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Family Story in Hindi : अपराधबोध – हम बेवफा हरगिज न थे

Family Story in Hindi : शहर के व्यस्ततम बाजार से गुजर रहा था. पहले तो इस शहर में लगभग हर वर्ष आता था. धीरेधीरे अंतराल बढ़ता गया. अब एक लंबे अंतराल के बाद आया था. हर गुजरने वाले को बड़े गौर से देख रहा था इस आशा के साथ कि शायद वह भी दिख जाए. अचानक उस पर नजर ठहर गई. वही तो थी जिसे मैं वर्षों से ढूंढ़ रहा था. उस की नजर भी मु झ पर पड़ गई तो वह भी ठिठक गई.

पता नहीं अचानक मु झे क्या हुआ. बिना कुछ देखे मैं उस की ओर लपक लिया. गुजरती हुई एक कार ने उठा के मुझे एक ओर पटक दिया. पता नहीं मु झे क्या हुआ, शायद बेहोश हो गया था. आंखें खोलीं तो देखा, मेरे चारों ओर एक भीड़ थी और एक व्यक्ति मेरे मुंह पर पानी के छींटे मार रहा था. मैं हड़बड़ा कर उठा और चारों ओर देखने लगा. वह मु झे भीड़ के पीछे चिंतित हो देख रही थी.

‘‘मरने का इतना ही शौक है तो किसी रेलगाड़ी के नीचे आ जाओ, मेरी गाड़ी के आगे क्यों कूद गए,’’ एक सूटेडबूटेड व्यक्ति क्रोध में बोल रहा था. वह कार मालिक था. मैं ने उस से हाथ जोड़ कर क्षमा मांगी और वह बुदबुदाता हुआ चला गया और भीड़ भी छंट गई. वह हाथों में भरेभरे 2 थैले लिए वहीं मु झे घूर रही थी. माथे पर चिंता की लकीरें दृष्टिगोचर थीं और आंखों में पानी.

मैं धीमेधीमे कदमों से चलता हुआ उस के समीप गया. चाह कर मेरे मुंह से दो शब्द न निकल सके. शायद, उस की भी यही हालत थी. बस, देखते रहे एकदूसरे को. जब भीड़ के एकदो धक्के लगे तो सचेत हुए.

‘‘कैसे हो?’’ चुप्पी उसी ने तोड़ी. मेरे होंठ फड़फड़ा कर रह गए. मु झे अब भी विश्वास नहीं हो रहा था कि मैं उस के सामने खड़ा था जिसे वर्षों से मिलना चाहता था. गला भी रुंध गया था.

‘‘कहीं चोट तो नहीं लगी? उस ने फिर पूछा.

मैं ने न में सिर हिला दिया.

फिर एक खामोशी छा गई. बोल रहीं थीं तो केवल आंखें. एक बार फिर कोई मु झ से टकराया तो मैं सजग हुआ.

‘‘तुम कैसी हो?’’ मैं ने पूछा तो उस ने भी सिर हिला कर उत्तर दे दिया कि ठीक है.

‘‘चलो, कहीं बैठ कर चाय पीते हैं,’’ मैं ने सु झाया.

‘‘मिलन रैस्तरां चलते हैं,’’ वह बोली.

मेरे दिल में एक चुभन सी हुई. हम अकसर यहीं मिलबैठ चाय आदि पीते हुए बातें करते थे. रैस्तरां अधिक दूर नहीं था. उस के एक कोने में हम बैठ गए.

‘‘लगता है ढेर सारी शौपिंग हो रही है,’’ बात चलाने के लिए मैं बोला.

‘‘हां, शादी है बेटी की.’’

‘‘अकेले ही शौपिंग कर रही हो?’’

‘‘नहीं, नमिता अपने डैडी के साथ गई है दूसरी मार्केट और मैं घर के लिए वापस निकली थी.’’

‘‘कितने बच्चे हैं?’’

‘‘तीन, दो बेटे और एक बेटी.’’

‘‘पति?’’

‘‘रिटायर होने वाले हैं?’’

इतने में वेटर चाय आदि ले आया.

‘‘अपने बारे में बताओ,’’ उस ने पूछा.

‘‘सब बच्चे सैटल हो गए हैं. अपनी फैमिली के साथ मस्त हैं. बस, हम दोनों ही हैं,’’ एक सांस में मैं ने सब बता दिया और पूछ बैठा, ‘‘तुम बताओ, कैसी चल रही है तुम्हारी लाइफ?’’

‘‘सब ठीक है, पति बहुत खुले विचारों वाले हैं. बच्चे भी बहुत अच्छे हैं. अभी जमाने की ज्यादा हवा नहीं लगी है,’’ वह हंस कर बोली.

उस के बाद फिर एक सन्नाटा पसर गया. हम चाय की चुसकियां लेते हुए एकदूसरे को देखते रहे.

‘‘मैं अकसर शहर में आया करता था, लेकिन वह कभी भी नहीं दिखी, जिस की तलाश में आता था,’’ मैं ने ही चुप्पी तोड़ी. मैं ने साफ महसूस किया कि उस ने ठंडी सांस भरी थी.

‘‘मैं ने 10 वर्ष प्रतीक्षा की,’’ वह भरे गले से बोली.

‘‘मैं जानता हूं,’’ मैं ने स्वीकार किया.

‘‘कैसे?’’

‘‘लवली ने बताया था.’’

‘‘अरे हां, तुम्हारी बहन लवली मिली थी एक बार रास्ते में. उस ने बताया था कि तुम्हारा तलाक हो गया है,’’ उस की आवाज में एक दर्द था.

‘‘तलाक के बाद मैं अकसर यहां आता था. तुम्हारा पता नहीं चला. जहां तुम रहा करती थीं, वहां से पता चला कि तुम परिवार सहित शिफ्ट हो गई हो. कोई तुम्हारा नया एैड्रेस नहीं बता पाया.’’

‘‘जब सब खत्म ही हो गया था तो फिर क्यों मिलना चाहते थे. तुम ने दूसरी शादी कर ली, मैं ने भी अपना घर बसा लिया,’’ इस बार उस की आवाज में तल्खी थी.

एकाएक मुझ से कुछ कहते न बन सका. बस, उस के चेहरे को ताकता रहा, जिस पर गुस्सा नजर आ रहा था. वह भी मु झे घूर रही थी.

‘‘वेल, रश्मि,’’ पहली बार मैं ने उसे नाम से पुकारा. वैसे मैं उसे रूषी कह कर बुलाया करता था. मेरे मन पर एक बो झ था और अभी भी है- ‘अपराधबोध’.

वह चुप ही रही.

‘‘मैं तुम्हें बताना चाहता था कि मैं ने ऐसा क्यों किया.’’

वह अब भी कुछ न बोली.

‘‘मैं अच्छी नौकरी करता था. रहता अकेला ही था दूसरे शहर में. तुम्हारे व तुम्हारे परिवार का पूरा सपोर्ट था. स्टैंड ले लेता तो कोई मुझे रोक नहीं सकता था,’’ मैंने अपनी बात आगे बढ़ाई.

‘‘मुझे इसी बात का तो दुख हुआ था,’’ वह अब भी गुस्से में थी.

‘‘यह 50 वर्ष पुरानी बात है. आज का युग होता तो शायद मैं भी अपने पेरैंट्स, अपनी बहनों की परवा न करता. तुम जानती हो, वह जमाना और था जब सब जज्बातों की कदर करते थे, बड़ों की पूरी इज्जत करते थे, समाज से डरते थे कि लोग क्या कहेंगे. उसूलन मु झे तुम्हारे साथ किया वादा निभाना चाहिए था लेकिन मैं ने अपने जज्बात निभाए. घर में कोई तुम्हारे फेवर में न था, यह तुम्हें पता ही है. फिर आना तो तुम्हें इसी घर में था. क्या लाभ होता तुम्हें वहां ला कर जहां तुम्हारा तिरस्कार होता. बहनों की भी अभी शादी होनी थी, इसलिए मैं अपना परिवार नहीं छोड़ सकता था.’’ मेरे भीतर से वह सबकुछ निकल गया जिसे मैं बरसों से मन में दबाए बैठा था, जिस का मेरे मन पर बोझ था.

‘‘एक बार मु झ से बात तो की होती?’’ वह लगभग चिल्लाते हुए बोली तो आसपास की टेबल पर बैठे लोग हमारी ओर देखने लगे.

‘‘मैं तुम्हें फेस नहीं कर सकता था. इसे मेरी कमजोरी सम झ लो या कायरता,’’ मैं मन में शर्मिंदगी अनुभव कर रहा था.

‘‘तुम नहीं मिले, एक बार भी नहीं सोचा कि मेरे ऊपर क्या बीतेगी. एक बार बात तो करते. मैं तुम से प्रेम नहीं करती थी बल्कि पूजती थी. तुम्हें भी याद होगा कि एक बार जब हम एकांत में बैठे थे तो मैं स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख पाई तो तुम ने ही मु झे सम झाया था और तुम ने संयम नहीं खोया और मु झे जबरदस्ती रोका. इसलिए तुम्हें पूजती थी,’’ उस की आंखों में छिपे आंसू उस के गालों पर लुढ़कने लगे. मैं चाह कर भी उस के आंसू न पोंछ सका.

तभी उस के फोन की घंटी बजने लगी. वह बात करने लग गई. मैं ने अंदाजा लगाया कि फोन पर पति से बात कर रही थी.

‘‘उन का फोन था. पिक करने के लिए कह रहे थे. मैं ने उन से कहा है कि वे घर जाएं, मैं भी आ रही हूं.’’ मेरा अनुमान ठीक था.

उस ने मेरा फोन ले कर अपने फोन पर एक नंबर डायल किया और बताया कि यह उस का फोन नंबर है. वह औटो ले कर बिना अपने घर का पता दिए या मेरा लिए चली गई. मैं वहीं खड़ा देखता रहा जब तक कि औटो आंखों से ओ झल नहीं हो गया. आज मैं बहुत हलका अनुभव कर रहा था. वर्षों से जो मन पर एक अपराधबोध महसूस कर रहा था, वह निकल गया.

सुबह जब मैं वापस जाने के लिए तैयार हो रहा था तो मेरे फोन पर एक अजनबी फोन नंबर से कौल आई. मैं ने अटैंड की तो हक्काबक्का रह गया. यह रश्मि के पति सौरभ की कौल थी. वह मिलना चाहता था. मैं असमंजस में पड़ गया. कोई और चारा न देख मैं ने उस से बसस्टैंड पर मिलने के लिए कह दिया क्योंकि एक घंटे बाद मेरी बस निकलने वाली थी.

हम एकदूसरे को नहीं जानते थे, देखा ही नहीं था कभी. बसस्टैंड पहुंचते ही मैं ने उस के फोन पर कौल की तो उस ने तुरंत अटैंड की.
देखा तो वह बस के समीप ही फोन कान पर लगाए बात कर रहा था. उस ने भी मु झे देख लिया. उस के हाथ में एक डब्बा था.

हाथ मिलाने की औपचारिकता के बाद वह डब्बा मु झे पकड़ाते हुए बोला, ‘‘यह रश्मि ने भेजा है, कह रही थी कि आप को खीर बहुत पसंद है. इस के साथ ही मैं आप का धन्यवाद करना चाहता हूं कि आप से मिलने के बाद वह आज वर्षों बाद गहरी और चैन की नींद सोई है. नहीं तो वह आधी रात के बाद करवटें ही बदलती रहती थी. आज पहली बार मैं ने उस के चेहरे पर एक शांति देखी है. यह कार्ड भी भेजा है. हमारी बेटी की शादी है, आना अवश्य.’’

मैं डब्बा और कार्ड लिए हुए किंकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा रह गया. बस कंडक्टर ने सीटी बजाई तो चेता और बस पर चढ़ते हुए केवल उस का धन्यवाद ही कर सका. मन में गाना बजने लगा, ‘हम बेवफा हरगिज न थे, पर हम वफा कर न सके…’ Family Story in Hindi

Family Story in Hindi : डिग्री – शादी का रोड़ा तो नहीं ?

Family Story in Hindi : रोहन दोपहर के खाने के बाद औफिस में सुस्ता रहा था. औफिस का कामधंधा तो बढि़या टनाटन चल रहा है, फिर भी सोच उन की पुत्री नेहा पर अटक गई.

नेहा 32 वर्ष की हो गई है. रोहन की सोच नेहा के विवाह की थी. इस उम्र तक पुत्री का विवाह हो जाना चाहिए.

हुआ कुछ यों, पहले नेहा ने विवाह के लिए इनकार कर दिया. जब तक उस की पढ़ाई समाप्त नहीं हो जाती, वह विवाह नहीं करेगी. नेहा पढ़ने में होशियार थी. बीकौम के साथ चार्टर्ड अकाउंटैंसी की पढ़ाई कर रही थी. बीकौम फर्स्ट डिवीजन में पास कर ली. सीए इंटर भी पास हो गया.

सीए फाइनल में अटक गई. नेहा ने ठान लिया जब तक सीए नहीं बन जाती, शादी नहीं करेगी. एक ग्रुप अटका हुआ था, आखिर 2 वर्ष बाद सफलता मिल ही गई. नेहा सीए बन गई और नौकरी भी करने लगी.

रोहन ने पत्नी रिया के माध्यम से नेहा से कहना आरंभ कर दिया. विवाह कर ले. नेहा ने अपनी पसंद से विवाह की बात की.

कालेज के दिनों में नेहा की मित्रता नयन से गाढ़ी हो गई थी. नयन के पिता का अपना व्यापार था. नेहा और नयन एकदूसरे के घर आतेजाते रहते थे. रिया को ऐसा महसूस हुआ, नेहा की पहली और अंतिम पसंद नयन ही है.

रोहन और रिया को नयन के साथ रिश्ते में कोई आपत्ति नहीं थी. उन्हें नेहा की हरी झंडी की प्रतीक्षा थी.

जहां नेहा ने फर्स्ट डिवीजन में बी कौम किया, नयन थर्ड डिवीजन में पास हुआ. उस ने भी सीए में दाखिला तो लिया लेकिन इंटर में लुढ़क गया और सीए की पढ़ाई छोड़ कर अपने पिता के व्यापार में सैट हो गया.

नेहा के सीए बनने पर रोहन और रिया ने एक शानदार पार्टी का आयोजन किया और अपने दिल की बात नयन के पिता को बता ही दी. नयन के पिता ने एक सप्ताह बाद बातचीत करने को कहा.

एक रैस्तरां में रोहन और रिया नयन के मातापिता से मिले. कुछ औपचारिक कुशलक्षेम की बातें हुईं और फिर रोहन सीधे मुद्दे की बात पर आए.

‘‘नेहा और नयन कालेज के दिनों से घनिष्ठ मित्र हैं और मेरी इच्छा है हम दोनों के विवाह के लिए सहमत हो जाएं.’’

नयन के मातापिता का जवाब सुन कर रोहन का माथा घूम गया.

‘‘माना दोनों बहुत वर्षों से दोस्त हैं. दोस्ती का यह मतलब नहीं होता, वे आपस में विवाह भी करें.’’

‘‘अच्छी दोस्ती का सीधा अर्थ होता है, वे एकदूसरे को अच्छी तरह सम झते हैं. विवाह सफल रहेगा,’’ रोहन ने अपना मत रखा.

‘‘देखिए, नयन बीकौम है और हमारे पारिवारिक व्यवसाय में रचबस गया है. उस के लिए कई व्यापारिक घरानों से रिश्ते आ रहे हैं. हम उन रिश्तों पर भी विचार कर रहे हैं.’’

‘‘मेरा भी अपना व्यापार है. दादाजी ने एक दुकान से काम आरंभ किया था, अब 2 फैक्ट्री हैं,’’ रोहन ने नयन के पिता को प्रभावित किया.

‘‘वह तो ठीक है लेकिन हमें अधिक पढ़ीलिखी लड़की बहू के रूप में स्वीकार्य नहीं है.’’

‘‘शादी का पढ़ाई से क्या संबंध है. लड़का और लड़की जब एकदूसरे को पसंद करते हैं तब पढ़ाई आड़े नहीं आती.’’

‘‘हम आप की बात से सहमत नहीं हैं. आप की लड़की हमारे लड़के से अधिक पढ़ी है. स्वाभाविक रूप से वह अपनी पढ़ाई का रोब डाल कर लड़के से ऊपर रहेगी. नयन कुंठा में नहीं जीना चाहता. हमें सिर्फ बीकौम पास लड़की ही चाहिए, जो नयन की बराबरी करे लेकिन ऊपर रहने का रौब न डाले,’’ नयन के पिता ने दोटूक कह दिया.

रोहन ने बात संभालने का प्रयास किया, ‘‘नेहा और नयन एकसाथ घूमफिर रहे हैं. दोनों खुश हैं. मु झे तो कभी एहसास नहीं हुआ, नेहा को अपने सीए होने का घमंड हो या नयन को कभी ताना मारा हो. जब अच्छे मित्र पतिपत्नी बनते हैं तब उन का प्यार और निखरता है. नेहा सीए है, उस की पढ़ाई आप के काम आएगी. उस के ज्ञान और टैक्स की जानकारी से आप को फायदा होगा, आप के व्यापार को फायदा होगा.’’

‘‘फिर तो हमारे ऊपर भी रौब डालेगी, हमें कुछ नहीं आता. सब ज्ञान उसी को है. हम जिस सीए से काम कराते हैं वह हमें सलाम मारता है और झुक कर काम करता है. उस को मालूम है अधिक बोला तो किसी और सीए से काम करवा लेंगे. अगर नेहा ने हमारा काम संभाला तब वह बहू नहीं, हमारा बाप बन जाएगी जो हम नहीं चाहते.’’

रोहन नयन के पिता के तर्क सुन कर चुप हो गया. उस ने कभी सोचा नहीं था आज के आधुनिक युग में भी पुरानी सोच के लोग जी रहे हैं.

नेहा और नयन अच्छे मित्र तो थे लेकिन पतिपत्नी नहीं बन सके. जो सपने संजोए थे उन्होंने, धाराशायी हो गए.

कुछ दिनों बाद नयन की शादी का समाचार मिला. एक बार फिर रिया ने बात छेड़ी.

‘‘तेरी कोई पसंद हो तो बता. कोई औफिस सहपाठी या फिर कोई मित्र?’’

नेहा ने कुछ समय मांगा. अभी नौकरी बदलनी है. कुछ समय बाद सोचेगी. लड़की सीए है, अच्छी नौकरी है. सैलरी बढि़या है. रिश्तेदारों ने भी अपने लड़कों के लिए रिश्ते भेजने बंद नहीं किए थे. रोहन औफिस में यही सोच रहा था. लड़की हो या लड़का, हर किसी को शारीरिक जरूरतों के लिए विवाह के बंधन में बंधना होता है. कुदरत के नियम पर समाज ने अपनी मोहर लगाई है. नयन की शादी हो गई. नेहा को कुछ सोचना चाहिए. जब उसे खुली छूट दी है, जिस लड़के को पसंद करेगी उसी से विवाह करा देंगे. इसी उधेड़बुन में रिया को फोन लगाया.

‘‘मैं आज रात फाइनल बात करती हूं. आज भी मेरे पास 2 रिश्ते आए हैं, क्या जवाब दूं. कब तक मना करती रहूं. एक समय बाद तो रिश्ते आने भी बंद हो जाएंगे.’’

रात को नेहा ने कह दिया, ‘‘नयन के बाद कोई लड़का उस के जीवन में नहीं है. आप के सु झाए लड़के पर वह विचार करेगी.’’

रोहन और रिया को इस जवाब पर प्रसन्नता हुई. आए रिश्तों पर चर्चा होने लगी. कुछ लड़के नेहा की 32 वर्ष उम्र देखते ही पीछे हट गए, हमें अपने से बड़ी उम्र की लड़की नहीं चाहिए.

बिरादरी के होली मिलन पर रोहन, रिया और नेहा हंसमिल कर सभी से बातें कर रहे थे. कुछ आंखें संभावित बहू और वर की तलाश में थीं.

‘‘और रिया, अपने को खूब मैंटेन कर रखा है,’’ सुकन्या ने हायहैलो करते हुए पूछा.

‘‘थैंक्यू, और बता, क्या चल रहा है?’’

‘‘इस से तो मिलवा,’’ नेहा को देख कर पूछा.

‘‘अब वर्षों बाद मिल रही है, भूल गई क्या. मेरा एक ही तो बच्चा है, नेहा.’’

‘‘हाऊ स्वीट, बड़ी प्यारी बच्ची है. शादी का कोई इरादा है क्या?’’

‘‘सीए बन गई है. गुरुग्राम में नौकरी कर रही है. कोई लड़का हो तो बताना,’’ रिया ने सुकन्या के कान में बात डाल दी.

‘‘नेकी और पूछपूछ. वह सामने देख लड़का, जंचे तो बता. अभी मिलवा देती हूं.’’

‘‘कौन है?’’

‘‘मेरी भाभी का लड़का है. गुरुग्राम में सौफ्टवेयर इंजीनियर है.’’

सुकन्या रिया का हाथ पकड़ कर अपनी भाभी से मिलवाने ले गई. लड़के का नाम यश था. रिया और यश को मिलवाया. खैर, मिलने का पहला अवसर था. बस, हायहैलो हुई.

रिया ने यह अवसर लपक लिया. सुकन्या और उस की भाभी से पूरी जानकारी प्राप्त कर ली. नेहा खूबसूरत थी. यश भी हैंडसम था. पहली नजर में दोनों एकदूसरे के परिवार को पसंद आ गए. 2 दिनों बाद रविवार था. सुकन्या के घर मिलने का कार्यक्रम तय हुआ. रोहन का पहला अनुभव खट्टा रहा था, इसलिए उस ने एक रैस्तरां में मिलने का कार्यक्रम तय किया.

रैस्तरां में नेहा और यश अलग टेबल पर बैठ कर बातचीत करने लगे.

रोहन ने यश के परिवार को स्पष्ट कर दिया. नेहा सीए है और यश सिर्फ बीटैक है.

देखा जाए तो नेहा की डिग्री बड़ी है और दूसरी बात यह है कि नेहा की उम्र 32 वर्ष है और यश की आप ने 30 वर्ष बताई है. मु झे और रिया को कोई फर्क नहीं पड़ता. भारतीय समाज में आज भी कुछ पुरानी सोच के व्यक्ति हैं जो विवाह के समय लड़की का कम पढ़ा होना और छोटी उम्र का होना पसंद करते हैं.

यश के पिता ने रोहन का हाथ पकड़ा और एक अलग टेबल पर ले गए. रोहन को कुछ सम झ नहीं आया. आखिर, एकांत में क्या कहना चाहते हैं.

‘‘देखो, एक अंदर की बात बताता हूं. मैं इन बातों पर विश्वास नहीं रखता हूं.’’

‘‘यह तो आप का बड़प्पन है,’’ रोहन ने यश के पिता का शुक्रिया अदा किया कि वे दकियानूस नहीं हैं.

‘‘पहले नेहा और यश अपनी पसंद बताएं. उन की पसंद मिल जाए तो आप को वह बात बताऊंगा जिस के लिए मैं आप को अलग टेबल पर लाया हूं.’’

कुछ बातें हुईं. खाना हुआ और सभी अपने घर वापस आ गए. रोहन उस बात को सम झने की कोशिश कर रहा था, यश के पिता क्या कहना चाहते थे, कहीं बेवकूफ तो नहीं बना रहे.

रात को नेहा और यश ने अपनीअपनी स्वीकृति प्रदान की. रोहन और रिया के चेहरे पर रौनक आ गई. अगले रविवार शगुन की थाली ले कर रोहन यश के घर पहुंचे. रिश्ता पक्का हुआ.

मुसकराते हुए यश के पिता रोहन को फिर एकांत में ले गए.

‘‘वह एक बात रह गई जो उस दिन रैस्तरां में बतानी थी.’’

‘‘जी, कहिए.’’

‘‘शादी के समय मैं सिर्फ 12वीं पास था. 33 फीसदी के साथ पास हुआ. कालेज में एडमिशन के लिए कम से कम 40 फीसदी नंबर चाहिए होते हैं. मैं तो स्टौकब्रोकर बन गया. यश की मां एमए पास है. जब मु झे मालूम हुआ, नेहा सीए है तब सब से बड़ी खुशी मु झे हुई. नेहा से कहना, नौकरी छोड़ कर मेरे औफिस में हाथ बंटाए.’’

रोहन मुसकरा दिया. यश के पिता को गले लगाया. मुड़ कर देखा, नेहा और यश दूसरे कमरे में बतिया रहे थे. उन दोनों को डिग्री से अधिक एकदूसरे के विचारों से मतलब था. Family Story in Hindi

Satirical Story In Hindi : अफवाह के चक्कर में – पत्नी साहिबा ने कर दी गड़बड़

Satirical Story In Hindi : जैसे ही बड़े साहब के कमरे में छोटे साहब दाखिल हुए, बड़े साहब हत्थे से उखड़ पड़े, ‘‘इस दीवाली पर प्रदेश में 2 अरब की मिठाई बिक गई, आप लोगों ने व्यापार कर वसूलने की कोई व्यवस्था ही नहीं की. करोड़ों रुपए का राजस्व मारा गया और आप सोते ही रह गए. यह देखिए अखबार में क्या निकला?है? नुकसान हुआ सो हुआ ही, महकमे की बदनामी कितनी हुई? पता नहीं आप जैसे अफीमची अफसरों से इस मुल्क को कब छुटकारा मिलेगा?’’ बड़े साहब की दहाड़ सुन कर स्टेनो भी सहम गई. उस के हाथ टाइप करतेकरते एकाएक रुक गए. उस ने अपनी लटें संभालते हुए कनखियों से छोटे साहब के चेहरे की ओर देखा, वह पसीनेपसीने हुए जा रहे थे. बड़े साहब द्वारा फेंके गए अखबार को उठा कर बड़े सलीके से सहेजते हुए बोले, ‘‘वह…क्या है सर? हम लोग उस से बड़ी कमाई के चक्कर में पड़े हुए?थे…’’

उन की बात अभी आधी ही हुई थी कि बड़े साहब ने फिर जोरदार डांट पिलाई, ‘‘मुल्क चाहे अमेरिका की तरह पाताल में चला जाए. आप से कोई मतलब नहीं. आप को सिर्फ अपनी जेबें और अपने घर भरने से मतलब है. अरे, मैं पूछता हूं यह घूसखोरी आप को कहां तक ले जाएगी? जिस सरकार का नमक खाते हैं उस के प्रति आप का, कोई फर्ज बनता है कि नहीं?’’ यह कहतेकहते वह स्टेनो की तरफ मुखातिब हो गए, ‘‘अरे, मैडम, आप इधर क्या सुनने लगीं, आप रिपोर्ट टाइप कीजिए, आज वह शासन को जानी है.’’

वह सहमी हुई फिर टाइप शुरू करना ही चाहती थी कि बिजली गुल हो गई. छोटे साहब और स्टेनो दोनों ने ही अंधेरे का फायदा उठाते हुए राहत की कुछ सांसें ले डालीं. पर यह आराम बहुत छोटा सा ही निकला. बिजली वालों की गलती से इस बार बिजली तुरंत ही आ गई. ‘‘सर, बात ऐसी नहीं थी, जैसी आप सोच बैठे. बात यह थी…’’ छोटे साहब ने हकलाते हुए अपनी बात पूरी की.

‘‘फिर कैसी बात थी? बोलिए… बोलिए…’’ बड़े साहब ने गुस्से में आंखें मटकाईं. स्टेनो ने अपनी हंसी को रोकने के लिए दांतों से होंठ काट लिए, तब जा कर हंसी पर कंट्रोल कर पाई. ‘‘सर, हम लोग यह सोच रहे थे कि मिठाई की बिक्री तो 1-2 दिन की थी, जबकि फल और सब्जियों की बिक्री रोज होती है, पापी पेट भरने के लिए सब्जियां खरीदा जाना आम जनता की विवशता है. तो क्यों न उस पर…’’

इतना सुनना था कि बड़े साहब की आंखों में चमक आ गई, वह खुशी से उछल पडे़, ‘‘अरे, वाह, मेरे सोने के शेर. यह बात पहले क्यों नहीं बताई? अब आप बैठ जाइए, मेरी एक चाय पी कर ही यहां से जाएंगे,’’ कहतेकहते फिर स्टेनो की तरफ मुड़े, ‘‘मैडम, जो रिपोर्ट आप टाइप कर रही?थीं, उसे फाड़ दीजिए. अब नया डिक्टेशन देना पड़ेगा. ऐसा कीजिए, चाय का आर्डर दीजिए और आप भी हमारे साथ चाय पीएंगी.’’ अगले दिन से शहर में सब्जियों पर कर लगाने की सूचना घोषित कर दी गई और उस के अगले दिन से धड़ाधड़ छापे पड़ने लगे. अमुक के फ्रिज से 9 किलो टमाटर निकले, अमुक के यहां 5 किलो भिंडियां बरामद हुईं. एक महिला 7 किलो शिमलामिर्च के साथ पकड़ी गई?थी, पर 2 किलो के बदले में उसे छोड़ दिया. जब आईजी से इस बाबत बात की गई तो पता चला कि वह सब्जी बेचने वाली थी, उस ने लाइसेंस के लिए केंद्रीय कार्यालय में अरजी दी हुई है. शहर में सब्जी वालों के कोहराम के बावजूद अच्छा राजस्व आने लगा. बड़े साहब फूले नहीं समा रहे थे.

एक दिन बड़े साहब सपरिवार आउटिंग पर थे. आफिस में सूचना भेज दी थी कि कोई पूछे तो मीटिंग में जाने की बात कह दी जाए. छोटे साहब और स्टेनो, दोनों की तो जैसे लाटरी लग गई. उस दिन सिवा चायनाश्ते के कोई काम ही नहीं करना पड़ा. अभी हंसीमजाक शुरू ही हुआ था कि चपरासी ने उन्हें यह कह कर डिस्टर्ब कर दिया कि कोई मिलने आया है.

छोटे साहब ने कहा, ‘‘मैं देख कर आता हूं,’’ बाहर देखा तो एक नौजवान अच्छे सूट और टाई में सलाम मारता मिला. उसे कोई अधिकारी जान छोटे साहब ने अंदर आने का निमंत्रण दे डाला. उस ने हिचकिचाते हुए अपना परिचय दिया, ‘‘मैं छोटामोटा सब्जी का आढ़ती हूं. इधर से गुजर रहा था तो सोचा क्यों न सलाम करता चलूं,’’ यह कहते हुए वह स्टेनो की ओर मुखातिब हुआ, ‘‘मैडम, यह 1 किलो सोयामेथी आप के लिए?है और ये 6 गोभी के फूल और 2 गड्डी धनिया, छोटे साहब आप के लिए.’’ छोटे साहब ने इधरउधर देखा और पूछा, ‘‘बड़े साहब के लिए?’’

उस ने दबी जबान से बताया, ‘‘एक पेटी टमाटर उन के घर पहुंचा आया हूं.’’ बड़े साहब की रिपोर्ट शासन से होती हुई जब अमेरिका पहुंची तो वहां के नए राष्ट्रपति ने ऐलान किया कि अगर लोग हिंदुस्तान की सब्जी मार्किट में इनवेस्ट करना शुरू कर दें तो वहां के स्टाक मार्किट में आए भूचाल को समाप्त किया जा सकता है.

एक अखबार ने हिंदुस्तान की फुजूलखर्ची पर अफसोस जताते हुए खबर छापी, ‘‘अगर चंद्रयान के प्रक्षेपण पर खर्च किए धन को सब्जी मार्किट में लगा दिया जाता तो उस के फायदे से लेहमैन जैसी 100 कंपनियां खरीदी जा सकती थीं.’’ जैसे आयकर के छापे पड़ने से बड़े लोगों के सम्मान में चार चांद लगते हैं, बड़ेबड़े घोटालों के संदर्भ में छापे पड़ने से राजनीतिबाज गर्व का अनुभव करते हैं, आपराधिक मुकदमों की संख्या देख कर चुनावी टिकट मिलने की संभावना बढ़ती है वैसे ही सब्जी के संदर्भ में छापे पड़ने से सदियों से त्रस्त हम अल्पआय वालों को भी सम्मान मिल सकता है, यह सोच कर मैं ने भी अपने महल्ले में अफवाह उड़ा दी कि मेरे घर में 5 किलो कद्दू है.

छापे के इंतजार में कई दिन तक कहीं बाहर नहीं निकला. अपनी गली से निकलने वाले हर पुलिस वाले को देख कर ललचाता रहा कि शायद कोई आए. मेरा नाम भी अखबारों में छपे. 15 दिन की प्रतीक्षा के बाद जब मैं यह सोचने को विवश हो चुका था कि कहीं कद्दू को बीपीएल (गरीबी रेखा के नीचे) में तो नहीं रख दिया गया? तभी एक पुलिस वाला आ धमका. मेरी आंखों में चमक आ गई. मैं ने बीवी को बुलाया, ‘‘सुनती हो, इन को कद्दू ला के दिखा दो.’’ बीवी मेरे द्वारा बताए गए दिशा- निर्देशों के अनुसार पूरे तौर पर सजसंवर कर…बड़े ही सलीके से 250 ग्राम कद्दू सामने रखती हुई बोली, ‘‘बाकी 15 दिन में खर्च हो गयाजी.’’

पुलिस वाले ने गौर से देखा कि न तो चायपानी की कोई व्यवस्था थी और न ही मेरी कोई मुट्ठी बंद थी. उस की मुद्रा बता रही थी कि वह मेरी बीवी के साजशृंगार और मेरे व्यवहार, दोनों ही से असंतुष्ट था. वह मेरी तरफ मुखातिब हो कर बोला, ‘‘आप को अफवाह फैलाने के अपराध में दरोगाजी ने थाने पर बुलवाया है.’’ Satirical Story In Hindi

Satirical Story In Hindi : सफाई अभियान – देशमुखजी ने बाजी हारनी नहीं सीखी थी

Satirical Story In Hindi : पांडुरावजी रात भर सो नहीं पाए थे. बात ही ऐसी हो गई थी. देशमुखजी ने कल रात की बैठक में उन पर जो हमला किया था, उस से वह तिलमिला गए थे. हां, देशमुख ही कह रहे थे, ‘‘इतनी गंदगी शहर में है कि नागरिकों का रहना मुश्किल हो गया है. सड़कों पर गड्ढे, खंबों पर बल्ब नहीं, ट्यूब लाइटें बंद पड़ी हैं. सारा शहर सड़ रहा है. लगता है प्रशासन ही सो गया है. मैं तो राज्य सरकार से अपील करूंगा कि बोर्ड ही भंग कर दिया जाए.’’ ‘‘बोर्ड भंग कर दिया जाए…बोर्ड भंग…’’

पांडुरावजी की नींद गायब हो गई थी. समाचारपत्र में छपा था, ‘‘पिछले साल 16 इस साल 56 फिर भी शहर गंदा.’’

उधर गाएं चारे के अभाव में गोशाला में मर रही थीं. हर वार्ड के सदस्य कुश्ती पर उतारू हो गए थे. बहन तारा व कसारा तो पांडुरावजी से ही लड़ गई थीं. सुबह उठते ही उन्होंने दरवाजे पर खड़ी नगर परिषद की कार को देखा. देखते ही रह गए. मोह आया, गाय जैसे बछड़े को चाटती है उसे हाथ से सहलाते रहे…गाय जड़ थी नहीं तो रंभा जाती.

माली आ गया था. जमादार बाहर सड़क पर हरिजनों को डांट रहा था. ‘हूं, यह हुकूमत ही तो देशमुख को चुभ गई है.’ वह बड़बड़ाए. टेलीफोन पर हाथ गया. रिसीवर उठाया. कमिश्नर को आने को तुरंत कह कर तैयार होने चले गए.

सक्सेनाजी की रात, मीठे सपनों में गुजर गई थी. कल की बैठक क्या हुई, लगा मानो शीरनी बरस रही हो. हैल्थ आफिसर पांडे पास ही बैठा था. बोला, ‘‘सर, अभियान हो जाए.’’ ‘‘सफाई अभियान,’’ गुप्ता चीफ सेनेटरी इंस्पेक्टर उछल गया था.

‘‘साल भर हो गया, कुछ तो होना ही चाहिए. जो कुछ अब तक हुआ वह तो ऊंट के मुंह में जीरा ही गया.’’ सक्सेना बाबू मीटिंग के बाद इसी उधेड़बुन में लग गए थे और वह चेयरमैन के घर की जगह देशमुख के घर चले गए थे. साथ में पांडेजी भी थे.

देशमुख चौंके, ‘‘आप?’’ ‘‘आप ने क्या भाषण दिया, मजा ही आ गया,’’ पांडेजी बोले.

‘‘वास्तव में शहर सड़ने लग गया है.’’ ‘‘पर जिम्मेदारी आप की है.’’

‘‘साहब, हम क्या करें, 150 हरिजनों की स्टाफ पेटर्न में जरूरत है पर यहां भरती 100 से अधिक नहीं है. जमादार का पद खाली है. एस.आई. नहीं है, आप ने कभी हमारी तकलीफ भी जानी है.’’ ‘‘वह तो है ही.’’

‘‘इधर फिनायल नहीं है. लाइट के सामान का आर्डर इस बार बाहर भिजवा दिया गया है. माल का पता नहीं. 3 बार आदमी गया है, आप भी बताइए…’’ ‘‘बिजली का आर्डर…’’ देशमुख को लगा, घाव पर मरहम पांडेजी लगा गए हैं.

अब तक देशमुख की दुकान से सारा सामान जाता था. शिकायत यही थी कि माल डुप्लीकेट हुआ करता था. ट्यूबलाइट ज्यादा टिक नहीं पाती थी. माल की क्वालिटी घटिया थी. पांडुराव ने जले पर नमक छिड़का था. आर्डर सीधा ही कंपनी के डीलर को दे दिया था. उस ने कमीशन देने से मना कर दिया था. अकाउंट आफिसर अलग नाराज था. वह कमीशन के बदले बिल पर ही टे्रड डिस्काउंट दे रहा था. बात यहीं बिगड़ गई थी. अब परिषद ही माल नहीं उठा रही थी.

कमेटी वाले चौराहे पर फ्यूज ट्यूबलाइट लगा रहे थे. जहां आदमी मुखर थे वहां के बल्ब ज्यादा फ्यूज हो रहे थे. बात यहीं तक रहती तो गनीमत थी. पांडुराव ज्यादा ही सख्त हो चले थे. बोले, ‘‘कच्ची भरती बंद…रखना हो तो पक्के आदमी रखो.’’ 50 हरिजनों की स्वीकृति की बात चल रही थी. झगड़ा उस को भी ले कर था. हैल्थ आफिसर ने हरिजन नेताओं से बात कर रखी थी. सौदा पट गया था. पर देशमुख पहले बिजली की खरीद तय करना चाह रहे थे. तय हो चुका था ठेके पर आदमी रखो पर किस के, विधायक महोदय अपने आदमी रखना चाह रहे थे. चुनाव का पता नहीं कब घंटी बज जाए. पांडुराव ने सदस्यों की कमेटियां बनाईं, पर विधायक ने ऊपर से रुकवा दीं. उन के आदमी रह गए थे.

झगड़ा ही झगड़ा. जन सेवा नहीं हुई आग में जलना हो गया है. उधर सत्ता सुख खींच रहा था. इधर कार्यकर्ता भी संभल नहीं रहे थे. देशमुख को पता था कि ताज उन्हीं को पहनना था पर आखिरी समय में सी.एम. का ही मानस बदल गया था. विरोधी कान भर आए थे कि ये आप के नहीं रहेंगे. पांडुरावजी भीड़ में थे, वे विधायक को पटा आए थे, ‘‘सर, मेरा तो कोई गुट है नहीं, मैं तो आप का ही हूं, हमेशा रहूंगा.’’

बस, फिर क्या था, उन का ही नाम आया. आम सहमति बन गई. देशमुख आज काफी खुश थे कि काफी धूल उड़ा आए हैं. अखबार वालों को भी दावत दे आए थे. पत्रकार भी विज्ञापन न मिलने से नाराज थे. नगर परिषद से महीने भर में 10-20 हजार के जो विज्ञापन मिल जाते थे वे भी अब तक नहीं मिले थे. इस बार जो खालीपन आ गया था, वे भी ऊब गए थे. उन को भी कुछ आस बंधने लगी थी.

कमिश्नर अकेले नहीं आए, पांडेजी भी साथ थे. आज देशमुख बहुत खुश थे. पार्टी कार्यकर्ता अभीअभी मिल कर गए थे. शर्मा मेंबर भी बहुत नाराज थे, क्योंकि सफाई का काम वह ही देख रहे थे. सक्सेनाजी और उन की अच्छी पट रही थी, जो पांडे को पसंद नहीं था. समिति तो बन नहीं पाई थी पर मेंबरों का दबाव उन के साथ था. वाइस चेयरमैन तो वह ही थे. पार्टी नेताओं के भी वह चहेते थे. उन्हें हैल्थ आफिसर समझा आए थे, ‘‘महीने भर अभियान चलेगा, तो 20 ट्रैक्टर किराए पर चलेंगे. 500 रुपया रोज से कम किराया नहीं. 20 प्रतिशत कमीशन होता है. आप अपने आदमियों को लगवा दीजिए, जो कचरा निकलेगा वह डंपिंग ग्राउंड में नहीं डलवा कर खेतों में डलवा देंगे. मुनाफा ही मुनाफा है.’’

‘‘सर, यह सोना होता है. खाद 400 रुपए ट्रिप की मिल जाती है. दिन भर में 50 ट्रिप, महीने भर चलेगा. सीजन भी यही है. परिषद के ट्रैक्टर अपना काम अलग करते रहेंगे. सी.एस.आई. सब कर लेगा. सामान भी खरीदना होगा. फिनाइल में कमीशन बढ़ गया है. अभियान में नाली मरम्मत भी हो जाएगी. सहायक अभियंता आप से मिल लेगा. ‘‘40 वार्ड का मामला है. 5 लाख प्रति वार्ड भी खर्च किया तो 2 करोड़ का विकास होगा. आप देख लीजिए, आप वाइस चेयरमैन हैं. गंदगी नहीं हटेगी तो लोग हमें हटा देंगे. आप कुछ भी कीजिए, नहीं तो हम कहीं के नहीं रहेंगे.’’

शर्माजी तभी से अकड़ गए थे. वह पांडुराव से कह आए थे, ‘‘चाहे तो आप पार्टी मीटिंग में वोट करवा लें.’’ देशमुख को सफाई की सारी बात समझ में आ गई थी. पर सफाई से बिजली भी जुड़ी हुई है. बिजली का सामान दुकान से निकल नहीं रहा था. ग्राहकी पहले ही नहीं थी. नाम तो जैसा चाहो लिखवा लो, दिल्ली में सब ठप्पा लग जाता है पर ग्राहक दोबारा कहां आता है. परिषद के चक्कर में मंगाया था, अभी तक सप्लाई यहीं से होती थी पर इस बार पतंग कट गई थी. हां, देशमुख घोषणा कर ही आए थे, ‘‘अगर अभियान नहीं होता है तो वह सदस्यता छोड़ देंगे.’’

शर्माजी कह रहे थे कि वह अपना इस्तीफा पार्टी हाईकमान को भेज रहे हैं. शहर की गंदगी पार्टी के मुंह पर तमाचा है. पांडुरावजी को कमिश्नर ने जब लौन में गंभीर मुद्रा में टहलते देखा तो वे चौंक गए. पांडेजी ने टोका, ‘‘मामला गड़बड़ है.’’

कुरसी पर बैठते ही कमिश्नर चौंक गए. पांडुराव बोले, ‘‘आप तो जानते ही हैं, सक्सेनाजी कि यह आप लोगों का प्रयास ही था, जो मैं चेयरमैन बना. आप से कुछ छिपा नहीं है. कितना खर्च हुआ सब आप को पता है. सोचता हूं अभियान शुरू कर दिया जाए. 1 जून से 1 माह का रख लेते हैं. फिर बारिश आ रही है. नालों की सफाई भी होनी है. शहर में सफाई और सौंदर्यीकरण आवश्यक है. आप लोग हैं ही. तैयारी शुरू कीजिए, सरकार के आदेश भी आने वाले हैं. ‘‘सर,’’ सक्सेनाजी की आंखों में चमक आ गई थी.

‘‘हां, ज्यादा नहीं लाख 2 लाख का उधार है…पुराना चल रहा है. पांडेजी को पता है. वे चुकता करवा देंगे. आप उन से सलाह लें ले. वह जो बताएं वैसी योजना बना लें. देशमुखजी को इस अभियान का संयोजक बनाना है. विधायकजी की यही इच्छा है. आप आदेश निकलवा लें अकाउंटेंट अपना ही आदमी है.’’ तब तक चाय आ गई थी.

कमिश्नर सक्सेना को लगा वह उस खेत की तरह हो गए हैं जिसे भेड़ों का रेवड़ जड़ से चर गया हो और वह परती धरती की तरह रह गए हों, जहां अब कुछ उगने की संभावना ही नहीं रह गई है. पांडेजी पास ही बैठे मुसकरा रहे थे. पांडुराव की आंखों में चमक थी और सक्सेना को लग रहा था, वह चाय नहीं गिलोयसत्व की फंकी लगा गए हों… Satirical Story In Hindi

Social Interest : जनवरी 2026 के सेकंड इश्यू में “आप के पत्र व अनुभव”

Social Interest :

संवेदनशील और मार्मिक कहानी

दिसंबर (द्वितीय) 2025 अंक में प्रकाशित कहानी ‘बदबू’ सच्चाई को बेबाकी से उकेरती हुई अपनी भाषा में बेहद संवेदनशील, मार्मिक और बोधगम्य तरीके से वैचारिक तथ्यों को उजागर करती है. इस से यह बेहद पठनीय बन पड़ी है. बहुत अरसे बाद ऐसी जीवंत कहानी पढ़ने में आई.  दीपान्विता राय बनर्जी

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समाज का आईना दिखाती कहानी

दिसंबर (द्वितीय) 2025 अंक में छपी कहानी ‘बदबू’ बहुत ही मार्मिक है. आज भी कितनी ऐसी ‘निद्रा’ (कहानी की पात्र) हैं जो इसी बदबू के साथ जीने को मजबूर हैं. वे इंसाफ के लिए लड़ रही हैं पर इंसाफ उन से कोसों दूर है और रेपिस्ट पैरोल पर बाहर निकल कर जिंदगी के मजे ले रहे हैं.

आखिर कब रुकेगी यह दहशत? कब औरतें, लड़कियां बेफिक्री से बाहर निकल पाएंगी? कब उन्हें लगेगा कि राह चलते कोई आवारा उन का पीछा नहीं कर रहा है? देश तरक्की कर रहा है मगर लड़कियां, औरतें आज भी डर के साए में जी रही हैं. नहीं पता उन्हें कि कब, कहां, कौन उन के साथ क्या कर दे. सगे भाई, बाप पर भी भरोसा नहीं रहा अब तो.   मिनी सिंह

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बच्चों के मुख से

मेरी बड़ी बहन गरमी की छुट्टियों में अरुणाचल प्रदेश की तरफ घूमने गई. उन की छोटी बेटी चैरी बहुत बोलती है. वहां के लोगों की आंखें थोड़ी छोटी होती हैं. वह सब को देखती रही, फिर बोली, ‘‘मम्मी, यहां के सारे लोग दिनरात सोते ही क्यों रहते हैं?’’ उस की सुलभ बात सुन कर हंसी आ गई.  लिटल महेंद्रा

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मेरी 3 वर्षीय बेटी मेरे पास आ कर बोली, ‘‘पापाजी, मेले को हात में मचल ने काता है. आप भी मचल के हात में कातना.’’

मैं कुछ समझ पाता, इस के पूर्व ही मेरी पत्नी जोर से हंसने लगी. वास्तव में बच्ची मच्छर के काटने पर शिकायत कर रही थी.                चेतनपुरी गोस्वामी

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मेरा 7 वर्षीय इकलौता बेटा सोमेश बहुत ही बातूनी व तेज दिमाग है. हमारा संयुक्त परिवार है. परिवार में ज्यादा बच्चे होने के कारण जो भी फल व मिठाइयां आती हैं, मेरी सासूमां सभी बहुओं के बीच में बांट देती हैं ताकि बच्चे आपस में लड़ाई न करें.

एक दिन शाम के समय सभी बच्चे मेरे कमरे में खेल रहे थे. सोने का समय हुआ तो सभी बच्चे चले गए. बस, मेरा बेटा ही रह गया.

वह कहता है, ‘‘मम्मी, अपन दादी से बोलेंगे कि बच्चों की पाती फिर से करें. दादी ने किसी ताईजी को 3-3 तो किसी ताईजी को 2-2 बच्चे दे दिए. बस, आप को ही एक बच्चा दिया. मैं दादी को अभी जा कर बोलता हूं कि मेरी मम्मी को भी 2 बच्चे दो, जिस से मेरी मम्मी के कमरे में भी हम 2 बच्चे हो जाएंगे.’’

यह सुनते ही मेरा हंसी के मारे बुरा हाल हो गया.   रीमा

 

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Social Interest

Readers’ Problems : “बुरे वक्त में कोई साथ नहीं देता”, “मेरे बौयफ्रैंड का मिलने का दबाव”, “भाभीदेवर के हंसीमजाक की सीमा”, “अपने लिए मैं ने कुछ किया नहीं”

Readers’ Problems :

बुरे वक्त में कोई साथ नहीं देता इस बात से दुखी हूं.

लगता है कि रिश्ते सिर्फ मतलब तक ही सीमित होते हैं. मैं 29 वर्ष का युवक हूं. मैं एक निजी कंपनी में नौकरी करता हूं और एक बड़े शहर में किराए के मकान में रहता हूं. पढ़ाई के समय से ही मेरा स्वभाव ऐसा रहा है कि मैं दोस्तों के लिए हमेशा खड़ा रहता हूं. किसी को पैसे की जरूरत हो, किसी का काम अटका हो या किसी को बस सुनने वाला चाहिए, मैं हर बार मौजूद रहता हूं. कई बार अपनी जरूरतें पीछे रख कर भी मैं ने दोस्तों की मदद की है.

समस्या तब महसूस होने लगी जब मेरी जिंदगी में मुश्किल समय आया. नौकरी में दबाव बढ़ गया, घर की कुछ जिम्मेदारियां भी सामने आ गईं. इस बार जब मुझे किसी दोस्त से बात करने या मदद की उम्मीद थी तो वही दोस्त या तो फोन नहीं उठाते थे या टालमटोल करने लगे.

धीरेधीरे यह बात साफ होने लगी कि जिन के लिए मैं हमेशा उपलब्ध रहा, वे मेरे लिए नहीं हैं. अब हालत यह है कि मैं लोगों पर भरोसा करने से डरने लगा हूं. मन में कड़वाहट आ गई है. कभीकभी खुद पर भी गुस्सा आता है कि मैं ने इतना दिया ही क्यों.

आप की तकलीफ सिर्फ दोस्तों से नहीं, अपेक्षाओं के टूटने से है. आप का स्वभाव देना है और यह एक अच्छी बात है लेकिन जब देने की आदत बिना सीमा के हो जाती है तो लोग उसे आप का स्वभाव नहीं, आप की मजबूरी समझने लगते हैं. यह समझना जरूरी है कि हर रिश्ता बराबरी का नहीं होता. कुछ लोग सिर्फ साथ चलने के लिए होते हैं, साथ निभाने के लिए नहीं. इस का मतलब यह नहीं कि आप गलत हैं, बल्कि इस का मतलब यह है कि आप ने लोगों को परखने में देर कर दी.

अब जरूरी है कि आप धीरेधीरे सीमाएं बनाना सीखें. हर किसी के लिए हर समय उपलब्ध रहना बंद करें. मदद करें, लेकिन अपनी कीमत पर नहीं. सच्चे रिश्ते कम होते हैं, लेकिन समय आने पर वही लोग टिकते हैं.

भरोसा पूरी तरह छोड़ना समाधान नहीं है, बल्कि सही लोगों पर भरोसा करना सीखना ही आगे का रास्ता है. याद रखिए जो खुद को बचाना सीख लेता है, वही दूसरों के लिए भी सही मायनों में खड़ा रह पाता है.

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मेरा बौयफ्रैंड बारबार मिलने के लिए दबाव डालता है.

मैं 16 साल की हूं. मेरा बौयफ्रैंड मुझे बहुत प्यार करता है. कभीकभी वह बारबार मिलने और ज्यादा समय साथ बिताने के लिए मुझ पर दबाव डालता है. मैं भी उसे पसंद करती हूं लेकिन कभीकभी डर लगता है कि मैं सही निर्णय नहीं ले रही. मुझे समझ नहीं आता कि मैं इस दबाव को कैसे संभालूं और खुद को सुरक्षित महसूस करूं.

प्यार में भी दबाव होना कभीकभी तनाव और डर पैदा कर सकता है. सब से पहले, यह जान लें कि आप का डर और चिंता पूरी तरह स्वाभाविक है. आप धीरेधीरे और विनम्र तरीके से अपने बौयफ्रैंड से कह सकती हैं कि आप अपने समय और सीमाओं के अनुसार ही मिलना चाहती हैं. अगर वह आप का सम्मान करता है तो वह इसे समझेगा. याद रखें, किसी भी रिश्ते में आप का मन, आप की शांति और सुरक्षा सब से अहम हैं.

*

भाभीदेवर के हंसीमजाक की सीमा क्या होनी चाहिए?

मैं 25 साल की हूं और मेरे देवर और मैं घर में अकसर अकेले समय में बातचीत करते हैं. कभीकभी मुझे लगता है कि हमारे बीच बातचीत या हंसीमजाक को कुछ लोग गलत समझ सकते हैं. मैं भाभीदेवर के रिश्ते के बीच सम्मान बनाए रखना चाहती हूं, लेकिन कभीकभी समझ नहीं आता कि मैं अपनी हदें कैसे तय करूं और कोई नाराज भी न हो.

परिवार में सीमाएं रखना और सम्मान बनाए रखना दोनों बहुत महत्त्वपूर्ण हैं. सब से पहले, यह जान लें कि हद तय करना स्वाभाविक और सही है. आप बातचीत और हंसीमजाक में विनम्रता बनाए रखें और अपनी निजी बातों को सोचसमझ कर साझा करें. यदि कोई बात असहज लगती है तो उसे शांति से नकार देना सीखें. परिवार के बाकी सदस्यों के सामने ऐसा व्यवहार साफ और सम्मानजनक रखें. याद रखें, किसी को खुश रखने के लिए अपनी मर्यादा या मानसिक शांति का त्याग न करें.

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कभीकभी लगता है अपने लिए मैं ने कुछ किया नहीं.

मैं 40 साल की हूं. घर, नौकरी, बच्चों और बुजुर्गों की जिम्मेदारियों में मेरी पूरी जिंदगी निकल रही है. मन थका रहता है, लेकिन किसी से कह नहीं पाती. सब को लगता है कि मैं मजबूत हूं, पर अंदर से बहुत खाली महसूस करती हूं. समझ नहीं आता कि मैं इस भावना से कैसे बाहर निकलूं.

जब इंसान लगातार दूसरों के लिए जीता है और खुद को पीछे छोड़ देता है तो ऐसा खालीपन आना स्वाभाविक है. सब से पहले, यह मान लेना जरूरी है कि आप की थकान और उदासी गलत नहीं है. आप इंसान हैं, मशीन नहीं. आप रोज अपने लिए थोड़ा सा समय निकालने की कोशिश करें, चाहे वह 15 मिनट की चुप्पी हो, पसंदीदा गाने, किताब या टहलना. किसी भरोसेमंद व्यक्ति से दिल की बात कहना भी बहुत हलका कर देता है. याद रखिए, खुद का खयाल रखना स्वार्थ नहीं, जरूरत है.

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Readers’ Problems

Land Allotment Dispute : सरित प्रवाह – जमीन, जमीन और जमीन

Land Allotment Dispute : 1950 से 1960 तक जमींदारी उन्मूलन के काल में विनोबा भावे ने एक गांधीवादी आंदोलन चलाया था, भूदान, उस में उन्होंने जमींदारों से कहा था कि जहां भी जमींदारी हटाने के कानूनों के बावजूद जमीदारों के पास बहुत जमीन बच गई है जिस पर और कोई खेती कर रहा है, उस ज़मीन को वे खेती करने वाले किसानों को दान कर दें.

बहुतों ने ऐसा किया भी. उस समय विनोबा भावे का नारा था ‘सब भूमि गोपाल की’ यानी सारी जमीन तो भगवान की है, कोई जमींदार कैसे हक जमा सकता है. विनोबा भावे को और भूदान आंदोलन को आज कोई याद नहीं करता क्योंकि अब सारी जमीन लैंड एक्वीजन एक्ट के अंतर्गत सरकारों के हाथों में आ गई है और सरकारें उन्हें अपनी मरजी से पुराने राजाओं की तरह अपने चाटुकारों को दे रही हैं.

भाजपा सरकार ने जमीन के बड़ेबड़े टुकड़े मंदिरों और आश्रमों को देने शुरू कर दिए हैं क्योंकि मन में बैठा है कि जमीन या तो भगवान की है या सरकार की या किसी निजी व्यक्ति की. असल में किसी भी जमीन का टुकड़ा या तो किसी व्यक्ति या कंपनी का है या फिर आम जनता की साझी धरोहर है. साझी धरोहर की अवधारणा को अमेरिका की एक अदालत ने 1892 में कानूनी जामा पहनाया था. उस के अनुसार, जब कोई भी प्राकृतिक संसाधन आम जनता के साझे उपयोग में आ रहा हो और वह किसी की निजी संपत्ति न हो तो सरकार किसी को निजी उपयोग के लिए नहीं दे सकती.

इस निर्णय के बाद अमेरिका की सारी अदालतों ने यह मानना शुरू कर दिया और भारत तक यह अवधारणा पहुंच गई है. 2013 का भूमि अधिग्रहण कानून, जिसे कांग्रेस पार्टी की सरकार ने बड़ी मुश्किल से आखिरी सालों में पास कराया था, इस सिद्धांत को काफी हद तक लागू करता है. लेकिन अब सरकारें जनोपयोगी हजारों एकड़ भूमि, एयरवेज, एयरस्पेस, नदियों के तट, समुद्री तट, विकास के नाम पर निजी उद्योगपतियों को दे रही हैं या फिर मंदिरों को.

ये दोनों ही उस का बिना भुगतान किए जनता द्वारा इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध लगा रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट बारबार ऐसा आदेश दे रहा है कि यह अंसवैधानिक है लेकिन सरकारें अपने संसदीय दंभ में मान नहीं रहीं. अदानी, अंबानी, टाटा से ले कर स्थानीय भाजपाई पार्षदों को जमीनें, जो जनता की हैं, दी जा रही हैं. जनता की सारी संपत्ति सिकुड़ती जा रही है.

सडक़ पर एक खोमचे वाला भी उस का फायदा उठा रहा है और वह रास्ता रोक कर खड़े होने के हक को 10-20 दिन प्राचीन हक कहने लगता है. सड़क के बीच में पत्थर रख उस पर तिलक लगा कर उसे प्राचीन मंदिर घोषित कर के कोई पंडा वहां सदा के लिए कुटिया बना लेता है. अरावली पहाडिय़ों को कागजों पर समतल जमीन घोषित कर राजस्थान, हरियाणा व दिल्ली की सरकारें उन्हें निजी हाथों में सौंप कर मेज के नीचे (अंडर टेबल) से पैसा इकट्ठा कर रही हैं.

इन के खिलाफ आमजन कोर्ट में जा सकते हैं पर कोर्ट में जाना कोई आसान नहीं. कोर्ट में वकील बहुत महंगे हैं. शिकायत करने वाले को सैकड़ों कागज जमा करने पड़ते हैं, 100-700 बार कोर्ट में पेशी होती है. दूसरी तरफ सरकारी वकील टैक्स देने वालों के पैसे से लड़ते हैं जबकि जनता के हकों के लिए लडऩे वालों को चंदा जमा करना पड़ता है जो बहुत टेढ़ी खीर है. मंदिर, आश्रम और निजी उद्योग तो पैसा आसानी से ले आते हैं पर जनता के अधिकारों के रखवालों को जनता बेवकूफ व सनकी समझती है.

15 मई, 2025 को मुख्य न्यायाधीश वी आर गवई ने एक मामले में महाराष्ट्र के पुणे जिले में जनता के सामने जंगल की 12 हैक्टेयर जमीन को पहले कृषि के लिए देने और फिर बहुमंजिली रिहायशी मकान बनाने की सरकारी इजाजतों को अंसवैधानिक करार दे दिया था. जिन अफसरों ने अनुमति दी थी उन के नाम तो सामने आए लेकिन उन्हें कोई फटकार नहीं लगाई गई.

यह न भूलें ले कि एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, पुराने ऐतिहासिक स्थल विकास के नाम पर एकएक कर के देश के हर कोने से आम आदमी से छीने जा रहे हैं. आज तो राष्ट्रपति व संसद भवन के आसपास का इलाका भी आम जनता के लिए नहीं बचा है. उस पर सुरक्षा के नाम पर केवल सफेद सरकारी मंत्रियों और बाबुओं का कब्जा हो गया है. सुप्रीम कोर्ट 2025 या 1892 में अमेरिकी कोर्ट जो भी कहते रहें, स्टील फ्रेम वाले बाबू नहीं सुनने वाले. Land Allotment Dispute

Global Politics Analysis : सरित प्रवाह – यूरोपअमेरिका विवाद, फायदे में भारत

Global Politics Analysis : अमेरिका के खब्ती राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जब से डेनमार्क के औटोनौमस इलाके ग्रीनलैंड पर कब्जा जमाने की बात शुरू की है तब से यूरोप और अमेरिका का विवाद खुले में आ गया है और इस का फायदा शायद भारत को हो जाए. अमेरिका की ग्रीनलैंड को संयुक्त राज्य अमेरिका में मिलाने की धमकी बेमतलब की है. 3 लाख से ज्यादा वर्ग किलोमीटर में, भारत से लगभग दोगुना, फैला ग्रीनलैंड बर्फ की मोटी परत से ढका है और उस की आबादी महज 57,000 है.

इस पर मिलिट्री के बेस तो बनाए जा सकते हैं पर इस से कोई आर्थिक लाभ होगा, ऐसा नहीं है. सिर्फ इसलिए कि यह नक्शे में बड़ा दिखता है, डोनाल्ड ट्रंप इसे खाने को बच्चों की तरह लपक रहे हैं. यूरोप, जो अमेरिका को 1945 से ही अपना लीडर मानता रहा है, इस बार बुरी तरह खफा हो गया है और कनाडा समेत सभी यूरोपीय देशों ने इस मामले में साफ नाराजगी जाहिर कर दी है. ग्रीनलैंड पर पहले तो डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोप के कुछ देशों के अमेरिका जाने वाले सामान पर टैरिफ यानी कस्टम ड्यूटियां लगाने की धमकी दी पर फिर धमकी वापस ले ली.

यूरोप अब अमेरिका की जगह भारत से व्यापार बढ़ा रहा है. चाहे भारत 4 ट्रिलियन डौलर की अर्थव्यवस्था हो, जो छोटे से जरमनी और फ्रांस के आसपास है, अमेरिका की कमी पूरी नहीं कर सकता. यूरोप 600 अरब डौलर से ज्यादा का सामान अमेरिका को भेजता है जबकि भारत का कुल आयात 700 अरब डौलर का है लेकिन इस में से पैट्रोल पदार्थ 225 अरब डौलर के हैं जो यूरोप सप्लाई नहीं कर सकता. यूरोप उस सस्ते माल को भी भारत को नहीं बेच सकता जो चीन से आता है जो लगभग 100 अरब डौलर का है.

यूरोप फिलहाल तो अमेरिका को धमकाने के लिए भारत का इस्तेमाल कर रहा है और चूंकि भारत को भी अमेरिका की जगह बाजार चाहिए, वह यूरोप को ज्यादा बेच सकेगा अगर यूरोप कस्टम ड्यूटियां कम कर देगा.

इस सारे चक्कर में फायदा असल में चीन को होगा और भारत समेत सभी को नुकसान होगा. सब से बड़ा नुकसान अमेरिका को होगा जहां जीवनस्तर एकदम गिरेगा. पिछले कुछ सालों से, आकड़े चाहे कुछ भी कहते रहें, अमेरिकी लोगों की जीवनशैली में ढीलापन आने लगा है. वहां लोग बेघर होने लगे हैं, बीमारों को उचित इलाज नहीं मिल रहा. नौकरियां हैं पर वे अच्छा वेतन नहीं दे रहीं. गोरों और गैरगोरों का विवाद हिंदूमुसलिम विवाद की तरह बढ़ रहा है.

यूरोप काफी समय से अमेरिका के पुराने साथी की तरह, एक चचेरे भाई की तरह था जिसे झगड़ालू ताऊ डोनाल्ड ट्रंप ने बुरी तरह नाराज कर दिया. यूरोप-अमेरिका का जौइंट फैमिली भाव टूट गया है और भारत को चाहे कुछ टुकड़े मिल जाएं लेकिन मोटेतौर पर वह खास लाभ में नहीं रहेगा. हाथ मिलाते हुए तसवीरें जरूर चमचमाती नजर आएंगी. Global Politics Analysis

Marital Dispute Law : सरित प्रवाह – तलाक कानून और पतिपत्नी

Marital Dispute Law : पतिपत्नी विवाद आजकल दोचार महीने नहीं, बल्कि दसपंद्रह साल तक चलते रहते हैं. यदि दोनों को एकदूसरे पर बहुत ‘कृपा’ हो, तो कानूनी लड़ाई बहुत ही भयंकर हो सकती है. एक मामले में पतिपत्नी ने एकदूसरे पर 40 से ज्यादा मुकदमे दायर दिए हैं. हाईकोर्ट की फटकार के बाद दोनों ने कुछ मुकदमे वापस लेने पर सहमति दर्शाई है पर सभी वापस हो सकेंगे, जरूरी नहीं है.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक मामले में फैमिली कोर्ट का बच्चे को तलाक के मुकदमे के दौरान बोर्डिंग स्कूल भेज देने के फैसले को गलत ठहराया है. पतिपत्नी दोनों ही कस्टडी चाहते थे. दिनेश कुमार अग्रवाल व दीप्ति गोयल का विवाह 2013 में हुआ, 2019 में बेटा पैदा हुआ. मां अपने बेटे को धनबाद से ले कर लखनऊ चली गई. वर्ष 2020 में पिता मां के पीछे से बच्चे को अपने साथ ले गया तो मां ने कोर्ट में दावा ठोक दिया.

हाईकोर्ट ने 2022 में बेटे को मां को दिलवा दिया. इस पर पिता ने दबाव डाला कि बच्चे को बोर्डिंग स्कूल में डाला जाए. जनवरी 2026 में हाईकोर्ट ने पिता की बोर्डिंग स्कूल की मांग को ठुकराते हुए कहा कि पतिपत्नी नाहक बच्चे को फुटबौल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं.

इस दौरान बच्चे को ले कर विवाद खड़ा किया गया, दहेज का मामला बनाया गया, मेंटिनैंस का विवाद बनाया गया. असल में जनवरी 2026 में जब हाईकोर्ट इस मामले को सुन रही थी तो उस ने तलाक का जिक्र क्यों नहीं किया, यह अस्पष्ट है.

एक बार मामला सुप्रीम कोर्ट में भी गया पर वहां भी अंतिम निबटारा नहीं किया गया जबकि सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के अधिकार का उपयोग कर दोनों पक्षों को तलाक दिला कर मां को बच्चे की कस्टडी दिला सकती थी.

असल में देश की अदालतें अभी भी शादी को जनमजनम का साथ मानती हैं और बीसियों मुकदमों के बाद भी तलाक के लिए हामी नहीं भरतीं. यह 1955 के तलाक कानून की भावना का स्पष्ट उल्लंघन है. धर्म के नाम पर पतिपत्नी को लडऩे के लिए मजबूर किया जा रहा है. Marital Dispute Law

Satirical Story In Hindi : परीक्षा का बुरवार – “यह कागज मुझे दीजिए”, सुधींद्रजी ने आदेश दिया

Satirical Story In Hindi :

सरिता, 20 साल पहले, मार्च (द्वितीय) 1985

अचानक सुधींद्रजी ने देखा कि 5 लड़कों का दल एकसाथ उठ कर बाहर जा रहा है. सब मुट्ठी बांध कर बीच की उंगली दिखा रहे हैं. सुधींद्रजी ने कड़कदार आवाज में जो बाहर आतेआते घिघियाने लगी थी.

सुधींद्रजी दौड़े जा रहे थे और पीछे लड़कों की भीड़ ‘सुधींद्र मुरदाबाद’, ‘तानाशाही नहीं चलेगी’ के नारे लगाती उन्हें खदेड़ रही थी, जैसे हांका हो रहा हो और शिकार को मचान पर बैठे शिकारी की ओर ले जाया जा रहा हो.

हांफते हुए सुधींद्रजी ने प्राचार्य के कमरे में शरण लेनी चाही, पर वहां सिर्फ रामू चपरासी बैठा था. तब वह प्राध्यापक कक्ष की तरफ भागे. वहां भी सन्नाटा पा कर वह शौचालय के चोर दरवाजे से कालिज के बाहर निकल जल्दी से रिकशा पकड़ कर घर को रवाना हो गए.

उन की सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं और वह पसीने में ऐसे डूब गए थे जैसे किसी ने नहा कर बिना बदन पोंछे कपड़े पहन लिए हों. उन की घिग्घी बंध गई थी और वह रोंआसे थे. पर रो इसलिए नहीं पा रहे थे क्योंकि आराम से रोने के लिए समय चाहिए और वक्त का उन के पास कतई अभाव था.

अभी भी उन की आंखों के सामने परीक्षा भवन का वही दृश्य रहरह कर घूम रहा था, जहां बी.ए. की परीक्षा में मुख्य निरीक्षक के रूप में उन की डयूटी लगी थी. उन की सहायता के लिए 4 अन्य प्राध्यापक भी नियुक्त थे.

उन्होंने प्राचार्यजी से पहले ही विनती की थी कि इस काम के लिए कालिज की खेलकूद परिषद के अध्यक्ष और भूतपूर्व पहलवान जनार्दनसिंह अधिक उपयुक्त होंगे, पर उन की एक न सुनी गई. प्राचार्य महोदय ने परीक्षा के महत्त्व और सुधींद्रजी की वरीयता का हवाला दिया और वह, कालिज के अंगरेजी विभाग के अध्यक्ष, ‘चढ़ जा बेटा सूली  पर…’ के अंदाज से उस गुरुतर दायित्व को निभाने चल पड़े.

घर पर उन की पत्नी ने उन्हें आगाह किया था कि परीक्षा स्थल पर ज्यादा उसूलबाजी से बचें अन्यथा पारि- वारिक भविष्य खतरे में पड़ जाएगा. वैसे गलती सुधींद्रजी की कम, उन की छवि की अधिक थी. वह लड़कों को गंभीरता से पढ़ाते, गैस पेपर्स से बचने की सलाह देते तथा मशीनों के युग में साहित्य समझाने की कोशिश करते थे. इन सब फालतू बातों के लिए अधिकांश विद्यार्थियों के पास समय नहीं था.

प्राचार्यजी ने उन को परीक्षा के निरीक्षण का काम देते समय सलाह दी थी कि कालिज का परीक्षा परिणाम अच्छा होना चाहिए. साथ ही यदि विश्वविद्यालय के चंद सिरफिरों का दल अचानक मौकामुआइना करे तो उन्हें शिकायत का अवसर भी नहीं मिलना चाहिए.

अगर बलि के बकरे अपनी व्यथा का वर्णन कर पाते तो उन की और सुधींद्रजी की मनोदशा में विशेष अंतर न होता. किसी तरह सुधींद्रजी सब चेतावनियों का स्मरण करते परीक्षा भवन तक पहुंचे और उन्होंने प्रश्नपत्र का बंडल खोल कर उसे बंटवाया. प्रश्नपत्र इतिहास का था. 10 मिनट तक हाल में पूर्ण शांति रही. करीब 100 परीक्षार्थी थे.

त्रासदी के पहले अध्याय का प्रारंभ एक मामूली सी घटना से हुआ जब उन के एक सहायक निरीक्षक ने सूचना दी कि पीछे की पंक्ति में एक लड़का किताब खोल कर नकल करने में व्यस्त है. सुधींद्रजी का कर्तव्यभाव जोर मार गया. वह अपने सहायक के साथ उस लड़के की मेज तक गए. लड़का बहुत ही तन्मयता के साथ लिखने में लगा था और उस की मेज से किताब ऐसे गायब थी जैसे राशन की दुकान से चीनी.

सुधींद्रजी के सहायक ने इस जादूगरी के चमत्कार को खिलाड़ी भावना के बजाय अपनी व्यक्तिगत हार के तौर पर लिया और शिकायत की, ‘साहब, अभी तो किताब यहीं थी.’

लड़के ने प्राध्यापक को डांटा, ‘मुझे तंग मत कीजिए.’

पलक झपकते खाली मेज पर एक चाकू गिरने की आवाज हुई. सुधींद्रजी ने साहस जुटा कर प्रश्न किया, ‘यह चाकू आप ने किस लिए निकाला?’

‘इस से पेंसिल छीलूंगा. मुझे ‘रफ वर्क’ करना है,’ लड़के ने उत्तर दिया और फिर हिदायत दोहराई, ‘मुझे तंग मत कीजिए,’ परीक्षा हाल उन के वापस पहुंचतेपहुंचते जैसे रामपुरी चाकू की दुकान बन चुका था. लड़कों को गणित के सवाल ज्यों इतिहास के पेपर में हल करने हों और सब ‘रफ वर्क’ के लिए तैयारी में जुटे हों.

एक साथी निरीक्षक ने सुधींद्रजी को आश्वस्त किया, ‘सब चलता है, प्रोफेसर साहब. हमारी परीक्षा प्रणाली ही घिसीपिटी है. रटने की योग्यता का बुद्धि से कोई वास्ता थोड़े ही है. आप चिंता न करें. विश्वविद्यालय का छापामार दस्ता वैसे तो अकसर परीक्षा के समय के बाद आता है, यदि इम्तिहान के दौरान भी आ गया तो कोई खास बात नहीं होगी. अपने यहां तो हर वर्ष यही होता है.

‘वैसे भी यदि कुछ छात्रों ने नकल कर डिगरी हथिया ली तो क्या होगा? नौकरी तो मिलने से रही. आजादी के बाद शिक्षा सड़क का कुत्ता हो गई है. जो चाहता है, लात लगा कर चला जाता है. हर शिक्षा मंत्री शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन की आवश्यकता पर लंबेचौड़े भाषण देता है, पर आज तक तो कुछ हुआ नहीं. वही यथास्थिति बरकरार है.

‘कलम की जगह छुरी का इस्तेमाल लड़कों की इस प्रणाली के विरुद्ध सामूहिक विरोध का प्रतीक है. इस व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह का इजहार है. हम व्यवस्था और लड़कों के बीच में क्यों पड़ें?’

सुधींद्रजी उस समय किसी फलसफे को सुनने की मनोस्थिति में नहीं थे. वह बचपन से अहिंसा के भक्त रहे थे. यहां तक कि खेलों में इसी कारण उन की रुचि नहीं थी. उन का विश्वास था कि हर वस्तु में प्राण होते हैं.

सागसब्जियां तो जीवन के लिए अनिवार्य थीं और इस कारण उन की हत्या करनी ही पड़ती थी, पर फुटबाल को लात मारना उन के हिसाब से कतई अनावश्यक था और हिंसा का दृष्टि- कोण दर्शाना था. अपनी पूरी जिंदगी में इतने छुरे उन्होंने एकसाथ नहीं देखे थे.

अपनी पत्नी से वह इसीलिए डरते थे क्योंकि वह छुरी चला लेती थी, भले ही सब्जियां छीलने या काटने के लिए. किसी भी परीक्षा में छुरीचाकू के जोर से नकल हो सकती है, ऐसा उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था.

रोमानी कवियों के प्रेमी सुधींद्रजी जीवन की यह वास्तविकता नहीं झेल पाए. उन के साथ एक दिक्कत यह भी थी कि वह अपने कर्तव्य के प्रति सजग थे, अन्यथा या तो उन्हें चुपचाप बैठ कर कोई उपन्यास पढ़ना था या फिर चाय का सेवन करना चाहिए था. खासकर ऐसे हालात में जबकि भारतीय रेल की तरह विश्वविद्यालय किसी अप्रिय दुर्घटना के बाद मुआवजा भी न देता हो.

वैसे भी रेल दुर्घटना में हताहतों की तादाद सालाना परीक्षा के घायलों की संख्या से कम ही होती है. इतना सोचना था कि सुधींद्रजी के परिवार प्रेम और उस से जगी भगोड़ी प्रवृत्ति ने जोर मारा, किंतु उन के पांवों में कर्तव्यपरायणता की जंजीर थी. लिहाजा, वह हर बुद्धिजीवी के समान अनिश्चय के लकवे से ग्रस्त अपनी कुरसी पर जमे रहे.

परीक्षा के समय कमजोर राष्ट्रों की तरह लड़कों को विदेशी सहायता की जरूरत पड़ती है. जिस प्रकार कमजोर देश को और कमजोर बनाने के लिए सभी विदेशी शक्तियां मदद करने के लिए प्रस्तुत रहती हैं, उसी तरह शिक्षा की नींव खोखली करने वाले मददगारों की भी कमी नहीं है.

अचानक सुधींद्रजी ने देखा कि 5 लड़कों का दल एकसाथ उठ कर बाहर जा रहा है. सब मुट्ठी बांध कर बीच की उंगली दिखा रहे हैं. सुधींद्रजी ने कड़कदार आवाज में जो बाहर आतेआते घिघियाने लगी थी, टोका, ‘क्या है?’

‘इक्की, साहब,’ सामूहिक उत्तर मिला.

सुधींद्रजी ने आसपास देखा, उन के साथी स्वयं उन से नजरें चुरा रहे थे.

‘क्या करें, कैलाश,’ उन्होंने अपने एक सहयोगी से जानना चाहा.

‘जाने दीजिए, साहब. लघुशंका के लिए जा रहे होंगे,’ कैलाशजी ने उत्तर दिया.

जब तक सुधींद्रजी निर्णय लेते, लड़के जा चुके थे. जाहिर था कि लड़कों के स्थानीय साधनों में कमी पड़ गई थी और समस्या का समाधान बाहरी सहायता से ही संभव था.

‘लेकिन, भाई, एकसाथ तो जाना ठीक नहीं है. एकएक कर के जाना चाहिए,’ सुधींद्रजी ने स्वगत कथन के माध्यम से अपनेआप को समझाया.

जब वह परीक्षा देते थे, यही कायदा था. वह भूल गए कि समय आगे बढ़ चुका है. पहले इम्तिहान एक व्यक्तिगत मसला था. अब उसे पास करना एक सामूहिक अभियान है, ‘टीम वर्क’ है.

वह नई पीढ़ी की कार्य प्रणाली से अनभिज्ञ थे. आखिर पीढि़यों का अंतराल और क्या होता है? दुनिया सिमट गई है, क्योंकि संचार के साधन बढ़ गए हैं, साथ ही एकदूसरे पर निर्भरता भी.

पहला दल बाहर से लौटा और परीक्षार्थियों में आपस में कुछ कानाफूसी हुई. दूसरा दल प्रस्थान कर पाता, इस से पहले ही सुधींद्रजी ने अपने अंतरहृदय की बलवती इच्छा को कमजोर आवाज में  प्रकट किया, ‘यदि आप को लघुशंका आदि के लिए बाहर जाना ही है तो एकएक कर के जाइए.’

पहला छात्र पैर पटकता चला गया. करीबकरीब उस के साथ ही दूसरा लड़का ‘हाजत आई है,’ कह कर बाहर था. तीसरे ने कान पर जनेऊ चढ़ा कर उस का अनुकरण किया. चौथा और 5वां ‘मैं मैके चली जाऊंगी’ की धुन पर सीटी बजाता निकल गया.

सुधींद्रजी ने पसीना पोंछते हुए अपने साथियों की ओर सहायता और दिशानिर्देश के मिलेजुले भाव से देखा. एक ने कहा, ‘प्रोफेसर साहब, लड़के आज्ञाकारी हैं. आप के निर्देशानुसार एकएक कर के गए हैं.’

सुधींद्रजी झुंझला उठे, ‘मेरा मतलब था कि एक के लौटने के बाद दूसरा जाए और आप कह रहे हैं कि ये लड़के मेरी बात मान रहे हैं. मैं ने ऐसा इम्तिहान कहीं नहीं देखा कि लड़के पेंसिल छीलने के लिए चाकू रखें और एक दल बना कर शौचालय जाएं. चलिए मेरे साथ, देख कर आते हैं कि क्या हो रहा है. जरूर कुछ दाल में काला है.’

बड़ी अनिच्छा से उन के सहयोगी ने उन का साथ दिया. बाहर पांचों लड़के पांडवों की तरह एक कृष्ण को घेरे खड़े थे जो प्रसाद बांटने की मुद्रा में कागज बांट रहे थे. सुधींद्रजी को देख कर प्रसाद वितरक कुछ सकपकाए.

‘आप कौन हैं?’ सुधींद्रजी ने जानना चाहा.

‘यह मेरे चाचाजी हैं. मेरे छोटे भाई की बीमारी का समाचार लाए हैं,’ एक लड़के ने उत्तर दिया.

छात्र को अपने चाचा के आगमन का कैसे पता चला, आदि प्रश्न हमारे देश के आध्यात्मिक संदर्भ में निरर्थक हैं. वहां टेलीफोन कम और मन की अदृश्य तरंगें संचार के अधिक प्रभावी साधन हैं.

‘यह कागज मुझे दीजिए,’ सुधींद्रजी ने आदेश दिया.

‘कौन सा कागज?’ एक छात्र ने कागज की गोली बना कर मुंह में डालते हुए कहा.

शायद वह डरपोक था, दूसरे ने कागज को मुट्ठी में भींचा और ‘लीजिए’ कहते हुए सुधींद्रजी की नाक की दिशा में फेंक दिया.

सुधींद्रजी भारतीय क्रिकेट टीम के सदस्य नहीं थे. फिर भी यह आसान सा कैच उन से छूट गया. वह कागजी सुदर्शन चक्र उन की नाक को सांकेतिक रूप से काटता हुआ नीचे जा गिरा, जहां एक छात्र ने उसे अपने जूते से रौंद डाला.

2 छात्र अंदर जा चुके थे और उन में से एक अपनी कुरसी पर खड़ा हो कर भाषण दे रहा था, ‘यह मजाक हो रहा है या इम्तिहान? अंदर यह सुधींद्र का बच्चा फालतू की बातों से तंग करता है और बाहर चैन से पेशाब भी नहीं करने देता. कोई बुजुर्ग घर से जरूरी संदेश ले कर आए तो उन्हें बेइज्जत किया जाता है.’

इस घोषणा का स्वागत मेजों पर चाकू थपथपा कर किया गया.

‘चलो साथियो, हम परीक्षा का बहिष्कार करते हैं. या तो यह निरीक्षक रहेगा या इम्तिहान होगा,’ एक सत्ताधारी पेशेवर छात्र नेता ने ऐलान किया. कुछ छात्रों ने कापियां फाड़ दीं और उन्हें हवा में उड़ा दिया. सुधींद्रजी की शान में नारे शुरू हो गए, साथ ही उन का हांका भी.

सुधींद्रजी मिलखा सिंह की गति से दौड़े. ऐसा यदि किसी राष्ट्रीय प्रतियोगिता में करते तो धावकों में अव्वल आते, देश में नाम कमाते. पर उस दौड़ में प्राण रक्षा तो हुई. ‘लड़के प्राचार्य से मिलेंगे, उपकुलपति से शिकायत करेंगे. क्या पता जांच समिति बिठा दी जाए. जान तो बची, पर बवाल हो गया,’ सुधींद्रजी सोचने लगे दौड़तेदौड़ते.

‘‘क्यों पिटते कुत्ते सी आवाजें निकाल रहे हो?’’ उन की पत्नी ने उन को जगा दिया. छत का पंखा पूरी रफ्तार से चल रहा था पर सुधींद्रजी ऊपर से नीचे तक पसीने से लथपथ थे.

‘‘मेरी तबीयत ठीक नहीं है. लगता है, दिल का दौरा पड़ने वाला है, जल्दी से कागजकलम दो. छुट्टी की अरजी लिखनी है,’’ सुधींद्रजी ने पत्नी से अनुरोध किया.

पत्नी ने उन्हें चाय का प्याला बना दिया. पिछले 10 वर्षों से सुधींद्रजी हर साल ऐसे ही बीमार पड़ते थे. उधर लड़के परीक्षा देते और इधर परीक्षा का बुखार सुधींद्रजी को धर दबाता. Satirical Story In Hindi

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