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Satirical Story In Hindi : नोट, सीट और नोटशीट

Satirical Story In Hindi : कार्यालयों के 3 महत्त्वपूर्ण पहिए हैं जिन पर चल कर कार्यालय गति पकड़ते पाए जाते हैं. ये पहिए हैं – नोट, सीट और नोटशीट. इन में से एक के अभाव में कार्यालय को कार्यालय नहीं माना जाता. कोई भी अधिकारी किसी कर्मचारी को एक ही आदेश देता हुआ पाया जाता है, ‘पुट अप विद द नोट’ यानी ‘नोट सहित आगे बढ़ाइए’. स्पष्ट है कि जब अधिकारी ही नोट सहित नोटशीट चाहता है तो कर्मचारी क्यों न चाहेगा? कर्मचारी बेचारा अगलबगल से पूछ कर, पुरानी नस्तियों का सहारा ले कर, थोड़ा अपनी ओर से जोड़ कर नोट सहित, फाइल बढ़ाता है. आखिर नोटशीट में अपना नोट क्यों लगाए, वह बहुधा अगलबगल की टीप देता है.

उस दिन एक अधिकारी ने अपने स्टैनो से कहा, ‘‘इतनी सारी गलतियों सहित ड्राफ्ट आप हस्ताक्षरार्थ भेजते हैं?’’

स्टैनो ने उत्तर दिया, ‘‘सर, यह सच है कि नोटशीट में बहुत सारी व्याकरण, वर्तनी और भाषा की गलतियां हैं, किंतु वे हम ने नहीं की हैं. वे विश्व बैंक से चली आ रही हैं. हम एक आदेश ले रहे हैं कि क्या हम इन्हें ठीक कर दें. क्योंकि भले ही ड्राफ्ट नोटशीट पर तैयार हो, उस की कोई भी काटछांट या उस पर पुनर्लेखन ड्राफ्ट को यानी प्रारूप को कचरे की पेटी में फिंकवा सकता है.’’

स्टैनो से अधिकारी की यह चर्चा चल ही रही थी कि एक कर्मचारी नेता धड़धड़ाता हुआ अधिकारी के कक्ष में घुसा और ऊंची आवाज में पूछने लगा, ‘‘क्या फुजूलखर्ची, कार्यालयों में कर्मचारियों की अनुपस्थिति, टैलीफोन के दुरुपयोग आदि पर रोक लगाई जा रही है? यदि ऐसा होता है तो यह बरदाश्त के बाहर होगा.’’

अधिकारी ने आश्वासन दिया, ‘‘इस अफवाह में कोई सचाई नहीं है. यह तो आप लोगों के मन में बेचैनी पैदा करने के उद्देश्य से उड़ाई गई अफवाह है और इस बारे में सरकार का आदेश आने दीजिए. कार्यान्वयन करने वाले तो आप लोग ही होंगे.’’

एक सप्ताह से कार्यालयों में गति बढ़ाने के लिए चर्चाएं लगातार चल रही हैं. मैं जानता हूं कि कर्मचारी नेता गति बढ़ाने के बारे में कितने चिंतित हैं. एक भी नस्ती आगे नहीं बढ़ पा रही है. सभी लोग कार्यालयों में गति विषय पर ही चर्चारत हैं. अधिकारी भी नस्तियों पर बहुधा चर्चा लिख कर, नस्ती निबटा देते हैं.

मेरी सोच है कि कार्यालयों में गति न बढ़े तो ही अच्छा, वरना फाइलों के माध्यम से आवेदकों को ही जल्दीजल्दी निबटा दिया जाता है. जिस के प्रकरण यहां विचाराधीन हैं वे ही हमारे अधीन हैं, हम उन के नहीं. ऐसा ही एक व्यक्ति आक्रोश से कह रहा था, ‘कार्यालयों में गति का अर्थ है, अधिकारियों और कर्मचारियों की सद्गति, आवेदकों और समाज की दुर्गति, शहर और प्रदेश की अधोगति, आदानप्रदान और अकर्मण्यता में प्रगति.’ बाबू और अधिकारी कलम घिसते हैं. बाहर के व्यक्ति के जूते घिसते हैं. आगंतुक को सब घिसते यानी घसीटते हैं. फाइल का अर्थ रेती भी होता है, जो लोहे तक को छील देती है, आदमी की क्या बिसात? फाइल में आदमी छीला जाता है.

फाइल की गति फाइल जाने और न जाने कोय. न्यूटन ने जो गति का सिद्धांत खोजा है, वह भारतीय कार्यालयों में नस्ती की गति को देख कर ही सोचा था. न्यूटन का गति का पहला नियम ही है कि ‘कोई वस्तु स्थिर रहती है या चलती ही रहती है, जब तक उस पर बाहरी दबाव न पड़े और उस की स्थिति न बदली जाए.’

फाइल पर भी जब तक कोई बाहरी आकर्षण या दबाव नहीं पड़ता, वह चलना शुरू नहीं करती. कोई ऊपर खींचने वाला हो तो नस्ती उठ जाती है.

न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के 3 सिद्धांतों की खोज की है. हमारे देश में सभी क्षेत्रों में चहुंओर बड़ेबड़े गुरु बैठे हैं, महागुरु. इन गुरुओं को अनुभव कर के ही गति के गुरुत्वाकर्षण नियम बनाए गए. हे गुरु, जो कुछ आकर्षण है, तुझ में ही है, गुरुत्वाकर्षण.

न्यूटन का नंबर दो का नियम भी है. यह नियम भारतीय कार्यालयों में बहुत लोकप्रिय है. नंबर दो का नियम न अपनाया जाए तो हमारे कार्यालय हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहें. कर्मचारी किसी से भी दोदो हाथ करने को तैयार हैं, किंतु नंबर दो के नियम को त्याग देने को तैयार नहीं. वैज्ञानिक न्यूटन के प्रति इस से बड़ी श्रद्धांजलि और क्या हो सकती है? न्यूटन की गति का नंबर दो का नियम ही है जिस पर भारतवर्ष के सभी कार्यालय निर्विवाद चल रहे हैं.

गति के बारे में न्यूटन का तीसरा सिद्धांत भी है, ‘प्रत्येक क्रिया पर उस के बराबर और विरोधी प्रतिक्रिया होती है.’ यह तीसरा सिद्धांत भी  कार्यालयों में नस्ती को ले कर ही अन्वेषित किया गया है. जैसे ही बाबू ‘क’ ने फाइल बढ़ाने को उठाई, बाबू ‘ख’ की भृकुटि तनी. जरूर किसी किस्म का जैक लगा है. लोहे के स्क्रूजैक से तो कार, बस यहां तक कि ट्रक तक उठा लिए जाते हैं, जरूर कोई कलदार वस्तु का जैक लगाया गया है, वरना बाबू ‘क’ फाइल उठाता? अपने रूमाल से पहले तो नस्ती पर धूल की परत साफ की, फिर उस पर कुछ लिखा. जरूर जेब में कुछ गया है, वरना रूमाल खीसे में से कैसे बाहर आ गया. पौकेट का आयतन तो उतना ही है? जरूर कुछ जेब में गया है, वरना रूमाल बाहर न आता. महीनों से धूल खाती फाइल, इतने प्यार से बाबू अपनी गोद में न रखता? अपनी बगल में न दबाता? इतने प्यार से तो उस ने प्रिया की ओर भी कभी नहीं देखा? उस नस्ती को मेरे पास आने दो, अभी दबाता हूं.

मेरा बुंह बंद कराना है तो मुंह में कुछ डालना पड़ेगा, वरना नस्ती नहीं बढ़ेगी. न्यूटन का गति का तीसरा सिद्धांत यही है, विरोधी और समकक्ष प्रतिक्रिया.

कार्यालय सांप और सीढ़ी का खेल है जिस में नस्ती पासा चलने वाले के हिसाब से बढ़ती है. किसी बढि़या खिलाड़ी ने पासा फेंका और फाइल एकदो घर आगे चली. फिर कोई दांव चला गया, नस्ती ऊपर तक बढ़ी. बीच में साहब का नहीं, सांप का मुंह आ गया. कलम ने उगल दिया, ‘नियम चस्पां करें’ या ‘चर्चा करें’. पच्चीस खाने चढ़ चुकी नस्ती प्रारंभिक बिंदु पर आ गिरी. अब उस के आगे बढ़ने का मुहूर्त कब निकलेगा, बड़े से बड़ा पंडित बताने में असमर्थ होगा.

फाइलों को आगे न बढ़ने देने के पीछे भी एक संवेदनशील कारण होता है. बाबू का उन रंगीन नस्तियों से प्रेमसंबंध स्थापित हो जाता है लाल, पीली, बैगनी, गुलाबी आवरणों में ढकी फाइलें जब लंबे समय तक सामने होती हैं तो कर्मचारी की उन के प्रति

आसक्ति बढ़ जाना स्वाभाविक है. दिल पर पत्थर रख कर ही इन नस्तियों को संवेदनशील बाबू विदा करता है. महत्त्वपूर्ण नस्तियों का बाबूजी की आंखों से ओझल हो जाना, बाबूजी के लिए वज्रपात से कम नहीं होता. ऐसी मूल्यवान नस्तियों के हाथ से निकलते ही भावुक बाबू मन ही मन सुबकता है, फूटफूट कर रोता है. कार्यालयों में परस्पर प्रेमसंबंध स्थापित हो जाना, एक दैनिक एवं स्वाभाविक प्रक्रिया के अंतर्गत आता है.

कभीकभी सोचता हूं कि यदि कार्यालयों को विश्रामालय, मनोरंजनालय, कहींकहीं कामालय कहा जाए तो कैसा रहे? क्योंकि बहुधा कार्यालयों में कार्य को छोड़ कर सभी कुछ स्वीकार्य होता है. यदि बाबू साहब, निदेशक महोदय देरी से आते हैं तो इस में उन की कोई गलती नहीं होती, कोई कारण अवश्य रहता है, वरना वर्षभर ही देरी से न आएं. बाबुओं को ढोने वाली बसें देरी से चलती हैं, निदेशक महोदय का वाहनचालक विलंब से वाहन लाता है, कोई भी सोच सकता है, वे समय से कार्यालय कैसे पहुंच सकते हैं.

इन दिनों कार्यालयों में महिलाओं की उपस्थिति भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं रहती. महिलाओं की बढ़ती संख्या यौन शोषण, अवैध संबंधों के किस्सों में वृद्धि का कारण है. इन के सहारे कर्मचारियों, अधिकारियों का दिन प्रफुल्लता से गुजर जाता है. कार्यालयों में चहलपहल रहती है, सब के दिल लगे रहते हैं. वातावरण खुशनुमा बना रहता है.

कार्यालयों में कर्मचारी नेताओं की संख्या दिनप्रतिदिन बढ़ रही है. और जो व्यक्ति एक बार नेता बन गया, वह पूरे सेवाकाल में शेर बन कर जीने का आदी हो जाता है. कर्मचारियों की समस्याएं तो कुछ ही दिन तक सुलझाता है, किंतु कार्यालयों के लिए पूरे कार्यकाल में वह स्वयं समस्या बना रहता है. देरी से आना, अपनी सीट पर न बैठ कर, यहांवहां तफरीह करना, घर जल्दी प्रस्थान कर जाना, उन का शौक बन जाता है. किसी उच्च अधिकारी की भी हिम्मत नहीं होती कि कोई काम उस ‘महान नेता’ से कह सके? कर्मचारी नेता को संभवतया संवैधानिक तौर पर वे अधिकार प्रदत्त हैं कि छोटीमोटी बातों पर ही उच्चाधिकारियों को सब के सामने झिड़क दे.

प्रत्येक कार्यक्षेत्र में महिलाओं की 30 प्रतिशत भागीदारी भी आखिरकार बड़ी लाभदायी सिद्ध होगी. प्रेमपत्रों के लेखन में 60 प्रतिशत वृद्धि होगी. आज भी कार्यालयों में प्रेमपत्र अच्छी संख्या में लिखे जा रहे हैं. इस से लिखने की तथा कल्पना करने की क्षमता बढ़ती है. कुछ दिन पूर्व एक दुखी पुरुष का आवेदन कार्यालय में आया कि उसे नौकरी से बेवजह निकाला गया है और अब वह भूखों मरने के कगार पर आ गया है. उस कार्यालय में प्रेमपत्रों की आई बाढ़ के परिणामस्वरूप, एक प्रेमपत्र की प्रति उस के पास पहुंच गई थी. अन्यथा अभिनय देखना, अभिनय करना और दूरदर्शन के कार्यक्रमों से ही फुरसत नहीं मिलती?

उच्चाधिकारी जब कनिष्ठ अधिकारी को डांटता है तो वह डांट बाबू से होती हुई भृत्य तक स्थानांतरित हो जाती है. वर्ष में एकाध बार भी यदि ऐसा हो जाया करे तो कार्यालयों की मुस्तैदी और दक्षता बढ़ जाया करे. साल में एक दिन तो लगे कि कार्यालय सचमुच कार्यालय है.

हमारे प्रदेश के एक पूर्व उच्चाधिकारी ने अपने अनुभवों के आधार पर पुस्तक में लिखा कि जो आईएएस अधिकारी अपने जीवन में एक भी निर्णय न कर सका, वह बड़ा सफल, निष्ठावान, दक्ष और प्रतिष्ठित अधिकारी माना गया. बेदाग रिटायर हो गया. वहीं उन उच्चाधिकारियों को कठघरों में खड़े होना पड़ा जिन्होंने कुछ निर्णय लिए. कुछ निलंबित हुए, कुछ सेवामुक्त कर दिए गए. कुछ ने भयाक्रांत स्थिति में दम तोड़ दिया.

प्रदेश के उच्चाधिकारी के अनुभवों का लाभ लेते हुए अकसर सभी अधिकारी कार्यालयों में सोते हुए पाए जाते हैं. कई अधिकारियोंकर्मचारियों को अपने घर में बिस्तरों में नींद नहीं आती, जबकि कार्यालय में कुरसियों पर बैठे खर्राटे लेते हैं. कर्मचारी नेता यदि अपनी सीट पर घुर्रघुर्र की ऊंची आवाज करता हुआ निद्रामग्न है तो अधिकारी बड़े खुश रहते हैं, उसे उठाते नहीं. वे जानते हैं कि यदि यह उठ गया तो लड़ाईझगड़ा करेगा. उच्चाधिकारी इसी बात में अपना हित देखते हैं कि कर्मचारी नेता सीट पर सोता रहे? Satirical Story In Hindi

Social Story in Hindi : कंजूस

Social Story in Hindi : विमल जब अपनी दुकान बंद कर घर लौटे तो रात के 10 बजने वाले थे. वे रोज की तरह सीधे बाथरूम में गए जहां उन की पत्नी श्रद्धा ने उन के कपड़े, तौलिया वगैरा पहले से रख दिए थे. नवंबर का महीना आधे से अधिक बीत जाने से ठंड का मौसम शुरू हो गया था. विशेषकर, रात में ठंड का एहसास होने लगा था. इसलिए विमल ने दुकान से आने पर रात में नहाना बंद कर दिया था. बस, अच्छे से हाथमुंह धो कर कपड़े बदलते और सीधे खाना खाने पहुंचते. उन की इच्छा या बल्कि हुक्म के अनुसार, खाने की मेज पर उन की पत्नी, दोनों बेटे और बेटी उन का साथ देते. विमल का यही विचार था कि कम से कम रात का खाना पूरे परिवार को एकसाथ खाना चाहिए. इस से जहां सब को एकदूसरे का पूरे दिन का हालचाल मिल जाता है, आपस में बातचीत का एक अनिवार्य ठिकाना व बहाना मिलता है, वहीं पारिवारिक रिश्ते भी मधुर व सुदृढ़ होते हैं.

विमल ने खाने को देखा तो चौंक गए. एक कटोरी में उन की मनपसंद पनीर की सब्जी, ठीक उसी तरह से ही बनी थी जैसे उन को बचपन से अच्छी लगती थी. श्रद्धा तो किचन में थी पर सामने बैठे तीनों बच्चों को अपनी हंसी रोकने की कोशिश करते देख वे बोल ही उठे, ‘‘क्या रज्जो आई है?’’ उन का इतना कहना था कि सामने बैठे बच्चों के साथसाथ किचन से उन की पत्नी श्रद्धा, बहन रजनी और उस की बेटी की हंसी से सारा घर गूंज उठा. ‘‘अरे रज्जो कब आई? कम से कम मुझ को दुकान में फोन कर के बता देतीं तो रज्जो के लिए कुछ लेता आता,’’ विमल ने शिकायती लहजे में पत्नी से कहा ही था कि रजनी किचन से बाहर आ कर कहने लगी, ‘‘भैया, उस बेचारी को क्यों कह रहे हो. भाभी तो तुम को फोन कर के बताने ही वाली थीं पर मैं ने ही मना कर दिया कि तुम्हारे लिए सरप्राइज होगा. आजकल के बच्चों को देख कर मैं ने भी सरप्राइज देना सीख लिया.’’

‘‘अरे मामा, आप लोग तो फन, थ्रिल या प्रैंक कुछ भी नहीं जानते. मैं ने ही मां से कहा था कि इस बार आप को सरप्राइज दें. इसलिए हम लोगों ने दिन में आप को नहीं बताया. क्या आप को अच्छा नहीं लगा?’’ रजनी की नटखट बेटी बोल उठी. ‘‘अरे नहीं बेटा, सच कहूं तो तुम लोगों का यह सरप्राइज मुझे बहुत अच्छा लगा. बस, अफसोस इस बात का है कि अगर तुम लोगों के आने के बारे में दिन में ही पता चल जाता तो रज्जो की मनपसंद देशी घी की बालूशाही लेता आता,’’ विमल ने कहा. ‘‘वो तो मैं ने 2 किलो बालूशाही शाम को मंगवा ली थीं और वह भी आप की मनपसंद दुकान से. मुझे पता नहीं है कि बहन का तो नाम होगा लेकिन सब से पहले आप ही बालूशाही खाएंगे,’’ श्रद्धा ने कहा ही था कि सब के कहकहों से घर फिर गूंज उठा.खाना निबटने के बाद श्रद्धा ने  उन सब की रुचि के अनुसार जमीन पर कई गद्दे बिछवा कर उन पर मसनद, कुशन, तकिये व कंबल रखवा दिए. और ढेर सारी मूंगफली मंगा ली थीं. उसे पता था कि भाईबहन का रिश्ता तो स्नेहपूर्ण है ही, बूआ का व्यवहार भी सारे बच्चों को बेहद अच्छा लगता है. जब भी सब लोग इकट्ठे होते हैं तो फिर देर रात तक बातें होती रहती हैं. विशेषकर जाड़े के इस मौसम में देर रात तक मूंगफली खाने के साथसाथ बातें करने का आनंद की कुछ अलग होता है.

रजनी अपने समय की बातें इस रोचक अंदाज में बता रही थी कि बच्चे हंसहंस कर लोटपोट हुए जा रहे थे. विमल और श्रद्धा भी इन सब का आनंद ले रहे थे. बातों का सिलसिला रोकते हुए रजनी ने विमल से कहा, ‘‘अच्छा भैया, एक बात कहूं, ये बच्चे मेरे साथ पिकनिक मनाना चाह रहे हैं. कल रविवार की छुट्टी भी है. अब इतने दिनों बाद अपने शहर आई हूं तो मैं भी भाभी के साथ शौपिंग कर लूंगी. इसी बहाने हम सब मौल घूमेंगे, मल्टीप्लैक्स में सिनेमा देखेंगे और समय मिला तो टूरिस्ट प्लेस भी जाएंगे. अब पूरे दिन बाहर रहेंगे तो हम सब खाना भी बाहर ही खाएंगे. बस, तुम्हारी इजाजत चाहिए.’’ विमल ने देखा कि उस के बच्चों ने अपनी निगाहें झुकाई हुई थीं. यह उन की ही योजना थी लेकिन शायद वे सोच रहे थे कहीं विमल मना न कर दें. ‘‘ठीक है, तुम लोगों के घूमनेफिरने में मुझे क्यों एतराज होगा. मैं सुबह ही ट्रैवल एजेंसी को फोन कर पूरे दिन के लिए एक बड़ी गाड़ी मंगा दूंगा. तुम लोग अपना प्रोग्राम बना कर कल खूब मजे से पिकनिक मना लो. हां, मैं नहीं जा पाऊंगा क्योंकि कल दुकान खुली है,’’ विमल ने सहजता से कहा.

तीनों बच्चों ने विमल की ओर आश्चर्य से देखा. शायद उन को इस बात की तनिक भी आशा नहीं थी कि विमल इतनी आसानी से हामी भर देंगे क्योंकि जाने क्यों उन लोगों के मन में यह धारणा बनी हुई थी कि उन के पिता कंजूस हैं. इस का कारण यह था कि उन के साथी जितना अधिक शौपिंग करते थे, अकसर ही मोबाइल फोन के मौडल बदलते थे या आएदिन बाहर खाना खाते थे, वे सब उस तरीके से नहीं कर पाते थे. हालांकि विमल को भी अपने बच्चों की सोच का एहसास तो हो गया था पर उन्होंने बच्चों से कभी कुछ कहा नहीं था. लेकिन विमल को यह जरूर लगता था कि बच्चों को भी अपने घर के हालात तो पता होने ही चाहिए, साथ ही अपनी जिम्मेदारियां भी जाननी चाहिए, क्योंकि अब वे बड़े हो रहे हैं. आज कुछ सोच कर विमल पूछने लगे, ‘‘रज्जो, यह प्रोग्राम तुम ने बच्चों के साथ बनाया है न?’’

रज्जो ने हामी भरते हुए कहा, ‘‘बच्चों को लग रहा था कि तुम मना न कर दो, इसलिए मैं भी जिद करने को तैयार थी पर तुम ने तो एक बार में ही हामी भर दी.’’ इस पर विमल मुसकराए और एकएक कर सब के चेहरे देखने के बाद सहज हो कर कहने लगे, ‘‘रज्जो, तुम शायद इस का कारण नहीं जानती हो कि बच्चों ने ऐसा क्यों कहा होगा. जानना चाहोगी? इस का कारण यह है कि मेरे बच्चे समझते हैं कि मैं, उन का पिता, कंजूस हूं.’’ विमल का इतना कहना था कि तीनों बच्चे शर्मिंदा हो गए और अपने पिता से निगाहें चुराने लगे. एक तो उन को यह पता नहीं था कि उन के पिता उन की इस सोच को जान गए हैं, दूसरे, विमल द्वारा इतनी स्पष्टवादिता के साथ उसे सब के सामने कह देने से वे और भी शर्मिंदगी महसूस करने लगे थे. विमल किन्हीं कारणों से ये सारी बातें करना चाह रहे थे और संयोगवश, आज उन को मौका भी मिल गया.

‘‘वैसे रज्जो, अगर देखा जाए तो इस में बच्चों का उतना दोष भी नहीं है. दरअसल, मैं ही आजकल की जिंदगी नहीं जी पाता हूं. न तो आएदिन बाहर खाना, घूमनाफिरना, न ही रोजरोज शौपिंग करना, नएनए मौडल के टीवी, मोबाइल बदलना, अकसर नए कपड़े खरीदते रहना. ऐसा नहीं है कि मैं इन बातों के एकदम खिलाफ हूं या यह बात एकदम गलत है पर क्या करूं, मेरी ऐसी आदत बन गई है. मगर इस का भी एक कारण है और आज मैं तुम सब को अपने स्वभाव का कारण भी बताता हूं,’’ इतना कह कर विमल गंभीर हो गए तो सब ध्यान से सुनने लगे.

विमल बोले, ‘‘रज्जो, तुझे अपना बचपन तो याद होगा?’’

‘‘हांहां, अच्छी तरह से याद है, भैया.’’ 

‘‘लेकिन रज्जो, तुझे अपने घर के अंदरूनी हालात उतने अधिक पता नहीं होंगे क्योंकि तू उस समय छोटी ही थी,’’ इतना कह कर विमल अपने बचपन की कहानी सुनाने लगे : उन के पिता लाला दीनदयाल की गिनती खातेपीते व्यापारियों में होती थी. उन के पास पुरखों का दोमंजिला मकान था और बड़े बाजार में गेहूंचावल का थोक का व्यापार था. विमल ने अपने बचपन में संपन्नता का ही समय देखा था. घर में अनाज के भंडार भरे रहते थे, सारे त्योहार कई दिनों तक पूरी धूमधाम से परंपरा के अनुसार मनाए जाते थे. होली हो या दशहरा, दिल खोल कर चंदा देने की परंपरा उस के पूर्वजों के समय से चली आ रही थी. विमल जब कभी अपने दोस्तों के साथ रामलीला देखने जाता तो उन लोगों को सब से आगे की कुरसियों पर बैठाया जाता. इन सब बातों से विमल की खुशी देखने लायक होती थी. विमल उस समय 7वीं कक्षा में था पर उसे अच्छी तरह से याद है कि पूरी कक्षा में वे 2-3 ही छात्र थे जो धनी परिवारों के थे क्योंकि उन के बस्ते, पैन आदि एकदम अलग से होते थे. उन के घर में उस समय के हिसाब से ऐशोआराम की सारी वस्तुएं उपलब्ध रहती थीं. उस महल्ले में सब से पहले टैलीविजन विमल के ही घर में आया था और जब रविवार को फिल्म या बुधवार को चित्रहार देखने आने वालों से बाहर का बड़ा कमरा भर जाता था तो विमल को बहुत अच्छा लगता था. उस समय टैलीफोन दुर्लभ होते थे पर उस के घर में टैलीफोन भी था. आकस्मिकता होने पर आसपड़ोस के लोगों के फोन आ जाते थे. इन सारी बातों से विमल को कहीं न कहीं विशिष्टता का एहसास तो होेता ही था. उसे यह भी लगता था कि उस का परिवार समाज का एक प्रतिष्ठित परिवार है.

पिछले कुछ समय से जाने कैसे दीनदयाल को सट्टे, फिर लौटरी व जुए की लत पड़ गई थी. उन का अच्छाखासा समय इन सब गतिविधियों में जाने लगा. जुए या ऐसी लत की यह खासीयत होती है कि जीतने वाला और अधिक जीतने के लालच में खेलता है तो हारने वाला अपने गंवाए हुए धन को वापस पा लेने की आशा में खेलता है. दलदल की भांति जो इस में एक बार फंस जाता है, उस के पैर अंदर ही धंसते जाते हैं और निकलना एकदम कठिन हो जाता है. पहले तो कुछ समय तक दीनदयाल जीतते रहे मगर होनी को कौन टाल सकता है. एक बार जो हारने का सिलसिला शुरू हुआ तो धीरेधीरे वे अपनी धनदौलत हारते गए और इन्हीं सब  चिंता व समस्याओं से व्यवसाय पर पूरा ध्यान भी नहीं दे पाते थे. उन की सेहत भी गिर रही थी, साथ ही व्यापार में और भी नुकसान होने लगा. विमल को वे दिन अच्छी तरह से याद हैं जब वह कारण तो नहीं समझ पाया था पर उस के माता और पिता इस तरह पहली बार झगड़े थे. उस ने मां को जहां अपने स्वभाव के विपरीत पिता से ऊंची आवाज में बात करते सुना था वहीं पिता को पहली बार मां पर हाथ उठाते देखा था. उस दिन जाने क्यों पहली बार विमल को अपने पिता से नफरत का एहसास हुआ था. फिर एक दिन ऐसा आया कि उधार चुकता न कर पाने के कारण उन का पुश्तैनी मकान, जो पहले से ही गिरवी रखा जा चुका था, के नीलाम होने की नौबत आ गई. इस के बाद दीनदयाल अपने परिवार को ले कर वहां से दूर एक दूसरे महल्ले में किराए के एक छोटे से मकान में रहने को विवश हो गए. हाथ आई थोड़ीबहुत पूंजी से वे कुछ धंधा करने की सेचते पर उस के पहले ही उन का दिल इस आघात को सहन नहीं कर सका और वे परिवार को बेसहारा छोड़ कर चल बसे.

यह घटना सुनते हुए रजनी की आंखें नम हो आईं और उस का गला रुंध गया. कटु स्मृतियों के दंश बेसाख्ता याद आने से पुराने दर्द फिर उभर आए. कुछ पल ठहर कर उस ने अपनेआप को संयत किया फिर कहने लगी, ‘‘मुझे आज भी याद है कि भैया के ऊपर बचपन से ही कितनी जिम्मेदारियां आ गई थीं. हम लोगों के लिए फिर से अपना काम शुरू करना कितना कठिन था. वह तो जाने कैसे भैया ने कुछ सामान उधार ले कर बेचना शुरू किया था और अपनी मेहनत से ही सारी जिम्मेदारियां पूरी की थीं.’’ ‘‘रज्जो सच कह रही है. इसी शहर में मेरे एक मित्र के पिता का थोक का कारोबार था. हालांकि वह मित्र मेरी आर्थिक रूप से मदद तो नहीं कर सका मगर उस ने मुझे जो हौसला दिया, वह कम नहीं था. मैं ने कैसेकैसे मिन्नतें कर के सामान उधार लेना शुरू किया था और उसे किसी तरह बेच कर उधार चुकाता था. वह सब याद आता है तो हैरान रह जाता हूं कि कैसे मैं यह सब कर पाया था. जैसेतैसे जब कुछ पैसे आने शुरू हुए तो मैं ने अम्मा, दीदी और रज्जो के साथ दूसरे मकान में रहना शुरू किया. हमारे साथ जो कुछ घटित हुआ, इस तरह की खबरें बहुत तेजी से फैलती हैं और जानते हो इस का सब से बड़ा नुकसान क्या होता है? आर्थिक नुकसान तो कुछ भी नहीं है क्योंकि पैसों का क्या है, आज नहीं तो कल आ सकते हैं पर पारिवारिक प्रतिष्ठा को जो चोट पहुंचती है और पुरखों की इज्जत जिस तरह मिटती है उस की भरपाई कभी नहीं हो सकती. मैं अपना बचपन अपने बाकी साथियों की तरह सही तरीके से नहीं जी पाया और उस की भरपाई आज क्या, कभी नहीं हो सकती.

‘‘लेकिन यह मत समझो कि इस की वजह केवल पैसों का अभाव रहा है. अपना सम्मान खोने के बाद भी सिर उठा कर जीना आसान नहीं होता. मुझे अच्छी तरह से याद है कि इन सब घटनाओं से मैं कितनी शर्मिंदगी महसूस करता था और अपने दोस्तों का सामना करने से बचता था. तू तो छोटी थी पर मां तो जैसे काफी दिन गुमसुम सी रही थीं और मेरी खुशमिजाज व टौपर दीदी भी इन सब घटनाओं से जाने कितने दिन डिप्रैशन में रही थीं. इन सारी घटनाओं की चोट मेरे अंतर्मन में आज भी ताजा है और मैं अकेले में उस पीड़ा को आज भी ऐसे महसूस करता हूं जैसे कल की घटना हो. अब मुझे पता चला कि एक आदमी की लापरवाही और गैरजिम्मेदारी का खमियाजा उस के परिवार के जाने कितने लोगों को और कितने समय तक भुगतना पड़ सकता है. आज भी अगर कोई पुराना परिचित मिल जाता है तो भले ही वह हमारा अतीत भूल चुका हो परंतु मैं उस को देख कर भीतर ही भीतर शर्मिंदा सा महसूस करता हूं. मुझे ऐसा लगता है कि मेरे सामने वह व्यक्ति नहीं कोई आईना आ गया है, जिस में मेरा अतीत मुझे दिख रहा है.

‘‘जीतोड़ मेहनत से काम करने से धीरेधीरे पैसे इकट्ठे होते गए और मेरा काम बढ़ता गया. फिर मैं ने अपनी एक दुकान खोली, जिस में डेयरी का दूध, ब्रैड और इस तरह के बस एकदो ही सामान रखना शुरू किया. जब कोई पूरी ईमानदारी और मेहनत से अपना काम करता है तो वक्त भी उस की सहायता करता है. मेरा उसूल रहा है कि न तो किसी की बेईमानी करो, न किसी का बुरा करो और मेहनत से कभी पीछे मत हटो. मेरी लगन और मेहनत का परिणाम यह है कि आज वही दुकान एक जनरल स्टोर बन चुकी है और उसी की बदौलत यह मकान खरीद सका हूं. श्रद्धा तो थोड़ाबहुत जानती है पर बच्चे कुछ नहीं जानते क्योंकि वे तो शुरू से ही यह मकान और मेरा जनरल स्टोर देख रहे हैं. वे शायद समझते हैं कि उन के पिता पैदायशी अमीर रहे हैं, जिन को पारिवारिक व्यवसाय विरासत में मिला है. उन को क्या पता कि मैं कितना संघर्ष कर इस मुकाम पर पहुंचा हूं.’’

विमल की बातें सुन कर बच्चे तो जैसे हैरान रह गए. वास्तव में वे यही सोचते थे कि  उन के पिता का जनरल स्टोर उन को विरासत में मिला होगा. उन को न तो यह पता था न ही वे कल्पना कर सकते थे कि उन के पिता ने अपने बचपन में कितने उतारचढ़ाव देखे हैं, कैसे गरीबी का जीवन भी जिया है और कैसी विषम परिस्थितियों में किस तरह संघर्ष करते हुए यहां तक पहुंचे हैं. पुरानी स्मृतियों का झंझावात गुजर गया था पर जैसे तूफान गुजर जाने के बाद धूलमिट्टी, टूटी डालियां व पत्ते बिखरे होने से स्थितियां सामान्य नहीं लगतीं, कुछ इसी तरह अब माहौल एकदम गंभीर व करुण सा हो गया था. बात बदलते हुए श्रद्धा बोली, ‘‘अच्छा चलिए, वे दुखभरे दिन बीत गए हैं और आप की मेहनत की बदौलत अब तो हमारे अच्छे दिन हैं. आज हमें किसी बात की कमी नहीं है. आप सही माने में सैल्फमेडमैन हैं.’’ ‘‘श्रद्धा, इसीलिए मेरी यही कोशिश रहती है कि न तो हमारे बच्चों को किसी बात की कमी रहे, न ही वे किसी बात में हीनता का अनुभव करें. यही सोच कर तो मैं मेहनत, लगन और ईमानदारी से अपना कारोबार करता हूं. बच्चो, तुम लोग कभी किसी बात की चिंता न करना. तुम्हारी पढ़ाई में कोई कमी नहीं रहेगी. जिस का जो सपना है वह उसे पूरा करे. मैं उस के लिए कुछ भी करने से पीछे नहीं रहूंगा.’’

‘‘यह बात हुई न. अब तो कल का प्रोग्राम पक्का रहा. चलो बच्चो, अब कल की तैयारी करो,’’ बूआ के इतना कहते ही सारे बच्चे चहकने लगे मगर जाने क्यों विमल का 15 वर्षीय बड़ा बेटा रजत अभी भी गंभीर ही था.‘‘क्या हुआ रजत, अब क्यों चिंतित हो?’’ बूआ ने पूछा ही था कि रजत उसी गंभीर मुद्रा में कहने लगा, ‘‘बूआ, अब पुराना समय बीत गया जब पापा को पैसों की तंगी रहती थी. अब हमारे पास पैसे या किसी चीज की कमी नहीं है बल्कि हम अमीर ही हो गए हैं. तो फिर पापा क्यों ऐसे रहते हैं. अब तो वे अपनी वे इच्छाएं भी पूरी कर सकते हैं जो वे गरीबी के कारण पूरी नहीं कर सके होंगे.’’रजत के प्रश्न से विमल चौंक गया, फिर कुछ सोच कर कहने लगा, ‘‘बेटा, मुझे खुशी है कि तुम ने यह प्रश्न पूछा. वास्तव में हमारी आज की जीवनशैली, आदतें या खर्च करने का तरीका इस बात पर निर्भर नहीं होता कि हमारी आज की आर्थिक स्थिति कैसी है बल्कि हमारे जीने के तरीके तय करने में हमारा बचपन भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है. अपने बचपन में मैं ने जैसा जीवन जिया है, उस प्रकार का जीवन जीने वालों के मन में कटु माहौल सा बन जाता है, जिस से वे चाह कर भी बाहर नहीं आ सकते. जो आर्थिक संकट वे भुगत चुके होते हैं, पैसे के अभावों की जो पीड़ा उन का मासूम बचपन झेल चुका होता है, उस के कारण वे अमीर हो जाने पर भी फुजूलखर्ची नहीं कर सकते.

‘‘आर्थिक असुरक्षा के भय, अपमानजनक परिस्थितियों की यादों के कष्टप्रद दंश, एकएक पैसे का महत्त्व या पैसों की तंगी की वजह से अभावों में गुजरे समय की जो पीड़ा  अंतर्मन में कहीं गहरे बैठ जाती है उस से चाह कर भी उबरना बहुत कठिन होता है. हकीकत तो यह है कि हमारा आज कितना भी बेहतर हो जाए या मैं कितना भी अमीर क्यों न हो जाऊं लेकिन मैं जिस तरह का बचपन और संघर्षमय अतीत जी चुका हूं वह मुझे इस तरह से खर्च नहीं करने देगा. लेकिन क्या तुम जानते हो कि वास्तव में कंजूस तो वह होता है जो जरूरी आवश्यकताओं पर खर्च नहीं करता है. ‘‘तुम लोगों को पता होगा कि घर में दूध, मौसम के फलसब्जियों या मेवों की कमी नहीं रहती. हां, मैं तुम लोगों को फास्ट फूड या कोल्ड डिं्रक्स के लिए जरूर मना करता हूं क्योंकि आज भले ही ये सब फैशन बन गया है पर ऐसी चीजें सेहत के लिए अच्छी नहीं होतीं. इस के अलावा तुम लोगों की वे सारी जरूरतें, जो आवश्यक हैं, उन को पूरा करने से न तो कभी हिचकता हूं न ही कभी पीछे हटूंगा. तुम्हारे लिए लैपटौप भी मैं ने सब से अच्छा खरीदा है. तुम लोगों के कपड़े हमेशा अच्छे से अच्छे ही खरीदता हूं. इसी तरह तुम लोगों की जरूरी चीजें हमेशा अच्छी क्वालिटी की ही लाता हूं. मैं अपने अनुभव के आधार पर एक बात कहता हूं जिसे हमेशा याद रखो कि जो इंसान अपनी आमदनी के अनुसार खर्च करता और बचत करता है, अपने आने वाले कल के लिए सोच कर चलता है, वह कभी परेशान नहीं होता. अच्छा, अब रात बहुत हो गई है और सब को कल घूमना भी है, इसलिए चलो, अब सोने की तैयारी की जाए.’’ Social Story in Hindi

Satirical Story In Hindi : संपादक की तलाश

Satirical Story In Hindi : एक निदेशालय के हिंदी अधिकारी महेंद्र द्वारा पेश किए गए अपनी ‘गृह पत्रिका’ के प्रतिवर्ष प्रकाशित किए जाने के प्रस्ताव व बजट खर्च के अनुमोदन हेतु अपनी मेज पर पड़ी हुई फाइल निदेशक महोदय ने जैसे ही खोल कर देखी तो तुरंत हिंदी अधिकारी को अपने कक्ष में बुला कर उन से कहा, ‘‘महेंद्रजी, बंद करो यह रोनाधोना. प्रतिवर्ष छपने वाली इस सरकारी गृह पत्रिका पर लाखों रुपए का फुजूल खर्च होता है और किसी काम की नहीं होती यह पत्रिका. गृह पत्रिका में होता ही क्या है? अपने ही कर्मचारी इधरउधर से चुरा कर दूसरे प्रतिष्ठित लेखकों की छपीछपाई रचनाएं आप को अपने नाम के साथ ला कर दे जाते हैं और आप उन को उन के रंगीन फोटो व संक्षिप्त परिचय के साथ औफसैट पर सप्तरंगी छपवा देते हैं. आखिर क्या फायदा ऐसी पत्रिका के प्रतिवर्ष प्रकाशन का? हां, इतना जरूर है कि इस बहाने आप की सांठगांठ स्थानीय प्रिंटर से अवश्य हो जाती होगी. वह आप को इस के बदले में प्रतिवर्ष कम से कम एक छोटी गाड़ी तो भेंटस्वरूप दे ही देता होगा या फिर यदि जरूरत से ज्यादा समझदार हुआ तो आप की बेटी के नाम से कुछ रकम एफडी कर देता होगा. मैं ने खुद अपनी आंखों से देखा है कि महंगे पेपर पर औफसैट प्रिंटिंग में छपी हुई यह गृह पत्रिका प्रतिवर्ष तमाम दिनों तक अपने ही प्रेषण विभाग में पड़ीपड़ी धूल चाटती रहती है. इस वर्ष नहीं छपेगी यह गृह पत्रिका. मैं इस वर्ष इस को प्रकाशित करवाने की आप को विभागीय अनुमति नहीं देता हूं. ले जाइए वापस अपनी इस फाइल को.’’

निदेशक महोदय द्वारा कही हुई बात पर अमल करते हुए महेंद्रजी ने उन की टेबल से फाइल उठा कर उसे व्यवस्थित ढंग से बांधा और नमस्कार कर के वे वापस अपने कक्ष की तरफ चले गए. कुछ ही दिनों में उन्हें पता चला कि निदेशक महोदय ने अपने बजट अनुभाग के एक अधिकारी के साथ मिल कर नई मासिक पत्रिका के सरकारी खर्च पर प्रकाशित किए जाने हेतु टिप्पणी लिख कर उस को छपवाने तथा अपने निदेशालय में ही एक नए पत्रिका प्रकाशन अनुभाग को खोले जाने का अनुमोदन मंत्रालय से यह कह कर करवा लिया कि राजभाषा हिंदी को बढ़ावा देने हेतु जिस गृह पत्रिका को प्रतिवर्ष छपवाने हेतु होने वाले व्यय का हमारे निदेशालय के हिंदी विभाग द्वारा अनुमोदन मांगा जाता था, मैं ने उसे मना कर दिया है. उसी पत्रिका को अब नए नाम से प्रतिमाह यानी मासिक रूप में प्रकाशित करवाने की कृपया मुझे अनुमति दी जाए ताकि समाज के सभी वर्गों को राजभाषा हिंदी की नई दिशा हेतु उपयुक्त सामग्री पढ़ने को मिल सके. इस पत्रिका के बाजार में बिकने के कारण निदेशालय की अतिरिक्त आमदनी अलग से होगी.

आजकल सभी सरकारी मंत्रालयों में राजभाषा हिंदी को बढ़ावा देने और उस की प्रगति के संबंध में जो भी पत्र आता है उसे बहुत ध्यान से देखासमझा जाता है. यहां भी ऐसा ही हुआ और मंत्रालय से उन निदेशक महोदय को अपने निदेशालय में ही एक नया प्रकाशन अनुभाग खोलने के साथ अपने निदेशालय के पते पर ही राजभाषा हिंदी की प्रतिमाह एक नई मासिक पत्रिका प्रकाशित करने हेतु अनुमति मिल गई. मंत्रालय की अनुमति मिलते ही निदेशक महोदय हरकत में आ गए और निदेशालय का अन्य सभी कार्य छोड़ कर जल्दी से जल्दी एक संपादक की नियुक्ति करने हेतु उन्होंने मंत्रालय से अपना प्रपोजल पास करवा कर अपने यहां इस पद की भरती हेतु विज्ञापन देश के सभी समाचारपत्रों में प्रकाशित करवा दिया.

विज्ञापन छपते ही उन के निदेशालय में तमाम सारे अनुभवी संपादकों के बायोडाटा की तमाम सारी डाक आनी शुरू हो गई. निर्धारित तिथि को छटे हुए कुशल अनुभवी संपादकों का इंटरव्यू लिया गया. निदेशक महोदय ने किसी एक भी संपादक को इस लायक नहीं समझा जो उन की नई मासिक पत्रिका का संपादन कर सके तो इस बारे में उन के उपनिदेशक उल्लासजी ने एक बार अपनी हिम्मत कर के उन से पूछ ही लिया, ‘‘सर जी, आप को अपनी पत्रिका के संपादक के अंदर ऐसा क्या चाहिए जो देशभर से अपने निजी खर्चे पर यहां इंटरव्यू देने आए हुए तमाम सारे संपादकों में से एक भी नजर नहीं आया?’’ वे बोले, ‘‘उल्लास, ये सब जान कर तुम क्या करोगे? तुम तो मेरे खास आदमी हो. अब तुम ही बन जाओ इस पत्रिका के संपादक. अपने यहां संपादक की भरती हेतु दिखावटी इंटरव्यू लिए जाने की प्रक्रिया तो मैं ने लगभग पूरी कर ही ली है.’’

उल्लासजी धीरे से बोले, ‘‘सर जी, मैं तो इस निदेशालय का सरकारी कर्मचारी हूं. भला संपादक कैसे बन सकता हूं?’’ निदेशक महोदय बोले, ‘‘उल्लास, तुम बन सकते हो संपादक. बस, तुम्हें इस कार्य हेतु अतिरिक्त वेतन नहीं मिलेगा. तुम्हारा पद अवैतनिक होगा. तुम अवैतनिक संपादक कहलाओगे.’’ उल्लासजी बोले, ‘‘सर, वह तो ठीक है मगर मुझे तो हिंदी साहित्य के बारे में बिलकुल ज्ञान नहीं है. कहीं पत्रिका के किसी अंक में प्रेमचंद की जगह चंदनचंद छप गया तो बहुत बुरा होगा, सर जी.’’ निदेशक महोदय बोले, ‘‘उल्लास, तुम्हारा सारा जीवन इस निदेशालय के ही कामकाज करतेकरते बीत गया. फिर भी इतनी चिंता करते हो. तुम छोटीछोटी बातों को भी गंभीरता से सोचते हो, इसलिए तुम्हारा अब तक वारान्यारा नहीं हो सका. तुम मेरे सामने आज भी वही कोट पहनते हो जो तुम ने अपनी शादी के समय सिलवाया था. आजकल इतना सीधा होने वाले को मूर्ख कहा जाता है. अपनेआप को बदलो. जीना सीखो. अपनी नहीं तो अपने परिवार की आधुनिक जरूरतों को समझो. खुद अपने 30 साल पुराने स्कूटर पर चलते हो तो इस का मतलब यह नहीं कि तुम्हारा पुत्र नई गाड़ी में अपने कालेज नहीं जा सकता. समझदार पिता बनो. उस की और अपने परिवार के अन्य सदस्यों की इच्छाओं व उत्साह को दफन मत करो. कमाना सीखो. अपौरच्युनिटी बारबार नहीं आती. हमारे निदेशालय द्वारा निकाली जाने वाली नई मासिक पत्रिका का संपादक बन कर तुम्हें करना ही क्या है. तुम्हें तो केवल एक बार 50 हजार डाक के पतों का ही संपादन कर के सूची तैयार करनी है, बस. तुम्हें पता है कि जब मैं ने अपने यहां इंटरव्यू देने हेतु आए हुए देशभर के संपादकों से अपना प्रश्न किया कि क्या आप 50 हजार डाक के पतों की सूची का तत्काल संपादन कर सकते हैं? तो मेरे इस प्रश्न के उत्तर में एक संपादक भी अपनी ‘हां’ नहीं भर पाया. सब की टांयटांय फिस हो गई. इसलिए सब के सब खुद ही निरस्त हो कर चले गए.’’

इस बार उल्लासजी ने गंभीरता से कहा, ‘‘सर जी, वास्तव में 50 हजार डाक के पतों की सूची तैयार करना कोई आसान बात तो है नहीं और फिर इस से अपनी पत्रिका के संपादक बनने का अर्थ भी तो पूरा नहीं होता. संपादक को तो अपनी पत्रिका में प्रकाशित होने वाली रचनाओं के प्रकाशन का दायित्व व जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है, उस का क्या होगा?’’ उत्तर मिला, ‘‘उल्लास, तुम तो संपादक बन जाओ, बस. तुम तो अपने खास आदमी हो, इसलिए इतना प्रैशर दे रहा हूं. रही पत्रिका में प्रकाशित रचनाओं की जिम्मेदारी के संबंध में बात, तो हम अपनी पत्रिका के अंदर स्पष्ट रूप में छपवा देंगे कि हमारी पत्रिका में प्रकाशित विचार एवं रचनाएं लेखकों के अपने हैं, इन से निदेशालय का सहमत होना अनिवार्य नहीं है.’’

‘‘सर जी, लेकिन किसी भी पत्रिका का संपादक बनना तो बहुत ही मेहनत का काम होता है. भला मैं कैसे कर पाऊंगा?’’ उल्लासजी बोले. उन के इस प्रश्न पर निदेशक महोदय अपना दृढ़विश्वास जताते हुए बोले,  ‘‘भाई, आज तक कोई भी सरकारी निदेशक अपने अधीनस्थ कर्मचारी से ले कर अधिकारी तक किसी से भी मेहनत का काम करवा पाया है जो मैं तुम से करवा लूंगा. तुम्हारा मूल काम तो उपनिदेशक का ही रहेगा, जो तुम पिछले कई सालों से यहां करते ही आ रहे हो, यह नाम तो केवल पत्रिका के आवरण पृष्ठ पर आप के पूरे नाम के साथ प्रकाशित होगा, बस.’  ‘‘सर, प्रकाशक और मुद्रक का भी तो चयन करना पड़ेगा?’’ उल्लासजी ने अपना अलग प्रश्न किया.

‘‘तुम उस की चिंता मत करो. मैं ने उपनिदेशक (बजट) परमिंदर सिंह को इस काम के लिए पहले से ही तैयार कर लिया है. वैसे भी वह बजट संबंधित सारे लफड़े बखूबी निपटा लेता है, ऊपर से सब को खुश भी रखता है. बहुत ही समझदार है,’’ निदेशक महोदय ने उल्लासजी से कहा. उल्लासजी फिर बोले, ‘‘सर जी, वह आप को पत्रिका में प्रकाशन के लिए रचनाओं से पहले 50 हजार डाक के पते आखिर क्यों चाहिए, जरा स्पष्ट रूप से बताएं?’’ सुन कर निदेशक महोदय ने उत्तर दिया,  ‘‘उल्लास, हमारी शीघ्र प्रकाशित होने वाली सरकारी मासिक पत्रिका को बाजार में बेचा जाए या नहीं, फिर भी हमें उस की खपत दिखाने हेतु मंत्रालय को जस्टीफाई करना पड़ेगा कि हमारी पत्रिका के प्रवेशांक की प्रति निम्नलिखित 50 हजार पतों पर मौजूद भारतीय परिवारों के हाथों पहुंच गई है. इसलिए अब इस के आगामी अंकों की प्रतिमाह 50 हजार से अधिक प्रतियां छापने की अनुमति प्रदान की जाए.’’

‘‘सर जी, तो क्या वास्तव में हमेशा ही 50 हजार से ज्यादा प्रतियां प्रतिमाह छपा करेंगीं?’’ उल्लासजी ने आश्चर्य प्रकट करते हुए पूछा. ‘‘उल्लास, तुम तो एकदम बुद्धू हो, नासमझ हो. यदि वास्तव में 50 हजार से अधिक प्रतियां प्रतिमाह छपेंगीं तो हमें क्या फायदा होगा? एकदो माह लगातार अपनी इस नई पत्रिका के प्रकाशन हेतु हुए व्यय के सरकारी बजट का मंत्रालय से अनुमोदन मिल जाने के बाद फिर किसी नए मंत्री की भी इतनी आसानी से हिम्मत नहीं होगी जो अपनी राजभाषा हिंदी की इस नई मासिक पत्रिका के बजट को आगामी किसी भी माह में देने से मना कर सके. हां, कम भले ही कर सकता है. बस, अपनी बात बन जाएगी. अपने निदेशालय की फाइलों पर इस के प्रकाशन हेतु होने वाले व्यय का भुगतान तो 50 हजार प्रतियों से अधिक की संख्या दिखाते हुए प्रतिमाह मिलता रहेगा और छपेंगीं अपनी मनमरजी के अनुसार. इसीलिए तो मैं ने इस नई पत्रिका के प्रकाशन अनुभाग में अपने खासखास आदमियों का ही चयन किया है. जो मेरे अनुसार काम करेगा वह कभी नुकसान में नहीं जा सकता. अब इस से ज्यादा और स्पष्ट क्या कहूं,’’ निदेशक महोदय बोले.

अपने निदेशक महोदय की समझदारी भरी बातें सुन कर भी उल्लासजी असमंजस में थे और बोले,  ‘‘सर जी, मैं थोड़ा सोचसमझ कर बताता हूं कि मैं आप की नई मासिक पत्रिका का संपादक बनने हेतु तैयार हूं या नहीं.’’ उल्लासजी को सीट से उठ कर चलते हुए देख निदेशक महोदय ने कहा, ‘‘बैठो उल्लास, बैठो, अभी कहीं मत जाओ. बैठो, मैं तुम्हारी चिंता का अभी समाधान कर देता हूं. तुम मेरी सरकारी गाड़ी ले जा कर तुरंत निर्वाचन आयोग के कार्यालय चले जाओ. वहां से अपने देश में अब तक बने हुए वोटर्स कार्डों की सूची अपनी पैनड्राइव में ले आओ. इस संबंध में मैं ने पहले ही वहां के अपने एक पुराने परिचित अधिकारी से बात कर रखी है. वोटर्स कार्डों की सूची को ला कर तुम्हें सिर्फ इतना करना है कि उसे अपने कंप्यूटर पर लोड कर के उस में दर्शाए हुए प्रत्येक पते के मुखिया के नाम में थोड़ी सी फेरबदल करने के बाद उस नए नाम के बाद कौमा लगा कर बड़ेबड़े पद लगाने हैं

जैसे अपरमहानिदेशक, उपमहानिदेशक, डाक्टर, इंजीनियर, प्रोफैसर आदि. इस प्रकार से तुम्हारे पास 50 हजार पतों की कोई कमी नहीं रहेगी. फिर भी यदि किसी माह में इस सूची में फेरबदल करना चाहो तो मैं अपने देश के स्कूलों की एक सूची, शिक्षा निदेशालय से निकलवा कर तुम्हें दे दूंगा. तुम उन सब स्कूलों के पतों पर प्रधानाचार्या को भी नई मासिक पत्रिका को प्रेषित करने का योगदान विभागीय रजिस्टरों में दिखा कर अपनी संपादकी सुरक्षित रख सकते हो. अब बताओ, तुम्हारी समस्या क्या है?’’

‘‘सर, अब मेरी मसझ में यह नहीं आ रहा कि आखिर अपनी इस मासिक पत्रिका में प्रकाशन हेतु नईनई रचनाएं कहां से आएंगी?’’ उल्लासजी ने कहा.

‘‘अरे भाई, उस की भी तुम बिलकुल चिंता मत करो. मैं कई ऐसे लेखकों को जानता हूं जो बिना पारिश्रमिक लिए हुए प्रतिमाह अनी नईनई रचनाएं हमें प्रकाशन हेतु हमेशा भेजते रहेेंगे. चलो भाई, इस बात की गारंटी भी मेरी,’’ निदेशक महोदय ने इस बार हंसते हुए कहा. तब तक चपरासी चायबिस्कुट ले आया. चाय पीतेपीते निदेशक महोदय ने कहा,  ‘‘उल्लासजी, आज का दोपहर का खाना मेरे साथ ही खाइएगा. अपनी इस नई पत्रिका के लिए प्रकाशक और मुद्रक का पदभार संभाले हुए परमिंदर सिंह आज मुझे ओबराय होटल में पार्टी दे रहे हैं. इस बहाने आप भी पांचसितारा होटल का खूबसूरत नजारा देख लेंगे. आप भी साथ चलिएगा, मैं वहीं पर आप को अपनी नई मासिक पत्रिका का समझदार संपादक घोषित किए जाने का उन्हें सरप्राइज दूंगा. वैसे भी कुछ खास बातें निदेशालय की चारदीवारी से बाहर ही तय हों तो ठीक रहता है, क्योंकि मैं ने सुना है कि दीवारों के भी कान होते हैं. अब तो मैं भी हिंदी साहित्य पर विश्वास करने लगा हूं. राजभाषा हिंदी के प्रचारप्रसार में बहुत दम है और मैं तो खांमखां ही अब तक अंगरेजी के पीछे पड़ा हुआ था.’’

निदेशक महोदय से हो रही वार्त्तालाप के मध्य इस बार ‘उल्लास’ से ‘उल्लासजी’ कहे जाने वाले आदरसूचक सम्मानमय शब्दों के अचानक हुए सुधार को सुन कर उल्लासजी भी सहजदिल हो गए और फिर वे उन्हें अपने अवैतनिक संपादक पदभार को संभालने हेतु मना नहीं कर पाए. अब उन को अपने अति समझदार निदेशक महोदय की सारी भावी योजनाएं अच्छी तरह से समझ आ चुकी थीं कि भविष्य में नई मासिक पत्रिका की चाहे केवल 50 ही प्रतियां प्रतिमाह छपें मगर उस के खर्च पर होने वाले मासिक व्यय के सरकारी अनुमोदन व छापने की अनुमति प्रतिमाह 50 हजार से अधिक प्रतियों के हिसाब से उन के निदेशालय को मंत्रालय द्वारा मिलती ही रहेगी. किसी भी नई पत्रिका प्रकाशन हेतु संपादक, प्रकाशक व मुद्रक ही तो चाहिए और क्या? ये सभी अपने ही खास आदमी हों तो फिर चिंता किस बात की. केवल 50 प्रतियों के प्रकाशन पर आने वाले मूल खर्चे के भुगतान के बाद बची हुई धनराशि का निबटारा कहां और किसकिस के हिस्से में कैश या उपहारस्वरूप जाना है, वह तो तय होते देर नहीं लगेगी. पांचसितारा होटलों में सुईट भी होते हैं जहां पर खुफिया कैमरे नहीं होते. वहीं पर हंसीखुशी के वातावरण में सरकारी आला अधिकारियों के साथ अधिकांश प्राइवेट डीलें होती हैं.

कुछ महीने बाद रविवार के दिन समस्त सरकारी कार्यालयों की जब छुट्टी रहती है, उस उपयुक्त दिन का लाभ उठाते हुए उल्लासजी के संपादन में निदेशालय के छठे तल पर स्थित सभागार में संस्कृति, मेलमिलाप, साहित्य और विचार का मासिक ‘मध्यांतर’ नामक पत्रिका के प्रवेशांक का विमोचन कर दिया गया. निदेशालय द्वारा प्रकाशित की जाने वाली इस नई मासिक पत्रिका के विमोचन समारोह में आने हेतु कब और किसेकिसे, निमंत्रणपत्र बांटे गए, किसी भी कर्मचारी को कानोंकान खबर तक नहीं लगी. कर्मचारियों को कौम्प्लीमैंट्री फ्री में मिलने वाली नई पत्रिका की एक प्रति भी नहीं मिली. बस, उन्हें नोटिस बोर्ड पर नई ‘मध्यांतर’ नामक मासिक पत्रिका के संपन्न हुए विमोचन समारोह की कुछ रंगीन फोटो लगी हुई अवश्य दिखाई दीं. प्रकाशन अनुभाग से अधिक पूछताछ करने पर निदेशालय के कर्मचारियों को पता चला कि शीघ्र ही इस के अंक बाजार में पत्रपत्रिकाओं वाली बुकस्टालों पर बिकते हुए दिखाई देंगे. वहां पर अपनी नजर बनाए रखें और कृपया यहां बारबार आ कर इस पत्रिका की एक भी फ्री प्रति पाने की चेष्टा बिलकुल भी न करें क्योंकि एक भी अतिरिक्त प्रति यहां के इस नए प्रकाशन अनुभाग में है ही नहीं. यहां तो केवल अपने विभागीय रजिस्टरों में उन देशभर के लोगों के डाक के पतों का रिकौर्ड रखा जाता है जिन को प्रतिमाह एकएक प्रति डाक द्वारा भेजी जा रही है तथा अब तक प्रकाशित हुई पत्रिका की एक प्रति निदेशालय के रिकौर्ड हेतु एक लोहे की अलमारी में ताला लगा कर सुरक्षित रखी जाती है और अलमारी की चाबी उपनिदेशक पद के साथ अतिरिक्त रूप से इस नई पत्रिका के संपादक का पदभार ग्रहण किए हुए उल्लासजी के पास ही रहती है. इसलिए हम तो आप को इस नई पत्रिका की प्रति को दिखा भी नहीं सकते. बाजार में ही खोजिए, शायद कहीं मिल जाए. Satirical Story In Hindi

Satirical Story In Hindi : नजरअंदाजी नजर की

Satirical Story In Hindi : दो प्यारी सी आंखें, जिन में बड़े ही यत्न से लगाया गया आईलाइनर यानी कि काजल, उस के ऊपर आई कलर व आईशैडो, तराशी हुई भवें और बड़ी ही सफाई से लगाया गया मस्कारा ताकि देखने वाले को ऐसा भ्रम हो कि कुछ कृत्रिम नहीं, सब प्राकृतिक खूबसूरती है. इतने रंगरोगन लगाए जाने के कारण श्रीमतीजी की आंखें इतनी कजरारी व खूबसूरत बन गई थीं कि मुझ जैसा कवि कल्पनाओं से दूर रहने वाला प्राणी भी उन नयनों के चक्कर में चकराने लगा. जैसे ही मैं ने उन के नयन सागर में गोते लगाने की सोची, तभी मेरे कानों में चिरपरिचित सी आवाज आई, ‘‘गोलू के पापा, पढि़ए न क्या लिखा है?’’ श्रीमतीजी टीवी में एक नई फिल्म के ट्रेलर में आ रहे कलाकारों के नामों के बारे में जानने को उत्सुक थीं. नाम बड़ी जल्दीजल्दी आजा रहे थे.

संयोगवश मैं उसी समय औफिस से आ कर घर में घुसा ही था और आदतन चश्मा मेरी आंखों पर चढ़ा था. जब तक वे गोलू को आवाज देतीं, तब तक नाम चला जाता और ऐसे मौकों पर बेटी आस्था पहले से ही गायब हो जाती. वैसे भी, बच्चों को अपने कंप्यूटर के आगे हिंदी फिल्मों में कोई रुचि नहीं. ऐसे में बलि का बकरा मैं ही बनता.

‘‘श्रीमतीजी, कितनी बार कहा कि डाक्टर के पास जा कर अपनी आंखों का चैकअप करवा लो पर तुम्हारी समझ में बात कहां आती है? छोटेछोटे अक्षर तुम से अब पढ़े नहीं जाते. ऐसे में तुम्हें परेशानी हो सकती है.’’ हमेशा की तरह इस बार भी वे मेरी बात को एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकालते हुए बोलीं, ‘‘अरे, पहले नाम पढ़ कर बताओ कि कौनकौन इस फिल्म में हैं? आजकल अच्छी फिल्में बनती कहां हैं?’’

वे अपनी ही रौ में बोले जा रही थीं. जैसे ही ट्रेलर समाप्त हुआ, मैं ने उन का हाथ पकड़ कर बिठाते हुए कहा, ‘‘पूरे घर का तुम खयाल रखती हो, हम सब की छोटी से छोटी बातें भी ध्यान में रखती हो पर अपना खयाल क्यों नहीं रखतीं?’’ मुझ से इतने प्यारभरे शब्दों की अपेक्षा वे नहीं रखतीं. सो, बड़े आश्चर्य से देखते हुए बोलीं, ‘‘आप को दाल में नमक की जगह चीनी और चाय में चीनी की जगह नमक मिला क्या? नहीं न, तो क्यों बारबार मेरी आंखों के चैकअप के पीछे पड़े हो? अरे, थोड़ा दूर का ही नहीं दिखता, बस. नजदीक का सब ठीक है न. अब इतनी सी बात के लिए क्या डाक्टर के पास जाऊं? वह आंखों में आंखें डाल कर ऐसे देखता है कि लोग उस की बातों में आ जाते हैं और अच्छेभले लोगों को भी चश्मा चढ़ा कर अपने पैसे बनाता है. उस के जैसे लोगों का काम ही है कि आंखों में प्रौब्लम बताना.’’ ऐसा बोलती हुई मेरी बोलती बंद कर वे कार में बैठने चल दीं. हमें स्वीटी के बेटे की बर्थडे पार्टी में जाना था, इसीलिए वे इतने रंगरोगन लगा कर तैयार हुई थीं. चूंकि कार भी मुझे ही चलानी थी, सो माहौल न गरम हो, इसी से मैं भी चुपचाप कार में जा कर बैठ गया.

दरअसल, अंदर की बात मुझे अच्छी तरह से पता थी कि किसी भी हालत में वे इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रही थीं कि उम्र के प्रभाव ने आंखों पर भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है और वे चश्मा लगा कर उम्रदराजों में शामिल नहीं होना चाहतीं. कौन्टैक्ट लैंस का झंझट भी उन से नहीं होगा, यह भी मुझे पता था. अब कौन उन्हें समझाए कि आजकल छोटेछोटे बच्चों को भी चश्मा लग जाता है. इस पर भी उन का यह तर्क कि बच्चे चश्मा लगा कर बुद्धिमान दिखते हैं और बड़े चश्मा लगा कर बूढ़े. 5 तरह के मेकअप आंखों में लगाएंगी लेकिन चश्मा नहीं. आईशैडो, आईलाइनर जैसे सौंदर्य प्रसाधनों पर दिल खोल कर चर्चा करेंगी पर आंखों की सेहत पर नहीं. अब उन्हें कौन बताए कि जब ठीक से दिखेगा ही नहीं तो आंखों की खूबसूरती भी किस काम की?

खैर, मैं हमेशा से ही उन्हें समझाता रहा और वे हमेशा की तरह मेरी बात अनसुनी करती रहीं. कल जब मैं औफिस से घर आया तो श्रीमतीजी आराम से अपनी पड़ोसिन से फोन पर बात कर रही थीं. मैं ने पूछा, ‘‘क्या आज आस्था के गेम के लिए जाना है?’’ बात करतेकरते ही उन्होंने मुझे घड़ी दिखा दी. मुझे कुछ समझ में नहीं आया. मैं ने फिर टोका तो फोन पटकते हुए बोलीं, ‘‘अरे, अभी कहां टाइम हुआ है? मुझे 7 बजे जाना है और अभी सवा 6 बजे हैं. आप ही आज लगता है औफिस से जल्दी आ गए.’’ मैं ने उन्हें पकड़ कर नजदीक से घड़ी दिखाई, ‘‘देखो, सवा 7 हो रहे हैं.’’ सकपकाते हुए वे जल्दीजल्दी आस्था को ले कर 45 मिनट देरी से पहुंचीं. कोच ने गुस्सा दिखाया क्योंकि उस ने 2 हफ्ते पहले से सभी को समय से 10 मिनट पहले आने को बोल रखा था. घर वापस आने पर बड़ी ही मासूमियत से बोलने लगीं, ‘‘मैं ने ड्राइंगरूम के साथसाथ किचन की भी घड़ी देखी थी. मुझे लगा अभी टाइम नहीं हुआ है.’’ इस पर भी क्या मजाल कि चश्मे का टौपिक उठ जाए.

परसों मेरे साथ शौपिंग करने गईं, कपड़े की शौप में इन्हें जाना था और शोकेस बंद था. उस का पारदर्शी शीशा श्रीमतीजी को समझ में नहीं आया और वे खुला समझ कर जा कर टकरा गईं. उस पर वहां खड़े लोगों का व्यंग्य कि अरे आंटी, शोकेस बंद है. लगता है आप अपना चश्मा घर में भूल आई हैं. लो भला, जिस वजह से वे चश्मा नहीं लगाना चाहती थीं वही बात हो गई. लोगों ने आंटी बोल कर इन्हें एक झटके में उम्रदराज बना दिया. जब तक मैं कुछ बोलता, श्रीमतीजी तो वहां खड़े लोगों से जा कर भिड़ गईं, एकदम वीरांगना की भांति, ‘अरे, चश्मा लगाए तेरी बीवी और तेरी मांबहन, मुझे क्या जरूरत है?’ और भी जाने क्याक्या सुना दिया.

अब तो मैं ने भी कहना छोड़ दिया. घर की शांति के लिए चश्मे की बात होनी बंद हो गई. शर्मनाक स्थिति तो तब आ गई जब हम लोग अपने दोस्त की वैन में उन के साथ बैठ कर कहीं बाहर जा रहे थे. रास्ते में विंडो का शीशा खुला समझ कर इन्होंने च्युंगम बाहर की ओर मुंह कर के थूक दी. यह तो गनीमत थी कि किसी के देखने से पहले सफाई से उन्होंने उसे पोंछ दिया. मेरे पिताजी का भी यही हाल था. यद्यपि वे चश्मा लगाते थे किंतु कार में बैठ कर बातों में इतना मशगूल हो जाते थे कि कार का शीशा खुला समझ के मुंह का पान थूक देते थे और फिर बातों में खो जाते थे. मम्मीजी खूब नाराज हुआ करती थीं पर पिताजी को कोई फर्क नहीं पड़ता था. यहां बात चश्मे की नहीं थी, बेचारे पिताजी तो कभीकभी चश्मा लगा कर ही सो जाया करते थे.

आखिरकार, वही हुआ जिस का मुझे डर था. एक दिन श्रीमतीजी कार ले कर बाजार गईं. बरसात के कारण सड़क पर एक छोटा सा गड्ढा बन गया था. पहले इन्हें गड्ढा समझ में नहीं आया, फिर सामने देख एकाएक जोर से ब्रेक लगा दिया. पीछे वाली कार ने इन की कार को जोर से ठोंका और इन्होंने अपनी कार से बाजू में खड़े रिकशे को ठोंक दिया. कार की डिग्गी तो पिचकी ही, साथ में इन्हें भी काफी चोट आ गई. मैं औफिस की जरूरी मीटिंग में व्यस्त था कि इन की एक सहेली का फोन आया कि श्रीमतीजी का ऐक्सिडैंट हो गया है. मैं घबराया भागा घर आया. तब तक इन के सिर और पैर में पट्टी बंध चुकी थी. यह तो अच्छा हुआ कि इन्हें ज्यादा चोट नहीं आई. मैं ने भी अब प्रण कर लिया कि इन्हें आंख के डाक्टर के पास ले जा कर ही रहूंगा. सो, मैं ने चुपचाप समय ले लिया और एक हफ्ते बाद मैं सीधा आंख के डाक्टर के पास इन्हें ले गया. आश्चर्य की बात कि मेरी प्यारी बीवी ने कोई विरोध नहीं किया. शायद, उन्हें पता था कि इस बार मैं उन की नहीं सुनने वाला. डाक्टर ने पूरा चैकअप कर के अच्छी पावर वाला चश्मा इन्हें चढ़ा दिया, जिस की इन्हें बहुत दिनों से सख्त जरूरत थी.

घर आतेआते इन का चेहरा उतर चुका था. मैं ने भी कोई बात नहीं की. दूसरे दिन भी मैं ने इन्हें गुमसुम सा ही देखा तो मैं ने इन का हाथ पकड़ कर सीधे आईने के सामने खड़ा कर दिया और बोला, ‘‘देखो, अपनेआप को, इस चश्मे में कितनी गरिमामयी लग रही हो. अरे, हमारे पास किशोर होता बेटा है तो क्यों कम उम्र का दिखना? यह तो हमारे लिए गर्व की बात है कि हम उम्रदराज व परिपक्व हैं और इस से समाज में हमारा सम्मान ही बढ़ता है.’’ शायद मेरी बात इन्हें पहली बार सही लगी. इन के चेहरे पर मैं ने वही पहले वाली मुसकान देखी, मन ही मन शांति मिली कि चलो, अब इन के साथसाथ कार व बच्चे भी सुरक्षित रहेंगे और चश्मा लगा चेहरा देख अपनेआप मेरा मन गा उठा, ‘ओ मेरी जोहरा जबीं, तुझे मालूम नहीं, तू अभी तक है हंसी और मैं जवां…’ Satirical Story In Hindi

“पूल में मगरमच्छ का जोड़ा… सर्वाइवल थ्रिलर फिल्म”

Tu Yaa Main (2026) – Movie Review : यह एक सर्वाइवल थ्रिलर फिल्म है जो एक मगरमच्छ के एक जोड़े से भरे पूल में कहानी दिखाती है. फिल्म 2018 में आई थाई हौरर फिल्म ‘द पूल’ से प्रेरित है. वैसे तो यह एक लवस्टोरी है लेकिन निर्देशक ने इस में मगरमच्छ वाला जो ट्विस्ट डाला है, उस की कल्पना शायद ही किसी ने की होगी. लव से शुरू हुई यह कहानी एक गहरे खौफ पर खत्म होती है दर्शक सांसें थामे रहते हैं कि आगे क्या होगा. फिल्म का रिव्यू पढ़ने के बाद डरने या घबराने की जरूरत नहीं है. वैलेंटाइन वीक प्यार की फुहार वाली यह फिल्म एक बार देखी जा सकती है.

बौलीवुड में सर्वाइवल थ्रिलर फिल्में कम ही बनी हैं. टाइटल देख कर और शनाया कपूर का नाम पढ़ कर दर्शकों ने एक रैगुलर लवस्टोरी की उम्मीद की थी, मगर निर्देशक ने रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी डाल कर दर्शकों की धारणा को बदल डाला है. इस फिल्म को देखते वक्त ज्यादा लौजिक ढूंढ़ने की कोशिश न करें. ढाई घंटे की यह फिल्म आप के धैर्य की परीक्षा लेती नजर आती है.

फिल्म की कहानी मुंबई में रहने वाली सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर अवनि शाह उर्फ मिस वैनिटी ( शनाया कपूर) और नालासोपारा के युवा मारुति कदम उर्फ फ्लोपारा (आदर्श गौरव) के इर्दगिर्द बुनी गई है. सोशल मीडिया के लिए रील्स बनाते वक्त दोनों करीब आते हैं और एकदूसरे से प्यार करने लगते हैं. अवनि के 20 लाख फॉलोअर्स हैं जबकि मारुति आर्थिक तंगी से गुजर रहा है. उस के फौलोअर्स भी ज्यादा नहीं हैं.

हालात से तंग आ कर दोनों गोवा जाने का फैसला करते हैं. रास्ते में उन की मोटरसाइकिल खराब हो जाती है और एक सुनसान जगह में बंद पड़े स्कूबा डाइविंग सैंटर में डाइविंग करते हैं. यहीं से कहानी में ट्विस्ट आता है दोनों लगभग एक 20 फुट गहरे स्विमिंग पूल में ज्यादा फंस जाते हैं पूल में ज्यादा पानी नहीं है और बाहर निकलने का रास्ता भी नहीं है. अचानक एक मगरमच्छ उस पूल में घुस आता है. उन की जान पर बन आती है.

इस के बाद पूरी फिल्म सर्वाइवल थ्रिलर में बदल जाती है मगरमच्छ के साथ फंसी अवनि और मारुति अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष करते हैं. मगरमच्छ का सामना करते हुए उन का कुत्ता मारा जाता है और मदद के लिए आया इंस्पैक्टर भी मगरमच्छ का शिकार बनता है. अवनि एक मगरमच्छ को गोली मार देती है मगरमच्छ के काटने से घायल मारुति तैरने में असमर्थ हो जाता है लेकिन अवनि उसे तैर कर पूल से बाहर निकलने में मदद करती है आखिरकार दोनों बच जाते हैं।

फिल्म में रोमांचक सीन दर्शकों को निश्चित रूप से भयभीत कर देते हैं।

थाई फिल्म ‘द पूल’ से प्रेरित इस फिल्म की कहानी में निर्देशक ने टेंशन बनाए रखी है. फिल्म सैकंड हाफ में कई जगह सांसें थामने पर मजबूर कर देती है. अवनि और मारुति का रोमांस लंबा लगता है. फिर भी तकनीकी रूप में फिल्म काफी मजबूत है.

मध्यांतर के बाद के संवाद कसावट लिए हैं. मगरमच्छ के साथ टकराव वाले दृश्य रोमांच पैदा करते हैं. पटकथा में कुछ तार्किक कमियां हैं. मोबाइल का पानी में तैरना और उस की घंटी बजना अविश्वसनीय लगता है. मगरमच्छ फिल्म का अहम हिस्सा है, मगर यह पहचान पाना मुश्किल लगता है कि वह असली है या नकली.

अभिनय की दृष्टि से आदर्श गौरव और शनाया कपूर ने पूरी फिल्म को संभाले रखा है. शनाया कपूर इन्फ्लुएंसर के रूप में आत्मविश्वासी नजर आती है. यह उस की दूसरी फिल्म है. अन्य कलाकार अपनी अपनी भूमिकाओं में फिट हैं. बीचबीच में फिल्म की रफ्तार धीमी पड़ जाती है. कुछ सीन दोहराव लिए हैं. सस्पेंस को लंबा खींचा गया लगता है.

फिल्म की सिनेमेटोग्राफी शानदार है. वीएफ एक्स और मगरमच्छ को क्रिएट करने वाले तकनीकी कलाकारों का काम अच्छा है. बैकग्राउंड म्यूजिक भी अच्छा है जो ‘आंखें चार…’ या ‘तुम ही प्यारी मंजिल हो माई लव…’ गीतों को गुनगुनाने का काम करता है. फिल्म का निर्देशन ठीकठाक है. संपादन में और ज्यादा कसावट होती, तो अच्छा था. Tu Yaa Main (2026) – Movie Review

Vadh 2 (2026) – Movie Review : “समाज के स्याह पक्ष के साथ न्याय व्यवस्था पर सवाल”

Vadh 2 (2026) – Movie Review : बौलीवुड में इन दिनों फिल्मों की नई कहानियों का अकाल सा पड़ गया है, इसलिए सीक्वल फिल्मों का दौर शुरू हो गया है. ‘वध-2’ भी एक क्राइम ड्रामा फिल्म है और 2022 में रिलीज हुई फिल्म ‘वध’ की सीक्वल है, जिस में 2 बुजुर्ग कलाकारों संजय मिश्रा और नीना गुप्ता ने अभिनय किया था. फिल्म के पहले भाग में सेवानिवृत्त शिक्षक (संजय मिश्रा) को एक पुलिस अधिकारी शक्ति सिंह (मानव विज) की हत्या करते दिखाया गया था. फिल्म जेल की पृष्ठभूमि पर है और सस्पैंस से भरी है. हालांकि फिल्म की गति धीमी है लेकिन यह अंत तक दर्शकों को बांधे रखती है.

‘वध-2’ की कहानी पिछली फिल्म से एकदम अलग है, मगर प्रिडिक्टिबल है. यह फिल्म भी पिछली फिल्म की तरह आम आदमी के शोषण और ताकतवर वर्ग के अत्याचार पर आधारित है. 2 प्रौढ़ लोगों की लवस्टोरी पर आधारित इस फिल्म की कहानी मध्य प्रदेश के शिवपुरी स्थित जेल और वहां के कैदियों व पुलिसकर्मियों के इर्दगिर्द बनाई गई है. 28 साल पहले युवा मंजु सिंह (मेहर देओल) को 2 प्रेमियों की हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाई जाती है.

यहां से कहानी वर्तमान में आती है. मंजु (नीना गुप्ता) अब उम्रदराज हो चुकी है और रिहाई की उम्मीद लगाए है. शंभुनाथ मिश्रा (संजय मिश्रा) जेल में तैनात है. मंजु के दिल में उस के लिए खास जगह है. इसी बीच प्रकाश सिंह (कुमुद मिश्रा) जेलर बन कर आता है, जो ऊंचनीच को मानता है. जेल में नैना (योगिता निहानी) को लाया जाता है, जिस पर झूठे आरोप मढ़े गए है. बाहुबलि विधायक के, भाई केशव (अक्षय डोगरा) की बुरी नजर नैना पर रहती है. जेलर प्रकाश सिंह केशव की बेरहमी से पिटाई करता है.

केशव जेल से फरार हो जाता है और प्रकाश सिंह को निलंबित कर दिया जाता है. लगभग 11 महीने बाद प्रकाश सिंह के सरकारी घर के पीछे केशव का शव मिलने से मामला गरम हो जाता है, फिर से जांच होती है.

जांच की जिम्मेदारी इंस्पैक्टर अतीत सिंह  (अमित के सिंह) को सौंपी जाती है और कई राज खुलते हैं. आखिरकार, कहानी हत्यारे तक पहुंचती है और सस्पैंस का खुलासा होता है.

फिल्म की यह कहानी धीमी गति से आगे बढ़ती है लेकिन जब यह भागना शुरू करती है तो दर्शकों को अच्छी लगने लगती है. दर्शक क्लाइमैक्स का जो अंदाजा लगा कर बैठे थे वैसा कुछ भी नहीं होता.

अभिनय की दृष्टि से नीना गुप्ता अपनी आंखों और हावभावों से आकर्षित करती है. संजय मिश्रा तो है ही हरफनमौला, उस ने अपने अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लिया है. दोनों प्रौढ़ कलाकारों की कैमिस्ट्री शानदार है. कुमुद मिश्रा का अभिनय भी शानदार है. योगिता निहानी मासूम लगी है. अक्षय डोगरा ने अच्छीखासी खलनायकी कर ली है.

फिल्म का निर्देशन अच्छा है. निर्देशक ने दर्शकों को जैसे सीट से बांध कर बैठा रखा है. यह फिल्म पिछली फिल्म से काफी बेहतर बनी है. निर्देशक ने जेल की जिंदगी, जेल के भीतर के गिरोहों और जेल कर्मचारियों की लाइफ को दिखाया है. फिल्म को वास्तविकता के करीब रखा गया है. यह समाज के स्याह पक्ष को दिखाती है. न्याय व्यवस्था पर भी सवाल उठाती है.

फिल्म के संवाद चुटीले हैं. फिल्म के अंत में इन दोनों कलाकारों पर फिल्माया गीत सुकून देता है. सिनेमेटोग्राफी बढि़या है. बैकग्राउंड म्यूजिक अच्छा बन पड़ा है. इस फिल्म को देखने के लिए धैर्य की जरूरत है. Vadh 2 (2026) – Movie Review

Paro Pinaki Ki Kahani (2026) – Movie Review : ‘सीवर क्लीनर’ और ‘सब्जी वाली’ की प्रेम कहानी

Paro Pinaki Ki Kahani (2026) – Movie Review : यह एक लवस्टोरी है, जिसे वैलेंटाइन डे के मौके पर रिलीज किया गया है. इन दिनों लवस्टोरीज पर धड़ाधड़ फिल्में बन रही हैं, ‘सैयारा’ फिल्म के बाद कई लव स्टोरीज आईं जिन्होंने प्रेम का असली मतलब दर्शकों को समझया, ‘पारो पिताकी की कहानी एक गटर साफ करने वाले युवक और एक सब्जी बेचने वाली युवती की प्रेम कहानी है. फिल्मकार अब तक फिल्मों की प्रेम कहानियों में अमीरीगरीबी, नायकनायिका की चुहुलबाजी, उन दोनों के परिवारों में टकराव ही दिखाते आए हैं. इस प्रेम कहानी का विषय सचमुच अद्भुत है. यह प्रेम कहानी दर्शकों को काफी हद तक बांधे रखती है. यह लव स्टोरी दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देती है.

फिल्म की कहानी मरियम (इशिता सिंह) और पिनाकी (संजय बिश्नोई) के इर्दगिर्द है. लोकल ट्रेन में आतेजाते वे रोज मिलते है. रेल के डब्बों में ही उन में आपस में मोहब्बत हो जाती है. मरियम अपने पिता के साथ सब्जी की दुकान चलाती है तो पिनाकी नालियों और सीवर की सफाई का काम करता है. रोजाना 2 लोग मरियम को छेड़ते हैं तो वह यह बात पिनाकी को जताती है.

एक दिन मरियम बिना कुछ बताए गायब हो जाती है. उस के गायब होने से पिनाकी दुखी हो जाता है. उसे पता चलता है कि उस के पिता ने उसे एक शख्स को सिर्फ 15 हजार रुपए में बेच दिया है. पिनाकी मरियम को वहां से भगाने की कोशिश करता है लेकिन पकड़ा जाता है. वह उन लोगों से वादा करता है कि जितने में मरियम को उस के पिता ने बेचा है वह उस से डबल पैसे उस शख्स को देगा. पिनाकी अपनी चालाकी से पुलिस को मरियम को ढूंढ़ने में मदद करने के लिए मना लेता है और मरियम को उन लोगों के कब्जे से छुड़वा लेता है. वह मरियम का हाथ थाम लेता है. इस तरह सच्चे प्यार की जीत होती है.

इसे कहते हैं लवस्टोरी. एक अच्छीभली युवती द्वारा एक गटर व नालियां साफ करने वाले से प्यार करना दिखा कर निर्देशक ने गहरी जड़ें जमा चुकी जाति व्यवस्था और मुश्किल से गुजारा करने वाले लोगों की क्रूरता को दिखाया है जबकि बदबूदार नाले में उतरना बहादुरी नहीं, आजीविका है, जहां गंदगी इतनी गहराई से समा जाती है कि उस का एहसास नहीं होता. फिल्म की यह कहानी जमीनी हकीकत से जुड़ी लगती है. फिल्म चंद रुपयों के बदले अपनी बेटियों को बेच देने के साथ ह्यूमन ट्रैफिकिंग गिरोह की बात भी करती है. मगर फिल्म में ह्यूमन टै्रफिकिंग गिरोह का खौफ प्रभावी नहीं बन पड़ा है. निर्देशक ने फिल्म में सामाजिक मुद्दों को तो उठाया है परंतु उन का सौल्यूशन नहीं दिया है.

इस लवस्टोरी में कोई किसिंग सीन, दिखावा या फिल्मी ड्रामा नहीं है. बस, फिल्म यही सिखाती है कि प्यार किया है तो उसे निभाया कैसे जाए. फिल्म की पटकथा कमजोर है और उलझ हुई है. निर्देशन भी सधा हुआ नहीं लगता. फिल्म में अधिकांश कलाकार नए हैं. पिनाकी की भूमिका में संजय बिश्नोई ने बढि़या ऐक्टिंग की है. इशिता सिंह भी प्रभावित करती है. फिल्म उन मजदूरों को डैडिकेट की गई है जो बिना थके इस तरह के छोटेमोटे काम करते हैं और लोग उन्हें नफरत से देखते हैं.

निर्देशक द्वारा कहानी कहने की कला की तारीफ करनी होगी. फिल्म बहुतकुछ सोचने पर मजबूर कर देती है, खासकर क्लाइमैक्स. फिल्म का मुख्य गाना ‘चरखा…’ वडाली ब्रदर्स का है. फिल्म के संवाद बढि़या हैं, ‘मेरे बाप ने मुझे रखा ही इसलिए है कि मैं सब्जी बेचने में उस की मदद कर सकूं,’ ‘सीवर साफ करने वालों का 40 की उम्र के बाद शरीर खराब हो जाता है.’ इन संवादों से दर्शक खुद को रिलेट करते हैं.

भले ही यह फिल्म श्याम बेनेगल जितनी भावनात्मक गहराई हासिल न कर पाए फिर भी यह नेक इरादे से बनाई गई लगती है. फिल्म की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. Paro Pinaki Ki Kahani (2026) – Movie Review

एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम – खाली घोंसले की खामोशी

Parents Loneliness : पढ़ाई के लिए, नौकरी के लिए, बेहतर भविष्य के लिए, किसी न किसी दिन बच्चे घर से बाहर निकलते ही हैं, यह जाना स्वाभाविक है, जरूरी है और सही भी है लेकिन जब बच्चे जीवन की यह नई उड़ान भरते हैं तो जिस घर से जुड़े होते हैं, वहां एक चुप्पी रह जाती है, मातापिता अकेले रह जाते हैं. वर्तमान समय में इसी को ‘एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम’ का नाम दिया गया है.

अकसर, बच्चे यह मान लेते हैं कि ‘मम्मीपापा तो समझदार हैं’, ‘वे अपनी नौकरी, घर तथा दोस्तों में व्यस्त रहते होंगे’, ‘धीरेधीरे उन्हें आदत हो जाएगी’ या फिर ‘वे तो अभी बहुत अधिक उम्र के भी नहीं हैं, अब वे अपने शौक पूरे कर सकते हैं, ‘उन्हें अकेलापन क्यों होगा?’ यहीं अनजाने में चूक हो जाती है. मातापिता चाहे युवा हों या वृद्ध, उन का जीवन वर्षों तक बच्चों के इर्दगिर्द घूमता है. उन बच्चों की दिनचर्या, आवाजें, उन की जरूरतें, सबकुछ मातापिता के जीवन का केंद्र होती हैं. जब वे घर छोड़ते हैं तो उन के जीवन का वह केंद्र अचानक खाली हो जाता है और उन्हें अकेलापन घेर लेता है.

Parents Loneliness (2)
घर भले ही शांत हो जाए लेकिन संबंधों की गर्माहट बनी रह सकती है. यदि संवाद, समझ और
स्नेह कायम रहे. यही संतुलन जीवन को संपूर्ण और सुखद बनाता है.

यह कोई शिकायत नहीं है. जानबूझ कर नहीं किया जाता बल्कि यह जीवन का एक चरण है जो सब के जीवन में कभी न कभी आता है, जो आवश्यक है यह भी सब को पता होता है. यह कोई कमजोरी नहीं है. यह सिर्फ प्यार का खालीपन है. आज की डिजिटल दुनिया में हमारा संवाद पूरी तरह डिजिटल हो गया है. सभी बातें व्हाट्सऐप मैसेज, इमोजी, स्टेटस, रील्स के रूप में होती हैं. ये सब सैकंडों में पहुंचते हैं और सैकंडों में भुला दिए जाते हैं. मातापिता को ‘गुडमौर्निंग’ का फौरवर्डेड मैसेज मिल जाता है. लेकिन उन्हें वह अपनापन नहीं मिल पाता जो कभी हाथ से लिखे एक पत्र में होता था. संवादों की कमी हो गई है, वे संवाद जो भावनाओं से भरे होते थे, एहसास की गर्माहट लिए हुए. यही वजह है कि आज एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम पहले से ज्यादा गंभीर हो गया है.

बच्चों की भूमिका

मातापिता को इस भावनात्मक स्थिति से बाहर निकालने में बच्चों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. इस के लिए किसी बड़े प्रयास की नहीं, बल्कि नियमित और संवेदनशील जुड़ाव की आवश्यकता होती है.

नियमित फोन व वीडियो कौल

बच्चे मातापिता को नियमित फोन और वीडियोकौल करें. केवल औपचारिक हालचाल तक सीमित न रहें. फोन करना सिर्फ, ‘सब ठीक है’ तक सीमित न रखें. अपनी रोजमर्रा की छोटीछोटी बातें साझ करें. औफिस की कोई घटना, कालेज का कोई किस्सा, मौसम, रास्ते, लोग, जो कुछ भी. मातापिता को यह महसूस होना चाहिए कि वे अब भी हमारे जीवन का हिस्सा हैं, सिर्फ सूचना पाने वाले नहीं.

पत्र लिखें

मातापिता को नियमित पत्र लिखें. हाथ से लिखे पत्र आज के डिजिटल युग में भले ही पुराने लगें पर मातापिता के लिए हाथ से लिखा पत्र आज भी अनमोल है. कागज लंबे समय तक उन के सामने रहता है. वे पत्रों को बारबार पढ़ते हैं, सहेज कर रखते हैं. डिजिटल संदेश क्षणिक होते हैं, लेकिन पत्र स्थायी सहारा बन जाते हैं और भावनात्मक संतुलन बनाने में मदद करते हैं.

फोटो के प्रिंट भेजिए

अपने कमरे की तसवीर, अपने शहर की, दोस्तों की, रोजमर्रा के पलों की तसवीरें मातापिता के घर को फिर से जीवंत बना देती हैं. मातापिता उन्हें दीवार पर लगा सकते हैं, अलमारी में रख सकते हैं ये तसवीरें घर को फिर से ‘जीवित’ बना देती हैं.

खास चीजें कूरियर से भेजते रहें

कभी कोई स्थानीय मिठाई, कभी हस्तशिल्प, कभी बस एक साधारण पोस्टकार्ड, कूरियर से आया छोटा सा पैकेट मातापिता को यह एहसास दिलाता है कि ‘हम दूर हैं, पर भूले नहीं हैं.’

दोस्तों को मातापिता से मिलवाएं

हम जिन दोस्तों को अपने शहर में छोड़ आए हैं, उन से कहें कि कभीकभी वे मातापिता से मिलने चले जाएं. घर में हलचल लौटती है, बातचीत होती है, मातापिता को सामाजिक जुड़ाव महसूस होता है.

भावनाओं को हलके में न लें

सब से जरूरी बात, मातापिता की भावनाओं को हलके में न लें. अगर मातापिता उदास हों, बारबार चिंता करें या पुराने दिन याद करें तो इसे ड्रामा न कहें, इसे नाटकीयता न समझें. यह जानबूझ कर नहीं होता. यह उस खालीपन का संकेत है जिसे समझे जाने की जरूरत है.

संवेदनशीलता जरूरी

यह बहुत जरूरी बात है कि बच्चों को आगे बढ़ने के लिए खुद को दोषी महसूस नहीं करना चाहिए. आप का आगे बढ़ना गलत नहीं है. आप का दूर जाना स्वार्थ नहीं है लेकिन दूर रह कर भी जुड़े रहना बच्चों की जिम्मेदारी है. सो, किसी न किसी रूप में बच्चे अपने मातापिता से जुड़े रहें.

एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम मातापिता की कमजोरी नहीं है. यह उन के प्रेम की गहराई का प्रमाण है. आज की डिजिटल दुनिया में जहां सबकुछ क्षणिक हो गया है, वहां स्थायी भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखना बेटेबेटियों की भी जिम्मेदारी बनती है. नियमित कौल, हाथ से लिखे पत्र, प्रिंट की हुई तसवीरें, छोटेछोटे कूरियर और संवेदनशीलता, यही वे साधन हैं जो खाली घोंसले में फिर से अपनापन भर सकते हैं.

समस्या को जाने बिना समाधान देने की अपेक्षा समस्या को सुन कर समझने की कोशिश करना बेहतर है. Parents Loneliness

Satirical Story In Hindi : आइए, साहित्य सम्मान का धंधा करें – कमाई हो तो धंधा है

Satirical Story In Hindi : हमें जीवन में केवल एक ही दुख था कि साहित्य साधना करते हमें 14 साल से अधिक हो गए लेकिन हमारी झोली में सम्मान का एक भी बजरबट्टू नहीं आया जबकि हमारे सामने पैदा हुए लल्लूराम एक दर्जन से भी अधिक न जाने कौनकौन सी संस्थाओं से सम्मान प्राप्त कर चुके थे.

हम अपनी यह पीड़ा किस से कहते? शाम को पार्क के एक कोने में पड़े पत्थर के आगे यह सोच कर कि कणकण में भगवान हैं, हम ने अपना माथा ठोका और अपनी बात को रखते हुए प्रार्थना की. कौन कहता है कि पत्थर नहीं सुनता? सर्वव्यापी ईश्वर चारों दिशाओं से देखता है, सो हमारे प्रार्थनापत्र पर भी बहुत जल्दी काररवाई हो गई.

अगले दिन डाक से एक बैरंग पत्र मिला जिसे हम ने छुड़ा लिया. उस पत्र में कुछ ऐसा लिखा था :

प्रिय,

साहित्य बंधु,

आप की साहित्य सेवा बरसों से निस्वार्थ जारी है. बंधु, हम आप को राष्ट्रीय हिंदी सेवी का सम्मान देना चाहते हैं जिस में आप की सहमति आवश्यक है.

कृपया शीघ्र फार्म भर कर अपनी एक दर्जन फोटो के साथ हमें पत्र का उत्तर दें.

आप का जगधर.

हम ने पत्र पढ़ा तो फूले नहीं समाए. तत्काल उस पत्र की एक दर्जन फोटोकापी करवा कर अपने शहर के सब से आला दरजे के होटल में एक प्रेसवार्त्ता रख ली. वहां सब पत्रकार बंधुओं को पत्र की फोटो प्रतियां दीं तथा अपनी साहित्य यात्रा के बारे में उन्हें बताया. प्रेसवार्त्ता पर पूरे 3 हजार रुपए खर्च हो गए. अगले दिन से पूरे 5 दिन तक शहर के तमाम पेपरों को देखा लेकिन किसी ने एक पंक्ति भी नहीं छापी. भला हो एक साप्ताहिक का जिस ने 2 पंक्ति का एक समाचार लगा दिया था. मित्रों ने हमें पत्र की फोटोकापियां दीं तब जा कर हमें पता चला कि राष्ट्रीय पुरस्कार के पत्र हमारे शहर में दर्जन भर साहित्यकारों को और मिले हैं. हमारा मन खट्टा हो गया.

हम ने उक्त संस्था को अपने फोटो तथा लोकल साप्ताहिक में छपी रचनाओं की फोटोप्रतियां भेज दीं. एक सप्ताह बाद संस्था से पंजीयन कराने के लिए एक पत्र मिला जिस की फीस 1 हजार रुपए थी तथा ठहरने, खाने की व्यवस्था के लिए 700 रुपए अतिरिक्त देने थे. हम भला परदेस में कहां ठहरते? पत्नी और हमारी एकमात्र सास भी जाने की जिद कर रही थीं सो उन के ठहरने, खाने का अतिरिक्त धन भी साथ में भेज दिया.

एक सप्ताह बाद फिर पत्र आया कि सम्मान में आप शाल कौन सी लेना चाहेंगे? श्रीफल कहां का पसंद करेंगे? मुख्य अतिथि किस को चाहेंगे?

हम ने अपनी पसंद लिख भेजी. अगले दिन ही पत्र आ गया कि आप की पसंद जानने का अवसर मिला. इन सब की पूर्ति के लिए कृपया शीघ्र 5 हजार रुपए मनीआर्डर से भेजने का कष्ट करें.

हम ने चूंकि सब प्रचारप्रसार कर दिया था, पूर्व में 5 हजार रुपए भेज दिए थे, ऐसे में यह 5 हजार रुपए और नहीं भेजते तो बेइज्जती होती. सो हम ने बिना किसी को बताए मनीआर्डर भेज दिया.

सम्मान की तारीख आ गई थी. हम बहुत खुश थे. कटिंग व फेशियल करवा लिया था. केशों में खिजाब भी लगवा लिया था. हमारी सास ने भी यह सब टोटके कर लिए थे. तैयारी पूरी हो गई कि फोन आया कि मंत्रीजी के आने से डेट आगे बढ़ गई है. आप को शीघ्र सूचित कर दिया जाएगा. हमारे अरमानों पर पानी फिर गया. प्रतीक्षा के अलावा हम कर भी क्या सकते थे?

1 माह बाद फिर तारीख आई. हम ने पूरी तैयारी कर ली थी. हम पूरे खानदान के साथ स्लीपर कोच से वहां पहुंचे. उम्मीद थी एक दर्जन संस्था के कार्यकर्ता हारफूल ले कर मिलेंगे लेकिन वहां तो कोई चिडि़या भी नहीं थी. हम आटोरिकशा ले कर दिए गए पते पर पहुंचे. वहां काफी भीड़ थी. जगधरजी को खोजा, वह परेशान, पसीना पोंछते मिल गए.

‘‘तो आप हैं गोपालजी.’’

‘‘हें…हें…’’ हम ने हंसते हुए कहा.

‘‘देखिए बंधु, मैं थोड़ा बिजी हूं. जो पूरी व्यवस्था को देख रहा था वह सब रुपया ले कर फरार हो गया है. पूरी जिम्मेदारी मेरे सिर पर आ गई है.’’

‘‘ओ हो, लेकिन हमारे ठहरने की व्यवस्था?’’

‘‘बंधु, यह टेंट लगा है. आप कहीं भी ठहर जाएं, लोट जाएं, पूरा देश अपना है,’’ कह कर वह हीही कर के आगे चल दिए. मैं सोच रहा था कि यह समस्त भीड़ सम्मान समारोह में उत्साहवर्द्धन करने वालों की होगी लेकिन मेरी सोच गलत थी. यह सब सम्मान लेने वालों की भीड़ थी. कुछ कल के लड़के थे और कुछ के पांव कब्र में लटक रहे थे.

हम ने खोज कर एक लौज में कमरा लिया और पूरे खानदान ने पहले भोजन किया और फिर समारोह के निश्चित समय पर जा पहुंचे. पंडाल भरा हुआ था तथा मंच पर वार्ड का कोई काला भैंसे जैसा नगर पंचायत का पार्षद खड़ा था. जगधरजी एक के बाद एक कर नाम पुकार रहे थे. सब दौड़दौड़ कर पहुंच रहे थे. कांधे पर एक 5 रुपए का गमछा तथा एक राष्ट्रीय सम्मान का प्रमाणपत्र दिया गया. 5 घंटे के इस आयोजन में हजार साहित्य बंधुओं को निबटाया गया होगा. हम भी दौड़ कर पहुंच गए थे. पत्नी फोटो उतारती उस के पहले कार्यकर्ता ने धक्का मार कर आगे कर दिया था.

हम ने भाषण तैयार किया था, जो हम नहीं दे सके. पूरे कार्यक्रम के बाद भोजन रखा था. 5-10 किलो पूरियां एवं सब्जी रखी थी. 10 मिनट में सब सामान खत्म हो गया था. हम तो इस जोर आजमाइश में पहुंच भी नहीं पाए. लौट कर हम जब रेलगाड़ी के डब्बे में बैठे तो हमारी पत्नी ने कहा, ‘‘जगधर भाई ने लगभग 25-30 लाख रुपए कमा लिए.’’

‘‘बिलकुल सच कहा,’’ हम ने थूक गटकते हुए कहा.

हमारी सास ने कहा, ‘‘दामादजी यह धंधा तो चोखा है, न हींग लगे न ही फिटकरी रंग चोखा हो जाए.’’

हम कुछ नहीं बोले. शहर लौट कर हम ने एक पार्टी दी जिस में 5 हजार खर्च हो गए. कुल जमा हम 20-25 हजार रुपए पर उतर गए. इतना तो हम ने उम्र भर नहीं कमाया था.

लेकिन हमारी पत्नी और हमारी सास की कही गई बातें हमें जंच गईं और हम ने निर्णय ले लिया कि हम भी सम्मान प्रदान करने का यह धंधा शुरू कर देंगे. Satirical Story In Hindi

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