Family Story : पूजा अकसर अपनी सहेलियों व दोस्तों से कहा करती थी कि मैं सारी उम्र जगजीत सिंह की गजलों, गुलजार सिंह की गजलों और गुलजार की फिल्मों के सहारे बिताऊंगी. ये दोनों कमरे में हों तो कोई अकेला नहीं हो सकता.

संजय वर्मा को पूजा की बातें और अंदाज दोनों इस कदर पसंद थे कि कई बार वह उस से शादी की बात करने की सोच कर भी कह नहीं सका क्योंकि हिम्मत नहीं जुटा पाया था.

पूजा अकसर कैंटीन में चाय के साथ समोसे या पकौड़े खाते हुए अपने दोस्तों को अपने साथ बीती हुईं सड़कछाप आशिकों की कहानियां सुनाया करती.

‘‘मैं कल घर जा रही थी. दोपहर का समय था. 2 लड़के बेसुरा राग अलापते हुए बगल से गुजरे, ‘तुम हम से दोस्ती कर लो, ये हसीं गलती कर लो.’ मैं ठीक उन के सामने जा कर खड़ी हो गई और कहा, ‘ठीक है, चलो, दोस्ती करते हैं.’ मेरे इतना कहते ही वे दोनों लड़के सकपका गए और माफी मांगने लगे.’’

सीमा ने कहा, ‘‘तुम्हें क्या पड़ी थी इस तरह प्रतिक्रिया जाहिर करने की?’’

‘‘क्या मैं सब्जी या गोबर हूं जो प्रतिक्रिया व्यक्त न करती. मैं उन लड़कों को छेड़खानी का वह मजा चखाती कि याद रखते.’’

‘‘क्या कर लेतीं तुम?’’

‘‘मैं उन के ‘आई कार्ड’ रखवा लेती. उन को यूनिवर्सिटी से निकलवा देती...’’

संजय बीच में बोला, ‘‘पूजाजी, आप जीवन को इतनी सख्ती से क्यों लेती हैं. क्या हुआ किसी का मन थोड़ा आवारा हो उठा तो.’’

‘‘नहीं, मु झे आवारगी पसंद नहीं. वह तो उन्होंने माफी मांग ली वरना...’’

‘‘आप को तो खुद संगीत से लगाव है.’’

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