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सरित प्रवाह – भारत-अमेरिका की डील ढीली

Editorial : किन्हीं 2 देशों में व्यापार हो और जितना संभव हो खुला व्यापार हो तो उतना ही दोनों देशों के लिए अच्छा होता है. लेकिन जब एक देश दूसरे की बांह मरोड़ कर व्यापार करने पर उतारू हो तो यह वह जबरदस्ती होगी जो तोपों से लदे व्यापारिक जहाजों ने 17वीं से 19वीं सदी तक भारत, चीन, जापान के साथ की थी.

इंगलैंड, अमेरिका, फ्रांस, हौलैंड, पुर्तगाल, स्पेन के व्यापारियों के जहाजों ने चीन और जापान से 17वीं सदी के बीच के दशकों में जबरन सख्त शर्तों के साथ व्यापार करने की इजाजत ली थी और फिर इस का फायदा जम कर उठाया. यूरोप के देश एशियाई देशों से जबरन सस्ता माल खरीदते और उन्हें गैरजरूरी सामान जबरन बेचते थे.

भारत और चीन को जबरन अफीम बेची गई, चाय का आदी बनाया गया और कौड़ियों के भाव यहां से मसाले, रेशम, रुई, चमड़ा, गेहूं ले जाया गया. भारत को तो अपनी आजादी खोनी पड़ी, चीन को सम्मान.

आज अमेरिका यही भारत से कर रहा है और आज भी हम वैसे ही व्यवहार कर रहे हैं जैसे 1707 के बाद मुगल साम्राज्य के बाद कर रहे थे. आज अमेरिका हम पर अपनी शर्तें थोप रहा है और उन शर्तों पर हमारे नेता जश्न मना रहे हैं. वे अपनी असहायता व दयनीयता को उपलब्धि बता कर अखबारों में वाहवाही के बड़ेबड़े विज्ञापन प्रकाशित करा रहे हैं. जो जीहुजूरी इस देश ने हर आक्रांत के समय, उस समय के थोड़ेबहुत पढ़ेलिखे लोगों की भी, देखी थी, आज फिर देख रहा है.

अमेरिका से भारत का व्यापार समझता एकतरफा है, यह बिलकुल स्पष्ट है. लेकिन व्यापार मंत्री पीयूष गोयल, विदेश मंत्री जे जयशंकर, पैट्रोल मंत्री हरदीप सिंह पुरी व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे व्यवहार कर रहे हैं कि जैसे कि वे अमेरिका की सोने की खानों पर कब्जा कर के लौटे हैं. अमेरिका ने धमकियों के बाद भारत से यह डील मनवाई है, यह स्पष्ट है.

अमेरिका के हाथ में आज भारत के खिलाफ बहुत से हथियार हैं. इन में सब से बड़ा छिपा हथियार भारतीय ही हैं जो अमेरिका में बसे हैं और जिन में से बहुत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी रिपब्लिकन के चाटुकार सदस्य हैं. कुछ तो चाटुकारिता में इतने पटु हैं कि वे अपने रंग को भूल कर वहां दक्षिणी अमेरिका या अफ्रीका से आए लोगों को गोरों की तरह नीची जाति का समझने लगे हैं.

अमेरिका भारत के निर्यात का बड़ा बाजार है और जब से अमेरिका ने आयात पर टैरिफ 3 फीसदी से 50 फीसदी किया, भारत के सैकड़ों उद्योग बंद हो गए और लाखों कामगार बेकार हो गए. भारतीय निर्यातकों ने जबरन दाम घटाए और नुकसान में सामान बेचा यह सोच कर कि कुछ समय बाद भारत सरकार तो हथियार डाल ही देगी.

भारत अमेरिका को वह लाल आंख नहीं दिखा सका जो उस ने चीन को दिखाई थी लेकिन चीन ने अमेरिका की एक भी बात नहीं मानी.
आज ऐसा नहीं है कि भारत अमेरिका से व्यापार करने के बिना जिंदा नहीं रह सकता लेकिन भारत के ‘भेदिए’ ही उसे अमेरिकी शरण में धकेल रहे हैं.

भारत-अमेरिका डील मीर जाफर और जयचंदों की याद दिलाती है. कहा गया है कि जो इतिहास नहीं पढ़ते उन्हें इतिहास सबक सिखाता है. हम तो हर 5-10 साल में इतिहास ही बदल देते हैं ताकि हमारे अपने लोगों को पता न चले कि भारत-अमेरिकी डील एक ऐतिहासिक भूल है. Editorial

सरित प्रवाह – बंगलादेश और भारत

Editorial : बंगलादेश में हुए आम चुनावों में बंगलादेश नैशनलिस्ट पार्टी की जीत से भारत में संतोष इतना ही होना चाहिए कि न तो जमाते इसलामी सत्ता में आई, न जेनजी की पार्टी जिस ने 2024 में शेख हसीना को उखाड़ फेंका था. बीएनपी के मुखिया तारिक रहमान ने कहना शुरू कर दिया है कि वे न दिल्ली के इशारों पर चलेंगे न पिंडी के. उन के लिए बंगलादेश मुख्य है.

जिस देश का जन्म भारत के कारण हुआ वह अब भारत के लिए अगर दूसरा सिरदर्द बन रहा है तो इस के लिए भारत जिम्मेदार है, बंगलादेश नहीं. भारत 1971 के बाद शेख मुजीबुर्रहमान को सुरक्षित नहीं रख पाया, बंगलादेशी सेना के कुछ जूनियर अफसरों ने ही उन की हत्या करवा कर उन की पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया.

इस का एक कारण यह था कि 1905 में जब अंगरेजों ने हिंदूमुसलिम आधार पर बंगाल प्रोविंस को 2 हिस्सों में बांटना चाहा था तभी भारत के हिंदू नेता उखड़ गए थे कि मुसलिम बहुल प्रोविंस कैसे बन जाए क्योंकि इस से हिंदू बंगालियों का पूर्वी बंगाल के दोहन पर बुरा असर पड़ता.
1757 तक तो पूरे बंगाल पर मुसलिम राज था. पलासी की लड़ाई के बाद जब से अंगरेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी का राज आया, तेजी से इंग्लिश पढ़ कर और अंगरेजों से व्यापार के गुण सीख कर हिंदू व्यापारियों व धर्मगुरुओं ने पूरे बंगाल की अर्थव्यवस्था व समाज पर कब्जा कर लिया था.

1905 में वायसराय लौर्ड जौर्ज नथानिएल कर्जन ने जब मुसलिम मांग के अनुसार बंगाल प्रोविंस को अलग करना चाहा था तो हिंदू धर्मगुरुओं और व्यापारियों को भारी नुकसान दिखा जो मुसलिम नवाबों के शासन के बाद अंगरेजों के शासन में जम कर कमाई कर रहे थे. 1947 में भारत के विभाजन के समय 1905 से 1911 तक के प्रोविंस विभाजन की यादें जड़ में थीं और बंगलादेश बन जाने के बाद भी यह इतिहास भुलाया नहीं गया है.

1971 के बाद भारत सरकार की चाहे जो गलती रही हो पर संघ परिवार ने अपना 1905 से 1911 वाला गुस्सा बरकरार रखा और उस ने भारत में बसे बंगलादेशियों के खिलाफ मुहिम वर्ष 2014, 2019 और 2024 के आम चुनावों में इस्तेमाल कर अपनी पार्टी भाजपा को जीत दिलवाई. यही नहीं, असम के राज्य विधानसभा चुनाव में भी उस ने इसे हथियार बनाया.

तारिक रहमान की बीएनपी इस पुराने गड़े मुद्दे को भूल जाए, यह संभव नहीं है क्योंकि भारत में मुसलिम राज को कहां भुलाया जा रहा है. फिल्म ‘छावा’ और ‘धुरंधर’ की सफलताएं बताती हैं कि यहां की जनता को यह भेदभाव उजागर करने में आज भी पाश्विक आनंद आता है. बंगलादेश भारत का मित्र तब बन सकता जब कम से कम सरकार इस मकड़जाल से निकले. पर जब वोट पाने का अकेला तरीका ही प्रशासनिक नीतियां नहीं बल्कि धार्मिक नारे, वह भी विघटनकारी, हों तो फिर तारिक रहमान की नीति को समझना मुश्किल नहीं. Editorial

Readers’ Problems : “बिना औफिस पौलिटिक्स…”, “टीनऐज बेटे को ढील…”

Readers’ Problems :
बिना औफिस पौलिटिक्स के आगे बढ़ना मुश्किल है.
औफिस पौलिटिक्स में फंस कर काम से मन हटने लगा है. मेरी उम्र 35 वर्ष है, एक मिडसाइज कंपनी में काम करता हूं. औफिस में गुटबाजी और चुगली आम बात है. कुछ लोग मैनेजमैंट के करीब बनने के लिए दूसरों की छवि खराब करते हैं. मैं अपना काम ईमानदारी से करता हूं, लेकिन औफिस पौलिटिक्स से दूर रहने के कारण कई बार मौके हाथ से निकल जाते हैं. मन में यह सवाल उठता है कि क्या बिना पौलिटिक्स के आगे बढ़ना संभव है?
आप का सवाल आज के कौर्पोरेट माहौल की एक बहुत सच्ची तसवीर पेश करता है. औफिस में गुटबाजी और चुगली अकसर इसलिए पनपती है क्योंकि कुछ लोग शौर्टकट से आगे बढ़ना चाहते हैं. यह स्वाभाविक है कि ऐसी स्थिति में ईमानदारी से काम करने वाला व्यक्ति खुद को पीछे छूटता हुआ महसूस करे लेकिन यह समझना जरूरी है कि पौलिटिक्स से दूर रहना और पौलिटिक्स को समझ कर प्रोफैशनल तरीके से काम करना – ये 2 अलग बातें हैं. बिना पौलिटिक्स में उलझेआगे बढ़ना संभव है बशर्ते आप अपनी मेहनत को सही ढंग से दिखाई देने योग्य बनाएं.
सब से पहले, अपने काम को विजिबल बनाइए. अकसर ईमानदारी से काम करने वाले लोग यह मान लेते हैं कि अच्छा काम अपनेआप बोल देगा लेकिन प्रोफैशनल दुनिया में सही मंच पर अपने योगदान को सामने रखना भी एक स्किल है. मीटिंग में प्रोजैक्ट की प्रौग्रेस स्पष्ट शब्दों में बताना, समयसमय पर मैनेजर को अपडेट देना और अपने अचीवमैंट्स को तथ्यात्मक ढंग से समझाना सैल्फप्रमोशन नहीं, बल्कि प्रोफैशनल कम्युनिकेशन है. इस से आप की पहचान बनेगी और गुटबाजी के बीच भी आप का काम नजरअंदाज नहीं होगा.
दूसरा, रिश्तों से भागिए मत, लेकिन चुगली का हिस्सा भी मत बनिए. हर औफिस में कुछ अनौपचारिक नैटवर्क होते हैं. आप विनम्र, सहयोगी और प्रोफैशनल रह कर अच्छे वर्किंग रिलेशन बना सकते हैं, बिना किसी की बुराई किए. भरोसेमंद लोगों के साथ तालमेल बनाना कैरियर के लिए जरूरी है, क्योंकि मौके अकसर टीमवर्क और रैफरैंस के जरिए भी आते हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि आप रिश्ते काम के लिए बनाइए, कामयाबी के लिए किसी को गिरा कर नहीं.
तीसरा, अगर कोई आप को चुगली या नैगेटिव पौलिटिक्स में घसीटने की कोशिश करे तो शांति से विषय बदल दें या खुद को उस से दूर रखें. इस से आप की प्रोफैशनल छवि साफसुथरी बनी रहती है. लंबे समय में मैनेजमैंट उन लोगों पर ज्यादा भरोसा करता है जो स्थिर, भरोसेमंद और परिणाम देने वाले होते हैं, न कि हर समय विवादों में उलझे रहते हैं. आप अपना काम दिखाएं, प्रोफैशनल रिश्ते निभाएं और अपने मूल्यों पर टिके रहें. धीमा रास्ता अकसर टिकाऊ होता है और टिकाऊ सफलता ही असली जीत है.
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टीनऐज बेटे को डील करने का सही तरीका क्या है.
बड़ा बेटा किशोरावस्था में है और पढ़ाई में ध्यान नहीं देता. मैं (उम्र 41 वर्ष), 2 बच्चों का पिता हूं. बड़ा बेटा पढ़ाई में ध्यान नहीं देता तो गुस्से में आ कर मैं उसे डांट देता हूं, कभीकभी सख्ती भी कर बैठता हूं. बाद में गिल्टी फील होती है कि कहीं मैं उसे खुद से दूर तो नहीं कर रहा लेकिन डर भी है कि ढील देने से वह बिगड़ न जाए. सही संतुलन कैसे बनाऊं?
बच्चों की परवरिश में सख्ती और प्यार दोनों की जरूरत होती है लेकिन डर पर आधारित अनुशासन लंबे समय में रिश्तों को नुकसान पहुंचाता है. किशोरावस्था में बच्चे अपनी पहचान ढूंढ़ रहे होते हैं, ऐसे में उन्हें समझ और मार्गदर्शन ज्यादा चाहिए.
डांटने के बजाय उस से बात करें. बेटे से पूछें कि पढ़ाई में मन क्यों नहीं लग रहा. उस की रुचियों और कठिनाइयों को समझने की कोशिश करें. सख्ती और ढील के बीच संतुलन का मतलब है स्पष्ट नियम और भावनात्मक सहारा. घर में पढ़ाई का एक तय समय, स्क्रीनटाइम की सीमा और जिम्मेदारियों की सूची होनी जरूरी है लेकिन इन नियमों के पीछे का कारण भी बच्चे को समझाएं. ‘क्यों पढ़ना जरूरी है’ यह बात डर से नहीं, उस के भविष्य के संदर्भ में समझाएं. साथ ही, उस की छोटीछोटी कोशिशों की सराहना करें. सिर्फ गलतियों पर ध्यान देने से बच्चे का मनोबल गिरता है, जबकि सराहना उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है.
अपने गुस्से पर भी काम करना बहुत ही जरूरी है. जब आप को लगे कि आप नियंत्रण खो रहे हैं तो उसी पल बातचीत रोक दें, पानी पी लें, थोड़ी देर कमरे से बाहर चले जाएं. बाद में शांत मन से बात करना ज्यादा असरदार होता है. याद रखें, बच्चा आप के व्यवहार से ही भावनाएं संभालना सीखता है. अगर वह आप के गुस्से को संभालते देखेगा तो वह भी धीरेधीरे वही सीखेगा.
अंत में, हर बच्चा एकजैसा नहीं होता. तुलना करने या दूसरों की सफलता का उदाहरण दे कर दबाव बनाने से बचें. अपने बेटे की रुचियों और क्षमताओं को पहचान कर उसे दिशा दें. अनुशासन डर से नहीं, भरोसे से टिकता है. जब बच्चा यह महसूस करता है कि उस के मातापिता उस के साथ हैं, तब वह खुद को सुधारने की कोशिश जरूर करता है. – कंचन
आप भी अपनी समस्या भेजें
पता : कंचन, सरिता 
ई-8, झंडेवाला एस्टेट, नई दिल्ली-55. 
समस्या हमें एसएमएस या व्हाट्सऐप के जरिए मैसेज/औडियो भी कर सकते हैं.
08588843415
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Satirical Story In Hindi : मुंबई की लोकल ट्रेन के फायदे

Satirical Story In Hindi : आप ने मुंबई की लोकल ट्रेन की काफी शिकायतें सुनी होंगी. शिकायतों से मतलब सवारी करने वालों की शिकायतें. मसलन, काफी भीड़ का होना, सीट का न मिलना, यहां तक कि इन्हें कलंक, हत्यारिन वगैरह कहना. वैसे तो लोकल ट्रेनें मुंबई की लाइफलाइन हैं और लाइफलाइन की शिकायत भला कैसे की जा सकती है? यहां की लोकल टे्रनों के कुछ खास फायदे हैं. इन्हें जान कर आप का मन खुश हो जाएगा.

फायदा नंबर एक यह है कि आप कितने भी सीधेसरल क्यों न हों, यहां की लोकल ट्रेन की कृपा से आप जीवट इनसान में तबदील हो जाते हैं.

शुरुआत में भीड़ देख कर आप 1-2 ट्रेनें छोड़ भी सकते हैं. ट्रेन में भीड़ के चढ़ जाने पर प्लेटफार्म चुनाव में हारी हुई पार्टी के दफ्तर या हारी हुई क्रिकेट टीम के खिलाड़ी के घर की तरह सूना हो सकता है और आप यह गलतफहमी पाल सकते हैं कि अगली ट्रेन में आप आराम से जा पाएंगे. पर अगली टे्रन आने तक, जिस में सिर्फ चंद मिनट ही होते हैं, भीड़ फिर पहले जैसी ही हो जाएगी.

जैसे बारिश के डर से चींटियां बिलबिला कर बिल से निकलती हैं, वैसे ही कुछ ही पलों में हजारों की तादाद में लोगों का प्रकट होना यहां आम बात है. आखिर में आप को लगेगा कि किसी ने चारा घोटाला कर चारे का हरण कर लिया है और आप के पास कोई चारा नहीं बचा है. नतीजतन, आप भीड़ से डरने के बजाय उस का हिस्सा

बन जाएंगे. ट्रेन में चढ़ना तो अपनेआप में भगीरथ प्रयास है ही, ट्रेन में टिके रहना भी उतना ही बहादुरी भरा काम है. बदन की मालिश बगैर किसी खर्चेपानी के होती रहेगी. कभी रेलिंग के सहारे खड़े रहने, तो कभी दीवार से हाथ टेके खड़े रहने से आप की मांसपेशियां मजबूत होंगी. सेहत सुधरती जाएगी और बगैर ज्यादा कोशिश किए आप का बदन गठीला हो कर लोगों के जलने की वजह बन जाएगा.

जब आप प्लेटफार्म पर पहुंचते हैं और देखते हैं कि ट्रेन के आने में महज एक मिनट ही बाकी है तो आप फर्राटा धावक बन जाते हैं, वह भी अपने जैसी बहुत सी बाधाओं से टकराने से बचने की जुगत के साथ. आप भले ही मोबाइल फोन से कितनी भी दूरी बना कर रखते हों, पर ट्रेन में समय बिताने के लिए आप को इस से दोस्ती करनी पड़ेगी और आप का अपने मोबाइल फोन से मधुर संबंध बन जाएगा. इन ट्रेनों में कुछ घोर पुस्तक विरोधियों को पुस्तक प्रेमी बनते, नास्तिकों को भजन करते भी देखा गया है. इसी तरह इन लोकल ट्रेनों में नाश्ता करते लोग भी मिल जाते हैं. वे भी जो बड़े आराम से नाश्ता करने के हिमायती हैं, इन लोकल ट्रेनों के चक्कर में सब से पहले जगह पाने की जुगत भिड़ाते हैं. खड़ा होने या बैठने की जगह मिल जाने के बाद ही ये नाश्ता करते हैं. पहले ट्रेन में सीट पाओ, फिर खाना खाओ.

कभीकभी आप ट्रेन से बैग ले कर उतरेंगे तो हाथ में सिर्फ बैग का हैंडल रह जाएगा मानो भीड़रूपी झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने किसी अंगरेज सैनिक का सिर धड़ से अलग कर दिया हो. इस से बैग इंडस्ट्री को काफी बढ़ावा मिलेगा. अगर बैग भारत में बनेंगे तो ‘मेक इन इंडिया’ को भी बढ़ावा मिलेगा. अगर इस हालत यानी बैग के सिर और धड़ को अलग होने से बचाना है तो आप को बैग को हाथ में न ले कर पीठ पीछे कस कर लटकाना होगा. अगर पीछे से किसी के बैग से कुछ निकाल लेने का डर सता रहा हो तो बैग को बैकपैक के बजाय चैस्टपैक बनाना पड़ेगा यानी बैग को पीठ पर न लटका कर सीने पर लटकाना पड़ेगा.

इस का एक बड़ा फायदा मर्दों को को ‘खिलाडि़यों के खिलाड़ी’ अक्षय कुमार की तरह ‘पेट से होने’ का अहसास हो पाएगा. यहां हम किसी तरह का लिंगभेद न करते हुए बताते चलें कि यही हालत औरतों की बोगी की भी होती है और वे औरतें भी इसी तरह के सुख भोगने का हक रखती हैं. आखिरी स्टेशन को छोड़ कर बीच के किसी स्टेशन पर टे्रन से उतरने में भी काफी मशक्कत की जरूरत होती है यानी बीच के किसी स्टेशन पर सहीसलामत उतरना मतलब महारथी होना ही है. फिर इस से आप चौकन्ने भी होते हैं, क्योंकि अगर 1-2 स्टेशन पहले से ही कोशिश नहीं करेंगे तो अपने स्टेशन के 1-2 स्टेशन बाद ही उतर पाएंगे और फिर वापसी में फिर से वही परेशानी मोल लेनी पड़ेगी. इस से आप जागरूक मुसाफिर बन जाते हैं.

इस के अनेक फायदों में से एक फायदा यह भी है कि डियोडरैंट इंडस्ट्री को इस से काफी बढ़ावा मिलता है. 50 लोगों के बैठने के लिए बनी बोगी में डेढ़ सौ लोगों के लदने से सब के पसीनों की गंध ‘मिले गंध मेरी तुम्हारी तो गंध बने हमारी’ का राग अलापते लगते हैं. उन के इस राग से बचने के लिए डियोडरैंट की जरूरत होती है और इस से संबंधित इंडस्ट्री को काफी बढ़ावा मिलता है. ‘स्टार्टअप’ और?‘स्टैंडअप इंडिया’ को इस से बढ़ावा मिल सकता है. यहां की लोकल ट्रेन वर्गभेद को भी दूर करती है. सैकंड क्लास और फर्स्ट क्लास में कोई खास फर्क नहीं होता. बहुत हुआ तो सैकंड क्लास में डेढ़ सौ मुसाफिर होंगे तो फर्स्ट क्लास में 140.

मुसाफिरों की तादाद के मामले में लिंगभेद भी नहीं है. औरतों की बोगी में भी यही देखने को मिलेगा. हां, लोकल मुसाफिर एक फर्क बताते हैं कि फर्स्ट क्लास में पसीने की गंध डियोडरैंट की गंध से हार मानती है तो सैकंड क्लास में डियोडरैंट की गंध अपनी हार मान लेती है. बाकी मामलों में दोनों एक से हैं. हालांकि कई मामलों में मुकाबला बराबरी पर भी छूटता है.

ट्रेन के डब्बों में सामान बेचने वालों के भी वारेन्यारे होते हैं. कितनी भी भीड़ हो, वे लोग अपना सामान आसानी से बेच देते हैं. फायदे और भी हैं, पर ज्यादा फायदे गिनाने से कहीं आप कब्ज के शिकार न हो जाएं, इसलिए फिलहाल इतना ही. Satirical Story In Hindi

Family Story in Hindi : मेरी स्वीट मिट्ठी – प्यार और अपनेपन की एक खूबसूरत कहानी

Family Story in Hindi : मेरे नाना रिटायरमैंट के बाद सपरिवार कोलकाता में बस गए थे. उन का कोलकाता के बाहर बसी एक नामचीन डैवलपर की टाउनशिप में बड़ा सा फ्लैट था.

मेरी नानी पश्चिम बंगाल के मिदनापुर की थीं. वे अच्छीखासी पढ़ीलिखी थीं. वे महिला कालेज में प्रिंसिपल के पद पर थीं. नाना ने उन की इच्छा के मुताबिक कोलकाता में बसने का फैसला लिया था.

मैं अपनी मम्मी के साथ दुर्गा पूजा में कोलकाता गया था. मैं ने रांची से एमबीए की पढ़ाई की थी. कैंपस से ही मेरा एक मल्टीनैशनल कंपनी में सैलेक्शन हो चुका था. औफर लैटर मिलने में अभी थोड़ी देरी थी.

मिट्ठी से मेरी मुलाकात कोलकाता में दुर्गा पूजा के दौरान हुई. कौंप्लैक्स के मेन गेट पर वह सिक्योरिटी गार्डों से उलझ गई थी.

शाम के समय पास की झुग्गी बस्ती से कुछ बच्चियां दुर्गा पूजा देखने आई थीं. चिथड़ों में लिपटी बच्चियों को सिक्योरिटी गार्ड ने रोक दिया था.

टाउनशिप के बनने के दौरान मजदूरों ने वहां सालों अपना पसीना बहाया था. ये उन्हीं की बच्चियां थीं.

मिट्ठी वहां अकसर जाती थी. वह उन की चहेती दीदी थी. वह बच्चों के टीकाकरण में मदद करती थी. स्कूलों में उन को दाखिला दिलाती थी. बच्चियों को पूजा पंडाल तक ले जाने और प्रसाद दिलाने में मिट्ठी को तमाम विरोध का सामना करना पड़ा था.

मिट्ठी विजयादशमी के दिन भी दिखाई दी थी. लाल बौर्डर की साड़ी में वह बेहद खूबसूरत दिख रही थी. मिट्ठी मुझे भा गई थी.

मम्मी जल्दी मेरे फेरे कराना चाहती थीं. उन्होंने रांची शहर के कई रिश्ते भी देखे थे. नानी से सलाहमशवरा करने

के लिए मम्मी मुझे कोलकाता ले कर आई थीं.

‘‘अमोल खुद अपना ‘जीवनसाथी’ चुनेगा… मेरा पोता अपने लिए बैस्ट साथी चुनेगा… एकदम हीरा…’’ नानी मेरी अपनी पसंद की बहू के हक में थीं.

‘‘गोरीचिट्टी, देशी मेम बहू बनेगी…’’ मम्मी की यही सोच थी. सुंदर, सुशील, घर के कामों में माहिर बहू उन की पसंद थी.

‘‘भाभी, हमारी बहू तो फर्राटेदार अंगरेजी में बतियाने वाली सांवलीसलोनी और स्मार्ट होगी…’’ छोटी मामी ने भी अपनी पसंद जताई थी.

‘‘मुझे मिट्ठी पसंद है…’’ मैं ने छोटी मामी को अपनी पसंद बताई.

मिट्ठी कौंप्लैक्स में ही रहती थी. मेरी मम्मी समेत परिवार के सभी लोग मिट्ठी की हरकतों से अनजान नहीं थे.

‘‘कौंप्लैक्स में मिट्ठी की इमेज ज्यादा अच्छी नहीं है. वह तेजतर्रार है… अमीरजादों के साथ आवारागर्दी करती है… मोटरसाइकिल से स्टंट करती है… बेहद बिंदास है… शौर्ट्स पहन कर घूमती है…’’ छोटी मामी ने मुझे जानकारी दी.

‘‘मुझे बोल्ड लड़कियां पसंद हैं…’’

‘‘उम्र में भी बड़ी है…’’

मैं ने उम्र की बात को भी नकार दिया.

‘‘मिट्ठी कैंपस के लड़कों के साथ टैनिस… क्रिकेट… बास्केटबाल खेलती है… मौडलिंग करती है… कंडोम की मौडलिंग… उस के मम्मीपापा ने कितनी आजादी दे रखी है…’’ मेरी बात से छोटी मामी शायद नाराज हो गई थीं.

‘‘मैं क्या सुन रही हूं…? मेरी रजामंदी बिलकुल नहीं है… नहीं… मैं मिट्ठी को बहू नहीं बना सकती…’’ मम्मी बेहद नाराज थीं. उन्होंने मुझ से दूरी बना ली थी.

मैं मिट्ठी को अपना मान चुका था. शीतयुद्ध का अंत हुआ. नानी को भनक लगी. उन्होंने सब को अपने कमरे में बुलाया. सब की बातों को बड़े ही ध्यान से सुना.

‘‘अमोल ने जिद पकड़ ली है… बदनाम लड़की से रिश्ता करने पर तुले हैं…’’ छोटी मामी ने नानी को बताया.

‘‘यह बदनाम लड़की कौन है…? कहां की है…?’’ नानी ने सवाल किया.

‘‘अपने कौंप्लैक्स की ही है… अपनी मिट्ठी… आवारागर्दी, गुंडागर्दी करती है… पूजा के पंडाल में हंगामा भी किया था… आप ने सुना होगा…’’ छोटी मामी ने मिट्ठी की खूबियों का बखान किया.

‘‘मिट्ठी तो अच्छी बच्ची है… कई बार मंदिर में मिली है… मेरे पैर छुए हैं… मैं ने आशीर्वाद दिया है… वह बदनाम कैसे हो सकती है,’’ नानी छोटी मामी से सहमत नहीं थीं.

‘‘क्या अच्छे परिवार की बच्चियां पराए जवान लड़कों के साथ क्रिकेट… बास्केटबाल और टैनिस खेलती हैं? कंडोम की मौडलिंग करती हैं? छोटे कपड़े पहनती हैं? मुंहफट और बेशर्म होती हैं?’’ मम्मी ने एकसाथ कई बातें बताईं और सवाल उठाए.

‘‘मैं ने अपने लैवल पर इन बातों की पड़ताल की है… जानकारियां इकट्ठी की हैं… मैं मिट्ठी से मिला हूं. वह मर्दऔरत के समान हक की बात करती है… वह एक समाजसेविका है… उसे कई मर्द दोस्तों का भी साथ मिला है… सब मिल कर काम करते हैं… ऐक्टिव रहने के लिए फिटनैस जरूरी है…

‘‘सामाजिक कामों के लिए रुपएपैसों की जरूरत पड़ती है. कंडोम की मौडलिंग में कोई बुराई नहीं है… बढ़ती आबादी को कंडोम से ही रोका जा सकता है… इन पैसों से बस्ती के गरीब बच्चों के स्कूल की फीस दी जा सकती है…

‘‘मिट्ठी बोल्ड है… गलतसही की पहचान और परख उसे है… वह अपने काम में जुटी है… जानती है कि वह गलत

रास्ते पर नहीं है… फुजूल की कानाफूसी और बदनामी की उसे कोई परवाह नहीं है. सब बकवास है…’’ मैं ने नानी की अदालत में मिट्ठी का पक्ष रखा.

‘‘मेरे पोते ने बैस्ट लड़की को चुना है. मिट्ठी ही मेरी बहू बनेगी…’’ नानी ने सहज भाव से अपना फैसला सुनाया. मुझे गले से लगाया… रिश्ते के लिए खुद पहल करने की बात कही. Family Story in Hindi

Satirical Story In Hindi : बीवी या बौस – लव मैरिज करने का कुछ ऐसा रहा परिणाम

Satirical Story In Hindi : मैंने अपनी जिद पर लव मैरिज की थी, इसीलिए विदाई के वक्त ससुरजी ने कहा था, ‘‘जमाई बाबू, अभी तो मैं अपनी बेटी की शादी नहीं करना चाहता था, लेकिन आप के प्यार के आगे मुझे झुकना पड़ा. खैर, बेटी को मैं ने अच्छे संस्कार दिए हैं, इसलिए आप की जिंदगी की बगिया हमेशा गुलजार रहेगी.’’

मैं ने ससुरजी के चरण छू कर कहा था, ‘‘जब तक मेरी इन बाजुओं में दम है, आप की बेटी राज करेगी.’’

और इस तरह बिना एक फूटी कौड़ी दिए ससुर साहब ने अपनी सुपुत्री मुझे सौंप दी और मैं अपनी बीवी को ले कर दिल्ली की एक बस्ती में आ गया.

जब मेरी मासूम सी बीवी ने मेरे घर में पहला कदम रखा था, तो मैं बहुत खुश हुआ था. सोचा था कि अब मुझे कष्ट नहीं होगा. समय पर नाश्ताखाना मिलेगा. जब दफ्तर से लौट कर आऊंगा तो बीवी मुझे प्यार करेगी. लेकिन मेरे सपने धरे के धरे रह गए.

एक दिन मैं ने दफ्तर से लौटते समय अपनी बीवी को फोन किया, ‘‘क्या कर रही हो?’’

‘कुछ नहीं, लेकिन आप कब आ रहे हैं?’ उधर से आवाज आई.

मुझे बहुत भूख लगी थी. मैं ने सोचा कि वह खाना बना कर रखेगी, इसीलिए मेरे आने के बारे में पूछ रही है. मैं ने कहा, ‘‘प्रिये, कुछ लजीज खाना बनाओ. मैं दफ्तर से निकल रहा हूं. एक घंटे में पहुंच जाऊंगा.’’

‘ठीक है,’ वह बोली.

मैं रास्तेभर गाना गुनगुनाते हुए घर पहुंचा. मैं खुश था कि घर पहुंचते ही गरमागरम लजीज खाना मिलेगा. मैं ने घंटी बजा दी लेकिन दरवाजा नहीं खुला. फिर 1-2 बार बजा कर इंतजार किया. फिर भी दरवाजा नहीं खुला तो कई बार घंटी बजाई. तब जा कर दरवाजा खुला.

‘‘क्यों, क्या हो गया? देर क्यों हुई दरवाजा खोलने में,’’ मैं ने पूछा.

वह अपने चेहरे पर लटक रहे बालों को समटते हुए बोली, ‘‘कुछ नहीं, जरा आंख लग गई थी.’’

घर का सामान सुबह जिस हालत में था वैसे ही अभी भी पड़ा था. सुबह जिस प्लेट में मैं ने नाश्ता किया था वह वैसे ही जूठी डाइनिंग टेबल पर पड़ी थी. धोने के लिए गंदे कपड़ों का ढेर एक कोने में मुंह चिढ़ा रहा था. फर्श पर धूल की परत थी. रसोईघर में जूठे बरतनों का ढेर लगा था.

लजीज खाना खाने का मेरा सपना चकनाचूर हो गया था. वह मासूमियत से हुस्न के हथियार के साथ अनमने ढंग से मुझे देख रही थी. मैं खून का घूंट पी कर रह गया.

कुछ दिनों के बाद एक सुबह मैं दफ्तर के लिए निकल रहा था, तो वह बोली, ‘‘सुनिएजी, मेरे मोबाइल फोन में बैलेंस खत्म हो गया है. बैलेंस डलवा दीजिएगा.’’

मैं ने चौंक कर कहा, ‘‘बैलेंस कैसे खत्म हो गया… कल ही तो 2 सौ रुपए का रीचार्ज कराया था?’’

‘‘कल मैं ने मम्मीपापा से बात की थी और बूआ से भी बात की थी…

2-3 सहेलियों से भी बात की थी…’’ वह थोड़ा अटकते हुए बोली.

‘‘तो इतनी ज्यादा बात करने की क्या जरूरत थी? सिर्फ हालचाल पूछ लेती और बात खत्म कर देती,’’ मैं ने कहा.

‘‘हालचाल ही तो पूछा था,’’ वह बोली.

मुझे दफ्तर के लिए देर हो रही थी. मैं ने कहा, ‘‘अच्छा, ठीक है, बैलेंस डलवा दूंगा,’’ कह कर मैं घर से निकल गया. मेरे सपनों का महल टूटता जा रहा था.

इसी बीच उसे एक नया शौक सूझा. अब वह टैलीविजन का रिमोट हाथ में लिए सीरियल देखती रहती थी. कुछ कहता तो भी सीरियल में ही खोई रहती. जोर से बोलने पर वह मेरी तरफ देख कर पूछती, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘दफ्तर से थकाहारा आया हूं. पानी और नाश्ते के लिए भी नहीं पूछती और कहती हो कि क्या हुआ…’’

‘‘अच्छा, अभी 5 मिनट में लाती हूं. सीरियल अब खत्म होने ही वाला है,’’ टैलीविजन पर से आंखें हटाए बिना वह जवाब देती.

उस के वे 5 मिनट कभी खत्म नहीं होते. मजबूरन मैं खुद ही रसोईघर में जा कर कुछ खाने को ले आता. खुद भी खाता और अपनी बीवी को भी खिलाता.

महीनों सीरियल प्रेम दिखाने के बाद मेरी बीवी का पासपड़ोस की औरतों के घरों में आनेजाने और गपबाजी का दौर शुरू हुआ.

मैं दफ्तर से आ कर दरवाजे की घंटी बजाता रहता लेकिन दरवाजा नहीं खुलता. जब फोन करता तो पता चलता कि वह किसी पड़ोसन के घर बैठी है.

जल्द ही मेरी बीवी का पड़ोसन के घरों में जाने का साइड इफैक्ट भी शुरू हो गया. दूसरों के घरों में कुछ नई और अच्छी चीजें देख कर आती और मुझे भी वे चीजें लाने को कहती. कुछ तो अपनी जरूरत और पैसे की सीमा को देखते हुए मैं ले भी आया लेकिन अकसर ऐसी डिमांड होने लगी.

कुछ मेरी चादर से बाहर होता तो मैं मना कर देता. वह मुंह फुला कर बैठ जाती. खाना जैसेतैसे बना कर लाती, जो खाया न जाता.

एक दिन मैं ने उसे समझाया, ‘‘प्रिये, सब की जरूरत और औकात अलग होती है और उसी के मुताबिक सब काम करते हैं. दूसरों को देख कर हमें परेशान नहीं होना चाहिए.’’

‘‘हां, मेरी किस्मत ही खराब है, तभी तो सारी अच्छी चीजें दूसरों के घर देखती हूं. अपने घर में नसीब कहां?’’ वह बुझी आवाज में बोली.

‘‘निराश क्यों होती हो? समय आने पर हमारे यहां भी सबकुछ हो जाएगा. सब एक दिन में तो अमीर नहीं हो जाते. इस में समय लगता है,’’ मैं ने कहा.

‘‘मैं बोझ हो गई थी, इसीलिए मेरे मम्मीपापा ने जल्दी मेरी शादी करा दी,’’ यह कहते ही उस की आंखों से आंसू टपकने लगे.

‘‘लेकिन यह शादी तो हम दोनों के बीच प्यार होने के चलते हुई थी.’’

‘‘तो क्या हुआ? मैं नादान थी, लेकिन मेरे मम्मीपापा को तो अक्ल थी. मुझे बोझ समझ कर उन्होंने मेरा निबटारा कर दिया.’’

‘‘खैर, देर से शादी होती तो क्या कोई टाटा, बिरला या मुकेश अंबानी का बेटा आ जाता रिश्ता ले कर?’’ गुस्से में मेरे मुंह से निकला.

‘‘कोई भी आता लेकिन आप से अच्छा आता,’’ उस ने जवाब दिया.

मैं ने चुप रह जाना ही ठीक समझा.

रविवार का दिन था. मैं ने सोचा कि आज आराम करूंगा. रोज अपने दफ्तर में बौस की और्डरबाजी से परेशान रहता हूं. कम से कम आज तो आराम कर लूं.

मैं ने बीवी से कहा, ‘‘जानेमन, आज कुछ अच्छा खाना बनाओ ताकि खा कर मजा आ जाए. मैं आज टैलीविजन पर फिल्म देखूंगा और आराम करूंगा.’’

लेकिन मेरी बीवी का खयाल कुछ और ही था. वह बोली, ‘‘चलिए न आज कहीं बाहर घूमने चलते हैं और होटल में खाना खाते हैं.’’

मैं ने घबरा कर कहा, ‘‘कहां घूमने चलेंगे? कोई अच्छी जगह नहीं है. भीड़भाड़ और गाडि़यों के जाम में ही फंसे रहे जाते हैं और होटल का खाना तो ऐसा होता है कि खाने के बाद पछतावा होने लगता है कि क्यों खाया.

‘‘खाने का कोई स्वाद नहीं होता. सिर्फ ज्यादा पैसे और टिप दो. शाम को हैरानपरेशान हो कर घर लौटो.’’

‘‘आप तो हमेशा ऐसे ही बोलते हैं. शादी के बाद हनीमून पर भी बाहर नहीं ले गए,’’ वह बिस्तर पर लेट कर आंसू बहाने लगी.

छुट्टी का मजा खराब हो चुका था. मैं खुद रसोईघर में जा कर कुछ स्वादिष्ठ खाना बनाने की कोशिश करने लगा.

एक बार पड़ोस में शादी थी. मुझे भी सपरिवार न्योता मिला था. दफ्तर से आ कर मैं ने अपनी बीवी से कहा, ‘‘जल्दी तैयार हो जाओ. सब इंतजार कर रहे होंगे.’’

लेकिन बहुत देर बाद भी वह अपने कमरे से बाहर न निकली. मैं कमरे में गया तो देखा कि वह तकिए में मुंह छिपा कर रो रही थी.

‘‘अरे, क्या बात हो गई… रो क्यों रही हो?’’ मैं ने घबरा कर पूछा.

वह कुछ न बोली. मैं ने जबरदस्ती उसे खींच कर बैठाया और फिर वजह पूछी.

‘‘न्योते में जाने लायक मेरे पास कपड़े नहीं हैं. मैं क्या पहन कर जाऊंगी?’’ वह सुबकते हुए बोली.

मैं हैरान रह गया. मैं रोज दफ्तर आताजाता हूं. लेकिन मेरे पास सिर्फ 2 जोड़ी ढंग के कपड़े थे, जबकि मेरी बीवी के पास कई जोड़ी कपड़े थे. 2 महीने पहले भी उस ने एक सूट खरीदा था, फिर भी वह रो रही थी.

मैं ने अलमारी में से उस के कई कपड़े निकाले और उस के आगे फैलाते हुए कहा, ‘‘ये सारे तो नए सूट हैं, फिर क्यों रो रही हो?’’

‘‘ये सब तो मैं पहले पहन चुकी हूं,’’ वह मुंह फेर कर बोली.

‘‘तुम कहना क्या चाहती हो? जो कपड़ा एक बार पहन लिया, वह पुराना हो गया क्या?’’ मैं ने पूछा.

‘‘ये कपड़े पहने हुए मुझे सब औरतें देख चुकी हैं.’’

‘‘मतलब, हर मौके लिए तुम्हें नए कपड़े चाहिए?’’ मैं ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘कोई कपड़े से बड़ा या छोटा नहीं होता. देखो तो, यह सूट कितना अच्छा है. तुम पहन कर तो देखो. जो इस सूट में तुम्हें देखेगा, तारीफ करेगा,’’ मैं ने पुचकारते हुए कहा.

उस दिन मैं बड़ी मुश्किल से अपनी बीवी को मना पाया था. लेकिन अब मेरी सीधीशांत दिखने वाली बीवी बातबात पर गुस्सा करने लगी थी. सीरियल देखने से मना

करता तो रिमोट पटक देती. पासपड़ोस में ज्यादा जाने से मना करता तो गुस्से में अपने को कमरे बंद कर लेती.

फोन पर ज्यादा बात करने से मना करता तो कई दिन तक मोबाइल फोन नहीं छूती. इतना ही नहीं, अगर मैं उस के बने खाने की शिकायत करता तो मुझे पर ही चीखने लगती और खाना बनाना छोड़ देती.

मैं तंग आ गया था. सोचता कि शादी से पहले कितनी सीधी और प्यारी थी मेरी बीवी, पर अब तो ज्वालामुखी बन गई है और गुस्सा तो जैसे इस की नाक पर बैठा रहता है.

दफ्तर में मेरा बौस काम में कमी निकाल कर मुझ पर बातबात पर गुस्सा करता था. लेकिन नौकरी तो करनी ही थी, उसी से घर का गुजारा चलता था, इसीलिए बौस का गुस्सा सहना पड़ता था.

घर आता तो बीवी भी मुझ पर ही बातबात पर गुस्सा करती. समझ में नहीं आता कि वह मेरी बीवी है या बौस.

मेरी बीवी और मेरे बौस ने मेरी जिंदगी दूभर कर दी थी. पता नहीं, इन दोनों के चक्रव्यूह से मैं कभी निकल पाऊंगा भी या नहीं. Satirical Story In Hindi

Romantic Story in Hindi : बैलेंसशीट औफ लाइफ – अनन्या की जिंदगी में कैसे मच गई हलचल?

Romantic Story in Hindi : औफिस में अनन्या अपने सहकर्मियों के साथ जल्दीजल्दी लंच कर रही थी. लंच के फौरन बाद उस का एक महत्त्वपूर्ण प्रेजैंटेशन था, जिस के लिए वह काफी उत्साहित थी. इस मीटिंग की तैयारी वह 1 हफ्ते से कर रही थी. उस की अच्छी फ्रैंड सनाया ने टोका, ‘‘खाना तो कम से कम आराम से खा लो, अनन्या. काम तो होता रहेगा.’’

‘‘हां, जानती हूं, पर इस प्रेजैंटेशन के लिए बहुत मेहनत की है, राहुल का स्कूल उस का होमवर्क, उस का खानापीना सुमित ही देख रहा है आजकल.’’ ‘‘सच में, तुम्हें बहुत अच्छा पति मिला है.’’

‘‘हां, उस की सपोर्ट के बिना मैं कुछ कर ही नहीं सकती.’’ लंच कर के अनन्या एक बार फिर अपने काम में डूब गई. पवई की इस अत्याधुनिक बिल्डिंग के अपने औफिस के हर व्यक्ति की प्रशंसा की पात्र थी अनन्या. सब उस के गुणों की, मेहनत की तारीफ करते नहीं थकते थे. आधुनिक, स्मार्ट, सुंदर, मेहनती, प्रतिभाशाली अनन्या

10 साल पहले सुमित से विवाह कर दिल्ली से यहां मुंबई आई थी और पवई में ही अपने फ्लैट में अनन्या, सुमित और उन का बेटे राहुल का छोटा सा परिवार खुशहाल जीवन जी रहा था. अनन्या ने अपने काम से संतुष्ट हो कर घड़ी पर एक नजर डाली. तभी व्हाट्सऐप पर सुमित का मैसेज आया, ‘‘औल दि बैस्ट’, साथ ही किस की इमोजी. अनन्या को अच्छा लगा, मुसकराते हुए जवाब भेजा. अचानक उस के फोन की स्क्रीन पर मेघा का नाम चमका तो उस ने हैरान होते हुए फोन उठा लिया. मेघा उस की कालेज की घनिष्ठ सहेली थी. वह इस समय दिल्ली में थी.

मेघा ने कुछ परेशान सी आवाज में कहना शुरू किया, ‘‘अनन्या, तुम औफिस में हो?’’ ‘‘अरे, क्या हुआ? न हाय, न हैलो, सीधे सवाल तुम ठीक तो हो न?’’

‘‘मैं तो ठीक हूं अनन्या, पर बड़ी गड़बड़ हो गई.’’

‘‘क्या हुआ? कुछ बताएगी भी.’’ ‘‘मार्केट में राघव की आत्मकथा ‘‘बैलेंसशीट औफ लाइफ’’ आई है न. उस ने तेरा और अपना पूरा किस्सा इस में लिख दिया है.’’

‘‘क्या?’’ तेज झटका लगा अनन्या को.

‘‘हां, मैं ने अभी पढ़ी नहीं है पर मेरे पति संजीव को बुक पढ़ कर किसी ने बताया कि किसी अनन्या की कहानी लिख कर तो इस ने शायद उस की लाइफ में तूफान ला दिया होगा. संजीव समझ गए कि शायद यह अनन्या तुम ही हो, आज शायद संजीव यह बुक लाएंगे तो पढ़ूंगी. मेरा तो दिमाग ही घूम गया सुन कर. सुमित जानता है न उस के बारे में?’’

‘‘हां, जानता तो है कि मैं और राघव एकदूसरे को पसंद करते थे और हमारा विवाह उस के महत्त्वाकांक्षी स्वभाव के चलते हो नहीं पाया और उस ने धनदौलत के लिए किसी बड़े बिजनैसमैन की बेटी से विवाह कर लिया था और आज वह भी देश का जानामाना नाम है.’’ मेघा ने अटकते हुए संकोचपूर्वक कहा, ‘‘अनन्या, सुना है तुम्हारे और उस के बीच होने वाले सैक्स की बात उस ने…’’

अनन्या एक शब्द नहीं बोल पाई, आंखें अचानक आंसुओं से भरती चली गईं. अपमान के घूंट चुपचाप पीते हुए, ‘‘बाद में फोन करती हूं.’’ कह कर फोन रख दिया.

मेघा ने उसी समय मैसेज भेजा, ‘‘प्लीज डौंट बी सैड, फ्री होते ही फोन करना.’’ कुछ पल बाद सनाया ने आ कर उसे झंझोड़ा तो जैसे वह होश में आई, ‘‘क्या हुआ अनन्या? एसी में भी इतना पसीना.. तेरी तबीयत तो ठीक है न?’’

‘‘हांहां, बस ऐसे ही.’’ ‘‘टैंशन में हो?’’

‘‘नहींनहीं, कुछ नहीं,’’ अनन्या फीकी सी हंसी हंस दी. यों ही कह दिया, ‘‘प्रेजैंटेशन के बारे में सोच रही थी.’’ ‘‘कोई और बात है जानती हूं, तू इतनी कौन्फिडैंट है, प्रेजैंटेशन के बारे में सोच कर माथे पर इतना पसीना नहीं आएगा. नहीं बताना चाहती तो कोई बात नहीं. ले, पानी पी और चल.’’

अनन्या ने उस दिन कैसे अपना प्रेजैंटेशन दिया, वही जानती थी. अतीत की परछाईं से उस ने स्वयं को बड़ी मुश्किल से निकाला था. मन अतीत में पीछे ले जाता रहा था और दिमाग वर्तमान पर ध्यान देने के लिए आगे धकेलता रहा था. तभी वह सफल हो पाई थी. उस के सीनियर्स ने उस की तारीफ कर उस का मनोबल बढ़ाया था. ‘‘तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही,’’ कह कर वह घर के लिए जल्दी निकल गई. राहुल स्कूल से डे केयर में चला जाता था. सुमित आजकल उसे लेता हुआ ही घर आता था, वह चुपचाप घर जा कर बैड पर पड़ गई.

राघव उस का पहला प्यार था. कौलेज में वह उस के प्यार में ऐसे मगन हुई कि यही मान लिया कि जीवन भर का साथ है. राघव एक छोटे से कसबे से दिल्ली में किराए का कमरा ले कर पढ़ता था. राघव के बहुत बार आग्रह करने पर वह एक ही बार उस के कमरे पर गई थी. वहीं भावनाओं में बह कर अनन्या ने पूर्ण समर्पण कर दिया था. आगे विवाह से पहले कभी ऐसा न हो, यह सोच कर फिर कभी उस के कमरे पर नहीं गई थी. पर दिल्ली के मशहूर धनी बिजनैसमैन की बेटी गीता से दोस्ती होने पर राघव को गीता के साथ ही भविष्य सुरक्षित लगा तो कई बहानों से दूरियां बनाते हुए राघव अनन्या से दूर होता चला गया.

अनन्या भी राघव में आए परिवर्तन को भलीभांति भांप गई थी. उस ने पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई, कैरियर पर लगा दिया था और अपने प्यार को कई परतों में दिल में दबा कर यह जख्म समय के ऊपर ही भरने के लिए छोड़ दिया था. कुछ समय बाद मातापिता की पसंद सुमित से विवाह कर मुंबई चली आई और सुमित व राहुल को पा बहुत संतुष्ट व सुखी थी पर आजकल जो आत्मकथा लिखने का फैशन बढ़ता जा रहा है, उस की चपेट में कहीं उस का वर्तमान न आ जाए, यह फांस अनन्या के गले में ऐसे चुभ रही थी कि उसे एक पल भी चैन नहीं आ रहा था. जिस प्यार के एहसास की खुशबू को अपने दिल में ही दबा उस की स्मृति से लंबे समय तक सुवासित हुई थी, आज जैसे उस एहसास से दुर्गंध आ रही थी.

अपनी सफलता, प्रसिद्धि के नशे में चूर राघव ने अपनी आत्मकथा में उस का प्रसंग लिख उस के लिए मुश्किल खड़ी कर दी थी. कहीं ससुराल वाले, मायके और राहुल बड़ा हो कर यह सब जान न ले. कितने ही अपने, दोस्त, परिचत, रिश्तेदार उस के चरित्र पर दाग लगाने के लिए खड़े हो जाएंगे. औफिस में जिन लोगों की नजरों में आज अपने लिए इतना स्नेह और सम्मान दिखता है, उस का क्या होगा? राघव ने यह क्यों नहीं सोचा? अपने लालच, फरेब, महत्त्वाकांक्षाओं के बारे में लिख कर अपनी चालबाजियां दुनिया के सामने रखता, एक लड़की जो अब कहीं शांति से अपने परिवार के साथ जी रही है, उस के शांत जीवन में कंकड़ मार कर उथलपुथल मचाने का क्या औचित्य है?

अनन्या के मन में क्रोध, अपमान की इतनी तेज भड़ास थी कि उस ने मेघा को फोन मिलाया. मेघा ने फोन उठाते ही प्यार से कहा, ‘‘अनन्या, तू बिलकुल परेशान मत होना, पढ़ कर तुझे बताऊंगी क्या लिखा है उस ने.’’

‘‘नहीं, रहने दे मैं कल औफिस जाते हुए खरीद लूंगी, अगर बुक स्टोर में दिख गई तो. पढ़ लूं फिर बताऊंगी उसे, छोड़ूगी नहीं उसे.’’ दोनों ने कुछ देर बातें करने के बाद फोन रख दिया.

सुमित और राहुल के आने तक अनन्या ने प्रत्यक्षतया तो स्वयं को सामान्य कर लिया था, पर अंदर ही अंदर बहुत दुखी व उदास थी. अगले दिन औफिस जाते हुए वह एक मशहूर बुकशौप पर गई. ‘न्यू कौर्नर’ में उसे ‘बैलेंसशीट औफ लाइफ’ दिख गई. उसे खरीद कर उस ने छुट्टी के लिए औफिस फोन किया और फिर घर वापस आ गई.

सुमित और राहुल तो जा चुके थे, बैड पर लेट कर उसने बुक पढ़नी शुरू की. राघव के जीवन के आरंभिक काल में उस की कोई रुचि नहीं थी. उस ने वहां से पन्ने पलटने शुरू किए जहां से उसे अंदाजा था कि उस का जिक्र होगा. उस का अंदाजा सही था. कालेज के दिनों में उस ने स्वयं को अनन्या नाम की क्लासमेट का हीरो बताया था. जैसेजैसे उस ने पढ़ना शुरू किया, क्रोध से उस का चेहरा लाल होता चला गया. लिखा था, ‘मेरा पूरा ध्यान बड़ा आदमी बनने में था. मैं आगे, बहुत आगे बढ़ना चाहता था, पर अनन्या का साथ मेरे पैरों की बेड़ी बन रहा था. मैं उस समय किसी भी लड़की को गंभीरतापूर्वक नहीं सोचना चाहता था पर मैं भी एक लड़का था, युवा था, कोई खूबसूरत लड़की मुझे पूर्ण समर्पण का निमंत्रण दे रही थी तो मैं कैसे नकार देता?

‘कुछ पलों के लिए ही सही, उस के सामीप्य में मेरे कदम डगमगाते तो जरूर पर उस के प्यार और साथ को मैं मंजिल नहीं समझ सकता था. पर हर युवा की तरह मैं भी ऐसी बातों में अपना कुछ समय तो नष्ट कर ही रहा था. एक अनन्या ही नहीं, उस समय एक ही समय पर मेरे 3-4 लड़कियों से शारीरिक संबंध बने, मेरे लिए ये लड़कियां बस सैक्स का उद्देश्य ही पूरा कर रही थीं.’ अनन्या ने इस के आगे कुछ पढ़ने की जरूरत ही नहीं समझी, उन पलों के पीछे इतना कटु सत्य था. उस ने स्वयं को अपमानित सा महसूस किया. आंखों से आंसू बह निकले. प्रेम के जिस कोमल एहसास में भीग कर एक लड़की एक लड़के को अपना सर्वस्व समर्पित कर देती है, उस लड़के के लिए वह कुछ महत्त्व नहीं रखता? किसी पुरुष के लिए लड़कियों की भावनाओं से खेलना इतना आसान क्यों हो जाता है? अनन्या अजीब सी मनोस्थिति में आंखें बंद किए बहुत देर तक यों ही पड़ी रही.

फिर उस ने मेघा को फोन मिलाया, ‘‘मेघा, मैं राघव को सबक सिखा कर रहूंगी. छोड़ूगी नहीं उसे.’’

‘‘क्या करेगी, अनन्या? इस में खुद ही तुम्हें तकलीफ न उठानी पड़े… वह अब एक मशहूर आदमी है.’’ ‘‘होगा बड़ा आदमी. मेरे बारे में लिख कर किसी लड़की की भावनाओं को ठेस पहुंचाने की सजा तो उसे जरूर दूंगी मैं. उस का नंबर चाहिए मुझे, प्लीज, मेघा इस में हैल्प कर.’’

‘‘अनन्या, दिल्ली में अगले ही हफ्ते हमारे कालेज के एक प्रोग्राम में वह मुख्य अतिथि बन कर आ रहा है, मैं ने यह सुना है.’’ ‘‘ठीक है, थैंक्स, मैं आ रही हूं.’’

‘‘सुन तो.’’ ‘‘नहीं, बस अब वहीं आ कर बात करूंगी.’’

अनन्या ने मन ही मन बहुत देर सोच लिया था कि सुमित से कहेगी कि अपने मम्मीपापा से मिलने का मन कर रहा है. वह दिल्ली जा रही है. राघव को सब के सामने ऐसे लताड़ेगी कि याद रखेगा. मौकापरस्त, लालची? शाम को सुमित और राहुल कुछ जल्दी ही आए. सुमित ने बहुत ही चिंतित स्वर में आते ही कहा, ‘‘उफ अनु, तुम कहां हो? तुम ने आज फोन ही नहीं उठाया. मुझे लगा किसी मीटिंग में होगी और यह चेहरा इतना क्यों उतरा है?’’

सुमित के प्यार भरे स्वर से अनन्या की आंखें झरझर बहने लगीं. राहुल उस से लिपट गया, ‘‘क्या हुआ, मम्मा?’’

‘‘कुछ नहीं, बेटा,’’ कहते हुए अनन्या ने उसे प्यार किया. ‘‘अनन्या, तुम घर कब आईं?’’

‘‘आज औफिस गई ही नहीं?’’ ‘‘अरे, क्या हुआ? तबीयत तो ठीक है? लंच तो किया था न?’’

‘‘नहीं, भूख नहीं थी. सौरी, सुमित, मेरा फोन साइलैंट था आज.’’ इतने में ही सुमित की नजर बैड पर जैसे फेंकी गई स्थिति में उस बुक पर पड़ी जिस ने अनन्या को बहुत परेशान कर दिया था. सुमित ने बुक उठाई. एक नजर डाली, फिर वापस रख दी कहा, ‘‘मैं अभी आया. तुम आराम करो?’’ सुमित ने खुद फ्रैश हो कर राहुल के हाथमुंह धुला कर कपड़े बदलवाए. इतने में अनन्या 2 कप चाय और राहुल के लिए दूध और नाश्ता ले आई. तीनों ने कुछ चुपचाप ही खायापीया.

राहुल को टीवी पर कार्टून देखने के लिए कह कर सुमित बैड पर अनन्या के पास ही आ कर बैठ गया. अनन्या का मन कर रहा था अपने मन की पूरी बात सुमित से शेयर कर ले पर उस ने कुछ सोच कर स्वयं को रोक लिया. सुमित ने अनन्या का हाथ अपने हाथ में ले कर चूम लिया. फिर कहा, ‘‘अनन्या, राघव की बुक से इतनी टैंशन में आने की जरूरत नहीं है.’’

अनन्या को हैरत का एक तेज झटका लगा. बोली, ‘‘यह सब पता है तुम्हें?’’ ‘‘हां, इस बुक को मार्केट में आए 1 महीना हो चुका है. पैसे से तो बड़ा आदमी बन गया वह, पर मानवीय मूल्यों को समझ ही नहीं पाया. ऐसे लोगों को मैं मानसिक रूप से गरीब ही समझता हूं.’’ अब अनन्या स्वयं को रोक नहीं पाई. सुमित के गले में बांहें डाल कर फूटफूट कर रो पड़ी.

‘‘अरे अनु, तुम्हें रोने की कोई जरूरत नहीं है. मैं अतीत की बात वर्तमान में करने में विश्वास ही नहीं रखता. वह उस उम्र की बात थी. उस का आज हमारे जीवन में कोई स्थान नहीं है.’’ सुमित के गले लगी अनन्या देर तक अपना मन हलका करती रही. सुमित उस की पीठ पर हाथ फेरता हुआ उसे शांत करता रहा. सुबकियों के बीच भी सुमित जैसा पति पा कर अनन्या स्वयं को धन्य समझती रही थी.

थोड़ी देर बाद अनन्या ने पूछा, ‘‘इस बुक के बारे में तुम्हें कैसे पता चला?’’ ‘‘दिल्ली में मेरा दोस्त, जो किताबी कीड़ा है,’’ मुसकराते हुए कहा सुमित ने, ‘‘अनुज ने इसे पढ़ा था, उस ने मुझ से फोन पर मजाक कर के मुझे छेड़ा कि यह अनन्या कहीं तुम ही तो नहीं, मैं ने उस समय हंसी में टाल दिया था पर मैं अनुज से बातें करने के बाद समझ गया था कि तुम्हारे बारे में ही लिखा गया है पर ऐसी बातों को तूल देने में मैं कोई समझदारी नहीं समझता. जो हुआ सो हुआ. इसलिए, तुम से यह बात नहीं की. तुम भी इस बात को इग्नोर कर दो.’’

‘‘मगर सुमित, मैं ऐसे व्यक्ति को सबक सिखाना चाहती हूं, जो अपनी कहानी की पब्लिसिटी के लिए कई लड़कियों के जीवन से खिलवाड़ कर रहा है. यह तो तुम इतने अच्छे इंसान हो मगर जरा सोचो, कोई और हो तो क्याक्या हो सकता है. मेरे मन को तभी सुकून मिलेगा जब मैं उसे ऐसा सबक सिखाऊंगी कि पब्लिसिटी को तरसते लोग आजीवन याद रखे…मैं दिल्ली जाना चाहती हूं, सुमित.’’ ‘‘उस के लिए तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, जो तुम्हें उसे कहना है, फोन पर कह लो. वैसे क्या कहना है?’’

‘‘उस का फोन नंबर कहां है हमारे पास? मैं उसे मानहानि के केस की धमकी दे कर उस का अपमान करना चाहती हूं.’’ ‘‘ठीक है, तुम चाहो तो गीता से बात भी कर सकती हो. वैसे हमें सिर्फ डराना और मानसिक परेशानी ही तो देनी है उसे. हमें उस का पैसा तो बिलकुल भी नहीं चाहिए. मुझे आराम से गीता का नंबर मिल सकता है. मेरे बौस की रिश्तेदार है वह. सुना है अच्छे स्वभाव की है. जरा भी घमंड नहीं है.’’

‘‘ठीक है, सुमित, मुझे उस का नंबर दे दो. वह शायद मुझे भी पहचान ही जाए. तुम मेरे साथ हो तो अब मुझे किसी भी बात की चिंता नहीं है.’’ ‘‘पर मेरी एक शर्त है.’’

‘‘क्या?’’ ‘‘मुझे तुम्हारे चेहरे पर दुख या उदासी न दिखे.’’ अनन्या मुसकराती हुई सुमित से लिपट गई अब उस का मन हलका हो गया था. मन पर रखा एक भारी पत्थर जैसे हट गया था.

अगले दिन सुमित ने अनन्या के फोन पर गीता का नंबर भेज दिया. अनन्या ने लंच टाइम में एक शांत जगह जा कर गीता का नंबर मिलाया. गीता ने फोन उठाया तो अनन्या ने कालेज के दिनों का अपना परिचय दिया, गीता को सब याद आ गया. बोली, ‘‘कैसी हो? मेरा नंबर कैसे मिला?’’ ‘‘कहां से मिला, वह छोड़ो गीता, बस यह पूछने का मन हुआ कि अपने पति की आत्मकथा पढ़ी होगी तुम ने कैसी लगी?’’

गीता का स्वर कुछ धीमा हुआ, ‘‘क्यों? अपना नाम आने पर परेशान हो?’’ ‘‘मुझे राघव का नंबर दे सकती हो? इतने सच दुनिया के सामने रखने पर उसे गर्व हो रहा होगा न. बधाई तो बनती है न?’’

‘‘मैं समझी नहीं. वैसे राघव इस समय मेरे सामने ही बैठा है.’’ ‘‘यह तो बहुत अच्छा है. क्या तुम फोन स्पीकर पर कर सकती हो? प्लीज.’’

गीता ने फोन स्पीकर पर कर लिया. अनन्या की ठहरी हुई, गंभीर आवाज स्पीकर पर गूंज उठी, ‘‘मैं ने फोन इसलिए किया है राघव कि तुम्हें पहले स्वयं ही बता दूं कि मैं तुम पर मानहानि का दावा करने जा रही हूं 2 करोड़ का. अपनी कहानी में तुम ने जिस तरह मेरे बारे में लिखा है, मैं तुम्हें छोड़ूगी नहीं. ‘‘गीता तुम्हारे जैसे लालची पति को जीवनसाथी बना कर कितनी खुश है, यह तो वही जानती होगी पर लड़कियों की भावनाओं के साथ खेलने वाले इंसान की पब्लिसिटी पाने की ऐसी आदत पर उसे शर्म तो जरूर आती होगी, तुम ने तो उसे भी शर्मिंदा किया है.

‘‘गीता, तुम तो एक औरत हो, इस हरकत में अपने पति का साथ कैसे दे पाई? वह लेखिका जिस से राघव ने यह किताब लिखवाई है, जानती हो, कौन है? वह भी इस का शिकार रही है, यह आदमी तुम्हारे पैसे से उस का मुंह बंद कर सकता है पर मैं इसे सबक सिखा कर रहूंगी. तुम्हारे पैसे ने राघव को तुम्हारा पति तो बना दिया पर चरित्र?’’

गीता के मुंह से हलकी सी आवाज निकली, ‘‘तुम्हारा पति क्या कहेगा?’’

‘‘उस ने यही कहा कि ऐसे आदमी को सजा मिलनी चाहिए जो लड़कियों के साथ खेले, फिर दुनिया के सामने अपने पौरुष का ऐसा डंका पीटे कि लड़कियां टूट जाएं, यह सर्वथा अनुचित है. और वाह, क्या नाम रखा है, ‘बैलैंसशीट औफ लाइफ’ नफेनुकसान के हिसाबकिताब में माहिर, रुपएपैसे के लालच में उलझा हुआ एक चरित्रहीन व्यक्ति अपनी कहानी को और नाम भी क्या दे सकता था? तुम लोगों के बच्चे तो बड़े हो कर अपने पिता के चरित्र पर बड़ा गर्व करेंगे. वाह.’’

गीता ने कहा, ‘‘अनन्या, मुझे थोड़ा समय दो.’’ अनन्या ने फिर फोन काट दिया. इतनी देर तक राघव सिर पर हाथ रखे ही बैठा रहा. उस में गीता से आंखें मिलाने का साहस नहीं था. गीता ने यह किताब लिखवाने के लिए पहले ही मना किया था पर राघव ने उस की एक न सुनी थी. आज वह एक सफल बिजनैसमैन था, गीता के मातापिता गुजर चुके थे. वह अब सारी प्रौपटी की एकमात्र अधिकारी थी.

गीता ने राघव की छिटपुट गलतियां कई बार माफ की थीं, पर आज गीता ने राघव को जिन जलती नजरों से देखा, राघव उन नजरों को सह न सका. चुपचाप बैठा रहा. गीता नि:शब्द उसे पहले घूरती रही, फिर इतना ही कहा, ‘‘यह बुक मार्केट से तुरंत वापस ले लो. एक भी कौपी कहीं न दिखे और फौरन सब से माफी मांगो नहीं तो अंजाम बहुत बुरा होगा,’’ कह कर गीता अपना पर्स उठा कर वहां से चली गई. राघव को इस के सिवा कोई और रास्ता सूझ भी नहीं रहा था. गीता उस के साथ बहुत अनर्थ कर सकती है, यह वह जानता था. वह जो भी था, गीता की दौलत के दम पर था. वह गीता को नाराज नहीं कर सकता था. अत: उस ने गीता को फौरन फोन किया, ‘‘आईएम वैरी सौरी, डियर तुम ने जैसा कहा है वैसा ही होगा.’’

राघव ने उसी समय अपने सैक्रेटरी को बुला कर गीता के कहे अनुसार आदेश दिए. अगली सुबह अनन्या राहुल को तैयार कर रही थी. तभी अपने फोन पर कुछ पढ़ता हुआ सुमित हंस पड़ा. अनन्या ने आंखों से ही कारण पूछा तो सुमित ने अपना फोन उस की ओर बढ़ा कर कुछ पढ़ने का इशारा किया. ट्विटर पर राघव का माफीनामा था और लिखा था कि इस बुक को मार्केट से विदड्रा कर रहा है.

सुमित ने अनन्या के कंधे पर हाथ रख कर पूछा, ‘‘खुश?’’ ‘‘थैंक्यू वैरी मच, सुमित. तुम्हारे जैसा जीवनसाथी पा कर मैं धन्य हो गई.’’

सुमित ने उस के माथे को चूम लिया. अचानक अनन्या ने अपने फोन को उठा कर कोई नंबर मिलाया तो सुमित ने पूछा, ‘‘किसे?’’ ‘‘गीता को थैंक्स कहना है कि उस ने एक स्त्री के मन की बात को समझा. उस ने जो गरिमा दिखाई, बहुत अच्छा लगा. वैसे भी ऐसे पति के साथ निभाना आसान तो नहीं होगा. उसे थैंक्स कहना फर्ज है मेरा.’’

‘हां’ में सिर हिलाता हुआ सुमित उसे प्यार भरी नजरों से देख रहा था. Romantic Story in Hindi

विज्ञान और भारतीय कर्मकांडी वैज्ञानिक

Ritualistic Scientists : धर्म और विज्ञान एकदूसरे के विरोधाभासी हैं, बावजूद इस के धार्मिक कर्मकांडी वैज्ञानिक उपलब्धियों को धार्मिक चोला ओढ़ाने की कोशिश में रहते हैं. कुछ ऐसी ही स्थिति सुभांशु शुक्ला की अंतरिक्ष स्टेशन की हालिया यात्रा के दौरान सामने आई.

मजहब या धर्म ऐसा ब्रेकर है जो व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र की गति को धीमा करता है. दुनिया के सभी धर्म इतिहास में बने हैं. कोई 1400 साल पुराना है तो कोई धर्म 2 हजार साल पुराना है और कोई धर्म तो सनातन होने का दावा करता है.

धार्मिक गिरोह अपने पुरातन होने का ढिंढोरा पीटते हैं लेकिन सच यही है कि धर्मों का पुराना होना ही इंसानियत के लिए घातक स्थिति है क्योंकि जो धर्म जितना पुराना है वह इंसानी बुद्धि को उतना ही पीछे ले जाने की जद्दोजेहद करता है.

जब हम दुनिया के इतिहास को देखते हैं तो हमें मालूम चलता है कि इंसान की बुद्धि ने धर्मों के खिलाफ बगावत की, तब जा कर विज्ञान का उदय हुआ. आज की हरेक तकनीक, जिस के बल पर यह दुनिया चल रही है व आप और हम जी रहे हैं, में किसी भी धर्म का कोई योगदान नहीं है. यह सब विज्ञान की ही देन है. कोई भी समाज तब तक आजाद नहीं होता जब तक उस समाज के विचार गुलाम हों. खयालात की गुलामी को पश्चिमी दुनिया ने तोड़ा और विज्ञान, तकनीक व डैमोक्रेसी में कहीं आगे निकल गए. लेकिन, हम आज भी अपनी धार्मिक मान्यताओं की झठी दुनिया से बाहर न निकल पाए.

कड़वी सच्चाई तो यही है कि विज्ञान के क्षेत्र में हमारी वास्तविक उपलब्धि शून्य के अलावा कुछ नहीं है. विज्ञान के क्षेत्र में इस महान शून्यता का कारण यह है कि हम वैज्ञानिक चेतना से कोसों दूर हैं. उधार की टैक्नोलौजी पर इतराने से वैज्ञानिक चेतना नहीं आती. विज्ञान का पथ बनाने के लिए कुर्बानियां देनी पड़ती हैं. धर्म की सत्ता से टकराना होता है.

सुभांशु शुक्ला एक्सिओम मिशन-4 के तहत अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) की यात्रा करने वाले पहले भारतीय अंतरिक्ष यात्री हैं. वर्ष 1984 में अंतरिक्ष में कक्षा की यात्रा करने वाले राकेश शर्मा के बाद दूसरे भारतीय बन गए. सुभांशु शुक्ला ने 25 जून, 2025 को स्पेसएक्स के ड्रैगन कैप्सूल के माध्यम से फ्लोरिडा से आईएसएस के लिए उड़ान भरी थी. उन्होंने वहां पर 18 दिन बिताए. 31 देशों के 60 से अधिक प्रयोग किए. उन में इसरो के 7 प्रयोग शामिल थे.

15 जुलाई, 2025 को कैलिफोर्निया के तट पर सुभांशु उतरे तो यह भारत के लिए बहुत गर्व की बात थी. यह मिशन भारत, पोलैंड और हंगरी के लिए भी ऐतिहासिक था, क्योंकि इन देशों के अंतरिक्ष यात्री 4 दशकों बाद किसी मानवयुक्त मिशन में शामिल हुए थे.

सुभांशु शुक्ला की सकुशल वापसी के लिए भारत में यज्ञहवन होने लगे. सुभांशु शुक्ला आसमान में थे और यहां जमीन पर बैठे निठल्ले लोग उन की लैंडिंग के लिए धार्मिक नौटंकी में लगे थे. क्या यह विज्ञान और वैज्ञानिक सोच की हत्या नहीं है?

वैज्ञानिकों की देन

1530 में कोपरनिकस के प्रयोगों ने यह साबित किया कि पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र नहीं है. पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है जिस से दिन और रात होते हैं और एक साल में वह सूर्य का चक्कर पूरा करती है. कोपरनिकस की इतनी सी बात से धर्म की सत्ता हिल गई और निकोलस कोपरनिकस को देश छोड़ना पड़ा.

जियोर्डानो बू्रनो का गुनाह बस इतना सा था कि उन्होंने निकोलस कोपरनिकस के विचारों का समर्थन किया और कहा कि ‘ब्रह्मांड का केंद्र पृथ्वी नहीं’. बस, इसी ‘गुनाह’ के लिए उन्हें जिंदा जला दिया गया.

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वैज्ञानिक सोच का सीधा टकराव धर्म और धार्मिक मान्यताओं से होता है, इसलिए जो वैज्ञानिक धर्मभीरुता नहीं छोड़ पाते, असल में वे वैज्ञानिक हो कर भी विज्ञान के दुश्मन ही साबित होते हैं.

कोपरनिकस के 80 वर्षों बाद और जियोर्डानो की मौत के 15 वर्षों बाद गैलीलियो गैलिली ने अपनी दूरबीन के प्रयोग से कोपरनिकस की बात को प्रमाणित किया और यह नतीजा निकाला कि वास्तव में धरती यूनिवर्स का केंद्र नहीं. धर्म के ठेकेदारों को यह बात पसंद नहीं आई और गैलीलियो गैलिली को जेल की सजा हो गई.

चार्ल्स डार्विन ने अपने जीवन के 50 साल लगा कर यह खोज निकाला कि धरती पर जीवन की विविधताओं का स्रोत ईश्वर नहीं है बल्कि विकासवाद है. उन की यह महान खोज धर्म के विरुद्ध साजिश बताई गई और चर्च ने डार्विन को ईश्वर का कातिल करार दे दिया. 24 नवंबर, 1880 को डार्विन ने फ्रांसिस एमसी डेर्मोट के एक पत्र का जवाब देते हुए अपने खत में साफसाफ लिखा था, ‘मु?ो आप को यह बताने में खेद है कि मैं बाइबिल पर भरोसा नहीं करता. यही कारण है कि मु?ो जीजस क्राइस्ट के ईश्वर की संतान होने पर भी विश्वास नहीं है.’

चर्च को डार्विन के मानव विकास के सिद्धांत बिलकुल मान्य नहीं थे. डार्विन के सिद्धांतों ने परमेश्वर, उन के पुत्र यीशू और ईसाइयों के प्रमुख धर्मग्रंथ बाइबिल के ही अस्तित्व पर सवालिया निशान खड़े कर दिए थे.

बाइबिल के अनुसार, पृथ्वी की रचना क्राइस्ट के जन्म से 4004 साल पहले हुई थी लेकिन डार्विन के विकासवाद की थ्योरी पृथ्वी की उत्पत्ति को लाखोंकरोड़ों वर्ष पहले का बताती थी. बाइबिल के मुताबिक, ईश्वर ने एक ही सप्ताह में सृष्टि की रचना कर दी थी लेकिन डार्विन कि थ्योरी बाइबिल की मान्यताओं के बिलकुल उलट थी.

डार्विन ने अपनी किताब, ‘द औरिजिन औफ द स्पीशीज’ में लिखा, ‘‘मैं नहीं मानता कि पौधे और जीवित प्राणियों को ईश्वर ने बनाया था.’’ इन्हीं ईश्वर विरोधी बातों के कारण डार्विन को ईश्वर और धर्म का हत्यारा बताया गया.

धर्म और विज्ञान के बीच कोई समझता हो ही नहीं सकता. जो लोग धर्म और विज्ञान के बीच गठजोड़ बनाने की कोशिश करते हैं वे दरअसल राजनीति का शिकार होते हैं.

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निकोलस कोपरनिकस (बाएं) ने साबित किया कि पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र नहीं है तो उन्हें धर्म का दुश्मन मान लिया गया और देश से निकाल दिया गया. जियोर्डानो ब्रूनो (दाएं) ने कोपरनिकस के सिद्धांतों को सच माना तो उन्हें जिंदा जला दिया गया. धर्म ने हमेशा से विज्ञान और वैज्ञानिकों के विरुद्ध षड्यंत्र किया है.

विज्ञानविरोधी हैं धर्म के सिद्धांत

धर्म के सिद्धांत हमेशा से विज्ञानविरोधी रहे हैं और विज्ञान के सिद्धांतों पर धर्म कभी खरा नहीं उतरता, इसलिए दोनों के रास्ते जुदा हैं. धर्म को पनपने के लिए विज्ञान की जरूरत पड़ती है. विज्ञान की बैसाखी के बिना आज कोई धर्म जिंदा नहीं रह सकता लेकिन विज्ञान को धर्म की रत्तीभर भी जरूरत नहीं पड़ती.

साइंस के लिए सैकड़ों लोगों ने अपनी जिंदगियां कुरबान की हैं. रातों की नींदें उड़ाई हैं तब जा कर आज की दुनिया रहने लायक बनी है. लोग साइंस और टैक्नोलौजी के फर्क को नहीं समझ पाते. टैक्नोलौजी साइंस नहीं है और विज्ञान सिर्फ तकनीक भर नहीं है. साइंस की अलगअलग शाखाएं हैं- कैमिस्ट्री, फिजिक्स, जियोलौजी, एस्ट्रोनोमी और बायोलौजी. विज्ञान के इन सभी क्षेत्रों को समझने के लिए हम टैक्नोलौजी का सहारा लेते हैं और हम टैक्नोलौजी को ही साइंस समझने की भूल करते हैं.

तकनीक, टैक्नोलौजी या प्रौद्योगिकी का मतलब विज्ञान नहीं है बल्कि वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित ऐसे उपकरण जिन से हम समस्याओं को हल कर इंसानियत के लिए जीवन को आसान बना सकें, तकनीक कहलाती है. संक्षेप में कहें तो विज्ञान के सिद्धांतों का इस्तेमाल कर जब हम उस का प्रयोग करते हैं तो वह तकनीक हो जाती है.

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चार्ल्स डार्विन ने जब दुनिया को एवोल्यूशन यानी विकासवाद का सिद्धांत दिया तो धर्म के ठेकेदारों ने उन्हें भी गालियां दीं और डार्विन की किताब ‘औरिजिन ऑफ स्पीशीज’ को बैन करवा दिया.

हम चंद्रयान के जरिए चांद तक पहुंचे, यह हमारी तकनीक की महान विजय है और इसे सैलिब्रेट जरूर करना चाहिए लेकिन साथ ही, विज्ञान क्या है, हमें यह भी समझना चाहिए.

जहां तकनीक विज्ञान का एक मामूली टूल होता है वहीं विज्ञान का हर प्रयोग धर्म की सत्ता के विरुद्ध इंसानी दिमाग का एक महत्त्वपूर्ण इवैंट होता है. यही फर्क है तकनीक और विज्ञान में. टूल का इस्तेमाल करने के लिए अच्छे टैक्नीशियन और जरूरी बजट की जरूरत होती है लेकिन विज्ञान के सिद्धांतों को गढ़ने के लिए किसी टैक्नीशियन की नहीं बल्कि वैज्ञानिक समझ की जरूरत होती है.

सैकड़ों टैक्नीशियन मिल कर चांद या मंगल पर जाने की टैक्नोलौजी को एसेम्बल कर उसे सफल बना सकते हैं लेकिन बात जब वैज्ञानिक सिद्धांतों या इन वैज्ञानिक सिद्धांतों पर कोई नवीन आविष्कार करने की हो तब ये सैंकड़ों टैकक्नीशियंस भी फेल हो जाते हैं.

महंगे बजट और विज्ञान की किताबों को पढ़ कर इंजीनियर, टैक्नीशियन बने चंद लोगों के जरिए चांद ही क्या, मंगल पर भी पहुंचा जा सकता है लेकिन वैज्ञानिक सिद्धांतों को गढ़ना और इन सिद्धांतों पर आधारित आविष्कारों से दुनिया की मुश्किलों को आसान बनाना मंगल पर पहुंचने से बिलकुल अलग बात है. जिन वैज्ञानिकों ने चांद पर जाने का रास्ता बनाया, वे कभी चांद पर नहीं पहुंचे.

जहां धर्म हावी वहां विज्ञान फिसड्डी

चांद पर यान भेज कर इतराने से कोई लाभ नहीं. यह सफलता टैक्नोलौजी की जीत जरूर है लेकिन यह विज्ञान की हार है. हम टैक्नोलौजी के सफलतापूर्वक इस्तेमाल से चांद पर पहुंचे हैं लेकिन सही माने में देखें तो इस मिशन में हम ने विज्ञान की हत्या कर दी.

चंद्रयान मिशन को पूरा करने की खातिर भारतीय वैज्ञानिकों को खुद से ज्यादा मंदिरों पर भरोसा था, इसलिए इसरो के वैज्ञानिक मंदिरों के चक्कर लगाते रहे और मंदिरों की बलिवेदी पर साइंस और साइंटिफिक टेम्परामैंट की बलि चढ़ाते रहे.

इसरो के वैज्ञानिक चांद की धरती पर मशीन भेजने में सफल हुए तो इस का असली श्रेय पश्चिम के वैज्ञानिक सोच वाली उन महान हस्तियों को जाता है जिन्होंने विज्ञान के लिए धर्म की सत्ता को चुनौतियां दीं और अपने जीवन को संकट में डाला.

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गैलीलियो गैलिली ने अपनी दूरबीन के जरिए जब यह साबित किया कि पृथ्वी यूनिवर्स का केंद्र नहीं है, तब गैलीलियो को कैद कर दिया गया.

विज्ञान का सीधा टकराव मजहबों से है. जिस समाज पर मजहब हावी होगा वहां विज्ञान के लिए जगह बचेगी ही नहीं. वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बिना आप विज्ञान के साथ चल ही नहीं सकते. जहां मजहब मजबूत होता है वहां साइंटिफिक टेम्परामैंट की गुंजाइश ही खत्म हो जाती है. भारत और पाकिस्तान जैसे देश इस बात का उदाहरण हैं. यहां धर्म हावी है, इसलिए विज्ञान के क्षेत्र में दोनों देश फिसड्डी हैं. यही हाल ईरान का है, जो एक समय ज्ञान का स्रोत था.

वैज्ञानिक होना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखना दोनों में बड़ा अंतर है. एक साइंटिस्ट अगर अपने प्रयोग की सफलता के लिए मंदिर में नारियल फोड़ता है या नमाज पढ़ कर अपनी सफलता की दुआ करता है तो असल में वह साइंटिस्ट हो कर साइंस की हत्या कर रहा होता है. जिस साइंटिस्ट के पास साइंटिफिक टेम्परामैंट न हो, वह साइंटिस्ट नहीं बल्कि साइंस का हत्यारा ही होता है.

चांद पर चंद्रयान भेज देना बड़ी बात जरूर है, आप इसे टैक्नोलौजी की जीत कह सकते हैं लेकिन यह विज्ञान की जीत नहीं है.

पश्चिम एशिया के तेल उत्पादक इसलामी देश यूरोप, अमेरिका, चीन, जापान की टैक्नोलौजी का भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं पर क्या वहां से वैज्ञानिकों की खेप पर खेप निकल रही है. सऊदी अरब में बन रहे जेद्दा टौवर, जो विश्व की सब से ऊंची इमारत होगी, के सृजनकर्ता एड्रीयन स्मिथ और गौर्डन गिल्ल हैं, कोई सऊदी नहीं.

धर्म या मजहब की सत्ता के बीच दम तोड़ते विज्ञान की जीत तब तक संभव नहीं जब तक हमारे वैज्ञानिकों में साइंटिफिक टेम्परामैंट की समझ पैदा न हो. चंद्रयान मिशन चाहे टैक्नोलौजी की जीत हो पर भारतीय विज्ञान की तो हार ही है. Ritualistic Scientists

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