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Romantic Story in Hindi : रंग दे चुनरिया – श्याम ने गौरी के साथ आखिर ऐसा क्या किया ?

Romantic Story in Hindi : वह बड़ा सा मकान किसी दुलहन की तरह सजा हुआ था. ऐसा लग रहा था, जैसे वहां बरात आई है. दूर से देखने पर ऐसा जान पड़ता था, जैसे हजारों तारे आकाश में एकसाथ टिमटिमा रहे हों. छोटेछोटे बल्ब जुगनुओं की तरह चमक रहे थे. लेकिन श्याम की नजर उस लड़की पर थी, जो उस के दिल की गहराइयों में उतरती चली गई थी. वह कोई और नहीं, बल्कि उस की भाभी की बहन गौरी थी. खूबसूरत चेहरा, प्यारी आंखें, नाक में चमकता हीरा और गोरेगोरे हाथों में मेहंदी का रंग उस की खूबसूरती में चार चांद लगा रहा था.

श्याम उसे अपना दिल दे बैठा था. उस ने महसूस किया कि गौरी के बिना उस की जिंदगी अधूरी है. गौरी कभीकभार तिरछी नजरों से उसे देख लेती. एक बार दोनों की नजरें आपस में मिलीं, तो वह मुसकरा दी.

तभी भाभी ने उसे पुकारा, ‘‘श्याम?’’

‘‘जी हां, भाभी…’’ उसे लगा कि भाभी ने उस की चोरी पकड़ ली है.

‘‘क्या बात है, आज तुम उदास क्यों हो? कहीं किसी ने हमारे देवरजी का दिल तो नहीं चुरा लिया?’’

‘‘नहीं भाभी, ऐसी कोई बात नहीं है,’’ वह अपनी घबराहट को छिपाने के लिए रूमाल निकाल कर पसीना पोंछने लगा. श्याम अपनी भाभी के जन्मदिन पर उन के साथ उन के मायके गया था, लेकिन उसे क्या पता था कि यहां आते ही उसे प्रेम रोग लग जाएगा.

गौरी सुंदर थी, इसलिए उस के मन को भा गई और वह उस पर दिलोजान से फिदा हो गया. अपने प्यार का इजहार करने के बारे में वह सोच रहा था कि क्या भाभी उसे अपनी देवरानी बनाने के लिए तैयार होंगी. भाभी अगर तैयार भी हो जाएं, तो क्या भैया होंगे? देर रात तक वह यही सोचता रहा.

अगले दिन श्याम चुपके से गौरी के कमरे में पहुंचा. वहां वह खिड़की खोल कर बाहर का नजारा देख रही थी. वह उस की आंख बंद कर उभारों से हरकत करते हुए बोला, ‘‘कैसा लगा गौरी?’’ गौरी खड़ी होती हुई बोली, ‘‘श्याम, ऐसी हरकतों से मुझे सख्त नफरत है.’’

‘‘ओह गौरी, मैं कोई पराया थोड़े ही हूं.’’

‘‘मैं दीदी और जीजाजी से शिकायत करूंगी.’’

‘‘गौरी, मुझे साफ कर दो. आइंदा, मैं कभी ऐसी हरकत नहीं करूंगा.’’

‘‘मैं अभी दीदी को बुला कर लाती हूं,’’ कह कर गौरी फीकी मुसकान के साथ वहां से चली गई.

श्याम का मोह भंग हुआ. उसे लगा कि गौरी को उस से प्यार नहीं है. वह अब तक उस से एकतरफा प्यार कर रहा था. लेकिन अब क्या होगा? कुछ देर बाद भाभी यहां पहुंच जाएंगी, फिर सारी पोल खुल जाएगी. खैर, बाद में जो होगा देख लेंगे… सोच कर उस ने गौरी के नाम एक खत लिख कर तकिए के नीचे रख दिया और अपने गांव चल दिया.

गौरी आधे घंटे बाद चाय ले कर जब कमरे में पहुंची, तो उस का दिल धकधक करने लगा. एक अनजान ताकत उस के मन को बेचैन कर रही थी कि आखिर श्याम कहां चला गया. लेकिन तभी उस की नजर तकिए के नीचे दबे कागज पर गई. वह उसे उठा कर पढ़ने लगी:

‘प्रिय गौरी, खुश रहो.

‘मैं अपने किए पर बहुत पछताया, लेकिन तुम भी पता नहीं किस पत्थर की बनी हो, जो मेरे लाख माफी मांगने के बावजूद भैया और भाभी से कहने के लिए चली गईं. पता नहीं, क्यों मैं तुम्हारे साथ गलत हरकत कर बैठा? मैं गांव जा रहा हूं. जब भैया वापस आएंगे, तो मेरी खैर नहीं.

‘गौरी, मैं ने अपनी जिंदगी में सिर्फ तुम्हीं को चाहा, लेकिन मुझे मालूम न था कि मेरा प्यार एकतरफा है. काश, यह बात पहले मेरी समझ में आ जाती.

‘अच्छा गौरी, हो सके तो मुझे माफ कर देना. मैं रो कर सब्र कर लूंगा कि अपनी जिंदगी में पहली बार किसी को चाहा था.

‘तुम्हारा श्याम.’

गौरी की आंखों से पछतावे के आंसू बहने लगे. चाय का प्याला जैसे ही उठाया, वैसे ही गिर कर टुकड़ेटुकड़े हो गया. उसे ऐसा लगा कि किसी ने उस के दिल के हजार टुकड़े कर दिए. उस ने कभी सोचा भी न होगा कि श्याम अपने भैया और भाभी की इतनी इज्जत करता है.

तभी उस की दीदी कमरे में आई, ‘‘क्या बात है गौरी, यह प्याला कैसे टूट गया. श्याम कहां है?’’ आते ही दीदी ने सवालों की झड़ी लगा दी. अचानक उस की निगाह गौरी के हाथ में बंद कागज पर चली गई, जिसे वह छिपाने की कोशिश कर रही थी. वह खत ले कर पढ़ने लगी.

‘‘तो यह बात है…’’

‘‘नहीं दीदी, वह तो श्याम,’’ गौरी अपनी बात पूरी नहीं कर सकी.

‘‘अरे, तेरी आवाज में कंपन क्यों पैदा हो गया. प्यार करना कोई बुरी बात नहीं है. एक बात बताओ गौरी, क्या तुम भी उस से प्यार करती हो?’’

गौरी ने नजरें झुका लीं, जो इस बात की गवाह थीं कि उसे भी श्याम से प्यार है. ‘‘लेकिन गौरी, श्याम कहां चला गया?’’

गौरी ने रोते हुए सारी बातें बता दीं. यह सब सुन कर गौरी की बहन खूब हंसी और बोली, ‘‘गौरी, अगर मैं तुम्हें अपनी देवरानी बना लूंगी, तो तुम मेरा हुक्म माना करोगी या नहीं?’’

‘‘दीदी, मैं नहीं जानती थी कि मेरी झूठी धमकी को श्याम इतनी गंभीरता से लेगा. मैं जिंदगीभर तुम्हारी दासी बन कर रहूंगी, लेकिन श्याम के रूप में मुझे मेरी खुशियां लौटा दो. वह मुझे बेवफा समझ रहा होगा.’’

इस के बाद दोनों बहनें काफी देर तक बातें करती रहीं. श्याम की भाभी जब अपनी ससुराल लौटीं, तो गौरी को भी साथ ले आईं. श्याम घर में नहीं था. जैसे ही उस ने शाम को घर में कदम रखा, तो सामने गौरी को देखा, तो मायूस हो कर बोला, ‘‘गौरी, क्या भाभी और भैया अंदर हैं?’’

‘‘हां, अंदर ही हैं.’’

यह सुन कर जैसे ही श्याम लौटने लगा, तो गौरी ने उस की कलाई पकड़ ली और बोली, ‘‘प्यार करने वाले इतने कायर नहीं हुआ करते श्याम. मैं सच में तुम से प्यार करती हूं.’’ ‘‘गौरी मेरा हाथ छोड़ दो, वरना भैया देख लेंगे.’’

‘‘मैं ने सब सुन लिया है बरखुरदार, तुम दोनों अंदर आ जाओ.’’ आवाज सुन कर दोनों ने नजरें उठा कर देखा, तो सामने श्याम का बड़ा भाई खड़ा था.

‘‘मेरे डरपोक देवरजी, अंदर आ जाइए,’’ अंदर से श्याम की भाभी ने आवाज दी. इस तरह श्याम और गौरी की शादी धूमधाम से हो गई.

इस साल होली का त्योहार दोनों के लिए खुशियां ले कर आया. होली के दिन गौरी ने श्याम के कपड़ों पर जगहजगह मन भर कर रंग लगाया.

‘‘गौरी, आज तेरी चुनरी की जगह गालों को लाल करूंगा,’’ कह कर श्याम भी गौरी की तरफ बढ़ा. तब ‘डरपोक पिया, रंग दे चुनरिया’ कह कर गौरी ने शर्म से अपना चेहरा हाथों से ढक लिया. Romantic Story in Hindi

Romantic Story in Hindi : प्यासा सावन – पारो और अमर के बीच उस रात क्या हुआ ?

Romantic Story in Hindi : रात के 2 बजे थे. अमर अपने कमरे में बेसुध सोया हुआ था कि तभी दरवाजे पर ठकठक हुई. ठकठक की आवाज से अमर की नींद खुल गई. लेकिन उस ने सोचा कि शायद यह आवाज उस के मन का भरम है, इसलिए वह करवट बदल कर फिर सो गया.

लेकिन कुछ देर बाद फिर ठकठक की आवाज आई. ‘लगता है कोई है,’ उस ने मन ही मन सोचा, फिर उठ कर लाइट जलाई और दरवाजा खोलने लगा. तभी उस के मन में खयाल आया कि कहीं बाहर कोई चोर तो नहीं है. यह खयाल आते ही वह थोड़ा सहम सा गया. फिर उस ने धीरे से पूछा, ‘‘कौन है?’’

‘‘मैं हूं,’’ बाहर से किसी लड़की की मीठी सी आवाज आई.

अमर ने दरवाजा खोल दिया. सामने पारो को खड़ा देख कर वह हैरान हो कर बोला, ‘‘अरे तुम?’’

‘‘क्यों, कोई अनहोनी हो गई क्या?’’ पारो मुसकराते हुए बोली.

अमर ने देखा कि पारो नारंगी रंग का सलवारसूट पहने हुए थी. दुपट्टा न होने से उस के उभरे अंग दिख रहे थे. पारो की आंखों में एक अनोखी मस्ती थी. उसे देख कर अमर को ऐसा लगा, जैसे उस के आगे कोई जन्नत की हूर खड़ी हो.

तभी पारो कमरे के अंदर आ गई और अमर को अपनी बांहों में भर कर उस के होंठों पर अपने होंठ टिका दिए. पारो की गरमगरम सांसों के साथ उस के उभरे अंगों की छुअन से अमर को एक अजीब तरह की मस्ती का एहसास होने लगा. वह पारो के आगे बेबस सा हो गया.

इस से पहले कि अमर कुछ और करता, उस के मन के किसी कोने से आवाज आई कि यह तू क्या कर रहा है. जिस थाली में खाया, उसी में छेद कर अपने मालिक के एहसानों का यह बदला दे रहा है.

‘लेकिन मैं ने तो पहल नहीं की है. पारो खुद ही ऐसा चाहती है, तभी तो इतनी रात गए मेरे पास आई है,’ उस ने सोचा और खुद को पारो से अलग करते हुए बोला, ‘‘पारो, अब तुम चली जाओ और फिर कभी मेरे करीब न आना.’’

‘‘क्या ऐसे ही चली जाऊं,’’ पारो ने प्यासी नजरों से अमर को देखा. अमर के दिमाग में एकएक कर के पिछली बातें घूमने लगीं.

अमर बीए पास हो कर भी बेरोजगार था. उस ने कई इंटरव्यू दिए, पर कहीं भी कामयाब नहीं हुआ. आखिर में निराश हो कर उस ने एक दोस्त के कहने पर गाड़ी चलाना सीखा और बतौर ड्राइवर डाक्टर भुवनेश की कार चलाने लगा. अमर की मेहनत और ईमानदारी से खुश हो कर भुवनेश उसे बेटे की तरह मानने लगे और उस की हर जरूरत को फौरन पूरा कर देते.

पारो डाक्टर भुवनेश की एकलौती बेटी थी. वह बहुत शोख, चंचल और खूबसूरत थी. वह हमेशा अपनी अदाओं से अमर को रिझाती, पर अमर मन से उसे अपनी बहन मानता था और पिछले रक्षाबंधन पर पारो ने उस को राखी भी बांधी थी.

डाक्टर भुवनेश ने अपने घर के पिछवाड़े वाला कमरा अमर को रहने के लिए दिया था. वह वहीं अपनी रात बिताता और दिन में डाक्टर साहब की कार चलाता था.

इधर कुछ दिनों से अमर महसूस कर रहा था कि पारो की नीयत ठीक नहीं है. वह तरहतरह से उसे अपने जाल में फांसने की कोशिश कर रही थी. उस की हरकतें देख कर कई बार अमर की वासना भड़कने लगती थी, पर बदनामी और नौकरी जाने के डर से वह मन मसोस कर रह जाता था.

पिछले हफ्ते की बात है. डाक्टर भुवनेश अमर से बोले, ‘अमर, पारो अपनी कुछ सहेलियों के साथ पिकनिक पर जा रही है. तुम सब को कार से ले जाओ. ध्यान रखना, किसी को कोई तकलीफ न हो.’

‘जी,’ अमर ने बस इतना ही कहा.

अमर ने कार निकाली, तो पारो कार पर सवार हो गई. कार चल पड़ी.

‘कहां जाना है?’ तभी अमर ने पारो से पूछा.

पारो बोली, ‘होटल मयूरी.’

‘क्या तुम होटल में पिकनिक मनाओगी? तुम्हारी सहेलियां कहां रह गईं?’ अमर ने पूछा.

‘पिकनिक वाली बात मनगढ़ंत थी. मैं ने पापा से झूठ बोला था,’ पारो हंसते हुए बोली, ‘पहले तुम एक कमरा तो बुक कराओ.’

अमर ने हैरानी से पारो की ओर देखा और कमरा बुक कराने होटल की ओर चला गया. जब दोनों कमरे में आए, तो पारो ने कहा, ‘अमर, कुछ नाश्ता मंगाओ.’

थोड़ी देर बाद दोनों नाश्ता कर चुके, तो पारो रूमाल से हाथ पोंछती हुई अमर के और करीब खिसक आई और बोली, ‘कुछ बात नहीं करोगे?’

‘कौन सी बात?’

‘वही, जो आधी रात के समय पतिपत्नी के बीच होती है,’ इतना कह कर पारो ने अमर को चूम लिया, फिर बोली, ‘अमर, तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो.’

अमर गुस्से में बोला, ‘पारो, होश में आओ. एक भले घर की लड़की का इस तरह बहकना ठीक नहीं है.’

चढ़ती जवानी के नशे में चूर पारो अमर की बात को अनसुना करते हुए बोली, ‘मैं एक अरसे से इस मौके की तलाश में थी. क्या मेरे कपड़े नहीं उतारोगे?’ कह कर पारो ने अमर को अपनी बांहों में भींच लिया.

अमर खुद पर काबू रखते हुए बोला, ‘पारो, इतना भी मत बहको. मैं तो तुम्हें अपनी बहन मानता हूं. याद है, पिछले साल तुम ने मुझे राखी बांधी थी और फिर तुम्हारे पिता मुझ पर कितना भरोसा करते हैं. क्या मैं उन के भरोसे को तोड़ दूं?’

‘तुम मेरे सगे भाई तो हो नहीं,’ कह कर पारो ने अपने ब्लाउज के बटन खोल दिए.

अमर की हालत सांपछछूंदर की सी थी. वह पारो से छिटक कर दूर जा खड़ा हुआ, फिर गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘पारो, तुम इस तरह की हरकतें कर के मुझे मत भड़काओ, वरना कुछ गलत कर बैठूंगा.’ इतना कह कर अमर ने पारो को कपड़े पहन कर आने को कहा और वह कार में जा कर बैठ गया.

‘‘कहां खो गए अमर?’’ तभी पारो ने अमर को टोका, तो वह चौंक कर उसे देखने लगा.

‘‘पारो, मुझ पर रहम करो. तुम जल्दी यहां से चली जाओ. मैं कमजोर हो रहा हूं,’’ अमर गिड़गिड़ाते हुए बोला. तभी दूसरे कमरे से खांसने की आवाज आई और पारो अपने कमरे की ओर भाग गई. अमर ने अब चैन की सांस ली. अगले दिन अमर का कुछ अतापता नहीं था. डाक्टर भुवनेश ने कमरे की तलाशी ली, तो एक चिट्ठी मिली. उस चिट्ठी में लिखा था:

‘मैं आप की नौकरी छोड़ कर जा रहा हूं. कृपया परेशान न होइएगा और न ही मुझे खोजने की कोशिश कीजिएगा.

‘आप का, अमर.’

चिट्ठी पढ़ कर डाक्टर भुवनेश हैरान रह गए. अमर का इस तरह बिना कुछ बताए जाना उन की समझ में नहीं आ रहा था. पारो को जब यह बात मालूम हुई, तो वह भी हक्कीबक्की रह गई. Romantic Story in Hindi

Satirical Story In Hindi : सफेद बाल मुरदाबाद – रिटायरमेंट से पहले की कहानी

Satirical Story In Hindi : जैसे ही उन के जनरल प्रोविडैंट फंड के कागज आए, वैसे ही वे दफ्तर की फाइलों की ओर से भी लापरवाह हो गए. ऐसी लापरवाही कि फाइलों से उन का जैसे कभी कोई रिश्ता ही न रहा हो. उन की मेज पर फाइलों का ढेर हर रोज उन के कद से ऊंचा होता जा रहा था, पर वे बेफिक्र. जो आएगा, वह उन के इकट्ठा किए गए गंद में सड़ता रहेगा.

वे सुबह ठुमकठुमक करते दोपहर के 12 बजे तक दफ्तर पहुंचते और जिस किसी को भी सीट पर तनिक गरदन उठाए देखते, उसी के पास गपें मारने हो लेते. किसी का उन के साथ गपें मारने का मन हो या न हो, इस से उन्हे कोई लेनादेना न होता.

जिन फाइलों की उलटापलटी की बदौलत उन्होंने बाबू होने के बाद भी शहर में 4-4 प्लौट खरीदे, बीसियों कंपनियों के हिस्से खरीदे, उन फाइलों से उन की बेरुखी देखने के काबिल थी.

जैसे ही 1 बजता, वे सब से पहले कैंटीन में आ जाते और इंतजार करते रहते कि कोई आए, तो वे उस को 4 बजे तक जैसेतैसे अपनी गपों में लगाए रखें.

आज उन के जाल में शायद मेरा फंसना लिखा था. दफ्तर आतेआते बिल्ली रास्ता काट गई थी, सो जान तो मैं पहले ही गया था कि आज दफ्तर में कुछ अनहोनी होगी, पर मेरे साथ इतना बुरा होगा, ऐसा मैं ने कभी नहीं सोचा था.

कैंटीन में फंसा मैं जब भी उन के पास से उठने की नाकाम कोशिश करता, तो वे कुछ खाने को मंगवा देते और सरकारी लालची कबूतर एक बार फिर पेट भरा होने के बाद भी दाने के लालच में उन के जाल में जा फंसता.

जब मेरा पेट हद से ज्यादा भर गया, तो और मेरे कान उन की बेहूदा बातें सुन कर पक गए, तो मैं ने कैंटीन के दरवाजे की ओर देखा कि कोई दफ्तर से चाय पीने आता, तो मैं उसे इन के हवाले कर इन से छुटकारा पाता.

पर जब दफ्तर से कोई आता न दिखा, तो सच कहूं कि पहली बार मुझे अपने हाल पर रोना आया और मैं ने उन को हद से ज्यादा झेलने के बाद उन से यों ही पूछ लिया, ‘‘मोहनजी, अब रिटायरमैंट के बाद आप का क्या करने का इरादा है? रिटायरमैंट के बाद आप को कोई याद आए या न आए, पर आप की सीट पर काम कराने आने वाले आप को बेहद याद आएंगे. बेचारों को आप ने इस तरह निचोड़ा है कि अगले कई जनमों तक अगर वे इसी देश में पैदा होंगे, तो किसी सरकारी दफ्तर में जाने से पहले सौ बार सोचेंगे.’’

‘‘करूंगा क्या? अब इश्कविश्क करने से तो रहा. घुटने तो घुटने, दिल तक को गठिया हो गया है. यह तो थोड़ाबहुत दफ्तर में…

अब बीवी की सेवा करूंगा, ताकि मरने से पहले उस के कर्ज से छुटकारा पा जाऊं. बेचारी ने किसी भी मन से सही, मेरी बहुत सेवा की है. कहीं ऐसा न हो कि अगले जनम में भी उसी से पाला पड़े,’’  कह कर उन्होंने ऐसा मुंह बनाया, मानो उन के मुंह में किसी ने नीम के पत्तों का गिलास भर रस उड़ेल दिया हो.

‘‘अगर बुरा न मानो, तो मैं आप को रिटायरमैंट के बाद ए बेहतर धंधे की सलाह दे सकता हूं,’’ मैं ने कहा.

‘‘यार प्रदीप, बहुत कर लिया दफ्तर में रहते हुए धंधा. यह 35 सालों तक मैं ने धंधे के सिवा और किया ही क्या है?’’

‘‘मेरी मानो, तो अपने महल्ले में मोबाइल रीचार्ज की दुकान खोल लेना. सारा दिन आराम से कट जाएगा और इस बहाने जाती जवानी भी रुक जाएगी.’’

‘‘हमारे महल्ले में पहले से ही 4-4 रिटायरी इस धंधे में जमे हैं. ऐसे में मुझे नहीं लगता कि…’’

‘‘तो ऐसा करो कि हेयर डाई की दुकान खोल लेना. वैसे भी मैं ने नोट किया है कि ज्योंज्यों हम जैसों की उम्र के बंदों के गाल अंदर को धंसते जा रहे हैं, वे सिर से ऐसे दिखते हैं मानो उन के सिर पर अभीअभी बाल आने शुरू हुए हैं. आज के सिर हैं कि उन्हें अपने पर एक भी सफेद बाल पसंद ही नहीं.

‘‘आज के जमाने का कोई सब से बड़ा दुश्मन है, तो वे हैं सफेद बाल. आज का आदमी उतना परेशान किसी से नहीं, जितना इन सफेद बालों से है. वह मौत का सामना खुशी से कर सकता है, पर सफेद बालों के आगे अपनेआप को बहुत कमजोर पाता है.

‘‘आदमी को उतनी परेशानी रोटी न मिलने पर भी नहीं होती, जितनी परेशानी आईने के आगे खड़े हुए अचानक सिर पर एक सफेद बाल दिखने पर होती है. सिर में एक सफेद बाल दिखते ही उसे लगता है, मानो उस पर मुसीबतों का एक पहाड़ नहीं टूटा, बल्कि कई टूट पड़े हैं,’’ किसी बाबा की तरह उपदेश देते हुए मेरा गला सूख गया था, सो पानी का घूंट ले कर मैं ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘मोहनजी, इधर सफेद बाल सिर में दिखा और उधर डाई बनानेबेचने वालों की फसल कटनी शुरू. कई तो मैं ने ऐसे भी देखे हैं, जो सिर पर बाल न होने के बाद भी गंजे सिर पर ही कालिख मल लेते हैं.

‘‘ये अपने साहब देखे? सिर के तो सिर के, छाती तक के बाल काले कर के दफ्तर आने लगे हैं, ताकि अपनी शर्ट के बटन दिसंबर में भी खुले रख कर खुद को जवान होने के एहसास में डुबोए रहें. उन के दाढ़ीमूंछों के रंगे बालों को देख कर तो नौजवानों के ओरिजनल काले बालों तक को शर्म आ जाती है.

‘‘मैं जब आप की बेटी की शादी में गया था, तो अपनी दादी की उम्र की आप की महल्ले वालियों के रंगे बालों को देख कर दंग रह गया था. लगा था, आप का महल्ला तो जैसे जवानों का महल्ला हो. उन के बूढ़ी होने का पता तब चला था, जब वे कमर पर हाथ रख कर जैसेतैसे वरवधू को आशीर्वाद देने के लिए उठी थीं.

‘‘सच कहूं, आज के आदमी के पास रोटी के लिए पैसे हों या न हों, पर वह बाल डाई करने के लिए पैसे का जोड़तोड़ कर ही लेता है.

‘‘मेरा बस चले तो मैं टांगों तक के सफेद बाल रंग कर ही सांस लूं. आने वाले दिनों में देखना जो बिना डाई किए बालों के मरेंगे, उन्हें स्वर्ग के तो स्वर्ग के नरक तक के ताले नहीं खुलेंगे मिलेंगे. पता है पिछले हफ्ते अपने महल्ले में क्या हुआ था?’’

‘‘क्या हुआ था?’’ यह पूछते हुए मोहनजी का मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘महल्ले के सौ साल के एक बुजुर्ग गुजर गए.’’

‘‘तो क्या डाक्टरों के मरा बताने के बाद भी वे दोबारा जिंदा हो उठे?’’

‘‘नहीं, अब हम डाक्टरों पर विश्वास कम ही करते हैं… जब उन्हें देवभूत लेने आए, तो उन के सफेद बालों को देख कर उन्हें ले जाने से साफ मुकरते हुए बोले, ‘माफ करना, हम इन्हें नहीं ले जा सकते.’

‘‘गाड़ी अपनी कर दें क्या भैया? तुम ऊपर बिल अपना दे देना,’’ हम ने उन के आगे गिड़गिड़ाते हुए कहा. सभी को अपनेअपने घर जाने को देर जो हो रही थी. अब यहां लोगों के पास जिंदों के लिए वक्त नहीं, तो मरे हुए के साथ कौन रहे?

‘‘देवभूतों ने चाय पीतेपीते कहा. ‘ये नहीं चलेंगे. नरक में भी नहीं,’

‘‘क्यों नहीं चलेंगे? सौ साल का बंदा ऊपर ही तो चलता है.’’

‘‘यह सुन कर वे बोले, ‘तो ऐसा करो, अगर तुम इन से छुटकारा पाना चाहते हो, तो पहले इन के सफेद बाल डाई कराओ. साहब तक को सफेद बाल वालों से सख्त नफरत है.

‘‘‘जब हम कोई सफेद बाल वाली आत्मा ले जाते हैं, तो वे हमें न सुनने लायक गालियां यह कहते हुए देने लग जाते हैं कि मृत्युलोक से क्या गंद उठा लाए. कितनी बार कहा कि खूबसूरती भी कोई चीज होती है कि नहीं?’’’

इतना सुन कर मोहनजी ने मेरी पीठ थपथपाई और खुद ही मेरे पास से उठ कर मंदमंद मुसकराते हुए घर की ओर हो लिए. Satirical Story In Hindi

Satirical Story In Hindi : परफौर्मैंस दें टिकट लें – चुनावी सेल का खेल

Satirical Story In Hindi : जब से अंगरेजी के ‘परफौर्मैंस’ शब्द ने हिंदी के बाल पकडे़ हैं, तब से सड़क से ले कर संसद तक सब एकदूसरे से इस के सिवा कुछ और मांग ही नहीं रहे हैं. इस शब्द का मतलब चाहे पता हो या न हो, वे संसद में हर एक से ईमानदारी, देशभक्ति, त्याग, जनसेवा मांगने के बदले ‘परफौर्मैंस’ को मांगतेमांगते अपना गला सुखाए जा रहे हैं, तो घर में बाप अपने बेटे से ‘परफौर्मैंस’ पर ‘परफौर्मैंस’ मांगते हुए दिमागी बुखार किए जा रहा है, ‘‘अस्पताल में जब औक्सिजन नहीं मिलेगी, तो निकलेगी सारी हेकड़ी. देख बेटा, कुछ भी ले ले, पर मुझे ‘परफौर्मैंस’ चाहिए बस. जो करना है कर, जैसे करना है कर…’’

चाहे बेटा अपनी जवानी को दांव पर लगा कर बाप को कितना भी अच्छा कर के क्यों न दिखा दे, पर एक असंतुष्ट बाप है कि उस से रत्तीभर भी संतुष्ट नहीं होता है, ठीक पार्टी के बाप की तरह. उसे सबकुछ करने के बाद भी लग रहा है कि उस का बेटा और तो सबकुछ दे रहा है, पर ‘परफौर्मैंस’ वैसी नहीं दे रहा, जैसी उसे देनी चाहिए.

अरे बापजी, अब बेटे को मार डालोगे क्या? अरे भैयाजी, पार्टी वर्कर को अब मार डालोगे क्या? पार्टी में रह कर उन्हें भी कुछ खाने दो. हमाम में तनिक नंगा नहाने दो, वरना कल को हमाम ही बंद हो गए, तो नंगे नहाने की इच्छा मन में ही दबी रह जाएगी.

जनसेवक हो कर अपने बाथरूम में नंगे नहाए, तो क्या नहाए? नंगे नहाने का जो सामूहिक मजा हमाम में है, वैसा अकेले बाथरूम में नहाने में कहां? पार्टी के हिसाब से तनिक ढील दें, अपने हिसाब से थोड़ीबहुत ही सही, इन्हें भी जीने दो, खानेपीने दो. बंदा जब हराम की खाएगा, तभी तो पार्टी का झंडा शान से उठा कर चल पाएगा.

भैयाजी आए थे. वे बहुत गुस्से में थे. गुस्से में रहना उन का भाव है, उन का स्वभाव है. यह दूसरी बात है कि जब उन के क्लास लगाने के दिन थे, उन दिनों क्लास से तो छोडि़ए, वे स्कूल से ही महीनोंमहीनों गायब रहते थे. उन का बाप आ कर मास्टर साहब के आगे अपनी नाक रगड़ कर उन का रीएडमिशन करा जाता था बेचारा. वे नहीं सुधरे तो नहीं सुधरे.

बेचारे बाप की नाक रगड़रगड़ कर नाक से ‘क’ रह गई. पर अब वे जहां भी जाते हैं, पार्टी वर्करों की क्लास पर क्लास लगाते हैं. जब देखो, क्लास लगाने में बिजी. जब देखो, पूरे दमखम के साथ क्लास लगाने में मस्त.

कल उन्होंने आते ही मेरी क्लास ली. गुस्सा आने से पहले ही वे मुझ पर बरसते हुए बोले, ‘‘और… यह क्या चल रहा है सब?’’

‘‘भैयाजी, पार्टी का नाम कमा रहा हूं. ईवीएम में अपने ‘टच’ के लिए जनता के बीच अपने को दिनरात खपा रहा हूं.’’

‘‘पार्टी का नाम कमा रहे हो या पार्टी की नाक पर बैठ कर अपना नाम कमा रहे हो?’’ वे भादों के घन समान गरजे. हुंकार ऐसी कि क्लास के बाहर उन की पार्टी के नेताओं को भी सुनाई दी, तो वे अपना बोरियाबिस्तर इकट्ठा करने की सोचने लगे.

भैयाजी भैयाजी हैं या बब्बर शेर, यह उन्हें भी नहीं मालूम. बस, आदमी होने के बाद भी बब्बर शेर हो, तो हम जैसे गीदड़ों पर दहाड़ ही लेते हैं.

‘‘यह क्या अनापशनाप सुन रहा हूं तुम्हारे बारे में?’’ उन्होंने पानी का गिलास खुद पीने के बदले मेरी ओर बढ़ाया, तो मैं परेशान.

‘‘आप को कहीं से गलत जानकारी मिली होगी भैयाजी. मैं तो तनमन से पार्टी को समर्पित हो कर सोएसोए भी जनहित में काम कर रहा हूं,’’ मैं ने अपने दोनों हाथ जोड़े. वे शांत होने के बदले और दहाड़े. लगा कि कहीं कोई जरूर बहुत बड़ी गड़बड़ है, क्योंकि छोटीमोटी गड़बड़ तो पार्टी में दिनरात चलती रहती है.

असल में हम पार्टी में रह कर देश की लड़ाई उतनी नहीं लड़ते, जितनी अपनेअपने वजूद की लड़ाई लड़ते रहते हैं.

‘‘तो बताओ, तुम ने इन सालों में क्याक्या किया? अपना रिपोर्टकार्ड दिखाओ? वे तो कह रहे हैं कि… देखो बंधु, हमें ‘परफौर्मैंस’ चाहिए बस. वे दे सकते हो तो दो, वरना अगले चुनाव में अपना टिकट साफ हुआ समझो,’’ वे घुड़के.

‘‘भैयाजी, इन सालों में मैं ने पार्टी की कसम, अपने लिए कुछ नहीं किया. अपना कोई भी रिश्तेदार सरकारी नौकरी में नहीं लगाया, न ही किसी अपने गधे रिश्तेदार का डाक्टरी में एडमिशन दिलाया. न ही अपना कहीं कोई एक भी प्लाट खरीदा. किसी कंपनी में मैं ने अपनी बीवीबच्चों के नाम से कोई गुपचुप साझेदारी भी नहीं की.

‘‘इतना ही नहीं, मैं ने कभी किसी कारोबारी को भी नहीं धमकाया. किसी बलात्कारी को नहीं बचाया. अपने घर की रोटी को छोड़ कर मैं ने किसी का टुकड़ा तक नहीं खाया.

‘‘बाहर के बैंक में तो छोडि़ए, मेरा अपने देश के बैंक में भी वही एक पुराना खाता चल रहा है. यकीन नहीं है तो… जोकुछ मेरे पास है, सब पार्टी जौइन करने के वक्त का है. यह जो मैं ने कुरतापाजामा पहन रखा है, वह भी ससुराल वालों का दिया हुआ है.

‘‘मैं और बीवी एक ही चप्पल पहनते हैं. यह सब बस इसलिए कि… जनता में जो हमारी पार्टी की इमेज खराब हो चुकी है, उसे एक बार फिर बनाया जाए…’’

‘‘यही तो शिकायत आई है तुम्हारी. इन्हीं बातों को ले कर तो पार्टी हाईकमान तुम से नाराज हैं. पार्टी दफ्तर में तुम्हारी शिकायतें लगातार आ रही हैं कि बंदा… अरे, हम राजनीति में जनकल्याण करने को थोडे़ ही आते हैं. हम तो बस नारा जनकल्याण का लगाते हैं और जनता के पैसे पर सरेआम डांसरों के साथ मंचों पर झूमतेगाते हैं.

‘‘हम राजनीति में आ कर जनता की भलाई नहीं करते, बल्कि अपने कल्याण के लिए पैदा हुए जीव हैं. हमें तीनों लोकों में राज करना है, इसलिए जनता की सोचने के बदले पार्टी की सोचो. पार्टी है तो हम हैं.

‘‘ऐसा सुनहरी मौका फिर नहीं मिलने वाला. विपक्ष को हमेशाहमेशा के लिए चित करना है. अगर अगली बार भी टिकट चाहते हो, तो पार्टी के लिए जीजान से काम करो बरखुरदार, पार्टी के लिए.

‘‘जनता को तो स्वर्ग में भी भेज दो, तो भी वह भूख, भय, भ्रष्टाचार ही चिल्लाती रहेगी. हमें साम, दाम, दंड, भेद जैसे भी हो, पार्टी के लिए ‘परफौर्मैंस’ चाहिए बस. लोकतंत्र में जवाबदेही जनता के लिए नहीं, पार्टी के लिए ही बनती है.

‘‘अगली दफा फिर टिकट लेना हो तो… आज का लोकतंत्र सिविक सैंस का नहीं, पार्टी  परफौर्मैंस का है मेरे भोले कार्यकर्ताजी, समझे तो ठीक, वरना टिकट कटा.’’

‘‘मैं सब समझ गया भैयाजी…’’ और मेरी क्लास खत्म हुई. Satirical Story In Hindi

Satirical Story In Hindi : पत्नी व देश का संविधान – पत्नी से लेकर कामवाली तक सबने किया मेरा मुंह बंद

Satirical Story In Hindi : इस समय देश का हर नागरिक संवैधानिक हो गया है. अवैधानिक काम करने वाला भी बातबात में संविधान की बात कर रहा है. एक कहता है कि भारतमाता की जय बोलना संविधान में कहां लिखा है, तो दूसरा कहता है कि कहां लिखा है कि नहीं बोल सकते.

अब छोटीछोटी बात में भी लोग संविधान की आड़ ले रहे हैं.  हमारा एक दोस्त मैसेजेस का जवाब नहीं देता था. एक दिन हम ने मैसेज किया कि भाई, थोड़ा सा सोशल हो जा सोशल मीडिया में, तो उस का मैसेज आ गया कि कहां लिखा है संविधान में कि हर मैसेज का जवाब देना आवश्यक है. मैं ने कहा कि यार, तूने तो मिलियन डौलर का प्रश्न खड़ा कर दिया. तू सही कह रहा है कि नहीं, यह मैं कैसे सही या गलत ठहराऊं.

अब यह संविधान की आड़ लेने वाली बात छूत के रोग की तरह हर तरफ फैलती जा रही है. उस दिन मैं सब्जी बाजार में था. मैं ने मोलभाव करना चाहा, तो सब्जी वाला बोला, ‘साहब पढ़ेलिखे हो कर भी एक दाम की तख्ती आप ने नहीं पढ़ी. संविधान में मोलभाव करने का उल्लेख नहीं है. कहां लिखा है, यदि लिखा हो तो हमें बताएं.’ मैं बहुत देर तक उस का थोबड़ा देखता रहा कि अब तो सब्जी मंडी में भी सब्जी वाला सब्जीभाजी की कम, संविधान की ज्यादा जानकारी रखने लगा है.

संविधान गलीकूचेबाजार से होते हुए घर के किचन में कब घर कर गया, हमें वैसे ही भान ही नहीं हुआ जैसे दिल्ली में भाजपाकांग्रेस का सफाया होने का नहीं हुआ था. पिछले रविवार को मैं ने पत्नी के सामने इच्छा प्रकट की कि आज रविवार है, कुछ खास डिश हो जाए? तो उस ने आंखें तरेर लीं कि पत्नी रविवार को पति के लिए खास डिश तैयार करेगी, यह संविधान में कहां लिखा है.

मैं भौचक था इस संविधान के घर के रसोई तक आ पहुंचने से. मैं ने सोचा, यह बाहर जो हवा बह रही है, शायद उसी का परिणाम है. वैसे, इस देश में आजकल किसी भी बात की हवा के चहुंओर पहुंचने में समय नहीं लगता है. मेड 2 दिन नहीं आई. वैसे यह कोई नई बात नहीं है. मेड इस तरह से मेड है कि वह आकस्मिक रूप से कभी भी गायब हो जाती है. पत्नी ने पूछ लिया कि 2 दिन कहां रही, बिना बताए छुट्टी मार ली, ऐसे नहीं चलेगा? तो वह हाथ नचा कर बोली कि संविधान में कहां लिखा है कि 2 दिन मेड बिना बताए नहीं आ सकती? और मैडमजी, आप की यह पड़ताल गैरसंवैधानिक ढंग की लग रही है? मैं मेड के संविधान के प्रति अचानक उपज आई सजगता से अचंभित था.

गांवों में नईनवेली आई पत्नियों के शौचालय के अभाव में ससुराल छोड़ने के तो आप ने कई किस्से पढ़े होंगे. अब नईनवेली बहू को किसी ने ज्ञान देने की कोशिश की कि सुबह उठ कर सासससुर के पैर छूना चाहिए. तो वह बोली कि फिर कहना कि रात को सास के पैर दबाना चाहिए. उस ने आंख मार कर आगे कहा कि संविधान में ऐसा कुछ नहीं लिखा है, इसलिए वह बाध्य नहीं है. उस के आराध्य न पति है और न सास. उस का कैरियर ही उस का आराध्य है, उस का संविधान है.

महिला मंडल की किटी पार्टियों का यह मौसम है. हम ने एक दिन हिम्मत बटोर कर, पत्नी से कहा कि अब किटी पार्टियां बंद कर दो क्योंकि बच्चों की परीक्षा नजदीक आ रही है. तो वह बोली कि संविधान का अध्ययन कर लो, उस में ऐसा कहीं लिखा नहीं है. मैं ने कहा कि बहुत जवाब देने लगी हो? तो वह तपाक से बोली कि संविधान में यह कहां लिखा है कि पत्नी केवल सुन सकती है, पलट कर जवाब नहीं दे सकती. आगे वह बोली, ‘‘जब मोदीजी कह रहे हैं कि उन का धर्म देश का संविधान है तो फिर हम कैसे इस का सम्मान करने में पीछे रह सकते हैं.’’

बौस के घर में एक कार्यक्रम था. हम ने पत्नी से गुजारिश की कि चलना है तो वह तपाक से बोली कि संविधान में कहां लिखा है कि पत्नी का बौस के यहां के हर बोरिंग फंक्शन में जाना जरूरी है. बौस आप का होगा, हमें तो उस दिन किटी पार्टी में जाना है.

ये दोटूक बातें आजकल संविधान की बैकिंग के कारण हमें हर जगह सुनने को मिल रही हैं. सरकार ने डाक्टरों को प्राइवेट प्रैक्टिस करने से रोका क्या, कि उन की यूनियन खड़ी हो गई कि संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं किया गया है कि डाक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस नहीं कर सकता. उस ने तो शपथ ली हुई है मरीज का इलाज करने की. इस के बदले में यदि स्वेच्छा से कोई मरीज कुछ दे जाता है तो इस के लिए डाक्टर कहां जिम्मेदार है?

शाम को पत्नी घर पर नहीं थी. चाय खुद बनानी पड़ी. वह 8 बजे घर में आई. हम पूछ बैठे कि कहां चली गई थी, हमें चाय भी आज खुद ही बनानी पड़ी? हमारा इतना कहना था कि वह बिफर गई, नहीं, सही कर लेता हूं कि वह भड़क पड़ी. ध्यान रहे पत्नियां अकसर भड़कती हैं पति नामक जीव पर. और पति की बोलती बंद हो जाती है, ले बच्चू अब ऊंट पहाड़ के नीचे आया है. वह बोली कि देश के संविधान में कहां लिखा है कि मैं कहीं जाऊंगी तो पूछ कर जाऊं और आगे भी कि यह कहां लिखा है कि चाय रोज मैं ही बना कर दूंगी. और संवैधानिक जानकारी लो, काम आएगी कि, संविधान में पति द्वारा चाय बना कर पत्नी को पिलाने की कोई रोक नहीं है? सो, तुम्हें तो अपनी चाय के साथ ही एक अदद चाय मेरे लिए भी बना कर थर्मस में रख देनी थी.

मैं अब निरुत्तर था. आप के पास कोई उपाय हो तो बताएं संविधान के घेरे से निकलने का. वैसे, आप की भी स्थिति मेरे से कम बदतर नहीं होगी, यह मैं जानता हूं, फिर भी आप से पूछ रहा हूं. Satirical Story In Hindi

Women Legal Rights : औरतों का गुजाराभत्ता मांगना भीख या अधिकार ?

Women Legal Rights : भारतीय समाज में शादी को बहुत ही पवित्र बंधन माना जाता है लेकिन यह बंधन एकतरफा ही रहा है. कौंस्टिट्यूशन के लागू होने से पहले तक मर्दों के लिए शादी के माने कुछ और थे और औरतों के लिए कुछ और. शादी एक पवित्र बंधन सिर्फ औरतों के लिए था. औरत अगर शादी से संतुष्ट न हो तो उस के पास इस बंधन से आजाद होने का कोई विकल्प नहीं था लेकिन मर्द एक औरत के होते दूसरी व तीसरी शादी कर सकता था. पवित्रता के पाखंड में सिर्फ औरतें फंसती थीं, मर्द नहीं.

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के लागू होने के बाद, संवैधानिक तौर पर ही सही, औरत और मर्द बराबर हो गए. अब औरतें विवाह की पवित्रता के ढोंग को चुनौती दे सकती थीं और उस के बंधन से आजाद हो सकती थीं. हालांकि 75 साल बाद आज भी संविधान की यह आजादी सामाजिक स्तर तक नहीं पहुंची है. ग्रामीण भारत की औरतें आज भी पतियों द्वारा छोड़ी जाती हैं और उन्हें पूछने वाला कोई नहीं होता लेकिन शहरी क्षेत्रों में हालात बदल रहे हैं. पढ़ीलिखी औरतें अब शादी के पाखंड को झेलने को तैयार नहीं. यही कारण है कि भारत में हर साल तलाक के मामले बढ़ रहे हैं. आंकड़ों के अनुसार, 2023 में देशभर के फैमिली कोर्ट्स में लगभग 8.26 लाख मामलों का निबटारा हुआ था. इन में तलाक, सेपरेशन, एलिमनी, गुजाराभत्ता और बच्चे की कस्टडी जैसे मामले शामिल हैं. औसतन हर दिन लगभग 2,265 मामले निबटाए गए. यह भी ध्यान देने योग्य है कि 2023 के अंत तक फैमिली कोर्ट्स में लगभग 11.5 लाख मामले पैंडिंग थे.

पुरुषवादी मानसिकता

तलाक के बढ़ते मामलों के बीच कुछ ऐसे मामले भी आते रहते हैं जो कोर्ट के फैसले पर सोचने को मजबूर करते हैं. तलाक के केसेज में कोर्ट के कई मामले ऐतिहासिक बन जाते हैं तो कई मामलों में जजों की पुरुषवादी मानसिकता उजागर हो जाती है. सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक तलाक के मामले में फैसला सुनाया, जिस में वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान और सहायक अधिवक्ता प्रभजीत जौहर ने पति की ओर से दलीलें पेश की थीं. इस मामले में पत्नी ने अपने पति से 12 करोड़ रुपए और मुंबई में एक फ्लैट की मांग की थी. कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद तलाक को मंजूरी दी और पति को निर्देश दिया कि वह अपनी पूर्व पत्नी को मुंबई के ‘कल्पतरु’ हाउसिंग कौम्प्लैक्स में एक फ्लैट सौंपे.

माधवी दीवान ने कोर्ट में तर्क दिया कि पत्नी की मांगें नाजायज और कानूनी अधिकारों से परे हैं, क्योंकि वह पढ़ीलिखी और काम करने में सक्षम है. कोर्ट ने पति की इनकम और प्रौपर्टी की जांच की और माना कि पत्नी ससुर की संपत्ति पर अधिकार नहीं जता सकती. आखिरकार कोर्ट ने पत्नी को 2 विकल्प दिए- या तो बिना किसी विवाद के फ्लैट स्वीकार करे, या 4 करोड़ रुपए की एकमुश्त राशि ले. पत्नी ने फ्लैट चुनने का फैसला किया. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13 और धारा 25 (स्थायी गुजाराभत्ता और रखरखाव) पर आधारित है. इस धारा के तहत क्रूरता, परित्याग, व्यभिचार आदि को आधार बना कर तलाक की मांग की जा सकती है. इस मामले में कोर्ट ने दोनों पक्षों की सहमति और वैवाहिक रिश्ते के टूटने की स्थिति (इर्रिवर्सिवल ब्रेकडाउन औफ मैरिज) को आधार बनाया.

हालांकि, विशिष्ट आधार (जैसे क्रूरता या परित्याग) का उल्लेख सार्वजनिक जानकारी में नहीं होने के कारण सहमति से तलाक को मंजूरी दी गई, जो धारा 13(1)(आई-बी) या धारा 13-बी (पारस्परिक सहमति से तलाक) के तहत नियम है.

गुजाराभत्ता निष्पक्ष व उचित हो

कोर्ट ने पत्नी की गुजाराभत्ता और संपत्ति की मांग को धारा 25 के तहत जांचा, जो तलाक के बाद जीवनसाथी को वित्तीय सहायता प्रदान करने की व्यवस्था करता है. इस धारा के तहत, कोर्ट को यह सुनिश्चित करना होता है कि गुजाराभत्ता निष्पक्ष और उचित हो, जिस में दोनों पक्षों की वित्तीय स्थिति, जीवनशैली और आत्मनिर्भरता की क्षमता को ध्यान में रखा जाता है. मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई और जस्टिस के वी विश्वनाथन की पीठ ने औरतों को सलाह देते हुए कहा कि ‘‘पत्नी को गरिमा के साथ जीने के लिए स्वयं कमाना चाहिए. आधुनिक युग में, विशेषरूप से पढ़ीलिखी और सक्षम महिलाओं को ‘भीख’ (अत्यधिक गुजाराभत्ता) पर निर्भर नहीं रहना चाहिए.’’

इस मामले पर कोर्ट ने बेशक निष्पक्षतापूर्वक फैसला सुनाया लेकिन फैसले के बाद जजों की उपरोक्त टिप्पणी से उन की मानसिकता भी स्पष्ट जाहिर हो गई. गुजाराभत्ता हासिल करना भीख कैसे है? अगर संविधान औरतों को गुजाराभत्ता हासिल करने को उन का अधिकार समझता है तो कोई जज औरतों के इस संवैधानिक अधिकार को ‘भीख’ की संज्ञा कैसे दे सकता है? क्या यह संविधान का मजाक नहीं है? इस में दोराय नहीं कि कई औरतें लालच में ज्यादा गुजाराभत्ता की मांग करती हैं लेकिन यह तय करना तो कोर्ट का काम है और कोर्ट ने इस मामले में औरत को उस का हक दिलवाया भी है. फिर कोर्ट को इस तरह की अनर्गल टिप्पणी करने की क्या तुक है? कोर्ट की यह टिप्पणी संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध ही नहीं बल्कि तलाक के लिए कचहरी के चक्कर काट रही तमाम औरतों के सम्मान के खिलाफ भी है. Women Legal Rights

Middle Class Struggles : बिना क्लास का मिडिल क्लास

Middle Class Struggles : मिडिल क्लास, समाज का सब से जाहिल और नकारा वर्ग. इस की जरूरत न समाज को होती है और न ही सरकार को. सही भी है, जब देखो तब महंगाई का रोना रोने चले आते हो. अरे भाई, पैट्रोल और डीजल सैकड़ा पार कर गया तो क्या? इनकम टैक्स में छूट नहीं मिली तो क्या? छठा वेतन आयोग लागू नहीं हुआ तो क्या? पुरानी पैंशन बहाल नहीं हुई तो क्या? प्याज और टमाटर के स्वाद आसमान छू रहे हैं तो क्या? जब बंदर, मेरा मतलब हमारे पूर्वज, अदरक का स्वाद नहीं जान पाए तो तुम उस अदरक का स्वाद जानने के पीछे क्यों पड़े हो. जेब में ऊंट के मुंह में जीरा टाइप पूंजी लिए टहलते रहते हो और अपने अधिकारों के लिए दरियाई घोड़े के मुंह की तरह खोले चीखतेचिल्लाते रहते हो.

अब तुम ही बताओ, सरकार तुम्हारी क्यों सुने. सच कहूं तो तुम्हारी तो खुद तुम्हारे घर वाले भी नहीं सुनते. महंगे होटल में जाने की तुम्हारी औकात नहीं और गलती से किसी तरह जी कड़ा कर के तुम चले भी गए तो सब्जी का नाम पढ़ने से पहले उस के दाम पढ़ते हो. तुम्हारी भूख भी होटल के मेनू कार्ड में सुनहरे अक्षरों में लिखे रेट्स पर डिपैंड करती है. तुम्हारी आंखें तेजी से मेनू कार्ड में स्वर्ण अक्षरों में लिखी सब से सस्ती सब्जी, रोटी और दाल को ढूंढ़ने में लग जाती हैं. सच कहूं तो वह फूड आइटम नहीं बल्कि अपनी औकात को ढूंढ़ रहा होता है. अगर गलती से घर वालों ने नान और पनीर की सब्जी और्डर करने का आग्रह कर दिया तो वह यह कह कर, यहां का डोसा और इडली सांभर बहुत मशहूर है, टालने का प्रयास करता है क्योंकि नान और पनीर की सब्जी का दाम पढ़ कर ही उस की भूख मर जाती है.

जहां कोल्डड्रिंक भी खास रिश्तेदार के आगमन पर आती है. जिस वर्ग में टूथब्रश दांत घिसने से शुरू हो कर कुकर के ढक्कन को साफ करने व पाजामे में नाड़ा डालने तक की यात्रा कर लेता है उस वर्ग से आप क्या ही उम्मीद करोगे. बताओ, तुम खुद ही बताओ. गिनती के चार प्रतिशत हो. मुट्ठीभर लोग और उम्मीदें बड़ीबड़ी. बताओ, क्यों करे सरकार तुम्हारी चिंता, तुम करते ही क्या हो उस के लिए? कोरोना काल में बिना काम के अपने घर में काम करने वाले लोगों को तनख्वाह दे दी तो क्या? एक दिन की तनख्वाह महामारी के नाम पर दे दी तो क्या? मंदिर और धर्मकर्म के नाम पर चंदा दे दिया तो क्या? तुम अपनेआप की औरों से बराबरी करने लगे. टीवी के सामने सोफे पर बैठेबैठे टीकाटिप्पणी करने के अलावा आज तक किया ही क्या है तुम ने?

सचसच बताओ तुम ने इस समाज के लिए आज तक किया क्या है? जब देखो हर महीने बिजली का बिल जमा करने खड़े हो जाते हो, साल पूरा होने तक इनकम टैक्स जमा करने के लिए जी हलकान करने लगते हो. कभी म्यूचुअल फंड तो कभी सीजन सेल तो कभी पीएफ के लिए जोड़तोड़ करने लगते हो. पोलियो ड्रौप पिलाने तुम दरदर भटको तो कभी जनगणना के लिए तुम द्वारेद्वारे जाओ, कभी चुनाव में ड्यूटी तो कभी मतगणना में. नैतिकता का भी सारा ठेका तुम ही ने ले रखा है. वह चार लोग जीवनभर दिखेंगे नहीं पर तुम उन चार लोगों से जीवनभर डरते रहोगे. जरा सी इज्जत की खातिर पूरे समाज में शरमाए-शरमाए फिरोगे, गंगाजी में डुबकी मार लोगे या लटक जाओगे पर मदद के लिए हाथ न फैला पाओगे. एक अच्छे भविष्य के इंतजार में स्वाति की तरह नक्षत्र से बरसने वाले पानी की बूंद के लिए जीवनभर मुंह खोले आसमान की तरफ ताकते रहोगे पर तुम्हारा होनाजाना कुछ भी नहीं है. जिंदगीभर टिटहरी की तरह दोनों टांग ऊपर किए आसमान को रोकने का भ्रम पाले जीते रहोगे. Middle Class Struggles

Romantic Story in Hindi : गजरा – एक गजरे ने कैसे बना दिया अमित की जिंदगी को खुशनुमा ?

Romantic Story in Hindi : दफ्तर से छुट्टी होते ही अमित बाहर निकला. पर उसे घर जाने की जल्दी नहीं थी, क्योंकि घर का कसैला स्वाद हमेशा उस के मन को बेमजा करता रहता था.

अमित की घरेलू जिंदगी सुखद नहीं थी. बीवी बातबात पर लड़ती रहती थी. उसे लगता था कि जैसे वह लड़ने का बहाना ढूंढ़ती रहती है, इसीलिए वह देर रात को घर पहुंचता, जैसेतैसे खाना खाता और किसी अनजान की तरह अपने बिस्तर पर जा कर सो जाता.

वैसे, अमित की बीवी देखने में बेहद मासूम लगती थी और उस की इसी मासूमियत पर रीझ कर उस ने शादी के लिए हामी भरी थी. पर उसे क्या पता था कि उस की जबान की धार कैंची से भी ज्यादा तेज होगी.

केवल जबान की बात होती तो वह जैसेतैसे निभा भी लेता, पर वह शक्की भी थी. उस की इन्हीं दोनों आदतों से तंग हो कर अमित अब ज्यादा से ज्यादा समय घर से दूर रहना चाहता था.

सड़क पर चलते हुए अमित सोच रहा था, ‘आज तो यहां कोई भी दोस्त नहीं मिला, यह शाम कैसे कटेगी? अकेले घूमने से तो अकेलापन और भी बढ़ जाता है.’

धीरेधीरे चलता हुआ अमित चौराहे के एक ओर बने बैंच पर बैठ गया और हाथ में पकड़े अखबार को उलटपलट कर देखने लगा, तभी उस के कानों में आवाज आई. ‘‘गजरा लोगे बाबूजी. केवल 10 रुपए का एक है.’’ अमित ने बगैर देखे ही इनकार में सिर हिलाया. पर उसे लगा कि गजरे वाली हटी नहीं है.

अमित ने मुंह फेर कर देखा. एक लड़की हाथ में 8-10 गजरे लिए खड़ी थी और तरस भरे लहजे में गजरा खरीदने के लिए कह रही थी.

अमित ने फिर कहा, ‘‘नहीं चाहिए. और गजरा किस के लिए लूं?’’

लड़की को कुछ उम्मीद बंधी. वह बोली, ‘‘किसी के लिए भी सही, एक ले लो बाबूजी. अभी तक एक भी नहीं बिका है. आप के हाथ से ही बोहनी होगी.’’

अमित ने गजरे और गजरे वाली को ध्यान से देखा. मैलीकुचैली मासूम सी लड़की खड़ी थी, पर उस की आंखें चमकीली थीं.

‘‘लाओ, एक दे दो,’’ अमित ने गजरों की ओर देखते हुए कहा. लड़की ने एक गजरा अमित के आगे बढ़ाया और उस ने जेब से 20 रुपए का नोट निकाल कर उसे दे दिया.

‘‘खुले पैसे तो नहीं हैं. यह पहली ही बिक्री है.’’

अमित ने एक पल रुक कर उस से कहा, ‘‘लाओ, एक और गजरा दे दो. 20 रुपए पूरे हो जाएंगे.’’

लड़की ने खुश हो कर एक और गजरा उसे दे दिया.

जब वह जाने लगी, तो अमित ने कहा, ‘‘जरा ठहरो, मैं 2 गजरों का क्या करूंगा? एक तुम ले लो. अपने बालों में लगा लेना,’’ अमित ने धीरे से मुसकरा कर गजरा उस की ओर बढ़ाया.

लड़की का चेहरा शर्म से लाल हो उठा. अमित को उस की आंखें बहुत काली और पलकें बहुत लंबी लगीं. तभी वह संभला और मुसकरा कर बोला, ‘‘लो, रख लो. मैं ने तो यों ही कहा था. अगर बालों में नहीं लगाना, तो किसी को बेच देना या फुटकर पैसे मिल जाएं, तो 10 रुपए वापस कर जाना.’’

लड़की ने उस गजरे को ले लिया और धीरेधीरे कदम बढ़ाते हुए वहां से चली गई. अमित कुछ देर वहीं बैठा रहा, फिर उठ कर इधरउधर घूमता रहा. जब अकेले दिल नहीं लगा, तो घर की ओर चल दिया.

जब वह घर पहुंचा, तो देखा कि बीवी पतीले में जोरजोर से कलछी घुमा रही थी.

अमित चुपचाप अपने कमरे में चला गया. कपड़े उतारते समय उसे गजरे का खयाल आया, तो उस ने सोचा कि जेब में ही पड़ा रहने दे. पर नहीं, बीवी ने देख लिया तो सोचेगी कि पता नहीं किसे देने के लिए खरीदा है. उस ने सोचा कि क्यों न जेब से निकाल कर कहीं और रख दिया जाए.

अमित के कदमों की आहट सुनते ही बीवी उठ खड़ी हुई थी. वह शाम से ही गुस्से से भरी बैठी थी कि आज तो इस का फैसला हो कर ही रहेगा कि वह क्यों देर से घर आता है. क्या इसी तरह जीने के लिए वह उसे ब्याह कर लाया है.

जब वह रसोई से बाहर आई, तो अमित के हाथ में गजरा देख कर एक पल के लिए ठिठक कर खड़ी हो गई.

हड़बड़ी में अमित गजरे वाला हाथ आगे बढ़ा कर बोला, ‘‘यह गजरा… यों ही ले आया हूं.’’

बीवी ने आगे बढ़ कर गजरा ले लिया, उसे सूंघा और फिर आईने के सामने खड़ी हो कर अपने जूड़े पर बांधने लगी. अमित सबकुछ अचरज भरी नजरों से देखता रहा.

तभी बीवी ने कहा, ‘‘खूब महकता है. सारा कमरा खुशबू से भर गया है. ताजा कलियों का बना लगता है.’’

‘‘हां, बिलकुल ताजा कलियों का है. तभी तो सोचा कि लेता चलूं.’’

कई दिनों के बाद उस दिन अमित ने गरमगरम भोजन और बीवी की ठंडी बातों का स्वाद चखा. दूसरे दिन वह शाम को छुट्टी होने पर दफ्तर से निकला, तो उस के साथ एक दोस्त भी था. दफ्तर में काम करते समय अमित ने सोचा था कि आज सीधे घर चला जाएगा, पर दोस्त के मिलने पर घर जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता था.

दोनों दोस्तों ने पहले एक रैस्टोरैंट में चाय पी, फिर वे बाजार में घूमते रहे. आखिर में वे समुद्र के किनारे जा बैठे. शाम को सूरज के डूबने की लाली से सागर में कई रंग दिख रहे थे.

अमित का ध्यान टूटा. वही कल वाली लड़की उस के सामने खड़ी गजरा लेने के लिए कह रही थी. अमित ने लड़की से गजरा ले लिया.

दोस्त ने कुछ हैरान हो कर कहा, ‘‘लगता है, भाभी आजकल खुश हैं. खूब गजरे खरीद रहे हो.’’

अमित मुसकराया, ‘‘बस यों ही खरीद लिया है. अब चलें, काफी देर हो गई है.’’

अमित घर पहुंचा, तो उस की बीवी जैसे उस के ही इंतजार में बैठी थी. वह बोली, ‘‘आज तो बड़ी देर कर दी आप ने. सोच रही थी, जरा बाजार घूमने चलेंगे. आते हुए शीला के घर भी हो आएंगे.’’

अमित ने बगैर कुछ बोले ही जेब से गजरा निकाल कर उस की ओर बढ़ाया. बीवी ने बड़े चाव से गजरा लिया और सूंघा. फिर आईने के सामने खड़ी हो कर उसे जूड़े पर बांधने लगी.

अमित ने कपड़े उतारे, तो बीवी ने कपड़े ले कर सलीके से खूंटी पर टांग दिए. फिर तौलिया और पाजामा देते हुए वह बोली, ‘‘हाथमुंह धो लो. मैं रोटी बनाती हूं, गरमगरम खा लो, फिर बाजार चलेंगे.’’

अमित समझ नहीं पा रहा था कि बीवी में यह बदलाव कैसे आ गया. गजरा तो मामूली सी चीज है. कोई और ही बात होगी. दिन बीतने लगे. अब अमित शाम को जल्दी घर चला आता. बीवी उसे देख कर खुश होती. जिंदगी ने एक नया रुख ले लिया था. अमित को लग रहा था कि बीवी में हर रोज बदलाव आ रहा है. उसे अपने में भी कुछ बदलाव होता महसूस हो रहा था.

अमित दफ्तर से घर आते समय एक दिन भी बीवी के लिए गजरा लेना नहीं भूला था. अब तो यह उस की आदत ही बन गई थी. वैसे तो गजरे वाली और भी लड़कियां वहां होती थीं, पर अमित हमेशा उसी लड़की से गजरा खरीदता, जिस ने उसे पहले दिन गजरा दिया था.

एक दिन अमित चौक में बैठा सामने की इमारत को देख रहा था कि गजरे वाली लड़की आई. अमित ने रोज की तरह उस के हाथ से गजरा ले लिया. पैसे ले कर वह लड़की वहीं खड़ी रही.

अमित ने देखा, उस के चेहरे पर संकोच था, जैसे वह कुछ कहना चाहती है.

अमित ने उस की झिझक दूर करने के लिए पूछा, ‘‘कितने बिक गए अब तक?’’

‘‘4 बिक गए हैं. अभीअभी आई हूं. पर बाबूजी, आप के हाथ से बोहनी होने पर देखतेदेखते ही बिक जाते हैं.’’

‘‘फिर तो सब से पहले मुझे ही बेचा करो,’’ अमित ने कहा.

‘‘कभीकभी तो आप बहुत देर से आते हैं,’’ लड़की शिकायती लहजे में बोली.

अमित कुछ देर तक चुप रहा, फिर बोला, ‘‘कहां रहती हो?’’

लड़की ने बताया कि वह अपनी अंधी दादी के साथ एक झोंपड़ी में रहती है. झोंपड़ी के सामने 2 चमेली के पौधे हैं, जिन के फूलों से वह उस के लिए खास गजरा बनाती है.

‘‘अच्छा,’’ अमित बोला.

लड़की का चेहरा लाज से लाल हो गया. वह एक पल को चुप रही, फिर बोली, ‘‘तुम रोज गजरा खरीदते हो, इस का करते क्या हो?’’

अमित मुसकराया. फिर कुछ कहतेकहते वह चुप हो गया.

आखिर लड़की ने कहा, ‘‘अच्छा, मैं जाती हूं.’’ और अमित उसे तेज कदमों से जाते हुए देखता रहा.

अब अमित की अधिकतर शामें घर में ही बीतने लगी थीं. दोस्त शिकायत करते कि अब वह बहुत कम मिलता है, पर वह खुश भी था कि उस की घरेलू जिंदगी सुखद बन गई थी.

एक दिन अमित की बीवी ने उस के साथ सिनेमा देखने का मन बनाया. वह दोपहर को उस के दफ्तर पहुंची और दोनों सिनेमा देखने चल पड़े. सिनेमा से निकलने पर बीवी ने कहा, ‘‘चलो, आज सागर के किनारे चलते हैं. एक अरसा बीत गया इधर आए हुए.’’

वहां घूमते हुए अमित को गजरे वाली लड़की दिखाई दी. वह उस की तरफ ही आ रही थी. उस के हाथ में एक ही गजरा था, जो कलियों के बजाय फूलों का बना हुआ था. लड़की के पास आने पर अमित ने कहा, ‘‘मैं हमेशा इसी लड़की से गजरा लिया करता हूं, क्योंकि यह मेरे लिए खासतौर पर मोटीमोटी कलियों का गजरा बना कर लाती है.’’ बीवी ने तीखी नजरों से लड़की को देखा, तो लड़की उस के सामने आंखें न उठा सकी.

गजरा लेने के लिए अमित ने हाथ बढ़ाया, तो लड़की ने हाथ का गजरा देने के बजाय अपनी साड़ी के पल्लू में बंधा एक गजरा निकाला. मोटीमोटी कलियों का बहुत बढि़या गजरा, जैसा कि वह रोज अमित को देती थी. अमित का चेहरा खिल उठा, पर उस की बीवी तीखी नजरों से उस लड़की को देख रही थी.

अचानक अमित का ध्यान बीवी की ओर गया तो चौंका. उस ने फौरन लड़की के हाथ से गजरा ले लिया और जेब से पैसे निकाल कर उस की ओर बढ़ाए,

पर लड़की ने पैसे न लेते हुए उदास लहजे में कहा, ‘‘पिछली बार के बकाया पैसे मुझे आप को देने थे. हिसाब पूरा हो गया,’’ इतना कह कर वह एक तरफ को चली गई.

अमित की बीवी ने वहीं खड़ेखड़े जूड़े पर गजरा बांधा और अमित को दिखाते हुए पूछा, ‘‘देखो तो ठीक तरह से बंधा है न?’’

‘‘हां,’’ अमित ने पत्नी की ओर देखते हुए कहा, ‘‘आज के जूड़े में तो तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो.’’

‘‘खूबसूरत चीज हर जगह ही खूबसूरत लगती है,’’ पत्नी ने शोखी से कहा और मुसकराई, पर अमित के होंठों पर मुसकराहट न थी. Romantic Story in Hindi

Satirical Story In Hindi : झूठ बोलना सीखें – आज की दुनिया में सत्य बड़ी जानलेवा बीमारी है

Satirical Story In Hindi : आप ने रेलवेस्टेशनों, बसअड्डों, पैसेंजर गाडि़यों और महानगरों के फुटपाथों पर 10 रुपए में इंगलिश सिखाने का दावा करने वाली पुस्तकें खरीदी भले ही न हों मगर देखी जरूर होंगी. इन्हें अपनी जेब के अनुकूल, अपनी आकांक्षाओं के अनुरूप पा सर्वसाधारण अपनी जेब ढीली करने को उत्सुक नजर आता है. और इस तरह यह धंधा चलता रहता है. समय की मार खाए गरीब बेचारे कभी यों 10 रुपए में अंगरेजी तो नहीं सीख पाते किंतु अपनी तरफ से पूरी कोशिश करने की आत्मसंतुष्टि उन्हें जरूर मिल जाती है. उस पुस्तक ने उन का कितना अंगरेजी ज्ञान बढ़ाया, यह तो नहीं कहा जा सकता. यह शोध का विषय है लेकिन चिंतनमननमंथन द्वारा मानसिक वादविवाद का आयोजन करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि दरअसल इस सर्वसाधारण के जीवन को उन्नत करने के लिए अंगरेजी नहीं झूठ बोलना कैसे सीखें नामक पुस्तक की सख्त आवश्यकता है. सर्वशिक्षा अभियान के तहत अगर इसे बढ़ावा मिले तो अतिउत्तम. अनिवार्य पठनीय पुस्तक का दरजा मिले तो वाहवाह.

सत्यं वद प्रियं. वद न वद सत्यम अप्रियम, यह पाठ हिंदुस्तान की हर पाठशाल में पढ़ाया जाता रहा है और इस के सदके में हमारे जैसे झूठ बोलने में अक्षम लोगों का जमावड़ा हिंदुस्तान की धरती पर हो गया, जिन्हें आजादी के सठिया जाने के बाद भी मिडिल क्लास कह कर खूब लताड़ा गया. अब तो सब से बड़ा अडं़गा है हमारी प्रगति में, वह यही है, हमारी मिडिल क्लास सत्यवादी सोच. इसलिए शरीर पर टैटू सा गुदा मिडिल क्लास रहनसहन, मिडिल क्लास भाषा.

यह तो मानी बात है कि कोई आदमी सच बोल कर प्रिय नहीं बना रह सकता. सच तो प्रकृति से ही कड़वा होता है, एकदम करेला, ऊपर से नीम चढ़ा जैसा. करेला तो जानते हैं न, छिलका उतार भी दिया जाए तब भी कड़वाहट अंदर पोरपोर तक भरी ही रहती है.

अभी तक हम ने तो सुना नहीं कि करेले को चाशनी में डुबो कर किसी ने बारहमासी रसगुल्ला बनाने में सफलता प्राप्त की हो, किसी को यह कला आई भी हो तो खानदानी शाही दवाखाना की तरह निश्चित ही चांदनी चौक की किसी गली में चुपचाप चल रही होगी. यों पटरियों पर तो वह न बिक रही होगी. यह हमारा सच तो होली पर बनने वाली गुझिया सी साख भी नहीं जुटा पाया कि चलो, सालाना जलसे में ही उस का कुछ जलवा हो. मगर वहां भी बुरा न मानो होली है का वरक लपेटा जाए तब जा कर कुछ बात बने.

इधर, झूठ की दादागीरी एकदम निराली है, बासमती चावल सी उस की महक आ ह ह हा…एकएक दाना एकदम खिला हुआ ताजगी से भरपूर. सब को मजा देने वाला. सब की इज्जत बचाने वाला. झूठ की खासीयत है वह हमेशा आराम से मेजपोश की तरह बिछा रहता है, खूबसूरत परदे की तरह लटका रहता है. सब की नंगई ढकी रहती है. सो, सब को समझ लेना चाहिए कि झूठ बोलना कितना आवश्यक है.

दुनिया तो, जी, झूठ से चलती है, सामने वाले की झूठी तारीफ करिए, आराम से रहिए. हंसिए, बोलिए चैन की नींद सोइए. वरना धरती सुंघाऊ , पानी पिलाने वाले, धूल चटाने वाले, दिन में तारे दिखाने वाले, छठी का दूध याद दिलाने वाले, चारों खाने चित्त कर देने वाले सत्य की मार के लिए स्वयं भी तैयार रहिए क्योंकि सामने वाला व्यक्ति सांप काटे की तरह पहला मौका हाथ आते ही आप पर वार करने से चूकेगा नहीं. फिर चाहे वह कोईर् रामदेव हो या कोईर् बालकृष्ण.

जनाब, बात तो धार्मिक व दलीय भावनाओं की है और सच के साथ वही सब से पहले आहत होती है. अब देखिए आप अपनेआप चलते कहीं गिर पड़ते हैं ठोकर खा कर, तो न अफसोस होता है न दर्द, बस उठे और फिर चल दिए. किंतु, सत्य का कोड़ा पड़े तो पीठ पर उभार छोड़ जाता है. इसलिए जनाब जानिए और समझिए अब हम रह रहे हैं ग्लोबल विलेज में, और राजनीतिज्ञों की सफलता के पांव तले दबेदबे सांस ले रहे हैं. उन के सफल घोटालों की अनवरत दास्तान कानफोड़ू कीर्तन की तरह धाड़धाड़ बज रही है वातावरण में. यह किस का कमाल है, मिथ्या वचन ना.

जिस के आगे 10 रुपए की बांसुरी से सच की कितनी भी मीठी तान निकले, झूठ के औरकैस्ट्रा के आगे टिक नहीं पाती. इस पर भी अगर हम सत्य को पकड़ कर बैठे रहेंगे तो विलुप्त होते देर न लगेगी. सो, आवश्यक है कि हमारी संतानें, भावी पीढ़ी झूठ बोलना सीखें. यों तो यह कार्य पाठ्यक्रम में बदलाव कर के सरकार भी कर सकती है किंतु जैसे बिजली, पानी, सड़क, सुरक्षा इत्यादि के मामले में सरकार से हम सीख चुके हैं  आत्मनिर्भर रहना, वैसे ही हम इस में भी आत्मनिर्भर हो जाएं.

इसी अभियान के अंतर्गत हम ने ‘झूठ बोलना कैसे सीखें’ नामक पुस्तक बाजार में उतारी है, इस से हमारी चार पैसे की आमदनी हो जाएगी और आप झूठ बोलना बड़ी आसानी से सीख जाएंगे. हमें यह जान लेना चाहिए कि कंप्यूटर की तरह इसे पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से शामिल करना आवश्यक है लेकिन जब तक यह औपचारिक शक्ल अख्तियार करे तब तक प्राइवेट ट्यूशन से सफलता की ओर कदम बढ़ा देना चाहिए. वैसे भी यदि सभी सीख जाएंगे तो झूठ की सफलता के क्षेत्र में बड़ा कंपीटिशन हो जाएगा बिलकुल आईआईटी सा.

आज की तारीख में यह पाठ किसी पाठशाला की किसी पाठ्यपुस्तक में पढ़ाया नहीं जाता. बस, बच्चा अनुभव से फेल होहो कर इसे धीरेधीरे सीखता है. उस पर तुर्रा यह कि सच की जड़ बड़ी गहरी होती है, बेशरम के झाड़ की तरह बेतरतीब यहां से काटें तो वहां से सिर उठा लेगी. अमरबेल सी जीवन का सब रस चूस लेगी. बरसात में सड़ेगी, अकाल में सूखेगी, सर्दी में ठिठुरेगी मगर गले पड़ी रहेगी. इसलिए एक बार सच की लत पड़ जाए तो बीड़ीसिगरेटशराब की तरह इस के नशे में आदमी सबकुछ लुटा बैठता है राजा हरिश्चंद्र की तरह.

जीवन में सफलता का राज दरअसल आप की झूठ बोलने की क्षमता पर निर्भर करता है या यों कहिए कि गोलमाल करने के प्रतिबद्धता पर टिका रहता है तो कुछ अतिशयोक्ति न होगी. झूठ बोलना एक कला है जिसे कुंगफू जैसी मेहनत से आम आदमी को सीखना पड़ता है, कराटे किड की तरह रोजमर्रा के जीवन में सुबहसवेरे से देर शाम तक इस का अभ्यास करना पड़ता है तब जा कर कहीं यह आम आदमी के जीवन में उतरती है और उसे खास बनाती है. हां, राजनीतिज्ञों और पंडेपुजारियों के जीन में यह होती है वंशानुगत, पैदाइशी, कोयल की कूक सी जिसे संगीत सीखना नहीं पड़ता. वे झूठ की विरासत लिए होते हैं, पैदा होते ही नेता और पंडित बन जाते हैं.

झूठ अपनी संरचना में ही लुभावना व प्रिय लगने वाला होता है व रक्तबीज सा अपनी फसल धड़ाधड़ काटता है. एक झूठ से 100 झूठ पैदा होते देर नहीं लगती. उस की बेल अपनी गति से हौलेहौले परवान चढ़ने लगती है. जबकि सच न बढ़ता है, न घटता है. बस, उतने का उतना ही बना रहता है. सो, उस की प्रगति की संभावना भी स्थिर सी रहती है.

झूठा सहारा ही आप की जिंदगी को बेहद आसान बना देता है. आप का खड़ूस बौस आप से हंसहंस कर करने लगेगा बात. जैसे वजन कम करने के लिए कमर कसनी होती है वैसे ही झूठ बोलना सीखने के लिए तैयार होना पड़ता है. वरना आप झूठ बोल नहीं पाते. सच की इस बीमारी को शुरुआत में ही संभाल लेना चाहिए वरना सच का कैंसर बड़ा भयंकर दर्द देता है. न जीने देता है न मरने देता है. राजा हरिश्चंद्र सा डोम बना कर छोड़ता है जो अपने बेटे का भी दाह नहीं कर पाता. सो, सच से दूर रहें. सच डरने की चीज है, अपनाने की नहीं.

अब झूठ की तारीफों के पुल क्या बांधना. पूरा का पूरा तंत्र बाकायदा इस के सहारे चल रहा है. सच को खोजना पड़ता है भूसे के ढेर से सूई की तरह. समंदर में डूबे खजाने की तरह, सच अन्वेषण की चीज है, इसलिए आप कृपया इस का दैनिक सार्वजनिक उपयोग बंद करें. यह बातबात पर दन्न से उगलने वाली चीज नहीं. यह कीमती चीज है, इसे इस की कीमत मिलने पर ही उपलब्ध कराएं. बताओ भला, यह भी कोई बात हुई कि इधर घर में आया मेहमान, गले मिले नहीं, कि बोल पड़े, ‘कैसे बेढब लग रहे हो.’ आ गया पतीले में उबाल. लो, पकड़ो अपने सच का ढक्कन.

आज की तारीख में जो झूठ नहीं बोल पाता वह सफलता की सीढि़यां नहीं चढ़ पाता. झूठ के साथ बस यही बड़ी खराबी है कि यह दिल पर बोझ बन जाता है. एक सच्चा झूठ बोलने वाला वही होता है जो कैसा भी झूठ बोले मगर वह न तो उस के दिल पर बोझ बने न चेहरे पर शिकन डाले. बस, जिस दिन आप को यह तरीका आ गया, आप महान हो गए. सच तो एक पैदाइशी तत्त्व है खानापीनासोना जैसा, उस में क्या शिक्षा, क्या ज्ञान की आवश्यकता. झूठ बोलना एक फन है और सोचिए, आप कैसे फनकार हैं.

सच के बारे में ऐसी धारणा है कि वही अंतिम विजेता होता है. चलिए मान लिया. मगर अंत का क्या? रास्ते का महत्त्व नहीं. अंत तो मृत्यु भी है, फिर क्या जीवन, कुछ भी नहीं. मौत तो

एक पल में हो जानी है. सांसें तो जीवनभर चलनी हैं. सो, मंजिल से अधिक रास्ते का महत्त्व है. झूठ बोलनासीखना परमआवश्यक पाठ है. इस से अधिक इस विषय में कहना झूठ की तौहीन खास है.

अब हम आप को बताने जा रहे हैं कि हमारी झूठ बोलना सीखें नामक पुस्तक की हाईलाइट्स क्या हैं. इंगलिश स्पीकंग कोर्स की तर्र्ज पर ही हम ने अपने यहां 3 तरह के  कोर्स मय कोर्स मैटीरयल व सीडी के उपलब्ध कराएं हैं. रैगुलर व कौरेस्पौंडैस कोर्र्स दोनों की सुविधाएं हैं. रैपीडेक्स क्रैश कोर्स, नियमित रैगुलर व सस्ता शौर्टकट भी आप की जेब व हस्ती के अनुसार आप की आकंक्षाओं व इच्छाओं के अनुरूप उपलब्ध हैं.

उपलब्ध पुस्तक के की नोट्स अर्थात कुछ टिप्स यानी कि कुछ मारक तत्त्व निम्नांकित हैं. कृपया वृहद वर्णन के लिए पुस्तक खरीदें. संपूर्ण पुस्तक के लिए मनीऔर्डर करें या इंटरनैट के जरिए कैश औन डिलीवरी सुविधा का उपयोग करें.

झूठ बोलना सीखने के लिए निम्नांकित 10 नियमों का पालन करें. आप 10 दिनों में ही झूठ बोलना सीख जाएंगे, फिर आप की पौ बारह –

झूठ बोलने की शुरुआत अपने घर से करें.

घर में भी उस व्यक्ति से करें जिसे आप अपने सब से करीब पाते हैं.  यह कठिन होगा मगर सचमुच कारगर होगा.

झूठ सकुचाते हुए नहीं, धड़ल्ले से बोलें.

झूठ आंखों में आंखें डाल कर बोलें.

झूठ बोलते समय चेहरे पर पसीना न आने दें, आ जाए तो उसे रूमाल से पोंछने की गलती न करें. आप को अभ्यास की आवश्यकता होगी.

झूठ बोलने का अभ्यास सुबह के पहले घंटे से ही करें जैसे रातभर सोने के बाद कहें, ‘रात नींद ही नहीं आई’ या ‘रात को एक सपना देखा’ और फिर दिल की बात एक सपने के माध्यम से बयान करें जिसे वास्तव में आप ने देखा ही नहीं.

अपने झूठ को दैनिक दैनंदिनी में लिखें.

एक दिन में कम से कम 5 झूठ बिना आवश्यकता के बोलें, जब आप लगातार 5 झूठ बोल लें तो एक सच बोलने की छूट है. शुरुआत खाने की तारीफ से भी की जा सकती है, यह आसान है.

दफ्तर में देर से पहुंचने पर बोला, हुआ झूठ या छुट्टी के आवेदन में लिखा गया झूठ इस अभ्यास में शामिल नहीं किया जाएगा.

यदि आप का झूठ पकड़ा जाए तो न गलती मानें, न माफी मांगें. पकड़े जाने पर मुल्ला नसीरुद्दीन की पनाह में जाएं यानी कोईर् तीसरी स्थिति पैदा करें, जहां न सच टिके, न झूठ.

यों आप को झूठ बोलने का सफर दिलचस्प होता जाएगा और पाठ आसान.

याद रखिए झूठ बोलना सीखें यानी झूठ स्पीकिंग कोर्स द्वारा यह सब संभव है मात्र 3 महीनों में. पुस्तक को पढ़ते ही बस 1 महीने में आप फर्राटेदार झूठ बोलने लग जाएंगे और अपना जिंदगीभर का सत्यवचन का पाठ भूल जाएंगे. इस के बाद आप हमेशा झूठ के पक्ष में झंडा उठाए दिखाई देंगे. गरीबी रेखा से नीचे वालों के लिए कम मूल्य पर हमारा एक 15 दिनों का सस्ता व आसान कोर्स भी उपलब्ध है. जो आप की सोच बदल देगा, जीने का नजरिया बदल देगा. वह भी आज के जमाने में आप की सफलता सुनिश्चित करेगा. यह ऐसा कोर्स है जिस में बेहतरीन झूठ बोलना सिखाया जाता है जो बड़ेबड़े राजनीतिज्ञों को मात कर सकता है. बस, एक बार आजमाएं तो.

कृपया अपने बच्चों को सिखाएं, आज की दुनिया में सत्य जानलेवा बीमारी है जिस में आदमी सिर्फ दालरोटी खा सकता है, मक्खनमलाईर् का स्वाद कभी पहचान भी नहीं सकता. अगर भूले से कभी उस के आगे कोईर् रसगुल्ला पड़ जाए तो उस का हाजमा खराब हो जाता है, शौच करकर के वह बदहाल हो जाता है. तो फिर ऐसा शारीरिक सौष्ठव ले कर क्या करेंगे आप. 6 व 8 पैक्स छाती के जमाने में. क्या चुल्लूभर पानी में डूब मरेंगे. और डूबना भी चाहेंगे तो डूबेंगे कैसे. सच बोलने वाले के नसीब में पानी कहां? स्विमिंग पूल तो मिलने से रहा चार दिनों में आए टैंकर में.

आप के हिस्से में इतना जल कहां. हमारी पुस्तक इस रोग के प्रतिक्षक टीके की तरह है. ‘जिंदगी की दो बूंद’ का स्लोगन और पोलियो से छुटकारा जैसे. सो इसे अपनाएं, खुशहाली पाएं. Satirical Story In Hindi

Satirical Story In Hindi : फायदे हैलमैट पहनने के – मुसीबत में फंसने पर इज्जत भी बचाता है हैलमैट

Satirical Story In Hindi : अगर कोई आप से पूछे कि आप हैलमैट क्यों पहनते हैं? तो आप का सीधा सा जवाब होगा कि हादसे के समय सिर को बचाने के लिए हैलमैट पहनते हैं. मगर हैलमैट पहनने की केवल यही एक वजह नहीं है. इस की जानकारी मुझे अपने दोस्त गिरधारीजी से मिली.

एक दिन मैं यों ही गिरधारीजी के घर गया. वे घर पर नहीं थे. भाभीजी ने आदर से मुझे बैठाया. अभी हम चायपानी कर ही रहे थे, इतने में गिरधारीजी घर आ गए. स्कूटर बाहर खड़ा कर हैलमैट लगाए हुए ही वे अंदर चले आए. उन्होंने मुझे हैलमैट को उतार कर नमस्कार किया, यह सब मुझे बड़ा अटपटा लगा.

पूछने पर वे कहने लगे, ‘‘हैलमैट के बहुत फायदे हैं. जैसे अगर आप दफ्तर से देर से घर आए हैं. आप की बीवी खरीदारी पर जाने के लिए कब से आप का इंतजार करतेकरते थक गई है, तो उस का गुस्सा सातवें आसमान पर होगा ही. जैसे ही आप घर में दाखिल होंगे, बीवी की बेलनरूपी मिसाइल से केवल हैलमैट ही आप को बचा सकता है और कोई नहीं.

‘‘अगर दफ्तर जाने में देर हो जाए. घबराने की जरूरत नहीं है. आप आराम से हैलमैट लगाए हुए ही दफ्तर के अंदर जाएं. बौस पहले आप को देखेगा, फिर घड़ी को देख कर चीखेगा, मगर आप को हैलमैट के चलते कुछ सुनाई नहीं देगा.

‘‘फिर भी बौस का गुस्सा न उतरा हो, तो वह केबिन में बुलाएगा. फिर आप कहिएगा, ‘सर, हैलमैट पहने था, इसीलिए आप की बातें सुन न सका.’

‘‘अगर आप की बीवी दफ्तर जाते समय रोज कभी सब्जी, कभी राशन लाने को कहे, तो आप भी परेशान हो जाते होंगे. दिनभर दफ्तर के पकाऊ काम से थके होने के चलते खरीदारी करना बड़ा सिरदर्द होता है. इस दर्द का इलाज यह हैलमैट ही है.

‘‘बीवी जब टमाटर मंगाए, तो घर में आलू ले जाइए. मिर्च की जगह नीबू खरीदें. बीवी गुस्सा होगी. कहना कि हैलमैट पहने हुए था. सुनाई नहीं दिया होगा. दूसरे दिन से बीवी आप से सब्जी मंगाना बंद कर देगी.

‘‘अगर आप के दोस्त आप से उधार मांगने के लिए दफ्तर के बाहर खड़े हो कर आप को आवाज दें. आप देख कर भी उन्हें अनदेखा कर दें. जब कोई उलाहना दे, तो कहें कि दोस्त, हैलमैट पहने था. सुनाई नहीं दिया होगा. इस तरह हैलमैट आप के रुपयों को डूबने से बचा लेता है.

‘‘अगर आप बीवी के साथ सड़क पर घूम रहे हैं, तो अगलबगल ताकझांक करने पर बीवी का कंट्रोल होता है. इस का भी अचूक उपाय है. हैलमैट पहन कर आप मनचाही जगह ताकझांक करो, कोई आप को पकड़ नहीं पाएगा.’’

मैं गिरधारीजी की बातों से हैरान था. शायद इसीलिए कहा गया है, ‘हैलमैट में गुण बहुत हैं, सदा रखिए संग…’ Satirical Story In Hindi

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