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Women Legal Rights : औरतों का गुजाराभत्ता मांगना भीख या अधिकार ?

Women Legal Rights : भारतीय समाज में शादी को बहुत ही पवित्र बंधन माना जाता है लेकिन यह बंधन एकतरफा ही रहा है. कौंस्टिट्यूशन के लागू होने से पहले तक मर्दों के लिए शादी के माने कुछ और थे और औरतों के लिए कुछ और. शादी एक पवित्र बंधन सिर्फ औरतों के लिए था. औरत अगर शादी से संतुष्ट न हो तो उस के पास इस बंधन से आजाद होने का कोई विकल्प नहीं था लेकिन मर्द एक औरत के होते दूसरी व तीसरी शादी कर सकता था. पवित्रता के पाखंड में सिर्फ औरतें फंसती थीं, मर्द नहीं.

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के लागू होने के बाद, संवैधानिक तौर पर ही सही, औरत और मर्द बराबर हो गए. अब औरतें विवाह की पवित्रता के ढोंग को चुनौती दे सकती थीं और उस के बंधन से आजाद हो सकती थीं. हालांकि 75 साल बाद आज भी संविधान की यह आजादी सामाजिक स्तर तक नहीं पहुंची है. ग्रामीण भारत की औरतें आज भी पतियों द्वारा छोड़ी जाती हैं और उन्हें पूछने वाला कोई नहीं होता लेकिन शहरी क्षेत्रों में हालात बदल रहे हैं. पढ़ीलिखी औरतें अब शादी के पाखंड को झेलने को तैयार नहीं. यही कारण है कि भारत में हर साल तलाक के मामले बढ़ रहे हैं. आंकड़ों के अनुसार, 2023 में देशभर के फैमिली कोर्ट्स में लगभग 8.26 लाख मामलों का निबटारा हुआ था. इन में तलाक, सेपरेशन, एलिमनी, गुजाराभत्ता और बच्चे की कस्टडी जैसे मामले शामिल हैं. औसतन हर दिन लगभग 2,265 मामले निबटाए गए. यह भी ध्यान देने योग्य है कि 2023 के अंत तक फैमिली कोर्ट्स में लगभग 11.5 लाख मामले पैंडिंग थे.

पुरुषवादी मानसिकता

तलाक के बढ़ते मामलों के बीच कुछ ऐसे मामले भी आते रहते हैं जो कोर्ट के फैसले पर सोचने को मजबूर करते हैं. तलाक के केसेज में कोर्ट के कई मामले ऐतिहासिक बन जाते हैं तो कई मामलों में जजों की पुरुषवादी मानसिकता उजागर हो जाती है. सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक तलाक के मामले में फैसला सुनाया, जिस में वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान और सहायक अधिवक्ता प्रभजीत जौहर ने पति की ओर से दलीलें पेश की थीं. इस मामले में पत्नी ने अपने पति से 12 करोड़ रुपए और मुंबई में एक फ्लैट की मांग की थी. कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद तलाक को मंजूरी दी और पति को निर्देश दिया कि वह अपनी पूर्व पत्नी को मुंबई के ‘कल्पतरु’ हाउसिंग कौम्प्लैक्स में एक फ्लैट सौंपे.

माधवी दीवान ने कोर्ट में तर्क दिया कि पत्नी की मांगें नाजायज और कानूनी अधिकारों से परे हैं, क्योंकि वह पढ़ीलिखी और काम करने में सक्षम है. कोर्ट ने पति की इनकम और प्रौपर्टी की जांच की और माना कि पत्नी ससुर की संपत्ति पर अधिकार नहीं जता सकती. आखिरकार कोर्ट ने पत्नी को 2 विकल्प दिए- या तो बिना किसी विवाद के फ्लैट स्वीकार करे, या 4 करोड़ रुपए की एकमुश्त राशि ले. पत्नी ने फ्लैट चुनने का फैसला किया. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13 और धारा 25 (स्थायी गुजाराभत्ता और रखरखाव) पर आधारित है. इस धारा के तहत क्रूरता, परित्याग, व्यभिचार आदि को आधार बना कर तलाक की मांग की जा सकती है. इस मामले में कोर्ट ने दोनों पक्षों की सहमति और वैवाहिक रिश्ते के टूटने की स्थिति (इर्रिवर्सिवल ब्रेकडाउन औफ मैरिज) को आधार बनाया.

हालांकि, विशिष्ट आधार (जैसे क्रूरता या परित्याग) का उल्लेख सार्वजनिक जानकारी में नहीं होने के कारण सहमति से तलाक को मंजूरी दी गई, जो धारा 13(1)(आई-बी) या धारा 13-बी (पारस्परिक सहमति से तलाक) के तहत नियम है.

गुजाराभत्ता निष्पक्ष व उचित हो

कोर्ट ने पत्नी की गुजाराभत्ता और संपत्ति की मांग को धारा 25 के तहत जांचा, जो तलाक के बाद जीवनसाथी को वित्तीय सहायता प्रदान करने की व्यवस्था करता है. इस धारा के तहत, कोर्ट को यह सुनिश्चित करना होता है कि गुजाराभत्ता निष्पक्ष और उचित हो, जिस में दोनों पक्षों की वित्तीय स्थिति, जीवनशैली और आत्मनिर्भरता की क्षमता को ध्यान में रखा जाता है. मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई और जस्टिस के वी विश्वनाथन की पीठ ने औरतों को सलाह देते हुए कहा कि ‘‘पत्नी को गरिमा के साथ जीने के लिए स्वयं कमाना चाहिए. आधुनिक युग में, विशेषरूप से पढ़ीलिखी और सक्षम महिलाओं को ‘भीख’ (अत्यधिक गुजाराभत्ता) पर निर्भर नहीं रहना चाहिए.’’

इस मामले पर कोर्ट ने बेशक निष्पक्षतापूर्वक फैसला सुनाया लेकिन फैसले के बाद जजों की उपरोक्त टिप्पणी से उन की मानसिकता भी स्पष्ट जाहिर हो गई. गुजाराभत्ता हासिल करना भीख कैसे है? अगर संविधान औरतों को गुजाराभत्ता हासिल करने को उन का अधिकार समझता है तो कोई जज औरतों के इस संवैधानिक अधिकार को ‘भीख’ की संज्ञा कैसे दे सकता है? क्या यह संविधान का मजाक नहीं है? इस में दोराय नहीं कि कई औरतें लालच में ज्यादा गुजाराभत्ता की मांग करती हैं लेकिन यह तय करना तो कोर्ट का काम है और कोर्ट ने इस मामले में औरत को उस का हक दिलवाया भी है. फिर कोर्ट को इस तरह की अनर्गल टिप्पणी करने की क्या तुक है? कोर्ट की यह टिप्पणी संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध ही नहीं बल्कि तलाक के लिए कचहरी के चक्कर काट रही तमाम औरतों के सम्मान के खिलाफ भी है. Women Legal Rights

Middle Class Struggles : बिना क्लास का मिडिल क्लास

Middle Class Struggles : मिडिल क्लास, समाज का सब से जाहिल और नकारा वर्ग. इस की जरूरत न समाज को होती है और न ही सरकार को. सही भी है, जब देखो तब महंगाई का रोना रोने चले आते हो. अरे भाई, पैट्रोल और डीजल सैकड़ा पार कर गया तो क्या? इनकम टैक्स में छूट नहीं मिली तो क्या? छठा वेतन आयोग लागू नहीं हुआ तो क्या? पुरानी पैंशन बहाल नहीं हुई तो क्या? प्याज और टमाटर के स्वाद आसमान छू रहे हैं तो क्या? जब बंदर, मेरा मतलब हमारे पूर्वज, अदरक का स्वाद नहीं जान पाए तो तुम उस अदरक का स्वाद जानने के पीछे क्यों पड़े हो. जेब में ऊंट के मुंह में जीरा टाइप पूंजी लिए टहलते रहते हो और अपने अधिकारों के लिए दरियाई घोड़े के मुंह की तरह खोले चीखतेचिल्लाते रहते हो.

अब तुम ही बताओ, सरकार तुम्हारी क्यों सुने. सच कहूं तो तुम्हारी तो खुद तुम्हारे घर वाले भी नहीं सुनते. महंगे होटल में जाने की तुम्हारी औकात नहीं और गलती से किसी तरह जी कड़ा कर के तुम चले भी गए तो सब्जी का नाम पढ़ने से पहले उस के दाम पढ़ते हो. तुम्हारी भूख भी होटल के मेनू कार्ड में सुनहरे अक्षरों में लिखे रेट्स पर डिपैंड करती है. तुम्हारी आंखें तेजी से मेनू कार्ड में स्वर्ण अक्षरों में लिखी सब से सस्ती सब्जी, रोटी और दाल को ढूंढ़ने में लग जाती हैं. सच कहूं तो वह फूड आइटम नहीं बल्कि अपनी औकात को ढूंढ़ रहा होता है. अगर गलती से घर वालों ने नान और पनीर की सब्जी और्डर करने का आग्रह कर दिया तो वह यह कह कर, यहां का डोसा और इडली सांभर बहुत मशहूर है, टालने का प्रयास करता है क्योंकि नान और पनीर की सब्जी का दाम पढ़ कर ही उस की भूख मर जाती है.

जहां कोल्डड्रिंक भी खास रिश्तेदार के आगमन पर आती है. जिस वर्ग में टूथब्रश दांत घिसने से शुरू हो कर कुकर के ढक्कन को साफ करने व पाजामे में नाड़ा डालने तक की यात्रा कर लेता है उस वर्ग से आप क्या ही उम्मीद करोगे. बताओ, तुम खुद ही बताओ. गिनती के चार प्रतिशत हो. मुट्ठीभर लोग और उम्मीदें बड़ीबड़ी. बताओ, क्यों करे सरकार तुम्हारी चिंता, तुम करते ही क्या हो उस के लिए? कोरोना काल में बिना काम के अपने घर में काम करने वाले लोगों को तनख्वाह दे दी तो क्या? एक दिन की तनख्वाह महामारी के नाम पर दे दी तो क्या? मंदिर और धर्मकर्म के नाम पर चंदा दे दिया तो क्या? तुम अपनेआप की औरों से बराबरी करने लगे. टीवी के सामने सोफे पर बैठेबैठे टीकाटिप्पणी करने के अलावा आज तक किया ही क्या है तुम ने?

सचसच बताओ तुम ने इस समाज के लिए आज तक किया क्या है? जब देखो हर महीने बिजली का बिल जमा करने खड़े हो जाते हो, साल पूरा होने तक इनकम टैक्स जमा करने के लिए जी हलकान करने लगते हो. कभी म्यूचुअल फंड तो कभी सीजन सेल तो कभी पीएफ के लिए जोड़तोड़ करने लगते हो. पोलियो ड्रौप पिलाने तुम दरदर भटको तो कभी जनगणना के लिए तुम द्वारेद्वारे जाओ, कभी चुनाव में ड्यूटी तो कभी मतगणना में. नैतिकता का भी सारा ठेका तुम ही ने ले रखा है. वह चार लोग जीवनभर दिखेंगे नहीं पर तुम उन चार लोगों से जीवनभर डरते रहोगे. जरा सी इज्जत की खातिर पूरे समाज में शरमाए-शरमाए फिरोगे, गंगाजी में डुबकी मार लोगे या लटक जाओगे पर मदद के लिए हाथ न फैला पाओगे. एक अच्छे भविष्य के इंतजार में स्वाति की तरह नक्षत्र से बरसने वाले पानी की बूंद के लिए जीवनभर मुंह खोले आसमान की तरफ ताकते रहोगे पर तुम्हारा होनाजाना कुछ भी नहीं है. जिंदगीभर टिटहरी की तरह दोनों टांग ऊपर किए आसमान को रोकने का भ्रम पाले जीते रहोगे. Middle Class Struggles

Romantic Story in Hindi : गजरा – एक गजरे ने कैसे बना दिया अमित की जिंदगी को खुशनुमा ?

Romantic Story in Hindi : दफ्तर से छुट्टी होते ही अमित बाहर निकला. पर उसे घर जाने की जल्दी नहीं थी, क्योंकि घर का कसैला स्वाद हमेशा उस के मन को बेमजा करता रहता था.

अमित की घरेलू जिंदगी सुखद नहीं थी. बीवी बातबात पर लड़ती रहती थी. उसे लगता था कि जैसे वह लड़ने का बहाना ढूंढ़ती रहती है, इसीलिए वह देर रात को घर पहुंचता, जैसेतैसे खाना खाता और किसी अनजान की तरह अपने बिस्तर पर जा कर सो जाता.

वैसे, अमित की बीवी देखने में बेहद मासूम लगती थी और उस की इसी मासूमियत पर रीझ कर उस ने शादी के लिए हामी भरी थी. पर उसे क्या पता था कि उस की जबान की धार कैंची से भी ज्यादा तेज होगी.

केवल जबान की बात होती तो वह जैसेतैसे निभा भी लेता, पर वह शक्की भी थी. उस की इन्हीं दोनों आदतों से तंग हो कर अमित अब ज्यादा से ज्यादा समय घर से दूर रहना चाहता था.

सड़क पर चलते हुए अमित सोच रहा था, ‘आज तो यहां कोई भी दोस्त नहीं मिला, यह शाम कैसे कटेगी? अकेले घूमने से तो अकेलापन और भी बढ़ जाता है.’

धीरेधीरे चलता हुआ अमित चौराहे के एक ओर बने बैंच पर बैठ गया और हाथ में पकड़े अखबार को उलटपलट कर देखने लगा, तभी उस के कानों में आवाज आई. ‘‘गजरा लोगे बाबूजी. केवल 10 रुपए का एक है.’’ अमित ने बगैर देखे ही इनकार में सिर हिलाया. पर उसे लगा कि गजरे वाली हटी नहीं है.

अमित ने मुंह फेर कर देखा. एक लड़की हाथ में 8-10 गजरे लिए खड़ी थी और तरस भरे लहजे में गजरा खरीदने के लिए कह रही थी.

अमित ने फिर कहा, ‘‘नहीं चाहिए. और गजरा किस के लिए लूं?’’

लड़की को कुछ उम्मीद बंधी. वह बोली, ‘‘किसी के लिए भी सही, एक ले लो बाबूजी. अभी तक एक भी नहीं बिका है. आप के हाथ से ही बोहनी होगी.’’

अमित ने गजरे और गजरे वाली को ध्यान से देखा. मैलीकुचैली मासूम सी लड़की खड़ी थी, पर उस की आंखें चमकीली थीं.

‘‘लाओ, एक दे दो,’’ अमित ने गजरों की ओर देखते हुए कहा. लड़की ने एक गजरा अमित के आगे बढ़ाया और उस ने जेब से 20 रुपए का नोट निकाल कर उसे दे दिया.

‘‘खुले पैसे तो नहीं हैं. यह पहली ही बिक्री है.’’

अमित ने एक पल रुक कर उस से कहा, ‘‘लाओ, एक और गजरा दे दो. 20 रुपए पूरे हो जाएंगे.’’

लड़की ने खुश हो कर एक और गजरा उसे दे दिया.

जब वह जाने लगी, तो अमित ने कहा, ‘‘जरा ठहरो, मैं 2 गजरों का क्या करूंगा? एक तुम ले लो. अपने बालों में लगा लेना,’’ अमित ने धीरे से मुसकरा कर गजरा उस की ओर बढ़ाया.

लड़की का चेहरा शर्म से लाल हो उठा. अमित को उस की आंखें बहुत काली और पलकें बहुत लंबी लगीं. तभी वह संभला और मुसकरा कर बोला, ‘‘लो, रख लो. मैं ने तो यों ही कहा था. अगर बालों में नहीं लगाना, तो किसी को बेच देना या फुटकर पैसे मिल जाएं, तो 10 रुपए वापस कर जाना.’’

लड़की ने उस गजरे को ले लिया और धीरेधीरे कदम बढ़ाते हुए वहां से चली गई. अमित कुछ देर वहीं बैठा रहा, फिर उठ कर इधरउधर घूमता रहा. जब अकेले दिल नहीं लगा, तो घर की ओर चल दिया.

जब वह घर पहुंचा, तो देखा कि बीवी पतीले में जोरजोर से कलछी घुमा रही थी.

अमित चुपचाप अपने कमरे में चला गया. कपड़े उतारते समय उसे गजरे का खयाल आया, तो उस ने सोचा कि जेब में ही पड़ा रहने दे. पर नहीं, बीवी ने देख लिया तो सोचेगी कि पता नहीं किसे देने के लिए खरीदा है. उस ने सोचा कि क्यों न जेब से निकाल कर कहीं और रख दिया जाए.

अमित के कदमों की आहट सुनते ही बीवी उठ खड़ी हुई थी. वह शाम से ही गुस्से से भरी बैठी थी कि आज तो इस का फैसला हो कर ही रहेगा कि वह क्यों देर से घर आता है. क्या इसी तरह जीने के लिए वह उसे ब्याह कर लाया है.

जब वह रसोई से बाहर आई, तो अमित के हाथ में गजरा देख कर एक पल के लिए ठिठक कर खड़ी हो गई.

हड़बड़ी में अमित गजरे वाला हाथ आगे बढ़ा कर बोला, ‘‘यह गजरा… यों ही ले आया हूं.’’

बीवी ने आगे बढ़ कर गजरा ले लिया, उसे सूंघा और फिर आईने के सामने खड़ी हो कर अपने जूड़े पर बांधने लगी. अमित सबकुछ अचरज भरी नजरों से देखता रहा.

तभी बीवी ने कहा, ‘‘खूब महकता है. सारा कमरा खुशबू से भर गया है. ताजा कलियों का बना लगता है.’’

‘‘हां, बिलकुल ताजा कलियों का है. तभी तो सोचा कि लेता चलूं.’’

कई दिनों के बाद उस दिन अमित ने गरमगरम भोजन और बीवी की ठंडी बातों का स्वाद चखा. दूसरे दिन वह शाम को छुट्टी होने पर दफ्तर से निकला, तो उस के साथ एक दोस्त भी था. दफ्तर में काम करते समय अमित ने सोचा था कि आज सीधे घर चला जाएगा, पर दोस्त के मिलने पर घर जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता था.

दोनों दोस्तों ने पहले एक रैस्टोरैंट में चाय पी, फिर वे बाजार में घूमते रहे. आखिर में वे समुद्र के किनारे जा बैठे. शाम को सूरज के डूबने की लाली से सागर में कई रंग दिख रहे थे.

अमित का ध्यान टूटा. वही कल वाली लड़की उस के सामने खड़ी गजरा लेने के लिए कह रही थी. अमित ने लड़की से गजरा ले लिया.

दोस्त ने कुछ हैरान हो कर कहा, ‘‘लगता है, भाभी आजकल खुश हैं. खूब गजरे खरीद रहे हो.’’

अमित मुसकराया, ‘‘बस यों ही खरीद लिया है. अब चलें, काफी देर हो गई है.’’

अमित घर पहुंचा, तो उस की बीवी जैसे उस के ही इंतजार में बैठी थी. वह बोली, ‘‘आज तो बड़ी देर कर दी आप ने. सोच रही थी, जरा बाजार घूमने चलेंगे. आते हुए शीला के घर भी हो आएंगे.’’

अमित ने बगैर कुछ बोले ही जेब से गजरा निकाल कर उस की ओर बढ़ाया. बीवी ने बड़े चाव से गजरा लिया और सूंघा. फिर आईने के सामने खड़ी हो कर उसे जूड़े पर बांधने लगी.

अमित ने कपड़े उतारे, तो बीवी ने कपड़े ले कर सलीके से खूंटी पर टांग दिए. फिर तौलिया और पाजामा देते हुए वह बोली, ‘‘हाथमुंह धो लो. मैं रोटी बनाती हूं, गरमगरम खा लो, फिर बाजार चलेंगे.’’

अमित समझ नहीं पा रहा था कि बीवी में यह बदलाव कैसे आ गया. गजरा तो मामूली सी चीज है. कोई और ही बात होगी. दिन बीतने लगे. अब अमित शाम को जल्दी घर चला आता. बीवी उसे देख कर खुश होती. जिंदगी ने एक नया रुख ले लिया था. अमित को लग रहा था कि बीवी में हर रोज बदलाव आ रहा है. उसे अपने में भी कुछ बदलाव होता महसूस हो रहा था.

अमित दफ्तर से घर आते समय एक दिन भी बीवी के लिए गजरा लेना नहीं भूला था. अब तो यह उस की आदत ही बन गई थी. वैसे तो गजरे वाली और भी लड़कियां वहां होती थीं, पर अमित हमेशा उसी लड़की से गजरा खरीदता, जिस ने उसे पहले दिन गजरा दिया था.

एक दिन अमित चौक में बैठा सामने की इमारत को देख रहा था कि गजरे वाली लड़की आई. अमित ने रोज की तरह उस के हाथ से गजरा ले लिया. पैसे ले कर वह लड़की वहीं खड़ी रही.

अमित ने देखा, उस के चेहरे पर संकोच था, जैसे वह कुछ कहना चाहती है.

अमित ने उस की झिझक दूर करने के लिए पूछा, ‘‘कितने बिक गए अब तक?’’

‘‘4 बिक गए हैं. अभीअभी आई हूं. पर बाबूजी, आप के हाथ से बोहनी होने पर देखतेदेखते ही बिक जाते हैं.’’

‘‘फिर तो सब से पहले मुझे ही बेचा करो,’’ अमित ने कहा.

‘‘कभीकभी तो आप बहुत देर से आते हैं,’’ लड़की शिकायती लहजे में बोली.

अमित कुछ देर तक चुप रहा, फिर बोला, ‘‘कहां रहती हो?’’

लड़की ने बताया कि वह अपनी अंधी दादी के साथ एक झोंपड़ी में रहती है. झोंपड़ी के सामने 2 चमेली के पौधे हैं, जिन के फूलों से वह उस के लिए खास गजरा बनाती है.

‘‘अच्छा,’’ अमित बोला.

लड़की का चेहरा लाज से लाल हो गया. वह एक पल को चुप रही, फिर बोली, ‘‘तुम रोज गजरा खरीदते हो, इस का करते क्या हो?’’

अमित मुसकराया. फिर कुछ कहतेकहते वह चुप हो गया.

आखिर लड़की ने कहा, ‘‘अच्छा, मैं जाती हूं.’’ और अमित उसे तेज कदमों से जाते हुए देखता रहा.

अब अमित की अधिकतर शामें घर में ही बीतने लगी थीं. दोस्त शिकायत करते कि अब वह बहुत कम मिलता है, पर वह खुश भी था कि उस की घरेलू जिंदगी सुखद बन गई थी.

एक दिन अमित की बीवी ने उस के साथ सिनेमा देखने का मन बनाया. वह दोपहर को उस के दफ्तर पहुंची और दोनों सिनेमा देखने चल पड़े. सिनेमा से निकलने पर बीवी ने कहा, ‘‘चलो, आज सागर के किनारे चलते हैं. एक अरसा बीत गया इधर आए हुए.’’

वहां घूमते हुए अमित को गजरे वाली लड़की दिखाई दी. वह उस की तरफ ही आ रही थी. उस के हाथ में एक ही गजरा था, जो कलियों के बजाय फूलों का बना हुआ था. लड़की के पास आने पर अमित ने कहा, ‘‘मैं हमेशा इसी लड़की से गजरा लिया करता हूं, क्योंकि यह मेरे लिए खासतौर पर मोटीमोटी कलियों का गजरा बना कर लाती है.’’ बीवी ने तीखी नजरों से लड़की को देखा, तो लड़की उस के सामने आंखें न उठा सकी.

गजरा लेने के लिए अमित ने हाथ बढ़ाया, तो लड़की ने हाथ का गजरा देने के बजाय अपनी साड़ी के पल्लू में बंधा एक गजरा निकाला. मोटीमोटी कलियों का बहुत बढि़या गजरा, जैसा कि वह रोज अमित को देती थी. अमित का चेहरा खिल उठा, पर उस की बीवी तीखी नजरों से उस लड़की को देख रही थी.

अचानक अमित का ध्यान बीवी की ओर गया तो चौंका. उस ने फौरन लड़की के हाथ से गजरा ले लिया और जेब से पैसे निकाल कर उस की ओर बढ़ाए,

पर लड़की ने पैसे न लेते हुए उदास लहजे में कहा, ‘‘पिछली बार के बकाया पैसे मुझे आप को देने थे. हिसाब पूरा हो गया,’’ इतना कह कर वह एक तरफ को चली गई.

अमित की बीवी ने वहीं खड़ेखड़े जूड़े पर गजरा बांधा और अमित को दिखाते हुए पूछा, ‘‘देखो तो ठीक तरह से बंधा है न?’’

‘‘हां,’’ अमित ने पत्नी की ओर देखते हुए कहा, ‘‘आज के जूड़े में तो तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो.’’

‘‘खूबसूरत चीज हर जगह ही खूबसूरत लगती है,’’ पत्नी ने शोखी से कहा और मुसकराई, पर अमित के होंठों पर मुसकराहट न थी. Romantic Story in Hindi

Satirical Story In Hindi : झूठ बोलना सीखें – आज की दुनिया में सत्य बड़ी जानलेवा बीमारी है

Satirical Story In Hindi : आप ने रेलवेस्टेशनों, बसअड्डों, पैसेंजर गाडि़यों और महानगरों के फुटपाथों पर 10 रुपए में इंगलिश सिखाने का दावा करने वाली पुस्तकें खरीदी भले ही न हों मगर देखी जरूर होंगी. इन्हें अपनी जेब के अनुकूल, अपनी आकांक्षाओं के अनुरूप पा सर्वसाधारण अपनी जेब ढीली करने को उत्सुक नजर आता है. और इस तरह यह धंधा चलता रहता है. समय की मार खाए गरीब बेचारे कभी यों 10 रुपए में अंगरेजी तो नहीं सीख पाते किंतु अपनी तरफ से पूरी कोशिश करने की आत्मसंतुष्टि उन्हें जरूर मिल जाती है. उस पुस्तक ने उन का कितना अंगरेजी ज्ञान बढ़ाया, यह तो नहीं कहा जा सकता. यह शोध का विषय है लेकिन चिंतनमननमंथन द्वारा मानसिक वादविवाद का आयोजन करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि दरअसल इस सर्वसाधारण के जीवन को उन्नत करने के लिए अंगरेजी नहीं झूठ बोलना कैसे सीखें नामक पुस्तक की सख्त आवश्यकता है. सर्वशिक्षा अभियान के तहत अगर इसे बढ़ावा मिले तो अतिउत्तम. अनिवार्य पठनीय पुस्तक का दरजा मिले तो वाहवाह.

सत्यं वद प्रियं. वद न वद सत्यम अप्रियम, यह पाठ हिंदुस्तान की हर पाठशाल में पढ़ाया जाता रहा है और इस के सदके में हमारे जैसे झूठ बोलने में अक्षम लोगों का जमावड़ा हिंदुस्तान की धरती पर हो गया, जिन्हें आजादी के सठिया जाने के बाद भी मिडिल क्लास कह कर खूब लताड़ा गया. अब तो सब से बड़ा अडं़गा है हमारी प्रगति में, वह यही है, हमारी मिडिल क्लास सत्यवादी सोच. इसलिए शरीर पर टैटू सा गुदा मिडिल क्लास रहनसहन, मिडिल क्लास भाषा.

यह तो मानी बात है कि कोई आदमी सच बोल कर प्रिय नहीं बना रह सकता. सच तो प्रकृति से ही कड़वा होता है, एकदम करेला, ऊपर से नीम चढ़ा जैसा. करेला तो जानते हैं न, छिलका उतार भी दिया जाए तब भी कड़वाहट अंदर पोरपोर तक भरी ही रहती है.

अभी तक हम ने तो सुना नहीं कि करेले को चाशनी में डुबो कर किसी ने बारहमासी रसगुल्ला बनाने में सफलता प्राप्त की हो, किसी को यह कला आई भी हो तो खानदानी शाही दवाखाना की तरह निश्चित ही चांदनी चौक की किसी गली में चुपचाप चल रही होगी. यों पटरियों पर तो वह न बिक रही होगी. यह हमारा सच तो होली पर बनने वाली गुझिया सी साख भी नहीं जुटा पाया कि चलो, सालाना जलसे में ही उस का कुछ जलवा हो. मगर वहां भी बुरा न मानो होली है का वरक लपेटा जाए तब जा कर कुछ बात बने.

इधर, झूठ की दादागीरी एकदम निराली है, बासमती चावल सी उस की महक आ ह ह हा…एकएक दाना एकदम खिला हुआ ताजगी से भरपूर. सब को मजा देने वाला. सब की इज्जत बचाने वाला. झूठ की खासीयत है वह हमेशा आराम से मेजपोश की तरह बिछा रहता है, खूबसूरत परदे की तरह लटका रहता है. सब की नंगई ढकी रहती है. सो, सब को समझ लेना चाहिए कि झूठ बोलना कितना आवश्यक है.

दुनिया तो, जी, झूठ से चलती है, सामने वाले की झूठी तारीफ करिए, आराम से रहिए. हंसिए, बोलिए चैन की नींद सोइए. वरना धरती सुंघाऊ , पानी पिलाने वाले, धूल चटाने वाले, दिन में तारे दिखाने वाले, छठी का दूध याद दिलाने वाले, चारों खाने चित्त कर देने वाले सत्य की मार के लिए स्वयं भी तैयार रहिए क्योंकि सामने वाला व्यक्ति सांप काटे की तरह पहला मौका हाथ आते ही आप पर वार करने से चूकेगा नहीं. फिर चाहे वह कोईर् रामदेव हो या कोईर् बालकृष्ण.

जनाब, बात तो धार्मिक व दलीय भावनाओं की है और सच के साथ वही सब से पहले आहत होती है. अब देखिए आप अपनेआप चलते कहीं गिर पड़ते हैं ठोकर खा कर, तो न अफसोस होता है न दर्द, बस उठे और फिर चल दिए. किंतु, सत्य का कोड़ा पड़े तो पीठ पर उभार छोड़ जाता है. इसलिए जनाब जानिए और समझिए अब हम रह रहे हैं ग्लोबल विलेज में, और राजनीतिज्ञों की सफलता के पांव तले दबेदबे सांस ले रहे हैं. उन के सफल घोटालों की अनवरत दास्तान कानफोड़ू कीर्तन की तरह धाड़धाड़ बज रही है वातावरण में. यह किस का कमाल है, मिथ्या वचन ना.

जिस के आगे 10 रुपए की बांसुरी से सच की कितनी भी मीठी तान निकले, झूठ के औरकैस्ट्रा के आगे टिक नहीं पाती. इस पर भी अगर हम सत्य को पकड़ कर बैठे रहेंगे तो विलुप्त होते देर न लगेगी. सो, आवश्यक है कि हमारी संतानें, भावी पीढ़ी झूठ बोलना सीखें. यों तो यह कार्य पाठ्यक्रम में बदलाव कर के सरकार भी कर सकती है किंतु जैसे बिजली, पानी, सड़क, सुरक्षा इत्यादि के मामले में सरकार से हम सीख चुके हैं  आत्मनिर्भर रहना, वैसे ही हम इस में भी आत्मनिर्भर हो जाएं.

इसी अभियान के अंतर्गत हम ने ‘झूठ बोलना कैसे सीखें’ नामक पुस्तक बाजार में उतारी है, इस से हमारी चार पैसे की आमदनी हो जाएगी और आप झूठ बोलना बड़ी आसानी से सीख जाएंगे. हमें यह जान लेना चाहिए कि कंप्यूटर की तरह इसे पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से शामिल करना आवश्यक है लेकिन जब तक यह औपचारिक शक्ल अख्तियार करे तब तक प्राइवेट ट्यूशन से सफलता की ओर कदम बढ़ा देना चाहिए. वैसे भी यदि सभी सीख जाएंगे तो झूठ की सफलता के क्षेत्र में बड़ा कंपीटिशन हो जाएगा बिलकुल आईआईटी सा.

आज की तारीख में यह पाठ किसी पाठशाला की किसी पाठ्यपुस्तक में पढ़ाया नहीं जाता. बस, बच्चा अनुभव से फेल होहो कर इसे धीरेधीरे सीखता है. उस पर तुर्रा यह कि सच की जड़ बड़ी गहरी होती है, बेशरम के झाड़ की तरह बेतरतीब यहां से काटें तो वहां से सिर उठा लेगी. अमरबेल सी जीवन का सब रस चूस लेगी. बरसात में सड़ेगी, अकाल में सूखेगी, सर्दी में ठिठुरेगी मगर गले पड़ी रहेगी. इसलिए एक बार सच की लत पड़ जाए तो बीड़ीसिगरेटशराब की तरह इस के नशे में आदमी सबकुछ लुटा बैठता है राजा हरिश्चंद्र की तरह.

जीवन में सफलता का राज दरअसल आप की झूठ बोलने की क्षमता पर निर्भर करता है या यों कहिए कि गोलमाल करने के प्रतिबद्धता पर टिका रहता है तो कुछ अतिशयोक्ति न होगी. झूठ बोलना एक कला है जिसे कुंगफू जैसी मेहनत से आम आदमी को सीखना पड़ता है, कराटे किड की तरह रोजमर्रा के जीवन में सुबहसवेरे से देर शाम तक इस का अभ्यास करना पड़ता है तब जा कर कहीं यह आम आदमी के जीवन में उतरती है और उसे खास बनाती है. हां, राजनीतिज्ञों और पंडेपुजारियों के जीन में यह होती है वंशानुगत, पैदाइशी, कोयल की कूक सी जिसे संगीत सीखना नहीं पड़ता. वे झूठ की विरासत लिए होते हैं, पैदा होते ही नेता और पंडित बन जाते हैं.

झूठ अपनी संरचना में ही लुभावना व प्रिय लगने वाला होता है व रक्तबीज सा अपनी फसल धड़ाधड़ काटता है. एक झूठ से 100 झूठ पैदा होते देर नहीं लगती. उस की बेल अपनी गति से हौलेहौले परवान चढ़ने लगती है. जबकि सच न बढ़ता है, न घटता है. बस, उतने का उतना ही बना रहता है. सो, उस की प्रगति की संभावना भी स्थिर सी रहती है.

झूठा सहारा ही आप की जिंदगी को बेहद आसान बना देता है. आप का खड़ूस बौस आप से हंसहंस कर करने लगेगा बात. जैसे वजन कम करने के लिए कमर कसनी होती है वैसे ही झूठ बोलना सीखने के लिए तैयार होना पड़ता है. वरना आप झूठ बोल नहीं पाते. सच की इस बीमारी को शुरुआत में ही संभाल लेना चाहिए वरना सच का कैंसर बड़ा भयंकर दर्द देता है. न जीने देता है न मरने देता है. राजा हरिश्चंद्र सा डोम बना कर छोड़ता है जो अपने बेटे का भी दाह नहीं कर पाता. सो, सच से दूर रहें. सच डरने की चीज है, अपनाने की नहीं.

अब झूठ की तारीफों के पुल क्या बांधना. पूरा का पूरा तंत्र बाकायदा इस के सहारे चल रहा है. सच को खोजना पड़ता है भूसे के ढेर से सूई की तरह. समंदर में डूबे खजाने की तरह, सच अन्वेषण की चीज है, इसलिए आप कृपया इस का दैनिक सार्वजनिक उपयोग बंद करें. यह बातबात पर दन्न से उगलने वाली चीज नहीं. यह कीमती चीज है, इसे इस की कीमत मिलने पर ही उपलब्ध कराएं. बताओ भला, यह भी कोई बात हुई कि इधर घर में आया मेहमान, गले मिले नहीं, कि बोल पड़े, ‘कैसे बेढब लग रहे हो.’ आ गया पतीले में उबाल. लो, पकड़ो अपने सच का ढक्कन.

आज की तारीख में जो झूठ नहीं बोल पाता वह सफलता की सीढि़यां नहीं चढ़ पाता. झूठ के साथ बस यही बड़ी खराबी है कि यह दिल पर बोझ बन जाता है. एक सच्चा झूठ बोलने वाला वही होता है जो कैसा भी झूठ बोले मगर वह न तो उस के दिल पर बोझ बने न चेहरे पर शिकन डाले. बस, जिस दिन आप को यह तरीका आ गया, आप महान हो गए. सच तो एक पैदाइशी तत्त्व है खानापीनासोना जैसा, उस में क्या शिक्षा, क्या ज्ञान की आवश्यकता. झूठ बोलना एक फन है और सोचिए, आप कैसे फनकार हैं.

सच के बारे में ऐसी धारणा है कि वही अंतिम विजेता होता है. चलिए मान लिया. मगर अंत का क्या? रास्ते का महत्त्व नहीं. अंत तो मृत्यु भी है, फिर क्या जीवन, कुछ भी नहीं. मौत तो

एक पल में हो जानी है. सांसें तो जीवनभर चलनी हैं. सो, मंजिल से अधिक रास्ते का महत्त्व है. झूठ बोलनासीखना परमआवश्यक पाठ है. इस से अधिक इस विषय में कहना झूठ की तौहीन खास है.

अब हम आप को बताने जा रहे हैं कि हमारी झूठ बोलना सीखें नामक पुस्तक की हाईलाइट्स क्या हैं. इंगलिश स्पीकंग कोर्स की तर्र्ज पर ही हम ने अपने यहां 3 तरह के  कोर्स मय कोर्स मैटीरयल व सीडी के उपलब्ध कराएं हैं. रैगुलर व कौरेस्पौंडैस कोर्र्स दोनों की सुविधाएं हैं. रैपीडेक्स क्रैश कोर्स, नियमित रैगुलर व सस्ता शौर्टकट भी आप की जेब व हस्ती के अनुसार आप की आकंक्षाओं व इच्छाओं के अनुरूप उपलब्ध हैं.

उपलब्ध पुस्तक के की नोट्स अर्थात कुछ टिप्स यानी कि कुछ मारक तत्त्व निम्नांकित हैं. कृपया वृहद वर्णन के लिए पुस्तक खरीदें. संपूर्ण पुस्तक के लिए मनीऔर्डर करें या इंटरनैट के जरिए कैश औन डिलीवरी सुविधा का उपयोग करें.

झूठ बोलना सीखने के लिए निम्नांकित 10 नियमों का पालन करें. आप 10 दिनों में ही झूठ बोलना सीख जाएंगे, फिर आप की पौ बारह –

झूठ बोलने की शुरुआत अपने घर से करें.

घर में भी उस व्यक्ति से करें जिसे आप अपने सब से करीब पाते हैं.  यह कठिन होगा मगर सचमुच कारगर होगा.

झूठ सकुचाते हुए नहीं, धड़ल्ले से बोलें.

झूठ आंखों में आंखें डाल कर बोलें.

झूठ बोलते समय चेहरे पर पसीना न आने दें, आ जाए तो उसे रूमाल से पोंछने की गलती न करें. आप को अभ्यास की आवश्यकता होगी.

झूठ बोलने का अभ्यास सुबह के पहले घंटे से ही करें जैसे रातभर सोने के बाद कहें, ‘रात नींद ही नहीं आई’ या ‘रात को एक सपना देखा’ और फिर दिल की बात एक सपने के माध्यम से बयान करें जिसे वास्तव में आप ने देखा ही नहीं.

अपने झूठ को दैनिक दैनंदिनी में लिखें.

एक दिन में कम से कम 5 झूठ बिना आवश्यकता के बोलें, जब आप लगातार 5 झूठ बोल लें तो एक सच बोलने की छूट है. शुरुआत खाने की तारीफ से भी की जा सकती है, यह आसान है.

दफ्तर में देर से पहुंचने पर बोला, हुआ झूठ या छुट्टी के आवेदन में लिखा गया झूठ इस अभ्यास में शामिल नहीं किया जाएगा.

यदि आप का झूठ पकड़ा जाए तो न गलती मानें, न माफी मांगें. पकड़े जाने पर मुल्ला नसीरुद्दीन की पनाह में जाएं यानी कोईर् तीसरी स्थिति पैदा करें, जहां न सच टिके, न झूठ.

यों आप को झूठ बोलने का सफर दिलचस्प होता जाएगा और पाठ आसान.

याद रखिए झूठ बोलना सीखें यानी झूठ स्पीकिंग कोर्स द्वारा यह सब संभव है मात्र 3 महीनों में. पुस्तक को पढ़ते ही बस 1 महीने में आप फर्राटेदार झूठ बोलने लग जाएंगे और अपना जिंदगीभर का सत्यवचन का पाठ भूल जाएंगे. इस के बाद आप हमेशा झूठ के पक्ष में झंडा उठाए दिखाई देंगे. गरीबी रेखा से नीचे वालों के लिए कम मूल्य पर हमारा एक 15 दिनों का सस्ता व आसान कोर्स भी उपलब्ध है. जो आप की सोच बदल देगा, जीने का नजरिया बदल देगा. वह भी आज के जमाने में आप की सफलता सुनिश्चित करेगा. यह ऐसा कोर्स है जिस में बेहतरीन झूठ बोलना सिखाया जाता है जो बड़ेबड़े राजनीतिज्ञों को मात कर सकता है. बस, एक बार आजमाएं तो.

कृपया अपने बच्चों को सिखाएं, आज की दुनिया में सत्य जानलेवा बीमारी है जिस में आदमी सिर्फ दालरोटी खा सकता है, मक्खनमलाईर् का स्वाद कभी पहचान भी नहीं सकता. अगर भूले से कभी उस के आगे कोईर् रसगुल्ला पड़ जाए तो उस का हाजमा खराब हो जाता है, शौच करकर के वह बदहाल हो जाता है. तो फिर ऐसा शारीरिक सौष्ठव ले कर क्या करेंगे आप. 6 व 8 पैक्स छाती के जमाने में. क्या चुल्लूभर पानी में डूब मरेंगे. और डूबना भी चाहेंगे तो डूबेंगे कैसे. सच बोलने वाले के नसीब में पानी कहां? स्विमिंग पूल तो मिलने से रहा चार दिनों में आए टैंकर में.

आप के हिस्से में इतना जल कहां. हमारी पुस्तक इस रोग के प्रतिक्षक टीके की तरह है. ‘जिंदगी की दो बूंद’ का स्लोगन और पोलियो से छुटकारा जैसे. सो इसे अपनाएं, खुशहाली पाएं. Satirical Story In Hindi

Satirical Story In Hindi : फायदे हैलमैट पहनने के – मुसीबत में फंसने पर इज्जत भी बचाता है हैलमैट

Satirical Story In Hindi : अगर कोई आप से पूछे कि आप हैलमैट क्यों पहनते हैं? तो आप का सीधा सा जवाब होगा कि हादसे के समय सिर को बचाने के लिए हैलमैट पहनते हैं. मगर हैलमैट पहनने की केवल यही एक वजह नहीं है. इस की जानकारी मुझे अपने दोस्त गिरधारीजी से मिली.

एक दिन मैं यों ही गिरधारीजी के घर गया. वे घर पर नहीं थे. भाभीजी ने आदर से मुझे बैठाया. अभी हम चायपानी कर ही रहे थे, इतने में गिरधारीजी घर आ गए. स्कूटर बाहर खड़ा कर हैलमैट लगाए हुए ही वे अंदर चले आए. उन्होंने मुझे हैलमैट को उतार कर नमस्कार किया, यह सब मुझे बड़ा अटपटा लगा.

पूछने पर वे कहने लगे, ‘‘हैलमैट के बहुत फायदे हैं. जैसे अगर आप दफ्तर से देर से घर आए हैं. आप की बीवी खरीदारी पर जाने के लिए कब से आप का इंतजार करतेकरते थक गई है, तो उस का गुस्सा सातवें आसमान पर होगा ही. जैसे ही आप घर में दाखिल होंगे, बीवी की बेलनरूपी मिसाइल से केवल हैलमैट ही आप को बचा सकता है और कोई नहीं.

‘‘अगर दफ्तर जाने में देर हो जाए. घबराने की जरूरत नहीं है. आप आराम से हैलमैट लगाए हुए ही दफ्तर के अंदर जाएं. बौस पहले आप को देखेगा, फिर घड़ी को देख कर चीखेगा, मगर आप को हैलमैट के चलते कुछ सुनाई नहीं देगा.

‘‘फिर भी बौस का गुस्सा न उतरा हो, तो वह केबिन में बुलाएगा. फिर आप कहिएगा, ‘सर, हैलमैट पहने था, इसीलिए आप की बातें सुन न सका.’

‘‘अगर आप की बीवी दफ्तर जाते समय रोज कभी सब्जी, कभी राशन लाने को कहे, तो आप भी परेशान हो जाते होंगे. दिनभर दफ्तर के पकाऊ काम से थके होने के चलते खरीदारी करना बड़ा सिरदर्द होता है. इस दर्द का इलाज यह हैलमैट ही है.

‘‘बीवी जब टमाटर मंगाए, तो घर में आलू ले जाइए. मिर्च की जगह नीबू खरीदें. बीवी गुस्सा होगी. कहना कि हैलमैट पहने हुए था. सुनाई नहीं दिया होगा. दूसरे दिन से बीवी आप से सब्जी मंगाना बंद कर देगी.

‘‘अगर आप के दोस्त आप से उधार मांगने के लिए दफ्तर के बाहर खड़े हो कर आप को आवाज दें. आप देख कर भी उन्हें अनदेखा कर दें. जब कोई उलाहना दे, तो कहें कि दोस्त, हैलमैट पहने था. सुनाई नहीं दिया होगा. इस तरह हैलमैट आप के रुपयों को डूबने से बचा लेता है.

‘‘अगर आप बीवी के साथ सड़क पर घूम रहे हैं, तो अगलबगल ताकझांक करने पर बीवी का कंट्रोल होता है. इस का भी अचूक उपाय है. हैलमैट पहन कर आप मनचाही जगह ताकझांक करो, कोई आप को पकड़ नहीं पाएगा.’’

मैं गिरधारीजी की बातों से हैरान था. शायद इसीलिए कहा गया है, ‘हैलमैट में गुण बहुत हैं, सदा रखिए संग…’ Satirical Story In Hindi

Parental Care : क्या घाटे का सौदा है पेरैंट्स की सेवा?

Parental Care :

क्यों पढ़ें – क्या कानून पेरैंट्स की बुढ़ापे में सेवा को विशेष अधिकार मानता है और क्या सेवा करने वाली संतान को वसीयत न होने पर कुछ ज्यादा मिलता है, यह जानिए इस लेख से. कानून और सुप्रीम कोर्ट के फैसले क्या कहते हैं, पढ़ें.

‘करोगे सेवा तो मिलेगी मेवा’, यह कहावत कहने सुनने में ही अच्छी लगती है नहीं तो मांबाप की सेवा करने वाले उन की मौत के बाद हाथ मलते ही नजर आते हैं. सेवा है तो उस का मूल्य भी होना चाहिए कोरे आशीर्वाद, नैतिकता प्रशंसा और पुण्य से सेवा करने वाली संतान के नुकसान की भरपाई नहीं होती.

हर समाज में मांबाप की सेवा को पुण्य का काम बताया गया है जबकि है यह जन्म देने वालों और परवरिश करने वालों के प्रति कृतज्ञता प्रगट करना. बुढ़ापे में जब मांबाप अशक्त हो जाएं तो संतान उन का सहारा बन कर उन की सेवा करते उन्हें आरामदायक जिंदगी दें. ऐसा होता भी है कि अधिकतर संताने तनमनधन से पेरैंट्स की सेवा शुमार और देखभाल करती हैं, लेकिन इस के अपवाद भी कम नहीं.

कई संतानें बेहद क्रूर होती हैं उन्हें बूढ़े मांबाप बोझ लगने लगते हैं तो वे मांबाप को या तो घर से ही निकाल देती हैं या फिर घर के किसी कोने में पटक कर उन के साथ जानवरों सरीखा व्यवहार करने लगती हैं. लेकिन इन से बहुत ज्यादा संख्या उन संतानों की है जो लोकलाज और रिश्तेदारी सहित समाज के डर और दबाब में मांबाप की सेवा कुढ़कुढ़ कर करते हैं. 20 फीसदी संताने ही होंगी जो मांबाप की सेवा को अपना कर्तव्य समझ उन की सेवा निस्वार्थ भाव से करती होंगी.

चिंता की बात अब सामाजिक डर या लिहाज और दबाव का कम होते जाना भी है. तेजी से खुलते वृद्धाश्रम तो इस की गवाही देते ही हैं लेकिन समस्या किस हद तक और कैसे बढ़ रही है इस का खुलासा तेलंगाना सरकार का हालिया एक फैसला भी करता है. जिस में कहा गया है कि जो संताने मांबाप की देखभाल नहीं करती हैं उन की सैलरी का 10 फीसदी हिस्सा काट कर पेरैंट्स के अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया जाएगा. जाहिर है यह फैसला तेलंगाना सरकार के कर्मचारियों पर ही लागू होगा. बाकियों को इस से कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

इस फैसले से एक और अहम बात यह भी उजागर होती है कि मांबाप की सेवा में पैसा एक बड़ा फैक्टर होता है. जिस का असर अलगअलग तरीके से पड़ता दिखाई देता है. मसकन जिन मांबाप के पास खासी जायदाद और दौलत होती है उन की संतानें लालच के चलते सेवा में कोताही नहीं बरतती क्योंकि इस के लिए उन्हें अपनी जेब से पैसा नहीं खर्च करना पड़ता. दूसरे यह लालच भी काम करता है कि बस कुछ दिनों की ही तो बात है इन के बाद तो सारी जमीनजायदाद सोना और नगदी अपनी हो ही जानी है. इसलिए सेवा घाटे का नहीं बल्कि मुनाफे का सौदा है.

Parental Care (2)
सेवा का सब से बड़ा पुरस्कार आत्मसंतोष है, लेकिन यदि उस के साथ परिवार का सम्मान और न्यायपूर्ण अधिकार भी जुड़ जाएं तो सेवा करने वाली संतान को यह महसूस होता है कि उस के त्याग की कद्र हुई है.

किस के लिए है घाटे का सौदा?

घाटे का सौदा इन संतानों के लिए है जो अपना सुख, कैरियर, ग्रहस्थी और तरक्की के मौकों को दांव पर लगा कर मांबाप की सेवा करती हैं. बूढ़े मांबाप की सेवा और देखभाल कोई आसान काम नहीं है इस में बहुत कुछ खोना पड़ता है लेकिन अगर बहुत कुछ खोने के बाद पता चले कि मिला कुछ नहीं तो कोफ्त होना स्वभाविक बात है. यह कोफ्त उस वक्त कलह में तबदील हो जाती है जब सेवा करने वाली संतान को अपने ठगे जाने का अहसास होता है.

यह अहसास कितना तकलीफदेह होता है इसे कुछ उदाहरणों से समझें तो महसूस होता है कि वाकई यह ज्यादती है सेवा करने वाले को अतिरिक्त कुछ मिलना चाहिए था. क्योंकि उस ने त्याग की मिसाल कायम की थी.

विदिशा के 55 वर्षीय एक सभ्य सभ्रांत अधेड़ जगदीश अग्रवाल ( बदला हुआ नाम ) की मानें तो वह दो भाई और एक बहन हैं. भाईसाहब 18 की उम्र में ही इंदौर इंजीनियरिंग कालेज पढ़ने चले गए थे और डिग्री मिलने के तुरंत बाद ही उन्हें सैंट्रल गवर्नमैंट की नौकरी भी मिल गई तो वे मथुरा चले गए. उन की शादी बड़े धूमधाम से हुई. शादी के बाद वे होलीदीवाली विदिशा आते रहे जो धीरेधीरे कम होता गया. क्योंकि भाभी भी सैंट्रल गवर्नमैंट की एम्प्लाई थी और शादी के तीन साल बाद उन्हें पहला बच्चा भी हो गया था फिर तीन साल बाद एक बेटी भी हुई तो आना जाना खत्म सा हो गया.

वक्त यूं ही गुजरता गया, हमें उन की मजबूरी समझ आती थी इसलिए विदिशा आने कभी अनावश्यक दबाव किसी ने नहीं बनाया. नौकरी लगने के बाद दो साल वे घर पांच हजार रुपए महीने के भेजते थे जो शादी के बाद बंद हो गए थे. क्योंकि उन की जिम्मेदारियां बढ़ रही थीं इसलिए खुद बाबू जी ने उन्हें इस बाबत मना कर दिया था. इस बीच मेरी और छोटी बहन की भी शादी हो गई. बहन की शादी में उन्होंने 50 हजार रुपए बाबू जी के हाथ पर रखे थे और मेरी शादी में 25 हजार खर्च किए थे.

यहां तक और इस के बाद तक भी जायदाद को ले कर कोई खटपट नहीं हुई थी. बाबू जी गल्ले के मझौले व्यापारी थे और अपनी जिंदगी में ठीकठाक कमाई उन्होंने कर ली थी. उन की अच्छी बात यह थी कि वे जमीनें खरीदते रहते थे. शहर के बाहर 3 प्लौट भी उन्होंने खरीदे थे जिन की कीमत बढ़ती ही रही थी. इस तरह उन की मौत के वक्त तक हमारे पास कोई 2 करोड़ की जमीनें और एक पुश्तेनी मकान था. बीकौम करने के बाद मैं उन के कारोबार में हाथ बंटाने लगा था.

एक बार बाबू जी जो बाथरूम में गिरे तो स्थाई रूप से बिस्तर से लग गए. क्योंकि उन की कूल्हे की हड्डी टूट गई थी. मेरे सर तिहरा भार आ पड़ा था बाबू जी की देखभाल और इलाज के अलावा व्यापार का भी और घर का भी. बच्चे स्कूल जाने लगे थे अब तक पढ़ाई बहुत महंगी भी हो गई थी. बाबू जी की बीमारी और अशक्तता में भाई साहब दो बार ही देखने आए एक बार तब जब उन का औपरेशन हुआ था और दूसरे तब जब उन्हें हार्टअटैक आया था. दोनों बार उन्होंने फूटी कौड़ी भी नहीं दी थी न ही यह पूछा कि इलाज में खर्च कितना हो गया. लेकिन दोनों ही बार वे मेरी पीठ थपथपा कर गए कि तुम्हारी किस्मत और कर्म अच्छे हैं जो तुम्हें मांबाप की सेवा करने का मौका मिल रहा है. मैं तो सरकारी नौकरी में फंस गया. बच्चे भी नौकरों के सहारे पल रहे हैं. तब मेरा भावुक हो जाना स्वभाविक बात थी और मैं यह सोच कर खुद को तसल्ली दे लिया करता था कि उन के हिस्से की सेवा और काम भी मैं कर रहा हूं. इस में हर्ज क्या है आखिर उन की मजबूरी है.

Parental Care (3)
मातापिता अपने सुख त्याग कर बच्चों को पढ़ालिखा काबिल बनाते हैं लेकिन वृद्धावस्था में जब वे असहाय, अशक्त और लाचार हो जाते हैं तब उन्हें वृद्धाश्रम भेज देना क्या अनैतिक नहीं है?

अब से कोई 5-6 साल पहले बाबू जी की हालत लगातार गिरने लगी थी और अम्मा को भी तरहतरह की बीमारियों ने घेर लिया था. अब दोनों को ही हर कभी डाक्टर और अस्पताल की जरूरत पड़ने लगी थी जिस के चलते दुकान हर कभी बंद करना पड़ती थी या फिर मुनीम और नौकरों के भरोसे छोड़ना पड़ती थी जिस से घाटा होने लगा था. एक वक्त तो ऐसा भी आया था जब दुकान कहने को ही रह गई थी.

इन परेशानी के दिनों में पत्नी और मैं शिफ्टों में अम्मा बाबू जी की सेवा शुमार करते थे. बाबू जी के साथ तो रातरात भर जागना पड़ता था कि कब उन्हें किस चीज की जरूरत पड़ जाए और उन का डायपर ज्यादा गीला होने पर समय पर बदला जाए. तब दिलोदिमाग पर मांबाप की सेवा का ऐसा जूनून था कि समाज के लोग और रिश्तेदार मुझे कलयुग का श्रवण कुमार कहने लगे थे मैं भी अपनी तारीफ सुन कर चने के झाड़ पर चढ़ जाया करता था. लेकिन जमा पैसा खत्म हो रहा था और नया पैसा आना कम हो चला था. कई बार तो ब्याज पर पैसा उठाना पड़ा.

इस दौरान भाई साहब ने कभी मदद नहीं की यह और बात है कि लिहाज और गैरत के अलावा यहां है तो की सोच के चलते मैं ने भी नहीं मांगी जो कि मेरी गलती साबित हुई. मैं अब तक यह मानने लगा था कि यहां का जो कुछ भी है वह मेरे लिए है क्योंकि भाई साहब ने दिल्ली में बड़ा सा बंगला खरीद लिया था और इधरउधर भी वे इन्वैस्ट करते रहते थे अगर यह सोचना मेरा लालच था तो मैं उस लालच पर भी पछताता रहता हूं.

झटके पर झटके

मैं ने तो मान लिया था लेकिन उन्होंने नहीं माना था इसलिए बाबू जी के सिधारते ही उन की जायदाद का हिसाब मांगने लगे और तेरहवी के दूसरे दिन ही बराबर बंटवारे की बात चार रिश्तेदारों के सामने कर दी. सभी ने उन का समर्थन भी किया. बहन ने कुछ भी लेने से मना कर दिया था.

मैं उन के बदले तेवर देख सकते में था और अकेले में बहुत रोया. कुछ दिन में ही घर जमीनों के दो हिस्से हो गए और अपना हिस्सा बेचने वे एक ब्रोकर को भी अपाइंट कर गए. ये मेरे लिए दूसरा झटका था बेचने का जिम्मा वे मुझे भी दे सकते थे इस से शहर और समाज में मेरी बात बनी रहती पर उन्होंने मुझ पर भरोसा नहीं किया.

कुछ दिन बाद जब मैं संभला तो मैं ने रिश्तेदारी और समाज में अपना रोना रोया कि मैं तो बाबूजी की सेवा में लुट गया. दिन देखा न रात देखी, सर्दीगर्मी, बरसात की परवाह किए बगैर हम पतिपत्नी सेवा में लगे रहे. कमाई और मुनाफे के कई मौके छोड़े और अम्माबाबूजी दोनों की सारी रिश्तेदारी निभाई उस में भी पैसा खर्च हुआ. जरूरत पड़ी तो पैसा ब्याज पर उठा लिया लेकिन जमीन नहीं बिकने दी. बिस्तर से लगे बाबूजी सब देखसमझ रहे थे लेकिन उन्होंने कोई वसीयत न जाने क्यों नहीं की. अब अम्मा भी कुछ नहीं बोलती सिवाय इस के कि मुझ बुढ़िया को बीच में न डालो तुम दोनों भाई जैसा ठीक समझो करो मैं अगर भार लगने लगी होऊं तो किसी रिश्तेदार के यहां पटक दो या वृद्धाश्रम भेज दो…

अब मेरी हालत का आप क्या कोई भी अंदाजा नहीं लगा सकता कि मुझ पर क्या गुजर रही है. पैसों की कमी के चलते बच्चों को सस्ते स्कूल में पढ़ाया जबकि भाईसाहब के बच्चे महंगे स्कूलों में पढ़े. वे महल से मकान में रहते हैं कार के नीचे कभी उन्होंने पांव नहीं रखा और मेरे बच्चों ने सिर्फ खटारा होती मेरी बाइक की ही सवारी की है.

मेरी पत्नी के पास वही गहने हैं जो उसे मायके से मिले थे जबकि भाभी हर साल दीवाली पर पांच तौला सोना खरीदती थीं. मेरी पढ़ाई पर मामूली खर्च हुआ लेकिन भाईसाहब की पढ़ाई पर उस से दस गुना ज्यादा खर्च हुआ था.

क्याक्या गिनाऊं, जगदीश कहते हैं मैं तो मांबाप की सेवा कर पछता रहा हूं. मुझे पुण्य नहीं पैसा चाहिए. इस सेवा और श्रवणकुमारियत ने मेरा हक मुझ से छीन लिया. मुझे बड़ा पैसा वाला नहीं बनने दिया और यह मेरी कमजोरी या निकम्मापन कतई नहीं है.

कई बार तो जी में आता है कि बाबू जी की बीमारी और कमजोरी के दिनों में ही सारी जायदाद अपने नाम लिखवा लेता तब भाईसाहब को पता चलता जिन्हें बिना एक रात जागे, बिना बाबू जी के पैर दबाए, टट्टी भरी धोती धोए बगैर और सब से बड़ी बात बिना कोई तनाव या चिंता पाले मेरे बराबर जमीन जायदाद मिली. अब तो उन से बात करने भी मन नहीं होता इतना बैगैरत और खुदगर्ज इंसान मैं ने दुनिया में नहीं देखा.

Parental Care (1)
यदि मातापिता चाहते हैं कि उन की सेवा करने वाली संतान को कुछ विशेष मिले तो वे जीवनकाल में स्पष्ट वसीयत बना सकते हैं, इस से भविष्य में संतानों के बीच विवाद और कटुता कम हो सकती है.

सगा बड़ा भाई है कभी बहुत प्यार करता है मुझे इसलिए मुंह से बददुआ भी नहीं निकलती. ऐसी और कई मिलीजुली बातें करते जगदीश खुद को रोने से रोक नहीं पाते.

न कहने की कोई वजह नहीं कि जगदीश के साथ ज्यादती तो हुई है मुमकिन है कुछ झूठ वे बोल रहे हों और अपनी कुछ कमजोरियां ढकने अपने किए को बढ़ाचढ़ा कर बता रहे हों लेकिन मांबाप की सेवा में उन्होंने कोई कोताही नहीं बरती और काफी कुछ उन्हें छोड़ना भी पड़ा है जिस की वाजिब कीमत नहीं मिली तो नमक पड़े केंचुए की तरह वे बिलबिला रहे हैं.

एक छोटे से शहर के मध्यमवर्गीय वैश्य परिवार के इस वास्तविक किस्से का एक पेंच यह है कि जमीनजायदाद का बंटवारा पिता के रहते वक्त पर हो जाता तो यह पहाड़ नहीं टूटता जो दो भाइयों के बीच खाई खोद गया. अगर बंटवारे की बात पिता की जिंदगी में होती तो शायद जगदीश को अपनी सेवाओं का पुरस्कार या मूल्य कुछ भी कह लें मिलता. क्योंकि बिस्तर से लगे अपाहिज पिता को बड़े बेटे के मुकाबले उन की जरूरत ज्यादा थी.

क्या कहता है कानून?

ऐसे कितने जगदीश देश भर में कहांकहां नहीं तिलमिला रहे होंगे इस का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि हर दूसरे हिंदू परिवार में ऐसा होना मुमकिन है कि जो पेरैंट्स की सेवा करता है उसे तारीफ और वाहवाही तो बहुत मिलती हैं लेकिन पिता की जायदाद में से हिस्सा उतना ही मिलता है जितना कि घर से दूर रह रही उन संतानों को मिलता है. जिन्हें प्रभु तुल्य अपने मांबाप की सेवा इलाज और देखभाल का मौका ही नहीं मिला और न ही उन्होंने ऐसा मौका अपनी तरफ से पैदा करने की कोशिश की. वे तो बस अपना कमाते खाते रहे जिंदगी एन्जौय करते रहे अपनी जायदाद भी अलग बनाते रहे लेकिन पुश्तैनी जायदाद में बराबरी से लिया.

इस से खार खाई कई संतानों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया लेकिन अदालत ने कहा कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं जो सेवा करने वाली संतान को ज्यादा हिस्सा देने की बात करता हो. ऐसे मुकदमों में से सब से चर्चित है एस आर श्रीनिवास व अन्य बनाम पद्मवाथाम्मा व अन्य 2010 जो निचली अदालत से शुरू हो कर सुप्रीम कोर्ट तक गया था. इस में वादी के तर्क वही थे जो जगदीश के थे. अदालत के सामने सीधा सा सवाल यह था कि क्या मातापिता की सेवा करने वाली संतान संपत्ति में ज्यादा हिस्से की हकदार है.

कई भावनात्मक तर्कों के साथ वादी एस आर श्रीनिवास ने अदालत से यह सवाल भी किया था कि अगर कानून सेवा और त्याग को नहीं देखेगा तो भविष्य में कोई सेवा क्यों करेगा. इस पर अदालत का कहना था कि सेवा तारीफ के काबिल है लेकिन उत्तराधिकार कानून से चलता है. यदि मातापिता चाहते तो सेवा करने वाली संतान को ज्यादा हिस्सा दे सकते थे लेकिन मौत के बाद अदालत सिर्फ कानून को देखेगी.

बकौल सुप्रीम कोर्ट, सेवा कितनी भी सराहनीय क्यों न हो वह उत्तराधिकार में विशेष अधिकार नहीं बनाती. इस बिना पर एसआर श्रीनिवास का मुकदमा खारिज हो गया और सभी संतानों को बराबर हिस्सा पुश्तैनी जायदाद में से मिला. दरअसल में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में ऐसी कोई धारा या नियम ही नहीं है जो जगदीश और श्रीनिवास जैसों की सेवा और जज्बे को सलाम न करे लेकिन उसे सेवा का मूल्य दिलाने पहल करती हो.

खामी कैसे दूर हो?

बिलाशक यह कानूनी खामी है जिस पर चर्चा और बहस होना जरूरी है जिस से मांबाप की सेवा को प्रोत्साहन मिले और इतना मिले कि भाईभाई और बहनें भी आपस में पेरैंट्स की सेवा और देखभाल को ले कर लड़ें कि नहीं मैं करूंगा.. मैं करूंगा .. मैं करूंगी. एक दूसरा रास्ता वसीयत की अनिवार्यता का है कि जिस के पास भी कम ज्यादा जितनी भी संपत्ति हो वह अपने जीतेजी उस की वसीयत जरूर करे. नहीं तो संपत्ति राज्य यानी सरकार की हो जाएगी. हालांकि ऐसा कानून हो पाना मुश्किल है लेकिन नामुमकिन भी नहीं है.

संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सेवा को मूर्खता न समझें और न ही केवल लाभहानि के तराजू में तोलें.

मातापिता को चाहिए कि वे समय रहते स्पष्ट निर्णय लें.

भाईबहनों को चाहिए कि सेवा करने वाले सदस्य के त्याग को सम्मान दें.

सेवा करने वाले को चाहिए कि वह अपने आत्मसम्मान और भविष्य का भी सम्मान रखे. Parental Care

Equality in Marriage : लोकतांत्रिक होना चाहिए पतिपत्नी का रिश्ता

Equality in Marriage :

क्यों पढ़ें ? – पति को परमेश्वर मानने की धारणा तेजी से बदल रही है तो सिर्फ इसलिए नहीं कि अब अधिकतर पत्नियां भी कमाऊ हो चली हैं बल्कि इसलिए भी कि कपल्स अब खुल कर जीना चाहते हैं और इस के लिए परंपराएं तोड़ भी रहे हैं हर किसी को इस बदलाव का स्वागत करना चाहिए बजाय उस में रोड़ा बनने के जो वैवाहिक जीवन का लुत्फ छीनता है. प्रस्तुत लेख में सभी पात्र व उन से की गई चर्चा वास्तविक हैं. प्रकाशन नीतियों के तहत नाम व स्थान बदल दिए गए हैं.

पतिपत्नी के रिश्ते को ले कर अकसर बहस होती रहती है कि यह कैसा होना चाहिए नए दौर के कपल्स खासतौर से पत्नियों की नजर से देखें तो यह कम से कम भक्त और भगवान सरीखा तो बिलकुल नहीं होना चाहिए यह सैनिकों जैसा हो सकता है जिस में जिंदगी की जंग में दोनों को कंधे से कंधा मिला कर हालातों का सामना करें लेकिन यह लोकतांत्रिक हो तो बात सोने पे सुहागा वाली हो जाती है.

अभिलाष से शादी तय होने के पहले ही मैं ने मम्मीपापा को बतला दिया था कि मैं उस के पैर नहीं पडूंगी…

क्यों,

उन के इस सवाल के जवाब में मैं ने भी सवाल ही दागा था कि आप ही बताइए क्यों पडूं क्या सिर्फ इसलिए कि ऐसा सदियों से चला आ रहा रिवाज है और इसीलिए मुझे इसे मानना चाहिए. इस पर उन्हें कोई सटीक या ठोस जवाब नहीं सूझा. लेकिन जाने क्यों दोनों तनिक गंभीर से हो गए थे.

निकिता आगे बताती है, आज हमारी शादी को 4 साल पूरे होने जा रहे हैं इस दौरान कभी कोई खास झंझलाहट हम दोनों के बीच नहीं हुई. हम दोनों ही एक दूसरे का सम्मान करते हैं, प्यार करते हैं, मिलजुल कर घरगृहस्थी के फैसले लेते हैं, वीकैंड पर मुंबई से बाहर घूमनेफिरने बाहर जाते हैं मौजमस्ती करते हैं.

थोड़ा रुक कर वह कहती है, एक पत्नी होने के नाते मैं ने कभी नहीं सोचा कि मैं किसी भी मामले में अभिलाष से उन्नीस हूं. अच्छा तो यह भी है कि उस ने भी कभी किसी बात के लिए मुझे फोर्स नहीं किया और न ही वह अहम दिखाया जो बतौर संस्कार मर्दों को बचपन से ही मिल जाता है कि तुम पति हो इसलिए इसी नाते पत्नी से बेहतर हो वगैरहवगैरह. आप चाहें तो इस बारे में अभिलाष से भी चर्चा कर सकते हैं.

निकिता की बात पर उसी की मौजूदगी में जब अभिलाष से उस की प्रतिक्रिया जानना चाही तो वह बोला, ईमानदारी से बताऊं तो शादी के पहले मुझे उम्मीद थी कि आम और परंपरागत पत्नियों की तरह निकिता मेरे पैर छुएगी. क्योंकि मैं ने देखा था कि मम्मी हर कभी खासतौर से तीजत्योहारों पर पापा के पैर छूती थीं. तब मुझे लगता था कि मम्मी पापा से कमतर हैं या फिर यह जरूरी होता होगा. जबकि वे भी पापा की तरह नौकरी ही करती थीं और उन की सैलरी पापा की सैलरी के लगभग बराबर ही थी.

थोड़ा रुक कर और हंस कर वह आगे बोला, निकिता से मुझे इस पर या किसी भी बात पर कोई शिकायतशिकवा नहीं और उस से पैर पड़वाकर मैं कहां का नारायण हो जाऊंगा रहूंगा तो नर ही.

बात अकेले निकिता और अभिलाष की नहीं बल्कि एक पूरी जनरेशन की है और बात अकेले पति के पैर छूने के बेहूदे रिवाज की नहीं बल्कि उस समानता की भी है जिस के तहत नई जनरेशन के कपल्स मानते हैं कि पतिपत्नी में छोटाबड़ा कोई नहीं होता. और न ही पति होने का मतलब परमेश्वर और पत्नी होने का मतलब दासी होना होता है.

पितृसत्तात्क प्रवृति

पतिपत्नी दोनों की सहमति, समझ और आपसी प्यार व सम्मान ही इस रिश्ते को आगे बढ़ाते हैं. अब वह दौर गया जब पत्नी बेवजह ही पति से दबी रहती थी और उस की ज्यादतियां बर्दाश्त करती रहती थी. हलांकि पति के पैर पड़ने वाली पत्नियां एकदम विलुप्त नहीं हो गई हैं लेकिन वे बराबरी की बात को इस या ऐसी दूसरी मान्यताओं और परंपराओं से जोड़ कर नहीं देखतीं उन की नजर में यह एक स्वैच्छिक बात है जिस से कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन पत्नी अगर पति के सामने झुकी रहे तो ज्यादा सुरक्षित रहती है.

अब पति परमेश्वर नहीं रहा

सवाल बड़ा दिलचस्प और मौजू निकिता जैसी युवा पत्नियों के लिहाज से है कि क्या अब पति परमेश्वर है यह कांसेप्ट खत्म हो गया है अगर हां तो क्यों और इस से फर्क क्या पड़ता है.

पति के परमेश्वर न रह जाने की दास्तां महज तीन शब्दों से लिखाई है शिक्षा, जागरूकता और आत्मविश्वास जो पत्नी को पति की बराबरी से खड़ा करते हैं और इस से इस नाजुक और रोमांटिक रिश्ते में कोई कमजोरी नहीं आती है उलटे यह और मजबूत होता है. इसे पुणे की एक कंपनी में जौब कर रहे नेहा और सारांश ( आग्रह पर बदले हुए नाम व स्थान ) से समझें तो दौर हर लिहाज से बराबरी का है.

इन दोनों की पहली मुलाकात जबलपुर से पुणे जाते वक्त ट्रेन में हुई थी. दोनों को आईटी सेक्टर में काम करते पांच साल हो चुके थे और दोनों अच्छे लाइफ पार्टनर की तलाश में थे.

14 घंटे की उस जर्नी में ही हमें समझ आ गया था कि हम एकदूसरे के लिए फिट हैं, खासतौर से वैचारिक और बौद्धिक स्तर पर. बस फिर क्या था हर वीकैंड पर हम मिलने लगे और साल भर में ही घर वालों को अपने फैसले से अवगत करा दिया. पेरैंट्स तो तैयार ही बैठे थे, नेहा बताती है कि वे सारांश के मम्मीपापा से मिले और चट मंगनी पट ब्याह हो गया. सारांश का जैन समुदाय और मेरा कायस्थ परिवार से होना तनिक भी आड़े नहीं आया.

मुझे नेहा के वे तेवर पसंद आए थे जिस के तहत लड़कियां लड़कों से कमतर नहीं, उन्हें अपने आप को साबित करने का मौका ही अब मिलना शुरू हुआ है. पुरुष ने हमेशा से ही उसे दबा कर रखा है, सारांश ने बताया, मैं हालांकि कोई फैमिनिस्ट नहीं हूं लेकिन अपने ही परिवार में मैं ने देखा था कि महिलाओं का अस्तित्व और पहचान दोनों ही बहुत सिमटे हुए हैं. उन की सहमति या असहमति के कोई माने नहीं होते. मैं एक अमीर व्यापारी परिवार से हूं जहां व्यापार तो व्यापार घर में कौन सी सब्जी बनेगी यह फैसले भी मर्द लेते हैं. महिलाओं के पास जो चीजें इफरात से है वे हैं गहने और साड़ियां जिन के भार से वे जिंदगी भर दबी रहती हैं.

जब मैं इंजीनियरिंग कालेज पहुंचा तो मेरे सोचने का तरीका काफी कुछ बदला जिस में नावेल्स और मैगजींस का बड़ा हाथ रहा. प्रेमचंद जी की कहानियों और उपन्यासों ने मुझ पर गहरा असर डाला लेकिन मन्नू भंडारी की कहानी यही सच है ने मेरे सोचने का तरीका ही बदल दिया. इस कहानी की नायिका अपने स्वाभिमान और आत्मसम्मान से समझौता करने के बजाय रिश्ता तोड़ लेना ज्यादा बेहतर समझती है.

सारांश मुद्दे की बात पर आते कहता है, मुमकिन है कि घर में भी मैं ने ऐसा ही कुछ देखा हो लेकिन इस का एकदम उल्टा, जहां महिला समझौता कर लेने मजबूर रहती है उस का स्वाभिमान कोई माने नहीं रखता. नेहा की बातों से मुझे लगा कि यह उसी ख्याल की है जो मुझे मेरे परिवार को साथ ले कर तो चलेगी. लेकिन यही सच है की नायिका की तरह मर्दों की हुकुमत के सामने झुकेगी नहीं. वह कहानी सालों पुरानी है लेकिन आज भी प्रासंगिक है.

इन दोनों कपल्स की बातें जाहिर करती हैं कि अब पति परमेश्वर नहीं रहा क्योंकि पत्नियां आर्थिक रूप से उस पर निर्भर नहीं रहीं और उन की पहली कोशिश रिश्ता निभाने की ही होती है, पर एक सीमा तक इस के बाद वे भी बजाय घुटन में रहने के तलाक ले कर सुकून की जिंदगी जीना पसंद करती हैं.

पत्नियां कब लेती हैं तलाक का निर्णय ?

लेकिन अब तलाक के बाद के जोखिम कम ही पत्नियां देखती हैं, जबलपुर हाईकोर्ट के युवा लेकिन अनुभवी अधिवक्ता सौरभ भूषण बताते हैं, मेरा अनुभव रहा है कि तलाक के अधिकतर मामलों में पति अहंकारी ठसियल और पितृसत्तात्मक मानसिकता वाला था. जिस की जिंदगी और घर दोनों में पत्नी की भूमिका प्रजा जैसी थी और खुद की उस राजा जैसी जिस का हुकुम ही कानून होता है. मैं यह नहीं कहता की सभी पत्नियां दूध की धुली होती हैं लेकिन तलाक का फैसला वे तभी लेती हैं जब रिश्ता उन के लिए एक ऐसा बोझ बन जाता है जिसे ढोना उन के बस की बात नहीं रह जाती.

बकौल सौरभ पतिपत्नी के रिश्ते को बजाय धर्म, संस्कृति और परंपराओं के ढांचे के संविधान के नजरिए से देखा समझा और जिया जाना चाहिए नहीं तो उस के टूटने और दरकने की आशंका और खतरे तो बने रहेंगे. पतियों को अहम और भ्रम दोनों छोड़ना पड़ेंगे क्योंकि समाज अभी दे न दे लेकिन कानून पतिपत्नी दोनों को बराबरी का दर्जा देता है.

समाज में भी तलाकशुदा पुरुषों की पूछ या डिमांड पहले सरीखी नहीं रह गई है कि शादी करने वालियों की लाइन लग जाती हो अब तलाक की त्रासदी पुरुषों को भी बराबरी से भुगतना पड़ती है. इस मामले में मैं सरिता मैगजीन की तारीफ करना जरूरी समझता हूं जिस की रचनाएं बेहद संतुलित ढंग से समाज और परिवार का सच पेश करते सही और सटीक रास्ता भी दिखाती हैं.

महिलाओं पर बनीं हिंदी फिल्में

पतिपत्नी के बदलते रिश्ते को हिंदी फिल्मों से भी समझा जा सकता है. 70 और एक हद तक 80 के दशक की कुछ फिल्मों में पत्नी को पति के पैर छूने के अलावा हर तरह की ज्यादती सहन करने वाली दिखाया गया है. बाद की फिल्मों में यह रिश्ता वास्तविक जिंदगी की तरह दोस्ताना होता गया 2017 में प्रदर्शित विद्या बालन और मानव कौल अभिनीत फिल्म तुम्हारी सुलू और 2020 में प्रदर्शित तापसी पन्नू और पवेल गुलाटी अभिनीत फिल्म थप्पड़ इस के बेहतर उदाहरण हैं.

थप्पड़ का मैसेज साफ था कि आज की पत्नी भरी पार्टी में पति का थप्पड़ बर्दाश्त नहीं कर सकती यह अपमान, हिंसा और क्रूरता तीनों हैं. लेकिन सच यह कि पति का पितृसत्तात्क प्रवृति का होने उस का कम पढ़ालिखा और गंवार होना जरूरी नहीं. वह पति एक शिक्षित सभ्य समाज का शहरी भी हो सकता है जो पौराणिक मानसिकता के चलते यह भूल जाता है कि गैरतमंद पत्नी थप्पड़ के साथ रहने और जीने तैयार नहीं.
उदाहरण फिल्मों का ही लें तो नायिका स्वामी और नाथ जैसे तो दूर एजी और सुनते हो जैसे परंपरागत संबोधनों से समाज में भी बाहर आ गई है. इस पर एक दिलचस्प किस्सा सुनाते भोपाल की सुरभि बताती है जब भी मैं अपनी पति आदित्य को नाम ले कर बुलाती हूं मम्मीपापा दोनों टोकते हैं कि पति का नाम मत लिया करो और उन से सम्मान से पेश आया करो ये क्या है कि आदित्य आएगा, आदित्य जाएगा, आदित्य खाएगा, आदित्य सोएगा.

न जाने ये लोग किस जमाने में जी रहे हैं वह खीझ कर बताती है जबकि आदित्य को इस से कोई शिकायत या परेशानी नहीं. हम लोग पतिपत्नी होने के साथसाथ अच्छे दोस्त भी हैं लेकिन जाने क्यों घरो में पति को हौवा बना कर रखा जाता है उसे तो कोई नहीं कहता कि सुरभि सोएंगी, सुरभि आएंगी, जाएंगी और सुरभि खाएंगी बोला करो. सम्मान का उपदेश सिर्फ पत्नियों को ही क्यों उन से ही यह अपेक्षा क्यों पतियों से क्यों नहीं.

बात सही है कि पुरानी पीढ़ी अपने दायरे में जी रही है जबकि नए दौर के कपल्स उन्मुक्त और दोस्ताना अंदाज में जीना पसंद कर रहे हैं. उन की नजर में जिम्मेदारियां शेयर की जाना रिश्ते को बेहतर बनाता है, प्यार के अनौपचारिक सम्मान को भी यह जनरेशन जरूरी समझती है.
आजादी के माने इन के लिए बेलगाम हो जाना नहीं है बल्कि पुराने को तोड़ कर नए रिवाज कायम करना है जिस में हुक्म की जगह डायलाग हों, एकदूसरे के लिए बराबरी का स्पेस हो, जरूरत के मुताबिक प्राइवेसी भी हो, असहमति को जिद न समझा और माना जाता हो और अहम बात संवेधानिक बराबरी जिंदगी में भी हो. Equality in Marriage

Buying Gold and Silver in India : सरकार पर घटता भरोसा

Buying Gold and Silver in India : डौलर के मुकाबले रूपए की गिरती कीमत और नोटबंदी की फैलती रहती अफवाहों के बीच जनता अपने ही देश की सरकार की नीयत पर भरोसा नहीं कर पा रही है. इस के चलते जनता सोने और चांदी की खरीदारी कर रही है.

सोना और चांदी की कीमतों में उछाल के कारणों को लगातार खोजा जा रहा है. चांदी की बात करें तो उस का इंड्रस्ट्रियल प्रयोग बढ़ा है. जिस से चांदी की कीमत में उछाल आया है. दूसरी तरफ सोने की चमक भी लगातार बढ़ती जा रही है. इंड्रस्ट्रियल प्रयोग से इतर सोना और चांदी पर लोग रूपए से अधिक भरोसा कर रहे हैं. जिस वजह से उस में सब से अधिक निवेश किया जा रहा है.

बढ़ती कीमतों के बीच लोग यह सोच रहे हैं कि बैकों में रखे पैसे पर मिलने वाले ब्याज से अधिक पैसा सोनाचांदी की खरीदारी में बढ़ जाएगा. सोना और चांदी की खरीदारी में गहनों के मुकाबले सिक्कों की खरीदारी अधिक हो रही है. 20 जनवरी , 2026 को लखनऊ में 10 ग्राम सोने का सिक्का 1 लाख 50 हजार के करीब जीएसटी सहित था. इस के मुकाबले चांदी का सिक्का 3500 रुपए जीएसटी के साथ था.

सोने में एक ग्राम, 2 ग्राम, 5 ग्राम, 8 ग्राम और 10 ग्राम तक के सिक्के मिल जाते हैं. इस में सोने के मूल्य के अलावा 3 फीसदी जीएसटी और 5 फीसदी मेकिंग चार्ज देना पड़ता है. वहीं चांदी में 10 ग्राम से 50 ग्राम तक सिक्के के रूप में मिल जाते हैं. सोने में सिक्के और बिस्कुट दो आकार के मिल जाते हैं. चांदी में 10 ग्राम तक के सिक्के होते हैं. उस के उपर वजन के बिस्कुट यानि सिल्ली मिल जाती है.

Buying Gold and Silver in India (1)
अलगअलग राजनीतिक पार्टियों के समर्थक उन्हें वोट तो दे रहे हैं लेकिन उनपर भरोसा नहीं जता पा रहे हैं, न ही उनसे सोनेचांदी के घटतेबढ़ते दामों पर कोई सवाल ही पूछ रहे हैं.

सोने और चांदी के बाजार को समझने वाले विनोद माहेश्वरी कहते हैं ‘सोने और चांदी में आम लोग अब तेजी से इंवेस्टमैंट करने लगे हैं. डोनाल्ड ट्रंप ने जब से टैरिफ की टेंशन दी है. करेंसी मार्केट में मची उथलपुथल से बाजार अस्थिर हो गया है. जिस के चलते निवेशक सुरक्षित निवेश ठिकाने के तौर पर सोनाचांदी की तरफ भागते हुए नजर आ रहे हैं. जिस से इन की डिमांड और कीमत दोनों में इजाफा हुआ है. इस के अलावा ने भी कीमतें बढ़ाने का काम किया है.

डौलर के मुकाबले कमजोर होता रुपया :

डौलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है. साल 2025 में रुपया अमेरिकी डौलर के मुकाबले 5 परसैंट तक कमजोर रहा. जो 2022 के बाद से इस का सब से खराब प्रदर्शन रहा. पिछले साल जब डौलर कमजोर हुआ और ज्यादार ग्लोबल करैंसी मजबूत हुईं. लेकिन इन सब वजहों से रुपया तब भी कमजोर रहा. वैसे आम जनता के निवेश का इस से सीधा संबंध नहीं है. डौलर की बढ़ती कीमतों और रुपए के कमजोर होने से जनता का भरोसा टूटता है. पहले लोग 500 और 1000 के नोट रख लेते थे.

8 नवंबर , 2016 को मोदी सरकार के द्वारा जब 500 और 1000 के नोट अचानक बंद कर दिए गए तब लोगों को लगा कि उन के पैसे कितना उन के हैं? रिजर्व बैंक के आंकड़ें बताते हैं कि 2016 से 2025 के बीच नकदी 37.29 लाख करोड़ से अधिक पहुंच गई है. इस का मतलब जनता नोटों का प्रयोग कर रही है. जनता ने नोटबंदी का जो रूप देखा उस से उस के मन में यह डर बैठ गया है कि नोट सरकार कभी भी बंद कर सकती है.

सरकार से घटता भरोसा

नोटबंदी के बाद सरकार ने 200, 500 और 2000 के नए नोट जारी किए थे. इन में से 2000 के नोट को बंद कर दिया गया. इस से बारबार जनता को डर लग रहा कि कहीं ऐसा न हो कि सरकार एक झटके से 500 का नोट भी बंद कर दें. ऐेसे में वह 500 के नोट को बचत के रूप में रखने से डर रही है. दूसरी तरफ कोरोना काल में तालाबंदी के बीच जब लोगों को नकदी की जरूरत थी तब वह नहीं मिली. अब विकल्प के रूप में जनता को सोना और चांदी में निवेश करना सुरक्षित लग रहा है.

बैकों में ब्याज घट गया है. कई बैक बंद हो गई. जिस में जनता का पैसा डूब गया है. ऐसे में निवेश के रूप में बैंक में पैसा रखने से भी लोगों को लाभ नहीं दिख रहा है. खासकर युवा वर्ग बचत को ले कर पहले जैसी सोच नहीं रख रहा है. वह पैसे बैंक में रखने से बेहतर खर्च करने में यकीन कर रहा है. उस के पास क्रेडिट कार्ड और मैडिकल हेल्थ कार्ड है. ईएमआई में ही उस का वेतन खर्च हो जा रहा है. युवाओं के वेतन का एक बड़ा हिस्सा इनकम टैक्स में कट जाता है.

शादी के बाद जब परिवार साथ होता है तब यह लोग इंवेस्टमैंट की सोचते हैं. उस समय इन की प्राथमिकता शेयर बाजार होती थी. वहां भी बाजार का संकट देख अब सोनाचांदी सुरक्षित निवेश लगता है. यह देखते हुए मेंस ज्वैलरी भी तेजी से प्रचलन में आई है.

जनता भले ही सरकार को वोट दे कर 2014 से 2025 तक चुनाव दर चुनाव जिताती आ रही है इस के बाद भी सरकार की मजबूती पर सवालिया निशान लगने के कारण भरोसा नहीं कर पा रही है. उसे लगता है कि डौलर के मुकाबले रुपए की गिरती कीमतें किसी संकट में न डाल दे इसलिए नकद रखने की जगह पर सोनाचांदी रखा जाए. यह किसी हालत में नोट की तरह बेकार नहीं होंगे.

निवेश और गहने हर खरीदारी में लाभ होगा. इन को खरीदनेबेचने में बैंको की तरह से हिसाब और टैक्स का डर नहीं होगा.

सोनेचांदी के सिक्के को काला होने से कैसे बचाएं ?

सोना और चांदी को अगर प्रयोग न किया जाए तो कुछ दिनों में उन की चमक कम हो जाती है. कई बार चांदी काली पड़ जाती है. ऐसे में इन को रखने के समय सावधानी बरतनी चाहिए. चांदी के सिक्कों को प्लास्टिक कैप्सूल या एयरटाइट जिपलौक बैग में रखें, जिस से हवा और नमी न लगे. एंटीटार्निश स्ट्रिप्स सिक्के के पास या बैग में रखें यह हवा में मौजूद सल्फर को सोख लेती हैं. ज्यादा नमी वाली जगह पर सिक्के न रखें.

Buying Gold and Silver in India (2)
सोना हो या चांदी, सही वक्त पर आभूषणों की धुलाई बेहद जरूरी है.

सिक्के छूने से पहले हमेशा सफेद सूती दस्ताने पहनें या चिमटे का इस्तेमाल करें, क्योंकि हाथों का तेल और एसिड दाग लगा सकता है. जरूरत पड़ने पर इन की सफाई के लिए हल्के साबुन के घोल या कौर्नस्टार्च पेस्ट का इस्तेमाल करें. सफेद सिरका या ऐसिड से सफाई न करें. इस से सिक्के का वजन घट सकता है.

सोने के सिक्कों को चांदी या धातुओं के साथ न रखें. इस से सोना खराब हो सकता है. सोनाचांदी को सुरक्षित रखना सब से बड़ी चुनौती होती है. इन के चोरी का खतरा सब से अधिक होता है. इन को तिजोरी या बैंक लौकर जैसे सुरक्षित स्थान पर रखें. हवा से बचाव के लिए सोने के सिक्कों को भी एयरटाइट कंटेनर में रखना सब से अच्छा होता है. सूखी और हवादार जगह पर रखें.

कैमिकल्स से इन का बचाव करना है. परफ्यूम, हेयर स्प्रे और अन्य कौस्मेटिक्स लगाने के बाद ही पहनें. इस तरह के प्रोडक्ट से सोना चांदी को दूर रखें. Buying Gold and Silver in India

Social Story in Hindi : प्राइवेट हौस्पिटल – कशमश भरी नौकरी

Social Story in Hindi : डाक्टर चांडक आज सुबह से ही बहुत खुश थे, सरकारी मैडिकल कालेज हौस्पिटल में आ कर. इतने खुश थे जैसे किसी को चांद मिल गया हो या फिर पंछी को आसमां मिल गया हो. आज सुबह से ही बहुत ही अच्छा लग रहा था हौस्पिटल में, जैसे नौकरी का पहला दिन हो.

डाक्टर चांडक को देख कर उन के अधीनस्थ रैजिडेंट डाक्टर, नर्सिंग स्टाफ व दूसरे लोग उन्हें वापस यहां देख कर बहुत ही खुश थे.

‘‘सर, आप को वापस यहां देख कर बहुत ही अच्छा लग रहा है,’’ इंचार्ज सिस्टर आशा बोली.

‘‘हां, मुझे भी,’’ मुसकराते हुए उन्होंने नर्सिंग स्टाफ से कहा.

सब यही सोच रहे थे कि क्यों डाक्टर चांडक को आज बहुत ही अच्छा लग रहा है? ऐसी भी क्या खास बात है?

बात दरअसल कुछ महीने पहले की है. डा. चांडक इसी मैडिकल कालेज में प्रोफैसर थे, पिछले 25 सालों से. अब उन की उम्र 50 साल से ज्यादा हो गई है. मतलब उन का चिकित्सीय अनुभव 25 साल से ज्यादा का हो गया है. उन के बारे में कहा जाता है कि वे मरीज के कमरे में प्रवेश करते समय ही पहचान जाते हैं कि इस मरीज की तकलीफ क्या है? ऊपर से डा. चांडक का मधुर स्वभाव व निर्मल मुसकराता चेहरा मरीज ही नहीं नर्सिंग स्टाफ व जूनियर डाक्टर को भी प्रभावित और प्रोत्साहित करता है.

डा. चांडक की उपलब्धियां उन की मेहनत के साथसाथ पारिवारिक परिस्थितियों के कारण भी थीं पर इन सब के बावजूद वे अपने प्राइवेट मित्रों जितना कमा नहीं पाते थे. हालांकि उन की लग्जरी लाइफ कोई खास कम नहीं थी. अच्छा बड़ा सरकारी क्वार्टर के साथ ही उन के पास अपने होम टाउन में 3 बीएचके फ्लैट था. 2 कारें जिन में एक खुद के लिए और एक बेटे के लिए. 2-3 सालों में विदेश में एक बार घूम कर आते थे और दूसरे बड़े शहरों में कालेज परीक्षा इंटरव्यू लेने जाते थे तो अपनी पत्नी को भी साथ में ले जाते थे.

कुल मिला कर डाक्टर चांडक अपनी व्यक्तिगत, पारिवारिक व सरकारी नौकरी से संतुष्ट थे. हालांकि उन की आर्थिक स्थिति अपने प्राइवेट डाक्टर्स जैसी अतिसंपन्न नहीं थी. उन के डाक्टर मित्र शहर की हर नई प्रौपर्टी में निवेश करते थे. साल में कम से कम 2 बार विदेश यात्राएं करते थे और उन के पास हर साल नई लग्जरी गाड़ी होती थी.

तभी उन की शांत जिंदगीरूपी तालाब में हलचल हुई, लहरें उठीं और तूफान बनी और समुद्रतट से जोरदार टकराई. उन का दोस्त सोनी, जो उन के साथ मैडिकल कालेज में पढ़ता था, और दूसरे शहर में प्रैक्टिस करता था. साथ में उन के साथ मैडिकल कालेज में डाक्टर बना था, शहर में ही कौन्फ्रैंस में मिला.

कालेज का सदाबहार टौपर और मैडिसिन में गोल्ड मैडलिस्ट, अपने दोस्त की आर्थिक हालत देख कर उसे बहुत दुख हुआ और वह डाक्टर चांडक से गुस्से में बोला, ‘तेरी प्रतिभा सरकारी तालाब में जंग खा रही है. अब तो प्राइवेट प्रैक्टिस के लिए तैयार हो जा. अब तो लगभग सारी जवाबदारियां भी पूरी हो चुकी हैं. अब रिस्क ले, सौरी रिस्क नहीं कमा ले.’

‘पर अपना हौस्पिटल, वह भी इस उम्र में शुरू करूं?’ उन्होंने आश्चर्य से अपने दोस्त को कहा.

‘भाई, अब कोई भी नया डाक्टर अपना हौस्पिटल खुद शुरू नहीं करता है. ऊपर से पुराने जमेजमाए बड़ेबड़े डाक्टर भी अपने हौस्पिटल बेच रहे हैं और कौरपोरेट हौस्पिटल में जा रहे हैं बड़ेबड़े पैकेज के साथ. अपने हौस्पिटल के इनवैस्टमैंट व मैनेजमैंट का झंझट नहीं. बहुत सारा बड़ा पैकेज दे रहे हैं और तुम तो अनुभवी हो और मैडिकल कालेज के प्रोफैसर हो. तुम को तो बहुत बड़ा पैकेज मिलेगा. तुम अपनेआप को कुएं से बाहर निकालो और समुद्र नहीं तो तालाब में ही आ जाओ. देखो, दुनिया कहां से कहां पहुंच चुकी है,’ उस ने अपने दोस्त को समझाने के लिए कहा.

डा. चांडक की पत्नी शुरू से ही उन्हें प्राइवेट में कुछ करने को कह रही थीं. दूसरों को छोड़ो जब उन की मैडिकल की पढ़ाई चल रही थी तभी उन्होंने प्राइवेट का ही सोचा था पर पासआउट होते ही उन को तुरंत ही दूसरे दिन अपने ही मैडिकल कालेज में असिस्टैंट प्रोफैसर की नियुक्ति मिली और प्राइवेट हौस्पिटल खोलने के लिए निवेश भी बड़ा चाहिए था. उन्होंने सोचा कि कुछ समय नौकरी करूंगा और बाद में अपना प्राइवेट क्लीनिक खोल लूंगा पर जवाबदारियां बढ़ती गईं और दूसरा उन्हें सरकारी कालेज में मरीज देखने के साथसाथ स्टूडैंट्स को पढ़ाने का भी मजा आ रहा था पर अब बेटा बैंक की जौब में सैटल हो चुका था और बेटी की शादी हो चुकी थी. अब उन्होंने दूसरे दोस्तों व परिवार के साथ सलाहमशविरा किया. ज्यादातर का मंतव्य प्राइवेट प्रैक्टिस करने का था.

हिम्मत कर के एक दिन सरकार को इस्तीफा दे दिया और उसी शहर में ही नया खुला कौरपोरेट हौस्पिटल जो अभी 1 साल पहले ही उस की नई ब्रांच खुली थी, अच्छाखासा पैकेज और इंसैंटिव दे रही थी, उन्होंने अपनी नई नौकरी जौइन कर ली.

यहीं से उन की जीवन की चिकित्सक तरीके की दूसरी पारी शुरू होती है. पहले दिन वह थोड़ी उत्सुकता और थोड़ी झिझक के साथ अस्पताल पहुंचे. अस्पताल के जगहजगह पर सिक्योरिटी गार्ड थे और हर जगह उन को पूछ कर अंदर जाना पड़ा क्योंकि यहां के सिक्योरिटी गार्ड्स उन को पहचानते नहीं थे. उन की चैंबर बेसमैंट में थी जो दूसरे डाक्टर के साथ थी.

उन के चैंबर के बाहर काले रंग की मंहगी प्लेट पर गोल्डन रंग में नाम के साथ डिग्री व पूर्व प्रोफैसर, मैडिकल कालेज टंगी हुई थी. बाहर सिस्टर नर्स बहुत छोटी सी टेबल पर बैठी थी. वेटिंगरूम बहुत बड़ा था और सरकारी हौस्पिटल की लकड़ी की बैंचों की जगह बड़ेबड़े सोफे रखे थे जिस में आदमी बैठते ही धंस जाता है. बीच में कांच की बड़ी डिजाइनर सैंटर टेबल थी जिस पर मैडिकल की पत्रिकाएं पड़ी हुई थीं जो हिंदी भाषा में और कौमन मैन को सम?ा में आए, ऐसी भाषा में थीं. यहां डाक्टर की जगह, ज्यादातर बड़ा स्थान मरीज व उन के रिश्तेदारों के लिए था. उन की चैंबर और उस की छत छोटी थी जबकि सरकारी हौस्पिटल में उन के कक्ष में ऐग्जामिनेशन टेबल से ज्यादा उन की खुद की टेबल थी.

उन्होंने बाहर सरसरी तौर पर नजर डाली फिर अपने कक्ष में प्रवेश किया. कुछ समय बाद सिस्टर एक चार्ट पेपर ले कर अंदर आई, ‘सर, आप के आज के पेशेंट्स की ओपीडी लिस्ट है,’ पेपर मेज पर रखते हुए उस ने कहा.

‘कितने मरीज हैं?’

‘सर, 7 मरीज अभी हैं और 5 शाम को हैं,’ नर्स ने नाम के साथ बताया.

‘क्या सिर्फ इतने ही पेशेंट? डाक्टर को हैरतअंगेज आश्चर्य हुआ. इतने मरीज तो वे अपने चैंबर से वार्ड तक जातेजाते रास्ते में ही देख लेते थे. वहां उन की रोजाना ओपीडी 100 से ज्यादा ही थी,’ उन्होंने मन ही मन बुदबुदाते कहा.

‘डा. चांडक, आप ने आज तक सरकारी हौस्पिटल में ही अभी तक काम किया है. यह शायद प्राइवेट हौस्पिटल में आप का पहला अनुभव है.

आप को बुरा न लगे तो मैं कुछ महत्त्वपूर्ण बातें आप को बताना चाहता हूं,’ सूटेडबूटेड मुख्य पब्लिक रिलेशन औफिसर ने उन से कहा. चपरासी दोनों के लिए कौफी रख कर गया.

‘यहां मरीज व उन के रिलेटिव्स को ज्यादा प्रश्न पूछने की आदत होती है क्योंकि हमारे ज्यादातर मरीज पढ़ेलिखे व संभ्रांत घर के होते हैं और यहां आने से पहले इंटरनैट में काफी कुछ सर्च कर के आते हैं. हमारा मूल उद्देश्य मरीजों की संतुष्टि है. जब तक वे प्रश्न पूछें उन्हें संतोषजनक जवाब देते रहना है. भले ही इस में आप को झल्लाहट हो, भले ही आप को अच्छा नहीं लगे. सर, यहां व सरकारी हौस्पिटल में यही महत्त्वपूर्ण अंतर है,’ मुख्य पब्लिक रिलेशन औफिसर ने कौरपोरेट हौस्पिटल की संस्कृति से परिचय कराया.

‘डाक्टर का मूल कर्तव्य दर्दी की संतुष्टि से ज्यादा दर्दी का दर्द तकलीफ मूलरूप से मिटाना होता है न कि दर्दी और उस के संबंधियों को खुश करना होता है,’ उन्होंने मन ही मन कहा पर आज पहला दिन था इसलिए उन्होंने बहस करने की जगह चुपचाप सुना.

पहला मरीज शहर के बाहर का था. अनेक अस्पतालों में उस का इलाज चल चुका था और कई डाक्टरों से सलाह ले चुका था पर ठीक नहीं हुआ. डा. चांडक ने उस की फाइल देखी और मरीज का परीक्षण किया. देखा कि मरीज लंबे समय से बीमार है. उस की जांच कर के उन्होंने एक टैस्ट के लिए लेबोरेटरी में उसे भेजा. लेबोरेटरी से डाक्टर का फोन आया और आश्चर्य के साथ बोला, ‘‘सर, सिर्फ एक ही टैस्ट?’’

‘बाकी सारे टैस्ट मरीज के किए हुए हैं,’ उन्होंने शांत मन से कहा.

‘वह बात आप की सही है, सर. पर यहां आए हर मरीज के सारे टैस्ट कराए जाते हैं, भले ही वह एक दिन पहले ही दूसरी जगह क्यों न कराए हों,’ किसी डा. नीरज ने यहां के सिस्टम को बताते हुए कहा.

2 घंटे बाद रिपोर्ट आई. उन्हें पता था कि रिपोर्ट पौजिटिव ही आएगी.

‘देखिए, आप को पेट की टीबी है. इसीलिए पेट लंबे समय से दर्द कर रहा है.

6 महीने दवा लेनी पड़ेगी, मैं 1 महीने की दवा लिखता हूं. आप चाहें तो यह दवा अपने शहर में सरकारी हौस्पिटल से भी ले सकते हैं. चाहें तो यहां महीने में एक बार आ कर मेरे से लिखा कर ले जा सकते हैं,’ उन्होंने पेपर पर दवा लिखते हुए दर्दी को औप्शन दिए.

‘धन्यवाद डाक्टर साहब. एक साल से परेशान हो गए थे, कोई पक्का निदान नहीं हो रहा था. अब तो हम आप से ही दवा लेंगे,’ मरीज को अभी तक दूसरे डाक्टर पर विश्वास नहीं था.

‘सर, आप को इस मरीज को ऐडमिट करना था,’ मैनेजर ने हलकी नाराजगी से कहा.

‘यह तो एक डाक्टर को तय करना है कि मरीज के साथ क्या करना चाहिए?’ उन्होंने गुस्से को दबा कर कहा.

डा. चांडक की ओपीडी दिनोंदिन बढ़ रही थी क्योंकि उन का निदान, टैस्ट और दवाई कम से कम. कोई बिना जरूरत के ऐडमिशन व टैस्ट नहीं.

इस कारण हौस्पिटल का स्टाफ तक अपनी जानपहचान वालों को डा. चांडक को बताने को कहता था. उन की ओपीडी तो बढ़ रही थी पर इस तुलना में हौस्पिटल में ऐडमिशन नहीं हो रहे थे. दूसरे टैस्ट बहुत ही कम हो रहे थे.

एक बार हौस्पिटल संचालक ने उन्हें बुलाया, ‘डा. चांडक, आप की ओपीडी काफी अच्छी हो गई है पर उन की तुलना में ऐडमिशन क्यों नहीं हो रहे हैं? अब आप को 3 महीने हो गए. हम सभी को टारगेट देते हैं. आप को अगले महीने यह टारगेट पूरे करने होंगे,’ कहते हुए एक प्रिंट पेपर उन की ओर बढ़ा कर कहा.

‘टारगेट? यह तो कंपनियां अपने सेल्समैन को देती हैं. यह कैसे संभव है कि पहले से ही बता सकते हैं कि किस मरीज को दवा देनी है कि किस को ऐडमिट करना है?’ उन्हें आज का दिन बहुत ही खराब लगा पूरी जिंदगी में.

जब वे कालेज में राउंड लेते थे तब 2 असिस्टैंट प्रोफैसर और रेजिडैंट डाक्टर उन के साथ झुंड की तरह चलते थे. उन का मरीज पर 1-1 वाक्य बोलना महत्त्वपूर्ण होता था. उन की जब क्लीनिकल क्लास लेते थे तब पिन ड्रौप साइलैंस होता था. वह माहौल यहां नहीं था. पूरी रात घर पर भी चिंतामग्न थे पर पहले महीने उन्हें फीस के रूप में 5 लाख से भी ज्यादा का चैक मिला जो उन की 3 महीने की सैलरी के बराबर थी तो उन्हें लगा कि क्यों उन के सारे साथी प्राइवेट की ओर भागते हैं.

‘सर, डाक्टर निशांत आप से मिलना चाहते हैं,’ रिसैप्शनिस्ट ने इंटरकौम पर कहा.

‘मैं यूरोलौजिस्ट हूं. मैं यहां 1 साल पहले काम करता था. अभी अपने शहर में खुद का हौस्पिटल शुरू किया है. यहां मेरा दोस्त राजेश आप के वार्ड में ही भरती है. बस, उस का डायग्नोसिस व प्रोग्नोसिस जानने आया हूं,’ अपना परिचय दे कर दोस्त की तबीयत के बारे में उन्होंने मैडिकल भाषा में पूछा.

उन्होंने अच्छी तरह से पूरा केस बताया और कब डिस्चार्ज करना है वह भी बताया. डाक्टर निशांत इतने सीनियर डाक्टर के संयम व सादगी से बहुत ही प्रभावित हुए. चाय पीतेपीते बातों ही बातों में चांडक ने हौस्पिटल के टारगेट के बारे में पूछा तो डाक्टर निशांत यह सुन कर हंसने लगे.

‘सर, इस हौस्पिटल में 200 करोड़ से भी ज्यादा निवेश हुआ है. ऊपर से हर महीने का मैंटेनैंस खर्च, 100 से ज्यादा सिक्योरिटी गार्ड्स, 200 से ज्यादा स्टाफ, 10-10 लिफ्ट और सैंट्रली वातानुकूलित एसी का लाखों रुपए का बिल, इन सब का अंतिम बोझ मरीज पर ही पड़ता है.’

‘इतना सारा खर्च व मुनाफे के लिए न सिर्फ बहुत सारे मरीज बल्कि ढेर सारे ऐडमिशन, टैस्ट आदि भी चाहिए. इसलिए न चाहते हुए भी मैनेजमैंट को टारगेट देना ही पड़ता है और डाक्टर्स को वे टारगेट पूरे करने पड़ते हैं. नहीं तो हौस्पिटल चल ही नहीं पाएगा.’

‘ओहो,’ डाक्टर चांडक को प्राइवेट हौस्पिटल का अर्थशास्त्र समझ में आया.

डाक्टर चांडक मरीजों को भरती तो करते थे पर बिना जरूरत ऐडमिशन उन की आत्मा को गंवारा नहीं था. ऐसा नहीं था कि मरीज भरती के लिए मना करते थे या बिल देने से मना करते थे. ज्यादातर मरीज संभ्रांत घर के होते थे. साथ में लगभग सभी के पास मैडिक्लेम पौलिसी भी थी.

कालेज में भी उन्हें कई कंपनी वाले अच्छी औफर करते थे, खासकर दवा व टैस्ट के लिए पर उन्होंने वही किया जो सही था और मन को गंवारा था. इस कारण वे अपने जूनियर डाक्टर, स्टाफ व मरीजों में प्रिय थे. सब लोग दिल से उन का सम्मान करते थे.

जब पहले महीने उन्हें 5 लाख से भी से ज्यादा राशि का चैक मिला, जिस में इंसैंटिव नहीं था तो वह फूले नहीं समाए. सरकार में 25 साल की नौकरी के बाद भी उन की सैलरी प्राइवेट हौस्पिटल से कई गुना कम थी. अब उन्हें समझ में आया कि ज्यादातर डाक्टर साथी क्यों प्राइवेट की ओर रुख करते हैं. शायद घर वाले भी इसलिए प्राइवेट करने को कहते थे. भविष्य में यह चैक की राशि बढ़ने वाली थी, रौकेट की तरह.

पर वे येनकेनप्रकारेण टारगेट पूरा करने में सक्षम नहीं थे. इसीलिए ऐडमिनिस्ट्रेशन का उन पर दबाव बढ़ता ही जा रहा था. वे धर्मसंकट में फंस गए. ढेर सारी प्राइवेट कमाई या फिर आत्मा की संतुष्टि. इस कारण वे तनाव में रहने लगे और उन का सदा हंसमुख निर्मल चेहरा चिंताग्रस्त हो गया.

‘पापा, क्या बात है, आजकल बहुत तनाव में लग रहे हो?’ बेटे ने पास आ कर उन से आदरभाव से पूछा.

‘हां बेटा, बहुत चिंताग्रस्त हूं,’ फिर उन्होंने अपने मन का द्वंद्व बताया, ‘समझ में नहीं आ रहा है, बेटा कि मैं क्या करूं?’

‘पापा, आप हमेशा ही कहते हो कि जो दिल को सही लगे वही करो. दिमाग का क्या है वह तो स्वार्थी है, हमेशा नफेनुकसान के बारे में सोचता है. इसलिए आप ने मुझे बोर्ड मैरिट में आने के बाद भी साइंस की जगह मेरा मनपसंद कौमर्स विषय लेने दिया, सब के साइंस के जोर देने पर भी मैं डाक्टर का बेटा हूं तो मुझे डाक्टर बनना चाहिए.’

‘पापा, आप जो भी निर्णय लेंगे, हम सब आप के साथ हैं,’ बेटे ने पिता का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा.

‘थैंक्यू बेटा,’ बेटे ने उन की मन की गांठ खोल दी.

‘दूसरे दिन सुबह ही कालेज में पहुंच गए. डीन सर उन के 2 साल सीनियर थे, मैडिकल स्टूडैंट के समय में. उन्होंने आने का कारण पूछा तो बोले,’ मैं कालेज वापस जौइन करना चाहता हूं, उन्होंने धीरे से जैसे शर्मिंदगी के भाव से कहा.

‘अरे वापस क्यों,’’ मुसकराते हुए डीन सर ने आगे कहा, ‘‘तुम्हारा इस्तीफा सरकार ने मंजूर ही कब किया था? यह देखो सरकार का कल ही पत्र आया है जिस में लिखा है कि सरकार में डाक्टरों की भारी कमी है और प्रोफैसरों की तो और भी ज्यादा कमी है और प्रोफैसर के कारण मैडिकल कालेज को हर साल 3 रैजिडैंट डाक्टर्स की सीट्स मिलती हैं जिस के कारण सरकार को विशेषज्ञ डाक्टर मिलते हैं. इसलिए उन का इस्तीफा नामंजूर किया जाता है,’ पत्र पढ़ कर वे बहुत खुश हुए.

‘सर, मैं कब जौइन करूं?’ उन्होंने झोंपते हुए पूछा.

‘कल ही आ जाओ. वापस आना है तो देरी क्यों?’ कहते हुए उन्होंने मुसकराते हुए कौफी मंगवाई.

‘डा. चांडक, मनुष्य मिट्टी जैसा होता है. इसलिए तुम उस माहौल में रह नहीं सके,’ डीन सर ने वैसे ही समझाया जैसे पहले दिन मैडिकल कालेज में ऐडमिशन के समय समझाया था कि जितना प्रैक्टिकल सीखोगे उतना ही जिंदगी में अच्छे डाक्टर बनोगे. Social Story in Hindi

Social Story in Hindi : अनोखा अरेंज मैरिज – नए जमाने की अनूठी पहल

Social Story in Hindi :

‘‘पा पा, कल संडे है न?’’ मेरे घर आते ही पलक ने पूछा.

‘‘हां बेटे, संडे है तो क्या हुआ?’’ मैं ने उस के पास बैठते हुए सवाल किया.

‘‘आप का संडे का दिन मेरे नाम होता है न, पापा,’’ उस ने प्यार से कहा.

‘‘हां बेटा, मेरा संडे आप के नाम ही होता है.’’

‘‘तो इस संडे हम गुलशन के घर जा रहे हैं.’’

‘‘गुलशन कौन है?’’ मैं ने सवाल किया.

‘‘अरे बाबा, वही मेरी बैस्ट फ्रैंड. आप उसे कैसे भूल सकते हो?’’

पलक ने नाराज होने का नाटक करते हुए कहा.

‘‘ओके, ओके. लेकिन मैं क्यों जा रहा हूं तुम्हारी फ्रैंड के घर?’’ मैं ने चौंकते हुए अगला सवाल किया.

‘‘इसलिए पापा क्योंकि कल गुलशन का बर्थडे है.’’

‘‘मगर बर्थडे में तो बच्चे जाते हैं न. आप की दोस्त है तो आप जाओ. मैं क्यों जाऊं आप के साथ?’’

‘‘क्योंकि गुलशन की मम्मी चाहती हैं कि आप भी आओ. उन्होंने आप को स्पैशली इनवाइट किया है,’’ पलक ने बात क्लियर की.

‘‘मगर, मु झे क्यों इनवाइट किया है उन्होंने? मैं ने अचरज से पूछा.

‘‘क्योंकि गुलशन की मम्मी आप को बहुत पहले से जानती हैं.’’

‘‘बहुत पहले से जानती हैं, मगर मैं तो नहीं जानता.’’

‘‘अरे पापा, मामला कुछ यह है कि उस दिन हम घूमने गए थे न. बस, उस की तसवीरें मैं ने अपने व्हाट्सऐप पर लगाई थीं और वे तसवीरें जब गुलशन देख रही थी तो उस की मम्मी भी उस के पास बैठी थी. उन्होंने भी तसवीरें देखीं और आप को देखते ही पहचान लिया. आप उन के पुराने क्लासमेट हो न,’’ पलक ने विस्तार से सारी बात बताई.

‘‘क्लासमेट, मगर क्या नाम है तुम्हारी फ्रैंड की मम्मी का?’’ मु झे अभी भी बात क्लियर नहीं हुई थी.

‘‘उन का नाम तो मु झे नहीं पता मगर अब चलो, बस. यह देखो उन की तसवीर,’’ पलक ने उन की तसवीर दिखाई मगर मैं पहचान नहीं सका.

पलक बोली, ‘‘हो सकता है वे बदल गई हों. कितने साल हो गए. शक्ल बदल भी जाती है न. आप उन्हें देखोगे तो पहचान जाओगे.’’

मैं तैयार तो हो गया मगर मन में कई सवाल थे कि पता नहीं कौन है, जो मु झे पहचानती है. मेरी क्लासमेट के रूप में बहुत से नाम मेरे जेहन में आए मगर मैं सम झ नहीं पाया कि वह कौन है?

फिर अगले दिन यानी संडे को मैं पलक के साथ उस की फ्रैंड गुलशन के घर पहुंचा. उस की मां ने बहुत प्यार से हमारा स्वागत किया. मगर अब भी अपनी क्लासमेट यानी उस की मां को सामने देख कर भी मैं पहचान नहीं पा रहा था.

मेरी हालत देख कर वह हंसने लगी. उस के गालों पर डिंपल पड़ा तो मु झे थोड़ाथोड़ा ऐसा लगा जैसे मैं इस चेहरे को पहचानता हूं.

गुलशन की मां ने फिर हमारी क्लास 8 की ग्रुप फोटो दिखाते हुए बताया, ‘‘यह तुम हो और यह हूं मैं.’’

‘‘अरे रजनीगंधा,’’ मेरे मुंह से निकला.

‘‘जी हां, रजनीगंधा. यही हमारा निकनेम था. यानी मेरा और रजनी का जौइंट निकनेम,’’ गुलशन की मम्मी ने कहा.

‘‘हां, याद है मु झे. तुम दोनों की दोस्ती इतनी प्यारी थी कि सारे स्कूल के बच्चों ने प्यार से तुम्हारे यानी सुगंधा और रजनीबाला के नाम को मिला कर रजनीगंधा नाम रखा था तो तुम सुगंधा हो.’’ अब सारा मामला मेरे सामने क्लियर हो गया था.

‘‘हां, मैं सुगंधा हूं और मानती हूं कि मैं थोड़ी बदल गई हूं. दरअसल सूरत में तो ज्यादा परिवर्तन नहीं आया मगर बच्चे हुए, उस दौरान मैं थोड़ी मोटी हो गई और इसी वजह से मेरी शक्ल भी बदलती गई.’’

‘‘वैसे, तुम अब ज्यादा अच्छी लग रही हो. अब ज्यादा सुंदर हो गई हो,’’ मैं अपने जज्बात रोक नहीं पाया.

‘‘सही कह रहे हो?’’ शरमाते हुए सुगंधा ने पूछा.

‘‘बिलकुल हंड्रैड परसैंट. पहले तो तुम ज्यादा ही दुबली हुआ करती थीं और बाल भी छोटे थे. अब काफी मैच्योर और खूबसूरत लग रही हो.’’

गुलशन और पलक एकदूसरे को देख कर मुसकरा पड़ीं.

‘‘तो फिर आप दोनों की दोस्ती पक्की,’’ गुलशन ने दोनों के हाथ मिलाते हुए कहा तो मैं थोड़ा सकपका गया.

‘‘आप दोनों की दोस्ती ऐसी ही बनी रहे,’’ कहते हुए पलक भी मुसकराई.

मैं ने मौका देख कर गुलशन की मां यानी सुगंधा से पूछा, ‘‘घर में और कौनकौन हैं? आप के पति क्या करते हैं और इनलौज कहां हैं?’’
वह थोड़ी गंभीर हो गई और बोली, ‘‘मैं अपने पति से अलग हो चुकी हूं. बड़ी बेटी उन के साथ है और गुलशन मेरे साथ. मैं जौब करती हूं और खुद के बल पर ही अपनी और अपनी बेटी की जिंदगी संवार रही हूं.’’

‘‘ओह, ओके,’’ कह कर मैं चुप हो गया.

मु झे पूछने की इच्छा तो हुई कि तलाक की वजह क्या थी मगर कुछ पूछ नहीं सका क्योंकि इस तरह किसी की निजी जिंदगी में झांकना मुझे उचित नहीं लगा. मैं खुद भी तो अकेला ही था. मेरी पत्नी की इस कोरोना काल में मृत्यु हो चुकी थी.

मैं बोल पड़ा, ‘‘मैं भी अकेले ही अपनी बेटी पलक की जिम्मेदारी उठा रहा हूं और इस में कोई परेशानी नहीं. बस, दुख जरूर है कि मेरी जीवनसाथी मेरे साथ नहीं है. लेकिन मैं भी आप की तरह ही अपनी जिम्मेदारी अच्छी तरह निभा रहा हूं.’’

‘‘जरूर, यह बात मैं सम झ सकती हूं विशाल, कि आप अपनी जिम्मेदारी बहुत अच्छे से निभा रहे हैं. तभी तो पलक इतनी सयानी और प्यारी बच्ची है. वह बहुत अच्छे से अपनी जिंदगी को एक दिशा दे रही है,’’ सुगंधा ने पलक की तारीफ की.

‘‘जी, मु झे और क्या चाहिए भला? मैं बस इतना ही चाहता हूं कि पलक पढ़लिख कर कुछ बन जाए और फिर एक अच्छे से लड़के के साथ उस के हाथ पीले कर मैं उस की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाऊं. वैसे, आप की गुलशन भी बहुत प्यारी और सम झदार है बिलकुल आप की तरह,’’ मैं ने कहा. सुन कर सुगंधा मुसकरा उठी.

सुगंधा अब मेरे साथ थोड़ी कंफर्टेबल होने लगी थी. समय के साथ गुलशन और पलक की दोस्ती तो पक्की होती ही गई, साथ ही, मेरी और सुगंधा की दोस्ती भी थोड़ीथोड़ी अच्छी होती गई. दरअसल इस के पीछे पलक और गुलशन का हाथ था. वे दोनों अकसर मु झे और सुगंधा को मिलाने की कोशिश करतीं. मैं पलक के इरादों से वाकिफ होने लगा था मगर मु झे सम झ नहीं आ रहा था कि वह ऐसा कर क्यों रही है? हमारी बच्चियां हमें मिलाने की कोशिश में क्यों हैं?

एक दिन पलक सुबहसुबह उठी और बताया कि संडे यानी कल हम फिल्म देखने जा रहे हैं.

मैं फिर से थोड़ा सकपकाया और पूछने लगा, ‘‘मगर बेटा, फिल्म देखने क्यों?’’

‘‘क्योंकि गुलशन भी आ रही है. पापा प्लीज.’’

‘‘तो गुलशन आ रही है न. तुम उस के साथ जाओ,’’ मैं ने बात साफ करनी चाही.

‘‘पापा, आप भूल रहे हो कि हम अभी इतने बड़े नहीं जो फिल्म देखने अकेले चले जाएं.’’

‘‘हां, वह तो ठीक है. अच्छा चलो, ठीक है. मैं गार्जियन की तरह तुम दोनों के साथ चलूंगा,’’ मैं ने सहमति दी.

‘‘सिर्फ आप ही नहीं, गुलशन की मम्मा भी आ रही हैं,’’ पलक ने बताया.

‘‘वह आ रही है तो मेरी क्या जरूरत?’’ मैं फिर पीछे हटने लगा.

मगर पलक ने आंखें तरेरीं, ‘‘उस की मां आ सकती है तो मेरे पापा क्यों नहीं आ सकते? मेरी खुशी के लिए आप इतना भी नहीं कर सकते हो?’’

मैं ने हथियार डाल दिए. अपनी बेटी को प्यार से गले लगाया और हंसता हुआ बोला, ‘‘चलो ठीक है. हर बार की तरह यह संडे भी तुम्हारे ही नाम.’’

‘‘ओफकोर्स, मेरे ही नाम क्योंकि मैं ही हूं आप की इकलौती वारिस,’’ कह कर वह हंसने लगी.

बेटी के साथ मेरी ट्यूनिंग शुरू से ही बहुत अच्छी थी. इसलिए उसे अकेले पालने की जिम्मेदारी उठाना मेरे लिए कठिन नहीं रहा. वह मु झे सम झती थी और हर तरह से मेरी हैल्प करती थी और कोशिश करती थी कि उस की किसी बात से मुझे तकलीफ न हो. यही वजह थी कि पलक मुझे अपनी उम्र से कहीं ज्यादा सम झदार लगती थी.

पलक और गुलशन ने पहले से ही औनलाइन टिकट बुक कर रखे थे. हम दोनों सिनेमाहौल में पहुंचे तो सुगंधा से मेरी नजरें मिलीं और मु झे अच्छा सा महसूस हुआ.

वह काफी स्मार्ट और आकर्षक लग रही थी. उस ने अपने लंबे बालों को खुला छोड़ा हुआ था और एक लाइट ब्लू कलर की खूबसूरत सी ड्रैस पहनी हुई थी.

मुझे याद है जब वह छोटी थी यानी स्कूल में हम दोनों साथ थे तब मैं सुगंधा पर कभी गौर भी नहीं करता था. उस समय हमारी उम्र भी कम थी और उस के बाल भी बहुत छोटे थे. वह इतनी खूबसूरत भी नहीं थी. साधारण सी थी और लड़कों जैसा व्यवहार करती थी. 8वीं के बाद उस ने स्कूल चेंज कर लिया था. इसलिए मैं ने कभी उस के लिए कोई आकर्षण महसूस नहीं किया था. आकर्षण अभी भी मु झे ऐसा कुछ महसूस नहीं हो रहा था. मगर वह मु झे अच्छी लग रही थी और उस का साथ भी मु झे भाने लगा था.

अब तो अकसर ही हर संडे किसी न किसी बहाने हम चारों कहीं घूमने चले जाते.

कभी एकदूसरे के घर, कभी कहीं बाहर या कभी फिल्म देखने, कभी कोई इवैंट तो कभी यों ही.

गुलशन और पलक काफी खुश रहने लगी थीं क्योंकि उन्हें भी अब घूमने में मजा आता था. एक दिन गुलशन की मम्मी यानी सुगंधा का बर्थडे था और इस के लिए पलक मु झे 4 दिन पहले से ही तैयार करने लगी थी. मु झे क्या पहनना है, पार्टी के लिए क्या गिफ्ट ले कर जाना है, किस तरह से पेश आना है वगैरह.

वह मुझे इस तरह से हिदायतें दे रही थी जैसे कोई पेरैंट्स अपने बच्चों को हिदायत देते हैं.

हंसी तो मु झे तब आई जब वह मु झे सम झाने लगी, ‘‘सुगंधा आंटी से आप जरा प्यार से बात किया करो और उन से कहना कि वह बेहद खूबसूरत लग रही हैं.’’

मैं ने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘अच्छा, मगर ऐसा क्यों?’’

‘‘क्योंकि वे वाकई खूबसूरत लगती हैं न, पापा.’’

‘‘हां, ठीक है पर मैं भी तो अच्छा लगता हूं न,’’ मैं ने उस की आंखों में झांका.

‘‘अरे पापा, मेरी आंखों में क्यों झांक रहे हो, उन की आंखों में झांक कर पूछना कि क्या आप उन्हें अच्छे लगते हैं?’’ दादी अम्मा की तरह पलक ने सम झाया.

‘‘उस से मुझे क्या करना है? मैं उन्हें अच्छा लगूं या नहीं, उस से क्या फर्क पड़ेगा? मु झे तो यह देखना है कि मैं अपनी बेटी को अच्छा लगता हूं या नहीं,’’ मैं अपनी बेटी की बात का मतलब अच्छे से सम झ रहा था मगर उस की टांग खींचने में मजा आ रहा था.

‘‘क्या पापा, आप भी बच्चों जैसी बातें करते हो. चलो, तैयार हो जाओ. मैं भी तैयार हो रही हूं,’’ पलक ने और्डर दिया.

‘‘पलक, आप भूल गए हो कि अभी हमें जाने में 2 घंटे हैं.’’

‘‘तो आप को तैयार करने में भी मु झे 2 घंटे लगेंगे, पापा. चलो, जल्दी से तैयार होना शुरू हो जाओ.’’

मैं सोचने लगा कि यह पलक भी कितनी बड़ी हो गई है और मु झे कितना तेवर दिखाने लगी है. जैसे कि वह मेरी बेटी नहीं, मेरी मम्मी बन गई हो और आजकल तो कुछ ज्यादा ही बदले हुए अंदाज हैं इस के. ऐसा लगता है जैसे पलक और गुलशन मिल कर कुछ न कुछ खिचड़ी पका रही हैं.

उस दिन बर्थडे पार्टी में सिर्फ सुगंधा और गुलशन ने मु झे और पलक को इनवाइट किया था. केक वगैरह काटने के बाद पलक और गुलशन अपने कमरे में घुस गईं. मैं और सुगंधा अकेले रह गए. मु झे थोड़ा अजीब भी लग रहा था और मैं सम झ नहीं पा रहा था कि सुगंधा से क्या बात करूं.

सुगंधा ही मेरी उल झन सम झती हुई बोली, ‘‘हमारे दोनों बच्चे न, ज्यादा ही सम झदार बन रहे हैं. ये कहीं न कहीं हमें एकदूसरे के करीब लाने की कोशिश में लगे हैं.’’

‘‘क्या तुम्हें भी ऐसा ही लगता है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘बिलकुल लगता है. मैं तो खुद ही सोच में हूं कि ये दोनों चाहते क्या हैं?’’ तभी अंदर से दोनों बेटियां निकलीं और हंसती हुई बोलीं, ‘‘हम चाहते हैं कि आप दोनों शादी करें.’’

‘‘क्या, शादी, और हम दोनों?’’ हम दोनों ही अचरज से एकदूसरे की तरफ देखने लगे.

सुगंधा के चेहरे पर थोड़ी सी  झिझक और शर्म की रेखाएं आईं और फिर वह मुसकराती हुई बोली, ‘‘यह सब क्या है गुलशन?’’

‘‘सही तो है न, मम्मा. आप अकेली हो. मु झे अगर अंकल जैसे पापा मिल जाएं तो क्या प्रौब्लम है?’’

‘‘सही बात है. मैं भी तो अकेली कितनी बोर हो जाती हूं. मम्मी के बगैर जिंदगी अच्छी नहीं लगती. मु झे मम्मी और पापा दोनों चाहिए. प्लीज मेरे लिए एक मम्मी ला दो, पापा. और जब सुगंधा आंटी जैसी मम्मी सामने हैं तो इन के अलावा मु झे कोई और चाहिए ही नहीं,’’ पलक ने भी गुलशन की हां में हां मिलाते हुए कहा.

मैं और सुगंधा एकदूसरे की तरफ देखते रह गए. मु झे सम झ नहीं आ रहा था कि क्या जवाब दूं. सुगंधा भी पसोपेश में थी क्योंकि हम दोनों के मन में ऐसा कुछ नहीं था पर हमारी बेटियों के मन में बहुतकुछ चल रहा था. यह आभास तो हमें बहुत समय से हो रहा था पर क्या यह उचित होगा? क्या सही में बच्चों की इन कोशिशों को बेकार नहीं जाने देना चाहिए? क्या हम एकदूसरे के साथ मिल कर बेहतर जीवन जी सकते हैं?

कहीं न कहीं मेरे मन में भी यह बात आने लगी थी. वाकई पिछले कुछ दिनों में मैं ने अपनी जिंदगी का सही अर्थों में आनंद लिया. पलक भी उतनी ही खुश नजर आती है क्योंकि सुगंधा आंटी साथ होती हैं. मु झे भी सुगंधा के साथ अच्छा ही लगता है. मैं ने सुगंधा की तरफ देखा. उस की आंखों में स्वीकृति नजर आ रही थी.

मैं ने पलक और गुलशन को सम झाते हुए कहा, ‘‘देखो, हमें थोड़ा समय चाहिए सोचने के लिए.’’

‘‘ठीक है, हम आप को 2 दिनों का समय देते हैं और उस के बाद मैं दादाजी के पास जाऊंगी आप दोनों का रिश्ता ले कर. अगर वे स्वीकृति देते हैं तो बात पक्की हो जाएगी और इस तरह आप दोनों की अरेंज मैरिज हम दोनों बेटियां करवा देंगे,’’ पलक की बात सुन कर मैं और सुगंधा काफी जोर से हंस पड़े.

वाकई बात बहुत मजेदार थी. आज हमारी बेटियां हमारी अरेंज मैरिज करा रही थीं. हमें एकदूसरे से मिलवाने की कोशिशों में लगी थीं. क्यों न उन की कोशिशों को एक खूबसूरत मोड़ दे कर हम एक नई जिंदगी की शुरुआत करें.

मैं ने अचानक हामी में सिर हिलाया, ‘‘ठीक है, ऐसा ही होगा.’’

हम दोनों ने हामी भर दी तो हमारी बेटियां हमें ले कर मेरे पिताजी के पास पहुंचीं. पिताजी यों ही मुसकरा रहे थे. उन्हें क्या आपत्ति हो सकती थी.

उन्होंने प्यार से दोनों के सिर पर हाथ फेरा और हमारी शादी पक्की हो गई. Social Story in Hindi

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