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बौक्स आफिस पर बाहुबली 2 का रिकार्ड तोड़ रही है यह फिल्म

निर्देशक एस. राजामौली की फिल्‍म ‘बाहुबली’ एक ऐसी फिल्‍म है जिसने साउथ से लेकर उत्तर भारत तक में जोरदार कमाई की है. इस फिल्‍म ने कमाई के अब तक के सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं, लेकिन अब एक दूसरी साउथ इंडियन फिल्‍म ही इस फिल्‍म के रिकार्ड को तोड़ने की दौड़ में नजर आ रही है.

अब चेन्नई बौक्स आफिस पर अपना कुछ ऐसा ही जादू चलाती दिख रही है सुपरस्टार अजित कुमार की फिल्म ‘विवेगम’. चेन्नई बौक्स आफिस पर दूसरे सप्ताह में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन चुकी है ‘विवेगम’.

इस एक्शन थ्रिलर फिल्म की कमाई की बात करें तो 4 सितंबर तक केवल चेन्नई में इस फिल्म ने 8.50 करोड़ रुपए की कमाई कर ली है, जबकि एस.एस. राजामौली की फिल्म ‘बाहुबली’ ने इतने दिनों में केवल 8.25 करोड़ की ही कमाई कर सकी थी. अंतरराष्ट्रीय बौक्स आफिस पर भी फिल्म वैसा ही धमाल मचा रही है, जैसा कि साउथ के बौक्स आफिस का नजारा है.

‘बाहुबली’ ने चेन्नई में तीन दिनों में 3.24 करोड़ का कलेक्शन किया था. वहीं ‘विवेगम’ ने तीन दिन में 4.28 करोड़ रुपए कमाए. सुपरस्‍टार अजित और काजल अग्रवाल की यह फिल्‍म तमिलनाडू के साथ ही विदेशों में भी धूम मचा रही है. इस फिल्‍म में विवेक ओबराय भी नजर आ रहे हैं.

अजित कुमार, काजल अग्रवाल और विवेक ओबेराय की ‘विवेगम’ 24 अगस्त को रिलीज हुई है, जिसे लोग दुनिया भर में काफी पसंद कर रहे हैं.

बाहुबली के बाद इसके लीड एक्टर प्रभास की फैन फोलोइंग अब पूरे देश में काफी बढ़ गई है. प्रभास जल्द ही फिल्म ‘साहो’ में नजर आने वाले हैं. इस फिल्म में उनके साथ श्रद्धा कपूर लीड रोल में हैं.

इस बैंक में है खाता तो होगी पैसों की होम डिलीवरी

सार्वजनिक क्षेत्र के दिग्गज स्टेट बैंक औफ इंडिया सहित कई बैंकों ने एटीएम निकासी पर शुल्क लेना शुरू कर दिया है. साथ ही ये बैंक अपने एटीएम से निकासी करने पर भी चार्ज ले रहे हैं.

ऐसे में एक ऐसा बैंक है, जो आपको न सिर्फ असीमित निकासी की सुविधा दे रहा है, बल्क‍ि कई प्रीमियम बैंकिंग सर्विसेज भी मुफ्त में दे रहा है. इसके साथ ही पैसो की होम डिलीवरी भी होगी.

हम बात कर रहे हैं इंडसइंड बैंक की. यह बैंक एसबीआई, पीएनबी और प्राइवेट सेक्टर के बड़े बैंकों को भी अपनी सर्विसेज के मामले में मात दे रहा है. इसकी तरफ से अपने हर बैंक कस्टमर को कई प्रीमियम सुविधाएं दी जा रही है.

असीमित एटीएम निकासी

इंडसइंड बैंक की वेबसाइट के मुताबिक बैंक के ग्रांहक देश के किसी भी भाग में किसी भी बैंक की एटीएम से असीमित निकासी कर सकते हैं. इसके लिए उनसे किसी भी तरह का चार्ज नहीं वसूला जाएगा.

फ्री चेक पिकअप

बैंक आपको फ्री चेक पिकअप की सुविधा भी दे रहा है. यह सुविधा हर ग्रांहक को एक दिन में एक बार मिलेगी. इस तरह आप अपने घर पर बैठकर ही अपना चेक जमा कर सकते हैं.

कैश पिकअप

चेक पिकअप के अलावा बैंक आपके घर से कैश भी पिक करेगा. इसके लिए आपको सिर्फ बैंक को इसकी जानकारी देने की जरूरत है. बैंक एग्जीक्यूटिव आपके घर आकर कैश पिक करेगा और आपके अकाउंट में डिपोजिट कर देगा. एक दिन में एक बार इस सुविधा का लाभ लिया जा सकता है और एक दिन में अधिकतम 1 लाख रुपए तक कैश बैंक पिक कर सकता है.

कैश डिलीवरी

इंडसइंड बैंक न सिर्फ कैश पिक करेगा, बल्क‍ि वह आपकी जरूरत और निर्देश के अनुसार कैश की होम डिलीवरी भी करेगा. बैंक के मुताबिक कस्टमर एक दिन में इस सुविधा का लाभ एक बार ही ले सकेंगे. हालांकि इस दौरान वह 1 लाख रुपए तक कैश मंगवा सकते हैं.

सीधे एग्जीक्यूटिव होगी बात

जब भी आप बैंक कस्टमर केयर से बात करते हैं, तो आपको कुछ मिनटों तक आईवीआर को झेलना पड़ता है. इसी में ही आपके कई मिनट खर्च हो जाते हैं. इंडसइंड बैंक ने यहां भी कस्टमर का खास ख्याल रखा है. बैंक की मानें तो कस्टमर केयर को काल करने पर कस्टमर की सीधे बैंक एग्जीक्यूटिव से बात होगी. उन्हें आईवीआर को सुनकर समय बरबाद करने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

चेक के फोटो मिलेंगे

एक महीने के दौरान आपने जितने भी चेक जारी किए, उतने ही चेक के फोटो आपको बैंक स्टेटमेंट के साथ मिलेंगे. इससे आपके पास न सिर्फ इश्यू किए गए चेक्स की कापी रहेगी, बल्क‍ि आपको इन्हें याद रखने के लिए जहमत नहीं उठानी पड़ेगी.

दिल्ली के इस ‘उसेन बोल्ट’ ने तोड़ा अंडर-16 खिलाड़ियों का रिकार्ड

दिल्ली के एक स्लम में रहने वाले एक युवक ने ऐसा कारनामा कर दिखाया है जिसकी आने वाले सालों में मिसालें दी जाएंगी. आजादपुर रेलवे स्टेशन के पास स्लम में रहने वाले निसार अहमद ने दिल्ली स्टेट एथलेटिक्स प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीता है. निसार ने 100 और 200 मीटर स्प्रिंट प्रतियोगिता में ये मेडल अपने नाम किए. गोल्ड मेडल जीतने के साथ ही निसार ने अंडर 16 औल इंडिया के रिकार्ड को भी तोड़ा है.

इससे भी खास बात यह है कि उन्होंने नैशनल अंडर-16 खिलाड़ियों के रिकार्ड तोड़े हैं. 100 मीटर की रेस उन्होंने सिर्फ 11 सेकंड में पूरी की, पुराना रिकार्ड 11.02 सेकंड का था. 200 मीटर की रेस में भी उनकी फुर्ती काबिल-ए-तारीफ रही, महज 22.08 सेकंड में उन्होंने रिकार्ड अपने नाम किया है, जोकि पिछले रिकार्ड से 0.3 सेकंड कम है.

निसार गरीब घर से आते हैं लेकिन उन्होंने इसे कभी अपने सपनों के बीच नहीं आने दिया. निसार के पिता नन्कू अहमद घर खर्च के लिए रिक्शा चलाते हैं और मां दूसरों के घरों में साफ-सफाई काम करती हैं. निसार की दो बहनें भी हैं जिनमें से एक की शादी हो चुकी है.

आजादपुर के पास बड़ा बाग झुग्गी बस्ती में रहने वाले स्प्रिंट रेस चैंपियन निसार अहमद की दौड़ का सफर चार साल पहले शुरू हुआ. अशोक विहार- 2 के गवर्नमेंट ब्वायज सीनियर सेकंडरी स्कूल में पढ़ने वाले निसार कहते हैं, स्कूल में मेरे टैलंट को मेरे फिजिकल एजुकेशन के टीचर ने पकड़ा. उन्होंने मुझे काफी मोटिवेट किया, एक्सरसाइज बताईं, यहां तक दूध पीने के लिए पैसे तक दिए. फिर छत्रसाल स्टेडियम में ट्रेनिंग के लिए सुनीता राय मैम के पास भेजा. यहां से मेरी स्ट्रेंथ और बढ़ी, मैं रोज 6-6 घंटे एक्सरसाइज और प्रैक्टिस करता हूं.

निसार ने 2014-15 में नैशनल लेवल पर खेला और सेमी फाइनल तक पहुंचे. इंटर जोनल लेवल पर कई रिकार्ड बनाए. 2016 में स्कूल नैशनल गेम्स-कालीकट में दो गोल्ड और दो ब्रान्ज जीते. इसी साल दिल्ली स्टेट ऐथलिटिक मीट में 100 मीटर में गोल्ड और 400 मीटर में सिल्वर मेडल उनके नाम रहा. पिछले तीन साल में हर बार उन्हें बेस्ट ऐथलीट का खिताब मिला है.

ये पति

3 भाइयों में सब से छोटे मेरे पति बचपन से ही अत्यधिक दुलार, प्यार के कारण घर की साधारण कुकिंग  विधियों से भी अनभिज्ञ रहे हैं.

एक बार मेरी छोटी बहन अपने पति के साथ आई. ये अति उत्साहित हो कर बोले, ‘‘रुची, तुम बैठ कर बातें करो, मैं सूजी का हलवा बना कर लाता हूं.’’ आधे घंटे बाद आ कर अत्यंत उत्साह से बोले, ‘‘सूजी का हलवा तैयार है. तुम सब को सर्व करो.’’

मैं रसोई में गई तो सामने नमक का डब्बा देख कर मेरा माथा ठनका. हलवे को चखा तो नमकीन था. चीनी की जगह श्रीमानजी ने नमक डाल दिया था.

अब, मैं क्या करूं? उस नमकीन हलवे में मैं ने नीबू निचोड़ा, हरी धनिया डाली और उपमा की नई डिश तैयार कर दी.

मैं रसोई के बाहर आई तो इन्होंने टोका, ‘‘अरे, हलवा नहीं लाई?’’ मैं ने कहा, ‘‘डिनर के समय रात में सर्व करूंगी.’’

‘‘अरे यार,’’ कह कर ये चुप हो गए. डिनर के समय? कटोरियों में सर्व की गई डिश को चख कर ये बोले, ‘‘अरे, यह हलवा नमकीन कैसे हो गया?’’

मैं ने कहा, ‘‘श्रीमानजी, आप ने सूजी में चीनी की जगह नमक डाल दिया था.’’

‘‘ओह, सौरी एवरीबडी,’’ कह कर ये लज्जित हो गए.

रुची खरे

*

मेरे पति मजाकिया स्वभाव के हैं. उन के द्वारा किया गया मजाक अकसर मुझे बहुत देर से समझ में आता है. हमारे घर के नल में कुछ दिनों से पानी नहीं आ रहा था. एक दिन जो सब्जी बनाई, उस में पानी बहुत ज्यादा पड़ गया था. पानी ज्यादा पड़ जाने की वजह से सब्जी की ग्रेवी बहुत पतली हो गई थी.

मेरे पति खाना खाने बैठे तो मैं ने उन की थाली में सब्जी परोसी. सब्जी की ग्रेवी थाली में बहने लगी. तभी पति ने मुझ से सवाल किया, ‘‘क्या आज नल में पानी आया था?’’

मैं ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, ‘‘हां, नल में तो पानी आ गया था.’’ मेरे पति ने बहुत ही गंभीर मुद्रा बना कर मुझ से कहा, ‘‘वह तो सब्जी देख कर ही पता चल रहा है.’’ मुझे उन की बात थोड़ी देर से समझ में आई और तब अपनी हंसी न रोक सकी.

सोनी दुबे

भगवा के विरुद्ध भाजपा सांसद वरुण गांधी का बड़ा बयान

होंठों पर चिपकी भगवा पट्टी को हटाते भाजपा सांसद और सोनिया गांधी के भतीजे वरुण गांधी को भोपाल आ कर याद आया कि देश में सबकुछ ठीकठाक नहीं है और इस की जानकारी उन्हें भी आम लोगों को देने की अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए जिस से कुछ खास लोग उन्हें सुन कर नोटिस लें, वरना वक्त तो बेचारगी में गुजर ही रहा है.

भोपाल के एक कालेज में वरुण की पीड़ा का फोड़ा पूरी तरह तो नहीं फूटा पर रिसा जरूर. उन्होंने सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र मेें पसरते असंतुलन को उत्पीड़न बताते हुए कहा कि नेता 100 करोड़ का घर बनाता है जबकि आम आदमी अपनी जरूरतें भी पूरी नहीं कर पाता. बगैर प्रदेश भाजपा को सूचित किए भोपाल आए वरुण ने मौजूदा हालात का जिम्मेदार सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को न बताते अपनी भड़ास ठीक वैसे ही निकाल ली जैसे नरेंद्र मोदी इमरजैंसी के असली जिम्मेदार वरुण के पिता संजय गांधी का जिक्र नहीं करते. अब देखना दिलचस्प होगा कि राजनीति की यह बार्टर डील कब तक चलती है.

बात होती तो क्या होती

लबे शीरी पे तेरी जुस्तजू होती तो क्या होती

मुकद्दर की रस्में यूं तो सिर आंखों पे,

जिगर में तेरी जुस्तजू भी होती तो क्या होती

बातों ही बातों में कितनी करीबियां आईं

जरा वफा पे चल के

आंखों में ही बात होती तो क्या होती

शाख ए गुल में खुशबू की बात ही क्या

जो जेरे ए खाक ए गुल के बाद भी

होती तो क्या होती

– दीपान्विता राय बनर्जी

पक्ष की मजबूरी है विपक्ष, इसे कुछ इस तरह से समझिए

देश के विरोधी दल आंतरिक विवादों में बुरी तरह बिखर रहे हैं. तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में सर्वेसर्वा होते हुए भी गोरखालैंड में लगाई गई आग को बुझाने में व्यस्त हैं. बिहार में नीतीश कुमार आयाराम गयाराम के चक्कर में लालू परिवार पर आर्थिक हेराफेरी के एक और दौर का लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं. ओडिशा में नवीन पटनायक के बीजू जनता दल में आंतरिक विद्रोह की आवाजें उठ रही हैं.

तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक पार्टी में कोई नेता ही नहीं है पर फिर भी वह सरकार में हैं. केरल व कर्नाटक में गैरभाजपा सरकारें हैं पर उन की उपलब्धियों के समाचार कम हैं, उन के अपने विवादों के ज्यादा हैं.

अन्य राज्यों में भी भारतीय जनता पार्टी के शासन को चुनौती देने वाले विरोधी दल बिखर रहे हैं. गुजरात में विधानसभा चुनावों के पहले ही शंकर सिंह वाघेला ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. उत्तर प्रदेश में मायावती बहुजन समाज पार्टी को संभाल नहीं पा रहीं और समाजवादी पार्टी में बापबेटे के बीच घमासान जारी है.

इस सारे का पूरा फायदा भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी उसी तरह उठा रहे हैं जैसे इंदिरा गांधी कांग्रेस का आधिपत्य जमाने के लिए 1984 से पहले उठाती थीं.

विपक्षी पार्टियों की सक्रियता लोकतंत्र में बहुत जरूरी है. असल में वे सरकार का हिस्सा हैं, गाड़ी में ब्रेक का काम करती हैं, उस के बिना सरकार चलेगी ही नहीं. तानाशाही सरकारें वहीं चल पाती हैं जहां सरकार पर किसी और का अंकुश हो चाहे वह सरकार का हिस्सा दिखे. गवर्नैंस में विचारों की विभिन्नता का महत्त्व बहुत ज्यादा है और जो तानाशाह अपने चारों ओर केवल यसमैन जमा कर लेता है वह ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाता.

विरोधी दलों का मजबूत होना सत्तारूढ़ पार्टी के लिए अनिवार्य है क्योंकि विपक्ष के बिना नेता के खिलाफ आतंरिक विद्रोह खड़ा हो सकता है. आज भारतीय जनता पार्टी नियंत्रण में है क्योंकि उस की सरकार पर एक तरफ नागपुर के संघ के अपने ही लोगों का कंट्रोल है तो दूसरी ओर बिखरा सा विपक्ष है. सत्ता पक्ष यदि अंदर और बाहर की टोकाटोकी से मुक्त हो गया तो गलतियों पर गलतियां करेगा. जनता भी त्रस्त रहेगी और सरकार भी लड़खड़ाएगी.

विपक्षी दलों की एकजुटता आज जरूरी है पर जिस तरह का राजनीतिक गठन देश में है, यह संभव नहीं है.  राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों में विपक्ष का एकसाथ हो जाना अच्छा संकेत है. हालांकि, दोनों पदों पर भारतीय जनता पार्टी अपनी ताकत से कुछ ज्यादा वोट ले गई पर फिर भी, स्थिति संभली सी दिख रही है.

भारतीय जनता पार्टी के कट्टरपंथी आज भी, चाह कर भी, पुरातन पौराणिक ब्राह्मणवादी शासन देश पर थोप नहीं पा रहे जबकि रातदिन मंदिरों, प्रवचनों, आश्रमों, मठों, यात्राओं में उस का गुणगान किया जाता है और भक्त आंखमूंद कर उसे आदर्श मानते हैं. विपक्षी एकता हो या न हो, लोकतांत्रिक देश में उस का वजूद बना रहना जरूरी है और विकास व संतुलन के लिए अनिवार्य.

वीडियो : ऐसा होगा जियो फोन, सबसे पहले यहां देखिए

घर-घर में डिजिटल क्रांति लाने के लक्ष्य से रिलायंस जियो ने पिछले वर्ष वेलकम औफर के साथ एंट्री की थी. उस दिन के बाद से टेलीकाम क्षेत्र में ऐसा उफान आया की अब तक नहीं थमा. सभी टेलीकाम कंपनियां जियो की टैरिफ दरों से प्रतिस्पर्धा करने की होड़ में सस्ते से सस्ते प्लान्स लेकर आयी. इस प्रक्रिया में सबसे अधिक फायदा यूजर्स को हुआ. आज लोग सिर्फ फ्री व्लायस कालिंग ही नहीं सस्ते डाटा का लाभ उठा पा रहे हैं.

इस क्रांति को देखते हुए मुकेश अंबानी ने रिलायंस इंडस्ट्रीज की वार्षिक जनरल मीटिंग 2017 में 21 जुलाई को जियो फोन लान्च किया था. जियो के 4जी फीचर वाले फोन ने मोबाइल बाजार में हड़कंप मचा दिया है, जिसकी प्री-बुकिंग 24 अगस्त से शुरू हो गई थी. ‘भारत का स्मार्टफोन’ माना जाने वाला जियो फोन 4G इनेबल फीचर फोन है.

जियो का 4G फीचर फोन कैसा होगा, अब इस बात से सस्पेंस खत्म हो गया है. हाल ही में रीलीज हुए एक वीडियो में यह फोन काफी स्टाइलिश नजर आ रहा है. ये दिखने में दूसरे फीचर फोन की तरह है, लेकिन इसमें कई एक्स्ट्रा की दी गई है.

अगर आपने भी जियो फीचर फोन बुक किया है तो देखिए ऐसे पैकिंग में आएगा आपका जियो फोन. इस फोन के साथ और क्या क्या मिलेगा आप खुद ही देख लिजिए.

हम यहां पर इस फीचर फोन से जुड़ी जरूरी बातें और उस सवालों के बारे में बता रहे हैं, जो आपके लिए जानना बेहद जरूरी है.

जियो फीचर फोन की खासियत

इस फीचर फोन में कम्‍पैक्‍ट डिजाइन, 4वे नेवीगेशन, एसडी कार्ड स्लाट जैसी कई सुविधाएं हैं. कुछ खास सहूलियतों पर एक नजर.

– अल्‍फान्‍यूमेरिक की पैड

– 4 वे नेविगेशन

– कम्‍पैक्‍ट डिजाइन

– 2.4″ QVGA डिस्‍प्‍ले

– बैटरी एंड चार्जर

– SD कार्ड स्‍लाट

– कैमरा

– माइक्रोफोन और स्‍पीकर

– हेडफोन जैक

– काल हिस्‍ट्री

– फोन कानटैक्‍ट

– रिंगटोन

– टार्च लाइट

– एफ एम रेडियो

जियो फोन से जुड़े कुछ फीचर और बातें जानना बेहद जरूरी है.

माय जियो ऐप

माय जियो ऐप से आप बिल देख सकते हैं. साथ ही इससे इंटरनेट डाटा, कालिंग, एसएमएस और अन्य जानकारी मिलती है.

जियो टीवी

इस ऐप से आप लाइव टीवी देख सकते हैं. कंपनी का दावा है कि इस ऐप से 350 से अधिक चैनल्स का एक्सेस मिल सकता है.

जियो सिनेमा

यह औन डिमांड वीडियो लाइब्रेरी है. इस ऐप से टीवी शो, म्यूजिक वीडियो, मूवी ट्रेलर देखी जा सकती है. आप यहां मूवी खरीद भी सकते हैं.

जियो म्यूजिक

यह म्यूजिक स्ट्रीमिंग और डाउनलोडिंग सर्विस ऐप है.

जियो मनी

इस ऐप को डिजिटल पेमेंट और कैशलेस ट्रांजेक्शन के लिए बनाया गया है.

जियो फोन की प्री बुकिंग शुरू होने के 2 दिन बाद ही इसे बंद करनी पड़ गई थी. कंपनी ने तर्क दिया था कि इसकी डिमांड ज्यादा हो गई है इसलिए प्री बुकिंग बंद कर दी, लेकिन कंपनी ने यह स्पष्ट नहीं किया कि इसकी अगली बुकिंग कब शुरू होगी.

ऐसे में संभव है कि आप भी यह हैंडसेट बुक नहीं कर पाए हों.

हालांकि कई लोग ऐसे भी हैं जो 24 और 25 अगस्त को हैंडसेट को बुक करने में सफल रहे. लोग बेचैन हैं कि उन्हें यह 4G फीचर फोन कब मिलेगा. अच्छी बात यह है कि कंपनी ने जियो फोन बुकिंग की स्टेटस जांचने के लिए दो विकल्प दिए हैं. इसकी मदद से आप जान पाएंगे कि उन्हें फोन की डिलिवरी कब तक मिलेगी.

जानें बुकिंग स्टेटस जांचने का तरीका

औफलाइन बुकिंग स्टेटस जांचने का तरीका

अगर आपने जियो फोन बुक किया है तो आपको कंपनी की ओर से ट्रांजेक्शन आईडी एसएमएस के तौर पर भेजा गया होगा. इसके अलावा आपके फोन नंबर के साथ बुक किए गए हैंडसेट यूनिट के वाउचर भी दिए गए होंगे. इसके नीचे एक फोन नंबर 18008908900 होगा. अगर आप बुकिंग स्टेटस या डिलिवरी तारीख जानना चाहते हैं तो आप अपने उस नंबर से ही काल करें जिस पर बुकिंग की पुष्टि हुई है. इसके बाद आईवीआर के निर्देशों का पालन करें.

अभी आईवीआर की ओर से आपको सुनने को मिलेगा, “आपको वाउचर काविस्तृत ब्यौरा एसएमएस के जरिए भेज दिया जाएगा.” इसके बाद एक एसएमएस आएगा जिसमें डिलिवरी तारीख का जिक्र नहीं होगा. इसमें कोई स्टोर का जिक्र नहीं होगा. संभव है कि रिलीज तारीख नजदीक आने पर आपको और जानकारी दी जाए.

औनलाइन स्टेटस जांचने का तरीका

जियो फोन की बुकिंग स्टेटस औनलाइन जांचने के लिए माय जियो ऐप खोलें. इसके बाद मैनेज बुकिंग विकल्प पर टैप करें. इसके बाद अपना रिजस्टर्ड फोन नंबर दें. इसके बाद ओटीपी डालें. अब आपको माय वाउचर पेज नजर आएगा. अभी स्टेटस फील्ड खाली है. लेकिन जैसे ही फोन की डिलिवरी शुरू होगी. संभव है कि इस पेज पर डिलिवरी की तारीख और स्टोर का जिक्र हो.

आप चाहें तो जियो फोन बुकिंग को माय जियो ऐप इस्तेमाल करके ट्रांसफर कर सकते हैं. इसके लिए मैनेज बुकिंग सेक्शन में जाना होगा.

चलने का नाम जिंदगी : जानिए घर में अकेले रह रहे बुजुर्गों की स्थिति

आज किरण को लंबे समय बाद मार्केट में सब्जी खरीदते देखा. वे काफी थकी और उदास दिख रही थीं. मैं ने पूछा, ‘‘आप की तबीयत तो ठीक है न?’’

वे कहने लगीं, ‘‘रोहन और अदिति अपनी आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली अपने मामामामी के पास शिफ्ट हो गए हैं. बच्चों के बिना घर का खालीपन खाने को दौड़ता है.’’ उन की आवाज में उदासीनता और अकेलेपन की पीड़ा का भाव साफ झलक रहा था.

बाजार में थोड़ा आगे बढ़ी थी कि सोसायटी की रश्मि दिख गईं. अरसे बाद उन से मुलाकात हुई थी. उन्हें देखते ही मैं हैरान रह गई, क्या ये वही रश्मि हैं जो बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी के बोझ तले हमेशा हैरानपरेशान दिखती थीं. न ढंग से कपड़े पहनना, न ही अपनी सेहत का ध्यान रखना, लेकिन आज की रश्मि का तो पूरा मेकओवर ही हो चुका था. आज वे पहले जैसी हालबेहाल आंटी नहीं थीं. उन के चेहरे पर नई रंगत, नई रौनक थी. बातबात में मुसकरा रही थीं.

मैं ने उन के कायाकल्प का राज पूछा तो उन्होंने बताया, ‘‘अब तक तो मैं बच्चों के लिए जीती रही लेकिन अब बच्चे दूसरे शहरों में अपनेअपने कैरियर में व्यस्त हैं तो मैं ने अब जिम्मेदारियों से मुक्त हो कर अपने लिए जीना सीख लिया है.

अब मैं अपनी मनमरजी का करती हूं. वे सब काम जो मैं बच्चों की जिम्मेदारियों के बीच नहीं कर पाती थी अब उन पर ध्यान देने लगी हूं. मैं ने फिटनैस क्लब जौइन कर लिया है, मनपसंद टीवी प्रोग्राम और फिल्में देखती हूं, पत्रपत्रिकाएं पढ़ती हूं, अपनी पुरानी सहेलियों से मिलतीजुलती हूं और पति के साथ सैरसपाटे के लिए भी निकल जाती हूं.’’

अब तक मैं उन की ऐक्टिवनैस और स्मार्टनैस का राज समझ चुकी थी. मैं ने मन ही मन सोचा एक किरण हैं जो बच्चों के घर से चले जाने के बाद अकेलेलन का रोना रो कर अपनी जिंदगी बेहाल किए जा रही हैं और एक रश्मि हैं जो बच्चों के जाने के बाद जिंदगी  की नई शुरुआत कर चुकी हैं और अपने लिए जी रही हैं.

एक रूटीन से चल रही जिंदगी में जब बच्चे पढ़ाई के लिए अचानक घर से जाते हैं तो भागतीदौड़ती जिंदगी में एक ब्रेक सा लग जाता है और लगता है जिंदगी में कुछ करने को नहीं बचा. कुछ पेरैंट्स के लिए तो यह अकेलापन किसी दुर्घटना से कम नहीं होता और वे डिप्रैशन तक में आ जाते हैं.

बच्चों के अपना कैरियर बनाने या पढ़ाई करने के लिए घर छोड़ने के बाद का यह अकेलापन एंप्टी नैस्ट सिंड्रोम यानी ईएनएस कहलाता है. कुछ पेरैंट्स को इस स्थिति से उबरने में काफी वक्त लग जाता है. बच्चों के घर से जाने के बाद अकेलापन, तनाव, व्याकुलता, अंधेरे में बैठना, चुपचाप रहना, एकांत में बैठना, भूख न लगना, घर के दैनिक कामों से अरुचि जैसी मानसिक समस्याएं पनपने लगती हैं.

फिर भी जिंदगी है खूबसूरत

एंप्टी नैस्ट सिंड्रोम से पीडि़त पेरैंट्स को लगता है उन का वर्षों पहले बसाया गया घोंसला, जिसे उन्होंने मेहनत से बनाया था, खाली हो गया है और वे बिलकुल अकेले हो गए हैं. उन्हें अपना जीवन दिशाहीन लगने लगता है. इस अवस्था में अधिकांश पेरैंट्स दुख और किसी चीज के खो जाने जैसा अनुभव करते हैं. वे अपने बच्चों की दैनिक जरूरतों और सुरक्षा को ले कर चिंतित रहते हैं और उन्हें लगता है कि उन के बच्चे अपना ध्यान कैसे रख पाएंगे.

एंप्टी नैस्ट सिंड्रोम की स्थिति उन महिलाओं के लिए बेहद भयावह हो जाती है जिन्होंने अपनी जिंदगी के महत्त्वपूर्ण वर्ष बच्चों की देखभाल में बिताए हों. उन के लिए खुद को नए सांचे में ढालना शून्य से शुरू करने जैसा होता है. लेकिन जिंदगी को यों खत्म हुआ मान लेना भी तो जिंदादिली नहीं है. जरूरत है नई खुशियों को खोजने की, उन्हें समेट कर जिंदगी को नए रंगों से सजाने की.

मनोचिकित्सक अनुजा कपूर के अनुसार, ‘‘एंप्टी नैस्ट सिंड्रोम मध्य आयुवर्ग के अभिभावकों के लिए अत्यंत पीड़ादायक समय होता है. इस पड़ाव को अधिकांश अभिभावकों द्वारा आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता. किसी भी पेरैंट्स के लिए यह समय काफी चैलेंजिंग होता है. वे बच्चे, जिन्हें हर कदम पर मातापिता की मदद की जरूरत होती थी, आज वे अकेले रह कर आत्मनिर्भर होने जा रहे हैं. यह बात पेरैंट्स स्वीकार नहीं कर पाते.’’

मांओं के लिए इस दौर से गुजरना खासा दुखदायी होता है. बच्चे जो उस की मदद के बिना एक कदम भी नहीं चल पाते थे, अब उन्हें उस मां की जरूरत नहीं, यह बात एक मां को भीतरभीतर कचोटती है. मां जिस ने अपना सारा प्यार, अपना सारा समय बच्चों को दिया. अब वही बच्चे उस से दूर हो रहे हैं. यह बात उसे अंदर ही अंदर मार रही होती है. यह स्थिति उसे अवसाद में ले जाती है और वह उस का सामना नहीं कर पाती.

इस सिंड्रोम से ग्रसित अभिभावकों में अवसाद, उद्देश्यहीनता, अस्वीकार्यता की भावना, बच्चे को ले कर चिंता व तनाव जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. दरअसल, अभिभावक बच्चों से अलगाव की इस स्थिति के लिए तैयार ही नहीं होते या कहें कि कुछ तैयारी नहीं करते. इस दौरान पेरैंट्स नई तरह की चुनौतियों से जूझते हैं, जैसे बच्चों के साथ नए तरह का रिश्ता बनाना, अपने खाली समय को बिताने के तरीके ढूंढ़ना, पतिपत्नी का दोबारा से एकदूसरे के साथ जुड़ाव बनाना आदि. बच्चे को कैरियर के लिए एक न एक दिन घर छोड़ कर जाना ही है. अपनेआप को उस स्थिति के लिए मानसिक रूप से पहले से तैयार करें. ऐसा करने से इस स्थिति का सामना करने में आसानी होगी.

मन का करने का समय

दिल्ली की रहने वाली 42 वर्षीय शैली व 46 वर्षीय संजय का इकलौता बेटा अतिशय राठी गोवा से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है. अतिशय के गोवा चले जाने के बाद पतिपत्नी ने अपनी दिनचर्या को एक नया मोड़ दिया है. दोनों मौर्निंग वर्कआउट, एरोबिक्स व साइक्लिंग से अपने दिन की शुरुआत करते हैं.

संजय खुद एक सौफ्टवेयर इंजीनियर हैं और अपना खुद का बिजनैस करते हैं. उन्होंने बेटे के आगे की पढ़ाई के लिए घर से चले जाने के बाद अपनी पत्नी को औफिस आने का सुझाव दिया जिस से वह व्यस्त रह सके और उसे बेटे के चले जाने का अकेलापन न सताए. इस दिनचर्या के अलावा वे दोनों अपने खाली समय में दोस्तों के साथ मस्ती और आउटिंग करते हैं.

उन का मानना है कि आज के समय में बच्चों को आप अपने साथ चिपका कर नहीं रख सकते. उन्हें अपने बेहतर कैरियर के लिए शहर या देश से बाहर जाना पड़े तो आप को उसे वह आजादी और आत्मविश्वास देना ही होगा. साथ ही, बच्चों के सामने या औरों के सामने अपने अकेले हो जाने का रोना नहीं रोना चाहिए. उलटा, पेरैंट्स को तो खुश होना चाहिए कि अब उन्हें रोज की जिम्मेदारियों से मुक्त हो कर अपने लिए कुछ करने का समय मिला है. यह समय अपने मन का करने का है.

क्या हो बच्चों की भूमिका

बच्चे पढ़ाई के सिलसिले में दूसरे शहर में हैं तो इस बात का ध्यान रखें कि आप के और आप के घर वालों के बीच दूरी न बढ़े. आप उन से दूर हैं तो क्या हुआ? आप उन से फोन से जुड़े रहें. उन के फोन का जवाब दें. कई युवाओं के साथ यह भी देखा गया है कि वे कैरियर और दोस्तों में इतने व्यस्त रहते हैं कि पेरैंट्स से उन का लगाव कम होने लगता है. वे हर समय अपने कैरियर की चिंता करते रहते हैं.

आप को यह बात समझनी जरूरी है कि कैरियर अपनी जगह है और घर वाले अपनी जगह. कुछ बच्चे जब छुट्टियों में घर आते हैं तो उस वक्त भी दोस्तों के साथ ही व्यस्त रहते हैं. आप ऐसा न करें. आप ज्यादा से ज्यादा समय पेरैंट्स के साथ बिताएं, उन से बातें करें, उन के लिए सरप्राइज प्लान करें.

एंप्टी नैस्ट सिंड्रोम के लाभ

हाल में आए एक शोध में यह बात सामने आई है कि एंप्टी नैस्ट सिंड्रोम सिर्फ अकेलेपन और खालीपन का ही सूचक नहीं है. आप बच्चों के घर से चले जाने के बाद उपजे इस एंप्टी नैस्ट सिंड्रोम को नकारात्मक ढंग से न ले कर सकारात्मक ढंग से लेंगे तो यह आप को जिंदगी जीने के नए आयाम और फायदे भी दे सकता है.

बच्चे के घर से चले जाने के बाद पतिपत्नी के बीच सामंजस्य और लगाव बढ़ाने का यह बेहतर मौका होता है. जीवन की आपाधापी में बच्चों, घरपरिवार और औफिस की जिम्मेदारी के बीच जीवन में पतिपत्नी के बीच किसी न किसी प्रकार की कड़वाहट आ ही जाती है. ऐसे में बच्चों के घर से चले जाने के बाद के खाली समय का इस कड़वाहट को दूर करने के लिए सदुपयोग किया जा सकता है और अपने रिश्ते को नया आयाम दिया जा सकता है.

कैसे निबटें स्थिति से

शुरुआत में बच्चों से संपर्क बनाए रखें. भले ही आप का बच्चा आप से दूर हो, समयसमय पर उस से मिलने जाएं, नियमित कौल, मैसेज या वीडियो चैट कर सकते हैं. यदि बच्चे के घर से जाने के बाद आप को इस स्थिति से सामंजस्य बिठाने में परेशानी हो रही हो तो अपनी भावनाओं को दबा कर न रखें. अपने हमउम्र दोस्तों से अपनी फीलिंग्स शेयर करें. यदि डिप्रैशन महसूस हो रहा हो तो चिकित्सक से जरूर बात करें. बच्चे के जाने के बाद उस की चिंता में घुलते रहने से बेहतर है कि अपने पुराने शौक को दोबारा जीने की कोशिश करें और अपने पार्टनर के साथ छोटीछोटी बातों का आनंद उठाएं. पुराने रिश्तेदारों, दोस्तों से दोबारा मेलजोल बनाएं. इस से आप व्यस्त रहेंगे, आप का तनाव दूर होगा. फिटनैस पर ध्यान दें.

बच्चों के जाने के बाद नियमित व्यायाम करें. संतुलित और पोषक भोजन खाएं. इस से शरीर में फील गुड कराने वाले हार्मोन का स्राव बढ़ता है, नींद अच्छी आती है.

बच्चों के दूसरे शहर चले जाने के बाद घर को दें नया लुक

उच्च शिक्षा हासिल करने या नौकरी लग जाने के बाद संतानों को दूसरे शहर या दूसरे देश में जाना पड़ता है. यह स्वाभाविक सचाई है. इस सच के साथ स्वाभाविक यह भी है कि मातापिता अकेलापन महसूस करने लगते हैं.

संतानों के बाहर जाने को दूसरी नजर से देखें तो यह आप को पूरी आजादी से रहने का अच्छा मौका देता है. आप कितने भी बुजुर्ग क्यों न हों, घर में कुछ ऐसी चीजें होती हैं जिन्हें अच्छे और आधुनिक फैशन के अनुरूप बदला जा सकता है.

ऐसे वक्त में आप घर को रीडैकोरेट करें. इस से आप को जहां जिंदगी में फिर से जोश और उत्साह के साथ जीने का नजरिया मिलेगा वहीं पुरानी यादों के साथ जीने के बजाय नए उजालों का स्वागत कर सकेंगे.

इस संदर्भ में टैंजरीन की डिजाइनिंग हेड सोनम गुप्ता का कहना है, ‘‘परदों को खूबसूरत पैटर्न में सजाएं. इस से आप का मूड बेहतर होगा और पूरे घर का लुक बदल जाएगा. ये किफायती मूल्य में औनलाइन बहुत आसानी से उपलब्ध होते हैं, इसलिए इन्हें बदलना आसान भी है.

‘‘हर मौसम के लिए खास/विंडो ड्रेपरी होती हैं. उदाहरण के लिए न्यूट्रल बैकड्रौप के लिए वाइट वेस पैटर्न आजमाएं या फिर हैप्पी समर येलो कलर या वाइब्रैंट औरेंज कलर द्वारा अपने लिविंगरूम को ऊर्जा से भरपूर बना लें.

‘‘बच्चों के घर से जाने के बाद जिंदगी में रोचकता और जीवंतता लाने के लिए पूरा बैडिंग डैकोर फ्लोरल ग्राफिक प्रिंट्स से सजाएं. विशिष्ट

लुक के लिए एब्सट्रैक्ट प्रिंट या फिर सुगंधित वातावरण के एहसास के लिए फिलिंग फ्लावर पैटर्न्स का प्रयोग करें.

‘‘चमकदार रंगों वाले खूबसूरत बैड शीट्स के साथ मुंबई स्ट्रीट व्यू या फिर गोवा बीच हैंगआउट प्रिंट के डिजाइन वाले तकियों से अपने बिस्तर पर लिविंग पैटर्न तैयार करें. हर मौसम में फैब्रिक का रूप बदल दें.

‘‘बच्चों के जाने के बाद आप के पास बहुत सारा खाली समय होता है. इस वक्त को आनंद से गुजारें. ब्रैकफास्ट के दौरान कौफी पीते हुए खिड़की या बालकनी से झांकने और नजारे देखने का लुत्फ ही अलग होता है. इस के लिए बालकनी में 2 आराम कुरसियां डाल लें और गद्देदार कुशन बिछा कर सुकून से बैठें.

‘‘घर में पहले की तरह चहलपहल का माहौल रखने का प्रयास करें. मेहमानों के लिए घर सजा कर रखें. खास कर लिविंग स्पेस और डाइनिंग रूम को नया जीवंत लुक दें.’’

बच्चों के कमरे में बदलाव

बच्चों के जाने के बाद उन का खाली कमरा मातापिता को रहरह कर कचोटता है. बच्चों के खाली कमरे को यादों का धरोहर बनाने के बजाय बेहतर होगा कि उसे किसी और तरह से अपने उपयोग में लाएं. आज तक बच्चों के लिए जीते रहे, अब जिंदगी को थोड़ा सुकून और खूबसूरती से सिर्फ अपने लिए गुजारें.

ईशान्या मौल के सीईओ महेश एम बता रहे हैं कई विकल्प —

रिलैक्सिंग रूम  : बच्चों के कमरे का उपयोग रिलैक्स होने के लिए करें. कमरे में से सारे इलैक्ट्रौनिक गैजेट्स हटा दें. जब वक्त मिले यहां बैठ कर बाहर का नजारा देखें या झपकी लें. जमीन पर मैट्रेस बिछा कर उस पर कुशन वगैरा रखें और आराम के पल गुजारें.

लाइब्रेरी :  यदि आप को पढ़नेलिखने का शौक है तो इस कमरे को पर्सनल लाइबे्ररी बनाने से बेहतर क्या होगा. किताबों और पत्रिकाओं का बढि़या संकलन तैयार करें. मैगजीन रैक्स, किताबों के लिए रैक्स वगैरा खरीद लें. कमरे में सोफा, टेबलकुरसी आदि डाल दें ताकि आराम से किताबें पढ़ी जा सकें.

म्यूजिक वर्ल्ड :  यदि आप म्यूजिकलवर हैं तो बेहतर होगा कि इस कमरे को म्यूजिक के नाम कर दें. रोजाना यहां बैठ कर अभ्यास करें. जमीन पर कालीन बिछा कर सुकून के साथ म्यूजिक की दुनिया में खो जाएं.

वर्कप्लेस : यदि घर से काम करते हैं या फ्रीलांसर हैं तो यह कमरा आप के लिए महत्त्वपूर्ण साबित हो सकता है. आप शांति के साथ यहां बैठ कर काम निबटा सकेंगे. यहां कौर्नर डैस्क, वाल सैल्फ, छोटा स्टोरेज कैबिनेट और एक रिवौल्विंग चेयर व टेबल रख कर इस कमरे को बेहतरीन वर्कप्लेस के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं.

पर्सनल जिम :  आप बच्चों के कमरे को छोटेमोटे पर्सनल जिम के रूप में भी तबदील कर सकते हैं. इस से आप का जिस्म भी मेंटेन रहेगा और चुस्तदुरुस्त भी बने रहेंगे. ट्रेडमिल और डंबल रख कर जिम की साजसज्जा पूरी करें. जब भी समय मिले, यहां आ कर ऐक्सरसाइज करें.

बच्चे अकसर मेहमान की तरह आएंगे. इस दौरान उन के सूटकेस, कपड़े रखने की जगह खाली रहे, ऐसी व्यवस्था करें. बच्चे अपने मित्रों व सहेलियों के साथ आ सकते हैं. सो 2 अलगअलग बैड भी हों. बाथरूम हमेशा साफ रखें और उस में सदा नया तौलिया व साबुन रखें ताकि बच्चों और मेहमानों के आने के समय इसे साफ करने की चिंता न करनी पड़े.

इस तरह आप अपने बच्चों के कमरे का बेहतर उपयोग भी कर सकेंगे और जब बच्चे छुट्टियों में घर आएंगे तो वे भी अपने कमरे के इस नए अवतार को देख कर खुश होंगे.

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