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स्लिमिंग मेकअप करेंगी तो आपका चेहरा दिखेगा पतला और खूबसूरत

करीना कपूर, विद्या बालन, कैटरीना कैफ, ऐंजेलिना जौली, अमीषा पटेल, सोनाक्षी सिन्हा, प्रीति जिंटा, जरीन खान, समीरा रेड्डी आदि कितनी हीरोइनें हैं, जो खूबसूरत शरीर के साथसाथ बेहतरीन नयननक्श की मलिका भी हैं. पर कभी आप ने गौर किया कि उन का चेहरा उन के पतले शरीर की तुलना में कितना भारी है? नहीं न? इसलिए कि उन के चेहरे की खूबसूरती आप को दीवाना जो बना देती है और इस की वजह है कुछ स्लिमिंग मेकअप तकनीक, जिस में बिना किसी महंगी सर्जरी के भी आप अपने चेहरे को पतला व खूबसूरत दिखा सकती हैं.

परफैक्ट आईज

स्लिमिंग मेकअप तकनीक में मुख्यरूप से नयननक्श को उभारा जाता है जैसेकि अगर आप के गाल उभरे हुए हैं तो उन्हें कम दिखाने के लिए आंखों का मेकअप ऐसा करें जिस से छोटी आंखें भी बड़ी दिखें, इस के लिए इन टिप्स को अपनाएं:

  1. आर्टिफिशियल आईलैशेज का इस्तेमाल करें तथा साथ में नैचुरल लैशेज को मिला कर मसकारा की डबल कोटिंग करें.
  2. आउटर कौर्नर पर लाइनर को स्मज कर के लगाएं.
  3. ब्लैक काजल की जगह व्हाइट पैंसिल का इस्तेमाल करें.
  4. लाइनर लगाते समय ऊपर की पलक पर लाइनर की मोटी लाइन व नीचे की पलक पर पतली लाइन बनाएं.
  5. कैट आईज लुक क्रिएट करें. लेकिन ज्यादा ब्लैक कलर इस्तेमाल न करें, बल्कि ब्लैक को शेडिंग के तौर पर इस्तेमाल करें.

आंखों को बड़ा दिखाने के लिए कलर ब्लास्ट या कंट्रास्ट लाइनर का इस्तेमाल भी कर सकती हैं. यह मार्केट में आसानी से उपलब्ध है.

  1. लोअर लैशेज पर ट्रांसपेरैंट मसकारा लगाएं.
  2. आंखों को बोल्ड दिखाने के लिए कलर कौंटैक्ट लैंस का इस्तेमाल करें.
  3. आईलैशेज पर शिमर बेज आईशेड का इस्तेमाल कर के ग्लैमर लुक दें.
  4. आई शेड के 2-3 कलर मैच कर के आई मेकअप करने से आंखें और ज्यादा उभर आती हैं.

जूसी लिप्स

स्लिमिंग मेकअप तकनीक में चबी चिक्स को कम दिखाने के लिए होंठों को भी उभारा जाता है. मेकअप आर्टिस्ट स्लिमिंग मेकअप तकनीक का इस्तेमाल कर के स्किनटोन के अनुरूप ऐसी सैंसुअल लिपस्टिक शेड का उपयोग करते हैं जोकि होंठों की खूबसूरती को और अधिक बढ़ा दे.

  1. लिपस्टिक को हमेशा होंठों के कोनों से बीच के हिस्से में लगाएं.
  2. लिपस्टिक लगाने के बाद उस पर हलका लिपग्लौस या हाईग्लौस जरूर लगाएं.
  3. लिपस्टिक लगाने के बाद मैट इफैक्ट के लिए टिशू पेपर रख कर होंठों पर पाउडर लगाएं.
  4. ग्लैमर लुक के लिए रैग्युलर लिपस्टिक में गोल्ड पिगमैंट मिक्स करें.
  5. मैक क्रेमस्टिक लिप लाइनर से होंठों को सैंसुअल लुक दीजिए इस में बारबार टचअप की जरूरत नहीं रहती.
  6. डैड स्किन रिमूव करने के लिए होंठों पर लिप बाम लगा कर टूथब्रश से जैंटली रबिंग करें. यह होंठों की डैड स्किन रिमूव कर के उन्हें मौइश्चराइज करेगा.
  7. फनलविंग लुक के लिए रूबी रैड, प्लम, पिंक, स्पैनिश पिंक, पीच आदि का चुनाव करें.
  8. नाइट पार्टी में डार्क कलर की लिपस्टिक लगाएं.
  9. लिपलाइनर व लिपस्टिक को परफैक्टली ब्लैंड करें. ध्यान रखें लिपलाइनर व लिपस्टिक का कलर एकसमान ही हो.
  10. लिपस्टिक पौलिशड, मैटी, फोमी, निओन आदि कोई भी हो, लेकिन हमेशा स्किनटोन के अनुरूप ही लगाएं.

फेस बेस मेकअप

स्लिमिंग मेकअप तकनीक में फेस कंटूरिंग का ज्ञान होना बेहद जरूरी है. कंटूरिंग के जरीए अपनी चीकबोंस व जौलाइन को उभार सकती हैं, साथ ही चबी चीक्स, डबलचिन, मोटी नाक और पफी आईज जैसी प्रौब्लम्स को भी कवर कर सकती हैं. इस के लिए आप स्किन शेड से 2-3 डार्क शेड फाउंडेशन का इस्तेमाल कंटूरिंग करने के लिए कर सकती हैं तथा फाउंडेशन से स्किन से 2-3 लाइट शेड का चुनाव हाईलाइटिंग के लिए करें.

हाईलाइटिंग एरिया

बेसिकली टी जोन (माथे के बीच में, नाक की ब्रीज लाइन व चिन सैंटर में) और अंडर आई एरिया हाईलाइनटिंग पौइंट कहे जाते हैं.

डार्क शेडिंग एरिया

आउटर पोरशन फेस चीकबोंस से अंदर की तरफ नीचे, नैक लाइन शेडिंग पौइंट हैं जहां डार्क फाउंडेशन शेड का इस्तेमाल करें. ध्यान रखें नैचुरल लुक के लिए ब्लैडिंग जरूर करें.

ब्लशर तकनीक

एक ही ब्लशर पैलेट से 3 कलर के ब्लशटोन लीजिए. डार्क शेड का ब्लशर चीकबोंस से नीचे की तरफ लगाएं. फिर ब्लैंड करें. मीडियम शेड चीकबोंस में और डार्क शेड बीच के हिस्से में लगा कर ब्लैंड करें. परफैक्ट ब्लशर टोन के लिए लाइटशेड ब्लशर को फिर चीकबोंस पर लगा कर ब्लैंड करें.

परफैक्ट आईब्रोज

आईब्रोज से भी चेहरा पतला दिख सकता है. इस के लिए आईब्रोज को आर्च शेप में बनवाएं. इस से आंखें ज्यादा बड़ी और उठी हुई दिखाई देंगी और चेहरा स्लिम नजर आएगा. आईब्रोज को डिफाइन करने के लिए हाईलाइटर लगा कर उंगली से ब्लैंड करें. आईब्रोज शेप थिक व लौंगलैंथ बनवाएं.

बैस्ट हेयर कट – हेयरस्टाइल

मीडियम लैंथ हेयर विद साइड बैंग्स कट का चुनाव करें या फिर मिक्स लौंग लैंथ लेयर या फेयर कटिंग का चुनाव करें, जो चेहरे को स्लिम लुक प्रदान करे. लेकिन अगर बाल छोटे हैं, तो शार्प बौब विद स्ट्रेट पौइंट से न्यू कट दिया जा सकता है, जिस में खूबसूरती उभर कर आएगी. इस के अलावा बोल्ड बैंग्स, सिल्क विद स्ट्रेट कट, मल्टीलेयर्स, ए लाइन स्ट्रेट कट, हाई बन विद बैंग्स, वाटरफाल ट्विस्ट विद कर्ल्स, हाफ अपडू फंकीबन, ओपन हेयरस्टाइल विद कर्ल, टाइट कर्ल विद फ्रिंज्स, साइड ट्विस्ट कर्ल, वन साइड बैंग्स, हाई पफ विद लूज पोनीटेल, लूज फंकी ब्रोकन कर्ल, लेयर कर्ल विद टैक्स्चर आदि हेयर कट व हेयरस्टाइल फेस को स्लिम और आप को हौट, गौर्जियस व फैब्युलस लुक प्रदान करने में मदद करेंगे.

खाप पंचायत जैसा बरताव करती लोकतांत्रिक वोटों से चुनी गई सरकार

खाप पंचायतें कैसे अपने फैसले थोपती हैं–जो कह दिया मान लो वरना बिरादरी से बाहर. अगर गांव के मुखिया, पंडित, मौलवी ने सहीगलत सोच पर किसी को पीटने, किसी को जुर्माना भरने, किसी का धंधा बदलवाने का चौपाल पर बैठ कर फैसला कर लिया तो कर लिया. जिस ने रोना है, रोए. कोई कुछ नहीं कर सकता.

हमारी लोकतांत्रिक वोटों से चुनी जनप्रिय सरकार अब इसी तरह बरताव करती नजर आती है. हम ने फैसले कर लिए, अब तुम को पड़ता खाता है तो जिंदा रहो वरना मरखप जाओ, नर्क में जाओ. कीचड़ में सड़ो. देश में रहना है तो रहो, वरना दफा हो जाओ. कहने को वित्त मंत्री अरुण जेटली इस तरह की बात दिवालिया होने की कगार पर बैठे धंधों के मालिकों को कह रहे थे कि नए कानून के मुताबिक उन का धंधा लगातार नुकसान में चल रहा है, तो उसे बंद कर दें, पर यह सरकार की असल मंशा को जाहिर करता है.

अब सरकार कहती है हम ने फैसले बंद कमरे में करने हैं और राजतंत्र की तरह मुनादी करानी है. जिसे नहीं मंजूर वह धंधा ही नहीं जिंदगी भी छोड़ने को आजाद है. हमें ऊंचनीच से मतलब नहीं. गाय को बचाने, नोटबंदी, जीएसटी के मामलों में सरकार ने पूरी तरह खाप पंचायती धौंस जमाई है. देश ने इसे मान लिया है, क्योंकि वोटतंत्र तो देश में है, पर लोकतंत्र अभी तक कुछ दिल्ली की कुछ सड़कों तक ही है.

वैसे भी हर गांवकसबे में अकसर नेता, थानेदार, पंडे, मौलवी की ही चलती है. वहां सुनवाई के नाम पर अदालतें चाहे हों, पर ये सब जानते हैं कि अदालत जब तक आखिरी फैसला देगी, तब तक परेशान के बच्चे बूढ़े हो चुकेंगे और परेशान या तो श्मशान में फुंक चुका होगा या कहीं 6 गज नीचे दबा होगा.

खाप पंचायतों की तरह सरकारी फैसले जनता की राय पर नहीं, सरकारी कमेटियां तय करती जा रही हैं. उन पर लागू करने से पहले राय नहीं ली जाती. अच्छाबुरा नहीं सोचासमझा जाता. नोटबंदी का फैसला लिया, बिना किसी की खास राय लिए. 50 दिन सारा देश परेशान रहा. आज भी लोगों को संदूकों से पुराने नोट मिलते हैं, काले धन के नहीं, शुद्ध कमाई के जो सरकार ने चोरी कर लिए, खाप पंचायत की तरह जुर्माना लगा दिया बिना कुसूर के. सरकार की जनता से बातचीत बंद हो गई है. अब एकतरफा प्रवचन दिए जाते हैं. हर चुनावी सभा, 15 अगस्त के भाषण, मन की बात, लोकसभा में बयान सब एकतरफा हैं. हमारे पास 70 परसैंट जमीन का राज है तो हम चाहे जो कर लें, यह खुद कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद कहते हैं. लोकतंत्र का मतलब होता है एक परसैंट की भी बात सुनी तो जाएगी. यहां 60 परसैंट भी बेकार हैं, क्योंकि वोटतंत्र 40 परसैंट वालों को 80 परसैंट सीटें दिला देता है.

इस का बेहद नुकसान हो रहा है. विकास और अच्छे दिनों की बातें तो बंद हो ही गई हैं, अब बोलने की व अदालतों की आजादी भी छिन सकती है. पूरा देश इस तरह के माहौल में जा सकता है जैसा दिल्ली वाले जहर से भरती हवा में महसूस करते हैं. अब फेफड़े ही नहीं, दिमाग भी जहर से भर रहा है. गनीमत है सुप्रीम कोर्ट कहींकहीं सरकार की मनमानी पर ब्रेक लगा रहा है. अभी निजता पर जो फैसला दिया सरकार के इस दावे को नकार कर दिया कि नागरिक के बदन पर राजा की तरह सरकार का ही हक है.

समलैंगिक संबंधों पर हेयदृष्टि क्यों : खुल्लमखुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों

गे हो या लैस्बियन, अकसर लोग इन्हें देख कर नाकभौं सिकोड़ने लगते हैं. समलैंगिक संबंधों को हेयदृष्टि से देखा जाता है. आज तक हमारा समाज इन संबंधों को स्वीकार नहीं कर पाया है. समाज और धर्म के ठेकेदारों का मानना है कि आखिर एक युवक दूसरे युवक से कैसे प्यार और शादी कर सकता है. उसे तो युवती से ही प्यार करना चाहिए और युवती को भी हमेशा युवक से ही प्यार करना चाहिए. समलैंगिक संबंधों को समाज हमेशा गलत मानता रहा है, लेकिन समलैंगिक संबंध रखने वाले लोग अब खुल कर सामने आने लगे हैं.

समलैंगिक युवकयुवतियां अब परेड के माध्यम से अपने प्यार का खुल कर इजहार करने लगे हैं, न तो अब उन्हें किसी का डर है और न ही किसी की चिंता. यदि आप उन्हें स्वीकार नहीं करना चाहते तो न करें. इन्हें आप के नाकभौं सिकोड़ने से भी कोईर् फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि अब ये चल चुके हैं एक अलग रास्ते पर जहां इन की सब से अलग, सब से जुदा दुनिया है.

१४ पौइंट्स समलैंगिक संबंधों पर

१ आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं : प्यार की परिभाषा सिर्फ महिला और पुरुष के प्यार तक सीमित नहीं है, प्यार किसी से भी हो सकता है. पुरुष को पुरुष से, औरत को औरत से. अगर 2 पुरुष या महिलाएं साथ रहना चाहती हैं तो इस में हर्ज ही क्या है भाई, रहने दो, उन को साथ, आप क्यों बीच में टांग अड़ा कर इसे गलत साबित करने में तुले हैं. जिंदगी उन की है उन्हें उन के तरीके से जीने दीजिए.

२ लंबी है समलैंगिक संबंधों की लड़ाई : वक्तबेवक्त समलैंगिक सड़कों पर उतर कर अपनी आवाज बुलंद करते रहते हैं. सिर्फ इसलिए कि आप और हम इन्हें सामान्य नजरों से देखें. इन्हें कानूनी अधिकार मिल सकें.

समलैंगिक संबंध रखने वाले लोग परेड का आयोजन करते हैं, जिस में बड़ी तादाद में देशीविदेशी शिरकत करते हैं. दुनिया की बात तो छोड़ दीजिए, क्या भारत समलैंगिकता को अपनाने के लिए पूरी तरह तैयार है? क्या गे, लैस्बियन, ट्रांसजैंडर को समान अधिकार दिए जाएंगे? अभी तो भारत में इसी पर बहस चल रही है.

सब से पहले लोग समलैंगिकता को ले कर अपना दृष्टिकोण बदल लें, सोच का दायरा बढ़ा लें, यही काफी होगा. अभी भी हमारे समाज में इन्हें मानसिक रोगी समझा जाता है.

३ समाज में फैली हैं भ्रांतियां : लैस्बियन और गे को ले कर समाज में कईर् तरह की गलतफहमियां हैं. लोग समलैंगिकता को एक विकल्प समझते हैं. वे सोचते हैं कि युवतियां जिम्मेदारियों से बचने के लिए लैस्बियन बनती हैं, ताकि उन पर कोई बोझ न पड़े, जबकि यह सरासर गलत है. साथ ही, लोगों में ये भी गलतफहमी है कि समलैंगिकों में एड्स की आशंका सब से अधिक रहती है, जबकि यह भी एक गलत धारणा है.

४ समलैंगिक अप्राकृतिक संबंध नहीं : विषमलैंगिक संबंध रखने वाले ज्यादातर लोगों का मानना है कि समलैंगिकता अप्राकृतिक है. वे सोचते हैं कि शायद इन में कुछ अंदरूनी गड़बड़ है इसलिए ये ऐसे हैं, जबकि ऐसा कुछ नहीं है. विज्ञान की नजर से देखें तो समलैंगिक संबंध बिलकुल सामान्य है.

५ क्रांतिकारी हैं समलैंगिक : समलैंगिक संबंध रखने वालों में प्यार की भावना विषमलैंगिकों से कहीं ज्यादा होती है. ये न सिर्फ अपने प्यार का खुल कर इजहार करते हैं बल्कि पूरी दुनिया के आगे उस की तसदीक करते हैं, जो आप और हम नहीं कर सकते. पौप गायिका लेडी गागा भी समलैंगिक संबंधों की वकालत कर चुकी हैं. गागा के मुताबिक, ‘‘समलैंगिक संबंध रखने वाले प्यार के क्रांतिकारी होते हैं.’’

६ फैशन नहीं है समलैंगिक संबंध : लोगों को लगता है कि समय तेजी से बदल रहा है. देश पाश्चात्य संस्कृति को अपना रहा है, लिहाजा, समलैंगिक संबंध का भी चलन है, इसलिए आजकल के युवा इस तरह की हरकत पर उतारू हैं. मनोवैज्ञानिकों की मानें तो यह कोई फैशन नहीं है, समलैंगिक संबंध किसी व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करते हैं कि वह किस से संबंध रखना चाहता है, कैसे संबंध रखना चाहता है. आप और हम उसे फैशन करार नहीं दे सकते. समलैंगिक संबंध बनाना उस का निजी फैसला है.

७ विदेशों में आमबात, भारत में हायतौबा : विदेशों में संबंध चाहे समलैंगिक हों या विषमलैंगिक, हर किसी को अपने तरीके से जिंदगी जीने की आजादी है. कोई कुछ भी करे, किसी को कोई मतलब नहीं, जबकि यहां स्थिति उलट है. समलैंगिक संबंधों को ले कर यहां खूब होहल्ला मचाया जाता है. चिल्लाने से अच्छा कि लोग पहले अपने गिरेबां में झांकें, फिर कुछ बोलें.

८ अदालत से मिली है मंजूरी : 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक मैरिज को लीगल करार दिया था. जुलाई 2014 में समलैंगिक शादी को 19 राज्यों में लीगल माना गया था. 2012 में अमेरिका के राष्ट्रपति ने एक न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा था कि मुझे लगता है कि समलैंगिक जोड़े शादी करने के लिए सक्षम हैं. 15 देश समलैंगिक शादी को मंजूरी दे चुके हैं. हालांकि अमेरिका के कोलोराडो में अब भी समलैंगिक शादी को मंजूरी नहीं दी गई है.

९ छिपाए जाते हैं संबंध : समलैंगिक संबंधों का खौफ अब भी बरकरार है. समलैंगिक जोड़े अकसर ये सोचते हैं कि क्या लोग उन्हें स्वीकार कर पाएंगे? क्या घर वाले उन की इच्छा जान पाएंगे? कई साल वे इसी कशमकश में निकाल देते हैं. कई रिश्ते घर वालों की मरजी की भेंट चढ़ जाते हैं. परिजन समलैंगिक संबंध को यह सोच कर स्वीकार नहीं कर पाते कि वे लोगों को क्या मुंह दिखाएंगे. रिश्तेदारों से क्या कहेंगे कि उन के बेटे या बेटी के समलैंगिक संबंध हैं या वे सम लिंग से शादी करना चाहते हैं.

देश में कई समलैंगिक जोड़े ऐसे हैं जिन्हें घर वालों का डर सताता रहता है और वे खुल कर अपनी बात नहीं रख पाते. कई बार तो वे घर वालों की मरजी से शादी तो कर लेते हैं, लेकिन पीठ पीछे समलैंगिकता का खेल भी चलता रहता है, जो एक न एक दिन सामने आ ही जाता है.

१० खुल कर रखें अपनी बात : यदि आप ऐसे किसी जोड़े को जानते हैं जिस के समलैंगिक संबंध हैं तो बजाय मजाक उड़ाने के, आप उन का साथ दें, ताकि वे अपनी बात खुल कर लोगों के सामने रख सकें. हर कोई खुल कर होहल्ला मचाए, यह जरूरी तो नहीं, हर इंसान का व्यवहार अलगअलग होता है. लिहाजा, समलैंगिक संबंध रखने वाले शरमाएं नहीं, खुल कर अपनी बात घर वालों के सामने रखें, उन्हें तैयार करें.

अपने संबंधों के लिए उन्हें बताएं कि यह कोई बीमारी नहीं है. सब चीजें उन के मनमुताबिक नहीं हो सकतीं. अब ऐसा तो है नहीं कि जो खाना हमें पसंद है ठीक वैसा ही खाना दूसरे को भी पसंद हो, हर व्यक्ति की पसंदनापसंद अलग होती है.

११ कई संस्थाएं करती हैं समर्थन : देशविदेश में कई संस्थाएं हैं जो समलैंगिक संबंधों की पक्षधर हैं और उन का खुल कर समर्थन करती हैं. उन में से एक नाम है उर्वशी वेद का भी है जो अमेरिकन ऐक्टिवस्ट के रूप में गे, लैस्बियन, ट्रांसजैंडर के लिए करीब 25 साल से काम कर रही हैं. भारत में ऐसी कई संस्थाएं हैं जिन में से एक है नाज फाउंडेशन, जो समलैंगिकों के अधिकारों के लिए लड़ रही है.

१२ क्या है धारा 377 : धारा 377 के तहत समलैंगिक संबंध गैरकानूनी हैं. समलैंगिक संबंध बनाने वाले स्त्रीपुरुष को 10 साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है. यह अपराध की श्रेणी में आता है, जिसे गैरजमानती माना गया है. इस कानून के जरिए पुलिस सिर्फ शक के आधार पर भी गिरफ्तारी कर सकती है.

१३ गे थे चीन के पहले प्रधानमंत्री : हौंगकौंग के एक लेखक सोई विंग मुंई की एक किताब जारी हुई थी, जिस में दावा किया गया था कि चीन के पहले कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई गे थे.

१४ जबरदस्ती नहीं बनाए जाते संबंध: यदि कोई गे या लैस्बियन है तो इस का मतलब यह कतई नहीं है कि वह आप की इच्छा के विरुद्घ आप से संबंध बनाएगा. अकसर लोग इस गलतफहमी के चक्कर में समलैंगिकों से कन्नी काट लेते हैं, जो सरासर अनुचित है.

समलैंगिकता का कोई इलाज नहीं

अगर किसी घर में कोई व्यक्ति समलैंगिक संबंध रखता है और यह बात घर वालों को पता चल जाती है तो परिवार वाले उस का डाक्टरी इलाज कराने में जुट जाते हैं. उन्हें लगता है कि समलैंगिकता बीमारी है जो डाक्टरी इलाज से ठीक हो जाएगी. डाक्टर्स के पास भी ऐसी कोई  घुट्टी नहीं है कि जिसे वे समलैंगिक संबंध रखने वाले व्यक्ति को पिलाएं और रोगी विषमलैंगिक बन जाए. इन संबंधों को जितनी जल्दी स्वीकार कर लेंगे उतना ही अच्छा होग

जिंदगी को रफ्तार देती स्किल्स, आइए जानते हैं इन स्किल्स के बारे में

हर जरूरी स्किल क्लासरूम में नहीं सिखाई जाती. कुछ स्किल्स जिंदगी से भी सीखी जाती हैं. इन्हीं स्किल्स से कैरियर की नींव तैयार होती है. अगर आप के पास इन स्किल्स का अभाव है, तो आप की प्रोफैशनल ग्रोथ में परेशानी हो सकती है. आइए जानते हैं इन स्किल्स के बारे में :

निर्णय लेना : हमें हर समय कोई न कोई निर्णय लेना पड़ता है. गलत निर्णय लेने से कैरियर खराब हो सकता है. क्या आप जानते हैं कि अच्छा निर्णय किस तरह से लिया जाए? खुद से 3 सवाल पूछें : क्या इस से आप के कैरियर के लक्ष्य की तरफ कदम बढें़गे? क्या इस से आप की प्रोफाइल मजबूत होगी? क्या इस से आप की ग्रोथ के मौके पैदा होंगे? अब अपने निर्णय की कीमत और इस से कंपनी, टीम व आप को होने वाले फायदों के बारे में विचार करें.

खुद को प्रमोट करना : अगर आप खुद का प्रमोशन नहीं करेंगे, तो इस काम को आप के बदले कोई भी नहीं करेगा. अपने बौस, टीम और कंपनी के सामने खुद को प्रमोट करने के लिए आप को खुद प्रयास करने चाहिए. इस बात को सीखें कि बेहतर सीवी किस तरह से बनाएं. छोटी बातचीत में अपनी खूबियों के बारे में बताना सीखें. आप ने अच्छे काम किए हैं, तो उन के बारे में लोगों को बताने से न चूकें.

बिजनैस को समझना : बिजनैस का लक्ष्य होता है, लाभ कमाना. क्या आप को पता है कि रेवन्यू कहां से आता है? कस्टमर आप की फर्म से क्यों जुड़े हैं? आप की फर्म के बड़े खर्चे क्या हैं? क्या आप कंपनी की कौस्ट कम करने या रेवन्यू बढ़ाने में मदद करते हैं? इन के  जवाब खोजने से खुद का महत्त्व पता लगेगा.

ध्यान से सुनना : प्रोफैशनल की सब से बड़ी गलती होती है कि वे सही तरह से सुनने की कला नहीं जानते. इस से कम्युनिकेशन स्किल्स अधूरी रहती है. सुनने के लिए पूरी तरह उस के शब्दों के चयन, आवाज की टोन और बौडी लैंग्वेज पर गौर करना पड़ता है. स्पीकर के पूरे मैसेज के साथ अनकही बात को भी समझना पड़ता है.

कनैक्शन बनाना :  आप वर्कप्लेस पर लोगों से कट कर नहीं रह सकते. अपनी कोर स्किल्स के बल पर आप हर लक्ष्य हासिल नहीं कर सकते, अगर लोग आप के साथ काम करना पसंद नहीं करते, मदद नहीं करते और वे आप से नहीं जुड़ते तो परेशानी हो सकती है.

समय निकालना : सफल लोग ज्यादा काम करते हैं, इसलिए बड़ी सफलता हासिल करते हैं. आम लोग अपने टारगेट्स पूरा करने के लिए ही ओवरटाइम करते हैं. सफल लोग अपने रूटीन में से समय निकालना जानते हैं. समय को वे सीखने या ज्यादा अनुभव प्राप्त करने में खर्च करते हैं. समय बचाने के लिए दिन के खास काम पहले करें. कठिन कार्य दैनिक रूटीन में शामिल करें. डैडलाइंस सैट करें. मल्टीटास्किंग के चक्कर में काम की क्वालिटी से समझौता न करें. काम के दौरान आने वाली बाधाओं से दूर रहने का प्रयास करें. दिन में एक घंटे का समय सोचने, प्रशिक्षण लेने और खुद के विकास के लिए निकालें. खुद के लिए समय नहीं निकालेंगे तो परेशान रहेंगे.

ऐसे न बनें

गुस्से वाला : भले ही आप समझदार हों, लेकिन यदि बातबात पर गुस्सा करते हैं, तो बात बिगड़ सकती है.

कठिनाई से बचने वाला : भले ही आप काबिल हों, पर समस्या के दौरान यदि भागने की कोशिश करते हैं तो इस से कैरियर में दिक्कत आ सकती है.

ज्यादा काम लेने वाला : क्षमता से ज्यादा जिम्मेदारियां लेने वाला व्यक्ति प्रमोशन के बजाय विफलता को न्योता देता है, इसलिए अपनी क्षमताएं पहचानें.

ज्यादा क्रैडिट लेने वाला : अपनी टीम को क्रैडिट देने के बजाय सारा श्रेय खुद लेने वाले व्यक्ति के बारे में देरसवेर सब को पता लग जाता है. इस से उसे कैरियर में नुकसान होता है.

हम भी किसी से कम नहीं : ऐसिड अटैक सर्वाइवरों की कहानी

चेहरा व्यक्तित्व को संवारता है. दिन की शुरुआत हम अपने चेहरे की खूबसूरती को देख कर ही करते हैं. लेकिन यही चेहरा अगर ऐसा हो, जिसे देख कर आप खुद ही दुखी हो जाएं, तो फिर आप क्या करेंगी? क्या आप अपनेआप को दोषी ठहराएंगी या फिर परिवार, समाज या आसपास के लोगों को, जो हर बार आप को याद दिलाते रहते हैं कि आप उन से अलग हैं, कुरूप हैं?

आप का चेहरा देखने पर उन का दिन खराब हो जाता है. तरहतरह के ताने आप को सुनने पड़ते हैं. आप का घर से निकल कर आजाद घूमना बंद हो जाता है. कोई आप से बात नहीं करता. परिवारदोस्त सब आप से किनारा करते हैं.

मगर क्या किसी ने उसे जलील किया, उसे टोका जिस की वजह से आप की ऐसी दशा हुई? आप की इच्छा के बिना, आप ऐसी जिल्लत की जिंदगी जीने पर मजबूर हैं. कोर्टकचहरी से ले कर आम इनसान तक उस व्यक्ति के गुनाह को भुला देता है. लेकिन अगर आप में हौसला है, तो आप उस कठिन स्थिति का सामना हिम्मत से कर सकती हैं. खुद को सभी के आगे मजबूत कर सकती हैं.

इन की हिम्मत का जवाब नहीं

ऐसी ही सच्ची घटना की शिकार हुई थी 1 महीने की शब्बो, जो आज 21 साल की हो चुकी है और एक कौल सैंटर में काम करती है. वह महीने में क्व12 हजार कमा कर आत्मनिर्भर हो चुकी है और अकेले मुंबई में रहती है.

सीढि़यों से चढ़ कर जब छरहरी शब्बो सामने आई तो उस का खिला चेहरा और होंठों पर लगी लाली उस की खुशहाली को बयां कर रही थी. हंसती हुई वह बगल में बैठ गई. उस के चेहरे का आधा हिस्सा ऐसिड अटैक से पूरी तरह खराब हो चुका है. उस की एक आंख में रोशनी नहीं है. लेकिन वह आत्मविश्वास से पूरी तरह भरी हुई थी.

उसे अपने बारे में बात करने से किसी तरह की हिचक नहीं थी. उस के काम और उस की इस हालत के बारे में पूछे जाने पर वह बताती है, ‘‘जब मुझे कोई काम नहीं मिल रहा था तो स्वात कंपनी की प्रीति अरोड़ा मैडम ने मुझे अपनी कंपनी में काम दिया. मुझे बहुत अच्छा लगा. अपनी जौब छूटने के बाद मैं दूसरा काम ढूंढ़ रही थी. फेस की वजह से काम नहीं मिल रहा था.

‘‘ऐसिड अटैक फाउंडेशन चलाने वाली प्रणाली शाह ने मुझे प्रीति  डम का नंबर दिया और कहा कि वे ऐसिड सर्वाइवर और डिसैबल्ड को काम देती हैं. मैं ने कौंटैक्ट किया. इंटरव्यू हुआ और मैं चुन ली गई. यहां सब फ्रैंड की तरह हैं.

पहले दिन से ही मुझे सब का अच्छा व्यवहार मिला. कभी किसी ने मेरे चेहरे का मजाक नहीं उड़ाया. हम सब साथ मिल कर काम भी करते हैं और घूमने भी जाते हैं.

संघर्ष जैसे जीवन का हिस्सा बन चुका

‘‘मैं ने अपना सुंदर चेहरा कभी नहीं देखा है पर अब देखना चाहती हूं. इसलिए सर्जरी करवा रही हूं. अपनी इस हालत की दोषी मैं नहीं, मेरे पिता हैं, जो जेल में हैं. जब मैं 1 महीने की थी. एक दिन मैं मां की गोद में थी, तभी मेरे पिता ने मेरी मां पर गुस्से से ऐसिड फेंक  दिया. उस का कुछ भाग मेरे चेहरे पर आ पड़ा.

मुझे बताया गया कि मां की मृत्यु उसी दौरान हो गई थी और पापा जेल चले गए थे. मुझे कुछ पता नहीं था. 5 साल तक मैं सायन हौस्पिटल में थी. इस के बाद बगल में स्थित अनाथालय श्री मानव सेवा संघ में मुझे डाल दिया गया. मेरी पढ़ाईलिखाई सब कुछ वहीं से हुआ. मुझे पढ़ने का बहुत शौक था.

‘‘एक बार जब मेरा आई क्यू टैस्ट किया गया तो मेरा टैस्ट काफी अच्छा निकला. पहले मुझे अलग स्कूल में डालने की सब की इच्छा थी, लेकिन प्रिंसिपल ने पाया कि मेरी बुद्घि साधारण बच्चों की तरह है. फिर मुझे नौर्मल स्कूल में ऐडमिशन मिला. मैं पढ़ाई में बहुत होशियार थी. हर तरह के क्विज में भाग लेती थी. अनाथालय के प्रैसिडैंट मुझे बहुत बढ़ावा देते थे. इस से मुझ में आगे बढ़ने की इच्छा पैदा होती गई. इस के बाद मैं ने मुंबई की प्रसिद कालेज एसएनडीटी स्नातक की उपाधि प्राप्त की.

आत्मनिर्भर होने का एहसास

शब्बो को पढ़ाई पूरी करने के बाद से एक अच्छी कंपनी में जौब मिल गई. लेकिन कुछ औफिस कर्मचारियों के आपत्ति करने पर उसे वहां से निकाल दिया गया. वह नम आंखों से कहती है, ‘‘वे कहते थे कि सुबहसुबह ऐसी सूरत देखने से पूरा दिन खराब जाता है. इसलिए 2 महीनों में ही मुझे निकाल दिया. लेकिन मैं क्या करूं? यह मेरी गलती तो नहीं कि लोग मुझे ऐसा कहते हैं.’’

इतना ही नहीं शब्बो पढ़ाई के दौरान भी कई प्रकार की समस्याओं से गुजर चुकी है. वह हंसती हुई कहती है, ‘‘मैं पढ़ने में होशियार थी, पर कोई मुझ से दोस्ती नहीं करता था. मैं अपनी क्लास कभी मिस नहीं करती थी और मेरा काम हमेशा पूरा रहता था. लेकिन जो लड़कियां कालेज बंक करती थीं, उन्हें मेरे नोट्स की जरूरत पड़ती थी. इस तरह धीरेधीरे वे मेरी दोस्त बन गईं.’’

जौब के बाद लाइफ कितनी बदली है? यह पूछे जाने पर शब्बो बताती है, ‘‘अब मैं काम करती हूं, वेतन मिलने पर उसे अपने हिसाब से खर्च कर सकती हूं. मेरा कोई भी नहीं है. मैं ने आज तक किसी रिश्तेदार को नहीं देखा है. मातापिता जब थे, तो रिश्तेदार भी अवश्य रहे होंगे, पर कोई मेरे पास नहीं आया. इसलिए मुझे आत्मनिर्भर होने का एहसास बहुत अच्छा लगता है. मैं थोड़ी दुबली हूं, इस की वजह समय से खाना न खा पाना है. अब मेरे पास पैसा है. मेरा इलाज भी नानावती हौस्पिटल में चल रहा है. मुझे अधिक धूप से बचना पड़ता है. गरमी के मौसम में त्वचा में जलन होती है.

नहीं बनीं जिंदा लाश

ऐसिड अटैक से ग्रस्त महिलाओं के लिए शब्बो संदेश देते हुए कहती है, ‘‘खुद को हमेशा मोटीवेट करें. हर व्यक्ति के जीवन में कोई न कोई समस्या है, इसलिए जरूरी नहीं कि आप घर बैठ कर लोगों से दूर रह कर मनोरोगी बनें. यह ठीक नहीं है. बहुतों के पास परिवार हैं पर मेरे पास तो कोई भी नहीं था. किताबें पढ़ कर ही मैं अपनेआप को साहस दे पाई.

‘‘खुद से प्यार करना, खुद के बारे में सोच कर ही आप आगे बढ़ सकते हैं. मुझे देख कर कई ऐसिड अटैक से ग्रस्त लड़कियां जौब के लिए कहती हैं पर बिना शिक्षा के कुछ मिलना संभव नहीं होता, इसलिए उन्हें किसी भी हालत में शिक्षा पूरी करनी चाहिए.’’

हौसले को मिला साथ

शब्बो को पढ़नेलिखने, पेंटिंग बनाने, सिंगिंग व डांसिंग का शौक है. शब्बो को अपनी पहचान बनाने की दिशा में काम करने वाली ‘स्वात कंसल्टैंसी सर्विसेज लिमिटेड’ की ओनर और उद्यमी प्रीति अरोड़ा को हमेशा लगता था कि कुछ काम इन के लिए किया जाए. उन्होंने कई बार अखबारों में देखा कि ऐसिड सर्वाइवर की जिंदगी कई प्रकार की जिल्लतों से भरी होती है. समाज उस के साथ बहुत बुरा बरताव करता है.

युवावस्था में कुछ लड़कियों के साथ ऐसे हालात हो जाते हैं. अधिकतर ऐसे केसेज वन साइड लव के होते हैं. उन के मातापिता उन्हें ले कर परेशान हो जाते हैं. वे क्या करें, कैसे उन की जिंदगी सवारें, यह एक बड़ी समस्या उन के सामने आ जाती है. अगर ये लड़कियां काम के लिए जाती हैं तो इन्हें काम नहीं मिलता. ये शारीरिक रूप से शिकार हुई हैं पर इन का मानसिक स्तर तो ठीक है, यही सोच प्रीति को इस तरफ ले आई.

वे कहती हैं, ‘‘सरकार ने ऐसिड अटैककी शिकार लड़कियों को शारीरिक विकलांग का टाइटल दे दिया है, लेकिन क्यों? वे मानसिक रूप से काफी मजबूत होती हैं. इस के अलावा सरकार केवल क्व3 लाख नुकसान भरपाई के

रूप में एक बार में दे देती है. इस से क्या होता है? इन की पूरी जिंदगी कैसे चलेगी? मैं इस के लिए भी लड़ रही हूं, क्योंकि इस तरह की महिलाएं केवल शारीरिक रूप से पीडि़त नहीं होतीं, बल्कि मानसिक रूप से भी कहीं अधिक पीडि़त होती हैं. पूरी जिंदगी इन्हें अपनेआप से लड़ना पड़ता है. ये एक जिंदा लाश की तरह होती हैं.’’

सराहनीय प्रयास

ऐसिड अटैक सर्वाइवर को बसाने की दिशा में प्रीति ने कई एनजीओ का सहारा लिया है, जहां उन्हें काम के बारे में जानकारी दी जाती है. ये लोग आम कर्मचारी के बीच में रह कर काम करते हैं. प्रीति की कंपनी की शाखाएं विदेश में भी हैं. यहां आने वाली महिलाओं को उन की योग्यता के अनुसार काम की ट्रेनिंग दी जाती है.

प्रीति बताती हैं, ‘‘जब मैं शब्बो से मिली थी तो बहुत शौक हो गई थी कि यह कैसे रोज अपनी सूरत को देखती होगी, जबकि हम एक मुंहासे से परेशान हो जाते हैं. लेकिन इस का आत्मविश्वास मुझे बहुत अच्छा लगा. एक आंख से वह कंप्यूटर से ले कर हर लिखापढ़ी का काम अच्छी तरह कर लेती है. काफी सर्वाइवर्स ऐसे होते हैं, जो बाहर निकलने से डरते हैं. ये लड़कियां बहुत अच्छा काम करती हैं.

‘‘कम पढ़ीलिखी सर्वाइवर्स के लिए मैं कई और कंपनियों के साथ जुड़ने की कोशिश कर रही हूं, लेकिन अधिकतर साथ देने से मना कर देती हैं. मैं अपनी कुछ और शाखाएं भी खोलने की कोशिश कर रही हूं, जहां मैं इन्हें ट्रेनिंग दे कर काम दे सकूं. अभी तक मैं ने सरकार से कोई अपील नहीं की है, लेकिन आगे चल कर ऐसे सर्वाइवर्स को जौब की गारंटी हो, ऐसी कोशिश जरूर करूंगी. यह जरूरी है ताकि वे किसी पर निर्भर न हों.’’

दास्तां और भी हैं

शब्बो की तरह आरती ठाकुर भी ऐसिड अटैक सर्वाइवर है और काम करती है. उस की कहानी बहुत ही दर्दनाक है. एक शाम जब वह काम से घर लौट रही थी, तो एक लड़के ने उस के पीछे से आ कर ऐसिड फेंक दिया. गनीमत थी कि उस का चेहरा दुपट्टे से ढका था. फलस्वरूप ऐसिड उस के चेहरे पर न गिर कर गरदन और छाती पर गिरा. जलन के मारे वह चिल्लाने लगी. एक पल के लिए तो उसे समझ में ही नहीं आया कि क्या करे. आसपास के लोगों ने उस पर पानी फेंका. फिर पुलिस आई. तब तक वह 10 से 15% तक जल चुकी थी.

आरती के मकानमालिक का बेटा जो आरती से एकतरफा प्यार करता था, जिसे आरती ने शादी से मना किया था, उसी ने आरती पर ऐसिड अटैक किया था. इस सिरफिरे लड़के ने आरती को अपने साथ शादी करने के लिए दबाव बनाया, जिसे आरती ने मना कर दिया. आरती पर ऐसिड अटैक उस वक्त किया गया जब वह अपने बौयफ्रैंड से शादी करने वाली थी.

सख्त कानून जरूरी

आरती अपनी 1 बहन और मां के साथ मुंबई के सबरबन एरिया में रहती है. वह बताती है, ‘‘वह दिन मेरे जीवन का सब से दुखद था, जब मैं ने अपने बदन को जलते देखा था. मैं जब हौस्पिटल में थी, तब मेरी मां और बहन ने बताया कि अपराधी पकड़ा गया है पर 6 महीने बाद वह बेल पर छूट गया. मैं इस हादसे से टूट चुकी थी. 1 साल तक बाहर नहीं निकली. डर लगता था कि कोई मेरे ऊपर नजर तो नहीं रख रहा. लेकिन जब बाहर निकलने की कोशिश की तो आसपास के लोग मुझे ऐसे घूरते थे जैसे गलती मेरी ही थी. मेरी नौकरी चली गई, शादी टूट गई. लेकिन एक दिन लगा कि मैं गलत नहीं हूं, मैं छिप कर क्यों बैठूं?

‘‘ऐसिड डालने वाला लड़का मेरे मकानमालिक का बेटा था. उस ने पहले भी मुझे 2 बार और मारने की कोशिश की थी, जो मुझे बाद में पता चला. पहली बार अटैक के बाद मैं ने मालवानी पुलिस थाने में रिपोर्ट लिखवाने की कोशिश की थी, क्योंकि तब मैं वहां किराए पर रहती थी. लेकिन पुलिस ने आनाकानी की और कहा कि आप लड़की हो इस झंझट में मत पड़ो. जब समझ में आया कि अपराधी कौन है तब तक देर हो चुकी थी. पुलिस भी ऐसे केसेज में लड़कियों का साथ नहीं देती. ऐसिड अटैक के बाद जब पहली बार औफिस गई तो सब मेरा मजाक उड़ाने लगे, जो काफी बुरा लगा.’’

नहीं टूटा हौसला

आरती का इलाज मुंबई के केईएम हौस्पिटल में फ्री में हो रहा है. वह अब फिर जौब कर रही है. नौकरी ने उस के मानसिक तनाव को कम कर दिया है. वह कहती है, ‘‘अब मैं डरती नहीं, मेरे हिसाब से डरना उसे चाहिए जिस ने अपराध किया है. पुलिस की लापरवाही की वजह से अधिक समस्या आ रही है, पर मैं उसे फिर से जेल भिजवा कर दम लूंगी. मैं केस लड़ रही हूं. मैं उन ऐसिड अटैक लड़कियों से भी कहना चाहती हूं कि मजबूती के साथ आगे बढ़ें. आत्मविश्वास ही आप को किसी भी स्थिति से लड़ना सिखाता है.

‘‘साथ ही मैं सरकार से भी अपील करती हूं कि ऐसे अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान तो है पर उस का ईमानदारी से पालन नहीं किया जाता, जिस से अपराधी खुलेआम घूमते हैं. सजा ऐसी होनी चाहिए कि कोई भी उस में तोड़मरोड़ न कर पाए और अगर कोई करे तो उसे भी सजा हो.’’

यह सही है कि ऐसिड अटैक सर्वाइवर की कहानी कोई नहीं सुनना चाहता, कोेई काम नहीं देना चाहता. ऐसे में उन्हें फिर से नई जिंदगी देना आसान नहीं होता. प्रीति अरोड़ा की ऐसे लोगों को फिर से बसाने की मुहीम काबिलेतारीफ है. गृहशोभा के माध्यम से वे उन सभी पीडि़तों से अपील करती हैं कि ऐसिड अटैक से शिकार लड़कियां हिम्मत न खोएं. वे ऐसिड अटैक से ग्रस्त हर लड़की का घर बसाना चाहती हैं. उसे नौकरी दिला कर आत्मनिर्भर बनाना चाहती हैं.

खुद से करें प्यार

यह सही है कि ऐसिड अटैक के बाद कोईर् भी मानसिक और शारीरिक रूप से टूट जाता है. ऐसे में उस के लिए इस सदमे से बाहर निकलना आसान नहीं होता. उसे फिर भी खुद यह समझने की जरूरत होती है कम से कम जान तो बच गई, जो बहुत कीमती है. शारीरिक कमी हुई है, पर मानसिक रूप से वह कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत है.

इस के साथसाथ इन बातों पर भी अमल करें:

अपने अंदर अपराधबोध की भावना न पालें, क्योंकि गलती आप ने नहीं, उस अपराधी ने की है.

लोग क्या कहेंगे, इस बारे में सोचना बंद करें. खुद से प्यार करना सीखें. सोचें कि मैं जैसी हूं वैसी ही खुश रह सकती हूं.

अगर आप अधिक डिप्रैस्ड महसूस करती हैं और उस से निकलने में असमर्थ हैं, तो मनोवैज्ञानिक या काउंसलर की मदद लें.

इस सुपरस्टार की बेटी का पत्ता काट 150 करोड़ की फिल्म में अभिनेत्री बनी दिशा पटानी

अभिनेत्री दिशा पटानी एक के बाद एक ब्लौकबस्टर फिल्मों का हिस्सा बनती जा रही हैं. पहले कप्तान कूल धोनी की बायोपिक और बाद में जैकी चैन के साथ वे कुंग फु योग में भी दिखाई दी थीं.

इन फिल्मों में अपने अभिनय से सबका दिल जीतनेवाली दिशा का नाम फिल्म ‘बागी 2’ से भी जोड़ा जा रहा है. लेकिन हाल ही में आई खबरों की मानें तो दिशा ने 150 करोड़ बजट की फिल्म साइन की है.

ये फिल्म है ‘संघमित्रा’ जिसका बजट 150 करोड़ का है. इस फिल्म को हिंदी के अलावा तमिल और तेलगु में भी बनाया जाएगा. कहा जा रहा है इसकी कास्ट हटकर होगी, इसलिए इस फिल्म को बनाने में समय लगेगा. हालांकि अब तक दिशा ने खुद इस खबर को लेकर कोई घोषणा नहीं की है, लेकिन इन दिनों इस बात को लेकर सभी चर्चा कर रहे हैं.

लेकिन इस फिल्म में दिशा को एंट्री आसानी से नहीं मिली है, बल्कि उन्होंने एक स्टार किड को रिप्लेस कर फिल्म में अपनी जगह बनाई है. उन्होंने कमल हासन की बेटी श्रुति हासन को रिप्लेस किया है. खैर हमें इस बात में कोई शक नहीं कि दिशा अपना किरदार बखूबी निभाएंगी, लेकिन फिल्म मेकर्स को दूसरी अदाकारों के मुकाबले दिशा ज्यादा पसंद आ रही है, ये अपने अपने आप में बड़ी बात है.

संजय दत्त को जूतों से मारती हैं उनकी पत्नी…!

संजय दत्त इन दिनों अपनी फिल्म भूमि को लेकर खबरों में बने हुए हैं. उनकी फिल्म रिलीज के बाद बौक्स औफिस पर अच्छा प्रदर्शन कर रही है. वहीं इन दिनों संजय अपने परिवार के साथ मजे कर रहे हैं. संजय दत्त ने अपनी जिंदगी में काफी उतार-चढ़ाव देखे हैं. खास तौर पर जेल जाने के बाद उन्हें काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. लेकिन अब जब वे जेल से छूटकर वापस आ गए हैं, तो वे अपने करियर और परिवार पर खास ध्यान देना चाहते हैं.

संजय दत्त की जिंदगी हमेशा से ही खबरों का हिस्सा बनी रही है, यही वजह है कि उनकी जिन्दगी पर बायोपिक बन रही है. इसी के चलते वे इन दिनों कई इंटरव्यू और कार्यक्रमों का हिस्सा बन रहे हैं. हाल ही में उन्होंने अपने एक इंटरव्यू के दौरान एक ऐसी निजी बात लोगों के साथ शेयर की, जिसे सुनने के बाद आपको आपने कानों पर विश्वास नहीं होगा.

वे टीवी शो ‘यार मेरा सुपरस्टार 2’ में बतौर गेस्ट शरीक हुए थे और इस शो के दौरान उन्होंने अपने जूतों के बारे में बात करते हुए बताया कि उनके जूते प्लास्टिक के होते हैं. ये जूते मेक्सिको का एक शख्स उनके लिए अपने हाथों से बनाता है. उन्होंने बताया कि उनके पास ऐसे कई जूते हैं.

तभी उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी उन्हें इन्ही जूतों से मारती भी है. लेकिन ऐसा बोलने के बाद उनके चेहरे पर हंसी दिखाई दी, जिससे लोगों को समझ में आया कि वे मजाक कर रहे हैं. बस फिर क्या था, स्टेज पर हंसी का फुव्वारा फूट पड़ा. इस बात से तो साफ पता चलता है कि पिछले दिनों को भुलाकर वे अपनी जिन्दगी हंसी-खुशी बिता रहे हैं.

यह रिश्ता तो प्यार का रिश्ता है क्योंकि सच्चे रिश्तों को कभी संभालना नहीं पड़ता

अकसर लड़कों को बड़े होते देख मातापिता उन के विवाह के सपने देखने लगते हैं. फिर किसी की बेटी को अपने कुल की शोभा बना कर अपने परिवार में ले आते हैं. इसी तरह लड़की को बड़ी होती देख उस के विवाह की कल्पनामात्र मातापिता को भावुक बना देती है. यही नहीं, स्वयं लड़की भी अपने विवाह की कल्पना में उमंगों से सराबोर रहती है. वह केवल पत्नी नहीं, बहू, भाभी, चाची, ताई, देवरानी, जेठानी जैसे बहुत सारे रिश्ते निभाती है.

शादी के कुछ समय बाद न जाने कौन से बदलाव आते हैं कि ससुराल वालों को बहू में दोष ही दोष नजर आने लगते हैं. उधर लड़की भी ससुराल वालों के प्रति अपनी सोच और रवैया बदल लेती है. कुछ परिवारों में तो 36 का आंकड़ा हो जाता है. लड़की के ससुराल पक्ष के लोग परिवार की हर मुसीबत की जड़ बहू और उस के परिवार वालों को ही मान लेते हैं. एकदूसरे को समझें जरूरी है कि आप एकदूसरे की भावनाओं को समझें. जब हम किसी की बेटी को अपने परिवार में लाते हैं, तो उसे अपने पिता के घर (जहां वह पलीबढ़ी) की अपेक्षा बिलकुल जुदा माहौल मिलता है. बात रहनसहन और खानपान की हो या फिर स्वभाव की, सब अलग होता है.

इस के अलावा पतिपत्नी के संबंधों को समझने में भी उसे कुछ समय लगता है. ऐसे में यदि परिवार के लोग अपेक्षाएं कम रखें और बहू को अपना मानते हुए समझ से काम लें, तो शायद परेशानियां जन्म ही न लें.

बहू के घर आने से पहले ही सासें बहुत सारी अपेक्षाएं रखने लगती हैं जैसे बहू आएगी तो काम का बोझ कम हो जाएगा. वह सब की सेवा करेगी इत्यादि.

दूसरी तरफ शादी के बाद तो लड़के का प्यार घर के अन्य सदस्यों के साथसाथ अपनी पत्नी के लिए भी बंटने लगता है, तो घर वालों को लगता है कि बेटा जोरू का गुलाम हो गया. बहू का घर के कामों में परफैक्ट न होना या काम कम करना बहुत बड़ा दोष बन जाता है. हर सास यह भूल जाती है कि पहली दफा ससुराल में आने पर जैसे उसे पति का साथ भाता था, वैसा ही बहू के साथ भी होता होगा.

सम्मान दे कर सम्मान पैदा करें

सासबहू के संबंध मधुर बने रहें, इस के लिए सास के व्यवहार में उदारता, धैर्य और त्याग के भाव होने आवश्यक हैं. अपने प्रियजनों को छोड़ कर आई बहू से प्यार भरा व्यवहार ही उसे नए परिवार के साथ जोड़ सकता है, उसे अपनेपन का एहसास करा सकता है और उस के मन में सम्मान और सहयोग की भावना उत्पन्न कर सकता है. बहू को सिर्फ काम करने वाली मशीन न समझ कर परिवार का सदस्य माना जाए.

बहू के विचारों व भावनाओं को महत्त्व दिया जाए. उस से परिवार के हर फैसले में सलाह ली जाए, तो परिवार में सुखशांति बनी रहे और समृद्धि भी हो. यदि सास घर के सारे काम बहू को न सौंप कर खुद भी कुछ काम करती रहे, तो सास का स्वास्थ्य तो बेहतर रहेगा ही, परिवार का वातावरण भी मधुर बना रहेगा.

दूसरी तरफ शादी के बाद लड़की के भी कुछ फर्ज हैं, जो उसे निभाने चाहिए. लड़की यह नहीं समझ पाती कि किसी भी सदस्य द्वारा समझाया जाना टोकाटाकी नहीं है. घर का थोड़ाबहुत काम भी उसे बोझ लगने लगता है.

उसे लगता है कि पति सिर्फ उस का है. वह किसी और सदस्य को समय देता है, तो वह उसे अपनी अपेक्षा समझती है. दूसरे शब्दों में ससुराल में अधिकार क्या हैं, यह तो उसे मालूम है पर कर्तव्यपालन को बोझ समझने लगती है.

ससुराल में बेटी जैसे अधिकार मिलें, यह तो जरूरी है पर किसी के टोकने पर वह यह भूल जाती है कि मायके में भी तो ऐसी परिस्थितियां आती थीं. डांट तो मायके में भी पड़ जाती थी. माना कि उस का ससुराल में किसी से (अपने बच्चों को छोड़ कर) खून का रिश्ता नहीं है पर इनसानियत और प्यार का रिश्ता तो है.

उसे भी इस सच को दिल से स्वीकार करना चाहिए कि थोड़ी सी मेहनत से सब का मन जीत कर वह सब को अपना बना सकती है. जौब पर जाने वाली लड़कियों को परिवार के साथ रहने का अधिक समय भले ही न मिलता हो, लेकिन समय निकाला तो जा सकता है और फिर परिवार का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनने के लिए कुछ कर्तव्य तो उस के भी हैं.

परिवार वालों को स्नेह और सम्मान दे कर वह अपने पति के दिल को जीत सकती है.

वर्चस्व की लड़ाई से बचें

दरअसल, वर्चस्व की लड़ाई ही सासबहू के बीच टकराव पैदा करती है. किसी भी संयुक्त परिवार में सास और बहू ज्यादातर समय एकदूसरे के साथ व्यतीत करती हैं. उन के ऊपर ही घर के कामकाज की जिम्मेदारी होती है. ऐसे में घर में अशांति का मुख्य कारण भी सास और बहू के कटु संबंध होते हैं.

आज टीवी पर अधिकतर धारावाहिक सासबहू के रिश्तों पर मिलते हैं. अधिकांश में दोनों में से कोई एक चालें चल रही होती है, कुछ में रिश्तों को व्यंग्यात्मक तरीके से पेश किया जाता है. विभिन्न सर्वेक्षणों व शोधों में यह बात सामने आई है कि संयुक्त परिवारों में तनाव का 60% कारण सासबहू के बीच का रिश्ता होता है.

जिन घरों में बहुत ही चाव से उन धारावाहिकों को देखा जाता है वहां विवाद ज्यादा होते हैं. वे घंटों उस पर डिस्कस भी करते हैं कि वह सास कितना गलत कर रही है या उस सीरियल की बहू कैसी शातिर है. तभी यह सास और बहू के मन में बैठ जाता है कि धारावाही के पात्रों की तरह ही दूसरी है और टीवी पर जाना जीवन में उतरने लगता है. जब बात खुद पर आती है तो हम भी वैसा ही करते हैं.

हम सभी किसी न किसी फिल्म या धारावाही के पात्रों से स्वयं को जुड़ा महसूस करते हैं और उस के जैसा ही बनना चाहते हैं. आप कैसी सास बनना पसंद करेंगी? ‘कुछ रंग प्यार के’ सीरियल की ईश्वरी देवी जैसी या फिर ‘बालिका वधू’ की दादीसा जैसी?

बहू का कौन सा किरदार आप को सूट करता है? आप सासबहू के किसी भी किरदार

के रूप में ढलें, पर एक सवाल अपनेआप से जरूर करें कि क्या घर के किसी भी सदस्य को दुख पहुंचा कर आप खुश रह सकती हैं? क्या परिवार के सदस्यों के आत्मसम्मान को चोट पहुंचाने से आप का जमीर आप को धिक्कारता नहीं? परिवार एक माला की तरह है और सदस्य मोती हैं. फिर क्या आप इस माला के बिखरने से खुश रह सकेंगी?

बहुओं के लिए जरूरी है कि वे बुजुर्गों के साथ कभी बहस न करें. किसी भी टकराव की स्थिति से बचें. अपनी बात उन के सामने जरूर रखें पर शांतिपूर्ण तरीके से.

इन सब से ऊपर लड़के की समझदारी भी जरूरी है. समझदारी एक अच्छे पति, बेटे और दामाद के रूप में.

मुंबई में रहने वाली वाणी का कहना है, ‘‘मैं तमिल परिवार से हूं और मेरी शादी एक पंजाबी परिवार में हुई है. मुझे सास का बहुत डर था. मेरी सहेली और रिश्तेदारों ने मुझे सास नाम से डरा दिया था. हमारी शादी अलग धर्म में हुई थी. रहनसहन, खानपान सब अलग था, लेकिन जितना मैं डर रही थी, उस का उलटा ही हुआ.

‘‘मेरी सास ने मुझे प्यार से सब कुछ बनाना सिखाया, हिंदी बोलना सिखाया. वे मुझे सास कम और दोस्त ज्यादा लगीं.’’

दिल्ली की मधु कहती हैं, ‘‘मैं सिर्फ 16 साल की उम्र में खुशीखुशी अपनी ससुराल आ गई. मेरे मन में किसी तरह का डर और पूर्वाग्रह नहीं था. मैं ने सोच रखा था कि कोई उलटा जवाब नहीं दूंगी. फिर कोई मुझ से नाराज क्यों होगा?

‘‘सासूजी वैसे तो बात बड़े प्यार से करती थीं, लेकिन मन ही मन न जाने क्यों उन्हें अपने बेटे के बदल जाने का डर था, जिस की वजह से वे मेरे हर काम में कोई न कोई कमी निकालती रहतीं. मैं कोई वादविवाद नहीं करती, फिर भी बात धीरेधीरे बढ़ने लगी.

‘‘सासूजी अब बाहर के लोगों के सामने भी मेरी बेइज्जती करने लगीं. वे हर समय मेरी बुराई करतीं. मेरी भी सहनशक्ति जवाब देने लगी थी. मैं उन्हें पलट कर बातें सुनाने लगी. इन सब बातों से घर का वातावरण खराब होने लगा. पति हर समय तनाव में रहते. वे न तो मां को समझा पाते और न ही मुझ को.

‘‘इस बीच मेरी सास बीमार हुईं पर जब मैं ने उन की खूब सेवा की तो उन का मन मेरे प्रति बदल गया और वे मुझे प्यार करने लगीं. मुझे नहीं मालूम कि उन का मन परिवर्तन मेरी सेवा से हुआ या मेरी समझदारी से. महत्त्वपूर्ण यह है कि आज घर का माहौल शांत है.’’

इन 2 मामलों से बिलकुल अलग एक मामला है मोहिनी का. वे बताती हैं, ‘‘मेरी शादी के बाद से ही परेशानियों का दौर शुरू हो गया था. पूरे घर में सास और ननद का वर्चस्व था. कहने को तो ननद शादीशुदा थीं पर शुरू से ही मेरी काट करती रहतीं. मैं सासससुर और ननद के त्रिकोण में फंसी थी.

‘‘पति हमेशा चुप रहते. उन दोनों की कुटिल चालों से हमारे अलग होने तक की नौबत आ गई. फिर अचानक कुछ ऐसा हुआ कि हालात ने करवट बदल ली. पति अब समझ गए हैं कि कमी कहां है.

‘‘ननद अपनी हरकतों के कारण मायके में ही है. सासूजी को भी अब मेरी उपयोगिता पता चल गई है. बेटी और बहू के बीच एक बहुत बारीक सी रेखा होती है. जरूरत सिर्फ उसे खत्म करने की होती है. पीछे मुड़ कर देखती हूं तो बहुत दुख होता है, क्योंकि जो गोल्डन पीरियड था वह खत्म हो गया था. फिर भी एक सुकून है कि चलो देर आए दुरुस्त आए.’’

पराई नहीं अपनी बेटी मानें

कुछ घरों में सासबहू का रिश्ता मांबेटी जैसा होता है जबकि कुछ घरों में हालात बहुत खराब होते हैं. कमी न मां में होती है न बहू में, कमी तो उन की समझ, उन के प्यार में होती है.

सवाल यह है कि आखिर सास बहू को पराया क्यों मानती है? कहने को अगर घर की बात है तो हम हमेशा यही सुनना पसंद करेंगे कि घर उस का है. लेकिन घर के साथ जिम्मेदारियां भी होती हैं.

वहीं दूसरी ओर कुछ बहुएं ऐसी भी होती हैं, जो सिर्फ अपने पति की या बच्चों की ही जिम्मेदारी उठाना चाहती हैं, सासससुर की नहीं. इसे घर संभालना नहीं कहते.

घर में तो सभी लोग होते हैं. सब के बारे में सोचना चाहिए जैसे वह अपने मायके में सब के लिए सोचती है.

वस्तुत: घर पूरे परिवार का होता है. हर सदस्य को अलगअलग अपनी जिम्मेदारियां उठानी चाहिए. घर को सिर्फ सास का कहना या बेटे और उस की पत्नी का कहना गलत होगा, क्योंकि घर में बाकी लोग भी तो रहते हैं. किसी एक इनसान से घर नहीं बनता. घर तो पूरे परिवार से बनता है.

छोटीछोटी बातों का ध्यान रखा जाए, तो परिवार का वातावरण सहज, सुखद एवं शांतिपूर्ण बन सकता है.

हार्दिक पांड्या ने ‘कंगारूओं’ से इस तरह निकाली अपनी दुश्मनी

भारतीय क्रिकेट टीम ने रविवार को इंदौरा के होल्कर स्टेडियम में आस्ट्रेलिया के खिलाफ अपना तीसरा वनडे मैच खेला और कंगारूओं को 5 विकेट से मात दी. अपनी इस जीत के साथ भारत वनडे में नंबर वन टीम बन गई और पांच वनडे मैच की सीरीज में 3-0 की अजेय बढ़त लेते हुए कब्जा जमा लिया. वनडे मैच में आस्ट्रेलिया ने टौस जीतकर पहले बल्लेबाजी की और एरोन फिंच के शतक और कप्तान स्टीव स्मिथ की पारियों के दम पर पूरे 50 ओवर खेलते हुए 6 विकेट के नुकसान पर 293 रनों का मजबूत स्कोर खड़ा किया. भारत ने 294 के लक्ष्य को हार्दिक पांड्या (78), रोहित शर्मा (71), और अजिंक्य रहाणे (70), की बेहतरीन पारियों के बूते 47.5 ओवरों में ही पांच विकेट खोकर हासिल कर लिया. पांड्या ने दो विकेट भी लिए. हरफनमौला खेल के लिए उन्हें ‘मैन आफ द मैच चुना’ गया.

रोहित और रहाणे ने पहले विकेट के लिए 139 रनों की साझेदारी करते हुए जीत की नींव रखी. इसके बाद पांड्या और मनीष पांडे (नाबाद 36) ने पांचवें विकेट के लिए 78 रनों की साझेदारी कर टीम को जीत की दहलीज पर पहुंचाया. महेंद्र सिंह धोनी (नाबाद 3) और पांडे ने मिलकर जीत की औपचारिकता को पूरा किया.

तीन रनों के भीतर दो विकेट खोने के बाद मेजबान टीम एक बार फिर दबाव में थी और आस्ट्रेलिया को जीत की खुशबू आने लगी थी. लेकिन पांड्या ने कंगारूओं के इस सपने को तोड़ दिया. यहां से पांड्या ने मनीष पांडे के साथ पारी को संभाला और टीम को जीत की दहलीज पर लाकर खड़ा कर दिया. आपको बता दें कि इस बार डीप मिड विकेट पर अपनी शानदार पारी में एश्टन एगर की गेंदबाजी के दौरान पांड्या ने शानदार छक्के जड़े और वाइड लान्ग आन पर गेंद को हवा में उड़ाकर बाउंड्री के पार पहुंचाया.

72 गेंदो के भीतर पांड्या ने 5 चौके और 4 छक्के लगाए. इस दौरान आस्ट्रेलियाई कप्तान स्मिथ ने उनका कैच भी छोड़ा जिसका पांड्या ने बखूबी फायदा उठाया. जीत के लिए जब 10 रन शेष रह गये थे तभी पांड्या पवेलियन लौट गये. जिसके बाद धोनी और पांडे ने टीम को जीत दिलाई.

बता दें कि इससे पहले भी हार्दिक पांड्या ने चेन्नई वनडे में शानदार जिताऊ पारी खेलते हुए और बल्‍लेबाजी में अपना दम दिखाते हुए 5 चौकों और 5 छक्‍कों की मदद से 83 रन बनाए. इसी के साथ उन्होंने आस्ट्रेलियाई टीम के दो बल्‍लेबाजों को भी आउट किया था. अपनी 83 रन की पारी के दौरान हार्दिक ने एडम जंपा की लगातार तीन गेंदों पर छक्‍के जड़े थे.

गौरतलब है कि इससे पहले भारत चेन्नई वनडे में 26 रनों और कोलकाता वनडे में 50 रनों से जीत हासिल कर चुके हैं.

आधार अपडेट के लियें बैंक जाने का समय नहीं, तो अपनायें ये तरीका

केंद्र सरकार ने बैंकिंग सेवाओं के लिए भी आधार कार्ड को लिंक करना अनिवार्य कर दिया है. हालांकि, इसके लिए आखिरी तारीख 31 दिसंबर रखी गई है. कामकाजी लोगों के लिए सबसे बड़ी परेशानी है कि उन्हें इस काम के लिए बैंक जाने की फुर्सत नहीं है लेकिन इससे घबराने की जरूरत नहीं है.

क्योंकि हम आपको बताने जा रहे हैं कि बिना बैंक शाखा गए आप अपने खाते से आधार संख्या लिंक करा सकते हैं. हम आपको बता रहे हैं कि कैसे आप बिना बैंक गए घर बैठे अपने आधार नंबर को अपने अकाउंट से कैसे लिंक कर सकते हैं.

एटीएम

अगर आपके मोबाइल में आपके बैंक का एप नहीं है तो कोई बात नहीं. आपको जब मौका मिले तब घर के पास या दफ्तर के पास, जिस बैंक में आपका खाता है, उसके किसी भी एटीएम में जाएं और वहां यह काम कर लें. इसके लिए सबसे पहले आप अपना कार्ड एटीएम में स्वाइप करें. इसके बाद भाषा का चुनाव करें, जो स्क्रीन पर डिस्पले हो रहा होगा. अपना डेबिट कार्ड पिन डालकर लौग इन करें. इसके बाद स्क्रीन पर दिख रहे औप्शन्स में आप मोर औप्शन पर क्लिक करें. उसके तहत आधार अपडेट मेन्यू पर क्लिक करें. मेन्यू खुलते ही आपसे 12 डिजिट का आधार नंबर मांगा जाएगा आप उसे दाखिल करें. इसे दोबारा डालें और अपने रिक्वेस्ट को सबमिट कर दें.

मोबाइल एप

आप अपने बैंक के मोबाइल एप में सबसे पहले लौग इन करें. इसके बाद इंटरनेट बैंकिंग आईडी और पासवर्ड या 4 डिजिट का पिन डालें. इसके बाद सर्विसेज में जाकर इन्स्टाबैंकिंग सर्विस पर क्लिक करें. उसमें अपडेट आधार का औप्शन आएगा. उसमें 12 डिजिट का अपना आधार नंबर डालें और उसे सबमिट कर दें. अब आपका आधार नंबर आपके बैंक से अपडेट हो गया और आपकी चिंता भी खत्म.

इंटरनेट बैंकिंग

इसके लिए आप इंटरनेट बैंकिंग में लौग इन करें यूजर आईडी और पासवर्ड डालें. सर्विस मेन्यू में अपडेट आधार आईकौन पर क्लिक करें और उसके अंदर 12 डिजिट का आधार नंबर डालें. इसके बाद आपको दोबारा आधार नंबर डालने को कहा जाएगा ऐसा कर के सबमिट बटन दबा दें.

ब्रांच जाकर

इन चारों के अलावा आप नजदीकी बैंक शाखा जाकर भी अपने आधार नंबर को खाते से अपडेट करा सकते हैं.

फोन बैंकिंग या आईवीआर

आप फोन बैंकिंग अफसर से बात कर भी अपने आधार नंबर को अकाउंट से लिंक करा सकते हैं. इसके लिए कस्टमर केयर नंबर पर कौल करें. उसके बात आप जिस भाषा में बात करना चाहते हैं उसका चुनाव करें. बैंकिंग अकाउंट के लिए मांगे गए विकल्प को दबाएं. उसके बाद 16 डिजिट का अपना डेबिट कार्ड नंबर डालें फिर पिन नंबर डालें. इसके बाद फोन बैंकिंग अफसर से बात कर उनसे आधार नंबर अपडेट करने को कहें.

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