अकसर लड़कों को बड़े होते देख मातापिता उन के विवाह के सपने देखने लगते हैं. फिर किसी की बेटी को अपने कुल की शोभा बना कर अपने परिवार में ले आते हैं. इसी तरह लड़की को बड़ी होती देख उस के विवाह की कल्पनामात्र मातापिता को भावुक बना देती है. यही नहीं, स्वयं लड़की भी अपने विवाह की कल्पना में उमंगों से सराबोर रहती है. वह केवल पत्नी नहीं, बहू, भाभी, चाची, ताई, देवरानी, जेठानी जैसे बहुत सारे रिश्ते निभाती है.

शादी के कुछ समय बाद न जाने कौन से बदलाव आते हैं कि ससुराल वालों को बहू में दोष ही दोष नजर आने लगते हैं. उधर लड़की भी ससुराल वालों के प्रति अपनी सोच और रवैया बदल लेती है. कुछ परिवारों में तो 36 का आंकड़ा हो जाता है. लड़की के ससुराल पक्ष के लोग परिवार की हर मुसीबत की जड़ बहू और उस के परिवार वालों को ही मान लेते हैं. एकदूसरे को समझें जरूरी है कि आप एकदूसरे की भावनाओं को समझें. जब हम किसी की बेटी को अपने परिवार में लाते हैं, तो उसे अपने पिता के घर (जहां वह पलीबढ़ी) की अपेक्षा बिलकुल जुदा माहौल मिलता है. बात रहनसहन और खानपान की हो या फिर स्वभाव की, सब अलग होता है.

इस के अलावा पतिपत्नी के संबंधों को समझने में भी उसे कुछ समय लगता है. ऐसे में यदि परिवार के लोग अपेक्षाएं कम रखें और बहू को अपना मानते हुए समझ से काम लें, तो शायद परेशानियां जन्म ही न लें.

बहू के घर आने से पहले ही सासें बहुत सारी अपेक्षाएं रखने लगती हैं जैसे बहू आएगी तो काम का बोझ कम हो जाएगा. वह सब की सेवा करेगी इत्यादि.

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