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जरूरी खबर : बिना पैन कार्ड रुक जाएंगे आपके ये काम

वर्ष 2018 में टैक्स चोरी से लेकर पैसों के लेन-देन में पारदर्शिता बनाएं रखने के लिए कई नियमों में बदलाव किया गया है. इन नये नियमों को आपके लिए जानना बेहद जरूरी है. इन नियमों के तहत अब मौद्रिक लेन-देन में पैनकार्ड का इस्तेमाल बढ़ा दिया गया है. अब पैन कार्ड न होने पर आपके कई कामों में अड़चन आ सकती है. आइए यहां हम आपको बताते हैं कि पैन कार्ड न होने पर आपके कौन-कौन से काम रुक सकते हैं.

यदि आप बैंक में नया खाता खुलवाना चाहते हैं या फिर फिक्स डिपौजिट (एफडी) करवाना चाहते हैं तो आपको पैन कार्ड की आनश्यकता होगी. ऐसा इसलिए क्योंकि नये नियमों के अनुसार, अब बिना पैन कार्ड के ये दोनों ही काम करना आसान नहीं होगा.

अगर 31 मार्च 2018 तक आपने बैंक खाते को पैन कार्ड से लिंक नहीं किया है तो आपका खाता वैध नहीं रह सकता है.

बैंक में अब 50 हजार रुपए या उससे अधिक पैसा जमा करने के लिए भी पैन कार्ड देना पड़ेगा. ये नियम जल्द ही लागू किया जा सकता है.

वहीं अगर आप प्रौपर्टी खरीदने का सोच रहे हैं और आपने अभी तक पैन कार्ड नहीं बनवाया है तो आपको बता दें कि आप बिना पैन कार्ड के प्रौपर्टी नहीं खरीद पाएंगे.

आजकल हर किसी का सपना होता है कि उसके पास अपनी गाड़ी हो. लेकिन अब आपको गाड़ी खरीदनी है तो इसके लिए पैन कार्ड एक जरूरी डौक्यूमेंट हो गया है.

वर्तमान के इस डिजिटल युग में डेबिट कार्ड या क्रेडिट कार्ड के बिना गुजारा मुमकिन नहीं है. ऐसे में अगर आप इसके डेबिट/क्रेडिट कार्ड के लिए अप्लाई करने जा रहे हैं तो पहले पैन कार्ड बनवा लें. बिना पैन कार्ड के आपका यह काम रुक जाएगा.

अगर आप भविष्य में विदेश जाना चाहते हैं तो हो सकता है कि फ्लाइट टिकट बुक करने के लिए भी आपको पैन कार्ड की जरूरत पड़े.

यदि आप भविष्य में शेयर मार्केट में इंवेस्ट करने की सोच रहे हैं तो इसके लिए पैन कार्ड जरूरी किया जा सकता है. वहीं एक निश्चित राशि से ज्यादा राशि के स्टौक खरीदने के लिए शायद आपको पैन कार्ड के बिना दिक्कत हो सकती है.

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सलमान खान को नहीं मिला दो करोड़ में सकाब

आखिरकार सलमान खान को भी अब अहसास हो गया कि ‘‘पैसे से सब कुछ नहीं खरीदा जा सकता.’’ इसकी वजह यह है कि कुछ दिन पहले सलमान खान ने अहमदाबाद निवासी सिराज खान पठान के विश्व प्रसिद्ध घोड़े सकाब को खरीदने के लिए सिराज खान पठान को एक बिचौलिए के माध्यम से दो करोड़ रूपए देने की पेशकश की थी, मगर सिराज खान ने अपने इस घोड़े को बेचने से साफ इंकार कर दिया.

जबकि सूत्रों के अनुसार जब इस घोड़े की उम्र पांच वर्ष थी, तब सिराज खान पठान ने इस घोड़े को राजस्थान के एक मेले में महज साढ़े चौदह लाख रूपए में खरीदा था. इस घोड़े के वह तीसरे खरीददार थे. पहले इसका नाम तूफान था, दूसरे खरीददार ने इसका नाम बदलकर पवन किया था, पर सिराज ने इसे नाम दिया- ‘सकाब’.

वास्तव में सकाब अपने आप में पूरे भारत में अनूठा घोड़ा है. सकाब की बराबरी पूरे विश्व में सिर्फ दो घोड़े कर सकते हैं, जिसमें से एक घोड़ा अमरीका में है और दूसरा कनाडा में है. सकाब 43 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ता है और उसकी इस गति में कोई बदलाव नहीं आता, इससे घुड़सवार के लिए उसकी सवारी करना काफी आसान हो जाता है. अब तक इतिहास में किसी अन्य घोड़े के बारे में ऐसा नहीं सुना गया.

एक अखबार के मुताबिक सकाब की मां पाकिस्तानी सिंधी नस्ल की थी. जबकि इसके पिता राजस्थानी सुथारवाड़ी नस्ल के थे. यह घोड़ा अब तक 19 दौड़ जीत चुका है, पर सिराज ने अपने इस घोड़े सकाब को किसी प्रतियोगी घुड़दौड़ का हिस्सा नहीं बनाया.

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बोरिस बेकर : अय्याशी और आशिकी ने बनाया दिवालिया

अगर कोई यह कहे कि वह बोरिस बेकर को नहीं जानता तो तय है कि उस की दिलचस्पी लौन टेनिस में कतई नहीं है. करोड़ों लोगों की दिलचस्पी टेनिस में पैदा करने वाले बोरिस बेकर को हाल ही में एक ब्रिटिश कोर्ट ने दिवालिया घोषित कर दिया तो टेनिस पे्रमियों के जेहन में सहज ही सन 1985 के विंबलडन की यादें ताजा हो आईं.

उस समय तक भारत में टीवी काफी लोकप्रिय हो चुका था और उसी के जरिए लोग जान रहे थे कि दुनिया के सब से दूसरे महंगे खेल टेनिस को, जिस का अपना अलग ही आकर्षण था. सन 1985 का विंबलडन टूर्नामेंट कई मायनों में अहम और दिलचस्प था. फाइनल मुकाबला तब के धाकड़ खिलाड़ी केविन कुर्रान और बोरिस बेकर के बीच था.

केविन कुर्रान की जीत तय मानी जा रही थी, क्योंकि उन का मुकाबला एक ऐसे लड़के से था, जो पहली दफा पेशेवर टूर्नामेंट खेल रहा था. दूसरे केविन कुर्रान क्वार्टर फाइनल में जान मैकेनरो और सेमी फाइनल में जिमी कानर्स जैसे नामी खिलाडि़यों को हरा कर फाइनल तक पहुंचे थे. ये दोनों ही खिलाड़ी समीक्षकों, दर्शकों और सटोरियों की निगाह में खिताब के प्रबल दावेदार और हकदार थे, लेकिन केविन कुर्रान ने बाजी पलट दी थी.

सुनहरे घने बालों वाले बोरिस की चमकती भूरी आंखें और भौहें हर किसी को भाई थीं, पर वह केविन कुर्रान को हरा कर टेनिस का यह सब से बड़ा खिताब अपने नाम कर पाएंगे, इस में हर किसी को शक था. इस टूर्नामेंट में बोरिस बेकर की हैसियत एक गैर वरीयता प्राप्त खिलाड़ी की थी, जिस के बारे में माना जा रहा था कि वह थोड़ा संयोग और थोड़ी सी प्रतिभा और खेल तकनीक के दम पर फाइनल तक आ पहुंचे हैं.

उस किशोर में ऊर्जा थी, पर उस का सब से बड़ा हथियार तेज सर्विस थी, जिस के चलते सामने कोर्ट में खड़े प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी को गेंद दिखती ही नहीं थी. लंदन के विंबलडन कोर्ट में मुकाबला शुरू होते ही रोमांच छा गया था. मुकाबला तजुर्बे और जोश के बीच था. जैसे ही पहला सेट बोरिस बेकर ने 6-3 के अंतर से आसानी से जीता, दर्शकों ने बूमबूम बेकर चिल्लाना शुरू कर दिया.

बूमबूम का यह खिताब बोरिस बेकर को उन की तेज सर्विस के लिए दिया गया था. लेकिन दूसरे सेट में केविन ने बेकर की सर्विस तोड़ते हुए 7-6 से जीता तो दुनिया भर के टेनिस प्रेमियों की सांस रुक गई. कल का आया लड़का एक झटके में विंबलडन जीत ले जाएगा, यह बात किसी को सहज पच नहीं रही थी. तीसरा सेट, जो दोनों के लिए निर्णायक साबित होता, पिछले 2 सेटों के मुकाबलों से ज्यादा कठिन था.

स्कोर जब 6-6 की बराबरी पर आया तो स्टेडियम में बैठे दर्शक सकते में आ गए. ड्यूज में बोरिस बेकर ने चतुराई दिखाते हुए 7-6 से यह सेट जीता तो लगभग साफ हो गया कि विंबलडन 1985 का पुरुष एकल खिताब पहली बार जर्मनी के खाते में जा रहा है. और ऐसा हुआ भी. 3 सेट्स में पस्त पड़ चुके केविन की थकान का फायदा बोरिस बेकर नाम के इस लडके ने उठाया और चौथा सेट थोड़े संघर्ष के बाद 6-4 से जीत कर एक ऐसा इतिहास रच दिया, जो आज तक लोगों को रोमांचित कर रहा है.social

पहली बार टेनिस पर से अमेरिकी दबदबा जब टूटा था, जिस का श्रेय बोरिस बेकर से ज्यादा अफ्रीकी मूल के केविन कुर्रान को जाता है, जिन्होंने टेनिस से कौनर्स, बोर्ग और मैकेनरो युग को विदा कर दिया था. जान मैकेनरो ने सन 1984 में और कौनर्स ने सन 1982 में विंबलडन खिताब जीते थे. दूसरे ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट यूएस, फें्रच और आस्टे्रलियाई ओपन भी इन्हीं के नाम रहते थे.

बहरहाल, एक दिन में ही बोरिस बेकर दुनिया में छा गए. उन की इस उपलब्धि पर जर्मनी में जोरदार और शानदार जश्न मनाया गया. जब वह यह खिताब ले कर अपने देश पहुंचे तो उन का स्वागत पोप सरीखा किया गया. इस के वह हकदार भी थे.

बोरिस बेकर अब जिज्ञासा और उत्सुकता का विषय बन चुके थे. जिन के बारे में लोगों के पास यही जानकारियां थीं कि उन का जन्म जर्मनी के लीमेन गांव के एक मध्यमवर्गीय परिवार में 22 नवंबर, 1967 को हुआ था. कैथोलिक धर्म के अनुयायी बोरिस बेकर के पिता कार्ल हाइंज पेशे से आर्किटैक्ट थे और उन की एक ही संतान थी बोरिस बेकर.

कार्ल हाइंज ने ब्लौ वाइज टेनिस सैंटर बनाया था. उसी में बोरिस ने महज 8 साल की उम्र से टेनिस में हाथ आजमाने शुरू किए थे. उस समय यानी 90 के दशक की शोहरतशुदा महिला खिलाड़ी स्टेफी ग्राफ भी इसी मैदान में अभ्यास करती थीं. खेल में व्यस्तता के चलते बोरिस हाईस्कूल तक ही पढ़ पाए थे.

17 साल की उम्र में विंबलडन जैसा अहम खिताब जीतने के बाद बोरिस के सामने चुनौती थी कि वह साबित करें कि सन 1985 की खिताबी जीत इत्तफाक नहीं थी. बहुत जल्द उन्होंने अपनी प्रतिभा दिखा भी दी. सन 1986 का विंबलडन बोरिस बेकर ने फिर जीता और हर ग्रैंड स्लैम प्रतियोगिता में नामी खिलाडि़यों को धूल चटा कर टेनिस में नए युग की शुरुआत की. सन 1986 का डेविस कप में उन का मुकाबला जान मैकेनरो से हुआ, जो टेनिस के इतिहास का सब से लंबा मैच था. 6 घंटे और 22 मिनट तक चले इस मैच में बोरिस ने जान मैकेनरो को 4-6, 15-13, 8-10, 6-2 और 6-2 से हराया था. सन 1985 से ले कर सन 1999 तक का समय बोरिस बेकर के कैरियर का सब से सुनहरा और कामयाब समय था.social

सन 1991 के आस्टे्रलियाई ओपन में जब उन्होंने चेकोस्लोवाकिया के इवान लैंडल को हराया था, तब यह मान लिया गया था कि वाकई बोरिस बेकर सर्वश्रेष्ठ हैं. इसी मैच के बाद उन्हें पहली बार पहली वरीयता मिली थी, जो हर एक टेनिस खिलाड़ी का खवाब होती है.

अपने कैरियर के दौरान बोरिस बेकर ने रिकौर्ड 49 एकल और 15 युगल खिताब जीते, जिन में बार्सिलोना ओलंपिक भी शामिल है. दौलत और शोहरत, दोनों बोरिस बेकर पर बरसे, लेकिन टेनिस खिलाड़ी की मियाद बहुत ज्यादा नहीं होती. इस खेल में हर साल एक नया स्टार उभरता है और पुराना डूबता है. 14 साल टेनिस के आसमान पर चमकने के बाद बोरिस ने सन 1999 में संन्यास ले लिया.

अब तक थकान उन पर हावी हो चली थी और व्यक्तिगत जीवन में भी वह लड़खड़ाने लगे थे. आमतौर पर होता यह है कि दौलत और शोहरत को पाने या बनाए रखने में कम पढ़ेलिखे खिलाडि़यों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. खेलतेखेलते सेलीब्रेटी हो जाने वाले खिलाड़ी सार्वजनिक जिंदगी जीते हैं, उन का व्यक्तिगत जीवन बचता नहीं, जिस के लिए एक हद तक वह खुद भी जिम्मेदार होते हैं.

बोरिस बेकर कुछकुछ मनमौजी और दार्शनिक अंदाज के युवा थे. लापरवाही और रोमांस उन की फितरत में शामिल थे, जिन्हें ले कर उन के मुख्य और पहले कोच गुथर वोश्च बेहद चिंतित रहते थे. एक अच्छे कोच का काम सिर्फ खेल निखारना ही नहीं, बल्कि खिलाड़ी को व्यावहारिक और संतुलित बनाए रखना भी होता है.

बोरिस बेकर चोरीछिपे ही नहीं, खुलेआम भी फ्लर्ट करते रहते थे. कई लड़कियां उन की जिंदगी में आईं और गईं, पर यह सब कुछ मौजमस्ती थी, जिसे तात्कालिक अनुबंध कहा जा सकता है.

बारबार टोकने के बाद भी जब बोरिस बेकर अपनी उन हरकतों, जो उन्हें बदनाम कर सकती थीं, से बाज नहीं आए तो गुथर वोश्च ने एक बार खुल कर कहा भी था कि यह आशिकी एक दिन बोरिस को बरबाद कर देगी. कोच गुथर की टोकाटाकी से आजिज आ कर बोरिस ने अपने इस कोच को पद से हटा दिया था.

अब तक बोरिस बेकर का जीवन ठीकठाक गुजर रहा था. बोरिस बेकर के प्रेमप्रसंगों को चटखारे ले कर सुनने वाले जर्मनी की जनता उस वक्त हैरान रह गई थी, जब उन्होंने एक अश्वेत युवती बारबरा फेल्टस से शादी करने की घोषणा की थी. बारबरा पेशे से एक्ट्रेस और फैशन डिजाइनर थीं.

रंगभेद की बीमारी से जर्मनी अछूता नहीं था, इसलिए अपने स्टार प्लेयर और वंडर किंग को एक काली लड़की से शादी करने का फैसला उसे गंवारा नहीं हुआ. बोरिस बेकर और बारबरा फेल्टस की शादी को ले कर जर्मनी में काफी विरोध प्रदर्शन हुए. सार्वजनिक विरोधों से बेकर घबराए नहीं, उलटे जैसेजैसे विरोध बढ़ता गया, वैसेवैसे बारबरा से शादी करने का उन का इरादा और भी दृढ़ होता गया.

आखिरकार एक अफ्रीकी फोटोग्राफर हारलेन फेल्टस की बेटी बारबरा फेल्टस बोरिस बेकर से शादी कर बारबरा बेकर बन गई. दिसंबर, 1993 में कोर्ट में दोनों ने शादी कर ली. चूंकि इस वक्त में बोरिस का खेल शबाब पर था, इसलिए इस शादी का विरोध जल्द ठंडा पड़ गया.

बोरिस और बारबरा की वैवाहिक जिंदगी के शुरुआती 6 साल ठीकठाक गुजरे. बारबरा ने 2 बच्चों को जन्म दिया. पहले बेटे का नाम नूह और दूसरे का नाम एलियास वाल्थासार रखा गया. बोरिस बेकर का खेल और कैरियर दोनों अब ढलान पर थे. उन्होंने टेनिस से बेशुमार दौलत कमा ली थी. अब उन का नाम टेनिस प्रेमियों की जुबान से उतरने लगा था.

मुमकिन है, शोहरत के आदी हो गए बोरिस अवसाद में आ गए हों और इसी अवसाद से उन के और बारबरा के बीच तलाक जैसी अप्रिय नौबत आ गई हो. हालांकि इस नौबत की बुनियाद उन की शादी के बाद सन 1995 में ही तब रख गई थी, जब शादी के कुछ महीनों बाद ही इन दोनों की एक नग्न तस्वीर ‘स्टर्न’ नाम की पत्रिका में छपी थी.

इस पर काफी बवंडर मचा था, पर इस फोटो का रहस्य खुला नहीं था. संभावना इस बात की ज्यादा थी कि बोरिस को अंदाजा हो गया था कि यह हरकत किस की हो सकती थी, पर अपनी शंका के प्रति वह आश्वस्त नहीं थे, इसलिए खामोश रहे. लेकिन ‘स्टर्न’ के कवर पेज पर सपत्नीक छपी नग्न तसवीर से वह काफी व्यथित और उद्वेलित हुए थे.

 

यह सन 1998 की बात है, जब बारबरा दूसरी बार गर्भवती हो कर लंदन के एक अस्पताल में भर्ती थीं. बोरिस हालांकि एक आदर्श पति की तरह उन का ख्याल रखते थे, पर उन दोनों के बीच की खटपट सामने आने लगी थी. पत्नी को अस्पताल में भर्ती करा कर बोरिस आदतन शराब पीने एक रेस्टोरेंट में गए, जहां एक वैट्रेस एंजेला एरमाकोवा से उन की आंखें लड़ गईं.

आंखों ही आंखों में एक करार हुआ. बोरिस बेकर और एंजेला ने कुछ घंटे तनहाई में गुजारे. यह अभी तक रहस्य है कि उन का मिलन झाडू रखने वाले कमरे में हुआ था या टायलेट की सीढि़यों पर. इस दौरान दोनों में शारीरिक संबंध बने, जो कतई नई या हैरानी की बात नहीं थी. लेकिन यह मिलन पूर्वनियोजित भी नहीं था.

अगर होता तो तय था कि बोरिस बेकर जैसा सधा खिलाड़ी कंडोम इस्तेमाल करने की ऐहतियात जरूर बरतता. बात ‘रात गई बात गई’ के तर्ज की थी. बोरिस वापस लौट आए और भूल गए कि बीती रात क्या हुआ था. इसी दौरान बोरिस को कहीं से अपुष्ट ही सही, अहम खबर यह मिली कि शादी के बाद ‘स्टर्न’ में छपी उन की और बारबरा की नग्न तस्वीर के पीछे बारबरा के पिता हारलेन का हाथ था, वह सन्न रह गए. पर कोई प्रमाण न होने से खामोश रहे.

एंजेला ने ठीक 9 महीने बाद बोरिस को बताया कि वह उन के बच्चे की मां बनने वाली है तो वह और बौखला उठे. जिंदगी में कुछ भी ठीकठाक नहीं चल रहा था. कल का बूमबूम बेकर, जिस की सर्विस और फोरहैंड रिटर्न पर करोड़ों लोग तालियां बजाते थे, नेपथ्य में कहीं थे. बोरिस बेकर अब तनहा थे और सुकून चाहते थे, जो उन्हीं की हरकतों के चलते उन्हें नहीं मिल रहा था.

बोरिस और एंजेला के संबंधों की खबर भी ढकीमुंदी नहीं रह गई थी. जब इस चटपटी खबर को मीडिया ने उठाया कि एंजेला बोरिस बेकर के बच्चे की मां बनने वाली है तो तिलमिलाई बारबरा ने उन्हें तलाक का नोटिस थमा दिया. शायद बोरिस बेकर को यकीन नहीं हो रहा था कि इस उम्र में एक बार के मिलन से भी कोई महिला उन से गर्भवती हो सकती है, इसलिए उन्होंने इस आरोप को नकार दिया कि एंजेला उन के बच्चे की ही मां बनने वाली है.

इस बाबत उन्होंने प्राइवेट जासूसों की सेवाएं भी लीं, पर कोई ठोस नतीजा नहीं निकला. बात बिगड़ी तो डीएनए जांच तक जा पहुंची, इस पर घबराए बोरिस ने स्वीकार कर लिया कि एंजेला से हुई बेटी उन की ही है. गलत नहीं कहा जाता कि हर मर्द चाहे वह कामयाब हो या नाकामयाब, किसी न किसी औरत को दिल से चाहता जरूर है. यही बोरिस के साथ हुआ.

वह वाकई बारबरा को चाहते थे, इसलिए उन्हें तलाक नहीं देना चाहते थे. उधर एंजेला प्रकरण के बाद बारबरा पति की गलती माफ नहीं कर पा रही थीं. उन के और बेकर के तलाक का मुकदमा अदालत में चला. मुकदमे के पहले बोरिस फ्लोरिडा में बारबरा को मनाने उन के घर गए, पर बेइज्जत कर भगा दिए गए.

कुछ ही सालों पहले तक करोड़ों प्रशंसकों के दिल में धड़कने वाले बोरिस बेकर अब बेहद दयनीय हालत में थे. टेनिस के खेल के लिहाज से अधेड़ावस्था में की गई अय्याशी की कीमत उन्हें चुकानी पड़ रही थी, जिस का दर्द कम से कम उस शराब के नशे से तो दूर होने वाला नहीं था, जिस में वह खुद को हर शाम डुबो लेते थे.

म्यूनिख की एक अदालत में यह मुकदमा चला और चर्चित इसलिए हुआ कि इस का सीधा प्रसारण हुआ था.

जनवरी, 2001 में अदालती फैसले के तहत बोरिस बेकर और बारबरा बेकर का विवाह विच्छेद हो गया. इस तलाक के लिए बोरिस बेकर को पत्नी को 90 करोड़ रुपए देने पड़े. अलावा इस के मियामी का उन का बड़ा आलीशान घर भी बारबरा को दे दिया गया. 2 करोड़ का कानूनी खर्च भी बोरिस बेकर को बारबरा को देना पड़ा.

बोरिस बेकर ने जिंदगी की एक लड़ाई हारी थी, पर हिम्मत नहीं हारी थी. तलाक के बाद जैसेतैसे उन्होंने खुद को संभाला और सन 2003 से बीबीसी के लिए टेनिस की कामेडी करने लगे. दूसरे व्यवसायों में भी उन्होंने अपनी जमापूंजी लगाई. सन 2003 में ही उन्हें इंटरनेशनल टेनिस के हाल औफ फेम से नवाजा गया.

कारोबार में वह शुरू में कामयाब रहे. कपड़ों का व्यापार भी उन्होंने किया, मर्सिडीज कारों के भी 3 शोरूम खोले और खासा पैसा कमाया. हेयर कंपनी जैसी नामी कंपनी से भी बोरिस बेकर जुड़े. सन 2006 में नामी टेलीकौम कंपनी वोडाफोन से भी उन्होंने एक करार किया, जिस के तहत उन्हें एक साल में 300 संदेशों के जवाब देने होते थे.

इस सब के बाद भी अब तक वह गुमनाम से हो चुके थे. ज्यादा पैसा कमाने की गरज से बोरिस बेकर ने जमीनों की खरीदफरोख्त का धंधा शुरू किया. जर्मनी से इंग्लैंड और फिर स्विट्जरलैंड जा बसे बोरिस बेकर जर्मन फुटबाल क्लब बेयर्न म्यूनिख के भी सलाहकार बन गए. सन 2002 में टैक्स चोरी के एक मामले में वह पकड़े गए थे, पर किसी तरह बिना किसी सजा या जुर्माने के बच निकले.

बहुत सी कमियों और हादसों को झेलने के बाद जिंदगी ढर्रे पर आने लगी तो बोरिस बेकर ने सन 2009 में दूसरी शादी करने का फैसला लिया. इस के पहले सन 2003 में अपनी आत्मकथा ‘द प्लेयर’ शीर्षक वाली पुस्तक उन्होंने लिखी, जिसे पाठकों ने नकार दिया. इस पुस्तक में अपनी जिंदगी और खेल की कई अहम घटनाओं का जिक्र उन्होंने किया है. एंजेला, जो बाद में रशियन मौडल बनी, से संबंधों का जिक्र भी इस में है.

बोरिस बेकर का टेनिस की दुनिया में नाम एक बार फिर सुर्खियों में तब आया, जब सन 2013 में सर्बिया के स्टार खिलाड़ी नोवाक जोकोविच ने उन्हें अपना कोच बनाया. एक कोच की भूमिका में वह कामयाब भी रहे और उन की मांग भी बढ़ने लगी.

सन 2009 में बोरिस बेकर ने डच मौडल शार्लेलि लिली केरसेनबर्ग से शादी कर ली, जिस से उन्हें एक बेटा हुआ. लिली एक खूबसूरत और सैक्सी खुले खयालों वाली महिला हैं.

जुलाई, 2017 में ही समुद्र किनारे उन्हें नहाते देखा गया था, तब वह टौप लेस थीं. ये तस्वीरें वायरल हुई थीं. लिली और बोरिस की पटरी कैसी बैठ रही है, यह बात तब उजागर हुई, जब अदालत ने बोरिस बेकर को दिवालिया घोषित कर दिया.

लंदन की एक अदालत ने जब दलीलें देते हुए उन्हें दिवालिया घोषित कर दिया, तब वह अदालत में मौजूद नहीं थे. बोरिस ने व्यवसाय के लिए बैंकों से 28 करोड़ रुपए बतौर कर्ज ले रखे थे. यह कर्ज उन्होंने 2 साल पहले लिए थे. दरअसल, बेकर के खिलाफ दिवालिएपन की दरख्वास्त आर्वथनाट लेथम नाम की कंपनी ने दी थी. इस पर बेकर के वकील की दलील यह थी कि उन के मुवक्किल को 28 दिनों की मोहलत दी जाए तो वह यह रकम चुका देगा.

इस दलील से अदालत की रजिस्ट्रार क्रिस्टीन डेरेट ने इत्तफाक न रखते हुए कहा कि बड़े खेद के साथ उन्हें कहना पड़ रहा है कि बोरिस बेकर यह पैसा नहीं लौटा पाएंगे. यह कोई आम बात नहीं है कि एक पेशेवर व्यक्ति अक्तूबर, 2015 से कर्ज नहीं लौटा पा रहा है, जो पुराना कर्ज है. क्रिस्टीन ने खुद को बोरिस बेकर का बड़ा प्रशंसक भी बताया था. अदालती फैसले पर बड़बोले बेकर ने टिप्पणी की कि उन के पास पैसा है और वह इसे लौटाने वाले थे.

पर साफ दिख रहा है कि बोरिस बेकर वाकई दिवालिया हो चुके हैं. इस पर अफवाह यह है कि अब लिली भी उन से तलाक चाहती हैं. अगर ऐसा हुआ तो जाहिर है, उन्हें दूसरी पत्नी को भी हर्जाने में या गुजारे के लिए भारीभरकम रकम देनी पड़ेगी. हालांकि सब कुछ सामान्य बताते हुए बेकर लिली के साथ सार्वजनिक स्थानों पर घूमतेफिरते दिखे, साथ में उन का 7 साल का बेटा भी था.

अब अंत जो भी हो, लेकिन यह साबित हो गया है कि बूमबूम बेकर दौलत और शोहरत संभालने में नाकाम साबित हुए हैं, इस की वजह उन का रोमांटिक और अय्याशमिजाज होना है. टेनिस के सब से कामयाब और होनहार स्टार का यह अंत और अंदाज एक सबक भी है कि सफलता स्थाई नहीं होती. इसे संभाल कर रखना पड़ता है.

मुमकिन है, तरस खा कर लिली तलाक न लें, क्योंकि अभी भी बोरिस बेकर के पास काफी जायदाद है, जिस में उन्हें ज्यादा फायदा दिख रहा होगा. टेनिस की बारीकियां समझने वाले बोरिस बेकर त्रियाचरित्र के शिकार हुए साफसाफ दिख रहे हैं.

बारबरा, एंजेला और लिली उन की भावनात्मक और शारीरिक कमजोरियों का फायदा उठाती रहीं, सच्चा प्यार उन्हें इन में से किसी ने नहीं किया.

भाजपा नेता कृष्णा शाही, आशनाई में गंवाई जान?

उस दिन जुलाई, 2017 की 18 तारीख थी. बिहार के गोपालगंज के फुलवरिया के बसवरिया मांझा गांव में लालबाबू  राय के घर तेरहवीं का भोज था. इस भोज में शहर के बड़ेबड़े लोग आए थे. हथुआ चौनपुर गांव के रहने वाले भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता कृष्णा शाही भी इस आयोजन में शामिल होने आए.

कृष्णा शाही लालबाबू राय के पोते आदित्य राय को दिल से चाहते और मानते थे, इसलिए उन के दादाजी के इस कार्यक्रम में उन का शामिल होना जरूरी था. करीब 20 सालों से दोनों परिवारों के बीच घरेलू संबंध थे और सुखदुख में एकदूसरे के यहां आनाजाना था.

खैर, आयोजन संपन्न हुआ तो नातेरिश्तेदारों को छोड़ कर सभी लोग अपनेअपने घर लौट गए. कृष्णा शाही रात को वहीं रुक गए. रात साढ़े 10 बजे उन की पत्नी शांता शाही ने फोन किया तो उन्होंने पत्नी को बताया कि आदित्य ने उन्हें अपने घर रोक लिया है. सुबह जल्दी घर लौट आऊंगा, क्योंकि पार्टी के काम से पटना जाना है. उन्होंने ड्राइवर सुनील को सुबह आने को कह दिया.

कृष्णा शाही को उस दिन पार्टी के काम से पटना जाना था. उन का ड्राइवर मुंहअंधेरे ही उन्हें लेने पहुंचा. लेकिन आदित्य राय ने बताया कि नेताजी तो रात को ही चले गए थे. ड्राइवर ने वापस लौट कर यह बात कृष्णा शाही की पत्नी शांता को बताई तो वह चौंकीं. उन्होंने पति को फोन किया. लेकिन उन के दोनों फोन बंद मिले. इस से शांता घबरा गईं. उन्होंने पति से बात करने की कई बार कोशिश की, लेकिन हर बार उन का फोन बंद मिला. जब शांता की समझ में कुछ नहीं आया तो उन्होंने यह बात अपने जेठ उमेश शाही को बताई और उन से पति के बारे में पता लगाने को कहा.crime story

उमेश शाही ने अपने छोटे भाई के मोबाइल पर फोन किया तो उन्हें भी फोन बंद मिला. उमेश के घर से आदित्य राय का घर 4-5 किलोमीटर दूर था. उमेश शाही बडे़ भाई दिनेश तथा कुछ अन्य लोगों को साथ ले कर आदित्य के घर बसवरिया मांझा गांव जा पहुंचे.

वहां पहुंच कर उन्होंने आदित्य राय को बुला कर पूछा, ‘‘कृष्णा कहां है आदित्य? अभी तक घर नहीं पहुंचा और उस का फोन भी बंद है?’’

‘‘नेताजी तो रात में ही यहां से घर चले गए थे.’’ आदित्य ने बताया.

‘‘यह क्या कह रहे हो तुम, कृष्णा रात में ही घर चला गया था तो अब तक पहुंचा क्यों नहीं?’’

यह सुन कर आदित्य भी चौंका.

इस के बाद आदित्य और उमेश के बीच कृष्णा शाही को ले कर बहस छिड़ गई. धीरेधीरे वहां गांव के लोग जुटने लगे. कृष्णा शाही कोई मामूली आदमी नहीं थे. वह बीजेपी के नेता और प्रदेश भाजपा व्यवसायी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष थे, साथ ही अपने क्षेत्र में काफी लोकप्रिय भी थे.

आदित्य की बातें सभी को बड़ी अजीब लगीं. उस की जुबान उस का साथ नहीं दे रही थी. उमेश ने यह बात भांप ली. वैसे भी वह समझ नहीं पा रहे थे कि कृष्णा रात को अगर उन के यहां सोया था तो कहां चला गया? मामला संदिग्ध लग रहा था, इसलिए सुबह 8 बज कर 10 मिनट पर उन्होंने कृष्णा शाही के रहस्यमय ढंग से गायब होने की सूचना फुलवरिया थाने को दे दी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी प्रेमप्रकाश राय ने यह जानकारी एसपी रविरंजन कुमार को दी. एसपी रविरंजन के आदेश पर कई थानों की पुलिस मौके पर पहुंच गई. हथुआ के डीएसपी मोहम्मद इम्तियाज भी वहां आ गए.

भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता कृष्णा शाही के रहस्यमय ढंग से गायब होने की सूचना जल्द ही उन के समर्थकों तक भी पहुंच गई. सैकड़ों की संख्या में उन के समर्थक आदित्य राय के गांव मांझा पहुंच गए. कृष्णा शाही की खोजबीन शुरू हुई. जहांजहां उन के ठहरने के अड्डे थे, वहांवहां तलाश की गई, लेकिन उन का कहीं पता नहीं चला. उन की खोजबीन करतेकरते 10-11 बज गए.

गांव का एक युवक यूं ही बड़का शिव मंदिर के पास वाले कुएं में झांकने लगा. भीतर का दृश्य देख कर वह चौंका. कुएं के पानी में एक जोड़ी चप्पल तैर रही थी. युवक उलटे पांव आदित्य के घर की ओर भागा, जहां भीड़ जमा थी.

युवक ने कुएं में चप्पल देखने की बात कही तो सब लोग कुएं की ओर दौड़े. कुएं के भीतर पानी के ऊपर तैर रही चप्पल को देख कर उमेश शाही पहचान गए. वे चप्पलें उन के छोटे भाई कृष्णा की थीं, जो वह घर से पहन कर निकले थे. उन्हें समझते देर नहीं लगी कि किसी ने कृष्णा की हत्या कर के लाश कुएं में फेंक दी है.

3 पुलिसकर्मियों को कुएं के भीतर उतारा गया. काफी खोजबीन के बाद कृष्णा की लाश पानी में नीचे मिल गई. बाहर निकाला गया तो लाश की कमर पर गमछे में भारी पत्थर बंधा मिला.

कृष्णा शाही की लाश मिलते ही वहां का माहौल गरम हो गया. चूंकि पुलिस फोर्स मौके पर मौजूद थी, इसलिए वह स्थिति को नियंत्रित किए हुए थी. कृष्णा का शव मिलने की बात सुन कर हजारों लोग बसवरिया मांझा गांव पहुंच गए. उग्र लोगों ने आदित्य राय के घर में तोड़फोड़ करनी शुरू कर दी. बाहर पड़ी कुर्सियों को तोड़ कर फेंका जाने लगा. घर के सामान उठा कर बाहर फेंक दिए गए. हंगामा कर रहे लोगों को रोकने के लिए कई थानों की पुलिस को तैनात किया गया. एसपी रविरंजन कुमार और डीएम भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

स्थिति पर काबू पाने के बाद पुलिस ने सुरक्षा के मद्देनजर आदित्य राय के घर को चारों ओर से कब्जे में ले लिया, ताकि कोई भी अप्रिय घटना न घट सके. पुलिस ने कृष्णा शाही की लाश का मुआयना किया तो मृतक के जिस्म पर कहीं भी चोट का कोई निशान नहीं पाया गया. हां, मृतक का होंठ जरूर नीला पड़ा हुआ था. इस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि कृष्णा की मौत जहर से हुई होगी.

मृतक के बड़े भाई उमेश शाही चीखचीख कर कह रहे थे कि सत्ता पक्ष (जनता दल यूनाइटेड) के विधायक अमरेंद्र पांडेय उर्फ पप्पू पांडेय ने साजिश रच कर मेरे भाई की हत्या करवाई है. साजिश में आदित्य भी शामिल है.

खैर, पुलिस ने कृष्णा शाही की लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल गोपालगंज भिजवा दी. इस के साथ ही पुलिस ने आदित्य राय एवं 4 महिलाओं को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया और थाने लौट आई.

उमेश शाही ने भाई की हत्या में 6 लोगों के खिलाफ लिखित तहरीर दी. इन 6 आरोपियों के नाम आदित्य राय, जदयू विधायक अमरेंद्र पांडेय उर्फ पप्पू पांडेय, सतीश पांडेय, उन के पुत्र जिला परिषद के चेयरमैन मुकेश पांडेय, चौनपुर गांव के निवासी यशवंत राय, सुशील उर्फ राजन थे.

मृतक के भाई उमेश शाही का आरोप था कि आरोपियों ने साजिश कर के उन के भाई कृष्णा की हत्या की है. पुलिस ने तहरीर के आधार पर सभी आरोपियों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 और 120बी के तहत नामजद मुकदमा दर्ज कर लिया.crime story

20 जुलाई को कृष्णा शाही के पोस्टमार्टम की रिपोर्ट पुलिस को मिल गई. रिपोर्ट में उन की मौत की वजह खाने में जहर मिला होना बताया गया था. पुख्ता जांच के लिए विसरा सुरक्षित रख लिया गया था.

हिरासत में लिए गए आदित्य और चारों महिलाओं से कड़ाई से पूछताछ की गई. आदित्य राय हर बार अपना बयान बदलता रहा. कभी वह शाही के घर से पैदल निकलने की बात कहता तो कभी किसी अनजान व्यक्ति का फोन आने पर रात में अकेले ही चले जाने की बात बताता.

कड़ाई के बावजूद महिलाओं ने भी अपना मुंह नहीं खोला. जब पुलिस ने थोड़ी और सख्ती की तो आखिर आदित्य ने घुटने टेकते हुए कह ही दिया, ‘‘हां, मैं ने ही खाने में जहर दे कर शाही की हत्या की है. जब से मैं ने फोन पर उन के और अपनी बहन के प्रेमसंबंध की बातें सुनी थीं, तभी से मेरे तनमन में आग लगी हुई थी. उस ने दोस्ती में जो दगाबाजी की, उसी से नाराज हो कर मैं ने उस की हत्या कर दी. मुझे इस का कोई पछतावा नहीं है.’’

आदित्य के अपराध स्वीकार करने के बाद उस के घर से जिन महिलाओं को हिरासत में लिया गया था, उन्हें छोड़ दिया गया. यह 19 जुलाई, 2017 की बात है.

12 घंटे के भीतर भाजपा नेता कृष्णा शाही हत्याकांड का परदाफाश हो गया था. एसपी रविरंजन कुमार ने अपने औफिस में प्रैस कौन्फ्रैंस कर के पत्रकारों को बताया कि भाजपा नेता कृष्णा शाही की हत्या अवैध संबंधों की वजह से की गई थी.

मामले की जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि जिस युवती से कृष्णा शाही के अवैध संबंध थे, वह उन के बेहद करीबी आदित्य राय की तीसरे नंबर की बहन रागिनी (बदला हुआ नाम) थी. इस की जानकारी होते ही आदित्य राय आगबबूला हो गया और भाजपा नेता को सबक सिखाने की फिराक में रहने लगा.

अपने दादाजी के तेरहवीं के मौके पर उस ने अच्छा मौका देख कृष्णा शाही के खाने में जहर दे कर उन की हत्या कर दी और लाश पास के कुएं में फेंक दी. आरोपी आदित्य राय ने पत्रकारों द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब में अपना अपराध स्वीकार करते हुए पूरी घटना विस्तार से बता दी.

उसी दिन शाम को पुलिस ने आरोपी आदित्य राय को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

33 वर्षीय कृष्णा शाही मूलरूप से बिहार के गोपालगंज के थाना हथुआ के गांव चौनपुर के रहने वाले थे. 5 भाईबहनों में वह सब से छोटे थे. उन से 2 बड़े भाई दिनेश और उमेश शाही थे. बड़ी बहनों की शादियां हो चुकी थीं. तीनों भाइयों में खूब निभती थी, इसीलिए उन का परिवार संयुक्त था.

कृष्णा शाही के पिता का नाम मैनेजर शाही था. 20 साल पहले 13 जनवरी, 1996 में गांव से थोड़ी दूर स्थित मठिया टोला जाते समय नक्सलियों के माले गु्रप ने उन की बम फेंक कर हत्या कर दी थी. उस समय कृष्णा शाही की उम्र 13 साल के करीब रही होगी. पिता की हत्या का सब से ज्यादा दुख कृष्णा को हुआ था.

मैनेजर शाही चौनपुर इलाके में एक बड़ा नाम था. वह पूरी तरह समाजसेवा के लिए समर्पित थे. चौनपुर गांव से सटे कई गांवों के लोग मुश्किल के समय मैनेजर शाही को याद करते थे. वह बड़ी दिलेरी से उन की समस्याओं का समाधान करते थे. दिन हो या रात, वह बिना परवाह किए फरियादियों के साथ बेहिचक कहीं भी चले जाते थे.

यह बात उन दिनों की है, जब बिहार में नक्सलियों के आतंक की फसल लहलहा रही थी. बंदूकों की तड़तड़ाहट और बमों की दुर्गंध से प्रदेश के नागरिकों का जीना दूभर हो गया था. नक्सलियों के फरमान पत्थर की लकीर की तरह हुआ करते थे. उन के फैसले किसी कीमत पर नहीं बदलते थे. ऐसा ही कुछ मैनेजर शाही के साथ भी हुआ. मैनेजर शाही नक्सलवादियों के फरमान की चिंता किए बगैर उन से लोहा ले रहे थे.

13 जनवरी, 1996 को एक फरियादी की मदद करने के लिए मैनेजर शाही मठिया टोला के लिए घर से निकले थे. मुखबिरों ने नक्सलियों को उन के घर से निकलने की खबर दे दी थी. सूचना मिलते ही नक्सली संगठन मठिया टोला में घात लगा कर बैठ गया. जैसे ही मैनेजर शाही मठिया टोला पहुंचे, उन्होंने बम फेंक कर उन के चिथड़े उड़ा दिए और फरार हो गए.

कृष्णा शाही ने पिता के अधूरे सपनों को पूरा करने की कसम खा ली थी. पिता की मौत के बाद मैनेजर शाही के तीनों बेटे पिता के पदचिह्नों पर चल निकले. तब तक कृष्णा बड़े हो गए थे. शाही परिवार की राजनीति में पैठ थी.

राजनीति की डगर पर पांव रखने के बाद कृष्णा ने रामविलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी का दमन थाम लिया. वह युवा और ऊर्जावान थे. उन्होंने अपनी जमीनी पकड़ मजबूत बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. अपनी लगन और मेहनत की बदौलत कृष्णा ने राजनीति में अपनी अच्छी साख बना ली.

सन 2006 में कृष्णा शाही की मेहनत एक बड़ा परिवर्तन लाई. उन के बड़े भाई उमेश शाही ने राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी माने जाने वाले विधायक अमरेंद्र पांडेय उर्फ पप्पू पांडेय के कब्जे से हथुआ के चौनपुर की पंचायत सीट झटक ली और सरपंच बन गए. जबकि सन 2000 में पंचायत की इस सीट पर अमरजीत यादव सरपंच थे. अमरजीत यादव अमरेंद्र पांडेय का खास आदमी था. चौनपुर की सरपंच सीट हाथ से निकल जाने के बाद अमरेंद्र बौखला गए. यहीं से अमरेंद्र पांडेय और कृष्णा शाही के बीच दुश्मनी की तलवारें खिंच गईं.

तुलिसिया के विधायक अमरेंद्र पांडेय गोपालगंज, हथुआ के नयागांव के निवासी थे. रामाशीष पांडेय के 2 ही बेटे थे सतीश पांडेय और अमरेंद्र पांडेय. गोपालगंज जिले के माफिया डौन सतीश पांडेय की अपने इलाके में तूती बोलती थी. वह ढाई दशक पूर्व उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों की पुलिस के लिए सिरदर्द बने माफिया डौन श्रीप्रकाश शुक्ला गैंग के सक्रिय सदस्य थे. उन्हें राजद के पूर्व मंत्री बृजबिहारी प्रसाद की हत्या में नामजद आरोपी बनाया गया था.  बाद में उन्हें इस केस में जमानत मिल गई थी. बिहार के चर्चित पुरखास नरसंहार में भी उन्हें आरोपी बनाया गया था, लेकिन बाद में वह इस में बरी हो गए थे.

जरायम की काली दुनिया से निकल कर सतीश पांडेय राजनीति के सहारे विधान परिषद तक पहुंचने के ख्वाब देखने लगे थे. उन्होंने सन 2000 के विधानसभा चुनाव में दरौली विधानसभा क्षेत्र से चनुव लड़ा, लेकिन उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा. उस के बाद उन्होंने अपने छोटे भाई अमरेंद्र पांडेय को राजनीति में उतार दिया.

विधायक अमरेंद्र पांडेय की क्षेत्र में अपनी ही सरकार चलती थी. उन के जीवन से जुड़े इतिहास के कई काले पन्ने अतीत में दबे हुए थे. बात 27 मई, 2012 की है. गोपालगंज जिला के हथुआ प्रखंड मुख्यालय में शराब की दुकान चलाने वाले अनिल साह की रात में गोली मार की हत्या कर दी गई थी.

अनिल साह की हत्या के मामले में कुचाईकोट विधानसभा क्षेत्र से जदयू विधायक अमरेंद्र पांडेय, उन के पिता रामाशीष पांडेय, बहनोई जलेश्वर पांडेय, भाभी और पूर्व जिला परिषद अध्यक्ष उर्मिला पांडेय सहित 7 लोगों के खिलाफ स्थानीय थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी.

अनिल साह के परिजनों ने खुल कर आरोप लगाया था कि विधायक अमरेंद्र पांडेय ने साह से 50 लाख रुपए रंगदारी मांगी थी और रुपए न मिलने पर शराब की दुकान बंद करने को कहा था. इस घटना के विरोध में स्थानीय लोगों ने मृतक के शव के साथ हथुआ सड़क को 2 घंटे तक जाम कर रखा था.

बहरहाल, कृष्णा शाही लोक जनशक्ति पार्टी को छोड़ कर बहुजन समाज पार्टी में चले गए. सन 2009 में कृष्णा शाही ने हथुआ विधानसभा से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा, जिस में वह हार गए. चुनाव हारने के बाद कृष्णा ने बसपा से नाता तोड़ कर भारतीय जनता पार्टी से नाता जोड़ लिया. भाजपा में आने के बाद कृष्णा शाही ने अपनी पूरी ऊर्जा क्षेत्र के विकास में लगा दी. अपनी मेहनत और लगन की बदौलत वह व्यापारी प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष चुने गए.

इस बीच कृष्णा शाही और विधायक अमरेंद्र पांडेय की दुश्मनी खुल कर सामने आ गई. शाही इस की चिंता छोड़ कर क्षेत्र के लोगों की सेवा में जुटे रहे. सन 2012 में फिर मुखिया का चुनाव हुआ. इस बार चौनपुरा मुखिया सीट को महिला सीट कर दिया गया था, इसलिए इस सीट पर न तो कृष्णा लड़ सके और न उन के बडे़ भाई.

शाही ने अपनी पत्नी शांता शाही को मुखिया पद के लिए चुनाव लड़ाया. शांता भारी मतों से जीतीं और सरपंच बन गईं. शांता की जीत से पांडेय खेमे में भूचाल आ गया, क्योंकि इस से शाही का राजनीतिक कद और बढ़ गया था.

कृष्णा शाही की राजनीति में सक्रियता से विरोधियों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही थी. राजनीतिक प्रतिद्वंदिता बढ़ने के साथ अदावत भी बढ़ी. उन की हत्या की आशंका से उन के घर वाले चिंतित भी रहा करते थे. परिजनों का चिंता करना गलत नहीं था. शाही की जान की सुरक्षा को ले कर उन की चिंता तब और बढ़ गई, जब गोरखपुर के कुख्यात अपराधी चवन्नी सिंह को गोपालगंज की पुलिस ने गिरफ्तार किया.

उस से पूछताछ में पता चला कि उसे एक विधायक ने कृष्णा शाही की हत्या की सुपारी दी थी. देखें तो समय रहते पुलिस ने कृष्णा शाही को बचा लिया था. इस के बाद उन पर मंडराते खतरे को देख कर जिला प्रशासन ने उन्हें सुरक्षा के लिए 4 अंगरक्षक दे दिए थे.

इस कहानी की दूसरी कड़ी आदित्य राय से हो कर आगे बढ़ती है. 30 वर्षीय आदित्य राय गोपालगंज के फुलवरिया थाना के बसवरिया मांझा गांव का रहने वाला था. उस के पिता अवधेश राय विदेश में नौकरी करते थे. अवधेश राय के 5 बच्चों में बेटा आदित्य राय एकलौता था.

आदित्य राय की सगी बुआ कृष्णा शाही के गांव चौनपुर में ब्याही थीं. उन्हीं के यहां आनेजाने में आदित्य की जानपहचान शाही परिवार से हुई थी, यह 17-18 साल पहले की बात है. तब आदित्य की उम्र 15-16 साल थी. दोनों परिवारों के बीच घनिष्ठ रिश्ता बन गया था, जो अभी तक चलता चला आ रहा था.

आदित्य के पिता भले ही विदेश में नौकरी करते थे, लेकिन उन का परिवार गांव में ही रहता था. आदित्य के अलावा उस की 4 बहनें थीं. अवधेश राय की अनुपस्थिति में उन के परिवार की देखभाल कृष्णा शाही के घर वाले करते आ रहे थे. ये लोग दुखसुख की हर घड़ी उन के परिवार के साथ खड़े रहते थे. शाही की अनुपस्थिति में उन की पत्नी शांता को कहीं जाना होता या कोई जरूरी काम पड़ जाता तो आदित्य उन के लिए तैयार रहता.

इतना ही नहीं, आदित्य और उस की 2 बहनों की शादी भी कृष्णा के घर वालों ने ही कराई थी. कृष्णा शाही का आदित्य के यहां रातोदिन का उठनाबैठना था. इसी उठनेबैठने में कृष्णा शाही की नीयत रागिनी को देख कर डोल गई. सामान्य कदकाठी और साधारण नैननक्श की रागिनी कृष्णा शाही के दिल में उतर गई. वह उस से प्रेम करने लगे. रागिनी भी सयानी थी. मर्दों की नजरों की भाषा वह समझने लगी थी. उस ने शाही की नजरों को पढ़ लिया था.

रागिनी जान गई थी कि कृष्णा शाही उस पर फिदा हैं. वह भी उन्हें अपना दिल दे बैठी. मौका मिलते ही उन्होंने अपनेअपने प्यार का इजहार  कर दिया. इस के बाद वे छिपछिप कर मिलने लगे. यह सिलसिला सालों तक चलता रहा. किसी को कानोंकान इन के प्यार की खबर नहीं लगी.

घटना से 15 दिनों पहले यानी 3 जुलाई, 2017 को आदित्य के दादा लालबाबू राय की मौत हो गई थी. अंतिम संस्कार में कृष्णा शाही ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था और आर्थिक मदद भी की थी. इस के अगले दिन आदित्य कमरे में कोई काम कर रहा था, तभी उस ने रागिनी को किसी से फोन पर बातें करते सुना. रागिनी उस से प्यारमोहब्बत की बातें कर रही थी. उस की बातें सुन कर आदित्य का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. इस के बावजूद कुछ कहने के बजाय वह परदे की ओट से उस की बातें ध्यान से सुनने लगा.

रागिनी भाजपा नेता कृष्णा शाही से प्यार की बातें कर रही थी. उस की बातें सुन कर आदित्य गुस्से से पागल हो उठा. वह यह सोच कर परेशान था कि शाही ने उस के साथ दोस्ती में दगा की है. बस उसी दिन से वह भाजपा नेता कृष्णा शाही को सबक सिखाने की योजना बनाने लगा. यह बात उस ने अपने तक ही सीमित रखी, ताकि शाही को निपटाने के बाद पुलिस उस पर शक न कर सके.

18 जुलाई, 2017 को आदित्य राय के दादा लालबाबू की तेरहवीं थी. शाही उस दिन पूरे समय आदित्य के साथ थे. उन्हें देख कर आदित्य को गुस्सा तो बहुत आ रहा था, पर उसे मौके की तलाश थी. क्योंकि वह जानता था कि शाही को किसी भी तरह का नुकसान पहुंचाने का हश्र क्या हो सकता है. वह कोई मामूली आदमी नहीं थे, इसलिए जो भी कदम उठाना था, सोचसमझ कर उठाना था.

7 बजे शाम तक कृष्णा शाही आदित्य के घर रहे. मेहमानों को भोजन कराने के बाद वह जरूरी काम की बात कह कर चले गए. जातेजाते रागिनी से कह गए थे कि वह रात को आएंगे, तभी खाना भी खाएंगे. यह बात आदित्य ने सुन ली थी. बस, उस ने रात में ही उन का काम तमाम करने का निर्णय ले लिया. उन के जाने के बाद आदित्य बड़का गांव बाजार गया और कीटनाशक दवा की एक शीशी खरीद लाया. रात साढ़े 10 बजे कृष्णा शाही अपनी कार से आदित्य के यहां पहुंचे. उन्होंने ड्राइवर को यह कह कर घर भेज दिया कि सुबह आ कर उन्हें ले जाएगा.

आदित्य उन्हें देख कर खुश हुआ. वह उन्हें पुराने घर न ले जा कर नए घर ले गया. उन्हें वहां बैठा कर आदित्य पुराने घर से एक थाली में खाना परोस कर लाया. उसी खाने में उस ने बाजार से लाया कीटनाशक मिला दिया. शाही खाना खा कर सो गए. सोते समय ही उन की मौत हो गई.

रात में सब सो गए तो आदित्य उन की लाश को कंधे पर लाद कर घर से कुछ दूरी पर स्थित कुएं पर ले गया, जहां उस ने उन की कमर से एक भारी पत्थर बांध कर लाश को कुएं में फेंक दिया. इस के बाद उस ने उन की लाल रंग की हवाई चप्पल भी ला कर कुएं में फेंक दी और घर जा कर आराम से सो गया.

सुबह 4 बजे कृष्णा शाही का ड्राइवर सुनील उन्हें ढूंढते हुए आदित्य के घर पहुंचा और उसे जगा कर कृष्णा शाही को जगाने के लिए कहा. क्योंकि उन्हें किसी काम से पटना जाना था. लेकिन आदित्य ने कहा कि वह तो यहां आए ही नहीं थे, जबकि सुनील खुद ही उन्हें छोड़ कर गया था.

आदित्य का यह जवाब उसे काफी अटपटा लगा. कुछ कहने के बजाय वह लौट गया और सारी बात शांता शाही को बताई. शांता ने पति के दोनों नंबरों पर फोन किया. दोनों ही नंबर बंद थे. इस के बाद उन्होंने जेठ उमेश शाही को सारी बात बता कर पति के बारे में पता लगाने को कहा. उमेश शाही ने भाई के बारे में पता किया तो उन की लाश कुएं में मिली.

23 जुलाई को कृष्णा शाही की हत्या के मामले में एक नया मोड़ आ गया. शांता शाही ने एसपी के घटना के खुलासे को चुनौती दी कि उन के पति के चरित्र पर जो दाग लगाया गया है, वह सरासर बेबुनियाद है. आदित्य के परिवार से उन का बीसों साल से पारिवारिक संबंध रहा है. उस की 2 बहनों की शादी उन्होंने ही करवाई थी, तब क्यों किसी ने उन के पति के चरित्र पर अंगुली नहीं उठाई? अब कैसे उन का संबंध आरोपी की बहन रागिनी से हो गया. इसे वह पुलिस की मनगढं़त कहानी बता रही हैं.

उन का कहना है कि आदित्य को मोहरा बनाया गया है, जबकि उन के पति की हत्या राजनीतिक विद्वेष की वजह से हुई है. वह पति की हत्या का दोषी जदयू के विधायक अमरेंद्र पांडेय उर्फ पप्पू पांडेय और उन के परिवार को मानती हैं.

पुलिस जो कह रही है कि आदित्य ने उन के खाने में जहर मिला दिया था, यह झूठ है. घटना मंगलवार को घटी थी, उस दिन शाहीजी का व्रत था. व्रत में वह खाना कैसे खा सकते थे. दूसरी बात यह कि शाहीजी का वजन 95-96 किलोग्राम था, जबकि आदित्य काफी कमजोर है. वह अकेला शाहीजी की लाश को कैसे अपने कंधे पर उठा कर ले गया? तीसरी बात घटना वाली रात साढ़े 10 बजे उन की पति से बात हुई थी. उन्होंने बताया था कि आदित्य ने यह कह कर रोक लिया है कि रात काफी हो गई है, वह यहीं सो जाएं.

जबकि आदित्य का कहना था कि शाहीजी उन के वहां आए ही नहीं थे. आखिर उस ने ऐसा क्यों कहा, यह जांच का विषय है. इन तमाम सवालों के जवाब देने में पुलिस प्रशासन विफल है. निश्चय ही शाहीजी की हत्या में आदित्य के साथ और भी कई लोग शामिल थे, जिन्हें पुलिस बचा रही है. इसलिए वह इस घटना की सीबीआई जांच कराने की मांग कर रही हैं.

मृतक के भाई उमेश शाही ने डीजीपी पी.के. ठाकुर से मिल कर घटना की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है. कथा लिखे जाने तक सीबीआई जांच की संस्तुति नहीं हुई थी. दूसरी ओर एसपी रविरंजन कुमार का कहना है कि घटना का खुलासा सही किया गया है. हत्या अवैध संबंधों की वजह से ही हुई है. हत्यारे को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया गया है. बाकी जिन 5 आरोपियों के नाम उमेश शाही की ओर से दिए गए हैं, जिन के बारे में जांच चल रही है. दोषी पाए जाने पर उन के खिलाफ भी काररवाई की जाएगी.

कथा लिखे जाने तक आरोपी आदित्य राय जेल में था. पुलिस अब तक कृष्णा शाही के दोनों मोबाइल फोन के बारे में पता नहीं लगा सकी है.

– कथा परिजनों एवं पुलिस सूत्रों पर आधारित

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कर्ज चुकाने के लिए रची गई एक अनूठी खूनी साजिश

6 भाईबहनों में गोपाल सेजाणी सब से छोटा था. कुछ समय पहले एक दुर्घटना में उस के पिता की मौत के बाद मां ने दूसरी शादी कर ली थी. बच्चों को छोड़ कर वह दूसरे पति के साथ कहीं और जा कर रहने लगी थी. बच्चे अकेले पड़ गए तो उन की देखभाल के लिए उन के मौसा हरसुख पटेल आगे आए. उन्होंने बच्चों को सहारा दिया. उस समय गोपाल की उम्र यही कोई 11 साल थी.

हरसुख अपने बच्चों की तरह उन की भी देखभाल कर रहे थे. सब ठीकठाक चल रहा था, लेकिन 8 फरवरी, 2017 को एक अनहोनी घट गई. शाम को हरसुख अपने स्कूटर पर गोपाल को बिठा कर गांव की तरफ आ रहे थे. उन का दोस्त महादेव भी उन के साथ था.

गांव के बाहर उन की मुलाकात नितेश मंड से हो गई. वह एनआरआई था, जो स्थाई रूप से लंदन में रहता था. उन दिनों वह भारत आया हुआ था. हरसुख को रोक कर वह उन से बातें करने लगा. उन्हें बातचीत करते हुए कुछ ही मिनट हुए होंगे कि मोटरसाइकिल से 2 लड़के आए और पास खड़े गोपाल को उठा कर भागने लगे.

नितेश ने उन का विरोध किया. जबकि हरसुख ने जान पर खेल कर गोपाल को बचाने की कोशिश की. लेकिन दोनों लड़कों के पास हथियार थे, जिस की वजह से वह उन का मुकाबला नहीं कर सके. वे लड़के हरसुख को घायल कर गोपाल को अपने साथ ले जाने में सफल हो गए. शोरशराबा सुन कर वहां काफी लोग इकट्ठा हो गए थे. हरसुख गंभीर रूप से घायल थे, इसलिए उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया.

सूचना पा कर थानाप्रभारी ए.वी. टिल्वा पुलिस बल के साथ वहां पहुंच गए. मामले की गंभीरता को देखते हुए थानाप्रभारी ने मुख्य मार्गों की नाकेबंदी करवा दी. वह भी अपहर्त्ताओं को तलाशने लगे, पर उन का पता नहीं चल सका.

अगले दिन औटोचालक श्यामण अपने औटो से केशोड़ हाईवे से गुजर रहा था, तभी उस की निगाह अचानक एक गड्ढे की तरफ चली गई. उस गड्ढे में उसे एक छोटा लड़का जख्मी हालत में पड़ा दिखाई दिया. श्यामण ने औटो रोक कर देखा तो वह खून से लथपथ था. उस की सांस अभी चल रही थी. श्यामण उसे अपने औटो से केशोड़ अस्पताल ले गया.

डाक्टरों ने बच्चे को बचाने की बहुत कोशिशें कीं, लेकिन उस की मौत हो गई. अस्पताल प्रशासन द्वारा इस की सूचना पुलिस को दी गई तो थानाप्रभारी ए.वी. टिल्वा हरसुख को साथ ले कर केशोड़ अस्पताल पहुंच गए. हरसुख ने उस की शिनाख्त गोपाल सेजाणी के रूप में कर दी.

चलती सड़क पर सरेराह एक बच्चे के इस तरह अपहृत हो जाने से लोगों में डर बैठ गया था. जब उस की मौत की बात सामने आई तो मामला और उछल गया. पुलिस ने इस मामले को भादंवि की धारा 361 के तहत दर्ज कर लिया. बाद में इस में भादंवि की धाराएं 364 और 302 और जोड़ दी गईं. जूनागढ़ के एसपी निलेश जिगाडि़या ने इस सनसनीखेज मामले की जांच के लिए एक स्पैशल टीम गठित कर दी थी.

हरसुख पटेल ने अपनी शिकायत में किसी को आरोपी नहीं बनाया था और न ही किसी पर शंका जाहिर की थी. एसपी जिगाडि़या ने उन से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की. उन्होंने सीधेसीधे बताया कि साजिश रच कर गोपाल का अपहरण कर के उस की हत्या की गई है. अपहरण फिरौती के लिए नहीं, बल्कि किसी अन्य मकसद से किया गया है. इस के पीछे नितेश मंड के अलावा एनआरआई आरती का हाथ है.

एसपी ने आरती के बारे में पूछा तो हरसुख पटेल ने उन्हें आरती के बारे में विस्तार से बता दिया. 53 वर्षीया आरती लोकनाथ धार बरसों पहले भारत से लंदन गई थी और वहीं बस गई थी. कभीकभी वह भारत भी आती रहती थी. उन्होंने लंदन में अपना एक अपार्टमेंट बनवा लिया था, जिस में कई किराएदार रहते थे. उन्हीं में एक नितेश मंड भी था. नितेश से आरती की खासी बनती थी.

मूलरूप से नितेश पंजाब का रहने वाला था, लंदन जाने से पहले वह गुजरात में जा कर कारोबार करने लगा था. गुजरात के कई लोग उस के संपर्क में थे. उन्हीं में हरसुख पटेल भी थे. वह जूनागढ़ के पास मालियाहाटिन गांव में रहते थे. नितेश का भी वहां पर एक मकान था.

नितेश मंड से हरसुख की जानपहचान थी. करीब एक साल पहले की बात है. एक दिन नितेश हरसुख के पास आया. इधरउधर की बातें करने के बाद उस ने कहा, ‘‘हरसुख भाई, बुरा न मानो तो एक बात कहूं?’’

‘‘हां, कहो.’’ हरसुख ने सहज भाव से कहा.

‘‘आप ने अपनी साली के बच्चों की जो जिम्मेदारी अपने ऊपर ले रखी है, यह बहुत बड़ी बात है.’’ नितेश ने कहा.

‘‘पता नहीं यह बड़ी बात है या छोटी, पर इतना जरूर जानता हूं कि मैं अपना फर्ज पूरा कर रहा हूं. एक तरह से वे भी मेरे ही बच्चे हैं.’’

‘‘यह तो आप की महानता है हरसुख भाई, वरना आज के महंगाई के जमाने में अपने परिवार की गुजर करना ही मुश्किल हो रहा है, ऐसे में आप… इस बारे में मेरा मन आप की मदद करने को कर रहा है.’’

‘‘कैसी मदद?’’ हरसुख पटेल ने हैरानी से पूछा.

‘‘कुछ ऐसी मदद, जिस से आप के कंधे का बोझ थोड़ा हलका हो जाए और आप के सब से छोटे भांजे गोपाल का भविष्य भी संवर जाए.’’

‘‘मैं कुछ समझा नहीं, जो कुछ कहना चाहते हो, खुल कर कहो.’’ हरसुख ने नितेश के चेहरे को सवालिया नजरों से देखते हुए कहा.

‘‘ऐसा है हरसुख भाई, लंदन में जहां मैं रहता हूं, उस अपार्टमेंट की मालकिन एक सज्जन महिला हैं. वह मूलरूप से हिंदुस्तानी हैं. उन के पास बहुत कुछ है. इसलिए वह सब की मदद करती रहती हैं. वह बहुत ही नेकदिल औरत हैं.’’

‘‘यह तो बड़ी अच्छी बात है. लेकिन उन के बारे में आप मुझे क्यों बता रहे हैं?’’ हरसुख ने पूछा.

‘‘मैं उन के बारे में इसलिए बता रहा हूं क्योंकि इतनी भलाई का काम करने के बावजूद उन्हें संतान सुख नहीं मिला. एक बच्चे की मां कहलाने को तरसती हैं वह. मैं चाहता हूं कि…’’

‘‘…यानी कि मैं अपना गोपाल उन के हवाले कर दूं.’’ हरसुख ने नितेश की बात बीच में ही काट कर कहा.

‘‘अरे नहीं भाई, ऐसा नहीं है. उन्हें औलाद पैदा नहीं हुई तो इस का मतलब यह नहीं है कि वह किसी का बच्चा छीनना चाहती हैं.’’

‘‘तो क्या चाहती हैं वह?’’

‘‘दरअसल, वह एक भारतीय बच्चा कानून के अनुसार गोद लेना चाहती हैं. मैं सोचता हूं कि अगर आप के छोटे भांजे को उन का दत्तक पुत्र बना दिया जाए तो उस की जिंदगी बन जाएगी. आप इस बारे में सोच लीजिए.’’ नितेश ने कहा.

हरसुख सचमुच सोचने लगे. आखिर उन्होंने नितेश से कह दिया कि वह इस बारे में उसे कल बताएंगे. भांजे के उज्ज्वल भविष्य को देखते हुए हरसुख ने नितेश का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. इस के बाद नितेश एडौप्शन पेपर तैयार कराने लगा. उस ने आरती को भी भारत आने के लिए फोन कर दिया था. आरती भी लंदन से हिंदुस्तान आ गई.

हरसुख को हर तरह से आश्वस्त कर आरती ने बच्चे को गोद लेने की प्रक्रिया पूरी कर ली. उस के बाद हरसुख को समझाया कि वह बच्चे का पासपोर्ट बनवा कर रखें, जल्दी ही वीजा लगवा कर वह उसे अपने पास लंदन बुला लेगी. इस के बाद वह लंदन चली गई. नितेश भी उस के साथ चला गया था. यह सन 2015 की बात है.crime story in hindi

हरसुख ने एसपी निलेश जिगाडि़या को बताया कि इस के बाद उन लोगों ने गोपाल के नाम से लंदन में ही जीवन बीमा करवा लिया था. इंडियन करेंसी के मुताबिक उस पौलिसी की वैल्यू एक करोड़ रुपए से भी ज्यादा थी. बीमा कराने के बाद वह उस से बच्चे का पासपोर्ट जल्द बनवाने को कहते रहे. लेकिन काफी कोशिश के बाद भी बच्चे का पासपोर्ट नहीं बन सका, जिस से वह लंदन नहीं जा सका.

हरसुख की बात सुन कर एसपी सारा माजरा समझ गए. नितेश को संदेह के आधार पर हिरासत में ले कर पूछताछ की गई. इस पूछताछ में एनआरआई होने के नाते वह पुलिस को ही धमकाने लगा. पुलिस उस की धमकी में नहीं आई. उस से जब सख्ती से पूछताछ की गई तो तो उस ने पुलिस के सामने घुटने टेक दिए.

उस ने गोपाल की हत्या कराने की बात स्वीकार कर ली. पुलिस ने 13 फरवरी, 2017 को उसे गिरफ्तार कर अदालत में पेश कर के 6 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड अवधि में उस से सघन पूछताछ की गई. इस पूछताछ में उस ने पुलिस को गोपाल की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह एक अनोखी अपराध कथा थी—

लंदन में आरती धार के अपार्टमेंट में किराए पर रहते हुए नितेश मंड उस से काफी घुलमिल गया था. उम्र में अच्छाखासा अंतर होने की वजह से दोनों के बीच मांबेटे जैसा रिश्ता कायम हो गया था. दोनों आपस में सुखदुख भी साझा करने लगे थे.

एक दिन बातें करतेकरते दोनों ने अपनीअपनी आर्थिक परेशानियां बयान कर दीं. नितेश के पास जहां ढंग की नौकरी नहीं थी, वहीं आरती का कहना था कि भले ही उस ने ठीकठाक प्रौपर्टी बना ली थी, लेकिन उस के ऊपर बहुत कर्ज चढ़ गया था. वह कर्ज उतार पाना उस के लिए कठिन हो रहा था. लेनदार कंपनियां उसे परेशान कर रही थीं.

एक दिन सुबह दोनों बैठे चाय पी रहे थे, तभी अपनीअपनी परेशानियों का रोना रोने लगे. रोना रोतेरोते वे योजना बनाने लगे कि किस तरह एक ही झटके में मोटे पैसों का जुगाड़ किया जाए. इस बारे में बात करते हुए दोनों ने कई मुद्दों पर विचार किया.

आखिर नितेश ने एक तरकीब सुझाते हुए आरती को सुझाव दिया कि किसी गरीब बच्चे को गोद ले कर उस का मोटा लाइफ इंश्योरेंस करवा दिया जाए. कुछ दिनों बाद उस बच्चे की हत्या कर के इंश्योरेंस का क्लेम ले लिया जाएगा.

आरती को बात जंच गई. यह भी तय हो गया कि गोद लेने वाला बच्चा हिंदुस्तानी हो. लेकिन मोटा बीमा करवाने को प्रीमियम अदा करने के लिए उस के पास ज्यादा पैसा नहीं था. जब बीमा करोड़ रुपए से अधिक का होगा तो जाहिर है, उस का प्रीमियम भी बड़ा होगा. इसलिए आरती ने कहा कि उस के पास प्रीमियम देने के पैसे नहीं हैं.

नितेश ने कहा कि भारत में बच्चे को तलाश करने का काम वह भारत के ही रहने वाले अपने एक दोस्त पर छोड़ देता है. इस काम को वह जल्दी पूरा कर देगा. उसे भी इस योजना में शामिल कर लिया जाएगा. बीमा का प्रीमियम तीनों मिल कर बराबरबराबर अदा कर देंगे. बच्चे को लंदन ला कर कुछ दिनों तक उस का खूब ध्यान रखेंगे, ताकि किसी को पर शक न हो. उस के बाद बच्चे की रहस्यमय तरीके से हत्या कर इंश्योरेंस का क्लेम ले लिया जाएगा.

आरती ने खुश हो कर हामी भर दी. इस के बाद नितेश ने अपना काम करना शुरू कर दिया. उस ने अपने दोस्त कंवलजीत सिंह रायजादा से बात की तो उस ने योजना में शामिल होने की हामी भर दी. 28 वर्षीय कंवलजीत सिंह जूनागढ़ के कस्बा मालिया का रहने वाला था.

कंवलजीत किसी बच्चे की तलाश करने लगा. जल्दी ही उस ने मालियाहाटिना के रहने वाले हरसुख पटेल के भांजे गोपाल सेजाणी के बारे में जानकारी हासिल कर ली. उस ने यह बात फोन द्वारा नितेश को बताते हुए कहा कि अगर वह या आरती भारत आ कर गोद लेने वाले बच्चे गोपाल के मौसा से बात कर लें तो काम हो सकता है. नितेश ने ऐसा ही किया. पहले वह भारत आया और हरसुख से बात की. बाद में बात फाइनल हो गई तो आरती भी भारत आ गई.

दोनों ने गोपाल सेजाणी को गोद लेने की काररवाई पूरी कर ली. इस के बाद आरती और नितेश लंदन चले गए. वहां उन्होंने गोपाल का भारतीय मुद्रा के हिसाब से 1.30 करोड़ रुपए का जीवन बीमा करवा दिया. इस के लिए बीमा कंपनी को 13 लाख का प्रीमियम देना पड़ा, जो आरती, नितेश और कंवलजीत ने मिल कर दिया.

गोपाल को लंदन ले जा कर मौत के घाट उतारने का काम पहले ही साल में कर दिया जाना था. लेकिन पासपोर्ट न बन पाने की वजह से उसे लंदन नहीं ले जाया जा सका. देखतेदेखते एक साल का समय निकल गया. इस बीच बीमा कंपनी का 13 लाख का आगामी प्रीमियम ड्यू हो गया. इस बार इन लोगों को यह रकम अदा करने में काफी परेशानी हुई.crime story in hindi

इस के बाद तय किया गया कि आगामी प्रीमियम ड्यू होने से पहले ही गोपाल का काम तमाम कर दिया जाए. वह लंदन नहीं आ पाता तो इंडिया में इस की व्यवस्था की जाए. इस की जिम्मेदारी कंवलजीत को सौंपी गई. कंवलजीत अकेला काम को अंजाम नहीं दे सकता था, इसलिए उस ने एक बदमाश से बात की.

नितेश भी लंदन से इंडिया आ गया. योजना बना कर कंवलजीत और उस के साथी ने 8 फरवरी, 2017 को गोपाल का अपहरण कर के उसे चाकुओं से गोद डाला. अगले दिन अस्पताल में उस की मौत हो गई.

नितेश मंड के बाद पुलिस ने गोपाल की हत्या के आरोप में कंवलजीत को भी गिरफ्तार कर लिया. लेकिन उस का साथी फरार हो गया था. अभी तक आरती को डिपोर्ट नहीं किया जा सका है.

कथा तैयार होने तक जूनागढ़ पुलिस ने नितेश और कंवलजीत के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र प्रस्तुत कर दिया था. केस के अन्य वांछित आरोपियों के गिरफ्तार होने पर सप्लीमेंट चालान तैयार कर के अदालत में दाखिल कर दिया जाएगा.

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तो अब ‘मिलन टौकीज’ को अंजाम तक पहुंचाएंगे अली फजल

फिल्मकार तिग्मांशु धुलिया के निर्देशन मे बनने वाली रोमांटिक फिल्म ‘‘मिलन टौकीज’’ पिछले तीन चार वर्षों से लगातार सुर्खियों में है. इस बीच इस फिल्म के साथ कई कलाकार जुड़ते और कई कलाकार बाहर होते रहे हैं. इतना ही नहीं कलाकारों के बदलने के साथ ही फिल्म की पटकथा में भी थोडे़ बहुत बदलाव किए जाते रहे हैं.

बहरहाल, अब फिल्म ‘‘मिलन टौकीज’’ में अली फजल को मुख्य भूमिका निभाने के लिए जोड़ा गया है. सूत्र बताते हैं कि अली फजल इन दिनों बौलीवुड के साथ साथ हौलीवुड में भी काफी व्यस्त है, तो तिंग्मांषु धुलिया को लगता है कि उनकी फिल्म की नैय्या पार लग जाएगी. वैसे अभी तक अली फजल के साथ अभिनय करने के लिए हीरोईन की तलाश पूरी नहीं हुई है.

मगर तिग्मांषु धुलिया का दावा है कि वह एक माह के अंदर हीरोइन का नाम तय कर लेंगे और अली फजल के साथ मार्च माह के दूसरे सप्ताह में उत्तर प्रदेश में षूटिंग भी शुरू कर देंगे.

ज्ञातब्य है कि फिल्म ‘‘मिलन टौकीज’’ के साथ शाहिद कपूर, आदित्य राय कपूर, आयुष्मान खुराना जैसे कलाकारों के आने व जाने की खबरें गर्म रही हैं. देखना यह है कि अली फजल ‘‘मिलन टौकीज’’ को उसके अंजाम तक पहुंचा पाते हैं या…

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सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आजाद हुआ बिहार क्रिकेट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बिहार की टीम बिहार क्रिकेट एसोसिएशन यानी बीसीए के तहत रणजी ट्रौफी और अन्य घरेलू टूर्नामैंटों में हिस्सा लेगी.

वर्ष 2000 में बिहार का विभाजन होने के बाद अलग राज्य झारखंड बना. इस के बाद से बिहार क्रिकेट का भविष्य अंधकार में चला गया. 2001 में क्रिकेट झारखंड चला गया. इस के बाद बिहार में नए संघ की दावेदारी को ले कर घमासान शुरू हो गया.

काफी जद्दोजेहद के बाद 27 सितंबर, 2008 को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई की आमसभा की बैठक हुई और उस में बिहार क्रिकेट एसोसिएशन को एसोसिएट का दर्जा मिल गया. उस समय बिहार से खेलने वाले खिलाडि़यों को उम्मीद जगी कि अब भविष्य ठीक होने वाला है पर खेल पदाधिकारियों की राजनीति के कारण इन युवा खिलाडि़यों को फिर निराश होना पड़ा.

वर्ष 2010 में बिहार क्रिकेट एसोसिएशन 2 धड़ों में बंट गया. इस लड़ाई में खिलाडि़यों का भविष्य फिर अंधकारमय हो गया और पद की लड़ाई इतनी बढ़ी कि बात हाईकोर्ट तक जा पहुंची फिर सुप्रीम कोर्ट. आखिरकार कोर्ट ने 23 सितंबर, 2015 को बिहार क्रिकेट एसोसिएशन चुनाव कराया और इस के मुखिया अब्दुल बारी सिद्दीकी बने. वर्ष 2016 में बिहार क्रिकेट एसोसिएशन को बीसीसीआई से मान्यता मिल गई. फिर लोढ़ा समिति की सिफारिशें लागू होने के बाद एक व्यक्ति एक पद के नियमों के अनुसार बीसीए के मुखिया को इस्तीफा देना पड़ा.

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से 17 वर्षों बाद अब बिहार के क्रिकेटर खुली हवा में सांस ले सकेंगे. उन्हें अब झारखंड नहीं, बल्कि अपने राज्य का प्रतिनिधित्व रणजी जैसे क्रिकेट टूर्नामैंट में करने का मौका मिलेगा. अब इशान किशन, बाबूल, शशीम राठौर, समर कादरी, केशव कुमार व शाहबाज नदीम जैसे क्रिकेटरों को संन्यास नहीं लेना पड़ेगा. बता दें कि इन खिलाडि़यों ने इसलिए असमय संन्यास लिया था क्योंकि इन के साथ सौतेला व्यवहार किया जाता था.

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स्वीकृति : भाग 1

आशीष के जाते ही डिंपल दरवाजा बंद कर रसोईघर की ओर भागी. जल्दी से टिफिन अपने बैग में रख शृंगार मेज के समक्ष तैयार होते हुए वह बड़बड़ाती जा रही थी, ‘आज फिर औफिस के लिए देर होगी. एक तो घर का काम, फिर नौकरी और सब से ऊपर वही बहस का मुद्दा…’

5 वर्ष के गृहस्थ जीवन में पतिपत्नी के बीच पहली बार इतनी गंभीरता से मनमुटाव हुआ था. हर बार कोई न कोई पक्ष हथियार डाल देता था, पर इस बार बात ही कुछ ऐसी थी जिसे यों ही छोड़ना संभव न था.

‘उफ, आशीष, तुम फिर वही बात ले बैठे. मेरा निर्णय तो तुम जानते ही हो, मैं यह नहीं कर पाऊंगी,’ डिंपल आपे से बाहर हो, हाथ मेज पर पटकते हुए बोली थी.

‘अच्छाअच्छा, ठीक है, मैं तो यों ही कह रहा था,’ आखिर आशीष ने आत्मसमर्पण कर ही दिया. फिर कंधे उचकाते हुए बोला, ‘प्रिया मेरी बहन थी और बच्चे भी उसी के हैं, तो क्या उन्हें…’

बीच में ही बात काटती डिंपल बोल पड़ी, ‘मैं यह मानती हूं, पर हमें बच्चे चाहिए ही नहीं. मैं यह झंझट पालना ही नहीं चाहती. हमारी दिनचर्या में बच्चों के लिए वक्त ही कहां है? क्या तुम अपना वादा भूल गए कि मेरे कैरियर के लिए हमेशा साथ दोगे, बच्चे जरूरी नहीं?’ आखिरी शब्दों पर उस की आवाज धीमी पड़ गई थी.

डिंपल जानती थी कि आशीष को बच्चों से बहुत लगाव है. जब वह कोई संतान न दे सकी तो उन दोनों ने एक बच्चा गोद लेने का निश्चय भी किया था, पर…

‘ठीक है डिंपी?’ आशीष ने उस की विचारशृंखला भंग करते हुए अखबार को अपने ब्रीफकेस में रख कर कहा, ‘मैं और मां कुछ न कुछ कर लेंगे. तुम इस की चिंता न करना. फिलहाल तो बच्चे पड़ोसी के यहां हैं, कुछ प्रबंध तो करना ही होगा.’

‘क्या मांजी बच्चों को अपने साथ नहीं रख सकतीं?’ जूठे प्याले उठाते हुए डिंपल ने पूछा.

‘तुम जानती तो हो कि वे कितनी कमजोर हो गई हैं. उन्हें ही सेवा की आवश्यकता है. यहां वे रहना नहीं चाहतीं, उन को अपना गांव ही भाता है. फिर 2 छोटे बच्चे पालना…खैर, मैं चलता हूं. औफिस से फोन कर तुम्हें अपना प्रोग्राम बता दूंगा.’

तैयार होते हुए डिंपल की आंखें भर आईं, ‘ओह प्रिया और रवि, यह क्या हो गया…बेचारे बच्चे…पर मैं भी अब क्या करूं, उन्हें भूल भी नहीं पाती,’ बहते आंसुओं को पोंछ, मेकअप कर वह साड़ी पहनने लगी.

2 दिनों पहले ही कार दुर्घटना में प्रिया तो घटनास्थल पर ही चल बसी थी, जबकि रवि गंभीर हालत में अस्पताल में था. दोनों बच्चे अपने मातापिता की प्रतीक्षा करते डिंपल के विचारों में घूम रहे थे. हालांकि एक लंबे अरसे से उस ने उन्हें देखा नहीं था. 3 वर्ष पूर्व जब वह उन से मिली थी, तब वे बहुत छोटे थे.

वह घर, वह माहौल याद कर डिंपल को कुछ होने लगता. हर जगह अजीब सी गंध, दूध की बोतलें, तारों पर लटकती छोटीछोटी गद्दियां, जिन से अजीब सी गंध आ रही थी. पर वे दोनों तो अपनी उसी दुनिया में डूबे थे. रवि को तो चांद सा बेटा और फूल जैसी बिटिया पा कर और किसी चीज की चाह ही नहीं थी. प्रिया हर समय, बस, उन दोनों को बांहों में लिए मगन रहती.

परंतु घर के उस बिखरे वातावरण ने दोनों को हिला दिया. तभी डिंपल बच्चा गोद लेने के विचार मात्र से ही डरती थी और उन्होंने एक निर्णय ले लिया था. ‘तुम ठीक कहती हो डिंपी, मेरे लिए भी यह हड़बड़ी और उलझन असहाय होगी. फिर तुम्हारा कैरियर…’ आशीष ने उस का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा था.

दोनों अपने इस निर्णय पर प्रसन्न थे, जबकि वह जानती थी कि बच्चे पालने का अर्थ घर का बिखरापन ही हो, ऐसी बात नहीं है. यह तो व्यक्तिगत प्रक्रिया है. पर वह अपना भविष्य दांव पर लगाने के पक्ष में कतई न थी. वह अच्छी तरह समझती थी कि यह निर्णय आशीष ने उसे प्रसन्न रखने के लिए ही लिया है. लेकिन इस के विपरीत डिंपल बच्चों के नाम से ही कतराती थी.

डिंपल ने भाग कर आटो पकड़ा और दफ्तर पहुंची. आधे घंटे बाद ही फोन की घंटी घनघना उठी, ‘‘मैं अभी मुरादाबाद जा रहा हूं. मां को भी रास्ते से गांव लेता जाऊंगा,’’ उधर से आशीष की आवाज आई.

‘‘क्या वाकई, मेरा साथ चलना जरूरी न होगा?’’

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं, मांजी तो जाएंगी ही. और कुछ दिनों पहले ही बच्चे नानी से मिले थे. उन्हें वे पहचानते भी हैं. तुम्हें तो वे पहचानेंगे ही नहीं. वैसे तो मैं ही उन से कहां मिला हूं. खैर, तुम चिंता न करना. अच्छा, फोन रखता हूं…’’

2 दिनों बाद थकाटूटा आशीष वहां से लौटा और बोला, ‘‘रवि अभी भी बेहोश है, दोनों बच्चे पड़ोसी के यहां हैं. वे उन्हें बहुत चाहते हैं. पर वे वहां कब तक रहेंगे? बच्चे बारबार मातापिता के बारे में पूछते हैं,’’ अपना मुंह हाथों से ढकते हुए आशीष ने बताया. उस का गला भर आया था.

‘‘मां बच्चों को संभालने गई थीं, पर वे तो रवि की हालत देख अस्पताल में ही गिर पड़ीं,’’ आशीष ने एक लंबी सांस छोड़ी.

‘‘मैं ने आज किशोर साहब से बात की थी, वे एक हफ्ते के अंदर ही डबलबैड भिजवा देंगे.’’

‘‘एक और डबलबैड क्यों?’’ आशीष की नजरों में अचरजभरे भाव तैर गए.

‘‘उन दोनों के लिए एक और डबलबैड तो चाहिए न. हम उन्हें ऐसे ही तो नहीं छोड़ सकते, उन्हें देखभाल की बहुत आवश्यकता होगी. वे पेड़ से गिरे पत्ते नहीं, जिन्हें वक्त की आंधी में उड़ने के लिए छोड़ दिया जाए,’’ डिंपल की आंखों में पहली बार ममता छलकी थी.

उस की इस बात पर आशीष का रोमरोम पुलकित हो उठा और वह कूद कर उस के पास जा पहुंचा, ‘‘सच, डिंपी, क्या तुम उन्हें रखने को तैयार हो? अरे, डिंपी, तुम ने मुझे कितने बड़े मानसिक तनाव से उबारा है, शायद तुम नहीं समझोगी. मैं आजीवन तुम्हारे प्रति कृतज्ञ रहूंगा.’’ पत्नी के कंधों पर हाथ रख उस ने अपनी कृतज्ञता प्रकट की.

डिंपल चुपचाप आशीष को देख रही थी. वह स्वयं भी नहीं जानती थी कि भावावेश में लिया गया यह निर्णय कहां तक निभ पाएगा.

डिंपल सारी तैयारी कर बच्चों के आने की प्रतीक्षा कर रही थी. 10 बजे घंटी बजी. दरवाजे पर आशीष खड़ा था और नीचे सामान रखा था. उस की एक उंगली एक ने तो दूसरी दूसरे बच्चे ने पकड़ रखी थी. उन्हें सामने देख डिंपल खामोश सी हो गई. बच्चों के बारे में उसे कुछ भी तो ज्ञान और अनुभव नहीं था. एक तरफ अपना कैरियर, दूसरी तरफ बच्चे, वह कुछ असमंजस में थी.

आशीष और बच्चे उस के बोलने का इंतजार कर रहे थे. ऊपरी हंसी और सूखे मुंह से डिंपल ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ‘‘हैलो, कैसा रहा सफर?’’

‘‘बहुत अच्छा, बच्चों ने तंग भी नहीं किया. यह है प्रार्थना और यह प्रांजल. बच्चो, ये हैं, तुम्हारी मामी,’’ आशीष ने हंसते हुए कहा.

परंतु चारों आंखें नए वातावरण को चुपचाप निहारती रहीं, कोई कुछ भी न बोला.

डिंपल ने बच्चों का कमरा अपनी पसंद से सजाया था. अलमारी में प्यारा सा कार्टून प्रिंट का कागज बिछा बिस्कुट और टाफियों के डब्बे सजा दिए थे. बिस्तर पर नए खिलौने रखे थे.

प्रांजल खिलौनों से खेलने में मशगूल हो, वातावरण में ढल गया, किंतु प्रार्थना बिस्तर पर तकिए को गोद में रख, मुंह में अंगूठा ले कर गुमसुम बैठी हुई थी. वह मासूम अपनी खोईखोई आंखों में इस नए माहौल को बसा नहीं पा रही थी.

पहले 4-5 दिन तो इतनी कठिनाई नहीं हुई क्योंकि आशीष ने दफ्तर से छुट्टी ले रखी थी. दोनों बच्चे आपस में खेलते और खाना खा कर चुपचाप सो जाते. फिर भी डिंपल डरती रहती कि कहीं वे उखड़ न जाएं. शाम को आशीष उन्हें पार्क में घुमाने ले जाता. वहां दोनों झूले झूलते, आइसक्रीम खाते और कभीकभी अपने मामा से कहानियां भी सुनते.

आशीष, बच्चों से स्वाभाविकरूप से घुलमिल गया था और बच्चे भी सारी हिचकिचाहट व संकोच छोड़ चुके थे, जिसे वे डिंपल के समक्ष त्याग न पाते थे. शायद यह डिंपल के अपने स्वभाव की प्रतिक्रिया थी.

एक हफ्ते बाद डिंपल ने औफिस से छुट्टी ले ली थी ताकि वह भी बच्चों से घुलमिल सके. यह एक परीक्षा थी, जिस में आशीष उत्तीर्ण हो चुका था. अब डिंपल को अपनी योग्यता दर्शानी थी. हमेशा की भांति आशीष तैयार हो कर 9 बजे दफ्तर चल दिया. दोनों बच्चों ने नाश्ता किया. डिंपल ने उन की पसंद का नाश्ता बनाया था.

‘‘अच्छा बच्चो, तुम जा कर खेलो, मैं कुछ साफसफाई करती हूं,’’ नाश्ते के बाद बच्चों से कहते समय हमेशा की भांति वह अपनी आवाज में प्यार न उड़ेल पाई, बल्कि उस की आवाज में सख्ती और आदेश के भाव उभर आए थे. थालियों को सिंक में रखते समय डिंपल उन मासूम चेहरों को नजरअंदाज कर गई, जो वहां खड़े उसे ही देख रहे थे.

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जज होने की महत्ता

सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठ जजों की प्रैस कौन्फ्रैंस के बाद सुप्रीम कोर्ट को उपदेश देने वालों की बाढ़ आ गई है. जो लोग अब तक सुप्रीम कोर्ट के कथन को ही अंतिम शब्द मानने को मजबूर थे, अब महात्मा बन गए हैं और इन 4 जजों को नैतिकता, अनुशासन, अदालतों की गरिमा, वरिष्ठता के मान, देश की अस्मिता, संविधान की आस्था आदि का पाठ पढ़ाने में लग गए हैं, साथ ही, शब्दकोशों से नएनए शब्द खोज कर जजों पर चिपका रहे हैं.

एक तरफ वे लोग हैं जो जानते हैं कि इन 4 जजों ने जो किया वह तभी किया होगा जब अति हो चुकी होगी. जो कुछ 12:15 बजे 12 जनवरी, 2018 की प्रैस कौन्फ्रैंस में कहा गया वह वास्तव में बहुत कम ही होगा और सुप्रीम कोर्ट की बैंचों, चैंबरों व गलियारों में बहुतकुछ ऐसा हो रहा होगा जिस के बारे में कहने या लिखने का साहस बहुत कम लोगों को है.

सुप्रीम कोर्ट की संस्था पर इस प्रैस कौन्फ्रैंस ने चोट पहुंचाई, उस की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाई है, यह कहने वालों में से अधिकतर वे हैं जो चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट लगेबंधे संस्कारों से बंधी रहे व वैदिक, संकुचित, सरकार की सत्ता में विश्वास रखने वाली, व्यक्तिपूजक हो और वह ‘संसद ही सर्वोपरि’ है के सिद्धांत को माने क्योंकि आज संसद की बागडोर एक विशिष्ट विचारधारा के हाथ में है.

सुप्रीम कोर्ट के ये 4 जज जानते हैं कि जो कुछ उन्होंने किया, करा या कहा वह अभूतपूर्व है पर जो कुछ उन्होंने नहीं कहा, पर जिस का संदेश वहां पहुंच गया जहां पहुंचना चाहिए था, उस के बारे में कम ही सोचा, बोला या लिखा जा रहा है.

एक विशिष्ट खेमे ने इन 4 जजों का इतिहास उघाड़ना शुरू कर दिया है जबकि सत्य यह है कि हर व्यक्ति के इतिहास में काले धब्बे होते हैं. पद की प्रतिष्ठा के कारण बहुत जगह चुप रहना ठीक होता है.

इन 4 जजों ने सुप्रीम कोर्ट का अपमान नहीं किया, खुद को सामने कर उस पर हो रहे निरंतर आक्रमण का सामना किया है. वे ह्यूमन शील्ड बन गए हैं. उन्होंने अपना भविष्य, अपनी गवर्नरशिपें, चेयरमैनशिपें, आरबिट्रेशन के अवसर, संतानों के भविष्य को दांव पर लगा दिया इसलिए कि सुप्रीम कोर्ट व देश के लोकतंत्र को बचाया जा सके.

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कैंसर को हरा सकते हैं, कुछ ऐसे लोगों की दास्तान आप भी पढ़िए

लोकप्रिय क्रिकेटर महेंद्र सिंह धौनी के जीवन पर बनी फिल्म ‘महेंद्र सिंह धौनी-द अनटोल्ड स्टोरी’ के एक दृश्य में महेंद्र सिंह धौनी को अपने दोस्तों से एक मैच का विश्लेषण करते हुए बताया गया है कि कूच बिहार क्रिकेट ट्रौफी टूर्नामैंट में पंजाब की टीम से बिहार की टीम क्यों हारी थी.

यह मैच 16 दिसंबर, 1999 को हुआ था. उस समय अंडर-19 की राष्ट्रीय टीम के खिलाडि़यों का चयन होना था. पंजाब की तरफ से युवराज सिंह और बिहार से महेंद्र सिंह धौनी का चयन तय माना जा रहा था. लेकिन बिहार की टीम के हार जाने की वजह से धौनी का चयन नहीं हो पाया था.

अपनी टीम की हार की वजह गिनाते किशोर महेंद्र सिंह धौनी दोस्तों को फ्लैशबैक में जाते बता रहा है कि दरअसल, हार तो तभी गए थे जब मैच के पहले ही दिन स्टेडियम से गुजरते युवराज सिंह के सामने हमारा आत्मविश्वास लड़खड़ा गया था. इस दृश्य में दिखाया गया है कि पंजाब का यह धुरंधर, उभरता बल्लेबाज कानों में ईयरफोन लगाए हाथ से ट्रौलीबैग घसीटते बड़ी बेफिक्री व आत्मविश्वास से जमीन को रौंदते हुए जा रहा है और बिहार के खिलाड़ी उस की इस अदा को भौचक देख रहे हैं.

फिल्म बनी थी महेंद्र सिंह धौनी की जिंदगी पर, लेकिन एक दृश्य में ही सही, कैमरे का फोकस युवराज सिंह पर करना अगर निर्देशक की मजबूरी हो गई थी तो बिलाशक इस की वजह युवराज सिंह का वह गजब का आत्मविश्वास व दृढ़ इच्छाशक्ति थी जो आंकड़ों और मैदान से परे उन की व्यक्तिगत जिंदगी में भी दिखी जब वे कैंसर का शिकार हो गए थे.

युवराज के हिम्मती हौसले

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मैदान पर कीर्तिमान गढ़ते रहने वाले युवराज सिंह को 2012 की शुरुआत में कैंसर ने अपनी गिरफ्त में ले लिया था. ठीक इस के पहले 2011 में भारत को क्रिकेट वर्ल्डकप जिताने में भी उन की भूमिका अहम रही थी.

फरवरी 2012 में जैसे ही यह खबर आम हुई कि युवराज सिंह के फेफड़े में ट्यूमर है तो उन के प्रशंसकों ने उन के मैदान तो मैदान, जिंदगी के मैदान में भी बने रहने पर शंकाएं व्यक्त करनी शुरू कर दी थीं. इस की वजह तय है कैंसर के प्रति पूर्वाग्रह और इसे असाध्य बीमारी मानना, जबकि ऐसा है नहीं.

युवराज सिंह के फिजियो डाक्टर जतिन चौधरी ने फरवरी 2012 में ही युवराज सिंह के बारे में उड़ रही अफवाहों को विराम देते स्पष्ट कर दिया था कि उन्हें असामान्य और कैंसर ट्यूमर है. अब यह फैसला डाक्टरों को करना है कि वे कीमोथेरैपी कराएं या फिर दवाइयां दें. ट्यूमर का हिस्सा युवराज सिंह के दिल की धमनी के ऊपर था जिस के फटने की आशंका से डाक्टर इनकार नहीं कर रहे थे.

देर न करते हुए युवराज सिंह बोस्टन के कैंसर अनुसंधान केंद्र जा पहुंचे जहां उन्हें कीमोथेरैपी दी गई. बहुत जल्द युवराज सिंह ठीक हो कर भारत आए और क्रिकेट के मैदान में भी दमखम दिखाते दिखे तो कैंसर से डरने वालों को सुखद आश्चर्य हुआ था कि अरे, यह तो ठीक हो जाता है.

युवराज सिंह के ठीक होने में यानी कैंसर को हराने में इलाज के अलावा उन का वह आत्मविश्वास अहम था जिस का जिक्र 1999 में बिहार कूच ट्रौफी के दौरान महेंद्र सिंह धौनी ने किया था. कैंसर से अपने संघर्ष की दास्तां बयां करती किताब ‘द टैस्ट औफ माइ लाइफ’ में युवराज ने लिखा है, ‘‘जब आप बीमार होते हैं, जब आप पूरी तरह निराश होने लगते हैं तो कुछ सवाल एक भयावह सपने की तरह बारबार आप को सता सकते हैं लेकिन आप को सीना ठोक कर खड़ा होना चाहिए और उन मुश्किल सवालों का सामना करना चाहिए.’’

मनीषा की जिंदादिली

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‘सौदागर’ फिल्म से फिल्म इंडस्ट्री में दाखिल हुईं अभिनेत्री मनीषा कोइराला ने भी कैंसर को हंसतेहंसते हराया. कई फिल्मों में बोल्ड सीन देने वाली मनीषा कैंसर का पता चलने के बाद भी बोल्ड रहीं. उन्हें ओवेरियन कैंसर था. यह इत्तफाक की बात थी कि मनीषा कोइराला के कैंसर का निदान भी 2012 में हुआ था.

मनीषा कोइराला की सर्जरी न्यूयौर्क में हुई थी. ठीक होने के बाद उन्होंने कहा था, ‘‘कैंसर के आगे अगर मैं घुटने टेक देती तो हार जाती पर मैं ने कैंसर का डट कर मुकाबला किया और मैं जीत गई.’’

अब कैंसर की ब्रैंड एंबैसेडर बन कर जागरूकता फैला रहीं मनीषा सामान्य जीवन जी रही हैं.

मनीषा की तरह अभिनेत्री लीजा रे भी स्तन कैंसर की शिकार हुईं. कई सालों के इलाज के बाद उन्होंने हौलीवुड में अपने अभिनय की नई पारी शुरू की. और आज वहां की एक लोकप्रिय अभिनेत्री हैं लीजा.

शेफाली का आत्मविश्वास

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जरूरी नहीं है कि कैंसर सैलिब्रिटीज का ही ठीक हो और उस के लिए महंगा इलाज कराने को बोस्टन या न्यूयौर्क जाना पड़े. इलाज कहीं भी हो, जरूरी यह है कि मरीज हौसला और हिम्मत बनाए रखें. लाखों मरीजों की तरह भोपाल की शेफाली चक्रवर्ती और लखनऊ की नीलम वैश्य सिंह के उदाहरण आश्वस्त करते हैं कि कैंसर से जीतना अब नामुमकिन नहीं रहा.

शेफाली के पति अमित चक्रवर्ती भोपाल स्थित बीएचईएल कंपनी में काम करते हैं. इस दंपती के 2 बच्चे हैं. बेटी 12 साल की और बेटा 8 साल का है. चक्रवर्ती दंपती की जिंदगी में सबकुछ ठीकठाक चल रहा था कि अब से कोई 4 साल पहले पता चला कि शेफाली को जीभ का कैंसर है.

शेफाली बताती हैं कि जिस दिन बायोप्सी की रिपोर्ट आई थी, अमित ने यह नहीं कहा कि तुम्हें कैंसर है, बल्कि यह कहा कि हमें एक लड़ाई लड़नी है और किसी भी हालत में जीतना है.

शेफाली सकते में थी कि कैसे एक झटके में परिवार की खुशियों को ग्रहण लग गया था. डाक्टरों से मिलीं तो पता चला कि जीभ का औपरेशन होगा और मुमकिन है इस से उन की आवाज भी जाती रहे यानी वे कभी बोल ही न पाएं. मुंबई के टाटा मैमोरियल में शेफाली का इलाज व औपरेशन हुआ और सफल भी रहा.

शेफाली ने इस दौरान हिम्मत नहीं हारी. पति और नातेरिश्तेदारों ने भी पूरा सहयेग दिया जिस के चलते एक दुर्गम रास्ते से हो कर वे मंजिल तक आ पाईं. अब शेफाली पूरी तरह स्वस्थ व सामान्य हैं. कैंसर से जंग उन्होंने जीत ली है तो इस की एक बड़ी वजह वही आत्मविश्वास है.

डर कर जीना नहीं

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कैंसर का पता शुरुआती दौर में जांच रिपोर्ट में आसानी से नहीं आता है. लखनऊ की रहने वाले नीलम वैश्य सिंह बहुत ही फिट व जागरूक महिला हैं. जब उन का वजन घटना शुरू हुआ और बौडी स्टैमिना कम होने लगा तो वे अपने फैमिली डाक्टर के पास गईं. कुछ समय पहले वे मैमोग्राफी करा चुकी थीं. उस में कोई जानकारी नहीं मिली थी. डाक्टर की सलाह पर दोबारा मैमोग्राफी टैस्ट कराया. इस में भी सही जानकारी नहीं मिल सकी. मैमोग्राफी के बाद अल्ट्रासाउंड यूएसजी कराया. इस में कुछ संकेत मिले. जिस की पुष्टि के लिए दिल्ली जा कर एफएनसी कराया. एफएनसी बहुत पीड़ादायक टैस्ट था. इस टैस्ट के बाद ही ब्रैस्ट कैंसर का पता चला. नीलम के लिए वे पल बहुत संघर्ष वाले थे. परिवार और बेटी को ले कर तमाम तरह की चिंताएं होने लगीं. नीलम के लिए अच्छा यह था कि पूरा परिवार उन के साथ हर तरह से सक्षम खड़ा था.

दिल्ली के बाद मुंबई जा कर सब से बेहतर इलाज की दिशा में प्रयास शुरू हुए. कई अलगअलग विशेषज्ञ डाक्टरों की राय और काउंसलिंग के बाद नीलम में आत्मविश्वास वापस आना शुरू हुआ. उन्होंने खुद को मजबूत किया. किसी भी औरत के लिए सब से कमजोर पहलू उस के खूबसूरत बाल होते हैं. ब्रैस्ट कैंसर में सुदंरता को ले कर अलग धारणा मन में थी. सर्जरी के पहले डाक्टर ने जब यह बता दिया कि इस में ब्रैस्ट को कोई नुकसान नहीं होगा और बाल वापस आ जाएंगे, तब मन मजबूत हुआ. नीलम कहती हैं, ‘‘सर्जरी करने वाले डाक्टर से बात करने के बाद मेरी सारी चिंताएं शांत हो गईं. सर्जरी से पहले हर तरह के टैस्ट किए जाने के बाद औपरेशन हुआ. औपरेशन के  बाद एक ट्रेनपाइप लगा कर मुझे अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया. दवाओं का शरीर पर बुरा प्रभाव था.  इस के बाद भी मैं खुद को व्यस्त रखना चाहती थी. मैं पार्टी, शौपिंग सबकुछ करने लगी.

‘‘सर्जरी के बाद कीमोथेरैपी शुरू हुई. हर 21 दिन पर 4 बार कीमोथेरैपी होने लगी. पहली थेरैपी के बाद ही मेरे बाल गिरने लगे. कई लोगों ने राय दी कि विग लगा लो. मेरा मन विग के लिए तैयार नहीं था. मैं ने अपने सिर के सारे बाल मुड़वा दिए. यह फैसला मेरे लिए और मेरे जानने वाले लोगों के लिए कठिन था.

‘‘मैं डर में नहीं जीना चाहती थी. बिना बाल के ही लोगों से मिलना, पार्टी और शौपिंग करना शुरू कर दिया.

‘‘अब मेरे बाल वापस आने लगे हैं. मैं ने कभी विग नहीं लगाई. जैसे नैचुरल बाल रहे उस की स्टाइल बना ली. हमेशा अपने को समाज के सामने रखा. कभी हिम्मत हार कर खुद को घर में कैद नहीं किया.

‘‘मेरा मानना है कि इस मर्ज में सब के साथ खुद की ताकत बहुत जरूरी होती है. कैंसर का इलाज बहुत खर्चीला है. इलाज के बाद भी जीवनभर दवाओं और जांच पर टिके रहना होता है. ऐसे में इलाज की कीमत का अंदाजा लगाना कठिन होता है. मेरे मामले में केवल डाक्टरी खर्च, दवा और जांच में 35 से 40 लाख रुपए खर्च हो चुके हैं. यह कमज्यादा भी हो सकता है.’’

मुमताज भी हैं मिसाल

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60-70 के दशकों में धूम मचा देने वाली अभिनेत्री मुमताज अब 68 साल की हो रही हैं. साल 2000 में मुमताज को ब्रैस्ट कैंसर हुआ था. उन के बाएं स्तन में गांठ थी. मैमोग्राफी से यह बात स्पष्ट हो गई थी कि बगैर औपरेशन के वह ठीक नहीं हो सकती तो मुमताज ने सर्जरी कराने का फैसला ले लिया. जब कैंसर का पता चला, उस पूरी रात मुमताज सो नहीं पाई थीं. यह वह दौर था जब वे गुजराती मूल के व्यवसायी मयूर वाधवानी से शादी कर इंगलैंड में जा बसी थीं. वे फिल्मों को अलविदा कह चुकी थीं. मुमताज शुरू से ही हार न मानने वाली अभिनेत्री रही हैं. यही आत्मविश्वास कैंसर से लड़ कर जीतने में भी काम आया. औपरेशन हुआ, कीमोथेरैपी और रेडियोथेरैपी भी हुईं जिस से उन का खानापीना बंद हो गया था. मुमताज ने हार नहीं मानी और एक दिन ऐसा भी आया जब डाक्टरों ने उन्हें विजयी यानी कैंसरमुक्त घोषित कर दिया.

कैंसर को दी मात

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कई कामयाब और हिट फिल्मों के निर्देशक अनुराग बासु की सकारात्मकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे कहते हैं कि उन्होंने कैंसर का नहीं, बल्कि कैंसर ने उन का सामना किया. साल 2004 में अनुराग को ल्यूकेमिया नाम का कैंसर हुआ था. तब वे फिल्म ‘तुम सा नहीं देखा’ का निर्देशन कर रहे थे. प्रोयाइलोसाइटिक ल्यूकेमिया एक तरह का ब्लड कैंसर होता है जिस से ठीक होने की बाबत डाक्टर कोई गांरटी नहीं देते.

आज अगर अनुराग को देखें तो लगता नहीं कि यह वही शख्स है जिसे डाक्टरों ने कह दिया था कि उस के पास 2-3 महीने का ही वक्त है. अनुराग ने कैंसर के आगे सिर नहीं झुकाया और 3 वर्षों के लंबे इलाज के बाद वे जीत गए.  दृढ़ इच्छाशक्ति वाले डायरैक्टर ने 17 दिन वैंटीलेटर पर भी गुजारे थे. मौत के मुंह से वापस आए अनुराग बासु अब कैंसर पर फिल्म बनाने की सोच रहे हैं जिस में उन के व्यक्तिगत अनुभव स्वाभाविक तौर पर शामिल होंगे.

– साथ में शैलेंद्र सिंह

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