Download App

महंगा है कैंसर का इलाज, जानिए किस तरह कैंसर के इलाज में टूट रहे हैं परिवार

रवि प्रकाश के 7 साल के बच्चे को ब्लड कैंसर था. उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले का रहने वाला रवि प्रकाश पेश से किसान था. गांव में उस की 4 बीघा खेती की जमीन थी. बलरामपुर जिला अस्पताल से वह लखनऊ मैडिकल कालेज बच्चे के इलाज के लिए आ गया. यहां आ कर उसे पता चला कि वह बीपीएल कार्डधारक नहीं है यानी सरकार उसे गरीबीरेखा से नीचे का नहीं मानती, इसलिए उस के बच्चे का ‘कैंसर कार्ड’  नहीं बन सकता. ऐसे में कैंसर के इलाज में सरकार द्वारा मिलने वाली सहायता उस को नहीं मिल सकेगी.

अब रवि प्रकाश के सामने 2 तरह की परेशानियां थीं. एक तो, उसे बच्चे का इलाज कराना था. दूसरे, इलाज के लिए पैसों का इंतजाम करना था. रवि प्रकाश के परिवार में 2 बच्चे और पत्नी थी. दोनों ही बच्चे बड़े थे, स्कूल जाते थे. दोनों के स्कूल का खर्च भी कंधों पर था. पत्नी घर पर रहती थी. सब से छोटे बेटे प्रमोद के इलाज को ले कर पूरा परिवार अस्तव्यस्त हो गया था. रवि प्रकाश अपनी पत्नी के साथ लखनऊ मैडिकल कालेज आ गया था. उस के दोनों बच्चे रिश्तेदारों के भरोसे गांव में थे.

कैंसर का इलाज लंबा चलता है. ऐसे में समय और पैसा दोनों देना पड़ता है. रवि प्रकाश की सब से पहले किसानी प्रभावित हुई. वह समय पर फसल नहीं बो पाया. इस के बाद पैसों की जरूरत को ले कर उस ने अपने खेत गिरवी रख दिए. खेत को गिरवी रखने से मिले पैसों से बेटे का इलाज होने लगा. कुछ दिनों वह मैडिकल कालेज में रहता, फिर उसे गांव जाना पड़ता. जब डाक्टर बुलाता, उसे वापस आना पड़ता. 5 वर्षों के इलाज में रवि प्रकाश पूरी तरह से टूट गया था. अब उसे लगने लगा कि यह बच्चा तो बचेगा ही नहीं, उस के बचाने के चक्कर में जमीन गिरवी चली गई, सो अलग. अब परिवार कैसे चलेगा. अब वह रात में लखनऊ में ही रिकशा चलाने लगा. बच्चे के इलाज में गांव का किसान शहर में मजदूर बन गया. इस के बाद भी बच्चा सही नहीं हो सका.

रवि प्रकाश अकेला नहीं है. कैंसर का महंगा इलाज हर वर्ग के लोगों को तोड़ देता है. इस का कोई अनुमानित खर्च नहीं है. रोग की जांच से ले कर इलाज तक अलगअलग अस्पतालों की अलगअलग फीस है. कीमोथेरैपी, दवाओं का खर्च, दवाओं के शरीर पर होने वाले प्रभाव को दूर करने का इलाज सब की अलगअलग कीमतें होती हैं.

लखनऊ के ही पीजीआई में दिल्ली की एक प्राइवेट कंपनी में काम करने वाले नीरज अपना इलाज कराने आए. नीरज मार्केटिंग विभाग में थे. अच्छी सैलरी पाते थे. नीरज के लिवर में कैंसर था. 35 साल की उम्र में नीरज को कैंसर की खबर ने तोड़ दिया. उस की 10 साल पुरानी नौकरी थी. नीरज ने शुरुआत में दिल्ली में अपना इलाज शुरू कराया. वहां उसे इलाज के लिए छुट्टी लेनी पड़ती थी. शुरुआत में उस की कंपनी से कुछ छुट्टियां मिल गईं. इलाज लंबा चलता देख कंपनी ने छुट्टी देने से मना कर दिया. नीरज को उस की कंपनी ने नौकरी छोड़ने पर मजबूर कर दिया. नौकरी में बचाया पैसा खत्म हो चुका था. पीजीआई में उसे बताया गया कि कम से कम 4 लाख रुपए का खर्च आएगा.

नीरज ने अपने हिस्से का पैतृक आवास बेच दिया. उस से मिले पैसों से अपना इलाज शुरू कराया. अब उस का परिवार किराए के कमरे में रहता था. वहां ही रह कर वह अपना इलाज करा रहा था. 3 वर्षों के प्रयासों के बाद भी नीरज का इलाज पूरा नहीं हो सका. ऐसे में वह जिंदगी की जंग हार गया. नीरज के पीछे उस का 10 साल का बेटा और पत्नी बेसहारा हो गए. पत्नी ने लखनऊ में एक दुकान पर सेल्स का काम करना शुरू किया. आज वह  अपनी और बेटे की परवरिश को ले कर परेशान है. वह कहती है, ‘‘नीरज ने जो भी कमाया और बचाया था, वह सब उस की बीमारी में खर्च हो गया. कैंसर की बीमारी से हम भिखारी हो गए. नीरज को बचा पाए होते तो शायद अफसोस न होता.’’

कैंसर के इलाज में टूटते परिवार

कैंसर के इलाज में टूटते परिवारों की दर्दनाक कहानी का अंत नहीं है. अस्पतालों में ऐसे परिवारों से मिलने के बाद समझ आता है कि कैंसर सिर्फ मरीज के लिए जानलेवा ही नहीं होता, यह पूरे परिवार की खुशियों को छीन भी लेता है है. मरीज के जाने के बाद परिवार सड़क पर बदहाल होता है. उसे समझ नहीं आता के वह अपनी जिंदगी कहां से शुरू करे. लखनऊ के मैडिकल कालेज में कैंसर पीडि़त परिवारों को सही से खाना तक नहीं मिल पाता.

लखनऊ के मैडिकल कालेज में ‘प्रसादम सेवा’ चलाने वाले विशाल सिंह कहते हैं, ‘‘हमारी संस्था कैंसर पीडि़त परिवार वालों के तीमारदारों यानी घर के लोगों को दिन का खाना खिलाने का काम करती है. हमारे पास आए परिवारों को देख कर पता चलता है कि कैंसर की मार केवल बीमार पर नहीं पड़ती, बल्कि पूरा परिवार भुक्तभोगी होता है. हम समाज के सहयोग से रोज 250 लोगों को खाना खिलाने का काम करते हैं. यहां लोग उत्तर प्रदेश, नेपाल, बिहार और बंगाल तक से आते हैं.’’

कैंसर की बीमारी बच्चों से ले कर बड़ों तक किसी को भी हो सकती है. इस के इलाज में नियमित जांच और दवाएं जरूरी होती हैं. इस के साथ ही साथ, मरीज को तनाव से मुक्त रहना, अपने शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना भी होता है. कैंसर के प्रकार और बीमारी की स्टेज के अनुसार खर्च बढ़ता रहता है. खर्च का अनुमान लगाना संभव नहीं होता है.

सरकार इस के इलाज में सहायता देती है पर यह कुछ मरीजों तक ही सीमित रह जाती है. कैंसर के खिलाफ लड़ाई जीतने में अच्छे इलाज और आत्मविश्वास का बहुत महत्त्व होता है. कैंसर के इलाज में इतना खर्च हो जाता है कि गरीब परिवार तो छोड़ दीजिए, सामान्य परिवार तक टूट जाते हैं.

भारत में लगभग 25 लाख लोग कैंसर से ग्रस्त हैं और हर साल 7 लाख से अधिक नए मामले रजिस्टर होते हैं. सभी प्रकार के कैंसरों में, पुरुषों में मुंह व फेफड़ों का कैंसर और महिलाओं में सर्विक्स व स्तन कैंसर देश में होने वाली सभी संबंधित मौतों में लगभग 50 प्रतिशत के लिए दोषी हैं.

इंडियन मैडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डा. के के अग्रवाल ने कहा, ‘‘हमारे देश में कैंसर का फैलाव एकसमान नहीं है. ग्रामीण और शहरी सैटिंग के आधार पर लोगों को प्रभावित करने वाले कैंसर के प्रकार में अंतर है. हम ने देखा है कि ग्रामीण महिलाओं में सर्विक्स कैंसर सब से अधिक व्यापक है, जबकि शहरी महिलाओं में स्तन कैंसर बड़े पैमाने पर है. पुरुषों के मामले में, ग्रामीण लोगों को मुंह का कैंसर प्रमुख रूप से होता है, जबकि शहरी पुरुष फेफड़ों के कैंसर से अधिक प्रभावित होते हैं. कैंसर एक महामारी की तरह बनता जा रहा है.

‘‘विडंबना यह है कि कैंसर की दवाएं बहुत महंगी हैं और आम आदमी की पहुंच से परे हैं. इस प्रकार, कैंसर की दवाइयां किफायती दामों  पर उपलब्ध कराने के लिए मूल्य नियंत्रण बहुत आवश्यक है. कैंसर के शुरुआती निदान को सुनिश्चित करने के लिए सरकार को भी पर्याप्त कदम उठाने चाहिए क्योंकि यह एक सिद्ध तथ्य है कि शीघ्र निदान से कई जानें बचाई जा सकती हैं.’’

कैंसर की प्रमुख जांच

कैंसर की प्रमुख जांच में मैमोग्राफी और पैप स्मियर शामिल होती हैं. मैमोग्राफी में स्तन के तंतु की एक्सरे के जरिए जांच की जाती है. पैप स्मियर जांच को पैपेनिकोला भी कहते हैं. गर्भाशय या सेरविक्स टिशू ले कर इस जांच को किया जाता है. इस के अलावा कैंसर की जांच के लिए शरीर के प्रभावित हिस्से का एक्सरे किया जाता है.

कैंसर का रोग जिस स्थान पर हुआ वह इस बात का मुख्य कारक होता है कि इलाज कैसे होगा? इस के साथ ही साथ मरीज की हालत कैसी है, यह भी महत्त्वपूर्ण होता है. इस के इलाज में रेडियम किरणों का प्रयोग किया जाता है. ये किरणें शरीर के कैंसर कोष को खत्म करने का काम करती हैं.

कैंसर के इलाज में रेडियम का प्रयोग काफी सावधानी से किया जाता है. कैंसर की शुरुआती अवस्था में सर्जरी सब से प्रभावशाली होती है. तब तक कैंसर शरीर में फैला नहीं होता है.

कीमोथेरैपी में कैंसर का इलाज दवाओं द्वारा किया जाता है. कैंसर के इलाज में 50 से अधिक प्रभावशाली दवाओं का प्रयोग किया जाता है. बहुत सारे इलाजों के आने के बाद, कैंसर सौ फीसदी ठीक हो जाएगा, यह नहीं कहा जाता है.

कैंसर से ठीक होने के बाद भी लोग सामान्य जीवन बिताने में लंबा समय ले लेते हैं. महंगा होने के बाद भी कैंसर का इलाज पूरी तरह से ठीक होने वाला नहीं है. यही वजह है कि मरीज तो हाथ से जाता ही है, परिवार भी इलाज के बोझ से कर्जदार हो जाता है, सो अलग.

VIDEO : अगर प्रमोशन देने के लिए बौस करे “सैक्स” की मांग तो…

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

जनता की अदालत में जज : अब न्याय व्यवस्था में भी दरार

सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठ जजों ने 12 जनवरी को भारत के मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध प्रैस कौन्फ्रैंस कर के न्यायपालिका और लोकतंत्र को बचाने की अपील की तो देश सकते में आ गया. न्यायिक और राजनीतिक क्षेत्रों में हलचल मच गई. देश में एक अजीब स्थिति पैदा हो गई. न्यायिक इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है.

जजों ने जनता की अदालत में आ कर जो कुछ कहा, सामान्य नहीं, बहुत गंभीर है. जजों के मतभेद खुल कर सामने आने के बाद न्याय का सब से बड़ा मंदिर शक के कठघरे में आ गया. जजों का इशारा स्पष्ट तौर पर न्याय के मंदिर में न्याय के ढोंग, पाखंड की ओर है. उच्च न्यायपालिका पर दबाव या फिर नेता, अपराधी और न्यायतंत्र के अपवित्र गठजोड़ की तरफ संकेत है.

12 जनवरी को 12:15 बजे सुप्रीम कोर्ट के 4 सीनियर जज जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, कुरियन जोसेफ और मदन बी लोकुर अचानक मीडिया के सामने आए. इन्होंने चीफ जस्टिस के तौरतरीकों पर सवाल उठाए, कहा कि लोकतंत्र खतरे में है. ठीक नहीं किया गया तो सब खत्म हो जाएगा.

चीफ जस्टिस पर आरोप

जस्टिस चेलमेश्वर ने शुरुआत करते हुए कहा कि यह कौन्फ्रैंस करने में हमें कोई खुशी नहीं है. यह बहुत ही कष्टप्रद है. हम ने 2 माह पहले चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को पत्र लिखा था और शिकायत की थी कि महत्त्वपूर्ण मामले उन से जूनियर जज को न दिए जाएं पर चीफ जस्टिस ने कुछ और ऐसे फैसले किए जिन से और सवाल पैदा हुए. इतना ही नहीं, आज (12 जनवरी) भी हम मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा से मिले और संस्थान को प्रभावित करने वाले मुद्दे उठाए पर वे नहीं माने. इस के बाद हमारे सामने कोई विकल्प नहीं रह गया. अपनी बात देश के सामने रखने का फैसला किया. कल को लोग यह न कह दें कि हम चारों जजों ने अपनी आत्मा बेच दी.

जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा महत्त्वपूर्ण मामले स्वयं सुनते हैं और दूसरे जजों को इस काम का मौका नहीं देते. देश की व्यवस्था के लिए अहम मामले अपनी पसंद की कुछ खास बैंचों में भेजते हैं. यह कार्य तर्क और विवेक के आधार पर नहीं होता.

चेलमेश्वर ने चीफ जस्टिस को 2 महीने पहले लिखा 7 पेज का पत्र भी जारी किया. इस में केस आवंटन की मनमानी प्रक्रिया के बारे में वर्णन था. चेलमेश्वर ने कहा कि यह सब खत्म होना चाहिए. जस्टिस कर्णन पर दिए गए फैसले में हम में से 2 जजों ने नियुक्ति प्रक्रिया को दोबारा देखने की जरूरत बताई थी, महाभियोग के अलावा अन्य रास्ते भी खोलने की मांग की थी. कोर्ट ने कहा था कि एमओपी में देरी न हो. केस संविधान पीठ में हैं तो दूसरी बैंच कैसे सुन सकती है. कोलेजियम ने एमओपी मार्च 2017 में भेजा पर सरकार का जवाब नहीं आया. मान लें कि वही एमओपी सरकार को मंजूर है.

जब जस्टिस चेलमेश्वर से यह पूछा गया कि क्या यह मुलाकात गैंगस्टर सोहराबुद्दीन मुठभेड़ के ट्रायल जज बृजगोपाल हरकिशन लोया की मौत की जांच जस्टिस अरुण मिश्रा की पीठ को सौंपने के खिलाफ थी जो वरिष्ठता में 10वें नंबर पर हैं?

चेलमेश्वर ने कहा कि आप यह मान सकते हैं.

4 judges take on Chief Justice of India

मालूम हो कि  दिल्ली प्रैस समूह की अंगरेजी पत्रिका ‘दी कैरेवान’ ने जज लोया की मौत को संदिग्ध हालत में हुई बताती रिपोर्ट औनलाइन प्रकाशित कर दिया तो हड़कंप मच गया. बृजगोपाल हरकिशन ?लोया मुंबई में सीबीआई के विशेष जज थे. उन की मौत 30 नवंबर और 1 दिसंबर, 2014 की रात को हुई. उस रात वे नागपुर में थे. उस समय सोहराबुद्दीन मामले की सुनवाई चल रही थी जिस में मुख्य आरोपी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह व अन्य लोग हैं.

इस की जांच की मांग को ले कर लगी याचिका को बंबई हाईकोर्ट ने स्वीकार कर लिया. इसे अचानक सुप्रीम कोर्ट ने सुनना शुरू कर दिया. चूंकि जस्टिस लोया विवादित सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले की सुनवाई कर रहे थे, इसलिए यह विवाद और गहरा गया क्योंकि इस में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह व कई प्रभावशाली लोग आरोपी हैं.

चारों जजों को इस मामले में भी आपत्ति है. ये जज इस मामले की सुनवाईर् के इच्छुक थे पर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने इस मामले को मनमाने तरीके से जस्टिस अरुण मिश्रा की पीठ को दे दिया, जिस में जस्टिस एम एम शांतानागौडर शामिल हैं. यह जूनियर अदालत है.

मामले को ले कर बंबई लायर्स एसोसिएशन ने जनहित याचिका दाखिल की है. एसोसिएशन की ओर से वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने तो खुल्लमखुल्ला कह दिया है कि हर कोई जानता है कि जस्टिस अरुण मिश्रा के भाजपा और उस के बड़े नेताओं से नजदीकी संबंध हैं. जबकि, इस प्रकार आरोप लगाना सही नहीं कहा जा सकता.

दवे ने यह भी कहा कि यह मामला बंबई हाईकोर्ट में लंबित है और शीर्ष अदालत को इस पर सुनवाई करने से बचना चाहिए. इस पर पीठ ने दवे से कहा कि शीर्ष अदालत को इसे क्यों नहीं सुनना चाहिए. हालांकि, अब जस्टिस अरुण मिश्रा की पीठ इस मामले से हट गई है.

इसी तरह चेलमेश्वर ने एमओपी संविधान पीठ 2016 का जिक्र किया. इस पीठ में जस्टिस चेलमेश्वर और कुरियन जोसेफ थे. चेलमेश्वर ने कहा कि वह फैसले का विषय था तो कोई दूसरी बैंच इसे कैसे सुन सकती है. यह आपत्ति न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी सरकार के साथ निर्धारित सहमतिपत्र के बारे में है जिस पर एक बार 5 जजों की पीठ से सुनवाईर् हो चुकी थी पर मुख्य न्यायाधीश ने इसे छोटी बैंच को भेज दिया.

सिस्टम में पेंच

चारों जज मैडिकल कालेज घोटाले के उस मामले में भी खफा हैं जिस की सुनवाई भी चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने एक बैंच से ले कर दूसरी को सौंप दी. मामला लखनऊ मैडिकल कालेज छात्र भरती घोटाले से संबंधित है जिसे जस्टिस चेलमेश्वर ने गंभीर मान कर 5-सदस्यीय पीठ गठित कर दी थी और जिसे चलती कोर्ट में रोकने के लिए चीफ जस्टिस ने एक स्लिप भेजी थी पर जस्टिस चेलमेश्वर नहीं माने. लेकिन चीफ जस्टिस ने अगले ही दिन नई बैंच से उसे खारिज कर दिया. इस घोटाले में गंभीर आरोप न्यायपालिका पर भी थे, इसलिए विवाद और गहरा गया.

मैडिकल घोटाले में ओडिशा के दलाल, हवाला कारोबारी शामिल थे. ओडिशा हाईकोर्ट के जज आई एम कुद्दूसी इस मामले में भ्रष्टाचार करने और पद के दुरुपयोग करने के आरोपी हैं. और याचिकाकर्ता कह चुका था कि चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा भी ओडिशा से हैं, इसलिए वह उन की बैंच में केस नहीं लगाना चाहता. इस पर भारी रोष था. बाद में उस पर कोर्ट ने 25 लाख रुपए का जुर्माना लगाया था.

कलकत्ता उच्च न्यायालय के जस्टिस सी एस कर्णन का विवादित मामला भी था. उन्होंने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को 20 भ्रष्ट जजों की लिस्ट भेजी थी लेकिन उन पर तो कोई कार्यवाही नहीं हुई, उलटे जस्टिस कर्णन को अवमानना मामले में जेल भेज दिया गया. जस्टिस कर्णन मामले में 7 जजों की संविधान पीठ बनी. पीठ ने कहा कि वे या तो जजों पर लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों का साबित करें या अपनी भूल के लिए माफी मांगें.

जस्टिस कर्णन ने अपने मामले की सुनवाई करने वाली संवैधानिक पीठ के सातों जजों के खिलाफ जातिगत भेदभाव के आरोप लगाए. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की बहुत विचित्र हालत देखी गई.

प्रैस कौन्फ्रैंस में जो इन मामलों का जिक्र सामने आया है, वे पहले भी उठते रहे हैं.

असल में यह तो न्याय के इस महासागर में ऊपर दिखने वाला एक छोटा सा हिमखंड है. भीतर कितना बड़ा आइसबर्ग छिपा है, अंदाजा लगाया जा सकता है. चारों जजों की चीफ जस्टिस से कोई व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है. वे निजी खुंदक की बात नहीं कर रहे हैं. यह पदप्रतिष्ठा की लड़ाई भी नहीं है. प्रैस कौन्फ्रैंस करने वाले 4 जजों में से 3 इसी साल रिटायर हो जाएंगे. ये सभी वरिष्ठ जज विधि व्यवस्था की बात करते हैं.

4 judges take on Chief Justice of India

न्यायपालिका पर सवाल

 समयसमय पर उच्च न्यायपालिका पर उंगली उठती रही है. कुछ सालों पहले ‘अंकल जजेज सिंड्रोम’ चर्चित हुआ था. 2009 में भारत के विधि आयोग ने अपनी 230वीं रिपोर्ट में उच्च न्यायालयों में ‘अंकल न्यायाधीशों’ की नियुक्ति के मामले में उल्लेख किया था कि न्यायाधीशों, जिन के परिजन उच्च न्यायालय में प्रैक्टिस कर रहे हैं, को उच्च न्यायालय में नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए.

उसी समय सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के बारे में कहना पड़ा था, ‘‘समथिंग इज रौटन इन द इलाहाबाद हाईकोर्ट.’’

यह मशहूर पंक्ति शेक्सपियर के हैमलेट में है जिस में कहा गया है कि ‘डेनमार्क के राज्य में कुछ सड़ा हुआ है.’ यह पंक्ति उच्च स्तरों में भ्रष्टाचार औैर नैतिकता की कमी का उल्लेख करने के लिए मानक वाक्य बन गई है.

असल में एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के कुछ जजों के भ्रष्टाचार की शिकायतों पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू और ज्ञानसुधा मिश्रा की पीठ ने यह टिप्पणी की थी. सुप्रीम कोर्ट में शिकायतें आ रही थीं कि कुछ न्यायाधीशों के पास अपने दोस्त और रिश्तेदार हैं जो अदालत में वकील के रूप में प्रैक्टिस करते हैं.

पीठ ने कहा था कि प्रैक्टिस शुरू करने के कुछ समय बाद ही जजों के बेटे और रिश्तेदार मल्टी मिलेनियर बन जाते हैं. वे आलीशान बंगले, बैंक बैलेंस, शानदार कार के मालिक बन जाते हैं.

उसी दौरान सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एस एच कपाडि़या ने हाईकोर्ट के 20 जजों के तबादले कर दिए थे.

2003 में बार कौंसिल औफ इंडिया यानी बीसीआई ने सभी जजों से मांग की थी कि यदि उन के करीबी रिश्तेदार उसी अदालत में प्रैक्टिस करते हैं तो वे पहले से जानकारी दें. बार कौंसिल को पता चला था कि उच्च न्यायालय में बड़ी संख्या में ऐसे न्यायाधीश हैं. बीसीआई ने एक वकील के लिए व्यावसायिक आचरण और शिष्टाचार के मानक के रूप में नियम निर्दिष्ट किया था. नियम के अनुसार, किसी अधिवक्ता  और न्यायाधीश के पिता, दादा, पुत्र, पोते, चाचा, भाई, भतीजे, चचेरे भाई, पति, पत्नी, मां, बेटी, बहन, सास, चाची, भतीजी, दामाद या भाभी के रूप में संबंधित हैं.

नहीं है कारगर उपाय

इस के बाद बीसीआई ने केंद्रीय कानून मंत्रालय को 21 उच्च न्यायालयों में 131 ‘अंकल जजों’ और उन के 180 अधिवक्ताओं की और उन के रिश्तों के नाम के साथ सूची भेजी थी. लेकिन अभी तक न तो न्यायपालिका और न ही सरकार इस पर कोई कारगर उपाय कर पाई.

प्रसंगवश यह सामने आया है कि चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा पूर्व चीफ जस्टिस रंगनाथ मिश्रा के भतीजे हैं. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने विवादित लोया मामला अरुण मिश्रा की पीठ को सौंपा है. जो कि 10वें नंबर पर जूनियर हैं, इस पर भी विवाद है.

असल में लोकतंत्र में न्याय के साथ खिलवाड़ इंदिरा गांधी के समय से ही शुरू हो गया था. 70 के दशक में इंदिरा गांधी ताकतवर हो कर उभर रही थीं पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें झटका दिया तो न्यायतंत्र से सर्वशक्तिमान बनने की कोशिश के रूप में उन्होंने देश पर इमरजैंसी थोप दी. अंदरूनी तौर पर न्यायपालिका में गोपनीयता और मौन के नाम पर अनगिनत लूपहोल नजर आते हैं पर अदालत और न्यायपालिका के सम्मान के नाम पर चुप्पी साध ली जाती है.

देश के जो प्रसिद्ध वकील हैं, यह नहीं कि वे कानून के ज्यादा विशेषज्ञ हैं, राजनीतिक रसूख की वजह से जजों के साथ उन की अच्छी सांठगांठ होती है. कौर्पोरेट और राजनीतिक दलों के साथ अंदरूनी खेल चलते रहते हैं.

अपने 3 वर्षों के शासन के दौरान भाजपा सरकार न्यायपालिका का विभाजन करने में सफल रही है. सरकार ने आते ही कोलेजियम सिस्टम को बदलने का प्रयास किया. 1993 से लागू कोलेजियम व्यवस्था को बदलने के लिए 2014 में सरकार ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग यानी एनजेएसी कानून पारित किया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दे दिया. जस्टिस जे एस खेहर, जे चेलमेश्वर, एम बी लोकुर, कुरियन जोसेफ तथा ए के गोयल की 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने एनजेएसी कानून को सर्वसम्मति से खारिज किया था.

इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट और 24 हाईकोर्टों में जजों की नियुक्ति तथा तबादले की 2 दशकों से भी पुरानी कोलेजियम व्यवस्था फिर से बहाल हो गई. एनजेएसी कानून में जजों की नियुक्ति और तबादलों में सरकार की प्रमुख भूमिका रहती पर यह खत्म हो गया.

कोलेजियम व्यवस्था के बदले नई व्यवस्था के लिए 99वें संविधान संशोधन को भी असंवैधानिक करार दे दिया गया. पीठ ने उच्च न्यायपालिका में नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट के 1993 और 1998 के फैसलों को समीक्षा के लिए भेजने का सरकार का आग्रह भी ठुकरा दिया.

इसे ले कर सरकार ने फिर से कोशिश की पर हल्ला मचा कि सरकार उच्च न्यायपालिका में हस्तक्षेप कर रही है. अब 4 जजों के मुख्य न्यायाधीश के कामकाज के प्रति विरोध प्रकट करना बताता है कि उन पर सत्ता का प्रभाव है. न्याय व्यवस्था में अब हालात सही नहीं हैं.

उच्च न्यायपालिका में अनियमितता गहरी है. संविधान, कानून अलग बातें हैं पर धार्मिक, जातीय पूर्वाग्रह अदालतों में आज भी कायम है. न्याय प्रभावशाली सामाजिक वर्ग के पक्ष में होता है. समयसमय पर यह बात बाहर आती रही है. फैसले पूर्वाग्रहपूर्ण होते हैं, यह बात कई बार सामने आती है. अमीरी, गरीबी, जाति, धर्म देख कर निर्णय होते रहे हैं. कभीकभी ‘न्याय’ विधिसम्मत से ऊपर धर्मसम्मत दिखते हैं.

आंकड़े बताते हैं कि देश की अदालतों में 3 करोड़ से ज्यादा मामले लंबित पड़े हैं. न्याय व्यवस्था में ऊपर से नीचे तक भेदभाव देखा जाता है. लाखों गरीब, दलित, पिछड़े छोटेछोटे मामलों में वर्षों से जेलों में बंद हैं या अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं.

असल में यह हमारी प्राचीन न्यायिक व्यवस्था की सोच  का असर है. प्राचीन भारतीय समाज में कानून अथवा धर्म, जिस का अनुपालन हिंदुओं द्वारा किया जाता था, मनुस्मृति द्वारा प्रतिपादित था. यह निष्पक्ष नहीं, वर्णव्यवस्था पर आधारित था. महाभारत में मनुस्मृति को कई जगह सर्वोच्च धर्मशास्त्र व न्यायशास्त्र घोषित किया गया है. यही वजह है कि यहां न्याय गरीबों, वंचितों, निचलों, किसानों, आदिवासियों के लिए नहीं है. कौर्पोरेट, अपराधी, राजनीतिबाजों की सांठगांठ न्यायिक व्यवस्था में उजागर होती रही है.

समाज व सरकार में दरार

 भारत की न्याय व्यवस्था विश्व में श्रेष्ठ मानी जाती है. मुसलिम देशों में धर्म की तानाशाही, अमानवीय न्याय संवैधानिक न्याय बना हुआ है. धार्मिक कानून वाले देशों को छोड़ दें तो विकसित अमेरिका, यूरोप के देशों के संविधान विज्ञान व प्राकृतिक आधारित हैं.

एक बार सुप्रीम कोर्ट का मतभेद सार्वजनिक हो जाने के बाद अब लगता नहीं कि यह दरार फिर से भर पाएगी. सुप्रीम कोर्ट के सभी 24 जज परस्पर एक रह पाएंगे, अब मुश्किल होगा. हर एक पर किसी न किसी का ‘आदमी’ होने का ठप्पा लगेगा. अब पीठें बनेंगी तब भी जजों के मतभेद उभरेंगे.

सुप्रीम कोर्ट, अटौर्नी जनरल और बीसीआई सब कहते हैं कि मामला घर का है और सुलझा लिया गया है पर घर में, एक बार मतभेद दुनिया के सामने आ जाने के बाद, वापस वही प्रतिष्ठा आ पाना कठिन है.

दरअसल, समाज और सरकार में जो दरार पड़ी है उस का असर अब न्याय व्यवस्था पर भी पड़ रहा है, इस दौर में व्यापक पैमाने पर सामाजिक विभाजन हुआ है. समूचे देश में हिंदूमुसलमानों के बीच खाई बढ़ी है. दलितों और पिछड़ों, पिछड़ों और मुसलमानों के मध्य तनाव, हिंसा बढ़ी. यही नहीं, पिछड़ी जातियों के बीच भी परस्पर वैमनस्य बढ़ा है. जाटों, गुर्जरों, राजपूतों, पटेल, पाटीदारों में एकदूसरे से दूरियां हुईं. समाज को बांटने वाली अनगिनत घटनाएं पिछले समय हुईं.

इस विभाजन को पाटने के लिए न तो राजनीतिक दल, न सामाजिक संगठन और न ही एनजीओ ने कोई प्रयास किया.

यह समस्या भारत में ही नहीं, विश्वव्यापी है. यह विघटन की दरार सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्र से होती हुई उच्च न्यायपालिका तक जा पहुंची, जो दिखने भी लगी है. आजादी के इतने सालों बाद भी समाज में न्याय का सिद्धांत पूरी तरह लागू नहीं है. 1947 में स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान में जिस समानता, स्वतंत्रता, न्याय का सपना देखा गया था वह ध्वस्त होता दिख रहा है. न्याय की अवधारणा पर चोट पहुंचती रही है.

कुछ समय से देश में धर्मविशेष राष्ट्र बनाने की मुहिम चल रही है. अखंड भारत कहलाने वाला यह देश वह है जहां राजा को न्याय की सलाह पुरोहित देते रहे हैं. शंबूक वध का उदाहरण है जहां पुरोहितों के कहने पर राजा राम ने शूद्रों के लिए निषिद्ध तप करने पर उस का सिर कलम कर दिया.

डर है कि कहीं न्यायतंत्र जातिविशेष और सत्ता की कठपुतली न बन जाए. जजों का यह कहना कि लोकतंत्र खतरे में है, यह कोर्ट का आंतरिक मामला नहीं है. हर भारतीय के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए.

जजों से निबटने की जटिल प्रक्रिया

 मौजूदा व्यवस्था में उच्च या सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश के खिलाफ केवल महाभियोग का ही प्रावधान है. पर यह प्रक्रिया जटिल है. आज तक किसी जज को इस प्रक्रिया के जरिए हटाया नहीं जा सका. महाभियोग के अलावा उच्च न्यायालय के किसी जज को दंडित करने के नाम पर एक राज्य से दूसरे राज्य में भेजा जा सकता है.

इसलिए यह चर्चा समयसमय पर उठती रही है कि जजों के मामले में कुछ ऐसे प्रावधान होने चाहिए जो न तो महाभियोग जितने कठोर और जटिल हों और न ही इतने हलके कि दोषी सिर्फ तबादला पा कर बच निकले.

जस्टिस कर्णन मामले में ऐसे किसी विकल्प का सुझाव देने को कहा गया था. इस संबंध में यूपीए सरकार के समय जुडिशियल स्टैंडर्ड्स ऐंड अकाउंटेबिलिटी बिल-2010 लाया गया था. इस बिल में एक ऐसी समिति के गठन का प्रावधान था जो जजों के खिलाफ आने वाली शिकायतों को दर्ज कर उन की जांच करती. कोई भी व्यक्ति किसी भी जज के व्यवहार या अक्षमताओं से संबंधित मामले की शिकायत इस समिति में कर सकता था. बिल में दोषी पाए जाने वाले जजों के खिलाफ कार्यवाही किए जाने के भी प्रावधान थे.

2012 में यह बिल लोकसभा से तो पारित हो गया पर राज्यसभा में इस में कई बदलाव किए गए. न्यायपालिका को भी इस के कई प्रावधानों पर आपत्ति थी. इसलिए यह बिल करीब 4 साल लंबित रहा और फिर 2014 में लोकसभा भंग होने के साथ ही लैप्स हो गया. ऐसे में आज भी किसी उच्च या सर्वोच्च न्यायालय के जज के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए महाभियोग जैसे लगभग असंभव विकल्प के अलावा दूसरे विकल्प मौजूद नहीं हैं.

जजों का पत्र

 प्रिय मुख्य न्यायाधीश,

दुख और चिंता के साथ हम ने यह उचित समझा कि आप को पत्र लिख कर कुछ न्यायिक आदेशों को रेखांकित किया जाए जिन से न्याय वितरण व्यवस्था का कार्य न सिर्फ विपरीत रूप से प्रभावित हुआ है, हाईकोर्टों की आजादी के प्रभावित होने के अतिरिक्त चीफ  जस्टिस के प्रशासनिक कार्य को भी प्रभावित किया है. कोलकाता, बंबई और मद्रास हाईकोर्ट के स्थापित होने के बाद कुछ परंपराएं और रूढि़यां कायम हुई थीं और उन्हें लगभग एक शताब्दी के बाद बने सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनाया है. इन में से एक परंपरा यह है कि चीफ जस्टिस रोस्टर के मास्टर होते हैं. इस के अंतर्गत वे केसों को वितरण करते हैं. पर यह, चीफ जस्टिस को अन्य साथी जजों पर कोई कानूनी वरिष्ठता प्राधिकार नहीं देता.

देश की न्यायपालिका में यह स्थापित है कि  मुख्य न्यायाधीश बराबरी वालों में सब से ऊपर हैं. न इस से अधिक और न इस से कम. सभी जज रोस्टर के अनुसार केस सुनने के लिए बाध्य हैं. इन नियमों के खिलाफ जाना न सिर्फ नाखुशी की बात होगी, अवांछनीय भी होगा और इस से पूरे कोर्ट की सत्यनिष्ठा पर संदेह पैदा होंगे. इस से जो हंगामा उत्पन्न होगा उस की बात करना आवश्यक नहीं है.

हमें दुख है कि पिछले दिनों 2 नियमों की बात हुई, उन का पालन नहीं किया जा रहा है. ऐसे उदाहरण हैं कि देश तथा संस्थान के लिए दूरगामी प्रभाव वाले केस मुख्य न्यायाधीश द्वारा उन की पसंद के जजों को दे दिए गए जबकि इन के पीछे कोई तर्कशील कारण नहीं था. इस से हर हालत में बचना चाहिए. हम संस्थान को फजीहत से बचाने के लिए इन केसों को विस्तार नहीं दे रहे हैं पर यह जरूर कहते हैं कि इस तरह के फैसलों से संस्थान की छवि को पहले ही कुछ हद तक नुकसान पहुंच चुका है.

इस बारे में हम यह उचित समझते हैं कि आप को 27 अक्तूबर, 2017 के केस (आर पी लूथरा बनाम भारत सरकार) में पास आदेश के बारे में बताया जाए. इस आदेश में था कि व्यापक जनहित में एमओपी (उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति का ज्ञापन) को अंतिम रूप देने में कोई देरी न की जाए. जब एमओपी संविधान पीठ (इस पीठ में जस्टिस चेलमेश्वर और जस्टिस जोसेफ थे) के फैसले का विषय था तो यह समझना काफी मुश्किल हो रहा है कि कोई दूसरी बैंच इसे कैसे देख सकती है. इस के अलावा संविधान पीठ के निर्णय के बाद आप को मिला कर कोलेजियम के  5 जजों ने एमओपी पर विचार कर उसे अंतिम रूप दिया और तब के चीफ जस्टिस ने उसे मार्च 2017 में भारत सरकार को भेजा.

सरकार ने इस का कोईर् जवाब नहीं दिया और सरकार की इस चुप्पी को देखते हुए यह माना जा सकता था कि सरकार ने कोलेजियम का एमओपी स्वीकार कर लिया है. इस के बाद बैंच के लिए ऐसा कोई अवसर नहीं था कि वह एमओपी को अंतिम रूप देने के लिए अपनी टिप्पणियां करे या यह मामला अनिश्चित समय के लिए लटका रहे.

4 जुलाई, 2017 को 7 जजों की बैंच ने जस्टिस कर्णन के मामले में फैसला दिया. इस मामले में हम में से 2 जजों ने टिप्पणियां कीं कि जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया को फिर से देखे जाने की जरूरत है और कोई ऐसा तंत्र बनाया जाए जिस में जजों को सुधारने के लिए महाभियोग से कम की सजा का प्रावधान हो. इस दौरान सातों में से किसी भी जज ने एमओपी के बारे में कोई शब्द नहीं कहा था. इस बारे में एमओपी से जुड़ा कोई भी मुद्दा चीफ जस्टिस और फुल कोर्ट की बैठक में उठाया जाना चाहिए था. अगर इसे न्यायिक पक्ष में उठाया जाना ही था तो कम से कम इसे संविधान पीठ के सामने उठाया जाना चाहिए था. यह घटनाक्रम बहुत गंभीर है.

चीफ जस्टिस इस बात के लिए बाध्य हैं कि वे स्थिति को ठीक करें और कोलेजियम के अन्य सदस्यों के साथ विचार कर उचित सुधारात्मक कदम उठाएं. अगर जरूरत पड़े तो वे अन्य जजों से भी बात करें.

आदर सहित,

जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर

रंजन गोगोई

मदन भीमराव लोकुर

कुरियन जोसेफ

VIDEO : अगर प्रमोशन देने के लिए बौस करे “सैक्स” की मांग तो…

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

ज्यादा नकद इनाम मिलने से नाखुश हैं U-19 कोच राहुल द्रविड़

भारतीय टीम ने औस्ट्रेलिया को हराकर चौथी बार आईसीसी अंडर-19 विश्व कप का खिताब अपने नाम कर लिया है. जिसके बाद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने खिलाड़ियों पर पैसों की बारिश कर दी. बीसीसीआई ने हर खिलाड़ी को 30 लाख, सपोर्ट स्टाफ को 20 लाख और कोच राहुल द्रविड़ के लिए सबसे ज्यादा 50 लाख रुपए के ईनाम का ऐलान किया. राहुल द्रविड़ को सबसे ज्यादा पैसे इसलिए दिए गए क्योंकि इस जीत में उनका योगदान सबसे अहम माना जा रहा है. क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना है कि राहुल द्रविड़ की शानदार कोचिंग की वजह से ही ऐसा संभव हो पाया है. यही वजह रही कि बीसीसीआई ने उनके लिए सबसे ज्यादा रकम का ऐलान किया लेकिन जब वतन लौट कर टीम मीडिया से मुखातिब हुई तो मीडिया से बात करते हुए विश्व कप जीतने के बाद भी टीम के कोच राहुल द्रविड़ थोड़े नाखुश दिखे.

प्रेस कौन्फ्रेंस के दौरान राहुल द्रविड़ ने बीसीसीआई के एक फैसले पर अपनी नाराजगी जाहिर की. राहुल द्रविड़ ने बीसीसीआई से पूछा है कि टीम के विश्व कप जीतने के बाद बोर्ड की तरफ से जो इनामी राशि दी गई उसमें इतना अंतर क्यों है? द्रविड़ ने पूछा कि मुझे, मेरी टीम और मेरे सपोर्टिंग स्टाफ को दी गई प्राइज मनी में इतना अंतर क्यों रखा गया है. अब खुद राहुल द्रविड़ ने ही इस पर सवाल उठा दिया है. उनका कहना है कि अन्य सपोर्ट स्टाफ ने भी उनके जितना ही मेहनत किया है इसलिए सिर्फ उनको ज्यादा पैसा मिलना सही नहीं है.

बताया जा रहा है कि टीम के हेड कोच द्रविड़ ने बीसीसीआई से अपील की है कि पूरे कोचिंग स्टाफ को एक समान इनामी राशि दी जाए. उन्होंने बोर्ड से स्टाफ के बीच में मतभेद ना करने की अपील भी की है. द्रविड़ ने बोर्ड से साफ कह दिया है कि कोचिंग स्टाफ के हर एक सदस्य का बराबर का योगदान है. पूरे स्टाफ ने एक टीम की तरह काम किया जिसका नतीज विश्व कप फतह रहा. इसलिए स्टाफ के हर सदस्य को बराबर का इनाम दिया जाना चाहिए. गौरतलब है मुख्य कोच राहुल द्रविड़ के अलावा टीम के अन्य सपोर्ट स्टाफ में गेंदबाजी कोच पारस म्हाब्रे, फील्डिंग कोच अभय शर्मा, फिजियोथेरैपिस्ट योगेश परमार, ट्रेनर आनंद दाते और वीडियो एनालिस्ट देवराज राउत थे.

आपको बता दें कि शुक्रवार 2 फरवरी को न्यूजीलैंड में औस्ट्रेलिया के खिलाफ धमाकेदार खेल दिखाते हुए टीम इंडिया ने 6 विकेट से फाइनल मुकाबला जीत विश्व कप अपने नाम कर लिया. टीम की तरफ से मनजोत कालरा ने शानदार नाबाद शतक लगाया. उन्हें मैन औफ द मैच चुना गया. पूरी सीरीज में शुभमान गिल के प्रदर्शन को देखते हुए उन्हें प्लेयर औफ द सीरीज का खिताब मिला.

बता दें कि वर्ल्ड कप जीतने के तुरंत बाद ही राहुल द्रविड़ ने ये कहा था कि उन्हें टीम की जीत का श्रेय कुछ ज्यादा ही दिया जा रहा है. उन्होंने कहा था कि ये पूरी टीम की मेहनत का नतीजा है और सिर्फ उनको ही इसका क्रेडिट नहीं मिलना चाहिए. अपने क्रिकेट करियर से ही लेकर द्रविड़ काफी सभ्य स्वभाव वाले इंसान रहे हैं. क्रिकेट के मैदान पर भले ही उन्होंने कितने बड़े कारनामे किए हों लेकिन वो हमेशा क्रेडिट लेने से बचते रहे और अब कोच बनने के बाद भी वो इसी तरह का बड़प्पन दिखा रहे हैं.

आज लौन्च होगा दुनिया का सबसे शक्तिशाली रौकेट

आज दुनिया का सबसे शक्तिशाली रौकेट लौन्‍च होने जा रहा है. इसका नाम फोल्कन हैवी रौकेट है, जिसका निर्माण टेस्ला के बिलेनियर एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने किया है. अमेरिका की दिग्‍गज कंपनी स्पेसएक्स इसे अंतरिक्ष में भेजने को तैयार है. इसका पहला टेस्ट फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर में होगा. टेकऔफ आज मंगलवार को 1:30 बजे से 4 बजे के बीच हो सकता है. यानी कि फौल्‍कन हैवी को फ्लोरिडा के कैनेडी अंतरिक्ष केंद्र से भारतीय समयानुसार देर रात लौन्‍च किया जाएगा.

स्पेसएक्स के मालिक एलन मस्क ने कहा कि पूरी दुनिया से लोग सबसे बड़े रौकेट और सर्वश्रेष्ठ आतिशबाजी के प्रदर्शन को देखने के लिए पहुंच रहे हैं. यदि मौसम खराब होने की वजह से या फिर किसी और कारण की वजह से मंगलवार को रौकेट लौन्च नहीं हो पाता तो इसे बुधवार को लौन्च किया जाएगा.

कंपनी का दावा है कि उनका रौकेट अब तक का सबसे शक्तिशाली रौकेट है और विशेषज्ञों ने इसकी सराहना करते हुए इसे गेम-चेंजर करार दिया है. नासा की भी इस पर नजर है. इसके जरिए आने वाले समय में लोगों को मंगल और चांद पर भेजा जा सकेगा. इस समय रौकेट के साथ भविष्य का स्पेस सूट पहने एक पुतला और मालिक की चेरी रेड कलर की टेस्ला कार भेजी जा रही है. रौकेट धरती की और्बिट से मंगल की और्बिट तक चक्कर लगाता रहेगा. मस्क का दावा है कि और्बिट पर पहु्ंचते ही यह रौकेट 11 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से चक्कर लगाएगा.

पिछले साल दिसंबर में स्पेसएक्स के सीईओ एलन मस्क ने 27 मर्लिन इंजन वाले इस रौकेट की तस्‍वीरें सोशल मीडिया पर साझा की थीं. इसे फौल्कन 9 नामक तीन रौकेट को मिलाकर बनाया गया है. यह 40 फीट चौड़ा व 230 फीट लंबा है और इसका कुल वजन 63.8 टन है, जो दो स्पेस शटल के वजन के बराबर है. जमीन से उठने पर यह 50 लाख पाउंड का थ्रस्ट पैदा करता है जो बोइंग 747 एयरक्राफ्ट के 18 प्लेन द्वारा मिलाकर पैदा करने वाले थ्रस्ट के बराबर है. इससे लगभग एक लाख 40 हजार पाउंड का वजन अंतरिक्ष में भेजा जा सकता है.

मस्क ने यह दावा भी किया था कि यह रौकेट मनुष्यों को चांद और मंगल ग्रह तक ले जा सकेगा. उन्‍होंने बताया था कि फौल्कन हैवी को ठीक उसी जगह से लौन्च किया जाएगा, जहां से ‘सैटन 5 अपोलो 11 मून रौकेट’ को लौन्च किया गया था. उन्होंने यह भी बताया था कि वह इस रौकेट के साथ मंगल ग्रह की ओर अपनी टेस्ला कंपनी की रोडस्टर कार भी लौन्च करेंगे. यह एक स्पो‌र्ट्स कार है और एक बार चार्जिंग में यह एक हजार किमी की यात्रा कर सकती है. वहीं 1.9 सेकंड में 0 से 100 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार पकड़ सकती है. इस कार की अधिकतम रफ्तार 400 किमी प्रतिघंटे है.

बता दें कि स्पेसएक्स ने रौकेट इंडस्ट्री में उस समय तहलका मचा दिया था जब उसने सफलतापूर्वक रौकेट बूस्टर्स का इस्तेमाल किया था. इससे स्पेस फ्लाइट की कीमत में कमी आई है. इसमें लौन्च किया गया रौकेट और्बिट में अपने भार को छोड़कर धरती पर सुरक्षित लैंडिंग करता है. इस तकनीक के सफल प्रयोग में रूसी, जापानी और यूरोपिय स्पेस एजेंसियां काम कर रही हैं. हालांकि वह अभी टेस्टिंग स्टेज में ही हैं.

अजान विवाद : सोनू निगम की जान को खतरा, बढ़ाई गई सुरक्षा

पिछले दिनों ‘अजान की तेज आवाज’ पर ट्वीट कर विरोध जताने वाले बौलीवुड के जाने माने सिंगर सोनू निगम की जान को खतरा बताया गया है और इसी के मद्देनजर उनकी सुरक्षा बढ़ा दी गई है. दरअसल, महाराष्ट्र के खुफिया विभाग ने पुलिस को भेजी एडवायजरी में कहा है कि कुछ कट्टरपंथी संगठनों से सोनू निगम को जान का खतरा है. वह उनकी हत्या की साजिश रच रहे हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से बताया जा रहा है कि खुफिया रिपोर्ट में कहा गया है ये कट्टरपंथी संगठन सोनू निगम को किसी पब्लिक प्लेस पर या फिर किसी इवेन्ट या प्रमोशन के दौरान निशाना बना सकते हैं. ऐसे में मुंबई पुलिस भी सतर्क हो गई है और उनकी सुरक्षा बढ़ाने की कवायद शुरू हो गई है.

आपको याद दिला दें कि सोनू निगम ने पिछले साल सुबह-सुबह लाउडस्पीकर से आने वाली अजान की आवाज पर आपत्ति जताई थी. बाद में सोनू ने साफ किया था कि वह धार्मिक स्‍थलों पर सुबह के समय बजने वाले लाउडस्‍पीकरों के विरोध में हैं.

पिछले साल सोनू निगम के एक ट्वीट के बाद ये विवाद शुरू हुआ था, जिसमें उन्होंने लिखा था, जब मोहम्मद ने इस्लाम की स्थापना की थी, जब बिजली नहीं थी. फिर एडिसन के आविष्कार के बाद ऐसे चोंचलों की क्या जरूरत है. जाहिर है कि इस आवाज से सभी की नींद खुल जाती है. सोनू निगम ने अपने ट्वीट में ये भी कहा था कि अगर वो मुस्ल‍िम नहीं हैं तो मस्जिद की अजान की आवाज से उनको क्यों रोज सुबह उठना पड़ता है. साथ ही उन्होंने अपने ट्विटर अकाउंट पर यह भी लिखा कि कब तक हम लोगों को ऐसी धार्मिक रीतियों को जबरदस्ती ढोना पड़ेगा.

सोनू निगम के इन ट्वीट्स पर बौलीवुड भी दो भागों में बंट गया था. बता दें कि इसी घटना के बाद सोनू निगम ने ट्विटर छोड़ दिया था. साथ ही एक मौलवी के फतवे के बाद उन्‍होंने मीडिया के सामने अपना सिर मुंडवा लिया था. इस मामले में कई कट्टरपंथी संगठनों ने उन्हें लेकर उग्र धमकियां भी दी थीं.

इस खुफिया रिपोर्ट में सोनू निगम के साथ ही बीजेपी के दो विधायकों पर भी जान का खतरा बताया गया है. विधायक राम कदम और आशीष सेलर को पाकितस्तान के आतंकी संगठन लश्कर ए तैयबा की तरफ से खतरा बताया गया है. इन दोनों विधायकों की सुरक्षा भी बढ़ा दी गई है.

औटो एक्सपो 2018 : कुछ खास तरह के स्कूटर्स होंगे लौन्च

औटो एक्सपो 2018 (Auto Expo 2018) की उल्टी गिनती शुरू हो गई है. इस बार औटो एक्सपो में 51 कंपनियां हिस्सा ले रही हैं. इसके अलावा बड़ी संख्या में फिल्मी और खेल जगत के बड़े सितारे भी शामिल होंगे. इस एक्सपो में भारत रत्न सचिन तेंदुलकर, अक्षय कुमार, जौन अब्राहम और तापसी पन्नू जैसे बड़े सितारे भी अपने ब्रांड का प्रचार करने के लिए ग्रेटर नोएडा पहुंचेंगे. इस बार 7 और 8 फरवरी को 24 नई कारों और टू व्हीलर को प्रदर्शित किया जाएगा. होंडा मोटरसाइकिल की तरफ से इस बार 11 टू-व्हीलर लौन्च करने का ऐलान किया गया है.

स्कूटर 125 CC का होगा यामहा का स्कूटर

वहीं महिंद्रा ने इस बार के औटो एक्सपो में 6 वाहन लौन्च करने का ऐलान किया है. टू-व्हीलर बनाने वाली कंपनी यामहा इस बार वाहनों के मेले में एकदम नया स्कूटर लौन्च करने की तैयारी कर रही है. यामहा का स्कूटर 125 CC का होगा. इस स्कूटर का नाम यामाहा नोजा ग्रांडे (Yamaha Nozza Grande) होगा. इस स्कूटर को पहले से साउथ ईस्ट एशिया के बाजारों में बेचा जा रहा है. यामहा के इस स्कूटर को भारत में टेस्टिंग के दौरान भी स्पौट किया गया था.

8 bhp पावर वाला है स्कूटर

यामाहा के नोजा ग्रांडे में 124cc का SOHC, फ्यूल-इंजेक्टेड इंजन दिया गया है. यह इंजन 8 bhp पावर और 9.7 Nm पीक टार्क जनरेट करने की क्षमता रखता है. पिछले कुछ समय में टू-व्हीलर निर्माता कंपनियां स्कूटर सेग्मेंट में काफी दिलचस्पी ले रही हैं. पिछले दिनों जापानी कंपनी ने इलेक्ट्रिक स्कूटर पेश किया था. यामहा के नए स्कूटर का मुकाबला होंडा ऐक्टिवा 125, होंडा ग्राजिया और सुजुकी ऐक्सेस से होगा.

business

वियतनाम में पहले से ही बिक रहा

यह स्कूटर वियतनाम में पहले से ही बिक रहा है. वहां पवर नोजा ग्रांडे में फ्यूल-इंजेक्शन तकनीक वाला इंजन है. इसमें 12-इंच के अलौय व्हील्स के साथ अगले हिस्से में टेलिस्कोपिक सस्पेंशन और डिस्क ब्रेक दिया गया है. उम्मीद है कि यामहा इसे औटो एक्सपो 2018 में शोकेस करने के साथ अगले कुछ महीनों में इसे भारतीय बाजर में लौन्च करेगी. कुछ मीडिया रिपोर्टस में यह दावा भी किया जा रहा है कि भारत में लौन्च होने वाला नोजा ग्रांडे 110 सीसी का होगा.

वहीं इन सबके बीच रिवर्स गियर वाला स्कूटर लोगों के आकर्षण का केंद्र रहेगा. इस बार के औटो एक्सपो में गुरुग्राम स्थित स्टार्टअप ट्वेंटी टू मोटर्स प्राइवेट लिमिटेड अपनी पहली इलेक्ट्रिक स्कूटर फ्लो लौन्च करेगी. इस स्कूटर की खासियत यह होगी कि इसमें रिवर्स गियर होगा.

स्कूटर में 2.1 KW की इलेक्ट्रिक मोटर

business

कंपनी के CEO और सह संस्थापक प्रवीण खरब के अनुसार फ्लो (Flow) नाम से आने वाले ई-स्कूटर में 2.1 KW की इलेक्ट्रिक मोटर लगाई गई है. कंपनी का दावा है कि यह मोटर 150 किग्रा तक वजन उठाने में सक्षम है. स्कूटर की खास बात ‘जियो फैंसिंग’ फीचर है, जो ऐप की मदद से काम करेगा. इस फीचर की मदद से स्कूटर को सुरक्षित रास्ते पर चलाया जा सकता है. इस ऐप से स्कूटर को चलाने का दायरा फिक्स करने के बाद यदि यह उससे बाहर जाएगा तो स्कूटर का इंजन औटोमेटिक बंद हो जाएगा.

60 हजार रुपए हो सकती है कीमत

कंपनी का दावा है कि यह स्कूटर दो घंटे में फुल चार्ज हो जाएगा. इसके बाद यह 80 किलोमीटर की दूरी तय कर सकता है. स्कूटर की अधिकतम रफ्तार 60 किलोमीटर प्रति घंटा की होगी. इस स्कूटर में यूज की गई 2.1 KW की इलेक्ट्रिक मोटर 100 rpm पर 90 Nm टार्क जेनरेट करती है. अभी इस स्कूटर की कीमत के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है. लेकिन उम्मीद है कि स्कूटर की कीमत करीब 60 हजार रुपए होगी.

ये हैं फीचर्स

फ्लो (Flow) स्कूटर के फीचर्स की बात करें तो इसमें रिवर्स गियर मिलेगा. यह किस तरह काम करेगा और यूजर के लिए कितना यूजफुल होगा, यह तो राइडिंग टेस्ट के बाद ही कहा जा सकता है. इसके अलावा, काइनेटिक एनर्जी रिकवरी सिस्टम, क्रूज कंट्रोल, LED डिजिटल मीटर, LED लाइट्स मिलेंगे. ऐप की मदद से यूजर इस स्कूटर को ट्रैक भी कर सकेंगे.

business

सरकार का ई-व्हीकल पर जोर

गौरतलब है कि प्रदूषण के बढ़ते स्तर के बीच सरकार भी ई-व्हीकल पर जोर दे रही है. इससे पहले भी कई बड़ी कंपनियां अपने ई-स्कूटर लौन्च करने की घोषणा कर चुकी है. दिसंबर में ही जापान की टू-व्हीलर निर्माता कंपनी ओकिनावा (okinawa) ने अपने ई-स्कूटर ‘प्रेज’ को लौन्च किया था. ओकिनावा के ‘प्रेज’ में 1000 वौट की दमदार मोटर लगाई गई है. यह मोटर 3.35 bhp की पावर पैदा करती है.

कंपनी का दावा है कि फुल चार्ज करने पर यह एक बार में 175 से 200 किमी की दूरी तय करने में सक्षम है. कंपनी के अनुसार इसे सड़क पर आप 75 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ा सकते हैं. फुल चार्ज होने में इसे 2 घंटे का समय लगता है. इस इलेक्ट्रिक स्कूटर का औनरोड दाम करीब 66,000 रुपए है.

VIDEO : अगर प्रमोशन देने के लिए बौस करे “सैक्स” की मांग तो…

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

कहीं आपका भी डाटा ना हो जाए हैक, अपनाएं ये तरीके

स्मार्टफोन्स और डाटा प्लान्स में आये दिन हो रहे बदलाव ने तकनीक की दुनिया में क्रांति लाने का काम किया है. यूजर्स अपने स्मार्टफोन्स से दुनिया की हर जानकारी को चंद मिनटों में पा सकते हैं.

किसी भी काम को औनलाइन करने का चलन पिछले कुछ महीनों में काफी तेजी से बढ़ा है. नेट बैंकिंग, ई शौपिंग और सोशल मीडिया जैसे फीचर्स के काम काफी आसान हो चुके हैं.

लेकिन जैसे हर खासियत की एक कमी होती है, वैसे ही अब अपने डाटा को सुरक्षित रखना सबसे बड़ी परेशानी बनती जा रही है.

एक छोटी सी भूल से आपका सारा डेटा लीक या चोरी हो सकता है. ऐसे में बचाव ही सबसे अच्छा तरीका है. हम आपको उन तरीकों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनकी मदद से आप अपने फोन के डेटा को हैकर्स से बचा सकते हैं.

पासवर्ड

technology

सोशल मीडिया हो या फिर कोई ऐप, पासवर्ड ही एक मात्र तरीका है जो आपके डेटा को सुरक्षित रखता है. ऐसे में जानना जरूरी है कि आपके अकाउंट का पासवर्ड कैसा हो? अगर आप अपना पासवर्ड Password रखना चाहते हैं तो इसे P4$$w0rd की तरह लिखें. इस तरह आपका पासवर्ड हैक करना ज्यादा मुश्किल होगा. याद रखें कि पासवर्ड जितना लंबा और अलग होगा उसे हैक करना उतना ही मुश्किल होगा.

डिवाइस को लौक रखें

फेस आईडी, टच आईडी और पासकोड जैसे फीचर्स को आप इनेबल करके अपने अकाउंट और फोन को हैक होने से बचा सकते हैं. कोशिश ये रहनी चाहिए की आपका पासवर्ड काफी मजबूत हो, और फिंगर प्रिंट सेंसर या फेस डिटेक्शन का अगर इस्तेमाल करते हैं तो ये और भी ज्यादा फायदेमंद रहता है.

ऐप की परख जरूरी है

गूगल प्ले से किसी भी ऐप को डाउनलोड करने से पहले चेक कर लें कि, ऐप आपके फोन की कौन-कौन सी जानकारी को एक्सेस करने की परमीशन मांग रहा है. अगर आपको ऐप की कोई शर्त पसंद नहीं आ रही है तो उसे बिल्कुल डाउनलोड न करें. जिन ऐप का आप इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं उन्हें अपने स्मार्टफोन से डिलीट कर दें.

technology

पब्लिक वाई-फाई का सावधानी से करें इस्तेमाल

कई जगहों पर जाने के बाद आपके फोन में वाई-फाई का नोटिफिकेशन आता है. ऐसे में ध्यान रखना जरूरी है कि पब्लिक वाई-फाई के इस्तेमाल के वक्त किसी भी महत्वपूर्ण लौगिंग से बचें, अन्यथा आपका पूरा डाटा चोरी या लीक हो सकता है.

अपडेट

हैकर्स से बचना है तो सबसे जरूरी चीज है अपने फोन और ऐप्स को अपडेट रखें. ऐप्स में अपडेट उसकी सुरक्षा, प्राइवेसी और फीचर्स को लेकर होता है. ऐसे में अगर आपका ऐप पुराना है तो हैकर्स के लिए इसे हैक करना ज्यादा आसान साबित होगा.

सेटिंग्स को चेक करें

अपने स्मार्टफोन, औन लाइन अकाउंट और ऐप्स की सेटिंग्स को जरूर चेक करें. अगर आपको कहीं परेशानी हो तो इसे तुरंत सही करें.

VIDEO : अगर प्रमोशन देने के लिए बौस करे “सैक्स” की मांग तो…

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

एयर एशिया करा रहा है सिर्फ 2,699 रुपये में विदेश यात्रा

अगर आप अपनों के साथ विदेश घूमने का सोच रहे हैं तो शायद इससे अच्छा मौका आपको दोबारा नहीं मिलेगा. सस्ती कीमत पर आपको पूर्वी एशिया के देशों में घूमने का मौका मिल रहा है. जी हां ये औफर पेश किया है विमान कंपनी एयर एशिया ने. एयर एशिया मात्र 2699 रुपये में विदेश का सफर कराने वाला औफर लेकर आई है. इस औफर की वैधता 1 अगस्त 2018 से शुरू होगी और 31 जनवरी 2019 तक रहेगी.

ये एक ‘प्रमोशनल सेल’ है, जिसके तहत आप देश के कुछ चुनिंदा शहरों से पूर्वी एशिया के शहरों में कम पैसे खर्च कर घूम सकते हैं. इसमें भुवनेश्वर, कोच्चि, गोवा, नई दिल्ली, जयपुर, त्रिचुरापल्ली, बंगलोर, चेन्नई और विशाखापत्तनम से कुअलालम्पुर, बाली, सिंगापुर, बैंकौक जैसे कई देश शामिल हैं. इस सेल का फायदा उठाने के लिए आपको एडवांस बुकिंग करानी होगी.

इस औफर में टिकटों की शुरुआती कीमत 2699 रुपये है. ऐसे में बिना मौका गंवाए फौरन एयर एशिया के वेबसाइट www.airasia.com पर जाकर इस औफर के बारे में सारी जानकारी ध्यान से पढ़ें और टिकट बुक करवाएं. बता दें कि ये औफर पहले आओ पहले पाओ के आधार पर आपको मिलेगा. औफर सीमित समय के लिए है, इसलिए बिना देर किए फौरन टिकट बुक करें.

क्या हैं इस प्रमोशनल सेलकी शर्तें

– इन टिकटों को www.airasia.com से ही बुक करा सकते हैं. इसके लिए आप क्रेडिट, डेबिट और चार्ज कार्ड का इस्तेमाल कर सकते हैं

– टिकटों के किराए में टैक्स जुड़ा हुआ होगा.

– एयर एशिया ने कहा है कि इन टिकटों के लिए सीटों की संख्या सीमित है. हो सकता है कि बुक कराते समय टिकट उपलब्ध न हो.

– ये किराए एक तरफ के हैं.

– सभी औफर एयर एशिया के नियमों के मुताबिक होंगे.

– एक बार बुकिंग के बाद कैंसिल कराने पर पैसा वापस नहीं किया जाएगा.

VIDEO : अगर प्रमोशन देने के लिए बौस करे “सैक्स” की मांग तो…

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

जब लंच ब्रेक में मैच रोके जाने पर भड़के कपिल देव…

भारत और दक्षिण अफ्रीका की क्रिकेट टीमों के बीच जारी 6 वनडे मैचों की सीरीज का दूसरा मैच रविवार को सुपर स्पोर्ट पार्क मैदान में खेला गया. इस मैच में भारत ने दक्षिण अफ्रीका को 9 विकेट से करारी शिकस्त दी. साथ ही इस मैच के दौरान एक बहुत बड़ा विलेन भी उबर कर सामने आया. वो विलेन और कोई नहीं बल्कि आईसीसी का एक नियम रहा जिसने वर्ल्ड क्रिकेट और उसके फैंस को कई बातें सोचने पर मजबूर कर दिया.

आईसीसी के नियम की वजह से जब भारत जीत से महज 2 रन दूर था, तब मुकाबला लंच ब्रेक के लिए रोक दिया गया और फिर 40 मिनट के लंबे इतंजार के बाद मैच की औपचारिकता पूरी की गई और टीम इंडिया को जीत मिली.

मैदान पर अंपायर्स के द्वारा मैच रोके जाने के बाद क्रिकेट जगत के कई दिग्गज इस फैसले और नियम पर सवाल उठाते नजर आएं, भारतीय टीम के पूर्व कप्तान कपिल देव ने भी इस फैसले पर सवालिया निशाल खड़े किए. कपिल ने कहा, ‘इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ (इतना कम मार्जिन के लिए मैच रोका गया हो), लेकिन मैं चाहता हूं कि ऐसी चीजें आने वाले समय में बदलें. हमें इससे काफी हैरानी हुई.’

अपनी हैरानी जाहिर करते हुए कपिल ने इस फैसले के लिए अंपायर्स से ज्यादा मैच रेफरी को दोषी माना. जिन्होंने इसमें बीच बचाव नहीं किया और मुकाबला 40 मिनटों के लिए रोकना पड़ा. इसके साथ ही कपिल ने कहा, ‘क्रिकेट को ऐसे लेवल पर लेकर जाएं, जिससे लोगों को इस खेल के साथ जोड़ा जा सके, लोगों का वक्त बर्बाद करने से कोई फायदा नहीं है. इस फैसले ने दुनिया के 40 मिनट रोके, जो कि बिल्कुल भी ठीक नहीं है. इन चीजों से लोग क्रिकेट से दूर होते हैं.’ साथ ही कपिल ने कहा, ‘सारे नियम कौमन सेंस को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं, इसलिए ऐसा कोई नियम नहीं हो सकता जो कौमन सेंस के आड़े आए. आईसीसी को ऐसे नियमों में बदलाव करने चाहिए.’

कपिल के अलावा पूर्व सलेक्टर संदीप पाटिल का कहना है कि अगर फाफ डू प्लेसी मेजबान होते तो वो भी मैच रोकने से मना कर देतें. खैर अब मैच हो चुका है और शायद इस पर आईसीसी विचार करेगा. साथ ही संदीप ने इस घटना को गली क्रिकेट से जोड़ते हुए कहा, ‘अंपायर्स के इस फैसले के बाद ऐसा लगा जब गली क्रिकेट में कोई हारता है तो कहते है कि मां बुला रही हैं और फिर वो चला जाता है.’

वेस्टइंडीज के पूर्व दिग्गज माइकल होंल्डिग ने इस फैसले को हास्यास्पद करार दिया. उन्होंने कमेंट्री करते हुए कहा, ‘‘वे (आईसीसी) खेल को आकर्षक बनाना चाहते हैं लेकिन यह हास्यास्पद फैसला है.’’

यह फैसला सभी को नागवार गुजरा क्योंकि अंपायरों ने पहले ही तीन ओवर और करने की अनुमति दे दी थी. जब लंच होना चाहिए था तब भारत ने 15 ओवर में एक विकेट पर 93 रन बनाये थे. अंपायर के फैसले से इंडियन क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली भी बेहद हैरान हुए. कोहली उस वक्त बल्लेबाजी कर रहे थें उन्होंने अंपायरों के सामने यह मसला उठाया लेकिन अंपायरों पर इसका कोई असर नहीं पड़ा. केवल कोहली ही नहीं बल्कि इस फैसले से बाकी सारे खिलाड़ी, दर्शक और कमेंटेटर भी हैरान रह गए, लेकिन अंपायर नियमों पर अडिग रहे जिसके कारण 40 मिनट के लंच ब्रेक के बाद फिर से भारतीय पारी शुरू हुई और उसने दो रन बनाकर छह मैचों की श्रृंखला में 2-0 से बढ़त बनाई.

इस मैच में मेजबान टीम ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 32.2 ओवरों में 118 रन बनाए. 119 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए बल्लेबाजी करने उतरी टीम इंडिया ने महज एक विकेट के नुकसान पर 20.3 ओवरों के बाद ही जीत हासिल कर ली. आज भारत की जीत के सबसे बड़े हीरो रहे युजवेन्द्र चहल, जिन्होंने मेजबान टीम के 5 बल्लेबाजों को पवेलियन पहुंचाया और टीम इंडिया की जीत की मियाद रखी.

VIDEO : अगर प्रमोशन देने के लिए बौस करे “सैक्स” की मांग तो…

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

भारतीय गेंदबाजों के सामने बेबस दिखी अफ्रीका टीम, बनाया ये खराब स्कोर

पहले वनडे के बाद दूसरे वनडे में भी दक्षिण अफ्रीका के बल्लेबाज भारत की स्पिन जोड़ी-कुलदीप यादव और युजवेंद्र चहल का सामना नहीं कर पाई. दोनों ने रविवार को सुपर स्पोर्ट पार्क मैदान पर खेल जा रहे मैच में आपस में आठ विकेट बांटते हुए मेजबान टीम को 32.2 ओवरों में 118 रनों पर ही ढेर कर दिया.

चहल ने पांच तथा कुलदीप यादव ने तीन विकेट लेकर सबको चौका दिया. चाइनामैन कुलदीप ने आठ ओवर फेंके और सिर्फ 20 रन दिए जबकि चहल ने 8.2 ओवरों में 22 रन दिए. चहल ने पहली बार वनडे में पांच विकेट लिए हैं. यह दक्षिण अफ्रीका का घर में सबसे कम स्कोर है.

साउथ अफ्रीका का घर में न्यूतम स्कोर

118 बनाम भारत, 2018

119 बनाम इंग्लैंड, 2009

129 बनाम इंग्लैंड, 1996

129 बनाम औस्ट्रेलिया, 2011

145 बनाम औस्ट्रेलिया, 2009

sports

बता दें कि टौस जीतकर भारतीय कप्तान विराट कोहली ने पहले बल्लेबाजी करने का फैसला लिया. मेजबान टीम को सधी हुई शुरुआत तो मिली, लेकिन कुलदीप और चहल ने उनकी अच्छी शुरुआत को जाया कर दिया. पहले विकेट के लिए हाशिम अमला (23) और क्विंटन डी कौक (20) ने 39 रन जोड़े. भुवनेश्वर कुमार ने अमला को विकेट के पीछे महेंद्र सिंह धौनी के हाथों कैच करा भारत को पहली सफलता दिलाई.

दूसरा विकेट 51 के कुल स्कोर पर डी कौक के रूप में गिरा. उन्हें चहल ने अपना शिकार बनाया. इसी स्कोर पर मेजबान टीम ने दो और विकेट खो दिए और उसका स्कोर 51 रनों पर चार विकेट कर दिया.

इस मैच में कप्तानी कर रहे एडिन मार्कराम (8) को कुलदीप ने भुवनेश्वर के हाथों कैच करा अपना खाता खोला. उन्होंने चार गेंद बाद डेविड मिलर जैसे खतरनाक बल्लेबाज को अजिंक्य रहाणे के हाथों कैच करा भारत को चौथी सफलता दिलाई. ज्यां पौल ड्यूमिनी (25) और खाया जोंडो (25) ने टीम को संकट से निकालने की कोशिश करते हुए पांचवें विकेट के लिए 48 रनों की साझेदारी की, लेकिन चहल ने जोंडो को अपना शिकार बनाते हुए इस साझेदारी को तोड़ दिया. यह विकेट 99 के कुल स्कोर पर गिरा.

ड्यूमिनी भी 107 के कुल स्कोर पर चहल की गेंद पर पगबाधा करार दे दिए गए. यहां से मेजबान टीम के बाकी के चार विकेट महज 11 रनों के भीतर गिर गए और उन्हें बहुत कम स्कोर पर ही पवेलियन का रूख करना पड़ा. कुलदीप और चहल के अलावा जसप्रीत बुमराह और भुवनेश्वर कुमार को एक-एक सफलता मिली.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें