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बाघ से 2-2 हाथ

उत्तराखंड के जिला उत्तरकाशी के तहत आने वाले गांव खट्टूखाल में रहने वाले सुमेर सिंह की शादी बरसों पहले छवि से हुई थी. घर के सारे लोग खेतीबाड़ी और पशुपालन से जुड़े थे. छवि भी ससुराल आने के बाद छवि भी घरगृहस्थी के कामों के अलावा खेतीबाड़ी के भी काम करने लगी थी. जंगली जानवरों से खेतों की रखवाली के लिए अगर उसे खेतों पर भी रुकना पड़ जाता तो वह मचान पर रातरात भर जागते हुए पहरा देने से पीछे नहीं हटती थी.

रात के वक्त अगर कोई जंगली जानवर खेतों की तरफ आ जाता तो वह ऊंची आवाज में हांक लगा कर उसे भगा देती थी. खेतों की रखवाली करते वक्त वह अपने साथ एक मजबूत डंडा रखती थी. घर पर भी वह हमेशा चौकस रहती थी. पहले जंगली जानवर आ कर गांव के अन्य घरों की तरह उस के घर भी नुकसान कर जाते थे. लेकिन जब से छवि ब्याह कर आई थी, उस ने अपने घर का कभी नुकसान नहीं होने दिया था.

इन्हीं खूबियों की वजह से छवि का अपनी ससुराल में खूब आदरसम्मान था. सभी उसे पसंद करते थे. देखतेदेखते छवि एक बेटी और 2 बेटों की मां बन गई. 3 बच्चे होने के बाद भी वह न जिस्मानी रूप से कमजोर हुई थी, न ही उस के आत्मबल में जरा भी कमी आई थी. वक्त के साथ बच्चे बड़े होने लगे तो वह भी बुढ़ापे की ओर बढ़ने लगी.

गांव खट्टूखाल की भौगोलिक स्थिति कुछ इस तरह से थी कि यह गांव चारों तरफ से घने जंगलों से घिर हुआ है. इस गांव से जो सब से करीबी गांव है, वह 6 किलोमीटर की दूरी पर है. रास्ता भी जंगल से ही हो कर जाता है. मुख्य सड़क पर जाने के लिए करीब डेढ़ किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ता है. यह सफर ज्यादातर दिन में ही तय किया जाता है. क्योंकि रात में जंगली जानवरों के हमले का खतरा बना रहता है.

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मुख्य सड़क पर पहुंच कर नजदीकी कस्बा है देवीधर, जो वहां से करीब 3 किलोमीटर की दूरी पर है. कुछ दिनों पहले की बात है. रविवार का दिन था. बच्चे घर पर ही थे. छवि खेतों पर जाने लगी तो उस की बेटी अंजलि भी उस के साथ चल दी. अब तक वह 17 साल की हो चुकी थी. मांबेटी घर से निकली ही थीं कि गांव की एक लड़की ललिता भी उन के साथ हो ली. वह भी अंजलि की हमउम्र थी.

इन के खेत घर से 4 किलोमीटर की दूरी पर थे. सुमेर सिंह के हिस्से में खेतों की 16 सीढि़यां थीं, इन्हीं में से एक जगह उस ने छानी बना रखी थी. छानी एक झोपड़ी की तरह होती है, जिस में मुख्यत: पशु बांधे जाते हैं. लेकिन बरसात के दिनों में अगर खेतों में रुकना पड़ जाए तो छानी रुकने के भी काम आती है.

सुमेर ने अपनी छानी में 5 भैंसें पाल रखी थीं. जिन की देखभाल के लिए एक कारिंदा रहता था. छवि अकसर अपने खेतों पर जाया करती थी. कभीकभार रात होने पर वह छानी में ही रुक जाती थी. चूंकि सावन का सोमवार आने वाला था. उस दिन गांव की कई महिलाओं को व्रत के लिए छाछ की जरूरत पड़ती थी. इस के लिए छवि छानी पर ही छाछ तैयार किया करती थी. वहां से गांव लौट कर वह महिलाओं को मुफ्त में छाछ बांट देती थी.

उस दिन भी वह इसी मकसद से अपनी बेटी अंजलि को ले कर छानी पर जा रही थी कि गांव की लड़की ललिता भी उन के साथ हो ली थी. छानी पर पहुंच कर तीनों ने भैसों के दूध से जमाए दही की छाछ बनानी शुरू कर दी. रात में कारिंदे को छुट्टी दे कर छवि बेटी अंजलि और ललिता के साथ छानी में ही सो गई.

दिन भर मेहनत की थी, इसलिए थकेहारे होने के कारण लेटते ही सब को नींद आ गई. भैंसें छानी से बाहर बंधी थीं. अंजलि और ललिता को छानी के भीतर सुला कर छवि भी भैसों से कुछ दूरी पर चारपाई बिछा कर लेट गई. छवि के पास घड़ी तो थी नहीं, जो वह टाइम देख पाती, फिर भी उस का अनुमान है कि उस वक्त आधी रात का एक बज रहा होगा, जब अचानक उस की आंख खुल गई.

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छवि को लगा कि कोई उसे सिर के बालों से पकड़ कर तेजी से घसीटते हुए ले जा रहा है. छवि की समझ में नहीं आया कि आखिर वह कौन है, जो इस तरह तेजी से उसे घसीटते हुए ले जा रहा है. वह करीब 50 मीटर तक घिसटती चली गई. कुछ ही देर में हरेभरे खेतों से घिसटती हुई वह कंटीली झाडि़यों पर आई तो उस का जिस्म बुरी तरह छिल गया.

झाडि़यों के पास ही बरसाती नाला था, जिस के पास मुलायम दूब वाली जगह थी. छवि अपने पशुओं को चराने के लिए अकसर वहां लाया करती थी. बालों से खींच कर वहां तक लाने वाले ने उसे उस दूब पर पटक दिया.

अब तक उस के हवास दुरुस्त हो चुके थे. उस ने देखा, उसे यहां तक घसीट कर लाने वाला एक खूंखार बाघ था. उस की लंबाई 7-8 फुट से कम नहीं थी. वह खूंखार बाघ छवि के सिर के बाल अपने मुंह में दबाए उसे घसीटता हुआ वहां तक लाया था. यह जानकारी होते ही छवि की घिग्गी बंध गई.

बाघ के रूप में छवि को अपनी मौत साफसाफ दिखाई दे रही थी. उस ने सुन रखा था कि बाघ पकड़ में आए शिकार को कभी नहीं छोड़ता. पहले वह उसे शिथिल करता है, फिर उस की श्वांस नली पर हमला कर के नली को पंक्चर कर देता है, जिस से धीरेधीरे उस के शिकार की मौत हो जाती है. बाद में वह अपने शिकार को सुरक्षित जगह पर ले जा कर आराम से खाता है.

जो भी था, छवि को अपने बचाव का कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था. फिर भी वह हिम्मत कर के उठी और वहां से भागने लगी. बाघ ने लपक कर उस की गर्दन अपने जबड़ों में दबोच ली. छवि की गर्दन पर उस के दांत गड़ गए.

दर्द से छवि की चीख निकल गई. एक पल के लिए उस ने सोचा कि अब वह नहीं बच पाएगी. उस की मौत निश्चित है. लेकिन उस के सोचने की शक्ति अभी खत्म नहीं हुई थी. उस ने मन ही मन अपना आत्मबल बटोर कर सोचा कि बाघ का निवाला तो बनना ही है. जब मौत तय है तो क्यों न मरने से पहले एक बार मौत का मुकाबला कर लिया जाए. छवि ने अपनी सारी हिम्मत जुटाई और एक हैरान करने वाला फैसला ले लिया.

छवि ने चीखते हुए अपने दोनों हाथ बाघ के मुंह में डाले और पूरी ताकत से उस के दोनों जबड़ों को फैलाना शुरू किया, ताकि उस के दांत उस की गर्दन पर ज्यादा गहराई तक न गड़ सकें. इस के साथ ही उस ने अपनी लात से बाघ के पेट पर 2-3 भरपूर वार किए.

उस के ऐसा करने से चमत्कार सा हुआ. जो बात सोची भी नहीं जा सकती थी, आर्श्चजनक रूप से वह हो गई. छवि की जबरदस्त हिम्मत और ताकत के सामने बाघ के जबड़े की पकड़ ढीली पड़ गई, जिस से छवि की गर्दन भी उस की पकड़ से मुक्त हो गई.

बाघ को कमजोर पड़ते देख छवि ने पूरी ताकत से उस के पेट पर लात मारी, साथ ही उस के जबड़े चीरने का प्रयास करने लगी. उस ने पूरी ताकत लगा कर बाघ को एक जोर का धक्का दिया तो बाघ पीछे जा गिरा. छवि उस के चंगुल से मुक्त हुई तो उस की हिम्मत चौगुनी हो गई. उस ने पास ही पड़ा बड़ा सा पत्थर उठा कर उस पर दे मारा.

पत्थर बाघ के सिर पर लगा. अपनी प्रवृति के अनुसार, हिंसक जानवर चोट खाने के बाद ज्यादा उग्र और आक्रामक हो उठते हैं. लेकिन यहां उलटा हुआ. एक अबला नारी की गर्जना और हिम्मत से बाघ का हौसला पस्त हो गया. घबरा कर वह तेजी से पलटा और जंगल की ओर भाग निकला.

छवि बुरी तरह जख्मी थी. गर्दन से खून बह रहा था. लेकिन उस ने हौसला नहीं खोया. शायद इसी के चलते वह पूरी ताकत से चीखी. उस के गले से निकली आवाज रात की निस्तब्धता को चीर गई. वह पूरा जोर लगा कर अंजलि और ललिता को पुकारने लगी.

कुछ ही देर में हड़बड़ाई हुईं दोनों लड़कियां वहां पहुंच गईं. छवि की हालत देख कर दोनों रोती हुईं ‘बचाओ बचाओ’ की गुहार लगाने लगीं. उसी बीच छवि ने पहनी हुई धोती का टुकड़ा फाड़ कर अपनी गर्दन में बांध लिया था. इस का फायदा यह हुआ कि काफी हद तक घाव से खून बहना रुक गया.

लड़कियों से चीड़ के पेड़ के छिलके मंगवा कर छवि ने आग जलाई. उल्लेखनीय है कि जंगली जानवर आग के नजदीक नहीं आते. उन्हें भरोसा था कि आग देख कर बाघ उन के पास नहीं आएगा, वरना वह फिर से हमला कर सकता था, बल्कि अब तो छवि के साथसाथ उस की बेटी अंजलि व उस की सहेली ललिता भी खतरे के दायरे में आ गई थीं.

खैर, इस के बाद छवि के कहने पर लीसे वाले छिलके को एक डंडे पर बांधा गया. उसे मशाल की तरह जला कर तीनों रात के अंधेरे में जंगली रास्ते से 4 किलोमीटर पैदल चल कर अपने गांव आ गईं. घर के बरामदे में पहुंच कर छवि निढाल सी हो कर पोल के सहारे बैठ गई. दोनों लड़कियों ने पहले की तरह रोते हुए शोर मचाना शुरू कर दिया.

शोर सुन कर सब से पहले सुमेर सिंह अपने कमरे से निकला. फिर घर के अन्य लोगों के अलावा पासपड़ोस के तमाम लोग जमा हो गए. हर शख्स यह सुन कर हैरान था कि छवि ने खुद को एक बाघ के चंगुल से बचा लिया था. लोग छवि को तुरंत अस्पताल ले जाने पर विचार करने लगे. किसी ने कहा कि चारपाई पर डाल कर ले जाते हैं तो किसी ने सलाह दी कि कंधे पर उठा कर ले जाया जाए.

लेकिन छवि ने कहा कि वह सड़क तक पैदल चली जाएगी, वहां से गाड़ी का इंतजाम कर लो. ऐसा ही किया गया. सुमेर ने अपने एक परिचित यजविंदर सिंह परमार को अपनी गाड़ी ले कर सड़क पर पहुंचने को कहा. देवीधार में यजविंदर की कंस्ट्रक्शन कंपनी है. वह अपनी गाड़ी ले कर बताई गई जगह पर पहुंच गया.

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घायल अवस्था में ही छवि अपने पति और अन्य लोगों के साथ डेढ़ किलोमीटर पैदल चल कर सड़क पर पहुंची. वहां से उसे देवीधार ले जाया गया. उस वक्त रात के 3 बजे से ज्यादा का समय हो गया था. इतनी रात को कोई डाक्टर न मिलने पर बोलेरो का रुख डुंडा की ओर कर दिया गया.

छवि को ले कर जब वे लोग सरकारी प्राथमिक चिकित्सालय पहुंचे तो ड्यूटी पर मौजूद डाक्टर ने मामला देखते ही घायल को किसी बड़े अस्पताल ले जाने को कहा. तब ये लोग वहां से 17 किलोमीटर दूर उत्तरकाशी के जिला अस्पताल पहुंचे, जहां इमरजेंसी में छवि का चैकअप करते ही डाक्टरों ने कहा कि इस की जान बचाना चाहते हैं तो तुरंत देहरादून के दून अस्पताल जाओ.

वहां से चलते वक्त साथ आए लोगों ने डाक्टरों की बातें सुन ली थीं. वे हैरान हो कर कह रहे थे कि यह औरत यहां तक पहुंच  गई है तो यह इस के आत्मबल और साहस का ही कमाल है, वरना जख्म जितना गहरा है, वह भी बाघ के दांतों का, इसे तो रास्ते में ही दम तोड़ देना चाहिए था.

खैर, छवि को ले कर वे सब उत्तरकाशी से 220 किलोमीटर दूर देहरादून पहुंचे. वहां अस्पताल के डाक्टरों की टीम ने छवि का तुरंत इलाज शुरू कर दिया, पर घाव की स्थिति देख कर उन्होंने भी अपने हाथ खींच लिए. एक सीनियर डाक्टर ने कहा, ‘‘केस इतना सीरियस है कि हम इस की जान बचाने के लिए अभी कुछ नहीं कर पाएंगे. यहां के हरिद्वार रोड पर बहुत बड़ा हौस्पीटल है सीएमआई. आप लोग इन की जान बचाना चाहते हैं तो इन्हें वहां ले जाएं.’’

कंबाइंड मैडिकल इंस्टीट्यूट (सीएमआई) देहरादून का काफी अच्छा निजी चिकित्सा संस्थान है. छवि को तत्काल वहां पहुंचाया गया. वहां के डाक्टरों ने छवि का उपचार तो शुरू कर दिया, साथ ही उस के पति सुमेर सिंह से कहा, ‘‘यहां का इलाज बहुत महंगा है. हमें नहीं लगता कि यहां का खर्चा आप लोग उठा सकोगे.’’

‘‘डाक्टर साहब, मैं अपने खेत और घर वगैरह सब बेच दूंगा, बस आप मेरी पत्नी को बचा लें. मेरी और मेरे बच्चों की जिंदगी इसी के साथ है.’’ सुमेर सिंह ने दोनों हाथ जोड़ कर कहा.

इस पर छवि का औपरेशन करने के लिए बाहर से एक स्पैशलिस्ट को फोन किया गया. 10 मिनट में ही स्पैशलिस्ट डाक्टर आ पहुंचे. पर जैसे ही उन्होंने गर्दन का घाव चक किया, उन्होंने भी अपने हाथ खड़े कर दिए. कहा, ‘‘इस का इलाज कर पाना मेरे लिए संभव नहीं है, आप इन्हें चंडीगढ़ के पीजीआई ले जाएं. वहां शायद इन की जान बच जाए.’’

पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट औफ मैडिकल साइंसेज (पीजीआई) चंडीगढ़ का विश्वविख्यात मैडिकल संस्थान है. 250 किलोमीटर का सफर तय कर के छवि के घर वाले पीजीआई आ पहुंचे. इमरजेंसी में उस वक्त डा. ऋषि मणि श्रीवास्तव ड्यूटी पर थे. उन्होंने तुरंत छवि का चैकअप किया.

छवि की गर्दन पर बाघ के दांतों का 10×6 सेंटीमीटर का ऐसा घाव था, जिस ने भीतर का सिस्टम पूरी तरह सें तहसनहस कर दिया था. उसे सांस लेने में दिक्कत हो रही थी. वह बोल भी नहीं पा रही थी. घाव चूंकि बाघ का था, इसलिए यह केस और भी खतरनाक और गंभीर था.

डा. ऋषि का संबंध डिपार्टमेंट औफ ओटोलारिनजोलौजी एंड हैड नेक सर्जरी से था. उन्होंने तुरंत इस इमरजेंसी केस के बारे में अपने एचओडी प्रोफेसर ए.के. गुप्ता से संपर्क किया. प्रो. गुप्ता ने भी तत्काल इमरजेंसी वार्ड में पहुंच कर छवि की हालत का मुआयना किया. तय हुआ कि डाक्टरों की टीम को तुरंत औपरेशन करना होगा.

प्रो. गुप्ता की अगुवाई में बनी इस टीम में डा. ऋषि मणि श्रीवास्तव के अलावा 2 अन्य सर्जनों डा. श्रुति व डा. निशिकांत को शामिल किया गया. डा. श्रीवास्तव के बताए अनुसार, यह एक नितांत मुश्किल एवं उलझा हुआ औपरेशन था, जो निरंतर 7 घंटों तक चला. मगर डाक्टरों को खुशी थी कि उन के प्रयास हर तरह से सफल रहे.

औपरेशन पूरी तरह कामयाब रहा. छवि की कट चुकी नसों को सफलतापूर्वक जोड़ दिया गया. उस के छोटेबड़े हर घाव को ठीक करने का प्रयास किया गया. उस की वोकल कौर्डस को काफी नुकसान पहुंचा था. सांस की नली में छेद हो गया था. लेकिन डाक्टर संतुष्ट थे कि उस की हर परेशानी पकड़ में आ गई थी. इन परेशानियों का इलाज भी सही रूप से होने लगा था.

औपरेशन के बाद 22 दिनों तक छवि को गहन औब्जर्वेशन में रखा गया. इस के बाद उसे तब डिस्जार्च किया गया, जब वह खाने और चलनेबोलने के काबिल हो गई. छवि जब स्वस्थ हो कर गांव लौटी तो सब ने इसे चमत्कार माना. पहले छवि की हिम्मत ने एक चमत्कार किया था कि बाघ के मुंह से वह अपनी गर्दन छुड़ा लाई थी. आगे मैडिकल साइंस ने चमत्कार किया कि पीजीआई के डाक्टरों ने उसे बचा लिया.

थाई मसाज की आड़ में

पहली अगस्त, 2017 को भीलवाड़ा के एडीशनल एसपी गोपालस्वरूप मेवाड़ा अपने औफिस में बैठे थानाप्रभारी से किसी आपराधिक मामले पर चर्चा कर रहे थे, तभी अंजान नंबर से उन के मोबाइल पर फोन आया. उस समय वह गंभीर मसले पर विचार कर रहे थे, इसके बावजूद उन्होंने फोन रिसीव कर के जैसे ही मोबाइल कान से लगाया, दूसरी ओर से फोन करने वाले ने कहा, ‘‘सर, आजकल आप शहर में रोजाना कोई न कोई बड़ा धमाका कर रहे हैं, इसलिए अपराधियों में दहशत छाई हुई है.’’

‘‘भई वह तो ठीक है, यह मेरी ड्यूटी भी है,’’ गोपालस्वरूप मेवाड़ा ने जवाब में कहा, ‘‘पर यह बताइए कि आप ने फोन क्यों किया है, आप कौन बोल रहे हैं?’’

‘‘सर, आप यही समझ लीजिए कि हम आप के शुभचिंतक हैं.’’ फोन करने वाले ने कहा.

‘‘चलो, यह भी ठीक है, पर मैं यह जानना चाहता हूं कि आप ने फोन क्यों किया है? आप को कोई शिकायत हो तो बताइए, अभी मैं थोड़ा व्यस्त हूं.’’ गोपालस्वरूप मेवाड़ा ने फोन करने वाले की चिकनीचुपड़ी बातें सुन कर पीछा छुड़ाने के लिए कहा.

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‘‘सर, मेरी कोई शिकायत नहीं है. मैंने तो आप को यह बताने के लिए फोन किया था कि शहर में आजकल तितलियों की बहार आई हुई है.’’ फोन करने वाले ने कहा.

तितलियों की बात सुन कर एसपी साहब ने कहा, ‘‘तितलियों की बहार का क्या मतलब? तुम कहना क्या चाहते हो? जो भी कहना है, साफसाफ कहो.’’

‘‘सर, शहर में देशी ही नहीं, विदेशी तितलियां भी आने लगी हैं. ये तितलियां मसाज पार्लरों में आ रही हैं.’’ फोन करने वाले ने कहा.

‘‘क्या मसाज पार्लरों में गलत काम भी हो रहे हैं?’’ गोपालस्वरूप मेवाड़ा ने फोन करने वाले से पूछा.

‘‘सर, यह पता करना पुलिस का काम है. इस बारे में आप पता करवा लीजिए.’’ उस आदमी ने इतना कह कर फोन काट दिया.

फोन कटने के बाद गोपालस्वरूप मेवाड़ा उस आदमी की बातों पर विचार करने लगे. उन्हें मामला गंभीर लगा तो थानाप्रभारी से उस फाइल पर बाद में चर्चा करने की बात कह कर उसे भेज दिया. इस के बाद अपने खास मुखबिरों को फोन कर के यह पता लगवाया कि शहर में कहांकहां मसाज पार्लर और स्पा सैंटर चल रहे हैं, साथ ही यह भी पता करवाया कि इन मसाज पार्लरों में किस तरह की गतिविधियां चल रही हैं?

2-3 घंटे में ही उन्हें मुखबिरों से जो जानकारियां मिलीं, वे चौंकाने वाली थीं. उन्होंने तुरंत अपने सूचना तंत्र से उन जानकारियों की पुष्टि करवाई. वे जानकारियां सही निकलीं तो गोपालस्वरूप मेवाड़ा ने पुलिस अधिकारियों की एक टीम बनाई. टीम में शामिल प्रशिक्षु डीएसपी दिनेश परिहार को कुछ बातें समझा कर प्राइवेट कार से सामान्य कपड़ों में शहर के महावीर पार्क के पास स्थित स्पा पैलेस भेज दिया.

कोतवाली से करीब 3 सौ मीटर दूर स्थित इस स्पा पैलेस पर दिनेश परिहार एक पढ़ेलिखे व्यापारी की तरह कार से उतरे. उन्होंने एक नजर स्पा पैलेस की बिल्डिंग पर डाली. बाहर से वह किसी मध्यम शहर के मसाज पार्लर जैसा नजर आ रहा था. लेकिन वह स्पा पैलेस का शीशे का दरवाजा खोल कर अंदर दाखिल हुए तो वहां की चमकदमक देख कर दंग रह गए. अंदर दाखिल होते ही रिसैप्शन पर चुस्त पोशाक पहने बैठी युवती ने मुसकरा कर उन का स्वागत करते हुए कहा, ‘‘वेलकम सर, मैं आप की क्या सेवा कर सकती हूं?’’

‘‘यार, मैं तो यहां घूमने आया था. आप के स्पा का नाम सुना तो आप से मिलने चला आया,’’ दिनेश परिहार ने एक शौकीनमिजाज नौजवान की तरह अपनी पैंट की जेब से महंगी सिगरेट का पैकेट निकालते हुए कहा, ‘‘क्या मैं यहां सिगरेट पी सकता हूं?’’

‘‘सौरी सर, यहां स्मोकिंग अलाऊ नहीं है. इसकी वजह यह है कि हमारे यहां विदेशी लड़कियां भी काम करती हैं. उन्हें स्मोकिंग से एलर्जी है. इस के अलावा हमारे कस्टमर भी ऐतराज करते हैं.’’ रिसैप्शनिस्ट ने मोहक मुसकान बिखेरते हुए कहा.

‘‘ओके, आप कह रही हैं तो हम सिगरेट नहीं पीते हैं.’’ दिनेश ने रिसैप्शन के पास दीवारों पर लगी मसाज के अलगअलग तरीकों वाली तसवीरों पर नजर डालते हुए कहा.

‘‘सर, पहले आप हमारे स्पा पर कभी नहीं आए?’’ रिसैप्शनिस्ट ने पूछा.

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‘‘यू आर राइट, मैं जयपुर का रहने वाला बिजनैसमैन हूं. आप के स्पा पैलेस का नाम सुना तो मसाज कराने का मूड बन गया और आप के यहां चला आया.’’ दिनेश ने रिसैप्शनिस्ट के चेहरे को गौर से देखते हुए कहा.

‘‘यस सर, योर मोस्ट वेलकम.’’ युवती ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘सर, हमारे यहां 900 रुपए एंट्री फीस लगती है. पहले आप उसे जमा करा दीजिए, उस के बाद जैसा और जिस लड़की से मसाज करवाना चाहेंगे, आप को उस का अलग से पैसा देना होगा.’’

‘‘डोंट वरी,’’ दिनेश ने पैंट की जेब से नोटों से भरा पर्स निकाल कर उस में से 5-5 सौ रुपए के 2 नोट रिसैप्शनिस्ट को देते हुए कहा, ‘‘यह लीजिए, एंट्री फीस.’’

युवती ने एक हजार रुपए कैश काउंटर में रख कर सौ रुपए का नोट लौटाते हुए कहा, ‘‘सर, योर गुडनेम प्लीज.’’

‘‘व्हाय…’’ दिनेश ने सौ रुपए का नोट युवती को देते हुए कहा, ‘‘ये आप के लिए टिप है.’’

‘‘थैंक्स सर,’’ युवती ने कहा, ‘‘हम रजिस्टर मेंटेन करते हैं, इसलिए आप का नाम जानना चाहती हूं.’’

‘‘ठीक है, आप को फार्मैलिटी करनी है तो लिख लीजिए दिनेश फ्राम जयपुर.’’ दिनेश ने जानबूझ कर सरनेम छिपाते हुए कहा.

‘‘सर, आप मोबाइल नंबर भी बता दीजिए तो हम आप को भविष्य में हमारी नई सेवाओं की समयसमय पर जानकारी देते रहेंगे.’’ युवती ने कहा.

‘‘ओह नो, आप अभी मोबाइल नंबर छोडि़ए,’’ दिनेश ने कहा, ‘‘मुझे आप की सर्विसेज पसंद आईं तो मैं खुद ही मौका मिलने पर यहां हाजिर हो जाऊंगा.’’

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‘‘ओके सर, प्लीज सिट औन सोफा,’’ युवती ने कहा, ‘‘हमारी मसाज गर्ल आप को ब्रोशर दिखाएगी. आप उन में से पसंद कर लीजिए कि कौन सी मसाज कराएंगे.’’

दिनेश सामने रखे सोफे पर बैठ गए. रिसैप्शनिस्ट ने इंटरकौम से एक युवती को बुला कर कहा, ‘‘यह सर मसाज कराना चाहते हैं, इन से बात कर लीजिए.’’

चुस्त कपड़े पहने वह युवती ब्रोशर ले कर दिनेश के बगल में बैठ गई और अपने उभारों को दिखाते हुए बोली, ‘‘सर, आप कैसी गर्ल्स से मसाज कराना चाहेंगे, इंडियन बेबी से या फौरनर बेबी से?’’

‘‘वाव, आप के यहां फौरनर गर्ल्स भी हैं?’’ दिनेश ने चौंकते हुए कहा, ‘‘तब तो आज मजा आ जाएगा. लेकिन पहले आप उस ब्यूटी के दीदार तो कराइए.’’

‘‘सर, आप मेरे साथ आइए.’’ युवती ने उठते हुए कहा.

वह युवती दिनेश को पहली मंजिल पर ले गई, जहां गलियारे के दोनों तरफ 8-10 कमरे बने हुए थे. पांच सितारा होटलों की तरह सजे गलियारे और उन कमरों में तमाम सुविधाएं थीं. कमरों में मद्धिम रोशनी के बीच एसी के अलावा बैड, मसाज टेबल और शौवर आदि लगे हुए थे.

दिनेश ने उस युवती के साथ चलते हुए एकदो कमरों में झांक कर देखा तो वहां की भव्यता देख कर दंग रह गए. युवती उन्हें एक कमरे में ले गई, जहां बैठी एक लड़की मोबाइल पर गेम खेल रही थी. लड़की की ओर इशारा कर के युवती ने कहा, ‘‘यह बेबी मिजोरम की है.’’

दिनेश की ओर दिलकश अदा से देखते हुए मिजोरम वाली लड़की ने कहा, ‘‘हाय हैंडसम.’’

दिनेश ने उस लड़की की ओर उपेक्षा से देखते हुए साथ आई युवती से कहा, ‘‘आप तो फौरनर ब्यूटी की बात कह रही थीं?’’

युवती ने अर्थपूर्ण मुसकराहट के साथ पूछा, ‘‘यह आइटम आप को पसंद नहीं आया?’’

दिनेश ने कुछ नहीं कहा तो युवती उन्हें दूसरे कमरे में ले गई, जहां 3 लड़कियां बैठी आपस में बातें कर रही थीं. युवती ने उन की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘जनाब, ये थाइलैंड की गर्ल्स हैं. आप इन में से पसंद कर लीजिए. आप कौन सी बेबी से मसाज कराना चाहेंगे? यह भी बता दीजिए कि आप फुल बौडी मसाज कराएंगे या केवल सिर की और कितनी देर की?’’

दिनेश ने उन में से एक लड़की को पसंद कर के अपने पास बुलाया. थाईलैंड की उस लड़की ने इशारों में सैक्स करने की बात कही तो नीचे से आई लड़की ने सैक्स के लिए 10 हजार रुपए मांगे. दिनेश ने रकम ज्यादा बताई तो सौदा 5 हजार रुपए में तय हो गया.

सौदा तय होने के बाद साथ आई युवती ने दिनेश से थाइलैंड की लड़की को एक कमरे में ले जाने को कहा. दिनेश चलने को हुए तभी जैसे उन्हें कुछ याद आया हो. उन्होंने कहा, ‘‘ओह सौरी, मैं नीचे सोफे पर अपना मोबाइल भूल आया हूं. पहले उसे ले आता हूं.’’

वह युवती कुछ कहती, उस के पहले ही दिनेश तेजी से सीढि़यां उतर कर ग्राउंड फ्लोर पर आ गए. सिगरेट पीने के बहाने वह बाहर आए और गोपालस्वरूप मेवाड़ा को मोबाइल फोन से अलर्ट कर दिया. एडीशनल एसपी साहब को उन्हीं के फोन का इंतजार था.

उन्होंने पहले से गठित टीम में शामिल सीओ सिटी राजेंद्र त्यागी, कोतवाली प्रभारी बिरदीचंद गुर्जर, थाना सदर के थानाप्रभारी यशदीप भल्ला, थाना सुभाषनगर के थानाप्रभारी प्रमोद शर्मा, थाना हमीरगढ़ के थानाप्रभारी गजराज चौधरी और एसआई पुष्पा कासोटिया आदि को स्पा पैलेस पर छापा मारने के लिए भेज दिया.

कुछ ही देर में पुलिस की कई गाडि़यों से आए पुलिस वालों ने स्पा पैलेस को घेर लिया. मसाज पार्लर की तलाशी में थाइलैंड की 3 और मिजोरम की एक लड़की को गिरफ्तार कर लिया गया. इन के साथ स्पा पैलेस के मैनेजर नवीन शर्मा और उस की एक सहयोगी महिला को भी गिरफ्तार किया गया.

मैनेजर नवीन शर्मा मूलत: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले का रहने वाला था. वह भीलवाड़ा में शास्त्रीनगर में रहता था. पुलिस सभी को थाने ले आई. पुलिस को हैरानी हो रही थी कि 10 दिन पहले ही कोटा में थाइलैंड की लड़कियां मसाज पार्लर की आड़ में अनैतिक कार्य करते हुए पकड़ी गई थीं, इस के बावजूद भीलवाड़ा में मसाज पार्लर चलाने वाले थाइलैंड की लड़कियों से अनैतिक धंधा करा रहे थे.

जांच में पता चला कि स्पा पैलेस नाम से मसाज का लाइसैंस मध्य प्रदेश के रतलाम शहर के रहने वाले व्यवसाई सुनील गोवानी के नाम था. सुनील के मध्य प्रदेश के शहर रतलाम, उज्जैन, इंदौर, नागदा, नीमच सहित राजस्थान के कई शहरों में मसाज पार्लर चल रहे थे. उसी ने थाइलैंड की इन लड़कियों को भीलवाड़ा पहुंचाया था. उस ने मिजोरम की लड़की के माध्यम से थाइलैंड की लड़कियों से संपर्क किया था. उस के बाद उन का वीजा तैयार करवाया था.

थाइलैंड से 2 लड़कियां इसी 8 जून को मुंबई उतरी थीं, जबकि एक लड़की 23 जून को हैदराबाद उतरी थी. इन सब को मुंबई और हैदराबाद से भीलवाड़ा लाया गया था. थाइलैंड की ये लड़कियां 3 महीने के टूरिस्ट वीजा पर भारत आई थीं. पुलिस को इन के पासपोर्ट मिले हैं. थाइलैंड की लड़कियों से पूछताछ में पुलिस को भाषा की परेशानी आई, क्योंकि ये हिंदी नहीं समझती थीं, लेकिन अंगरेजी फर्राटे से बोल रही थीं.

पूछताछ में पता चला कि थाइलैंड की ये तीनों लड़कियां पहली बार भारत आई थीं. वे मोटी कमाई के लालच में देहव्यापार में धकेल दी गई थीं. जबकि वहीं मिजोरम वाली लड़की इस के पहले इंदौर स्थित सुनील के स्पा में काम कर चुकी थी. भीलवाड़ा के इस पार्लर पर दिल्ली, मुंबई और कोलकाता से भी लड़कियां आ चुकी हैं.

सुनील गोवानी के इस काम में भीलवाड़ा के शास्त्रीनगर का रहने वाला मनोज लालवानी भी जुड़ा था. उस की शास्त्रीनगर में इलैक्ट्रिक के सामानों की दुकान है. वह रोजाना शाम को स्पा पैलेस आ कर मैनेजर नवीन शर्मा से उस दिन की कमाई ले जाता था, जिसे वह और गोवानी आपस में बांट लेते थे.

स्पा पैलेस पर काम करने वाली लड़कियां भीलवाड़ा के शास्त्रीनगर में किराए के मकान में रहती थीं. मकान का किराया ही नहीं, उन के खानेपीने के खर्च के साथ स्पा पैलेस तक आनेजाने के लिए जो वैन लगी थी, उस का खर्चा मनोज ही देता था.

इस स्पा पैलेस का उद्घाटन करीब सवा साल पहले फिल्म अभिनेत्री मोनिका बेदी ने किया था. पार्लर में औनलाइन बुकिंग भी होती थी. इस के लिए वेबसाइट भी बनी थी. पार्लर में थाइलैंड एवं मिजोरम से बुलाई गई लड़कियों को 25-25 हजार रुपए वेतन के साथ इंसेंटिव भी दिया जाता था.

पार्लर में रोजाना 10 से 30 ग्राहक आते थे. पार्लर में मसाज का जो ब्रोशर ग्राहक को दिखाया जाता था, उस में 30 मिनट, 60 मिनट, 90 मिनट एवं 120 मिनट के मसाज के अलगअलग रेट निर्धारित थे.

पार्लर में काम करने वाली लड़कियों को सवा से डेढ़ महीने में बदल दिया जाता था. उन के स्थान पर दूसरे पार्लर से लड़कियां बुला ली जाती थीं, ताकि ग्राहकों को नईनई लड़कियां मिलती रहें, जिस से पार्लर से ग्राहक जुड़े रहें. स्पा पैलेस में सदस्य बना कर भी ग्राहकों को जोड़ा जाता था.

इस के लिए 11 हजार रुपए सदस्यता ली जाती थी. ये सदस्यता 3 महीने के लिए होती थी. इस अवधि में मसाज की संख्या तय कर दी जाती थी. इस बीच उस से कोई पैसा नहीं लिया जाता था. पुलिस को पार्लर की तलाशी में एक फाइल मिली है, जिस में सदस्यों के फोटो के साथ पूरा ब्यौरा दिया था.

स्पा पैलेस जिस बिल्डिंग में चल रहा था, उसे 80 हजार रुपए महीने किराए पर लिया गया था. पार्लर के रिसैप्शन से ले कर गैलरी और फर्स्ट फ्लोर के कमरों के बाहर सीसीटीवी कैमरे लगे थे. पुलिस ने इन कैमरों की हार्डडिस्क जब्त कर ली है. पुलिस उस की जांच कर रही है कि वहां कौनकौन लोग आते थे.

पुलिस ने रिसैप्शन से ग्राहकों का नाम एवं मोबाइल नंबर लिखा रजिस्टर भी जब्त कर लिया है. विदेशी युवतियों की तलाशी में पुलिस को करीब एक लाख रुपए नकद मिले हैं. इस के अलावा मसाज पार्लर से तमाम आपत्तिजनक चीजें जब्त की गई हैं. भीलवाड़ा पुलिस ने थाइलैंड की युवतियों के बारे में दिल्ली स्थित थाइलैंड दूतावास को सूचना दे दी थी.

कथा लिखे जाने तक पार्लर चलाने वाला सुनील गोवानी और उस का साथी मनोज लालवानी पुलिस की गिरफ्त में नहीं आया था. इस से पहले 21 जुलाई को कोटा शहर में स्पा सैंटर में चल रहे सैक्स रैकेट का भंडाफोड़ किया गया था. पुलिस ने कोटा के गुमानपुरा में सैंटर स्क्वायर मौल में चौथी मंजिल पर चल रहे सौंदर्यम फैमिली स्पा एवं जवाहरनगर में डिस्ट्रिक्ट सैंटर में संचालित स्पा सैंटर पर छापा मार कर थाइलैंड की 8 एवं नगालैंड की एक लड़की सहित कुल 17 लोगों को गिरफ्तार किया था.

गुमानपुरा स्थित सौंदर्यम फैमिली स्पा को बूंदी का रहने वाला राजेश माधवानी चला रहा था, जबकि उस की पत्नी संजना माधवानी जवाहरनगर वाला स्पा चला रही थी. दोनों जगहों पर स्पा की आड़ में सैक्स रैकेट चल रहा था. पुलिस ने स्पा चलाने वाले राजेश माधवानी और उस की पत्नी संजना को गिरफ्तार कर लिया था.

इन में गुमानपुरा का सौंदर्यम फैमिली स्पा काफी समय से चल रहा था, जबकि जवाहरनगर वाला स्पा कुछ महीने पहले ही फ्रैंचाइजी के रूप में खोला गया था. सौंदर्यम फैमिली स्पा में 4 छोटेछोटे केबिन बने हुए थे, जिन में पलंग, गद्दे और स्पा की सामग्री के अलावा तमाम आपत्तिजनक चीजें रखी थीं.

इस स्पा सैंटर में 2 हजार रुपए सामान्य चार्ज लिया जाता था, जबकि सैक्स के लिए कोई कीमत तय नहीं थी. लड़कियां पहले स्पा करती थीं, उसी के साथ वे ग्राहक को ‘यू वांट…यू वांट…’ कह कर उकसाती थीं. इस के बाद स्पा संचालक के माध्यम से घंटे के हिसाब से सौदा तय होता था. पैसों का बंटवारा लड़की और स्पा संचालक के बीच आधाआधा होता था.

पूछताछ में राजेश माधवानी ने बताया था कि उस के संबंध मुंबई, दिल्ली और कोलकाता के कुछ लोगों से थे. उन्हीं के माध्यम से वह थाइलैंड से लड़कियां मंगाता था. वह भी महीने, डेढ़ महीने में स्पा की लड़कियों को बदल देता था. उस ने सौंदर्यम के नाम से बाकायदा वेबसाइट बनवा रखी थी, जिस में स्पा सैंटर के कमरों की लाइव तसवीरें देखी जा सकती थीं. रेट लिस्ट सहित कई अन्य जानकारियां वेबसाइट पर दी गई थीं.

ये सोशल मीडिया के जरिए ग्राहकों को विदेशी युवतियों की फोटो भेज कर बुकिंग करते थे. संजना ने पकड़े जाने से 3-4 दिन पहले ही थाइलैंड की लड़कियां दिल्ली और पुणे से बुलाई थीं. इन लड़कियों को वह 20 हजार रुपए महीने वेतन तथा सैक्स के नाम पर मिलने वाली रकम का आधा हिस्सा देती थी. ग्राहक की इच्छा पर लड़कियों को स्पा से बाहर भी भेजा जाता था.

दोनों स्पा सैंटरों से पुलिस को करीब 2 सौ लोगों की ऐसी सूची मिली है, जो वहां नियमित आते थे. थाइलैंट की लड़कियों ने पुलिस को बताया था कि उन के देश में इस तरह सैक्स अपराध नहीं है, इसलिए वे भारत आई थीं. कोटा में पकड़ी गई थाइलैंड की लड़कियां न हिंदी जानती थीं और न ही अंगरेजी. पुलिस ने नगालैंड की लड़की के माध्यम से उन लड़कियों से पूछताछ की, क्योंकि वह थाई भाषा जानती थी. राजेश और संजना जानबूझ कर थाइलैंड की इन लड़कियों को लाए थे, जिस से वे किसी अन्य दलाल के पास न जा सकें.

राजेश माधवानी पहले ट्रांसपोर्ट का व्यवसाय करता था. उस में घाटा होने के बाद वह पत्नी के साथ कोटा में स्पा सैंटर चलाने लगा. उस का स्पा सैंटर अच्छा चल रहा था. पर मोटी कमाई के लालच में स्पा की आड़ में वह भारतीय और विदेशी लड़कियों से देहव्यापार कराने लगा. इसी साल मार्च में उस ने पहली बार थाइलैंड की लड़कियों को कोटा बुलाया था.

पहली बार विदेशी लड़कियों के आने से राजेश माधवानी की पौ बारह हो गई थी. उस के ग्राहकों की तादाद तेजी से बढ़ गई. थाई मसाज की आड़ में उस ने थाइलैंड की लड़कियों को देहव्यापार में उतार दिया. पकडे़ जाने तक वह 25 से ज्यादा थाई लड़कियों को कोटा बुला चुका था.

राजेश की पत्नी संजना कोटा से पहले जयपुर में ब्यूटीपार्लर चलाती थी. उसे इस का पूरा अनुभव था, इसलिए राजेश ने पत्नी को साथ रखा और पहले स्पा के नाम पर साख बनाई. वह स्पा के लिए सदस्य भी बनाता था. विदेशी लड़कियों को बिना सूचना दिए रखने और ठहराने के मामले में इंटेलीजेंस ब्यूरो ने राजेश माधवानी को नोटिस दिया है. किसी भी विदेशी नागरिक को अपने यहां नौकरी देने या ठहराने पर आईबी को सूचना देनी जरूरी होती है.

अदालत की ओर से न्यायिक हिरासत में जेल भेजे जाने पर कोटा जेल प्रशासन ने थाइलैंड और नगालैंड की लड़कियों का जेके लोन अस्पताल में मैडिकल कराया था. मैडिकल में थाइलैंड की 20 साल की एक लड़की गर्भवती पाई गई थी. अभी वह अविवाहित है. सोनोग्राफी जांच में उस के पेट में 10 सप्ताह का गर्भ होने का पता चला है.

इस के अलावा थाइलैंड की एक लड़की के एचआईवी पौजिटिव होने की पुष्टि हुई है. इस से जेल और पुलिस प्रशासन की परेशानियां बढ़ गई हैं. इस के अलावा उन लोगों की भी चिंता बढ़ गई है, जो इन लड़कियों के संपर्क में आए थे. महानगरों की तरह राजस्थान के छोटे शहरों में भी मसाज पार्लर और स्पा सैंटरों की आड़ में विदेशी लड़कियों को देह व्यापार में धकेलने के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं.

जयपुर में नवंबर, 2015 में बनीपार्क इलाके में बने एक मौल में स्पा सैंटर के नाम पर जिस्मफरोशी का रैकेट पकड़ा गया था. मौल की पहली मंजिल पर चल रहे 2 स्पा सैंटरों पर की गई कारवाई में थाइलैंड की 10 लड़कियों के अलावा 8 लड़कों को पकड़ा गया था. ये स्पा द थाई हारमोनी एवं क्रिस्टल स्पा सैंटर के नाम से करीब एक साल से चल रहे थे.

बहरहाल, इंसान की आदिकाल से चली आ रही सैक्स की भूख ने अब वैश्विक बाजार खड़ा कर दिया है. भारत के महानगरों में फैले इस बाजार में कई सालों से विदेशी लड़कियां लोगों के आकर्षण का केंद्र रही हैं. अब छोटे शहर भी इस की चपेट में आते जा रहे हैं.

– कथा पुलिस सूत्रों एवं अन्य रिपोर्ट्स पर आधारित

क्या कुसूर था वैशाली का

हरियाणा से निकला नारा ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ भले ही राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान  बनाने में कामयाब रहा हो, लेकिन कुछ सिरफिरे इस नारे के मूलतत्त्व की ऐसी धज्जियां उड़ा रहे हैं कि इंसानियत ही नहीं हैवानियत भी शर्म से सिर झुका ले. बेटी के लिए सब कुछ करने वाले मांबाप तक नहीं समझ पाते कि उन्होंने बेटी को बचा कर,उसे पढ़ा कर गुनाह किया या बेटी होना ही उस का गुनाह था. बेटी के मांबाप को जिंदगी भर दर्द और गुस्से का घूंट पीने को मजबूर करने वाले ऐसे दरिंदों को जितनी सजा दी जाए, कम है.

यौवन सब को आता है, लड़कों को भी लड़कियों को भी. यौवन आता है तो निखार भी आता है और सुंदरता भी बढ़ती है. लड़कों को तो इस सब से कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन कई बार लड़कियों के लिए यह सब बहुत भारी पड़ता है. उन्हें इस सब की ऐसी कीमत चुकानी पड़ती है, जिस के बारे में स्वयं लड़की ने तो क्या, किसी ने भी सोचा तक नहीं होता. बांसवाड़ा, राजस्थान की 18 वर्षीया वैशाली के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ. न तो वैशाली को खुद पता था और न उस के मातापिता को कि उस की खूबसूरती पर एक रक्तपिपासु की नजर जमी है.

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बांसवाड़ा की अगरपुरा कालोनी में रहने वाली वैशाली फर्स्ट ईयर की छात्रा थी और अपने परिवार के साथ रहती थी. उस के पिता पिंकेश शर्मा विकलांग हैं. वैशाली के घर के सामने ही जगदीश बंजारा का घर था. कुछ समय तक जगदीश वैशाली का सहपाठी भी रहा था. जब से वैशाली यौवन द्वार पर आ कर खड़ी हुई थी, तभी से जगदीश की नजरें उस पर जम गई थीं. जगदीश और उस का भाई रमेश उसे आतेजाते छेड़ते थे. वैशाली ने इस बात की शिकायत अपने मातापिता से भी की थी. इतना ही नहीं, कालोनी वालों ने भी जगदीश की आए दिन उधमबाजी करने की पुलिस से शिकायत की थी.

जगदीश संभवत: किसी गलतफहमी का शिकार था, यही वजह थी कि वह वैशाली से एकतरफा प्यार करने लगा था. जबकि वैशाली उस से बात तक करने को तैयार नहीं थी.

बुधवार 2 अगस्त, 2017 की दोपहर 12 बजे वैशाली फर्स्ट फ्लोर की बालकनी में बाई के साथ कपड़े सुखा रही थी. उस के पिता पिंकेश शर्मा ऊपर की मंजिल पर थे. तभी सामने के घर में रहने वाला जगदीश दीवार फांद कर आया और उस ने अनायास वैशाली को दबोच लिया. उस ने साथ लाए चाकू से वैशाली की गर्दन पर इतने वार किए कि वह लहूलुहान हो कर गिर पड़ी. जगदीश जैसे आया था, वैसे ही भाग गया. बाई ने शोर मचाया तो पासपड़ोस के लोग भी आ गए और वैशाली के परिवार वाले भी. वैशाली को आननफानन में अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक वह दम तोड़ चुकी थी.

इस बीच किसी ने फोन कर के इस मामले की सूचना थाना कोतवाली को दे दी थी. कोतवाली पुलिस भी मौकाएवारदात पर पहुंच गई और महिला थाने की पुलिस भी. पूरी जानकारी ले कर पुलिस ने वैशाली के पिता पिंकेश शर्मा की तहरीर पर जगदीश बंजारा के खिलाफ भादंवि की धारा 450 (हथियार ले कर जबरन घर में घुसने), 376, 511 (बलात्कार की कोशिश), हत्या के लिए 302 और 34 के अंतर्गत केस दर्ज कर लिया. इस के साथ ही पुलिस ने जगदीश बंजारा की खोज शुरू कर दी, लेकिन तब तक पूरा बंजारा परिवार फरार हो चुका था.

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वैशाली की हत्या को ले कर पूरी अगरपुरा कालोनी में रोष था. इतना रोष कि लोग बंजारा परिवार के घर को आग लगा देना चाहते थे. गंभीर स्थिति को देखसमझ कर एसपी के आदेश पर बंजारा परिवार के घर पर 7 सशस्त्र सिपाहियों का पहरा बैठा दिया गया था. इस के बावजूद कुछ युवक उस घर को क्षति पहुंचाने के लिए आए तो पुलिस ने उन्हें समझा कर वापस लौटा दिया.

काफी भागदौड़ के बाद सिपाही इंद्रजीत सिंह और लोकेंद्र सिंह ने जैसेतैसे 3 अगस्त को जगदीश बंजारा को गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर उस से काफी पूछताछ की गई, लेकिन उस ने मुंह नहीं खोला. आखिर इतना बड़ा अपराध कर के वह कब तक चुप रह सकता था. 4 अगस्त को उसे मुंह खोलना ही पड़ा. पुलिस से उस ने केवल इतना ही कहा, ‘‘मैं वैशाली से प्यार करता था. वह मेरी बनने को तैयार नहीं थी, फिर मैं उसे किसी और की कैसे होने दे सकता था? इसलिए मैं ने उसे मार डाला.’’

मृतका वैशाली के पिता पिंकेश शर्मा चाहते थे कि इस ममले की जांच महिला थाने के सीआई देवीलाल करें. इस के लिए वह एसपी से मिले.

एसपी ने केस की जांच सीआई देवीलाल को सौंप दी. पुलिस जगदीश बंजारा को जेल भेज चुकी है. केस की जांच सीआई देवीलाल कर रहे हैं, जगदीश बंजारा को पकड़ने वाले सिपाही इंद्रजीत सिंह और लोकेंद्र सिंह को पुलिस विभाग ने सम्मानित किया है.

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इंडियन पेमैंट पोस्टबैंक बनेगा गांव में बचत योजना का आधार

सरकार की हर गांव और घर तक बैंक की पहुंच बनाने की योजना इसी साल आकार लेनी शुरू कर देगी. सरकार ने संसद में बताया है कि इंडियन पोस्ट पेमैंट बैंक यानी आईपीपीबी की करीब साढ़े 6 सौ शाखाएं अप्रैल से काम करना शुरू कर देंगी.

पिछले वर्ष अक्तूबर से आईपीपीबी की कुछ ऐसी ही योजनाएं चल रही थीं और उन की सफलता को देखते हुए आगामी अप्रैल से इन बैंकों की 650 शाखाएं काम करनी शुरू कर देंगी. भारतीय रिजर्व बैंक इन बैंकों को काम करने के लिए लाइसैंस जारी कर चुका है.

सरकार का दावा है कि इस साल के अंत तक बड़ी संख्या में इन बैंकों की शाखाएं खोल दी जाएंगी. इस के लिए भरती प्रक्रिया भी चल रही है. आईपीपीबी के माध्यम से सरकार की योजना छोटी बचत योजनाओं को क्रियान्वित करने की रही है. हर गांव में बैंक की पहुंच हो, लोगों को बचत योजनाओं का लाभ मिले, इस के लिए देश के 90 प्रतिशत गांवों में फैले पोस्टऔफिसों के विशाल नैटवर्क का इस्तेमाल करने के लिए कंपनी कानून 2013 में संशोधन किया गया है.

पोस्टऔफिस में मिलने वाले सेविंग्स सर्टिफिकेट्स जैसी योजनाओं को बेचने का अधिकार अब निजी क्षेत्र के कुछ बड़े बैंकों को भी दिया गया है. छोटी बचत की इन योजनाओं को पहले की तरह लोकप्रिय बनाने के लिए सरकार ने अपने पोस्टऔफिस के विस्तृत नैटवर्क का इस्तेमाल करने की योजना बनाई और उस की शुरुआत अप्रैल से की जा रही है. यह योजना नए कलेवर में उपभोक्ताओं को कितना पसंद आती है, यह तो समय बताएगा, लेकिन इस से ग्रामीण क्षेत्र के लोगों का पोस्टऔफिस का रुख उस में फिर लौट सकता है, पोस्टऔफिसों की वीरानी फिर भीड़भाड़ में बदल सकती है.

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राष्ट्रीय दूरसंचार नीति से आएगी संचार क्रांति

स्मार्टफोन आज हर हाथ की शान बन गया है. बस, रेल, मैट्रो या अन्य किसी भी सार्वजनिक वाहन से सफर करते समय लोग अपने स्मार्टफोन में व्यस्त नजर आते हैं. यह प्रचलन महानगरों में लगातार बढ़ रहा है. लोकल ट्रेन या सार्वजानिक वाहनों में सफर करते हुए समसामयिक मुद्दों पर की जाने वाली बहसें अब लगभग खत्म हो गई हैं. लोग खुद के मोबाइल में इस तरह चिपके रहते हैं कि अगलबगल में क्या चल रहा है, उस की उन्हें रास्ता चलते खबर नहीं रहती.

जियो मोबाइल के डाटा निशुल्क देने की पिछले डेढ़ वर्ष पहले की गई घोषणा के बाद यह स्थिति ज्यादा बनी है. रिलायंस के जियो के बाद एअरटेल, वोडाफोन, बीएसएनएल, आइडिया जैसी सेवाप्रदाता कंपनियां प्रतिस्पर्धा में आईं और उन्होंने भी अपने ग्राहकों को संभालने के लिए कम कीमत पर डाटा उपलब्ध कराना शुरू कर दिया. लोगों को कम दाम पर डाटा मिल रहा है लेकिन कंपनियों का नैटवर्क वाईफाई महज नाममात्र का होता है.

भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण यानी ट्राई ने इस स्थिति पर नियंत्रण करने और उपभोक्ताओं को पूरा लाभ देने के लिए नई नियमावली पर काम शुरू कर दिया है. इस के तहत उपभोक्ता को हर हाल में वाईफाई पर 20 एमबीपीएस और ब्रौडबैंड पर न्यूनतम स्पीड 2 एमबीपीएस देनी होगी. यह स्थिति हर समय बरकरार रहेगी. इस के लिए अगले 5 वर्षों में दूरसंचार क्षेत्र में 6.40 लाख करोड़ रुपए का निवेश होना है और संचार व्यवस्था के स्तर पर भारत को 50 शीर्ष देशों में शामिल कराना है.

वाईफाई के एक करोड़ हौटस्पौट तैयार किए जाने हैं और उपभोक्ताओं की हर दिक्कत का समाधान सुनिश्चित कराया जाएगा. यह व्यवस्था सरकार द्वारा तैयार की जा रही राष्ट्रीय संचार नीति में की जा रही है. ट्राई का कहना है कि इस संबंध में लोग अपनी दिक्कतें उसे भेजें ताकि जिस समस्या का नीति में समाधान नहीं आया है, उसे भी प्रस्ताव में शामिल किया जा सके.

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औनलाइन बिकने वाले सामानों पर होगी पूरी जानकारी

औनलाइन खरीद नई बाजार व्यवस्था है और इस में कारोबार करने वाली स्नैपडील, अमेजौन इंडिया, फ्लिपकार्ट, बिगबास्केट, ग्रोफर्स जैसी कई बड़ी कंपनियां करोड़ों का कारोबार कर रही हैं. औनलाइन खरीदारी बड़े शहरों में धूम मचा रही है और मौल आदि के कारोबार को उस ने खासा प्रभावित किया है. यह प्रचलन अब छोटे शहरों और कसबों तक बढ़ गया है. वहां भी खरीदार स्थानीय कारोबारियों की जगह औनलाइन खरीद को प्राथमिकता देने लगे हैं.

इस की बड़ी वजह यह है कि लोगों को घर बैठे ब्रैंडेड और अच्छा सामान मिल रहा है. कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा जबरदस्त है, इसलिए कीमत भी कम देनी पड़ रही है.

करोड़ों का कारोबार कर रही इन कंपनियों के लिए अब तक कोई नियम नहीं था, इसलिए ग्राहक लुटते भी रहे हैं. लेकिन, अब सरकार ने इन कंपनियों के लिए नियम लागू कर दिए हैं. इन कंपनियों से खरीदे जाने वाले सामान पर अब एमआरपी, सामान बनाने की तारीख, एक्सपायरी डेट, सामान की मात्रा, मेड इन, कस्टमर केयर नंबर आदि सबकुछ पढ़े जाने वाले अक्षरों में लिखा होगा.

कस्टमर केयर का नंबर होना ग्राहकों के लिए सब से बड़ा फायदा साबित होगा. अभी तक ग्राहक को सामान मिल जाता था लेकिन उस में की गई गड़बड़ी की शिकायत के लिए उसे दरदर भटकना पड़ता था. इन नियमों से उम्मीद की जा सकती है कि औनलाइन कंपनियों की मनमानी पर लगाम कसेगी.

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नववर्ष पर नई ऊंचाई पर पहुंचा सूचकांक

नए साल का स्वागत बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई के सूचकांक ने झूमते हुए किया है. नववर्ष की शुरुआत में बाजार में हालांकि एकाध कारोबारी दिन कुछ सुस्ती नजर आई लेकिन उस के बाद उस में ऐसी तेजी आ गई कि सूचकांक एक के बाद एक  नए रिकौर्ड स्थापित करने लगा.

साल की शुरुआत हालांकि कमजोर रही लेकिन नए साल के पहले सप्ताह के आखिरी सत्र में बाजार ने 97.21 अंक की बढ़त के साथ 34,153 अंक का नया कीर्तिमान छू लिया. नैशनल स्टौक एक्सचेंज का निफ्टी भी 10,558 अंक के नए रिकौर्ड पर पहुंच गया.

बजट में अच्छे संकेत मिलने और आर्थिक स्थिति के मजबूती की तरफ बढ़ने के आकलन के साथ 2018 के दूसरे सप्ताह के पहले दिन ही बाजार ने जोरदार छलांग लगाई और सूचकांक 34,353 अंक के नए शीर्ष पर पहुंच गया.  निफ्टी भी 10,631 अंक के स्तर तक पहुंचा. सप्ताह के दूसरे दिन बाजार फिर नई ऊंचाई पर पहुंच गया.

बाजार के जानकारों का कहना है कि बजट में कारोबार के अनुकूल घोषणाएं होने तथा कौर्पाेरेट को मदद कर नए ढंग से काम करने जैसे कदम उठाए जाने की उम्मीदों के कारण बाजार में उत्साह रहा. छोटे और लघु उद्योगों के प्रति सरकार के सकारात्मक रुख के कारण इस में जो तेजी आ रही है उस का भी बाजार पर अच्छा असर माना जा रहा है.

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मैंने प्रेमविवाह किया है. अब मेरे पति अन्य लड़कियों के साथ घूमते हैं. मैं पैसे की मुहताज हो गई हूं. आप ही रास्ता सुझाएं.

सवाल
2 साल पहले मैं ने घरवालों की मरजी के खिलाफ अपने सहकर्मी से प्रेमविवाह किया था. एक साल तक तो सब सही चलता रहा लेकिन धीरेधीरे चीजें बिगड़ती चली गईं, जैसे उस का देररात शराब पी कर घर आना, ऐयाशी करना, जुआ खेलना, लड़कियों के साथ घूमनाफिरना आदि. जब मैं इन सब के लिए रोकती हूं तो वह मेरे साथ गालीगलौज व हाथापाई करता है. कई बार तो घर से निकाल भी चुका है. अब तो मैं एकएक पैसे की मुहताज हो गई हूं. आप ही रास्ता सुझाएं.

जवाब
एक तरफ पति द्वारा प्रताड़ित करना और दूसरी तरफ घर वालों का सपोर्ट नहीं है तो काफी कठिन स्थिति है. लेकिन फिर भी आप डरे नहीं, बल्कि डट कर मुकाबला करें.

अब जब भी आप का पति आप पर हाथ उठाए तो उसे चेतावनी दें कि अगली बार ऐसा करने की हिम्मत जुटाई तो पुलिस के हत्थे चढ़वा दूंगी, साथ ही, समय रहते खुद की हरकतें सुधारने को भी कहें. जब वह आप के ऐसे तेवर देखेगा तो खुद में सुधार जरूर लाएगा. साथ ही, आप अपने पेरैंट्स से माफी मांगें ताकि आप को उन का सपोर्ट मिल सके. आप अकेली यह लड़ाई न लड़ें, साथ ही नौकरी भी ढूंढ़ें.

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विवाह सैक्स के बाद नहीं पैसों के बाद

विवाह को ले कर युवाओं की धारणा अब बदल रही है. पहले जहां सैक्स संबंध कायम होने के बाद शादी करने की मांग जोर पकड़ लेती थी वहीं अब सैक्स के बाद भी ऐसी मांग नहीं उठती. कई बार तो लिव इन रिलेशनशिप लंबी चलती रहती है. फिल्मों में ही नहीं सामान्यतौर पर भी कई दोस्त आपस में एकसाथ रहते हैं. अब सैक्स कोई मुद्दा नहीं रह गया है. जब कभी शादी की बात चलती है तो युवकयुवती दोनों की एक ही सोच होती है कि पहले आत्मनिर्भर हो जाएं व अच्छा कमाने लगें, जिस से जिंदगी अच्छी कटे, फिर शादी की सोचें.

केवल युवा ही नहीं, उन के पेरैंट्स भी शादी की जल्दी नहीं करते. वे भी सोचते हैं कि पहले बच्चे कुछ कमाने लगें उस के बाद ही विवाह की सोचें. जो बच्चे कमाने लगते हैं वे बाकी फैसलों की तरह शादी के फैसले भी खुद लेने लगे हैं.

सैक्स अब पहले की तरह समाज में टैबू नहीं रह गया है. युवा इस को ले कर सजग और जागरूक हो गए हैं, उन्हें घरपरिवार से दूर अकेले रहने के अवसर ज्यादा मिलने लगे हैं. जहां वे अपनी सैक्स जरूरतों को पूरा कर सकते हैं. सैक्स को ले कर वे इतने सजग हो गए हैं कि अब उन को अनचाहे गर्भ या गर्भपात जैसी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता. आज उन्हें गर्भ से बचने के उपाय पता हैं. पहले सैक्स एक ऐसा विषय था जिस पर लोग चर्चा करने से बचते थे. युवा जब इस विषय पर चर्चा करनी शुरू करते थे तब परिवार के लोग उन की शादी के बारे में सोचना शुरू कर देते थे. अब केवल युवक ही नहीं युवतियां तक अपने घर से दूर पढ़ाई, कंपीटिशन और जौब को ले कर शहरों में होस्टल या पीजी में अकेली रहने लगी हैं. ऐसे में सैक्स उन के लिए कोई मुद्दा नहीं रह गया है. अब युवाओं की प्राथमिकता है कि शादी की बात तब सोचो जब पैसे कमाने लगो.

फैशन और जरूरतें बनीं वजह

‘विवाह सैक्स के बाद नहीं पैसे के बाद’ इस बदलती सोच के पीछे सब से बड़ी वजह आज के समय में बढ़ती महंगाई है. पहले विवाह के बाद जहां 20 से 40 हजार में हनीमून ट्रिप पूरा हो जाता था वहीं अब यह खर्च बढ़ कर 90 हजार से 1 लाख रुपए के ऊपर पहुंच गया है. शादी के बाद पतिपत्नी के बीच इतना सामंजस्य नहीं होता कि बिना कहे वे इस आर्थिक परेशानी को समझ सकें. एक नए शादीशुदा जोड़े की हनीमून कल्पना पूरी तरह से फिल्मी होती है. जहां पत्नी किसी राजकुमारी सा अनुभव करना चाहती है. अब इस अनुभव और फीलिंग्स के लिए पैसों की जरूरत होती है. ज्यादातर युवा प्राइवेट जौब में होते हैं, जहां पैसा भले होता है पर समय नहीं होता. ऐसे में युवाओं को ऐसी नौकरी की प्रतीक्षा रहती है जिस में पैसा हो, जिस के सहारे वे शादी के बाद सभी सुखों का आनंद ले सकें.

शादी के समय ही नहीं उस के बाद भी अब नई स्टाइलिश ड्रैस रेंज बाजार में आने लगी हैं. अब तो शौपिंग के लिए बाजार जाने की जरूरत भी नहीं होती. औनलाइन शौपिंग का दौर है, जहां आप को बिना बाजार गए ही सबकुछ मिल सकता है. जरूरत होती है पैसों की. इसलिए अब युवा शादी तब करना चाहते हैं जब शादी के मजे लेने के लिए उन के पास पैसे हों. फेसबुक, व्हाट्सऐप और सोशल मीडिया के इस दौर में जीवन के किसी पल को दोस्तों व नातेरिश्तेदारों से छिपाया नहीं जा सकता. ऐसे में अपनी खुशियों को पूरा करने के लिए पैसों की अहमियत अब सभी को समझ आने लगी है.

‘विवाह सैक्स के बाद नहीं पैसे के बाद’ यह सोच अब दिनोदिन और मजबूत होती जा रही है. पहले की तरह यह नहीं होता कि शादी हुई उस के बाद सबकुछ घरपरिवार की जिम्मेदारी पर होता था. अब अपना बोझ खुद उठाना पड़ता है. ऐसे में ‘पहले कमाई फिर शादी’ की सोच बढ़ रही है.

बच्चों की प्लानिंग

‘विवाह सैक्स के बाद नहीं पैसे के बाद’ की धारणा में कई बार आलोचक कहते हैं कि जब शादी से पहले ही सैक्स हो गया तो शादी के बाद क्या बचता है? इस सवाल के जवाब में युवा कहते हैं कि शादी के पहले वाले और शादी के बाद वाले सैक्स में फर्क होता है. शादी के बाद हमारी प्राथमिकता परिवार की होती है. हम अपने हिसाब से बच्चे का जन्म प्लान करते हैं. आज के समय में बच्चे के जन्म से ले कर स्कूल जाने तक बहुत सारे खर्चे होने लगे हैं. इन को सही तरह से संभालने के लिए अच्छे बजट की जरूरत होती है. एक बच्चे की प्राइवेट अस्पताल में डिलीवरी का खर्च ही लाख से ऊपर पहुंच जाता है. उस के बाद तमाम तरह के खर्च और फिर बच्चे के प्ले स्कूल जाने का खर्च महंगा पड़ने लगा है. अस्पताल हो या प्ले स्कूल उस में किसी तरह का कोई समझौता नहीं किया जा सकता.

3 साल की उम्र में ही बच्चे का स्कूल जाना शुरू हो जाता है. इस में अच्छे स्कूल में प्रवेश से ले कर पढ़ाई के खर्च तक बड़े बजट की जरूरत होती है, जो यह सिखाता है कि शादी के लिए सैक्स की नहीं पैसे की ज्यादा जरूरत है. बच्चा जैसेजैसे एक के बाद एक क्लास आगे बढ़ता है उस का खर्च भी बढ़ता है, जिसे वहन करना सरल नहीं होता. कई बार युवा ऐसे लोगों को देखते हैं जो इस तरह के हालात से गुजर रहे होते हैं. ऐसे में वे अपना हौसला नहीं बना पाते.

शादी के लिए पहले मातापिता व घरपरिवार का हस्तक्षेप ज्यादा होता था लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब ज्यादातर फैसले या तो युवा खुद लेते हैं या फिर फैसला लेते समय उस की सहमति ली जाती है. शादी की उम्र बढ़ गई है, जिस में सैक्स से ज्यादा पैसे का फैसला प्रमुख हो गया है.

सैक्स का सरल होना

सैक्स अब ऐंजौयमैंट का साधन बन गया है. युवकयुवतियां भी खुद को अलगअलग तरह की सैक्स क्रियाओं के साथ जोड़ना चाहते हैं. इंटरनैट के जरिए सैक्स की फैंटेसीज अब चुपचाप बैडरूम तक पहुंच गई हैं, जहां केवल युवकयुवतियां आपस में तमाम तरह की सैक्स फैंटेसीज करने का प्रयास करते हैं. इंटरनैट के जरिए सैक्स की हसरतें चुपचाप पूरी होती रहती हैं. सोशल मीडिया ग्रुप फेसबुक और व्हाट्सऐप इस में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं. फेसबुक पर युवकयुवतियां दोनों ही अपने निकनेम से फेसबुक अकाउंट खोलते हैं और मनचाही चैटिंग करते हैं. इस में कई बार युवतियां अपना नाम युवकों की तरह रखती हैं, जिस से उन की पहचान न हो सके. चैटिंग करते समय वे इस बात का खास खयाल रखती हैं कि उन की सचाई किसी को पता न चले. यह बातचीत चैटिंग तक ही सीमित रहती है. बोर होने पर फ्रैंड को अनफ्रैंड कर नए फ्रैंड को जोड़ने का विकल्प हमेशा खुला रहता है.

इस तरह की सैक्स चैटिंग बिना किसी दबाव के होती है. ऐसी ही एक सैक्स चैटिंग से जुड़ी महिला ने बातचीत में बताया कि वह दिन में खाली रहती है. पहले बोर होती रहती थी, जब से फेसबुक के जरिए सैक्स की बातचीत शुरू की तब से वह बहुत अच्छा महसूस करने लगी है. कई बार वह इस बातचीत के बाद खुद को सैक्स के लिए बहुत सहज पाती है. पत्रिकाओं में आने वाली सैक्स समस्याओं में इस तरह के बहुत सारे सवाल आते हैं, जिन को देख कर लगता है कि सैक्स की फैंटेसी अब फैंटेसी नहीं रह गई है. इस को लोग अब अपने जीवन का अंग बनाने लगे हैं.

शादी के पहले सैक्स का अनुभव जहां पहले बहुत कम लोगों को होता था, अब यह अनुपात बढ़ गया है. अब ऐसे कम ही लोग होंगे, जिन को सैक्स का अनुभव शादी के बाद होता है. ऐसे में सैक्स के लिए शादी की जरूरत खत्म हो गई है. शादी के बाद जिम्मेदारियों का बोझ उठाने के लिए पैसों की जरूरत बढ़ गई है. यही वजह है कि शादी सैक्स के बाद नहीं शादी पैसों के बाद का चलन बढ़ गया है.

आज इन विषयों को ले कर कई पुस्तकें, सिनेमा और टीवी सीरियल्स भी बनने लगे हैं, जो इस बात का समर्थन करने लगे हैं कि शादी से पहले सैक्स की नहीं पैसों की जरूरत होती है.

पैडमैन : सैनेटरी नैपकीन पैड पर सोचने को मजबूर करती है फिल्म

औरतों की माहवारी/मासिक धर्म को लेकर चली आ रही भारतीय संस्कृति व सामाजिक परंपरा  पर चोट करने के साथ ही मासिक धर्म के दौरान औरतों की स्वच्छता और उनके अच्छे स्वास्थ्य की चिंता करने वाली फिल्म ‘‘पैडमैन’’ की कहानी यूं तो पैडमैन कहे जाने वाले तमिलनाडु निवासी अरूणाचलम मुरूगनाथन की कहानी है. पर इसमें काल्पनिक कहानी व काल्पनिक पात्रों को ज्यादा तरजीह देकर इंटरवल से पहले इसे कुछ ज्यादा ही मेलोड्रामैटिक बना दिया गया है.

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माहवारी के पांच दिन औरतों द्वारा गंदा कपड़ा, राख, पत्ता आदि का उपयोग करने की बजाय सैनेटरी नैपकीन पैड के उपयोग की वकालत करने वाली फिल्म ‘पैडमैन’ में दावा किया गया है कि सिर्फ 12 प्रतिशत भारतीय महिलांए ही सैनेटरी नैपकीन पैड का उपयोग करती हैं. यदि यह आंकड़ा सही है, तो चिंता का विषय है.

फिल्म ‘‘पैडमैन’’ की कहानी महेश्वर, मध्यप्रदेश में रह रहे वेल्डिंग का काम करने वाले युवक लक्ष्मी कांत चौहान (अक्षय कुमार) की गायत्री (राधिका आप्टे) संग शादी से होती है. शादी के बाद अपनी पत्नी से प्यार करने वाला लक्ष्मी काफी खुश है. लेकिन उसे यह पसंद नहीं कि माहवारी के पांच दिन उसकी पत्नी घर से बाहर बैठे और गंदे कपड़े का उपयोग करे. वह दवा की दुकान पर जाकर अपनी पत्नी गायत्री के लिए 55 रूपए में सैनेटरी नैपकीन पैड खरीदकर लाता है.

उसे पैड मांगने में कोई शर्म नहीं महसूस होती. पर गायत्री इतना महंगा पैड उपयोग नहीं करना चाहती. उसका मानना है कि इससे घर में दूध नहीं आ पाएगा. गायत्री अपने पति लक्ष्मी को समझाती है कि वह औरतों के मसले पर अपना दिमाग न खपाए. पर पत्नी की तकलीफ लक्ष्मी को बर्दाश्त नहीं. ऊपर से डौक्टर उसे बताता है कि जो औरतें माहवारी के पांच दिनों में पत्ता, गंदा कपड़ा या राख का उपयोग करती हैं, वह बीमारी को दावत देती हैं. तब लक्ष्मी प्रसाद एक पैड को खोलकर देखता है, तो उसे पता चलता है कि मलमल के कपड़े के अंदर कुछ रूई/कापुस/कपास लपेटा गया है.

तो वह कहता है कि चवन्नी की रूई के लिए 55 रूपए मांगे जा रहे हैं. अब वह दुकान से कपड़ा व रूई खरीदकर अपनी पत्नी को पैड बनाकर देता है. गायत्री अगली माहवारी की रात उस पैड का उपयोग करती है, पर कोई फायदा नहीं होता और वह पुनः वही गंदा कपड़ा उपयोग करने लगती है. तब लक्ष्मी दुबारा प्रयास कर पैड बनाता है और इस बार वह पड़ोस की लड़की को पहली बार माहवारी होने पर वह पैड देता है. इससे हंगामा मच जाता है. लक्ष्मी की मां लक्ष्मी की दो छोटी बहनों को बड़ी बहन की ससुराल में रहने भेज देती हैं. लोग उसे पागल कहने लगते हैं.

गांव के लेाग लक्ष्मीकांत के इस काम को गंदा बताते हैं. बच्चे औरतों की माहवारी को क्रिकेट मैच की संज्ञा देते हैं. एक दिन फैक्टरी में फैक्टरी का एक मालिक कहता है कि कोई भी चीज ग्राहक को देने से पहले खुद उसका उपयोग करके उसके सही होने का आकलन कर लेना चाहिए. अब लक्ष्मी नए सिरे से पैड बनाता है. और खुद उस पैड को पहनकर सायकल चलाता है, साथ में खून पैड में जाता रहे, ऐसी थैली लगा रखी है. जब उसकी पैंट लाल रंग से भीग जाती है, तो वह महेश्वर की नर्मदा नदी में कूद जाता है. इस पर गांव की पंचायत बैठती है. बीच पंचायत में गायत्री का भाई आकर उसे अपने साथ ले जाते हैं. अंततः पंचायत के निर्णय से पहले ही लक्ष्मी ऐलान कर देता है कि वह गांव छोड़कर जा रहा है.

लक्ष्मी शहर पहुंचकर एक प्रोफेसर के घर पर नौकरी करने लगता है. जहां प्रोफेसर के बेटे की सलाह पर कम्पयूटर पर गूगल की मदद से अमेरिका व मलेशिया से पैड बनाने में उपयोग होने वाला पदार्थ तथा करोड़ों की मशीन की कार्यशैली देखकर एक सूदखोर से कर्ज लेकर नब्बे हजार में नई मशीन का ईजाद करता है. इस मशीन की मदद से जो सैनेटरी नैपकीन पैड बनता है, उसकी कीमत सिर्फ दो रूपए होती है. नाटकीय तरीके से इस पैड का पहला उपयोग परी (सोनम कपूर) करती है. परी तबला वादक होने के साथ साथ एमबीए की विद्यार्थी है.

परी के पिता आईआईटी में है. परी के कहने पर उसके पिता दिल्ली में आयोजित समाज उपयोगी नई खोज प्रतियोगिता में लक्ष्मी को उसकी मशीन के साथ बुलवाते है. जहां उसे दो लाख रूपए का पुरस्कार मिलता है. उसके बाद परी के साथ मिलकर लक्ष्मी इस पैड को गांव की औरतों तक पहुंचाने, जरुरतमंद औरतों को बैंक से कर्ज दिलवाकर उन्हे मशीन बेचते हैं, जिससे वह महिलाएं अपने गांव में पैड बनाकर औरतों को दो रूपए में बेचे.

उधर गायत्री के भाई चाहते हैं कि गायत्री, लक्ष्मी प्रसाद को तलाक देकर नई जिंदगी शुरू करे, इधर लक्ष्मी प्रसाद अमेरिका में युनाइटेड नेशन में पुरस्कार हासिल करता है. वापस भारत लौटते हुए उसे खबर मिलती है कि भारत सरकार उसे पद्मश्री देने जा रही है. यह खबर अखबारों में छपती हैं. गायत्री के  भाईयों को अपराध बोध होता है. लक्ष्मी के गांव के लोग उसे सम्मान देने लगते हैं. फिल्म के अंत में लक्ष्मी प्रसाद रक्षा बंधन पर अपनी बहनों को उपहार में सैनेटरी नैपकीन पैड देते नजर आते हैं.

नारी उत्थान ही नहीं बल्कि नारी के स्वास्थ्य के संदर्भ में एक अति उपयुक्त व जरुरी विषय पर बनी यह सामाजिक फिल्म कई जगह सरकारी जुमलों के अलावा अति मेलोड्रामैटिक फिल्म बनकर रह जाती है. लेखक ने थोड़ी मेहनत की होती तो यह फिल्म काफी बेहतर बन सकती थी. फिल्म बेवजह लंबी बनायी गयी है. इंटरवल से पहले यह फिल्म निराश करती है. फिल्मकार ने एक तरफ कम्प्यूटर, गूगल सर्च व मोबाइल युग की बात की है तो दूसरी तरफ ऐसे अंधविश्वास फैलाने वाले सीन रखे हैं, जिन पर कोई भी आम इंसान यकीन नहीं करता.

मसलन-हनुमान जी को एक नारियल पकड़ाएं, कुछ देर बाद टुकड़े के रूप में प्रसाद का मिलना या भगवान कृष्ण के हाथों लड्डू के प्रसाद का मिलना आदि बेवकूफी भरे सीन किस सोच के साथ रखे गए हैं, यह तो अक्षय कुमार व आर बालकी ही बेहतर जाने. फिल्म 2018 में बनी है, जब भारत के गांव गांव में मोबाइल फोन व इंटरनेट हावी है. पर इस तरह के दृश्यों को दिखाकर फिल्मकार क्या साबित करना चाहते हैं, यह तो वही जानें.

इंटरवल से पहले फिल्म की पटकथा में कसाव की जरुरत थी, जिस पर ध्यान नहीं दिया गया. इंटरवल के बाद सोनम कपूर के किरदार के साथ ही फिल्म में रोचकता बढ़ती है और अंततः फिल्म दर्शकों के बीच अपनी पकड़ बनाने में कामयाब रहती है. फिल्म के संवाद प्रभावित नहीं करते हैं. फिर भी फिल्म के निर्देशक आर बालकी मासिक धर्म की स्वच्छता के आस पास के सामाजिक प्रचलन और मासिक धर्म व सेनेटरी नैपकीन पैड को टैबू बनाए जाने पर गहरी चोट करने में सफल रहे हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो फिल्म में अक्षय कुमार, राधिका आप्टे और सोनम कपूर तीनों ने ही अपने अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है. औरतों से जुड़े अति संजीदा मुद्दे पर आधारित इस फिल्म में अति संजीदा किरदार निभाना अक्षय कुमार के लिए रस्सी पर चलना जैसा कठिन  रहा, पर वह लोगों का दिल जीतने में कामयाब रहते हैं. राधिका आप्टे  ने साबित कर दिखाया कि वह हर तरह के बाखूबी किरदार निभा सकती हैं. सोनम कपूर के अभिनय में काफी सहजता रही.

फिल्म के संगीतकार अमित त्रिवेदी ने विषय के अनुरूप संगीत पिरोया है. फिल्म के कैमरामैन पी सी श्रीराम ने महेश्वर की खूबसूरती को बहुत बेहतरीन तरीके से कैमरे में कैद किया है. कुछ कमियों के बावजूद ‘‘पैडमैन’’ ऐसी फिल्म है, जो अंततः दर्शकों के मन में बेहतर कल की उम्मीद जगाती है. नारी के मासिक धर्म व सैनेटरी नैपकीन की उपयोगिता पर यह फिल्म जिस तरह से बात करती है, उसके लिए इसे देखा जाना चाहिए.

दो घंटे 19 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘पैडमैन’’ का निर्माण ट्विंकल खन्ना, क्रियाज इंटरटेनमेंट, एसपीई फिल्मस इंडिया, केप आफ गुड फिल्मस और होप प्रोडक्शन ने मिलकर किया है. फिल्म की कहानी ट्विंकल खन्ना की किताब ‘‘द लीजेंड आफ लक्ष्मीप्रसाद’’ पर आधारित और तमिलनाड़ु के असली पैडमैन कहे जाने वाले अरूणाचलम मुरूगनाथन के जीवन की कहानी से प्रेरित है. फिल्म के लेखक व निर्देशक आर बालकी, कैमरामैन पी सी श्रीराम, संगीतकार अमित त्रिवेदी, सूत्रधार अमिताभ बच्चन तथा फिल्म के कलकार हैं-अक्षय कुमार, राधिका आप्टे, सोनम कपूर, सुधीर पांडे, माया अलघ, अमिताभ बच्चन व अन्य.

स्वीकृति : भाग 2

कमरा ठीक कर, किताबों और फाइलों के ढेर में से उस ने कुछ फाइलें निकालीं और उन में डूब गई. कुछ देर बाद उसे महसूस हुआ, जैसे कमरे में कोई आया है. बिना पीछे मुड़े ही वह बोल पड़ी, ‘‘हां, क्या बात है?’’

परंतु कोई उत्तर न पा, पीछे देखा कि प्रार्थना और प्रांजल खड़े हैं.

प्रांजल धीरे से बोला, ‘‘प्रार्थना को गाना सुनना है.’’

डिंपल ने एक ठंडी सांस भर कमरे के कोने में रखे स्टीरियो को देखा, फिर अपनी फाइलों को. उसे एक हफ्ते बाद ही नए प्रोजैक्ट की फाइलें तैयार कर के देनी थीं. सोचतेसोचते उस के मुंह से शब्द फिसला, ‘‘नहीं,’’ फिर स्वयं को संभाल उन्हें समझाते हुए बोली, ‘‘अभी मुझे बहुत काम है, कुछ देर बाद सुन लेना.’’

दोनों बच्चे एकदूसरे का मुंह देखने लगे. वे सोचने लगे कि मां तो कभी मना नहीं करती थीं. किंतु यह बात वे कह न पाए और चुपचाप अपने कमरे में चले गए.

डिंपल फिर फाइल में डूब गई. बारबार पढ़ने पर भी जैसे मस्तिष्क में कुछ घुस ही न रहा था. पैन पटक कर डिंपल खड़ी हो गई. बच्चों के कमरे में झांका, वहां एकदम शांति थी. प्रार्थना तकिया गोद में लिए, मुंह में अंगूठा दबाए बैठी थी. प्रांजल अपने सूटकेस में खिलौने जमाने में व्यस्त था.

‘‘यह क्या हो रहा है?’’

‘‘अब हम यहां नहीं रहेंगे,’’ प्रांजल ने फैसला सुना दिया.

उस रात डिंपल दुखी स्वर में पति से बोली, ‘‘मैं और क्या कर सकती हूं, आशीष? ये मुझे गहरी आंखों से टुकुरटुकुर देखा करते हैं. मुझ से वह दृष्टि सहन नहीं होती. मैं उन्हें प्रसन्न देखना चाहती हूं, उन्हें समझाया कि अब यही उन का घर है, पर वे नहीं मानते,’’ डिंपल का सारा गुबार आंखों से फूट कर बह गया.

प्रांजल और प्रार्थना के मौन ने उसे हिला दिया था, जिसे वह स्वयं की अस्वीकृति समझ रही थी. उस ने उन्हें अपनाना तो चाहा लेकिन उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया.

‘‘मैं जानता हूं, यह कठिन कार्य है, पर असंभव तो नहीं. मांजी ने भी उन्हें समझाया था कि उन की मां बहुत दूर चली गई है, अब वापस नहीं आएगी और पिता भी बहुत बीमार हैं. पर उन का नन्हा मस्तिष्क यह बात स्वीकार नहीं पाता. लेकिन धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.’’

‘‘शायद उन्हें यहां नहीं लाना चाहिए था. कहीं अच्छाई के बदले कुछ बुरा न हो जाए.’’

‘‘नहीं, डिंपी, हमें ऐसा नहीं सोचना चाहिए. इस समय उन्हें भरपूर लाड़प्यार और ध्यान की आवश्यकता है. हम जितना स्नेह उन्हें देंगे, वे उतने ही समीप आएंगे. वे प्यार दें या न दें, हमें उन्हें प्यार देते रहना होगा.’’

‘‘मेरे लिए शायद ऐसा कर पाना कठिन होगा. मैं उन्हें अपनाना चाहती हूं, पर फिर भी अजीब सा एहसास, अजीब सी दूरी महसूस करती हूं. इन बच्चों के कारण मैं अपना औफिस का कार्य भी नहीं कर पाती जब वे पास होते हैं तब भी और जब दूर होते हैं तब भी. मेरा मन बड़ी दुविधा में फंसा है.’’

‘‘मैं ने तो इतना सोचा ही नहीं. अगर तुम को इतनी परेशानी है तो कहीं होस्टल की सोचूंगा. बच्चे अभी तुम से घुलेमिले भी नहीं हैं,’’ आशीष ने डिंपल को आश्वासन देते हुए कहा.

‘‘नहींनहीं, मैं उन्हें वापस नहीं भेजना चाहती, स्वीकारना चाहती हूं, सच. मेरी इच्छा है कि वे हमारे बन जाएं, हमें उन्हें जीतना होगा, आशू, मैं फिर प्रयत्न करूंगी.’’

अगले दिन सुबह से ही डिंपल ने गाने लगा दिए थे. रसोई में काम करते हुए बच्चों को भी आवाज दी, ‘‘मेरी थोड़ी मदद करोगे, बच्चो?’’

प्रांजल उत्साह से भर मामी को सामान उठाउठा कर देने लगा, किंतु प्रार्थना, बस, जमीन पर बैठी चम्मच मारती रही. उस के भोले और उदास चेहरे पर कोई परिवर्तन नहीं था आंखों के नीचे कालापन छाया था जैसे रातभर सोई न हो. पर डिंपल ने जब भी उन के कमरे में झांका था, वे सोऐ ही नजर आए थे.

‘‘अच्छा, तो प्रार्थना, तुम यह अंडा फेंटो, तब तक प्रांजल ब्रैड के कोने काटेगा और फिर हम बनाएंगे फ्रैंच टोस्ट,’’ डिंपल ने कनखियों से उसे देखा. पहली बार प्रार्थना के चेहरे पर बिजली सी चमकी थी. दोनों तत्परता से अपनेअपने काम में लग गए थे.

उस रात जब डिंपल उन्हें कमरे में देखने गई तो भाईबहन शांत चेहरे लिए एकदूसरे से लिपटे सो रहे थे. एक मिनट चुपचाप उन्हें निहार, वह दबेपांव अपने कमरे में लौट आई थी.

अगला दिन वाकई बहुत अच्छा बीता. दोनों बच्चों को डिंपल ने एकसाथ नहलाया. बाथटब में वे पानी से खूब खेले. फिर सब ने साथ ही नाश्ता किया. खरीदारी के लिए वह उन्हें बाजार साथ ले गई और फिर उन की पसंद से नूडल्स का पैकेट ले कर आई. हालांकि डिंपल को नूडल्स कतई पसंद न थे लेकिन उस दोपहर उस ने नूडल्स ही बनाए.

आशीष टूर पर गया हुआ था. बच्चों को बिस्तर पर सुलाने से पूर्व वह उन्हें गले लगा, प्यार करना चाहती थी, पर सोचने लगी, ‘मैं ऐसा क्यों नहीं कर पाती? कौन है जो मुझे पीछे धकेलता है? मैं उन्हें प्यार करूंगी, जरूर करूंगी,’ और जल्दी से एक झटके में दोनों के गालों पर प्यार कर बिस्तर पर लिटा आई.

अपने कमरे में आ कर बिस्तर देख डिंपल का मन किया कि अब चुपचाप सो जाए, पर अभी तो फाइल पूरी करनी थी. मुश्किल से खड़ी हो, पैरों को घसीटती हुई, मेज तक पहुंच वह फाइल के पन्नों में उलझ गई.

बाहर वातावरण एकदम शांत था, सिर्फ चौकीदार की सीटी और उस के डंडे की ठकठक गूंज रही थी. डिंपल ने सोचा, कौफी पी जाए. लेकिन जैसे ही मुड़ी तो देखा कि दरवाजे पर एक छोटी सी काया खड़ी है.

‘‘अरे, प्रार्थना तुम? क्या बात है बेटे, सोई नहीं?’’ डिंपल ने पैन मेज पर रखते हुए पूछा.

पर प्रार्थना मौन उसे देखती रही. उस की आंखों में कुछ ऐसा था कि डिंपल स्वयं को रोक न सकी और घुटनों के बल जमीन पर बैठ प्रार्थना को गले से लिपटा लिया. बच्ची ने भी स्वयं को उस की गोद में गिरा दिया और फूटफूट कर रोने लगी. डिंपल वहीं बैठ गई और प्रार्थना को सीने से लगा, प्यार करने लगी.

काफी देर तक डिंपल प्रार्थना को यों ही सीने से लगाए बैठी रही और उस के बालों में हाथ फेरती रही. प्रार्थना ने उस के कंधे से सिर लगा दिया, ‘‘क्या सचमुच मां अब नहीं आएंगी?’’

अब डिंपल की बारी थी. अत्यंत कठिनाई से अपने आंसू रोक भारी आवाज में बोली, ‘‘नहीं, बेटा, अब वे कभी नहीं आएंगी. तभी तो हम लोगों को तुम दोनों की देखभाल करने के लिए कहा गया है.

‘‘चलो, अब ऐसा करते हैं कि कुछ खाते हैं. मुझे तो भई भूख लग आई है और तुम्हें भी लग रही होगी. चलो, नूडल्स बना लें. हां, एक बात और, यह मजेदार बात हम किसी को बताएंगे नहीं, मामा को भी नहीं,’’ प्रार्थना के सिर पर हाथ फेरते हुए डिंपल बोली.

‘‘मामी, प्रांजल को भी नहीं बताना,’’ प्रार्थना ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘ठीक है, प्रांजल को भी नहीं. तुम और हम जाग रहे हैं, तो हम ही खाएंगे मजेदार नूडल्स,’’ डिंपल के उत्तर ने प्रार्थना को संतुष्ट कर दिया.

डिंपल नूडल्स खाती प्रार्थना के चेहरे को निहारे जा रही थी. अब उसे स्वीकृति मिल गई थी. उस ने इन नन्हे दिलों पर विजय पा ली थी. इतने दिनों उपरांत प्रार्थना ने उस का प्यार स्वीकार कर उस के नारीत्व को शांति दे दी थी. अब न डिंपल को थकान महसूस हो रही थी और न नींद ही आ रही थी.

अचानक उस का ध्यान अपनी फाइलों की ओर गया कि अगर ये अधूरी रहीं तो उस के स्वप्न भी…परंतु डिंपल ने एक ही झटके से इस विचार को अपने दिमाग से बाहर निकाल फेंका. उसे बच्ची का लिपटना, रोना तथा प्यारभरा स्पर्श याद हो आया. वह सोचने लगी, ‘हर वस्तु का अपना स्थान होता है, अपनी आवश्यकता होती है. इस समय फाइलें इतनी आवश्यक नहीं हैं, वे अपनी बारी की प्रतीक्षा कर सकती हैं, पर बच्चे…’

डिंपल ने प्रार्थना को प्यारभरी दृष्टि से निहारते देखा तो वह पूछ बैठी, ‘‘अच्छा, यह बताओ, अब कल की रात क्या करेंगे?’’

‘‘मामी, फिर नूडल्स खाएंगे,’’ प्रार्थना ने नींद से बोझिल आंखें झपकाते हुए कहा.

‘‘मामी नहीं बेटे, मां कहो, मां,’’ कहते हुए डिंपल ने उसे गोद में उठा लिया.

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