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विराट ने इस पाकिस्तानी अंपायर को भेजा खास संदेश, वीडियो वायरल

भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली ने पाकिस्तानी अंपायर अलीम डार के लिए एक वीडियो मेसेज भेजा है. उनका यह संदेश सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है. दरअसल, विराट कोहली ने यह बधाई संदेश अलीम डार के रेस्टोरेंट खुलने पर भेजा है.

इस वीडियो में देखा जा सकता है कि विराट ने जिम में पसीना बहाते हुए अलीम डार को नया रेस्टोरेंट खोलने पर बधाई दे रहे हैं.

इस वीडियो में विराट कह रहे हैं, ‘हैलो अलीम भाई, मैंने सुना है कि आपने नया रेस्टोरेंट खोला है जिसके लिए मैं आपको बहुत-बहुत मुबारकबाद देना चाहता हूं. मैं दुआ करता हूं कि जैसे आपने अंपायरिंग की फील्‍ड में इतना नाम कमाया है, वैसे ही आपका रेस्त्रां भी आगे बढ़े और उतना ही नाम कमाए.’

इस वीडियो में कोहली ने कहा, “मैंने यह भी सुना है कि आप इस रेस्टोरेंट के द्वारा बधिर बच्चों के लिए स्कूल खोलना चाहते हैं. इस स्कूल की सारी फंडिंग इस रेस्टोरेंट के द्वारा होगी. मैं आपको बहुत-बहुत मुबारकबाद देना चाहता हूं दोबारा. आशा करता हूं कि आप जो भी अचीव करना चाहते हैं वो जरूर हो. मैं सभी लोगों से बोलूंगा कि एक बार जरूर आपके रोस्टोरेंट जाएं और वहां मौजूद स्वादिष्ट खाने का मजा लें. मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं.”

पाकिस्तानी अंपायर अलीम डार सबसे सम्मानित अंपायरों में से एक हैं. बता दें कि अलीम डार ने हाल ही में इच्छा जताई थी कि वो अपने पांचवे वर्ल्ड कप में भी अंपायरिंग करना चाहते हैं.

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अप्रैल 2016 से पहले होम लोन लेने वालों को मिलेगा ये फायदा

अप्रैल 2016 से पहले होम लोन ले चुके लोगों की शिकायत रही है कि ब्याज दरें घटने का फायदा उन्हें नहीं मिल रहा, क्योंकि यह सुविधा नए लोन पर ही लागू होती है. अगर आपकी भी कुछ इसी तरह की शिकायत है तो अब आपको जल्द ही राहत मिलने वाली है. ऐसा इसलिए क्योंकि रिजर्व बैंक औफ इंडिया (RBI) ने इसका फैसला कर दिया है. आरबीआई ने बैंकों को लिखा है कि ब्याज दरें कम होने का फायदा पुराने होम लोन ग्राहकों को भी दिया जाए.

रिजर्व बैंक ने बेस रेट को हालिया मार्जिनल कौस्ट औफ लेंडिंग रेट (एमसीएलआर) से जोड़ने के लिए कहा है, जिससे ग्राहकों को ब्याज दर पर बैंकों की मनमानी से मुक्ति मिल जाएगी. 1 अप्रैल से बेस रेट को एमसीएलआर से लिंक कर दिया जाएगा और दोनों में एक साथ बदलाव होंगे.

क्या है इसका मतलब?

इसका मतलब यह है कि जब बैंक एमसीएलआर में बदलाव करेगा तो उसे कुछ हद तक बेस रेट में भी बदलाव करना होगा. एक साल पहले जनवरी में अधिकतर बैंकों ने एमसीएलआर में 0.80-0.90 पर्सेंट की बड़ी कटौती की थी क्योंकि नोटबंदी के बाद उनके पास कैश काफी बढ़ गया था. हालांकि, उन्होंने तब बेस रेट में कोई बदलाव नहीं किया था.

पहले क्या था सिस्टम?

2010 के बाद से बैंक बेस रेट के आधार पर कर्ज दे रहे थे. यह ब्याज दर के लिए फ्लोर रेट था. लेकिन एमसीएलआर सिस्टम लागू होने के बाद बैंकों को लोन की मियाद के हिसाब से अलग-अलग ब्याज दर पर कर्ज देने का विकल्प दिया गया. एमसीएलआर रेट में तय समय के अंदर बदलाव नहीं होता है. आरबीआई ने एमसीएलआर सिस्टम इसलिए लागू किया था क्योंकि उसके मुताबिक बैंक पौलिसी रेट में बदलाव का पूरा फायदा ग्राहकों को नहीं दे रहे थे.

शिकायतें मिलीं तो RBI ने दिया निर्देश

अप्रैल 2016 से पहले होम लोन्स बेस रेट आधारित रहे थे जिसका एकतरफा निर्धारण बैंक किया करते हैं. जब शिकायतें आने लगीं कि बेस रेट में ब्याज दरें घटने का फायदा नहीं दिखता तो आरबीआई ने फौर्मुले पर आधारित मार्जिनल कौस्ट औफ लेंडिंग रेट (MCLR) लागू किया जो फंड्स की लागत से जुड़ा है. अप्रैल 2016 के बाद से लोन लेनेवालों को एमसीएलआर का फायदा मिल रहा है, लेकिन इसके पहले लोन लेनेवाले बेस रेट के आधार पर ही पेमेंट कर रहे हैं.

MCLR का यह फायदा

बेस रेट खत्म करने के बाद 21 महीनों में वेटेड ऐवरेज लेंडिंग रेट 11.23% से घटकर दिसंबर 2017 में महज 10.26% रह गया. इसका फायदा जिन्हें मिल रहा है, उनमें ज्यादातर वे लोग हैं जिनके लोन पर लागू ब्याज की दर एमसीएलआर से जुड़ी हुई है. ज्यादातर बैंकों ने कौस्ट औफ फंड्स (लोन देने की कुल लागत) के मुताबिक ब्याज दरों में बदलाव नहीं किया है, लेकिन एसबीआई ने पिछले महीने होम लोन पर ब्याज दर 30 बेसिस पौइंट्स घटाकर 8.65% प्रतिशत कर दिया.

कैसे तर्कसंगत हो पाएंगे रेट्स?

बैंक औफ अमेरिका के भारत में कंट्री हेड नाकु नखाटे ने कहा, ‘एमसीएलआर का बेस रेट से समायोजन का सुझाव लोन बंटवारे में सुधार लाने और लेंडिंग रेट्स कम करने में बहुत मददगार साबित होगा.’ इस कदम की घोषणा करते हुए आरबीआई के डेप्युटी गर्वनर विश्वनाथन ने कहा, ‘हम बेस रेट की गणना को एमसीएलआर से जोड़ रहे हैं.’ हालांकि, यह भी स्पष्ट नहीं है कि आरबीआई बेस रेट को एमसीएलआर के अनुरूप तर्कसंगत कैसे बनाएगा. हालांकि, इतना स्पष्ट है कि बेस रेट से जुड़े लोन भविष्य में एमसीएलआर से जुड़ जाएंगे.

NBFCs भी RBI के लोकपाल के दायरे में

अपने पौलिसी स्टेटमेंट में रिजर्व बैंक ने बैंकों से कहा है कि वे 1 अप्रैल 2018 से बेस रेट को एमसीएलआर से लिंक करें. कर्ज लेनेवालों के लिए एक और फायदे की बात यह है कि अब नौन-बैंकिंग फाइनैंस कंपनियों को भी आरबीआई के लोकपाल के अंदर ला दिया गया है. इससे लोन लेनेवालों की शिकायतों का निपटारा बिना किसी खर्च के हो सकेगा. गौरतलब है कि रिजर्व बैंक होम लोन देनेवाली कंपियों को नौन-बैंकिंग फाइनैंस कंपनीज (NBFCs) के रूप में रजिस्टर करता है.

अब अपने ताजा आदेश में आरबीआई ने सभी बैंकों से कहा है कि पुराने होमलोन के बेस रेट की गणना भी एमसीएलआर से करें. यह काम 1 अप्रैल 2018 से होगा.

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व्हाट्सऐप लाया ग्रुप वीडियो कौलिंग फीचर, ऐसे करें डाउनलोड

वैसे तो व्हाट्सऐप को दुनिया का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला मैसेजिंग ऐप कहा जाता है. लेकिन अब लगातार जिस तरह से इसमें नए नए फीचर जोड़े जा रहे हैं उसे देखते हुए इसे इंस्टैंट मैसेजिंग ऐप कहना गलत होगा, क्योंकि इसमें जोड़े जाने वाले नए फीचर्स इसे इंस्टैंट मैसेजिंग ऐप की छवि से अलग कर रहे हैं.

रिपोर्ट्स के मुताबिक व्हाट्सऐप में एक बार फिर से एक नया फीचर जुड़ने वाला है जिसका इस्तेमाल ग्रुप वीडियो कौलिंग के लिए किया जा सकता है. मतलब कि इस नये फीचर के द्वारा एक साथ कई लोगों के साथ कौलिंग की जा सकती है, ठीक वैसे ही जैसे की कौन्फ्रेंसिंग करते हैं. अभी इस फीचर की व्हाट्सऐप के बीटा वर्जन में टेस्टिंग चल रही है. इसे अभी कंपनी ने सभी के लिए उपलब्ध नहीं कराया है. अभी व्हाट्सऐप पर एक बार में एक ही व्यक्ति से बात की जा सकती है. WA बीटा इंफो ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि फिलहाल यह फीचर केवल एंड्रौयड के लिए दिया जाएगा.

इसके अलावा यह भी बताया गया है कि एक बार में तीन लोगों को कौलिंग में जोड़ा जा सकता है यानी एक साथ चार यूजर्स वीडियो कौलिंग कर सकते हैं. फिलहाल व्हाट्सएप की तरफ से ये नहीं बताया गया है की ग्रुप वीडियो कौलिंग का फीचर कब आएगा. लेकिन अगर आपल इसे अभी ही प्रयोग करना चाहते हैं तो एपीके मिरर वेबसाइट से इसका लेटेस्ट बीटा वर्जन डाउनलोड कर सकते हैं. आपको बता दें कि पिछले साल अक्टूबर में व्हाट्सऐप के बीटा वर्जन 2.17.70 में वौयस कौल के फीचर को देखा गया था.

मालूम हो कि व्हाट्सऐप ने हाल ही में भारत में अपने व्हाट्सऐप बिजनेस (Whatsapp Business app) को लौन्च किया है. ऐप को सबसे पहले इंडोनेशिया, इटली, मैक्सिको, ब्रिटेन और अमेरिका में लौन्च किया गया था. खास बात है कि ऐप को पब्लिक रिलीज से पहले, शुरुआत में भारत और ब्राजील में टेस्ट किया गया था.

व्हाट्सऐप बिजनेस ऐप को गूगल प्ले स्टोर से फ्री में डाउनलोड किया जा सकता है. यह ऐप 4.0.3 और इससे ऊपर के सभी एंड्रौयड वर्जन में काम करेगा. इसके लिए कंपनी ने BookMyShow, Netflix और MakeMyTrip के साथ साझेदारी में शुरुआत की है. व्हाट्सऐप का यह नया ऐप बिजनेस के लिए एक सिंपल टूल के साथ आता है, इससे यूजर अपने क्लाइंट और कस्टमर्स के साथ आसान तरीके से बात कर सकते हैं.

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केवल भारत में बिकने के लिये बनी है ये कार, जानें फीचर

कार बनाने वाली साउथ कोरियन कंपनी KIA मोटर्स ने अपनी कौन्सेप्ट SUV (स्पोर्ट्स यूटिलिटी व्हीकल) SP कौन्सेप्ट को भारत में Auto Expo 2018 में पेश कर दिया है.

इस एसयूवी को भारत के लिए ही बनाया गया है. इसे भारतीय मार्केट को देखते हुए ही डेवलप और डिजाइन किया गया है. यह कीया मोटर्स की पहली गाड़ी होगी जिसे जून 2019 के बाद भारत में सेल किया जाएगा.

कंपनी के सीईओ का कहना है कि यह कंपनी की पहली कार होगी जो भारत में सेल की जाएगी. इसके अलावा उन्होंने कहा कि इस कार को कंपनी के भारत के ही प्लांट में बनाया जाएगा.

कंपनी ने करीब 64 अरब रुपए इनवेस्ट करके आंध्र प्रदेश में अपना प्लांट लगाया है. इस प्लांट की क्षमता 3 लाख यूनिट सालाना की है.

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साथ ही कहा कि 2019 से लेकर 2021 तक कंपनी भारत के लिए कई और नई कारें भारत में लौन्च करने की प्लानिंग कर रही है. इसमें हैचबैक से लेकर SUV तक सब होंगी. इसके अलावा कंपनी केवल भारत के लिए ही कौम्पेक्ट इलेक्ट्रिक व्हीकल भी पेश करेगी. हालांकि इसके बारे में उन्होंने कोई ज्यादा जानकारी नहीं दी. Kia मोटर्स भारत में Auto Expo 2018 में पूरी दुनिया में बिकने वाली अपनी 16 कारों को लेकर आई है. कीया SP कौनसेप्ट इंडियन हेरिटेज से प्रेरित है और इसमें आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा.

KIA SP कौन्सेप्ट SUV में 1.5 लीटर का डीजल इंजन मिलेगा. इसके अलावा इसमें 1.6 लीटर के पेट्रोल इंजन का भी औप्शन मिलेगा. वहीं गियर बौक्स की बात करें तो इसके मैनुअल और औटोमैटिक में 6 स्पीड वाला गियर बौक्स दिया गया है. इसके अलावा हुंडई i10 जैसी KIA पिसेन्टो को भी पेश किया जाएगा. यह शहर के लिए एक पावरफुल कार होगी.

आपको बता दें कि ग्रेटर नोएडा के एक्सपो मार्ट में Auto Expo 2018 चल रहा है. औटो में दुनिया भर से कार बनाने वाली कंपनियां आई हुई हैं. यह औटो एक्सपो का 14 वां शो है. यह आम पब्लिक के लिए 9 फरवरी से शुरू हो जाएगा. ऐसा पहली बार हो रहा है जब औटो एक्सपो में 50 से ज्यादा इलेक्ट्रिक व्हीकल्स पेश किए जाएंगे. इस बार औटो एक्सपो में देसी कंपनी टाटा ने भी अपनी 3 इलेक्ट्रिक कारें पेश की हैं. इसके अलावा महिंद्रा ने भी अपनी एक एसयूवी और एक कन्वर्टेबल SUV पेश कर दी है. इसके अलावा 2 इलेक्ट्रिक व्हीकल भी पेश किए हैं.

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ओवेरियन कैंसर, बनें जागरुक और रहें सावधान

भारत में हर वर्ष करीब 1,60,00 महिलाओं में स्त्री रोग संबंधी कैंसर का पता चलता है. सब से व्यापक सर्वाइकल कैंसर है लेकिन इस के अन्य प्रकार भी हैं-अंडाशय, गर्भाशय, योनी या जननांग संबंधी. कैंसर की वजह से ज्यादातर मौतें गैरजरूरी रूप से लक्षणों व जांच की जरूरत के बारे में जागरूकता की कमी के चलते होती हैं. ऐसे में इन कैंसरों के बारे में अपनी समझ को बड़े पैमाने पर बढ़ाने की जरूरत है.

क्या है कैंसर

कैंसर एक भयावह शब्द है लेकिन इसे अच्छी तरह समझा नहीं जाता है. कैंसर शब्द का प्रयोग बीमारियों के एक संग्रह को परिभाषित करने के लिए किया जाता है जिस में एक अनोखी बात होती है-कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि जिस में शरीर के अन्य हिस्से तक फैलने की क्षमता होती है. प्रसूति संबंधी कैंसर महिलाओं के जननांगों से फैलता है. जब कैंसर की शुरुआत अंडाशय से होती है तो इसे अंडाशय के कैंसर के तौर पर जाना जाता है.

अंडाशय का कैंसर

दुनियाभर में महिलाओं को होने वाले कैंसर में 7वां सब से सामान्य प्रकार का कैंसर अंडाशय का कैंसर है. पिछले 2 दशकों के दौरान अंडाशय के कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और भारतीय महिलाओं को होने वाला यह तीसरा सब से सामान्य प्रकार का कैंसर बन गया है.

अंडाशय का कैंसर मुख्यरूप से 2 प्रकार का होता है. एपिथेलियल अंडाशय कैंसर अंडाशय की सतह से पैदा होता है और जर्म सैल ट्यूमर अंडाशय के जर्म सैल से निकलते हैं. 85-90 फीसदी कैंसर एपिथेलियल अंडाशय कैंसर होता है और आमतौर पर 50 वर्ष व उस से अधिक उम्र की महिलाओं में पाया जाता है. जबकि जर्म सैल ट्यूमर युवतियों और युवा महिलाओं में पाया जाता है.

अंडाशय के कैंसर के फैलने का एक विशेष तरीका होता है जहां कैंसर कोशिकाएं खुद को उदर गुहा के माध्यम से स्थापित करती हैं और फेफड़े व लिवर जैसे दूर के अंगों तक फैल जाती हैं. अंडाशय निकालने के बावजूद अंडाशय का कैंसर होना संभव है, जिसे प्राइमरी पेरिटोनियल कैंसर कहते हैं.

क्या आप को पता है

–       प्रसूति रोगों से संबंधित कैंसर में अंडाशय का कैंसर मृत्यु का सब से अहम कारक है और महिलाओं में कैंसर की वजह से होने वाली मौतों का 5वां सब से प्रमुख कारण है.

–       अंडाशय कैंसर के सिर्फ 15 फीसदी मामलों का पता शुरुआती दौर में, उपचारयोग्य स्तर पर चलता है जबकि करीब 85 फीसदी महिलाओं को बीमारी का पता अंतिम चरण में चलता है.

–       पीएपी परीक्षण में सिर्फ सर्वाइकल कैंसर का पता चलता है और इस में अंडाशय का कैंसर शामिल नहीं है.

–       यह पुष्ट हो चुका है कि इन मरीजों को बचाव का अधिकतम लाभ तब मिल सकता है जब उन की देखभाल एक विशेषज्ञ स्त्री प्रसूति रोग विशेषज्ञ द्वारा की जा रही हो.

जोखिम के कारण

–       उम्र के साथ अंडाशय के कैंसर

का जोखिम बढ़ता जाता है और रजोनिवृत्ति के समय विशेषरूप से बढ़ जाता है.

–       अंडाशय कैंसर, कोलोन कैंसर, पेट के कैंसर, यूटरिन कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर, प्रीमेनोपोजल ब्रैस्ट कैंसर का पारिवारिक इतिहास या प्रीमेनोपोजल ब्रैस्ट कैंसर का व्यक्तिगत इतिहास महिलाओं में अंडाशय के कैंसर के जोखिम को बढ़ाता है.

–       खुद में या परिवार के किसी सदस्य में बीआरसीए जीन म्युटेशन होना.

–       प्रजनन क्षमता में कमी और बच्चे न पैदा करना जोखिम के कारण हैं.

जोखिम कम करने वाले कारक

–       गर्भधारण करना.

–       ओरल कौंट्रासैप्टिव पिल्स 5 साल तक लेने से जोखिम काफी हद तक कम हो जाता है.

–       स्तनपान.

–       फैलोपियन ट्यूब को हटाना या बांध देना यानी महिला नसबंदी.

कैसे पता चलेगा

दरअसल, कैंसर के शुरुआती चरण में अंडाशय के हिस्से के सर्जिकल एक्सिजन के बाद हिस्टोपैथोलौजी से अंडाशय के कैंसर की पुष्टि होती है. आगे के चरणों में उपचार से पहले अंडाशय कैंसर कोशिकाओं या रोगग्रस्त पेरिटोनियल/ओमैंटल बायोप्सी के लिए पेट में फ्लूइड एससाइटिक फ्लूइड का साइटोलौजिकल परीक्षण कर किया जाता है.

शुरुआती दौर में पता लगाना और अधिकतम सर्जिकल उपचार चुनौतीपूर्ण है क्योंकि अधिकतर महिलाओं में शुरुआती स्तर में लक्षणों का पता नहीं चल पाता है. आमतौर पर शुरुआती स्तर पर बीमारी का पता किसी अन्य कारणवश किए गए रेडियोलौजिकल जांच या क्लिनिकल परीक्षण या नियमित गाइनोलौजिकल हैल्थ चैकअप के कारण पता चलता है.

क्लिनिकल परीक्षण, पेट का अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन व एमआरआई बीमारी के फैलने का पता लगाने व उपचार की प्रक्रिया को परिभाषित करने में मदद करता है. रक्त में ट्यूमर मार्कर-सीए125 भी जानकारी बढ़ाता है.

कैसे होता है उपचार

सर्वश्रेष्ठ परिणामों के लिए अंडाशय कैंसर का उपचार मौजूदा मानक दिशानिर्देशों के आधार पर तय किया जाता है. आमतौर पर सर्जरी में विशेषीकृत सर्जिकल प्रक्रियाएं शामिल होती हैं.

इन लक्षणों के बारे में सलाह लें

–       सूजन.

–       श्रोणि या पेटदर्द.

–       पेट का फैलना.

–       खाने में परेशानी महसूस करना.

–       पेशाब संबंधी लक्षण- तात्कालिकता या बारबार महसूस होना.

जिन महिलाओं को रोज या एक सप्ताह से अधिक ऐसे लक्षण महसूस हों उन्हें अंडाशय में समस्या होने के संभावित कारण मानते हुए अपने डाक्टर से संपर्क करना चाहिए.

शुरुआती स्तर का अंडाशय कैंसर

शुरुआती स्तर की बीमारी के उपचार का मुख्य आधार सर्जरी है. सर्जरी का मुख्य उद्देश्य ट्यूमर को निकालना और बीमारी के स्तर को बढ़ने से रोकना है. इस से कीमोथेरैपी करने या न करने के बारे में फैसला करने में मदद मिलती है. चुनिंदा मामलों में फर्टिलिटी स्पेरिंग सर्जरी भी की जा सकती है. इमेजिंग में परिभाषित किए जाने के आधार पर संदेहास्पद अंडाशय ट्यूमर या अंडाशय के जटिल हिस्सों के इंटराऔपरेटिव परीक्षण के लिए फ्रोजेन सैक्शन मूल्यांकन की जरूरत होती है. इस सुविधा की अनुपलब्धता में इन हिस्सों की जांच हिस्टोपैथोलौजी रिपोर्ट के आधार पर की जाती है. इस के बाद ऐसे मरीजों को सर्वश्रेष्ठ परिणामों के लिए उपचार पूरा करने के लिहाज से दूसरी सर्जरी की जरूरत होती है.

अंतिम समय में अंडाशय का कैंसर

अंतिम चरण में पहुंच चुके अंडाशय कैंसर की रोकथाम में सर्जरी और कीमोथेरैपी सब से महत्त्वपूर्ण तत्व हैं. मरीजों को सर्जरी के पहले और बाद में कीमोथेरैपी दी जाती है.

दुनियाभर में इस बात की सलाह दी जाती है कि बचाव और जीवन की गुणवत्ता के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ परिणाम हासिल करने के लिए संदेहास्पद और वास्तविक मामलों में सर्जरी एक अनुभवी स्त्री प्रसूति रोग विशेषज्ञ द्वारा एक विशेषीकृत केंद्र पर ही करानी चाहिए.

अंडाशय कैंसर के पूर्वानुमान क्या हैं : पूर्वानुमान कैंसर के प्रकार और रोग का पता चलने का समय बीमारी के स्तर पर निर्भर है. शुरुआती स्तर के कैंसर के लिए 5 वर्ष तक बचना उत्साहवर्धक है, करीब 90 फीसदी. अंतिम चरणों में बचने की दर काफी कम 17-39 फीसदी के बीच है.

(लेखिका फोर्टिस मैमोरियल रिसर्च इंस्टिट्यूट, गुड़गांव में डायरैक्टर व गाइनीऔंकोलौजी हैं.)

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त्वचा कैंसर से ऐसे बचें, वरना भुगतना पड़ेगा खामियाजा

हर वर्ष त्वचा कैंसर के तकरीबन 10 लाख से ज्यादा मामले सामने आते हैं. त्वचा कैंसर का मतलब एबनौर्मल ग्रोथ औफ सैल्स होता है. इस में सैल्स का डिवीजन होता है. जहां जरूरत नहीं है वहां त्वचा असामान्य रूप से विभाजित होने लगती है जिस के कारण त्वचा कैंसर होता है.

त्वचा कैंसर का उपचार थोड़ा मुश्किल है पर इस से बचने के लिए कोशिश की जाती है. मुख्यरूप से 3 टाइप के त्वचा कैंसर होते हैं :

– बेसल सैल्स

– स्क्वैमस सैल्स कार्सिनोमा

– मेलेनोमा

भारत में बेसल सैल्स व स्क्वैमस सैल्स कौमन हैं जबकि मेलेनोमा आस्ट्रेलिया व यूएसए में ज्यादा होता है. यह पराबैगनी किरणों के संपर्क में आने के कारण होता है. वैसे मेलेनोमा कैंसर के कई कारण होते हैं, जैसे जिस के शरीर में इम्यूनिटी पावर कम होगी उसे मेलेनोमा कैंसर का अधिक खतरा होता है. एचआईवी से पीडि़त लोगों में इम्यूनिटी पावर कम होती है, इसलिए उन में इस बीमारी का सब से अधिक खतरा रहता है. अगर आप अपनी बौडी का एक्सरे कई बार करवाते हैं तो आप भी इस की चपेट में आ सकते हैं.

मेलेनोमा कैंसर तेजी से फैलता है. अगर शरीर में हलका घाव हो तो वह तेजी से बढ़ने लगता है. मेलेनोमा का रंग काले व गुलाबी रंग से मिल कर बनने वाले बैगनी कलर का होता है. शरीर के हर घाव को मेलेनोमा कैंसर न समझें, इलाज तुरंत शुरू कर दें.

जहां तक बेसल सैल्स की बात है तो यह कम फैलता है. यदि चेहरे का घाव लंबे समय से है और वह ठीक नहीं हो रहा है, तो जल्द ही किसी चिकित्सक से मिलें. अगर ऐसा नहीं करते हैं तो यह कैंसर का रूप ले सकता है.

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इन्हें न करें नजरअंदाज

एक्जिमा टाइप की बीमारी या फिर कुहनी, घुटने, हथेली का घाव ठीक न हो रहा हो या फिर शरीर में मस्से का रंग व साइज बदलने लगे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. चेहरे में लालपन होना भी खतरे से खाली नहीं. कोई भी धब्बा 6 हफ्ते तक अगर ठीक न हो तो इसे हलके में न लें.

किसे है ज्यादा खतरा

– जिस की त्वचा का रंग गोरा हो.

– जो धूप के संपर्क में ज्यादा रहता हो.

– जो ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाके में रहता हो.

– एड्स के मरीजों को.

– आनुवंशिक यानी घर में पहले भी किसी को यह बीमारी रही हो.

– रेडिएशन से इलाज करवाने वालों को.

– जिसे अधिक पिंपल्स निकलते हों.

– जिन्हें एक्जिमा हो.

– जो ज्यादा कैमिकल के संपर्क में रहता हो.

बचें कैसे

– कोशिश करें कि घर से बाहर निकलने पर शरीर कपड़ों से ढका हुआ हो.

– जिन दवाओं से एलर्जी हो उन्हें कहीं लिख कर रखें और खाने से बचें.

– ऐंटीबायोटिक दवाओं से बचें. डाक्टर के परामर्श के बाद ही ऐंटीबोयोटिक दवाओं को लें.

– 30-40 वर्ष की आयु के बाद साल में एक बार त्वचा की जांच जरूर करवाएं.

– अल्ट्रावौयलेट रेज से बचने के लिए सनस्क्रीन क्रीम का इस्तेमाल करें. चाहे सर्दी हो या गरमी, जब भी बाहर निकलें तो क्रीम लगा कर ही निकलें. याद रहे सनस्क्रीन क्रीम का असर मात्र 6 घंटे तक ही होता है. आप चाहें तो क्रीम को साथ रख सकते हैं.

पता कैसे चलता है

त्वचा के प्रभावित हिस्से की बायोप्सी से ही त्वचा कैंसर का पता चलता है. यह कितनी गहराई तक है, का पता लगा कर इस का इलाज किया जाता है. ऊपरी परत का कैंसर फ्रीज कर के निकाला जाता है. जो कैंसर गहराई तक है उसे मौज सर्जरी के माध्यम से ठीक करते हैं. कैंसर की गहराई नीचे तक हो तो रेडिएशन या कीमोथेरैपी के जरिए इस का इलाज किया जाता है.

आजकल नई तकनीक यानी बायोलौजिकल थेरैपी के जरिए कैंसर का इलाज किया जा रहा है. इस का प्रयोग उन दवाइयों के लिए किया जाता है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा कैंसर की कोशिकाओं पर आक्रमण करती हैं. यह ज्यादातर कैंसर की शुरुआती अवस्था में की जाती है.

(लेख दिल्ली स्थित लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल में त्वचा विभाग के डायरैक्टर एवं प्रोफैसर डा. विजय कुमार गर्ग से बातचीत पर आधारित.)

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स्तन कैंसर : घबराएं नहीं, जांच कराएं और इन लक्षणों पर ध्यान दें

स्तन कैंसर, स्तन कोशिकाओं के असामान्य विकास का परिणाम है. इस का कोई विशेष कारण ज्ञात नहीं है कि स्तन की मांसपेशी क्यों असामान्य रूप से बढ़ने लग जाती हैं. भारत में स्तन कैंसर बहुत ही सामान्य है. उस के बाद फेफड़ों का कैंसर है. स्तन कैंसर से पीड़ित मरीजों की संख्या के निरंतर बढ़ने का कारण है अज्ञानता.

यह रोग प्रारंभिक अवस्था में पता चल जाने पर न तो जानलेवा होगा न ही उपचार के परे. अधिकांश रूप में स्तन में गांठ  ही प्रथम लक्षण हो सकता है, परंतु इस के अलावा कई अन्य बातों का भी ध्यान रखना चाहिए.

इन 5 लक्षणों पर विशेष ध्यान दें-

स्तन में सूजन व गांठ :  यह एक प्रारंभिक लक्षण है. यदि स्तन का आकार बढ़ने लगे तो अवश्य डाक्टर से सलाह लें.

स्तन से स्राव :  यह भी एक सामान्य लक्षण है. प्रत्येक स्तनस्राव दूध नहीं होता है. रक्तमिश्रित या पानी जैसा स्राव होने पर स्तन को दबाना नहीं चाहिए. डाक्टर से संपर्क करना चाहिए.

स्तन पर गड्ढा/त्वचा का निकलना: यदि स्तन की चमड़ी असामान्य प्रतीत हो या रंग में परिवर्तन अथवा मोटा, खुरदरा महसूस हो, जैसे नारंगी का छिलका तो बिना समय गंवाए डाक्टरी सलाह लें.

निपल असामान्य हो जाएं : स्तन के निपल यदि अंदर चले जाएं या वे असामान्य प्रतीत हों तो अवश्य जांच करवाएं क्योंकि कैंसर की कोशिकाओं के विकसित होने पर निपल में असामान्य बदलाव 7 प्रतिशत मरीजों में देखा गया है. स्तन का रंग लाल या सूजा हुआ या निपल के चारों ओर का चर्म बदला हुआ हो सकता है.

स्तन में पीड़ा : स्तन कैंसर से पीडि़त मरीजों का असामान्य लक्षण है स्तन में पीड़ा होना. लोगों में ऐसा भ्रम है कि स्तन की गांठ केवल उसी स्थान पर पीड़ा का कारण होगी, परंतु यह सत्य नहीं है. संपूर्ण स्तन में पीड़ा का अनुभव हो सकता है. ऐसा महसूस हो सकता है मानो कोई फोड़ा रिस या टपक रहा हो. इस पीड़ा को हलके में न लें. तुरंत जांच करवाएं.

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उपरोक्त 5 बातों का ध्यान रखने से स्तन कैंसर प्रथम स्तर पर पता किया जा सकता है जिस का उपचार संभव है.

अपने शरीर में होने वाले स्तन व उदर में दर्द, मासिकधर्म का उस पर किस प्रकार प्रभाव होता है, इस पर स्वयं ध्यान दें जिस से आप अपने शरीर में होने वाले असामान्य लक्षण को स्वयं अनुभव कर सकें. नियमितरूप से डाक्टर से स्तन की जांच करवाएं चाहे वह सामान्य ही क्यों न हो. यह माह की एक तारीख या मासिकधर्म का प्रथम दिन स्वयं निर्धारित करें और शीशे के सामने खड़े हो कर अपने स्तन की जांच (गांठ के लिए) करें, अवलोकन करें.

स्तन में बदलाव उम्र के साथ मासिकधर्म के समय व गर्भावस्था में भी होता है. यों तो स्तन कैंसर का कोई निश्चित कारण नहीं, फिर भी कुछ रिस्क फैक्टर्स होते हैं.

– बढ़ती उम्र या 50 साल से ज्यादा.

– घरपरिवार निकटसंबंधी (जिन का रक्त से संबंध हो) यदि स्तन कैंसर से ग्रसित हो.

– यदि सगी बहन, मां या मौसी को स्तन कैंसर हो तो 2-3 गुना संभावना बढ़ जाती है.

– कुछ विशेष जींस भी स्तन कैंसर के लिए जिम्मेदार पाए गए हैं.

– जिन महिलाओं के स्तन में गांठ या अंडेदानी में गांठ या कैंसर हो उन में बढ़ती उम्र के साथ स्तन कैंसर हो सकता है.

इस के अलावा कम उम्र में मासिकधर्म का आरंभ हो जाना, देर से मासिकधर्म बंद होना (मेनोपौज), गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन अधिक समय तक करना ये सभी कैंसर होने के खतरे के कारण हैं.

बांझपन या बच्चे को जन्म न देना, बढ़ती उम्र में बच्चे को जन्म देना, बच्चे को स्तनपान न कराना इत्यादि भी स्तन कैंसर होने की संभावना को कई गुना बढ़ा देते हैं.

जो गांठ छूने से सख्त हो या जिस के किनारे टेढ़ेमेढ़े या असामान्य हों, ज्यादातर उन में कैंसर होता है.

– निपल के आकार में परिवर्तन.

– स्तनपीड़ा जो मासिकधर्म के बाद  भी रहे.

– स्तनगांठ जो मासिकधर्म से अप्रभावित रहे या समाप्त न हो.

– स्तन में नई गांठ बन जाना.

– स्तन से (सामान्यतया एक से) स्राव (पानी, लाल, भूरा या पीला).

– स्तन की चमड़ी का लाल होना, सूजन, खुजली या जख्म का होना.

– गले की हड्डी या बगल में गांठ होना.

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बाद के लक्षण

– निपल का अंदर की ओर मुड़ जाना या धंस जाना.

– स्तन का आकार बढ़ जाना.

– स्तन की ऊपरी सतह पर छोटेछोटे गड्ढे बन जाना.

– पुरानी स्तनगांठ के आकार में वृद्धि.

– जननांगों में पीड़ा होना.

– बिना कारण वजन का घटना व कमजोरी महसूस करना.

– बगल में गांठ का बड़ा हो जाना.

– स्तन पर नीली नसों का उभरना.

उपरोक्त किसी भी लक्षण से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि यथाशीघ्र डाक्टर से सलाह करनी चाहिए.

जीवनशैली या दिनचर्या भी कैंसर का कारण बन सकती है, जैसे भोजन जिस में वसा (फैट) की मात्रा प्रचुर हो, अलकोहल का सेवन इत्यादि.

स्तन कैंसर की जांच

डाक्टर द्वारा स्तन की जांच, मैमोग्राफी, अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन या बायोप्सी करानी चाहिए. प्रारंभिक अवस्था में रोग का निदान आसान होता है व आयु पर प्रभाव भी कम पड़ता है.

जब कैंसर एडवांस स्टेज पर फैल गया हो तो औपरेशन, कीमोथेरैपी, हार्मोनल थेरैपी और रेडियो थेरैपी के इलाज उपलब्ध हैं. इलाज कैंसर की स्टेज पर निर्भर करता है.

जागरूकता जरूरी

सामान्य जनता में ज्ञान की कमी इस का प्रथम कारण है. कोई भी कैंसर यदि प्रारंभिक अवस्था में पता चल जाए तो जीवन व धन दोनों का रक्षण हो सकता है. महिलाओं में जागरूकता होनी आवश्यक है.

दूसरा कारण, दवाओं का महंगा होना है. तीसरा कारण, लंबे समय तक का इलाज है. चौथा कारण, लास्ट स्टेज में कैंसर के इलाज में कीमोथेरैपी/ रेडियोथेरैपी होती है. जिस से लाल रक्त हीमोग्लोबिन कम होता है. सो, नियमित रूप से कई बार खून की जांच करवानी पड़ती है. कैंसर कोई संक्रमिक (छूत का) रोग नहीं है. यह लाइलाज भी नहीं हैं, इसलिए घबराना नहीं चाहिए.

(लेखिका मूलचंद अस्पताल, नई दिल्ली में वरिष्ठ चिकित्सक व स्त्रीरोग विशेषज्ञ हैं.)

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शराबबंदी को ठेंगा दिखाता नाजायज मतलबी बंधन

प्रदेश में शराबबंदी के बावजूद शराब माफिया, अपराधियों और पुलिस वालों के बीच अनोखा महागठबंधन तैयार हो गया है और वह शराबबंदी कानून को ठेंगा दिखा रहा है. इस की एक छोटी सी बानगी 11 अक्तूबर, 2017 को देखने को मिली, जब अरवल पुलिस ने शराब का एक कंसाइनमैंट पकड़ा. मामले की जांच के लिए केस को आर्थिक अपराध इकाई यानी ईओयू को सौंप दिया गया. ईओयू ने अपना काम शुरू किया. उसे सूचना मिली थी कि 12 अक्तूबर को उसी कंसाइनमैंट की डिलीवरी सीतामढ़ी में होने वाली है. पुलिस ने छापा मारने की तैयारी की. सीतामढ़ी पुलिस को अलर्ट रहने को कहा गया.

इसी बीच रून्नीसैदपुर थाने के दारोगा अवनी भूषण सिंह ने शराब माफिया अजीत राय के मोबाइल फोन पर मैसेज भेजा, ‘अभी रेड होगी.’ उस के बाद दारोगा साहब ने फोन कर के अजीत राय को सावधान रहने की हिदायत भी दी.

अजीत राय पर शराबबंदी कानून तोड़ने समेत हत्या, रंगदारी वसूलने समेत कई केस पहले ही दर्ज हैं. तकरीबन आधा दर्जन मामलों में वह चार्जशीट किया जा चुका है.

दारोगा अवनी भूषण सिंह को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि वह पहले से ही ईओयू के रडार पर है.

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शराब माफिया को छापामारी की सूचना देने के कुछ ही देर बाद साल 2009 बैच के दारोगा अवनी भूषण सिंह समेत शराब माफिया को दबोच लिया गया.

बिहार में यह इस तरह का पहला मामला है जब ईओयू ने शराब माफिया और पुलिस के गिरोह का भंडाफोड़ किया है.

11 अक्तूबर को ही अरवल जिले के कलेर थाने के थानेदार को शराब के एक कंसाइनमैंट की जानकारी मिली. रात के 8 बज कर 35 मिनट पर थानेदार ने पुलिस टीम के साथ पटनाऔरंगाबाद हाईवे-98 पर एक मिनी ट्रक को रोका.

हरियाणा के रजिस्ट्रेशन नंबर वाले उस ट्रक में शराब की 4320 बोतलें लदी हुई थीं. ट्रक पर सवार कुलदीप सिंह और केशव देव को गिरफ्तार कर लिया गया. उन्होंने बताया कि शराब से लदे इस मिनी ट्रक को हाजीपुर में डिलीवरी देनी थी.

ईओयू की टीम ट्रक के साथ हाजीपुर पहुंची. हाजीपुर पहुंचने के बाद शराब माफिया ने ट्रक को मुजफ्फरपुर चलने को कहा. मुजफ्फरपुर से पहले ही तुर्की ब्लौक के पास एक स्कौर्पियो गाड़ी ने ट्रक को रुकने के लिए कहा. ट्रक के रुकते ही उस में सवार ईओयू की टीम ने स्कौर्पियो में सवार 5 लोगों को दबोच लिया.

गिरफ्तार लोगों के नाम अजीत कुमार, अजय कुमार, सुजीत कुमार, संजीव कुमार और सुरेंद्र कुमार सिंह है. सुरेंद्र दिल्ली का रहने वाला है.

बिहार में शराबबंदी के बाद भी शराब का चोरीछिपे  गैरकानूनी धंधा चल रहा है. जो शराब पीना चाहता है, उस के घर पर शराब की डिलीवरी हो रही है. 500 रुपए की कीमत वाली शराब की बोतल के लिए पियक्कड़ों को डेढ़ से 2 हजार रुपए तक चुकाने पड़ते है. पुलिस ने अब तक शराब के जिन धंधेबाजों को पकड़ा है, उन लोगों ने कबूल किया है कि झारखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा से शराब बिहार पहुंचती रही है.

शराबबंदी कानून को ठेंगा दिखा कर अपना गैरकानूनी धंधा चलाने के लिए शराब माफिया हर तरह की तिकड़म लड़ा रहे हैं. जब शराब से लदे बड़े ट्रकों को पुलिस ने पकड़ना शुरू किया तो छोटी गाडि़यों में शराब की खेप लाने का काम शुरू कर दिया गया. मिनी ट्रक, कारें, आटोरिकशा यहां तक कि स्कूटी में भर कर भी शराब ढोई जाने लगी है.

पुलिस से मिली जानकारी के मुताबिक, शराब की खेप को बिहार की सीमा के बाहर बड़े पैमाने पर जमा कर के रखा गया है. वहीं से डिमांड के हिसाब से शराब की खेप की होम डिलीवरी की जा रही है.

पहले गोपालगंज जिले के रास्ते गैरकानूनी तरीके से शराब बिहार की सीमा में घुसाई जा रही थी. उस रूट पर जब पुलिस की धरपकड़ तेज हो गई

तो अब अरवलजहानाबाद रूट को शराब माफिया ने अपना सेफ जोन बना लिया है.पुलिस की आंखों में धूल झोंकने के लिए शराब की खेप को इधरउधर घुमाने के बाद तय अड्डे तक पहुंचाया जाता है. पुलिस की मिलीभगत के बगैर माफिया का काम आसान नहीं हो सकता है.

भोजपुर के एक शराब माफिया को गिरफ्तार करने के बाद जब ईओयू ने उस से पूछताछ की तो उस ने हैरान करने वाली बातें बताईं. उस ने बताया कि पटना से शराब की खेप को वह अपनी बोलेरो गाड़ी में रखता और पटना से भोजपुर के बीच पड़ने वाले हर पुलिस थाने में चढ़ावा चढ़ाता चला जाता था.

एक खेप ले जाने पर उसे थानों में तकरीबन 20 से 25 हजार रुपए चढ़ाने पड़ते थे और एक खेप से उस की कमाई 2 लाख रुपए से ज्यादा की हो जाती थी.

शराब की खेप के तय जगह पर पहुंचने के बाद तुरंत उस की डिलीवरी नहीं की जाती है. इस के लिए 10-15 घंटों का समय लगता है. खेप के पहुंचने के बाद धंधेबाज रेकी करते हैं. वे दूर रह कर उस पर नजर रखते हैं.

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हर तरह से निश्चिंत होने के बाद ही शराब की खेप को ठिकाने लगाने का काम शुरू किया जाता है. अगर लोकल पुलिस को दानदक्षिणा दे दी गई होती है तो बेरोकटोक डिलीवरी हो जाती है.

पिछले दिनों अरवलपटना से सटे दानापुर ब्लौक में जब शराब से लदा एक ट्रक पहुंचा तो उसे लेने के लिए कोई भी नहीं पहुंचा. धंधेबाजों को पता चल गया था कि ईओयू ने शराब की खेप को पकड़ने के लिए वहां पहले से ही जाल बिछा रखा था. तकरीबन 12 घंटे के बाद शराब के धंधेबाज जब पूरी तरह से निश्चिंत हो गए कि अब कोई खतरा नहीं है तो वे गाड़ी के पास पहुंचे. पर इतनी सावधानी बरतने के बाद भी वे ईओयू के जाल में फंस गए, क्योंकि ईओयू ने अपनी टीम को बदल दिया था.

पिछले साल 1 अप्रैल से बिहार को पूरी तरह से ‘ड्राई स्टेट’ बनने के बाद ही राज्य के सीमा पार के इलाकों में शराब के कई बाजार सज चुके थे.

बिहार से सटे नेपाल के इलाकों में तो शराब का धंधा कई गुना बढ़ चुका है, वहीं बिहार से सटे झारखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल वगैरह राज्यों के बौर्डर पर भी शराब का धंधा फलफूल रहा है.

शराबबंदी के बाद ही कई रिटायर्ड सरकारी अफसरों ने कहा था कि सरकार का यह फैसला तभी कामयाब होगा जब सरकारी अफसर और मुलाजिम पूरी ईमानदारी से सरकार का साथ देंगे. ज्यादातर राज्यों में सरकारी अफसरों और जनता की मदद नहीं मिलने की वजह से शराबबंदी नाकाम साबित हुई है.

रिटायर्ड मुख्य सचिव वीएस दुबे कई मौके पर कहते रहे हैं कि शराब पर पूरी तरह से रोक लगाना सरकार का काफी अच्छा फैसला है. पर यह तभी कामयाब हो सकेगी, जब पुलिस दारोगा और आबकारी दारोगा पर पूरी तरह जवाबदेही डाली जाएगी. गैरकानूनी शराब की तस्करी को रोकने के लिए पड़ोसी राज्यों की सीमा पर ठोस निगरानी तंत्र बनाने होंगे.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पता था कि उन के शराबबंदी के फैसले को सब से ज्यादा खतरा पुलिस से ही है, इसलिए उन्होंने हर थाने के थानेदारों से लिखित शपथपत्र ले लिया था कि उन के इलाके में चोरीछिपे शराब बिकते, खरीदते या पीते पाई जाती है तो सीधे थानेदार ही जवाबदेह होंगे.

इस के बावजूद भी पुलिस के कई लोग शराब माफिया और दूसरे अपराधियों के साथ मिल कर शराबबंदी कानून को तोड़ने में लगे हुए हैं.

देशी शराब है सब से बड़ी सिरदर्द

बिहार में शराबबंदी के बाद चोरीछिपे गैरकानूनी तरीके से देशी शराब बनाने और बेचने पर रोक लगाना सरकार के लिए हमेशा मुश्किल रहा है. पिछले अगस्त महीने में गोपालगंज जिले के खजूरबन्नी गांव में देशी शराब पीने की वजह से 17 लोगों की मौत हो गई थी.

शराब पर पाबंदी के बाद भी कोई तगड़ा नैटवर्क है, जो यह जहर बांट रहा है और कानून की धज्जियां उड़ा रहा है. इस गैरकानूनी काम को करने वालों की पीठ पर या तो किसी बड़े नेता का हाथ है या पुलिस के अफसरोंमुलाजिमों की मिलीभगत है.

महुआ की चुलाई दारू को बनाने के लिए महुआ और गुड़ को मिला कर सड़ाया जाता है. उसे खुले आकाश के नीचे 2-3 दिनों तक रखा जाता है. उस के बाद से उस में बदबू आनी शुरू हो जाती है. उसे चूल्हे पर रख कर खौलाया जाता है. इस दौरान उस की भाप को ढक कर दूसरे बरतन में चुलाई यानी टपकाई जाती है. वही महुआ दारू का रूप ले लेता है. उस में ज्यादा नशा पैदा करने के लिए नौसादर मिला दिया जाता है. ज्यादा नौसादर मिला देने से महुआ की शराब अकसर जहरीली हो जाती है. वहीं देशी दारू बनाने के लिए चावल और गन्ने के छोआ को मिला कर 3-4 दिनों तक फूलनेसड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है. जब उस में सड़न और बदबू पैदा हो जाती है, तो उसे गरम कर के छान लिया जाता है. उस के बाद उस में स्पिरिट मिला कर देशी दारू बना दी जाती है.

बिहार के उत्पाद मंत्री विजेंद्र यादव कहते हैं कि कुछ लोग शराबबंदी को नाकाम करने में लगे हुए हैं. पर इसे कामयाब बनाने के लिए गांवगांव में शराब के खिलाफ लोगों को जागरूक करने की मुहिम चलाई जा रही है.

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जातीय स्वाभिमान ने बढ़ाई बेकारी, कैसे आगे बढ़ेगा देश का युवा

गांवों में बहुत सारे लोगों को जातीय स्वाभिमान के नाम पर उन के पुश्तैनी पेशे से दूर कर दिया गया है. अपने पेशे से दूर हुए लोगोंके लिए रोजगार का कोई दूसरा रास्ता न मिलने से गांवों में बेकारी बढ़ गई है. वहां से रोजगार के लिए शहर आए ये लोग यहां के बढ़ते खर्च और अपनी कमाई के बीच बढ़ते फर्क के चलते गुजरबसर नहीं कर पा रहे हैं.

साल 1990 के बाद से ही देश की राजनीति में जाति और धर्म का दखल तेजी से बढ़ गया. इस के चलते वोट के लिए तरहतरह के लालच राजनीतिक दलों ने जनता को दिए. इन में सब से बड़ा लालच जातीय स्वाभिमान का था.

भारतीय समाज में कई ऐसे पेशे थे, जो जाति से जुड़े थे. कुछ पेशे मजबूरी वाले थे, तो कुछ कारीगरी की मिसाल भी थे.

राजनीतिक दलों ने जातीय स्वाभिमान के नाम पर इन धंधों को छोड़ने के लिए सामाजिक लैवल पर बदलाव शुरू कर दिया. इस से काफी हद तक समाज में बदलाव नजर आने लगा. सामाजिक जागरूकता के चलते ही  ऐसे धंधों से लोग अलग हो गए, जो जाति से जुड़े थे.

जातीय स्वाभिमान के जरीए राजनीतिक दलों ने समाज में चेतना तो जगा दी, पर जो लोग बेरोजगार हो गए, उन के लिए कोई रोजगार मुहैया नहीं कराया. ऐसे में अपने पेशेवर धंधे छोड़ने वाले ये लोग मजदूर बन कर रह गए.

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छोटेछोटे वे धंधे, जो कभी गांव में रोजगार का जरीया होते थे, अब दूसरे कारोबारियों के पाले में चले गए. जो लोग अपना धंधा करते थे, वे अब कारोबारियों के यहां ठेके पर काम करने वाले मजदूर बन कर रह गए.

गांवों में रोजगार का एक बड़ा साधन लकड़ी और लोहे का कारोबार था. लकड़ी और लोहे से तैयार होने वाली कई चीजें बना कर बाजार में बेची जाती थीं. यह काम गांव में खास जाति के लोग करते थे. जातीय स्वाभिमान के नाम पर इन लोगों ने गांव में यह काम करना बंद कर दिया.

कारीगर हो गए मजदूर

इस के 2 नुकसान हुए. पहला तो यह कि ये लोग दूसरों के कारखाने में काम करने वाले मजदूर बन कर रह गए. दूसरा, ये लोग अपनी नई पीढ़ी को इस रोजगार की बारीकियां नहीं सिखा पाए. ऐसे में आने वाली पीढ़ी को कोई जानकारी नहीं हो सकी.

अगर इन लोगों के लिए सरकार ने किसी कामधंधे का इंतजाम किया होता तो शायद अपना पेशेवर धंधा छोड़ कर ये लोग नौकरी कर के गुजारा कर सकते थे. ऐसे में ये लोग वापस उसी धंधे में चले गए, वह भी मजदूर बन कर.

ऐसे धंधों की लंबी लिस्ट है, जिन को पहले जातीय स्वाभिमान के रूप में छोड़ दिया गया, फिर उसी धंधे में मजदूर बन कर काम करने को लोग मजबूर हुए. बाल काटने और दाढ़ी बनाने से जुड़ा धंधा भी ऐसा ही है.

इस काम के माहिर लोगों ने गांव में यह काम करना छोड़ दिया. ये लोग रोजगार के लिए शहर आ गए. यहां किसी दूसरी जाति के आदमी ने एक सैलून बनवा दिया. उस में ये लोग काम करने लगे. इन को प्रति ग्राहक के हिसाब से ही पैसा मिलने लगा.

यही हाल बुनकरों, साड़ी कारीगरों, पावरलूम पर काम करने वालों का भी हुआ. इस की वजह से छोटेछोटे शहरों में यह धंधा बंद हो गया. अब यह धंधा बड़ी फैक्टरी में होने लगा. ये कारीगर यहां मजदूर की तरह से दिनरात काम करने लगे.

पहले बुनकार साडि़यां खुद तैयार करते और बेचते थे. अब वे केवल साड़ी तैयार करते हैं. उन को बेच कर मोटा मुनाफा कारोबारी की जेब में जाने लगा है.

विज्ञान के जरीए हुई तरक्की ने भी कारोबारी के लिए तमाम सहूलियतें पैदा कर दीं. मशीनों से काफी काम होने लगा, जिस से हाथों से काम करना बंद होने लगा.

रोजगार का इंतजाम नहीं

कारीगरी में मशीनों के इस्तेमाल ने कुशल कारीगरों को बेरोजगार बनाने का काम किया. कारोबारी ने अपने मुनाफे के हिसाब से कारीगरों का इस्तेमाल करना शुरू किया. मशीनों के इस्तेमाल से धीरेधीरे लोगों के हाथ से रोजगार जाने लगा. अब वे वापस जब अपने गांव की तरफ आने लगे, तो यहां भी हालात बदल चुके थे.

गांवों में होने वाले छोटेछोटे रोजगार बंद हो चुके थे. अब यहां भी फैक्टरी में बना माल ही बिकने लगा था. इस की लागत भी बढ़ चुकी थी.

यह सही है कि जातीयता के नाम पर ऐसे कई बहुत से काम भी होते थे, जो सही नहीं थे. इन से दूर होने के बाद अगर लोगों को सही रोजगार मिल जाता तो शायद यह स्वाभिमान बना रहता.

सरकारों ने भी लोगों के रोजगार के ऊपर ध्यान नहीं दिया. सरकारी नौकरियों में रिजर्वेशन का फायदा केवल कुछ परिवारों तक ही सिमट कर रह गया.

गांवों में पढ़ाई का लैवल लगातार नीचे गिरता गया, जिस से शहरी बच्चों और गांव के बच्चों के बीच दूरी बढ़ गई. गांव के बच्चे रोजगार की दौड़ में पिछड़ते चले गए.

गांवों में खेती रोजगार का एक बड़ा जरीया है. जातीय स्वाभिमान के नाम पर पहले खेतों से मजदूर दूर हो गए. ये लोग कामधंधे के लिए अपना गांव छोड़ कर दूरदराज के प्रदेशों में जा कर खेती का काम करने लगे. खेती में मजदूरों की आत्मनिर्भरता को कम करने के लिए अलगअलग तरह की मशीनें आ गईं. इस  वजह से अब मजदूरों की छंटनी वहां भी होने लगी. ऐसे में ये लोग वापस गांव आए तो यहां भी खेतों में मजदूरों की खपत कम हो गई थी.

गांवों में अपनी जमीन न होने के चलते ये लोग अब मजदूरी करने लगे. ऐसे में गांव छोड़ने का भी कोई फायदा नहीं हुआ. यही नहीं, सफाई का काम करने वाले लोगों ने अपने पुश्तैनी काम को जातीय स्वाभिमान के नाम पर छोड़ दिया. अब वे ऐसे ठेकेदारों के बंधुआ मजदूर हो गए हैं, जो इस पेशे को कारोबार बना कर काम करने लगे हैं.

जातीय स्वाभिमान के नाम पर राजनीतिक दलों की सोच केवल वोट लेने तक सिमटी रही है. अगर सरकारों ने रोजगार और नौकरी के मौके बनाए होते तो अपने पुश्तैनी धंधों को छोड़ने वालों को फायदा होता.

सरकार ने कभी ऐसा कोई काम नहीं किया. ऐसे में अपना रोजगार छोड़ कर लोग मजदूर हो गए. अपने पुश्तैनी धंधों से नाखुश लोगों ने नई पीढ़ी को भी उस कारीगरी से दूर रखा. नई पीढ़ी के लिए नौकरियां नहीं थीं. ऐसे में वे केवल मजदूर बन कर रह गई. छोटीबड़ी हर तरह की नौकरियों में लगातार कमी आती जा रही है.

प्राइवेट सैक्टर में जो काम थे, वे भी धीरेधीरे सरकारी नीतियों के चलते बंद होते जा रहे हैं. छोटे कारखानों और कारोबारियों का काम बंद होने से मजदूरी भी बंद हो गई है. खेतों में काम मशीनों से होने लगा. प्राइवेट सैक्टर के प्रभावित होने से बेरोजगारी ज्यादा बढ़ गई है.

नौजवानों में बेरोजगारी

भारत में ऐसे नौजवानों की तादाद तेजी से बढ़ती जा रही है, जो केवल सरकारी नौकरियों की चाह रखते हैं. ऐसे नौजवान पढ़ेलिखे भले ही हों, पर इन में किसी भी तरह की कुशलता नहीं है.

ज्यादातर नौजवान नकल के सहारे पास हुए हैं. ये नौकरियों में होने वाले कंपीटिशन में भी कोई असर नहीं छोड़ पाते हैं. सेना और रेलवे में नौकरियों की कमी होने से बड़ी तादाद में बेरोजगारी बढ़ती जा रही है.

सरकारी नीतियां ऐसी हैं, जिस से नए उद्योगधंधे पनप नहीं रहे. केंद्र सरकार ने लोगों को ट्रेंड करने का काम शुरू किया. 3 साल में ऐसे ट्रेंड लोगों में से कितनों को रोजगार दिया जा सका है, यह पता नहीं है.

अगर चुनाव में बेरोजगारी एक मुद्दा बन जाए तो किसी भी दल के लिए मुसीबत बन सकती है. यही वजह है कि सभी दल नौजवानों को बेरोजगारी के मुद्दे से दूर रखने के लिए जाति और धर्म के स्वाभिमान का पाठ पढ़ाया करते हैं. वे कतई नहीं चाहते कि नौजवानों में रोजगार की बात मुद्दा बन सके.

आज हर दल को अपना प्रचार करने के लिए ऐसे नौजवानों की जरूरत है, जो उस के साथ जुड़ कर काम करने लगे.

अगर इन नौजवानों को नौकरी और कामधंधे से जोड़ा गया. तो वे किसी दल के मुफ्त के कार्यकर्ता नहीं बन सकेंगे. रोजगार की कमी में वे नेता के आगेपीछे घूमेंगे और जिंदाबादमुरदाबाद के नारे लगाएंगे. ऐसे में बेरोजगार नौजवान राजनीतिक दलों के ऐसे कार्यकर्ता हैं, जिन को केवल जातिधर्म का लौलीपौप दे कर बहलाया जा सकता है.

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कहां गया नजीब, बेटे की तलाश में दरदर भटक रही मां

15 अक्तूबर, 2016 की रात दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से गायब हुए छात्र नजीब अहमद का आज तक कोई अतापता नहीं लग सका है. बेबस मां फातिमा नफीस पिछले कई महीनों से नजीब के साथी छात्रों के सहारे दिल्ली में दरदर की खाक छान रही हैं.

फातिमा नफीस देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से भी गुहार लगा चुकी हैं, लेकिन नतीजा अभी तक ढाक के तीन पात है. राष्ट्रपति को दी गई अपनी अर्जी में फातिमा नफीस ने मामले की जांच सरकारी और राजनीतिक दखल से परे रख कर कराने की मांग की है. उन्होंने जेएनयू प्रशासन, दिल्ली पुलिस और सीबीआई के काम करने के तरीके पर भी सवाल उठाए हैं.

फातिमा नफीस का आरोप है कि जब वे मामले की रिपोर्ट दर्ज कराने संबंधित थाने में गईं, तो पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट लिखने से आनाकानी की. बाद में जब जेएनयू छात्रसंघ और गवाहों ने अपने बयान समेत लिखित शिकायत की, तब जा कर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की.

मामले की जांच कर रही सीबीआई ने 14 नवंबर, 2017 को दिल्ली हाईकोर्ट को सौंपी गई अपनी स्टेटस रिपोर्ट में पुलिसिया जांच पर कई सवाल खड़े किए हैं. सीबीआई ने पुलिस द्वारा 16 नवंबर, 2016 को हिरासत में लिए गए उस आटोरिकशा चालक से भी गहन पूछताछ की, जो कथित रूप से नजीब को जेएनयू से जामिया मिल्लिया इसलामिया ले गया था. आटोरिकशा चालक पुलिस को दिए गए अपने बयान से साफ मुकर गया. उस का कहना था कि उस ने ऐसा पुलिस के दबाव में आ कर बोला था.

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गौरतलब है कि दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश पर सीबीआई ने इसी साल 16 मई को नजीब अहमद के मामले की जांच अपने हाथ में ली थी. इस से पहले जांच दिल्ली पुलिस के जिम्मे थी, जो कदम दर कदम नाकाम रही.

सीबीआई ने अदालत को बताया कि मामले से जुड़े 9 संदिग्ध छात्रों के मोबाइल फोन जब्त किए गए हैं, जिन की फौरैंसिक जांच रिपोर्ट आना बाकी है.

दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस एस. मुरलीधर व जस्टिस आईएस मेहता की 2 सदस्यीय खंडपीठ का मानना था कि जांच के दौरान सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट को ओपन कोर्ट करने की जरूरत महसूस नहीं होती. सीबीआई ने भी नजीब की मां के वकील को स्टेटस रिपोर्ट की कौपी देने से इनकार कर दिया है.

अदालत में सुनवाई के दौरान सीबीआई काउंसिल निखिल गोयल ने बताया कि सभी 9 संदिग्ध छात्रों के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स की जांच हो चुकी है, सिर्फ रिपोर्ट आना बाकी है. इस के बाद सीबीआई ने मांग की है कि मामले की इनचैंबर प्रोसीडिंग की जाए, जिस पर अदालत ने 21 दिसंबर, 2017 की सुनवाई के दौरान विचार करने का अश्वासन दिया है.

वहीं दूसरी तरफ अतिरिक्त मुख्य मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट समर विशाल की अदालत ने सीबीआई की उस अर्जी को विचार के लिए स्वीकार कर लिया है, जिस में आरोपी छात्रों का लाई डिटैक्शन टैस्ट कराने की मांग की गई है.

गौरतलब है कि जेएनयू के माहीमांडवी होस्टल के कमरा नंबर 106 में रहने वाला नजीब अहमद स्कूल औफ बायोटैक्नोलौजी का छात्र था. बताते हैं कि 15 अक्तूबर, 2016 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कुछ समर्थक छात्रों के साथ नजीब का झगड़ा हुआ था और उसी रात वह लापता हो गया.

सूचना पा कर उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले से आईं मां फातिमा ने इस बात की एफआईआर दिल्ली के वसंतकुंज नौर्थ थाने में दर्ज कराई. 6 नवंबर, 2016 को नजीब की गुमशुदगी को ले कर छात्रों ने उस की मां फातिमा और दूसरे परिवार वालों के साथ विरोधप्रदर्शन किया, तो पुलिस ने फातिमा समेत बड़ी तादाद में छात्रों को हिरासत में ले लिया, जिन्हें बाद में छोड़ दिया गया. साथ ही, ऐलान हुआ कि जो भी शख्स नजीब के मामले में कोई कारगर सुराग देगा, उसे 5 लाख रुपए का इनाम दिया जाएगा.

इसी बीच यूनिवर्सिटी द्वारा बिठाई की गई जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट पेश की कि नजीब से हुए झगड़े के लिए अखिल भारतीय विधार्थी परिषद के समर्थक छात्र जिम्मेदार हैं. जेएनयू की सिक्योरिटी और वार्डन ने अपनी लिखित टिप्पणी में कहा कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के समर्थकों ने नजीब को पीटा था. लेकिन आरोप यह है कि यूनिवर्सिटी की जांच समिति की रिपोर्ट साजिशन बदल दी गई.

खुद के हाईटैक होने का दावा करने वाली दिल्ली पुलिस जांच के नाम पर महज खानापूरी करती रही. कभी वह यूनिवर्सिटी की तलाशी लेती तो कभी माहीमांडवी होस्टल की. साथ ही, उस ने यह भी शिगूफा छोड़ा कि नजीब आईएसआईएस में शामिल हो गया है.

जब दबाव बढ़ा, तो नजीब को खोजने के लिए घोषित इनामी रकम 10 लाख रुपए कर दी गई. साल 2017 की शुरुआत में यानी 22 जनवरी, 2017 को पुलिस ने एक नौजवान को नजीब के परिवार से फिरौती मांगने के आरोप में गिरफ्तार किया. हालांकि कोई सुबूत न होने के चलते उसे बाद में छोड़ दिया गया.

अफसोस की बात यह है कि देश की भरोसेमंद संस्था सीबीआई की जांच प्रक्रिया भी ढीली रही है. 6 महीने से ज्यादा गुजर चुके हैं, लेकिन अभी तक सिर्फ उस की स्टेटस रिपोर्ट ही अदालत के सामने आई है. 7 महीने का समय दिल्ली पुलिस पहले ही बरबाद कर चुकी है.

दरअसल, नजीब की गुमशुदगी सिर्फ सीबीआई और दिल्ली पुलिस प्रशासन की नाक का सवाल नहीं है, बल्कि यह देश की राजधानी से जुड़ा वह मामला है, जिस के चलते केंद्र सरकार की इज्जत भी दांव पर है.

सवाल यह है कि नजीब कहां है, किस हाल में है, किस के कब्जे में है, किस के दबाव में है, जो वह सामने नहीं आ रहा है, नेताओं ने भी नजीब मामले में चुप्पी साध रखी है. सिर्फ राज्यसभा सदस्य शरद यादव ने ही सीबीआई दफ्तर पर विरोध प्रदर्शन के दौरान फातिमा नफीस के आंसू पोंछे, बाकी को सांप सूंघ गया.

हालात की गंभीरता का अंदाजा लगाइए कि एक मां पिछले कई महीनों से अपने लापता लाड़ले की बाट जोह रही है, जिसे उस ने न जाने कितनी मुसीबतें सह कर पालापोसा, भविष्य बनाने की गरज से अपनी नजरों से दूर कर दिल्ली पढ़ने के लिए भेजा और आज उसी जिगर के टुकड़े को तलाशते तलाशते उस की आंखें पथराने को हैं. यह तो भला हो नजीब के उन साथी छात्रों का, जिन्होंने फातिमा का हाथ थाम रखा है, वरना हमारी व्यवस्था ने नकारेपन की सारे हदें लांघ रखी हैं.

किसी ने कभी सोचा कि दिल्ली में एक आदमी के रहनेखाने और इधरउधर पैरवी करने में हर महीने कितनी रकम खर्च होती है? एक गरीब परिवार के लिए यह हालत कितनी दुखदायी होती है, समझना आसान है. लेकिन हमारी व्यवस्था की बागडोर संभालने वाले इस से अनजान बने हुए हैं.

हमारे नेता भले ही हालात की नजाकत को समझें, लेकिन सच यही है कि नजीब मामले पर देशभर के लोगों की नजर हैं. यही नहीं, उन की आंखों में कई सवाल भी हैं, जिन्हें समझना कोई मुश्किल काम नहीं है. नजीब की किसी भी हाल में बरामदगी ही इन तमाम सवालों का जवाब है.

सीबीआई को चाहिए कि वह जल्द से जल्द मामले का परदाफाश करे, कुसूरवारों को सजा मिले, जिस से फातिमा नफीस और उन के बेटे के साथ इंसाफ हो सके.

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