Download App

स्टूडेंट आफ द ईअर 2 : आखिर कौन कर रहा है इस फिल्म से डेब्यू

करण जोहर अपनी 2012 की सफलतम फिल्म ‘‘स्टूडेंट आफ द ईअर’ की सिक्वअल फिल्म ‘‘स्टूडेंट आफ द ईअर 2’’ का निर्माण करने जा रहे हैं, जिसका निर्देशन पुनीत मल्होत्रा करेंगे. जब से इस फिल्म के निर्माण की खबरें गर्म हुई थीं, तभी से फिल्म के कलाकारों को लेकर अटकलों का बाजार भी गर्म रहा.

पर अब सूत्र बता रहे हैं कि इस फिल्म में दो लड़के यानी कि दो छात्र की बजाय एक छात्र और एक छात्रा की बजाय दो छात्राएं होंगी.इतना ही नहीं फिल्म के हीरो टाइगर श्रौफ होंगे, पर उनकी निजी जिंदगी की प्रेमिका दिशा पाटनी को इस फिल्म में जगह नही मिल पायी. अब यह तय हो चुका है कि फिल्म ‘‘स्टूडेंट आफ द ईअर’’ में अब टाइगर श्रौफ के साथ अनन्या पांडे और तारा सुतारिया अभिनय करेंगी.

bollywood

अनन्या पांडे की बतौर अदाकारा यह पहली फिल्म होगी. वह मशहूर बौलीवुड अभिनेता चंकी पांडे की बेटी हैं. जबकि तारा सुतारिया मशहूर वी जे, मौडल और टीवी कलाकार हैं. इतना ही नही ‘गुजारिश’ और ‘तारे जमीं पर’ जैसी फिल्मों में कुछ किरदारों को अपनी आवाज दे चुकी हैं.

VIDEO : सर्दी के मौसम में ऐसे बनाएं जायकेदार पनीर तवा मसाला…नीचे देखिए ये वीडियो

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

ठगों की सम्यक दृष्टि

हमारी सभ्यता और संस्कृति में ठगी को विद्या और कला की मान्यता बेवजह नहीं मिली है. ठगी दुष्कर काम है जिस में आत्मविश्वास, ज्ञान और अभिनय सहित ढेरों गुणों व जानकारियां अनिवार्य होती हैं. यों ठगी सर्वव्यापी है. हर कोई किसी न किसी को ठग रहा है. व्यापारी ग्राहकों को, डाक्टर मरीजों को, बैंक उपभोक्ताओं को और नेता जनता को ठग रहे हैं.

यह मामला थोड़ा अलग है जिस में ठगों ने उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू को ही चूना लगा डाला. यह बात खुद उन्होंने सदन में स्वीकारी कि उपराष्ट्रपति बनने के बाद वजन घटाने वाली एक दवाई का इश्तिहार उन्होंने देखा और दवा और्डर कर दी. 1 हजार रुपए लेने के बाद दवा कंपनी ने फिर हजार रुपए मांगे तो वेंकैया का माथा ठनका पर तब तक वे आम लोगों की तरह ठगे जा चुके थे.

अब उम्मीद की जानी चाहिए कि इन ठगों की बाबत कोई कठोर कानून बनेगा जो लोगों की कमजोरियों का फायदा तरहतरह के विज्ञापन दे कर खुलेआम उठाते हैं. बेहतर तो यह होगा कि मोटे लोग वजन कम करने वाले चमत्कारी विज्ञापनों के चक्कर में पड़़ने के बजाय व्यायाम और खानपान पर ध्यान दें.

VIDEO : सर्दी के मौसम में ऐसे बनाएं जायकेदार पनीर तवा मसाला…नीचे देखिए ये वीडियो

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

जेल गार्डनिंग

बिहार के महाचर्चित चारा घोटाले का समापन राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को साढे़ 3 साल की सजा के साथ हुआ जिन्हें हजारीबाग जेल में मालीगिरी का काम सौंपा गया है. अब लालू साढ़े 3 साल जेल की बगिया संजोते क्यारियां बनाएंगे, सागसब्जी और फलफूल लगाएंगे और फिर निराईगुड़ाई भी करेंगे जिस से फसल में खरपतवार न उगे. इन्हीं खरपतवारों में से एक घास भी होती है जिसे चारे के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

भा जाए तो जेल गार्डनिंग भी किचन गार्डनिंग की तरह रुचिकर काम है जिस में माली अपने रोपे पौधों को रोज बढ़ते देख खुश होता है. फिर लालू को तो इस बाबत 93 रुपए रोज की दिहाड़ी भी मिलेगी. इस मेहनताने का वे एक अलग सुख भोगेंगे. बस, वे यह ध्यान रखें कि अब कैसे भी हो, चारा न उग पाए और हाईकोर्ट उन्हें रहम खा कर जमानत दे दे.

VIDEO : सर्दी के मौसम में ऐसे बनाएं जायकेदार पनीर तवा मसाला…नीचे देखिए ये वीडियो

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

आध्यात्मिक राजनीति

जमाना अब ब्रैंडेड राजनीति का है. कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी प्यार की राजनीति पर जोर दे रहे हैं तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पूर्वोत्तर राज्यों की हिंसा के कीचड़ में कमल खिलने का सपना देख रहे हैं. तीसरे किस्म की जो राजनीति तमिल अभिनेता रजनीकांत करने जा रहे हैं वह आध्यात्मिक राजनीति होगी.

यह आध्यात्म क्या बला होती है, यह आज तक न कोई ढंग से समझ पाया और न ही कोई समझा पाया. अब इस में राजनीति की छौंक रजनीकांत ने लगा दी, तो लगता है प्रयोगवादी राजनीति के इस नए दौर में नेता भी भगवान को पाने की बात करने लगे हैं. तमिलनाडु की राजनीति द्रविड़ आंदोलन की गोद में पलीबढ़ी है जो मूलतया अनीश्वरवादी है. अब रजनीकांत इस में ईश्वरवाद भी घुसाने का जोखिम उठा रहे हैं तो तय है परदे के पीछे कोई और भी है. जब परदा पूरी तरह उठेगा तभी पता चलेगा कि आध्यात्मिक राजनीति के माने क्या होते हैं.

VIDEO : सर्दी के मौसम में ऐसे बनाएं जायकेदार पनीर तवा मसाला…नीचे देखिए ये वीडियो

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

8 करोड़ का अंधविश्वास

छत्तीसगढ़ आदिवासी बाहुल्य होने के चलते ही गरीब राज्य माना जाता है. मुख्यमंत्री रमन सिंह के ठाटबाट कभी किसी सुबूत के मुहताज नहीं रहे. चुनावी साल में रमन सिंह ने नया कारनामा 16 पजेरो कारें खरीदने का कर दिखाया है जिन की कीमत 8 करोड़ रुपए है. एक सी दिखने वाली इन कारों का नंबर भी एकसा सीजी-02-एआर 0004 है.

सुरक्षा के लिहाज से खरीदी गईं इन बुलैटप्रूफ कारों को ले कर चर्चा है कि इन्हें एक तांत्रिक के कहने पर खरीदा गया और 0004 नंबर इसलिए रखा गया कि राज्य में भाजपा चौथी बार भी सत्ता में आए और रमन सिंह फिर से मुख्यमंत्री बनें.

छत्तीसगढ़ में इस साल सूखा पड़ा है और मनरेगा में मजदूरों को मजदूरी नहीं मिल रही. ऐसे में ये महंगी कारें गरीब आदिवासियों की नजरों में खटकते खतरे का संकेत हैं कि शौक इतनी बड़ी चीज का नहीं होना चाहिए.

VIDEO : सर्दी के मौसम में ऐसे बनाएं जायकेदार पनीर तवा मसाला…नीचे देखिए ये वीडियो

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

प्रदूषण की देन फेफड़ों का कैंसर

दिल्ली अब दुनिया की सब से अधिक प्रदूषित राजधानी हो गई है. इस का प्रदूषण स्तर चीन के बीजिंग को भी निरंतर पीछे छोड़ रहा है. प्रदूषण एक धीमा लेकिन पक्का हत्यारा है. आज के लोग जिन जहरीले तत्त्वों का सामना कर रहे हैं, वे लोगों के जीवनकाल को कई दिन या हफ्तों तक कम कर देंगे.

वायु प्रदूषण, कई स्वास्थ्य स्थितियों से जुड़ा हुआ है. विशेषरूप से फेफड़े के कैंसर से. एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, फेफड़े का कैंसर सभी तरह कैंसरों का 6.9 प्रतिशत है और पुरुषों व महिलाओं दोनों में कैंसर संबंधी मौतों में इस का योगदान 9.3 प्रतिशत है. हम में से हरेक के लिए समझना जरूरी है कि वायु प्रदूषण किस तरह से हमारे फेफड़ों और पूरे स्वास्थ्य पर प्रभाव डालता है.

फेफड़े के कैंसर के कारण

फेफड़े के ऊतकों में कोशिकाएं जब अनियंत्रित हो कर बढ़ने लगती हैं तब अंदर एक ट्यूमर बनने लगता है, जिसे फेफड़े कैंसर या लंग कार्सिनोमा कहते हैं. यह मैटास्टासिस प्रक्रिया से पास के ऊतकों या शरीर के अन्य भागों में फैल सकता है. कार्सिनोमा के 2 मुख्य प्रकार हैं : लघु कोशिका लंग कार्सिनोमा (एससीएलसी) और गैरलघु कोशिका लंग कार्सिनोमा (एनएससीएलसी).

lifestyle

अधिकांश मामलों में फेफड़ों के कैसर की वजह होती है लंबे समय तक धूम्रपान. हालांकि, धूम्रपान न करने वालों में भी इस का 10 से 15 प्रतिशत तक जोखिम रहता है. इस के अलावा, इस कंडीशन में योगदान देने वाले अन्य कारकों में जैनेटिक्स और वायु प्रदूषण के जरिए शरीर में पहुंचने वाले विभिन्न हानिकारक पदार्थ शामिल हैं. जिन के परिवार में पहले किसी को यह समस्या है या जिन्होंने पहले रेडिएशन थेरैपी ली है उन को भी इस स्थिति का जोखिम बना रहता है.

संकेत और लक्षण

एससीएलसी और एनएससीएलसी दोनों के लक्षण समान हैं और इन में प्रमुख हैं- बिगड़ी हुई खांसी, खांसते समय कफ में खून आना, छाती का दर्द जो खांसते या हंसते समय बढ़ जाता हो, सांस की तकलीफ, घरघराहट, कमजोरी व थकान, भूख की कमी और वजन घटना. कुछ लोगों को सांस के संक्रमण जैसे निमोनिया या ब्रोंकाइटिस का अनुभव हो सकता है. जब कैंसर फैलता है तो प्रभावित क्षेत्र के अनुसार लक्षण भिन्न होते हैं.

वायु प्रदूषण व फेफड़ों का कैंसर

आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में हर साल 3,000 मौतों के लिए वायु प्रदूषण जिम्मेदार है, यानी प्रतिदिन 8 मौतें. मानव स्वास्थ्य पर वायु प्रदूषण के प्रभाव बहुत जटिल होते हैं. इस का कारण यह है कि इस के विभिन्न स्रोत हैं, और प्रत्येक का हमारे स्वास्थ्य पर एक अलग प्रभाव होता है. वायु प्रदूषण तत्त्व फेफड़ों और श्वसन प्रणाली पर गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं. वे रक्त परिसंचरण प्रणाली में घुलमिल जाते हैं और शरीर में हर ओर पहुंचने लगते हैं. इस के अलावा, ये वायु प्रदूषक तत्त्व मिट्टी, पौधों और पानी में भी जमा हो सकते हैं, जिस से कैंसर से जुड़े जोखिम में वृद्धि हो सकती है.

जैविक प्रदूषक ज्यादातर एलर्जीकारक होते हैं जो अस्थमा, फीवर और अन्य एलर्जी रोगों का कारण हो सकते हैं. वाष्पशील कार्बनिक पदार्थ नाक और गले में जलन पैदा करते हैं. वे लंबे समय तक सिरदर्द, मतली, और बैलेंस में कमी का कारण बन सकते हैं और जिगर व शरीर के अन्य भागों को भी नुकसान पहुंचाते हैं. औद्योगिक तथा वाहन उत्सर्जन से निकलने वाली नाइट्रोजन औक्साइड, विशेषरूप से सर्दी में, बच्चों को सांस की बीमारियों के प्रति अतिसंवेदनशील बनाती है. कार्बन मोनोऔक्साइड हीमोग्लोबिन के साथ मिल कर औक्सीजन की क्षमता को कम कर सकती है. इस के अलावा, यह मस्तिष्क और हृदय के लिए भी हानिकारक है.

VIDEO : सर्दी के मौसम में ऐसे बनाएं जायकेदार पनीर तवा मसाला…नीचे देखिए ये वीडियो

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

स्मौग धूल, धूएं और धुंध का मिश्रण है. यह फेफड़ों और दिल दोनों के लिए बहुत खतरनाक है. सल्फर डाइऔक्साइड की उच्च मात्रा ब्रोंकाइटिस को बढ़ा सकती है.

डब्लूएचओ की इंटरनैशनल एजेंसी फौर रिसर्च औन कैंसर ने बाहरी वायु प्रदूषण को कार्सिनोजेन (कैंसर-कारक एजेंट) के रूप में वर्गीकृत किया है. यह अनुमान 5 महाद्वीपों से प्राप्त 1,000 से अधिक वैज्ञानिक कागजात और अध्ययनों का विश्लेषण कर के निकाला गया. प्रदूषित हवा में छोटे धूल कण होते हैं जिन्हें पर्टिकुलेट मैटर (पीएम) कहते हैं. यह बहुत छोटे ठोस कणों और तरल बूंदों, जो हवा में पाए जाते हैं तथा जोखिम पैदा करते हैं का एक संयोजन है.

पीएम 2.5 नामक सब से छोटे कण विशेषरूप से अत्यधिक हानिकारक हैं. सूक्ष्म होने के कारण वे आसानी से फेफड़े के टिश्यू में प्रवेश कर सकते हैं. पीएम 2.5 के कुछ स्रोतों में डीजल इंजन से निकलने वाला धुआं शामिल है. सर्दी में हालात और बदतर हो जाते हैं क्योंकि स्मौग के कारण इन कणों का फेफड़े के अंदर पहुंचना आसान हो जाता है. रेडोन एक रेडियोऐक्टिव गैस है, जो घर के अंदर जमा हो सकती है और जिस के संपर्क में आने पर फेफड़ों के कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है. हालांकि श्वसन तंत्र में प्रदूषकों के प्रवेश को रोकने के लिए नाक के बाल, बलगम और मैक्रोफेज जैसे रक्षा तंत्र मौजूद होते हैं परंतु ये तब विफल हो सकते हैं जब प्रदूषण का स्तर उच्च होता है.

घर के अंदर वायु प्रदूषण

वायु प्रदूषण का एक अन्य आम स्रोत धुआं घर के अंदर होता है जो कोयला जलाने से उत्पन्न होता है आमतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में खाना पकाने के दौरान. आंकड़े बताते हैं कि कोयले के धुएं के संपर्क में रहने वाली महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर का जोखिम दोगुना होता है. दुनियाभर में घरेलू वायु प्रदूषण के कारण लगभग 2.4 अरब लोगों के जीवन को खतरा है. इस कारण होने वाले लंग कैंसर से करीब 1.5 अरब लोगों की मृत्यु हो जाती है. शहरी क्षेत्रों में, इस के आम स्रोतों में शामिल हैं मच्छर भगाने वाली कौइल और सिगरेट का धुआं.

(लेखक पोर्टिया मैडिकल के मैडिकल डायरैक्टर हैं.)

क्या करें

कुछ ऐसे तरीके हैं जिन से वायु प्रदूषण को कम किया जा सकता है और फिर फेफड़ों के कैंसर की आशंका को भी कम किया जा सकता है. यह प्रयास व्यक्तिगत स्तर से शुरू होना चाहिए. जितना संभव हो, पैदल चलिए और साइकिल चलाइए. दिन में उस वक्त बाहर निकलें जब वायु प्रदूषण का स्तर सब से कम हो. मास्क पहन कर चलना हो तो एन95 वाला मास्क चुनें क्योंकि वह अधिक छोटे कणों को फेफड़ों में प्रवेश करने से रोक सकता है.

एक अन्य तरीका यह है कि उन क्षेत्रों से दूर रहें जहां वायु की गुणवत्ता बहुत अच्छी नहीं है. यह आवश्यक है कि सरकार और स्थानीय अधिकारी एक व्यापक रणनीति विकसित करने के लिए एकसाथ काम करें ताकि वायु प्रदूषण से होने वाले खतरों, जैसे कि लंग कैंसर, को कम किया जा सके.

सर्विकल कैंसर

महिलाओं को प्रभावित करने वाले सभी कैंसरों में सर्विकल कैंसर भारत में कैंसर संबंधी मौतों का दूसरा सब से आम कारण है. यह मुख्यतया ह्यूमन पैपिलोमा वायरस या एचपीवी के कारण होता है. यह एक ऐसी स्थिति है जो मुख्यतया गर्भाशय ग्रीवा यानी सर्विक्स की परत, या गर्भाशय के निचले हिस्से को प्रभावित करती है. यह कैंसर धीरेधीरे विकसित होता है और समय के साथ पूर्ण विकसित हो जाता है. कैंसर के कुछ लक्षणों में योनि से असामान्य रक्तस्राव, रजोनिवृत्ति या यौन संपर्क के बाद योनि से रक्तस्राव, मासिकधर्म की सामान्य से अधिक मात्रा या लंबी अवधि, असामान्य योनि स्राव, और यौनक्रिया के दौरान रक्तस्राव या दर्द प्रमुख हैं.

समय पर स्क्रीनिंग और रोग का पता लगाना सर्विकल कैंसर से मुकाबला करने के 2 महत्त्वपूर्ण पहलू हैं, क्योंकि यह पूरी तरह से इलाजयोग्य स्थिति है. इस के अलावा, महिलाओं को संक्रमण से बचने के लिए जीवनशैली में परिवर्तन करने चाहिए. इस में कई साथियों के साथ यौन संपर्क से बचाव, नियमित जांच, धूम्रपान का त्याग, फलों, सब्जियों व साबुत अनाज का सेवन और शरीर का वजन ठीक रखना प्रमुख कदम हैं.

(डा. नंदिता पलशेटकर, मैडिकल डायरैक्टर, ब्लूम आईवीएफ.)

कोलोरैक्टल कैंसर : बचाव के उपाय

कोलोरैक्टल कैंसर (सीआरसी) बड़ी आंत का कैंसर होता है. यह गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट का एक अलग हिस्सा होता है. बड़ी आंत की लगभग सभी कैंसर कोशिकाओं के छोटे गुच्छे या समूह के तौर पर बनने शुरू होते हैं, जिन्हें एडेनोमेटस पौलिप्स कहा जाता है. हालांकि, इन पौलिप्स को कैंसर में बदलने में काफी साल लग जाते हैं.

सीआरसी दुनियाभर में महिलाओं में होने वाला तीसरा और पुरुषों में चौथा सब से आम कैंसर है. हालांकि, दुनियाभर में भौगोलिक क्षेत्रों के आधार पर इस में अंतर देखा जाता है. आधे से अधिक सीआरसी के मामले विकसित देशों में देखे गए हैं, लेकिन स्वास्थ्य संसाधनों के अभाव की वजह से सीआरसी से होने वाली सर्वाधिक मौतें ज्यादातर अल्पविकसित देशों में होती हैं. भारत में ऐसे कैंसर के मामले समृद्ध पश्चिमी देशों की तुलना में करीब 7 से 8 गुना कम होते हैं, लेकिन पिछले कुछ दशकों से भारत में भी सीआरसी के मामले बढ़ रहे हैं.

लक्षण व संकेत

इस कैंसर के अभी तक कोई विशिष्ट लक्षण व संकेत नहीं मिले हैं. कुछ ऐसे लक्षण हैं जो इस बीमारी के संदेह को बढ़ाते हैं, जैसे कि मल में रक्त या आंव का आना, मलत्याग की आदतों में बदलाव (मलत्याग में कठिनाई, दस्त या कब्ज), लगातार पेट से संबंधित परेशानियां, जैसे दर्द, ऐंठन और अप्रत्याशित वजन का घटना, एनीमिया, थकान, आंत का अवरुद्ध होना, खासतौर पर वृद्धावस्था में.

VIDEO : सर्दी के मौसम में ऐसे बनाएं जायकेदार पनीर तवा मसाला…नीचे देखिए ये वीडियो

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

कारण

अधिकांश मामलों में यह स्पष्ट नहीं होता कि कोलोनिक कैंसर के क्या कारण हैं. क्रोलोन कैंसर वैसी स्थिति में होता है जब बड़ी आंत की लाइनिंग कोशिकाओं में आनुवंशिक ब्लूप्रिंट (डीएनए) में परिवर्तन होता है. आनुवंशिक परिवर्तन नए सिरे (अधिकांश मामलों में) से उत्पन्न हो सकते हैं. यह जन्मजात और परिवार से आनुवंशिक तौर पर भी हो सकता है. ये जन्मजात जीन म्यूटेशंस कैंसर का अपरिहार्य कारण नहीं बनते हैं लेकिन कैंसर के खतरे को काफी बढ़ा देते हैं.

जोखिम बढ़ाने वाले जन्मजात कैंसर सिंड्रोम के आम रूप हैं : एचएनपीसीसी (वंशानुगत गैर पौलीपोसिस कोलोरैक्टल कैंसर सिंड्रोम) एफएपी (फैमिलिया एडेमोनेटस पौलीपोसिस). आहार में कम फाइबर, ज्यादा रैड मीट व कैलोरी के सेवन, धूम्रपान, आरामतलब जीवनशैली और वजन का बढ़ना आमतौर पर कोलोनिक कैंसर के प्रमुख कारण होते हैं.

अन्य कारक जो कोलोनिक कैंसर की आशंका को बढ़ाते हैं, उन में 50 वर्ष से अधिक आयु, अफ्रीकी-अमेरिकन नस्ल, कोलोरैक्टल कैंसर या पौलिप्स का व्यक्तिगत इतिहास, आंत में सूजन, जैसे अल्सरेटिव कोलाइटिस और आंत से जुड़ी बीमारियां, मधुमेह, मोटापा, कैंसर के बाद कराई गई रैडिएशन थेरैपी आदि शामिल हैं.

जांच है जरूरी

अधिकांश सीआरसी पौलिप्स के कई वर्षों में धीरेधीरे कैंसर में तबदील होने की वजह से होते हैं. ऐसे में इस कैंसर को रोकने या जल्द पता लगाने के लिए जांच करना तार्किक है. स्क्रीनिंग या जांच कार्यक्रम में आसान जांच के साथ स्वस्थ व्यक्तियों की बड़ी आबादी शामिल होती है. इस से प्रारंभिक चरण में या कैंसर के पूर्व स्तर पर बीमारी का पता लगाने में मदद मिलती है, जिस से रोग की मृत्युदर कम हो सकती है.

सीआरसी की जांच में व्यापक आबादी के बीच नौन इन्वैसिव स्टूल टैस्ट और इन्वैसिव कोलोनोस्कोपिक टैस्ट्स के साथ संगठित स्क्रीनिंग कार्यक्रम शामिल हैं. स्टूल टैस्ट (मल जांच) की स्क्रीनिंग में रक्त की मात्रा की जांच की जाती है. सामान्य जांच हैं-गुआयाक फीकल औकल्ट ब्लड टैस्ट (जीएफओबीटी) और फीकल इम्यूनोकैमिकल टैस्ट (एफआईटी).

वर्तमान सुझावों के आधार पर सीआरसी जांच में फीकल औकल्ट ब्लड का पता लगाने के लिए एफआईटी को पहला विकल्प बताया गया है और इस के लिए खानेपीने की पाबंदी की जरूरत नहीं होती है तथा यह ज्यादा संवेदनशील परीक्षण है. अन्य नौनइन्वैसिव तकनीक भी उपलब्ध हैं, जैसे कि फीकल डीएनए एनालिसिस. ये परीक्षण एडेनोमा और कोलोरैक्टल कैंसर कोशिकाओं में मौलीक्यूलर परिवर्तन की पहचान करते हैं. हालांकि, ज्यादा लागत होने की वजह से इन परीक्षणों का उपयोग कम किया जाता है.

फीकल परीक्षण के बाद सिगमोएडोस्कोपी और कोलोनोस्कोपी जैसी इन्वैसिव जांच से पौलिप्स और कैंसर का पता लगाने के साथ ही साथ तुलनात्मक रूप से शुरुआती अवस्था में उसे हटा सकते हैं. इस के स्पष्ट प्रमाण हैं कि दीर्घावधि में फौलोअप जांच के दौरान कोलोनोस्कोपी कोलोनिक कैंसर से होने वाली मृत्युदर में कमी आई है. लेकिन इस के सुखद अनुभव नहीं होने की वजह से आम आबादी फीकल टैस्ट्स को तरजीह देती है और फीकल टैस्ट के पौजिटिव आने के बाद ही कोलोनोस्कोपी कराई जाती है.

हो सकता है नियंत्रण

कैंसर की रोकथाम का कोई निश्चित तरीका नहीं है लेकिन कुछ उपाय हैं जिन्हें अपना कर कैंसर के जोखिम को कम किया जा सकता है.

– वजन को कम रखें और खासतौर पर कमर के चारों ओर वजन बढ़ाने से बचें.

– तेज चलने और गहन व्यायाम द्वारा शारीरिक गतिविधियों को बनाए रखें.

– फलों और सब्जियों का ज्यादा मात्रा में सेवन करें, लेकिन ज्यादा कैलोरी, रैडमीट या प्रौसेस्ड मीट के सेवन से परहेज करें.

– अल्कोहल और सिगरेट का सेवन कतई न करें.

– हालांकि यह वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध नहीं है लेकिन फिर भी कैल्शियम, मैग्नीशियम व विटामिन डी निवारक हो सकते हैं.

– अध्ययनों में पाया गया है कि जो लोग एस्प्रिन और अन्य इन्फ्लेमेटरी दवाइयों, जैसे आईब्रूफेन और नैप्रोक्सिन का सेवन करते हैं, उन्हें आंत का कैंसर या पौलिप्स होने का खतरा कम रहता है.

(लेखक फोर्टिस अस्पताल, शालीमार बाग, दिल्ली  में डायरैक्टर जीआई एवं औंको सर्जन हैं.)

मूत्राशय कैंसर पर कसें लगाम

कैंसर एक गैरसंक्रामक रोग है जो भारतीयों को बड़े पैमाने पर अपनी गिरफ्त में ले रहा है. आंकड़े बताते हैं कि औसतन 1,300 से अधिक भारतीय प्रतिदिन इस खतरनाक बीमारी से मर जाते हैं.

एक अनुमान है कि वर्ष 2020 तक इस बीमारी के मामले 25 प्रतिशत तक बढ़ जाएंगे. जितनी भी किस्म के कैंसर हैं, उन में ब्लैडर कैंसर दुनियाभर में हर साल लगभग 3,30,000 लोगों को प्रभावित करता है. यद्यपि ब्लैडर यानी मूत्राशय कैंसर के शिकार 50 प्रतिशत लोग धूम्रपान करने के कारण इस अवस्था में पहुंचते हैं, परंतु धूम्रपान न करने वालों के लिए भी जोखिम बराबर है. यह कैंसर महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में अधिक होता है क्योंकि वे कैंसर पैदा करने वाले रसायनों के अधिक संपर्क में रहते हैं और आंतरिक रूप से भी वे अधिक संवेदनशील होते हैं.

क्या है मूत्राशय का कैंसर

मूत्राशय का कैंसर या ब्लैडर कैंसर तब होता है जब मूत्राशय में कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं. कैंसर कोशिकाओं के अधिक होने पर ट्यूमर बन सकता है जो शरीर के अन्य क्षेत्रों में फैल सकता है. यह मूत्राशय की अंदरूनी परत से शुरू होता है और आखिरकार गहरी परतों पर आक्रमण कर सकता है. यह कई बार लंबे समय तक म्यूकोसा तक सीमित रह सकता है. यह कैंसर आकार में छोटा हो सकता है या नोड्यूल के रूप में दिखाई दे सकता है.

मूत्राशय कैंसर के प्रकार

मूत्राशय के कैंसर के कुछ सामान्य प्रकार अग्रलिखित हैं-

VIDEO : सर्दी के मौसम में ऐसे बनाएं जायकेदार पनीर तवा मसाला…नीचे देखिए ये वीडियो

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

ट्रांसीजनल सैल कार्सिनोमा :  यह मूत्राशय की अंदरूनी कोशिकाओं में होता है. ये कोशिकाएं ब्लैडर भरे होने पर फैलती हैं और उस के खाली होने पर सिकुड़ती हैं. चूंकि ये कोशिकाएं मूत्रमार्ग और उस के अंदर भी फैलती हैं, इसलिए ये वहां भी ट्यूमर बना सकती हैं.

ब्लैडर का अडिनोकार्सिनोमा :  सभी ब्लैडर कैंसर में इस तरह का कैंसर लगभग 1 से 2 प्रतिशत तक होता है. इस तरह के कैंसर वाले लोग लंबे समय तक सूजन व जलन से परेशान रहते हैं.

स्क्वैमस सैल कार्सिनोमा :  इस तरह का ब्लैडर कैंसर भी लगभग 1 से 2 प्रतिशत ही होता है. इस प्रकार के लोग लंबे समय तक संक्रमण, सूजन, और जलन का अनुभव करते हैं.

मूत्राशय कैंसर के कुछ अन्य

दुर्लभ रूप हैं- छोटे सैल कैंसर (न्यूरोएंड्रोक्राइन कोशिकाओं में उत्पन्न), फियोक्रोमोसाइटोमा (दुर्लभ), और सारकोमा (मांसपेशियों के ऊतक में).

लक्षण और जोखिम कारक

कुछ लक्षण हैं जो थकान, वजन घटने, और हड्डियां कमजोर होने का संकेत दे सकते हैं. हालांकि, निम्न लक्षणों वाले लोग सावधान रहें और जांच करवाएं-मूत्र में रक्त आना, मूत्रत्याग के समय दर्द होना, लगातार मूत्र आना, पेट में दर्द और निचले हिस्से में दर्द होना.

पुरुषों और महिलाओं में ब्लैडर कैंसर का 50 प्रतिशत खतरा तो धूम्रपान के कारण होता है. अन्य जोखिम कारकों में कैंसर पैदा करने वाले रसायन, क्रोनिक ब्लैडर इन्फैक्शन, तरल पदार्थों का कम सेवन, उम्र, अधिक फैट वाले आहार का सेवन, मूत्राशय के कैंसर का पारिवारिक इतिहास, कुछ कीमोथेरैपी दवाओं के साथ पहले कभी उपचार या इलाज के लिए पहले कभी रेडिएशन थेरैपी प्रयोग आदि प्रमुख हैं.

ब्लैडर कैंसर के चरण

मूत्राशय कैंसर के 4 चरण होते हैं-

स्टेज 1 : इस स्तर पर कैंसर मूत्राशय की अंदरूनी परत में होता है, लेकिन मस्कुलर ब्लैडर वौल में अभी उस का आक्रमण नहीं हुआ है.

स्टेज 2 :  इस स्तर पर कैंसर मूत्राशय की दीवार पर आक्रमण कर चुका होता है लेकिन अभी भी मूत्राशय तक ही सीमित है.

स्टेज 3 :  कैंसर कोशिकाएं मूत्राशय की दीवार के माध्यम से आसपास के ऊतकों तक फैल गई हैं. वे पुरुषों में प्रोस्टेट और महिलाओं में गर्भाशय या योनि तक फैल सकती हैं.

स्टेज 4 :  इस स्तर तक, कैंसर कोशिकाएं लिंफ नोड्स और अन्य अंगों तक फैल सकती हैं, जैसे कि फेफड़े, हड्डियों या लिवर तक.

क्या है जांच

एक बार लक्षण स्पष्ट होने के बाद, डाक्टर से परामर्श करना और उचित जांच कराना महत्त्वपूर्ण है. मूत्राशय के कैंसर का निदान विभिन्न प्रक्रियाओं के माध्यम से किया जा सकता है.

सिस्टोस्कोपी : इस प्रक्रिया में एक बारीक ट्यूब मूत्रमार्ग के माध्यम से डाली जाती है. सिस्टोस्कोप में लैंस और फाइबर औप्टिक प्रकाश से डाक्टर मूत्रमार्ग और मूत्राशय के अंदर देख सकते हैं.

बायोप्सी :  सिस्टोस्कोपी के दौरान डाक्टर परीक्षण के लिए एक सैल का नमूना (बायोप्सी) एकत्र करने के लिए मूत्राशय में एक विशेष टूल पास करते हैं. मूत्राशय के कैंसर का इलाज करने के लिए भी इस प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है.

मूत्र कोशिका विज्ञान :  इस प्रक्रिया में कैंसर कोशिकाओं की जांच के लिए एक माइक्रोस्कोप के नीचे मूत्र का विश्लेषण किया जाता है.

इमेजिंग टैस्ट  :  ये परीक्षण मूत्रमार्ग की बनावट की जांच करने में सहायता करते हैं.

उपचार और निवारण

मूत्राशय कैंसर के उपचार के विकल्प पर निर्भर करता है कि कैंसर कितना फैल चुका है और क्या व्यक्ति को किसी अन्य तरह की परेशानी भी है. कुछ उपचार विकल्प इस प्रकार हैं-

सर्जरी :  इस स्थिति के लिए सब

से सामान्य सर्जरी मूत्राशय ट्यूमर का ट्रांसयूरेथ्रल रिसैक्शन है. हालांकि, यह प्रारंभिक अवस्था में ही संभव है. व्यक्ति सर्जरी के बाद उसी दिन घर वापस जा सकता है.

सिस्टेक्टोमी :  इस प्रकार की सर्जरी में मूत्राशय के एक भाग या पूरे ही अंग को निकाल दिया जाता है.

इंट्रोवेसिकल थेरैपी : इसे प्रारंभिक चरण के कैंसर का इलाज करने के लिए प्रयोग किया जाता है. मूत्राशय में एक तरल दवा के इंजैक्शन के लिए एक कैथेटर का उपयोग किया जाता है.

रेडिएशन थेरैपी :  कैंसर कोशिकाओं को खत्म करने के लिए उच्च ऊर्जा वाले रेडिएशन का प्रयोग कर के रेडिएशन थेरैपी की जाती है.

मूत्राशय के कैंसर को रोका तो नहीं जा सकता, लेकिन जोखिम कम करने के लिए कुछ कदम जरूर उठाए जा सकते हैं. इन में से कुछ इस प्रकार हैं-

धूम्रपान न करें :  यह मूत्राशय के कैंसर के जोखिम को कम करने के लिए सब से प्रभावी कदमों में से एक है.

कैमिकल : हानिकारक रसायनों के संपर्क में आने से बचें.

पानी अधिक पिएं : खुद को हाइड्रेटेड रखने के लिए खूब पानी पीना चाहिए ताकि मूत्र में केंद्रित किसी भी जहरीले पदार्थ को कम करने में मदद मिले.

खानपान : फलों और सब्जियों का अधिक सेवन करें. इन में एंटीऔक्सिडैंट होते हैं जो कैंसर से लड़ने व जोखिम को कम करने में मदद कर सकते हैं.

मूत्राशय के कैंसर पर शोध जारी है और इस रोग को रोकने, इस का पता लगाने, निदान करने और इस का इलाज करने के नए तरीके तलाशे जा रहे हैं. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि मूत्राशय के कैंसर या किसी भी अन्य प्रकार के कैंसर वाले लोगों के जीवन में बेहतर गुणवत्ता लाई जा सके और इस रोग से मृत्यु की संभावना को कम किया जा सके.

(लेखक क्लिनिकल एडवाइजरी बोर्ड, हैल्दी के प्रमुख हैं.)

औरतों की आह

अमेरिका की अश्वेत टीवी आइकन ओपरा विनफ्रे ने हौलीवुड के गोल्डन ग्लोब अवार्ड कार्यक्रम में अपनी 8 मिनट की स्पीच में औरतों के यौनशोषण पर खुली बात कर के ‘मी टू’ आंदोलन को एक नई दिशा दी है. कैरियर की शुरुआत में अभिनेत्रियों को ही नहीं, दूसरे बहुत से क्षेत्रों में भी स्मार्ट, सुंदर युवतियों को अपना शरीर सौंपना पड़ता है ताकि उन की राह में पुरुष रोक न लगाएं. हौलीवुड के प्रसिद्ध, अतिसफल निर्देशकनिर्माता हार्वे विंसटीन का भंडाफोड़ पिछले अक्तूबर में एक अभिनेत्री मीरा सैरविनो ने किया था और उस के बाद लगभग 80 युवतियां कह चुकी हैं ‘मी टू’ यानी मैं भी शिकार रही हूं.

गोल्डन ग्लोब अवार्ड कार्यक्रम के दौरान बहुत सारी अभिनेत्रियां, नायिकाएं व फिल्मों व टीवी से जुड़ी अन्य हस्तियों ने यौनशोषण के खिलाफ विरोध करने के लिए काली पोशाकें पहनी थीं.

सफलता के लिए आदमी को लैंगिक मर्दानगी साबित करने की आवश्यकता नहीं होती तो औरतों को क्यों करनी पड़े, यह सवाल स्वाभाविक है. मर्दों को सैकड़ों औरतों के साथ संबंध बनाने की छूट है पर घर से निकली औरत को पहले ही कदम पर यौनअर्पण के लिए मजबूर कर दिया जाता है.

बहुत से क्षेत्रों में, केवल शो बिजनैस में ही नहीं, औरतों को सफलता पाने के लिए अपने को सभी मर्दों की साझी संपत्ति घोषित करना होता है और यह साजिश है कि पत्नी कुंआरी ही हो, ताकि सफल औरतें पत्नी ही न बनें.

औरतों को उन से यौन संबंध बनाने होते हैं जिन से प्यार ही नहीं होता. नतीजा यह होता है कि इन औरतों की प्रेमग्रंथि को पहले ही मसल दिया जाता है. सैकड़ों युवतियों को कुरबानी देनी होती है. ओपरा विनफ्रे जैसा नाम थोड़ी सी महिलाओं को ही को मिलता है.

क्या गोल्डन ग्लोब अवार्ड फंक्शन में इस का खुला विरोध कुछ बदलाव लाएगा? शायद नहीं. 150-200 वर्षों की तार्किक सोच, शिक्षा, औरतों के नए अवसरों के बावजूद अभी तक समाज पुरुषसत्तात्मक ही बना हुआ है और जिस देश में धर्म जितना हावी है वहां उतना ज्यादा अत्याचार होता है. औरतें जीवनभर गाय की तरह गुलाम बनी रहती हैं, दूध देती हैं, बछड़े पैदा करती हैं और खूंटे पर बंधीबंधी मर जाती हैं.

VIDEO : सर्दी के मौसम में ऐसे बनाएं जायकेदार पनीर तवा मसाला…नीचे देखिए ये वीडियो

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

मोहब्बत

बरसों से तलाश थी जिस मोहब्बत की

आज टकराई कहीं जाके

खुशी से फूले नहीं समा रहा था मैं

पर खुशी काफूर हुई शीशे के सामने आके

उम्र का एहसास इस से पहले तो

नहीं करवाया जिंदगी ने

आज जब मोहब्बत खिली तो

जिंदगी खड़ी थी उम्र को लाके

अब हिम्मत कहां से लाऊं ओ जान

परवाना बन के कैसे जाऊं तू बता

अब इंतजार है

कब तू समझे आंखों की जबां

वरना यों ही कट जाएगी

जिंदगी तुझ पर होके कुरबान.

– स्मृति भोला

VIDEO : सर्दी के मौसम में ऐसे बनाएं जायकेदार पनीर तवा मसाला…नीचे देखिए ये वीडियो

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

 

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें