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पृथ्वी के बाद विराट और जडेजा के शतक

राजकोट में खेले जा रहे पहले टेस्ट मैच में सलामी बल्लेबाज पृथ्वी शौ के शानदार 134 रनों की बदौलत भारत ने मेहमान टीम वेस्टइंडीज के खिलाफ शिकंजा कस लिया था, रही सही कसर कप्तान विराट कोहली और हरफनमौला खिलाड़ी रविंदर जडेजा की उम्दा बल्लेबाजी ने पूरी कर दी.

विराट कोहली ने 139 रन बनाए. यह उन का 24वां शतक था. वे डौन ब्रेडमैन के बाद सब से तेजी से 24 टेस्ट शतक पूरे करने वाले बल्लेबाज बन गए हैं, जबकि रविंदर जडेजा ने अपने होम ग्राउंड पर नाबाद 100 रनों की पारी खेली. टेस्ट मैचों में यह उन का पहला शतक है.

इस के अलावा चेतेश्वर पुजारा की 86 रनों और ऋषभ पंत की 92 रनों की अच्छी पारी की बदौलत भारत ने 9 विकेट पर 649 रन बना कर पारी घोषित कर दी. भारत ने ये रन 149.5 ओवरों में 4.33 की बड़ी तेज औसत से बनाए हैं.

विराट कोहली का रिकौर्ड

189 गेंदों पर अपना शतक बनाने वाले विराट कोहली ने कुल 139 रन बनाए. यह उन का 72 टेस्ट मैचों में 24वां शतक है. वे वीरेंद्र सहवाग के 23 टेस्ट शतकों से आगे निकल गए हैं.

कप्तान के रूप में 17वां शतक जमाने वाले विराट ने घरेलू मैदान पर 3000 रन भी पूरे किए. इतना ही नहीं, उन्होंने तीसरे कैलेंडर ईयर में 1000 टेस्ट रन पूरे किए हैं. ऐसा करने वाले वे पहले भारतीय बल्लेबाज हैं, जबकि दुनिया के छठे बल्लेबाज हैं.

एप्पल और अमेजन समेत 30 कंपनियों की जासूसी कर रहा चीन

समय समय पर चीन पर दुनिया के कई सरकारी और निजी संस्थाओं की जासूसी के आरोप लगते रहे हैं. कई बार चीन ने साइबर अटैक, हैकिंग, मालवेयर अटैक जैसे तमाम तरह के कृत्रिम हमलों से दुनिया को हैरान किया है. पर अब चीन के निशाने पर दुनिया की सबसे बड़ी टेक् कंपनियां हैं. खबर है कि चीन अब एप्पल और अमेजन समेत 30 कंपनियों की जासूसी कर रही है. रिपोर्ट में ये भी कहा जा रहा है कि मेड इन चाइना कंप्यूटरों और सर्वर से चीन एफबीआई की भी जासूसी कर रही है.

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में ये बात सामने आई है कि चीनी कंपनियों ने मदरबोर्ड में बेहद छोटे माइक्रोचिप्स का इस्तेमाल किया है. इन मदरबोर्ड्स को एप्पल और अमेजन समेत 30 अमेरिकी कंपनियां इस्तेमाल कर रही हैं. इस पड़ताल में ये बात स्पष्ट तौर पर सामने आई है कि अमरिकी कंपनियों पर ये अब तक का सबसे बड़ा हमला है. ये बात सबसे पहले 2015 में सामने आई, जिसके बाद एप्पल और अमेजन ने चीनी कंपनी से अपनी पार्टनरशिप खत्म कर ली थी. हालांकि चीनी सरकार इस तरह के आरोपों से इंकार कर रही है.

डायबिटीज मरीजों में बढ़ रहा है कैंसर का खतरा

अगर आप डायबिटीज मरीज हैं तो ये खबर आपके लिए जरूरी है. हाल ही में हुए शोध में ये बात सामने आई कि डायबीटिज यानी मधुमेह के मरीजों में कैंसर के होने की संभावना बढ़ जाती है. स्वीडिश नेशनल डायबिटीज रजिस्टर (SNDR) ने अपने शोध के बाद दुनिया भर के लोगों को सेहत के प्रति सजग रहने के लिए आगाह किया है.

SNDR के शोधकर्ताओं ने ये बताया है कि डायबिटीज मरीजों में कैंसर की संभावना बढ़ रही है. इसके साथ ही व्यक्ति की उम्र भी काफी कम हो जाती है. इन मरीजों में आम लोगों के मुकाबले कोरेलेक्टल कैंसर का खतरा बढ़ जाता है, वहीं महिला मरीजों में स्तन कैंसर की संभावना भी बढ़ जाती है.

इस अनुसंधान का नेतृत्व करने वाले जोर्नस्डोटिर ने कहा कि उनका शोध इस बात की पुष्टि नहीं करता कि सभी डायबिटीज मरीजों को कैंसर का खतरा है. बल्कि उनके शोध में ये बात सामने आई कि पिछले 30 साल में ‘टाइप 2 डायबिटीज’ से पीड़ितों की संख्या बढ़ी है जो उनके अध्ययन में इसके देखभाल के महत्व पर जोर देता है. डायबीटिज केवल भारत ही नहीं दुनिया भर के लोगों के लिए चुनौती है.

दिल्ली हाईकोर्ट ने सुहैब इलियासी को पत्नी की हत्या के मामले में किया बरी

दिल्ली हाईकोर्ट ने पूर्व टीवी एंकर, निर्माता सुहैब इलियासी को उन की पत्नी अंजू इलियासी की हत्या के मामले में बरी कर दिया है. जस्टिस एस मुरलीधर और विनोद गोयल की बेंच ने इलियासी की अपील पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया है.

उम्रकैद की सजा मिली थी

मालूम हो कि क्राइम टीवी शो ‘इंडियाज मोस्ट वांटेड’ के ऐंकर रह चुके इलियासी को दिल्ली की एक निचली अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. सुहैब की गिरफ्तारी के बाद उनको आईपीसी की धारा 304बी (दहेज हत्या) सहित कुछ हलकी धाराओं के तहत आरोपित किया गया था.

बाद में सुहैब पर हत्या का मामला चलाने के लिए अंजू की बहन और मां ने मांग की थी. मगर ट्रायल कोर्ट ने उन की इस मांग को खारिज कर दिया था.

अंजू की मां और बहन ने सुहैब पर लगाए थे आरोप

अंजु की मां रुकमा सिंह और बहन रश्मि सिंह ने इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. इस पर अगस्त 2014 में आदेश दिया कि सुहैब पर आईपीसी की धारा 302 के तहत हत्या का मुकदमा चलाया जाए.

20 दिसंबर, 2017 को सुहैब इलियासी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी. मगर दिल्ली हाईकोर्ट की एक बेंच में चली सुनवाई के बाद कोर्ट ने सुहैब को बरी कर दिया.

क्या फिर से वापसी करेंगे

एक समय सुहैब टीवी की दुनिया का एक जानामाना नाम थे. क्राइम रिपोर्ट पर आधारित सीरियल ‘इंडियाज मोस्ट वांटेड’ को दर्शकों की अच्छी खासी रिस्पांस मिली थी. पर जब सुहैब शोहरत की बुलंदियों पर थे कि तभी उनकी पत्नी अंजू की संदिग्ध परिस्थिति में मौत हो गई थी. अंजू की मां और बहन ने सुहैब पर हत्या के आरोप लगाए थे.

 

आदिवासी राजनीति का फिल्मी कनेक्शन

तारीखों की घोषणा के पहले ही मध्यप्रदेश में चुनाव प्रचार ज़ोर पकड़ने लगा है इधर बड़े राजनैतिक दल स्टार प्रचारकों की सूची बना रहे हैं कि कब किसे कहां बुलाया जाना कारगर रहेगा लेकिन आदिवासियों के तेजी से उभरते दल “जय आदिवासी युवा शक्ति” यानि जयस ने फिल्म अभिनेता गोविंदा को बुलाकर दोनों प्रमुख दलों भाजपा और कांग्रेस की चिंताओं में और इजाफा कर दिया है.

politics govinda promotes tribal party jayas

जयस प्रमुख डाक्टर हीरालाल अलावा ने गांधी जयंती पर पार्टी लांच पर गोविंदा को आमंत्रित किया तो व्यक्तिगत सम्बन्धों को निभाते गोविंदा निमाड इलाके के कस्बे कुक्षी पहुँच भी गए जहां आमतौर पर लोग कोई वजह न हो तो जाने से कतराते हैं.

कुक्षी में हजारों की तादाद में जमा आदिवासियों ने खासतौर से उनके लिए आए गोविंदा को रूबरू देखा तो गोविंदा भी भीड़ देख हैरान थे. कभी मुंबई से कांग्रेस के सांसद रहे गोविंदा के भीतर का नेता बेहद जज्बाती होकर बोला आप लोगों का प्यार देखकर अभिभूत हूं.

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हालांकि राजनीति को अलविदा कह चुके इस हीरो ने सियासी बातों से परहेज ही किया लेकिन जयस की धमाकेदार एन्ट्री में जरूर उन्होने जान फूंक दी. इस मौके पर उन्होंने आदिवासी परम्परा के प्रतीक तीर कमान भी हाथ में उठाया.

गौरतलब है कि जयस 80 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारने का एलान कर चुकी है और किसी पार्टी से समझौता या गठबंधन की बात भी नकार चुकी है. सियासी हल्कों और गलियारों में अब इस बात की चर्चा ज्यादा है कि वह भाजपा और कांग्रेस में से किसे ज्यादा नुकसान पहुंचाएगी. राजनैतिक विश्लेषकों के हिसाब किताब से परे खुद हीरालाल अलावा यह मानने में संकोच नहीं करते कि जयस भाजपा का ज्यादा नुकसान करेगी.

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आक्रामक रुख अख़्तियार किए जयस मुखिया का कहना है कि आजादी के 70 सालों बाद भी किसी ने आदिवासियों के भले के लिए कुछ नहीं किया है. बक़ौल हीरालाल अलावा जयस के मुद्दे बेहद साफ हैं और हर कोई देख और समझ रहा है कि आदिवासी इलाकों में शिक्षा और स्वास्थ सेवाओं की हालत बद से बदतर है. 10 राज्यों के कोई 10 लाख आदिवासी युवा जयस से जुड़ चुके हैं जिन्होंने नारा दिया है “इस बार आदिवासी सरकार”.

लेकिन क्या ऐसा हो पाएगा इस पर हीरालाल अलावा कहते हैं क्यों नहीं हो सकता अब तक सभी राजनैतिक पार्टियां आदिवासियों का इस्तेमाल भर करती रहीं हैं लेकिन अब जयस के बैनर तले आदिवासी एकजुट हो रहा है. युवा आदिवासियों को पांचवी अनुसूची के माने भी समझा रहे हैं और उन्हें यह भी बता रहे हैं कि एक नपीतुली साजिश के तहत उन्हें हिंदु करार दिया दिया जाता है. आदिवासी प्रकृति उपासक हैं और उनकी सहजता व मौलिकता कभी किसी सबूत की मोहताज नहीं रही. आदिवासी संस्कृति से खिलवाड़ के षड्यंत्र अब सफल नहीं होने दिये जाएंगे. इसके लिए जरूरी है कि आदिवासी अपने मौलिक अधिकार पहचानें और राजनीति में ताकत बनकर उभरें.

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इसमें कोई शक नहीं कि जयस की धमक से भाजपा ज्यादा चिंतित है क्योकि उसे आदिवासी इलाकों से खासे वोट और सीटें मिलने लगीं थीं. पांच सालों से जमीनी मेहनत कर रहे हीरालाल अलावा बेहद पेशेवर अंदाज से पेश आ रहे हैं. जल्द ही जयस के प्रचार अभियान में दो और दिग्गज अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती और नाना पाटेकर भी नजर आएंगे और कुछ वामपंथी विचारक भी सक्रिय हो सकते हैं.

देखना दिलचस्प होगा कि एम्स जैसे नामी संस्थान से नौकरी छोडकर घर वापस आए हीरालाल अलावा अपने मकसद में कितने कामयाब हो पाएंगे. अभी तक का कटु अनुभव तो यह रहा है कि आदिवासियों के नाम पर कई राजनैतिक दल और संगठन बने हैं लेकिन कुछ अपनी खुदगर्जी के चलते जेबें भर कर चलते बने तो कइयों को ईसाई मिशनरियों और आरएसएस जैसे संगठनो ने मिटाने में अहम रोल निभाया ऐसे में जोरदार शुरुआती रेस्पोंस हासिल कर चुके इस युवा डाक्टर के कंधों पर यह महती ज़िम्मेदारी होगी कि वह आदिवासियों की उम्मीदों पर खरा उतरे.

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बात जहां तक फिल्मी हस्तियों को बुलाकर प्रचार करने की है तो यह हक जयस को भी है ऐसा पहली बार हुआ है कि कोई नामी अभिनेता आदिवासियों की पार्टी के लिए राज्य में आया इससे आदिवासियों का जोश और बढ़ा ही है. उमड़ी भीड़ देखकर गोविंदा भी मौका नहीं चूके और उन्होने 12 अक्तूबर को प्रदर्शित होने जा रही अपनी फिल्म फ्राइडे का भी प्रमोशन कर डाला. भीड़ की मांग पर उन्होने ठुमके भी लगाए और अपनी पुरानी हिट फिल्मों के संवाद भी दोहराए.

एनडीए का मददगार हो जायेगा तीसरा मोर्चा

मायावती के तीसरे मोर्चे की अवधारणा विपक्षी एकजुटता की राह में सबसे बडा रोड़ा है. एक जैसी विचारधारा के बाद भी एक मंच पर खड़े न हो सकने की मजबूरी भाजपा की सबसे बडी ताकत बनेगी. ऐसे में मायावती विलेन साबित हो सकती है. मायावती तीसरे मोर्चे की पंसद तभी बन सकती है जब बसपा दूसरे नम्बर की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर सकेगी.

कहने के लिये भले ही तीसरा मोर्चा भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए यानि राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा की खिलाफत कर रहा हो पर असल में वह विपक्ष की एकता में बाधक होगा. जिसके परिणामस्वरूप कांग्रेस की अगुवाई वाला यूपीए यानि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन कमजोर होगा. देश की राजनीति में गैर भाजपा और गैर कांग्रेस की अवधारणा कभी सफल विकल्प नहीं बन सकी.

ऐसे में एनडीए के खिलाफ होने के बाद भी तीसरा मोर्चा उसका मददगार होगा. लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकजुटता न होने से एनडीए के लिये लड़ाई सरल हो जायेगी. उसे सत्ता में पहुंचने से नहीं रोका जा सकता है. इसका साफ चुनावी गणित है. लोकसभा चुनाव के बाद संसद में सबसे बड़ी दो पार्टियों में अभी भी भाजपा और कांग्रेस का नाम ही रहता है. ऐसे में कोई भी मोर्चा इन दो दलों को दरकिनार नहीं कर सकता है.

क्षेत्रिय दलों में समाजवादी पार्टी, बसपा, तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी दल, शिवसेना और दक्षिण भारत के क्षेत्रिय दल अपने अपने इलाको के विधानसभा चुनाव में भले ही सरकार बनाने में सफल हो जाते हों पर  राष्ट्रीय स्तर पर उनका प्रदर्शन सरकार बनाने की गणित तक नहीं पहुंचता है.

क्षेत्रिय दलों में अपने अपने नेता अहम होते हैं. ऐसे में एकजुट होकर वह सरकार बनाने की हालत में नहीं होते. भाजपा के विजय रथ को सबसे पहले बिहार में रोका जा सका था. उसका कारण यह था कि बिहार में भाजपा का मुकाबला करने में कांग्रेस, जदयू और राजद का महागठबंधन तैयार हो गया था. भाजपा को हराने और अपनी सरकार बनाने के बाद भी महागठबंधन चल नहीं सका. जिससे वापस बिहार में भाजपा-जदयू की सरकार बन गई. कर्नाटक में भाजपा की सरकार बनते बनते रह गई क्योंकि चुनाव के बाद कांग्रेस और जेडीएस नेताओं ने बेहतर तालमेल दिखाया.

विपक्षी एकता को कमजोर करेगा तीसरा मोर्चा

उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 3 और विधानसभा की 1 सीट के लिये हुये उपचुनाव में भाजपा के हारने का कारण विपक्ष का एकजुट होना था. राजनीतिक सर्वे बताते हैं कि अगर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस, सपा और बसपा का महागठबंधन होता है तो इस गठबंधन को 60 सीटों पर जीत हासिल हो सकती है. ऐसे में भाजपा को 20 के करीब सीटें ही मिल पायेंगी. अगर यह दल बिखर गये तो भाजपा को 40 से 50 तक सीटें मिल सकती हैं.

कमोबेश यही हाल देश के दूसरे हिस्सों का भी है. अलगअगल राज्यों में गैर भाजपाई दलों का गठबंधन हो सका तो भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए की हालत खराब हो सकती है. अगर एनडीए के खिलाफ तीसरा मोर्चा बनाकर भी चुनाव लड़ा गया तो भी भाजपा का कम नुकसान होगा. अगर भाजपा को हराना है तो सभी दलों को एक मंच पर आना होगा.

बहुजन समाज पार्टी के कांग्रेस से गठबंधन तोड़ने से यह साफ हो गया है कि अब लोकसभा चुनाव में भाजपा के मुकाबले विपक्ष एकजुट नहीं होगा. मायावती ने जिस तरह से महागठबंधन को दरकिनार किया है उससे अब मायावती पर सवाल उठने लगे हैं कि कहीं इसके पीछे भाजपा की कोई रणनीति तो नहीं काम कर रही है. 2017 के विधानसभा चुनाव में जब समाजवादी पार्टी के मुलायम परिवार में मतभेद गहराये पार्टी संकट में आई तो उस समय अखिलेश यादव ने कहा था कि ‘किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा साजिश के तहत यह काम किया गया.’ अखिलेश यादव का इशारा सपा के पूर्व नेता अमर सिंह पर था.

जब जब उत्तर प्रदेश में चुनावी जरूरत हुई सपा में बड़े नेताओं ने दलबदल कर लिया. राज्यसभा चुनाव के समय सपा नेता नरेश अग्रवाल ने भाजपा के साथ कदम बढ़ाये और वह सपा छोड़ भाजपा में शामिल हो गये.

ताकत बढायेगा विपक्षी बिखराव

2019 के लोकसभा चुनाव में लग रहा था कि सपा एकजुट रहेगी. परिवार में चली लड़ाई थम गई. ऐसे ही समय में अमर सिंह भाजपा नेताओं के करीब पहुंचते  रहे हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक ने अमर सिंह का नाम लेना शुरू किया और सपा छोड़कर शिवपाल यादव ने समाजवादी सेकुलर मोर्चा बना लिया. एक तरफ जहां सपा-बसपा-कांग्रेस एकजुट होने की तैयारी कर रहे थे सपा में सेंध लग गई.

शिवपाल यादव चुनावी ताकत भले ही न बन पाये हों पर सपा को कमजोर कर सकते है. सपा में इस बिखराव के पीछे भी अमर सिंह और उनकी भाजपा से दोस्ती को प्रमुख वजह माना जा रहा है. भाजपा के लिये 2019 के लोकसभा चुनाव में सबसे खराब यह है कि इस बार मोदी मैजिक नहीं चल रहा है. दलित और पिछड़ों के साथ ही साथ अगड़ी जातियां भी भाजपा से खुश नहीं है.

विपक्ष का बिखराव भाजपा की ताकत को बढायेगा. भाजपा ने अब उन दलों के साथ भी समझौता करना सीख लिया है जिनसे उनके वैचारिक मतभेद रहे हैं. जम्मू कश्मीर में पीडीपी इसका प्रमुख उदाहरण है. यह बात और है कि यह गठबंधन ठीक से चला नहीं पर कांग्रेस और नेशनल काफ्रेंस के गंठबंधन को सत्ता से बाहर कर दिया.

ऐसे में भाजपा को बाहर करने के लिये विपक्ष को एकजुट होना पड़ेगा. अगर विपक्ष एकजुट नहीं होगा तो भाजपा को सत्ता से बाहर करना संभव नहीं है.

मतभेद नहीं मनभेद ज्यादा

विपक्षी एकता में अगर गैर भाजपा दलों की बात करें तो इन दलों में विचारधारा के स्तर पर मतभेद नहीं है. गैर भाजपा दल सम्प्रदायिकता के मुद्दे पर एक जैसे विचार रखते हैं. असल बात यह है कि इनके बीच आपस में मनभेद बहुत है. समान विचारधारा की सोच रखने के बाद भी यह एक साथ मंच पर दिखने में कतराते हैं.

इसकी वजह इनके खुद के बीच वचर्स्व की जंग है. उत्तर प्रदेश के लोकसभा उपचुनावों के बाद भाजपा को हराने की घटना ने विपक्षी दलों में एक उम्मीद जगाई. जनता को यह लगा कि भाजपा को यह लोग मिलकर रोक सकते है. कर्नाटक के चुनाव में जब भाजपा को किनारे करके एचडी कुमार स्वामी ने मुख्यमंत्री कह कुर्सी संभाली तो विपक्ष एकजुट दिखाई दिया. शपथ ग्रहण में मायावती और सोनिया गांधी की गले लगती तस्वीर ने दिखाया कि विपक्ष एकजुट हो सकता है.

मायावती ने कांग्रेस से चुनावी गठबंधन के लिये मना करके कर्नाटक की उस छवि को फीका कर दिया है. भले ही अभी वह सोनिया और राहुल को लेकर कुछ न कह रही हों पर मायावती ने विपक्षी एकता के गुब्बारे की हवा निकाल दी है. मायावती की रणनीति से वाकिफ लोग मानते हैं कि मायावती की महत्वाकांक्षा बहुत है. वह अपनी इस पहल से दूसरे दलों को यह दिखाना चाहती हैं कि बसपा चुनावी तैयारी मे सबसे आगे चल रही है. यह चुनाव मायावती के लिये भी सबसे अहम है. हो सकता है कि गठबंधन के गणित से उनको कोई लाभ हो भी जाये पर बसपा को संगठन के तौर पर और दलितों को कुछ हासिल नहीं होगा.

एक बार फिर से उनको कांग्रेस या भाजपा के पाले में ही खड़ा होना होगा. मायावती इससे बचने के लिये ही तीसरे मोर्चे की नेता के रूप में खुद को बनाये रखना चाहती हैं. पर यह संभव नहीं है.

तीसरे मोर्चे में असरदार चेहरों की कमी नहीं है. वह मायावती को अपना नेता मानने के लिये तैयार नहीं होंगे. बिना कांग्रेस तीसरा मोर्चा इतना ताकतवर नहीं हो सकता है कि वह भाजपा को रोक सके. मायावती से अधिक कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी सभी को स्वीकार हो सकते हैं.

ऐसे में मायावती और उनकी अगुवाई पर सवालिया निशान लग रहे हैं. मायावती और उनकी पार्टी बसपा का असर उत्तर प्रदेश के बाहर नहीं है. राजस्थान, छत्तीसगढ और मध्य प्रदेश में अगर बसपा कांग्रेस मिल कर चुनाव लड़ती तो दोनो को लाभ होता. मायावती कांग्रेस पर दबाव बनाकर इन राज्यों की ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की दबाव वाली राजनीति कर रही है. इसके साथ ही साथ वह भाजपा को भी संदेश दे रही है.

गलत फहमी में बसपा

बसपा ठीक उसी तरह से गलतफहमी का शिकार है जैसे 2009 के लोकसभा चुनाव में उसे गलतफहमी हुई थी. 2009 के लोकसभा चुनाव के समय मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं. 2007 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में पहली बार बसपा ने बहुमत से सरकार बनाई थी. बसपा देश की सबसे मजबूत जनाधार वाली पार्टी थी. ऐसे में मायावती के समर्थकों ने उनको प्रधानमंत्री के रूप में देखना शुरू कर दिया.

बसपा उस चुनाव में भी अपनी ताकत का सही आकलन नहीं कर पाई और उसे उम्मीद से बहुत कम वोट मिले. 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा अपनी उम्मदों पर खरी उतरी ही नहीं व 2012 के विधानसभा चुनाव में वह सत्ता से बाहर हो गई. तब से हर चुनाव में बसपा का जनाधार कमजोर ही होता गया है. 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली. 2017 के विधानसभा चुनाव में वह तीसरे नम्बर की पार्टी बन कर रह गई. ऐसे में 2019 में बसपा अपने पक्ष में चमत्कार की उम्मीद कर रही है.

बसपा को लग रहा है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिलेगा तो बसपा अपने साथ कुछ दलों को लेकर सरकार बनाने में सौदेबाजी कर लेगी. ऐसे में वह कांग्रेस और भाजपा दोनों से समानरूप से समझौता कर सकती है. बसपा नेता मानते हैं कि कांग्रेस को छोड सभी दलों ने मायावती को अपना नेता मान लिया है. इस वजह से मायावती कांग्रेस को भी दबाव में लेना चाह रही है. अचम्भे की बात यह है कि मायावती को छोड़कर किसी भी दल के नेता ने मायावती को तीसरे मोर्चे का नेता नहीं स्वीकार किया है. देखा जाये तो मायावती से अधिक प्रभावशाली नेता और भी हैं जिनको लेकर दूसरे तैयार भी हो सकते हैं. इनमें मुलायम सिंह यादव, शरद पवार, एचडी देवगौडा, ममता बनर्जी जैसे नेता प्रमुख हैं. ऐसे में मायावती के लिये चुनौतियां अपार हैं. तीसरा मोर्चा पहले की तरह वोट को काट सकता है पर सरकार बनाने में सफल नहीं हो सकता है.

अंधाधुन : तब्बू का शानदार अभिनय

बौलीवुड में बेहतरीन रोमांचक फिल्में नही बन पाती हैं. मगर श्रीराम राघवन की फिल्म ‘‘अंधाधुन’’ एक बेहतरीन रोमांचक फिल्म के रूप में उभरती है. वैसे श्रीराम राघवन की फिल्म ‘‘अंधाधुन’’ 2010 की चर्चित फ्रेंच लघु फिल्म ‘‘पियानो ट्यूटर’’ से प्रभावित एक ब्लैक कौमेडी से भरी रोमांटिक रोमांचक फिल्म है.

पुणे में पियानो बजाने में माहिर मगर अंधे आकाश (आयुष्मान खुराना) और शुभा (राधिका आप्टे) की सुंदर प्रेम कहानी चलती रहती है, पर जैसे ही आयुष्मान की मुलाकात सिमी (तब्बू) से होती है, सब कुछ बदल जाता है. सिम्मी प्यार की भूखी व प्यार में धोखा खाई हुई है. क्रूर सिमी को कुछ लोग एकदम बेकार औरत मानते हैं.

आकाश एक दिन मशहूर अभिनेता रहे प्रमोद सिन्हा (अनिल धवन) के निमंत्रण पर उनकी शादी की सालगिरह पर उनके घर पियानो बजाने जाता है. घर का दरवाजा प्रमोद सिन्हा की पत्नी सिमी खोलती है. पहले वह आकाश को वापस भेजना चाहती है. पर फिर मजबूरन उसे आकाश को अंदर लाना पड़ता है.

आकाश, सिमी के घर में पियानो बजाना शुरू कर देता है. पियानो बजाते हुए वह देखता है कि अंदर के एक कमरे से मनोहर (मनोहर विज) निकलता है, जिसकी मदद से सिमी को प्रमोद सिन्हा की लाश को ठिकाने लगाते हुए आकाश देख लेता है. सिमी के घर से निकलकर आकाश पुलिस स्टेशन हत्या की रपट लिखाने पहुंचता है, वहां पर वह मनोहर को पुलिस इंस्पेक्टर के रूप में देखकर अपनी बात बदल देता है कि उसकी बिल्ली गुम हो गयी है.अब इंस्पेक्टर मनोहर उसके साथ उसके घर जाता है बिल्ली को ढूंढने की बात कहकर वह यह जानने की कोशिश करता है कि आकाश अंधा है या नहीं.

मनोहर समझ जाता है कि आकाश वास्तव में देख सकता है. इसी बीच यह बात सामने आ जाती है कि प्रमेद सिन्हा की जानकारी के बिना सिमी व मनोहर के संबंध चल रहे थे और उस दिन परिस्थितिवश प्रमोद की हत्या हो जाती है.

अब धूर्त पुलिस इंस्पेक्टर मनोहर व सिमी अपने अपने तरीके से आकाश को खत्म करना चाहते हैं. इसी प्रयास के तहत सिमी, आकाश को उसके घर के अंदर ही अंधा कर देती है और शुभा को समझा देती है कि आकाश के साथ उसके जिस्मानी रिश्ते बन चुके हैं. उसके बाद शह और मात का अजीबोगरीब खेल शुरू होता है, जिसमें रिक्शा चालक मोहन, लाटरी टिकट बेचने वाली (छाया कदम), लालची डाक्टर (जाकिर हुसैन) भी जुड़ते हैं.

बौलीवुड में श्रीराम राघवन की गिनती बेहतरीन रोमांचक फिल्मकार के रूप में होती है. मगर फिल्म ‘‘अंधाधुन’’ में बतौर निर्देशक इंटरवल से पहले श्री राम राघवन की पकड़ मजबूत बनी रहती है. मगर इंटरवल के बाद उनके हाथ से फिल्म फिसल जाती है. कुछ दृश्य पुरानी फिल्मों से चुराए हुए हैं.

पटकथा लेखक श्रीराम राघवन, अजिरत विश्वास, पूजा लाढ़ा सुरती व योगेश चांदेकर लिखित बेहतरीन पटकथा वाली फिल्म अंत तक दर्शकों को बांधकर रखती है. मगर बीच बीच में फिल्म बोझिल हो जाती है. कुछ संवाद भी अच्छे बन पड़े हैं.

कहानीकार, पटकथाकार व निर्देशक ने फिल्म की कहानी को आगे खींचने के लिए डाक्टर व दूसरे पात्र रचे, मगर वह इस कहानी में अहम किरदार निभाने वाले उस बालक के किरदार को भूल गए जो कि आकाश की इमारत में रहता है और जो अपने मोबाइल को आकाश के घर की खिड़की पर रखकर वीडियो बना लेता है, जिसमें आकाश व सिमी की सच्चाई सामने आ चुकी है.

इस बालक को नजरंदाज करने की बजाय इसी के आधार पर कहानी को कई नए मोड़ दिए जा सकते थे.
जहां तक अभिनय का सवाल है तो राधिका आप्टे निराश करती हैं. कुछ दृश्यों को नजरंदाज कर दें, तो आयुष्मान ने दमदार अभिनय किया है. अपनी अदाकारी से तब्बू पूरी फिल्म अपने कंधों पर लेकर चलती हैं. जितनी देर परदे पर तब्बू रहती हैं, उतनी देर दर्शक की निगाह किसी अन्य कलाकार यानी कि किरदार की तरफ नहीं जाती. अनिल धवन के अभिनय की हर कोई तारीफ करेगा. डाक्टर के किरदार में जाकिर हुसैन व लाटरी टिकट बेचने वाली के किरदार में छाया कदम छाप छोड़ने में असफल रहती हैं. अश्विनी कलसेकर की प्रतिभा को जाया किया गया है. फिल्म का गीत संगीत व पार्श्व संगीत उत्तम है.

दो घंटे बीस मिनट की अवधि की फिल्म ‘‘अंधाधुन’’ का निर्माण ‘‘वायाकौम 18 पिक्चर्स’’ और ‘मैचबौक्स पिक्चर्स’’ ने मिलकर किया है. फिल्म के निर्देशक श्रीराम राघवन, लेखक श्रीराम राघवन,अजिरत विश्वास, पूजा लाढ़ा सुरती व योगेष चांदेकर, संगीतकार अमित त्रिवेदी, रफ्तार व गिरीष नाकोड़, कैमरामैन के यू मोहन हैं तथा कलाकार हैं – आयुष्मान खुराना, राधिका आप्टे, तब्बू, अनिल धवन, जाकिर हुसैन, मानव विज, अश्विनी कलसेकर, छाया कदम तथा अन्य.

#metoo में मारे गए प्रेसीडेंट फ्रैंक अंडरवुड, अब ये संभालेंगी व्हाइट हाउस

नेटफ्लिक्स की चर्चित सीरीज हाउस औफ़ कार्ड्स देखने वाले जानते हैं कि व्हाइट हाउस में घुसने और प्रेसीडेंट बनने के लिए फ्रैंक अंडरवुड किस हद तक साजिशों का जाल बिछाते आये हैं. जरूरत पड़ने पर अपनी बीवी को भी दांव पर लगाने वाले फ्रैंक अंडरवुड आखिरी सीजन में प्रेसीडेंट बन व्हाइट हाउस पर कब्जा तो कर लेते हैं लेकिन उनके रेसिस्ट पास्ट और बीवी की जालसाजी से उनकी कुर्सी हिलने लगती है.

लोगों को लगा था कि नए सीजन में फ्रैंक फिर कुछ नए दांवपेंच दिखाएंगे लेकिन इस किरदार को निभाने वाले एक्टर केविन स्पेसी के यौन शोषण के आरोपों में फंसे होने के चलते फ्रैंक के किरदार को मार दिया गया है. इस बात की पुष्टि हुई है यूएस की फेमस वेब टीवी सीरीज हाउस औफ कार्ड्स के फाइनल सीजन के टीजर में. जहां रोबिन राइट उनके पति बने फ्रैंक अंडरवुड की कब्र से बात करती दिखाई दे रही हैं. अब वे प्रेसीडेंट के अवतार में आकर व्हाइट हाउस संभालती दिख रही हैं.

जिससे यह साफ जाहिर हो रहा है कि फाइनल सीजन में केविन के किरदार को मारकर ही उन्हें शो से बाहर किया गया है. यह कुछ कुछ ऐसा ही है जैसे हमारे यहां के सास बहू सीरियल्स में किसी एक्टर को बाहर का रास्ता दिखाना हो तो निर्माता उस किरादर का एक्सीडेंट करवाकर उसे चलता कर देते हैं. लेकिन औस्कर विनर एक्टर का इस शो से जाना दर्शकों के लिए किसी झटके से कम नहीं है. क्योंकि लगातार कई सीजंस में थ्रिल पैदा करते केविन के किरदार की वजह से अमेरिकी राजनीति, व्हाइट हाउस का काम करने का तरीका समझ आता है. अब इस पौलिटिकल ड्रामा के फाइनल सीजन में महज 8 एपिसोड होंगे. शो का वर्ल्ड प्रीमियर नवम्बर 2018 में होगा.

रेप का मामला

गौरतलब है कि अक्टूबर 2017 में एक्टर एंथोनी रैप ने केविन के बारे में एक खुलासा करते हुए कहा था कि 1986 में केविन ने शराब के नशे में उनका शोषण किया था. इसके बाद लगभग 15 और लोगों ने केविन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी. इधर उनके प्राइवेट मसाज थेरेपिस्ट ने यौन शोषण का आरोप लगाया है और उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है. मसाजर का आरोप है कि केविन स्पेसी ने उन्हें मसाज के दौरान जबरन अपने प्राइवेट पार्ट को हाथ लगाने का दबाव डाला. घटना 2 साल पहले केविन स्पेसी के मलिबू, कैलिफोर्निया स्थित घर की बताई जा रही है. कुल मिलाकर उन पर लगे कई आरोप उसी #metoo कैम्पेन का हिस्सा हैं जिन्होंने हौलीवुड में हार्वे वीनस्टीन का करियर ख़त्म कर दिया.

नेटफ्लिक्स का कड़ा रुख

हालांकि केविन की छवि हार्वे जैसी नहीं थी. उनकी गिनती दुनिया भर के बड़े कलाकारों में होती थी. अमेरिकन ब्यूटी के लिए पौपुलर केविन मेथड एक्टर माने जाते रहे हैं लेकिन इन मामलों के चलते नेटफ्लिक्स ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए उनका बायकाट कर दिया. नेटफ्लिक्स के मुताबिक़ केविन स्पेसी पर 1986 में एक बाल-कलाकार के साथ सेक्शुअल हैरेसमेंट का आरोप है लिहाजा हमने मशहूर शो ‘हाउस ऑफ कार्ड्स’ को बंद करने का मन बना लिया है. उन्होंने कहा कि अब वो केविन स्पेसी के साथ किसी भी तरफ का संबंध नहीं रखना चाहते. साथ ही नेटफ्लिक्स पर केविन स्पेसी की फिल्म ‘गोर’ का प्रसारण भी बंद कर दिया जाएगा.

क्या कहती हैं मिसेज प्रेसीडेंट?

हाउस औफ कार्ड्स शो से निकलने के बाद उनकी को स्टार रौबिन राइट ने कहा कि स्पेसी और वह, दोनों एक साथ काम करते थे. लेकिन इस से ज्यादा उनके बीच और कुछ नहीं था. वह बस सेट पर एक साथ रहते थे और वह एक्शन और कट के परे उन्हें बिल्कुल नहीं जानतीं. उन्होंने कहा कि स्कैंडल के सामने आने के बाद से उन दोनों ने आपस में कभी संपर्क नहीं किया है. हालांकि तमाम दूरियों के बाद भी राइट ने स्पेसी की एक अभिनेता के तौर पर काफी तारीफ की. उन्होंने कहा कि मैं उस आदमी को नहीं जानती थी. मैं बस उस शानदार अभिनेता को जानती थी, जो कि स्पेसी थे. बता दें कि रौबिन राइट ने हाउस औफ कार्ड्स शो में स्पेसी की पत्नी का किरदार निभाया था.

स्पेसी का कुबूलनामा

इस पूरे प्रकरण में केविन ने भी शालीनता से बात की और जरूरत पड़ने पर अपनी गलती स्वीकार करते हुए माफी भी मांगी. इस अमेरिकी एक्टर का कहना है कि उन्होंने एंथनी रैप के लैंगिक दुर्व्यवहार के आरोप लगाए जाने के बाद अब ‘समलैंगिक शख्स के रूप जीवन बिताने’ का फैसला किया है. स्पेसी ने ट्विटर के जरिए रैप से माफी मांगी और यह घोषित किया कि अब वह अपना जीवन एक समलैंगिक शख्स के रूप में जीना चाहते हैं. स्पेसी ने ट्वीट किया, “ईमानदारी से कहूं तो मुझे वह वाकया याद नहीं है, यह 30 साल से ज्यादा समय की बात हो चुकी है. लेकिन, जैसा उन्होंने कहा है अगर वैसा व्यवहार मैंने उनके साथ किया था, तो मैं शराब के नशे में किए गए दुर्व्यवहार के लिए तहेदिल से उनसे माफी मांगता हूं और जिस तरह की मनोदशा से आजतक गुजरने के बारे में उन्होंने बताया है, उसका मुझे दुख है.”

हौलीवुड-बौलीवुड

इन दिनों हौलीवुड या बौलीवुड, फिल्मों से कम और सेक्स स्कैंडल्स की वजह से ज्यादा सुर्खियों में है. जहां केविन जैसा औस्कर विजेता कलाकार यौन शोषण के आरोप में घिरा है वहीं बौलीवुड में नाना पाटेकर अभिनेत्री तनुश्री दत्ता द्वारा लगाए यौन शोषण के आरोप का सामना कर रहे हैं. हालांकि इस मामले में लोग उनके साथ खड़े हैं लेकिन केविन का करियर लगभग ख़त्म सा हो गया है. एक बेहतरीन एक्टर के बिना हाउस औफ कार्ड का नया सीजन जाहिर है फीका सा लगेगा, शायद इसीलिए नेटफ्लिक्स ने इस को फाइनल सीजन बताकर महज 8 एपिसोड में खत्म करने का फैसला लिया है.

रेलवे कोच कृपाशंकर बने अंतर्राष्ट्रीय मैच रेफरी

हिंदी की सुपरहिट फिल्म ‘दंगल’ के लिए फिल्म स्टार आमिर खान को कुश्ती के दांवपेंच सिखाने वाले पहलवान कृपाशंकर बिश्नोई अंतर्राष्ट्रीय मैच के रेफरी बन गए हैं. उन्होंने मैसेडोनिया में आयोजित रेफरी कोर्स स्तर-2 अपग्रेड के लिए हुई परीक्षा को सफलतापूर्वक पास कर लिया है.

गौरतलब है कि भारतीय कुश्ती संघ (डब्ल्यूएफआई) ने अगस्त महीने में उन का नाम मैसेडोनिया में आयोजित रेफरी कोर्स स्तर-2 अपग्रेड के लिए चुना था. साथ ही, उन्हें 26 से 30 सितंबर, 2108 तक मैसेडोनिया के स्कोप्जे शहर में आयोजित विश्व वेटरन कुश्ती चैंपियनशिप के लिए भी रेफरी नियुक्त किया था.

कृपाशंकर ने उक्त परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन कर सभी को आकर्षित किया. परीक्षा के दौरान उन्होंने कई पायदान पार किए जैसे कुश्ती अभ्यास, सामान्य सारांश के सवाल, पैरिंग, लिखित परीक्षा, वीडियो परीक्षा के साथ ही रेफरी सम्मेलन प्रतियोगिता में भी वे अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने में सफल रहे.

परीक्षा के दौरान परीक्षक के तौर पर यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग की तरफ से ट्यूनीशिया के कामेल बुआज़िस और रूस के आंद्रेई क्रिकोव इंस्ट्रक्टर मौजूद थे. उन्होंने कृपाशंकर के कार्य की प्रशंसा की व रेफरी कार्य को भी सराहा.

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हालांकि यूनाईटेड विश्व कुश्ती (यूडब्ल्यूडब्ल्यू) ने कृपाशंकर बिश्नोई को अपने रेफरियों के अंतर्राष्ट्रीय पैनल में पहले ही शामिल करने की घोषणा साल 2016 में की थी. उस समय नियंत्रण संस्था ने जरमनी के डोर्टमंड शहर में रेफरी कोर्स का आयोजन किया था जिस की परीक्षा को पास करने के बाद कृपाशंकर बिश्नोई को अंतर्राष्ट्रीय पैनल में जगह मिली थी. उस के बाद भारत में कुश्ती के नए नियमों को लागू करने की बात को ले कर कृपाशंकर ने 12 सितंबर, 2017 को अपनी फेसबुक पोस्ट के जरीए एक विवादित टिप्पणी की थी. इस में भारतीय कुश्ती संघ की तुलना खच्चर से कर दी गई थी, जिस की वजह से 13 सितंबर, 2017 को भारतीय कुश्ती संघ ने कृपाशंकर को 6 साल के लिए निलंबित कर दिया था. इस के बाद इस फैसले को कृपाशंकर ने डब्ल्यूएफआई की अनुशासन समिति से अपील करते हुए अपने ऊपर लगे निलंबन को वापस लेने की गुहार लगाई थी. इस विवाद पर महासंघ ने सुनवाई करते हुए 11 महीने बाद कृपाशंकर पर से निलंबन वापस ले लिया था और उन्हें दोबारा ऐसा न करने की चेतावनी दे कर छोड़ दिया.

कृपाशंकर बिश्नोई ने फोन पर बताया, “मैं सब से पहले कोच हूं. बतौर कोच मुझे एक रेफरी के काम के बारे में भी पता होना चाहिए ताकि अपने पहलवानों को रेफरी की शब्दावली से परिचित करा सकूं. अगर मैं बतौर रेफरी किसी प्रतियोगिता में जाता हूं तो इस से मेरा निजी फायदा होगा, देश की मैडल टेली पर कोई असर नहीं पड़ेगा पर बतौर कोच अगर मैं कहीं जाता हूं और रेफरी के कामों को भी समझ कर अपने शिष्यों को कुश्ती सिखाता हूं तो वे देश के लिए ज्यादा मैडल जीत पाएंगे. यह कोर्स तकरीबन 7 दिन का होता है जिस पर डेढ़ लाख रुपए का खर्च आता है जिसे खुद वहन करना होता है.”

कृपाशंकर बिश्नोई तब से ज्यादा चर्चा में हैं जब से उन्होंने फिल्म ‘दंगल’ के लिए आमिर खान और अन्य कलाकारों को कुश्ती के गुर सिखाए थे. वे मध्य प्रदेश के ऐसे पहले अंतर्राष्ट्रीय रेफरी हैं, जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय रेफरी पैनल में शामिल किया गया है. उन की इस उपलब्धि पर भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह और सचिव वीएम प्रसूद ने बधाई दी.

लव बाइट : सैक्स बनाए रोमांचक

लव बाइट सैक्स का वह पल होता है जब आप अपने साथी को रोमांच की दुनिया की सैर करा रहे होते हैं और एकदूसरे के साथ प्रेम के सागर में गोते लगा रहे होते हैं. ऐसे में लव बाइट न सिर्फ आपको बल्कि आपके सैक्स पार्टनर को गजब का अनुभव करा सकता है.

क्या है लव बाइट

अगर आप को लव बाइट के बारे में पता नहीं तो पहले जानिए कि यह है क्या और इसे किस तरह आजमाएं कि आपकी पार्टनर मदहोशी के आगोश में समा जाएं. लव बाइट सैक्स में उतना ही मजेदार अनुभव कराता है जितना चुंबन, सहलाना और एकदूसरे की अंगों की तारीफ करना.

सैक्स पार्टनर के उन जगहों पर जोर से चुंबन या फिर दांतों से हलका हलका दबा कर निशान छोड़ने को लव बाइट कहते हैं. यह आमतौर पर सैक्स इंटिमेट के दौरान किया जाता है. इस में बस इतना ध्यान रखना होता है कि यह पूरी तरह सेफ हो और बिना सहमति के अथवा जोरजबरदस्ती से न हो और जो सैक्स पार्टनर को पसंद न हो.

कहां करें लव बाइट

पार्टनर के साथ इंटिमेट के दौरान गरदन, नितंब, जांघों, पैरों, हाथों, कान के पीछे, होंठों, ब्रैस्ट आदि जगहों पर लव बाइट करना ज्यादा अच्छा होता है. फीमेल सैक्स पार्टनर अपने ब्रैस्ट पर लव बाइट कराना ज्यादा पसंद करती हैं. पर ध्यान रखें कि यह ज्यादा जोर से न किया जाए. इस से आपकी पार्टनर का मूड सैक्स से उचट सकता है.

ध्यान रखें

* लव बाइट फोरप्ले करते समय करें.

* मुंह साफ रखें और लव बाइट करते समय लार न छोड़ें.

* कमर को पकड़ कर अपनी ओर खींचें और वहां लव बाइट दें. इससे सैक्स पार्टनर मदहोश होकर लिपट जाएगी.

* इंटिमेसी के दौरान साथी को फोरप्ले का भरपूर सुख दें और उसके अंगों की तारीफ करें.

* बाहरी जगहों पर लव बाइट देना सही नहीं है. उन जगहों पर करें जो कपड़ों से ढके होते हैं. इससे बाद में उन्हें शर्मिंदगी नहीं होगी.

* नहाते समय, कपड़े बदलते समय लव बाइट को देखना और उसे फील करने का अलग ही आनंद होता है.

*  लव बाइट लंबे समय तक प्यार के पलों को जवां और हसीन बनाए रखता है. पर ध्यान रखें, इस में हाइजीन का खयाल रखें और जबरन लव बाइट कतई न करें.

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