Download App

महारानी की बौखलाहट

जिन 3 राज्यों में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं उन में सत्तारूढ़ भाजपा सब से कमजोर राजस्थान में पड़ रही है.

5 साल महल की राजनीति करती रहीं मुख्यमंत्री वसुंधराराजे सिंधिया को समझ नहीं आ रहा है कि वे मतदाताओं को अपनी कौन सी उपलब्धियां बता कर रिझाएं. इन दिनों राजस्थान गौरवयात्रा पर राजसी ठाठ से निकलीं वसुंधरा को हर किसी के विरोध का सार्वजनिक सामना करना पड़ रहा है. बेरोजगार युवक और कई कर्मचारी संगठन खुल कर महारानी का विरोध कर रहे हैं.

ऐसे में वसुंधरा वही कर रही हैं जो आमतौर पर खीझ में किया जाता है. राजस्थान के मुसलिम नाम वाले गांवों का हिंदूकरण करना उन्होंने शुरू कर दिया है. मसलन, अब बाड़मेर जिले का मियां का बाड़ा नाम का गांव महेश नगर कहलाएगा. बेरोजगार, दलित, किसान और मुसलमान इस शर्त पर भाजपा को वोट देंगे, ऐसा कहने और सोचने की कोई वजह नहीं क्योंकि उन की परेशानियों का हल भगवाकरण से तो होने से रहा.

सिरफिरे आशिक का हाईवोल्टेज ड्रामा : विभा के साथ क्या हुआ

जिस ने भी सुना, उस ने मिसरोद का रास्ता पकड़ लिया. कोई सिटी बस से गया तो कोई औटो से. किसी ने टैक्सी ली तो कुछ लोग अपने वाहन से मिसरोज जा पहुंचे. बीती 13 जुलाई की अलसुबह मिसरोद में कोई ऐसी डिस्काउंट सेल नहीं लगी थी, जिस में किसी जहाज के डूब जाने से कपड़ा व्यवसायी या निर्माता को घाटे में आ कर मुफ्त के भाव कपड़े बेचने पड़ रहे हों, बल्कि जो हो रहा था, वह निहायत ही दिलचस्प और अनूठा ड्रामा था, जिसे भोपाल के लोग रूबरू देखने का मौका नहीं चूकना चाहते थे.

भोपाल होशंगाबाद रोड पर पड़ने वाला मिसरोद कस्बा अब भोपाल का ही हिस्सा बन गया है. इस इलाके में तेजी से जो रिहायशी कालोनियां विकसित हुई हैं, उन में से एक है फौर्च्यून डिवाइन सिटी.

इस कालोनी में खासे खातेपीते लोग रहते हैं. इन्हीं में से एक हैं बीएसएनएल (भारत संचार निगम लिमिटेड) से रिटायर हुए एम.पी. श्रीवास्तव. एजीएम जैसे अहम पद से रिटायर्ड एम.पी. श्रीवास्तव ने वक्त रहते फौर्च्यून डिवाइन सिटी में फ्लैट ले लिया था.

एम.पी. श्रीवास्तव नौकरी से तो रिटायर हो गए थे, लेकिन जवान हो गई दोनों बेटियां विभा और आभा की शादी की चिंता से मुक्त नहीं हो पाए थे. रिटायरमेंट के बाद उन का अधिकांश समय बेटियों के लिए योग्य वर ढूंढने में गुजर रहा था. साधनसंपन्न घर में सब कुछ था. साथ ही खुशहाल परिवार में 2 होनहार बेटियां और कुशल गृहिणी साबित हुई उन की पत्नी चंद्रा, जिन्हें पति से ज्यादा बेटियों के हाथ पीले होने की चिंता सताती थी.

13 जुलाई को श्रीवास्तवजी के फ्लैट नंबर 503 में जो चहलपहल हुई, उस की उम्मीद श्रीवास्तव दंपति ने सपने में भी नहीं की थी. ऐसी शोहरत जिस से हर शरीफ शहरी बचना चाहता है, कैसी और क्यों थी, पहले उस की वजह जान लेना जरूरी है.

इस संभ्रांत संस्कारी कायस्थ परिवार की बड़ी बेटी का नाम विभा है, जिस की उम्र 31 साल है. विभा पढ़ाईलिखाई में तो होशियार है ही, साथ ही उस की पहचान उस के सांवले सौंदर्य की वजह से भी है. एमटेक करने के बाद महत्त्वाकांक्षी विभा ने बजाय नौकरी करने के मुंबई का रास्ता पकड़ लिया था. चाहत थी मौडल बनने की.

विभा महत्त्वाकांक्षी ही नहीं, बल्कि प्रतिभावान भी थी. इसी के चलते करीब 3 साल पहले एक समारोह में कायस्थ समाज ने उसे सम्मानित भी किया था. उसी साल विभा ने एक ब्यूटी कौंटेस्ट में भी हिस्सा लिया था, जिस में वह विजेता रही थी.

इस सब से उत्साहित विभा को भी लगने लगा था कि अगर कोशिश की जाए तो उस के लिए सेलिब्रिटी बनना कोई मुश्किल काम नहीं है. उस ने अपनी यह इच्छा मांबाप को बताई तो उन्होंने उसे निराश नहीं किया. उन लोगों ने उसे मुंबई जाने की इजाजत दे दी.

मौडलिंग और फिल्मों में काम करने की सोच लेना तो आसान काम है, लेकिन ग्लैमर की इस दुनिया में अपना मुकाम बनाना हंसीखेल नहीं है. यह बात विभा को मुंबई जा कर समझ आई. लेकिन विभा हिम्मत हारने वालों में से नहीं थी. वह  काम हासिल करने के लिए लगातार संघर्ष करती रही. बोलचाल की भाषा में कहें तो वह स्ट्रगलर थी.

मुंबई में रोजाना हजारों स्ट्रगलर हाथ में एलबम लिए निर्माता निर्देशकों और नामी कलाकारों के यहां धक्के खाते हैं. सचमुच दाद देनी होगी ऐसे नवोदित कलाकारों को, जो सुबह उठ कर देर रात तक चलते दौड़ते नहीं थकते. उस वक्त उन के जेहन में उन नामी कलाकारों के संघर्ष की छवि बसी होती है जो कभी उन्हीं की तरह स्ट्रगलर थे.

मीडिया भी ऐसे किस्से खूब बढ़ाचढ़ा कर पेश करता है. मसलन देखो कल का चाय या फल बेचने वाला या फिर पेशे से कंडक्टर कैसे शोहरत के शिखर पर पहुंच गया और अब अरबों की दौलत का मालिक है.

कामयाब होना है तो धक्के तो खाने ही पड़ेंगे, यह बात मुंबई पहुंचने वाला हर स्ट्रगलर जानता है. विभा भी जानती थी. स्ट्रगल के दौरान विभा की मुलाकात रोहित नाम के युवक से हुई जो खुद भी स्ट्रगलर था.

मूलत: उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ का रहने वाला रोहित भी छोटामोटा कलाकार था और किसी बड़े मौके की तलाश में था.

विभा और रोहित की जानपहचान पहले दोस्ती में और फिर दोस्ती प्यार में बदल गई, इस का अहसास दोनों को उस वक्त हुआ, जब रोहित ने विभा पर बेजा हक जमाना शुरू कर दिया.

छोटे शहरों की बनिस्बत मुंबई की दोस्ती और प्यार में फर्क कर पाना बेहद मुश्किल काम है. वजह यह कि फिल्म इंडस्ट्री में कोई वर्जना नहीं होती. वहां कलाकार की पहचान उस की कामयाबी के पैमाने से होती है, जबकि विभा और रोहित अभी कामयाबी के सब से निचले पायदान पर खड़े थे. कामयाबी की सोचना तो दूर की बात है, अभी उन के कदम जरा भी आगे नहीं बढ़ पाए थे.

जमीन पर खड़ेखड़े ही विभा को अहसास हो गया था कि जितना उसे मिलना था, उतना मिल चुका. लिहाजा अब वापस भोपाल लौट जाए और मम्मीपापा जहां कहें, वहां शादी कर ले. वजह यह कि रोहित उस पर शादी के बाबत दबाव बनाने लगा था जो उस से बरदाश्त नहीं हो पा रहा था.

पर वापसी के पहले विभा ने एक आखिरी कोशिश इस सोच के साथ शौर्ट मूवी बना कर की थी कि अगर मूवी चल निकली तो आगे के रास्ते और किस्मत के दरवाजे खुदबखुद खुलते चले जाएंगे. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. उलटे जो हुआ वह उस की बनाई रील का रीयल लाइफ में उतर आना था.

अपनी बनाई मूवी में विभा ने अपनी पूरी कल्पनाशीलता, रचनात्मकता और प्रतिभा झोंक दी थी. इस मूवी की प्रोड्यूसर उस की छोटी बहन आभा थी. मूवी के कथानक के आधार पर उस ने उस का नाम फ्रायडे नाइट रखा था.

फ्रायडे नाइट की कहानी मसालों से भरपूर थी, जिस की शूटिंग विभा ने अपने ही फ्लैट पर की थी. इस कहानी की मुख्य पात्र भी वही थी, जो एक लड़के से प्यार करने लगती है. लड़का विभा को धोखा दे देता है तो वह तिलमिला उठती है.

इस के पहले वह अपने प्रेमी के सामने रोतीगिड़गिड़ाती है, लेकिन उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता. एक वक्त ऐसा भी आता है, जब विभा की हालत पागलों जैसी हो जाती है और इसी गुस्से में वह एक सख्त फैसला ले लेती है.

यह सख्त फैसला होता है अपने बेवफा प्रेमी का कत्ल कर देने का, जिसे वह एक शुक्रवार की रात को अंजाम देती है. विभा को लगा था कि उस की फिल्म बाजार में आते ही हाहाकार मचा देगी और बौलीवुड उसे हाथोंहाथ ले लेगा.

अपनी फिल्म को ले कर विभा ने कई चैनलों के चक्कर लगाए, लेकिन उसे किसी ने भाव नहीं दिया. अंतत: उस ने 2 साल पहले इस फिल्म को यूट्यूब पर अपलोड कर दिया. यूट्यूब पर भी नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं मिले. फ्रायडे नाइट को देखने वालों की संख्या मुश्किल से 5 अंकों में पहुंच पाई.

13 जुलाई को हजारों लोग विभा के पांचवीं मंजिल स्थित उस फ्लैट की तरफ उत्सुकता से देख रहे थे, जहां कभी फ्रायडे नाइट की शूटिंग हुई थी. इन में कितने ही लोग उस वीडियो को भी देख रहे थे जिसे रोहित ने वायरल किया था.

इस वीडियो में रोहित लाल बनियान में नजर आ रहा था और विभा पलंग पर बेहोश पड़ी थी. वीडियो में रोहित गुहार लगाता नजर आ रहा था कि देखो पुलिस और विभा के घर वाले हम बच्चों पर कितना जुल्म ढा रहे हैं.

रोहित के मुताबिक वह और विभा दोनों एकदूसरे से प्यार करते थे और शादी करना चाहते थे. लेकिन विभा के घर वाले इस के लिए तैयार नहीं थे. आज जब वह विभा से मिलने आया तो उन्होंने पुलिस बुला ली. पुलिस वालों ने दोनों की इतनी पिटाई की कि शरीर के कई हिस्सों से खून बह रहा है. उस ने बहता हुआ खून भी दिखाया.

वीडियो वायरल होने की देर थी कि लोग मुफ्त का तमाशा देखने मिसरोद की तरफ दौड़ पड़े. रोहित का यह कहना गलत नहीं था कि विभा के घर वालों ने पुलिस बुला ली है.

पुलिस घटनास्थल पर मौजूद तो थी लेकिन यह सोच कर सकपकाई हुई थी कि इस सिचुएशन से कैसे निपटा जाए. मतलब यह कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. यानी विभा की जान भी बच जाए और रोहित को गिरफ्तार भी कर लिया जाए.

दरअसल उस दिन सुबह करीब 7 बजे मिसरोद थाना इंचार्ज एस.के. चौकसे को एम.पी. श्रीवास्तव के फोन पर इत्तला दी थी कि रोहित नाम के एक युवक ने उन के फ्लैट में जबरन घुस कर उन की बड़ी बेटी विभा को फ्लैट के आखिरी कमरे में बंधक बना रखा है. उन्हें यह बात तब पता चली जब वह दूध लेने फ्लैट से बाहर निकले थे.

मामला गंभीर था और संभ्रांत कालोनी से ताल्लुक रखता था, इसलिए 3 सदस्यीय पुलिस टीम जल्द ही फार्च्यून डिवाइन सिटी पहुंच गई. पुलिस दल का नेतृत्व एसआई एस.एस. राजपूत कर रहे थे. उन्होंने सारा मामला समझ कर रोहित को बहलाफुसला कर काबू में करने की कोशिश की लेकिन वह कामयाब नहीं हुए.

सुबहसुबह पुलिस को आया देख कालोनी के लोग विभा के घर के नीचे इकट्ठा हो कर माजरा समझने की कोशिश करने लगे थे. उन्हें इतना ही पता चल पाया कि श्रीवास्तवजी के घर कोई सिरफिरा घुस आया है, जिस ने उन की बड़ी बेटी को बंधक बना लिया है और तरहतरह की धमकियां दे रहा है.

रोहित को इस बात की आशंका थी कि विभा के मातापिता पुलिस को बुलाएंगे इसलिए वह सतर्क था. एम.पी. श्रीवास्तव उन की पत्नी चंद्रा और छोटी बेटी आभा हलकान थीं कि अंदर कमरे में विभा पर रोहित जाने क्याक्या जुल्म ढा रहा होगा. इस डर की वजह रोहित के हाथ में देसी कट्टे का होना था.

एसआई राजपूत ने रोहित से बात करने की कोशिश की तो उस ने मोबाइल चार्जर की मांग की. राजपूत से चार्जर लेने के लिए रोहित ने दरवाजा थोड़ा खोला तो उन्होंने हाथ अड़ा कर पूरा दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन रोहित इस स्थिति के लिए तैयार था. उस ने कैंची से राजपूत के हाथ पर हमला कर दिया और उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी. चोट से तिलमिलाए एसआई राजपूत ने हाथ वापस खींच लिया तो रोहित ने चार्जर ले कर कमरा फिर से बंद कर लिया.

पुलिस को आया देख विभा की हिम्मत बढ़ी और उस ने रोहित का विरोध किया. इस पर झल्लाए रोहित ने विभा के हाथ और गले पर कैंची से वार कर के उसे घायल कर दिया. खून बहने से विभा बेहोश हो गई तो उस ने उसे बिस्तर पर पटक दिया और इसी हालत में वीडियो शूट कर वाट्सऐप पर डाल दिया.

इस वीडियो के वायरल होते ही भोपाल में हड़कंप मच गया. थोड़ी देर में पुलिस के आला अफसर भी मौके पर पहुंच गए. एसपी (साउथ) राहुल लोढा ने भी रोहित से बातचीत कर के उस की मंशा जाननी चाही. शुरू में तो वह बात करने से कतराता रहा लेकिन खामोश रहने से बात नहीं बन रही थी, इसलिए उस ने जल्द ही अपने दिल की बात जाहिर कर दी कि वह विभा से प्यार करता है और उस से शादी करना चाहता है.

इस दौरान पुलिस ने रोहित के पिता को भी खबर कर दी थी, इसलिए वह अलीगढ़ से भोपाल के लिए निकल गए थे. दरअसल, रोहित की एक शर्त यह भी थी कि वह अपने पिता के आने के बाद ही दरवाजा खोलेगा.

यह पुलिस और प्रशासन का इम्तिहान था. वजह अपनी पर उतारू हो आया रोहित विभा को जान से भी मार सकता था. ऐसे में पुलिस वालों ने उस की हर बात मानने में ही भलाई समझी और लगातार उस से बात कर के उसे उलझाए रखा.

रोहित ने दूध मांगा तो वह भी उसे दिया गया, लेकिन वह दरवाजा खोलने को तैयार नहीं था, इसलिए दूध की बोतल छत से रस्सी से लटका कर दी गई. रोहित ने बोतल का दूध लेने से मना कर दिया क्योंकि उसे डर था कि कहीं उस में कोई नशीला या बेहोश कर देने वाला पदार्थ न हो. इस के बाद उस ने हर चीज पैक्ड मांगी जो उसे मुहैया कराई गई.

उधर रोहित द्वारा जारी वीडियो में विभा लहूलुहान और बेहोश दिखाई दे रही थी, जिसे देख कर उस के मांबाप और बहन की चिंता बढ़ती जा रही थी. वीडियो में रोहित एसआई एस.एस. राजपूत को भी कोसता नजर आया. दोपहर होतेहोते स्थिति और विकट हो चली थी. रोहित कुछ समझने को तैयार नहीं था और बारबार विभा से शादी करने की रट लगाए जा रहा था. खाना और पानी भी उसे बालकनी से दिया गया था, जो उस की मांग के मुताबिक पैक्ड था.

जब खूब हल्ला मच गया तो शाम के करीब 5 बजे आला पुलिस अधिकारी हाइड्रोलिक मशीन के जरिए 5वीं मंजिल तक पहुंचे और रोहित से बातचीत की. हाइड्रोलिक मशीन पर राहुल लोढ़ा के साथ एसडीएम दिशा नागवंशी और एएसपी रामवीर यादव थे.

इन लोगों ने खिड़की से रोहित से बात की और उसे भरोसा दिलाया कि उस की शादी विभा से करवा दी जाएगी, इस में कोई अड़चन इसलिए नहीं है क्योंकि दोनों बालिग हैं और शादी के लिए राजी हैं.

राहुल लोढ़ा ने समझदारी से काम लेते हुए रोहित को आश्वस्त किया कि शादी रजिस्टर्ड होगी, क्योंकि एसडीएम भी उन के साथ हैं. चूंकि बंद कमरे में शादी नहीं करवाई जा सकती थी, इसलिए उन्होंने रोहित से बाहर आने के लिए कहा.

रोहित समझ तो रहा था कि यह पुलिस की चाल भी हो सकती है, लेकिन अब तक 12 घंटे गुजर चुके थे और वह थकने लगा था. वह बारबार विभा को धमका रहा था. होश में आ चुकी विभा की समझ में भी आ गया था कि इस सिरफिरे से छुटकारा पाने का एक ही तरीका है कि उस की बात मान ली जाए.

मेरी नहीं हुई तो मैं तुम्हें किसी और की भी नहीं होने दूंगा. अगर किसी और से शादी की तो मार डालूंगा, जैसे फिल्मी डायलौग बोलने वाले राहुल को थोड़ी तसल्ली तब हुई, जब विभा ने स्टांप पेपर पर शादी की सहमति दे दी.

इधर पुलिस वाले भी कुछ इस तरह से पेश आ रहे थे, मानो बाहर आते ही दोनों की शादी करा देंगे. रोहित को लग रहा था कि वह प्यार की जंग जीत गया है, जमाना उस के सामने झुक गया है.

वह पूरी ठसक से बाहर निकल आया. इस के पहले उस ने कुछ मीडियाकर्मियों से वीडियो कालिंग के जरिए बात की और जीत का निशान अंगरेजी का ‘वी’ अक्षर बनाते हुए खुशी जाहिर की थी.

बाहर आते ही पुलिस ने सिरफिरे आशिक रोहित को गिरफ्तार कर लिया और विभा सहित उसे इलाज के लिए अस्पताल भेज दिया, क्योंकि दोनों के शरीर से काफी खून बह चुका था. वहां गुस्से में मौजूद महिलाओं ने रोहित की जूतेचप्पलों और लातघूसों से खूब धुनाई की.

इलाज के बाद रोहित को हिरासत में ले लिया गया और विभा को घर जाने दिया गया. अस्पताल में विभा ने बताया कि वह रोहित से प्यार नहीं करती, उस ने तो खुद के बचाव के लिए शादी के हलफनामे पर दस्तखत कर दिए थे.

विभा की मां चंद्रा ने खुलासा किया कि एक साल से रोहित विभा के पीछे पड़ा था और उसे तरहतरह से तंग कर रहा था. इसी साल होली के मौके पर 28 मार्च को भी वह उन के घर में घुस आया था, तब भी उस के हाथ में कट्टा था. इस की शिकायत थाने में लिखाई गई थी और पुलिस ने रोहित को गिरफ्तार भी किया था, लेकिन बाद में उसे कोर्ट से जमानत मिल गई थी.

इधर मथुरा तक आ गए रोहित के पिता रेशमपाल को जैसे ही ड्रामे के खात्मे की जानकारी मिली, वह वहीं से वापस लौट गए. उन्होंने यह जरूर बताया कि वह रोहित की बेजा हरकतों से आजिज आ चुके हैं. इसीलिए कुछ दिन पहले उन्होंने उसे अपनी जायदाद से बेदखल कर दिया था. गांव में प्रधानी के चुनाव के दौरान रोहित द्वारा शराब चुराए जाने की बात भी उन्होंने बताई.

रेशमपाल ने ईमानदारी से यह भी बताया कि रोहित ने कई दफा इस लड़की (विभा) से फोन पर उन की बात कराई थी. यानी लोगों का यह अनुमान गलत नहीं था कि मामला उतना एकतरफा नहीं था, जितना विभा बता रही थी. उस ने भले ही रोहित से प्यार की बात नहीं स्वीकारी, पर यह जरूर कह रही थी कि रोहित का असली चेहरा सामने आने के बाद उस ने उस से दूरियां बनानी शुरू कर दी थीं.

जाहिर है माशूका की इसी बेरुखी से रोहित झल्लाया हुआ था. उसे विभा बेवफा नजर आने लगी थी, लेकिन वह उसे दिलोदिमाग से निकाल नहीं पा रहा था. गिरफ्तारी के दूसरे दिन रोहित पुलिस वालों से यह कहता रहा कि उन एसपी साहब को लाओ, जिन्होंने शादी करवाने का वादा किया था.

उस के मुंह से यह सुन कर सभी को उस पर हंसी भी आई और तरस भी. पुलिस वाले इस ड्रामे को थर्सडे नाइट कहते नजर आए, क्योंकि इस की शुरुआत गुरुवार 12 जुलाई से हुई थी.

श्रीवास्तव परिवार अभी सदमे से उबरा नहीं है और न ही लंबे समय तक उबर पाएगा. रोहित ने 12 घंटे जो ड्रामा किया, उस की दहशत उन के सिर चढ़ कर बोल रही है. खुद विभा आशंका जता रही है कि अगर रोहित को जमानत मिली तो वह फिर उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेगा.

रोहित के पिता रेशमपाल का भी यही कहना है कि रोहित को जमानत नहीं मिलनी चाहिए. कथा लिखने तक रोहित को जमानत नहीं मिली थी, पर भोपाल के सीनियर वकीलों का कहना है कि कुछ देर से ही सही, उसे जमानत मिल ही जाएगी. इसलिए बदनामी झेल चुके श्रीवास्तव परिवार को संभल कर रहना चाहिए.

जिद ने बनाया हत्यारा : धर्मेंद्र और चैतन्य का कैसा था हठ

योगमाया साहू छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के किशनपुर में स्थित उपस्वास्थ्य केंद्र में एएनएम थी. वहीं पर उसे सरकारी क्वार्टर मिला हुआ था, जिस में वह अपने पति चैतन्य साहू और 2 बेटों तन्मय और कुणाल के साथ रहती थी. चैतन्य साहू भी रायपुर के एक प्राइवेट अस्पताल में नौकरी करता था. चूंकि दोनों पतिपत्नी कमा रहे थे, इसलिए घर में आर्थिक समस्या नहीं थी. परिवार खुशहाली से रह रहा था.

घर की साफसफाई और बरतन मांजने के लिए योगमाया ने त्यागी राणा नाम की एक बाई रख रखी थी. वह घर में झाड़ूपोंछा आदि काम निबटा कर चली जाती थी. घर के मुख्य दरवाजे की 2 चाबियां थीं. उन में से एक चाबी योगमाया ने बाई को दे रखी थी और एक को वह खुद अपने पास रखती थी.

बात पहली जून, 2018 की है. काम वाली बाई त्यागी राणा रोज की तरह उस दिन भी सुबह 6 बजे सफाई करने एएनएम योगमाया साहू के क्वार्टर पर पहुंची. घर के मुख्य दरवाजे पर ताला बाहर से लगा देख बाई त्यागी राणा को अजीब लगा. क्योंकि अमूमन गेट पर ताला अंदर की ओर से बंद रहता था.

अपने पास मौजूद चाबी से गेट का ताला खोल कर वह अंदर आई तो उस ने कमरे के दरवाजे को हलका सा धक्का दिया तो दरवाजा खुल गया. कमरे में कोई नहीं था. उस के बाद आवाज लगाती हुई वह आंगन में पहुंची तो आंगन में खून देख कर वह घबरा गई और उलटे पांव चीखती हुई बाहर भागी.

वह सीधी स्वास्थ्य केंद्र में मौजूद मितानिन हिरौंदी बाई साहू के पास पहुंची. वह उसी स्वास्थ्य केंद्र में नौकरी करती थी. उस ने उन्हें अपनी आंखों देखी बात बताई. स्वास्थ्य केंद्र में मौजूद स्टाफ के लोग एएनएम योगमाया के क्वार्टर पर पहुंचे तो वहां का नजारा देख कर सभी चौंक गए.

योगमाया साहू, पति चैतन्य साहू और उस के बड़े बेटे तन्मय की रक्तरंजित लाशें आंगन में पड़ी हुई थीं. दूसरे कमरे में छोटे बेटे कुणाल का खून से लथपथ शव खाट के एक कोने में पड़ा था.

स्वास्थ्य केंद्र में खबर देने के बाद बाई सरपंच सुरेश खुंटे के घर पहुंच गई. सरपंच ने जब सुना कि चैतन्य के घर में 4 हत्याएं हो चुकी हैं तो वह भी हैरान रह गए. पलभर में ही यह खबर पूरे किशनपुर में फैल गई. देखते ही देखते सैकड़ों तमाशबीन मौके पर पहुंच गए.

सूचना सरपंच सुरेश खुंटे ने पिथौरा थाने के थानाप्रभारी को फोन द्वारा दे दी. थानाप्रभारी रात की गश्त से लौट कर गहरी नींद में सो रहे थे. जैसे ही सरपंच का फोन आया तो उन की नींद काफूर हो गई. वह तुरंत सहयोगियों के साथ घटनास्थल की तरफ रवाना हो गए.

थानाप्रभारी ने घटनास्थल पर पहुंच कर मौकामुआयना किया. उन्होंने सूचना आला अधिकारियों को दे दी. चौहरे हत्याकांड की सूचना पाने के कुछ देर बाद ही एसपी संतोष सिंह, एएसपी संजय धु्रव और एएसपी (प्रशिक्षु आईपीएस) उदय किरण घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस अधिकारियों ने मौकामुआयना किया. आंगन में फैला खून देख कर ऐसा लग रहा था जैसे घटना को 3-4 घंटे पहले अंजाम दिया गया हो. एएनएम योगमाया, उन के पति चैतन्य साहू और बड़े बेटे तन्मय की लाश एक साथ पड़ी थी. लाश से थोड़ी दूर खून से सना एक फावड़ा पड़ा था. लग रहा था कि हत्यारों ने इसी फावड़े से हत्या की थी.

कमरे में लोहे की अलमारी खुली पड़ी थी. उस का सामान फर्श और बिस्तर पर बिखरा पड़ा था. यह सब देख कर यही अनुमान लगाया जा रहा था कि हत्यारे शायद चोरी की नीयत से घर में घुसे होंगे. जैसे ही उन्होंने अलमारी का लौक खोलने की कोशिश की होगी तो खटपट की आवाज सुन कर घर के किसी सदस्य की आंख खुली होगी. इसी बीच घटना को अंजाम दिया गया होगा.

पुलिस ने घटना की सूचना मृतक चैतन्य के पिता बाबूलाल साहू को दे कर मौके पर बुला लिया. वह सांकरा में अकेले रहते थे.

घटना से 2 दिन पहले ही यानी 30 मई, 2018 की शाम करीब 5 बजे बाबूलाल साहू कुछ रिश्तेदारों के साथ बेटा, बहू और पोतों से मिलने किशनपुर आए थे. 3-4 घंटे बच्चों के बीच बिताने के बाद रात वह करीब 9 बजे सांकरा वापस लौट गए थे.

एसपी संतोष सिंह ने बाबूलाल साहू से बेटे या बहू की किसी से कोई रंजिश या दुश्मनी की बात पूछी तो उन्होंने किसी से रंजिश या दुश्मनी होने से साफ इनकार कर दिया. पुलिस को पता चला कि मोहल्ले में चैतन्य या योगमाया साहू का व्यवहार बहुत अच्छा था. किसी के मुसीबत में होने पर दोनों पतिपत्नी उस की तीमारदारी करने उस के घर पहुंच जाते थे. इसलिए किशनपुर का एकएक बच्चा उन के व्यवहार से वाकिफ था.

जब ये इतने भले इंसान थे तो पुलिस यह नहीं समझ पा रही थी कि इस वारदात को किस ने अंजाम दिया, गुत्थी काफी उलझी और पेचीदगी से भरी थी. ध्यान देने वाली बात यह थी कि हत्यारों ने पुलिस को गुमराह करने के लिए घटना को लूटपाट में तब्दील करने की कोशिश की थी. घर की सारी वस्तुएं मौजूद मिलीं.

रायपुर से फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड टीम भी वहां पहुंची, लेकिन उस के हाथ कोई खास सफलता नहीं लगी. स्थानीय लोगों से पूछताछ में पता चला कि रात में चीखने की आवाज तो आ रही थी. उन्होंने यह सोच कर इस ओर ध्यान नहीं दिया कि अस्पताल है, प्रसव पीड़ा के समय यहां महिलाएं चीखती हैं. हो सकता है कोई महिला प्रसव पीड़ा से तड़प रही हो इसीलिए वह आवाज सुन कर भी अपने घरों से बाहर नहीं निकले और हत्यारे अपने काम पूरे कर गए.

पुलिस ने घटना की रिपोर्ट दर्ज कर जांच शुरू कर दी. ब्लाइंड मर्डर की गुत्थी को सुलझाने के लिए एसपी संतोष सिंह ने एएसपी संजय धु्रव के नेतृत्व में एक एसआईटी का गठन किया गया.

एसआईटी में प्रशिक्षु आईपीएस उदय किरण, पिथौरा एसडीपीओ के अलावा क्राइम ब्रांच के 10 पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया. इस के अलावा पुलिस की 3 टीमों को पिथौरा से बाहर भेजा गया.

सनसनीखेज चौहरे हत्याकांड के खुलासे के लिए पुलिस हत्यारों की खोजबीन में भटक रही थी. घटना के 3 दिनों बाद यानी 3 जून की शाम को पुलिस ने शक के आधार पर किशनपुर के ही रहने वाले 3 व्यक्तियों को हिरासत में ले कर पूछताछ की. संदिग्धों से पूछताछ में जब कोई नतीजा नहीं निकला तो उन्हें सख्त हिदायत दे कर छोड़ दिया.

पुलिस ने जहां से जांच की काररवाई शुरू की थी, घूमफिर कर वहीं आ खड़ी हुई. पुलिस ने मृतक पतिपत्नी की काल डिटेल्स की जांच कर ली थी लेकिन उस में कोई काल संदिग्ध नहीं मिली.

घटना की परिस्थितियों से साफ पता चल रहा था कि इस में कोई अपना शामिल है. लेकिन वह कौन है? पुलिस इसी बात का पता लगाने में जुटी हुई थी. जब पुलिस को कहीं से कोई सुराग हाथ नहीं लगा तो उस ने 4 जून को उसी एरिया के मोबाइल टावर के संपर्क में आने वाले फोन नंबरों की लिस्ट निकलवाई.

हजारों मोबाइल नंबरों की लोकेशन ट्रेस हुई. काफी मेहनत और मशक्कत के बाद उन नंबरों में से एक संदिग्ध नंबर सामने आया जो 30/31 मई की रात 2 से 3 बजे के बीच घटनास्थल पर मौजूद मिला था. उस के बाद बड़ी तेजी से उस की लोकेशन बदलती गई.

पते की बात तो यह थी कि वही संदिग्ध नंबर चैतन्य साहू की काल डिटेल्स में भी पाया गया था. एक ही नंबर दोनों जगह पाए जाने से वह नंबर संदेह के घेरे में आ गया.

पुलिस ने उस संदिग्ध नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि वह नंबर किशनपुर के रहने वाले धर्मेंद्र बहिरा के नाम पर लिया गया था. धर्मेंद्र बहिरा के बारे में पुलिस को पता चला कि वह प्लंबर का काम करता है.

5 जून, 2018 को एसआईटी ने धर्मेंद्र बहिरा को उस के घर से दबोच लिया. एएसपी संजय धु्रव ने उस से सख्ती से पूछताछ शुरू की, ‘‘अच्छा, यह बताओ कि तुम साहू परिवार को कितने दिनों से जानते हो?’’

‘‘साहब, वे मेरे पड़ोसी थे, इसलिए मैं उन्हें लंबे समय से जानता हूं.’’ धर्मेंद्र ने हाथ जोड़ कर जवाब दिया.

‘‘तब तो उन के घर में तुम्हारी अंदर तक पैठ बनी होगी?’’ एएसपी ने फिर सवाल किया.

‘‘नहीं साहब, उन के यहां कभी- कभार जाना होता था. चैतन्य साहू एक बार मेरे पास प्लंबिंग का काम कराने के लिए आए थे.’’ उस ने बताया.

‘‘30/31 मई की रात में तुम कहां थे?’’ एएसपी ने अगला सवाल किया.

‘‘सर, मैं उस रात अपने घर पर था.’’ धर्मेंद्र बोला.

‘‘तुम अपने घर पर थे तो तुम्हारा मोबाइल साहू के घर क्या कर रहा था?’’ एएसपी संजय ने अंधेरे में तीर चलाया.

इतना सुन कर धर्मेंद्र सन्न रह गया. उन्होंने उस के चेहरे के उड़े रंग को भांप लिया था.

‘‘चलो, सीधे मुद्दे पर आते हैं. अच्छा यह बता दो कि तुम ने साहू परिवार का कत्ल क्यों किया? सहीसही बताना.’’ इस बार थानाप्रभारी दीपक चंद ने सवाल किया था.

‘‘साहब, यह झूठ है, मैं ने किसी को नहीं मारा है.’’ धर्मेंद्र ने जवाब दिया.

एएसपी संजय धु्रव और थानाप्रभारी दीपक चंद समझ गए कि यह आसानी से मानने वाला नहीं है. इस के बाद उन्होंने उस के साथ सख्ती से पूछताछ की तो वह पूरी तरह टूट गया और कबूल कर लिया कि उसी ने साहू परिवार के चारों सदस्यों को मौत के घाट उतारा है.

इस के बाद वह पूरी कहानी तोते की तरह बकता चला गया. पुलिसिया पूछताछ से पता चला कि वह बड़ा ही नराधम निकला, महज चंद रुपयों की खातिर उस ने हंसतेखेलते पूरे परिवार की जिंदगी छीन ली. पूछताछ में कहानी कुछ ऐसी सामने आई—

40 वर्षीय चैतन्य साहू मूलरूप से छत्तीसगढ़ के रायपुर का रहने वाला था. इसी जिले की आरंग की रहने वाली योगमाया से उस की शादी सन 2008 में हुई थी. शादी के बाद चैतन्य के 2 बच्चे हुए. उस की जिंदगी खुशियों से भरी हुई थी. वे दोनों बच्चों की ठीक से परवरिश करने में लगे थे.

शादी के 7 साल बाद चैतन्य की भी रायपुर के ओम अस्पताल में वार्डबौय की नौकरी लग गई थी. 3 साल तक उस ने वहां नौकरी की. शादी के 8 साल बाद जुलाई 2016 में उस की पत्नी योगमाया की भी नौकरी स्वास्थ्य विभाग में एएनएम पद पर लग गई. उस की पहली पोस्टिंग महासमुंद जिले के किशनपुर के उप स्वास्थ्य केंद्र में हुई थी, जिस के बाद से पतिपत्नी बच्चों सहित रायपुर छोड़ कर पिथौरा में रहने लगे.

योगमाया साहू को किशनपुर के उप स्वास्थ्य केंद्र में ही रहने के लिए क्वार्टर मिल गया था. थोड़े ही समय में पतिपत्नी ने अपने मृदुल व्यवहार से किशनपुर के नागरिकों को अपना मुरीद बना लिया था. योगमाया पीडि़त महिलाओं का खास खयाल रखती थी. प्रसव वेदना के समय वह तीमारदारों की हिम्मत बंधाती थी. यही नहीं, तीमारदारों के बुलाने पर दोनों पतिपत्नी उन के घर तक पहुंच जाते थे.

उप स्वास्थ्य केंद्र के पास में 28 वर्षीय धर्मेंद्र बहिरा अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में मांबाप और भाईबहन थे. वह अविवाहित था. धर्मेंद्र मेहनतकश इंसान था. वह एक अच्छा प्लंबर था. लोग उसे बुला कर अपने घरों में काम करवाते थे. योगमाया के यहां उस का आनाजाना था.

एक दिन की बात है. एएनएम योगमाया के क्वार्टर का नल खराब हो गया. चैतन्य ने धर्मेंद्र के घर जा कर क्वार्टर का नल ठीक करने को कह दिया. अगले दिन धर्मेंद्र ने योगमाया के क्वार्टर का नल ठीक कर दिया. इस काम की उस की मजदूरी डेढ़ सौ रुपए हुई थी. चैतन्य ने उसे अगले दिन आ कर पैसे ले जाने को कह दिया तो धर्मेंद्र बिना कुछ बोले मुसकरा कर वहां से चला गया.

अगले दिन धर्मेंद्र अपनी मजदूरी के पैसे लेने चैतन्य के क्वार्टर पर गया. चैतन्य घर पर ही था. उस ने कह दिया कि पैसे शाम में आ कर ले जाना, अभी मेमसाहब घर पर नहीं हैं. पैसे उन्हीं के पास रहते हैं. यह सुन कर धर्मेंद्र को बुरा लगा लेकिन पड़ोस की बात होने के नाते बिना कुछ कहे वापस लौट गया.

उस के बाद ऐसे करतेकरते कई दिन बीत गए. चैतन्य कोई न कोई बहाना बना कर उसे घर से वापस लौटा देता था लेकिन उसे पैसे नहीं दिए. चैतन्य अब इस बात पर आ कर अड़ गया कि 50 रुपए के काम के डेढ़ सौ रुपए क्यों दूं. मैं डेढ़ सौ नहीं केवल 50 रुपए ही दूंगा.

उस के बाद पैसों को ले कर चैतन्य और धर्मेंद्र के बीच विवाद छिड़ गया. धर्मेंद्र ने चैतन्य से कह दिया कि वह अपनी मजदूरी के डेढ़ सौ रुपए उस से वसूल कर के ही रहेगा. चैतन्य ने भी कह दिया कि वह जो चाहे कर ले, 50 रुपए से एक फूटी कौड़ी ज्यादा नहीं देगा. योगमाया भी पति के ही पक्ष में बोलने लगी. मजदूरी को ले कर दोनों के बीच बात बढ़ गई.

धर्मेंद्र ने सोच लिया कि वह अपनी मेहनत के पैसे ले कर रहेगा, चाहे कुछ भी हो जाए. धर्मेंद्र ने मन ही मन सोच लिया कि उसे अब क्या करना है. उस ने सोच लिया कि चैतन्य साहू मजदूरी के पैसे नहीं दे रहा है तो कोई बात नहीं, वह उस से इस के कई गुना वसूल कर लेगा.

दरअसल चैतन्य के क्वार्टर पर आतेजाते धर्मेंद्र उस के क्वार्टर के कोनेकोने से परिचित हो चुका था. उसे मालूम हो चुका था कि घर में कहांकहां कीमती चीजें रखी जाती हैं.

उसे यह तक पता चल चुका था कि चैतन्य की पत्नी एएनएम योगमाया साहू के पास सोने और चांदी के कितने गहने हैं और वह कहां रखे हैं. उस ने अपनी मजदूरी के एवज में गहनों को चुराने की योजना बना ली.

योजना के मुताबिक 30-31 मई, 2018 की रात धर्मेंद्र बहिरा चैतन्य साहू के सरकारी क्वार्टर में चुपके से पीछे के रास्ते से घुस गया. उस ने अपने साथ फावड़ा ले रखा था ताकि मुसीबत के वक्त वह अपना बचाव कर सके. दबे पांव क्वार्टर में घुस कर उस ने कमरे का निरीक्षण किया.

देखा कि सभी गहरी नींद में सो रहे थे. फिर वह बीच कमरे में रखी अलमारी के पास गया और अपनी मास्टर की से अलमारी खोलने लगा. चाबी की आवाज सुन कर चैतन्य की नींद टूट गई.

उठ कर वह उस ओर बढ़ा जिस ओर से खड़खड़ाहट की आवाज आ रही थी. चैतन्य कमरे में पहुंचा तो धर्मेंद्र को देख कर चौंक गया. धर्मेंद्र की नजर जब चैतन्य पर पड़ी, उसे सामने देखा तो उसे सांप सूंघ गया. वह बुरी तरह डर गया और घबरा गया कि अब उस की चोरी पकड़ी जाएगी.

इस घबराहट में उसे कुछ सूझा नहीं तो फावड़े से चैतन्य की गरदन पर ताबड़तोड़ कई वार कर दिए. वह चीखता हुआ फर्श पर जा गिरा. धड़ाम की आवाज सुन कर योगमाया की नींद टूट गई और कमरे में आ गई. फर्श पर पति को लहूलुहान देख कर उस के मुंह से चीख निकल पड़ी.

धर्मेंद्र योगमाया को सामने देख कर घबरा गया. घबराहट में उस ने योगमाया की भी गरदन पर फावड़े से ताबड़तोड़ वार कर उसे भी मौत के घाट उतार दिया. इसी बीच मां की आवाज सुन कर तन्मय भी उठ कर कमरे में आ गया और धर्मेंद्र को पहचान गया तो धर्मेंद्र ने उसे भी मौत के उतार दिया. उस के बाद तीनों की लाशें घसीट कर आंगन में ले गया.

चैतन्य का एक और बेटा कुणाल जिंदा था और वह कमरे में अभी भी सो रहा था. धर्मेंद्र को डर था कि कुणाल उसे पहचानता है. कहीं वह जिंदा बच गया और उस ने भांडा फोड़ दिया तो उसे जेल जाना पड़ सकता है. उस समय धर्मेंद्र की मति ऐसी मारी जा चुकी थी कि वह इतना तक नहीं समझ सका कि जब गहरी नींद में सो रहे कुणाल ने उसे वारदात करते देखा ही नहीं है तो वह उस का नाम क्यों लेगा.

फिर क्या था विवेकहीन हो चुका धर्मेंद्र उस कमरे में जा पहुंचा, जहां कुणाल सोया था. उस ने सोते हुए कुणाल पर फावड़े से वार कर उसे भी मौत के घाट उतार दिया और लाश उसी बिस्तर पर छोड़ दी.

चारों को मौत के घाट उतारने के बाद दरिंदा बन चुके धर्मेंद्र को होश आया तो उस के होश फाख्ता हो गए. चारों ओर खून ही खून देख कर वह घबरा गया और फावड़ा आंगन में ही छोड़ कर मौके से फरार हो गया. अब उसे पश्चाताप हो रहा था कि आवेश में आ कर वह कितना बड़ा गुनाह कर बैठा.

चंद रुपयों के लिए उस ने हंसतेखेलते परिवार की दुनिया ही उजाड़ दी. लेकिन उस के पश्चाताप करने से अब क्या फायदा होने वाला था. जो होना था सो तो हो चुका था. साहू परिवार की दुनिया ही उजड़ चुकी थी.

5 जून, 2018 को पुलिस ने धर्मेंद्र बहिरा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. जेल में बंद धर्मेंद्र अपने किए पर पश्चाताप के आंसू बहा रहा था. काश, धर्मेंद्र पहले ही सोचसमझ कर कदम उठाता तो आज साहू परिवार दुनिया में सांस ले रहा होता.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

‘माया’ जाल में फंसा पति : जवानी में अगर बहक जाएं पैर

चित्रकूट जिले के गांव लोहदा का रहने वाला फूलचंद विश्वकर्मा कानपुर की एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में ट्रक ड्राइवर की नौकरी करता था. उस की मां और बड़े भाई का परिवार गांव में रहते थे. ट्रक ड्राइवर का पेशा ऐसा है, जिस में कई बार आदमी को लौटने में महीनोंमहीनों लग जाते हैं. इसी वजह से फूलचंद पिछले एक साल से गांव में रह रही बूढ़ी मां और भाई के परिवार से नहीं मिल सका था. समय मिला तो उस ने 5 जुलाई, 2018 को गांव जाने का फैसला किया.

फूलचंद तहसील राजापुर स्थित अपने गांव लोहदा पहुंचा तो उस की वृद्धा मां तो पुश्तैनी घर में मिल गई, लेकिन अलग रह रहा बड़ा भाई शिवलोचन और उस का परिवार घर में नहीं था. वह मां से मिला तो उस की आंखें भर आईं और वह उस के गले लग कर रो पड़ी. फूलचंद को लगा कि मां से एक साल बाद मिला है, इसलिए वह भावुक हो गई है. उस ने जैसेतैसे सांत्वना दे कर मां को चुप कराया और बड़े भाई शिवलोचन और उस के परिवार के बारे में पूछा.

उस की मां चुनकी देवी ने रोते हुए बताया कि पिछले 8 महीने से शिवलोचन का कोई पता नहीं है. बहू माया भी 7-8 महीने पहले दोनों बच्चों को ले कर अपने मायके चली गई थी. तब से वापस नहीं लौटी.

मां की बात सुन कर फूलचंद परेशान हो गया. उस ने इस बारे में मां से विस्तार से पूछा तो उस ने बताया कि 8 महीने पहले जब कई दिनों तक शिवलोचनदिखाई नहीं दिया तो उस ने और गांव वालों ने बहू माया से उस के बारे में पूछा.

माया ने बताया कि शिवलोचन अपनी नौकरी पर कर्वी चला गया है. इस के कुछ दिन बाद माया भी यह कह कर दोनों बच्चों के साथ मायके चली गई कि घर में राशन खत्म हो गया है. जब शिवलोचन लौट आएं तो खबर भिजवा देना, मैं आ जाऊंगी.

फूलचंद को मालूम था कि उस का भाई शिवलोचन कर्वी के एक जमींदार तेजपाल सिंह के खेतों में टै्रक्टर चलाने का काम करता था. जमींदार की गाडि़यां भी वही ड्राइव करता था. मां ने बताया कि उस ने शिवलोचन को कई बार फोन भी कराया था, लेकिन उस का फोन बंद था. मां ने आशंका व्यक्त करते हुए यह भी कहा कि शिवलोचन इतने महीनों तक कभी भी कर्वी में नहीं रहा, बीचबीच में वह आता रहता था.

फूलचंद इस बात को समझता था कि आदमी भले ही कितना भी व्यस्त क्यों न रहे, ऐसा नहीं हो सकता कि अपने परिवार की सुध ही न ले. संदेह की एक वजह यह भी थी कि भाई का हालचाल जानने के लिए फूलचंद ने खुद भी भाई के मोबाइल पर फोन किए थे, लेकिन उस का फोन हर बार बंद मिला था. उस वक्त उस ने यही सोचा था कि संभव है, भाई किसी ऐसी जगह पर हो, जहां नेटवर्क न मिलता हो.

संदेह पैदा हुआ तो फूलचंद उसी दिन गांव के 2 आदमियों को साथ ले कर कर्वी के जमींदार तेजपाल सिंह के पास गया. वहां उसे जो जानकारी मिली, उस ने फूलचंद की चिंता और बढ़ा दी. तेजपाल सिंह ने बताया कि शिवलोचन नवंबर 2017 में दीपावली के बाद से काम पर नहीं आया है.

उस के कई दिनों तक काम पर न आने की वजह से उन्होंने उस के मोबाइल पर फोन किया तो उस की बीवी माया ने फोन उठाया. उस ने कहा कि शिवलोचन ने उन की नौकरी छोड़ दी है, उसे कहीं दूसरी जगह ज्यादा पगार की नौकरी मिल गई है.

तेजपाल सिंह ने आगे बताया कि उन्होंने इस के बाद यह सोच कर फोन नहीं किया कि जब वह अपना बकाया वेतन लेने के लिए आएगा तो पूछेंगे कि अचानक नौकरी क्यों छोड़ दी.

तेजपाल सिंह के यहां से मिली जानकारी के बाद चिंता में डूबा फूलचंद उदास चेहरा लिए अपने गांव लौट आया. फूलचंद ने घर लौट कर भाई के बारे में गहराई से सोचा तो यह बात उस की समझ में नहीं आई कि भाई ने जब दूसरी जगह नौकरी कर ली थी तो माया भाभी ने गांव वालों और मां से यह क्यों कहा था कि वह कर्वी में अपने काम पर गया है.

फूलचंद ने शिवलोचन के साथसाथ अपनी भाभी माया को भी कई बार फोन किया था, लेकिन शिवलोचन की तरह माया का भी फोन बंद मिला था. फूलचंद की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर शिवलोचन कहां चला गया और 8 महीने से घर क्यों नहीं लौटा. ऊपर से उस का फोन भी बंद था.

आश्चर्य की बात यह थी कि उस की भाभी माया जब से अपने मायके गई थी, वापस नहीं लौटी थी. न ही उस ने किसी को फोन कर के कभी कुशलक्षेम पूछी थी. ऊपर से उस का फोन नहीं लग रहा था.

फूलचंद को अपने भाई शिवलोचन की चिंता सताने लगी तो वह भाई की खोजबीनमें जुट गया. फूलचंद की एक बड़ी बहन थी, सावित्री. उस की शादी चित्रकूट की मऊ तहसील में हुई थी. उस के पास शिवलोचन की ससुराल वालों का नंबर था.

फूलचंद ने फोन कर के बहन को बताया कि शिवलोचन पिछले कई महीनों से लापता है और माया अपने मायके गई है. दोनों में से किसी का फोन भी नहीं लग रहा. शिवलोचन के बारे में पता लगाने की सोच कर फूलचंद ने सावित्री से माया के पिता का नंबर ले लिया.

उस ने वह नंबर लगा कर जब माया के पिता से बात की तो उस ने बताया कि माया अपने दोनों बच्चों को ले कर 8 महीने पहले दीपावली के बाद उन के पास आई थी. लेकिन वह 2 महीना पहले दोनों बच्चों को उन के घर छोड़ कर यह कह कर गई थी कि शिवलोचन के बारे में जानकारी लेने लोहदा जा रही है, 2-4 दिन में आ जाएगी. लेकिन उस के बाद ना तो वह घर लौटी, न ही उस ने फोन कर के बच्चों की कुशलक्षेम पूछी.

माया के पिता ने जो कुछ बताया, वह चौंकाने वाला था. क्योंकि अभी तक तो फूलचंद इस भ्रम में था कि उस की भाभी माया अपने मायके में है, लेकिन जब पता चला कि माया अपने मायके से 2 महीना पहले ही कहीं चली गई है तो फूलचंद के माथे पर परेशानी की लकीरें और गहरा गईं.

गांव में जहां शिवलोचन का मकान था, फूलचंद की मां उस से कुछ दूर अपने पैतृक मकान में रहती थी. वहीं पर वह अपनी गुजरबसर के लिए चाय का ढाबा चलाती थी. शिवलोचन की पत्नी माया जब 7-8 महीने पहले बच्चों को ले कर मायके गई थी तो जाते वक्त घर का ताला लगा कर चाभी अपनी सास चुनकी देवी को दे गई थी. तभी से शिवलोचन का मकान बंद पड़ा था.

इसी दौरान शिवलोचन के पड़ोसी हुकुम सिंह ने उस से कहा कि 8 महीने पहले शिवलोचन ने उस का सेकेंड हैंड टीवी यह कह कर लिया था कि कुछ दिन में पैसे दे देगा. लेकिन टीवी लेने के कुछ दिन बाद ही शिवलोचन और उस की पत्नी पता नहीं कहां चले गए. उन्होंने न तो पैसे दिए, न टीवी लौटाया.

हुकुम सिंह ने फूलचंद से कहा कि शिवलोचन तो पता नहीं कब आएगा, इसलिए वह उस का टीवी निकाल कर उसे दे दे. फूलचंद ने अपनी मां चुनकी देवी से शिवलोचन के घर की चाभी ले कर ताला खोला तो अंदर के दोनों कमरों से तेज बदबू का झोंका आया. बंद कमरों के खुलने के कुछ देर बाद जब बदबू कम हुई तो फूलचंद ने हुकुम सिंह का टीवी उठा कर उसे दे दिया.

फूलचंद को लगा कि लंबे समय से मकान बंद था, जिस से सीलन और गंदगी की वजह से बदबू आ रही होगी. उस ने सोचा कि क्यों न दोनों कमरों की सफाई कर दी जाए. लेकिन जब वह उस कमरे की सफाई करने लगा, जिस में शिवलोचन और माया रहते थे तो कमरे के फर्श की कच्ची जमीन थोड़ी धंसी हुई दिखाई दी.

यह देख कर फूलचंद का मन शंका से भर उठा. क्योंकि वहां की जमीन को देख कर ऐसा लग रहा था, मानो कच्चे फर्श का वह हिस्सा अलग हो. उस जगह को गौर से देखने पर लगा, जैसे वहां कोई चीज दबाई गई हो.

पांव से दबाने पर वहां की जमीन नीचे की तरफ दब रही थी. गांव के कुछ लोगों को बुला कर फूलचंद के जमीन का वह हिस्सा दिखाया तो सब ने राय दी कि क्यों न जमीन खोद कर देख लिया जाए. लेकिन जमीन में ऐसीवैसी किसी चीज के दबे होने की आशंका से फूलचंद खुदाई करने से हिचक रहा था. लिहाजा उस ने सब से राय ली कि क्यों न पहले पुलिस को खबर कर दी जाए.

‘‘अरे भैया, तुम तो ऐसे डर रहे हो जैसे जमीन में खजाना गड़ा हो. अरे तुम्हारा घर है, तुम्हारी जमीन है. खोद कर देखो, जो कुछ भी होगा सामने आ जाएगा और अगर ऐसावैसा कुछ हुआ भी तो पुलिस को खबर कर देना.’’ कई लोगों ने एक राय हो कर कहा.

बात फूलचंद की समझ में आ गई. लिहाजा उस ने कमरे के उस हिस्से की फावड़े से खुदाई शुरू कर दी. 3 फुट गहरा गड्ढा खुद चुका था मगर कुछ भी नहीं निकला. लेकिन एक बात ऐसी थी, जिस की वजह से केवल फूलचंद ही नहीं, बल्कि गांव वालों का मन भी आशंका से भर उठा.

बात यह थी कि उस जगह की मिट्टी काफी नरम थी. मिट्टी की सतह वैसे नहीं चिपकी थी, जैसे आमतौर पर चिपकी होती है. इतना ही नहीं जैसेजैसे जमीन खोदी जा रही थी, गड्ढे में से बदबू आनी शुरू हो गई थी. छह इंच जमीन और खोदते ही फूलचंद की आशंका सच साबित हुई. जमीन के उस गड्ढे से कुछ हड्डियां मिली. इस के बाद दहशत में आ कर फूलचंद ने खुदाई रोक दी.

गांव वालों से बातचीत के बाद फूलचंद अपनी मां चुनकी देवी, पड़ोसी हुकुम सिंह, गांव के प्रधान, चौकीदार और कुछ अन्य लोगों को साथ ले कर थाना पहाड़ी पहुंचा. यह 7 जुलाई, 2018 की दोपहर की बात है. पहाड़ी थाने के एसएचओ इंसपेक्टर अरुण पाठक थाने में ही मौजूद थे.

एक साथ इतने सारे लोगों को आया देख पाठक ने उन से आने की वजह पूछी तो फूलचंद ने अपने भाई और भाभी के घर से गायब होने के बारे में बता कर घर में हुई खुदाई के दौरान मानव हड्डियों के निकलने की बात उन्हें बता दी.

इंसपेक्टर अरुण पाठक बोले, ‘‘अरे भाई, जब तुम ने इतना गड्ढा खोद ही दिया था तो थोड़ा सा और खोद लेते. कम से कम यह पता तो चल जाता कि वहां किसी जानवर की हड्डियां दबी हैं या इंसान की.’’

‘‘दरअसल, मेरे भाईभाभी का कुछ पता नहीं है, इसलिए हमें बड़ा डर लग रहा है. आप चल कर देख लीजिए.’’ फूलचंद ने इंसपेक्टर पाठक के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा.

इंसपेक्टर अरुण पाठक पुलिस टीम ले कर फूलचंद और उस के साथ आए गांव वालों के साथ लोहदा गांव में शिवलोचन के घर पहुंच गए. घर के बाहर पहले से ही काफी भीड़ जमा थी. इंसपेक्टर अरुण पाठक ने पहले से 2-3 फीट खुदे गड्ढे की थोड़ी और खुदाई कराई.

पहले से करीब साढे़ 3 फीट खुदे गड्ढे की थोड़ी और खुदाई कराई. करीब साढ़े 3 फीट खुदे गड्ढे की एक फीट और खुदाई हुई तो पूरा नरकंकाल निकला. नरकंकाल की गर्दन में रस्सी बंधी हुई थी, जो गली नहीं थी. ऐसा लग रहा था जैसे रस्सी से उस का गला दबाया गया हो.

चूंकि शव पूरी तरह कंकाल में तब्दील हो चुका था, इसलिए लग रहा था कि शव को कई महीने पहले दफनाया गया था. मामले की गंभीरता को समझते हुए इंसपेक्टर अरुण पाठक ने इलाके के क्षेत्राधिकारी शिवबचन सिंह और नायब तहसीलदार को मौके पर बुलवा लिया.

दोनों अधिकारियों ने बात जानने के बाद नरकंकाल को सावधानीपूर्वक गड्ढे से बाहर निकलवा लिया. इस दौरान चित्रकूट जिले के पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार झा भी फोरेंसिक टीम को ले कर लोहदा पहुंच गए.

कंकाल किसी आदमी का था, यह ढांचे से साबित हो रहा था. कंकाल की पहचान के लिए गड्ढे से कोई ऐसी चीज नहीं निकली थी, जिसे पहचान कर कोई यह बता पाता कि कंकाल किस का है. अलबत्ता फूलचंद व उस की मां चुनकी देवी ने कंकाल को गौर से देखने के बाद आशंका जताई कि कंकाल शिवलोचन का हो सकता है.

इंसपेक्टर अरुण पाठक ने फूलचंद से पूछा, ‘‘तुम यह बात इतने विश्वास से कह रहे हो कि कंकाल शिवलोचन का ही है?’’

‘‘सर, मेरे भाई के बाए हाथ के पंजे में अंगूठा नहीं था. इस कंकाल के भी बाएं हाथ में सिर्फ चार अंगुलियों की हड्डियां हैं. अंगूठे की हड्डी गायब है. मेरे भाई के बाएं हाथ का अंगूठा एक दुर्घटना में पूरी तरह कट गया था.’’

फूलचंद ने विश्वास का कारण बताया तो इंसपेक्टर पाठक को भी लगा कि संभव है, कंकाल फूलचंद के भाई शिवलोचन का ही हो. वजह यह थी कि शिवलोचन काफी दिनों से गायब था. लेकिन कंकाल शिवलोचन का ही है, इस की वैज्ञानिक रूप से पुष्टि डीएनए टेस्ट होने पर ही हो सकती थी.

पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार झा के आदेश पर पुलिस ने नरकंकाल का पंचनामा भरवा कर उसे डीएनए टेस्ट के लिए भिजवाने की औपचारिकता पूरी की. डीएनए मिलान के लिए फोरेंसिक टीम के डाक्टरों ने शिवलोचन की मां चुनकी देवी का ब्लड सैंपल ले लिया.

पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार झा ने सीओ शिववचन सिंह को निर्देश दिया कि वह चुनकी देवी और उन के बेटे फूलचंद से शिवलोचन के गायब होने की शिकायत ले कर मुकदमा दर्ज करें. साथ ही शिवलोचन की लापता पत्नी माया और उस के दोनों बच्चों का भी पता लगाए.

पहाड़ी थाने के प्रभारी इंसपेक्टर अरुण पाठक ने शुरू में इस मामले को जितने सहज ढंग से लिया था, केस उतना ही पेचीदा निकला. यह जानकर उन्हें और भी ज्यादा आश्चर्य हुआ कि 2 महीने पहले माया अपने बच्चों को मां के पास छोड़ कर कहीं चली गई थी.

इंसपेक्टर अरुण पाठक ने शिवलोचन और माया के संबंधों के बारे में गहराई से पता लगाने के लिए गांव के लोगों और शिवलोचन के परिवार के सभी सदस्यों से एकएक कर के पूछताछ करनी शुरू कर दी. उन लोगों से मिली जानकारी के बाद यह साफ हो गया कि शिवलोचन के घर में जो नरकंकाल मिला वह शिवलोचन का ही है.

शिवलोचन के घर वालों और लोहदा गांव के लोगों से पूछताछ के बाद इंसपेक्टर अरुण पाठक की समझ मेंआ गया कि शिवलोचन के रहस्यमय ढंग से गायब होने और उस की पत्नी के लापता हो जाने के पीछे क्या राज है.

अरुण पाठक ने फूलचंद से तहरीर ले कर 7 जुलाई की रात को ही पहाड़ी थाने में भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत शिवलोचन की पत्नी माया और लोहदा गांव के टुल्लू लोध, जिसे रज्जन भी कहते थे, के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करवा दिया.

पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार झा के निर्देश पर एसएचओ अरुण पाठक ने मुकदमे की जांच का काम खुद ही शुरू कर दिया. सहयोग के लिए उन्होंने एक पुलिस टीम का गठन किया, जिस में सिपाही मुकद्दर सिंह, वीरेंद्र सिंह, रामअजोर सरोज और महिला सिपाही रुचि सिंह को शामिल किया गया.

पुलिस अधीक्षक के आदेश पर क्राइम व साइबर सेल की टीम भी थाना पहाड़ी पुलिस की मदद में लग गई. थानाप्रभारी अरुण पाठक ने सब से पहले टुल्लू लोध उर्फ रज्जन के पिता लिसुरवा और भाई लल्लन को हिरासत में ले कर उन से यह जानने का प्रयास किया कि टुल्लू इन दिनों कहां है.

पूछताछ में पता चला कि वह मुंबई में है. पुलिस ने जब कड़ी पूछताछ की तो उस के घर वालों ने टुल्लू का मोबाइल नंबर भी दे दिया. अरुण पाठक ने टुल्लू तक पहुंचने के लिए उस के पिता की उस से बात कराई.

बात से पहले ही मोबाइल फोन का स्पीकर औन करवा दिया गया था. उन्होंने लिसुरवा को हिदायत दे दी थी कि वह सामान्य ढंग से बात करे और टुल्लू को जरा भी अहसास न होने दे कि बात पुलिस की मौजूदगी में हो रही है.

इंसपेक्टर अरुण पाठक की टुल्लू के पिता की उस से बातचीत कराने की तरकीब काम कर गई. उन्हें पता चल गया कि टुल्लू मुंबई में है और माया भी उसी के साथ है. टुल्लू से हुई बातचीत में अरुण पाठक को यह भी पता चला कि टुल्लू अपने पिता से मिलने और उन की आर्थिक मदद के लिए आना चाहता है. उस ने अपने पिता से कहा था कि 15 जुलाई को वह कर्वी बस अड्डे पर पहुंच जाएं.

अरुण पाठक ने लिसुरवा तथा उस के परिवार के सदस्यों को 15 जुलाई तक पुलिस की निगरानी में रहने का निर्देश दिया. उन के मोबाइल फोन भी इंसपेक्टर पाठक ने अपने कब्जे में ले लिए, जिस से वे लोग टुल्लू को सतर्क न कर सकें. इस के बाद इंसपेक्टर पाठक और उन की पुलिस टीम बेसब्री से 15 जुलाई का इंतजार करने लगे.

15 जुलाई की सुबह टुल्लू ने अपने भाई लल्लन के मोबाइल पर फोन किया. पुलिस ने अपनी निगरानी में उस की बात कराई. टुल्लू ने लल्लन को फोन पर बताया कि वह माया के साथ चित्रकूट रेलवे स्टेशन पर है और दोपहर एक बजे तक कर्वी बसअड्डे पर पहुंचेगा. पाठक ने लल्लन व उस के पिता लिसुरवा को साथ लिया और पुलिस टीम के साथ कर्वी बस अड्डे के आसपास पुलिस का जाल बिछा दिया.

पुलिस ने लल्लन व उस के पिता को बस अड्डे के पास अकेले छोड़ दिया. सादे कपड़ों में 2 पुलिस वाले दोनों के आसपास मंडराते रहे. करीब एक बजे कर्वी बस अड्डे के टिकट काउंटर के पास बेसब्री से बेटे का इंतजार कर रहे लिसुरवा के पास एक युवक व महिला पहुंचे. आगंतुक युवक ने जब लिसुरवा के पैर छुए तो इंसपेक्टर पाठक समझ गए कि वही टुल्लू है.

नजरें गड़ाए बैठी पुलिस टीम ने उन लोगों को चारों ओर से घेर लिया. पूछताछ में पता चला कि युवक टुल्लू लोध उर्फ रज्जन राजपूत ही है और उस के साथ जो खूबसूरत सी महिला है, वह माया है. पुलिस टुल्लू और माया को उस के घर वालों के साथ थाना पहाड़ी ले आई. टुल्लू लोध और माया को हिरासत में लिए जाने की खबर उच्चाधिकारियों को भी मिल चुकी थी.

टुल्लू तथा मायादेवी से पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार झा और क्षेत्राधिकारी शिवबचन सिंह के समक्ष पूछताछ की गई. दोनों से पूछताछ में शिवलोचन हत्याकांड की हैरान करने और दिल दहलाने वाली कहानी सामने आई.

पूछताछ में यह बात साफ हो गई कि शिवलोचन के घर से जो नरकंकाल बरामद हुआ था, वह शिवलोचन का ही था. एक रात माया और टुल्लू ने उस की हत्या कर के लाश को घर में ही जमीन में गाड़ दिया था.

लोहदा गांव में रहने वाला 27 वर्षीय टुल्लू लोध उर्फ रज्जन राजपूत मकानों में टाइल्स लगाने का काम करता था. उस के परिवार में मातापिता के अलावा एक भाई व दो बहनें थीं. बहनों की शादी हो चुकी थी. जबकि छोटा भाई लल्लन अभी कुंवारा था. कई साल पहले टुल्लू की दोस्ती गांव के ही शिवलोचन से हो गई थी.

दोनों ही शराब पीने के शौकीन थे. सो दोस्ती की शुरुआत भी शराब के ठेके से हुई. टुल्लू और शिवलोचन ने एक बार साथ बैठ कर शराब पी तो जल्द ही उन की दोस्ती पारिवारिक संबंधों में तब्दील हो गई. दोनों एकदूसरे के घर आनेजाने लगे. कई बार दोनों का खानापीना भी साथसाथ होता था.

दरअसल, टुल्लू की शिवलोचन से गहरी दोस्ती की असली वजह उस की खूबसूरत और जवान पत्नी माया थी, जिसे वह भाभी कह कर बुलाता था. माया अल्हड़ और चंचल स्वभाव की औरत थी. टुल्लू को माया पहली ही नजर में भा गई थी. उस ने माया की नजरों में दिखाई देने वाली प्यास को पढ़ लिया था.

टुल्लू का शिवलोचन के घर आनाजाना शुरू हुआ तो जल्दी ही यह सिलसिला शिवलोचन की अनुपस्थिति में भीचलने लगा.एक तरफ माया की जवानी उफान मार रही थी, जबकि दूसरी ओर उस का पति शिवलोचन काफीकाफी दिनों तक घर से दूर रहता था. माया उम्र के उस दौर से गुजर रही थी जब औरत को हर रात मर्द के साथ की जरूरत होती है.

टुल्लू ने पति से दूर रह रही और पुरुष संसर्ग के लिए तरसती माया के आंचल में अपने प्यार और हमदर्दी की बूंदें उडे़ली तो माया निहाल हो गई. जल्दी ही दोनों के बीच नाजायज रिश्ते बन गए. माया, टुल्लू के प्यार में ऐसी दीवानी हुई कि दोनों के बीच रोज शारीरिक संबंध बनने लगे. शिवलोचन काफीकाफी दिनों तक घर के बाहर रहता था. रोकटोक करने वाला कोई नहीं था.

लेदे कर घर में एक सास थी जो अकसर माया के पास आ कर रहने लगती थी. लेकिन टुल्लू से संबंध बनने के बाद माया ने सास चुनकी देवी से भी लड़ाईझगड़ा शुरू कर दिया था, फलस्वरूप सास उस के मकान पर न आ कर ज्यादातर अपने पैतृक घर में रहती थी. माया ने ऐसा इसलिए किया था ताकि टुल्लू रात में उस के पास बेरोकटोक आ जा सके.

मूलरूप से ग्राम देवरी पंधी, जिला बिलासपुर छत्तीसगढ़ की रहने वाली माया की पहली शादी 13 साल पहले उस के मायके में ही एक युवक से हुई थी. लेकिन शादी के एक साल बाद ही पति ने गलत चालचलन का आरोप लगा कर उसे छोड़ दिया था. 2008 में शिवलोचन अपने एक परिचित के साथ किसी काम से माया के गांव देवरी पंधी गया था.

वहां बातोंबातों में किसी ने जब उस से पूछा कि उस ने शादी क्यों नहीं की तो शिवलोचन ने बता दिया कि अभी तक कोई अच्छी लड़की नहीं मिली. उस परिचित ने शिवलोचन से कहा कि अगर वह कुछ रुपए खर्च करे तो वह अपने गांव की एक तलाकशुदा लड़की से उस की शादी करा देगा.

शिवलोचन की उम्र बढ़ रही थी. उसे भी एक जीवनसाथी की जरूरत थी. वह पैसा खर्चने को तैयार हो गया तो उस परिचित ने शिवलोचन को माया के घर ले जा कर उस के परिवार व माया से मिलवा दिया. शिवलोचन को माया पसंद आ गई. माया के घर और परिवार की माली हालत ठीक नहीं थी.

लिहाजा बिचौलिया बने परिचित ने माया के पिता को कुछ रकम दे कर जब शिवलोचन का माया से विवाह करने की बात चलाई तोवह तुरंत राजी हो गया. इस के बाद चट मंगनी पट विवाह की रस्म अदा कर के शिवलोचन माया को पत्नी बना कर अपने घर ले आया. वक्त हंसीखुशी गुजरने लगा. माया से उसे 2 बेटे हुए प्रमांशु (6) और 8 वर्षीय हिमांशु.

शिवलोचन काफीकाफी दिनों तक परिवार से दूर रह कर इसलिए जी तोड़ मेहनत करता था ताकि पत्नी व बच्चों का भविष्य संवार सके. उसे क्या पता था कि उस की गैरहाजिरी में माया उसी के दोस्त के साथ रंगरेलियां मनाती है.

बात पिछले साल दीवाली के बाद तब बिगड़ी, जब नवंबर में शिवलोचन छुट्टी ले कर घर आया. घर में उस के हाथ एक ऐसा फोटो लगा, जिसे देख कर उस का माथा ठनक गया. दरअसल, फोटो माया और टुल्लू का था, जिस में दोनों एक साथ थे.

शिवलोचन ने उस फोटो को देखने के बाद पहली बार माया पर हाथ उठाया. उसी शाम जब टुल्लू उस के घर आया तो उस ने उस की भी पिटाई कर दी.बात इतनी बढ़ी कि मामला थाने तक जा पहुंचा. गांव के बड़े बुजुर्ग और समझदार लोग भी थाने पहुंचे.

दरअसल, काफी दिनों से लोग शिवलोचन से शिकायत कर रहे थे कि उस की गैरमौजूदगी में टुल्लू उस के घर आताजाता है और वह अकसर रात को भी उस के घर में ही रहता है. शिवलोचन ने जब यह बात माया से पूछी तो उस ने ऐसे आरोपों को गलत बताया.

लेकिन जब शिवलोचन ने दोनों की एक साथ फोटो देखी तो वह समझ गया कि गांव के लोग जो कहते हैं, वह गलत नहीं है. बहरहाल, उस समय पुलिस ने बड़े बुजुर्गों के बीच बचाव के बाद शिवलोचन और टुल्लू में समझौता करा दिया. साथ ही टुल्लू को माया से न मिलने और उस के घर न जाने की हिदायत भी दी. लेकिन इस के बावजूद टुल्लू और माया का मिलना बदस्तूर जारी रहा.

काम के सिलसिले में शिवलोचन को अकसर घर से बाहर रहना पड़ता था जबकि माया को टुल्लू के संग साथ की जो लत लग चुकी थी, उस ने दोनों को एकदूसरे से दूर नहीं होने दिया.

दूसरी ओर शिवलोचन ने माया और टुल्लू की निगरानी शुरू कर दी थी. उस ने गांव के अपने एक दो हम उम्र दोस्तों से कह दिया था कि वे माया और टुल्लू पर नजर रखें.

जब उसे पता चला कि दोनों के बीच मिलनाजुलना अब भी बदस्तूर जारी है तो उस ने माया से मिल कर इस समस्या को खत्म करने का फैसला किया. इस के लिए वह 4 नवंबर को अपने घर आया. उस ने माया और टुल्लू के मेलजोल की बात को ले कर पत्नी की पिटाई कर दी. शाम को वह घर में ही शराब पी कर सो गया.

माया उसी दिन से शिवलोचन ने नफरत करने लगी थी, जब उस ने पहली बार दोनों का फोटो देखने के बाद तमाशा किया था और उस की पिटाई भी कर दी थी. तभी से गांव भर की औरतें माया को बदचलन औरत की नजर से देखने लगी थी. उस दिन शिवलोचन की मार ने आग में घी का काम किया. उस ने शिवलोचन के शराब पी कर गहरी नींद में सोते ही टुल्लू को फोन कर के अपने घर बुला लिया.

उस ने टुल्लू से कहा कि अगर वह उसे सचमुच प्यार करता है तो आज रात ही शिवलोचन से उस के अपमान का बदला लेने के लिए उसे जान से मार दे. टुल्लू तो माया का दीवाना था. उस ने सोचा कि शिवलोचन मर जाएगा तो माया सदा के लिए उस की हो जाएगी. यही सोच कर उस ने घर में पड़ी लाठी से सोते हुए शिवलोचन के सिर पर एक के बाद एक कई प्रहार किए, जिस से वह चारपाई पर ही ढेर हो गया.

इस काम में माया ने भी उस का साथ दिया. इस के बावजूद माया इत्मीनान कर लेना चाहती थी कि शिवलोचन मरा है या नहीं. उस ने टुल्लू के साथ मिल कर कमरे में पड़ी जूट की रस्सी का फंदा बनाया और शिवलोचन के गले में डाल कर काफी देर तक खींचा. शिवलोचन के मरने के बाद समस्या थी लाश को ठिकाने लगाने की. क्योंकि लाश को घर से बाहर ले जाने से पकडे़ जाने का डर था.

माया ने सुझाव दिया कि शिवलोचन के शव को कमरे में ही जमीन खोद कर गाड़ दिया जाए. इस के बाद उन्होंने ऐसा ही किया. टुल्लू ने फावड़े से कमरे के एक हिस्से के कच्चे फर्श को 5 फुट गहरा खोदा और शिवलोचन के गले में बंधी रस्सी समेत लाश को गड्ढे में धकेल दिया. टुल्लू ने खून से सने कपड़े लाश के ऊपर ही डाल दिए. लाश को गड्ढे में डालने के बाद माया और टुल्लू ने उस पर मिट्टी डाल दी.

रात में ही माया ने उस जगह को अच्छी तरह से लीप दिया, ताकि किसी को गड्ढा खोदे जाने की बात का पता न चल सके. उस रात शिवलोचन की हत्या करने से पहले माया और टुल्लू ने कुछ खायापीया नहीं था. लिहाजा लाश को घर में ही दफनाने के बाद माया ने चूल्हा जला कर खाना बनाया. जिस लाठी से शिवलोचन की हत्या की गई थी, माया ने उसे चूल्हे में जला कर रोटियां सेंकी.

इस के बाद दोनों ने चारपाई उसी जगह बिछाई, जहां शिवलोचन के शव को दफनाया था. उस रात शिवलोचन ने जिस बोतल से शराब पी थी, उस में कुछ शराब बची थी. टुल्लू और माया ने बची हुई शराब बराबरबराबर पी, फिर दोनों ने साथसाथ खाना खाया.

खाना खाने के बाद दोनों लाश दफनाने वाली जगह पर बिछी चारपाई पर सो गए. सोने से पहले दोनों ने एकदूसरे के जिस्म की प्यास बुझा कर शिवलोचन के मरने का जश्न मनाया.

शिवलोचन की हत्या को अंजाम देने के बाद माया करीब 15 दिन तक उसी घर में रही. इस दौरान टुल्लू हर रात उस के पास आता. दोनों एक साथ खाना खाते और उसी चारपाई पर रंगरेलियां मनाते, जो उन्होंने शिवलोचन की लाश दफनाने के बाद फर्श की जमीन लीप कर उस के ऊपर डाली थी.

शिवलोचन की हत्या के बाद जब गांव के लोग या माया की सास चुनकी देवी माया से शिवलोचन के बारे में पूछते तो वह कहती कि कर्वी में काम चल रहा है, वहीं रहते हैं.

करीब 15 दिन बाद जब घर का सारा राशन खत्म हो गया तो माया के पास वहां रहने की कोई वजह नहीं बची. इस दौरान माया और टुल्लू ने आपस में तय कर लिया था कि उन्हें आगे की जिंदगी किस तरह बितानी है. इसलिए 15 दिन बाद माया अपने दोनों बच्चों को ले कर मायके चली गई.

जाने से पहले उस ने अपनी सास से खूब लड़ाई की और ताना दिया कि उस का बेटा परिवार का ख्याल नहीं रखता. घर में राशन तक नहीं है इसलिए अपनी मां के घर जा रही हूं. जब शिवलोचन घर आए तो मुझे लेने आ जाएं.

उसी दिन माया ने घर की चाभी भी अपनी सास को दे दी थी. दरअसल, वह अच्छी तरह से जानती थी कि सास चुनकी देवी ढाबे वाले अपने पैतृक घर को छोड़ कर उस के घर में रहने के लिए नहीं जाएगी. वजह यह थी कि एक तो वह गांव में काफी पीछे और सुनसान जगह पर था, दूसरे वहां उस की देखभाल करने वाला भी कोई नहीं था.

माया जानती थी कि शिवलोचन तो अब किसी को मिलेगा नहीं, उस का शव भी गल जाएगा. समय के साथ शिवलोचन की मौत भी रहस्यमय गुमशुदगी बन कर रह जाएगी. माया के गांव से जाने के एक 2 दिन बाद टुल्लू भी मुंबई चला गया था और वहां बिल्डिंगों में टाइल्स लगाने का काम करने लगा था.

अपनी ससुराल लोहदा से जाने के बाद माया मई के महीने तक अपने मातापिता के पास रही. उस ने परिवार वालों को बताया कि बिना बताए शिवलोचन कहीं चला गया है. अपने गांव पहुंच कर माया ने अपना मोबाइल नंबर भी बदल दिया था. शिवलोचन के मोबाइल को उस ने उस की हत्या के बाद ही तोड़ कर फेंक दिया था. उस का नया नंबर सिर्फ टुल्लू के पास था, जिस पर दोनों की रोज बातें होती थीं.

टुल्लू अकसर अपने गांव में फोन कर के शिवलोचन को ले कर हो रही गतिविधियों की जानकारी लेता रहता था. जब कई महीने बीत गए और माया को लगा कि अब मामला ठंडा हो गया है तो उस ने मई महीने में अपने पिता से कहा कि वह पति के बारे में जानकारी करने के लिए चित्रकूट जा रही है, जल्दी ही लौट आएगी.

अपने बच्चों को छोड़ कर माया कर्वी आ गई, जहां पहले से ही टुल्लू उसे लेने के लिए आया हुआ था. वहां से वे दोनों मुंबई चले गए और पतिपत्नी की तरह साथ रहने लगे. माया की योजना थी कि एक दो महीने का वक्त और गुजरने के बाद अपने दोनों बच्चों को भी ले आएगी. लेकिन उस से पहले ही माया व टुल्लू पुलिस के हत्थे चढ़ गए.

पुलिस ने माया व टुल्लू से पूछताछ के बाद वह फावड़ा भी बरामद कर लिया, जिस से शिवलोचन की हत्या के बाद उस का शव दफनाने के लिए गड्ढा खोदा था. चूंकि महीनों गुजर जाने के बाद भी किसी को कोई शक नहीं हुआ था, इसलिए माया और टुल्लू को उम्मीद थी कि अब शिवलोचन की हत्या का भेद नहीं खुल पाएगा.

दरअसल शिवलोचन के घर वालों और गांव के लोगों से पूछताछ के बाद जब इंसपेक्टर अरुण पाठक को पता चला था कि माया और गांव के टुल्लू के बीच लंबे अर्से से न केवल अवैध संबंध थे बल्कि इन्हीं संबंधों के चलते शिवलोचन और टुल्लू में मारपीट भी हुई थी, तभी पाठक को शक हो गया था कि हो न हो शिवलोचन की हत्या में माया व टुल्लू का ही हाथ हो.

क्योंकि माया तो गांव से चली ही गई थी, कुछ दिन बाद टुल्लू भी गांव से गायब हो गया था. इंसपेक्टर अरुण पाठक ने माया व टुल्लू से पूछताछ के बाद दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. इसी दौरान पुलिस को शिवलोचन की डीएनए रिपोर्ट भी मिल गई, जिस से स्पष्ट हो गया कि शिवलोचन के घर में मिला नरकंकाल उसी का था.

– कथा अभियुक्तों से पूछताछ, परिजनों द्वारा पुलिस को दी गई जानकारी पर आधारित

हमने उनको पीएम बनाया, वो हमें भगा रहे हैं : प्रमोद तिवारी

कांग्रेस नेता और पूर्व राजयसभा सदस्य प्रमोद तिवारी ने गुजरात मे उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को निकले जाने की आलोचना करते हुए कहा कि पिछले 3 दिनों में 30 हजार से अधिक उत्तर भारतीयों को विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगो को गुजरात से निकाला गया है. उनके साथ हिंसा की गई, उनके मकान जलाए गए. उनकी जायदाद को नुकसान पहुंचाया गया. मकान खाली कराये गए, घरों का सामान बाहर रखा गया है.

प्रमोद तिवारी ने कहा कि मोदी जी के शासन काल मे यह सर्कुलर जारी हुआ था कि 30 फीसदी से अधिक गुजरात के में उत्तर भारतीयों को काम ना मिले. कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने आरोप लगाया कि जो भी भाजपा की सरकार वाले राज्य हैं, जैसे असम से उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगो का नाम सूची से बाहर किया गया. सबसे पहले कच्छ गुजरात से उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के सीखों और पंजाबियों को निकाला गया. अरूणाचल प्रदेश और शिलौंग मेघालय में यही हुआ. जब मोदी जी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो मनसे के राज ठाकरे को राजकीय अतिथि बनाया ठाकरे ने भी उत्तर भारतीयों को बाहर किया.

पूर्व सांसद प्रमोद तिवारी ने कहा जिन प्रदेशो में बीजेपी की सरकार है वही से उत्तर भारतीयों को क्यों निकाला जा रहा है. क्या यही गुजरात मौडल है? पीएम मोदी को सांसद बनना था तो यूपी आये और जब कार्यकाल खत्म होने को आया तो यूपी वालो का अपमान किया जा रहा है. हमारे लोगो के घर जलाए गए, गाड़िया जलाई गई, सम्पति नष्ट की गई पीएम और अध्यक्ष अमित शाह ने एक शब्द नही बोला. हमने उन्हें 73 सांसद देकर पीएम बनाया और बदले हमे दुत्कार मिला. मोदी जी को जब पीएम बनाना था तो उनको उत्तर प्रदेश याद आया और अब जब फिर चुनाव आ रहा तो गुजरात से उत्तर प्रदेश के लोगों को भगाया जा रहा.

गुजरात हिंसा : घिनौनी राजनीति की भेंट चढ़ते हिंदी भाषी, आखिर दोषी कौन?

एक समय था जब पंजाब की अर्थव्यवस्था चरम पर थी, वहां के स्थानीय किसान उत्तर भारतीय मजदूरों की जीतोड़ मेहनत के बलबूते चमचमाती गाड़ियों और कोठियों के मालिक बन बैठे थे.

यह वह दौर था जब यूपी, बिहार जैसे राज्यों की चरमराती व्यवस्था और बेरोजगारी से लोग पलायन पर मजबूर हो गए थे और पंजाब, दिल्ली जैसे राज्यों में मेहनत मजदूरी से अपना भरणपोषण कर रहे थे.

वक्त ने करवट बदली तो सरकारी योजनाओं खासकर मनरेगा ने इन्हें वापसी का रास्ता दिखाया. पंजाब के किसानों की हालत अब बेहद खस्ता है, क्योंकि अधिकतर उत्तर भारतीय मजदूर या तो दूसरे राज्यों की ओर रूख चुके या फिर वापस अपने राज्य लौट गए.

अब न तो सस्ते में काम करने वाले मजदूर रह गए वहां और न ही वैसी खुशहाली.

गेहूं और खरीफ फसलों की पैदावार कर भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देने वाला पंजाब अब नशे की गिरफ्त में है. अधिकतर खेत बंजर पड़े हैं और किसानों के चेहरे पर पहले जैसी हंसी भी नहीं.

क्यों पलायन पर मजबूर हैं उत्तर भारतीय

हालिया एक घटना से हीरों और कपड़ों के उत्पादन में अग्रणी रहने वाले गुजरात के व्यापारियों के चेहरे सूखे हुए हैं.

मालूम हो कि सूरत, अहमदाबाद जैसे गुजरात के बड़े शहरों में कपड़ा मिलों में काम करने वाले और हीरों को तराश कर चमकाने वाले उत्तर भारतीय मजदूर गुजरात से बड़ी संख्या में पलायन कर रहे हैं.

यह पलायन दरअसल राज्य में भड़की एक हिंसा के बाद हो रहा है जब पिछले 28 सितंबर को साबरकंठा जिले में एक 14 माह की मासूम के साथ बलात्कार के आरोप के बाद राज्य के 6 जिलों में हिंदी भाषी लोगों के खिलाफ हिंसा भङक उठी थी.

हालांकि इस बलात्कार के आरोप में बिहार के एक मजदूर के पकड़े जाने के बाद भड़की हिंसा के खिलाफ लगभग 450 लोगों को गिरफ्तार किया गया है और 50 से अधिक प्राथमिकियां दर्ज की गई हैं.

घटना से उपजा संकट

इस घटना से उपजी संकट ने एक तरफ जहां वहां काम करे मजदूरों को पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया तो वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक दलों की सियासी रोटियां भी सेंकनी शुरू हो गईं.

कांग्रेस ने भाजपा पर लोगों को क्षेत्र के नाम पर बांटने का आरोप लगाते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राज्य के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए.

राजनीतिक हमले

कांग्रेस प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी ने मीडिया से बातचीत में कहा,”नरेंद्र मोदी के गुजरात में प्रवासी लोगों को डराया, धमकाया और भगाया जा रहा है.”

उन्होंने कहा,”उत्तर प्रदेश और बिहार की जनता आपको चुनकर भेजती है. अब वहीं के लोगों को भगाया जा है. अब आप किस मुंह से उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जाएंगे?”

कांग्रेस ने यहां तक कह दिया कि जहां जहां भाजपा की सरकारे हैं वहां वहां अराजकता का माहौल है.

उधर, राज्य के गृहमंत्री प्रदीप सिंह जडेजा ने किसी का नाम लिए बगैर कहा, “गुजरात की इस घटना के पीछे यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि क्या यह उन लोगों की साजिश है जो 22 साल से गुजरात की सत्ता से बाहर हैं?”

जडेजा ने अपने बयान में बताया कि राज्य की स्थिति से केंद्र को अवगत करा दिया गया है और स्थिति नियंत्रण में है.

सिक्के का दूसरा पहलू

जिस अपराधी ने यह गंदा कृत्य किया वह गिरफ्तार हो चुका है. कानूनन उसे कङी से कङी सजा भी मिलेगी. और मिलनी भी चाहिए पर सवाल यह है कि एक के इस कृत्य से बाकियों को भी कटघरे में खड़ा करना कौन सी समझदारी है?

जाहिर है, घटना के बाद राजनीतिक दल अपनीअपनी रोटियां सेंकने में लग जाते हैं और भुगतते वे निर्दोष भी हैं जिनका इस तरह के अपराधों से कोई वास्ता नहीं होता.

कहीं यह साजिश तो नहीं

भड़की हिंसा के पीछे एक वजह उत्तर भारतीयों का कम पैसे में बेहतर काम करना भी है, जो अपने काम से मालिकों का दिल जीत लेते हैं और फिर धीरेधीरे खुद को स्थापित कर लेते हैं. ऐसे में स्थानीय लोग खुद को ठगा महसूस करते हैं.

बड़ीबड़ी कंपनियां भी प्रवासी मजदूरों को काम यह सोच कर भी देते हैं कि कम पैसे में बेहतर काम हो तो फायदा हर हाल में कंपनी को होगी. साथ ही अगर स्थानीय कामगार होंगे तो स्थानीय राजनीति कंपनी पर हावी होने लगती है.

दूसरा, गुजरात चूंकि नरेंद्र मोदी और अमित शाह का गृहप्रदेश भी है इसलिए देश के बङे राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, पश्चिम बंगाल आदि जो भाजपा का गढ भी है से आने वाले मजदूरों, प्रवासियों पर किसी भी कारण से हमले कराए जाएं ताकि गुजरात विरोधी लहर पैदा हो.

मोदी और शाह को सिर्फ गुजराती के रूप में प्रस्तुत कर उन्हें राजनीतिक रूप से नीचा दिखाया जाए.

उधर, गुजरात के व्यापारियों की स्थिति पतली है कि नोटबंदी और जीएसटी की वजह से खस्ताहाल व्यापार पर अब कुशल और मेहनतकश श्रमिकों की मार पड़ेगी जो कम मजदूरी में भी व्यापार की तरक्की के लिए जीजान से लगे थे.

हिंसा में शामिल कुछ अराजक तत्व को इससे कुछ लेनादेना नहीं होगा क्योंकि कुछ लोगों का काम ही है अराजकता फैलाना और लोगों का इस्तेमाल करना ताकि उनकी राजनीति चमकती रहे.

हां, गुजरात में जो कुछ हो रहा है वह भाजपा के लिए खतरे की घंटी तो जरूर है जिसकी पटकथा शायद जनता 2019 के चुनाव के लिए लिख चुकी है.

आमिर खान को एशियाई कुश्ती के लिए न्योता

जब से सोवियत संघ टूटा है तब से अमेरिका के साथसाथ चीन ने भी हर क्षेत्र में अपनी जगह मजबूती से बनाई है. खेलों में तो इस देश ने जबरदस्त कामयाबी पाई है. वैसे, चीन के एथलीट अपने शांत स्वभाव के लिए दुनिया भर में मशहूर हैं. वे खुद को अपने तक सीमित रखते हैं और जब तक प्रोटोकौल के तहत जरूरी नहीं रहता, तब तक बमुश्किल ही गैर चीनी लोगों से बात करते हैं. पर मेहनती इतने हैं कि कम उम्र में ही बड़े से बड़े खेल इवेंट में मेडल जीत लेते हैं.

लेकिन हिंदी फिल्म ‘दंगल’ की कामयाबी के बाद चीन में भी हालात बदलने लगे हैं. कम से कम कुश्ती में तो यह बात बिलकुल सही कही जा सकती है.

हरियाणा के देशी पहलवान रह चुके महावीर फोगाट द्वारा अपनी बेटियों गीता और बबिता को विश्व स्तरीय पहलवान बनाने के लिए किए गए संघर्ष की कहानी जब हिंदी फिल्म ‘दंगल’ में दिखाई गई तो चीन के लोगों को वह बहुत पसंद आई. जब यह फिल्म चीन में रिलीज की गई तो इस ने वहां 1300 करोड़ रुपए से ज्यादा का कारोबार किया.

इस लोकप्रियता को भुनाने के लिए चीनी रेसलिंग एसोसिएशन ने भारतीय रेसलिंग फेडरेशन से गुहार लगाई है कि चीन अगले साल फरवरी महीने में एशियाई कुश्ती चैंपियनशिप का आयोजन कर रहा है और इस सिलसिले में वह बौलीवुड के सुपरस्टार और ‘दंगल’ फिल्म के हीरो आमिर खान की अपने यहां देखने को उत्सुक है.

यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग के तकनीकी आयोग तथा एशियन एसोसिएटिड रेसलिंग कौंसिल के सदस्य झेंग यी ने आमिर से चीन का दौरा करने के लिए कम से कम 2 बार आग्रह किया है. इस संबंध में रेसलिंग फेडरेशन औफ इंडिया के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह ने झेंग यी को आश्वासन दिया है कि वे इस चैंपियनशिप के दौरान आमिर खान को चीन का दौरा करवाने के लिए हरमुमकिन कोशिश करेंगे.

उन्होंने आगे कहा कि इतना ही नहीं चीनी कुश्ती संघ ने यह भी जानना चाहा है कि क्या फोगाट बहनें इस चैंपियनशिप में भारतीय दल में शामिल रहेंगी? इस पर हम ने उन्हें बता दिया है कि भारत में टीम चयन के लिए ट्रायल सिस्टम से गुजरना होता है और फोगाट बहनें अगर ट्रायल में सफल रहती हैं तो वे निश्चित तौर पर चीन आएंगी.

अब देखते हैं कि चीनियों की यह ख्वाहिश पूरी होती है या नहीं.

टेस्टी फूड स्पैशल : खाना तो खाना है, देशी विदेशी नहीं

धार्मिक पूर्वाग्रह खाने के प्रति भी साफसाफ दिखते हैं. हम जिस माहौल में रहते हैं उस में सिखाया यह जाता है कि हम हर लिहाज से विदेशों से बेहतर हैं. हमारा रहनसहन, रीतिरिवाज जीवनशैली, संस्कृति और खानपान तक विदेशों से श्रेष्ठ है.

देशी खाने का बिलाशक अपना जायका और लुत्फ है लेकिन पूर्वाग्रहों के चलते विदेशी खाने को हेय मानना उस के जायके और लुत्फ से वंचित करना है. खाने में भी भेदभाव एक संकीर्ण सोच है. इस से न तो धर्म और संस्कृति को कोई नुकसान होता और न ही कोई भ्रष्ट होता.

खानपान के बाजार पर नजर डालें तो देशभर में देशी के साथसाथ विदेशी आइटम भी इफरात से भरे पड़े हैं. बीते 2 दशकों में एक हद तक देशीविदेशी खाने में भेदभाव कम हुआ है. अगर पकौड़े, समोसे, वड़ापाव, जलेबी, छोलेभठूरे और डोसाइडली हर कहीं मिल रहे हैं तो उन की ही बराबरी से बर्गर, पिज्जा, मंचूरियन, पास्ता, नूडल्स और स्प्रिंगरोल वगैरह भी मिल रहे हैं.

फर्क इतना भर है कि विदेशी कहे जाने वाले आइटमों के स्टौल्स पर युवाओं की भीड़ ज्यादा नजर आती है तो देशी व्यंजन 40 पार की उम्र के लोग ज्यादा खाते नजर आते हैं. यह कोई हर्ज या एतराज की बात नहीं, बल्कि सुखद इस लिहाज से है कि लोग अब खाने की आजादी का बेहिचक इस्तेमाल कर रहे हैं.

बेकार गया विरोध

लंबे अरसे तक गुलाम रहे देशों को सहज होने में वक्त भी लंबा लगता है. गुलामी के दौरान वे हर विदेशी चीज से नफरत करते, उस का बहिष्कार करने लगते हैं. अंगरेज भारत आए तो कई नई चीजें साथ लाए. इस में उन का खाना भी था.

हाल यह था कि लोग ब्रैड और सौस को भी गुलामी का प्रतीक मानते थे. अब हालत उलट है. इन दोनों सहित दर्जनों आइटम भारतीय घरों की जरूरत बन चुके हैं यानी पीढ़ीदरपीढ़ी डर कम हुआ और भारतीयों ने विदेशी फूड आइटमों को अपनाया है. लोग डायनिंग टेबलों और छुरीकांटों का भी धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं. जमीन पर बैठ कर खाना अब पिछड़ेपन और गरीबी की निशानी मानी जाने लगी है.

आजकल के बच्चे और युवा बगैर चाइनीज व्यंजनों के नहीं रह सकते, तो इस की वजह साफ है कि वे खाने के मामले में थोपी गई मान्यताओं व धारणाओं को खोखला समझते हैं. दूसरे, भारतीयों की लाइफस्टाइल भी तेजी से बदली है. लोग तेजी से कामकाजी और व्यस्त हो चले हैं खासतौर से महिलाएं जिन के हिस्से में खाना बनाने और खिलाने का जिम्मा था.

भोपाल की एक नौकरीपेशा महिला पूनम ओझा कहती हैं, ‘‘सुबह बच्चों को स्कूल भेजते वक्त इतनी फुरसत नहीं रहती कि उन्हें रोटी या परांठे रोजरोज दे सकूं. इसलिए अकसर बाजार से फास्ट फूड आइटम खरीद कर दे देती हूं. यह देख कर हैरत होती है कि जिस दिन ये रखे जाते हैं उस दिन बेटे सार्थक का टिफिन खाली मिलता है.’’

पूनम कहती हैं, ‘‘इस में हर्ज क्या है, खाने का पहला मकसद तो पेट भरना है इस के बाद उस के नफानुकसान देखे जा सकते हैं जो कहीसुनी बातों पर आधारित होते हैं.’’

एक बात जो पूनम जैसी करोड़ों मांओं के दिलों में है वह दरअसल, यह है कि विदेशी खाने को ले कर कभीकभार जो होहल्ला मचता है, वह धर्म व संस्कृति के ठेकेदार मचाया करते हैं. इस में उन के आर्थिक स्वार्थ ज्यादा होते हैं, जो अब नजर भी आने लगे हैं कि कोई देशी कंपनी या बाबा मैगी व नूडल्स बनाए तो वे नुकसान नहीं करते लेकिन यही विदेशी कंपनियां बनाएं तो देशप्रेमियों के पेट में मरोड़ें उठने लगती हैं. वे खाने के आइटमों पर तरहतरह के आरोप लगाते रहते हैं. इन का प्रचार बजाय अपनी खूबियों के, दूसरों की आलोचना पर टिका होता है.

खानपान हर दशक में बदलता है और यह मुख्यतया नई पीढ़ी पर निर्भर करता है कि वह क्या खानापीना चाहती है. दौर प्रचार का है जो हर्ज की बात नहीं. लेकिन कभी खाने के आइटमों का भी इतने बड़े पैमाने पर प्रचारप्रसार होगा, यह बात सोची तक नहीं गई थी.

सोची इसलिए नहीं गई थी क्योंकि भारतीय खाने के मामले में संकुचित हैं. उन्हें लगता था कि धर्मसंस्कृति की तरह उन का खाना भी विकल्पहीन है और अगर इसे छोड़ या बदल दिया तो हम फिर से गुलाम हो जाएंगे.

इस मानसिकता को भुनाने के लिए अलगअलग तरीके से कोशिशें हुईं. पहले लोगों ने यह समझा कि घर से बाहर होटलों पर खाना कोई गुनाह नहीं, फिर यह समझा कि खाने से धर्म व संस्कृति को कोई खतरा नहीं.

लेकिन कट्टरवादियों को यह बात कभी रास नहीं आई. लिहाजा, वे लकीर के फकीर बने धर्मग्रंथों व रीतिरिवाजों का राग आज भी अलापते रहते हैं कि विदेशी खाना और खाने के तौरतरीके नई पीढ़ी को तबाह कर रहे हैं. पिज्जा, बर्गर, नूडल्स वगैरह जंक फूड हैं और पचते नहीं हैं, इसलिए बच्चे और युवा ज्यादा बीमार रहते हैं. अहम बात यह भी है कि देश का पैसा विदेशी कंपनियों को जा रहा है.

देश की चिंता में घुले जा रहे महानुभाव शायद ही बता पाएं कि बच्चे कुपोषण और गलत खानपान से ज्यादा मरते हैं. आएदिन कुपोषण के आंकड़े बताते हैं कि बच्चों की बीमारियों की वजह कोई पिज्जाबर्गर नहीं, बल्कि अशिक्षा व जागरूकता का अभाव है, पोषक तत्वों की कमी है और इलाज की सहूलियतें मुहैया न होना है.

यह बात चूंकि लोगों को समझ नहीं आई, आने लगी तो देशी कंपनियां भी बाजार में कूद पड़ीं. यह भी हर्ज या एतराज की बात नहीं थी. खाने का बाजार अगर खरबों का आंकड़ा छू रहा है तो सभी को हक है कि सभी अपने प्रोडक्ट बेचें. लेकिन दुकानदारी चमकाने के लिए विदेशी खाने की अतार्किक आलोचना करने का हक उन्हें नहीं है.

क्या होगा भेदभाव से

अर्थशास्त्र और व्यापार से परे मुद्दे की बात यह है कि अच्छे और मनपसंद खाने का हक सभी को है, इसलिए किसी को भी देशीविदेशी के आधार पर इसे छोड़ना नहीं चाहिए.

यह अधिकार भी हरेक को है कि वह खुद तय करे कि उसे क्या खाना है. इन दिनों खाने पर सब से ज्यादा खर्च हो रहा है. प्रसंगवश यह बात उल्लेखनीय है कि अब से 40-50 वर्षों पहले छोटे शहरों में खाने के होटल बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों तक ही सिमटे रहते थे क्योंकि तब संयुक्त परिवारों में घरों में दिनभर खाना बनता रहता था.

अब देशभर का बाजार खाने से गुलजार है और उस में भी इतनी वैरायटियां हैं कि खुद खाने वाला चकरा जाता है कि क्या खाए. नई पीढ़ी खुद खाने के प्रति सचेत हो रही है. वह कौंटिनैंटल खाने का भी लुत्फ उठाती है और परंपरागत व्यंजनों का भी. इटैलियन, चाइनीज और थाई फूड वगैरह से उसे कोई परहेज या नफरत नहीं है, तो इस में हर्ज क्या. अब हर चीज हर कहीं मिल रही है और देश में ही बन रही हैं.

भारत वैसे भी विविध व्यंजनों वाला देश है. यहां हर सौ किलोमीटर पर स्वाद और व्यंजन बदल जाते हैं. खाने के शौकीन अब धर्म या क्षेत्र के आधार पर खानापीना तय नहीं करते. और अच्छी बात यह है कि यह बात विदेशी कहे जाने वाले खाने पर भी लागू होती है. बड़ी तादाद में युवा नौकरी और रोजगार के लिए विदेश जा रहे हैं. तब वे खाने के बारे में नहीं सोचते कि वहां बैगन का भरता और दालबाटी नहीं मिलेगी. वे सोचते यह हैं कि वहां भी लोग कुछ खाते ही होंगे, वही वे भी खा लेंगे.

यही सोच लोगों को तरक्की के रास्ते पर ले जाती है और दिमाग की खिड़कियां खोलती है. जमाना खाने के शौकीनों का है. खाने के बारे में देशीविदेशी का फर्क दिखावेभर की निशानी है. जो अच्छा लगे और सहूलियत से मिले, वह निसंकोच खाएं.

विदेशी खाना भी कम लजीज नहीं

विदेशी खाने का चलन हमारे देश में अभी शुरू हुआ है, इसलिए लोग उस के बारे में उतना ही जानते हैं जितना उन्हें विज्ञापनों में बताया जाता है. विदेशों में भी तमाम वैरायटियों का खाना मिलता है. विदेश गए भारतीय भले ही वहां भी भारतीय खाना ढूंढे़ और बनाएं लेकिन भारत में अजमेर, पुष्कर, खजुराहो, आगरा और वाराणसी जैसे शहरों में खोमचों से ले कर बड़े होटलों तक में देशवासी विदेशी व्यंजनों का तबीयत से लुत्फ उठाते दिख जाते हैं.

कुछ विदेशी पकवानों की खूबियों पर नजर डालें तो उन्हें जान कर इतना तो समझ आता है कि खाना जलवायु, खेती और मौसम पर निर्भर करता है. इस में देशविदेश ढूंढ़ना एक बेकार की बात है. आइए जानें, कुछ विदेशी खानों के बारे में-

चाइनीज खाना : यह दुनियाभर में मशहूर है. यह बहुत ज्यादा शाकाहारी नहीं होता है. लेकिन इस में सब्जियों की भरमार होती है. आमतौर पर चाइनीज खाना स्टिर फ्राइपिंग तरीके से बनाया जाता है. इस विधि में सामग्री पतली और लच्छेदार काट कर, उसे तेज आंच में कम वक्त के लिए भूना जाता है. ऐसा करने से सब्जियोंं के विटामिन और दूसरे पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते और उन की मूल रंगत व स्वाद भी बना रहता है.

इटैलियन खाना : इस में जैतून के तेल का इस्तेमाल होता है और चीज भी भरपूर मात्रा में होता है. पिज्जा अब अंतर्राष्ट्रीय डिश बन चुकी है. इटैलियन परिवार सहित ताजा खाना पसंद करते हैं.

फ्रैंच खाना : इस के अधिकांश व्यंजन मिठास लिए होते हैं. इन में मक्खन का इस्तेमाल ज्यादा होता है.

पूर्वी एशियाई खाना : इन देशों का खाना स्वास्थ्य के लिए बेहतर माना जाता है. यह खाना या तो उबला हुआ होता है या फिर भाप में बना होता है. इस  में प्रोटीन की मात्रा 60-70 फीसदी तक होती है.

जापानी खाना : इस के बारे में अब हर कोई जानने को उत्सुक रहता है. वजह, वहां के लोगों का दीर्घायु होना और उन की फिटनैस है. जापानी हर तरह का परंपरागत खाना खाते हैं, लेकिन उस में सभी तत्त्व संतुलित मात्रा में होते हैं. मसलन, अनाज, सब्जी, चावल, मांस और मछली, सी फूड भी जापानी शौक से खाते हैं. दही जापानी खाने की अनिवार्य आइटम है.

विदेशी व्यंजनों की बुराई क्यों

लोकपरलोक की तरह खानेपीने के मामले में भी हिंदू पंडेपुजारियों के मुहताज रहे हैं. आएदिन तीजत्योहारों पर घरों में पकवान बनते हैं. उन का भोग पहले भगवान को लगता है, फिर पंडों की बारी आती है त्योहारों पर पकवानों के थाल सजा कर उन्हें दिए जाते हैं.

पितृपक्ष में तो पंडों की बन आती है जिस का मैन्यू भी उन्होंने बना रखा है कि उस में पूरी, हलवा, खीर, पकौड़े और जो मृतक को पसंद था वह बनाया जाए. मृत्युभोज में भी तबीयत से खाना बनता है जो मूलतया धर्म की ही देन है.

पंडों ने वही बनवाया जो उन्हें पसंद था सब्जीपूरी, खीर, गुलाबजामुन और ढेरों मिष्ठान. यही लत यजमानों को लगी तो वे भी तीजत्योहारों पर खूब ठूंसठूंस कर पकवान व मिष्ठान खाते हैं. नतीजा, तरहतरह की बीमारियां. देशी खाना कतई बुरा नहीं. हां, बल्कि उसे धर्म के बताए दिशानिर्देशों पर खाना और न खाना नुकसानदेह है.

ब्राह्मण और पंडे खुद को धर्मरक्षक बताते हैं, इसलिए वे इस बात से डरते हैं कि कल को श्राद्ध पक्ष और तेरहवीं में भी लोग चाउमिनपिज्जा वगैरह परोसने लगे तो ये आइटम उन के गले नहीं उतरने वाले. लोग भी इस बदलाव या स्वीकृति पर सहज विश्वास न करते, धर्म को ही शंका की निगाह से देखेंगे कि यह चलायमान कब से हो गया. लिहाजा, ये लोग विदेशी खाने के अवगुण बताते रहते हैं और इस का प्रचार सोशल मीडिया पर भी करते रहते हैं कि विदेशी खाने के बढ़ते चलन से धर्म व संस्कृति नष्टभ्रष्ट हो रहे हैं, लिहाजा पतन हो रहा है

बहुएं नहीं बेटे करते हैं 80 फीसदी बुजुर्गों का उत्पीड़न, सर्वे में खुलासा

आम धारणा है कि घर के बड़े बुजुर्गों की अनदेखी व उत्पीड़न बहुएं करती हैं. कई बार ऐसे प्रकरण या वीडियोज भी सामने आते हैं जहां बहू सासससुर को यातना देती नजर आ जाती है. लेकिन हाल में हुआ एक सर्वे अलग तस्वीर पेश करता है. सर्वे के मुताबिक घर के बुजुर्गों के उत्पीड़न के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार उनके पुत्र हैं. इस सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ राजधानी दून में ही लगभग 80 फीसदी बुजुर्गों का उत्पीड़न होता है और इसमें से लगभग 61 फीसदी बेटे होते हैं जो अपने बुजुर्ग मातापिता को अनदेखा करते हैं.

बेटे, बहू और बेटियां

गौरतलब है कि ये आंकड़े जुटाए हैं सीनियर सिटीजंस के लिए काम करने वाली संस्था हेल्पेज इंडिया ने. इसकी सर्वे रिपोर्ट में बुजुर्गों की स्थिति को बारीकी से दर्शाया गया है. इन आंकड़ों को जुटाने में इस संस्था ने देश के अलग-अलग राज्यों के 23 शहरों में सर्वे किया था. इस सर्वे में प्रत्येक शहर के 60 साल से ज्यादा उम्र के 218 बुजुर्ग पुरुष व महिलाओं से बातचीत की गयी. इस तरह कुल 5014 बुजुर्गों को इस सर्वे में शामिल किया गया था. रिपोर्ट आगे कहती है कि 34 फीसदी बुजुर्ग बहुओं के अत्याचार का शिकार बनते हैं जबकि इसमें बेटियों की भी कुछ प्रतिशत भागीदारी है. हालांकि मातापिता के उत्पीड़न में बेटियों की हिस्सेदारी पूरे देश में लगभग 6-7 प्रतिशत ही है.

किस शहर में कितना उत्पीड़न ?

सीनियर सिटीजंस के साथ होने वाला उत्पीड़न का आंकड़ा शहर के हिसाब से घटता और बढ़ता दिखता है. मसलन 23 शहरों में की गई रिपोर्ट के मुताबिक इनके साथ ससे ज्यादा उत्पीड़न या कहें दुर्व्यवहार मैंगलोर में होता है. यहाँ 47 फीसदी बुजुर्ग अनदेखी और शोषण का शिकार होते हैं. जबकि नंबर 2 पर है अहमदाबाद, जहाँ 46 फीसदी बुजुर्गों के साथ उत्पीड़न हो रहा है. इसके अलावा भोपाल में 39 फीसदी, अमृतसर में 35 फीसदी और दिल्ली 33 फीसदी का आंकड़ा है.

क्यों होता है ऐसा ?

उम्र के आखिरी पड़ाव में आते ही घर और बाजार में बुजुर्गों को खोटा सिक्का समझा जाने लगता है. इसलिए सब इनके साथ सब बेरुखी से पेश आते हैं. वर्ल्ड एल्डर एब्यूज अवेयरनेस डे के मौके पर हुए एक सर्वे में करीब 64 फीसदी बुजुर्गों का मानना था कि उम्र या सुस्त होने की वजह से लोग उनसे रुखेपन से बात करते हैं. जिन बुजुर्गों को सर्वे में शामिल किया गया, उनमें से 44 फीसदी लोगों का कहना था कि सार्वजनिक स्थानों पर उनके साथ बहुत गलत व्यवहार किया जाता है. खासतौर से सरकारी अस्पतालों और दफ्तरों के कर्माचारियों का व्यवहार सबसे उदासीन होता है. बेंगलूरू,  हैदराबाद, भुवनेश्वर, मुंबई और चेन्नई  ऐसी सिटीज हैं जहाँ पब्लिक प्लेस पर सीनियर सिटीजंस के साथ सबसे बुरा बर्ताव होता है.

अपनी जड़ें काटते युवा

कुल मिलाकर देश का कोई भी कोना ऐसा नहीं है जहाँ घर के बड़े बुजुर्गों के साथ अमानवीय व्यव्हार न होता हो. कहीं ज्यादा तो कहीं कम है. इस सर्वे से यह बात भी सामने आती है कि जिन बहुओं को सासससुर का उत्पीड़न करने के लिए कोसा जाता है, दरअसल इसके लिए ये कम और इनके पति ज्यादा दोषी हैं. जब बेटे ही मांबाप का उत्पीड़न करेंगे तो उनकी पत्नियां भी उन्ही का साथ देंगी. भारतीय समाज में बुजुर्गों को मार्गदर्शक और पारिवारिक मुखिया के नाते हमेशा आदर दिया गया है लेकिन आज की युवा और आधुनिक पीढ़ी तकनीक, पैसा और भोगविलास में इतनी मशरूफ है कि उसी पेढ़ को काटने पर तुली है जो उसे छांव देता है.

अमेरिका से ले कर बौलीवुड तक यौन उत्पीड़न पर बंटा हुआ समाज

यौन उत्पीड़न की घटनाओं से भारतीय समाज ही नहीं, अमेरिकी समाज भी उद्वेलित है लेकिन विभाजित है. हाल की सुखिर्यों में रहीं कुछ खबरों पर गौर करें तो उन में एक खास बात यह है कि समाज समर्थन और विरोध दो हिस्सों में बंटा हुआ दिखाई दे रहा है.

पहले बात करते हैं अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के जज ब्रेट कानावाह की. ब्रेट पर 3 महिलाओं ने यौन शोषण का आरोप लगाया था. इसे ले कर अमेरिका में कई जगहों पर प्रदर्शन हुए और उन्हें जज नियुक्त नहीं किए जाने की मांग की गई पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यौन आरोपों के बावजूद शुरू से ही ब्रेट का समर्थन किया और अमेरिकी सीनेट में कावानाह के पक्ष में 50 तो विपक्ष में 48 वोट पड़े.

विवाद के बावजूद रिपब्लिकन सांसद ब्रेट के पक्ष में खड़े रहे. आखिर उन्हें शपथ दिला दी गई. ट्रंप के अलावा अमेरिका में कुछ संगठन भी ब्रेट के पक्ष में खड़े थे. करीब 36 साल पहले एक महिला ने ब्रेट पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया था.

इधर अब भारत में अचानक बौलीवुड कलाकारों को यौन शोषण की याद आई और एक के बाद एक आरोप सामने आने लगे. 10 साल पहले एक फिल्म में साथ काम करने के दौरान पूर्व मिस इंडिया रही तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर पर यौन उत्पीड़न किए जाने का आरोप लगाया है.

यह मामला ठंडा भी नहीं पड़ा कि क्वीन फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अदाकारा का राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली कंगना रनौत ने फिल्म के निर्देशक विकास बहल पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा दिया. कंगना के कहा है कि विकास बहल ने कई बार उसे असहज महसूस कराया. कंगना का कथित प्रेम संबंध को ले कर अभिनेता रितिक रोशन से भी लंबे समय से विवाद रहा है.

गायक कैलाश खेर पर भी नताशा हेमरजानी नाम की फोटो जर्नलिस्ट ने उत्पीड़न का आरोप लगाया है. नताशा के मुताबिक 2006 में जब वह अपनी एक साथी महिला पत्रकार के साथ कैलाश खेर का इंटरव्यू लेने उन के घर गई थीं तब इस आदमी ने उसे गलत तरीके से छुआ.

ये मामले ताजा नहीं, पुराने हैं. इन घटनाओं को ले कर बौलीवुड बंटा हुआ है. कई इस तरफ तो कई उस तरफ.

अमेरिका विश्व का सब से पुराना लोकतंत्र है. पिछले दो सौ सालों में यहां के समाज में परिवर्तन का दौर चला है और धीरेधीरे बदलाव हुआ है. हालांकि पिछली सदी में यहां भारत की तरह गोरे और कालों के बीच व्याप्त तौर पर भेदभाव रहा है लेकिन सरकारी और लोकतांत्रिक संगठनों के निरंतर प्रयासों के चलते धीरेधीरे नस्ल भेद कम करने में सफलता मिली.

अमेरिकी समाज दुनिया में स्वतंत्र और उदार माना जाता है. यहां अनेक जोड़े ऐसे हैं जिन में पति अश्वेत तो पत्नी श्वेत या पत्नी काली तो पति गोरा. भले ही अमेरिका में स्वतंत्र सोच का विस्तार हुआ हो पर औरत के साथ यौन संबंधों को ले कर दुनिया भर में सोच एक जैसी है.

अगर औरत यौन उत्पीड़न का आरोप लगाती है तो सब से पहले वह खुद निशाने पर होती है. इतने सालों से चुप क्यों थी? हो न हो, उसी का दोष है? क्या वह खुद दूध की धुली है? इस तरह के सवालों के साथ बहस चलती है.

डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन सांसद जज ब्रेट और लगभग आधा बौलीवुड नाना पाटेकर, कैलाश खेर जैसों के पक्ष में खड़े हैं तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है.

बौलीवुड में जिस तरह से यौन उत्पीड़न के आरोपों की बाढ सी आई हुई है उस से नुकसान महिलाओं को ही ज्यादा होगा. कोई भी पुरुष निर्माता, निर्देशक अपनी फिल्म कंपनी में महिलाओं और महिलाओं कलाकारों से दूरी बना कर रखेगा. हो सकता है वे महिलाओं को नौकरी ही न दें.

कास्टिंग काउच जैसी बातें बौलीवुड में आम है. फिल्म में रोल पाने या नौकरी पाने के लिए स्वयं युवतियां हर तरह का समझौता करने को तैयार रहती है. ऊंचाइयों पर चढने के लिए पहले पुरुष का सीढी की तरह इस्तेमाल किया जाता है और फिर उसी सीढी को लात मार दी जाती है.

बड़ी और सफलतम हीरोइनों को ले कर फिल्म इंडस्ट्री में एक अंडरस्टैंडिंग चुप्पी है. एकदूसरे की हकीकत कोई उजागर नहीं करना चाहता. दबी जुबान से कुछ निर्माता, निर्देशक, हीरो और हीरोइनें कास्टिंग काउच के सच को स्वीकार करते सुने भी गए हैं.

यौन उत्पीड़न के घटनाओं को उजागर कर का भले ही मी टू जैसे अभियान का नाम दिया जाए, चाहे फिल्म हो, राजनीति हो या अन्य क्षेत्र, स्थिति का सामना महिलाओं को स्वयं ही करना होगा. कैसे करना है, उस उन्हें खुद तय करना है. यौन उत्पीड़न का हल्ला मचाने से उन का कोई भला नहीं होगा.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें