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मेरे साथ शील भंग का प्रयास हुआ : पंखुरी पाठक

समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता रही पंखुरी पाठक ने आरोप लगाया है की उनके साथ अलीगढ़ में मोब लिंचीग, जानलेवा हमला और शील भंग करने का प्रयास हुआ. पंखुरी पाठक अपने सहयोगी फिल्म बुलेट के लेखक अमरेश मिश्रा और कुछ साथियों के साथ अलीगढ़ गई थी. अलीगढ़ में यह लोग मानवाधिकार जांच दल का हिस्सा बनकर पुलिस एनकाउंटर में मारे गए नोशाद और मुस्तकीम के घर गये थे.

आरोप है कि पुलिस ने इन लोगों को शक की बिना पर मारा था. मुस्तकीम की विधवा से मिलकर जब पंखुड़ी पाठक और उनकी टीम वापस आ रही थी तो भगवा गमछाधारी बजरंग दल के लोगों ने हमला कर दिया. यह लोग मारने पर उतारू थे.

पंखुरी का आरोप है कि उनका शील भंग करने का प्रयास हुआ. ऐसे में किसी तरह से यह लोग अपनी टीम के साथ बच कर निकल सके. उनकी कार तोड़ दी गई. पंखुरी किसी तरह से भाग कर लखनऊ पहुंच सकी. इस घटना में अलीगढ़ के अतरौली थाने की पुलिस की भूमिका पर भी पंखुरी पाठक ने आरोप लगाये हैं.

पंखुरी पाठक और अमरेश मिश्रा सहित और कई साथियों ने मामले में लोगों को जेल भेजने की मांग की. पंखुरी ने कहा की  मोब लिंचीग के इस मामले वैसे ही काम हो जैसे कि गाइड लाइन सुप्रीम कोर्ट ने बनाई है. सरकार से मांग करते हुए पंखुरी ने कहा कि दोषी लोगों के साथ ही साथ अतरौली थाने के एसएचओ पर भी मुकदमा कायम हो.

जेरेमी लालरिननुगा बने यूथ ओलंपिक में गोल्ड जीतने वाले पहले भारतीय

वेटलिफ्टर जेरेमी लालरिननुगा ने एक अनोखा कारनामा कर इतिहास रच दिया है. वह भारत के लिए यूथ ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने वाले पहले खिलाड़ी बन गए हैं. उन्होंने 62 किलोग्राम भारवर्ग में सबसे ज्यादा वजन उठाकर यह खिताब अपने नाम किया. आइजोल के 15 वर्षीय इस खिलाड़ी ने कुल 274 किलो (124 किलोग्राम +150 किलोग्राम) वजन उठाया. इससे पहले वह वर्ल्ड यूथ सिल्वर-मेडलिस्ट भी रहे हैं.

जेरेमी ने क्लीन ऐंड जर्क में अपने आखिरी प्रयास में 150 किलोग्राम वजन उठाया. इससे पहले स्नैच में उन्होंने 124 किलोग्राम का भार उठाया था.

सोमवार रात को अर्जेंटीना की राजधानी में हुए इस मुकाबले में उन्होंने तुर्की के टौपटस कानेर और कोलंबिया के विलर एस्टिवन को पछाड़कर सोने का तमगा हासिल किया. कानेर ने 263 किलोग्राम (122 किग्रा+144 किग्रा) और एस्टिवन ने 260 किलोग्राम (115 किग्रा+143किग्रा) वजन उठाया था.

मिजोरम का यह खिलाड़ी 26 अक्टूबर को 16 साल का होगा. उन्हें भारतीय वेटलिफ्टिंग में आने वाले वक्त का बड़ा सितारा माना जा रहा है. इससे पहले, लालरिननुगा ने यूथ में एशियन चैंपियनशिप्स में ब्रौन्ज मेडल जीता था. इस बीच उन्होंने दो नैशनल रेकार्ड भी बनाए थे.

अब टीवी के सबसे संस्कारी बापू आलोक नाथ पर लगा रेप का आरोप

बौलीवुड इंडस्ट्री में इन दिनों एक के बाद एक खुलासे हो रहे हैं. पहले तनुश्री दत्ता और कंगना ने यौन शोषण का आरोप लगाया तो वहीं अब इन आरोपों के चपेट में हिंदी सिनेमाजगत के सबसे संस्कारी बापू आलोक नाथ भी आ गए हैं. बौलीवुड में आलोक नाथ की छवि आदर्शवान व्यक्ति की है. वह ज्यादातर पिता का रोल निभाते हुए परदे पर देखे गए लेकिन अब उन पर भी यौन शोषण का आरोप लगा है. हालांकि इस बात पर यकीन करना थोड़ा मुश्किल है लेकिन यह आरोप 80 से 90 के दशक में टेलीविजन की जानी मानी प्रोड्यूसर और लेखिका विंटा नंदा ने लगाया है. विंटा नंदा ने सोशल मीडिया पर लंबा सा पोस्ट लिखा और अपनी आपबीती लोगों को बताई.

विंटा नंदा ने फेसबुक पर खुलेआम लिखा – ‘मुझे पार्टी में बुलाया गया था. उनकी पत्नी और मेरी बेस्ट फ्रेंड उस वक्त शहर से बाहर थे. यह हमेशा की तरह आम पार्टी थी जिसमें मेरे कुछ दोस्त जो कि थियेटर से भी जुड़े हुए हैं वह भी आते थे, इसलिए मैंने पार्टी में जाने से एतराज नहीं किया. पार्टी के दौरान मेरी ड्रिक्स में कुछ मिलाया गया जिसके बाद मुझे अजीब सा लगने लगा. रात के करीब 2 बजे मैं उनके घर से निकली. मुझे किसी ने घर छोड़ने को नहीं कहा. मैं इतने तो होश में थी कि मुझे लगा कि उनके घर पर ठहरना सही नहीं है.’

विंटा ने आगे लिखा – ‘मैं घर से निकली और अपने घर की तरफ चल पड़ी. तभी यह कार लेकर मेरे बगल से निकला और बोला कि मैं तुम्हें छोड़ दूंगा. मैं यकीन करती थी इसलिए बैठ गई. उसके बाद ठीक से क्या हुआ याद नहीं मुझे. बस इतना याद है मेरे मुंह में किसी ने जबरदस्ती शराब डाली. जब दूसरे दिन दोपहर में उठी तो दर्द महसूस हुआ. तब मुझे पता चला कि मेरा बलात्कार हुआ है. उस वक्त साल 1994 के मशहूर शो ‘तारा’ के लिए काम कर रही थी. खुद को उस स्थिति से बाहर निकालने में मुझे 20 साल लग गए. मेरा आत्मविश्वास अब लौट आया है और इसी वजह से अब इस बात को आप लोगों से साझा करने की हिम्मत जुटा पाई हूं.’

विंटा ने इस पोस्ट में आलोक नाथ का नाम साफ साफ तो नहीं लिखा है लेकिन संस्कारी शब्द का इस्तेमाल किया है जिससे यह साफ जाहिर है कि वह आलोक नाथ के बारे में बात कर रही हैं. अब इस मामले पर आलोक नाथ का भी बयान सामने आ गया है. आलोक नाथ ने एक न्यूज चैनल से बात करते हुए कहा – ‘आज के जमाने में अगर कोई महिला किसी पुरुष पर आरोप लगाती है तो पुरुष का इस पर कुछ भी कहना मायने नहीं रखता.’

उन्होंने आगे कहा – ‘मैं विंटा को अच्छे से जानता हूं. इस समय इस मामले पर मैं चुप ही रहना चाहूंगा. उन्हें अपने विचार रखने का पूरा हक है. समय आने पर सही बात अपने आप सामने आ जाएगी. अभी इस बात को पचाने की कोशिश कर रहा हूं. बाद में इस पर कुछ कहूंगा.’

गठबंधन न होने से कम घाटे में कांग्रेस

तीन प्रमुख हिन्दी भाषी राज्यों मध्यप्रदेश राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अब गठबंधन की कहानी खत्म हो गई है और यह हो गया है कि अब सीधी टक्कर कांग्रेस और भाजपा के बीच ही होगी कुछ सीटों पर बसपा और दूसरे छोटे दल फर्क डालेंगे लेकिन उससे कांग्रेस की सेहत पर उतना फर्क नहीं पड़ना जितना कि गठबंधन होने से पड़ता. गठबंधन क्यों परवान नहीं चढ़ पाया या चढ़ने नहीं दिया गया इस का ठीकरा भले ही बसपा प्रमुख मायावती के सर फोड़ा जा रहा हो कि वे मनमानी और सौदेबाजी पर उतर आईं थीं लेकिन अब धीरे धीरे साफ हो रहा है कि दरअसल में खुद कांग्रेस भी नहीं चाहती थी कि वह छोटे मोटे दलों से हाथ मिलाकर चुनाव लड़े.

मध्यप्रदेश पर सभी की निगाहें थीं जहां सबसे ज्यादा 230 सीटें हैं गठबंधन के तहत बसपा यहां 52 सीटें मांग रही थी इसके अलावा सपा भी 7 सीटों की मांग कर रही थी. महकौशल इलाके के आदिवासी इलाकों में थोड़ी पैठ रखने वाली गौंडवाना गणतंत्र पार्टी की मांग 11 सीटों की थी तो निमाड इलाके में ख़ासी जमीन तैयार कर चुकी नई नवेली पार्टी जयस भी 20 से कम सीटों पर तैयार नहीं थी. यानि कांग्रेस महज 130 सीटों पर लड़ पाती इनमें से कितनी वह जीत पाती और कितनी सीटें उसके सहयोगी दल ले जा पाते इस पर भी शुबह बना रहता क्योंकि सीधी लड़ाई में भाजपा भारी पड़ती जिसकी बड़ी ताकत 53 फीसदी सवर्ण और पिछड़े वोट हैं.

कांग्रेस का यह डर अपनी जगह जायज था कि जहां जहां दलित आदिवासी उम्मीदवार बसपा गोगपा और जयस के उतरते वहां वहां सवर्ण एकजुट होकर भाजपा को जिता देता क्योंकि वह एक्ट्रोसिटी एक्ट और आरक्षण के मुद्दों पर प्रदेश व्यापी आंदोलन कर रहा है और अपनी अलग पार्टी सपाक्स भी बना चुका है. सपाक्स से कई रिटायर्ड आईएएस अधिकारी और दूसरे अफसर चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुके हैं जिनका मकसद और मंशा जीत से ज्यादा भाजपा को सबक सिखाना है.

कांग्रेस की दूसरी बड़ी दिक्कत गठबंधन को लेकर अपने ही कार्यकर्ताओं की नाराजगी थी जो यह कहने लगे थे कि बसपा या दूसरे छोटे दल जमीनी तौर पर उतने मजबूत और असरदार हैं नहीं जितना इनका हल्ला मीडिया ने मचा रखा है. प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर चल रही है लिहाजा उसका फायदा उठाने कांग्रेस अपने दम पर अकेले लड़े जिससे वोटर में उसको लेकर भ्रम की स्थिति न रहे कि अगर भाजपा को सत्ता से बाहर किया तो पहली दफा गठबंधन वाली सरकार को झेलना पड़ेगा. इन कार्यकर्ताओं की दूसरी वजनदार दलील यह थी कि दलित और आदिवासी दलों के साथ लड़ने से पार्टी का सवर्ण वोट पूरी तरह कट सकता है. दूसरे जयस और गोगपा जैसे दलों ने तो शर्त यह भी थोप दी थी कि अगर गठबंठन जीता तो मुख्यमंत्री आदिवासी समुदाय का होगा और इसकी घोषणा भी पहले ही होगी.

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने सब्र से काम लेते गठबंधन की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं कि लेकिन सबको मिलजुल कर भाजपा को बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए जैसी बातें जरूर वे करते रहे जिससे बौखलाई मायावती को अलग चुनाव लड़ने की घोषणा करनी पड़ी. यही सोनिया और राहुल गांधी भी चाहते थे कि 2019 के आम चुनाव के मद्देनजर मायावती से ताल्लुक बिगाड़े बिना बात बन जाये. जाहिर है कांग्रेस लोकसभा चुनाव के लिए उत्तरप्रदेश में अपनी बदहाली को लेकर किसी खुशफहमी का शिकार नहीं है. अगर इन तीन राज्यों में वह बेहतर प्रदर्शन कर पाई या अपने बूते पर सत्ता पर काबिज हो पाई तो उत्तरप्रदेश में अपनी शर्तों पर सौदेबाजी कर पाएगी .

गठबंधन न हो पाने की स्थिति में भी अधिकतर सर्वे कांग्रेस को राहत देने वाले हैं जिनमे त्रिकोणीय विधानसभा की बात कोई नहीं कर रहा तो इसकी वजहें भी हैं राजस्थान में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को मतदाता की जबरजस्त नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है तो छत्तीसगढ़ को लेकर भी कोई नहीं कह रहा कि अजीत जोगी की वैसाखियों के सहारे बसपा कोई चमत्कार कर पाएगी. जोगी की पार्टी छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस का यह पहला चुनाव है उसका प्रभाव क्षेत्र भी बिलासपुर संभाग ज्यादा है जहां बसपा पहले से ही मजबूत है ऐसे में ये दोनों मिलकर 10 सीटें भी जीतने की हालत में नहीं हैं जबकि मायावती कांग्रेस से 15 – 20 सीटों की मांग पर अड़ी थीं.

कांग्रेस ने मध्यप्रदेश में गठबंधन न करने का जोखिम उत्तरप्रदेश और बिहार में अपनी दुर्दशा देखते हुए भी उठाया है जहां गठबंधनों और वोटों की शिफ्टिंग के चलते वह दौड़ में नहीं है. तीन राज्यों में भी चुनावों में बड़ा फैक्टर जाति ही है जिसकी राजनीति में कांग्रेस खासतौर से बसपा को अपने वोटों के सहारे एंट्री नहीं देना चाहती. कांग्रेस का एक और बड़ा डर मायावती की पलटीमार इमेज भी है, जैसे ही उन्होंने अकेले लड़ने का ऐलान किया तो यह चर्चा भी तेज हुई कि तीन राज्यों में भाजपा को फायदा पहुंचाने के एवज में सौदा उन्हें उप प्रधानमंत्री बनाए जाने का हुआ है.

जबकि सच यह है कि इस चुनाव में भाजपा की राह आसान नहीं है नरेंद्र मोदी के नाम के सहारे तीन राज्यों की सत्ता बरकरार नहीं रखी जा सकती और उसके तीनों मुख्यमंत्री भी जनता की नाराजी का सामना कर रहे हैं. कांग्रेस बसपा का गठबंधन का न होना उसके लिए राहत की कम आफत की बात ज्यादा है क्योंकि सीधी लड़ाई में सत्ता विरोधी वोटों का सीधा फायदा कांग्रेस को होगा .

स्वास्थ्य बीमा करवाने से पहले जरूरी है इन बातों की पड़ताल

क्या आप भी स्वास्थ्य बीमा लेने की सोच रहे हैं अगर हां तो ये खबर आपके लिए ही है.  ऐसा इसलिए क्योंकि बड़े पैमाने पर हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों के सक्रिय होने के बाद इनके द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं के बारे में हर बारीक जानकारी मालूम होना बेहद जरूरी है ताकि इसका लाभ आप उठा सकें. तो कौन-कौन सी बातें आपकी इंश्योरेंस पौलिसी में जरूर होनी चाहिए? आईये जानते हैं…

एक्सीडेंट vs स्वास्थ्य

पौलिसी धारकों को सबसे पहले समझने की जरुरत है कि एक्सीडेंट Vs हेल्थ इंश्योरेंस में अंतर क्या है. एक्सिडेंट इंश्योरेंस दुर्घटना में मौत का कवर देता है. इसमें बीमा कंपनी आपके नौमिनी को बीमा का पैसा देगी. जबकि हेल्थ इंश्योरेंस से बीमारियों के इलाज के खर्चे की भरपाई की जा सकती है. अस्पताल में भर्ती होने पर इलाज के खर्चे का कवर मिलता है.

सब-लिमिट

जब भी आप हेल्थ इंश्योरेंस लेने का मन बनायें तो पहले ये देखें कि पौलिसी में कोई सब-लिमिट तो नहीं है. कुछ हेल्थ इंश्योरेंस पौलिसीज में सब-लिमिट नहीं होती है. जिस पौलिसी में कोई कैप या सब-लिमिट नहीं हो वो पौलिसी बेहतर रहेगी. इसके अलावा पौलिसी लेते वक्त इस बात का ध्यान रखें कि आपके घर के आसपास के कितने हास्पिटल और डाक्टर आपकी पौलिसी की लिस्ट में हैं.

फ्री लुक विंडो

भारत में हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियां कई तरह की मौजूद हैं, इनमें एलआईसी की कई पौलिसी में 15 दिनों का फ्री लुक विंडो होता है. अगर आपको पौलिसी पसंद नहीं है तो फ्री लुक विंडो बाकी रहने तक पौलिसी रिटर्न कर दें. आप किसी वित्तीय सलाहकार से इंश्योरंस के बारे में जानकारी लेकर उसकी सहायता से अपने लिए सही पौलिसी को चुन सकते हैं. औनलाइन पौलिसी खरीदने पर फ्री लुक पीरियड 30 दिन का होता है. हेल्थ इंश्योरेंस पौलिसी में 3 साल से ज्यादा की पौलिसी खरीदने पर ही ये सुविधा मिलती है. पौलिसी डौक्यूमेंट मिलने की तारीख साबित करना पौलिसी होल्डर की जिम्मेदारी होती है. यह सिर्फ नई पौलिसी लेने पर लागू होता, रिन्युअल पर नहीं लागू होता.

राजस्थान का जनसंपर्क विभाग नहीं करना चाहता प्रधानमंत्री मोदी का प्रचार

6 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राजस्थान के अजमेर में आयोजित एक बड़ी रैली संबोधित कर प्रदेश चुनाव के लिए बीजेपी के प्रचार का बिगुल बजाया. संयोग से यह रैली उस दिन हुई जिस दिन निर्वाचन आयोग ने आगामी विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा की. इस दिन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया की 40 दिन की राज्यव्यापी गौरव यात्रा का समापन भी हुआ. लक्जरी बस पर सवार होकर मुख्यमंत्री ने राज्य के अलग अलग जगाहों की यात्रा की और लोगों से संपर्क साधा.

इससे एक दिन पहले राजस्थान के सूचना और जनसंपर्क विभाग (डीआईपीआर) के कर्मचारियों ने उस आदेश के खिलाफ अपनी शिकायत दर्ज कराई जिसमें विभाग को मोदी की अजमेर रैली के लिए मीडिया मैनेजमेंट करने को कहा गया था. इस पत्र में पब्लिक रिलेशन्स एंड एलाइड सर्विसेज एसोसिएशन औफ राजस्थान (प्रसार) के अध्यक्ष सीताराम मीणा के हस्ताक्षर थे. यह शिकायत राजस्थान के मुख्य सचिव के नाम थी जिसमें कहा गया था कि सरकारी तंत्र को बीजेपी की अजमेरी रैली में लगाया जा रहा है जो राजस्थान हाई कोर्ट के हाल के आदेश का उल्लंघन है.

मुख्यमंत्री की गौरव यात्रा 4 अगस्त को शुरू हुई. साथ ही यात्रा की मुसीबतें भी. हाई कोर्ट में आरोप लगा कि सरकारी तंत्र और धन का इस्तेमाल रैली के लिए किया जा रहा है. कर्मचारियों को मीडिया प्रबंधन करने के राज्य के लोक निर्माण विभाग और डीआईपीआर के आदेशों को अदालत में चुनौती मिली. 5 तारीख को अदालत ने यात्रा के दौरान किसी भी राज्य प्रयोजित कार्यक्रम, प्रदर्शनी या उद्घाटन पर रोक लगा दी.

अदालत ने डीआईपीआर के 2 अगस्त के उस आदेश पर भी विचार किया जिसमें गौरव यात्रा के उदयपुर पहुंचने और ‘‘राज्य द्वारा आयोजित कार्यक्रमों’’ के प्रचार के मीडिया प्रबंधन के लिए अधिकारियों को नियुक्त किया गया था. अदालत ने साफ तौर पर सरकारी आदेश को गैर कानूनी नहीं कहा और इस बात को नोट किया कि यात्रा के क्रम में डीआईआरपी न केवल राजनीतिक यात्रा (मुख्यमंत्री की गौरव यात्रा) के लिए मीडिया सहयोग देगा बल्कि सरकार के समाज कल्याण योजनाओं का प्रचार करेगा.’’ इसके बावजूद अदालत ने अपने फैसले के अंत में लिखा हैः

गौरव यात्रा के साथ राज्य प्रायोजित और राज्य द्वारा वित्त सहयोग से आयोजित कार्यक्रम इस तरह से गडमड हो गए हैं कि इन्हें एक दूसरे से अलग करना मुश्किल है… इस राजनीतिक यात्रा के दौरान यदि एक पार्टी का नेता जो प्रदेश का मुख्यमंत्री भी है, किसी कार्यक्रम का उद्घाटन करता है तो एक सामान्य आदमी के लिए यह बता पाना कठिन है कि यह एक पार्टी का महिमामंडन है कि सरकार की उपलब्धियों का प्रचार.

जिस दिन हाई कोर्ट का यह आदेश आया डीआईपीआर ने अपने 10 समाचार अधिकारियों, कैमरामैन और विडियोग्राफर को 6 सितंबर को होने वाली मुख्यमंत्री की बीकानेर यात्रा को कवर करने के लिए नियुक्त किए जाने का नोटिस जारी किया. दो दिन बाद प्रसार ने डीआईपीआर के आयुक्त के समक्ष राजनीतिक कार्यक्रम के लिए सरकारी अधिकारियों के इस्तेमाल के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई और इसकी एक कौपी राज्य के मुख्य सचिव को भी भेजी. इस पत्र में लिखा है कि उक्त आदेश उच्च न्यायालय के उस निर्णय के खिलाफ है जिसमें कहा गया है कि बीजेपी की गौरव यात्रा राजनीतिक है और ‘‘केवल राजकीय कार्यक्रमों की कवरेज करने और राजनीतिक कार्यक्रमों की कवरेज नहीं करने के विषय में स्पष्ट लिखित निर्देश जारी नहीं किए गए हैं.’’

लगता है की अदालत के आदेश के प्रति प्रसार की चिंता का कारण डीआईपीआर के इस्तेमाल पर उसके अस्पष्ट फैसले के चलते है. अपने पत्र में कर्मचारियों ने राजकीय कार्यक्रम और राजनीतिक कार्यक्रम के अंतर का हवाला दिया है.

इन दोनों तरह के कार्यक्रमों के बीच के अंतर के बारे में कोर्ट के फैसले में कहा गया है. हालांकि फैसला डीआईपीआर के यात्रा में इस्तेमाल पर साफ तौर पर रोक नहीं लगाता लेकिन वहां साफ लिखा है कि राजनीतिक और राजकीय कामों का भेद सर्वोपरी है. फैसले में लिखा है, ‘‘डीआईपीआर न केवल राजनीतिक यात्रा के लिए प्रचार में सहयोग कर रहा है बल्कि सरकार की जन कल्याणकारी योजना के प्रसार को भी देख रहा है.’’ अदालत ने दोनों की बात तो की है लेकिन साफ तौर पर यह नहीं कहा है कि कार्यक्रम में डीआईपीआर की संलिप्तता गैर कानूनी है.

प्रसार का यह भी आरोप है कि डीआईपीआर के उन कर्मचारियों को, जिन्होंने हाई कोर्ट के फैसले के उल्लंघन का विरोध किया, मुख्यमंत्री कार्यालय में मीडिया सलाहकार महेन्द्र भारद्वाज और डीआईपीआर के संयुक्त निदेशक अरुण जोशी ने धमकी दी और उन पर दवाब डाला. शिकायत में आगे लिखा है कि भारद्वार और जोशी डीआईपीआर के अधिकारियों को लगातार फोन कर रहे थे और, ‘‘राजनीतिक कार्यक्रम की कवरेज करने के लिए दवाब बना रहे थ’’. पत्र में लिखा हैः

कार्य न करने पर अंजाम भुगतने, स्थानांतरण कर दिए जाने सहित अन्य तरह की धमकियां दे रहे हैं. इस माहौल में ये अधिकारी अत्याधिक तनाव में हैं.

नाम न छापने की शर्त पर डीआईपीआर के एक अधिकारी ने बताया कि सरकार के आधिकारिक आदेशों का विरोध विभाग के अंदर के कर्मचारियों ने किया था. ‘‘हमने रिपोर्टों को सीधे सीधे मीडिया को न भेजकर इस काम के लिए नियुक्त मुख्यमंत्री के ओएसडी-औफिसर औन स्पेशल ड्यूटी – को अपनी समाचार रिपोर्ट भेजने का फैसला किया.” उनका कहना है कि कर्मचारियों को यह डर था कि अगर वो सीधे मीडिया को अपनी रिपोर्ट भेजते हैं तो यह 5 सितंबर के अदालत के फैसले की अवमानना होगी. शिकायत में लिखा है, ‘‘प्रसार का मानना है कि उक्त आदेश माननीय उच्च न्यायालय के निर्णय की स्पष्ट अवमानना है और राज्य सेवा नियमों के विपरीत है. इसका विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की सेवा पर प्रतिकूल असर पड़ने की पूरी संभावना है. भविष्य में इस आधार पर उन्हें अपनी नौकरी भी गंवानी पड़ सकती है.’’

राजस्थान हाई कोर्ट के वकील अखिल चौधरी का कहना है कि कोर्ट ने एक कमजोर फैसला दिया था और मुख्यमंत्री को कवर करने के लिए नियुक्त किए गए कर्मचारियों पर अवमानना की कार्यवाही नहीं चल सकती. ‘‘डीआईपीआर का नोटीफिकेशन अदालत के फैसले के तहत ही है क्योंकि इसमें यह नहीं कहा गया है कि कर्मचारियों को गौरव यात्रा या मुख्यमंत्री के काम के लिए लगाया गया है.’’ वे आगे कहते हैं, ‘‘कागजों में तो यह राजकीय काम के लिए है लेकिन हकीकत में वे लोग सरकारी तंत्र का इस्तेमाल बीजेपी की गौरव यात्रा के लिए कर रहे हैं.’’

बाद में भी डीआईपीआर ने 13 सितंबर को कोटा की रैली, 18 सितंबर को जयपुर की रैली और 26 सितंबर को राजे की बीकानेर यात्रा के लिए आदेश जारी किए. 4 अक्टूबर को उसने मोदी की अजमेर रैली के मीडिया मैनेजमेंट के लिए एक और नोटीफिकेशन जारी किया. इसके दूसरे दिन प्रसार ने दूसरा पत्र लिखा. इस बार यह पत्र राजस्थान के मुख्य सचिव को भेजा गया जिसमें 7 सितंबर वाली बातों का उल्लेख था.

हालांकि, अक्टूबर वाले पत्र में इस बात पर जोर दिया गया था कि डीआईपीआर के अधिकारी केवल ‘‘राजकीय कार्यों के निर्वहन के लिए ही नियत समय और स्थान पर उपस्थित रहकर अपने दायित्वों का निर्वहन करेंगे तथा किसी भी राजनैतिक कार्यक्रम का कवरेज एवं मीडिया मैनेजमेंट में भागीदारी नहीं करेंगे.’’ पत्र में आगे लिखा है, ‘‘यदि इस क्रम में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के अधिकारियों एवं कार्मिकों के खिलाफ भविष्य में कोई प्रशासनिक कार्यवाही होती है तो उसके लिए राज्य सरकार और आयुक्त सूचना एवं जनसम्पर्क जिम्मेदार होंगे.’’

प्रसार यूनियन के अध्यक्ष सीताराम मीणा और वरिष्ठ उपाध्यक्ष मोतीलाल वर्मा ने इन पत्रों पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया. मीडिया सलाहकार भारद्वाज और डीआईपीआर के संयुक्त निदेशक जोशी ने उनके खिलाफ प्रसार के पत्रों पर टिप्पणी करने से मना कर दिया और कहा कि मैं डीआईपीआर के दूसरे कर्मचारियों और विभाग के आयुक्त सहित अन्य लोगों से इस पर बात करूंगा. लेकिन डीआईपीआर के आयुक्त ने मेरे किसी भी कौल का जवाब नहीं दिया.

अब कुछ दिन कैसे गुजारें गुजरात में

पहले गोधरा का बहाना ले कर गुजरातियों ने 2002 में मुसलमानों को जम कर परेशान किया और नरेंद्र मोदी की राज्य सरकार की नाक के नीचे कोई 2000 मुसलिम पूरे राज्य में मारे गए, अब यही उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के हिंदी भाषी मजदूरों के साथ किया जा रहा है. गुजरात के साबरकांठा जिले के एक छोटे कस्बे में बाहरी मजदूरों पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने एक गुजराती बच्ची का बलात्कार किया था. उस का बदला पूरे गुजरात में फैले उत्तर प्रदेश, बिहार व मध्य प्रदेश से आए मजदूरों से लिया जा रहा है.

यह वही बदले की भावना है जो 2002 में भगवाई लोगों ने मुसलमानों के खिलाफ लगाई की कि उन्होंने रामजन्म भूमि से लौटने वाली एक ट्रेन के एक डब्बे में आग लगा दी. जब किसी खास तरह के लोगों को धमकाया हो तो कोई भी बहाना बना कर उत्पात शुरू कर देना एक पुराना तरीका है बदला लेने का और आमतौर पर उस का जम कर लाभ मिलता है. गुजरात में एक ही पार्टी का राज उसी घृणा पर टिका है जिस का बांध 2002 में खोला गया था और जिस का विषैला पानी आज भी गुजरात की सड़कों पर फैला हुआ है.

उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश से आए सारे मजदूरों का लाभ गुजराती जम कर उठा रहे हैं पर यह देख कर खीज भी रहे हैं कि अब वे गुजरात में जम कर ज्यादा पैसा मांग रहे हैं और फटेहाल तरीके से रहने को तैयार नहीं हैं. वर्णव्यवस्था की नई परिभाषा लिखने वाले गुजराती इन बाहरी लोगों को पिछड़ा ही रखना चाहते हैं और ये आदेश मानने को तैयार नहीं हैं. गुजरात का उद्योग इन्हीं मजदूरों पर टिका है पर अब तो मालिक बने लगे हैं और यह पिछले 100-200 साल में पिछड़े से सेठ बने गुजरातियों के खास वर्ग को खल रहा है.

जो समाज बारूद तैयार करता है कि उस से बने बम दूसरे धर्म वालों पर फोड़ सकता है उसे यह आभास नहीं रहता कि बम बनाने वाले उसी समाज को भी निशाना बना सकते हैं. 2002 में जिन लोगों की भीड़ें मुसलमानों के घरों को फूंकने में जमा की गई थी उन में वही लोग बहुत संख्या में थे जब अब 25 सीटर बसों में 80-80 भर कर 24-48 घंटे की यात्रा कर के गांवों की ओर जा रहे हैं.

3-4 दशक पहले यह उत्तर प्रदेश में हुआ था जब आज दलित कहे जाने वालों को मुसलमानों की मारपीट के लिए उकसाया गया था. आज ये दलित उत्तर प्रदेश में, अपने राज्य में, अपने से ऊंचे पिछड़ों के शिकार हो रहे हैं क्योंकि वे अब पहले की तरह जीहजूरी नहीं कर रहे. गुजरात के हिंदी भाषी मजदूर, जो 2002 के कारनामों का इनाम चाहते थे, आज उन्हें अपनी अच्छी कमाई धमाई छोड़ कर भागने में मिल रही है.

स्मार्टफोन के कैमरे में आए स्क्रैच को करें चुटकियों में ठीक

हमसब अपने स्मार्टफोन को काफी संभाल कर रखते हैं. पर फिर भी कई बार फोन में कवर नहीं लगाने के कारण तो कई बार किसी चीज से खरोंच पड़ जाने के कारण कैमरे के लेंस पर स्क्रैच आ जाता है. ऐसे में हम चाहकर भी अच्छी फोटो क्लिक नहीं कर पाते. वैसे आप चाहें तो घर पर खुद ही स्मार्टफोन के लेंस के स्कैच को आसानी से साफ कर सकते हैं. चलिए हम आपको इसके तरीके बताते हैं.

रबिंग अल्कोहल

रबिंग अल्कोहल की कुछ बूंदों को पानी में मिलाकर आप एक मुलायम कपड़े से फोन के कैमरे के लेंस को साफ कर सकते हैं. दो-तीन बार करने पर लेंस नए जैसा साफ हो जाता है.

टूथपेस्ट

वैसे तो टूथपेस्ट के फायदों के बारे में आप जानते ही होंगे, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि इसका इस्तेमाल आप फोन के कैमरे के लेंस को साफ करने के लिए भी कर सकते हैं. थोड़ा-सा टूथपेस्ट कैमरे के लेंस पर लगाकर आप एक साफ कपड़े की मदद से उसे साफ कर सकते हैं.

इरेजर

वैसे तो इरेजर का इस्तेमाल हम पेंसिल से की गई लिखावट को मिटाने के लिए करते हैं लेकिन इरेजर से आप फोन के कैमरे के लेंस को साफ कर सकते हैं. इस बात का ध्यान रखें इरेजर नया और साफ हो.

यदि इन सब तरीकों से भी स्क्रैच खत्म नहीं हो रहा है तो आप बाजार से स्क्रैच रिमूवर खरीद सकते हैं. स्क्रैच रिमूवर को लेंस पर लगाकर आप लेंस को आसानी से साफ कर सकते हैं.

अब घरवालियों को डरा रहा है महंगाई का भूत

महंगाई का भूत अब घरवालियों को डरा रहा है. पैट्रोल, डीजल और घरेलू गैस के दाम तो बढ़ ही गए हैं और भी दूसरी बहुत सी चीजों के दाम बढ़ रहे हैं और पहले दामों के आदी लोगों को इस नई मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है. इस बार की महंगाई का जिम्मा असल में सीधासीधा नोटबंदी और जीएसटी पर जाएगा. तेल की विश्व बाजार में बढ़ती कीमतें भी इतनी जिम्मेदार नहीं हैं.

सरकार ने नोटबंदी से देश के व्यापारों को चरामरा दिया था. सारे तमाशे के बाद पता चला कि कमरों में भरा काला धन तो सफेद हो कर बैंकों में आ गया और जितने नोट चलन में थे उन के 99% बैंकों से होते हुए रिजर्व बैंक में पहुंच गए. इस दौरान 3 से 6 महीनों की नक्दी की किल्लत ने व्यापारों की कमर तोड़ दी.

दुर्घटना के बाद डाक्टरों का बिल तो आता ही है, ऊपर से पाखंडी पंडितों पर अंधविश्वास करने वाले फिर टोनेटोटकों पर ही खर्च करने लगते हैं. इसी तर्ज पर भगवा सरकार ने जीएसटी थोप दिया कि एक टैक्स सब की जिंदगी आसान बना डालेगा, पर हुआ उलटा ही. हरेक की जिंदगी कंप्यूटर कुंडलियों में फंस कर रह गई है और आम घरों तक इस आग की ताप पहुंच रही है.

आंकड़ेबाजी से चाहे जो लगे कि अर्थव्यवस्था पटरी पर आ रही है पर असल में लाखों व्यापार ठप्प हो गए हैं. उन के साथ सीधे जुड़े कर्मचारियों के घर अब पैरालाइसिस में हैं.

महंगाई का असर खर्च पर कम मन पर पहले पड़ता है. हरकोई एक दाम का आदी हो जाता है और उसी के अनुसार अपना बजट बनाता है. पर इस तरह की भयंकर ऐपिडैमिक संतुलन बिगाड़ देती है.

परेशानी यह है कि सरकार की आम लोगों की परेशानियों को दूर करने में कोई रुचि नहीं है. सरकार पैट्रोल के दामों में कमी करने को तैयार नहीं जबकि इस पर बहुत ज्यादा टैक्स लगे हैं. असल में सरकार ही पैट्रोल व डीजल पर कालाबाजारी कर रही है. इस का व्यापार अपने या कुछ के हाथों में रख कर उन्हें भी लाभ पहुंचा रही है और खुद भी कमा रही है.

महंगाई का आलम यह है कि भारत जैसे गरीब देशों में जरा सी चीनी, टमाटर, आलू ज्यादा पैदा हो जाएं दाम धड़ाम से गिर पड़ते हैं. थोड़ी सी सस्ती हुई चीज भी घरों में खरीद कर नहीं रखी जाती, क्योंकि इतने पैसे ही नहीं बचते. लोग अब बच्चों की पढ़ाई, इलाज और यहां तक कि मौजमस्ती के लिए तीर्थयात्रा तक में कर्ज लेते हैं. महंगाई ने साल की बचत को बुरी तरह हड़प लिया है. पैसा जमा कर के भविष्य के लिए रखने की आदत को तो नोटबंदी ने पहले ही नष्ट कर दिया था.

अब तो हरिभजन गाओ, एटीएम की ठंडी हवा खाओ.

दलदल में दलाई लामा

तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा के मुताबिक, वे देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को अच्छी तरह जानते हैं जिन के आत्मक्रेंद्रित रवैए के चलते महात्मा गांधी मोहम्मद अली जिन्ना को प्रधानमंत्री नहीं बना पाए और देश दोफाड़ हो गया.

गोवा इंस्टिट्यूट औफ मैनेजमैंट के छात्रों के गले उन का यह रहस्योद्घाटन उतरा या नहीं, यह तो वही जानें लेकिन कांग्रेस ने इस शांतिदूत पर यह कहते चढ़ाई कर दी कि यह बहकता बयान नरेंद्र मोदी के इशारे पर दिया गया है.

इधर, भगवा खेमे से कोई रिस्पौंस नहीं मिला तो दलाई लामा घबरा गए और चौथे ही दिन उन्हें नेहरू वाले बयान पर माफी मांगने लायक ज्ञान प्राप्त हो गया, बल्कि यह भी याद हो आया कि 1950 में नेहरू ने भिक्षुओं और तिब्बतियों को शरण देने का एहसान किया था. अब विवादित और बेवजह के बयानों से दोबारा नोबेल या भारतरत्न मिलता हो, तो जरूर दलाई लामा को उम्मीद रखने का हक है.

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