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अमित शाह को काला झंडा दिखाने वाली नेहा यादव का दावा, पुलिस ने दी एनकाउंटर की धमकी

27 जुलाई को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इलाहाबाद में कुंभ मेले की तैयारी की समीक्षा करने और शहर के साधुओं से भेंट करने पहुंचे थे. एयरपोर्ट से लौटते वक्त अमित शाह के काफिले को तीन विद्यार्थियों ने रोका. नेहा यादव, रमा यादव और किशन मौर्य काफिले के सामने आ गए और पुलिस की गाड़ी के सामने काला झंडा लहराते हुए ‘अमित शाह वापस जाओ’ के नारे लगाने लगे. इस घटना के थोड़ी ही देर बाद सोशल मीडिया में जारी एक वीडियो में देखा जा सकता है कि पुलिस छात्राओं को खींच कर हटा रही है और एक छात्रा को डंडे से मार रही है. इन विद्यार्थियों को गिरफ्तार कर लिया गया और 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. तीन दिन बाद इन सभी को जमानत मिल गई. तीनों विद्यार्थी समाजवादी पार्टी के छात्र संगठन से जुड़े हैं.

दिल्ली में द कैरेवन के स्टाफ राइटर सागर ने नेहा यादव से उनके विरोध प्रदर्शन पर बातचीत की और जानना चाहा कि विरोध के बाद उनको किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा. नेहा के ऊपर राष्ट्र विरोधी नारे लगाने का आरोप है. 24 वर्षीय नेहा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से आहार विज्ञान विषय में पीएचडी कर रही हैं. वह बताती हैं, ‘‘पुलिस चाहती थी कि वह हमें बुरी तरह से पीटे ताकि हम सरकार के खिलाफ बोलने से डर जाएं.’’ नेहा का दावा है कि, ‘‘हमें अमित शाह के कहने पर पीटा गया.”

सागरः हमें अपने बारे में बताएं?

नेहाः मेरा घर बरेली में है. मेरी मां उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव ऊंचा की प्रधान हैं. मेरे पिता आवकाश प्राप्त सरकारी कर्मचारी हैं. 2016 में मैंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से खाद्य एवं पोषण विज्ञान में ग्रैजुएशन किया और एक साल विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग में शोध फेलो रही हूं. मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पीएडी की प्रवेश परिक्षा में शीर्ष स्थान प्राप्त किया था. 2017 से मैंने अपनी पीएचडी की पढ़ाई शुरू की है.

सागरः आप लोगों ने अमित शाह के काफिले को कैसे रोका और उसके बाद क्या हुआ? सुरक्षा अधिकारियों की क्या प्रतिक्रिया थी?

नेहाः अमित शाह 27 जुलाई को इलाहाबाद आने वाले थे. हमारा मकसद उन्हें काला झंडा दिखाना या उनके काफिले को रोकना नहीं था. हम तो बस अपनी मांगों का ज्ञापन सौंपना चाहते थे. हमने अलग अलग स्थानों में इसकी कोशिशें की. जब वह संगम (इलाहाबाद में एक ऐसी जगह जहां गंगा, यमुना और मिथकीय नदी सरस्वती का मेल होता है) गए तो हमने उनसे वहां भी मिलने की कोशिश की. जब वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दू हौस्टल से गुजर रहे थे तो भी हमने उनसे मिलने का प्रयास किया. जब हमारी सारी कोशिशें बेकार हो गईं तो धूमनगंज से लौटते वक्त हम लोग उनके काफिले के सामने आ गए. आरक्षण जैसी असल मांगों के लिए हमने ऐसा किया था. इस विश्वविद्यालय में आरक्षण लागू करने में भ्रष्टाचार हुआ है और इस बात को दबाया जा रहा था. हम महिला सुरक्षा का मामला भी उठा रहे थे. हम अपनी  मांगें भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के सामने रखना चाहते थे. यदि आप मुझसे पूछेंगे कि भाजपा में आज सबसे ताकतवर नेता कौन है तो मैं कहूंगी अमित शाह. उन्होंने ही प्रधानमंत्री को प्रधानमंत्री बनाया है.

हमने जब उनका काफिला रोका तो उन्हें गाड़ी से बाहर आकर पूछना चाहिए था कि हम लड़कियां उनसे क्या कहना चाहती हैं, हम क्यों सड़क पर उतर आईं हैं? उनके पास जेड श्रेणी की सुरक्षा है. हमसे बात करने के बजाए उन्होंने अपने कमांडो को हमें पीटने के लिए भेज दिया. पुलिस ने हमें बालों से खींचा और पीटने लगी. हमें गाड़ियों में डाल कर जंगल की ओर जाने लगी और एनकाउंटर कर देने की धमकी देने लगी. वे लोग रात में फिर आए और हमें पीटने लगे यह सब सुबह तक चलता रहा. लेकिन न अमित शाह ने और न ही प्रधानमंत्री ने ट्वीट किया कि ये लड़कियां कौन हैं. किसी ने जानने की कोशिश नहीं की कि हमारी मांगें क्या हैं. हम लोगों का कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं है. मैं पीएचडी कर रही हूं. अपनी पढ़ाई को खतरे में डालना नहीं चाहती. मैं जेल जाना या अपने ऊपर मामलें दर्ज करवाना नहीं चाहती. हमारे देश में ऐसा कभी नहीं हुआ, कांग्रेस के कार्यकाल में भी ऐसा नहीं हुआ जो आज भाजपा के शासन में हो रहा है.

सागरः क्या आप विस्तार से बताएंगी कि आप की गिरफ्तारी के बाद क्या क्या हुआ?

नेहाः जैसे ही हमने काफिले को रोका, अमित शाह के कमांडो गाड़ियों से बाहर निकल आए. वे लोग डंडों से हमें पीटने लगे. उसके बाद यूपी पुलिस का एक कांस्टेबल हम पर कूद पड़ा और हमें बालों से पकड़ कर खींचने लगा. सामने से दूसरा कमांडो डंडे से हम लोगों को पीट रहा था. हमें जबरन गाड़ियों में डाल कर धूमनगंज के एक वीरान रेलवे क्रौसिंग की ओर ले गए. जहां से उठाया गया था उससे दो तीन किलोमीटर के फासले पर यह जगह है. दो चार घंटों तक वे लोग यहां से वहां घूमाते रहे. उस जगह के आसपास पुलिस चौकी भी नहीं थी. सिर्फ जंगल ही जंगल था. एक दो बार उन लोगों ने हमें गाड़ी से निकाला और डराने की कोशिश करने लगे. उनके साथ कोई महिला पुलिस नहीं थी. हममें से किसी को नहीं पता था कि हम लोग कहां हैं. चार पांच घंटे तक डराने, धमकाने और पीटने के बाद हमें आशा ज्योति केन्द्र (पीड़ित महिलाओं के लिए सरकारी आवास) ले जाया गया. हमारे छात्र साथी किशन मौर्य को पुलिस स्टेशन के शौचालय में पूरी रात बंद करके रखा गया. हम लड़कियों को केन्द्र के एक अजीब से कमरे में ले जाया गया. हमें किसी से भी नहीं मिलने दिया. रातभर भूखा रखा गया. सुबह जब हमारे लोग खाना लेकर मिलने आए तो उन्हें दूर से भी मिलने नहीं दिया गया. समाजवादी पार्टी के बहुत से नेता भी आए लेकिन किसी को भी हमसे मिलने नहीं दिया गया. सत्ताधारी पार्टी का कोई भी कार्यकर्ता यह पूछने नहीं आया कि हम लोग क्यों विरोध कर रहे थे. विपक्ष के लोगों को हमसे मिलने नहीं दिया गया.

रात भर वहां रखने के बाद जब सुबह महिला पुलिस स्टेशन की इंचार्ज कल्पना चौहान आईं तो हम लोगों को गालियां देने लगीं. मैं और रमा जिस कमरे में थे वहां एक महिला कांस्टेबल के साथ कल्पना हमारा वीडियो बनाने लगीं. हमें डराने लगीं कि हम लोग राष्ट्र विरोधी हैं और राष्ट्र विरोधी नारे लगा रहे थे. हमारे बाल खींचने लगीं और हमें थप्पड़ मारने लगीं. उसके बाद हम लोगों को नीचे ले जाकर गाड़ियों में भरने लगे. ये बात 28 जुलाई की सुबह की है. उस दिन हम लोगों को मेडिकल जांच के लिए ले जाया गया था. हमारी मेडिकल जांच भी ठीक से नहीं होने दी गई. मेरे पैरों में बहुत चोट आई थी और मैं ठीक से चल नहीं पा रही थी. मैंने एक्स-रे करवाने की मांग की लेकिन वे लोग इसके लिए तैयार नहीं हुए. उन लोगों ने सतही तरह की जांच की और हमें कोर्ट ले गए और वहां से हमें जेल भेज दिया गया.

पुलिस की कोशिश थी हम पर दवाब बनाए और इतना पीटे कि हम लोगों के भीतर हमेशा के लिए भाजपा का डर समा जाए. उन्होंने सिर्फ हमें ही नहीं हमारे परिवार वालों को भी बार बार यह कह कर डराया कि हम लोगों को देशद्रोही करार दे दिया जाएगा. हम लोगों ने कभी भी देश विरोधी नारे नहीं लगाए. हम लोग तो कह रहे थे ‘‘अमित शाह वापस जाओ वापस जाओ’’. (9 अगस्त को जब कल्पना चौहान से फोन से संपर्क किया गया था तो उन्होंने लड़कियों के साथ मारपीट करने की बात से इनकार कर दिया था.)

सागरः आपके खिलाफ क्या आरोप थे और जेल के अंदर आप के साथ क्या हुआ?

नेहा: इस मामले में पुलिस ने हमसे कभी भी ठीक से पूछताछ नहीं की. उन्हें पूछना चाहिए था कि हमने अपनी जान को दांव पर लगा कर क्यों ऐसा किया. पूछना चाहिए था न? हम लोग इतने बड़े काफिले के सामने आ गए. गाड़ियां सौ की रफ्तार से दौड़ रही थीं. तो भी हमने काफिले को रोक दिया. हमारे खिलाफ भारतीय दण्ड संहिता की धारा 147 (गैरकानून जमावडे की सजा),धारा 188 (कार्यकारी आदेश का उल्लंघन), धारा 341 (गलत तरीके से अवरोध खड़ा करना) धारा 505 (सार्वजनिक उपद्रव) और आपराधिक काननू संशोधन अधिनियम की धारा 7 के तहत मामला दर्ज किया गया. ये धाराएं इसलिए लगाई कि हमारा आपराधिक रिकौर्ड बन जाए. उसके बाद हम लोगों को जेल भेज दिया गया.

हम लोग जेल के भीतर गए ही थे कि जेल गार्ड ने हम लोगों को पहचान लिया और कहने लगा ‘‘ये वही लड़कियां है जो पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगा रही थीं. ये लोग देशद्रोही हैं. इन लड़कियों को अलग बैरक में रखना चाहिए नहीं तो दूसरों पर गलत असर पड़ेगा.’’ हम लोगों को अलग बैरक में भेज दिया गया. जब जेलर आए तब जाकर हम लोगों को सामान्य बैरक में लाया गया. हम लोग रातभर अलग बैरक में रहे और सुबह सामान्य बैरक में भेज दिया गया.

सागरः आपको क्या लगता है कि क्यों छात्रों को सत्तारूढ़ सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने पर देशद्रोही कहा जाता है? आपके मामले में यह कैसे किया गया?

नेहा: यदि आप हमारा मामला देखेंगे तो पाएंगे कि हम लोग राष्ट्रीय और विश्वविद्यालय से जुड़े मामले उठा रहे थे. 2014 में मोदी की सरकार बनाने के बाद से जिस भी विश्वविद्यालय में विरोध हुआ उसे इस या उस बहाने से राष्ट्र विरोधी बताया गया. उदाहरण के लिए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कन्हैया कुमार को देशद्रोही बताया गया. सर्वोच्च अदालत ने उसे छोड़ दिया लेकिन जाली वीडियो बना बना कर ऐसी मानसिकता बनाई गई कि देशविरोधी नारे लगाए गए थे. जब हम लोगों ने इसका विरोध बीएचयू में किया तो कहा गया कि इस संस्थान में भी देशद्राही रहते हैं. इसी तरह जब हम लोग इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कोई मामला उठाते तो हमें किसी न किसी प्रकार से पाकिस्तान से जोड़ दिया जाता है, देशद्राही कहा जाता है,आतंकवादी कहा जाता. आज छात्र जिस भी मुद्दे को उठाते हैं, ‘‘सर, हमे हौस्टल नहीं मिल रहा, हमसे गलत तरीके से फीस वसूली जा रही है, दाखिले में भ्रष्टाचार हो रहा है या आरक्षण नीति का सही क्रियांवयन नहीं हो रहा है.’’ आप कोई भी मुद्दा उठाइये आपको देशद्रोही बोला जाता है. और यह आप के साथ तब ज्यादा किया जाएगा जब आप भाजपा के समर्थक नहीं होंगे. तब तो आप पक्का देशद्रोही हैं.

जेल से छूटने के बाद जब यूनिवर्सिटी गई तो मेरे अपने गाइड ने पूछा कि क्या मैंने देश के खिलाफ नारेबाजी की है. ‘अमित शाह वापस जाओ’ का नारा अमित शाह के लिए था और हमने पाकिस्तान का नाम तक नहीं लिया था. हमे झटका लगा कि हमारा अपना गाइड, हमारा अपना विभाग हम पर विश्वास नहीं कर रहा है. वे लोग कह रहे थे कि ऐसे नारा लगाना लोकप्रियता पाने के लिए आज कल चलन में है. अगर हमने ऐसे नारे लगाए होते तो देशद्रोही गतिविधियों से संबंधित आईपीसी की धारा हमारी एफआईआर में जोड़ दी गई होती और हम लोग जेल बाहर नहीं होते.

सागरः आप समाजवादी पार्टी के छात्र संगठन से जुड़ी हैं इसलिए लागे कह सकते हैं कि आपके विरोध प्रदर्शन के पीछे राजनीतिक कारण हैं. आप इसका क्या जवाब देंगी?

नेहाः अमित शाह की कार के सामने आना हमारा मकसद नहीं था. यह कहना कि यह एक राजनीतिक स्टंट है सरासर गलत होगा. अगर वे (सरकार) हमारी समस्या को सुनते तो हम भला क्यों विरोध करते? उन्हें हमारी मांगों को सुनना चाहिए और नीतियों को लागू करना चाहिए. आज सेक्यूलर लोगों को उनके सम्प्रदायवाद से लड़ने की स्ट्रेटजी बनानी पड़ेगी. उनकी विचारधारा आरएसएस की विचारधारा है, जो महिला विरोधी है, वे लोग हमारे मामलों को जगह देना नहीं चाहते.

सागरः प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही नरेन्द्र मोदी बेटी बचाआ, बेटी पढ़ाओ कह रहे हैं. आपको एसा क्यों लगता है कि भाजपा महिला विरोधी है?

नेहाः यह नारा बस 2019 के आम चुनावों तक के लिए है. धरातल पर यह लोग इसका पालन नहीं करते. इसके उलट उन लोगों ने बेटियों को मारापीटा और जेल भेजा. किसी भी विश्वविद्यालय में जब—जब लड़कियां अपनी मांगो कें साथ सड़क पर आईं हैं तो उन पर लाठियां चली हैं, उन्हें देशद्रोही कहा गया है. हम लोगों को अमित शाह के कहने पर पीटा गया और किसी ने भी नहीं कहा कि डंडो से पीटना सरकार की गलती थी. क्या इसे गलत कहना उनकी जिम्मेवारी नहीं है? जब मोदी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने कहा था कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा को वह कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे. लेकिन उनके शासन में महिलाओं पर सबसे ज्यादा हिंसा हुई है. उनकी सरकार महिलाओं के लिए खतरा है. न यह सरकार बेटियों को पढ़ा रही है, न बेटियों को बचा रही है.

सागरः आप ये क्यों कहती हैं कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एससी, एसटी, ओबीसी छात्रों के दाखिले में और शिक्षकों की भर्ती में आरक्षण संबंधी नीतियों को लागू नहीं किया जा रहा है?

नेहाः आरक्षण एक बड़ा मामला है. यह कोई उपकार नहीं है, यह प्रतिनिधित्व का अधिकार है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय में जुलाई 12 और 15 के बीच खुली श्रेणी में स्नातक कोर्स के लिए काउंसलिंग के लिए उम्मीदवारों को बुलाया गया. खुली श्रेणी सभी वर्ग के छात्र—छात्राओं के लिए होती है. इसमें 49.5 प्रतिशत आरक्षित कोटे को बाहर कर दिया गया. ओबीसी, एससी,एसटी और अल्पसंख्यक छात्र भी काउंसलिंग के लिए आए थे लेकिन सामान्य श्रेणी के छात्रों को छोड़ सभी को यह कह कर वापस भेज दिया कि किसी और दिन उन्हें काउंसलिंग के लिए बुलाया जाएगा. बाद में उनसे कहा गया कि प्रवेश प्रक्रिया पूरी हो चुकी है. हमें कभी पता नहीं चला कि इन सीटों को कैसे भरा गया है. उसके बाद सामान्य श्रेणी के छात्रों को उनकी इच्छा के कोर्स में दाखिला दे दिया गया. जब कोई ओबीसी छात्र ऐसी मांग करता है तो उसे उसकी इच्छा के विपरीत पाठ्यक्रम दिया जाता है. आरक्षित श्रेणी के छात्रों को उनका पसंदीदा विषय नहीं दिया जाता. उन्हें उनका अधिकार नहीं दिया जा रहा. आपको पता है वे लोग इंटरव्यू कैसे करते हैं? जब कोई आरक्षित छात्र इंटरव्यू के लिए आता है तो उसके प्रमाणपत्रों को अपूर्ण या अमान्य कह दिया जाता है या वह छात्र इंटरव्यू देने आया ही नहीं ऐसा कह दिया जाता है.

ये लोग विद्यार्थियों के प्रवेश, ऐडहोक और एसोसिएट शिक्षकों की भर्ती या हौस्टल आवंटन में आरक्षण नियमों का पालन नहीं कर रहे है. विश्वविद्यालय के दिशानिर्देश के बावजूद मुझे हौस्टल नहीं दिया गया है. हमारे पास यह साबित करने के कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय आरक्षण नीति की परवाह नहीं करता पुख्ता प्रमाण हैं. लेकिन यह सिर्फ इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थिति नहीं है. यह प्रत्येक राज्य और केन्द्रीय विश्वविद्यालय की स्थिति है. आरक्षण बस नाम मात्र की चीज रह गई है.

अंडर-19 का एशिया कप भी भारत के नाम

भारत में नए क्रिकेट खिलाड़ियों की पौध लहलहा रही है. इसी का नतीजा है कि अंडर-19 की भारतीय क्रिकेट टीम ने ढाका, बंगलादेश में शानदार खेल दिखाते हुए श्रीलंकाई टीम को 144 रनों से हरा कर छठी बार अंडर-19 का एशिया कप अपने नाम कर लिया. फाइनल मुकाबले में भारतीय अंडर-19 टीम ने 3 विकेट पर 304 रन का बड़ा स्कोर बनाने के बाद श्रीलंकाई टीम को 38.4 ओवर में 160 रनों पर समेट दिया.

आप को याद होगा कि हाल ही में रोहित शर्मा की कप्तानी में भारतीय सीनियर टीम ने बंगलादेश को हरा कर एशिया कप का खिताब अपने नाम किया था.

ढाका में खेले गए अंडर-19 के इस फाइनल मुकाबले में भारतीय टीम ने टौस जीता और पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया. भारतीय ओपनर यशस्वी जायसवाल ने 85 और अनुज रावत ने 57 रन बना कर भारतीय टीम को शानदार शुरुआत दी. उन दोनों ने पहले विकेट के लिए 121 रनों की साझेदारी की. अनुज रावत ने 79 गेंदों पर 4 चौके और 3 छक्के जड़े जबकि यशस्वी जायसवाल ने 113 गेंदों की अपनी बेहतरीन पारी में 8 चौके और 1 छक्का लगाया.

इस के बाद कप्तान पी. सिमरन सिंह ने 37 गेंदों पर 3 चौकों और 4 छक्कों की मदद से 65 रनों की नाबाद पारी खेली. साथ ही, आयुष बडोनी ने नाबाद 52 रन का योगदान दिया. दोनों ने चौथे विकेट के लिए नाबाद 110 रनों की पार्टनरशिप की.

श्रीलंकाई टीम के लिए डी. परनाविथाना ने 48 और ओपनर बल्लेबाज एम. फर्नांडो ने 49 रन बनाए. उन दोनों के अलावा सूर्याबंडारा ने 31 रनों का योगदान दिया.

‘मैन औफ द मैच’ रहे भारत के युवा गेंदबाज हर्ष त्यागी ने कमाल का प्रदर्शन करते हुए 38 रन दे कर 6 विकेट झटके जबकि 18 साल के सिद्धार्थ देसाई ने 2 विकेट अपने नाम किए.

भारत यह कप छठी बार जीता है जो एक रिकार्ड है. साल 2012 में भारत को पाकिस्तान के साथ इस खिताब को बांटना पड़ा था. तब कुआलालंपुर में उन्मुक्त चंद की कप्तानी मे भारतीय और पाकिस्तानी अंडर-19 टीम के बीच खेला गया फाइनल मुकाबला टाई रहा था.

एसबीआई ग्राहक ध्यान दें: 31 अक्टूबर से बदल जाएंगे ये नियम

एसबीआई (स्टेट बैंक औफ इंडिया) ने एटीएम से एक दिन में कैश निकालने की लिमिट में बड़ी कटौती करने का फैसला किया है. एसबीआई के नए नियम के तहत ग्राहक 31 अक्टूबर से एक दिन में अधिकतम 20 हजार रुपए कैश ही एटीएम से निकाल सकेंगे. बता दें कि अभी यह सीमा 40 हजार रुपए है. बैंक ने अपने ग्राहकों को इसकी जानकारी देने के लिए उनके नंबर पर एसएमएस भी भेजा है, साथ ही आधिकारिक ट्‍विटर हैंडल पर भी इसकी जानकारी दी है.

बैंक द्वारा भेजे गए एसएमएस में कहा गया है कि ग्राहक, क्लासिक और मेस्ट्रो कार्ड की कैश लिमिट 40,000 रुपए से घटाकर 20,000 रुपए प्रतिदिन कर दी गई है. नया नियम 31 अक्टूबर से लागू हो जाएगा.

बैंक ने कैश निकालने की लिमिट में बड़ी कटौती करने के साथ ही और भी कई नियमों में बदलाव किए हैं. आइए एक नजर डालते हैं इन बदलावों पर-

– बैंक ने इसके अलावा दूसरा एसएमएस बैंक खाते में कैश जमा करने को लेकर भेजा है. इसमें कहा गया है कि एसबीआई ने कैश डिपाजिट की 30 हजार रुपए लिमिट तय थी, जिसे खत्म कर एसबीआई ने लोगों की सुविधा के लिए एक नई स्कीम शुरू की है. इस स्कीम के अंतर्गत ग्राहक किसी भी एसबीआई ब्रांच में बिना किसी असुविधा के पैसे जमा करवा सकेंगे. इसके लिए उन्हें कोई भी अतिरिक्त शुल्क नहीं देना होगा.

– डिजिटल ट्रांजेक्शंस को बढ़ावा देने और एटीएम फ्रौड (धोखाधड़ी) के बढ़ते को देखते हुए ऐसा किया गया है.

– बैंक की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक प्लेटिनम कार्ड वाले ग्राहक एक दिन में एक लाख रुपए तक की नकदी निकाल सकते हैं.

– इसके साथ ही करंट अकाउंट खाताधारकों के लिए एसबीआई ने नई सुविधा शुरू की है. इसके अंतर्गत अब ग्राहक प्रतिदिन 2 लाख रुपए तक अपने करंट अकाउंट में जमा करवा सकेंगे.

– ग्राहकों को बेहतर सुविधा देने के लिए एक और नियम बदल दिया गया है. इस नियम के तहत एसबीआई ग्राहक अब देश की किसी भी ब्रांच में जाकर अपने सेविंग अकाउंट में जितना चाहे पैसा जमा कर सकते हैं. अभी तक यह लिमिट 30,000 रुपए प्रतिदिन की थी.

अयोध्या के नाराज साधू बढ़ा सकते हैं बीजेपी की मुश्किलें

लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को फिर से ताज़ा करना चाहती है. लेकिन शहर के साधू, जो बीजेपी का साथ देते रहें हैं, पार्टी की मंदिर नीति की हवा निकालते दिख रहे हैं. 5 अक्टूबर को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के संगठन विश्व हिन्दू परिषद ने राम मंदिर निर्माण का रोडमैम तैयार करने के घोषित उद्देश्य के साथ दिल्ली के कार्यालय में बैठक बुलाई. इस बैठक में परिषद से जुड़े 50 साधुओं ने हिस्सा लिया लेकिन अयोध्या के सिर्फ 5 साधू ही बैठक में उपस्थित थे.

मंदिर मुद्दे पर शहर के साधुओं ने वीएचपी से अलग अपना आंदोलन शुरू कर दिया है. रामघाट स्थित तापसी छावनी मंदिर के महंत परमहंस दास, मंदिर निमार्ण की मांग को लेकर 1 अक्टूबर से भूख हड़ताल पर बैठे हैं. उनकी मांग है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संसद में कानून पास कर राम मंदिर निर्माण की सभी अड़चनों को दूर करें. मंदिर के पास भूख हड़ताल की जगह पर ढेरों साधू जमा होते हैं और बहुत से साधू बीजेपी के खिलाफ नारेबाजी करते हैं. साधुओं के आंदोलन ने वीएचपी के भीतर हड़कंप मचा दिया है और बीजेपी के सामने महत्वपूर्ण आधार के खिसक जाने का खतरा है.

चार साल से वीएचपी के सक्रिय समर्थक रहे परमहंस दास से मैंने फोन पर बात की. वो कहते हैं, ‘‘हमारी मांग बिलकुल सरल है. कार्यकाल के खत्म होने से पहले बीजेपी मंदिर निर्माण के अपने चुनावी वादे को पूरा करे. हमें लगता है कि और अधिक प्रतीक्षा करने से कुछ मिलने-विलने वाला नहीं है. कुछ ही महीनों बाद चुनावी आचार संहिता लागू हो जाएगी और बीजेपी एक बार फिर राम मंदिर के निर्माण के वादे के साथ लोगों से वोट मांगेगी. इसलिए मैंने प्रतीक्षा न करने का निर्णय लिया है और भूख हड़ताल कर रहा हूं.’’

अयोध्या के सबसे शक्तिशाली निर्वाणी अखाड़ा के प्रमुख धरम दास का कहना है कि इस बवाल के लिए बीजेपी जिम्मेदार है. ‘‘मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है और बीजेपी, वीएचपी और आरएसएस के लोग मंदिर का मामला उठा कर अपना अभियान तीव्र कर रहे हैं. उन लोगों को पता है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक सरकार कुछ नहीं कर सकती, फिर भी लोगों की भावनाओं को भड़का रहे हैं. लेकिन साधुओं को हमेशा मूर्ख नहीं बनाया जा सकता. साधुओं को लगता है कि उनके साथ छल हुआ है.’’

उनका कहना है कि साधुओं के गुस्से के डर से वीएचपी खुले में मीटिंग तक नहीं कर सकी और उसे दिल्ली में अपनी मीटिंग बुलानी पड़ी. वीएचपी की केन्द्रीय समिति ‘केन्द्रीय मार्गदर्शक मंडल’ के सदस्य होने के बावजूद धरम दास ने दिल्ली की बैठक में भाग नहीं लिया.

1984 से, जबसे वीएपी ने हिन्दुओं के राजनीतिक मोबलाइजेशन के लिए राम जन्मभूमि मामले को केन्द्रीय मुद्दा बनाया है, साधुओं के साथ उसके संबंध तनावपूर्ण रहे हैं. 1980 के दशक में उसके इस अभियान को बहुत थोड़े साधुओं का समर्थन मिला और स्थानीय साधुओं ने बहुत कम साथ दिया. 1990 में जब लालकृष्ण आडवाणी ने ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ के नारे के साथ देश भर में रथ रात्रा निकाली तब जाकर वीएचपी को अयोध्या में पैर जमाने का मौका मिला.

ोलुीब ेो्पह सोब मोहेा जीदवतास ूद वरज

जिस गठजोड़ के दम पर 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिराई गई, वह अधिक समय तक बरकरार नहीं रह सका. 1990 के मध्य तक अयोध्या के साधू विभाजित हो गए. अधिकांश साधू अपने अपने कामों में लग गए. कोई जमीन के लेनदेन का अपना काम करने लगा तो कई बीजेपी के साथा साथ कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं पर अपना प्रभाव जमाने की कोशिश करने लगे.

परमदास ने मुझे बताया कि 2014 के लोक सभा चुनावों के लिए जब बीजेपी ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में सामने किया तो अयोध्या के साधू फिर एक हो गए और वीएचपी के प्रभाव में आ गए. वह कहते हैं, ‘‘अयोध्या में राम मंदिर बनाने का वादा कर मोदी सत्ता में आए लेकिन उन्होंने इस दिशा में कोई काम नहीं किया. अधिकतर साधुओं की यही शिकायत है. सिर्फ वे साधू जिन्हें लगता है कि वीएचपी में बने रहने से कुछ मिल सकता है, आज इससे जुड़े हुए हैं. मोदी ने तो आज तक अयोध्या की यात्रा नहीं की. वीएचपी से प्रवीण तोगड़िया को हटाने में भी मोदी का हाथ था. तोगड़िया राम मंदिर का वादा पूरा करने की मांग सरकार से कर रहे थे.’’

एक वक्त वीएचपी के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे तोगड़िया मोदी के आज बड़े आलोचक हैं. साधुओं को एक साथ रखने में वर्तमान वीएचपी नेतृत्व की असफलता पर उन्होंने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. तोगड़िया ने मुझसे फोन पर कहा, ‘‘1984 से आज तक हुईं वीएचपी की सभी 15 धर्म संसदों में मंदिर निर्माण के लिए कानून पास करने की मांग का प्रस्ताव पारित हुआ है. अब जबकि बीजेपी के पास लोक सभा में पूर्ण बहुमत है तो इस बारे में कानून पास करने और इस मांग को पूरा करने से उसे कौन रोक रहा है.’’

परदे के पीछे यह क्या चल रहा है…

बौलीवुड में कास्टिंग काउच कोई नई बात नहीं है. छोटे शहरों से मुंबई की चकाचौंध दुनिया में आने वाली युवतियों के साथसाथ स्थापित अभिनेत्रियों ने भी समयसमय पर हीरो, फिल्म निर्माता, निर्देशक आदि पर छेड़छाड़, फिल्मों में काम देने के बहाने रात बिताने और यौन सुख देने को मजबूर करने का आरोप लगाया है. इस आरोप में बड़ेबड़े नाम भी शामिल रहे हैं.

क्यों कहा जा रहा है कि विकास बहल यौन हिंसक है

ताजा मामला विकास बहल द्वारा एक युवती के साथ यौन शोषण का है, जो अब तूल पकड़ रहा है.

साल 2015 में फिल्म ‘बांबे वेलवेट’ के प्रमोशन के दौरान एक युवती से विकास बहल द्वारा छेड़छाड़ करने का आरोप है, जो एक मीडिया हाउस को दिए बयान के बाद गरमा गया है.

आश्चर्य की बात तो यह भी है कि विक्रमादित्य, जो प्रोडक्शन के सह मालिक हैं ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उन्हें इस मामले की जानकारी तक नहीं थी. यानी मामले को दबाने की पूरी कोशिश की गई थी.

मामला तूल पकड़ता जा रहा है

मामले को तूल पकड़ता देख विक्रमादित्य मोटवानी, विकास बहल, मधु मंटेना की भागीदारी वाले फैंटम प्रोडक्शन हाउस को अनुराग कश्यप ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स से एक पोस्ट शेयर करके इस प्रोडक्शन हाउस को बंद करने की घोषणा कर डाली.

छेड़छाड़ और यौन शोषण मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए विक्रमादित्य ने मीडिया में बयान देते हुए कहा, “विकास और उस लड़की के बीच 2015 में जो घटना घटित हुई थी उस वक्त मुझे इसकी जानकारी नहीं थी. हमने उसे फिल्मों का प्रोडक्शन व निर्देशन करने से रोक दिया है और उसके सिग्नेचर औथोरिटी भी वापस ले ली हैं.”

मामले पर परदा डालने की कोशिश

मालूम हो कि इससे पहले पीड़ित लड़की को मनाने और मामले को निबटाने की पूरी कोशिश की गई थी. दरअसल, युवती का बौयफ्रैंड इस घटना से खफा था. वह दोषी को सजा तो दिलाना चाहता था पर वह नहीं चाहता था कि इस मामले में युवती का नाम अथवा पहचान उजागर हो.

बाद में एक बयान में विक्रमादित्य ने कहा, “इस घटना से मैं आहत हूं. विकास यौन हिंसक है. उसने एक युवा लड़की की जिंदगी बरबाद करने की कोशिश की. उसके विश्वास को धोखा दिया.”

इनपर भी लग चुके हैं सनसनीखेज आरोप

* सदाबहार अभिनेता दिवंगत राजेश खन्ना की लिव इन पार्टनर रहीं अनीता आडवाणी ने बिग बास सीजन 7′ में आरोप लगाया था कि जब वे महज 13 साल की थीं तब एक कार्यक्रम में अचानक राजेश खन्ना ने उन्हें बांहों में भरकर किस किया था.

* डाइरेक्टर राजकुमार संतोषी पर तब की हौट हीरोइन रहीं ममता कुलकर्णी ने आरोप लगाया था कि फिल्म ‘चाइना गेटके दौरान राजकुमार ने उनका इस्तेमाल किया था.

* साल 2004 में प्रीति जैन ने मधुर भंडारकर पर रेप का आरोप लगाया था. लंबे चले केस के बाद हालांकि बाद में प्रीति ने मुकदमा वापस ले लिया था.

* ऐक्टर शाइनी आहूजा पर उसकी एक नौकरानी ने रेप का आरोप लगाया था. नौकरानी का आरोप था कि साल 2009 में जब शाइनी की पत्नी शहर से बाहर थीं तो उसके साथ शाइनी ने रेप किया था.

* 2014 में ऐक्टर व मौडल दिवंगत इंदर कुमार पर एक 22 साल की लड़की ने रेप का आरोप लगाया था.

* दिग्गज अभिनेता इरफान खान पर भी शारीरिक शोषण का आरोप लग चुका है.

फिल्म ‘पान सिंह तोमर’ की कोस्टार रहीं ममता पटेल ने आरोप लगाया था कि फिल्म की आउटडोर शूटिंग के दौरान इरफान ने उनके साथ शारीरिक शोषण किया था और चुप रहने की धमकी भी दी थी.

* हिंदी फिल्मों में खतरनाक विलेन का किरदार निभाने वाले शक्ति कपूर भी एक स्टिंग औपरेशन के दौरान कास्टिंग काउच के केस में फंस चुके हैं.

नक्सलवाद पर केन्द्रित है फिल्म ‘द लास्ट आप्शन नक्सलाइट‘

फिल्म द लास्ट आप्शन नक्सलाइटकी निर्देशिका पायल कश्यप ने कहा कि आजादी के बाद नक्सलवाद देश के सामने सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती बन कर उभरी है. 23 मई 1967 को बंगाल के एक छोटे से गांव नक्सलबाड़ी से निकला यह आंदोलन आज केरल, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा, बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार होते नेपाल तक फैल गया. भारतीय राजनीतिक घटना प्रवाह में ऐसा पहली बार हुआ है जब एक स्थान विशेष (नक्सलबाड़ी) से शुरु हुई परिघटना ने वाद का रूप ले लिया और इसके फौलोवर का कहना है सत्ता बंदूक की नली से निकलती है. लेकिन मेरी फिल्म द लास्ट आप्शन नक्सलाइट के माध्यम से यह बतलाने की कोशिश की गई है कि बंदूक की नली से सिर्फ और सिर्फ आतंक ही निकल सकता है.

पायल कश्यप ने कहा कि क्या हिंसा के रास्ते परिवर्तन संभव है? कतई नहीं यह कहानी इसी की वकालत करती है और बतलाने की कोशिश करती है कि बंदूक से समस्या का समाधान कभी नहीं हो सकता. हमारा अंतिम विकल्प स्टेट (राजसत्ता) के खिलाफ बंदूक उठा नक्सली बन जंगल चला जाना नहीं वरन उसके भी आगे एक राह है और वह है शांति की राह.

फिल्म के माध्यम से समाज सुधार की बात पर उन्होंने कहा कि देखिये मेरा काम कहानी को पर्दे पर उतारना है, साथ ही मेरी फिल्मों का एक अहम हिस्सा होता है मनोरंजन. मैं कहानी के माध्यम से कुछ कहना चाहती हूं. जिस कहानी का विषय दिल को छू जाता है उस कहानी को सेल्यूलायड पर गढ़ने की तैयारी में मैं जुट जाती हूं. और रही बात समाज सेवा की तो मैं भी समाज का एक हिस्सा हूं. सो मेरी भी यह जिम्मेवारी बनती है देश और समाज के लिए कुछ न कुछ करूं. मनोरंजन तो फिल्म देखने के वक्त तक होता है, जबकि संदेश आप अपने दिमाग के साथ घर तक ले जा सकते हैं और इसी संदेश का समाज पर प्रतीकात्मक प्रभाव पड़ता है.

नक्सल को ही अपना विषय क्यों बनाया? इसके जवाब में पायल कहती हैं देखिये मुझे फिक्शन से ज्यादा फैक्ट अपील करता है. साथ ही रियलिस्टिक फिल्म बनाने से दर्शक ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं. छत्तीसगढ़ की एक घटना एक महिला के साथ हुए दुर्व्यवहार जो बाद में नक्सल बन बंदूक उठा लेती है ने मुझे उद्वेलित किया. और मैने इसी घटना के इर्दगिर्द कहानी बुनी. और मैं जानती हूं कि सिनेमा सम्प्रेषण का शक्तिशाली माध्यम है इसलिए फिल्म के माध्यम से गुमराह होकर समाज से कटे युवकों को मुख्य धारा से जोड़ने का एक प्रयास किया जायेगा.

भाजपा सरकार किसान विरोधी : पल्लवी पटेल

भाजपा की केन्द्र सरकार भले ही खुद को किसानों की प्रिय सरकार बता रही हो पर उत्तर प्रदेश के विभिन्न राजनीतिक दल उसे किसानों की विरोधी सरकार बता रहे है. अपना दल की प्रदेश अध्यक्ष पल्लवी पटेल ने भाजपा सरकार की ‘आयुष्मान भारत’ योजना और किसानों को लेकर तमाम सवाल उठाये है.

अपना दल मण्डल एवं जिलाध्यक्षों की संयुक्त बैठक में राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्णा पटेल एवं प्रदेश अध्यक्ष पल्लवी पटेल ने केन्द्र की भाजपा सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा ‘केन्द्र सरकार के द्वारा बडे जोर शोर से शुरू की गई ‘आयुष्मान भारत’ योजना भी एक जुमला साबित होगी. भाजपा ने स्वास्थ्य, सुरक्षा और शिक्षा के बारे में अपने संकल्प पत्र में इलाज के लिए फ्री सुविधा देने की बात की थी लेकिन आज किसी भी अस्पताल में या मेडिकल कालेजों में फ्री दवाईयों की बात छोड़िये स्ट्रेचर और एम्बुलेन्स सेवा भी मुहैया नहीं हो पाती है. ‘आयुष्मान भारत योजना’ का भी वही हश्र होगा जो प्रत्येक खाता धारक के खाते में 15 लाख जमा होने का हुआ’.

अपना दल की प्रदेश अध्यक्ष पल्लवी पटेल ने कहा, ‘भाजपा सरकार ने चुनाव से पहले जो भी वादे किये उनका हश्र जनता के सामने है किसानों का कर्ज माफ हो जायेगा, किसानों की बेहतरी के लिए स्वामीनाथन आयोग लागू होगा और प्रत्येक वर्ष दो करोड़ रोजगार बेरोजगारों को दिया जायेगा कोई भी योजना धरातल पर नहीं उतरी. गांव की गरीब जनता अशिक्षित है वह इस योजना को लाभ नहीं ले पायेगी. यह योजना भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ेगी.

अपना दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्णा पटेल ने पदाधिकारियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि मिशन 2019 लोकसभा चुनाव की कामयाबी के लिए हमें युद्ध स्तर पर संगठन को धरातल पर उतारना होगा. अपना दल की नीतियों को बताते हुए कहा कि प्रत्येक बूथ में 10 नौजवानों को बूथ पदाधिकारी बनाना होगा जिसमें एक महिला होना अनिवार्य है.

प्रदेश अध्यक्ष पल्लवी पटेल ने किसानों के मुद्दों को उठाते हुए कहा केन्द्र और प्रदेश सरकार कार्पोरेट जगत की हितैषी और किसानों, मजदूरों की विरोधी है. बीजेपी सरकार के इशारे पर आंदोलनकारी जो पैदल मार्च कर दिल्ली पहुंच रहे थे उन्हें रोककर लाठीचार्ज किया गया जो किसानों पर अत्याचार है.

कर्जमाफी से किसानों का पत्ता साफ किया गया. वहीं पर कार्पोरेट घरानों का कर्जमाफ किया गया. जो कृषि प्रधान देश के लिए बहुत बड़ी बिडंबना है किसानों की मांगें जायज थी जैसे किसानों की संपूर्ण कर्जमाफी, गन्ना किसानों का बकाया भुगतान व्याज सहित, स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट अक्षरशः लागू की जाए, किसानों को कृषि डीजल और कृषियंत्रों में सब्सिडी दी जाए और किसानों को पांच हार्स पावर तक बिजली मुफ्त की जाए.

किसान परिवार को पांच हजार मासिक पेंशन दी जाए और किसान आयोग बनाया जाए. इन बुनियादी मांगों के साथ किसान पदयात्रा कर रहे थे, दिल्ली बार्डर पर बीजेपी सरकार के इशारे पर पुलिस प्रशासन द्वारा बलपूर्वक रोका गया. यह लोकतंत्र की हत्या करने जैसा है. आगामी 2019 के चुनाव में भाजपा सरकार को किसान तबका सबक सिखाएगा. सरकार उद्योगपतियों का लगभग तीन लाख करोड़ कर्ज को बट्टे खाते में डाल सकती है लेकिन किसानों के 65 हजार करोड़ रुपया माफ न कर लाठी के दम पर कुचलने का काम कर रही है.

पंडे पुजारियों को मुफ्त की मलाई क्यों

ये फैसला मेहनतकश लोगों और उन गरीबों के पेट पर लात मारने जैसी बात है जो जाति से ब्राह्मण नहीं है. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होने के ठीक 2 दिन पहले राज्य के पंडे पुजारियों को उनके पूजा पाठ का फल दे दिया है. फल भी ऐसा कि हर किसी को अपने पुजारी न होने पर पछतावा हो और अगले जनम में ब्राह्मण कुल में पैदा होकर पुजारी बनने के लिए ज्यादा से ज्यादा दान दक्षिणा मंदिरों में चढ़ाएं. अब राज्य के पुजारियों को पेट भरने की नहीं बल्कि भाजपा को वोट दिलवाकर फिर से सत्ता में लाने की चिंता है, जिससे आगे भी उन्हें मुफ्त की मलाई मिलती रहे और वे बेफिक्र होकर काम धंधा और मेहनत किए बगैर मुफ्त के माल पुए उड़ाते रहें.

एक झटके में राज्य सरकार ने कैसे पुजारियों को मालामाल कर दिया है उसे इस फैसले से आसानी से समझा जा सकता है जिसके तहत –

  • ऐसे मंदिर जिनके पास खेती किसानी की जमीन नहीं है उनके पुजारियों को सरकार हर महीने 3 हजार रु देगा.
  • जिन मंदिरों के पास पांच एकड़ तक की जमीन है उनके पुजारियों को 2100 रु महीने के देगी.
  • जिन मंदिरों के पास 5 से 10 एकड़ तक की जमीन है उन्हें उनके पुजारियों को 1500 रु हर महीने दिये जाएंगे.
  • और जिन मंदिरों के पास 10 एकड़ से ज्यादा का रकबा है उनके पुजारियों को 500 रु महीना सरकारी खजाने से दिया जाएगा.

सरकारी मेहरबानियों का सिलसिला यहीं खत्म नहीं हो जाता बल्कि सरकार पुजारियों को देश भर के तीर्थ स्थल भी मुफ्त में घुमाएगी और जिन पुजारियों के पास अपने मकान नहीं हैं उन्हें गांवों में मुख्यमंत्री आवास योजना के और शहरों में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पक्के मकान भी बनाकर देगी. साल में दो बार सरकारी खर्चे पर पुजारियों की सेहत की जांच होगी. इस फैसले में सरकार ने यह व्यवस्था भी कर दी है कि पुजारी मंदिरों की 10 एकड़ तक की जमीन की पैदावार यानि आमदनी खुद रखेंगे और जमीन 10 एकड़ से ज्यादा हो तो उसे जब चाहें नीलाम कर सकते हैं. अब ग्राम सभाएं न तो पुजारियों की नियुक्ति कर सकती हैं और न ही उन्हें हटा सकती हैं.

तिहरी होगी आमदनी – जाहिर है अब राज्य का हर पुजारी लाखों करोड़ों में खेलेगा वजह उसे तिहरी आमदनी होगी. भक्त जो दान दक्षिणा चढ़ावा बगेरह देते हैं वह तो उसका होता ही है लेकिन अब एक तरह से पुजारियों को मंदिरों की जमीनों का भी मालिकाना हक दे दिया है और इशारा यह भी किया है कि इस बार भी भाजपा सत्ता में आई तो अगली बार उन्हें कृषि ऋण पुस्तिकाएं भी दी जाएंगी. पुजारियों को दूसरी बड़ी आमदनी इन्हीं जमीनो से होगी और तीसरा जरिया इस फैसले से उजागर हो ही गया है कि उन्हें नगदी पैसा भी सरकार देगी.

एक छोटे से छोटे मंदिर में भी रोजाना 500 रु से कम का चढ़ावा नहीं आता सीजन यानि धार्मिक तीज त्योहारों के दिनों में तो इसकी तादाद 50 गुना तक बढ़ जाती है अब अगर औसतन हजार रु रोज की भी दान दक्षिणा आई तो पुजारी जी को कम से कम 60 हजार रु महीने की आमदनी होगी जो मेहनत मजदूरी करने बाले दूसरे लोगों के लिए सपना होती है और मुफ्त की ज़मीनों की पैदावार भी 20 हजार रु एकड़ से कम नहीं होती. इतनी पगार राज्य के 80 फीसदी मुलाजिमों को भी नहीं मिलती.

अलावा इसके पुजारियों को भक्त गण समय समय पर गौ दान वस्त्र दान भूमि दान स्वर्ण दान जैसे दर्जनों दान करने की अपनी लत से बाज नहीं आते यानि पुजारियों की बल्ले बल्ले हो गई है.

यह मेहरबानी क्यों – चुनावी लिहाज से देखें तो भाजपा और शिवराज सिंह कोई जोखिम जीत के बाबत नहीं उठाना चाहते. राज्य के कोई घोषित 55 हजार और अघोषित एक लाख मठ मंदिर भाजपा के प्रचार के अड्डे शुरू से ही रहे हैं. अब कोई 5 लाख वोटों का इंतजाम तो भाजपा ने कर ही लिया है लेकिन उम्मीद ही नहीं बल्कि गारंटी भी है कि एक फैसले से मालामाल हो गए ये पुजारी जमकर भाजपा का प्रचार पूजा पाठ से भी पहले करेंगे. एक तो सरकारी एहसान का बदला वे चुकाएंगे दूसरे भाजपा उन्हें कभी निराश नहीं करती वह हर कभी हर कहीं धार्मिक जलसे करती रहती है जिससे दान दक्षिणा इन्हीं पंडे पुजारियों के खीसे में जाता है.

चुनाव से हटकर देखें तो भी भाजपा और साधू संतों और महंतो का याराना हमेशा से ही  शोले फिल्म के जय और वीरू जैसा रहा है . शिवराज सरकार के ताजे फैसले ने तो इस दोस्ती का रंग और गाढ़ा करते मेसेज दे दिया है कि धर्मतंत्र लोकतन्त्र पर भारी पड़ता है और विपक्षी दल भी वोट खोने के डर से इसका विरोध नहीं कर पाते उल्टे बयान यह देते हैं कि सत्ता में आए तो वे भाजपा से ज्यादा ही धर्म के इन दुकानदारों को देंगे. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने भी यही इशारा किया तो साफ हो गया कि उनमें इस गलत और ज्यादती करते फैसले का विरोध करने का माद्दा ही नहीं है और इसीलिए कांग्रेस भाजपा से मुंह की खाती रही है .

अलोतांत्रिक फैसले पर खामोशी क्यों – कांग्रेस ही नहीं बल्कि कोई दूसरा दल या संगठन भी  इस फैसले पर एतराज जताने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा वजह सब के सब सिरे से धर्म के गुलाम हैं . किसी ने यह सवाल नहीं किया कि पुजारियों को सरकारी नौकरों की तरह तनख्वाह क्यों वे सरकार के लिए करते क्या हैं जो वह करदाताओं का पैसा उन लोगों पर लुटा रही है जिनकी गुजर बसर का इंतजाम तो भगवान और धर्म के ठेकेदारों ने पहले से ही कर रखा है क्योंकि वे पंडे पुजारी हैं.

एक आम आदमी धर्म के खौफ के चलते मंदिरों में मेहनत की कमाई दक्षिणा की शक्ल में दे और सरकार भी उसी के टेक्स का पैसा पुजारियों को दे यह कहां लिखा है. सरकारी पैसे का इस्तेमाल जाति और धर्म से परे सभी के भले के लिए हो बात समझ आती है कि सरकार कुछ कर रही है लेकिन सरकार के लिए कुछ न करने बालों को मुफ्त की मलाई देने की तुक समझ से परे है .

पूजा पाठ या भगवान की मूर्तियों की देखभाल कोई सरकारी काम नहीं नहीं है बल्कि एक ऐसा आदिम धंधा या कारोबार है जिसमें धर्म का डर दिखाकर तरह तरह से आम लोगों को लूटा जाता है इसमे सरकार भी शामिल हो गई है तो बात चिंता की है और इस पर एतराज भक्तों को भी जताना चाहिए कि जब हम पुजारी को दान दक्षिणा देते ही हैं तो हमारे ही पैसे को और क्यों सरकारी तौर पर लुटाया जा रहा है.

क्या सरकार इन पुजारियों से उनकी तिहरी आमदनी का हिसाब लेगी जाहिर है नहीं उनकी तो सारी आमदनी टैक्स फ्री है. जो जमीने मंदिरों की हैं वे पूरे लोगों की क्यों नहीं, इन्हें सहकारिता के सिद्धांतों के तहत सार्वजनिक भले के लिए क्यों नहीं इस्तेमाल किया जा सकता. दरअसल ये और ऐसे कई सवाल ही बेहूदे हैं जो धर्म के धंधेबाजों को हिलाकर रख देते हैं और वे हाय हाय करते सड़कों पर आकर विरोध करने लगते  हैं.

फिर आरक्षण का विरोध क्यों –  जातिगत आरक्षण और एक्ट्रोसिटी एक्ट को लेकर पूरे देश के सवर्ण और दलित आमने सामने हैं.  सवर्ण दलितों की काबिलियत पर निशाना साधते हैं तो जागरूक दलित भी पूछने लगा है कि लाखों करोड़ों मंदिरों में सदियों से मंदिरों में बैठकर ब्राह्मण भी जाति की बिना पर जो मुफ्त की मलाई खा रहे हैं वह भी आरक्षण नहीं तो क्या है और उस पर भी हमें मंदिरों में दाखिल नहीं होने दिया जाता और धर्म के नाम पर कैसे कैसे जुल्मो सितम ढाये जाते हैं यह हकीकत किसी से छिपी नहीं है.

जागरूक दलितों का यही तबका अब मंदिरों और पंडे पुजारियों के बहिष्कार की बात करने लगा है.

शिवराज सिंह ने इन और ऐसे कई विस्फोटक हालातों को नजरंदाज करते पुजारियों की झोली भर दी है तो याद रामायण और महाभारत काल की भी आती है जिनमें राजा इसी तरह पंडे पुजारियों पर खजाना लुटा दिया करते थे क्योंकि वे आम लोगों को धर्म कर्म में उलझाए रखते थे जिससे वे राजा की गलत नीतियों , मनमानी , अत्याचार और अय्याशियों का विरोध न करें. सत्ता के ये दलाल  दैवीय प्रकोपों का डर दिखाते जनता को पूजा पाठ यज्ञ हवन बगैरह में उलझाए रखते थे. यही अब हो रहा है तो लोकतन्त्र के माने क्या.

विराट की बीसीसीआई से अपील, विदेशी दौरों पर पत्नियों को साथ भेजें

भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली ने क्रिकेट बोर्ड बीसीसीआई से अपील की है कि खिलाड़ियों के साथ उनकी पत्नियों को भी पूरे विदेशी दौरों पर टीम के साथ रहने की इजाजत दी जाए. मालूम हो कि वर्तमान नीति के अनुसार, खिलाड़ी और सपोर्ट स्टाफ की पत्नियां केवल दो सप्ताह तक साथ रह सकती हैं. सूत्रों के अनुसार कोहली ने पहले बीसीसीआई के एक शीर्ष अधिकारी के सामने इस मुद्दे को रखा, जिसने विनोद राय और डायना एडुलजी की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त प्रशासकों की समिति (CoA) को इस बारे में बताया.

खबरों के मुताबिक सीओए ने इस संबंध में भारतीय टीम के मैनेजर सुनील सुब्रमण्यम से नियम बदलने के लिए औपचारिक अनुरोध करने के लिए कहा है.

एक सूत्र ने कहा, ‘अनुरोध कुछ सप्ताह पहले किया गया था, चूंकि यह बीसीसीआई की नीति है, इसलिए प्रबंधक को पहले औपचारिक अनुरोध करना होगा. अनुष्का शर्मा विदेश में कोहली के साथ यात्रा कर रही हैं, हालांकि, विराट अब पुराने नियम को समाप्त करना चाहते हैं. उनके अनुसार एक नई नीति आनी चाहिए जहां पत्नियों को भारतीय टीम के साथ यात्रा करने की अनुमति दी जानी चाहिए.’

हाल ही में इंग्लैंड दौरे पर हार के बाद ये बात उठी थी कि क्या पत्नियों को खिलाड़ियों के साथ दौरे पर होना चाहिए. ये विवाद पहले भी कई बार उठ चुका है. इंग्लैंड के खिलाफ बीच दौरे पर ही बोर्ड ने खिलाड़ियों की पत्नियों को वापस आने को कहा था.

इंग्लैंड दौरे पर ही उस समय विवाद हुआ, जब अनुष्का शर्मा टीम इंडिया के साथ लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग पहुंची. इसकी एक तस्वीर भी सामने आई, जिसमें अनुष्का पूरी टीम के साथ थीं. तस्वीर को लेकर बीसीसीआई को सोशल मीडिया पर लोगों का काफी गुस्सा झेलना पड़ा. इस दौरान लोगों ने सवाल उठाया कि बीसीसीआई आखिर क्यों किसी खिलाड़ी की पत्नी को आधिकारिक दौरे पर साथ रहने की अनुमति दे सकती है. खिलाड़ी वहां खेलने गए हैं या हनीमून पर.

जीवन सरिता : प्यार में बेजार न हों

क्या कभी आप की किसी ऐसे विपरीतलिंगी से मुलाकात हुई है जो आप को बहुत अच्छा महसूस कराए, ऊंचाइयों का एहसास कराए और आप पर भरपूर प्यार बरसाए, लेकिन कुछ दिनों में ही सबकुछ ठंडा पड़ जाए ऐसे, जैसे उस के जीवन में तुम्हारा कभी कोई महत्त्व ही नहीं रहा हो. आज की स्थिति में यही हो रहा है. आप इसे प्रेम की अग्निवर्षा कह सकते हैं. इस स्थिति से पढ़ेलिखे बुद्धिजीवी भी नहीं बच पा रहे हैं. इस प्रचलन से प्रभावित व्यक्ति थेरैपिस्टों के यहां लाइन लगाए खड़े हैं. अब ऐसा लगता है कि डेटिंग लोगों को करीब लाने के बजाय जोड़तोड़ की एक शृंखला है.

मनोचिकित्सक डेल आर्चर इस तरह के प्रेम के बारे में कहते हैं, ‘‘इसे हम ‘कंडीशनिंग लव’ का एक रूप कह सकते हैं. यह स्थिति प्रेम की आंधी ले कर आती है. इस स्थिति में पीडि़त व्यक्ति कोई शक नहीं कर पाता क्योंकि उसे अत्यधिक सम्मान, प्रेम, आकर्षण तथा भरपूर प्रशंसा मिलती है. लेकिन कुछ दिनों बाद ही उसे ऐसे छोड़ दिया जाता है कि उसे सोचनेसमझने का भी समय नहीं मिलता.’’

बनावटी लगन : आर्चर इस स्थिति का वर्णन करते हुए कहते हैं, ‘‘अगर अचानक आप से कोई प्रेम करने लगे तो आप को होशियार हो जाना चाहिए. इस स्थिति में आप का सहयोगी आप पर अत्यधिक प्यार लुटाएगा, आप का खूब सम्मान करेगा तथा आप की काफी प्रशंसा करेगा. इस स्थिति को भांप कर स्वयं सोच कर देखें ताकि आप के साथ कोई अनहोनी न हो, क्योंकि यह आप के प्रति बनावटी लगन है.’’

खुद को कैसे संभालें : जब आप को यह मालूम हो जाए कि आप इस तरह के प्रेमजाल में फंस चुके हैं तो परेशान न हों. इस संबंध में जानेमाने मनोचिकित्सक और व्यवहार विज्ञान के प्रोफैसर जौय पियरे कहते हैं, ‘‘इस तरह के लोग आत्मविश्वासी, महत्त्वाकांक्षी व आकर्षक व्यक्तित्व के धनी होते हैं. उन्हें उन के व्यवहार तथा बोलचाल की भाषा से पहचान पाना आसान नहीं होता, क्योंकि वे अपना असली रंग तभी दिखाते हैं जब उन्हें यकीन हो जाता है कि आप पूरी तरह उन पर निर्भर हो गए हैं.’’

इस संबंध में रिलेशनशिप विशेषज्ञ रजत खुराना का कहना है, ‘‘बनावटी प्रेमियों की खासीयत यह है कि वे वैसा ही करते हैं जैसा सहयोगी चाहता है. यदि उन का शिकार उन्हें समझ पाता है या उन का मूल्यांकन सही नहीं कर पाता है तो दंड के तौर पर वे अपना ध्यान उस से पूरी तरह हटा लेते हैं और अपने संबंध समाप्त कर लेते हैं जोकि भुक्तभोगी के लिए झकझोर देने वाली घटना होती है.’’

बदलता रूप : समाजशास्त्री शिव विश्वनाथन का कहना है, ‘‘वर्तमान पीढ़ी के लिए डेटिंंग एक शातिर दिमाग का खेल है. डेटिंग अब प्रेम की पर्याय नहीं, बल्कि शिकार की पर्याय बन चुकी है. इस के जरिए जब कोईर् पुरुष किसी महिला का शिकार करता है तो यह उस के भीतर के गुस्से का एक रूप होता है.

‘‘जितना हम उन्नतशील हुए हैं, उतना ही हमारा व्यवहार आदिम हो गया है. रोमांस अब मायावी हो गया है. इस डिजिटल युग में एक अमूर्त भावना से प्यार है.  ‘‘आज के युवाओं में विवेक नहीं है, और न ही उन में अपनी भावनाओं को प्रदर्शित करने की कोई बेहतर जानकारी है. आधुनिक मानव की प्रवृत्ति पशुओं के शिकार करने की प्रवृत्ति के समान हो गई है.’’

दरअसल, किसी भी प्रकार का प्रेम दोनों सहयोगियों से एक प्रकार का समर्पण चाहता है. लेकिन आज की गलाकाट प्रतिस्पर्धा के युग में जहां मैं और मेरा का सिद्धांत लागू है वहां सच्चा प्रेम कोई अहमियत नहीं रखता. यहां प्रेम कुछ नहीं बढ़ाता, मानव का अहं जरूर बढ़ा देता है. इस से बदतर और क्या होगा कि इस मानसिक खेल में कोई किसी का दिल नहीं, बल्कि दिमाग जीतना चाहता है. इस तरह के प्रेमजाल में उलझने से खुद को, दूसरों को और अपने प्रियजनों को भी बचाएं.

प्रेमजाल के प्रकार : मौजूदा डेटिंग की दुनिया में 2 परिस्थितियां लोकप्रिय हो गई हैं. पहली स्थिति में सहयोगी कुछ समय के लिए स्नेह दिखाता है और फिर बिना किसी स्पष्टीकरण के अचानक गायब हो जाता है. दूसरी स्थिति वह होती है जब आप कभी भी सुनिश्चित नहीं होते कि आप का साथी आप के साथ है या नहीं, आप को प्यार करता है या नहीं. ये लोग लंबे समय तक अपनी चुप्पी से लटकाए रखते हैं. लेकिन जब आप उन्हें छोड़ने का मन बना लेते हैं तो वे बोलने लगते हैं.

क्या आप जानते हैं : साइकोलौजी टुडे में लिखा है कि कुख्यात पंथ नेता जिम जोंस, चार्ल्स मैनसन और डेविड कोरेश प्रेमबमबारी को अनुसूचित जनजाति की आत्महत्या और हत्या के लिए इस का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में करते थे. दलाल और गुट के नेता प्रेमबमबारी को संगठन के वफादार और आज्ञाकारियों के लिए भी प्रयोग करते थे. आजकल लव जिहाद इसी श्रेणी में गिना जाने लगा है.

बेहतर यही है कि आप बनावटी या फरेबी प्रेमियों से बच कर रहें और अपनी पढ़ाई या कारोबार पर विशेष ध्यान दें.

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