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धर्म के दलदल में धंसता भारतीय गणतंत्र

सत्ता की कुर्सियों पर सदियों से धर्म विराजमान रहा है. राजा पुरोहितों के कहे अनुसार राज संचालित करते रहे पर यूरोप में धर्म से जब लोग उकता गए तो नवजागरण आंदोलन छेड़ा गया और फ्रांस में चर्च की विलासिता और व्याभिचार के चलते क्रांति का बिगुल फूंका गया. इस तरह की क्रांतियों के असर से विश्व भर में लोकतंत्रों का विकास होने लगा.

लेकिन भारत में सत्ता प्रतिष्ठान जिस व्यग्रता से धर्म की स्थापना में जुटा दिखाई दे रहा है वहीं यूनान से प्रकाश की एक चमचमाती लौ दिखाई दे रही है. एथेंस में एक ऐतिहासिक समझौता हुआ है जो पुरोहितों और बिशपों की स्थिति सिविल सेवकों के रूप में समाप्त कर देगा और ग्रीक को चर्च और राज्य से अलग करने के लिए एक कदम आगे लाएगा.

समझौते के तहत यूनान की सरकार ने चर्चों को दिया जाने वाला सरकारी खर्च बंद करने का निर्णय लिया है. इस में पादरियों को मिला सिविल सेवक का दर्जा खत्म होगा. हालांकि ग्रीक में चर्च और राज्य के अलग होने का यह पहला कदम है और रास्ता अभी बहुत लंबा है. इसे चर्च के नेताओं के साथसाथ सरकार और सांसदों द्वारा अनुमोदन किया जाना है.

यूनान के प्रधानमंत्री एलेक्सिस सिप्रास और आटोसेफर्नियस और्थोडौक्स चर्च के प्रमुख आर्कबिशप लेरोनिमोस के बीच इस संबंध में संयुक्त समझौता हुआ है.

समझौते के अनुसार चर्च की संपत्तियों, कब्जे और निवेशों का प्रबंधन करने के लिए यूनान राज्य और चर्च एक संयुक्त निधि तैयार करेंगे. इस में मौजूदा चर्च के 10 हजार पादरियों का वेतन शामिल होगा, जो अभी सिविल सेवक पेरोल का हिस्सा हैं. यानी इन का वेतन सरकारी खजाने से जा रहा है.

प्रधानमंत्री सिप्रास ने कहा है कि 79 साल बाद चर्च की संपत्ति का मुद्दा हल हो गया है. सरकार ने 1939 में चर्च की संपत्तियों के बदले पादरियों को वेतन देना स्वीकार किया था.

उन्होंने यह भी कहा कि एक तरफ डाक्टरों को वेतन नहीं दिया जा रहा था लेकिन 10 हजार पादरियों को सरकार वेतन दे रही है जबकि डाक्टरों की तादाद पादरियों से कम है. इस से हर कोई नाखुश था.

कई पादरी और नेता प्रधानमंत्री सप्रास और आर्कबिशप के बीच हुए समझौते की आलोचना कर रहे हैं. यूनानी क्लेरिक्स संघ ने शिकायत की है कि पादरियों की सिविल सेवकों की स्थिति खत्म होने से उन के मौजूदा अधिकार भी समाप्त हो जाएंगे. उन का कहना है कि पुरोहितों को धोखा दिया गया है. इस समझौते के बारे में उन से कोई सलाहमशविरा तक नहीं किया गया.

दुनिया को लोकतंत्र का पाठ सिखाने वाले यूनान में हालांकि यूनानी रूढिवादी चर्च यहां की सरकार के अनेक हिस्सों में सर्वव्यापी है. यहां रूढिवादी चर्च  सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. स्कूलों में छात्र आज भी प्रार्थना के साथ अपने दिन की शुरुआत करते हैं और 12वीं तक की पढाई में अनिवार्य रूप से धर्म की शिक्षा जारी हैं. यूनान की अदालतों में न्यायाधीश की सीट के ऊपर एक धार्मिक आइकन लटका रहता है.

यहां की कुछ सार्वजनिक सेवाओं का स्वरूप ऐसा है जिस में अभी भी नागरिकों के धर्म को जानने की अनिवार्यता है. दशकों से यहां की सरकारें चर्च की उपस्थिति में शपथ लेती आई हैं. हालांकि इस बार मार्च में यूनानी मंत्रियों ने पहली बार चर्च के बिना शपथ ली थी.

चर्च शताब्दियों तक फलतेफूलते रहे हैं. ये रोमन कैथोलिक थे. इन में से ज्यादातर रोम के चर्च से अलग हो गए. सभी ईसाई इस बात से सहमत हैं कि ईसा ने केवल एक ही चर्च की स्थापना की थी पर कई कारणों से ईसाइयों में एकता नहीं रह पाई और उन के बहुत से चर्च और संगठन बन गए. वे एकदूसरे से पूरी तरह स्वतंत्र हैं.

यूरोपीय देशों में राज्य और चर्च के बीच सत्ता को ले कर लंबे समय से जद्दोजेहाद चला है. 1517 में लूथर ने कैथोलिक चर्च की बुराइयों के विरुद्ध आवाज उठाई. उन्होंने कुछ परंपरागत ईसाई धर्म सिद्धांतों का विरोध किया. इस में लूथर को जर्मन शासकों का संरक्षण भी मिला. बाद में कालविन ने लूथर के सिद्धांतों को विकसित करते हुए एक दूसरे प्रोटेस्टैंट संप्रदाय का प्रवर्तन किया जो स्विट्जरलैंड, स्काटलैंड, हालैंड तथा फ्रांस के कुछ भागों में फैला. अंत में हेनरी अष्टम ने भी इंग्लैंड को रोम के अधिकार से अलग कर लिया पर वहां एंग्लिकन चर्च प्रारंभ हो गया.

लूथर ने दो साम्राज्यों के सिद्धांतों ने चर्च और राज्य को अलग करने की आधुनिक धारणा की शुरुआत की.

16वीं शताब्दी में पोप के नेतृत्व में चर्च के शासन को फिर प्राथमिकता मिलने लगी. बाद की शताब्दियों में सारे पश्चिम यूरोप में नास्तिकता तथा अविश्वास व्यापक रूप से फैल गया. फ्रांस की क्रांति के फलस्वरूप चर्च की अधिकांश संपत्ति जब्त हुई और चर्च तथा सरकार का गहरा संबंध टूट गया.

यूनान ने दुनिया को लोकतंत्र, सभ्यता और धर्मों को आदर देने का विचार दिया. आज की जनतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का प्रारंभ यूनान से होता है. यूनान ने सुकरात, प्लेटो, अरस्तू जैसे दार्शनिक दिए. उन की शिक्षा ने विश्व को रास्ता दिखाया. गणित, भौतिक विज्ञान, जीवविज्ञान का जन्म भी यूनान में ही हुआ.

इतिहासकारों का मानना है कि करीब 4 हजार साल ईसापूर्व यूनान में मानव आबादी बस चुकी थी. यह भी मान्य तथ्य है कि ईसापूर्व 1000-499 में यूनान के नगर राज्यों की स्थापना हो चुकी थी जहां अनेक राजाओं का शासन चलता था. ईसापूर्व 683 में एथेंस में राजतंत्र समाप्त हो गया और अपने ढंग का जनतंत्र अस्तित्व में आया. बाद में यूनान पर रोम का आधिपत्य हो गया. सन् 380 में सम्राट थियोडोसियस के शासन में ईसाई धर्म रोम का राजधर्म बन गया. 467 में जब रोमन साम्राज्य का पतन हुआ तब रोम के पतन का कारण ईसाई धर्मावलंबी होना बताया गया.

अब फिर मुस्लिम देशों को छोड़ दें तो विश्व के बाकी देशों में धर्म का असर शिक्षा की वजह से कम हो रहा है. यूरोप में सैंकड़ों साल पुराने चर्च बंद हो रहे हैं. उन की जगह बड़ेबड़े शौपिंग मौल, डिपार्टमेंटल स्टोर, शिक्षण संस्थान बन रहे हैं. पादरियों के कुकर्मों के चलते कई चर्च तो पीड़ितों के मुआवजे की भेंट चढ़ गए या नीलाम कर दिए गए.

दुनिया में धर्म का रुतबा घट रहा है. नास्तिकों की संख्या बढ़ रही है क्योंकि वहां लोगों को धर्म, ईश्वर की सच्चाई समझ आ रही है लेकिन भारत धर्म, अध्यात्म में अपनी मुक्ति का मार्ग तलाश रहा है. यहां की भाजपा सरकार देश में वैज्ञानिक तकनीक ज्ञान को आगे बढ़ाने की बजाय हिंदुत्व के खोखले काल्पनिक सहारे में भविष्य देख रही है. यह मार्ग आगे बढ़ने की बजाय पीछे मध्यकाल के अंधकार की ओर जा रहा है.

देश में मूर्तियां और मंदिर निर्माण पर पूरी शक्ति खर्च की जा रही है. स्कूलों, कालिजों, विश्वविद्यालयों में वेद, पुराण, गीता, योग, आयुर्वेद अनिवार्य किए जा रहे हैं. इस ज्ञान पर सत्ता प्रतिष्ठान आत्ममुग्ध हो रहा है. सरकार देश को धार्मिक राज्य बनाने पर तुली हुई है. धार्मिक संगठनों से सरकार मिली हुई है. नीतियां बनाने और क्रियान्वयन में धर्म की चलती है. शासन धार्मिक अभिव्यक्ति में डूबा दिखाई दे रहा है.

कई राज्यों के मंत्री भगवाधारी हैं. उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री एक मठ के प्रधान हैं. यानी धर्म के प्रतिनिधि सत्ता में मौजूद हैं जो धार्मिक एजेंडा लागू कर रहे हैं. शहरों, महल्ले के पौराणिक नामकरण का दौर चल रहा है. अयोध्या में मंदिर निर्माण की पूरी तैयारी की जा रही है.

लेकिन इस से नुकसान यह है कि सरकारी संस्थानों, सार्वजनिक कार्यालयों में धार्मिंक संस्थाओं के विचार लागू होने लगेंगे. एक धर्मनिरपेक्ष राज्य का मौडल धार्मिक संस्थाओं और राज्य को एकदूसरे के हस्तक्षेप से बचाता है पर व्यवहार में ऐसा कहीं नहीं है. इस का उद्देश्य सार्वजनिक संस्थानों को विशेष रूप से सरकारी कार्यालयों को धार्मिक संस्थानों के प्रभाव से बचाने का है क्योंकि धार्मिक विचारों में सार्वजनिक जिम्मेदारी का कोई विचार नहीं है. धार्मिक संस्थाएं अपने स्वयं के धर्म के बारे में भी नहीं सोचतीं. क्या हम हिंदू तालिबान बन रहे हैं? धर्म के सहारे राज करने का सपना देखने वाले अफगानिस्तान, पाकिस्तान, सीरिया, सूडान के हालात सामने हैं. भारत की जनता को तरक्की, आजादी चाहिए या धर्म की थोपी गुलाम जिंदगी.

टेम्परेरी जौब्स की तादाद 3 लाख पहुंचने की जगी उम्मीद

देश बेरोजगारी के दौर से गुजर रहा है. बेरोजगारों की तादाद बढ़ती जा रही है. परमानेंट यानी स्थाई नौकरियां तो लगभग ना के बराबर हैं. हां, सुकून की बात यह है कि अस्थाई नौकरियां बढ़ रही हैं. एक बेरोजगार के लिए बेकार बैठे रहने से अच्छा है कि टेम्परेरी नौकरी मिल रही है तो उसी को कर लिया जाए.

आज देश में अस्थाई कर्मचारियों की भर्ती 4 साल के उच्च स्तर पर है. गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स यानी जीएसटी के लागू होने के चलते आर्थिक, ई-कौमर्स और फूड डिलीवरी सेगमेंट में संगठित क्षेत्र की कंपनियों का दबदबा बढ़ रहा है. इस से ऐसा अनुमान है कि नई अस्थाई नौकरियों की तादाद पिछले साल की 1.3 लाख से बढ़ कर 3 लाख तक हो सकती हैं.

टीमलीज़ सर्विसेज कंपनी का कहना है कि 2015 से अस्थाई कर्मचारियों की नियुक्ति में 5 गुना इजाफा हुआ है. इस की वजह सिर्फ जीएसटी नहीं है, बल्कि लेबर फार्मलाईजेशन का भी इस में अहम योगदान है.  इस का नतीजा यह हुआ है कि अस्थाई कर्मचारी अब कौर्पोरेट इंडिया का अहम अंग बन गया.

पिछले साल 1 जुलाई से जीएसटी लागू होने से पहले असंगठित और अपंजीकृत कंपनियों के पास प्राइसिंग एडवांटेज था क्योंकि उन पर सर्विस टैक्स नहीं लगता था. लेकिन उस के बाद से यानी जीएसटी लागू होने के बाद से ग्राहकों के लिए टैक्स से जुडी स्टाफिंग फर्मों की सेवाएं लेने का चलन बढ़ा है क्योंकि जीएसटी के तहत उन्हें इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा करने की इजाजत मिली है. इस ने जीएसटी के पहले की तुलना में अधिकतर सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए सेवाओं को ज्यादा किफायती बना दिया है. अब वे अपंजीकृत सप्लायर्स से मुकाबला कर सकते हैं. सही मानों में कहा जाए तो अब वे अनरजिस्टर्ड कंपनियों के मुकाबले फायदे की स्थिति में हैं.

अस्थाई कर्मचारियों की भर्ती में बढ़ोतरी की बड़ी वजह बड़ी ई-कोमर्स कम्पनियां है, जिन में खासकर फ्लिपकार्ट और अमेजन भी शामिल हैं. मालूम हो कि ई-कामर्स कंपनियों ने अभी फेस्टिव सीजन में बढती बिक्री के मद्देनज़र 1.2 लाख नए अस्थाई कर्मचारियों को भारती किया था.

रेडस्टेड इंडिया कंपनी का कहना है कि दिग्गज ई-कामर्स कंपनियों के बीच एकदूसरे से आगे निकलने की होड़ है. अस्थाई कर्मचारियों की नियुक्ति में भी अमेज़न और फ्लिपकार्ट में यही होड़ दिखी.

लोजिस्टिक सेक्टर तो बढ़ ही रहा है, इस के साथ ही, फ्लिपकार्ट और अमेज़न जैसी बड़ी ई-कामर्स कम्पनियां एकदूसरे से आगे निकलने की कोशिश कर रही हैं. यह अस्थाई कर्मचारियों की नियुक्ति बढ़ने की प्रमुख वजह है.

इस बीच, टीमलीज सर्विसेज कंपनी का यह भी कहना है कि औनलाइन खरीदारों की तादाद भी बढ़ने की उम्मीद है. 2018 में अभी तक 10 करोड़ लोगों ने औनलाइन शौपिंग की है. 2020 तक इन की तादाद बढ़ कर 17.5 करोड़ हो सकती है.

‘देश छोड़ने’ के कोहली के बयान पर विश्वनाथन आनंद ने कही ये बात

हाल ही में विराट कोहली के ‘पसंदीदा विदेशी खिलाड़ी’ के मामले में उनकी एक  की काफी आलोचना हुई. कोहली ने एक फैन को भारत से चले जाने को कहा था क्योकि उसका पसंदीदा खिलाड़ी विदेशी था. इस बात पर सोशल मीडिया पर लोगों ने कोहली के खिलाफ काफी तीखी प्रतिक्रिया दी और जम कर उनकी आलोचना की गई. इन सब के बीच पूर्व विश्व चैंपियन विश्वनाथन आनंद ने कहा कि ये सब कुछ कोहली ने भावनाओं में बह कर कह दिया. विश्वनाथन आनंद ने कहा कि सोशल मीडिया पर एक फैन के लिये ‘भारत से चले जाओ’ टिप्पणी करने के दौरान भारतीय कप्तान विराट कोहली इमोशनल हो गए और अपना आपा खो बैठे. इस टिप्पणी के बाद कोहली को सोशल मीडिया पर काफी ट्रोल किया गया.

विश्वनाथन ने एक एजेंसी से हुई बातचीत में कहा कि, ‘मुझे लगता है कि उसने नियंत्रण खो दिया. वह थोड़ा भावुक हो गया और उसने वह बोल दिया जो सबसे पहले उसके दिमाग में आया. खेल में आपको सभी तरह के चरित्र मिलते हैं और यह वह चरित्र है जो उसके सबसे अनुकूल है.’

इस पर आगे वेलते हुए आनंद ने कहा कि शायद कोहली कमजोर लम्हे में घिर गया या वह अपने सर्वश्रेष्ठ मूड में नहीं था. यह मेरा नजरिया है. इसके बाद उसने नियंत्रण खो दिया. इसके अलावा इस मामले में काफी कुछ कहा और लिखा जा चुका है. तो बेहतर होगा इस पर और कुछ ना ही कहा जाए.

आपको बता दें कि लाइव बातचीत के दौरान एक प्रशंसक ने इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाजों की तारीफ करते हुए कोहली को जरूरत से अधिक तवज्जो देने की बात कही, जिसपर आक्रमक रवैया दिखाते हुए भारतीय कप्तान ने कहा कि, ‘मुझे नहीं लगता आपको भारत में रहना चाहिए.’

 

सैमसंग का फोल्डेबल फोन नए साल में होगा लौन्च

दक्षिण कोरियाई स्मार्टफोन निर्माता कंपनी सैमसंग ने अपना पहला फोल्डेबल फोन नए साल में लौन्च करने की योजना बनाई है. इसके साथ ही कंपनी 5G नेटवर्क वाले गैलेक्सी एस10  स्मार्टफोन भी लौन्च करेगी. मार्च में कंपनी फोल्डेबल गैलेक्सी एफ फोन, गैलेक्सी एस10 का एक और वेरिएंट लौन्च करेगी.

सैमसंग इलेक्ट्रौनिक्स के अध्यक्ष और कंपनी के मोबाइल कारोबार के प्रमुख कोह डोंग-जिन ने पिछले हफ्ते कहा था कि कंपनी 2019 की पहली छमाही में एक फोल्डेबल स्मार्टफोन उतारेगी.  सूत्रों के अनुसार दक्षिण कोरियाई टेक्नोलौजी कंपनी ने फरवरी में फ्लैगशिप गैलेक्सी एस10 स्मार्टफोन से पर्दा हटाने की योजना बनाई है.

आपके बता दें फोल्डेबल स्मार्टफोन के 5G सपोर्ट करने की उम्मीद नहीं है. इस स्मार्टफोन की कीमत का निर्धारण नहीं किया गया है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि इसकी कीमत 20 लाख वान (1,770 डौलर) तक हो सकती है.

मोदी और माल्या पर सीआईसी सख्त, लंबी हो सकती है डिफाल्टरों की लिस्ट

भारत सरकार के लिए मेहुल चौकसी, विजय माल्या जैसे नाम गले का फांस बने हुए हैं. पर हालिया खबर जो आ रही है उससे सरकार पर ये दबाव और ज्यादा बढ़ सकता है. मेहुल, नीरव, माल्या और विक्रम कोठारी जैसे कई बड़े डिफाल्टरों के अलावा और भी कई नाम हैं जो सामने आ सकते हैं. दरअसल सेंट्रल इंफार्मेशन कमीशन (CIC) ने रिजर्व बैंक के गवर्नर और प्रधानमंत्री कार्यालय को नोटिस जारी कर कहा है कि जल्द से जल्द विलफुल डिफाल्टर्स के नाम का खुलासा करें.

इन बड़े नामों के अलावा डिफाल्टर्स की लिस्ट में ऐसे कई नाम हैं जिनका नाम सामने नहीं आ सका है. इन डिफाल्टर्स के नाम को बैंको ने सार्वजनिक नहीं किया. चीफ इंफार्मेशन कमीशन ने राइट टू इंफार्मेशन एक्ट (RTI Act) के तहत पूछा है कि आखिर क्यों अब तक डिफाल्टर्स की लिस्ट नहीं जारी की गई? CIC की सख्ती के बाद देश भर के तमाम विलफुल डिफाल्टर्स के लिए परेशानी बढ़ सकती है और इनके नाम जल्दी ही सार्वजनिक किया जा सकता है. इस मामले में रिजर्व बैंक को 26 नवंबर तक नोटिस का जवाब देना है.

पिछले किछ दिनों में पब्लिक सेक्टर के केवल चार बैंकों ने डिफाल्टर के नामों का खुलासा किया. आपको बता दें कि इस लिस्ट में 1814 ऐसे डिफाल्टर हैं जिनके पास बैंकों के कुल 41 हजार 716 करोड़ रुपये फंसे हुए हैं. एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट में इस बात का दावा किया गया है कि लगभग सभी बैंकों में डिफाल्टर हैं. इनमें शीर्ष 10 डिफाल्टरों के पास बकाया रकम का आधा पैसा फंसा हुआ है. अब देखने वाली बात होगी कि बैंक डिफाल्टरों की लिस्ट कितनी बड़ी होने वाली है और इसमें कितने बड़े नाम और जुड़ने वाले हैं.

बौक्स औफिस पर ‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’ की हुई बुरी दुर्गति

‘यशराज फिल्मस’ की आदित्य चोपड़ा निर्मित और विजय कृष्ण आचार्य निर्देशित फिल्म ‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’ की बौक्स आफिस पर जिस तरह से दुर्गति हुई है, उससे पूरा बौलीवुड सदमे में है. अफसोस की बात यह है कि इस फिल्म को अमिताभ बच्चन और आमिर खान जैसे दिग्गज कलाकार और चार दिन की लगातार मिले दीवाली का अवकाश भी न बचा सका. 340 करोड़ की लागत वाली फिल्म ‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’ चार दिन के वीकेंड में महज 117 करोड़ ही कमा सकी. यहां हमें याद रखना पड़ेगा कि फिल्म ‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’ का निर्माण करने के साथ साथ वितरण भी स्वयं ‘यशराज फिल्म्स’ ने ही किया है. इस फिल्म को बौक्स औफिस पर उतारने यानी कि सिनेमाघरों में पहुंचाते हुए दर्शकों को ठगने के सारे हथकंडे अपनाए. धार्मिक सोच के अनुसार दीवाली की रात सोना नहीं चाहिए. इसलिए इस फिल्म को दीवाली की रात बारह बजे के बाद ही कई शो रख दिए गए, जिनकी कीमत भी काफी रखी गयी. मुंबई में सिंगल थिएटरों में साढ़े तीन सौ रूपए से सात सौ रूपए तक टिकट के दाम रखे गए. जबकि मल्टीप्लैक्स में पांच सौ रूपए से लेकर 1600 रूपए तक टिकट के दाम रखे गए. यूं तो दिखावे के लिए आमिर खान ने इस तरह टिकट के दाम बढ़ाए जाने पर अपनी नाराजगी भी जाहिर की. फिर भी फिल्म ‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’ को डूबने से कोई न बचा सका.

टिकटों के दाम बढ़ाने के बावजूद फिल्म ‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’ वीकेंड कलेशन में ‘संजू’, ‘रेस 3’, ‘टाइगर जिंदा है’ का भी मुकाबला नहीं कर पायी. जबकि ‘संजू’, ‘रेस 3’ और ‘टाइगर जिंदा है’ को छुट्टियों का भी फायदा नहीं मिला था.

इस फिल्म ने पहले दिन यानी कि गुरूवार को बाक्स आफिस पर पचास करोड़ कमाए थे. (बौलीवुड का एक सूत्र इस रकम पर सवाल उठा रहा है. इस सूत्र का कहना है कि ‘यशराज फिल्म्स’ ने इस बार पत्रकारों के लिए प्रेस शो नहीं रखा. बल्कि ‘यशराज फिल्म्स’ ने मुंबई व दिल्ली शहर के कुछ पत्रकारों के घरों पर टिकटें भिजवाईं. इन टिकटों की रकम भले ही यशराज फिल्म्स ने चुकाई, पर यह रकम 50 करोड़ रूपये में जुड़ी हुई है.) मगर दूसरे दिन शुक्रवार को यह रकम सीधे 42 प्रतिशत घटकर महज 28 करोड़ रह गई. तीसरे दिन शनिवार को यह रकम घटकर महज 22 करोड़ 75 लाख रूपए और चौथे दिन रविवार को घटकर 16 करोड़़ पचहत्तर लाख पए रही. इस तरह चार दिन के छुट्टी वाले वीकेंड में यह फिल्म महज एक सौ सत्रह  करोड़ पचास लाख ही बटोर सकी. मजेदार बात यह है कि फिल्म के निर्माता के द्वारा दावा किया जा रहा था कि उनकी फिल्म वीकेंड के चार दिन में चार सौ करोड़ रूपए कमा लेगी. इसी लक्ष्य को पाने के लिए टिकट के दाम भी बढ़ाए गए थे. जबकि अमूमन हर फिल्म शुक्रवार को प्रदर्शित होती और छुट्टी का वीकेंड न होने पर भी हर फिल्म शुक्रवार के मुकाबले शनिवार और शनिवार के मुकाबले रविवार को कई गुणा ज्यादा कमाती है. मगर यहां तो सिर्फ गिरावट ही आयी. पांचवें दिन सोमवार को तो सुबह से ही सिनेमाघर खाली पड़े हुए हैं.

इस फिल्म से सबसे बड़ा नुकसान निर्माता के अलावा आमिर खान को हुआ. सोशल मीडिया पर दर्शकों और आमीर खान के प्रशंसकों ने आमिर  खान को कटघरे में खड़ा करते हुए काफी नाराजगी जाहिर की. अपने प्रशंसकों की व्यथा से आहत होकर आमिर खान ने ऐलान कर दिया कि वह कुछ दिन के लिए अभिनय से अवकाश ले रहे हैं. अब यह कितने दिन के लिए होगा, पता नहीं.

ज्ञातब्य है कि हमने इस फिल्म की समीक्षा लिखते हुए पहले ही आगाह कर दिया था कि यह फिल्म सिर्फ दर्शकों को ठगने वाली है. इस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है, जिसके लिए दर्शक पैसा व अपना समय बर्बाद करे.

फिल्म ‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’ की बाक्स आफिस पर जो दुर्गति हुई है, उससे हर फिल्मकार को सबक लेने के साथ साथ यह समझ लेना चाहिए कि दिग्गज या बड़े स्टार कलाकार भी उस फिल्म को डूबने से नहीं बचा सकते, जिस फिल्म में अच्छी कहानी, अच्छा कंटेंट नही होगा.

विदेशों में भी बुरी हालत

इस फिल्म की विदेशी बाजार में पिछली असफल फिल्मों ‘फैन’ और ‘जब सेजल मेट हैरी’ से भी ज्यादा बुरी हालत रही. अमरीका व कनाडा में आमीर खान के प्रशंसक सर्वाधिक हैं. पर यहां भी यह फिल्म कमा न सकी.

अब तक विदेशी बाजार में वीकेंड में ‘पद्मावत’ ने 10.6 मिलियन डालर, ‘रेस 3’ ने 7.79 मिलियन डालर, ‘संजू’ ने 7.22 मिलियन डालर के मुकाबले ’‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’’ने   5.25 मिलियन डालर ही कमाए.

आसान नहीं है फिल्म जीरो की राह, शाहरुख को मिलेंगी ये चुनौतियां

शाहरुख खान के अभिनय से सजी और आनंद एल राय निर्देशित फिल्म ‘जीरो’ के ट्रेलर व पोस्टर जिस दिन से आया है उसी दिन से इस फिल्म की मुसीबतें बढ़ती ही जा रही है. एक तरफ सिख समुदाय नाराज है तो दूसरी तरफ शाहरुख खान के अपने दोस्त भी उनके लिए मुसीबतें बढ़ा रहे हैं. तीसरी तरफ हौलीवुड भी उनके पीछे पड़ गया है.

सिख समुदाय नाराज मामला पहुंचा कोर्ट

फिल्म ‘जीरो’ के पोस्टर में शाहरुख खान द्वारा नंगे बदन कृपाण धारण करने को लेकर सिख समुदाय नाराज है और दिल्ली में पुलिस में शिकायत दर्ज करायी जा चुकी है. वहीं मुंबई के एक वकील ने मुंबई हाई कोर्ट में फिल्म ‘जीरो’ के खिलाफ आईपीसी की धारा 295( ए ) के तहत याचिका दायर की है. आरोप है कि यह फिल्म जानबूझकर सिख समुदाय के लोगों की धार्मिक भावना को ठेंस पहुंचाने का काम कर रही है. मुंबई उच्च न्यायालय में दायर इस याचिका में शाहरुख खान और फिल्म के निर्माता के खिलाफ कार्यवाही ने की मांग की गयी है.

मुंबई उच्च न्यायालय में एक वकील अमृतपाल सिंह खालसा ने फिल्म ‘जीरो’ के ट्रेलर के आधार पर अभिनेता शाहरुख खान, फिल्म के निर्माता गौरी खान व करूणा बडवाल, निर्देशक आनंद एल राय, ‘रेड चिली इंटरटेनमेंट प्रा.लिमिटेड’  के साथ ही ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ के सीईओ और चेअरमैन के खिलाफ कार्यवाही करने की मांग की है. इस पर मुंबई उच्च न्यायालय में 19 नवंबर को सुनवाई होगी.

कन्नड़ व हिंदी सहित पांच भाषाओं की फिल्म ‘केजीएफ’ ने दी चुनौती

फिल्म ‘जीरो’ के लिए कन्नड़ के सुपर स्टार यश की फिल्म ‘केजीएफ’ एक नई मुसीबत लेकर खड़ी हो गयी है. दक्षिण भारत यानी कि कन्नड़ भाषा के सुपर स्टार यश अपनी फिल्म ‘केजीएफ’ लेकर आ रहे हैं. जिसे वह कन्नड़, तमिल, तेलगू, हिंदी और मलयालम सहित पांच भाषाओं में एक साथ प्रदर्शित करने वाले हैं. फिल्म ‘केजीएफ’ का ट्रेलर बाजार में आ चुका है, जिसे देखकर अहसास होता है कि इस फिल्म को भी ‘बाहुबली’ के ही तर्ज पर भव्य स्तर पर फिल्माया गया है.

फिल्म ‘केजीएफ’ भी शाहरुख खान की फिल्म ‘जीरो’ के साथ 21 दिसंबर को पूरे विश्व में एक साथ प्रदर्शित की जाएगी. केजीएफ यानी कोलार गोल्डफील्ड की कहानी 1950 से 1990 के बीच की है. जिसमें भारी भरकम संवाद हैं. फिल्म का ट्रेलर बाजार में आने के दिन से ही बौलीवुड में चर्चा गर्म है कि यदि ‘केजीएफ’के प्रदर्शन की तारीख नहीं बदली गयी, तो शाहरुख खान की फिल्म ‘जीरो’ का गणित गड़बड़ करने के साथ ही शाहरुख खान का बना बनाया खेल बिगड़ जाएगा.

केजीफ को हिंदी में फरहान अख्तर करेंगे वितरित

मजेदार बात यह है कि फिल्म ‘केजीएफ’ को हिंदी में शाहरुख खान के खास दोस्त फरहान अख्तर प्रदर्शित कर रहे हैं. फरहान अख्तर ने ट्वीटर सहित सोशल मीडिया के हर प्लेटफार्म पर जबरदस्त तरीके से फिल्म ‘केजीफ’ का प्रचारित करना शुरू कर दिया है.

उधर ट्रेलर को बाजार में लाने के साथ ही फिल्म ‘केजीएफ’ के नायक यश ने कहा है, ‘मैं शुरू से ही बौलीवुड की फिल्मों, खासकर अमिताभ बच्चन की फिल्मों से प्रभावित रहा हूं. इसी के चलते ‘केजीएफ’ में लोगों को मेरे अभिनय में अमिताभ बच्चन की एंग्री इमेज की झलक नजर आ सकती है. मुझे हिंदी अच्छी तरह से आती है, पर बोलने की आदत छूट गयी है. मुझे अमिताभ बच्चन की फिल्मों के तमाम संवाद याद हैं.’

फिल्म ‘केजीएफ’ की कहानी मुंबई की सड़कों पर पले बढ़े रौकी की है, जो कि बाद में कोलार की रक्त से सनी गोल्ड माइन्स में जाता है. फिल्म के ट्रेलर से एक संदेश उभरता है कि युद्ध के मैदान में इमोशंन्स और प्यार के कोई मायने नहीं है. युद्ध के मैदान में सिर्फ बहादुर योद्धा ही जीतते हैं. फिल्म ‘केजीएफ’ कहती है, ‘हजारों गिरेंगे, एक राज करेगा. मुंबई से रक्त रंजित कोलार की गोल्ड माइन्स तक की रौकी की यात्रा के गवाह बनिए.

कोलार देश का वह क्षेत्र है जिसे सोने के उत्पादन के लिए आरक्षित किया गया था. मगर 2001 में जब सोने का उत्पादन काफी घट गया, तो यहां की सभी माइन्स यानी कि सोने की खदानें बंद कर दी गयीं.

करण जोहर भी मैदान में

उधर शाहरुख खान व उनकी पत्नी गौरी खान के खास दोस्त करण जोहर ने दोस्ती निभाते हुए एक सप्ताह छोड़ दिया है, पर वह 28 दिसंबर को अपनी फिल्म ‘सिंबा’ लेकर आएंगे, जिसका निर्देशन रोहित शेट्टी ने किया है. यह वही रोहित शेट्टी हैं, जिन्होने शाहरुख खान के लिए असफल फिल्म ‘दिलवाले’ निर्देशित की थी. फिल्म ‘सिंबा’ में सैफ अली खान की बेटी सारा अली खान और रणवीर सिंह की जोड़ी है. मजेदार बात यह है कि करण जोहर ने 28 दिसंबर से सभी सिंगल थिएटर बुक कर लिए हैं.

‘माउली’ हटी

शाहरुख खान के मित्र व अभिनेता रितेश देशमुख ने शाहरुख खान का निवेदन स्वीकार करते हुए अपनी मराठी भाषा की फिल्म ‘माउली’ को अब 21 दिसंबर को रिलीज करने की बजाय अब एक सप्ताह पहले 14 दिसंबर को ही रिलीज करने का फैसला कर लिया है. शाहरुख खान ने भी रितेश देशमुख को अपना छोटा भाई बताते हुए सोशल मीडिया पर उनका धन्यवाद अदा कर दिया है.

हौलीवुड फिल्म ‘एक्वामैन’ से कड़ी टक्कर

उधर हौलीवुड की फिल्म ‘एक्वामैन’ भी अंग्रेजी के अलावा पांच भारतीय भाषाओं में 21 दिसंबर को ही रिलीज होने वाली है. इस फिल्म के ट्रेलर ने पहले से ही भारतीय दर्शकों के मन में पूरी फिल्म देखने की उत्सुकता जगा रखी है.

मोदी के ‘विकास’ पर भारी पड़ता ‘हिंदुत्व’

अपनी योजनाओं के सही परिणाम न दे सकने वाले मोदी अब हिन्दुत्व के एजेंडे के दबाव में फंस गये हैं. विकास के मौडल की बात कर प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी अपनी योजनाओं से जनता को लुभाने में कारगर नहीं हुये.

खासकर नोटबंदी, जीएसटी, बेरोजगारी और मंहगाई के मुद्दे पर केन्द्र सरकार जिस तरह से फेल हुई उसके बाद हिन्दुवादी संगठन मोदी के विकास मौडल पर भारी पड गये. इसकी वजह से 2014 के मोदी का विकास मौडल 2019 में राममंदिर मौडल में बदल गया. राममंदिर आन्दोलन का श्रेय लेने के लिये शिवसेना, अखिल भारत हिन्दू महासभा, विश्व हिन्दू परिषद और भाजपा आपस में ही टकरा रहे हैं .हिन्दुत्व के सामने लाचार प्रधनमंत्री मोदी मजबूरन इस रस्साकशी को देख रहे हैं.

अयोध्या के राममंदिर प्रकरण में केन्द्र सरकार इस बात की पक्षधर थी कि कोर्ट का फैसला ही मान्य होगा. मंदिर मुद्दे पर केन्द्र सरकार को बैकफुट पर देखकर शिवसेना ने उस पर दबाव बनाने के लिये 25 नवंबर को अयोध्या में सभा करने का एलान किया था. एक माह पूर्व शिवसेना के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राज्य सभा सदस्य संजय राउत ने कहा था कि शिवसेना की सभा में सेना प्रमुख उद्वव ठाकरे आएंगे और राम मंदिर के लिये कानून बनाने के मुद्दे पर केन्द्र सरकार को घेरेंगे. मंदिर मुददा शिवसेना लेकर न चली जाये ऐसे में भाजपा के कुछ नेताओं खासकर राकेश सिन्हा ने मंदिर मुद्दे पर निजी बिल लाने की बात कहनी शुरू कर दी.

शिवसेना को मात देने के लिये भाजपा की योगी सरकार ने अयोध्या में दीपोत्सव कार्यक्रम के दौरान फैजाबाद का नाम बदल कर अयोध्या करने के साथ ही सरयू किनारे राम की 152 फुट ऊंची प्रतिमा बनाने, एयरपोर्ट और मेडिकल कालेज बनाने की योजना पास कर दी. भाजपा के साथ ही साथ विश्वहिन्दू परिषद भी इस लडाई में कूद गई. विश्व हिन्दू परिषद ने 25 नवम्बर को ही अयोध्या में ही अपनी धर्मसभा करने का एलान कर दिया. धर्मसभा के लिये विहिप के अंतरर्राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय ने भूमिपूजन कार्यक्रम भी कर लिया. चंपत राय के कहा कि राम मंदिर मुकदमा सितम्बर 2018 माह में ही खत्म हो चुका होता पर छलकपट करने वाले इसे लोकसभा चुनाव तक ले जाना चाहते हैं.

विहिप 24 नवम्बर को अयोध्या में एक लाख और 9 दिसम्बर को दिल्ली में 5 लाख लोगों की सभा करने का दावा कर रही है. विहिप के प्रांतीय प्रवक्ता शरद शर्मा कहते है कि विहिप का कार्यक्रम पहले से प्रस्तावित था इसका शिवसेना से कुछ लेना देना नहीं है. 24 को ही अयोध्या में शिवसेना प्रमुख उद्वव ठाकरे आएंगे. वह लक्ष्मण किला में ही संतो माहत्माओं से मिलेगे. अखिल भारत हिन्दू महासभा सुप्रीम कोर्ट में जाकर राम मंदिर की जल्द सुनवाई की मांग कर रही है. ऐसे में साफ लग रहा है कि मंदिर मुद्दे को लेकर तमाम मंदिर समर्थक दल अपने ही वर्चस्व को साबित करने में जुट गये हैं. 25 नवम्बर को अयोध्या में हो रहे आयोजन से पता चल सकेगा कि शिवसेना और विहिप में किसकी पकड मजबूत है.

संघ यानि आरएसएस ने जिस तरह से मंदिर मुद्दे को आगे बढ़ाया है उससे साफ हो गया है कि भाजपा में मंदिर चुनावी मुददा होगा. मोदी के गुजरात विकास के मौडल को 2019 में जगह नहीं मिल पायेगी. जानकार मानते हैं कि मोदी पर 2014 के मुकाबले 2019 के चुनाव में दबाव बढ़ रहा है. अब वह पहले की तरह अपनी मर्जी से फैसले नहीं ले सकेगे.

ठग्स औफ हिंदोस्तान : पहली बार तो नहीं ठगे गए लोग

लोग हिंदी फिल्म ‘ठग्स औफ हिंदोस्तान’ के बकवास होने का रोना रो रहे हैं. बोल रहे हैं कि बड़े बजट की इस फिल्म से उन के पैसे वसूल नहीं हुए. पर क्यों? अरे, कोई फिल्म इसलिए नहीं बनाई जाती कि लोगों के दिलों में न उतर सके. लेकिन कभीकभार ऐसा हो जाता है. ऐसा पहले भी हुआ है कि बड़े सितारों से सजी बड़े बजट की फिल्में पहले ही दिन बौक्स औफिस पर दम तोड़ गई थीं.

लेकिन क्या लोग खासकर भारत में लोग अच्छी फिल्में देखने के वाकई शौकीन हैं? क्योंकि पहले कई बार ऐसा देखा गया है कि किसी शानदार फिल्म की समीक्षा लिखने वाले समीक्षक ने फिल्म की तारीफ में अपनी लेखनी को कागज पर इस तरह उतार उतार दिया कि लोग किसी तरह चले जाएं सिनेमा उस फिल्म को देखने के लिए पर अफसोस ऐसा हो नहीं पाया.

रानी मुखर्जी की फिल्म ‘हिचकी’ तो याद होगी ही आप को. भारत से ज्यादा चीन में चली है. बिगड़ैल बच्चों को सुधारने के विषय पर बनी इस फिल्म में हिचकी की भयंकर बीमारी से जूझ रही एक जूझारू टीचर के किरदार को रानी मुखर्जी ने घोंट कर पी लिया था. फिल्म के संवाद, डायरेक्शन भी उम्दा था लेकिन हमारे यहां यह फिल्म उतनी नहीं चल पाई जितनी चलनी चाहिए थी.

कभीकभी तो ऐसा महसूस होता है कि भारत में छोटे बजट की अच्छी फिल्मों को लोग देखने से बचते हैं या शायद बहुतों को अच्छी फिल्में देखने की तमीज ही नहीं है. रहस्यरोमांच से भरपूर हालिया फिल्म ‘अंधाधुन’ जब मैं ने सिनेमाघर में देखी थी तब बहुत से दर्शक किसी सस्पैंस फिल्म को देखने के मूड में ही नहीं लग रहे थे. इस फिल्म के पहले 5 मिनट में एक बड़ा राज छिपा था जो कई दर्शक मिस कर गए. जो गंभीर सीन किसी अगले सीन की अहम कड़ी थे, बहुत से दर्शक उन्हें समझ ही नहीं पाए. कइयों ने तो इंटरवल के बाद पौपकॉर्न खाने के चक्कर में फिल्म के खास सीन छोड़ दिए और फिल्म का रोमांच वहीं मार डाला.

कहने का मतलब है कि हम आज भी अच्छे सिनेमा को ऐनजौय करने के लायक नहीं बन पाए हैं. स्टारकास्ट हमारे लिए सब से अहम होती है.

आप को याद होगी शाहरुख खान की फिल्म ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’. 21 जनवरी, 2000 को रिलीज हुई इस फिल्म का पहला दिन पहला शो मैं ने ब्लैक में टिकट खरीद कर दिल्ली के प्लाजा सिनेमा में देखा था. वह फिल्म कतई बुरी नहीं थी पर उस में मीडिया जगत पर जो कटाक्ष किया गया था वह समय से पहले का था. लिहाजा फिल्म औंधे मुंह गिरी थी.

वहीं सिनेमाघर में मेरे साथ बैठे एक टपोरी टाइप बंदे ने बोर हो कर कहा था कि इस से अच्छी तो राकेश रोशन के लौंडे की फिल्म है. वजह, उसी दौरान रितिक रोशन की फिल्म ‘कहो न प्यार है’ आई थी. बिना किसी बड़े तामझाम के आई फिल्म ‘कहो न प्यार है’ खूब चली थी. लोगों की सुनासुनी के चक्कर में तो सलमान खान और भाग्यश्री की पहली फिल्म ‘मैं ने प्यार किया’ सुपरडुपर हिट हो गई थी.

थोड़ा ज्यादा पीछे चलते हैं. फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ शोमैन राजकपूर का ड्रीम प्रोजेक्ट थी जिस में उन्होंने एक जोकर के जरीए ज़िंदगी का फलसफा दर्शकों के सामने रखने की कोशिश की थी पर फेल हो गए. बड़े निराश हुए थे वे लोगों के अनाड़ीपन पर और उन्होंने तभी ठान लिया था कि अपनी अगली फिल्म में वे दर्शकों को वही चटपटी रेसिपी परोसेंगे जो वह चटकारे ले कर देखती है. तब उन्होंने फिल्म ‘बॉबी’ बनाई थी जिसे लोगों ने हाथोंहाथ लिया था. ऋषि कपूर और डिंपल कापड़िया की जोड़ी देखते ही देखते हिट हो गई थी.

अगर गिनाने लगें तो बहुत सी ऐसी फिल्में रही हैं जो आज की तारीख में कल्ट फ़िल्में मानी जाती हैं पर अपने समय में फ्लॉप रही थीं. ‘कागज के फूल’, ‘सिलसिला’, ‘लम्हे’, ‘पाकीजा’, ‘जाने भी दो यारो’ ऐसी ही कुछ फ़िल्में हैं.

कहने का मतलब यह है कि कोई भी फिल्मकार जिस विजन के साथ फिल्म बनाता है वह दर्शकों तक अपना संदेश किस हद तक पहुंचा पाती है इस का कोई तय पैमाना नहीं है. यह सब दर्शकों के मूड और उन की सोच पर निर्भर करता है कि कौन सी फिल्म को वे अपना बना लेते हैं.

फिल्म ‘शोले’ के साथ भी यही हुआ था. समीक्षकों ने इस फिल्म को पूरी तरह से नकार दिया था पर दर्शकों ने इसे इतना प्यार दिया कि ‘शोले’ भारतीय सिनेमा का एक यादगार इतिहास बन गई.

सुप्रीम कोर्ट आदेश : दीवाली पर पुलिसिया अमल

एक तरफ घर और बाहर खुशी का माहौल, बाजार दूधिया रोशनी में नहाया हुआ वहीं दूसरी तरफ पुलिस के आने पर गलियों में पसरा सन्नाटा क्योंकि पुलिस पकड़ रही थी पटाखा चलाने वालों को और पटाखा बेचने वालों को. इस दीवाली पर लोग अपने छोटेछोटे बच्चों के साथ पटाखे चलाते देखे गए. दीवाली में भले ही इस बार कम पटाखे चलाए गए लेकिन लोगों में छिपी असंवेदनशीलता सब से ज्यादा दिखी. ये तर्क खूब सुने गए कि पटाखे बेचने पर पाबंदी है, चलाने पर थोड़े ही है.

दिल्ली में दीवाली की रात पटाखे चलाने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करने वालों के 550 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए, वहीं 300 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया. दीवाली की रात पुलिस ने दिल्ली के विभिन्न इलाकों से 2,776 किलो पटाखे भी जब्त किए. साथ ही, अवैध रूप से पटाखों की बिक्री के संबंध में 72 मामले दर्ज किए गए और इस में कुल 87 लोगों को गिरफ्तार किया गया. वहीं, कोलकाता में 1,300 किलो से ज्यादा पटाखे जब्त किए गए और 566 लोगों को पकड़ा गया.

पुलिस ने बताया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 188 (आज्ञा का उल्लंघन) के तहत तकरीबन 562 मामले दर्ज किए गए और अदालत के आदेश का उल्लंघन करने के मामले में 310 लोगों को गिरफ्तार किया गया. जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया, उन्हें बाद में जमानत दे दी गई. 24 बच्चों के खिलाफ भी किशोर न्याय अधिनियम के तहत कार्यवाही की गई और उन्हें जमानत दे दी गई.

बता दें कि बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दीवाली पर पटाखे जलाने की समयसीमा रात 8 बजे से 10 बजे तक निर्धारित की थी. साथ ही, ग्रीन पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल का आदेश दिया था. कोर्ट ने आदेश के पालन के लिए पुलिस की जिम्मेदारी भी तय की थी.

सुप्रीम कोर्ट ने देश की आबोहवा को साफसुथरा बनाए रखने के लिए संविधान सम्मत फैसला सुनाया जो उस का अधिकार क्षेत्र भी है. लेकिन हैरानी यह है कि  सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में भगवा मंडली पटाखे फोड़ती नजर आई. भगवा मण्डली के हिसाब से यह फैसला हिन्दू विरोधी था. सिर्फ हिन्दू धर्म के पक्ष में खड़ी भगवा मंडली को तो बुरा लगना ही था जबकि यह फैसला मुसलमानों, सिखों और ईसाइयों के लिए भी था जो अंधभक्तों को नजर नहीं आया. यह फैसला पर्यावरण और मानव जाति की सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है. अतः न्यायप्रिय, सैक्यूलर और शिक्षाविदों ने माननीय कोर्ट के फैसले की सराहना करते हुए इसे जरूरी बताया है.

दीवाली पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का कहीं सख्ती से पालन हुआ तो कहीं उल्लंघन. दिल्ली व एनसीआर में पहले से आबोहवा काफी प्रदूषित है और महानगर धुएं की चादर में लिपटा हुआ है. ऐसे में पटाखों की बिक्री पर रोक लगाना सही कदम है. वहीं दूसरी ओर दिल्लीएनसीआर में पटाखा कारोबारियों के धंधे पर काफी बुरा असर देखने को मिला. 2,500 किलो से ज्यादा के पटाखे जब्त किए गए. इस से पटाखा बाजारों के दुकानदार काफी निराश हैं. उन का मानना है कि इस से उन्हें करोड़ों रुपयों का नुकसान हुआ है.

दीवाली पर देश के सभी पटाखाप्रेमी बोरे भर कर पटाखे छुड़ाने की तैयारी किए बैठे थे. इस बीच, सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश किसी झटके से कम नहीं था. केंद्रीय पर्यावरण मंत्री हर्षवर्धन ने लोगों से आग्रह किया कि सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का पालन करें और ग्रीन दीवाली मनाएं. इस से पर्यावरण को साफसुथरा बनाए रखने में मदद मिलेगी.

उन्होंने कहा कि पटाखे के प्रदूषण के कारण फेफड़े की तमाम बीमारियां, हाई ब्लडप्रैशर और बेचैनी होती है. ग्रीन पटाखे चलाने से इस तरह की बीमारियों से बचा जा सकता है. साथ ही, हमें पशुपक्षियों के बारे में भी सोचना चाहिए जो पटाखे की तेज आवाज से डर कर जीते हैं.

पर्यावरण प्रदूषण (निवारण एवं नियंत्रण) प्राधिकरण के अध्यक्ष भूरे लाल ने कहा कि यह स्वागतयोग्य कदम है. दिल्ली की हवा वाकई दूषित है. पटाखे इस समस्या को और ज्यादा बढ़ा देते हैं. वहीं, टेरी के महानिदेशक अजय माथुर ने कहा कि कम समय में धूल और धूलकण के हटने के लिए अनुकूल मौसम न होने से यह प्रतिबंध सही दिशा में उठाया गया कदम है.

दूसरी ओर, पटाखों पर बैन लगने के बाद विरोध में भी आवाजें मुखर होने लगीं. कुछ नौजवानों का कहना था कि पर्यावरण की इतनी ही चिंता है तो फिर बस, कार, मोटरसाइकिल का इस्तेमाल क्यों करते हो, अपने घर में पूजा करते समय अगरबत्ती भी मत जलाया करो.

भारतीय जनता पार्टी के सांसद वरुण गांधी उत्तर प्रदेश की सुल्तानपुर लोकसभा सीट से सांसद हैं. उन्होंने पटाखों पर बैन लगाने के समर्थन में कहा कि मैं एक छोटी बच्ची का पिता हूं, बच्चों को प्रदूषण से होने वाली सांस की समस्याएं होती हैं. अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए मैं इस दीवाली पर पटाखे जलाने के बजाय 15 पेड़ लगाऊंगा.

आरएसएस नेता और राष्ट्रीय मुसलिम एकता मंच के संयोजक इंद्रेश कुमार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से चारों तरफ मातम, दुख और रोटी का संकट है. इस फैसले से पटाखा बेचने वालों के कारोबार पर बुरा असर पड़ा है. इस से उन की रोजीरोटी छिन गई है. यह दीवाली तो उन के लिए काली दीवाली साबित हुई है.

सदर बाजार वैलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष एचएस छाबड़ा ने अपना विरोध जताया. कारोबारियों ने पटाखों को सब्जियों के भीतर रख विरोध जताया. हम ने तो आलू बम बनाया है, भिंडी बम बनाया है, शिमलामिर्च बम, प्याज चकरी बनाया है.

वैलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष एचएस छाबड़ा ने कहा कि हमें ग्रीन पटाखों की जानकारी नहीं थी. ग्रीन पटाखों की जानकारी समय पर नहीं मिलने के कारण ये पटाखे बाजार में नहीं मिल सके और कारोबारियों को नुकसान उठाना पड़ा है.

उन का यह भी कहना है कि हम ने एसएचओ से पूछा तो उन्होंने इस की पूरी लिस्ट देने की बात कह कर अगले 2 घंटे तक हमें इंतजार कराया. कोई लिस्ट या जानकारी हमें नहीं दी गई, इस के चलते बाजार में ग्रीन पटाखे नहीं आ सके.

दिल्ली के कारोबारी ग्रीन पटाखों से अनजान हैं. दिल्ली के दूसरे पटाखा विक्रेताओं का कहना है कि अचानक से सुप्रीम कोर्ट का ग्रीन पटाखा बेचने का आदेश आ गया. ऐसे में कारोबारियों को समझ ही नहीं आ रहा है कि ग्रीन पटाखे कहां से लाएं.

त्रिपुरा के गवर्नर तथागत राय ने ट्वीट कर इस फैसले को हिन्दूविरोधी करार देते हुए कहा था कि कभी दही हांडी, आज पटाखा, कल को हो सकता है प्रदूषण का हवाला दे कर मोमबत्ती और अवार्डवापसी गैंग हिन्दुओं की चिता जलाने पर भी याचिका डाल दे.

भाजपा सांसद चिंतामणि मालवीय ने कहा कि हमारा धर्म और त्योहार हिन्दू कलैंडर के हिसाब से होता है. मैं पूजा खत्म करने के बाद ही पटाखे जलाऊंगा. हम त्योहारों पर किसी तरह की टाइम लिमिट नहीं लगा सकते. इस तरह की बंदिशें मुगलों के समय में होती थीं. यह हमें मंजूर नहीं है.

न्यायमूर्ति एके सीकरी ने कहा कि हम यह सुन कर बेहद दुखी हैं कि कुछ लोग हमारे आदेश को सांप्रदायिक रंग दे रहे हैं.

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