‘‘मेरा नाम अवधेश सिंह है. मेरा घर पास ही में है. जब तक तुम्हारा पति मिल नहीं जाता, तब तक तुम मेरे घर में रह सकती हो. तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी.
‘‘मेरी जानपहचान बहुतों से है. तुम्हारे पति को मैं बहुत जल्दी ढूंढ़ निकालूंगा. जरूरत पड़ने पर पुलिस की मदद भी लूंगा.’’
कुछ सोचते हुए उर्मिला ने कहा, ‘‘अपने घर ले जा कर मेरे साथ कुछ गलत हरकत तो नहीं करेंगे?’’
‘‘तुम पति की तलाश करना चाहती हो, तो तुम्हें मुझ पर यकीन करना
ही होगा.’’
‘‘आप के घर में कौनकौन हैं?’’
‘‘यहां मैं अकेला रहता हूं. मेरा बेटा और परिवार गांव में रहता है. मेरी पत्नी नहीं है. उस की मौत हो चुकी है.’’
‘‘तब तो मैं हरगिज आप के घर नहीं रह सकती. अकेले में आप मेरे साथ कुछ भी कर सकते हैं.’’
अवधेश सिंह ने उर्मिला को हर तरह से समझाया. उसे अपनी शराफत का यकीन दिलाया.
आखिरकार उर्मिला अपने भाई रतन के साथ अवधेश सिंह के घर पर इस शर्त पर आ गई कि वह उस के घर का सारा काम कर दिया करेगी. उस का खाना भी बना दिया करेगी.
अवधेश सिंह के फ्लैट में 2 कमरे थे. एक कमरा उस ने उर्मिला को दे दिया. शुरू में उर्मिला अवधेश सिंह को निहायत ही शरीफ समझती थी, मगर
10 दिन होतेहोते उस का असली रंग सामने आ गया. अवधेश सिंह अकसर किसी न किसी बहाने से उस के पास आ जाता था. यहां तक कि जब वह रसोईघर में खाना बना रही होती, तो वह उस के करीब आ कर चुपके से उस का अंग छू देता था. कभीकभी तो उस की कमर को भी छू लेता था.
उर्मिला को यह समझते देर नहीं लगी कि उस का मन बेईमान है. वह उस का जिस्म पाना चाहता है.
एक बार उर्मिला का मन हुआ कि वह उस का घर छोड़ कर कहीं और चली जाए, मगर इस विचार को उस ने यह सोच कर तुरंत दिमाग से हटा दिया कि वह जाएगी तो कहां जाएगी? क्या पता दूसरी जगह कोई उस से भी घटिया इनसान मिल जाए.
गणपत के गांव से लौट आने तक उर्मिला को कोलकाता में रहना ही था. उस ने मीठीमीठी रोमांटिक बातों से अवधेश सिंह को उलझा कर रखने का फैसला किया.
एक दिन उर्मिला रसोईघर में काम कर रही थी, अचानक वह वहां आ गया. उसी समय किसी चीज के लिए उर्मिला झुकी, तो ब्लाउज के कैद से उस के उभारों का कुछ भाग दिखाई पड़ गया.
फिर तो अवधेश सिंह अपनेआप को काबू में न रख सका. झट से उस ने कह दिया, ‘‘मैं तुम्हें प्यार करने लगा हूं. तुम मेरी बन जाओ.’’
सही मौका देख कर उर्मिला ने अवधेश सिंह पर अपनी बातों का जादू चलाने का निश्चय कर लिया.
उर्मिला ने भी झट से कहा, ‘‘मैं भी अपना दिल आप को दे चुकी हूं.’’
अवधेश सिंह खुशी से झूम उठा. उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘सच कह रही हो तुम?’’
‘‘आप तो अच्छे आदमी नहीं हैं. मैं तो आप को शरीफ समझ कर अपना दिल दे बैठी थी, मगर आप ने तो मेरा हाथ पकड़ लिया.’’
अवधेश सिंह ने तुरंत हाथ छोड़ कर कहा, ‘‘तो क्या हो गया?’’
‘‘मेरी एक मुंहबोली भाभी कहती हैं कि किसी का प्यार कबूल करने से पहले कुछ समय तक उस का इम्तिहान लेना चाहिए.
‘‘वे कहती हैं कि जो आदमी झट से हाथ लगा दे, वह मतलबी होता है. प्यार का वास्ता दे कर जिस्म हासिल कर लेता है. उस के बाद छोड़ देता है, इसलिए ऐसे आदमियों के जाल में नहीं फंसना चाहिए.’’
‘‘तुम मुझे गलत मत समझो उर्मिला. मैं मतलबी नहीं हूं, न ही मेरी नीयत खराब है. तुम जितना चाहो इम्तिहान ले लो, मुझे हमेशा खरा प्रेमी पाओगी.’’
‘‘तो फिर हाथ क्यों पकड़ लिया?’’
‘‘बस यों ही दिल मचल गया था.’’
‘‘दिल पर काबू रखिए. जबतब मचलने मत दीजिए. एक बात साफ बता देती हूं. ध्यान से सुन लीजिए.
‘‘अगर आप मेरा प्यार पाना चाहते हैं, तो सब्र से काम लेना होगा. जिस दिन यकीन हो जाएगा कि आप मेरे प्यार के काबिल हैं, उस दिन हाथ ही नहीं, पैर भी पकड़ने की छूट दे दूंगी. तब तक आप सिर्फ बातों से प्यार जाहिर कीजिए. हाथ न लगाइए.’’
‘‘वह दिन कब आएगा?’’ अवधेश सिंह ने पूछा.
‘‘कम से कम एक महीना तो लगेगा.’’
उर्मिला की चालाकी अवधेश सिंह समझ नहीं पाया और उस की शर्त को मान लिया.
अवेधश सिंह सरकारी अफसर था. कोलकाता में वह अकेला ही रहता था. जब तक उस की पत्नी जिंदा थी, वह साल में 4-5 बार गांव जाता था. पत्नी की मौत के बाद उस ने गांव जाना ही छोड़ दिया था.
बात यह थी कि पत्नी की मौत के बाद उस ने दूसरी शादी करने का निश्चय किया, जिस का उस के बेटों ने पुरजोर विरोध किया था.
अवधेश सिंह के 2 बेटे थे. दोनों ही शादीशुदा थे. गांव में खेतीकिसानी करते थे. बेटों ने दूसरी शादी का विरोध किया, तो उस ने उन से रिश्ता ही तोड़ लिया. दरअसल, अवधेश सिंह औरत के बिना नहीं रह सकता था. वह वासना का भेडि़या था. भोलीभाली और गरीब लड़कियों को बहलाफुसला कर वह अपने घर लाता था, फिर तरहतरह का लोभ दिखा कर उन के साथ मनमानी करता था.
अवधेश सिंह सुबहसवेरे कभीकभी गंगा स्नान के लिए भी जाता था. उस दिन सुबह 8 बजे गए, तो उर्मिला पर उस की नजर चली गई. वह समझ गया कि उर्मिला कहीं दूर देहात की है. वह उस के चाल में जल्दी आ जाएगी.
वह उसे अपने घर ले जाने में कामयाब भी हो गया. अवधेश सिंह उर्मिला को निहायत ही भोलीभाली समझता था, पर वह उस की चालाकी समझ नहीं पाया. उसे लगा कि वह उर्मिला की बात मान लेगा, तो वह राजीखुशी उस का बिस्तर गरम कर देगी.
फिर तो वह उर्मिला का दिल जीतने के लिए जीतोड़ कोशिश करने लगा. उस की हर जरूरत पर ध्यान देने लगा. महंगे से महंगा गिफ्ट भी वह उसे देने लगा.
इस तरह 10 दिन और बीत गए. इस बीच उर्मिला को राधेश्याम की कोई खबर नहीं मिली.
उस के बाद एक दिन अचानक उर्मिला ने पति राधेश्याम को छोड़ अवधेश सिंह के साथ एक नई जिंदगी की शुरुआत करने का फैसला किया.
हुआ यह कि एक दिन अवधेश सिंह दफ्तर से लौट कर रात में घर आया. उस समय रतन सो चुका था.
आते ही उस ने उर्मिला को अपने कमरे में बुलाया. उर्मिला कमरे में आई, तो अवधेश सिंह ने झट से दरवाजा बंद कर दिया.
वह उर्मिला से बोला, ‘‘तुम मान जाओगी, तो जो कुछ कहोगी, वह सबकुछ करूंगा. तुम चाहोगी तो तुम से शादी भी कर सकता हूं.’’
उर्मिला उलझन में पड़ गई. बेशक, वह गांव से पति की तलाश में निकली थी, मगर शहरी चकाचौंध ने पति से उस का मोह भंग कर दिया था.
अब वह गांव की नहीं, शहरी जिंदगी जीना चाहती थी. अवधेश सिंह के प्रस्ताव पर वह यह सोचने लगी कि उस का पति मिल भी गया तो क्या वह अवधेश सिंह की तरह ऐशोआराम की जिंदगी दे पाएगा?
अवधेश सिंह की उम्र भले ही उस से ज्यादा थी, मगर उस के पास दौलत की कमी नहीं थी.
उस ने अवधेश सिंह का प्रस्ताव स्वीकार करने का फैसला किया. अवधेश सिंह अपनी बात से मुकर न जाए, इसलिए उर्मिला ने लिखवा लिया कि वह उस से शादी करेगा.
उस के बाद उर्मिला ने अपनेआप को उस के हवाले कर दिया. उर्मिला को पा कर अवधेश सिंह की खुशी का ठिकाना न रहा. उस ने अगले हफ्ते ही उस से शादी करने का फैसला किया.
उर्मिला भी जल्दी से जल्दी अवधेश सिंह से शादी कर लेना चाहती थी. 2 दिन बाद ही उस ने अपने भाई रतन को गांव जाने वाली ट्रेन में बिठा दिया. उस से कह दिया कि वह गांव लौट कर नहीं जाएगी. अवधेश सिंह के साथ शहर में ही रहेगी.
शादी के 2 दिन बाकी थे, तो अचानक राधेश्याम के रूममेट राघव के फोन पर उर्मिला को बताया कि गणपत गांव से आ गया है. उर्मिला हर हाल में अवधेश सिंह से शादी करना चाहती थी, इसलिए वह राधेश्याम का पता लगाने नहीं गई. तय समय पर उस ने अवधेश सिंह से शादी कर ली.
एक महीने बाद अवधेश सिंह की गैरहाजिरी में राधेश्याम उर्मिला से मिला.
‘‘कहां थे इतने दिन…?’’ उर्मिला ने पूछा.
‘‘गांव से आने के बाद मैं एक अमीर विधवा औरत के प्रेमजाल में फंस गया था. अब मैं उस के साथ नहीं रहना चाहता.
‘‘गणपत से मुझे जैसे ही पता चला कि तुम अवधेश सिंह के घर पर हो, मैं यहां चला आया. अब मैं तुम्हारे साथ गांव लौट जाना चाहता हूं.’’
‘‘आप ने आने में बहुत देर कर दी. मैं ने अवधेश सिंह से शादी कर ली है. अब मैं आप के साथ नहीं जा सकती.’’ राधेश्याम सबकुछ समझ गया. उस ने उर्मिला से फिर कुछ नहीं कहा और चुपचाप वहां से लौट गया.
अमेरिका के हुए महत्वपूर्ण मध्यावधि चुनाव में सत्तारूढ़ रिपब्लिकन पार्टी को झटका लगा है. विरोधी दल डेमोक्रेट्स ने कांग्रेस के निचले सदन हाउस औफ रिप्रजेंटेटिव को छीन लिया. हालांकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी ने उच्च सदन सीनेट में अपना बहुमत बरकरार रखा है. डेमोक्रेट्स ने सत्ता में रिपब्लिकन पार्टी का एकाधिकार तोड़ दिया है. उसे निचले सदन में 24 से अधिक सीटों का फायदा हुआ है.
अमेरिकी संसद के हाउस औफ रिप्रजेंटेटिव्स में डेमोक्रेटिक पार्टी के संख्याबल से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए उन के एजेंडे पर आगे बढ़ने का रास्ता अब आसान नहीं होगा. प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेट्स के कब्जे के बाद अब फैसलों पर कांग्रेस की निगरानी रहेगी.
435 सीटों वाली कांग्रेस में इस बार 96 यानी सब से ज्यादा महिलाएं जीत कर आई हैं. इन में से दो मुस्लिम महिलाएं, दो अमेरिकन इंडियन और अश्वेत महिलाएं शामिल हैं. विजयी महिलाओं में ज्यादातर डेमोक्रेट्स हैं. सदन में रिपब्लिक पार्टी के पास 235 सीटें थीं जबकि डेमोक्रेटिक पार्टी की 193 सीटें थीं.
अमेरिकी कांग्रेस में भारतीय अमेरिकियों के समूह कथित समोसा कौकस के सभी 4 निवर्तमान सदस्य प्रतिनिधि सभा के लिए फिर से चुन लिए गए. इन में प्रमिला जयपाल, राजा कृष्णमूर्ति, रो खन्ना और एमी बेरा को जीत मिली.
क्यों होते हैं मध्यावधि चुनाव?
अमेरिकी संसद में ऊपरी सदन सीनेट व निचला हाउस औफ रिप्रजेंटेटिव है. राष्ट्रपति चुनाव के दो साल बाद मध्यावधि चुनाव होते हैं. इन चुनावों में अमेरिकी संसद में जनप्रतिनिधि व प्रांतों के गवर्नर चुने जाते हैं.
नतीजों के संकेत साफ है कि राष्ट्रपति ट्रंप के लिए और कठिन हालात बन जाएंगे जो आव्रजन, कर और स्वास्थ्य देखभाल सुधारों समेत उन के कुछ अहम मुद्दों पर व्यापक विधायी परिवर्तन चाहते हैं. इन नतीजों से माना जा रहा है कि 2020 में राष्ट्रपति चुनावों में दोनों प्रमुख दलों के बीच राजनीतिक कड़वाहट बढेगी और इन के बीच कांटे का मुकाबला होगा.
पारंपरिक रूप से राष्ट्रपति चुनाव जीतने वाली पार्टी अगले मध्यावधि चुनाव में हारती है. इस बार ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी ने जितनी सीटों का नुकसान उठाया है उस से ज्यादा सीटें पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के समय 2010 मध्यावधि चुनाव में उन की डेमोक्रेटिक पार्टी ने खोई थीं.
अमेरिकी संसद में अब तक ट्रंप के सामने असहाय रही डेमोक्रेटिक पार्टी अब अधिक सधे ढंग से उन पर नकेल कस सकती है. राष्ट्रपति को अपनी आधिकारिक शक्तियों के एकतरफा इस्तेमाल की उतनी आजादी नहीं मिल पाएगी.
लेकिन ट्रंप ने अपने मिजाज के मुताबिक तानाशाही फैसले करने जारी रखे हैं. नतीजों के बाद भी उन की अकड़ ढीली नहीं हुई है और उन्होंने एटौर्नी जनरल जैफ सेशंस को बाहर का रास्ता दिखा दिया. सेशंस ट्रंप के चुनाव अभियान से जुड़े आरोपों की जांच को ले कर विवादों में थे. सेशंस की जगह उन्होंने अपनी कठपुतली के रूप में मैथ्यू व्हीटेकर को सीनेट की मंजूरी के बिना ही नियुक्त कर दिया जिसे असंवैधानिक बताया जा रहा है. इस से पहले ट्रंप ने संघीय जांच ब्यूरो के डायरेक्टर जेम्स बी कौमे को हटाया था.
ट्रंप का मीडिया के खिलाफ भी हमला और बढ़ गया है. प्रैस कौंफ्रेंस में खरे मुश्किल सवाल पूछने पर उन्होंने सीएनएन के रिपोर्टर का व्हाइट हाउस से अधिस्वीकरण वापस ले लिया.
मध्यावधि चुनाव नतीजों से जाहिर है कि ट्रंप जिस तरह मनमाने ढंग से शासन चला रहे हैं जनता वैसा नहीं चाहती. ट्रंप पिछले दो साल पहले जिस लोकप्रियता के साथ सत्ता में आए थे, अब वह खत्म होती दिख रही है. शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और व्यापार की दिशा में वह कोई ठोस कदम नहीं उठा पाए हैं. महिलाएं उन के व्यवहार से आए दिन सड़कों पर उतर रही हैं. सेलिब्रिटी खुल कर राष्ट्रपति की आलोचना करने में पीछे नहीं हैं.
विरोधियों और मीडिया को धमकाने से ले कर विदेश नीति तक के मामलों में वह निशाने पर रहे हैं. आने वाले दो सालों में लग रहा है ट्रंप के खिलाफ देश भर में गुस्सा और बढ़ेगा.
1998 में अरबाज खान से शादी कर 2017 में तलाक लेने वाली 45 वर्षीया बौलीवुड एक्ट्रेस मलाइका अरोड़ा अपने से 12 साल छोटे अर्जुन कपूर के साथ रिलेशनशिप में हैं. वे पब्लिकली नजर आने लगे हैं. इन की शादी की खबरें भी उड़ने लगी हैं. दोनों के डिनर डेट की तस्वीरें वायरल हो रही हैं, तो वहीं 42 वर्षीय सुष्मिता सेन पिछले कुछ दिनों से अचानक अपने अफेयर को लेकर फिर से चर्चा में है. इस बार वह खुद से 15 साल छोटे रोहमन शौल के साथ रिलेशनशिप को ले कर खबरों में है. पिछले दिनों दोनों कई पार्टियों में साथ नजर आए. खबरों में यह भी है कि रोहमन ने सुष्मिता को कुछ हफ्ते पहले ही शादी के लिए प्रपोज किया. दोनों करीब 2 माह पहले एक फैशन इवेंट में मिले थे और एक दूसरे को डेट कर रहे हैं.
प्रियंका चोपड़ा भी पिछले दिनों न्यूयौर्क में प्री ब्राइडल सेरेमनी के बाद अपनी गर्लगैंग के साथ बैचलर पार्टी के लिए एमस्टरडम रवाना हुई. अपने से 11 साल छोटे निक जौन के साथ जल्द ही शादी के बंधन में बनने वाली हैं. शादी की तैयारियां भी जोरों पर हैं.
कुछ समय पहले अपने से 7 साल छोटे हर्ष से शादी कर लेडी कौमेडियन भारती ने भी सब को अचरज में डाल दिया था. इस से पहल 41 साल की उम्र में प्रीति जिंटा ने अपने से 10 साल छोटे फाइनेंशियल एनालिस्ट जौन गुडनइफ से शादी कर ली तो उर्मिला मातोंडकर ने भी 9 साल छोटे मोहसिन से शादी कर सब को हैरत में डाल दिया.
जाहिर है कि शिक्षा, नौकरी और आत्मनिर्भरता के बाद अब महिलाएं रिलेशनशिप और शादी को ले कर भी ओपन हो रही हैं. पहले जब औरतें घर से बाहर नहीं निकलती थी तब उन्हें आदमी के पैर की जूती माना जाता था. उन के पास कोई अधिकार नहीं था. पति की बात मानना, उस के अनुसार खुद को ढालना और पति जब कहे समर्पण के लिए तैयार रहना, यही आदर्श पत्नी की विशेषताएं थी. मगर अब माहौल बदल रहा है. ट्रेंड चेंज हो रहा है. आज औरतें पढ़लिख कर आगे बढ़ रही हैं. काबिल बन रही हैं. भरपूर नाम, पैसा और रुतबा हासिल कर रही हैं. ऐसे में पति का डोमिनेंस क्यों सहें?
इस संदर्भ में मनोवैज्ञानिक और सोशल एक्टिविस्ट अनुजा कपूर कहती हैं कि यदि पुरुष कम उम्र की लड़की से शादी कर सकता है, 15 साल की लड़की 45 साल के अधेड़ की बीवी बन सकती है, तो स्त्रियां खुद से छोटे लड़कों को पति क्यों नहीं बना सकती? आज स्त्रियां सक्सेसफुल हैं. आत्मनिर्भर हैं. उन्हें अपने हक और कानून मालूम हैं. वे आदमी के बिना भी रह सकती हैं. क्यों क वह घर का काम भी आराम से कर सकती है और बाहर भी सक्षम है. उन के जीवन में पुरुष की अहमियत उतनी नहीं रही.
पहले औरतों की शादी अधिक उम्र के व्यक्ति से की जाती थी ताकि वह पति के नियंत्रण में रहे. उस की हर आज्ञा का पालन करें. अधिक उम्र के पुरुषों के पास पैसा, अनुभव और रुतबा, सब कुछ होता था. आज महिलाएं खुद ही इतनी काबिल, शिक्षित और कमाऊ है तो किसी का रोब क्यों सहे? वह अपने से कम उम्र के पुरुष से शादी कर उसे डोमिनेट कर के रख सकती है. इसे एकदम से गलत नहीं माना जा सकता. जो ज्यादा काबिल और रुतबेदार होगा वही दूसरे को डोमिनेट करेगा. यही समाज का नियम है.
पुरुष क्यों करते हैं अपने से अधिक उम्र की लड़की या महिला से शादी
1 . अधिक समझदार और अनुभवी
बड़ी उम्र की दुल्हन स्वभाव से परिपक्व और गंभीर होती है. उन के साथ रिलेशनशिप में कम उम्र वाले ड्रामों और बचपने की गुंजाइश नहीं रहती बल्कि म्युचुअल बौडिंग, इंटेलिजेंस और अंडरस्टैंडिंग कायम रहती है. उसे हर मामले में अधिक अनुभव रहते हैं.
वित्तीय आत्मनिर्भरता
बड़ी उम्र की वेल सेटल्ड वाइफ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होती है. अपने पति के कैरियर को आगे बढ़ाने में और सेटल होने में भी मददगार रहती है. वह हर मामले में बेहतर गाइडेंस दे सकती है और अपने संपर्कों से पति को फायदे पहुंचा सकती है. जो कम उम्र की ऐसी हाउस वाइफ से बहुत बेहतर है जो पैसों की अहमियत नहीं समझती, बेमतलब के खर्चे करने की आदी होती है और पूरी तरह पति पर निर्भर होती है.
अधिक धैर्य और परवाह करने वाली
बड़ी उम्र की बीवी कम डिमांडिग और अधिक केयरिंग होती है. वह पूरा अफेक्शन देना जानती है. बदले में केवल एक्ससेप्टेशन मांगती है. फिल्म ‘ए दिल है मुश्किल’ में ऐश्वर्या का कैरेक्टर कुछ ऐसा ही था. वह रणबीर कपूर के साथ ऐसे ही एक रिश्ते में थी जहां वह फेमस शायर थी तो वहीं रणवीर टौय ब्वॉय की तरह उस के साथ जुड़ा था.
जहां तक बात साथ जीवन जीने की है तो क्या ऐसे रिश्ते कामयाब होते हैं? क्या हेल्थ और सेक्सुअल कंपैटिबिलिटी के ख्याल से समस्याएं आ सकती हैं ?
इस संदर्भ में सेक्सुअलिटी पर काफी काम कर चुके अल्फ्रेड विनसे के मुताबिक पुरुषों में सेक्सुअल हार्मोन 18 साल की उम्र में पीक पर होते हैं जब कि महिलाओं में यह 30 के बाद का समय होता है. हैल्थ की दृष्टि से भी महिलाएं 5 साल अधिक जीती हैं. ऐसा होने की वजह लाइफस्टाइल या बायोलौजी नहीं. 1 विधुर के अनुपात में उसी उम्र की 4 विधवाएं जिंदा रहती हैं. यानी अपने से अधिक उम्र की लड़की के साथ शादी करने वाले पुरुष पत्नी के साथ ही बूढ़े होते हैं. वैसे भी प्यार में उम्र का अंतर मायने नहीं रखता. जिंदगी किस के साथ और किस तरह बीती यह महत्वपूर्ण होता है.
मशहूर नृत्य निर्देशक संदीप सोपारकर ने भी अब अभिनय की तरफ कदम बढ़ा दिए हैं. वह इन दिनों निर्माता चंदा पटेल की फिल्म ‘‘आई एम नौट पोर्न स्टार – नजर संभाल के’’ में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं. यह फिल्म युवा पीढ़ी के बनते बिगड़ते रिश्तों व रिश्तों में आने वाली समस्याओं पर केंद्रित है.
फिल्म ‘‘आई एम नौट पोर्न स्टार – नजर संभाल के’’ से अभिनय करियर की शुरूआत करने की चर्चा करते हुए संदीप सोपारकर कहते हैं – ‘‘अभिनय करियर की शुरूआत करने के लिए एक फिल्म का चयन करना मेरे लिए काफी कठिन रहा. लेकिन सबसे पहले मुझे इस फिल्म के शीर्षक और फिर इसकी पटकथा ने प्रभावित किया. फिर यह ग्रे किरदार है और फिर हम जिस तरह से रिश्तों में ग्रे रहते हैं, उसकी बात करती है. हम इस फिल्म की शूटिंग दिसंबर माह में करने वाले हैं.’’
जबकि इस फिल्म के लेखक व निर्देशक जैनेंद्र बख्शी कहते हैं- ‘‘रिश्तों को लेकर हर इंसान की अपनी अलग राय होती है. हमारी फिल्म एक ही बात कहती है कि जब हम अपने आपको माफ कर सकते हैं, तो दूसरों को माफ क्यों नहीं कर सकते.’’
दुनिया की पहली भाषाई ईमेल सेवा प्रदाता कंपनी डेटामेल ने अपने एप्लिकेशन पर अनलिमिटेड स्टोरेज की घोषणा की है. कंपनी का दावा है कि यह दुनिया में इकलौता एप है जो अनलिमिटेड स्पेस देता है.
डेटामेल ईमेल सेवा को डेटा एक्सजेन टेक्नोलॉजीज ने विकसित किया है. डेटा एक्सजेन टेक्नोलॉजीज के संस्थापक और सीईओ डॉ. अजय डेटा ने एक बयान में कहा, “ईमेल्स की व्यक्तिगत या कारोबारी संचार में महत्वपूर्ण भूमिका है.
इसमें महत्वपूर्ण डेटा होता है, जरूरत लंबी अवधि तक और निरंतरता के साथ पड़ती है. लेकिन कभी-कभी लिमिटेड स्टोरेज होने की वजह से मेलबॉक्स फुल हो जाता है और स्पेस की कमी की वजह से कामकाज प्रभावित होता है.
ऐसी परिस्थिति में यूजर्स को कुछ ईमेल्स को डिलीट करना होता है या ईमेल्स और डेटा को खोने से बचाने के लिए अलग-अलग बैकअप्स बनाने होते हैं.”
डेटामेल ने इस समस्या को समझा और अपने यूजर्स को अपने एप्लिकेशन के माध्यम से अनलिमिटेड स्टोरेज उपलब्ध कराया. डेटामेल में अनलिमिटेड स्टोरेज सुविधा यूजर्स को अपने स्तर पर और अपनी जरूरत के मुताबिक स्पेस कोटा बढ़ाने की अनुमति देता है.
अनलिमिटेड स्पेस पाने के लिए एप के भीतर ही टॉप कॉर्नर पर गिफ्ट बॉक्स दिया है. यूजर्स को उसे ना है और उपहार में दी गई किसी खास एक्शन को फॉलो करना होता है. जब वे एक्शन को पूरा करते हैं तो एक एमबी स्पेस उनके ईमेल अकाउंट में जुड़ जाती है.
यूजर्स जितनी बार चाहें, उतनी बार यह कर सकते हैं. यह उन्हें यूजर्स को आने वाली दिक्कतों को दूर करने में मदद करते हैं, जैसे कि कम स्टोरेज स्पेस होने से ईमेल बाउंस होना शामिल है. वे ईमेल्स के जरिये आसानी से संचार कर सकते हैं.
बयान में कहा गया कि छात्रों और पेशेवरों के लिए यह एक बहुत अच्छा ईमेल अकाउंट बन जाता है, क्योंकि उनके ईमेल खाते पर पूरी तरह से उनका नियंत्रण होगा और जब भी वे चाहेंगे तो डेटामेल एप से अपने खाते में स्टोरेज बढ़ा सकेंगे. यह न केवल स्टोरेज संसाधनों को खराब होने से रोकता है, बल्कि कंपनी और यूजर्स के लिए संसाधनों के लिए इस्तेमाल को बेहतर बनाता है.
आज यूजर्स को आवंटित स्थान मिलता है और उपयोग न होने के कारण यह स्पेस बेकार हो जाती है, जबकि कुछ लोगों को अतिरिक्त स्पेस की जरूरत होती है और वे स्पेस के लिए संघर्ष करते रहते हैं. डेटामेल इस समस्या को हल करता है, क्योंकि इसमें आपके पास स्टोरेज कोटा की पूर्व-निर्धारित ऊपरी सीमा ही नहीं होती है.
कंपनी का कहना है कि भारत में निर्मित, ‘डेटामेल’, दुनिया की पहली भाषाई ईमेल सेवा है, जो आईडीएन की कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में समर्थन करती है. इसे किसी भी एंड्रॉयड या आईओएस सिस्टम से मुफ्त में डाउनलोड किया जा सकता है. वर्तमान में भारत में हिंदी, गुजराती, उर्दू, पंजाबी, तमिल, तेलुगू, बांग्ला और मराठी सहित पंद्रह क्षेत्रीय भाषाओं में भाषाई ईमेल सेवा पेश की जा रही है.
1990 के दशक के अंत में गौरव सावंत एकाएक स्टर बन गए. वे रिटायर्ड ब्रिगेडियर के बेटे हैं. 1994 में वे इंडियन एक्सप्रेस से जुड़े और जल्द ही रक्षा बीट देखने लगे.
1999 में सावंत ने कारगिल युद्ध कवर किया जो उनके करियर की सफलता के लिए निर्णायक रहा. कारगिल युद्ध पर अपनी किताब में पत्रकार संकर्षण ठाकुर, सावंत की हुंकार को कुछ इस तरह बयां करते हैं, “भाई लोग, क्या गजब बात है. एक के बाद एक मेरी 34वीं स्टोरी पहले पेज की हेडलाइन बनी है. ये मेरा सबसे अच्छा वक्त है.”
उसी वर्ष सावंत ने युद्ध मैदान में अपने 9 हफ्तों के अनुभव पर डेटलाई कारगिल नाम की प्रसिद्ध किताब लिखी. इंडिया टुडे में प्रकाशित किताब की समीक्षा में कहा गया है, “सावंत ने कारगिल अभियान का सारगर्भित ब्यौरा पेश किया है, युद्ध के मानवीय पक्ष को संवेदनशील तरीके से उकेरा है, भौंचक्की सेना के सामने पेश चुनौतियां और तीव्रता को शब्द दिए हैं.”
एमिटी विश्वविद्यालय में वर्ष 2002-2003 के अकादमिक सत्र में सावंत गेस्ट लेक्चरर थे. सावंत ने जिन्हें पढ़ाया उनमें से एक थीं विद्या कृष्णन. उस वक्त कृष्णन जिज्ञासू विद्यार्थी थीं जो अपने भविष्य के पेशे के लिए उत्साहित थीं. भोपाल में रहने वाले अपने मां-बाप के विरोध के बावजूद उन्होंने पत्रकारिता के डिपलोमा कोर्स में प्रवेश लिया था. उनके माता-पिता का मानना था कि मीडिया की नौकरी में कम पैसा है. कृष्णन इस पेशे में अपना नाम बनाने का पक्का इरादा रखती थीं और जवान और सफल सावंत उनके लिए एक रोल मॉडल की तरह थे. “हम लोगों के लेक्चर बहुत बोरिंग होते थे. और एक दिन अचानक यह जवान लड़का आता है तो जाहिर है कि बहुत सी बातें होंगी ही”, कृष्णन के एक बैचमेट ने बताया.
2003 में भारतीय टेलीविजन न्यूज के जानेमाने एंकर गौरव सावंत ने ब्यास में एक रिपोर्टिंग ट्रिप के दौरान कथित तौर पर वरिष्ठ स्वास्थ पत्रकार विद्या कृष्णन का यौन शोषण किया था.
2003 में ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद कृष्णन को द पायनियर ने काम पर रख लिया. पहली बार जब उन्हें शहर के बाहर रिपोर्टिंग के लिए भेजा गया तो यह उनके लिए खुद को साबित करने का मौका था. कृष्णन को पंजाब की एक नदी के किनारे बसे शहर ब्यास के सैन्य अड्डे में शांतिकालीन ड्रिल को कवर करने का अवसर मिला था. वह उत्सुक होने के साथ घबराई हुई भी थीं. यह भारतीय सेना के प्रतिनिधियों द्वारा आयोजित की जाने वाला आम रिपोर्टिंग दौरा था लेकिन कृष्णन के लिए यह बड़ी बात थी. “मुझ पर भरोसा किया गया था और इससे मैं बहुत उत्साहित थी, मुझे उन लोगों ने यह मौका दिया गया था जो संभवतः वरिष्ठ पत्रकार थे,” जनवरी में एक इंटरव्यू में कृष्णन ने मुझे बताया.
तो भी कृष्णन का उत्साही मन पहली बार रक्षा क्षेत्र की रिपोर्टिंग करने की चिंता के बोझ तले दबा हुआ था. “इससे पहले मैंने कभी सेना के बारे में नहीं लिखा था….यदि मैं यह नहीं समझ पाई कि क्या हो रहा है तो मैं खबर कैसे बनाउंगी?” मन में चल रही बातों को याद करते हुए उन्होंने बताया. जब उन्हें यह पता चला कि उनके साथ जाने वाले पत्रकारों के दल में सावंत भी हैं तो उन्हें बहुत राहत मिली. उन्होंने मुझे बताया, “मैं यह सोच कर ठीक हो गई कि ‘चलो मेरे टीचर भी है’”. यदि कोई बात समझ नहीं आई तो उनसे ही पूछ लूंगी.”
हालांकि कृष्णन की सोचा के विपरीत, ब्यास का वह दौरा उनके करियर का मोड़ साबित नहीं हुआ. वो याद करती हैं कि सावंत- उनका टीचर जिसे पर वह भरोसा करती थीं- ने उस पूरे दौरे में उनके साथ यौन हिंसा और शोषण किया.
वह कृष्णन के करियर का शुरुआती दौर था और सावंत जैसे बड़े पत्रकार के खिलाफ खड़े होना एक असंभव लक्ष्य जान पड़ता था जो उनके करियर को ही तबाह कर सकता था. आगे के 15 सालों तक कृष्णन ने इस घटना के बारे में कुछ नहीं कहा. आज वो एक स्थापित पत्रकार हैं जो हाल तक दी हिंदू में स्वास्थ्य और विज्ञान संपादक थीं. (वह दी कारंवा के लिए नियमित रूप से लिखती हैं.) इस बीच सावंत भारतीय टेलीविजन न्यूज के सबसे अधिक जाने पहचाने चहरों में से एक बन चुके थे. हाल में वे इंडिया टुडे टेलीविजन चैनल के प्रबंध संपादक हैं.
2017 के अक्टूबर में हॉलीबुड के बड़े निर्माता हार्वी वाइनस्टीन के खिलाफ लगे यौन शोषण और हिंसा के आरोपों ने दुनिया भर में विभिन्न किस्म की चर्चाओं की शुरुआत की. अचानक ही ऐसे आरोपों को अलग तरह से लिया जाने लगा. ताकतवर पुरुषों के यौन अपराधों पर खुल कर बोला जाने लगा और ऐसे व्यक्तियों का करियर खत्म होने लगा. यौन शोषण की शिकार महिलाओं को मिल रहे समर्थन ने कृष्णन को अपनी बातों को सामने लाने साहस प्रदान किया. उन्होंने तय किया कि अब चुप्पी विकल्प नहीं है.
पिछले साल दिसंबर में कृष्णन ने मुझे फेसबुक में एक संदेश भेजा. “यदि तुम कभी न्यूज रूम में यौन शोषण पर कोई इंटरव्यू करना चाहो तो मैं ऑन रिकॉर्ड बात करने को तैयार हूं.”
ब्यास में होने वाले आयोजन के एक दिन पहले सेना के जवान और पत्रकार आयोजन स्थल के लिए रवाना हुए. कृष्णन को आज उन सभी लोगों के नाम याद नहीं हैं जो सेना की जीप में उनके साथ थे. उन्हें याद है कि भारतीय सेना का एक प्रतिनिधि जीप के आगे ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बैठा था. कृष्णन समाने की ओर मुंह करके बीच की लाइन में दाहिने हाथ की तर्फ बैठीं थी. सावंत उनके ठीक पीछे, बैंच जैसी सामने की सीट पर बैठे थे.
यात्रा शुरू होने के थोड़ी ही देर बाद- हल्की फुल्की बात और परिचय हो जाने के बाद- पुरुष पत्रकार, जो ज्यादातर एक दूसरे के परिचित थे, गपबाजी में लग गए. उस गाड़ी में कृष्णन ही एक मात्र महिला थीं. उन्होंने बातचीत में बहुत कम भाग लिया. आज की तरह ही उन दिनों भी रक्षा बीट में पुरुषों का वर्चस्व था. मर्द रास्ते में रुक कर किसी ढाबे में कुकड़ खाने की बात कर रहे थे. सावंत की जल्द शादी होने वाली थी और कुछ पत्रकार इस बात को लेकर उनकी टांग खींच रहे थे.
यात्रा में एक वक्त आया जब जीप में किसी और आदमी से बात करते हुए सावंत ने अपना दाहिना हाथ कृष्णन के दाहिने कंधे पर रख दिया. कृष्णन एकाएक असहज हो गईं लेकिन फिर उन्होंने इसे नजरअंदाज कर दिया. वह बताती है, “कुछ पल के लिए मैंने सोचा कि ऐसा गलती से हो गया होगा.” मैंने सोचा कि ‘शायद मैंने गलत समझ लिया. मैं ही दूर हो जाती हूं.” उन्होंने कई दफा खुद को एडजस्ट करने की कोशिश की लेकिन सावंत उसी तरह हाथ रखे हुए थे.
कृष्णन सोचती रहीं कि क्या वह जानबूझ कर ऐसा कर रहा है. वो कहती है, “वह जानता था कि मैं असहज हो रही हूं. वह जानता था कि मैं अपने शरीर को यहां से वहां कर रही हूं. मुझे आश्चर्य होगा यदि वह कहता है कि ‘मुझे तो पता ही नहीं था कि यह हो रहा है’”.
उसके बाद सावंत ने अपना हाथ कृष्णन के कंधे से हटा कर उनकी छाती पर रख दिया. वह घबरा गईं. वो कहती हैं, “मेरे शरीर को जैसे सांप सूंघ गया था.” कृष्णन ने अपने चारो ओर देखा. वहां सभी अनजान मर्द थे जो एक दूसरे को जानते थे. उनके बीच की मिलनसारिता कृष्णन के भीतर अलगाव पैदा कर रही थी. “मैं खुद को इतना सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रही थी कि किसी से बता सकूं और कह सकूं, “देखो क्या हो रहा है, इसे रोको.’ मेरे भीतर कुछ भी कह सकने का आत्मविश्वास नहीं था.”
कृष्णन यात्रा के खत्म होने का बेसब्री से इंतजार करने लगी. उन्हें इस बात की भी चिंता थी कि जीप पर सवार अन्य लोगों को पता चल जाएगा कि सावंत क्या कर रहा है. कृष्णन याद करती हैं, “मुझे उन चंद घंटो की बस एक ही बात याद है कि मैं लगातार खुद को इधर उधर कर रही थी और इस तरह बैठने की कोशिश कर रही थी कि किसी को भनक न लग जाए कि क्या हो रहा है.” वह आगे कहती हैं, “मुझे याद है कि मैं बार बार पूछ रही थी, ‘हम कब तक वहां पहुंचेंगे- क्या हम लोग पहुंच गए, क्या हम लोग आ पहुंचे”. एक समय आया जब सावंत ने चुटकी लेते हुए कहा, “तुम्हें पहुंचने की बड़ी जल्दी है”. उन्हें याद है इसके बाद वहां मजाक उड़ाया जाने लगा. उस गाड़ी में सवार सबसे कम उम्र की लड़की एक बच्चे की तरह व्यवहार कर रही थी जिसे लंबी यात्रा में फंस जाने का एहसास हो रहा था.
आधी दोपहर में वे लोग लंच के लिए रुके. कृष्णन ने बताया कि लंच ब्रेक में वह इसी चिंता में खोई रहीं कि आगे क्या होगा. भोजन के बाद उनको इस बात से राहत मिली कि सावंत ने अपनी सीट बदल ली थी. कृष्णन को याद है कि सीट बदलते वक्त सावंत ने जोर से कहा था, “हां मैं कहीं और बैठ सकता हूं. मुझे यहां कौन मिस करने वाला है.”
सावंत की उस टिप्पणी में जो कसमसाहट थी वह कृष्णन को याद है क्योंकि उन्हें लगा कि वहां उपस्थित लोग यह जान गए थे कि वह उपहास उन पर लक्षित था. जिस राज को उन्होंने छिपा रखा था वह तमाशा बन चुका था. रुकने की जगह पहुंचते पहुंचते रात हो चुकी थी. सब लोग अपने अपने कमरों में चले गए और थोड़ी देर बाद डिनर के लिए इक्ट्ठा हुए.
इसके बाद सावंत कृष्णन और अन्य लोगों से छिछोरी किस्म की बातें कर रहे थे. उनकी बातचीत में करतूत का कोई एहसास नहीं था और किसी प्रकार की क्षमायाचना तक नहीं. कृष्णन ने कहा, “मेरे लिए यह ऐसा था कि जैसे वो ऐसा दिखा रहा हो कि कुछ हुआ ही नहीं.”
उस रात, जब वो अपनी कमरे में अगले दिन के असाइन्मेंट पर ध्यान लगाने की कोशिश कर रहीं थी तो सावंत ने उन्हें संदेश भेजा. वह उनके कमरे में आना चाहते थे.
कृष्णन को अपनी प्रतिक्रिया ठीक से याद नहीं है. वह सावंत को विनम्रता से मना करना चाहती थीं क्योंकि वह उस पेशे के एक ताकतवर आदमी थे जिस पेशे में वह नई नई जुड़ी थीं. उन्हें सावंत के उस संदेश का कुछ-कुछ हिस्सा याद है. उसमें लिखा था कि उनके दिमाग में “गंदी बात नहीं चल रही”. वह बस उनके साथ बाथटब में जाना चाहता है.
कृष्णन ने सावंत के इस प्रकार धीरे धीरे हावी होने को समझ लिया. “छूना एक ऐसी चीज बन गई जिसे वह चीख कर कह सकता था”- जीप पर उनका मिस न करने वाला उपहास- “उसके बाद वह ऐसी चीज बन गई जिसे वह खुल कर कह रहा था…. वह मेरे साथ बाथटब में जाना चाहता था.”
उसका संदेश और कृष्णन के “ना” बोलने के चंद मिनटों में कृष्णन को दरवाजे में खटखटाहट सुनाई दी. कृष्णन कहती हैं, “मैंने एक सेकेंड के लिए भी नहीं सोचा था कि वही होगा.”
जैसे ही कृष्णन ने दरवाजा खोला सावंत अंदर आ गए. उसने हल्की बातचीत से शुरुआत की, कृष्णन ने याद करते हुए बताया, लेकिन असहजता से कृष्णन जड़ हो गईं थीं. सावंत उनसे लंबा और मजबूत कदकाठी के थे और कृष्णन को इस बात का डर था कि वे उस पर हावी हो जाएंगे. “मेरे दिमाग में यह डर समाया हुआ था कि मैं वह कर बैठूंगी जो वह करना चाहता है. मुझे इतना आत्मविश्वास नहीं था कि मैं अड़ी रह सकती हूं और उसे ना कह सकती हूं”, कृष्णन याद करती हैं.
कृष्णन को “ना” कहने का मौका ही नहीं मिला क्योंकि सावंत ने उनसे पूछा ही नहीं.
कमरे में घुसने के कुछ मिनटों के अंदर ही, वह अभी उनसे बात ही कर रहा था, उसने अपने पैंट की चेन खोल दी और उनका हाथ पकड़ कर अपने गुप्तांग की ओर खींचने लगा. कृष्णन ने सावंत को धक्का देने की कोशिश की लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाईं.
कृष्णन बताती हैं, “वह पीछे नहीं हटा…मैं उसे बहुत अच्छी तरह से एहसास करा दिया था कि उसका आगे बढ़ना मुझे पसंद नहीं है” कृष्णन कहती है, “मुझे लगा कि वह मुझ पर हावी हो रहा है और इसलिए मैं डर के मारे चीखने लगी.”
जैसे ही कृष्णन की “चीख तेज होने लगी” सावंत रुक गया. “मुझे लगता है कि वहां कुछ लाज रही होगी जब उसे लगा होगा, ‘मैं इसका बलात्कार नहीं कर सकता’, तो वह उस वक्त दूर हट गया.” “वह पीछे नहीं भी हट सकता था और मैं क्या ही कर लेती, कम से कम उस वक्त मैंने यही सोचा….मुझे लगा कि यदि वह कुछ करना चाहता तो कर सकता था.”
दी कारंवा ने जब सावंत से इन आरोपों पर प्रतिक्रिया मांगने के लिए ईमेल किया तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.
इस हिंसा के कुछ पल बाद कृष्णन कमरे में अकेली थीं. उन्होंने कमरे से उस वक्त के अपने सबसे विश्वासपात्र को, अपने बौयफ्रेन्ड को फोन लगाया. अपने प्रियजन से मिलने वाली सांत्वना के लिए नहीं बल्कि यह बताने के लिए भी उनके साथ क्या हुआ, कृष्णन ने फोन किया था. मेरा मनोविज्ञान ही इस तरह से तैयार किया गया था कि…मेरी चिंता थी कि ‘मेरा बौयफ्रेंड क्या कहेगा?’”
कृष्णन का बौयफ्रेंड बहुत नाराज हुआ. लेकिन उसने भी उन्हें परेशानी से दूर रहने की सलाह दी. “उस का जवाब भी ऐसा ही था, ‘कोई मतलब नहीं है, तुम बस वापस आ जाओ. मैंने तो बोला ही था.”
उनकी बातचीत से दो विकल्प सामने थे. “तुम ये काम करते रहना चाहती हो या वापस भोपाल चली जाना चाहती हो?”
दोनों ने ये मशवरा किया कि क्यों चुप रहना ही सबसे बेहतरीन विकल्प है. कृष्णन की छवि समस्या पैदा करने वाली, तवज्जो चाहने वाली और कठिन कमर्चारी की बन जाने का खतरा था. ऐसी आशंका थी कि फिर उन्हें बाहर के असाइनमेंट में नहीं भेजा जाएगा. इन चिंताओं के साथ एक और जरूरी सवाल थाः क्या लोग उनकी बातों पर भरोसा करेंगे?
जब मैंने उनके उस वक्त के बौयफ्रेंड से इस बारे में बात की तो उन्होंने उस रात यौन शोषण के बारे कृष्णन और अपनी बातचीत की पुष्टि की. “वह बहुत घबराई हुई थी. वह चीख चीख के रो रही थी…मुझे लगता है कि वह सावंत का बहुत सम्मान करती थी और इसलिए यह सब उनके लिए बहुत चौंकाने वाला था.”
जब कृष्णन दूसरे दिन सावंत से मिली तो वह कुछ इस अंदाज में मिले जैसे पिछली रात की घटना कोई सपना था. उन लोगों ने ड्रिल में भाग लिया, सैन्य स्कूल को दौरा किया और चेकआउट करने के लिए अपने कमरों में चले गए.
उस रात कृष्णन और उनके बौयफ्रेंड की बातचीत दो घंटे से ज्यादा तक चली. जिस कमरे में वह रुकी थीं वहीं के लैंडलाइन फोन से कृष्णन ने बौयफ्रेंड को फोन किया था. उसने बताया, “हो सकता है मेरा फोन काम नहीं कर रहा था या उसमें पैसे नहीं थे.” अगले दिन जब वह चेकआउट कर रहीं थीं तो उनको बताया गया कि आउटस्टेशन फोन के लिए व्यवस्थापकों ने बहुत ज्यादा चार्ज किया है. परिणामस्वरूप उन्हें अतिरिक्त दो हजार रुपए देने को कहा गया.
यह रकम उनकी उस वक्त की कमाई के बराबर थी. कृष्णन याद करती हैं, “मैं टूट गई थी.” उन्हें सेना के उस प्रतिनिधि से पैसे उधार लेने पड़े जो उनके साथ ब्यास आया था. अधिकारी को अचरज हुआ या वह कृष्णन के हावभाव में दिखाई दे रही परेशानी को ताड़ गया, लेकिन उसने जताया नहीं. दिल्ली पहुंचने के काफी दिनों बाद कृष्णन अधिकारी के पैसा लौटा सकीं.
एक बार दिल्ली पहुंचने के बाद कृष्णन न्यूजरूम में रोजाना होने वाले ऊहापोह में खो गईं. जैसे जैसे वो उस हिंसा को भूलने की कोशिश कर रही थीं उनके चुप रहने के तर्क मजबूत होते गए. “ऐसा कुछ भी करने से पहले जो खुद को खत्म करने के समान था आपको एक स्पष्ट जवाब देना होता है कि मेरा लक्ष्य क्या है और मेरा कोई लक्ष्य नहीं था”, कृष्णन ने बताया. “मैं क्या करने वाली थी. उसे नौकरी से निकलवाना? वह स्टार रिपोर्टर था और वह दूसरी संस्था में था”.
2003 में कार्यस्थल में यौन दुर्व्यवहार के पीड़ितों के लिए बहुत कम विकल्प थे. सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित विशाखा दिशानिर्देश को आज छह साल हो चुके हैं. इसमें कई निर्देश जारी किए गए हैं जिसमें कार्यस्थल में यौन उत्पीड़न की शिकायत के निवारण के लिए यौन उत्पीड़न शिकायत समिति की स्थापना का निर्देश भी है. लेकिन यह दिशानिर्देश अभी तक कानून नहीं बन पाया है. अधिकांश संस्थाओं ने- न्यूजरूम भी इसका अपवाद नहीं है- ने इसका पालन नहीं किया है. अधिकांश संपादक, जो पहले की ही तरह पुरुष ही हैं- ऐसी दखलअंदाजियों का बर्दाश्त नहीं करते. (बहुत तो अभी भी दिशानिर्देशों की बखिया उधेड़ रहे हैं जबकि 2013 में बने कानून ने यौन उत्पीड़न से सुरक्षा और शिकायत निवारण हेतु इस दिशानिर्देश को बाध्यकारी बना दिया है.)
मैंने कृष्णन से पूछा कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति था जिससे शिकायत करने के बारे में वह सोच सकती थीं. उनका जवाब था, “किससे?” जहां तक उन्हें याद है उस वक्त आंतरिक शिकायत समिति का अस्तित्व नहीं था. वह द पायनियर के संपादक चंदन मित्रा जो हाल में राज्यसभा सांसद हैं, से शिकायत करने को तैयार नहीं थीं क्योंकि वह बहुत निचले पायदान पर थीं. कृष्णन ने कहा, “मैंने बाद में लोगों से सुना है कि चंदन मित्रा एक ऐसे आदमी हैं जो वास्तव में पीड़ित का साथ देते हैं.” कृष्णन को नहीं लगा कि संस्था से संपर्क करने से बात बनेगी.
कृष्णन ने पेशे की चिंताओं के चलते ही सावंत का नाम न लिया हो ऐसा नहीं था बल्कि उनका सामाजिक मनोविज्ञान या ट्रेनिंग ने भी उन्हें ऐसा करने से रोका. वो बताती हैं, “मैंने बीस साल की परिपक्वता में ऐसा किया था. इस उम्र में आप स्वयं को कसूरवार मानते हैं ना कि इसके विपरीत जा कर देख पाते हैं कि कैसे व्यस्क लोगों और बॉस और उन लोगों से सवाल करना चाहिए जो ताकतवर होते हैं.” कृष्णन के मन में सावंत के लिए हमदर्दी थी और शिकायत करने पर सावंत को होने वाले नुकसान का अपराधबोध भी. “मुझे बहुत समय लगा इस बात को मानने के लिए जहां मैं कुछ ऐसा कह सकती हूं… कि उसकी गंदी पहचान को बचाने का ठेका मैंने नहीं लिया है.” कृष्णन ने बताया, “जिन बातों पर मैं विचार कर रही थी उनमें से एक बात यह भी थी ‘कि उसकी अभी शादी हो रही है’”. “मुझे नहीं याद कि यह बात किसने मेरे दिमाग में भरी. अब मुझे एहसास होता है कि यह कितना बेवकूफी भरा सुनाई पड़ता है.”
उनके साथ जो हुआ उसे कृष्णन ने कम करके देखा. “मुझे याद है कि मुझे बार बार कहा जाता था और फिर मैं खुद से कहती थी, ‘रेप तो नहीं हुआ ना, कुछ बुरा तो नहीं हुआ है, तुम अपने काम में वापस जाओ, कौन सा उससे रोज मिलना है.‘”
लंबे समय तक कृष्णन ने इस घटना को अपने दिमाग में बंद करके रखा. इस गर्मी में एक इंटरव्यू में उन्होंने मुझसे कहा, “क्योंकि मैंने इस बात को लंबे वक्त तक सोचा या याद नहीं किया इसलिए मुझे पीड़ित होने का एहसास नहीं हुआ. हर रोज इससे कहीं बड़ी समस्याओं का खुलासा हो रहा था. “मुझसे कहा गया कि इससे निबटने का सबसे अच्छा तरीका है कि मैं इसे भूला दूं…पिछले कुछ महीनों में कुछ ऐसा हुआ कि पहली बार मैंने इस बारे में सोचा. मैंने इसे याद करने के लिए इतना समय खर्च किया.”
हालांकि कृष्णन इस याद से दूर भाग रहीं थीं लेकिन उसकी परछाई ने उनका साथ कभी नहीं छोड़ा. “मैं हमेशा बहुत बहुत चौकस रहती कि कहीं मैं सावंत से न टकरा जाउं”, कृष्णन ने बताया, “दोस्तों की शादियों में, पत्रकारों की पार्टियों में, इस तरह की चीजों में. एक वो भी वक्त था जब मैं यह चेक करती कि कौन कौन आ रहा है. और अगर मुझे पता चलता कि आने वालों में उसका नाम है तो मैं वहां नहीं जाती.”
तब से लेकर आज तक शहर के बाहर होने वाली रिपोर्टिंग में कृष्णन हमेशा चौकस रहती हैं. कृष्णन ने मुझे बताया, “मुझे हमेशा इस बात का डर रहता है कि मेरा बीट सहयोगी कौन होगा”. “इन सालों में जब भी मैंने यात्रा की, मैं कभी दोस्ताना नहीं रही”. उस विचार कि “फिर वहीं हो सकता है” ने उन्हें कभी स्वाभिक नहीं होने दिया.
भारतीय न्यूजरूम का माहौल- जो अधिकतर महिलाओं के प्रति शत्रुतापूर्ण है- यौन दुराचार को सहज बनाता है और इसके प्रभाव को अधिक खराब करता है. ऐसी जगहों में लैंगिक संवेदनशीलता की कमी, महिलाओं को अपनी चिंताओं को सामने लाने से रोकती है. भारत की बहुसंख्यक महिला पत्रकारों के लिए ऐसे डर और यहां तक की इस डर का एहसास आपस में गुपचुप तरीके से साझा करने की चीज है. कृष्णन कहती हैं, “महिला होने के नाते इस स्तर पर हमारे लिए गलती करने की बहुत कम गुंजाइश है. हमें लगातार यह साबित करने के लिए कि हम मर्द पत्रकारों की तरह कड़क हैं आवश्यकता से अधिक काम करना पड़ता है. ऐसा अलग अलग तरीके से करना होता है, जो अब मैं समझने लगी हूं.”
अपने करियर में कृष्णन ने स्त्रीद्वेष को कई स्वरूपों में झेला है. उनके आरंभिक बॉस में से एक ने उनके काम के प्रति उत्साह का यह कह कर मजाक उड़ाया था कि “बड़ी बरखा दत्त बनने निकली हो.” कृष्णन ने मुझे बताया कि स्वास्थ मंत्रालय में एक बैठक के दौरान हाल ही में एक पुरुष पत्रकार ने उनकी और एक अधिकारी के बीच चल रही बातचीत को बीच में काटते हुए कहा था, “आप इनसे बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इनका ब्लाउज डीप है.”
कृष्णन कहती है, “यह एकदम ही यौन उत्पीड़न नहीं है, यह बताता है कि हम कार्यस्थल में महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार करते हैं. यह रोजाना का लैंगिक भेदभाव है.” “मुझे इस बात पर गुस्सा आता है कि हमारे पास स्मार्ट, जवान महिला पत्रकार होने के बावजूद हम उन्हें तैयार नहीं करते क्योंकि हम उन्हें किसी चीज़ की तरह देखते हैं. और आप कितनी भी वरिष्ठ हों यह वैसा ही बना रहता है क्योंकि आप इस कड़ी में कितना भी ऊपर क्यों न पहुंच जाएं आपसे ज्यादा मर्द उस कड़ी में उस स्तर पर विराजमान हैं.”
और यही वह परिवेश है जो इस उद्योग के लीडरों को ऐसा काम करने, ऐसा काम को सही मानने या भेदभावपूर्ण रिवाज को आसानी से नजरअंदाज करने का अवसर देता है. जब भी कोई महिला पत्रकार चुप्पी की इस संस्कृति को तोड़ती है और किसी दरिंदे का नाम लेती है जिसके बारे में सब को पता है कि वह वैसा है, लेकिन कोई कुछ नहीं कहना चाहता, तब इंडस्ट्री उस दरिंदे को बचाने के लिए आगे आ जाती है. उसके बचाव को यह कह कर सही बताया जाता है कि पीड़िता के बेअसर करियर की तुलना में उस दरिंदे की पत्रकारिता की प्रतिभा अधिक महत्वपूर्ण है.
आज 15 साल बाद भी, जबकि कृष्णन के पास अनुभव का लाभ है, यह कहना मुश्किल है कि कृष्णन का वह खौफ बेबुनियाद था. जिन लोगों से कृष्णन ने अपना अनुभव साझा किया उनमें से अधिकांश ने कृष्णन को खामोश रहने की सलाह दी. उनसे कहा गया कि वह अपने करियर में अच्छा कर रही हैं और अपनी छवि को खराब करने की कोई जरूरत नहीं है. यह भी कहा गया कि आरोप लगाने से उनको चिन्हित कर दिया जाएगा और कोई भी उनकी रिपोर्टिंग को गंभीरता से नहीं लेगा.
लेकिन कृष्णन ने अब इन बातों पर ध्यान देना बंद कर दिया है. उनको लगता है कि यह उनका नैतिक कर्तव्य है कि वह अपनी कहानी लोगों को बताएं. वह कहती हैं, “मैं यह इसलिए नहीं कर रही क्योंकि मैं चाहती हूं कि सावंत के साथ कुछ होना चाहिए.” उन्होंने मुझे बताया, “ऐसा कर मैं वास्तव में कुछ हासिल नहीं करने वाली.” उनका मानना है कि वह ऐसा उन औरतों के लिए कर रही हैं जिन पर यह खतरा मंडरा रहा है या जिन्होंने कार्यस्थल पर उत्पीड़न और हिंसा को भोगा है. वह कहती हैं, “ऐसे लोग हैं जिन्हें नौकरियों की जरूरत है और जो महत्वकांक्षी हैं और प्रतिभावान हैं और खुद को साबित करना चाहते हैं. वह खुद को साबित करने में इस कदर लगे हुए हैं कि इस तरह की भयावह चीजों को देखते हुए भी कहते हैं, ‘चलो, मैं इसे भूल जाती हूं ताकि मैं अपने भविष्य को अच्छा बना सकूं.‘” “यह मामला दूसरे मामलों की तरह नहीं होना चाहिए. इसे इतना जटिल नहीं होना चाहिए.”
कृष्णन ने फिर कहा, “मैं ऐसा इसलिए कर रही हूं ताकि मेरे मन को शांति मिल सके.”
जिस समय कृष्णन का यौन शोषण हुआ था उस वक्त वो कमजोर थीं. सावंत एक मशहूर पत्रकार थे जबकि वह एक नौसिखिया थीं. लेकिन आज कृष्णन अपने इरादों और मेहनत के दम पर एक सफल महिला हैं. दी हिंदू के अलावा उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस और मिंट में काम किया है. आज सावंत शायद उस वक्त से ज्यादा ताकतवर हैं लेकिन कुछ खास बात है जो बदल चुकी है. कृष्णन ने डरना बंद कर दिया है.
ऑस्ट्रेलिया को साल 2015 में विश्व कप का खिताब जिताने वाले क्रिकेटर माइकल क्लार्क की घरेलू जिंदगी में एक बड़ा तूफान आ गया है. खबरें हैं कि माइकल क्लार्क अपनी असिस्टेंट साशा आर्मस्ट्रॉन्ग के साथ एक्स्ट्रा मैरेटियल अफेयर चल रहा थे.
ध्यान देने वाली बात यह है कि माइकल क्लार्क शादीशुदा हैं और उनकी एक बेटी भी है. क्लार्क ने साल 2012 में बिजनेस वुमेन और मॉडल कायली बॉल्डी से शादी की थी. हालांकि दोनों का रिश्ता पिछले कुछ समय से अच्छा नहीं चल रहा था.
फिलहाल क्लार्क की एक्स्ट्रा मैरेटियल अफेयर की खबरें सोशल मीडिया पर वायरल होने से पत्नी कायली को बड़ा झटका लगा है. क्लार्क की इन हरकतों से कायली काफी नाराज भी नजर आ रही हैं.
बता दें क्लार्क और साशा की मीडिया में कुछ तस्वीरें भी लीक हुई हैं. इन तस्वीरों में दोनों एक लग्जरी यॉट में लेटे दिखाई दे रहे हैं. साशा वैसे तो क्लार्क की एकेडमी का कामकाज देखती हैं, लेकिन व्यस्त समय के बाद दोनों ज्यादा समय एक दूसरे के साथ ही रहते हैं.
वहीं सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरें वायरल होने के बाद क्लार्क भी काफी परेशान हैं. अपनी असिस्टेंट के साथ रिश्ते को लेकर क्लार्क ने फिलहाल कोई बयान नहीं दिया है.
बता दें कि इस पूर्व ऑस्ट्रेलियाई कप्तान ने 115 टेस्ट खेले हैं जिसमें उन्होंने 8643 रन बनाए हैं जिसमे उनका सर्वाधिक स्कोर 329* रहा है.
चुनाव के वक्त गुस्सा सरकार पर ही आता है, विपक्षी दल पर नहीं, जो चाहे तो जनता के गुस्से को हवा देते खुद सरकार बना लेने का सपना पूरा कर सकता है. शबाब पर आ चुके प्रचार में कांग्रेस मध्यप्रदेश के लोगों को हवा के साथ एक मंच भी दे रही है जिस पर एक फोन काल कर पहुंचा जा सकता है. बात चुनावी प्रचार अभियान की ही है जिसमें कांग्रेस भाजपा पर भारी पड़ रही है. अपने विज्ञापनों में कांग्रेस लोगों से अपील कर रही है कि उन्हें भी किसी वजह से अगर सरकार पर गुस्सा आता है तो वे अपने गुस्से का वीडियो बनाकर भेंजे वह उसे न्यूज चैनल्स पर दिखाएगी.
ऐसी कई शार्ट फिल्में कांग्रेस दिखा भी रही है जिन्हें देख देख कर आमतौर पर शांत रहने वाले लोगों के सर पर भी गुस्सा चढ़ने लगा है. सरकार को कोसते ये वीडियो कितने असरकारी साबित हुये यह तो मतगणना वाले दिन 11 दिसंबर को पता चलेगा लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इनका चित्रण प्रभावी और मुद्दों पर आधारित है. एक वीडियो में एक गृहिणी राज्य में बढ़ते बलात्कार और महिलाओं के प्रति हिंसा में इजाफा होने पर गुस्सा हो रही है, तो दूसरे में एक किसान मंडियों में बढ़ती दलाली और किसानों की आत्महत्यों के अलावा मंदसौर गोलीकांड पर गुस्सा हो रहा है जिसमें किसानों पर पुलिस ने गोलियां चलाईं थीं.
एक दूसरे वीडियो यानि विज्ञापन में एक आम आदमी को राज्य की बदहाली पर गुस्सा आ रहा है तो एक अन्य वीडियो में बेरोजगार युवाओं की कमजोर नब्ज पर हाथ रखा गया है कि शिक्षित युवा अवसाद में जीता दर दर की ठोकरें खाते कह रहा हैं कि …. गुस्सा आता है …. गुस्सा मध्यप्रदेश के व्यापारी को भी आ रहा है जो अपनी दुर्दशा की वजह जीएसटी और नोटबंदी को ठहरा रहा है.
कांग्रेस को समझ आ गया है कि यही गुस्सा उसकी नैया पार लगा सकता है लिहाजा चैनल्स पर उसके गुस्से वाले इश्तिहार खूब फल फूल रहे हैं उलट इसके भाजपा के चुनावी विज्ञापन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के इर्द गिर्द घूम रहे हैं. भाजपा अपने विज्ञापनों के जरिये यह बताने की कोशिश कर रही है कि राज्य ने खूब तरक्की कर ली है. कांग्रेस ने उसे बीमारू राज्य सौंपा था जिसे शिवराज सिंह ने खुशहाल बना दिया है जिनकी मंशा अब मध्यप्रदेश को समृद्ध बनाने की है और जाहिर है इसके लिए उन्हें एक और मौके की दरकार है जो जनता से मांगा जा रहा है. उसके विज्ञापनों में किसान, व्यापारी, छात्र, युवा और महिलाएं कह रहे हैं माफ करो महाराज, हमारा नेता शिवराज. गौरतलब है कि मध्यप्रदेश की राजनीति में ज्योतिरादित्य सिंधिया को महाराज कहा जाता है.
भाजपा ने इसके पहले राज्य को और खुशहाल बनाने जनता से आइडिया मांगा था इसमें लोगों से वादा किया गया था कि वे जो आइडिया भेजेंगे उसे अमल में लाया जाएगा, लेकिन यह आइडिया ज्यादा चला नहीं तो उसने अपने इश्तहारों को शिवराज सिंह पर फोकस कर लिया कि उन्होंने अपने कार्यकाल में किस तबके के लोगों के लिए क्या क्या किया.
चुनावी विज्ञापनों की अपनी अलग अहमियत होती है, वे किसी प्रोडक्ट की तरह ही होते हैं जिसमें वे खूबियां होती नहीं हैं जो गिनाई जाती हैं इसके बाद भी लोग उन पर तब्बजुह देते हैं तो इसकी वजह उनकी राजनीति में दिलचस्पी और यह तथ्य देखना परखना रहता है कि किसका झूठ सच के ज्यादा नजदीक है.
इस लिहाज से भाजपा पिछड़ रही है क्योंकि उसके दावे सच से काफी दूर हैं और लोग शिवराज सिंह का चेहरा बीते 13 सालों से इतना देख रहे हैं जितना किसी देवी देवता का भी फोटो या मूर्ति में भी उन्होने नहीं देखा होगा.
यानि भाजपा के विज्ञापनों में उत्सुकता और आकर्षण का अभाव है. वे ठीक किसी डाक्यूमेंट्री की तरह हैं, जबकि कांग्रेस के विज्ञापनों से सच का एहसास लोगों को हो रहा है, जो दरअसल में आम लोगों की रोजमरराई परेशानियों की नुमाइनदगी करते उनका ठीकरा सरकार के सर पर फोड़ते हुये हैं. कांग्रेस हालांकि पैसों की कमी के चलते भाजपा जितनी विज्ञापनबाजी नहीं कर पा रही है, पर यह बात भी धीरे धीरे उसके पक्ष में जाने लगी है, क्योंकि आमतौर पर लोग भाजपा के विज्ञापनों को सरकारी विज्ञापन ही मान रहे हैं. चैनल्स पर भाजपाई विज्ञापन औसतन हर पांच सेकंड में और कांग्रेस का बीस सेकंड में चल रहा है. अखबारी विज्ञापन अभी कांग्रेस ने शुरू नहीं किए हैं.
ऐसे में लोगों का यह ख्याल भी पुख्ता होता जा रहा है कि भाजपा उनके ही पैसों से उसका विज्ञापन उन्हें दिखा रही है, दूसरी अहम बात भाजपा के प्रचार अभियान में कमियों और खामियों का ठीकरा कांग्रेस के 1993 से लेकर 2003 के शासन काल पर फोड़ा जा रहा है, जिससे लोग हैरत में हैं कि 15 साल राज करने के बाद भी अगर कमियां और खामियां हैं, तो आप किस खेत की मूली और किस मर्ज की दवा हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अभी भी देश की बदहाली का जिम्मेदार कांग्रेस और नेहरू गांधी परिवार को बताते हैं तो लोग खीझने लगते हैं कि उनसे छुटकारा पाने ही तो आपको बैठाला था और आप हैं कि अभी भी विपक्ष जैसी बातें करना नहीं छोड़ पा रहे हैं.
यही मध्यप्रदेश के लोग कह और सोच रहे हैं कि मिस्टर बंटाढार यानि दिग्विजय सिंह तो अब कहीं पिक्चर में नहीं और क्या चौथी बार भी उनके किए धरे पर वोट करें तो आप 15 साल से क्या कर रहे थे. आप तो यह बताएं कि आपने अब तक क्या किया कांग्रेस ने जो किया था उसकी सजा तो वह भुगत चुकी है अब बारी आपकी है. लोगों का गुस्सा बेवजह नहीं है और भाजपाई विज्ञापनों का अर्धसत्य भी किसी सबूत का मोहताज नहीं रह गया है.
किसी विज्ञापन में जब यह बताया जाता है कि वे यानि कांग्रेसी 50 साल बेटियों की शिक्षा पर घड़ियाली आंसू बहाते रहे, शिवराज पढ़ने की आजादी के लिए साइकल देते रहे, तो राजधानी भोपाल के शिवाजीनगर में घर घर जाकर झाड़ू पोंछा करने वाली संतोषी रेकवार हैरान हो उठती है कि उसकी दोनों बेटियों जिनमे से एक 11वीं और दूसरी 8वीं में पढ़ती है, को साइकल कहां मिली. दिलचस्प बात यह भी है कि इसी विधानसभा क्षेत्र के भाजपाई उम्मीदवार वरिष्ठ मंत्री उमाशंकर गुप्ता को एक बस्ती में लोगों ने घुसने ही नहीं दिया था जिसका वीडियो वायरल भी हुआ था.
बहरहाल यह हैरानी राज्य की लाखों संतोषियों की है जो 12 नवंबर अखबार में साइकल वाला विज्ञापन देखकर पहले चौंकी थीं, फिर उन्हें बिना कांग्रेस के उकसाये गुस्सा आया था. वे पूरी ईमानदारी से मानने लगीं हैं कि सरकार सरकार में कोई फर्क नहीं होता, सभी झूठ बोलते हैं और वोट झटकने गलत सलत प्रचार करते हैं. खोट उनकी नीयत में भी था, खोट इनकी नीयत में भी है.
अगर यह गुस्सा भड़ास में बदला तो कांग्रेस का यह नारा सच भी हो सकता है कि मामा तो गया… ( मामा मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह को कहा जाता है.)
कहते हैं कि मां का आंचल किसी नवजात के लिए सब से महफूज जगह होती है और अगर कोई उसी आंचल में सुकून से दूध पीते किसी 12 दिन के बच्चे को जबरदस्ती खींच कर ले जाए और मार डाले तो उस मां पर क्या बीतेगी, यह सोच कर ही बदन में सिहरन पैदा हो जाती है. और अगर यह कांड कोई गुस्साया बंदर करे तो?
जी हां, ऐसा ही हुआ है. दरअसल, पूरे देश की तरह उत्तर प्रदेश की ‘ताज नगरी’ आगरा में भी बंदरों ने आतंक मचा रखा है. वहां पर लोगों के हाथों से खानेपीने का सामान छीन कर बंदरों के भागने की घटनाएं रोज होती हैं. कभीकभार तो बंदर इतने ज्यादा मस्तीखोर हो जाते हैं कि बाहर छत पर सूख रहे कपड़ों को भी फाड़ डालते हैं. ज्यादातर लोग उन्हें डंडे का डर दिखा कर भगा देते हैं पर उन का कोई स्थायी इलाज नहीं ढूंढ़ते हैं.
लेकिन इस बार तो हद ही हो गई. सोमवार, 12 नवंबर, 2018 को आगरा में एक बंदर ने 12 दिन के नवजात बच्चे को अपना दूध पिला रही एक मां से छीन लिया और उसे मार डाला.
पुलिस ने बताया कि आगरा के रुनकता इलाके में कछारा ठोक कॉलोनी में योगेश का घर है जो एक ऑटोरिक्शा ड्राइवर हैं. उस की नेहा से 2 साल पहले शादी हुई थी और उन दोनों के घर में 12 दिन पहले ही एक बेटे ने जन्म लिया था.
नेहा सोमवार की रात को अपने उस बच्चे आरुष उर्फ सनी को दूध पिला रही थी. योगेश ने बताया कि घर का दरवाजा खुला था. तभी एक बंदर अचानक घर के अंदर घुस आया. बच्चे को दूध पिलाने में मगन नेहा कुछ समझ पाती इस से पहले ही बंदर ने आरुष को उठा लिया और बाहर की ओर भागा.
नेहा भी चिल्लाती हुई उस बंदर के पीछे भागी. बंदर भाग कर पड़ोसी की छत पर चढ़ गया और बच्चे को पटकने लगा.
नेहा के रोनेचिल्लाने की आवाज सुन कर लोग घरों से बाहर निकले. सब ने बंदर को हड़काया तो वह आरुष को वहीं फेंक कर भाग गया.
नेहा ने बताया कि आरुष की गरदन से काफी खून बह रहा था. वे लोग उसे पास के एक प्राइवेट अस्पताल ले गए जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.
इस घटना से गुस्साए लोगों ने बताया कि आरुष को मारने से पहले एक बंदर ने उसी इलाके की एक 14 साल की बच्ची पर भी हमला किया था जिस में उसे काफी चोटें आई थीं.
लोगों ने यह भी बताया कि इसी इलाके में कुछ दिनों पहले एक बंदर ने एक नवजात बच्चे पर हमला किया था. हालांकि उस बच्चे को बचा लिया गया था.
देशभर में बंदरों के आतंक की घटनाएं देखनेसुनने को मिलती हैं. हरियाणा के रोहतक शहर में बंदरों का आतंक इतना ज्यादा है कि ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब कोई उन के हमले का शिकार नहीं बनता है.
वहां के सैक्टर 2 में एक नया मकान बन रहा था जिस की तराई करते समय उस मकान के चौकीदार को कुछ बंदरों ने आ कर घेर लिया. जब तक पड़ोस के मकान से लोग दौड़ कर पहुंचे, तब तक उस चौकीदार को बंदरों ने हाथ, कमर, जांघ में काट खाया था. हजारों रुपये खर्च करने पड़े, तब जा कर चोट ठीक हुई थी.
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में बहुत से लोग यह सोच कर जाते हैं कि अगर उन की यहां मौत हुई तो उन्हें बिन मांगे मोक्ष मिलेगा. पर यहां उन का सामना होता है उन बंदरों से जो वहां के मंदिरों में रहते हैं. वजह, उन्हें यहीं पर बहुत से भक्तों के द्वारा खानापीना मिलता रहता है.
लेकिन जब बंदरों का पेट भर जाता है तो वे उत्पात करने में भी पीछे नहीं रहते हैं. तथाकथित हाईटेक हो रहे वाराणसी शहर में बंदर फाइबर ऑप्टिक तारों से लटकेझूलते भी रहते हैं. यहां तक कि वे तारों को खा भी जाते हैं.
असली समस्या तो तब आती है जब नगरनिगम वाले इन्हें भगाने आते हैं पर भक्त इस बात से नाराज हो जाते हैं कि उन के तथाकथित देवता पर जुल्म क्यों ढाया जा रहा है.
देश की राजधानी नई दिल्ली का रक्षा मंत्रालय तक बंदरों की उछलकूद से परेशान है. वहां बंदरों को दूर भगाने के लिए सुरक्षा कर्मियों का सहारा लिया जाता है. दिल्ली के कई और इलाके भी बंदरों के आतंक से पीड़ित हैं पर उन की कहीं सुनवाई नहीं होती है.
देश के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जब साल 2014 में वृंदावन गए थे तब बंदरों से उन की हिफाजत के लिए 10 लंगूर भी साथ ले जाए गए थे. मतलब हमारे देश का प्रथम नागरिक भी इन उछलतेकूदते तथाकथित देवताओं के प्रकोप का मारा है.
एक अंदाजे के मुताबिक, वृंदावन में तकरीबन 2 लाख बंदर हैं. ये बंदर भक्तों से प्रसाद, चश्मे, मोबाइल और कैमरे वैगरह छीन लेते हैं. ज्यादा गुस्सा हो जाएं तो काट भी खा लेते हैं.
आतंक का दूसरा नाम बनते जा रहे बंदरों को भागने के लिए अब बहुत से लोग पैसे खर्च कर के लंगूर का सहारा लेने लगे हैं पर यह भी महंगा और कोई स्थायी इलाज नहीं है.
दरअसल, अब शहरों के आसपास जंगल खत्म हो गए हैं और इसी वजह से बंदर अपनी टोलियों में शहर में आ धमकते हैं. बहुत से शहर तो बंदरों से ही मशहूर हो गए हैं.
चूंकि कुछ धार्मिक आस्थाओं के चलते लोग बंदरों को खानेपीने की चीजें देने लगते हैं जिस से वे उसी इलाके में हिलमिल जाते हैं और बाद में वहीं पर आतंक मचाना शुरू कर देते हैं. यह आतंक कभीकभार इतना दुखदाई हो जाता है कि एक मां को अपना बच्चा तक खोना पड़ जाता है. और यह घटना पहली नजर में जितनी छोटी लगती है उतनी है नहीं, बस थोड़े से भावुक हो कर सोचिए कि इस में आयुष की क्या गलती थी?
बंदर काटे का इलाज
बंदर के काटने को हलके में मत लीजिए क्योंकि कुत्ते बिल्ली जैसे जानवरों की तरह बंदर के काटने से भी रेबीज जैसी खतरनाक बीमारी होने का खतरा बना रहता है, इसलिए इस का इलाज कराने में देरी नहीं करनी चाहिए.
अगर बंदर काट ले तो तो ये उपाय जरूर करें:
• घाव को साबुन से अच्छी तरह 10 से 15 मिनट तक धोएं.
• घाव पर साफ़ कपड़ा बांधें.
• बिना देरी किए अस्पताल पहुंचे और इलाज करवाएं.
• एंटी रेबीज टीका जरूर लगवाएं.
• आप को काटने वाला बंदर भविष्य में किसी और पर भी हमला बोलता है तो इस बात की सूचना डॉक्टरों को दें.
आपने अपने पार्टनर से चीटिंग की है. अब वजह चाहे वन नाइट स्टैंड वाली हो या ज्यादा ड्रिंक करने के बाद लिया गया डिसीजन. या फिर किसी कलीग से अफेयर के चक्कर में पार्टनर को धोखा दिया है. इन सब बातों से अब कोई फर्क नहीं पड़ता. खैर, धोखा तो दे दिया है. अब सवाल यह उठता है कि आप अपने रिश्ते को बरकरार रखने में दिलचस्पी भी रखते हैं या नहीं? अगर हां, तो क्या करें?
सच का सामना
ज्यादातर यही सलाह देंगे कि आप अपने गिल्ट का निवारण अपने साथी को सच बता कर करें कि आपने उसे धोखा दे दिया है. लेकिन ज्यादातर मैरिज काउंसलर और सेक्स थेरेपिस्ट कहते हैं कि स्कूलों में “होनेस्टी इज द बेस्ट पौलिसी” वाली नीति रिलेशनशिप के मामले में खास कारगर नहीं होती. न्यूयौर्क की सेक्स थेरेपिस्ट एंड मैरिज काउंसलर मेगन फ्लेमिंग के मुताबिक़, ‘यह सुनने में भले ही कन्ट्रोवर्सियल लगे लेकिन मेरा यही सुझाव है कि आप अपने पार्टनर को बेवफाई के बारे में न ही बताएं तो अच्छा है.’
भारी पड़ता है कन्फेशन
वह आगे कहती हैं, “आप भले ही सच बोलकर अपने अपराध बोध से छुटकारा पा लें और यह सोचें कि सच बोला है तो आपका पार्टनर आपको डंप नहीं करेगा. लेकिन मेरा अनुभव कहता है कि आपका सच सुनकर साथी भावनात्मक तौर पर टूट जाता है. आप जो भी कर लें लेकिन उस पर नकारात्मक भावनाओं का अम्बार लग जाता है. चिडचिडापन, शक, भ्रम, क्रोध और रिजेक्शन जैसे भाव उसे घेर लेते हैं. और यह सब मिलकर आपके और उनके बीच के रिश्ते की नींव हिलाकर रख देगा. इस कन्फेशन के बाद आपका पार्टनर आप पर कभी भी भरोसा नहीं कर पायेगा, यह निश्चित है.
रिलेशनशिप क्राइसिस?
यदि आप वास्तव में रिश्ते को बेहतर बनाना चाहते हैं, तो सबसे पहले यह सोचे कि आपने उन्हें चीट किया ही क्यों. यानी ऐसी नौबत क्यों आई कि आपको अपने पार्टनर से बेवफाई करनी पड़ी. जाहिर है, इस सवाल का जवाब खोजने में आपको अपने रिश्ते की कई उलझनों का सामना करना पड़ेगा लेकिन समस्या की जड़ तक जाने के लिए यह जरूरी है. इस मामले में डॉक्टर फ्लेमिंग कहती हैं, आमतौर पर जब इस तरह के मामले लेकर क्लाइंट मेरे पास आते हैं तो उनकी बेवफाई के पीछे अमूमन यही कारन होता है कि उनकी जरूरतें अपने पार्टनर से पूरी नहीं हो पा रही थीं. फिर चाहे वे सेक्सुअल नीड्स हों या इमोशनल. जबकि वे इस इस मामले में अपने करीबी रिश्तेदारों से बात कर इस समस्या को सुलझा सकते थे लेकिन इसके बजाए उन्होंने चीटिंग काटने का ऑप्शन चुना.
यह दरअसल रिलेशनशिप क्राइसिस का पड़ाव होता है. जहां कपल का रिश्ता संकट में होता है और वे इस संकट को सुलझाने के बजाए किसी और पार्टनर की बाहों में जाना बेहतर समझते हैं. जबकि वे अपने रिश्ते की मरम्मत करने का अवसर गंवा रहे होते हैं.
अब क्या करें
अगर आपका वन नाइट स्टैंड ओवर हो चुका है और ऑफिस कलीग से भी दिल भर गया है तो जाहिर है आप अपने पार्टनर के पास वापस जाना चाहेंगे. ऐसे में पहले तो सच को दबाकर यह संकल्प लें कि दोबारा ऐसी नौबत नहीं आयेगी. उसके बाद खुद को किसी रिलेशनशिप काउंसलर के पास ले जाएँ ताकि आपकी जरूरतों और कमियों को समझा जा सके. फिर जरूरत पड़े तो पार्टनर को भी सेक्स थेरेपिस्ट या मैरिज काउंसलर के पास ले जाएँ. एक चिकित्सक आपको यह समझने में मदद कर सकता है कि अपने रिश्तों में क्या नहीं सोचा गया था और स्वस्थ तरीके से अपने साथी के साथ फिर नयी शुरुआत कैसे करें. लेकिन हाँ, इस सारे प्रोसेस में अपने अफेयर की बात को न घुसायें तो बेहतर होगा.
बोल दिया जाए या छोड़ दिया जाए
हालांकि कुछ लोग इसके ठीक विपरीत सोचते हैं. वे मानते हैं कि पार्टनर से धोखे की बात छिपानी नहीं चाहिए. क्योंकि एक बार एक बार धोखा देने वाला व्यक्ति यह काम बार-बार करता है. इसलिए उसके कन्फेशन से कम से कम सामने वाला पार्टनर एलर्ट तो रहेगा. कुछ मानते हैं कि एक साथी को कभी न कभी यह पता चल ही जाता है कि उसे धोखा दिया गया है. इस से बेहतर है कि आप ही सब सच-सच बता दें. फिर भले ही वह डिप्रेशन में जाए या उस रिश्ते को ख़त्म कर ले.
लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि रिश्तों के नाजुक मसलों में हर सच कई बार इतनी दरारें पैदा कर देता है कि वह चरमरा कर टूट जाता है. इसलिए सच नहीं बोलना है तो यह जरूर निश्चय कर लें कि अब उस गलती को दोबारा नहीं दोहराएंगे, तब जाकर आपका झूठ किसी हद तक जायज माना जा सकता है.