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सम्मान वापस पाने का मौका

28 नवंबर से 16 दिसंबर तक ओडिशा के भुवनेश्वर में हौकी विश्वकप का 14वां संस्करण खेला जाएगा. भारतीय हौकी टीम के लिए अपना खोया हुआ सम्मान वापस पाने का मौका है. मस्कत में संपन्न हुई एशियन चैंपियंस ट्रौफी में भारत और पाकिस्तान के बीच फाइनल मुकाबला बारिश के कारण न खेले जाने से दोनों टीमों को संयुक्त विजेता घोषित किया गया था.

भारतीय हौकी टीम के लिए यह खुशी की बात है और मलाल भी है. मलाल इसलिए कि टीम पाकिस्तान की उसी टीम को 6 देशों की लीग मुकाबले में 3-1 से हरा चुकी थी. यदि फाइनल मुकाबला होता तो निश्चित ही भारतीय टीम पाकिस्तान पर भारी पड़ती. जकार्ता में एशियाई खेलों में फाइनल में न पहुंच पाने का जख्म अभी भरा नहीं है. यह अच्छा मौका था पर बारिश ने उस जख्म को भरने नहीं दिया.

एशियाई खेलों में जिस मलयेशियाई टीम ने भारतीय टीम को फाइनल में नहीं पहुंचने दिया था उसी टीम ने मस्कत में भी भारतीय टीम को बराबरी पर रोक दिया. भारतीय फौरवर्डों ने कई मौके गंवा दिए. फिर से वही कमजोरी दोहराई गई.

पाकिस्तान और दक्षिण कोरिया की टीमों के साथ भारतीय टीम को उतनी मशक्कत नहीं करनी पड़ती जितनी कि मलयेशिया और जापान की टीमों के साथ करनी पड़ती है.

इन दोनों टीमों को अगर मात देनी है तो भारतीय टीम को रणनीति पर विचार करना होगा. भारतीय खिलाडि़यों ने जापानी खिलाडि़यों को मस्कत में हलके में लेना शुरू कर दिया था. सैमीफाइनल में गोल के लिए भारतीय खिलाडि़यों को कड़ा संघर्ष करना पड़ा और जहां पिछले मुकाबले में उन्हें 9-0 से मात दी थी वहीं इस मुकाबले में 3-2 से ही संतोष करना पड़ा.

यहां भी भारतीय खिलाडि़यों ने कई मौके गंवाए. विश्वकप जीतना है तो भारतीय खिलाडि़यों को अपनी कमजोरी पर ध्यान देना होगा. गोल पर निशाना साधना होगा. सर्किल में संयम की जरूरत है. मजबूत व रक्षात्मक हौकी खेलने वाली टीमें कभी भी गोल पर निशाना लगाने की आजादी नहीं देती हैं, इसलिए निशाने पर ध्यान देना होगा.

पैनल्टी को गोल में तबदील करने में भारतीय टीम ने कुछ सुधार तो किया है पर इतने से काम चलने वाला नहीं. यदि मजबूत टीम सामने हो तो अकसर देखा गया है कि पैनल्टी कौर्नर कम मिलते हैं. इसलिए पैनल्टी कौर्नर को गोल में तबदील करने की क्षमता को बढ़ाना होगा.

इस विकल्प में भारत को पूल सी में रखा गया है जिस में बैल्जियम, दक्षिण अफ्रीका और कनाडा जैसी मजबूत टीमों से उसे भिड़ना होगा.

हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में स्पेन, इंगलैंड, जरमनी, नीदरलैंड्स व आस्ट्रेलिया जैसी टीमों के साथ भारतीय टीम के खिलाडि़यों ने अच्छा प्रदर्शन किया है. हमारे पास हरमनप्रीत जैसे ड्रैग फ्लिकर हैं. आकाशदीप जैसे खिलाड़ी हैं. युवा खिलाडि़यों में जोश है, जनून है, जज्बा है. बस, एक चीज की कमी दिखती है, वह है मानसिक रूप से मजबूती की. यदि खिलाडि़यों में मानसिक मजबूती होगी तो फिर मजबूत से मजबूत टीमों को मात देने में भारतीय खिलाड़ी सक्षम हैं.

 

अथ: महामंत्री सत्यपाल महाराज उवाच : हिंसक वैदिक युग में लौटें

केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह ने एक बार फिर देश की जनता को अपना ज्ञान दिया है. पिछली बार सत्यपाल सिंह ने डार्विन के सिद्धांत को नकारते हुए कहा था कि हमारे पूर्वज बंदर नहीं थे, इंसान थे. इस बयान को ले कर मीडिया में उन की खूब छीछालेदर हुई.

अब फिर उन्होंने एक विवादित बयान दिया है.मंत्रीजी ने फरमाया है कि अगर हम चाहते हैं कि देश से आतंकवाद और अपराध का खात्मा हो जाए तो हमें वैदिक सभ्यता की ओर लौटना होगा.

दिल्ली में आर्य समाज द्वारा आयोजित 4 दिवसीय आर्य महासम्मेलन में सत्यपाल सिंह ने जनता को वैदिक युग में लौटने की सलाह देते हुए कहा कि आतंकवाद और अपराधों को वैदिक सभ्यता के मुताबिक चलने से मिटाया जा सकता है.

उन्होंने यह भी कहा कि जब अमेरिका के राष्ट्रपति शपथग्रहण करते हैं तो उन के हाथों में बाइबिल होती है. उसी तर्ज पर मैं यह उम्मीद रखता हूं कि आने वाले समय में जब हमारे देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री शपथ लेंगे तो उन के हाथों में वेद हों.

लगता है मंत्रीजी ने वेद पढ़ना तो दूर, देखे भी नहीं होंगे. वेद हिंदुओं के सब से पुराने धार्मिक ग्रंथ माने गए हैं. वेद पढ़ने वालों को पता है कि इन में हिंसा भरी पड़ी है. फिर भी कहा गया है कि वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति:.

यज्ञों में पशु हिंसा, शत्रुओं को मारने के लिए हिंसा करते हुए कहा गया है कि यह हिंसा वेदोक्त है, इसलिए इस में कोई दोष नहीं है.

अथर्ववेद में कहा गया है,

‘‘दह दर्भ सपत्नान् मे दम पृतनायत.
दह मे सर्वान् दुर्हार्दों दह मे द्विषतो मणे.’’

‘‘अर्थात हे दर्भ, मेरे शत्रुओं को जला डाल. मुझ पर सेना सहित आक्रमण करने वालों को जला डाल. मेरे सब अशुभ चिंतकों को जला डाल. हे मणि, मेरे सब दुश्मनों को जला डाल.’’

वेदों में हिंसा की वकालत

वेदों में लाखों मलेच्छों, कालों को मारने की बात कही गई है. इंसानों को ही नहीं, वेदों में पशुओं को मारने का वर्णन बाकायदा विधान सहित बताया गया है. इन में मांसाहार का वर्णन है, गायों को काटने का विवरण दिया गया है. यज्ञों में पशुबलि अनिवार्य थी.

वेदों में सिर्फ ब्राह्मण पर हिंसा को निषेध बताया गया है. लाखोंकरोड़ों विधर्मियों और कालों की हत्या के बेशुमार श्लोक रचे हुए हैं.

अथर्ववेद में लिखा है,

‘‘उग्रो राजा मन्यमानो ब्राह्मणं यो जिघत्सति,
परा तत् सिच्यते राष्ट्रं ब्राह्मणो यत्र जीयते.’’

‘‘अर्थात जो राजा अपनेआप को उग्र मानता हुआ ब्राह्मण की हत्या करता है और ब्राह्मण जिस राज्य में दुखी रहता है, वह राजा और राष्ट्र दोनों समाप्त हो जाते हैं.’’

‘‘तद् वै राष्ट्रमा स्त्रवति नावं भिन्नामिवोदकम्,
ब्रह्माणं यत्र हिंसतिं तद् राष्ट्रं हंति दुच्छुना.’’

अथर्ववेद-सूक्त 19,8

‘‘अर्थात जिस राष्ट्र में ब्राह्मण पर हिंसा होती है, उस राष्ट्र का ब्रह्मरूपी पाप उसे छेद वाली नौका के साथ डुबो देता है. ब्राह्मण पर डाली गई विपत्ति ही उस राष्ट्र को डुबो देती है.’’ ऋग्वेद में हिंसा की बातें भरी हुई हैं. एक जगह कहा गया है,

‘‘हे इंद्र, तुम ऐश्वर्यवान, शत्रुविजयी और शत्रुभयंकर हो. तुम ने अकेले ही वृत्र आदि राक्षसों का नाश किया है. तुम्हारा अश्वयुक्त रथ शत्रुओं की ओर बढ़े और वज्र शत्रुओं की ओर बढ़े और उन्हें मारे.’’

‘‘हे इंद्र, हम समीपवर्ती शत्रुओं का भयंकर शब्द सुन रहे हैं. तुम अपने संतापकारी वज्र का इन पर प्रयोग कर के इन्हें मारो. इन शत्रुओं को जड़ से समाप्त करो. इन्हें विशेषरूप से बाधा पहुंचाओ तथा पराजित करो. हे इंद्र, पहले राक्षसों को मारो. इस के बाद इस यज्ञ को पूरा करो.’’

आगे लिखा है, ‘‘हे अग्नि, जैसे शिकारी जाल फैलाता है, वैसे ही तुम भी अपना भयनाशक तेज फैलाओ. अपने तेज से तुम राक्षसों का नाश करो. हे अग्नि, तुम अपनी ज्वालाओं, चिनगारियों और उल्काओं को सब ओर फैलाओ और शत्रुओं को जलाओ.’’

कहने का अर्थ यह है कि दलितों, किसानों, वंचितों पर हिंसा होती है तो उसे हिंसा नहीं माना जाए क्योंकि यह शास्त्रोक्त है यानी सही है, नैतिक है, कानूनी है.

वेदों में तो हिंसा की वकालत है. वेदों के रास्ते पर चलने से अपराध और हिंसा कैसे रुक सकती है. ये बातें बेतुकी और तर्कविहीन हैं. यह सत्यपाल सिंह ही बता सकते हैं कि हिंसा को रोकने के लिए उन की क्या थ्योरी है.

देश के 3-4 प्रतिशत लोगों के अलावा सब वेदों, पुराणों, स्मृतियों के अनुसार पापी हैं और पिछले जन्मों के कर्मों का फल भुगत रहे हैं. इन्हें राष्ट्रपति के हाथ में दे कर सूई उलटी घुमाने की चेष्टा है.

रैस्तरां पर नियमों का बोझ

हमारे देश में सरकारी संस्थाओं के नियमों, कानूनों पर सब का बहुत विश्वास होता है. कुछ लोग किसी तरह की बेईमानी करें, सरकारी संस्थाएं तुरंत सभी पर नियमकानून लाद कर कह देंगी कि हम ने तो सुधार ला दिए. रैस्तरांओं में खराब खाना परोसे जाने की शिकायतों पर फूड सिक्योरिटी ऐंड स्टैंडर्ड्स अथौरिटी औफ इंडिया (एफएसएसआई) ने सुरक्षा कानून के नियमों में खासा बदलाव का काम किया है कि हर रैस्तरां को बोर्ड लगाना होगा कि खाने में कौन सा तेलमसाला इस्तेमाल हो रहा है.

यह कोरी मूर्खता है. लोग कहीं भी खाना दुकान के नाम से जा कर खाते हैं, बोर्ड पढ़ कर जाने वालों की संख्या कम ही होती है. महंगे रैस्तरांओं में सामान ठीकठाक ही होता है पर सस्तों में तो घटिया होगा ही. नए नियम के सहारे इंस्पैक्टरों को एक और बंदूक मिल जाएगी जिसे मालिक की कनपटी पर रख कर कुछ और वसूली करेंगे.

भोपाल जैसे शहर में 1,500 रजिस्टर्ड रैस्तरां हैं. अब नियम कहते हैं कि हर सप्ताह बदले नियमों से जांच होगी यानी कि रिश्वत के भरपूर मौके. ग्राहकों को निबटाने की जगह मालिक का ध्यान इंस्पैक्टरों को खुश करने में लगा रहेगा जो दलबल सहित रैस्तरां आएंगे.

जिस देश में सीबीआई पर भरोसा न हो, प्रधानमंत्री पर भरोसा न हो, वित्त मंत्री पर भरोसा न हो, वहां फूड इंस्पैक्टर पर भरोसा करना तो असंभव सा है. वैसे भी, खाना ऐसी चीज है जो जरा सा ध्यान बंटे, जरा सा मौसम खराब हो, जरा सा कारीगर का हाथ कमजोर हो, कच्चा सामान जरा सा ढीला हो, तो वह खराब हो सकता है. फूड इंस्पैक्टर खाना सुधारेगा नहीं, वह तो फाइन चार्ज करने, जेल भेजने की धमकी देगा.

सरकार को अगर ग्राहकों की बहुत चिंता है तो क्यों नहीं वह अपने रैस्तरांओं की लंबी चेन खोल देती? रेलों का खाना कैसा है, हम सब देख चुके हैं. सरकारी होटल बंद हो चुके हैं. वहां तो इंस्पैक्टर फटक भी नहीं सकते और पैसा बचाने की जल्दबाजी भी नहीं होती. तो फिर, खाना खराब क्यों? हर राज्य के भवन दूसरे राज्यों में बने हैं जहां कैंटीनें चलती हैं पर कहीं भी सरकार कैंटीन नहीं चलाती. फूड डिपार्टमैंट जांच करने की जगह खुद फूड सप्लाई कर के देखे, नानीदादी याद आ जाएंगी.

फूड एक बड़े व्यवसाय की तरह उभर रहा है, क्योंकि कामकाजी औरतों को सुविधा और छुआछूत की बंदिशों के हटने से बाहर खाने में ज्यादा आनंद आता है. सो, इन्हें सरकारी नियमों में न बांधें. मोटेतौर पर स्टार रेटिंग दे दो. जनता को बाकी काम खुद करने दो. हां, अगर हो सके तो शिकायतों के लिए दफ्तर खोल दो जहां कोई भी शिकायत दर्ज करा सके और दूसरों द्वारा की गई शिकायतों को देख सके. धंधे को काबू करने के लिए यही काफी होगा.

वीडियो न बनाएं, मदद के लिए हाथ बढ़ाएं

गुजरात के कच्छ में 14 जनवरी को एक बस ड्राइवर की लापरवाही से 9 युवकों की जानें चली गईं. ये सभी एक ही गांव के थे. वे रन उत्सव देखने के लिए कच्छ आए थे. सभी की उम्र 20-21 साल थी. एक युवक का तो फरवरी में विवाह होने वाला था. उन में 5 लड़के अपनेअपने मातापिता की एकलौती संतान थे. जब यह हादसा हुआ तब किसी ने उन्हें अस्पताल पहुंचाने की नहीं सोची, बल्कि लोग उन तड़पते युवकों का वीडियो जरूर बनाते रहे.

बीते साल 17 मई को इंदौर में एक सड़क हादसे में 2 युवक जिंदा जल गए लेकिन तमाशबीन लोग उन का वीडियो बनाते रहे. दोनों युवक मोटरसाइकिल पर जा रहे थे. तभी उन की टक्कर एक कार से हो गई जिस से मोटरसाइकिल में आग लग गई. हादसे के वक्त वहां लोगों की भीड़ जमा हो गई, पर किसी ने आग बुझाने की या घायलों को बचाने की कोशिश नहीं की. बस, तमाशा देखते रहे और वीडियो बनाते रहे.

दिल्ली में एक ठेले वाले को स्कौर्पियो ने टक्कर मार दी. घायल अवस्था में वह व्यक्ति सड़क पर खून से लथपथ पड़ा रहा, पर किसी ने उस की मदद नहीं की. बस, खड़ेखड़े तमाशा देखते रहे. एक शख्स तो उस का मोबाइल तक उठा कर चलता बना. जब तक पुलिस आई तब तक वह दम तोड़ चुका था. कहते हैं दिल्ली है दिल वालों की. मगर डेढ़ करोड़ की आबादी वाले दिल्ली शहर में शायद ही किसी के पास दिल है.

दिल्ली में एक अन्य दुर्घटना के बाद एक युवक सड़क पर लहूलुहान पड़ा मदद की गुहार लगाता रहा, मगर कोई उस की मदद के लिए आगे नहीं आया. हजारों लोग उस के सामने से गुजरे, पर किसी का दिल उस घायल युवक को देख कर नहीं पसीजा. आश्चर्य यह कि वहां पुलिस भी खड़ी थी, पर वह भी मदद के लिए आगे नहीं आई. आखिरकार उस की मौत हो गई. आखिर, क्यों लोग इतने पत्थर दिल होते जा रहे हैं?

बीते वर्ष मुंबई में 17 साल की अनन्या को एक बाइकसवार ने टक्कर मार दी. जब तक लोग उसे पकड़ पाते, वह फरार हो गया. अनन्या वहीं सड़क पर बेहोश पड़ी रही और लोग तमाशा देखते रहे. किसी ने यह भी नहीं सोचा कि कम से कम ऐंबुलैंस बुला दे, ताकि बच्ची की जान बच सके. इतना ही नहीं, किसी शख्स ने उस बेचारी बच्ची का मोबाइल तक चुरा लिया. खैर, एक मांबेटी ने उस की मदद की और उसे अस्पताल पहुंचाया, आखिर उस की जान बच गई.

यह देख कर बड़ी कोफ्त होती है कि हम कैसे देश में जी रहे हैं, जहां एक इंसान के दिल में दूसरे इंसान के लिए हमदर्दी नहीं है. ऐसे मौके पर मदद करने के बजाय लोग फोन चुरा कर भाग जाते हैं. उसी फोन से वह घायल की मदद कर सकता था. पर नहीं, फोन चुराना उसे ज्यादा सही लगा.

सोशल मीडिया पर अकसर ऐसे वीडियो वायरल होते रहते हैं. एक वीडियो में एक आदमी गरीब बच्चों को खाना, पानी की बोतल और टिशू पेपर बांट रहा है, तो कहीं एक अन्य वीडियो में कुछ आदमी एक औरत को डायन बता कर पीट रहे हैं और कोई उस का वीडियो बना रहा है. एक अन्य घटना में 2 लड़कियां बीच सड़क पर लड़ रही हैं, एकदूसरे के बाल खींच रही हैं और कोई उन का वीडियो बना रहा है.

मानवता के लिए

हमारे देश में काफी ज्यादा सड़क हादसे होते हैं और उन में लोगों की मौतें भी बहुत ज्यादा होती हैं. अफसोस इस बात का है कि ऐसे हादसों के दौरान लोगों की भीड़ तो जमा हो जाती है पर मदद के लिए कोई आगे नहीं आता.

सड़क पर कोई दुर्घटना हो या फिर राह में किसी महिला के साथ होने वाली कोई अनहोनी घटना या फिर पद के नशे में चूर किसी पुलिस वाले का किसी शरीफ इंसान का धकियाना, लोगों को इन बातों से कोई मतलब नहीं. मतलब तो उन्हें बस वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डालने से होता है. आखिर, क्यों लोग घायलों की मदद करने से कतराते हैं?

दरअसल, लोग पुलिस की झंझटों से बचना चाहते हैं. नोएडा में एक ऐसा ही वाकेआ हुआ. एक शख्स ने जब एक घायल आदमी को अस्पताल पहुंचाया तो पुलिस ने उसे ही पकड़ कर जेल में बंद कर दिया. पुलिस ने उस शख्स को ही गलत ठहराया, लेकिन जब सचाई सामने आई तो उसे छोड़ भी दिया. वह शख्स पूरी रात लौकअप में बंद रहा. यह तो पुलिस की लापरवाही है कि उस ने बिना जाने ही एक शरीफ व मददगार इंसान को जेल में बंद कर दिया. लेकिन इस का यह मतलब तो नहीं कि हम घायल की मदद न करने की ठान लें?

यह कहना गलत नहीं होगा कि आज लोगों की संवेदनाएं मरती जा रही हैं. लोग समाज के सभ्य नागरिक कहलाना तो पसंद करते हैं पर समाज के लिए कुछ करना नहीं चाहते. किसी को सड़क पर लहूलुहान और तड़पता देख लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता. लेकिन अगर वही सब सोशल मीडिया पर देखते हैं तो लाइक करने से खुद को रोक नहीं पाते, जैसे घायलों से उन्हें कितनी हमदर्दी है.

इस मुद्दे पर मनोचिकित्सक डा. शिवि जग्गी का कहना है, ‘‘लोगों में वीडियो बनाने का जो क्रेज है उसे सोशल मीडिया का इफैक्ट कहा जा सकता है. सोशल मीडिया का दखल आज हमारे जीवन में इतना ज्यादा बढ़ गया है कि हम पलपल की जानकारी इंटरनैट पर अपडेट करते रहते हैं. कुछ मामलों में इसे एक एडिक्शन कहा जा सकता है.

‘‘विदेशों में पब्लिक की मदद के लिए हैल्पलाइन नंबर होता है जहां फोन करने पर जल्द ही मदद मिल जाती है, लेकिन हमारे देश में ऐसा नहीं है. यहां अलगअलग सेवाओं के लिए अलगअलग नंबर होते हैं. जिन्हें याद रखना मुश्किल है और घबराहट में तो वैसे भी इंसान का दिमाग काम करना बंद कर देता है.’’

सामाजिक फर्ज भी निभाएं

भले ही कभी किसी घायल की मदद न की हो, उसे देख कर मुंह मोड़ लिया हो, पर जब वही सब सोशल मीडिया पर दिखाया जाता है, तो उसे बारबार देखते हैं. दोस्तों के साथ बैठ कर चर्चा भी करते हैं. दिखाते हैं कि उन्हें भी देशदुनिया की कितनी जानकारी है. पर जरा दिल से सोचिए, कहीं किसी रोज आप के साथ भी ऐसा ही कुछ हो गया और लोग आप की मदद को आगे न आए तो?

दुर्घटना कब, किस के साथ और कहां हो जाए, कहा नहीं जा सकता. सिर्फ वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर अपलोड कर देने से या देख कर लाइक कर देने से या फिर दोस्तों के साथ बैठ कर उस पर चर्चा करने से आप का फर्ज पूरा नहीं हो जाता.

एक मनोवैज्ञानिक के अनुसार, जब कोई ऐक्सिडैंट होता है, तो हम उसे देखने में बहुत रुचि दिखाते हैं, क्योंकि हमें लगता है कि जरूर ड्राइवर तेज गति से गाड़ी चला रहा होगा. हम तो इतनी तेज गाड़ी नहीं चलाते, इसलिए हमारे साथ ऐसा हादसा नहीं हो सकता.

एक पड़ताल के अनुसार, अगर हादसे में घायल व्यक्ति को शुरुआती 20-30 मिनट के भीतर उपचार मिल जाता है, तो उस की जान बचाई जा सकती है. इस तरह से साल में करीब 30-40 फीसदी लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सकता है. सरकार को ऐसी स्कीम बनानी चाहिए जिस में गाड़ीचालक के लिए फर्स्ट एड कोर्स अनिवार्य किया जाए ताकि जरूरत के वक्त वह किसी की मदद कर सके, साथ ही, आम जनता को हादसे में घायल की मदद के प्रति जागरूक करने के लिए कैंप लगाने चाहिए, ताकि वह सोशल मीडिया के बजाय व्यक्ति की जान को ज्यादा तवज्जुह दे.

जैसे सिक्के के दो पहलू होते हैं, उसी तरह वीडियो बनाने को भी पूरी तरह से गलत नहीं ठहरा सकते. इस से पता चलता है कि लोग जागरूक हैं और वक्त पड़ने पर वह वीडियो सुबूत के तौर पर काम भी आ सकता है. पर जागरूकता का यह मतलब नहीं है कि सिर्फ वीडियो बनाते रहें और घायल को तड़पता देखते रहें.

कमाई भी, शोहरत भी

आज गाना, डांस, कुकिंग और जाने क्याक्या वीडियो बना कर लोग इंटरनैट पर अपलोड करते हैं और उस से नाम, शोहरत और पैसे भी खूब कमा रहे हैं. इंटरनैट पर वीडियो बना कर डालना एक फैशन बन गया है और शौक भी. बिना लागत लगाए, कमाई का यह अच्छा जरिया है.

भारत में हर महीने 20 हजार यूट्यूब चैनल द्वारा 3 लाख से ज्यादा वीडियो अपलोड किए जाते हैं और एक लाख से ज्यादा नए सब्सक्राइबर बनते हैं. आज यूट्यूब पर कमाई कर के कितने ही लोग लखपति बन गए हैं.

हाल ही में चर्चा में आई प्रिया प्रकाश वरियर एक मलयालम अभिनेत्री हैं. वे रातोंरात सोशल मीडिया पर छा गईं. इन की प्रसिद्धि की वजह एक मलयाली फिल्म में एक गीत की 10 सैकंड की क्लिप है जो सोशल मीडिया पर खूब चली और वे लोकप्रिय हो गईं. प्रिया प्रकाश अपने गाने से सोशल मीडिया पर वायरल हुईं. फिलहाल, प्रिया के इंस्टाग्राम पर करीब 10 लाख फौलोअर्स हैं. अपनी फौलोअर्स की लगातार बढ़ती तादाद और लोकप्रियता के चलते प्रिया को हर सोशल मीडिया पोस्ट के बदले 8 लाख रुपए मिल रहे हैं.

भुवन बाम एक यूट्यूबर हैं. इन के यूट्यूब का नाम बीबी की वाइन्स है, जो अपनी कौमैडी के लिए प्रसिद्ध है. भुवन बाम की वीडियोज ज्यादातर भारत में देखी जाती हैं. इन की यूट्यूब की एक महीने की कमाई 7 लाख 75 हजार रुपए है और सालाना कमाई करीब 80 लाख रुपए है. ऐसे और कई जानेमाने लोग हैं जो यूट्यूब से खूब कमाई कर रहे हैं. इन में टैक्निकल गुरु गौरव चौधरी, आध्यात्मिक गुरु संदीप माहेश्वरी, पम्मी आंटी वगैरह शामिल हैं. यहां तक कि रामदेव के भी छोटेछोटे वीडियो देखे जा सकते हैं. ये सकारात्मक वीडियो हैं जिन से लोग प्रभावित तो होते ही हैं, साथ में कुछ अच्छा भी सीखते हैं.

हाल ही में नार्वे में एक घटना घटी जो काफी चर्चा में रही. वहां बच्चों के एक ग्रुप ने इंटरनैट पर एक आपत्तिजनक वीडियो शेयर कर दिया जो देश की सुरक्षा के लिए खतरा था. हालांकि फिर वह वीडियो डिलीट कर दिया गया और उन बच्चों को ढूंढ़ कर जांच भी बैठाई गई.

एक अध्ययन के अनुसार, सोशल मीडिया का उपयोग युवा और वयस्क लोग बड़े पैमाने पर करते हैं. कुछ पोस्ट की गई सामग्री या कंटैंट सही होता है और कुछ ऐसा होता है जो ठीक नहीं है. फ्लाईमाउथ विश्वविद्यालय द्वारा कराए गए एक शोध से यह बात सामने आई है कि युवा और वयस्क सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री पोस्ट करते हैं जिन में यौन या अप्रिय सामग्री शामिल होती है.

आने वाले समय में इंटरनैट और क्याक्या गुल खिलाएगा, यह तो वक्त ही बताएगा. हमें अपनी पीढ़ी को इंटरनैट के सही इस्तेमाल के बारे में बताना बहुत जरूरी है. हम सभी को चाहिए कि इंटरनैट, मोबाइल और नई तकनीक का इस्तेमाल समाज के हित के लिए करें, सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं. वीडियो बनाने के साथ हमें मानवीय जिम्मेदारी को भी निभाना चाहिए ताकि समाज में मानवता कायम रहे.

सतेंद्र सिंह लोहिया : दिहाड़ी मजदूरी से इंग्लिश चैनल तक का सफर

दिल्ली के तालकटोरा इंडोर स्टेडियम में परफैक्ट हैल्थमेले के मंच पर कई डाक्टर, पद्म विभूषण और पद्मश्री पुरस्कार विजेताओं के बीच व्हीलचेयर पर एक साधारण सा दिखने वाला व्यक्ति भी मौजूद था. मेरा ध्यान बारबार उस व्यक्ति पर जा रहा था कि आखिर यह है कौन जो इतनी बड़ीबड़ी हस्तियों के बीच बैठा है, तभी मंच संचालक ने उन का परिचय कराया कि ये सतेंद्र सिंह लोहिया हैं जो पैरों से विकलांग हैं लेकिन इन के हौसले इतने बुलंद हैं कि इन्होंने इंग्लिश चैनल पार कर नया कीर्तिमान रच डाला.

दरअसल, इसी वर्ष 24 जून को सतेंद्र इंगलिश चैनल को पार कर इतिहास रच चुके हैं. वे इस कीर्तिमान को रचने वाले  एशिया के पहले स्विमर और मध्य प्रदेश के पहले तैराक बन चुके हैं.

इंग्लिश चैनल अटलांटिक सागर का हिस्सा है, जो इंगलैंड को फ्रांस से अलग करता है और उत्तरी सागर को अटलांटिक से जोड़ता है. इसे तैर कर पार करने के लिए 35 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है.

प्रदेश के सब से बड़े खेल पुरस्कार विक्रम अवार्ड से पुरस्कृत सतेंद्र ने इस इंग्लिश चैनल को अपने 3 साथियों के साथ महज 12 घंटे 26 मिनट में पार कर लिया. इसी सिलसिले में सतेंद्र से विस्तृत बातचीत हुई.

सतेंद्र ने बताया, ‘‘मेरा बचपन काफी गरीबी में बीता. मध्य प्रदेश के जिला भिंड के गाता गांव में हम लोग रहते थे. मेरे पिता किसान थे. हमारी 15 बीघा के आसपास जमीन थी. खेतीबारी से ही हमारा घरखर्च चलता था. हम 4 भाई हैं. हम लोगों की पढ़ाईलिखाई के लिए पिताजी को कर्ज लेना पड़ा और पिताजी कर्ज में डूब गए. कर्ज को चुकाने के लिए पिताजी ने पुश्तैनी घर और जमीन को भी बेच दिया और फिर गांव छोड़ दिया.

‘‘पिताजी परिवार को ले कर ग्वालियर आ गए. वहां दिहाड़ीमजदूरी कर के बड़ी गरीबी में हम लोगों का पालनपोषण किया.

‘‘मैं ग्वालियर में ही लक्ष्मीबाई शारीरिक प्रशिक्षण संस्थान में डा. वी के डबास से मिला. मैं ने उन से रिक्वैस्ट की तो वे मान गए. फिर उन्होंने मेरी स्विमिंग देखी और कहा कि तुम्हें स्विमिंग अच्छी आती है. फिर मैं ने स्टेट लैवल पर स्विमिंग की और मैडल जीता.

‘‘वर्ष 2011 में हमारी आर्थिक स्थिति काफी खराब थी. ग्वालियर के तत्कालीन कलैक्टर पी नरहरि ने मेरी मदद की और ग्वालियर में ही रजिस्ट्रार औफिस में एलडीसी के पद पर मेरी नियुक्ति हो गई. लेकिन कैरियर बनाने के लिए मैं ने यह नौकरी छोड़ दी.’’

ऐसी स्थिति में आप ने स्विमिंग के लिए कैसे सोचा? पूछने पर वे कहते हैं, ‘‘जन्म के समय तो मैं स्वस्थ था पर पिताजी बताते हैं कि जब 16-17 दिन का हुआ तो काफी बीमार पड़ गया. पिताजी जब डाक्टर के पास ले गए तो वहां ग्लूकोज ड्रिप के रिएक्शन से मुझे अपने दोनों पैर खोने पड़े.

‘‘मैं जब कुछ बड़ा हुआ तो अपनी उम्र के बच्चों को नदी में तैरते देखता तो मेरे मन में भी तैरने की हसरत जागी. जब भी मैं नदी में नहाने जाता तो लोग तरहतरह की बातें बनाते. कोई मुझे कहता कि मंदिर में बैठो और ढोलक बजाओ, क्योंकि तुम से तो कुछ काम हो ही नहीं पाएगा. यह सुन कर मुझे बहुत बुरा लगता था लेकिन मैं ने इन बातों को दरकिनार कर अपनी प्रैक्टिस जारी रखी और धीरेधीरे तैरना सीख गया.

‘‘एक दिन अखबार में पढ़ा कि एक विदेशी जो खुद पैरों से विकलांग है, ने इंग्लिश चैनल पार किया. उसी दौरान मैं ने ठान लिया कि जब वह व्यक्ति पार कर सकता है तो मैं क्यों नहीं कर सकता? फिर पढ़ाई और स्विमिंग दोनों को जारी रखा. स्विमिंग की प्रैक्टिस के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे. मध्य प्रदेश के नामी बिल्डर दिलीप सिंह सूर्यवंशी जिन की बड़े लोगों में गिनती होती है, ने मुझे सिर्फ आर्थिक मदद ही नहीं दी बल्कि काफी प्रोत्साहित भी किया. रोहण मोरे, इंग्लिश चैनल पार कर चुके हैं, के अधीन पुणे में अपने खर्च से टैक्निकल प्रैक्टिस की.

‘‘हरियाणा के पूर्व राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी की मदद से मैं वर्ष 2016 में कनाडा जा पाया. उस के बाद भारत सरकार ने वर्ष 2017 में मुझे आस्ट्रेलिया इंटरनैशनल पैरालिंपिक स्विमिंग चैंपियनशिप में भाग लेने के लिए भेजा जिस में मुझे गोल्ड मैडल मिला.

‘‘मैं अनुसूचित जाति से हूं और विकलांग होने के बावजूद मैं ने आज अपना मुकाम हासिल किया है. लेकिन दुख होता है कि आज भी लोग छुआछूत को मानते हैं.

‘‘बचपन का एक किस्सा शेयर कर रहा हूं. जब मैं 8 वर्ष का था तो मेरे मातापिता कुएं से पानी निकालने गए थे. वहां देखा कि एक व्यक्ति पहले से ही पानी निकाल रहा था. पिताजी बालटी ले कर किनारे खड़े हो गए. जब वह व्यक्ति पानी निकाल कर चला गया तब पिताजी ने कुएं में बालटी डाली और पानी भरा. मैं ने घर आ कर पिताजी से पूछा कि आप इतनी देर खड़े क्यों रहे तो उन्होंने जवाब दिया कि बेटा उस समय हम पानी नहीं निकाल सकते थे, क्योंकि वह ऊंची जाति का व्यक्ति था. मुझे यह बात तब समझ नहीं आई थी पर वह बात आज भी मेरे जेहन में है जिस से मुझे दुख होता है कि हम आज भी कैसे समाज में रह रहे हैं. लेकिन विदेशों में ऐसा कोई जातिगत भेदभाव नहीं है. हम इंगलैंड गए तो वहां न ऊंचनीच, न ही जातिपांति का एहसास हुआ और न ही वहां इस तरह की मानसिकता वाले लोग मिले. वहां के लोगों ने मुझे मानवता के नाते सपोर्ट किया. ऐसी सोच वाले व्यक्ति हमारे समाज को प्रदूषित कर रहे हैं.

‘‘एक बात मुझे आज भी मेरे दिल में चुभती है. जब मैं कालेज में था तो एक लड़की से मेरी काफी घनिष्ठ दोस्ती थी. एक दिन उस से मैं ने कहा कि चलो, कहीं घूमने चलते हैं. तब मेरे पास तिपहिया स्कूटर था तो उस ने जवाब दिया कि घूमने और तुम्हारे साथ, लोग क्या कहेंगे. उस का जवाब सुन कर मैं दंग रह गया. मैं ने सोचा ऐसी दोस्ती का क्या फायदा. इस कारण मैं ने उस से दोस्ती तोड़ ली. आज उसे इस बात का मलाल जरूर होगा.

‘‘आज मैं जिस मुकाम पर हूं खुद अपनी मरजी से शादी कर सकता हूं. शादी एक ही जाति में नहीं होनी चाहिए. अंतरजातीय होनी चाहिए. एक जाति में होने का मतलब है कि आप एक घेरे में बंध गए. सामाजिक बंधन टूटने जरूरी हैं तभी समाज में नई सोच जागृत होगी.’’

सतेंद्र की जिंदगी और उपलब्धियां उन सामान्य लोगों के लिए भी मिसाल हैं, जो किसी न किसी कमी का रोना रोते रहते हैं.

कुछ इस तरह चमकाएं अपनी किचन की टाइल्स

किचन को साफ-सुथरा रखना एक कला हैं. कई लोग ऐसे होते हैं जो खाना बनाने के दौरान पूरे किचन को फैला देते हैं. वहीं कुछ ऐसे भी होते हैं जो पूरे व्यवस्थित तरीके से काम करते हैं.

इसी तरह कई लोग ऐसे होते हैं जो काम खत्म करने के साथ ही किचन को साफ कर लेते हैं पर कुछ ऐसे होते हैं जो ऊपरी सफाई तो कर देते हैं लेकिन टाइल्स और फर्श की सफाई छोड़ देते हैं. ऐसे में एक बात ध्यान रखना जरूरी है कि जो मेहनत आप आज बचा रही हैं उसके बदले आपको भविष्य में ज्यादा पसीना बहाना पड़ेगा. रोज-रोज सफाई करते रहने से गंदगी जमती नहीं है और किचन जल्दी साफ हो जाता है. किचन की सफाई को दो भागों में बांटकर आप अपने काम को आसान बना सकती हैं:

  • सिरका

2 कप सिरका और 2 कप पानी का मिश्रण बना कर एक साफ स्प्रे बोतल में डाल लें. इसे टाइल्स पर स्प्रे करें और एक माइक्रो फाइबर कपड़े की मदद से उसे साफ करें. माइक्रो फाइबर कपड़ा दूसरे कपड़े की तुलना में, गंदगी को अच्छे से सोख लेता है और इससे सतह पर खरोंच भी नहीं आती है.

  • ब्लीच या अमोनिया

यदि आपकी टाइल्स काफी गंदी हो चुकी है तो ब्लीच और पानी को सामान मात्रा में मिला लें. इस मिश्रण को सतह पर गोलाकार मुद्रा में लगाएं. अब टाइल्स को गर्म पानी से साफ़ कर लें. इसके बाद किसी सूखे कपड़े से इसे साफ कर लें. ब्लीच का इस्तेमाल करते वक्त दस्ताने जरूर पहनें.

  • रोज़ की सफाई

अपने किचन में रोज पोछा लगाएं. पोछे के पानी में डिटर्जेंट या एक कीटाणुनाशक का प्रयोग कर सकते हैं. यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि जिस कपड़े से आप पोछा लगा रही हैं वो गंदा न हो. इस्तेमाल के बाद उसे साफ भी करना जरूरी है.

  • बेकिंग सोडा

बेकिंग सोडा का इस्तेमाल करके आप आसानी से दाग से छुटकारा पा सकती हैं. बेकिंग सोडा और पानी का एक मोटा पेस्ट बना लें और उसे दाग पर लगा दें. 10-15 मिनट तक इसे सूखने दें और फिर गीले कपड़े से साफ़ कर लें. यदि यह दाग ज़िद्दी है, तो किसी पुराने टूथब्रश से साफ कर सकती हैं.

वजन कम करने के लिए करें घर के ये काम

वजन कम करना चाहते हैं तो डाइटिंग और जिम का चक्कर छोड़िए. घर के कुछ काम करने से आप वजन कम कर सकते हैं. घर के एसे कई काम होते हैं, जिन्हें करने से कैलोरी बर्न होती हैं. इनका फायदा व्यायान करने जैसा ही होता है और ये आपके शरीर से एक्स्ट्रा फैट कम कर सकते हैं.

आइए आपको बताते हैं कुछ ऐसे काम.

  • कुत्ता टहलाना

अगर आपके घर में कोई पालतू जानवर है तो आपके लिए कैलोरी बर्न करना कोई मुश्किल काम नहीं है. आप चाहें तो सुबह-शाम उसे टहलाने के बहाने सैर के लिए निकल सकते हैं. इससे भी वजन घटेगा.

  • बागवानी

बागवानी में पौधों को पानी देना, मिट्टी खोदना जैसे काम आते हैं. इससे हाथों की पूरी एक्सरसाइज होने के साथ ही अच्छे वर्कआउट का फायदा मिलता है. दरअसल, जिस मुद्रा में हम बागवानी करते हैं, उससे शरीर की मांसपेशि‍यों की अकड़न दूर होने के अलावा अच्छी स्ट्रेचिंग भी होती है.

  • फर्श साफ करना

पूरे घर के फर्श को साफ करना वजन घटाने का एक बेहतरीन उपाय साबित हो सकता है. अगर आपका पेट बाहर निकल आया है तो बैठकर पोंछा लगाना आपके लिए बहुत फायदेमंद रहेगा.

  • बर्तन धोना

बर्तन धोने के दौरान भी पूरा शरीर गतिशील रहता है. इस मामले में मेड पर आश्रित होने की बजाय खुद ही जूठे बर्तन धोएं. ऐसा करने से आपका शरीर गतिशील रहेगा और कैलोरी भी बर्न होगी. वहीं किचन भी ज्यादा साफ रहेगी.

हाथ से कपड़े धोना- मशीन छोड़ें और हाथ से कपड़े धोना शुरू करें. ऐसा करने से आपकी पूरी बांह की एक्सरसाइज हो जाएगी और आपको जिम जाने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी.

मूंग दाल स्क्रब से पाएं प्राकृतिक निखार

जब बात त्‍वचा की देखभाल से जुड़ी हो, तब घरेलू और प्राकृतिक चीजों का इस्‍तेमाल करने में ही भलाई है. यह न केवल त्‍वचा के लिए अच्‍छी और सुरक्षित है, बल्कि हमारे पैसे भी बचाती है. त्‍वचा को स्‍क्रब करने के लिए आप अपनी रसोई में रखी मूंग दाल का प्रयोग कर सकती हैं. इससे आपकी त्वचा पर प्राकृतिक निखार आएगा. आइये जानते हैं इसके बारे में –

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– यह मूंग दाल स्‍क्रब संवेदनशील त्‍वचा के लिए बहुत उपयोगी है. मूंग दाल को अच्‍छे से पीस कर पाउडर बना लें और उसमें थोड़ा सा शहद मिला कर अपनी गर्दन और चेहरे पर लगा लें. जब यह सूख जाए तब इसको कौटन से रगड़ कर छुडा लें और फिर नहा लें.

– आप चाहें तो मूंग दल के मिश्रण को घर के बने घी में मिला कर अपने शरीर पर मसाज कर सकती हैं. दाल के मिश्रण को नीचे से ऊपर की ओर पर मसाज करें. घी को त्‍वचा में लगाने से वह मुलायम और चमकदार बनती हैं, वहीं दाल से डेड स्‍किन साफ हो जाती है.

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– अगर आपको इसकी महक अच्छी न लग रही हो तो मिश्रण में थोड़ा गुलाब की पंखुड़ियां या फिर तुलसी की पत्‍तियों को पीस कर मिला दें. जब आप इस स्‍क्रब को शरीर पर लगाएगीं तो आपकी त्‍वचा निखर जाएगी और उसमें से सुंगध आने लगेगी.

हेयर रिमूविंग टिप्स : बिना हिचकिचाहट पाएं आकर्षक बौडी

अगर आपको कहीं बाहर जाना है और शौर्ट ड्रेस पहननी है तो जाहिर सी बात है कि आप हाथ व पैरो से हेयर को रिमूव करेंगी. हेयर रिमूव करने के लिए आप अक्‍सर वैक्‍सिंग का तरीका आजमाती हैं या शेविंग करती हैं. लेकिन हेयर रिमूव करते समय किस बात का ध्यान रखना आपके लिए बेहद जरूरी है आज हम आपको इसके बारें में बताएंगे.

आजमाएं यह तरीके

– वैक्‍सिंग करते समय इस बात का ध्‍यान रखें की वैक्‍स ज्‍यादा पुरानी न हुई हो. कंटेनर पर इसकी एक्‍सपायरी डेट जरुर देख लें तभी इस्‍तमाल करें.

– वैक्‍सी की स्‍ट्रिप डिस्‍पोजेबल होनी चाहिये. इसके अलावा कभी भी वैक्‍सिंग के लिए कपड़े का इस्‍तमाल न करें. साथ ही वैक्‍स ज्‍यादा गरम नहीं होनी चाहिये वरना त्‍वचा खराब हो सकती है.

– शेव करने से पहले अपनी त्‍वचा गीली कर लें. सूखी त्‍वचा, खतरनाक हो सकती है और इससे कटने, छिलने का डर भी होता है.

– एक अच्‍छा रेजर पसंद करना बहुत बड़ा काम हो सकता है. अपने दोस्‍तों से कहें कि वह आपको कोई अच्‍छा रेजर रिकम्‍मेंड करें, जिसकी ब्‍लेड आसानी से हेयर रिमूव कर सके.

– कभी भी पुराना ब्‍लेड या इस्तेमाल किया हुआ ब्‍लेड दुबारा प्रयोग में न लाएं. पुराने ब्‍लेड को इस्‍तमाल करने से आपकी त्‍वचा कट-छिल सकती है, जिससे संक्रमण आदि होने का खतरा होता है.

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– क्‍या आप जानती हैं कि पुरुषों और महिलाओं की शेविंग क्रीम सामान्‍य होती है. पर महिलाओं की शेविंग क्रीम ज्‍यादा महंगी होती है, इसलिए आप चाहें तो पुरुषों की शेविंग क्रीम भी इस्तेमाल कर सकती हैं.

– शेव करने से पहले पैरों को अच्‍छी तरह से स्‍क्रब कर लें, जिससे पोर्स खुल जाएं और शेव करने के बाद ब्‍लेड से पोर्स बंद न हों.

– शेव करने के बाद कभी भी मास्‍चराइजर का इस्‍तमाल करना न भूलें. शेव करने से आपकी त्वचा रूखी हो जाती है इसलिए क्रीम जरुर लगाएं.

पीहू : दो वर्ष की बच्ची का असाधारण अभिनय

एक दो साल की बच्ची पूरे दिन घर के अंदर अकेले हो, तो क्या क्या हो सकता है, इसकी कल्पना से ही दिल कांप उठता है. जब आप फिल्म ‘‘पीहू’’ में परदे पर दो साल की नन्ही सी बच्ची की हरकतों को देखते हैं, तो आप टकटकी लगाए दिल थामकर देखते रह जाते हैं. कई बार सांसे थम सी जाती हैं. कई बार हंसाती है, तो कई बार रुलाती भी है. जी हां! ‘‘मिस टनकपुर हाजिर हो’’ के बाद अब फिल्मकार विनोद कापड़ी एक दो साल के बच्ची के इर्द गिर्द घूमती बिना गीत संगीत वाली फिल्म ‘‘पीहू’’ लेकर आए हैं.

फिल्म की कहानी दो वर्ष की उम्र की लड़की पीहू (मायरा विश्वकर्मा) की है जो कि अपने घर में कैद होकर रह गयी है, घर से बाहर निकलने का उसके पास कोई रास्ता नहीं है. पीहू को लगता है कि उसकी मां उसके बगल में ही सो रही है. वह अपनी मां को जगाने की कोशिश करती है. कुछ देर बाद उसकी मां पूजा (प्रेरणा शर्मा) के हाथ से जहर की गोलियों की खुली शीशी के गिरने के साथ कुछ गोलियां बिखर जाती हैं, तब दर्शकों अहसास होता है कि पीहू की मां पूजा ने जहर की गोलियां खाकर आत्महत्या कर ली है.

पीहू के पिता गौरव सुबह ही कलकत्ता गए हैं और वह प्रेस का बटन बंद करना भूल गए हैं. वह बार बार बाहर से फोन करते रहते हैं. हर बार उनकी पत्नी पूजा की बजाय बेटी पीहू ही फोन उठाती है. गौरव  फोन पर अपनी पत्नी पूजा को सुनाते हुए जो कुछ कहते हैं, उससे यह पता चलता है कि रात में पीहू के जन्मदिन की पार्टी संपन्न हुई, जिसमें गौरव देर से पहुंचे. पूरी रात गौरव व पूजा में झगड़ा होता रहा. झगडे़ के केंद्र में पूजा की सहेली मीरा थी. पूजा को लगता है कि मीरा व गौरव के बीच अवैध संबंध हैं.

सच से अनजान पीहू मां को सोते हुए समझकर जगाती रहती है. सुबह से रात तक वह संडास करने से लेकर दूध पीने, भूख लगने पर मायक्रोवेव ओवन के अंदर पराठा को गरम करने, गैस स्टोव जलाकर पराठे को सेंकने, खेलने सहित हर काम करती है और तमाम घटनाक्रम ऐसे घटित होते रहते हैं, जिनसे दर्शकों की सांसे थम सी जाती हैं, यह सोचकर कि पीहू को कुछ हो न जाएं.

मसलन – प्रेस चालू है,धीरे धीरे धुंआ उठने लगा है, मायक्रोवेव ओवन में पराठा जलकर राख हो गया. गैस चूल्हे को जलाया, पर उसे बंद करने की बजाय जलते गैस पर रखी रोटी उठाने जा रही है, खुद को फ्रिज के अंदर बंद कर लेती है, बालकनी से गुड़िया के नीचे गिर जाने पर वह बालकनी से नीचे झांकती है और लगता है कि अब गिरी तब गिरी. तो वहीं बाथरूम में लगा गीजर अचानक फट जाता है. इलेक्ट्रिसिटी आ जा रही है. टीवी चल रहा है..वगैरह वगैरह..

Vinod Kapri

लेखक व निर्देशक विनोद कापड़ी ने एक बेहतरीन विषय उठाया, मगर वह इसे सही ढंग से परदे पर पेश नहीं कर पाए. यदि वह थोड़ा सा कहानी पर ध्यान देते, सामाजिक स्थितियों व रिश्तों पर ध्यान देते तो यह फिल्म और अधिक बेहतर बन सकती थी. पति पत्नी के बनते बिगड़ते रिश्ते व पति पत्नी के बीच अहंकार की लड़ाई का छोटे बच्चों पर क्या असर होता है, इसे पूरी तरह से उकेरने में यह फिल्म विफल रहती है. फिल्मकार का सारा ध्यान सिर्फ दो साल की बच्ची की हरकतों व मकान के अंदर मौजूद फ्रिज, फिनायल, इलेकिट्रक, वायर, प्रेस, गैस चूल्हा, बहुमंजली इमारत आदि उपकरणों के साथ घटनाक्रमों को बुनते हुए रोमांचक स्थित पैदा करने तक सीमित रही, जिससे दर्शक टकटकी लगाकर देखता रहे. फिल्म में कुछ सीन अविश्वसनीय लगते हैं. फिर भी फिल्म दर्शकों को भावनात्मक रूप से भी जोड़ती है.

पूरी फिल्म सिर्फ दो साल की बाल कलाकार मायरा विश्वर्मा के ही कंधों पर है. मां के किरदार में प्रेरणा शर्मा तो सिर्फ बिस्तर पर बेहोश सी लेटी ही नजर आती हैं. बाकी कोई किरदार परदे पर नजर नहीं आता. मगर मायरा अपनी मासूमियत से सब का न सिर्फ दिल जीत लेती है, बल्कि लोगों को डेढ़ घंटे तक बांधकर रखती है. उसका असाधारण अभिनय काबिले तारीफ है.

कैमरामैन योगेष जैनी की सराहना करनी ही पड़ेगी.

एक घंटे 32 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘पीहू’’ का निर्माण रौनी स्क्रूवाला, सिद्धार्थ राय कपूर और शिल्पा जिंदल ने किया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक विनोद कापड़ी, कैमरामैन योगेश जैनी, संगीतकार विशाल खुराना, कलाकार हैं – मायरा  विश्वकर्मा और प्रेरणा शर्मा.

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