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मंगलसूत्र बेच कर दी बेटे की सुपारी

सुबह के यही कोई साढ़े 9 बजे का समय था. मुंबई महानगर से सटे जनपद पालघर के उपनगर वसई जानकी पाड़ा की पहाडि़योंके बीच की खाई के पास काफी लोगों की भीड़ जमा थी. लोगों के जमा होने की वजह यह थी कि उस गहरी खाई में एक युवक की लाश पड़ी थी. मामला हत्या का लग रहा था, इसलिए किसी व्यक्ति ने इस की सूचना पालघर पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. यह क्षेत्र थाना वालिव के अंतर्गत आता था, इसलिए कंट्रोल रूम ने युवक की लाश की सूचना थाना वालिव के अलावा वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी दे दी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी संजय हजारे इंसपेक्टर डी.वी. वांदेकर और एसआई विनायक माने को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. घटनास्थल थाने से करीब 2 किलोमीटर की दूरी पर था. पुलिस 10 मिनट में मौके पर पहुंच गई. पुलिस ने खाई में उतर कर युवक की लाश पर सरसरी नजर डाली. उस की उम्र करीब 22 साल थी. वह जमीन पर औंधे मुंह पड़ा हुआ था, शरीर पर किसी धारदार हथियार के कई घाव थे. उस का गला भी काटा हुआ था.

थानाप्रभारी संजय हजारे टीम के साथ लाश का निरीक्षण कर ही रहे थे कि पालघर डिवीजन के एसपी मंजूनाथ सिंगे, एसडीपीओ दत्ता तोटेवाड़ फोरेंसिक टीम के साथ वहां पहुंच गए. फोरेंसिक टीम का काम खत्म होने के बाद पुलिस अधिकारियों ने मृतक के शव का निरीक्षण किया और थानाप्रभारी को दिशानिर्देश दे कर लौट गए.

थानाप्रभारी संजय हजारे ने शव को खाई से बाहर निकलवाया और वहां भीड़ से उस की शिनाख्त करने को कहा. लेकिन भीड़ में ऐसा कोई नहीं था जो मृतक को पहचान पाता. इस से यह बात साफ हो गई कि मृतक उस जगह या उस इलाके का रहने वाला नहीं था.

प्राथमिक काररवाई के बाद पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए पालघर जिला अस्पताल भेज दिया. यह 21 अगस्त, 2017 की बात है. थाने लौटने के बाद थानाप्रभारी संजय हजारे ने इस केस के बारे में अपने सहायकों के साथ विचारविमर्श किया और जांच की जिम्मेदारी इंसपेक्टर डी.वी. वांदेकर को सौंप दी.

डी.वी. वांदेकर ने मामले की तह तक जाने के लिए एक पुलिस टीम बनाई, जिस में उन्होंने एसआई विनायक माने और कुछ सिपाहियों को टीम में शामिल किया. पुलिस के सामने सब से बड़ी समस्या लाश की शिनाख्त की थी, क्योंकि शिनाख्त के बाद ही आगे की कडि़यां जुड़ सकती थीं.

शिनाख्त के लिए पुलिस ने वायरलैस से जिले के सभी पुलिस थानों को मृतक का हुलिया भेज कर यह पता लगाने की कोशिश की कि किसी पुलिस थाने में उस हुलिए के युवक की गुमशुदगी तो नहीं दर्ज है.

पुलिस टीम को पूरी आशा थी कि किसी न किसी पुलिस थाने में मृतक के लापता होने की शिकायत जरूर दर्ज होगी. लेकिन पुलिस टीम की यह उम्मीद विफल हो गई.

किसी भी थाने में मृतक के हुलिए से मिलतेजुलते किसी युवक की गुमशुदगी की सूचना दर्ज नहीं थी. लेकिन इस से पुलिस टीम निराश नहीं हुई. टीम ने लाश के फोटो वाले पैंफ्लेट छपवा कर जिले के सभी रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और सार्वजनिक स्थानों पर लगवा दिए.

इस के अलावा पुलिस ने सोशल मीडिया और प्रिंट मीडिया का सहारा ले कर मृतक की शिनाख्त की अपील की. लेकिन इस से भी कामयाबी नहीं मिली. जैसेजैसे समय गुजर रहा था, वैसेवैसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का दबाव बढ़ता जा रहा था.

तमाम कोशिशों के बावजूद पुलिस के हाथ खाली थे. 15 दिसंबर को पुलिस को अचानक एक गुप्त सूचना मिली. इस सूचना पर काम किया गया तो सफलता मिलती गई. पुलिस को सूचना मिली कि जिस युवक की हत्या हुई थी, उस युवक का नाम रामचरण द्विवेदी है.

वह उसी दिन से गायब है, जिस दिन खाई में अज्ञात लाश मिली थी. सूचना में यह भी बताया गया कि रामचरण उपनगर भायंदर के गणेश देवल नगर में रहने वाले रामदास द्विवेदी का बेटा है.

सूचना मिलने के बाद पुलिस ने रामदास और उस के परिवार वालों को थाने बुला लिया. उन्हें जब लाश के फोटो और कपड़े दिखाए गए तो वे फोटो और कपड़ों को देखते ही दहाड़ मार कर रोने लगे. रामदास ने बताया कि यह उस का बेटा रामचरण है.

पुलिस ने रामदास द्विवेदी से उस के बेटे के बारे में पूछताछ की तो उस ने बस इतना ही बताया कि रामचरण का चालचलन ठीक नहीं था. वह आवारा किस्म का युवक था. ड्रग्स के अलावा वह शराब और शबाब का भी आदी था. औरत उस की खास कमजोरी थी, जिस की वजह से इलाके के कई लोगों से उस की दुश्मनी हो गई थी.

प्रारंभिक पूछताछ करने के बाद पुलिस ने रामचरण द्विवेदी और उन के परिवार को घर भेज दिया. शव की शिनाख्त हो जाने के बाद पुलिस टीम का सिरदर्द आधा हो गया था. अब उन्हें यकीन हो गया था कि हत्या की गुत्थी जल्दी ही सुलझ जाएगी.

पुलिस टीम ने मुखबिरों के जरिए जब मृतक रामचरण का इतिहास खंगाला तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए. इस के बाद पुलिस गणेश देवल नगर पहुंची. पुलिस ने वहां के लोगों से पूछताछ की तो संदेह की सुई रामचरण द्विवेदी के घर वालों की तरफ ही घूम गई.

पुलिस ने रामचरण के घर वालों को फिर से थाने में बुला कर पूछताछ की तो वे पुलिस के सवालों के बीच उलझ कर रह गए. उन के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि उन्होंने रामचरण के गायब होने की शिकायत स्थानीय पुलिस थाने में क्यों नहीं दर्ज कराई. पुलिस समझ गई कि दाल में जरूर ही कुछ काला है. लिहाजा जब उन से सख्ती से पूछताछ की गई तो रामदास ने सच उगल दिया. उस ने बताया कि उस के सामने ऐसे हालात बन गए थे कि उसे अपने ही बेटे की हत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा. चूंकि उस से विस्तृत पूछताछ करनी थी, इसलिए पुलिस ने उसे वसई कोर्ट के मैट्रोपोलिटन मजिस्टै्रट के यहां पेश कर के एक सप्ताह के रिमांड पर ले लिया.

रिमांड के दौरान रामदास और उन की पत्नी रजनी ने अपने ही बेटे की हत्या करने की जो कहानी बताई वह पारिवारिक रिश्तों को तारतार कर देने वाली निकली.

रामदास द्विवेदी मुंबई के उपनगर भायंदर (वेस्ट) में अपने परिवार के साथ रहता था. परिवार में उस की पत्नी रजनी के अलावा 2 बेटे थे. बड़े बेटे का नाम सीताराम और छोटे का नाम रामचरण था. बड़े बेटे की शादी हो चुकी थी. छोटा बेटा रामचरण भी शादी के लायक हो गया था. लेकिन उस का आचरण ठीक नहीं होने के कारण उस के लिए कोई रिश्ता नहीं आ रहा था.

रामदास द्विवेदी मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला जौनपुर के मछली शहर का रहने वाला था. उस के पिता रामचंद्र द्विवेदी कथावाचक ब्राह्मण थे. गांव, समाज और बिरादरी में उन की काफी इज्जत थी. लेकिन उन के घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. पूजापाठ में इतनी कमाई नहीं थी कि घर का खर्च सुचारू रूप से चल सके. घर की परेशानियों की वजह से रामदास द्विवेदी रोजीरोटी की तलाश में मुंबई चला आया था.

मुंबई के भायंदर इलाके में उस के गांव के कई लोग रहते थे. उन के सहयोग से रामदास को कोई अच्छी नौकरी तो नहीं मिली, उसी इलाके की एक इमारत में चौकीदारी की नौकरी जरूर मिल गई. हालांकि चौकीदारी में इतनी कमाई नहीं थी. लेकिन रामदास मेहनती इंसान था.

वह लोगों की कारों की धुलाई और साफसफाई कर के इतना कमा लेता था कि घरपरिवार का काम चल सके. धीरेधीरे पैसे जमा कर के उस ने अपना एक झोपड़ा खरीद लिया था. अपने खर्चे के बाद जो पैसा बचता, उसे वह गांव भेज देता था. इस से परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक होने लगी थी. इसी दौरान बनारस की रहने वाली लक्ष्मी से उस की शादी हो गई.

शादी के बाद रामदास ने कुछ दिनों तक अपनी पत्नी को मांबाप की सेवा में छोड़ा. उस के बाद वह पत्नी को ले कर मुंबई चला आया.

समय के साथसाथ लक्ष्मी सीताराम और रामचरण 2 बच्चों की मां बन गई थी. रामचरण चूंकि छोटा था, इसलिए सभी उसे बहुत प्यार करते थे. उस समय उन्हें यह नहीं पता था कि यही लाड़प्यार एक दिन उन के पूरे परिवार को समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ेगा.

परिवार के लाड़प्यार ने रामचरण को इस कदर बिगाड़ दिया कि बाद में उसे संभालना मुश्किल हो गया. स्कूल में उस का मन पढ़ाईलिखाई में कम मटरगश्ती में ज्यादा लगता था. घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वह अपने बड़े बेटे सीताराम को अधिक पढ़ालिखा नहीं पाए थे. लेकिन रामचरण से उन्हें काफी उम्मीदें थीं.

मगर घर वालों का यह सपना सपना ही रह गया. कहने के लिए तो वह स्कूल जाता था लेकिन पढ़ाई के नाम पर वह आवारा बच्चों के साथ घूमता था जो अपने ही घरों से चोरी कर के लाए पैसों का गलत इस्तेमाल करते थे. छोटी सी उम्र में ही रामचरण ड्रग्स, चरस, शराब और शबाब के चक्कर में पड़ गया.

शुरू में रामदास द्विवेदी और घर वालों को रामचरण की इस कमजोरी के बारे में पता नहीं चला और जब पता चला तब तक काफी देर हो चुकी थी. रामचरण नशे के उस मुकाम पर पहुंच गया था, जहां से लौटना मुश्किल था. वह जिस बस्ती और इलाके में रहता था, वहां के लोगों के लिए वह सिर दर्द बन गया था. मारपीट, राहजनी और अय्याशी के शौक में वह पूरी तरह जकड़ चुका था.

मोहल्ले की कोई भी लड़की या औरत रास्ते में उस के सामने आने तक से डरती थी. अपनी बस्ती और इलाके की कई औरतों को वह अपनी हवस का शिकार बना चुका था. अपनी धौंस और डर दिखा कर रामचरण कई औरतों का यौनशोषण कर चुका था.

इज्जत और समाज में बदनामी होने के डर से कोई उस के खिलाफ पुलिस में नहीं जाता था. इस से उस का हौसला इतना बढ़ गया था कि ड्रग्स के नशे में उस ने अपने घर को भी नहीं छोड़ा. पहले उस ने अपनी भाभी के साथ रेप किया और इस के बाद अपनी मां की इज्जत भी तारतार कर डाली थी.

रामचरण इंसान से जानवर बन गया था. मां ने जिस बेटे को जन्म दिया, वही बेटा एक दिन उस के साथ ही रेप कर बैठेगा, यह बात लक्ष्मी ने सपने में भी नहीं सोची थी.

एक जानवर में और रामचरण में अब कोई फर्क नहीं रह गया था. कहावत है कि जब कोई आदमी जानवर बन जाए और फिर आदमखोर हो जाए तो उसे मार देना ही एक रास्ता होता है.

यही सोच कर लक्ष्मी ने रामचरण के लिए एक खतरनाक फैसला ले लिया. बेटे के कृत्य की वजह से वह बड़ी ही शर्मिंदगी महसूस कर रही थी. एक तरह से वह घुटघुट कर जी रही थी. अपने खतरनाक फैसले में अपने पति रामदास द्विवेदी, बेटे सीताराम द्विवेदी और बहू को भी शामिल कर लिया. यह काम उन में से किसी के भी बस का नहीं था, लिहाजा वह किराए के हत्यारे को तलाशने लगे.

इस तलाश में लक्ष्मी और उस के पति को अपने ही इलाके में रहने वाले अपराधी प्रवृत्ति के केशव मिस्त्री की याद आई. केशव मिस्त्री वसई के जानकीपाड़ा में रहता था और राजगीर का काम करता था. कभीकभार वह लक्ष्मी और उन के परिवार से मिलनेजुलने आया करता था.

इस मामले में लक्ष्मी और उस के पति, बेटे और बहू ने केशव मिस्त्री से मिल कर जब सारी बातें बता कर अपनी योजना बताई तो वह रामचरण को मारने के लिए तैयार हो गया. उस ने इस काम के लिए एक लाख रुपए की मांग की. लक्ष्मी इतना पैसा देने की स्थिति में नहीं थी. उस ने अपनी मजबूरी बताई तो मामला 50 हजार रुपए में तय हो गया.

लक्ष्मी के पास 50 हजार रुपए भी नहीं थे उस के पास शादी का मंगलसूत्र था. बेटे को मरवाने के लिए उस ने अपना मंगलसूत्र तक बेच कर केशव मिस्त्री को पैसे दे दिए. पैसे मिलने के बाद केशव मिस्त्री ने इस काम को अंजाम देने के लिए अपने दोस्त राकेश यादव को तैयार कर लिया.

योजना के अनुसार 20 अगस्त, 2017 को केशव मिस्त्री और राकेश यादव लक्ष्मी के घर आए और रामचरण द्विवेदी को शराब और शबाब की पार्टी के बहाने अपने साथ लाए टैंपो में बैठा कर जानकीपाड़ा की खाई के पास ले गए और उसे टैंपो से उतार कर उस के गले और शरीर पर गंड़ासे से वार कर के अधमरा कर दिया. फिर उन्होंने उस की गरदन काट कर उसे खाई में फेंक दिया.

पुलिस ने गिरफ्तार रामदास द्विवेदी, उस की पत्नी लक्ष्मी द्विवेदी, बेटे सीताराम द्विवेदी और बहू के बयान दर्ज किए. तत्पश्चात उसे न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया. जब पुलिस टीम केशव मिस्त्री और राकेश यादव के घर पहुंची तो पता चला कि वे दोनों घटना को अंजाम देने के बाद अपने गांव उत्तर प्रदेश चले गए.

यह जानकारी मिलते ही थानाप्रभारी संजय हजारे ने एसआई विनायक माने को एक पुलिस टीम के साथ उत्तर प्रदेश के लिए रवाना कर दिया, जहां उन्होंने केशव मिस्त्री और राकेश यादव को गिरफ्तार कर लिया और मुंबई ले आए थे. पुलिस ने दोनों आरोपियों से भी विस्तार से पूछताछ के बाद उन्हें कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

-कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. लक्ष्मी परिवर्तित नाम है.

 

विश्व रैंकिंग में फिसले भारतीय सुपर कंप्यूटर

हम अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए लैपटौप और स्मार्टफोन का भले ही इस्तेमाल करते हों लेकिन जब बात दुनिया की जरूरत की आती है या कहें कि जब करोड़ों लोगों की जरूरत को कोई एक कंप्यूटर पूरा करे तो वह सुपर कंप्यूटर बन जाता है. सुपर कंप्यूटर एक ऐसा कम्प्यूटर है जो आम जरूरतों को पूरा करने वाले किसी भी कंप्यूटर से हजारों, लाखों गुना ज्यादा क्षमता और स्पीड वाला होता है.

गूगल से ले कर फेसबुक और यूट्यूब से ले कर ट्विटर तक सभी सर्विसेज़ आज पूरी दुनिया की धडकनों में बसती हैं. आप को यह मालूम होना चाहिए कि एकसाथ करोड़ों लोगों को दी जाने वाली ये डिजिटल सर्विसेज किसी छोटेमोटे कम्प्यूटर से नहीं, बल्कि सुपरकम्प्यूटर से औपरेट होती हैं.

टौप 500 सुपरकम्प्यूटरों की सूची के टौप 100 में शामिल रहे 2 भारतीय सुपरकम्प्यूटरों की रैंकिंग ताज़ा सूची में नीचे आ गई है. वहीँ, इस बार भारत के 4 सुपर कम्प्यूटर ही टौप 500 में जगह बना सके, जबकि पिछली सूची में इन की तादाद थी.

भारत के सब से तेज प्रदर्शन वाले कंप्यूटर ‘प्रत्यूष’ की स्थिति जून के 39 से घट कर अब 45वें नंबर पर आ गई है. प्रत्यूष को पुणे स्थित इंडियन इंस्टिट्यूट औफ़ ट्रौपिकल मीटियोरोलोजी (आईआईटीएम) में इनस्टौल किया गया है.

वहीँ, नौएडा स्थित नेशनल सेंटर फौर मीडिया एंड वेदर फोरकास्टिंग (एनएसएमडब्लूएफ) में इनस्टौल किए गए सुपरकम्प्यूटर ‘मिहिर’ की रैंकिंग 66 से घट कर 73 पर आ गई.

आईआईटीएम के अनुसार, प्रत्यूष दुनिया में वेदर एंड क्लाइमेट यानी मौसम और जलवायु रिसर्च के काम में लगाया गया चौथा सब से तेज सुपरकम्प्यूटर है.

अर्थ साइंसेज मिनिस्ट्री यानी भू विज्ञान मंत्रालय के एक उच्च अधिकारी का कहना है, ‘हम ने देश में अपनी वेदर और क्लाइमेट सर्विसेज को सपोर्ट देने के लिए ये सिस्टम खरीदे थे. इस कम्प्यूटर सिस्टम के ज़रिए हम वेदर और क्लाइमेट सर्विसेज में कई सुधार कर सकते हैं. हम साल 2021 तक इस सिस्टम को और अपग्रेड करेंगे. ’

सुपरकम्प्यूटरों से मानसून, मौसम की प्रतिकूल स्थितियों, साइक्लोन और भूकंप का अनुमान लगाने में मदद मिलती है. एयर क्वालिटी, लाइटनिंग, फिशिंग आदि के बारे में भी ये उपयोगी होते हैं. टौप 500सुपरकम्प्यूटरों की सूची में 2 और भारतीय प्रविष्टियों में एक, सोफ्ट्वेयर कम्पनी में लगाई गई लेनोवो की मशीन 338वें नंबर पर और दूसरी सुपरकम्प्यूटर एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर की एक मशीन 486वें स्थान पर रही. यह टौप 500 सूची का 52वां संस्करण था.

टौप 500 सुपरकम्प्यूटर की ताज़ा सूची में यूएस डिपार्टमेंट एंड एनर्जी सुपरकम्प्यूटर्स के 5 सुपरकम्प्यूटर टौप 10 पोजीशंस में रहे. इन में ओक रिज नेशनल लेबोरेटरी का समिट और लौरेंस लिवरमोर नेशनल लेबोरेटरी का सिएरा शामिल हैं.

उधर, चीन के 2 सुपरकम्प्यूटरों के अलावा स्विट्ज़रलैंड, जापान और जर्मनी की एकएक मशीनें टौप 10में हैं.

मालूम हो कि वर्ष 2015 में भारत ने नेशनल सुपरकम्प्यूटर मिशन का एलान किया था. इस का मकसद देश में विभिन्न शैक्षिक और वैज्ञानिक संस्थानों में 70 से ज्यादा सुपरकम्प्यूटर लगाना है. इन में से पहली 1. 34 पेटाफ्लौप मशीन इस साल के आखिर तक आईआईटी खड़गपुर में लगाए जाने की संभावना है.

ड्रेसिंग टेबल लेने से पहले कुछ खास बातों का रखें ध्यान

जब आप अपने घर के लिए ड्रेसिंग टेबल लेना चाहते हैं तो इसके पहले आपको सोचने की काफी आवश्‍यकता है, क्योंकि फर्नीचर की सामग्री, लंबाई-चौड़ाई और स्‍टोरेज स्‍पेस कैसा होगा, इस बात पर ध्‍यान देना होगा.

आइए हम बताते हैं ड्रेसिंग टेबल लेते समय क्या-क्या सावधानियां बरतने की जरुरत है.

ड्रेसिंग टेबल सामग्री- आज कल बाजार में शीशे और स्‍टोंस से बने ड्रेसिंग टेबल काफी प्रचलन में हैं पर वहीं पर लकड़ी और मेटल के बने हुए ड्रेसिंग टेबल ज्‍यादा टिकाऊ और कम बजट के होते हैं. वहीं पर मारबल और ग्‍लास के बने ड्रेसिंग टेबल काफी भारी और महंगे होते हैं. साथ ही इनको हिला पाना भी काफी मुश्‍किल होता है.

कुर्सी के साथ ड्रेसिंग टेबल- आज कल मार्केट में बिना कुर्सी के भी ड्रेसिंग टेबल उपलब्‍ध है पर अच्‍छा होगा कि आप हमेशा कुर्सी के साथ ही ड्रेसिंग टेबल लें. यह कुर्सी कई प्रकार की हो सकती है, जैसे केवल एक स्‍टूल या फिर कुषन के साथ भी अगर आपको एक भव्‍य लुक चाहिए तो आप एक बड़े से ड्रेसिंग टेबल के साथ एक भारी भरकम कुर्सी खरीद सकती हैं.

रखने की जगह- ड्रेसिंग टेबल की सबसे बढिया जगह है खिड़की के पास जिससे कि प्राकृतिक रौशनी में आप खुद को ढ़ग से देख सकें. वहीं पर अगर आप इसके पास बफैट लैंप या टेबल लैंप रखेगीं तो रौशनी का मज़ा और भी दोगुना हो जाएगा.

ड्रेसिंग टेबल और लाइट का प्रयोग- तैयार होने के लिए एक लाइट का होना बहुत जरुरी है. एक छोटी सी लाइट जो कि मिरर के कोने में लगी हो सकती है, आपको पूरी रौशनी देगी.

किचन का काम करना चाहती हैं आसान, तो करें ये काम

अगर आपका किचन साफ हो तो पूरे परिवार की सेहत अच्‍छी रहती है. किचन को साफ रखने के कुछ तरीके हैं जिसे आपको रोज़ अपनाना चाहिए. खाना बनाने के बाद किचन साफ करना बहुत ज़रूरी होता है. सब्ज़ी काटने के बाद उसके छिल्के कूड़े में डालने से आप कई तरह की परेशानियों से बच सकती हैं.

घरेलू और प्राकृतिक चीज़ों जैसे नींबू का रस और बेकिंग सोडा से रसोई को बड़ी आसानी से साफ किया जा सकता है. ये बहुत महंगी भी नहीं होती है और बजट में आसानी से मार्किट में मिल भी जाती है.

आइए बताते हैं आपको किचन को साफ-सुथरा रखने के लिए किन बातों का ध्‍यान देना चाहिए-

  • गैस स्‍टोव साफ करना गैस स्‍टोव को भी रोज़ साफ करने की ज़रूरत होती है. अगर खाना पकाने के दौरान स्‍टोव पर कुछ गिर गया है तो उसे तुरंत साफ कर दें. इससे स्टोव पर खाने के दाग नहीं पड़ेंगे.
  • किचन स्‍लैब की सफाई रसोर्इ में खाना पकाने के बाद किचन स्‍लैब को ज़रूर साफ करें. इसके लिए एक मुलायम कपड़े और घरेलू डिटर्जेंट का इस्‍तेमाल करें जैसे कि नींबू का रस. इससे स्‍लैब पर पड़े दाग और बदबू आसानी से चली जाती है.
  • माइक्रोवेव की सफाई जितना जल्‍दी हो सके माइक्रोवेव को साफ करते रहें. इससे माइक्रो‍वेव पर चिपचिप नहीं होती है और उससे तेल के दाग भी निकल जाते हैं. मुलायम कपड़े में बेकिंग सोड़ा और नमक डालकर माइक्रोवेव को साफ करें.
  • सिंक साफ करें खाने के बाद ज़रा सा सेंधा नमक सिंक में डाल दें. नमक के ऊपर काला सिरका भी डालें और ब्रश की मदद से सिंक को साफ करें. विनेगर से सिंक की सारी बदबू चली जाएगी और दाग भी मिट जाएंगे. बर्तनों की सफाई गंदे और झूठे बर्तनों को रातभर सिंक में पड़े नहीं रहने देना चाहिए. इससे बर्तन भी खराब होते हैं. इस्‍तेमाल करने के तुरंत बाद बर्तनों को धो लें.

कुछ दिनों के लिए ही सही, पर आए तो अच्छे दिन

मध्यप्रदेश में कोई 30 बागी दोनों प्रमुख दलों भाजपा और कांग्रेस से मैदान में हैं, इनमे से 20 के लगभग सत्तारूढ़ दल भाजपा के हैं इनमें से भी कुछ चेहरे ऐसे हैं जो कभी पार्टी छोड़ने की बात सोच भी नहीं सकते थे, मसलन बुंदेलखंड इलाके के बुजुर्ग कद्दावर नेता डाक्टर रामकृष्ण कुसमारिया, सरताज सिंह, केएल अग्रवाल और बेरसिया सीट से निर्दलीय लड़ रहे ब्रह्मानन्द रत्नाकर जैसे 2 दर्जन नेता, जिन्होंने टिकिट न मिलने पर पार्टी छोड़ दी और अब पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार को हराने दिन रात एक कर रहे हैं.

वैसे तो हर चुनाव में बागी समीकरण गड़बड़ाते हैं लेकिन 2018 का मध्यप्रदेश विधानसभा का चुनाव इसलिए भी याद किया जाएगा कि इसमें बागियों की भरमार है. किसी दल के बागी ने अपनी महत्वाकांक्षाओं के आगे पार्टी के अनुशासन और साख की परवाह नहीं की है. ये वही नेता हैं जो कल तक पार्टी के प्रति निष्ठा और आस्था का राग अलापते थकते नहीं थे. अब इस आस्था और निष्ठा के चिथड़े भी चुनाव में यही लोग उड़ा रहे हैं तो साफ लगता है कि राजनीति अब शुद्ध कारोबार बन चुकी है जिसमें हर कोई अपना नफा नुकसान देख आगे का कदम उठाता है.

इनसे तो ये बेहतर

मुमकिन है बागियों के साथ वाकई ज्यादती हुई हो जिससे दुखी होकर वे पार्टी के प्रति आस्था निष्ठा भूल चुके हों, लेकिन इनसे तो वे अस्थाई कार्यकर्ता बेहतर साबित हो रहे हैं जो दिहाड़ी पर पार्टी का झण्डा उठाकर रैलियों और जनसभाओं में भीड़ बढ़ा रहे हैं. जी हां राजधानी भोपाल सहित बड़े शहरों इंदौर, जबलपुर, रीवा, सतना, उज्जैन और ग्वालियर में इन दिनों कोई बेरोजगार नहीं है. दोनों प्रमुख दलों ने तीन सौ रुपये रोज पर कार्यकर्ताओं की भर्ती कर रखी है, काम भी कठिन नहीं बस पार्टी का झण्डा हाथ में लहराते सभाओं और रैलियों में शिरकत करना है. अधिकांश शहरों में इन कार्यकर्ताओं की एडवांस बुकिंग हो चुकी है. कई जगह तो मासिक वेतन पर कार्यकर्ताओं की भर्ती की गई है.

बात सिर्फ इतनी सी है कि वह जमाना लदे ही एक जमाना गुजर चुका है जब रैली या सभा में पार्टी के कार्यकर्ता हाथ में झण्डा उठाए अपने नेता की जय जय कार से आसमान गुंजा देते थे. अब किसी पार्टी के पास ऐसे कार्यकर्ता नहीं हैं जो बिना किसी लाज शर्म के भीड़ का हिस्सा बन जाते हों. सभी पार्टियां कार्यकर्ताओं की कमी से जूझ रहीं हैं, जिसकी भरपाई के लिए किराए की भीड़ जुटाई जा रही है. इस बाबत युवाओं, औरतों, छात्रों, मजदूरों सहित हर उस आदमी को तीन सौ रुपये रोज दिये जा रहे हैं जो हाथ में झण्डा उठाकर रैली और सभा में चलने तैयार हो.

हालत तो यह है कि इन अस्थायी कार्यकर्ताओं का भी टोटा पड़ने लगा है. सूबे में अब बड़े नेताओं के दौरे शुरू हो गए हैं, उनकी सभाओं और रैलियों में भीड़ जुटाने और दिखाने पार्टियों के ठेकेदार गली गली घूम रहे हैं कि चलो तीन सौ रुपये, देंगे साथ में दिन भर का नाश्ता, पानी, चाय, खाना भी फ्री है.

भोपाल के पौश इलाके अरेरा कालोनी की झुग्गियों में सुबह से सन्नाटा पसर जाता है, इन लोगों के अच्छे दिन आ गए हैं. रोजगार की गारंटी मिल गई है, पार्टी का ठेकेदार आता है बात करता है कुछ समझाता है और सौदा पट जाने पर टोपी झण्डा और बैनर देता है और इन्हें साथ ले जाता है. कालेजों में भी ये ठेकेदार दिख जाते हैं, छात्रों को मेहनताने के साथ साथ पेट्रोल भी उनकी बाइक में डलवाया जा रहा है. काम बहुत आसान है बस मीटिंग में पहुंचकर भीड़ बढ़ाना है और नारे लगाना है.

नौकरों पर निर्भर रहने बाले मध्यमवर्गीय लोग परेशान हैं क्योकि उनकी काम वाली बाइयां गोल मार रहीं हैं. छोटी मोटी गुमठियां और दुकाने बंद पड़ी हैं, दिनभर की माथापच्ची के बाद पांच सौ रुपये कमाने वाले दुकानदारों को वे तीन सौ रुपये भा रहे हैं जिनके लिए करना कुछ नहीं है बस रैली में शामिल होना है या फिर सभा स्थल पर पहुंचकर भाषण सुनना है और बीच बीच में नारे लगाना है.

धंधा हालांकि पुराना है लेकिन बड़े पैमाने पर इस चुनाव में ही देखने में आ रहा है जिसमे शाम सात आठ बजे ईमानदारी से भुगतान हो जाता है और अगले दिन की भी बुकिंग हो जाती है. जैसे जैसे मतदान का दिन नजदीक आता जा रहा है वैसे वैसे इनकी मांग भी बढ़ती जा रही है, चुनिंदा शौकीनों को शाम को गला तर करने की भी व्यवस्था है.

जो भीड़ रैलियों और मीटिंगों में दिखती है वह कैसी है यह बताने की जरूरत नहीं. उज्जैन से एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें भाड़े का कार्यकर्ता बता रहा है कि उसे नजदीक के गांव से दस हजार रुपये महीने के करार पर लाया गया है. ये नेताजी पूर्व कांग्रेसी सांसद प्रेमचंद गुड्डू हैं, जिनका बेटा भाजपा के टिकिट पर चुनाव लड़ रहा है. भीड़ दिखाने थोक में देहातों से लोगों को ढोया जा रहा है.  ऐसा सभी जगह हो रहा है क्योंकि पार्टी का असल कार्यकर्ता झण्डा उठाकर भीड़ नहीं बन रहा.

ऐसे में बेरोजगारों की चांदी हो आई है, हालांकि वह चार दिन की है लेकिन अंधरे से तो बेहतर है. भोपाल दक्षिण सीट के एक वरिष्ठ भाजपा कार्यकर्ता का कहना है कि चुनाव लड़ना अब आसान काम नहीं रह गया है, लोग चुनाव में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं इसके सियासी माने कुछ भी हों लेकिन ऊपर से हुक्म आता है कि किसी भी कीमत पर इतने हजार लोग चाहिए तो हम और क्या करें सिवाय भाड़े की भीड़ जुटाने के जिसका खर्च उम्मीदवार देता है. यही हाल कांग्रेस का भी है उसमें भी कार्यकर्ताओं से ज्यादा नेता हैं.

28 नवम्बर को यह रोजगार बंद हो जाएगा लेकिन इससे कमाने वाले दुआ मांग रहे हैं कि चुनाव रोज रोज हों तो क्या हर्ज है. निर्वाचन आयोग के निर्देश पर राज्य में पड़े अब तक के छापों में 20 करोड़ से भी ज्यादा की नगदी बेहिसाब शराब और ड्रग्स बरामद हुई हैं, ये इन्हीं अस्थाई कार्यकर्ताओं की सेवा के लिए थीं. जो नहीं पकड़ी जा सकीं वह अरबों में है.

एक और बात कम हैरानी और दिलचस्पी की नहीं कि चुनाव प्रचार के दिनों में कहीं देह व्यापार के अड्डे पर छापा नहीं पड़ रहा. एक कांग्रेसी नेता की मानें तो सभी बड़े शहरों के फार्म हाउस गुलजार हैं. मझोले नेता देर रात तक सर खपाते हैं, उनकी थकान सुरा के साथ सुंदरियों के सानिध्य और मसाज से उतरती है. पुलिस वाले पहले से ही मैनेज किए जा चुके हैं, उनका भी सीजन चल रहा है, बेचारे घर गृहस्थी छोड़ दिन रात ड्यूटी बजा रहे हैं.

मुद्दे की बात तीन सौ रुपये रोज के अस्थाई कार्यकर्ता हैं जो वोट किसी को भी दें लेकिन कुछ दिन पैसों की जरूरत या लालच के चलते जागरुक मतदाता की भूमिका में नहीं आ पा रहे. लगता नहीं कि चुनाव आयोग इस तरफ ध्यान देगा, क्योंकि उसे इस बात से कोई मतलब नहीं कि कौन पैसे लेकर किसका प्रचार कर रहा है, उसका मकसद तो मतदान प्रतिशत बढ़ाना भर है.

टेस्टी फूड स्पैशल : औयल मिलावटी तो नहीं

बाजार में बहुत से कुकिंग औयल बिक रहे हैं. औयल की शुद्धता की पहचान करना आसान नहीं है. हमारे देश में खाने की चीजें अन्य देशों के मुकाबले काफी ज्यादा हैं. हम तलाभुना खाना ज्यादा पसंद करते हैं और खाने में जब तक सब्जी या दाल के ऊपर तेल न दिखे तब तक हमें खाने का मजा ही नहीं आता. भारत में ज्यादातर खाना लोग औयल में ही बनाते हैं. गरमागरम समोसे हों या दालसब्जियों में लगने वाला तड़का, सब में औयल इस्तेमाल किया जाता है. औयली खाना भारतवासियों के खून में है.

अच्छा कुकिंग औयल आप को स्वस्थ रख सकता है. भले ही आप बढि़या से बढि़या खाना बना लें लेकिन औयल अच्छा नहीं है तो सब बेकार है, ऐसा खाना बीमारियों को निमंत्रण देता है.

बाजार में कई ब्रैंड्स के औयल मौजूद हैं जो तरहतरह के दावे कर जनता को गुमराह करते हैं. कई तेल कंपनियां कौलेस्ट्रौल कम करने, दिल की बीमारियां दूर करने, हार्ट को हैल्दी रखने, लाइटवेट औयल, लोफैट औयल आदि न जाने कितने ही झूठे दावे करती हैं. ये खोखले दावे लोगों को लुभाते हैं और लोग उन झूठे विज्ञापनों को देख कर बिना किसी जांचपरख के इन का सेवन करते हैं.

तेल में मोनो सैच्युरेटेड फैटी (मूफा) जिस में ओमेगा-3 पाया जाता है और पौली सैच्युरेटेड फैटी एसिड (पूफा) जिस में ओमेगा-6 पाया जाता है, अलगअलग मात्रा में होते हैं. ये दोनों ही स्वास्थ्य के लिए जरूरी हैं. जैतून, सरसों, सोयाबीन, राइस ब्रान तेल, कनोला (राई) तेल और मूंगफली का तेल हार्ट के लिए काफी अच्छे हैं. इन तेलों को अपने आहार में शामिल करना काफी लाभदायक है. ये शरीर में बन रहे गंदे कौलेस्ट्रौल को कम करते हैं. ये प्रोटीन औरकार्बोहाइड्रेट के चयापचय को तेज कर पाचनक्रिया में मदद करते हैं.

आइए जानते हैं कि कौन से तेल की किस तरह से जांच कर आप उस की शुद्धता की पड़ताल कर सकते हैं-

रिफाइंड औयल

रिफाइंड औयल का बिलकुल भी इस्तेमाल न करें, यह हानिकारक होता है. यह तेल काफी सारे कैमिकलों को मिला कर तैयार किया जाता है. इसे 200 डिगरी सैल्सियस से अधिक तापमान पर गरम किया जाता है. इस की चिकनाई और चिपचिपाहट निकाल दी जाती है. इन सब प्रौसैस में तेल में जितने भी न्यूट्रिशन और प्रोटीन मौजूद होते हैं वे सब निकल जाते हैं और फिर तेल खाने लायक नहीं रहता.

रिफाइंड औयल के इस्तेमाल से छोटी से ले कर भीषण बीमारियां तक जन्म लेती हैं, जैसे घुटने से फ्लूइड का कम होना, कमरदर्द, हड्डियों का कमजोर होना, हार्टअटैक, पैरालिसिस, ब्रेन डैमेज होना आदि. इस की पहचान है कि इस में बिलकुल भी चिकनाहट नहीं होती और न ही किसी तरह की खुशबू होती है. यह बहुत पतला पानी जैसा होता है.

सरसों के तेल की पहचान

सेहत को ध्यान में रखते हुए लोग अब सरसों के तेल का इस्तेमाल कर रहे हैं. सरसों के तेल में भी इतनी मिलावट है कि लोगों को पता ही नहीं चलता कि वे सरसों के तेल का इस्तेमाल कर के फायदे में नहीं, बल्कि नुकसान में हैं. लोग असली और नकली में आसानी से फर्क ही नहीं कर पाते.

जहां सरसों का तेल जोड़ों के दर्द को कम करता है, वहीं कैंसर से बचाता है. यह एलर्जी ठीक करता है और दिल के रोगों को दूर करता है. लेकिन मिलावट होने से इस के नुकसान का सामना लोेगों को करना पड़ता है. वैसे तो इसे टैस्ट करने के बहुत सारे उपाय हैं लेकिन आप एक आसान टैस्ट से पता लगा सकते हैं कि सरसों का तेल असली है या नहीं.

इस के लिए आप थोड़ा सा तेल हाथ पर रखें और रगड़ें. सरसों का तेल काफी गाढ़ा होता है. यदि रगड़ने से इस का रंग हाथ पर हलका पीला हो तो समझ लें कि इस में मिलावट है. यदि रंग न छूटे, केवल चिकनाई रहे तो समझ लें कि तेल शुद्ध है.

जैतून के तेल की पहचान

जैतून का तेल शरीर में खराब कोलैस्ट्रौल को कम करता है और अच्छे कोलैस्ट्रौल को बढ़ाता है. यह हार्टअटैक से बचाता है. जैतून के तेल में एंटीऔक्सिडैंट की मात्रा काफी होती है. यह शरीर में मौजूद वसा को कम भी करता है.

जैतून के तेल की जांच भी आसानी से घर पर ही की जा सकती है. 1 कटोरी में जैतून का तेल भर लें और उसे फ्रिज में रखें. अगर तेल जम जाए तो आप समझें तेल नकली है. इस दौरान एक बात का अवश्य ध्यान रखें कि तेल को फ्रिजर में न रखें और अच्छे परिणाम के लिए 24 से 48 घंटे तक इंतजार करें.

– जैसमीन कश्यप, फिटनैस एक्सपर्ट, गुडवेज फिटनैस

बांझपन का शिकार बना सकते हैं ऐसे फल और सब्जियां

अकसर लोग अपने शरीर और आसपास के माहौल पर रसायनों यानी कैमिकल्स से पड़ने वाले बुरे असर की अनदेखी कर देते हैं, जबकि यह साबित हो चुका है कि कीटनाशकों के संपर्क में रहने वालों में बांझपन यानी औलाद का न होने का खतरा उन से अधिक होता है, जो कीटनाशकों से दूर रहते हैं. लेकिन कीटनाशकों से दूर रहने वाले भी बांझपन के शिकार हो सकते हैं और इस का कारण है हमारा असुरक्षित भोजन, क्योंकि हम अपने भोजन में शामिल फलों और सब्जियों के जरीए यूरिया ग्रहण करते हैं.

गर्भावस्था यानी प्रैगनैंसी के दौरान गर्भवती के आहार में फल और सब्जियां बेहद जरूरी हैं, क्योंकि इन में खनिज पदार्थ भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. कई शोधों में पाया गया है कि यदि प्रैगनैंसी के उपचार से गुजर रही महिलाएं ऐसे फलों और सब्जियों का सेवन करती हैं, जिन में कीटनाशकों के अंश बचे हों तो उन के गर्भवती होने की उम्मीद कम हो जाती है और गर्भावस्था संबंधी परेशानियां पैदा होने का बड़ा खतरा पैदा हो जाता है.

दरअसल, कीटनाशक फलों और सब्जियों को चूहों और कीटों आदि से बचाने के लिए फसल पर छिड़के जाते हैं. ये कीटनाशक 2 तरह के होते हैं, रसायनिक और जैविक. जहां रसायनिक कीटनाशी कृत्रिम रूप से तैयार किए जाते हैं, वहीं जैविक कीटनाशी उस प्राकृतिक सामग्री से तैयार किए जाते हैं, जो विभिन्न पौधों, कीटों और कुदरती रूप से मिलने वाले तत्त्वों से प्राप्त होती है.

इन रसायनों से सीधे तौर पर वे लोग प्रभावित होते हैं जो इन के संपर्क में आते हैं. मसलन, रसायन उद्योगों में काम करने वाले जो इन्हें तैयार करते हैं या फिर वे किसान जो खेतों में इन का प्रयोग करते हैं. हालांकि जो लोग सीधे तौर पर इन कीटनाशकों के संपर्क में नहीं होते हैं उन पर भी रसायनयुक्त फल और सब्जियां खाने पर रसायनों का बुरा असर पड़ता है.

गर्भधारण की संभावना 30 फीसदी तक कम

दुनियाभर के शोधकर्ताओं ने गर्भावस्था पर कीटनाशकों के प्रभाव जानने के लिए कई शोध किए, जिन में पाया गया कि उच्च मात्रा में कीटनाशक युक्त फल और सब्जियां खाने वाली महिलाओं में गर्भवती होने की संभावना 30 फीसदी तक घट गई. इस के अलावा 40 फीसदी मामले ऐसे थे, जिन में इन रसायनों के कारण गर्भपात के हालात भी बने.

पुरुष भी हो सकते हैं शिकार

कीटनाशकों के कारण न केवल महिलाओं पर, बल्कि पुरुषों की प्रजनन यानी औलाद पैदा करने की क्षमता पर भी बुरा असर पड़ता है. पुरुषों में अंग में तनाव न रहने की समस्या भी कुछ अरसे से तेजी से बढ़ी है.

कई शोधों के अनुसार 40 साल से ज्यादा उम्र के करीब 55 फीसदी पुरुष अंग में तनाव न आने की परेशानी से गुजर रहे हैं. और इस परेशानी के लिए कीटनाशकों के इस्तेमाल को जिम्मेदार ठहराया गया है.

दरअसल, इन कीटनाशकों में मौजूद रसायन शरीर में पैदा होने वाले एक रसायन ऐसिटाइलकोलिनएस्टरेज के निर्माण को रोक देता है. यह एक ऐंजाइम है जो दिमाग में मौजूद रसायनिक संदेशवाहक के रूप में कार्य करने वाले न्यूरोट्रांसमीटर्स के साथ उन संवेगों का आदानप्रदान करता है, जो अंग में तनाव लाते हैं.

रसायनिक कीटनाशकों का पुरुष पर शुक्राणुओं की संख्या और गुणवत्ता में कमी, लड़कियों में समयपूर्व यौवन आना, जन्मजात दोष, गर्भपात और मृत बच्चे को जन्म देने जैसे और भी कई दुष्परिणाम सामने आते हैं.

जन्मजात दोष भी हो सकते हैं

ये रसायन जीवनभर शरीर पर असर डालते रहते हैं. ये प्रजनन प्रणाली को कई तरह से नुकसान पहुंचाते हैं. कुछ रसायन कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त करते हैं तो कुछ उन्हें पूरी तरह नष्ट कर देते हैं. इन के कुप्रभाव इतने अधिक मजबूत और स्थायी होते हैं कि डीएनए का ढांचा तक बदल सकते हैं. इस के परिणामस्वरूप अगली पीढ़ी प्रजनन संबंधी परेशानियों या कई जन्मजात कमियों के साथ जन्म लेती है.

– डा. अनुजा सिंह, गायनेकोलौजिस्ट ऐंड आईवीफ एैक्सपर्ट, इंदिरा आईवीफ हौस्पिटल, पटना

रिश्तों में सिर्फ दिखावा न करें

अर्चि की सास बहुत बीमार थीं. दूर रहने की वजह से अर्चि उन से मिलने बारबार जा नहीं सकती थी. इस बार छुट्टियों में वह महीनाभर बीमार सास के पास बिता कर जैसे ही घर लौटी, सास की मृत्यु का समाचार मिला. उस के पति के बड़े भाई, भाभी, बहन कोई भी मृत्यु पूर्व उन से मिल नहीं पाए थे. अर्चि के मन में यही संतोष था कि कितना अच्छा हुआ कि वह महीनाभर मां के पास रह ली. ज्यादा नहीं तो थोड़ीबहुत ही अंतिम दिनों में उन की सेवा कर ली.

मृत्यु का समाचार मिलने पर वह बड़ी दुविधा में थी. सफर में 2-3 दिन लग जाना मामूली बात थी. तब तक मां का अंतिम दर्शन करना भी नहीं हो पाएगा. बड़े भाइयों ने मां की स्मृति में कोई भी कार्यक्रम न करने का निश्चय किया. ऐसी स्थिति में अर्चि को वहां जाना फुजूल ही लगा. सब बातें सोचविचार कर तय कर के अर्चि व उस के पति ने यही निश्चय किया कि अर्चि यहीं रहेगी. सिर्फ उस के पति चले जाएंगे. हालांकि अंतिम दर्शन तो उन्हें भी नहीं होंगे पर मां की मिट्टी ले आएंगे, यही सोच कर वे चले गए.

रिश्तेदारोंपरिचितों को पता चला कि अर्चि अपनी सास की मौत पर भी नहीं गई, उन के अंतिम दर्शन भी नहीं किए तो सब ने उसे बड़ा भलाबुरा कहा, आलोचना की, उसे निष्ठुर और पाषाणहृदया कहा.

अर्चि किसी को भी नहीं समझा पाई कि मृत्यु के बाद जबकि वह उन का आखिरी बार चेहरा भी न देख पाती, उस के वहां पहुंचने से पहले उन का अंतिम संस्कार हो जाना निश्चित था, वहां बेकार जा कर करती क्या? क्या यह अच्छा नहीं हुआ कि वह सास के जीतेजी ही महीनाभर वहां रह कर उन की सेवा कर आशीर्वाद ले आई. किसी ने भी उस की बात पर ध्यान नहीं दिया. सब के दिमाग में यही रहा कि कैसी बहू है, सास के मरने पर भी ससुराल नहीं गई.

यह हमारे समाज की विडंबना है कि अंतिम दर्शन को बड़ी मान्यता दी जाती है. बेटेबहू जीतेजी भले बूढ़े सासससुर की खैरखबर न लें, कभी उन के हालचाल न पूछें, उन की हारीबीमारी का खयाल न करें, उन के जीनेमरने की चिंता न करें, बुढ़ापे में अकेले कष्ट उठा कर जिंदगी की शाम गुजार रहे मातापिता की परवा न करें तो कोई बात नहीं लेकिन मरने पर उन के अंतिम दर्शन करने के कर्तव्य की औपचारिकता जरूर निभाएं, यह जरूरी है.

रोजी की सास गांव में अकेली रहती थी. बूढ़ी जान अकसर बीमार रहती थी. रोजी ने कभी उन्हें अपने पास बुला कर रखने की जहमत उठाना गवारा नहीं किया. गांव में जा कर, वहां रह कर सास की सेवा करने का तो प्रश्न ही नहीं था. अकेले बीमारी से लड़तीलड़ती बेटाबहू की उपेक्षा से टूटी बेचारी आखिर एक दिन मौत के गले लग गई. गांव के अन्य रिश्तेदार, परिचितों ने बेटाबहू को उन की मौत की खबर दी. जिस दिन उन की मौत की खबर आई, पड़ोसियों व अन्य लोगों को दिखाने के लिए रोजी छाती पीट कर, फूटफूट कर रोती हुई यही कहती रही, ‘‘हाय, अम्मा अचानक चल बसीं. मैं कैसी अभागी हूं कि उन के अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाई. आखिरी बार उन के चरण नहीं छू पाई. आखिरी पल में कुछ कहसुन नहीं पाई.’’

जिंदा सास की खैरखबर लेने कभी गांव के घर में पैर नहीं रखा. अकेली सास को अपने साथ रखने में सदा कतराती रही. जब वह मर गई तो अंतिम दर्शन न कर पाने के मलाल में टसुए बहाती रही. क्या यह सिर्फ दिखावा व ढकोसला नहीं है?

मजबूरी व महत्त्वाकांक्षाएं

कामधंधे की तलाश में ज्यादातर बेटे आजकल मांबाप से दूर ही रहते हैं. मांबाप के बुढ़ापे की लाठी बनने के बजाय उन का संबल छीन लेते हैं. इन में कुछ तो मजबूरीवश घर छोड़ते हैं, कुछ अतिमहत्त्वाकांक्षा के तहत. दोनों ही परिस्थितियों में बूढ़े मांबाप को ही अकेलेपन की घुटन सहनी होती है.

जो मांबाप अपने बच्चों को जिंदगी की रफ्तार के साथ उड़ान भरना सिखाते हैं वे पंखों में मजबूती आते ही फुर्र हो जाते हैं. पीछे घिसटघिसट कर जिंदगी गुजारते मातापिता अकेले ही बच्चों की व्यस्तता, बेरुखी और बेगानेपन से टूटे जिंदगी को अलविदा कह जाते हैं. तब यही बच्चे मांबाप के अंतिम दर्शन न कर पाने, अंतिम समय पर न मिल पाने पर अफसोस जाहिर करते देखे जा सकते हैं.

मांबाप और सासससुर

बूढ़े मांबाप के साथ रहना या उन्हें साथ रखना आज की युवा पीढ़ी को स्वीकार्य नहीं है. आधुनिकता व स्टेटस मैंटेन करने में बूढ़े मांबाप अनफिट होते हैं. उन्हें साथ रख कर गंवारू कहलाना कोई पसंद नहीं करता. बहुत कम परिवार ऐसे होंगे जहां बेटाबहू मांबाप व सासससुर को उचित आदर, मान व सम्मान देते होंगे. अपने ही बच्चों का यह बरताव उन के जिंदगी जीने के उत्साह को खत्म कर देता है और वे असमय ही मौत का दामन थाम लेते हैं.

बुजुर्गों के दायित्व

कई बार गलती बुजुर्गों की भी होती है. वे युवाओं के सामान्य व्यवहार को भी अपने ही चश्मे से देखते हैं. उन की साधारण बातचीत को भी बतंगड़ बना कर अनेक समस्याएं खड़ी कर देते हैं. बदलते जमाने व नई पीढ़ी के साथ वे सामंजस्य बिठाना ही नहीं चाहते. बेटेबहू की समस्याओं को समझना ही नहीं चाहते. उन्हें थोड़ा खुलापन व आजादी देना उन्हें मंजूर नहीं. मांबाप के इस तानाशाही रवैए से तंग आ कर बेटाबहू अलग रहना ही हितकर समझते हैं तो सर्वस्व उन की आलोचना की जाती है कि बुढ़ापे में मांबाप को अकेला छोड़ दिया.

युवाओं के कर्तव्य

परिवार को खुशहाल बनाने के लिए सामंजस्य तो दोनों को ही बिठाना पड़ेगा. स्वार्थ व भौतिकता की अंधी दौड़ में लिप्त आज के युवाओं को मातापिता के उपकार, उन के कर्तव्य, बच्चों के लिए किए गए उन की इच्छाओं व आकांक्षाओं के दमन को याद रखना चाहिए और बुढ़ापे में उन्हें अकेला छोड़ कर यह सोचने के बजाय कि उन की उम्र तो बीत गई अब उन्हें भजनपूजन करते हुए मौत का इंतजार करना चाहिए, एकदम अनुचित है.

युवाओं को चाहिए कि वे बजाय मांबाप की मौत के बाद उन के अंतिम दर्शन की इच्छा रखने के उनके जीतेजी उन की देखभाल करें. उन का सम्मान व आदर करें, बुढ़ापे में उन्हें सुरक्षा व संबल प्रदान करें. साथ में रहना संभव न हो तो उन की देखभाल के लिए उचित बंदोबस्त करें. समयसमय पर फोन के जरिए उन के हालचाल लेते रहें. बच्चों को भी दादादादी, नानानानी का सम्मान करना सिखाएं. उन्हें दुत्कारने के बजाय उन के अनुभवों से शिक्षा लें. जीतेजी उन की सेवा करें और सम्मान करें, यही ज्यादा उचित है व मन को शांति भी प्रदान करता है.

स्मार्टफोन एडिक्शन से कैसे बचें

हाल ही में किये गए एक सर्वे के मुताबिक औसतन स्मार्टफोन यूजर्स 1 दिन में 47 बार अपना फोन चेक करते हैं. 85 % स्मार्टफोन यूजर्स अपने दोस्तों और परिजनों से बातें करते हुए भी अपना मोबाइल चेक करते रहते हैं.

स्मार्टफोन पर व्यतीत किया जाने वाला औसत समय प्रतिदिन 2 घंटा 51 मिनट है तो औसतन स्माटफोन यूजर्स 1 दिन में 2,617 बार फोन को टैप, स्वाइप और क्लिक करते हैं.

वैसे तो आज के समय में स्मार्टफोन, टैबलेट और कंप्यूटर लोगों की  जिंदगी में काफी महत्वपूर्ण जगह रखने लगे हैं मगर किसी भी चीज की अधिकता अच्छी नहीं होती.  स्मार्टफोन का जरूरत से ज्यादा प्रयोग यानी स्मार्टफोन एडिक्शन लोगों में दुश्चिंता, तनाव, अवसाद, एकाग्रता की कमी, अनिद्रा आदि की वजह बन रहा है.

जब आप सोशल मीडिया और मोबाइल पर बेवजह गेम खेलने और वक्त बिताने के इतने आदी हो जाते  हैं कि आप के रिश्ते और काम प्रभावित होने लगे या फिर बारबार ईमेल, मैसेज वगैरह चेक करते रहने की आदत पड़ गई है और आप मोबाइल के बगैर रहने की कल्पना भी नहीं कर सकते तो समझ लीजिए कि आप मोबाइल एडिक्शन यानी नोमोफोबिया (फियर औफ बीइंग विदाउट ए  मोबाइल फोन) के शिकार हो चुके हैं.

यह ऐसी बीमारी है जो इंसान का सुकून छीन  लेती है. सेहत के साथ रिश्ते भी बीमार होने लगते हैं. इस से बचने के लिए इन बातों का खयाल रखें.

  1. नो फोन जोन

अपने बेडरूम में फोन चार्ज करना बंद करें. क्यों कि यही  वह जगह है जहां आप खुद को रिचार्ज करते हैं. अपने जीवनसाथी के साथ वक्त बिताते हैं और सुकून व आराम के लम्हे गुजारते हैं. बेड पर लेट कर अपने फोन या टैबलेट पर ईबुक्स पढ़ने के बजाय किताबें  पढ़े. रिसर्च बताते हैं कि किताबें पढ़ने से आप की मानसिक क्षमता और याददाश्त बढ़ती है. नींद भी अच्छी आती है.

इसी तरह डाइनिंग टेबल भी एक आवश्यक नो फोन जोन एरिया  है. यहां आप परिवार के साथ होते हैं. साथ मिल कर भोजन करने का फायदा तभी मिल सकता है जब आप फोन में उलझे हुए  न हो. इस समय रिलैक्स्ड रहे और जीवनसाथी व बच्चों की समस्याएं सुने या दिन भर घटी मनोरंजक बातें एकदूसरे के साथ शेयर करें.

  1. नो फोन टाइम

जिस तरह घर के कुछ खास हिस्सों में फोन का प्रयोग सीमित रखना लाजमी है वैसे ही जिंदगी में कुछ लम्हें ऐसे होते हैं जब आप को फोन के बारे में सोचना ही नहीं चाहिए. जैसे शाम में ऑफिस से घर लौटने के बाद का समय आप के जीवनसाथी और बच्चों का है. घर पहुंचते ही फोन ले कर बैठ जाने की आदत उचित नहीं. यह समय बच्चों के साथ हंसखेल कर बिताएं. इसी तरह जिम, मीटिंग में, बाथरूम में या ड्राइविंग करते समय फोन अलग उठा कर रख दें या स्विच ऑफ कर दे.

  1. सोशल मीडिया उपवास

जिस तरह समयसमय पर खानेपीने का उपवास रखना सेहत के लिए अच्छा होता है ऐसे ही कभीकभी सोशल मीडिया से गायब हो जाना भी रिश्तो की मजबूती के लिए जरूरी है. महीने दो महीने में एक बार सप्ताह भर के लिए सोशल मीडिया से वर्चुअली एबसेंट रह कर देखें. परिवार के साथ कहीं घूमने का प्रोग्राम हो या लोंग वीकेंड  का समय, आप सोशल मीडिया से दूरी बढ़ा सकते हैं. नोटिफिकेशंस बंद कर दे.

बच्चों के सिवा अपनी जिंदगी में हम किसी ऐसे व्यक्ति को पसंद नहीं करते जो हर समय हमें महत्वहीन बातों और चीजों के लिए परेशान करता रहे. दरअसल नोटिफिकेशंस ऐसे व्यक्तियों का ही डिजिटल वर्जन है जो हर वक्त आप को परेशान करते हैं. हर समय इन के हमलो की वजह से हमारे अंदर एडिक्शन के वायरस घुसने लगते हैं.

नोटिफिकेशंस व्यक्ति के हार्ट रेट को बढ़ा देते हैं. इन्हें देखते ही व्यक्ति मैसेज में क्या लिखा है यह देखने की उत्सुकता बढ़ जाती है. वह खुद को रोक नहीं पाता और हर नोटिफिकेशन पर फोन खोल कर बैठने लगता है. इस तरह उसे फोन की ऐसी लत लग जाती है कि वह 2 मिनट भी उस के बिना नहीं रह पाता. मगर यह उचित नहीं फोन से जो भी सूचनाएं प्राप्त करनी है उसे अपने हिसाब से जब जरूरत हो तब लेने की आदत डालें न कि फोन के बंदी बन कर आप हर समय उसी में आंखे गड़ाये रहने को विवश हो जाएं.

  1. दोस्तों के साथ अधिक वक्त बिताएं

बच्चों के पैदा होने के बाद अक्सर हम अपनी दोस्तीयारी सीमित कर लेते हैं. मगर शारीरिक मानसिक तंदुरुस्ती के लिए परिवार के बाहर भी क्वालिटी रिलेशनशिप डिवेलप करने की आवश्यकता पड़ती है. पेंरेटिंग काफी जिम्मेदारी का काम होता है. पैरेंट बनने के बाद लोग व्यस्तता की वजह से बाहरी रिश्तों से अलगथलग पड़ने लगते हैं. ऐसे में उन्हें स्मार्टफोन का ही सहारा नजर आता है. वे फोन के करीब हो जाते हैं. वस्तुतः फोन की आवश्यकता अपने प्रिय दोस्तों को कॉल करने और मिलने के प्रोग्राम तय करने के लिए होना चाहिए न कि महज दोस्तों के स्टेटस को लाइक कर अपने जिंदा होने का एहसास दिलाने के लिए.

दोस्तों के साथ फिजिकली वक्त बिताएं. नईनई योजनाएं बनाएं लेकिन अपने बीच डिजिटलमैन यानी स्मार्टफोन को न आने दें. उन्हें दूर ही रखें. इस की जरूरत केवल इमरजेंसी के समय के लिए ही सीमित रखें.

  1. अपने परिवार के लिए भी समय निकालें

इंसान जब परेशान हो या थका हो तो उसे बच्चों का साथ रिलैक्स फील कराता है. इसी तरह यदि आप स्मार्टफोन ओवर यूजर हैं तो भी बच्चों का साथ आप को इस एडिक्शन से छुटकारा दिलाने में मददगार साबित हो सकता है.यह बहुत ही सहज समाधान है. जब भी आप को अपना फोन देखने की इच्छा महसूस हो तो बच्चों या जीवनसाथी के साथ वक्त बिताएं. अपने इनबॉक्स के ईमेल खंगालने या फसबूक्स में लाइक्स और कमैंट्स लिखने से बहुत अच्छा और फलदायक परिवार के साथ क्वालिटी टाइम बिताना है.

विस्मृति का शिकार हो रहीं स्मृति

वो भी क्या दौर था जब टीवी सीरियल सास भी कभी बहू थी की बहू तुलसी वीरानी को देखने देश भर के घरों में लोग ड्राइंग रूम में ठसाठस भर जाते थे और एक वक्त यह भी है कि जब स्मृति ईरानी साक्षात सामने हों तो भी लोग उन्हें देखने नहीं जाते. राजनीति में आने के बाद जिन सितारों ने चमक खोई है केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी का नाम उनमें ऊपर ही कहीं मिलेगा.

स्मृति चुनाव प्रचार के लिए जबलपुर आईं तो आयोजन स्थल सिविक सेंटर की खाली कुर्सियाँ उन्हें मुंह चिढ़ा रहीं थीं. स्मृति की यह झल्लाहट छुपी भी नहीं रही. पत्रकार वार्ता में वे एक महिला पत्रकार से यूं ही ख्वामख्वाह उलझतीं नजर आईं तो समझने वाले ही उनकी मनोदशा समझ पाये. स्मृति ईरानी कोई अच्छी वक्ता भी नहीं हैं वे तेज बोलने को ही बोलना मान बैठी हैं.  उनके भाषणों में नया कुछ उम्मीद रखने वालों को निराशा ही हाथ लगती है. नेहरू गांधी परिवार की आलोचना उनका पसंदीदा विषय है खासतौर से राहुल गांधी पर जब तक वे कोई जरूरी या गैर जरूरी कटाक्ष नहीं कर लेतीं तब तक उन्हें लगता नहीं कि राजनीति कर ली.

आलोचना हर्ज की बात नहीं लेकिन हर भाषण में वे राजनीति के अपने आदर्श प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कापी करती हैं तो मौजूद लोगों की रही सही जिज्ञासा भी खत्म हो जाती है. हर कोई जानता है कि स्मृति ईरानी कोई पेशेवर नेत्री नहीं हैं.  अमेठी से राहुल गांधी के सामने लड़ कर शहीद होने का खूबसूरत इनाम उन्हें नरेंद्र मोदी ने मंत्री बनाकर दिया था. शुरुआती दौर में भाजपा में उनकी जगह किसी अरुण जेटली , सुषमा स्वराज या राजनाथ सिंह से कम नहीं आंकी जाती थी लेकिन धीरे धीरे अपनी ही अपरिपक्वता और अनुभवहीनता के चलते उनहोंने चमक खोना शुरू किया तो यह सिलसिला अभी थमा नहीं है.

तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें स्टार प्रचारकों की सूची में रखा है लेकिन जबलपुर की खाली कुर्सियों ने काफी कुछ जता दिया है कि जनता यूं ही किसी को नेता नहीं मान लेती. मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ को उन्होने निशाने पर लेने की कोशिश की. कमलनाथ ने विवादित बना दी गई बात यह कही थी कि कांग्रेस महिलाओं को किसी कोटे के तहत या सजावट के लिए टिकिट नहीं देती तो पूरी भाजपा उनके ऊपर चढ़ बैठी कि वे और कांग्रेस महिलाओं की बेइज्जती कर रहे हैं.

कमलनाथ का मकसद क्या था यह तो वही जानें लेकिन दूसरे भाजपा नेताओं की तरह स्मृति भी उनके झांसे में आ गईं जबकि जनता उनसे यह सुनना चाह रही है कि वह भाजपा को चौथी बार क्यों चुनें. इस सवाल का जबाब भी उन्होने रट्टू तोते की तरह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की तारीफ़ों में कसीदे गढ़ते दिया जो ज्यादा असरकारी साबित नहीं हुआ क्योकि चुनाव प्रचार करने आने वाला स्टार प्रचारक यही करता है.

लोग जानते समझते हैं कि स्मृति ईरानी भी अब ड्रामाई राजनीति करने लगी हैं.  सबरीमाला मंदिर विवाद पर वे खुद महिलाओं के खिलाफ बोलीं थीं कि पूजा करने का मतलब यह नहीं है कि आपको अपवित्र करने का भी अधिकार है. इससे भी नीचे उतरते उन्होने यह तक कह डाला था कि क्या आप माहवारी के खून से सना नेपकिन लेकर चलेंगे और किसी दोस्त के घर में जाएंगे, नहीं आप ऐसा नहीं कर सकते. मुंबई में ब्रिटिश हाइ कमीशन और आव्जर्बर रिसर्च फाउंडेशन की तरफ से आयोजित यंग थिंकर्स कान्फ्रेंस को सम्वोधित करते अपनी महिला विरोधी या पितृ सत्तात्मक व्यवस्था से सहमत होते उन्होंने कहा था कि वे हिन्दू धर्म को मानती हैं लेकिन उन्होने एक पारसी व्यक्ति से शादी की है और यह तय किया है कि उनके दोनों बच्चे पारसी धर्म को मानें.

इस दिन पहली बार कुछ खुलकर बोलते स्मृति ने माना था कि जब उनके बच्चे आतिश बेहराम ( पारसियों का प्रार्थना स्थल जिन्हें अग्नि मंदिर भी कहा जाता है ) के अंदर जाते थे तो उन्हें सड़क पर या कार में अंदर बैठना पड़ता था क्योकि उन्हें दूर रहने और वहां खड़ा न रहने के लिए कहा जाता था. इस खुलासे के कोई खास माने नहीं थे कि महिलाओं के धार्मिक अधिकारों के मामले में सभी धर्म एक से हैं.

चूंकि पारसी धर्म में भी ऐसा होता है इसलिए हिन्दू धर्म में भी होने दिया जाये यह बात गले उतरने वाली नहीं थी इसलिए सेनेटरी नेपकिन वाले बयान पर हल्ला मचने पर उन्होने अपना एक फिल्मी स्टाइल वाला फोटो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था जिसमें वे एक कुर्सी से बंधी हैं और उनके मुंह में भी कपड़ा ठुंसा है.

इन सस्ते हथकंडों से कोई फायदा स्मृति ईरानी को नहीं हुआ उल्टे ऐसे मौकों पर लोगों को उनकी शैक्षणिक योग्यता वाला विवाद जरूर याद आ जाता है जिसमें उन्होने सफ़ेद झूठ बोला था. अब अपनी सभाओं में कम भीड़ देखकर स्मृति को समझ आ रहा है कि वे खेत में उगी नहीं बल्कि गमले में उगाई गई नेता हैं तो वे खीझ भी रही हैं. जबलपुर के बाद सीहोर की एक सभा में मुकम्मल वक्त होते हुये भी केवल 7 मिनिट बोलीं तो वहां के भाजपा प्रत्याशी सुदेश राय को मायूसी ही हाथ लगी क्योंकि भीड़ यहाँ भी उम्मीद के मुताबिक नहीं थी.

दरअसल में स्मृति ईरानी की मूल पहचान राजनीति नहीं बल्कि टीवी है लेकिन दिक्कत यह है कि 15 -20 साल पहले उनका छोटे पर्दे पर एकछत्र राज्य था और अब नई पीढ़ी का दर्शक उन्हें नहीं जानता. दूसरे इस दौरान एक से बढ़कर एक टीवी अभिनेत्रियां आईं हैं. स्मृति के चेहरे पर उम्र भी हावी होने लगी है ऐसे में उनकी पूछ कम होना स्वभाविक बात है जिससे आज नहीं तो कल उन्हें समझौता करना ही पड़ेगा. इसके आसार भी नजर आने लगे हैं सीहोर में उन्होने स्वीकारा कि अब अमेठी से वे दौबारा चुनाव लड़ेगी या नहीं यह फैसला अमित शाह को करना है.

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