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रिश्ते ऐसे रखें मधुर

जिस तरह पेड़ पौधों की निरंतर उचित देखभाल कर माली उन्हें जीवंत बनाए रखता है, कुछ उसी तरह इंसान रिश्तों को समय और समझदारी से मधुर बनाए रख सकता है.

दुनिया रिश्तों पर चल रही है. खून के रिश्ते, दोस्ती के रिश्ते, सामाजिक रिश्ते और मानवता का नाता. इन 4 कैटेगरी में सारे रिश्ते आ जाते हैं और इन्हीं के इर्दगिर्द हम जीवन गुजार लेते हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने कहा था,  ‘‘अगर रिश्तेनाते निभाना आप की कमजोरी है तो आप इस दुनिया के सब से मजबूत इंसान हैं.’’ उन की बात सच है क्योंकि हर रिश्ता बनाने के बाद उसे निभाना पड़ता है वरना वह रिश्ता खत्म हो जाता है. भले ही खून के रिश्ते हमें जन्म से मिल जाते हों लेकिन उन्हें बनाए रखने के लिए निभाना पड़ता है. मतलब उस पर मेहनत करनी पड़ती है. मेहनत करने से आशय यह नहीं है कि किसी तरह की खुशामद करनी पड़ती हो बल्कि रिश्तों को निभाने के लिए समय और समझदारी की जरूरत होती है.

आज एकल परिवारों का चलन बढ़ रहा है. भाई व बहन अकेले हो रहे हैं. पहले की तरह परिवारों में 7-8 भाईबहन नहीं हैं. ऐसे में उन रिश्तों की अहमियत बढ़ जाती है जो खून के न हों, जैसे दोस्ती, व्यापारिक या आसपड़ोस के रिश्ते.

मुंबई की रंजना सिंह का कहना है कि उन के पिता के 5 भाई और 4 बहनें हैं. शादी या किसी पारिवारिक समारोह में उन लोगों के सपरिवार इकट्ठे होने पर ऐसा लगता है मानो अब किसी बाहर वाले की जरूरत ही नहीं. लेकिन मेरी ससुराल में बिलकुल उलटा है. मेरे पति की सिर्फ 1 बहन है. हमारे यहां तो दोस्तों, चचेरे, फुफेरे और ममेरे रिश्तेदारों से ही रौनक होती है.

दिल्ली की अनीता कहती हैं कि दिल्ली जैसे बड़े शहर में जब हम अपने रिश्तेदारोंपरिचितों से इतनी दूर रह रहे हैं तब आसपड़ोस में रिश्ते बनाना जरूरत बन जाता है. हम अलगथलग नहीं रह सकते. किसी भी तकलीफ में परिवार और रिश्तेदारों से पहले पड़ोसी ही पहुंचते हैं.

कुछ रिश्ते ऐसे भी बनाने पड़ते हैं जो समय की जरूरत होते हैं, जैसे व्यापारिक रिश्ते, आसपड़ोस से संबंध, क्लब या अन्य सामाजिक गठबंधन. ये रिश्ते बनते तो हमारी जरूरतों की वजह से हैं लेकिन अगर हम इन में स्नेह और अपनापन भी शामिल कर लें तो कोई हर्ज नहीं है. न जाने कब ये गहरा रूप ले लें और जीवनभर सार्थक साथ निभाएं.

जब बनाएं वैवाहिक संबंध

आजकल विवाह से पहले ही फोन पर बातें करना, मिलनाजुलना आम बात है. ऐसा कर के भावी जीवनसाथी एकदूसरे के बारे में जानने का प्रयास करते हैं. अपनी अपेक्षाएं और नए जीवन की योजनाएं बना कर अपने विचारों को सांझा करते हैं. इस दौरान दुनिया बहुत हसीन लगती है. प्यार के सब्जबाग खिले रहते हैं. सबकुछ बहुत अच्छा और दुनिया अचानक से बहुत खूबसूरत लगने लगती हैं. लेकिन हकीकत, खयालों और बातों की दुनिया से बहुत इतर होती है. जब तक इस का भान होता है तब विवाह के पहले के हसीन सपनों में किचन के मसालों की गंध आने लगती है क्योंकि तब तक प्रेम का इत्र उड़ चुका होता है. अपने साथी से चिढ़ होने लगती है. उस के वादे झूठे लगने लगते हैं और रिश्तों पर से भरोसा उठने लगता है.

यही वह समय है जब दिल की नहीं दिमाग की सुननी चाहिए. कुछ न समझ आए तो किसी काउंसलर से बात करनी चाहिए और सब से उपयोगी सलाह ‘समय’ देना चाहिए. नया रिश्ता है. नई जगह और नए लोग. जाहिर है कि किसी नई जगह जाने पर हम वहां के माहौल और लोगों को पहले औब्जर्व करते हैं न कि जाते ही अपने मन की करने लगते हैं. ठीक है कि वह नई जगह आप की ससुराल है जहां पर आप को अपना शेष जीवन बिताना है. जीवन सुखमय हो, खुशहाल हो, इस के लिए धीरज रखने की जरूरत है. नए घर में आप को कैसे जगह बनानी है, यह आप की समझदारी पर निर्भर होता है.

अगर सास से मां जैसे व्यवहार की उम्मीद करती हैं तो खुद भी बेटी जैसी बनिए. हर वक्त कमियों और खामियों का रोना ले कर न बैठें. जो है, जैसा है, उसे खुशी से स्वीकार करें. ननद आप से कभी कुछ मांगे तो मुंह सिकोड़ कर न कहने के बजाय उसे वह चीज दे दें. उसे यह एहसास दिलाएं कि इस्तेमाल करने के बाद वह उस चीज को सुरक्षित लौटाए.

पति की जिम्मेदारियों को समझें न कि ‘मेरा समय खराब है’, ‘मत मारी गई थी जो तुम से शादी कर ली’ जैसे ताने दें. किसी की तुलना खुद से कर के पति को नीचा न दिखाएं जैसे कि फलां के पास इतने जेवर हैं, या उन्होंने नई गाड़ी ली है वगैरह.

इन पर अमल कर पाना शुरूशुरू में भले ही मुश्किल हो लेकिन एक बार यह कला आप सीख लेती हैं तो समझो सारे रिश्ते आप की मुट्ठी में और इन को हैंडल करने की चाबी आप की कमर में.

चिकन पौक्स होने से पहले हो जाएं सावधान, जानिए लक्षण

चिकन पौक्स होने के बाद लोगों के पास परेशान होने के अलावा कोई चारा नहीं होता. इसमें लोग बहुत ज्यादा परेशान होते हैं. शरीर पर हुए पौक्स ना सिर्फ उन्हें दर्द देते हैं बल्कि उनमें बहुत जलन और खुजली भी होती है. इसके शुरू होने से दो तीन दिन पहले से तेज सिरदर्द, गले में सूजन, खांसी और छिंकने जैसी परेशानियां होने लगती हैं. जैसे जैसे शरीर पर इसका असर फैलता है इनका रूप और ज्यादा भयानक होने लगता है. हम इसके कुछ और लक्षण के बारे में आपको बताएंगे ताकि आप बेहतर इलाज की तौयारी पहले से कर सकें और मरीज को कम परेशानी हो.

  • खुजली और लाल निशान

इसके शुरुआती लक्षण तेज सिरदर्द, खांसी और गले में सूजन जैसी परेशानियां होती है. पर बस इस लक्षणों से बीमारी को ठीक से समझ पाना आसान नहीं होता. पर जब आपके शरीर पर लाल निशान और खुजली होने लगे तो समझ जाइए कि आपको चिकन पौक्स होने वाला है. इ, दौरान खुजली और जलन काफी तेज होती है. इससे मरीज काफी परेशान होता है. जिन लोगों को पहले से त्वचा संबंधी परेशानी है उन्हें और ज्यादा परेशानी हो सकती है.

  • थकान

चिकन पौक्‍स के कारण थकान, उल्टी और भूख में कमी जैसी परेशानियां होती हैं, इसलिए कुल मिलाकर बच्‍चे को काफी थकान महसूस हो सकती है.

  • चिकन पौक्‍स के निशान

खुजली के 12-14 घंटे के भीतर लाल निशान, गोल गोल धक्‍कों आवा निशानों में बदल जाते हैं. इन निशानों के ऊपर छाले बन जाते हैं, जो धीरे-धीरे घाव का रूप ले लेते हैं. आमतौर पर ये घाव सबसे पहले पेट, चेहरे, पीठ और छाती पर नजर आते हैं. घावों की संख्‍या हर व्‍यक्ति को अलग हो सकती है. लेकिन, आमतौर पर पूरे शरीर पर 200-250 निशान हो सकते हैं.

  • भूख ना लगना

कई बार लोगों को खुजली और जलन के साथ तेज बुखार और पेट दर्द की शिकायते होती हैं. इस दौरान मरीज का उनका वजन भी घट सकता है.

नानुकर का कहां सवाल

हाय, ये लाजभरी कजरारी पलकें
मदअलसाई निंदियारी सपनीली आंखें
गोरे चिकने शानों पे बिखरीबिखरी घटा
घनघोर महकी स्याह रेशमी जुल्फें.

हाय, ये लपलपाती नाजुक पतली कटारी कमर
गजगामिनी इठलाती मतवाली हंसिनी चाल
नखशिख गदराया मखमली ‘पूनम’ सा यौवन
गुलाब की लचकती मस्ताई शोख कुंआरी डाल.

न यों रूठी रहो बौराए वसंती फालगुन में
शराबी रस में भीगो डूबो उतर आओ प्रेमांगन में
नशीले सिंदूरी मौसम के कसे आलिंगन चुंबन में
चुनरी चोली अंगिया के अर्द्धखुले कच्चे बंधन में.

खनकाओ चूडि़यां झनकाओ पायल
छलकाओ अमृत मधुकलश और कर दो घायल हाय,
दूधिया जोबन से सरका आंचल
गहरी नदिया निहार तनमन हुआ पागल.

पोरपोर उद्याम प्यास तेज श्वासप्रश्वास
मृदंग बनी धड़कन
अब क्या दूर क्या पास हाय,
ये सुर्ख शहदीले होंठ अंगूरी गुलाली गाल

होली में कैसी शर्मोहया,
नानुकर का कहां सवाल.

– सुभाष चंद्र झा

राहुल को महामानव बना रही भाजपा

कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी जापानी युद्धकला अकीदों में ब्लैक बैल्ट हैं. यह सैल्फडिफैंस मार्शल आर्ट है. इस में सामने वाले को पटकनी देना सरल होता है. इस में खुद को नियंत्रित और एकाग्र रखना जरूरी होता है. इस कला में दुश्मन की एनर्जी को ही उस के खिलाफ प्रयोग किया जाता है. राहुल गांधी अब यही दांव राजनीति में अपना रहे हैं. यही वजह है कि वे अपनी किसी आलोचना से घबरा नहीं रहे.

राहुल गांधी अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उन की ही भाषा में जवाब दे रहे हैं. जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद को चौकीदार कहा तो राहुल ने चौकीदार की सजगता को मुद्दा बना कर राफेल डील, नीरव मोदी, अडानी और विजय माल्या जैसे तमाम मुद्दे उन के सामने रख दिए. जिस सीबीआई को भाजपा कांग्रेस के समय पिंजरे का तोता कह रही थी, उसे अब कांग्रेस ने भ्रष्टाचार से भी जोड़ दिया है.

ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का खौफ भाजपा नेताओं के मन में गहरे पैठ गया है. भाजपा का एक वर्ग राहुल गांधी को ‘पप्पू’ और ‘बुद्धिहीन’ मानता है. इस के बाद भी भाजपा को पूरे देश में केवल राहुल गांधी का ही खौफ सता रहा है. राफेल डील से ले कर सीबीआई में मची रार पर राहुल गांधी के तर्कपूर्ण कटाक्षों को पूरा देश महसूस कर रहा है. आज राहुल गांधी अकेले ऐसे नेता हैं जिन का खौफ भारतीय जनता पार्टी के अंदर ही नहीं, मोदी सरकार के अंदर भी बैठ गया है.

सीबीआई में मची ऐतिहासिक लड़ाई के राजनीतिक मुद्दा बनते ही भाजपा के प्रचारतंत्र ने सीबीआई डायरैक्टर आलोक वर्मा को भी कांग्रेसी खेमे से जोड़ कर पूरे मामले में राहुल गांधी को जिम्मेदार बताना शुरू कर दिया. ऐसे में यह साफ दिखता है कि भाजपा केवल राहुल गांधी को ही अपने विरोध में खड़ा देख रही है. इस तरह वह उन को महामानव बनाने में लगी है.

भाजपा को यह पता चल चुका है कि वह अपने सब से उच्च शिखर तक पहुंच चुकी है. वहां से अब निकलने वाला रास्ता ढलान की तरफ ही जाता है. ऐसे में अगर राहुल गांधी विरोधी दलों को एकजुट करने या कांग्रेस को विकल्प के रूप में जनता के सामने पेश करने में सफल रहे तो मोदी का मैजिक फेल होते देर नहीं लगेगी. ऐसे में भाजपा राहुल गांधी को ही निशाने पर रख कर हर असफलता उन के माथे मढ़ना चाहती है. भाजपा की इस कोशिश में राहुल गांधी राजनीति के केंद्र बनते जा रहे हैं. राहुल की आलोचना ही उन की ताकत बन रही है. भाजपा के तमाम प्रयासों के बाद भी देश की जनता अब ‘पप्पू’ यानी राहुल गांधी को जुझारू नेता मान रही है.

दांव पर मोदी का मैजिक

अगर देश की जनता भाजपा के साथ है और देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बरकरार है तो राहुल गांधी से इस तरह के खौफ की वजह क्या हो सकती है? असल में मोदी सरकार ने साढ़े 4 साल जिस तरह से सरकार चलाई उस में जनता को राहत देने वाला कोई काम नहीं हुआ. महंगाई, आधारकार्ड, जीएसटी और नोटबंदी जैसे काम जनता के लिए सिरदर्द साबित हुए. बैंक सेवक नहीं, बल्कि मालिक हो गए.

भाजपा को एहसास हो रहा है कि साढ़े 4 सालों के सरकार के निक्कमेपन पर केवल राहुल गांधी ही चोट कर सकते हैं. राहुल गांधी न हों तो निकम्मापन छिपा रह जाएगा. ऐसे में भाजपा का एक ही अभियान है कि राहुल गांधी को रोक लो. भाजपा के राहुल रोको अभियान से लग रहा है जैसे भाजपाई उन को महामानव समझ रहे हैं. इतिहास के सब से बुरे दौर में पार्टी संभालने वाले राहुल गांधी से भाजपा का यह डर ही उन की ताकत बनता जा रहा है.

करीब 13 साल कांग्रेस में कामकाज देखने के बाद राहुल गांधी ने साढ़े 47 साल की उम्र में दिसंबर 2017 में राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभाला था. कांग्रेस का जनाधार लगभग खत्म हो चुका था. 2014 के लोकसभा चुनाव में उस के केवल

44 सदस्य चुने गए. कांग्रेस का वोट प्रतिशत 19 के करीब था. 2014 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद भी कांग्रेस की हालत में सुधार नहीं हुआ. इस के बाद हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को ज्यादातर में हार का ही सामना करना पड़ा. महाराष्ट्र, हरियाणा और असम जैसे कांग्रेसी किले भी ढह गए.

भाजपा का कांग्रेसमुक्त भारत का सपना लगभग पूरा हो चुका है. इस के बाद भी भाजपा का राहुल गांधी से खौफ खाना बताता है कि राहुल को जनता का समर्थन हासिल हो रहा है. केंद्र सरकार के साढ़े 4 वर्षों के निकम्मेपन ने राहुल गांधी को ताकत दे दी है. राहुल गांधी के पास कांग्रेस का सब से कमजोर दौर का संगठन है. वे अकेले नेता हैं जिन को जनता उम्मीद से देख रही है. वे महामानव बन कर अगर भाजपा को हरा नहीं सकते, तो भाजपाइयों में डर क्यों है?

विपक्षी एकजुटता के पैरोकार

राहुल गांधी विपक्षी एकता के सूत्रधार हैं. बिहार में जब नीतीश कुमार राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस का महागठबंधन छोड़ कर भाजपा के साथ गए तो राहुल गांधी ने राजद का साथ दिया. कर्नाटक में जब विपक्ष की एकजुटता दिखाने का समय आया तो कांग्रेस ने 2 कदम पीछे हटते हुए त्याग की भूमिका अदा की. राहुल गांधी का उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव, मायावती, महाराष्ट्र में शरद पवार, कर्नाटक में देवगौड़ा, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू के साथ बेहतर तालमेल है.

राहुल गांधी बिना किसी अहं के विपक्षी एकजुटता को बनाए रखने का काम कर रहे हैं. ऐसे में भाजपा को यह डर है कि कहीं राहुल गांधी भाजपा के खिलाफ विपक्ष को एकजुट रखने में सफल हो गए तो उस के लिए 2019 में वापसी करना संभव नहीं होगा. भाजपा में राहुल का एक स्वाभाविक डर बैठ गया है.

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन भले ही न हो सका हो पर बसपा नेता मायावती ने राहुल गांधी की कोई आलोचना नहीं की. मायावती ने कांग्रेसबसपा गठजोड़ टूटने की वजह दिग्विजय सिंह को बताया. लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की सीटें किसी भी क्षेत्रीय दल से अधिक होंगी. ऐसे में भाजपा के खिलाफ जो भी पार्टी विरोध को बुलंद कर पाएगी वह कांग्रेस ही होगी.

भाजपा इस बात को समझती है. इस वजह से वह सपा और बसपा जैसी छोटी पार्टियों में मचे अंतर्विरोध को हवा देने का काम कर रही है. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी में शिवपाल यादव की सेंधमारी का लाभ भाजपा को होगा. इसी तरह प्रतापगढ़ की कुंडा विधानसभा सीट से विधायक राजा भैया के अलग पार्टी बनाने से अगड़ी जातियां खासकर ठाकुर बिरादरी के उन के साथ जाने से इन जातियों के कांग्रेस के साथ जाने का खतरा कम हो जाएगा, जिस का लाभ भाजपा को होगा.

युवा नेताओं का बढ़ता असर

राजनीति में युवा नेताओं का प्रभाव बढ़ रहा है. भारतीय जनता पार्टी में नरेंद्र मोदी और अमित शाह युवा नेता नहीं हैं, जिस तरह एक समय कांग्रेस में युवा नेताओं का महत्त्व घट रहा था, उसी तरह से अब भाजपा में युवा नेताओं का काम केवल नारे लगाना और कुरसी बिछाना रह गया है. देश की राजनीति में युवाओं का महत्त्व बढ़ रहा है. ये कट्टरता और भ्रष्टाचार दोनों से दूर हैं. ये राहुल गांधी के समकक्ष नेता हैं. इन में जम्मूकश्मीर में उमर अब्दुल्ला, राजस्थान में सचिन पायलट, मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया, उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव, बिहार में तेजस्वी यादव प्रमुख हैं. ये नेता राहुल गांधी के साथ राजनीतिक और व्यावहारिक दोनों स्तर पर करीब हैं. भाजपा के पास ऐसे नेताओं की कमी हो रही है.

48 वर्षीय राहुल गांधी के पास संसदीय कार्यों का लंबा अनुभव है. पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद उन की स्वीकार्यता बढ़ी है. वे युवाओं की तरह फिट हैं. जापानी युद्धकला अकीदों में वे ब्लैक बैल्टहैं जो उन को चुस्तदुरस्त बनाए रखने में मदद करती है. राहुल ने अपने राजनीतिक जीवन में हर तरह का संघर्ष देख लिया है. राहुल गांधी ने जमीनी स्तर पर तमाम आंदोलन खडे़ किए. कांग्रेस के सब से कमजोर संगठन के बाद भी वे अकेले अपने कंधों पर पार्टी का बोझ उठाए हुए हैं.

पूरे देश में राहुल गांधी एकजैसी व्यक्तिगत पकड़ रखते हैं. जो सक्रियता प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा नेता नरेंद्र मोदी ने हासिल की, राहुल गांधी ने कमजोर दल के नेता होने के बाद भी उस को हासिल कर लिया है. राजनीति में जिस समय राहुल गांधी का पदार्पण हुआ था उस समय भले ही वे कमजोर स्वभाव के रहे हों पर अब उन का स्वभाव दृढ़निश्चय वाला हो गया है. वे अब एक तपेतपाए नेता की तरह दिखते हैं.

सोशल मीडिया पर बढ़ता प्रभाव

राहुल गांधी का सोशल मीडिया पर व्यापक प्रभाव है. उन के ट्वीट प्रधानमंत्री को भारी पड़ने लगे हैं. इस के पीछे उन की बदलती कार्यशैली है. लोकसभा में जब बहस चल रही थी, राहुल गांधी ने अपनी सीट से उठ कर प्रधानमंत्री की सीट के पास जा कर उन को गले लगाया. यह दृश्य पूरी मीडिया पर भारी पड़ गया. राहुल गांधी के प्रचार को मात देने के लिए भाजपा ने जो अभियान चलाया उस में भी राहुल गांधी ही छाए रहे.

पैट्रोल की बढ़ती कीमतों पर राहुल गांधी के सवाल का समर्थन पूरे देश ने किया. इस के बाद केंद्र सरकार को डीजलपैट्रोल सस्ता करना पड़ा. भाजपा ने राहुल गांधी के धर्म को ले कर कई बार सवाल उठाए. उस के बाद राहुल गांधी ने मंदिरों के दर्शन का सिलसिला शुरू कर दिया. जिस के बाद भाजपा को बैकफुट पर आना पड़ा. अब भाजपा उन के मंदिर जाने का मजाक नहीं उड़ाती है.

भाजपा ने जिस राहुल गांधी का पप्पू और शहजादा कह कर मजाक उड़ाया, वह अब निखर कर नेता बन कर सामने खड़ा हो गया है. अब राहुल गांधी अपने परिवार के नाम से नहीं, बल्कि अपने काम की वजह से जाने जाते हैं. यही वजह है कि भाजपा ने राहुल गांधी को ही केंद्र में रख कर अपने विरोध की चुनावी राजनीति को अंजाम देना शुरू किया है.

भाजपा की इस रणनीति से राहुल गांधी महामानव बन गए हैं.ऐसे में केंद्र के विरोध में उठने वाले हर सुर को राहुल गांधी में दम दिख रहा है. कांग्रेस को भी अपनी ताकत का केंद्र राहुल गांधी में दिख रहा है. तमाम तरह के आरोपों से दूर राहुल गांधी केंद्र सरकार के विरोध में मुखर स्वर बन चुके हैं. राहुल के लिए अच्छी बात यह है कि अब उन्हें गंभीरता से सुना भी जा रहा है.

बुढ़ापे में अकेलापन

नई चिकित्सा ने जहां लोगों की आकस्मिक मृत्यु को रोक दिया है, वहीं बढ़ते बुढ़ापे ने एक समस्या खड़ी कर दी है जो दिनोंदिन विकराल होती जा रही है. दिल्ली के निकट गुरुग्राम में 77 साल के एक वृद्ध का पत्नी के साथ वसीयत करना, आत्महत्या का पत्र लिखना और फिर पत्नी का गला रेतने के बाद अपनी नसें काट लेना उसी समस्या का मात्र एक उदाहरण है.

ऐसा देश के कोनेकोने में हो रहा है. और भारत में ही नहीं, विदेशों में भी ऐसी घटनाएं घट रही हैं. रिटायरमैंट के बाद कुछ साल तो निकल जाते हैं पर जैसेजैसे बच्चे, अगर हैं, अपनीअपनी गृहस्थी में व्यस्त होने लगते हैं, तो जिंदगी में एक खालीपन छाने लगता है और जीवन बेकार सा महसूस होने लगता है. संपत्ति होते हुए भी नकदी कम होने लगती है, बीमारियों पर खर्च बढ़ने लगता है.

ये ऐसे तनाव हैं जिन के उदाहरण या नियम कम हैं. इन से कैसे निबटें, यह न बच्चे जानते हैं न पड़ोसी और न डाक्टर. ऊपर से इन वृद्धों को लूटने वाले चारों और बिखरे रहते हैं. कोई घर का नौकर बन कर आता है तो कोई बैंक मैनेजर. गुरुग्राम वाले इस दंपती ने अपना 40 लाख रुपया एक आटा मिल वाले को दे रखा था जो हाल में लापता हो गया था.

अच्छे घरों और अच्छे पदों पर रहने वाले लोगों के लिए बुढ़ापा एक आफत बन कर आ रहा है, खासतौर पर जब दोनों में से एक साथ छोड़ जाए.

अब समाज में ऐसा भी होने लगा है जब पतिपत्नी अपनेआप में इतने व्यस्त और संतुष्ट रहते हैं कि वे बच्चे चाहते ही नहीं हैं और पूरे तर्क सहित सोचविचार कर बच्चे न पैदा करने का निर्णय लेते हैं.

25-30 वर्ष की आयु में लिए गए इस निर्णय का असर 60-70 की आयु में दिखता है जब कोई उन की संपत्ति को लेने वाला नहीं बचता कि जो बदले में साधारण देखभाल भी प्यार समेत दे दे. हां, लूटने वाले बहुत आ जाते हैं. इन वृद्धों का हाल उन से ज्यादा बुरा नहीं है जिन के बच्चे विदेशों में जा कर बस गए हैं.

इस समस्या का हल वृद्धाश्रम से ज्यादा आसान एक ही घर में 4-5 वृद्धों का रहना होगा. बिल्डरों को ऐसे सुविधाजनक घर बनाने चाहिए जिन्हें वे केवल प्रौढ़ों और वृद्धों को बेचें और उन की बनावट ऐसी हो कि वृद्ध उन्हें खुद मैनेज कर लें और कमजोर होने पर भी उन्हें संभाल सकें. सरकारों से उम्मीद

तो नहीं की जा सकती कि वे उन्हें सहायता देंगी पर वे कम से कम ऐसे मकानों, जो 70 साल से ऊपर वालों के हैं, करमुक्त, मुफ्त बिजलीपानी के कर दें ताकि बुजुर्गों को बिलों का भुगतान न करना पड़े.

गुरुग्राम के बुजुर्ग दंपती गुरमीत कौर और हरमीक सिंह ढिल्लों ने अगर आत्महत्या करने का फैसला किया तो बहुत गलत न था, क्योंकि वे अब ऐसे माहौल में पहुंच गए थे जहां चारों ओर मगरमच्छ ही मगरमच्छ थे.

यार को बनाया गुनहगार : प्रेमी के साथ मिल प्रिया ने क्या किया

18 जुलाई, 2018 की बात है. रात के करीब 11 बजने वाले थे. रिटायर्ड बैंक अधिकारी कृष्णकांत गुप्ता ने कुछ देर पहले ही रात का भोजन किया था. इस के बाद कुछ देर टीवी देखा और ड्राइंग रूम में बैठ कर पत्नी चंद्रकांता से इधरउधर की बातें कीं. गुप्ता और उन की पत्नी जब घरपरिवार की बातें कर रहे थे तो उन की 10 महीने की पोती नितारा दादी की गोद में ही सो गई थी. इस बीच नौकरानी प्रिया ने भोजन के बरतन वगैरह साफ कर लिए थे.

अब कोई काम भी नहीं था. कृष्णकांत गुप्ता को नींद आने लगी तो उन्होंने पत्नी चंद्रकांता से कहा, ‘‘मैं तो सोने जा रहा हूं. तुम भी दिन भर की थकी हुई हो, अब सो जाओ और नितारा को भी अपनी गोद से बिस्तर पर लिटा दो.’’

‘‘हां, मैं भी थक गई हूं, अपने कमरे में जा कर सोती हूं.’’ चंद्रकांता ने कहा.

कृष्णकांत गुप्ता ड्राइंग रूम से उठ कर अपने कमरे में जाने लगे तो उन्हें अपने मकान के पोर्च में कुछ हलचल सी महसूस हुई. उन्होंने गेट खोल कर देखा तो 3 अनजान लोग घर के अंदर खड़े मिले. उन्होंने उन लोगों से पूछा, ‘‘क्या बात है, तुम कौन हो और यहां क्यों खड़े हो?’’

कृष्णकांत गुप्ता के सवालों से घबरा कर वे तीनों आदमी सौरी बोलते हुए यह कह कर वहां से चले गए कि रात के अंधेरे में हम गलती से रामदेव का घर समझ कर आप के घर के अंदर आ गए. हमें रामदेव के घर जाना है. वे तीनों अनजान आदमी भले ही वहां से चले गए. लेकिन गुप्ताजी के मन में कई तरह की शंकाएं उठने लगीं.

कृष्णकांत गुप्ता जयपुर के गोपालपुरा बाईपास पर स्थित पौश कालोनी 10बी स्कीम में रहते थे. 3 साल पहले ही वह इलाहाबाद बैंक से अधिकारी पद से रिटायर हुए थे.

इस मकान में वह अपनी पत्नी चंद्रकांता और 10 महीने की पोती नितारा के साथ रहते थे. उन का बेटा अंकुर और बहू अंकिता मुंबई में रहते हैं. बेटा अंकुर मुंबई में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) में काम करता है.

कृष्णकांत गुप्ता ने घर के छोटेमोटे कामकाज और पोती की देखभाल के लिए एक नौकरानी प्रिया साहू को काम पर रख लिया था. उसे रहने के लिए अपने मकान में ही एक कमरा दे दिया था. उसे वह 16 हजार रुपए महीने की सैलरी देते थे. वह पश्चिम बंगाल की रहने वाली थी.

कृष्णकांत गुप्ता को शंका हुई तो उन्होंने कालोनी समिति के अध्यक्ष हंसराज और सचिव गोपाल को फोन कर के अपने घर बुलाया. इसी के साथ उन्होंने पुलिस को भी सूचना दे दी. 3 संदिग्ध लोगों की बात सुन कर कालोनी के लोग उन के यहां जमा हो गए. लोगों ने रात में ही गलियों में घूम कर उन संदिग्ध लोगों को ढूंढा, लेकिन वे नहीं मिले.

इस बीच सूचना पा कर 2 पुलिसकर्मी वहां पहुंच गए. कृष्णकांत गुप्ता ने उन्हें अपने यहां आए 3 संदिग्ध लोगों के बारे में बताया तो उन पुलिस वालों ने भी मोटरसाइकिल से गलियों के चक्कर लगाए और वहां से चले गए. तब तक रात के करीब 1 बज गए थे. उन तीनों अनजान लोगों का कुछ पता नहीं चला तो कालोनी के लोग भी गुप्ताजी को सावधान रहने की बात कह कर अपनेअपने घर जा कर सो गए.

तड़के करीब 3 बजे कृष्णकांत गुप्ता अपने कमरे में जब गहरी नींद में सो रहे थे तो उन की नींद घर में कुछ लोगों की हलचल की आवाज से टूट गई. वह कुछ समझ पाते, इस से पहले ही 2-3 बदमाश उन के घर में घुस आए और उन का मुंह व हाथपैर साड़ी व चुनरी से बांध दिए. इस के बाद बदमाश चंद्रकांता के कमरे में पहुंचे. बदमाश उन्हें चाकू दिखा कर धमकाते हुए उन के पति के कमरे में ले आए.

इस के बाद बदमाशों ने उन के घर से तमाम कीमती सामान बटोर लिया. बदमाशों ने अलमारी के ऊपर रखे चांदी के बरतन उतारने के लिए चंद्रकांता से कहा तो चंद्रकांता ने अपने पैर में रौड लगी होने की वजह से ऊपर चढ़ने से इनकार कर दिया.

बदमाशों ने चाकू दिखा कर उन्हें जान से मारने की धमकी दी तो चंद्रकांता ने कहा कि टेबल पर चढ़ कर गिरने से मरूंगी, इस से अच्छा है कि तू ही मुझे मार दे.

बाद में एक बदमाश ने टेबल पर चढ़ कर चांदी के बरतन उतारे. लूटपाट के दौरान बदमाशों ने अपने साथ टिफिन में लाया खाना भी खाया. उस टिफिन को बाद में वह मकान के बाहर फेंक गए थे.

करीब आधे घंटे तक लूटपाट करने के बाद बदमाश वहां से करीब 15 लाख रुपए के गहने, चांदी के बरतन और ढाई लाख रुपए नकद बटोरने के बाद गुप्ता दंपति की 10 महीने की पोती नितारा को साथ ले जाने की धमकी देने लगे. इस पर चंद्रकांता बिफर गईं. वह बोलीं कि सब कुछ ले जाओ लेकिन मेरी पोती की तरफ आंख उठा कर भी मत देखना. मेरे जीते जी तुम मेरी पोती को नहीं ले जा सकते.

चंद्रकांता का रौद्र रूप देख कर बदमाशों ने नितारा को तो छोड़ दिया लेकिन वह 3 मोबाइल फोन और एक टैबलेट तथा कृष्णकांत गुप्ता का एटीएम कार्ड भी ले गए. बदमाशों ने लूटे गए माल को बैगों में भर लिया. फिर उन्होंने चंद्रकांता और उन की पोती को एक कमरे में बंद कर दिया और कृष्णकांत गुप्ता को दूसरे कमरे में.

इस के बाद बदमाश पोर्च में खड़ी गुप्ताजी की टोयटा इटियोस कार नंबर आरजे14सी आर5236 में सवार हो कर नौकरानी प्रिया को भी अपने साथ ले गए. जिस समय बदमाश घर में लूटपाट कर रहे थे, उस समय नौकरानी प्रिया चुपचाप तमाशा देख रही थी. प्रिया अपना सारा सामान समेट कर उन बदमाशों के साथ चली गई थी.

बदमाशों के जाने के बाद चंद्रकांता ने कमरे की खिड़की से पड़ोसियों को कई आवाजें लगाईं, लेकिन किसी ने नहीं सुनीं. इस बीच, दूसरे कमरे में हाथपैर बंधे पड़े कृष्णकांत ने किसी तरह खुद को आजाद किया. उन्होंने पत्नी चंद्रकांता को आवाज दी तो पता चला कि वह कमरे में बंद है. उन्होंने पत्नी और पोती को कमरा खोल कर बाहर निकाला. इस के बाद मौर्निंग वाक पर निकले कालोनी के लोगों को बुला कर वारदात की जानकारी दी.

इस के बाद पुलिस को सूचना दी गई. शिप्रापथ थाना पुलिस ने मौके पर पहुंच कर जांचपड़ताल शुरू की. फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट्स ने मकान से अंगुलियों के निशान लिए. डौग स्क्वायड की भी मदद ली गई. बाद में डीसीपी डा. विकास पाठक और अन्य पुलिस अधिकारी भी मौके पर पहुंचे और गुप्ता दंपति से बदमाशों के हुलिया, बोलचाल आदि के बारे में पूछताछ की.

पूछताछ में पता चला कि घर में लूटपाट करते हुए 3 बदमाश नजर आए थे. इन में एक ने सफेद रंग की शर्ट और 2 बदमाशों ने टीशर्ट व जींस पहन रखी थी. बदमाशों के साथ प्रिया के भी जाने से यह बात साफ हो गई कि नौकरानी प्रिया पहले से ही बदमाशों से मिली हुई थी.

उसी ने बदमाशों के लिए मकान का गेट खोला था. बाद में वह उन्हीं बदमाशों के साथ चली गई. पुलिस का अनुमान था कि घर में भले ही 3 बदमाश घुसे थे, लेकिन उन के साथी आसपास बाहर निगरानी पर जरूर रहे होंगे.

पुलिस ने नौकरानी प्रिया साहू के बारे में जांचपड़ताल की तो पता चला कि करीब 4 महीने पहले जयपुर सर्वेंट सेंटर के मार्फत उसे 16 हजार रुपए महीने की तनख्वाह पर रखा था. तब उन्हें बताया गया था कि प्रिया साहू 3 साल तक भीलवाड़ा में एक डाक्टर के घर पर भी काम कर चुकी है.

एजेंसी ने प्रिया का पुलिस वेरिफिकेशन होने का भी दावा किया था. उसी समय कृष्णकांत गुप्ता ने प्रिया को सैलरी के अलावा रहने और खानेपीने की सुविधाएं देने की बात कही थी. कुछ दिनों अपने यहां काम पर रखने के बाद कृष्णकांत गुप्ता ने प्रिया को मुंबई में अपने बेटेबहू के पास एक महीने तक काम करने के लिए भी भेजा था.

पुलिस ने जब जयपुर सर्वेंट सेंटर के संचालक फहीम को थाने बुला कर पूछताछ की तो पता चला कि उस ने प्रिया का पुलिस सत्यापन नहीं कराया था. इस के अलावा उस का नाम प्रिया नहीं बल्कि परवीन खातून था.

प्रिया फर्राटे से अंगरेजी बोलती थी और समझती भी थी लेकिन वह हिंदी नहीं जानने और घड़ी में समय नहीं देखने आने की बात कहती थी.

कृष्णकांत ने पुलिस को बताया कि बेटे ने अमेरिका से लाया हुआ एक मोबाइल फोन वारदात से 12 घंटे पहले ही कुरियर से भेजा था. बदमाश उन दोनों के फोनों के अलावा उस नए मोबाइल को भी ले गए. चंद्रकांता जिस टैबलेट पर रात को समय काटने के लिए फिल्म वगैरह देखती थी. वह टैबलेट भी बदमाश ले गए थे.

वारदात की सूचना मिलने पर कृष्णकांत गुप्ता के बेटेबहू भी 19 जुलाई को ही मुंबई से जयपुर पहुंच गए. गुप्ता के बड़े भाई अशोक गुप्ता जयपुर के ही प्रतापनगर और छोटे भाई अनिल मानसरोवर में रहते हैं.

चंद्रकांता के सासससुर भी जयपुर में मानसरोवर कालोनी में रहते हैं. उन की बेटी भी पति के साथ हैदराबाद से जयपुर आ गई. वारदात का पता चलने पर उन के घर रिश्तेदारों और जानपहचान वालों की भीड़ जुड़ने लगी थी.

पुलिस के लिए चुनौती की बात यह थी कि कालोनी के जिस मकान में डकैती की वारदात हुई, उस के पास ही राजस्थान के पूर्व पुलिस महानिदेशक मनोज भट्ट और जयपुर के महापौर अशोक लाहोटी रहते थे. वारदात का पता चलने पर महापौर कृष्णकांत गुप्ता के घर पहुंचे और मामला दर्ज कराने उन के साथ शिप्रापथ थाने भी गए.

मामला दर्ज होने पर डीसीपी (दक्षिण) डा. विकास पाठक ने अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (दक्षिण) मनोज चौधरी के निर्देशन और एसीपी (मानसरोवर) दीपक कुमार की अध्यक्षता में एक विशेष टीम गठित की. इस के अलावा अभियुक्तों की तलाश में शिप्रापथ थानाप्रभारी सुरेंद्र यादव और श्यामनगर थानाप्रभारी अनिल कुमार जैमिनी के नेतृत्व में 2 अलगअलग टीमें पश्चिम बंगाल भेजी गईं. इन में एक पुलिस टीम हवाई मार्ग से गई थी.

इस बीच पुलिस अपने तरीके से बदमाशों के बारे में सुराग लगाती रही. इस में पता चला कि वारदात से करीब 20 दिन पहले कृष्णकांत के घर पर नौकरानी प्रिया से मिलने एक युवक आया था. प्रिया ने उस युवक को अपना पति बताया था.

पुलिस कृष्णकांत गुप्ता की उस कार का भी पता लगाने में जुट गई, जिस में सवार हो कर बदमाश नौकरानी के साथ भागे थे. जांच में पता चला कि वह कार जयपुर से आगरा रोड हो कर 19 जुलाई की सुबह करीब साढ़े 10 बजे आगरा का मथुरा टोलनाका पार कर के गई थी.

इस के अलावा गुप्ता के एटीएम कार्ड से गाजियाबाद में 3 बार में 12 हजार रुपए निकाले गए थे. ये जानकारियां मिलने पर पुलिस की एक टीम गाजियाबाद भेजी गई.

तकनीकी जानकारियों और खुफिया सूचनाओं के आधार पर वारदात के पांचवें दिन जयपुर पुलिस ने 23 जुलाई, 2018 को नौकरानी परवीन खातून उर्फ प्रिया के अलावा उस के प्रेमी नदीम और एक अन्य बदमाश आमिर खान उर्फ समीर खान को गाजियाबाद से गिरफ्तार कर लिया.

इन के कब्जे से पुलिस ने कृष्णकांत गुप्ता की लूटी गई कार और वारदात में प्रयोग किए 2 चाकू तथा 34 हजार 460 रुपए नकद बरामद किए. इन बदमाशों ने लूट का बाकी सामान अपने एक अन्य साथी के पास होना बताया. इस के बाद पुलिस ने 24 जुलाई को वारदात के मुख्य मास्टरमाइंड दयाराम सिंह को दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया.

बाद में 26 जुलाई को पांचवें आरोपी दिलशाद को भी गिरफ्तार किया गया. इन अभियुक्तों से पुलिस ने गुप्ता के घर से लूटे गए गहने, चांदी के बरतन व अन्य सामान बरामद कर लिया. बदमाशों ने लूटी गई धनराशि में से करीब एक लाख रुपए खर्च कर दिए थे. चूंकि वारदात में 5 लोग शामिल थे, इसलिए पुलिस ने केस में डकैती की धाराएं जोड़ दीं.

इन के अलावा पुलिस ने फरजी दस्तावेज के आधार पर परवीन खातून को प्रिया साहू के नाम से गुप्ता के घर पर नौकरानी पर लगवाने वाले जयपुर सर्वेंट सेंटर के संचालक फहीम को भी 26 जुलाई को गिरफ्तार कर लिया.

इन सभी आरोपियों से पूछताछ के बाद डकैती डालने की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

नदीम उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के कांठ थाना इलाके के गांव पैगंबरपुर सुखवासी लाल के रहने वाले आरिफ का बेटा था. कांठ थाने के गांव बिच्छपुरी का रहने वाला आमिर खान उर्फ समीर खान और पास के ही गांव देहरी जुम्मन का रहने वाला दयाराम उर्फ विकास करीब डेढ़ साल पहले यूपी की जेल में बंद थे.

चूंकि तीनों एक ही जिले के रहने वाले थे, इसलिए तीनों की ही जेल में दोस्ती हो गई. वहां से जमानत पर बाहर आने के बाद भी ये आपस में एकदूसरे के संपर्क में रहे.

बाद में नदीम अहमदाबाद चला गया. अहमदाबाद में प्रिया की बड़ी बहन अपने पति के साथ रहती थी. वह नदीम के साथ ही एक फैक्ट्री में काम करती थी. प्रिया की बहन ने नदीम को अपना एक मोबाइल फोन बेचा था. उस फोन में प्रिया के घर वालों के नंबर भी सेव थे.

उस फोन में जो नंबर लड़कियों के नाम से सेव थे, फुरसत मिलने पर नदीम एकएक कर के उन नंबरों पर बात करता. इसी दौरान एक दिन उस ने प्रिया का नंबर मिलाया. प्रिया ने उस से प्यार से बात की. नदीम को उस की बातें अच्छी लगीं. इस के बाद वह अकसर प्रिया से बातें करने लगा. प्रिया का अपने पति से तलाक हो चुका था. वह अकेली रहती थी. धीरेधीरे नदीम और प्रिया की दोस्ती हो गई.

परवीन खातून उर्फ प्रिया कोलकाता के 24 परगना में रहने वाले आबिद हुसैन की बेटी थी. परवीन खातून घरों में नौकरानी का काम और नवजात शिशुओं की देखभाल का काम करती थी. उस ने प्रिया साहू के नाम से फरजी आईडी बनवा रखी थी. इस आईडी के जरिए वह जयपुर सर्वेंट सेंटर के माध्यम से कृष्णकांत गुप्ता के घर पर नौकरी करने आई थी.

प्रिया उर्फ परवीन खातून ने ही अपने प्रेमी नदीम को जयपुर में रिटायर्ड बैंक अधिकारी कृष्णकांत गुप्ता के घर की सारी जानकारी दी थी. उस ने नदीम को बताया था कि यह अमीर परिवार है और घर में केवल बुड्ढेबुढि़या और उन की पोती रहती है.

प्रिया से गुप्ता के परिवार की जानकारी हासिल करने के बाद नदीम ने प्रिया से शादी करने का वादा भी कर दिया था. इस के बाद वारदात से पहले 5 जुलाई, 2018 को नदीम अपने साथी दयाराम उर्फ विकास के साथ जयपुर चला आया.

नदीम उस दिन अकेला ही गुप्ता के घर जा कर प्रिया से मिला और उसे शादी करने का विश्वास दिलाने के लिए अंगूठी पहनाई. इस दौरान प्रिया ने गुप्ता और उन की पत्नी चंद्रकांता को बताया था कि वह उस का पति है. प्रिया ने नदीम को चायनाश्ता भी कराया था.

नदीम ने कुछ देर प्रिया से बातचीत के दौरान ही गुप्ता के मकान की रेकी कर ली. नदीम के साथी दयाराम ने गुप्ता के मकान के बाहर रह कर कालोनी की रेकी की और आनेजाने के रास्ते देखे.

इस के बाद पूरी योजना बना कर नदीम, आमिर और दयाराम 18 जुलाई को जयपुर पहुंचे. वे सीधे कृष्णकांत गुप्ता के घर पहुंचे. वे तीनों रात को 11 बजे ही वारदात के लिए पहुंच गए. लेकिन कृष्णकांत गुप्ता ने उन्हें देख लिया तो वे वहां से भाग कर आसपास छिप गए. बाद में उन्होंने रात करीब ढाई बजे परवीन खातून उर्फ प्रिया के मोबाइल पर फोन कर के गेट खुलवाया और लूटपाट की वारदात की.

वारदात के बाद वे नौकरानी प्रिया को साथ ले कर गुप्ता की टोयटा इटियोस कार से भाग गए थे. इस के बाद पुलिस ने काल डिटेल्स और एटीएम कार्ड प्रयोग करने की लोकेशन के आधार पर अभियुक्तों तक पहुंचने में सफलता हासिल की.

गिरफ्तार अभियुक्त नदीम के खिलाफ चोरी, बलात्कार और आर्म्स एक्ट के 5 मामले विभिन्न थानों में दर्ज हैं. आमिर खान उर्फ समीर खान के खिलाफ भी 8 आपराधिक मामले गुड़गांव, नोएडा, गाजियाबाद व मुरादाबाद में दर्ज हैं. आमिर खान ने लूट की वारदात के बाद कृष्णकांत की कार की फरजी आरसी और खुद का फरजी ड्राइविंग लाइसेंस भी बनवा लिया था.

अभियुक्त दयाराम उर्फ विकास के खिलाफ चोरी, अपहरण, लूट, एनडीपीएस एक्ट आदि के 9 मामले दर्ज हैं. गुप्ता के घर डाली गई डकैती में गिरफ्तार पांचवें अभियुक्त दिलशाद ने बाकी चारों आरोपियों को गाजियाबाद में फ्लैट में छिपाने में मदद की थी. वह इस वारदात में भी शामिल था. दिलशाद अपहरण के मामले में मुरादाबाद में गिरफ्तार हो चुका है.

पुलिस ने जयपुर सर्वेंट सेंटर के संचालक फहीम को गिरफ्तार कर जांचपड़ताल की तो पता चला कि उस की भूमिका कई मामलों में संदिग्ध है.

फहीम ने न केवल प्रिया उर्फ परवीन खातून को ही फरजी पहचानपत्र के आधार पर नौकरी नहीं दिलवाई बल्कि कई अन्य लड़कियों को भी कोलकाता से ला कर राजस्थान में कई अन्य लोगों के घरों में बतौर नौकरानी रखवाया था.

इन लड़कियों की पुलिस तसदीक कराने का काम सेंटर संचालक फहीम ही करता था, लेकिन फहीम जानबूझ कर इन युवतियों के फरजी नाम व पते से पहचानपत्र बनवा कर लोगों की जानमाल को खतरे में डालता था, इसलिए पुलिस ने उस के खिलाफ अलग से मुकदमा दर्ज किया.

यह विडंबना रही कि प्रिया उर्फ परवीन खातून जिस नदीम के साथ जीवन भर साथ निभाने के सपने देख रही थी, उसी नदीम और उस के साथियों के साथ वह जेल पहुंच गई. प्रिया ने केवल गुप्ता परिवार के साथ ही विश्वासघात नहीं किया बल्कि नौकरानी की पूरी जमात से भरोसा उठा दिया.?

तोड़ दिया धागा प्यार का : राजू और साबिया की कहानी

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला लखीमपुरखीरी के हैदराबाद थाने का एक गांव है सरकारगढ़. इसी
गांव में शराफत खां अपने परिवार के साथ रहते थे. वह खेतीकिसानी का काम करते थे. उन के परिवार में पत्नी नजमा के अलावा 6 बेटे और 3 बेटियां थीं. उन के 2 विवाहित बेटे शब्बन और चमन सऊदी अरब में काम करते थे. बाकी बेटे गांव में ही मेहनतमजदूरी करते थे. उन की सब से छोटी बेटी साबिया खातून काफी सुंदर थी. वह गोला गोकरननाथ कस्बे के एक कालेज से बीए कर रही थी.

थाना कोतवाली गोला के अंतर्गत गांव बहारगंज में लड्डन खां रहते थे, खेतीकिसानी करने वाले लड्डन के परिवार में पत्नी रजिया के अलावा 3 बेटे व 2 बेटियां थीं. लड्डन खां शराफत खां के बेटे शब्बन के ससुर थे. शब्बन की शादी लड्डन की बेटी से हुई थी. रिश्तेदारी होने की वजह से शब्बन का साला राजू उस के यहां आताजाता रहता था. इसी आनेजाने में उस की नजर शब्बन की बहन साबिया पर टिकी रहती थी. वह साबिया को चाहने लगा था. इसलिए वह उस से खूब बातें किया करता था.

धीरेधीरे साबिया का भी झुकाव उस की तरफ होने लगा था. साबिया के स्कूल जाने के टाइम पर वह गांव से बाहर मोटरसाइकिल लिए खड़ा रहता. साबिया के वहां पहुंचने पर वह उसे अपनी बाइक पर बैठा कर कालेज छोड़ने जाता और छुट्टी होने पर उसे गांव के बाहर छोड़ देता. इसी दरमियान दोनों और करीब आते गए. दोनों एक साथ घूमते और मस्ती करते थे.

एक दिन एक पार्क में बैठे हुए दोनों बतिया रहे थे, तभी राजू ने अपनी जेब से पैक की हुई एक छोटी सी डिब्बी निकाल कर साबिया के हाथ पर रख दी. साबिया के होंठ लरज उठे. उस की आंखें भी मासूमियत से राजू को निहार रही थीं. वह आहिस्ता से बोली, ‘‘क्या है इस में.’’

तभी राजू ने कहा, ‘‘खोलो तो सही, अभी मालूम पड़ जाएगा कि इस में क्या है.’’ साबिया ने पैक किया रैपर हटा कर डिब्बी का ढक्कन खोला तो डिब्बी में चांदी की एक अंगूठी दिखाई दी. उस अंगूठी में 2 छोटेछोटे दिल बने हुए थे, जो एकदूसरे से जुड़े हुए थे.

उन जुडे़ दिलों के अंदर छोटेछोटे नगीने भी जड़े हुए थे. अंगूठी देखने के बाद साबिया ने राजू की ओर निहारा. चेहरे पर प्रसन्नता के भाव साफ झलक रहे थे. राजू उस के मनोभावों को समझ चुका था, ‘‘साबिया, कैसा लगा मेरा यह पहला तोहफा?’’

‘‘बहुत अच्छा है.’’ वह बोली.

राजू कहां चूकने वाला था. उस ने पूछा, ‘‘और मैं?’’

साबिया के कपोल पर हया के भाव उभरे. वह खामोश ही रही. साबिया को खामोश देख कर राजू ने उसे पुन: कुरेदा, ‘‘तुम ने बताया नहीं?’’

साबिया सकुचाती और शरमाती हुई बोली, ‘‘मालूम नहीं.’’

तभी राजू ने साबिया के हाथ से अंगूठी ले ली. इस के बाद उस ने साबिया के बाएं हाथ की कलाई अपने हाथ में ले कर उस समय अंगुली में अंगूठी पहना दी.

साबिया खातून के लिए यह पहला अवसर था, जब किसी चाहने वाले युवक ने प्यार भरे अंदाज में उसे छुआ था. वह आनंद से सिहर उठी.

साबिया को घर जाने को काफी देर हो गई थी. वह आहिस्ता से बोली, ‘‘राजू, अब चलो. घर वाले परेशान हो रहे होंगे.’’

‘‘ठीक है, तुम्हें घर तक छोड़ दूं.’’ राजू ने कहा.

‘‘नहीं, तुम मुझे रोज की तरह गांव के बाहर ही छोड़ देना. मैं नहीं चाहती कि घर वालों और गांव वालों को हमारे प्यार की भनक लगे.’’ साबिया ने कहा.

राजू उसे बाइक पर बैठा कर चल दिया. बाइक चलाते हुए राजू बोला, ‘‘साबिया, शायद तुम्हें पता नहीं कि सूर्य को बादल चाहे जितना भी ढक लें, प्रकृति और लोगों को सूर्य के निकलने का अहसास हो ही जाता है. इसी तरह हम जितना भी चाहें कोशिश कर लें, प्यार को बहुत दिनों तक छिपा नहीं सकते.’’

‘‘हां, इतना तो मैं भी जानती हूं, राजू. लेकिन मैं नहीं चाहती कि शुरुआत में ही हमारे प्यार को ले कर कोई समस्या खड़ी हो.’’ इसी तरह बातचीत करतेकराते वह गांव के बाहर तक पहुंच गए. साबिया बाइक से उतरी और अपने घर की ओर चल दी.

वह घर पहुंची तो उसे घर का माहौल रोज की तरह ही सामान्य लगा. इस से उस ने राहत की सांस ली. समय ने साथसाथ उन दोनों का प्यार और प्रगाढ़ होता चला गया. घर और परिवार से दोनों छिपछिप कर मिल लिया करते थे.

किसी चाहने वाले को मुलाकात के लिए चाहे कितना भी समय मिल जाए, इस के बावजूद भी उन की यही चाहत होती है कि काश, इस मुलाकात के समय यह घड़ी की सुइयां भी ठहर जाया करें.

2 दिन बाद राजू साबिया से फिर मिला. तब राजू ने शिकायत की कि वह उसे जितना समय देती है, उतना उस के लिए कम पड़ता है. साबिया ने उसे अपनी मजबूरी बताई और कहा कि वह और ज्यादा देर तक घर के बाहर नहीं रह सकती. फिर भी उस ने प्रेमी की बेचैनी को काफी हद तक दूर करने का रास्ता निकाल लिया.

उस ने कहा कि रात को वह जब फ्री हो कर अपने कमरे में होगी, तब उस के मोबाइल पर मिस काल दे दिया करेगी. इस के बाद वह उसे फोन मिला लिया करे. साबिया ने उसे यह भी हिदायत दी कि जब तक वह उसे मिस्ड काल न किया करे, वह उसे फोन न करे, वरना भेद खुल सकता है. राजू ने खुशीखुशी उस की बात मान ली.

इस के बाद दोनों के बीच मोबाइल पर भी बातें होने लगीं, लेकिन मोबाइल पर उन के द्वारा बातें करने वाली बात परिवार वालों से ज्यादा दिन तक नहीं छिप सकी. एक रात सबीना अपने कमरे में बिस्तर पर लेटी चादर सिर पर तान कर मोबाइल पर राजू से बात कर रह थी.

उसी दौरान उस के पिता शराफत लघुशंका के लिए उठे तो उन्हें साबिया के कमरे से दबीदबी सी आवाज सुनाई दी. साथ ही हल्की हंसी की आवाज से वह ठिठक गए. उन्होंने दरवाजे को धकेला तो वह खुल गया. साबिया चादर के अंदर मुंह छिपाए फोन पर बात करने में व्यस्त थी.

उसे इस बात का जरा भी भान नहीं हुआ कि कब उस के पिता उस के सिरहाने आ कर खड़े हो गए.

शराफत ने कान लगा कर उस की कुछ बातें सुनीं. जितना कुछ शराफत ने सुना, उस से ज्यादा वह समझ गए. इस के बाद शराफत ने एक झटके में साबिया के ऊपर से चादर हटा दी.

चादर हटते ही साबिया चौंक पड़ी. अपने सिर के पास पिता को खड़ा देख कर वह एक झटके से बिस्तर से उठी और उस के मुंह से हकलाहट भरी आवाज निकली, ‘‘अब्बू.’’

वह शराफत के सामने खड़ी कांप रही थी. शराफत ने सवाल नहीं गोले दागे. उन्होंने पूछा, ‘‘किस से बातें कर रही थी?’’

साबिया खामोश रही. शराफत दहाड़ा, ‘‘बोलती क्यों नहीं?’’

साबिया सिसकती हुई संक्षेप में सब बताती चली गई. शराफत ने गुस्से में उफनते हुए कहा, ‘‘आइंदा उस लुच्चे से हरगिज बात मत करना और अगर की तो तेरी खैर नहीं.’’ इतना कह कर शराफत ने उस के हाथ से मोबाइल छीन लिया ओर अपने साथ ले गए.

अगले दिन साबिया राजू से मिली और पूरी बात बता दी. साबिया का मोबाइल छिन जाने के कारण बात नहीं हो सकती थी. इसलिए उसे राजू ने अपना एक मोबाइल देना चाहा, लेकिन साबिया ने लेने से इनकार कर दिया. तब राजू ने गुस्सा जाहिर करते हुए कहा, ‘‘इस का मतलब साबिया तुम मुझ से प्यार नहीं करोगी?’’

वह रुआंसी, सी हो कर बोली, ‘‘राजू, मैं ने ऐसा तो नहीं कहा.’’

‘‘फिर मोबाइल क्यों नहीं ले रही हो?’’

‘‘नहीं, अब मुझे मोबाइल नहीं लेना.’’ कहते हुए उस ने अनामिका से अंगूठी निकाल कर राजू की हथेली पर रख दी. इस के बाद वह वहां नहीं ठहरी. तेजी से घर की ओर रुख कर गई. राजू उसे देखता ही रह गया.

उस ने कई बार उसे पुकारा, ‘‘साबिया…साबिया…’’ लेकिन साबिया को न रुकना था और न वह रुकी. राजू ठगा सा, अपमानित सा खुद को महसूस कर रहा था. उस के अंदाज में प्यार नहीं, बदले की भावना घर कर गई. उस ने पुन: साबिया को आवाज देनी चाही, लेकिन कुछ सोच कर उस ने आवाज नहीं दी.

साबिया के पास मोबाइल फोन भी नहीं था जिस से वह बात कर सके. लिहाजा उन के बीच होने वाली बातचीत बंद हो गई. राजू अब यह सोचने लगा कि यदि साबिया एक बार फिर उस से अकेले में मिले तो वह उसे मना लेगा.

4 दिन बाद दोनों की किसी तरह 10 मिनट के लिए मुलाकात हुई. राजू ने पुन: अपने सोए हुए प्यार को जागृत करना चाहा किंतु साबिया ने साफसाफ मना कर दिया.

राजू के काफी दबाव बनाने पर साबिया ने यहां तक कह दिया, ‘‘राजू, मेरे घर वाले नहीं चाहते कि मैं तुम से किसी तरह का संबंध रखूं इसलिए तुम से न मिलना मेरी मजबूरी है.’’

राजू ने गहरी सांस लेते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हारे घर वालों की बातों को समझता हूं. वे लोग ऐसा चाहते हैं कि तुम मुझ से न मिलो और न बात करो. अब तुम मुझे यह बताओ कि क्या तुम भी अपने घर वालों की बात से पूरी तरह सहमत हो.’’

साबिया थोड़ा झल्ला कर बोली, ‘‘राजू कितनी बार कहूं कि तुम मुझ से जो उम्मीद बांधे हो, वह कभी पूरी नहीं होगी. मैं अपने घरपरिवार से अलग नहीं हो सकूंगी.’’

राजू व्यंग्य से मुसकराते हुए बोला, ‘‘इन सब बातों के बारे में तो तुम्हें बहुत पहले सोचना था. मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं, साबिया. लेकिन तुम मुझ से दूर होने की कोशिश कर रही हो, मैं ऐसा नहीं कर सकता.’’

‘‘तुम कहना क्या चाहते हो, राजू.’’

‘‘मैं कोई दूसरी भाषा में बात नहीं कर रहा हूं, जिसे तुम समझ नहीं पा रही हो.’’

‘‘मैं तुम्हारी कोई बात नहीं सुनना चाहती.’’ कहते हुए साबिया अपने घर की ओर बढ़ चली.

राजू ने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक साल चलने वाला उस का प्यार एक मिनट में यूं टूट जाएगा.

उसे क्या मालूम था कि प्यार का घरौंदा बनाने में पूरी उम्र लग जाती है और बिखरने में पल भर लगता है. प्यार चाहे एक साल का हो या 40 साल का, टूटने का दर्द होना लाजिमी है.

कहीं ऐसा तो नहीं कि साबिया की लाइफ में कोई और आ गया है, तभी तो साबिया एकदम से बदल गई. यह बात राजू के दिमाग में अच्छी तरह से बैठ गई.

साबिया उस की नहीं हो सकी, राजू को इस का दुख था. पर वह किसी और की हो जाए, इस बात को वह कतई बरदाश्त नहीं कर सकता था. इसे संयोग कहें या साबिया की बदनसीबी कि एक रोज राजू ने एक लड़के से साबिया को बातचीत करते देख लिया.

साबिया हंसतीमुसकराती उस से बतिया रही थी. यह देख कर राजू के कलेजे पर सांप लोट गया. फिर कोई एक बार नहीं, बल्कि उस ने उसे उसी लड़के से 2-3 बार बात करते देखा था.

राजू मौके की फिराक में रहने लगा था कि कब साबिया उसे अकेली मिले और उस के मुंह से सच्चाई जाने. सच्चाई जानने के लिए 2-3 मौके हाथ भी आए. उस का साबिया से आमनासामना भी हुआ, लेकिन राजू के कुछ कहने से पहले ही साबिया कन्नी काट कर निकल जाती.

साबिया के इस व्यवहर से राजू छटपटा उठा. सच्चाई जानने के लिए वह राजू व्याकुल रहने लगा. सच्चाई तो वह साबिया के मुंह से ही सुनना चाहता था. वह उपयुक्त समय के इंतजार में था. लेकिन उस के लाख चाहने पर भी उसे मौका नहीं मिल रहा था. उसे यह भी पता चला कि साबिया के पास एक मोबाइल फोन रहता है. उस का नंबर भी उसे मिल गया.

9 जून की रात साढ़े 3 बजे बाइक से राजू साबिया के गांव पहुंचा. फिर साबिया को फोन कर के उस के घर के पास एक खेत में बुलाया. पहले साबिया मना करती रही लेकिन राजू के बारबार कहने पर परेशान हो कर वह उस से मिलने को तैयार हो गई. उस समय साबिया के घर के सभी लोग सो रहे थे. साबिया चुपके से अपने बिस्तर से उठी और मेन गेट खोल कर राजू की बताई जगह पर पहुंच गई.

वहां उसे राजू मिला. वह साहस बटोर कर बोली, ‘‘राजू, मैं कई बार बोल चुकी हूं कि तुम से किसी प्रकार का संबंध नहीं रखना चाहती, इस के बावजूद भी तुम मुझे परेशान कर रहे हो.’’

राजू गहरी नजरों से साबिया की ओर देखते हुए बोला, ‘‘साबिया, क्या तुम उस लड़के से प्यार करती हो?’’

साबिया उस की बातों को नजरअंदाज करती हुई बोली, ‘‘तुम्हारा क्या मतलब है. मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा.’’

‘‘बनो मत साबिया, तुम्हारी बेरुखी मुझे जीने नहीं दे रही है. मुझे यह पता चला है कि तुम्हारा उस लड़के से…’’

‘‘राजू, तुम्हारा यह आरोप गलत और बेबुनियाद है.’’

‘‘मैं ने तुम्हें उस के साथ बातें करते देखा है.’’

साबिया ने आश्चर्य से राजू की ओर देखा, ‘‘तुम क्या कह रहे हो, मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है. किस से बात की, कब बात की और यदि मैं ने किसी से बात कर भी ली तो तुम उस का नाम क्यों नहीं बता रहे हो.’’ साबिया ने नाम जानने को उसे उकसाया.

राजू बोला, ‘‘मुझे नाम बताने की कोई जरूरत नहीं. तुम खुद अच्छी तरह से समझ रही हो. साबिया, अब भी वक्त है, तुम उसे भूल जाओ नहीं तो…’’

उस की बातों पर साबिया को गुस्सा आ गया. वह बोली, ‘‘सुनो राजू, मैं तुम्हारी जागीर नहीं हूं, जिस पर तुम हुकुम चलाओ. मेरी जो मरजी होगी, मैं वही करूंगी. तुम कौन होते हो मुझे रोकने वाले.’’

‘‘जानना चाहती हो, ठहरो बताता हूं.’’ इतना कह कर उस ने अपनी जेब में रखे चाकू को निकाला और साबिया पर वार कर दिया, ‘‘दिल दिया है तो जान भी ले लूंगा.’’

साबिया ने अपने आप को बचाने का भरसक प्रयास किया, लेकिन असफल रही. राजू ने ताबड़तोड़ कई प्रहार साबिया के शरीर पर किए साबिया खून से लथपथ जमीन पर गिर पड़ी. राजू ने फिर उस के गले पर चाकू से कई वार किए. जिस से उस की मृत्यु हो गई. इस के बाद राजू वहां से फरार हो गया.

सुबह होने पर घर वालों ने साबिया को गायब देखा तो वे सभी हैरान रह गए कि वह रात में घर में से कहां चली गई. सभी उसे तलाशने लगे लेकिन कुछ पता नहीं चला.

इसी बीच गांव के किसी व्यक्ति ने खेत में पड़ी साबिया की लाश देखी तो साबिया के पिता शराफत अली खां को यह खबर दे दी. वह घर के अन्य सदस्यों के साथ तुरंत मौके पर पहुंच गए. साबिया की लाश देख कर सब फफक कर रो पड़े.

7 बजे के करीब शराफत ने स्थानीय थाना हैदराबाद में फोन कर के घटना की सूचना दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी सत्येंद्र कुमार सिंह हमराहियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. लाश का निरीक्षण करने के बाद उन्होंने लाश पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दी.

थानाप्रभारी ने शराफत से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि रात में सहरी खाने के बाद सब सो गए थे. सुबह उठे तो साबिया अपने बिस्तर से गायब थी. इस का मतलब यह है कि रात में किसी के बुलावे पर वह मिलने गई. यह काम उस के बेटे शब्बन का साला राजू ही कर सकता है. वही साबिया के पीछे हाथ धो कर पड़ा था. साबिया उस से मिलना पसंद नहीं करती थी.

यह जानकारी मिलने के बाद थानाप्रभारी ने गांव वालों से पूछताछ की तो पता चला कि राजू और साबिया के बीच प्रेमसंबंध थे. उन को कई बार एक साथ देखा गया था. मगर सवाल यह खड़ा था कि राजू ने आखिर साबिया की हत्या क्यों की.

थानाप्रभारी सत्येंद्र सिंह ने शराफत की तहरीर के आधार पर राजू व अज्ञात लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.

चूंकि राजू पहले से ही घर से फरार था, इसलिए उस की सुरागरसी के लिए उन्होंने अपने विश्वस्त मुखबिरों को लगा दिया. 11 जून, 2018 को सुबह सवा 5 बजे पुलिस ने राजू को केशवपुर तिराहे से एक मुखबिर की सूचना पर गिरफ्तार कर लिया.

राजू से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. राजू की निशानदेही पर पुलिस ने आलाकत्ल चाकू, खून से सनी उस की टीशर्ट, पैंट और बाइक बरामद कर ली. इस के बाद उसे न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया.

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अब मत झेलिये वैक्सिंग के दर्द को

आप भी पार्लर में जाकर वैक्स करवाती होंगी और यह भलीभाती जानती होंगी कि वैक्‍सिंग करवाना यानी खूब सारा दर्द झेलना. लेकिन अगर कई बार वैक्‍सिंग करवाई जाए तो शरीर को उसकी आदत हो जाती है और तब दर्द थोड़ा कम होता है. आज हम बात करेंगे कि वैक्‍सिंग के दर्द को प्राकृतिक तरीके से कैसे कम किया जाए, जिससे आप अगली बार हंसती-मुसकुराती वैक्‍सिंग करवा सके.

ऐसे करें दर्द को और कम

– अगर आपको वैक्‍सिंग का दर्द प्राकृतिक तौर पर कम करना है, तो हमेशा सौफ्ट वैक्‍स की जगह पर हार्ड वैक्‍स के लिए ही जाएं.

– वैक्‍सिंग करवाने से 30-40 मिनट पहले एस्‍पिरिन की गोली खा लेनी चाहिये. इससे त्‍वचा कम संवेदनशील हो जाएगी और वैक्‍सिंग पेन नहीं होगा. इसके अलावा कई पार्लरों में ऐसी क्रीम होती हैं, जो हेयर रिमूवल और वैक्‍किंग करने से पहले लगा दी जाती है. अपनी पार्लर वाली से इस क्रीम या स्‍प्रे के बारे में जरुर पूंछ लें.

– पेन को कम करने के लिए वैक्‍सिंग के तुरंत बाद मिंट स्‍प्रे लगा लें. यह त्‍वचा को ठंडक का एहसास देता है, जिससे दर्द का पता ही नहीं चलता.

– एक तरीका यह भी हो सकता है, कि जिस स्‍थान पर वैक्‍स करवाया गया हो उसको तुरंत ही ठंडे पानी से धो लें. जब आपको लगे कि जलन कम होने लगी है, तो धोना बंद कर दें. इससे जलन बहुत कम हो जाएगी.

– वैक्‍सिंग के बाद स्‍किन पर बर्फ लगाएं. इससे जलन कम हो जाएगी और तुरंत ही राहत मिलेगी.

– जैसे ही वैक्‍सिंग करें, तुरंत ही अपने हाथों से उस स्‍थान को कस के दबा दें. इसके अलावा अगर कोई ठंडी बोतल हो तो उसे लेकर अपने त्‍वचा पर लगा लें. इससे जलन कम होगी

रखें डियोड्रेंट की महक को 24 घंटों तक बरकरार

आज के समय में दिनभर में दो बार नहाना और डियो छिड़कना खुद को तरोताजा रखने की एक बेसिक जरुरत बन गई है. कई लोग घर पर ही डियो और इत्र तैयार कर लेते हैं, पर सवाल यह उठता है कि ये डियोड्रेंट आपके शरीर पर कितने देर तक के लिए काम करते हैं. अगर आपको कुछ अहम तकनीक पता चल जाए, तो आप 24 घंटो तक के लिए डियोड्रेंट के असर को बरकरार रख पाएंगे. चलिए जानते हैं कि क्‍या हैं वे तकनीक?

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– स्‍प्रे करने से पहले बौटल को कस कर शेक कर लें.

– डियो को सीधे अपने आर्मपिट पर नहीं छिड़कना चाहिये. इसको कपड़े पहनने के बाद ज्‍यादा मात्रा में छिड़कना चाहिये.

– अगर आप स्‍प्रे वाले डियो की जगह पर रोलर वाला डियो लगा रहे हैं, तो पहले अपनी त्‍वचा को सूख जाने दीजिये.

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– रोलर वाला डियो इस्‍तमाल कर रहे हैं, तो उसके साथ ही टैल्‍कम पाउडर भी प्रयोग करें. टैल्‍कम पाउडर से रोलर वाला डियो ज्‍यादा देर तक के लिए टिकता है.

– अपने आर्मपिट को हमेशा साफ करते रहें क्‍योंकि बाल, बैक्‍टीरिया और जर्म को और भी ज्‍यादा बढ़ावा देते हैं. इसलिए आर्मपिट को साफ रखें.

– डियो ज्‍यादा देर तक के लिए काम करें इसके लिए नहाने से 5-7 मिनट पहले अपने आर्मपिट पर टूथपेस्‍ट लगा लें. इसके बाद ठंडे पानी से नहा लें, इससे बदबू नहीं आएगी.

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– एक लाजवाब तरीका यह भी है कि आप अपनी गर्दन और कलाईं पर भी थोड़ा सा डियोड्रेंट छिड़क लें.

– अगर आप फुल कपड़े पहने हुए हैं जैसे, टॉप या शर्ट, तो अच्‍छा होगा कि पूरे कपड़े पर ही डियो छिड़क लें.

– ऐसे कपड़े न पहने जिनको पहनने से गर्मी लगती हो और खूब पसीना आता हो. पोलिस्‍टर और मोटे कपड़े ऐसे कपड़े होते हैं, जो शरीर को सांस नहीं लेने देते. 3. गर्मियों में सूती कपड़े ही पहने क्‍योंकि यह हवा को आर-पार होने देता है, जिससे पसीना और बदबू नहीं आती.

आपको भी है स्किन एलर्जी ? ऐसे करें उपचार

हमारी स्‍किन बहुत ही ज्यादा संवेदनशील होती है. काफी लोगों को स्किन एलर्जी की समस्या होती है. ये एलर्जी कई कारणों की वजह से हो सकती है. भले ही वह सूरज, कपड़े या फिर सब्‍जियों के दा्रा हो. वैसे तो एलर्जी समय के साथ अपने आप ठीक हो जाती है, पर इसका ख्‍याल रखना भी जरुरी हो जाता है नहीं तो यह बढ़ भी सकती है. चलिए जानते हैं, स्किन एलर्जी को ठीक करने का प्राकृतिक उपचार.

नीम पेस्‍ट

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नीम एंटी बैक्‍टीरियल होती है इसलिए यह किसी भी त्‍वचा संबधित बीमारी को दूर कर सकती है. एलर्जी को ठीक करने के लिए नीम की पत्‍तियों को 6-8 घंटे के लिए पानी में भिगो कर पीस लें. इसको त्‍वचा पर लगा कर 30 मिनट तक के लिए छोड़ दें और फिर ठंडे पानी से नहा लें.

 नारियल तेल लगाएं

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त्‍वचा पर गरम नारियल तेल लगाएं और रातभर ऐसे ही लगा रहने दें. यह एलर्जी वाली खराब त्‍वचा को साफ कर के निकाल देता है और साथ में यह एंटी बैक्‍टीरियल भी होता है. इसके अलावा आपको सूती कपड़े भी पहनने चाहिये.

नींबू का रस

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एलर्जी वाली जगह पर रुई से नींबू का रस लगाएं. इसके अलावा नींबू के रस को आप नारियल तेल में मिला कर भी लगा सकती हैं. इसको लगा कर पूरी रात ऐसे ही रहने दें.

पानी

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खूब सारा पानी पिएं. पानी पीने से शरीर की सारी गंदगी पेशाब बन कर बाहर निकल जाती है. यह स्‍किन एलर्जी का एक प्राकृतिक इलाज है.

नहाएं

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गरम पानी से नहाने से बचना चाहिये क्‍योंकि इससे और भी ज्‍यादा बेचैनी, जलन और खुजली पैदा हो सकती है. वहीं पर ठंडा पानी एलर्जी से राहत दिलाता है. इसलिए ठंडे पानी से ही नहाएं. यह एक प्रकार का घरेलू नुस्‍खा है, जिससे स्‍किन एलर्जी बिल्‍कुल ठीक हो जाती है.

पोस्‍ता दाना

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मिक्‍सर में पोस्‍ता दाना ग्राइंड करें और उसमें नींबू का रस मिलाएं. इस पेस्‍ट को एलर्जी वाली त्‍वचा पर लगाए, जिससे यह ठीक हो जाए.

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