Download App

आपके घर के कुछ ऐसे छुपे कोने, जहां होनी चाहिए हमेशा सफाई

घर की सफाई सिर्फ दिखावे और खूबसूरती के लिए ही नहीं, बल्कि आपके परिवार के स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी है. रसोई विशेषज्ञ कहते हैं कि घर के कुछ ऐसे कोने होते हैं, जिनपर आपका ध्यान नहीं जाता है. लेकिन ये कोने सबसे ज्यादा गंदे होते हैं. जैसे किचन कैबिनेट, रैक और एग्जौस्ट फैन की तरफ ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होती है.

आइए हम बताते हैं आपके घर का वो कौन सा कोना है, जहां आप सफाई नहीं कर पाती है.

  1. किचन और बाथरूम के एग्जौस्ट फैन के ब्लेड के साथ ही इसकी खिड़की में भी धूल और तेल की परत चढ़ी होती है. इसे नियमित साफ करना बहुत जरूरी है.
  2. किचन कैबिनेट और रैक के ऊपरी हिस्से धूल और धुएं के कारण बहुत गंदे हो जाते हैं. इसके ऊपर भाप और धूल से गंदगी जम जाती है, जिसे साफ करने में बहुत मुश्किल आती है.
  3. गीजर के ऊपर कभी किसी का ध्यान नहीं जाता, जहां सालों से गंदगी की परत जमा होती रहती है.
  4. स्विच बोर्ड को हर रोज साफ करना चाहिए क्योंकि यहां कीटाणु आसानी से पनपते हैं.
  5. पेंटिंग हटा के उसके पीछे दिवार को नियमित साफ करते रहना चाहिए.
  6. ट्यूबलाइट के ऊपरी हिस्से पर बहुत आसानी से धूल जम जाती है, जिसे साफ करते रहना चाहिए.
  7. एसी के साथ ही वोल्टेज रेग्युलेटर के ऊपरी हिस्से को भी साफ करना चाहिए.
  8. आपके चमकते सिंक भी गंदगी छिपाए रहते हैं. उसके निचले हिस्से की सफाई भी नियमित किया करें.
  9. सोफे और दीवार की बीच की जगह में गंदगी जमा होती है. जगह कम होने से वहां की सफाई भी रोज नहीं हो पाती है. सोफा रोज हटाकर सफाई करना मुश्क‍िल होता है. ऐसे में कुछ दिन बाद-बाद इन्हें साफ करना चाहिए.
  10. घर की ऊंची खिड़कियों पर रोजाना सफाई कर पाना मुश्कि‍ल होता है, लेकिन यहां भी हर कुछ दिन में सफाई होती रहनी चाहिए.

ड्राइंग रूम में सोफे रखने के लिए आजमाएं ये 7 बेहतरीन तरीके

आपके पास ड्राइंग रूम को सजाने के लिए इतने सारे समान होते हैं, औऱ आप इस बात को लेकर कन्फ्युज हो जाती हैं कि कौन-सा समान कहां रखें कि आपका ड्रांइग रुम ज्यादा अच्छा और सिस्टमैटिक दिखें. पर जब ड्राइंग रुम में सोफे रखने की बात आती है तो जगह ढ़ूढ़ना मुश्किल हो जाता है पर आज हम आपको बताएंगे आप लिविंग रुम में सोफे को ढंग की जगह पर कैसे रखें.

ड्राइंग रुम में सोफे रखने के टिप्‍स-

  • सोफो को ‘यू शेप’ में रखना ज्‍यादा बेहतर होगा क्‍योंकि इससे आपके महमानों को आराम से आने जाने में न ही कोई दिक्‍कत होगी और न ही उन्‍हें एक दूसरे से बात चीत करने में परेशानी आएगी.
  • आप अपने मेहमानों को ड्राइंगरुम के कौन से कोने पर बैठाना पंसद करेगीं. अगर आपका दरवाज़ा रुम के बीच में है तो अपने सोफों को या तो बीच में या फिर किनारे की ओर पर रखें.
  • आने जाने या फिर बैठने में परेशानी ना हो इसलिए सेंट्रल टेबल को सोफे से 1 फीट की दूरी पर रखें. इससे कमरे की व्यवस्था अच्छी तरह से परिभाषित और विस्तृत दिखेगी.
  • सोफे को यू शेप में रखें और बीच में सेंट्रल टेबल के नीचे, कमरे की थीम से मिलता जुलता मैट या कार्पेट बिछाएं.
  • सोफे के पीछे की खाली दीवार पर एक बड़ी सी पेटिंग टागें. अगर बड़ी पेटिंग नहीं है तो 3-4 छोटे फ्रेम वाली खूबसूरत पेटिंग भी टांग सकती हैं.
  • अगर सोफे के आस पास की जगह खाली नज़र आ रही है तो उसके बगल में साइड टेबल या फिर लैंप या शोपीस को सजा सकती हैं. इससे आपके सोफों के आस पास की जगह ढ़क जाएगी और कमरा बहुत खूबसूरत भी लगेगा.
  • आप चाहें तो सोफे के पीछे वाली दीवार पर छोटे छोटे इंडोर प्‍लाट्स भी लगा सकती हैं, इससे कमरे में हरियाली दिखेगी और आंखों को सुकून भी मिलेगा. यही नहीं अपने कमरे में जानदार रौशनी के लिए आप कमरे के हिसाब से झूमर भी लगा सकती हैं. इससे कमरा बड़ा प्रतीत होगा.

ब्लीच का इस्तेमाल करने से पहले जानिए कुछ अहम बातें

गोरी रंगत, स्मूद और ईवनटोन स्किन हर महिला की चाहत होती है और इसे पाने का ब्लीचिंग सब से कौमन ब्यूटी ट्रीटमैंट होता है, क्योंकि इस के इस्तेमाल से फेशियल हेयर का रंग हलका हो जाता है, जिस से वे दिखाई नहीं देते और त्वचा भी गोरी व सुंदर नजर आती है. आज मार्केट में कई तरह के ब्लीच उपलब्ध हैं. ब्लीच का इस्तेमाल करने से पहले जानिए कुछ अहम बातें:

प्रोटीन हाइड्रा ब्लीच

यह ब्लीच फ्रेकल्स, ऐजिंग, पिगमैंटेशन, डार्क स्पौट और अनईवन स्किनटोन जैसी समस्याओं पर असरकारक तरीके से काम करता है. यह फेशियल हेयर को तो लाइटटोन करता ही है, साथ ही पिगमैंटेशन की समस्या को भी दूर करता है. यह स्किनटोन को भी लाइट करता है. यह स्किन को डीप क्लीन कर के स्किन पोर्स को भी रिफाइन करता है. सनटैन को रिमूव करने में यह सर्वोत्तम है. यह हर तरह की स्किनटोन के अनुरूप काम करता है. ईवन सैंसिटिव स्किन पर भी बिना किसी रैडनैस और जलन के. मगर प्रोटीन हाइड्रा ब्लीच किसी अच्छे सैलून में जा कर कुशल हाथों से ही करवाएं.

ऐक्स्ट्रा औयल कंट्रोल

जैसाकि नाम से मालूम होता है यह ब्लीच खासतौर पर ऐक्स्ट्रा औयली स्किन के लिए उम्दा उत्पाद है. इस ब्लीच से स्किन में मैलानिन पिगमैंट कम होता है. मैलानिन पिगमैंट जितना कम होगा, स्किन उतनी ही फेयर नजर आएगी. इसी के साथ यह ब्लीच त्वचा के ऐक्स्ट्रा औयल को कंट्रोल कर के मृत कोशिकाएं भी हटाता है.

हाइड्रेटिंग ब्लीच

शुष्क त्वचा के लिए यह सर्वोत्तम है. यह स्किन में पैनिट्रेट हो कर उसे मौइश्चर प्रदान करता है, जिस से वह सौफ्ट, फेयर व हैल्दी नजर आती है.

ब्लीच के प्रकार

पाउडर ब्लीच: अमोनिया, हाइड्रोजन पैरोक्साइड और ब्लीच पाउडर का सम्मिलित रूप है पाउडर ब्लीच. यह डार्क स्पौट और झांइयों के लिए अति उत्तम होता है. इसे कुशल हाथों से ही करवाएं, क्योंकि सही अनुपात न होने पर यह त्वचा को नुकसान भी पहुंचा सकता है.

क्रीम ब्लीच : क्रीम ब्लीच सब से ज्यादा चलन में है और इस्तेमाल में भी आसान है. यह क्रीम ब्लीच व ऐक्टिवेटर का सम्मिलित रूप होता है.

मिश्रण बनाने का तरीका: 4 भाग ब्लीच क्रीम में 1 भाग ऐक्टिवेटर डाल स्पैचुला से अच्छी तरह मिलाएं. कोई गांठ न रहे. ध्यान रखें ज्यादा इफैक्ट के लिए ऐक्टिवेटर की मात्रा बढ़ाने से भविष्य में पिगमैंटेशन की समस्या विकराल रूप ले सकती है या स्किन बर्न भी हो सकता है. इसलिए बढि़या इफैक्ट के लिए स्किन के अनुरूप ही ब्लीच का चुनाव करें तथा उस के मिश्रण का भी.

पैच टैस्ट: अगर ब्लीच का इस्तेमाल पहली दफा कर रही हैं, तो ब्लीच लगाने से पहले पैच टैस्ट जरूर कर लें. इस के लिए थोड़ी सी मात्रा में मिश्रण ले कर बांह पर लगाएं. अगर जलन होने लगे या लालिमा आ जाए, तो इस का प्रयोग न करें.

ब्लीच लगाने से पहले

ब्लीच लगाने से पहले चेहरे को ठंडे पानी और सौम्य फेसवाश से साफ कर लें. ध्यान रखें चेहरे पर गरम पानी व स्क्रब का ब्लीच से पहले व ब्लीच के एकदम बाद इस्तेमाल नहीं करें. यह नुकसानदायक हो सकता है. फिर पेस्ट को स्पैचुला या उंगली की मदद से चेहरे पर ऊपर से नीचे की तरफ लगाएं. आंखों, आईब्रोज और लिप्स पर न लगाएं. ब्लीच 10 से 15 मिनट तक लगाए रखें. इस के बाद पेस्ट को कौटन की मदद से साफ कर लें. फिर चेहरे पर मौइश्चराइजर लगा लें.

त्वचा के अनुरूप ब्लीच

संवेदनशील त्वचा: इस प्रकार की त्वचा पर प्रोटीन हाइड्रा, हर्बल, हाइड्रेटिंग व रैडिएंट ग्लो इस्तेमाल करें.

तैलीय त्वचा: तैलीय त्वचा पर अकसर कीलमुंहासों की परेशानी हो जाती है. अत: इस तरह की त्वचा के लिए ऐक्स्ट्रा औयल कंट्रोल, अमोनिया फ्री ब्लीच, डी टैन, फ्रूट ब्लीच उपयुक्त होता है.

शुष्क त्वचा: इस प्रकार की त्वचा के लिए औयल व मौइश्चर बेस्ड ब्लीच का प्रयोग करें जैसे हाइड्रेटिंग ब्लीच, व्हाइटनिंग ब्लीच आदि.

मैच्योर स्किन: इस प्रकार की त्वचा के लिए ऐजिंग औक्सीजन ब्लीच उपयुक्त रहता है. लेकिन त्वचा की नमी को बनाए रखने के लिए हाइड्रेटिंग ब्लीच का इस्तेमाल करें. इस के अलावा त्वचा के मैलानिन स्तर को कम करने के लिए प्रोटीन हाइड्रा औक्सी का इस्तेमाल करें.

ब्लीच करते समय ध्यान देने योग्य बातें

थ्रैडिंग, वैक्सिंग, स्टीम व स्क्रबिंग के बाद कभी ब्लीच न करें.

ब्लीचिंग करने से पहले प्री ब्लीच लोशन या लाइट मौइश्चराइजर का इस्तेमाल करें खासकर शुष्क व सैंसिटिव स्किन पर.

दि ब्लीच लगाने पर जलन महसूस हो, तो ठंडे पानी से चेहरे को तुरंत धो लें. बर्फ लगाएं.

ब्लीच का इस्तेमाल पैच टैस्ट के बाद ही करें.

कटीफटी त्वचा पर ब्लीच का इस्तेमाल न करें.

ब्लीच का इस्तेमाल 15 से 20 दिन से पहले दोबारा न करें.

ब्लीच को 15 मिनट से ज्यादा समय तक न लगाएं रखें.

ब्लीच क्रीम में ऐक्टिवेटर मिक्स करते समय मैटल चम्मच व मैटल बाउल का इस्तेमाल न करें.

चेहरे के ब्लीच को शरीर पर और शरीर के ब्लीच को चेहरे पर न लगाएं.

ब्लीच करते समय टीवी देखने या किताब पढ़ने से परहेज करें, क्योंकि यह आंखों को नुकसान पहुंचा सकता है.

ब्लीच करने के 6 घंटे बाद तक साबुन या फेसवाश का प्रयोग न करें.

धूप से आने के तुरंत बाद ब्लीच न करवाएं. शरीर का तापमान सामान्य होने पर करवाएं.

जिन की बौडी हीट ज्यादा रहती हो वे स्किन की जांच करवा कर ही स्किन के अनुरूप ब्लीच करवाएं.

आफ्टर ब्लीच सनगार्ड लगा कर ही धूप में निकलें.

कभी फेशियल करने के बाद ब्लीच का इस्तेमाल न करें वरना परिणाम गंभीर हो सकता है.

ब्लीच करने के फायदे

ब्लीच से फेशियल हेयर स्किनटोन अच्छी तरह मैच हो कर ईवन फेयर ग्लो देती है.

10 से 15 मिनटों में ही स्किन फेयर व रैडिएंट नजर आने लगती है.

ब्लीच स्किन की डैड लेयर को रिमूव कर के स्किन को ब्राइट लुक प्रदान करता है.

पोस्ट ब्लीच पैक स्किन को हाइड्रेट कर के व्हाइटनिंग बैनिफिट देता है.

सनटैन को रिमूव कर के मैलानिन को लाइट कर के स्किनटोन को लाइटर व फेयर करता है.

ब्लीच के नुकसान

ब्लीच में मरकरी होता है, जो त्वचा को नुकसान पहुंचता है, इसलिए ब्लीच का इस्तेमाल जरूरत से ज्यादा न करें.

ब्लीच के बाद त्वचा लाल हो जाए, तो धूप व आंच के संपर्क में न आएं.

सांवलों को ही नहीं गोरी रंगत वालों को भी ब्लीचिंग की जरूरत पड़ती है, लेकिन स्किन के अनुरूप ब्लीच न होने पर यह स्किन डैमेज का कारण भी बन सकता है.

ब्लीच के परिणामस्वरूप त्वचा में दर्द, उस का छिलना, लाल व भूरे रंग के धब्बे या सूजन होने का मतलब ब्लीच रिऐक्ट कर गया है.

अगर आप ने कैमिकल पीलिंग करवाई है, तो ब्लीच का इस्तेमाल कम से कम 4 से 6 महीने तक न करें. सौंदर्य विशेषज्ञा से सलाह ले कर ही ब्लीचिंग का इस्तेमाल करें.

ब्लीच को आंखों व भौंहों के आसपास न लगाएं वरना परेशानी हो सकती है.

ब्लीच कुशल हाथों से ही करवाएं और ब्रैंडेड प्रोडक्ट्स का ही इस्तेमाल करें.

हाईफु की इस तकनीक से आप 45 की उम्र में 35 की नजर आएंगी

क्या आप भी 35 की उम्र में 45 की नजर आने लगी हैं? क्या झुर्रियों ने आप के चेहरे की खूबसूरती छीन ली है? अगर हां, तो अब आप बढ़ती उम्र के इन निशानों को हाईफु ऐंटीएजिंग स्किन ट्रीटमैंट के जरीए कम कर सकती हैं. यह तकनीक न सिर्फ ढीलीढाली त्वचा में कसाव लाती है, बल्कि उसे पहले की तरह यंग और फ्रैश लुक भी देती है.

डर्मैटोलौजिस्ट, डा. डिंपल भंखारिया के अनुसार, ‘‘तेज धूप, प्रदूषण, मौसम में बदलाव के साथसाथ स्ट्रैस, स्मोकिंग, अलकोहल जैसी बुरी लतों का असर सब से पहले त्वचा पर ही दिखाई देता है. त्वचा रूखी, ढीली और डल नजर आती है. दिनबदिन त्वचा से फैट कम होने लगता है. नतीजतन वह पतली और कमजोर हो जाती है, जिस से महीन रेखाएं, झुर्रियां, लटकन जैसी त्वचा संबंधी परेशानियां होने लगती हैं. इन्हें कम करने के लिए सनस्क्रीन, ऐंटीएजिंग क्रीम और जैंटल मौइश्चराइजर का इस्तेमाल और ऐक्सरसाइज के अलावा हाईफु ऐंटीएजिंग स्किन ट्रीटमैंट का सहारा भी लिया जा सकता है.’’

क्या है हाईफु

‘हाई इंटैंसिटी फोकस्ड अल्ट्रासाउंड’ को हाईफु स्किन टाइटनिंग ट्रीटमैंट के नाम से जाना जाता है. यह एक तरह का ऐंटीएजिंग ट्रीटमैंट है, जो नौनसर्जिकल तकनीक है. इस के जरीए चेहरे व गले के साथसाथ शरीर के अन्य हिस्सों की ढीलीढाली त्वचा को टाइट किया जाता है, जिस से त्वचा टाइट और हमेशा जवां नजर आती है.

कहां करता है हाईफु काम

हाईफु की सहायता से आईब्रोज, फोरहैड, गालों, ठुड्डी, गले, पेट आदि की ढीलीढाली त्वचा को टाइट किया जाता है. इस से आंखों, होंठों, माथे, नाक आदि के आसपास उभर आईं फाइन लाइंस को भी हटाया जा सकता है. यह खुले पोर्स को भी कम करता है. इस तकनीक के जरीए स्किन टाइटनिंग के साथसाथ स्किन लिफ्टिंग भी की जा सकती है जैसे अगर जौ लाइन या आईब्रोज अपनी जगह से लटक गई है तो उसे जौ लिफ्टिंग और आईब्रोज लिफ्टिंग के जरीए फिर से अपनी जगह सैट किया जाता है.

कैसे करता है यह काम

इस ट्रीटमैंट से पहले चेहरे पर लोकल एनेस्थीसिया क्रीम लगाई जाती है, जिस से त्वचा नम हो जाती है. उस के बाद मशीन के हैंड पीस के जरीए प्रभावित जगह पर शौट (लेजर की किरणों की तरह) दिया जाता है, जिस से हलकी गरमाहट महसूस होती है. इस के प्रभाव से स्किन टिशु में सिकुड़न आ जाती है जिस से त्वचा में कसाव आ जाता है.

इस टैक्नोलौजी से नए कोलोजन की भी उत्पत्ति होती है. कोलोजन एक तरह का स्किन फाइबर है, जो उम्र के साथ घटता जाता है. उस के कम होते ही चेहरे पर झुर्रियां और महीन रेखाएं उभर आती हैं. ऐसे में इस ट्रीटमैंट के जरीए नए कोलोजन की उत्पत्ति झुर्रियों को आने से रोकती है. पूरे चेहरे की झुर्रियों और फाइन लाइंस को कम करने के लिए 45 मिनट से 1 घंटे का समय लगता है. सब से अच्छी बात यह है कि इस ट्रीटमैंट के दौरान किसी तरह का दर्द नहीं होता.

कब लें यह ट्रीटमैंट

30-35 साल उम्र की महिलाओं और पुरुषों से ले कर 60-65 साल की महिलाएं और पुरुष यह ट्रीटमैंट ले सकते हैं. यह ट्रीटमैंट किसी भी स्किन टाइप और स्किन टोन की महिला और पुरुष ले सकता है.

ट्रीटमैंट लेने के 3-4 महीने बाद इस का असर नजर आता है, जो साल भर बना रहता है. फिर धीरेधीरे महीन रेखाएं और झुर्रियां फिर से दिखने लगती हैं. तब दोबारा इस ट्रीटमैंट के जरीए उन्हें कम किया जा सकता है. अगर आप के चेहरे पर मामूली रिंकल्स हैं, तो साल में 1 बार और अगर बहुत ज्यादा हैं तो 2-3 बार यह ट्रीटमैंट लिया जा सकता है.

एक जनवरी से भोजपुरी फिल्में और संगीत हो जाएगा “अश्लीलता मुक्त”

मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के भीतर अश्लीलता के खिलाफ क्रांति का बिगुल बज गया है. 5 लाख सदस्यों वाली ‘फेडरेशन औफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लाइज’ ने ऐलान किया है कि भोजपुरी फिल्मों में अब अश्लीलता नहीं बर्दाश्त की जाएगी. ऐसी फिल्मों का बनना सामाजिक अपराध है. इसलिए कोई उनके निर्माण या प्रदर्शन में संलग्न न हो, जो लोग ऐसा नही करेंगे, उनकी सदस्यता रद्द की जाएगी. फेडरेशन ने इस बात का भी ऐलान किया है कि मुंबई, इलाहाबाद, पटना और रांची हाई कोर्ट में ‘‘पूर्वांचल विकास प्रतिष्ठान’’ द्वारा भोजपुरी मनोरंजन उद्योग में फैली अश्लीलता के खिलाफ दायर की जा रही याचिका में फेडरेशन भी सह याचिकाकर्ता बनेगा.

‘‘पूर्वांचल विकास प्रतिष्ठान’’ और ‘‘फेडरेनशन औफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्पलाईज’’ने यह घोषणा मुंबई में ‘सिने एंड टीवी आर्टिस्ट एसोसिएशन’ के दफ्तर में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में की. दोनों संगठनों ने ऐलान किया कि पहली जनवरी 2019 के बाद प्रदर्शित होने वाली हर भोजपुरी फिल्म की पूर्वांचल समाज और संस्कृति को जानने वाले किसी विद्वान व्यक्ति से समीक्षा करायी जाएगी और पूर्वांचल के समाज के मानदंडों के हिसाब से यदि कुछ गलत पाया गया, तो सेंसर बोर्ड के सामने यह सवाल प्रखरता से खड़ा किया जाएगा कि उसने इस फिल्म को कैसे पास किया?

इस अवसर पर फेडरेशन के अध्यक्ष बी एन तिवारी, महासचिव अशोक दुबे, कोषाध्यक्ष संजू श्रीवास्तव, प्रोड्यूसर एसोसिएशन के सदस्य शरद देराज शेलार और पूर्वाचल विकास प्रतिष्ठान की ओर से पूर्व मंत्री चंद्रकात त्रिपाठी, अश्लीलता विरोधी अभियान की ब्रांड अम्बेसेडर पद्मश्री डा शोमा घोष, ‘पूर्वांचल विकास प्रतिष्ठान’ के सचिव ओमप्रकाश सिंह, मुंबई हाई कोर्ट में याचिका दाखिल करने जा रहे एडवोकेट विजय सिंह और गायक अविनाश तिवारी ने भोजपुरी फिल्मों, भोजपुरी के संगीत अलबमों व भोजपुरी गीतों से एक माह के अंदर अश्लीलता को जड़ से समाप्त करने की बात की.

इन सभी का मानना है कि भोजपुरी मनोरंजन उद्योग में अश्लीलता इन दिनों चरम पर है. यह स्त्रियों की अस्मिता पर हमला है. इससे बच्चों, किशोरी, तरूणों का भविष्य बिगड़ रहा है. समाज की छवि बिगड़ रही है. भाषा, साहित्य, संस्कृति और समाज आदि की अवमानना हो रही है.

इन परिस्थितियों को रेखांकित करते हुए बी एन तिवारी ने कहा -‘‘बंद यानी बंद. भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में अश्लीलता अब नहीं चलेगी. यदि सेंसर बोर्ड ने भी नियमों का पालन नहीं किया, तो हम उसके खिलाफ मुखर विरोध के लिए तैयार हैं. अब तक भोजपुरी फिल्मों में जो अश्लीलता परोसी जा रही है, इसके लिए सेंसर बोर्ड ही जिम्मेदार है. सेंसर बोर्ड अपना काम सही ढंग से नहीं कर रहा है. यदि सेंसर बोर्ड सही ढंग से काम कर रहा होता, तो एक भी भोजपुरी फिल्मों में अश्लीलता परोसकर औरतों की अस्मिता के साथ खिलवाड़ नजर न आता. अश्लीलता के खिलाफ हमारी लड़ाई यहीं नहीं रूकेगी. पहले भोजपुरी की यह लडाई जीत ली जाए, इसके बाद हिंदी सिनेमा में भी अश्लीलता का विरोध किया जाएगा. सबसे पहले जहां ज्यादा बुराई है, उसे खत्म कर लिया जाए.’’

पद्मश्री डा शोमा घोष ने कहा – ‘‘पूर्वांचल की भोजपुरी बहुत मीठी बोली है. भोजपुरी बहुत संपन्न संस्कृति की बहुत विस्तृत फलक की है. चंद तिजारती लोग इसे बिगाड़ रहे हैं. हमारी यह लड़ाई तो मां के दूध की मिठास बचाने की लड़ाई है. समाज के होने और जीने की लड़ाई है. समाज ने अब तक संगठित विरोध नहीं किया था. इसलिए यह बुराई फैलती चली गयी.’’

पूव मंत्री चंद्रकांत त्रिपाठी ने भी अश्लीलता के खिलाफ बिगुल बजाने की बात पर जोर देते हुए कहा – ‘‘हम सभी इस लड़ाई को एक तार्किक अंजाम तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.’’

‘‘फेडरेशन आफ वेस्टर्न इंडिया इम्प्लौइज एसोसिएशन’’ संस्था से जुड़े अन्य लोगों ने भी यही प्रतिबद्धता जताते हुए कहा – ‘‘फेडरेशन अश्लीलता के खिलाफ अपनी इस प्रतिबद्धता को सभी सदस्यों को सूचित कर रही है. फिल्म निर्माताओं के दूसरे संगठनों से भी इस बारे में बात हो रही है. हमें विष्वास है कि इस लड़ाई में सभी साथ खडे़ होंगे. सबकी इस बारे में एक व्यापक सहमति बनेगी. सेंंसर बोर्ड को भी इस बारे में फेडरेशन की इस प्रतिबद्धता की जानकारी दी जा रही है. इस बाबत फेडरेशन के सलाहकार जाने माने निर्देशक अशोक पंडित से भी बात हो रही है.

‘‘पूर्वांचल विकास प्रतिष्ठान’’ के सचिव ओमप्रकाश सिंह ने मुंबई, इलाहाबाद व अन्य हाईकोर्ट में फाइल की जा रही याचिका का विवरण देते हुए कहा – ‘‘धारा 29 में दिए गए जीने के हक के मौलिक अधिकार को विचार का मुख्य बिंदु बनाया जा रहा है. इस मामले में यह याचिका एक अनोखी याचिका बनेगी. सवाल यह भी है कि भाषा को, साहित्य को, संस्कृति को, लोक कलाओं को मर्यादाओं को मूल्यों को मानकों को भी जीने का सम्मान से जीने का कोई हक है या नही? यही याचिका उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के राज्य मानवाधिकार आयोग में भी दाखिल की जा रही है. निर्माताओं, निर्देशकों, प्रदर्शकों, वितरकों, कलाकारों आदि को मिलाकर कुल 600 लोगों को हमने व्यक्तिगत चिट्ठी भेज कर आग्रह किया है कि वह भोजपुरी फिल्मों में अश्लीलता का कारण ना बनें.’’

हमारे द्वारा छोड़ी फिल्में ही हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि हैं : अजीत अंधारे

हौलीवुड में फिल्मों का निर्माण स्टूडियो सिस्टम के तहत ही हो रहा है. वहां ‘डिजनी स्टूडियो’, ‘बीबीसी 4 स्टूडियो’, ‘फौक्स स्टार स्टूडियो’ काफी सक्रिय हैं. हौलीवुड सिनेमा ने तो पूरे यूरोप पर कब्जा करके यूरोपीय देशों के सिनेमा का अंत कर दिया है. पिछले कुछ वर्षों से भारत में कुछ कारपोरेट कंपनियां सिनेमा से जुड़कर स्टूडियो की तरह फिल्में बनाती आ रही हैं. मगर बौलीवुड के कलाकारों की अपनी दादागीरी, कारपोरेट कंपनियां द्वारा अपनी बैलेंस सीट पर ध्यान देने, कंपनी के शेयर के भाव कैसे बढ़े इस पर ध्यान देने, फिल्मों के निर्माण का निर्णय करने का दायित्व सिनेमा को समझने वाले को देने की बनिस्बत एमबीए करके आने वाले रंगरूटों को दिए जाने के कारण भारत में कारपोरेट या स्टूडियो के तहत बनी फिल्में सुपर फ्लाप हो रही हैं.

जिसकी वजह से हमारे यहां स्टूडियो सिस्टम असफल होता जा रहा है. इतना ही नहीं सिनेमा भी गुड़गोबर हो रहा है. इसी के चलते 2016 में अचानक पांच छह स्टूडियो बंद हो गए. कुछ ने हिंदी फिल्मों के निर्माण से तौबा कर ली. जो स्टूडियो कार्यरत हैं, उनकी हालत भी पतली है.

कई स्टूडियो की पतली हालत के बीच ‘‘वायाकौम 18’’ स्टूडियो निरंतर प्रगति की ओर अग्रसर है. हालात ऐसे हो गए हैं कि अब ‘‘वायकौम 18’’ स्टूडियो ने अपना विस्तार करते हुए क्षेत्रीय भाषा के सिनेमा की तरफ भी कदम बढ़ा दिए हैं. ‘‘वायकौम 18 स्टूडियो’’ निर्मित मराठी भाषा की फिल्म ‘‘आणि मी काशीनाथ घाणेकर’’, जो कि दिवाली के अवसर पर पूरे महाराष्ट् में हिंदी फिल्म ‘‘‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’’ के साथ ही सिनेमाघरों में पहुंची, बाक्स आफिस पर जबरदस्त कमाई करने के साथ ही समीक्षकों की भी प्रशंसा बटोर रही है.

ajit andhare viacom 18

हाल ही में ‘‘वायाकौम 18 स्टूडियो’’ के सी.ओ.ओ अजीत अंधारे ने ‘‘सरिता’’ पत्रिका के साथ एक्सक्लूसिव बात की, जो कि इस प्रकार रही….

सिनेमा के बदलाव में स्टूडियो सिस्टम की भूमिका को आप किस तरह से देख रहे हैं?

हम खुद एक स्टूडियो हैं. ऐसे में अपने मुंह अपनी प्रशंसा करना ठीक नहीं लगता. पर मेरी सोच यह है कि सिनेमा में जो पूरा बदलाव आया, वह कारपोरेट कंपनियों यानी कि स्टूडियो से ही संभव हुआ है. इसमें ‘वायाकौम 18’, ‘जी स्टूडियो’, ‘यूटीवी डिज्नी’, ‘फौक्स’ सभी का योगदान है. सिनेमा में जो बदलाव आया है, उसका नेतृत्व इन स्टूडियो ने ही किया है.

देखिए, स्टूडियो सिस्टम शुरू होने से पहले से ही बौलीवुड में काम कर रहे इंटेंस लोग थे, उनसे इतर नए लोगों को भी बौलीवुड से जुड़ने का मौका मिला. नए नए लेखक, नई नई कहानियां, नए नए निर्देशक आए. इसी कारण ‘वायाकौम 18’ ने ‘वेलकम टू सज्जनपुर’ जैसी फिल्में बनायी, जो कि ट्रेडिशनल बौलीवुड की परिभाषा में नहीं आती है.

जहां तक ‘वायाकौम 18’ का सवाल है, तो हम लोगों ने तो इसे अपना डीएनए ही बनाया हुआ है. हमने अलग तरह के विषयों पर फिल्में बनायीं. क्योंकि हमें यकीन था कि मल्टीप्लैक्स का  सिनेमा देखने को इच्छुक है. हमने सोचा कि मल्टीप्लैक्स का एक नया दर्शक वर्ग है, जिसके लिए हम अलग तरह के सेगमेंट की फिल्में दे सकते हैं. तो हमने बौलीवुड मसाला व फार्मूला से हटकर फिल्मों का निर्माण किया. फिर चाहे वह ‘गैंग औफ वासेपुर’ हो या ‘कहानी’ हो ‘स्पेशल 26’ हो. इनमें हमने आम बौलीवुड मसाला फिल्मों से कुछ हटकर कहानी देने की कोशिश की. अक्षय कुमार की ईमेज एक्शन हीरो की थी, जिसे हमने अपनी फिल्मों में बदला. हमने अक्षय कुमार से कौमेडी किरदार करवाए. ‘स्पेशल 26’ और ‘ओह माय गौड’ जैसी फिल्मों में दर्शकों ने अक्षय कुमार को एक नए रूप में पसंद किया. कुछ समय पहले उनकी आयी फिल्म ‘‘टॉयलेटः एक प्रेम कथा’ भी आपको याद होगी. इसे भी हम ही लेकर आए. तो हमने सामाजिक मुद्दों को मनोरंजन की चाशनी में भिगोकर देते हुए एक नया सिनेमा दिया.

हमने उन फिल्मों को भी प्राथमिकता दी, जिन्हें लोग नारी प्रधान फिल्में कहते हैं. यह वह फिल्में हैं, जिनमें हीरोईजम पुरूष नहीं, बल्कि महिला किरदारों व कलाकारों से आया. हमारा यह प्रयोग भी काफी सफल रहा. इतना ही नही हमने नई कहानियों को नए अंदाज में पेश करने की कोशिश की. मसलन, आप हमारी नई फिल्म ‘‘अंधाधुन’’ को लें. ‘‘अंधाधुन’’ में ट्रेडिशनल कहानी का कोई हिस्सा नहीं है. तो हम स्टूडियोज का मकसद रहा है कि हम कुछ अलग तरह की कहानियों को लेकर आएं और चिरपरिचित बौलीवुड मसाला फिल्मों की शैली को तोड़ते हुए दर्शकों को कुछ नया प्रदान करें, जिसमें हम सभी सफल हैं.

पर जब आप मल्टीप्लैक्स के दर्शकों को ध्यान में रखकर फिल्में बनाते हैं, तो आप शहरी दर्शक वर्ग तक सीमित रह जाते हैं. आपकी फिल्में सिंगल थिएटर व गांव तक नही पहुंच पाती ?

हमारे कहने का अर्थ यह नहीं है कि हमने सिंगल थिएटर को एकदम से नजरंदाज कर दिया है. मेरे कहने का अर्थ यह है कि जब हम एक नई राह बनाते हैं, तो उसके लिए नया दर्शक वर्ग भी तैयार करने की कोशिश करते हैं. हमने सिंगल थिएटर के लिए ‘सन औफ सरदार’, ‘भाग मिल्खा भाग’, ‘मैरी कौम’ सहित कई फिल्में बनायी हैं. यह सारी फिल्में ‘वायाकौम 18’ की हैं. हम सिर्फ मल्टीप्लैक्स के दर्शकों के लिए सिनेमा नही बना रहें हैं. बल्कि हम हर तरह के दर्शक के लिए फिल्में बना रहे हैं. लेकिन कटु सत्य यह भी है कि मल्टीप्लैक्स का दर्शक हमें एक नई कहानी को नए अंदाज में कहने का अवसर देता है. और हमने उस नए मौके के इर्दगिर्द अपनी पूरी कार्यशैली को रचा व बुना है.

ajit andhare viacom 18

यदि आपकी बात सच है, तो फिर 80 प्रतिशत स्टूडियो बंद क्यों हो गए? उनसे जो गलती हुई, उससे आप लोगों ने कोई सबक सीखा?

मैं आपकी बात से सहमत हूं कि बीच में कुछ स्टूडियो बंद हुए हैं. पर हमारा 7-8 वर्षों का बहुत अलग अनुभव रहा. हम लगातार फिल्में बना रहे हैं, जिन्हें दर्शक पसंद भी कर रहे हैं. फिल्में बिजनेस कर रही हैं. हमारी सोच यह रही है कि आप फिल्में ‘डील ओरिएंटेड’ बनाएंगे यानी कि फिल्म एक बिजनेस है. उसी हिसाब से सारी चीजें मैन्यूप्युलेट होकर फिल्म बनाएंगे, तो नुकसान होना स्वभाविक है. क्योंकि फिल्म निर्माण एक रचनात्मक प्रतिक्रिया है. इसे रचनात्मकता के चश्मे से समझना बहुत जरूरी है. स्क्रिप्ट सामने आने पर जब हम क्रिएटीविटी के चश्मे से उसे देखते हैं, तो हमें अहसास हो जाता है कि यह किस तरह का व्यापार करेगी? मेरा मानना है कि यदि आप फिल्म निर्माण को ‘डील ओरिएंटेड’ या ‘चेक ओरिएंटेड’ मानकर चलाएंगे, तो किसी भी सूरत में अच्छे परिणाम नहीं आएंगे. कुछ स्टूडियों के साथ ऐसा हुआ है,आप स्वयं इसका अंदाजा लगा सकते हैं.

जहां तक ‘वायाकौम 18’ का सवाल है, तो हमने संख्या गिनाने के लिए फिल्मों का निर्माण नहीं किया. हमारा यह ध्येय कभी नहीं रहा कि हमें हर तिमाही इतनी फिल्में रिलीज करनी हैं. मैंने कई बार कहा है कि फिल्में ‘एसेंबल’ वाली नही है. यह कार, फ्रिज या टीवी नही है, जिसे एसेंबल किया और बेच दिया. फिल्में शैम्पू की तरह एक बड़ी संख्या में हर तिमाही नहीं बन सकती. एक कलाकृति जब स्वयं एक रूप लेती है, तभी वह बनती है. कुछ स्टूडियो ने एक रिदम को फौलो किया कि हर तिमाही इतनी फिल्में लेकर आएंगे, उस रिदम ने भी नुकसान पहुंचाया. यह बहुत अच्छा अप्रोच साबित नहीं हुआ. हमने रिदम वाला अप्रोच कभी नहीं रखा. हम शुरू से इस ढर्रे पर चले हैं कि यदि कोई फिल्म रचनात्मक और आर्थिक दृष्टिकोण से सही नही बन सकती है, तो उसे हम नहीं बनाएंगे.

तीसरा अप्रोच यह होना चाहिए कि आपको स्क्रिप्ट के आधार पर लागत तय करनी होनी चाहिए. यानी कि फिल्म की लागत क्या हो? इसकी अच्छी समझ होनी चाहिए. आप किसी भी लागत पर फिल्म बनाएंगे, ओवर प्रमोशन, ओवर मार्केटिंग करेंगे, तो नुकसान होना ही है. देखिए, फिल्म एक ऐसा व्यापार है, जहां लोग बहुत जल्द उत्साहित या उतावले हो जाते हैं. यह उतावलापन स्टार कलाकार के दबाव में या उन लोगों के दबाव में आता है, जिन्हें फिल्म व्यापार की समझ नही है. कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें होर्डिंग से लगाव है. यह चाहते हैं कि फिल्म की रिलीज से पहले फिल्म के बडे़ बडे़ होर्डिंग्स लगें.

कहने का अर्थ यह है कि फिल्म की मार्केटिंग की समझ बहुत कम लोगों को है, पर हर कोई दावा करता है कि वही फिल्म की मार्केटिंग को सही ढंग से समझता है. देखिए, यह कई तरह के दबाव हैं, जो कि स्टूडियो के उपर हावी रहते हैं. ऐसे में हमें बिजनेस के फंडामेंटल और कहानी की मांग इन दोनों का समन्वय बनाकर काम करना होता है. हमारी पहली कोशिश यह रहती है कि निर्देशक को क्रिएटिव/रचनात्मकता के स्तर पर फिल्म बनाने की पूरी छूट दें. यही हमारा तर्जुबा है. इसलिए हम आगे बढ़ते जा रहे हैं.

क्या आप मानते हैं कि स्टूडियो सिस्टम शुरू होने पर कलाकारों को बेतहाशा पारिश्रमिक राशि देना भी गलती थी?

शायद आप उस दौर की बात कर रहे हैं, जब स्टूडियो सिस्टम की शुरूआत हुई थी. 2001 में ‘गदरःएक प्रेम कथा’ के निर्माण के साथ ही स्टूडियो सिस्टम शुरू हुआ था. उस समय एक नया दौर शुरू हो रहा था. तब तमाम स्टूडियो को फिल्म व्यवसाय से जुड़ना था. तो शायद उन लोगों ने स्टार अटरैकष्ण के चक्कर में कलाकारों को खुलकर पैसे बांटे होंगे, पर इसका सही जवाब तो उस दौर के लोग ही दे सकते हैं कि वह अपने इस कृत्य को कैसे सही ठहराएंगे. देखिए, मैंने पहले भी कहा कि इस तरह की अप्रोच के साथ आप फिल्म उद्योग से जुड़ तो सकते हैं यानी कि चक्रव्यूह में घुस तो जाएंगे, मगर फिर चक्रव्यूह से निकलना आसान नही होगा. तमाम स्टूडियो के साथ वही परिणाम हुआ. आपको अपनी सीमाओं में रहकर, कहानी के अनुसार उसकी लागत को ध्यान में रखकर ही सिनेमा बनाना पड़ेगा.

आप स्टूडियो सिस्टम का हिस्सा हैं. इस वजह से आप दूसरे स्टूडियो की कार्यप्रणाली पर नजर तो रखते होंगे, जिससे आपके यहां वह गलती ना होने पाए?

मुझे लगता है कि मैं इस सवाल का जवाब आपको पहले दे चुका हूं. जब भी आप अधिक से अधिक फिल्म बनाने की सोच रखेंगे, बड़े बजट की फिल्में बनाने के लोभ का शिकार रहेंगे, तो स्वाभाविक तौर पर गलती होगी. यदि आप इस सोच के साथ बौलीवुड में उतरते हैं कि फिल्मी परदा बड़ा होता है, ऐसे में बड़े बजट की आलिशान फिल्म बनानी चाहिए. बड़े स्टारों के साथ काम करने की आपके अंदर उत्तेजना है, तो गड़बड़ी होने की संभावना बढ़ जाती हैं. मेरी राय में इस तरह की उत्तेजना या उतावलेपन से हर स्टूडियो को दूर रहना चाहिए. मेरी राय मे हर कहानी अपने साथ एक बजट लेकर आती है. हमने इन सब चीजों को बहुत ध्यान में रखकर फिल्में बनायी. हमारी कुछ फिल्मों को बौलीवुड से जुड़े लोगों ने छोटी फिल्मों का नाम दिया. पर उनके परिणाम बहुत बड़े हुए. हमारी कुछ फिल्मों ने इस फिल्म इंडस्ट्री को नई राह दिखायी. बौलीवुड के लोगों ने ‘‘मांझीः द माउंटेनमैन’, ‘क्वीन’ या ‘अंधाधुन’ को छोटी फिल्म कहकर बुलाया. इन फिल्मों के परिणाम आपके सामने हैं.

बौलीवुड में एक मुद्दा और है. हर इंसान आपको बड़े स्टार/ फिल्म की तरफ आकर्षित करता है. एक सफल स्टूडियो के लिए जरूरी होता है कि आप खुद को उस आकर्षण से कैसे बचाकर रखें. मैं बड़ी फिल्मों की खिलाफत नहीं कर रहा हूं. बड़ी फिल्में भी बननी चाहिए, मगर उनकी कहानी और उनकी गणित अलग होनी चाहिए. हमने कई बड़ी फिल्में ठुकरायी हैं. आपके अंदर एक बडे़ बजट की फिल्म को ना कहने की ताकत और यकीन का होना बहुत जरूरी है. देखिए, यदि बड़े बजट की फिल्म में कुछ बहुत बड़ी रचनात्मकता नजर नहीं आती है, तो ऐसी फिल्मों को ना कहने के लिए बहुत बड़ी दिलेरी चाहिए. हम ऐसा करते आए हैं और हमें इसके अच्छे प्रतिसाद मिले हैं. अक्सर हम उन फिल्मों की बातें नहीं कर पाते हैं, जिन्हें हमने छोड़ दी थी. पर मैं आज दावे के साथ कह सकता हूं कि हमारे स्टूडियो द्वारा छोड़ी फिल्में ही हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि हैं.

आपने ‘‘बुधिया सिंह’’, मंटो, मांझी जैसी कुछ बेहतरीन छोटे बजट की फिल्में बनायीं. पर इन फिल्मों को आप विशाल दर्शक वर्ग तक पहुंचा नहीं पाए?

मैं मानता हूं कि हमारी कुछ बेहतरीन फिल्में विशाल दर्शक वर्ग तक नहीं पहुंच पायीं. क्योंकि इस तरह की फिल्मों को लेकर चुनौतियां बहुत होती हैं. इसमें दो खास मुद्दे हैं. पहला यह कि फिल्म की कहानी कितनी सशक्त है? और दूसरा फिल्म में कलाकारों का वजन कितना है? देखिए, हम चाहे जितनी बातें कर लें, पर आज भी सिनेमा स्टार कलाकार का माध्यम बना हुआ है. दर्शक सिनेमा घर में टिकट लेकर कलाकार के नाम पर पहले आता है, बाद में कहानी देखता है. कई बार कहानी में वजन होता है, पर वह अंडरवेट हो जाती है, जब उसमें अभिनय करने वाले कलाकार वजनदार ना हों. मैं एक उदाहरण देना चाहूंगा. आप दौड़ में देखते हैं कि एक धावक दूर से दौड़ते हुए आता है, फिर डंडे का सहारा लेकर लंबी छलांग लगा देता है. तो जिस तरह से वह दौडे़गा, वह उस फिल्म की कहानी की गुणवत्ता है और जिस डंडे को लेकर दौड़ते हुए छलांग लगाएगा, वह है स्टार. यानी कि वह जो डंडा या कोल्ड वार लेकर कूदता है, वह है स्टार यानी कि कलाकार. यदि आपका डंडा छोटा रह गया, तो आप लंबी छलांग नहीं लगा सकते. यदि आपकी दौड़ में तेजी नही है, यानी कि कहानी कमजोर है, तो आप पीछे रह जाएंगे. आपने जिन फिल्मों का नाम लिया यह सारी फिल्में हमारे दिल के काफी करीब हैं. पर मैं मानता हूं कि फिर भी वह नतीजा नही निकला, जो निकलना चाहिए था. तो हमें समझ आया कि हम डंडे में छोटे रह गए.

लेकिन अब यह भी देखने में आ रहा है कि स्टार के नाम पर फिल्में नही चल सकतीं?

आप यह भी एकदम सही फरमा रहे हैं. सिर्फ स्टार के नाम पर तो कोई भी फिल्म नहीं चल सकती. आप भी जानते हैं और मैं भी जानता हूं कि हाल ही में स्टार के नाम पर बनी फिल्म थिएटर में एक दिन भी नही चली. मैं बेवजह उसका नाम नही लेना चाहता. इसीलिए हम कहते हैं कि स्टार व कहानी दोनों में सामंजस्य बहुत बेहतरीन होना चाहिए. मसलन, फिल्म ‘‘मैरी कॉम’’ को लें. इसमें हमने प्रियंका चोपड़ा को लिया था. तो एक बेहतरीन वजनदार कहानी के साथ स्टार का वजन भी बढ़ गया था. इन दोनों का कॉम्बीनेशन ऐसा बना कि फिल्म ने सफलता के कई रिकॉर्ड बना डाले. मैं यह कहना चाहूंगा कि आप अपनी फिल्म के साथ जिस कलाकार को चुन रहे हैं, उसके व कहानी के बीच संतुलन होना जरूरी है.

‘‘वायाकौम 18’’ को ‘‘जलेबी’’ और ‘‘फोर्स 2’’ जैसी फिल्में बनाने की जरूरत क्यों पड़ जाती है?

हंसते हुए…. जैसा कि आपने शुरूआत में ही कहा कि यहां हर तरह के दर्शक हैं और हमें हर तरह के दर्शकों के लिए फिल्में बनानी चाहियें. तो हम वही कर रहे हैं. यह जरूरी नही है कि हर बार दर्शक को प्रेरणा देने वाली ही कहानी पसंद आए. या संदेश देने वाली फिल्म बनाएं. स्टूडियो के तौर पर हमारे लिए जरूरी होता है कि हम सभी नौ रसों का उपयोग करते हुए दर्शकों का मनोरंजन करें. इसी के चलते ‘सन ऑफ सरदार’, ‘जलेबी’ या ‘फोर्स 2’ फिल्मों के लिए भी जगह है. ‘सन ऑफ सरदार’ और ‘फोर्स 2’ दोनों सफल रहीं. हम अलग अलग फिल्में अलग अलग फिल्मकारों के साथ बनाते आए हैं. इसलिए यह सारी फिल्में हमने बनायी. दर्शक का एक वर्ग इस तरह की फिल्मों को सपोर्ट करता है.

‘वायकौम 18’’ की अब तक की उपलब्धि क्या रही?

पिछले सात आठ वर्षों के अंतराल में हमने जो गुणवत्ता प्रधान अच्छे कंटेंट पर आधारित फिल्में बनाईं, उन पर हमें गर्व है. हमें गर्व है कि हम टिपिकल बौलीवुड हीरो वाली फिल्मों से दूरी बनाकर रखने में सफल हुए. हमने स्टार कलाकार की बजाय कहानी को प्रधानता दी. हमें ‘‘क्वीन’’, ‘‘मांझी : द माउंटेन मैन’’, ‘‘ट्वायलेट : एक प्रेम कथा’’, ‘‘पद्मावत’’, ‘‘मंटो’’, ‘‘अंधाधुन’’, ‘‘बाजार’’ जैसी मनोरंजक व अर्थपूर्ण फिल्मों के निर्माण पर गर्व है. अब हम क्षेत्रीय सिनेमा की तरफ भी कदम बढ़ा चुके हैं.

क्षेत्रीय भाषा के सिनेमा की तरफ मुड़ने की कोई खास वजह?

हम क्षेत्रीय सिनेमा की तरफ मुड़े नहीं हैं, बल्कि ‘‘वायाकौम 18 स्टूडियो’’ ने अब अपना विस्तार क्षेत्रीय भाषा के सिनेमा की तरफ भी करा है. हम ऐसी कहानियों व प्रतिभाओं के साथ फिल्में बना रहे हैं, जिनसे उस भाषा का स्थानीय दर्शक जुड़ सके. हम स्थानीय सिनेमा के बाजार के साथ खुद को जोड़ रहे हैं.
दूसरी बात ब्रॉडकास्ट का जो विस्तार हुआ है, उसकी वजह से भी हमने क्षेत्रीय सिनेमा की तरफ रूख किया है. आप जानते हैं कि हमारा मनोरंजन प्रधान ‘कलर्स’ चैनल अब कई अलग अलग भाषाओं में आ रहा है. इससे उस क्षेत्रीय भाषा की विकसित हो रही समझ के आधार पर हम क्षेत्रीय सिनेमा की तरफ बढ़ रहे हैं. मैं मानता हूं कि हर क्षेत्रीय भाषा के सिनेमा की पूरी समझ बहुत जरूरी है. वहां कहानी कहने के तरीके, स्टार सिस्टम, कार्यशैली और स्थानीय रूचि आदि की जानकारी होनी चाहिए.

क्षेत्रीय सिनेमा में भी हम रोचक कथानक वाली फिल्में ला रहे हैं. तमिल भाषा में ‘‘कर्थी’’ और तमिल के सुपरस्टार सूर्या के साथ फिल्में बना रहे हैं. तेलगू में ‘‘वैजयंती मूवीज’’ के अष्विनी दत्त गारू के साथ ‘‘देवदास’’कर रहे हैं.

मराठी में हम पुल देशपांडे व काशीनाथ घाणेकर की बायोपिक फिल्में लेकर आ रहे हैं. काशीनाथ घाणेकर की बायोपिक फिल्म ‘‘आणि ..मी काशीनाथ घाणेकर’’ दिवाली के अवसर पर सिनेमाघर पहुंची, जिसे अच्छी सफलता मिली है.

मराठी में ही हम व्यंगात्मक रोमांटिक हास्य फिल्म ‘‘खटला बटला’’ ला रहे हैं, जिसका निर्देशन राष्ट्रीय. इसमें ज्योति वायदांडे व अभिजीत पवार की मुख्य भूमिका है. जबकि गुजराती में हमारी फिल्म ‘‘दह’’ 28 सितंबर को प्रर्दिशत होकर सफलता दर्ज करा चुकी है.

हम तमिल में एक अनाम रोमांचक फिल्म कर्थी के संग बना रहे हैं, जिसका निर्देशन जीतू जोसेफ कर रहे हैं. तो वहीं मलयालम में बी युन्नी कृष्णान निर्देशित कॉमेडी ड्रामा फिल्म ‘‘विकीपीडिया’’ में सुपरस्टार दिलीप की मुख्य भूमिका है. जबकि बंगाली सिनेमा में ‘‘घूमकेतु’’ बना रहे हैं. कौशिक गांगुली निर्देशित यह फिल्म एक शादीशुदा इंसान की कहानी है, जो कि अपने मकसद और अपने परिवार के बीच पिस रहा है. इसी के साथ हमने अंग्रेजी फिल्मों के लिए पैरामाउंट के साथ हाथ मिलाया है. इनमें बंबल बी, जेमिनी मैन, टाप गन मावरिक फिल्मों का समावेश है.

क्या यह माना जाए कि रचनात्मकता के स्तर पर और कंटेंट के आधार पर हिंदी की बनिस्बत क्षेत्रीय सिनेमा ज्यादा समृद्ध है?

मैंने पहले ही कहा कि कई क्षेत्रीय सिनेमा में बेहतरीन कहानी मौजूद हैं. तो कुछ क्षेत्रीय सिनेमा ऐसे हैं, जो प्रशंसकों के बल पर चल रहे हैं. यह भीड़ वाला सिनेमा है. मसलन, आप तेलगू सिनेमा को लें. तेलगू सिनेमा में आज भी स्टार कलाकार को लेकर पागलपन नजर आता है. वह एक ट्रेडिशनल सिनेमा का मार्केट है. तेलगू सिनेमा की अपनी एक खूबी है. उस खूबी के अनुसार हम उस सिनेमा में प्रवेश कर रहे हैं.

आपने सिनेमा पर बहुत अच्छी पकड़ बना रखी है.

आपका यह कहना बहुत सही है. मराठी व मलयालम सिनेमा में कंटेंट बहुत अच्छा है. मलयालम व मराठी भाषा में कहानियां ही नहीं बेहतरीन तकनीशियन भी मौजूद हैं. तो उस बाजार से हम बहुत प्रेरित हैं. हम चाहते हैं कि उस बाजार से कहानी व प्रतिभा को लाकर हिंदी में भी उनका उपयोग करें. तथा जो हिंदी में अच्छी कहानी व प्रतिभा है, उसे क्षेत्रीय भाषा के दर्शकों से परिचित कराएं.

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हर क्षेत्रीय भाषा के सिनेमा से जुडे़ लोगों ने हमारी सफल हिंदी फिल्म ‘‘अंधाधुन’’ को अपनी भाषा में रीमेक करने की मंशा जाहिर की है.

क्या आप क्षेत्रीय भाषा की अपनी फिल्मों को बाद में हिंदी में भी लेकर आएंगे?

यह निर्णय तो कहानी के आधार पर होगा. अक्सर क्षेत्रीय भाषा की कहानी स्थानीय स्वभाव संस्कृति के अनुरूप होती है. यानी कि उस कहानी का उस क्षेत्र में ही विशेष महत्व है. मसलन, हमने एक मराठी फिल्म बनायी है – ‘‘मी काशीनाथ घाणेकर.’’ काशीनाथ घाणेकर मराठी थिएटर के सुपरस्टार रहे हैं. तो इस फिल्म का दूसरी भाषा में सफल होना मुश्किल है. पर हम एक फिल्म बना रहे हैं – ‘‘ठाकरे’’, जो कि बाला साहेब ठाकरे की बायोपिक फिल्म है. इसे हमने हिंदी व मराठी दो भाषाओं में फिलहाल बनाया है. इस फिल्म का विषय ऐसा है, जिसे किसी भी भाषा में पसंद किया जा सकता है. तो कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जो दूसरी भाषाओं में यात्राएं कर सकती है, जबकि कुछ नहीं कर सकतीं.

फिल्म ‘‘ठाकरे’’ में कथानक के स्तर पर शिवसेना के लोग हावी होंगे. ऐसे में यह फिल्म एकपक्षीय नहीं हो जाएगी?

देखिए, फिल्म बन चुकी है. हमने फिल्म को पूरी ईमानदारी के साथ बनाया है. आपको जिस तरह की आशंका है, वैसा कुछ भी नहीं है. बालासाहेब ठाकरे के जीवन की कहानी बहुत खुले मन से कही गयी है. शुरूआत में आपकी तरह हमें भी आशंका थी. पर बाला साहेब ठाकरे से जुडे़ हर इंसान ने बडे़ खुले मन से ईमानदारी से ही हमें कहानी कहने की स्वतंत्रता दी. कहानी के साथ पूरा न्याय किया गया है. हम इस फिल्म को लेकर आश्वस्त भी हैं.

कन्नड़ और पंजाबी सिनेमा की तरफ ध्यान कम जाता है. इसकी कोई खास वजह है?

पंजाबी में तो हम लोग कुछ काम कर रहे हैं. पंजाबी सिनेमा का मार्केट इसलिए नहीं उभरा, क्योंकि उसके सेटेलाइट राइट्स बिकने की संभावनाएं नही हैं. मगर पंजाबी फिल्में थिएटर में बहुत अच्छा बिजनेस करती हैं. कन्नड़ में भी हम लोगों की कुछ योजनाएं हैं. मजेदार बात यह है कि कन्नड़ में हमारे चैनल बहुत सशक्त हैं. इसलिए वहां के दर्शकों तक पहुंच और मार्केट की समझ हमें है.

पिछले 4-5 वर्षों में एक नया ट्रेंड आ गया है. हौलीवुड की फिल्में भारतीय भाष में डब होकर आ रही हैं. तो उससे भारतीय सिनेमा को कितना खतरा है?

हम हर भाषा में काम कर रहे हैं. भारत विविध भाषा व संस्कृति का देश है. तो यहां पर अंग्रेजी फिल्मों के भी अपने दर्शक हैं. क्षेत्रीय सिनेमा के भी अपने दर्शक हैं. हिंदी सिनेमा के भी दर्शक हैं. अगर आप इस व्यवसाय में हैं, तो आपको हर मार्केट को ध्यान में रखकर चलना पडे़गा. हमारी रणनीति यही है. पर हम कोशिश यह करेंगे कि फिल्मों का आपस में क्लैश/ टकराव ना होने पाए. यदि कोई हौलीवुड की बड़ी फिल्म रिलीज हो रही हैं, तो हम उसके सामने अपनी कोई बड़ी फिल्म लेकर ना आएं, ऐसी कोशिश हो सकती है.

पर हौलीवुड सिनेमा जिस तरह से हावी हो रहा है,उससे मुकाबला कैसे करेंगे?

हौलीवुड फिल्में तब हावी होती हैं, जब भारतीय सिनेमा उससे क्लैश/ टकराव करता है. जैसा कि मैंने पहले ही कहा हम कोशिश करते हैं कि जब कोई बेहतर या बड़ी हौलीवुड/ अंग्रेजी फिल्म रिलीज हो रही हो, तो हिंदी की फिल्म को रिलीज ना करें. आप हौलीवुड को हलके में नहीं ले सकते हैं. क्योंकि अब भारत में भी उसका आकर्षण बढ़ चुका है. इसके अलावा हमें यह नही भूलना चाहिए कि भारतीय सिनेमा (हिंदी व क्षेत्रीय) के अपने कमिटेड दर्शक हैं. क्षेत्रीय सिनेमा के भी अपने कमिटेड दर्शक हैं. तो फिल्मों की रिलीज में भी चतुरायी से कदम उठाना पड़ेगा. ऐसा करने से हर मार्केट विकसित हो सकती है.

जब यूरोप में हौलीवुड सिनेमा हावी हो रहा था, तब वहां के लोगों की भी यही सोच थी. पर बाद में हौलीवुड सिनेमा के कारण यूरोपीय सिनेमा खत्म हो गया. क्या इस तरह का संकट भारतीय सिनेमा के साथ आपको नजर नही आ रहा है?

मेरी समझ यह कहती है कि भारतीय सिनेमा की जो परंपरा है, जो पुरानी धरोहर है, वह काफी सशक्त है. उसकी नींव इतनी मजबूत है कि हौलीवुड की वजह से हिल नहीं सकता. दूसरी बात भारतीय सिनेमा तेजी से विकसित हो रहा है. अब हालात यह हैं कि विदेशों में भी भारतीय सिनेमा लोकप्रियता बटोर रहा है. हमारे सामने दो रास्ते होते हैं – एक हम यह रूख कर लें कि हमें हौलीवुड से कैसे बचना है? दूसरा रूख होता है कि भारतीय सभ्यता संस्कृति से ओत प्रोत जो हमारा भारतीय सिनेमा है, उसे किस तरह विदेशों में अधिक से अधिक प्रदर्शित करें. अब हमने ‘पद्मावत’ को पूरे में 80 देशों में रिलीज किया. आप देखिए कि चीन में भारतीय फिल्में और खासकर हिंदी फिल्में सबसे ज्यादा प्रदर्शित हो रही हैं. बिजनेस कर रही हैं. मेरी सोच यह कहती है कि भारतीय सिनेमा को पूरे विश्व में फैलाने का नजरिया ज्यादा कारगार उपाय है.

देखिए, हौलीवुड एक खास तरह का सेगमेंट है, उनकी कथा कथन की एक अपनी शैली है. हां! उनके विजुअल्स काफी दर्शनीय व आकर्षित करने वाले होते हैं. उसमें उनकी अपनी एक ताकत है, जो कि रहेगी. जबकि हम लोगों की ताकत ड्रामा व इमोशंस में है. कला, संगीत, नृत्य आदि भारतीय सिनेमा में कई रंग हैं, जो कि भारतीय सिनेमा को एक अलग पहचान देते हैं. इसलिए हम काफी सुरक्षित हैं. पर हमें अपने सिनेमा को और अधिक विकसित करते रहना पड़ेगा.

इन दिनों वुमन इम्पावरमेंट की बहुत बातें हो रही हैं. इस दिशा में भारतीय सिनेमा में क्या हो रहा है?

देखिए, सिनेमा तो समाज का ही आइना है. और समाज में आ रहे बदलाव के ही कारण या यूं कहें कि वुमन इम्पावरमेंट का ही कारण है कि अब हम नायिका प्रधान सिनेमा बना रहे हैं. समाज में जिस तरह से महिलाओं की उपलब्धियां बढ़ी हैं, अब वह भारतीय सिनेमा में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं. यह सिनेमा में आना आवश्य्क है. सदियों से पितृसत्तात्मक समाज में जो असमानता रही है, वह धीरे धीरे सही हो रही है. अब एक संतुलन बन रहा है. जो कि हमारे सिनेमा में भी रिफलेक्ट हो रहा है.

मेरे हिसाब से अप्रोच यह होनी चाहिए कि समाज में जो बदलाव आ रहे हैं, उसे सिनेमा में मनोरंजक तरीके से दिखाया जाए. तो वह कारगर होगा. जैसे कि हमने फिल्म ‘ट्वॉयलेटः एक प्रेम कथा’ में शौचालय निर्माण का युनीक मुद्दा उठाया. यानी कि सिनेमा के परदे पर वुमन इम्पावरमेंट पर एक मुहीम ना बनाते हुए सिर्फ समाज के प्रतिबिंब के रूप में दिखाएं, तो अच्छा होगा. जैसा कि हमने ‘क्वीन’ या ‘मैरी कॉम’ में पेश किया. इसी तरह हम अपने बिजनेस के उत्तरदायित्व के साथ साथ सामाजिक उत्तरदायित्व को भी बेहतर तरीके से निभा लेते हैं.

पर इस तरह का काम बहुत कम हो रहा है?

देखिए, काफी फिल्में बनी हैं. मैं दूसरे स्टूडियो की भी बात करना चाहूंगा. ‘नीरजा’ व ‘राजी’ बेहतर फिल्में बनी हैं. तो पिछले कुछ वर्षों से नायिका प्रधान फिल्मों का टे्ंड बहुत मजबूत हुआ है. पिछले 5-6 वर्षों में वुमन इम्पावरमेंट को लेकर सिनेमा ने अहम भूमिका निभायी है.

इन दिनों रील सिनेमा को सुरक्षित करने की मुहीम चल रही है. इरानी फिल्मकार माजिद मजीदी का मानना है कि डिजिटल सिनेमा की वजह से सिनेमा मर रहा है?

हम लोग भी इस मुद्दे से परिचित हैं. आप भी समझ सकते हैं कि ग्रामोफोन पर गाने सुनने वालों को एमपी 3 पर गाने सुनने में मजा नहीं आ सकता. इसी तरह रील सिनेमा का जो विजुअल चार्म है, वह डिजिटल सिनेमा में नहीं मिल सकता. रोमांटिक व रोमांचंक किस्म के लोगों को डिजिटल सिनेमा मजा नही देता. लेकिन डिजिटल सिनेमा के जो फायदे हैं, उसे भी आप नकार नहीं सकते. तो यह दोनों मीडियम हैं और मुझे लगता है कि कहानी कहने के तरीके के आधार पर दोनों मीडियम का उपयोग किया जा सकता है. हकीकत यह है कि आर्थिक पक्ष से लेकर कई पक्षों को तक डिजिटल मीडियम के इतने फायदे हैं कि आप उसे नजरंदाज नही कर सकते. पर आप भी जानते हैं और मैं भी कि कला में जब नई तकनीक का उद्भव होता है, तो कुछ अजीब सा लगता है. आज हम हाथ से लिखने की बजाए कम्प्यूटर पर टाइपिंग कर लेते हैं या औडियो रिकौर्डिग करते हैं. पर हाथ से लिखने का जो सुख है, वह कम्प्यूटर पर टाइपिंग के सुख के बराबर नहीं हो सकता. सोचने की बात यह है कि हम किस तकनीक का कितना अच्छा उपयोग कर सकते हैं.

कंपनी को चलाने और रचनात्मकता को बरकरार रखने का जो चक्रव्यूह है, उसके चलते ऐसा कोई विषय है, जिस पर आप फिल्म नहीं बना पा रहे हैं?

जी हां!! ऐसा है. हम काफी समय से कोशिश कर रहे हैं कि हम लोग ‘स्पेस/अंतरिक्ष’ पर फिल्म बनाएं. हकीकत यह है कि हिंदी फिल्में ‘स्पेस’ पर नहीं पहुंची हैं. यह एक नया आयाम है. हमने इस पर अपनी तरफ से काफी काम किया है. हम कल्पना चावला की बायोपिक बनाना चाहते हैं. उनका जीवन बहुत उम्दा रहा है. इसको लेकर हम हमारे स्टूडियो से जुड़े सभी लोग बहुत उत्साहित हैं. लेकिन आप भी जानते हैं कि फिल्म निर्माण की यात्रा में काफी चुनौतियां होती हैं. यह चुनौतियां हमारे सामने आज भी बरकरार हैं. लेकिन अभी तक हमने हार मानी नही है. लेकिन यह फिल्म कब शुरू होगी, आज की तारीख में दावे से नहीं कह सकता. पर कोशिश जारी है.

अब आप देखें, हौलीवुड में लोग स्टार वार हो या उनके दूसरे कौमिक कल्चर हों, उसका जश्न सिनेमा में मना रहे हैं. मगर हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर को लेकर कुछ नही कर पाए हैं. हौलीवुड सिनेमा के पास सांस्कृतिक धरोहर नही है, इसलिए उन्होंने अपने यहां की कौमिक बुक्स का सहारा लिया है. हमारी सांस्कृतिक धरोहर हमें विरासत में मिली है. हमारे पास ‘महाभारत’ जैसा महाकाव्य है, जिसके हर चरित्र पर बेहतरीन फिल्में बन सकती हैं. मैं निजी स्तर पर इस तरह के विषयों पर काम करना चाहता हूं. मेरा मानना है कि यदि हम अपने देश की सांस्कृतिक धरोहर का पूरा उपयोग कर उसे सिनेमा में उतार सकें, तो हमारा सिनेमा पूरे विश्व में राज कर सकता है. हमारे पास ऐसा बहुत कुछ है, जो कि चीन या अमरीका के लोगों को भी पसंद आएगा.

प्लास्टिक के कचरे से बनेगा डीजल

प्लास्टिक कचरे से डीजल बनाने की तकनीकी करीबन 5 साल पहले ईजाद की गई थी, इस तकनीक से न सिर्फ डीजल बल्कि पैट्रोल और एलपीजी गैस भी तैयार की जा सकती है. उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से अब न सिर्फ एक हजार किलोग्राम प्लास्टिक कचरा रोजाना उठाने का इंतजाम किया गया है, बल्कि इस से प्रतिदिन 800 लिटर डीजल भी बनाया जाएगा. यह सब काम होगा भारतीय पैट्रोलियम संस्थान (आईपीपी) की तकनीक से.

इस कार्य के लिए गैस अथौरिटी औफ इंडिया लिमिटेड यानी गेल ने संस्थान को 13 करोड़ रुपए की मदद दी है. इस के लिए संस्थान में प्रयोगशाला स्तर का प्लांट भी लगाया गया है.

हालांकि बड़े स्तर पर करीब एक टन क्षमता के प्लांट से उत्पादन शुरू किया जाएगा. अगले वर्ष जनवरी में संस्थान परिसर में डीजल बनाने का प्लांट लगाया जाएगा. इस की शुरुआत देहरादून के प्लास्टिक कचरे से शुरू की जाएगी. इस की डिमांड बढ़ने पर केंद्र सरकार के स्तर से तमाम शहरों में भी इस पहल को आगे बढ़ाया जाएगा. यदि यह तकनीकी पूर्णरूप से सफल रही तो डीजल के दाम लगभग 50 रुपए प्रति लिटर होने की उम्मीद है, जो वर्तमान में 73 रुपए प्रति लिटर है. यह कहना है आईआइइपी वैज्ञानिकों का. यदि इस प्लांट की क्षमता 5 टन तक बढ़ाई जाती है तो इस के दाम 35 रुपए प्रति लिटर तक आ सकते हैं.

क्रांतिकारी बदलाव

केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक यदि देश के 60 प्रमुख शहरों में 15 हजार टन प्लास्टिक कचरा प्रतिदिन निकाला जाता है तो इस में से 6 हजार टन कचरा यों ही पड़ा रहता है. हालांकि आईआईपी की सफल तकनीकी के प्रयोग के बाद तमाम नगर निकाय अपने स्तर पर ईंधन बनाने के प्लांट लगा सकते हैं. यदि यह प्रयोग सफल रहा तो प्लास्टिक कचरे के निस्तारण में यह क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है.

कैसे बनता है ईंधन

प्लास्टिक कचरे को पहले सुखाया जाता है और फिर उसे सीलबंद भट्टी में डाल कर औक्सीजन की अनुपस्थिति में तेज आंच पर पकाया जाता है, जिस से प्लास्टिक भाप में बदल जाता है. इस भट्टी से एक पाइप जुड़ा होता है जो एक वाटर टैंक में जाता है और उस भाप को इसी टैंक में जमा किया जाता है. इस टैंक की सतह पर जमा पानी को छूते हुए भाप को दूसरे टैंक में भेजा जाता है इस प्रक्रिया में भाप ईंधन बन जाती है. इसे रिफाइन कर पैट्रोल या डीजल बनाया जाता है. हालांकि पूरी भाप तरल अवस्था में नहीं आ पाती है और वाटर टैंक के ऊपरी हिस्से में जमा हो जाती है. इस का इस्तेमाल एलपीजी बनाने में किया जाता है.

पिथौरागढ़ में बनेगा ट्यूलिप गार्डन

जम्मूकश्मीर में स्थित ट्यूलिप गार्डन की तर्ज पर ही उत्तराखंड  के पिथौरागढ़ में भी एक ट्यूलिप गार्डन बनाने का प्रयास किया जा रहा है. औयल ऐंड नैचुरल गैस कंपनी यानी ओएनजीसी इस गार्डन के निर्माण के लिए धन मुहैया कराएगी. ओएनजीसी के वरिष्ठ अधिकारियों ने पिथौरागढ़ जा कर निर्माण स्थल का निरीक्षण व अन्य जांच कार्य शुरू कर दिया है.

नैसर्गिक खूबसूरती से भरपूर राज्य के इस सीमावर्ती जिले पिथौरागढ़ को मिनी कश्मीर के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन इस जिला मुख्ययालय में पर्यटकों के वास्ते अभी तक ऐसे पर्यटक स्थल स्थापित नहीं हो पाए हैं, जो पर्यटन को बढ़ावा दें और साथ ही राज्य के राजस्व बढ़ाने में भी मददगार साबित हो सकें. इस संबंध में यहां नए पर्यटन स्थलों को विकसित करने की दिशा में प्रयास चल रहे हैं.

ट्यूलिप गार्डन के निर्माण के लिए वन विभाग ने पिथौरागढ़ से लगभग 8 किलोमीटर दूर मड़धूरा के पास इस गार्डन को बनाए जाने का प्रस्ताव तैयार किया है. इस गार्डन में कश्मीर के ट्यूलिप गार्डन में खिलने वाले ट्यूलिप के पौधे लगाए जाएंगे. लगभग 20 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैले इस क्षेत्र में पर्यटकों के लिए अन्य सुविधाएं मसलन, झूले, वर्डवाचिंग सैंटर, हिमालय को देखने के लिए एक विशाल दूरबीन आदि लगाने का भी प्रस्ताव है.

ओएनजीसी के उच्च अधिकारियों ने पिथौरागढ़ जा कर प्रस्तावित स्थल की जांचपरख की. ट्यूलिप के इस गार्डन को तैयार करने के लिए देश की नवरत्न कंपनी औयल ऐंड नैचुरल गैस कंपनी यानी ओएनजीसी करीब 50 करोड़ रुपए देगी. इस के परिणाम बहुत जल्दी ही सामने आने वाले हैं. इस गार्डन के बनने से उत्तराखंड में रोजगार के साधन भी बढ़ेंगे और पहाड़ी क्षेत्रों से हो रहे पलायन पर कुछ हद तक रोक लग सकेगी.

बड़ा सवाल : क्या सब कुछ वैजिटेरियन ही है

क्या एक शुद्ध शाकाहारी के लिए इस दुनिया में अपना वजूद रखना मुमकिन है जब चारों ओर जानवरों से बनी चीजें बिखरी हों? शुद्ध शाकाहारी, जिन्हें यूरोप में वेगान कहा जा रहा है, को हर समय चौकन्ना रहना पड़ता है कि कहीं जानवरों से बनी चीजें वैज कह कर तो नहीं परोसी जा रहीं. कुछ तो इसीलिए उन रेस्तराओं में जाते ही नहीं जहां मीट भी बनता हो.

वनरास क्रौकरी बनाने वाली एक कंपनी है, जिस की प्लेटों के नीचे 100% वैजिटेरियन की मुहर लगी होती है, क्योंकि बोन चाइना की प्लेटों पर हड्डियों का चूरा लगता है, लेकिन क्या शैंपू की बोतल के नीचे लिखा होता है 100% शुद्ध वैजिटेरियन?

कुछ भी शाकाहारी नहीं

जानवरों की हड्डियों, ओवरियों, लिवर, लंग्स, ग्लैंड, ब्रेन, स्पाइनल कौर्ड, उन की बदन के कैमिकल बहुत सी रोजमर्रा की चीजों में डाले जाते हैं और वेगान उन्हें शुद्ध शाकाहारी समझ कर मजे में इस्तेमाल करते हैं. दवाइयों में भी इन जानवरों के कैमिकल इस्तेमाल करे जाते हैं और कभीकभार हाल में मरे या मारे गए जानवरों के कैमिकल दवाओं और कौस्मैटिक में इस्तेमाल होते हैं. गायों के लिवर से विटामिन बी12 तैयार होता है.

ग्लाइकोजैन, जो पैंक्रियाज से निकाला जाता है, ब्लड शुगर लैवल बढ़ाने में इस्तेमाल होता है.

मैलाटोनिक जानवरों की पीनियल ग्लैंड्स से निकाला जाता है और उसे इनसोमनिया यानी नींद न आने की बीमारी में इस्तेमाल करा जाता है. जानवरों व सूअरों के पेट का बाइल लिवर की बीमारियों, कब्ज आदि परेशानियों की दवाइयों में इस्तेमाल किया जाता है. ह्यालूरोनिक ऐसिड सौंदर्य उत्पादों में इस्तेमाल होता है, जो जानवरों के जोड़ों से निकलता है.

जानवरों से कू्ररता

सुगंधित चीजों में ऐनिमल प्रोडक्ट बहुत इस्तेमाल होते हैं. मस्क, कस्तूरी जो महंगे परफ्यूमों में इस्तेमाल होता है हिमालय के मस्क हिरनों से निकलता है. हिरन को मार कर उस के ग्लैंड को सुखाया जाता है और फिर अलकोहल में डुबोया जाता है ताकि कस्तूरी निकल सके. कैस्टोरियम पैस्ट जैल कैमिकल होता है जो लिवर से निकलता है और ताजे नए लैदर को सुगंध देने के लिए परफ्यूम में या गाडि़यों की अपहोल्स्ट्री में इस्तेमाल होता है.

जानवरों की गुदा से निकलने वाले कैमिकल भी सैंटों में इस्तेमाल होते हैं और वह कैमिकल तो तभी मिलते हैं जब जानवर जिंदा हो और उस से क्रूरता बरती जाए. प्रकृति ने गंध उन्हें दूसरों को डराने या अपने साथियों को सावधान करने के लिए दी है पर इस का अब जम कर इंडस्ट्रियल इस्तेमाल हो रहा है और अफ्रीका में बीसियों ऐसे फार्म हैं जहां से इस तरह के कैमिकल सारी दुनिया में भेजे जाते हैं.

मनुष्य है जानवरों का दुश्मन

कुछ क्रीमों में सेरेब्रोसाइड और ऐराफिडौजिक ऐसिड्स ब्रेन टिशू से निकलते हैं. जानवरों के टिशू से निकलने वाले ऐसिड लिपस्टिकों में इस्तेमाल होते हैं. प्रोविटामिन बी 5 शैंपू और कंडीशनरों में डाला जाता है जो जानवरों के सींगों, खुरों, पंखों, बालों से निकलता है.

शार्क लिवर औयल लूब्रिकेटिंग क्रीमों में इस्तेमाल करते हैं. रेनिट जो गाय, सूअर और बकरी के पेट से निकलता है, चीज बनाने में इस्तेमाल होता है.

जानवरों के सब से बड़े दुश्मन इंसान हैं जो खुद को शाकाहारी कहते हुए मजे में जानवरों से बनी चीजों को इस्तेमाल करते हैं.

क्या करें जब पिता पीटता हो…

सभी टीचर अखबार पढ़ कर सकते में थे. उन्हीं के स्कूल के छात्र बंटी की कू्ररता का बखान अखबार में था. मिसेज शर्मा ने उसे पहली से 5वीं तक पढ़ाया था. हमेशा गुमसुम रहने वाला लड़का इतनी कू्ररता से किसी की हत्या कर देगा, ऐसा किसी ने नहीं सोचा था. उन्हें याद आ रहा था कि उस की मां ने दूसरी शादी की थी. सौतेले बाप के अत्याचार से उस का बचपन खत्म सा हो गया था. वह पढ़ाई में काफी कमजोर था, इसलिए किसी भी टीचर के बहुत नजदीक नहीं था. घर से मिली उपेक्षा और फिर घर से बाहर स्कूल में भी.

मार्गदर्शन का अभाव

अकसर हम हर चौथे दिन तोड़मरोड़ कर ऐसी ही खबर पढ़ते हैं. थोडे़ समय के लिए ये खबरें हम सब को सन्न कर देती हैं. परंतु धीरेधीरे समय के अनुसार सब धूमिल पड़ती जाती हैं, हम सभी यह महसूस कर रहे हैं कि आजकल बच्चों में परिपक्वता जल्दी आ जाती है. फलस्वरूप वे समय से पहले उम्र से अधिक की सोच रखने लगते हैं. परंतु उन की इस परिपक्वता को सही मार्गदर्शन नहीं मिल पाता. ऐसे में पिता के प्यार से महरूम बच्चे अपराध की ओर अग्रसर हो जाते हैं. पढ़ेलिखे मातापिता भी इस स्थिति को संभाल नहीं पाते जबकि अनपढ़ और कम पढ़ेलिखे मातापिता इस बारे में सोच ही नहीं सकते.

शहरों में पलते और विकसित होते बच्चे जोकि विशेषतौर पर स्लम और पुनर्वास कौलोनी में रहते हैं, को जिंदगी के सभी पहलुओं का बहुत ही जल्दी सामना करना पड़ता है.

राहुल ऐसी ही एक स्लम कौलोनी के एक कमरे में अपने मातापिता के साथ रहता है. उस ने पिता को बचपन से ही एक शराबी के रूप में देखा है. उस के पिता रोज शाम को नशे में धुत हो कर आते और फिर बातबात पर उस की मां और सब भाईबहनों से ?ागड़ने लगते. उन के हाथ में जो भी चीज आ जाती, वे उसी से उन्हें मारने लगते. वे उस की मां के चरित्र को ले कर तरहतरह के कटाक्ष करते.

राहुल और उस के भाईबहन हमेशा सहमेसहमे रहते. घर पर पढ़ाई में मदद करने वाला कोई नहीं था. धीरेधीरे राहुल घर से गायब रहने लगा. उस के बहुत से बड़ी उम्र के लड़के दोस्त बन गए थे. उसे घर से ज्यादा मजा उन के साथ आता. वे सब कई आपराधिक गतिविधियों में शामिल थे. राहुल भी उन के साथ छोटीमोटी चोरियां करने लगा. उस की किशोरावस्था स्वतंत्र स्वच्छंद जीवन जीना चाहती थी. धीरेधीरे उस ने पिता पर भी हाथ उठाना शुरू कर दिया.

रखें दोस्ती भरा व्यवहार

मनोवैज्ञानिक डा. रमा वर्मा के अनुसार, ‘‘बढ़ती उम्र के लड़कों के साथ दोस्ताना व्यवहार न रखा जाए और उन को सही मार्गदर्शन न दिया जाए तो वे गलत संगत में पड़ सकते हैं. इसलिए मातापिता को बच्चों के साथ दोस्ती भरा व्यवहार करना चाहिए. बचपन से ही पिता से पिटने की आदत अकसर बच्चों में बगावत उत्पन्न कर देती है. वे निर्दयी और कू्रर होते जाते हैं व अपराध की दुनिया का रुख कर लेते हैं.’’

वंदना 4 बहनों में सब से बड़ी थी. 4 लड़कियों को पालने और उन के विवाह पर आने वाले खर्च के बारे में सोच कर उस के पिता के अंदर संताप पनपने लगा. अकसर वे बच्चियों को पीट कर अपनी खीज उतारते. मासूम बच्चियां अपना कुसूर नहीं जानती थीं. उन में पिता के प्रति नफरत उत्पन्न होती गई. उन के लिए पिता एक ऐसा राक्षस था जो जब चाहे उन को पीट कर अपना गुस्सा निकाल सकता है.

धीरेधीरे वंदना में उस के गुस्से ने बगावत का रूप ले लिया. वह पिता की कही हर बात का उलटा जवाब देने लगी. उस की बढ़ती उम्र के साथ महल्ले के कई लड़के उस के आगेपीछे घूमने लगे. उन की मीठी बातों ने आग में घी डालने का काम किया. एक दिन वह घर से भाग गई और उस के इस कदम से उस की बहनों की जिंदगी और खराब होती गई. उस के पिता ने बदनामी के डर और शर्म से उन्हें और पीटना शुरू कर दिया.

अच्छे मातापिता बनने की ट्रेनिंग

डा. रमा के अनुसार, ‘‘भारत में विवाह पूर्व अच्छे मातापिता बनने की टे्रनिंग देनी बहुत ही जरूरी है, विशेषतौर पर निम्न वर्ग में, जहां शादियां बहुत ही जल्दी कर दी जाती हैं.’’ वास्तव में हमारे देश में इस विषय पर अभी तक कोई टे्रनिंग नहीं दी जाती. संस्कृति की दुहाई दे कर शर्म के कारण बच्चों से इस बारे में कोई बात नहीं की जाती. अकस्मात जिम्मेदारियों से घिरने से उन्हें एक मातापिता, पतिपत्नी के कर्तव्य का ज्ञान ही नहीं होता और वे जीवन के प्रति नकारात्मक रुख अपना लेते हैं.

पहले ज्यादातर संयुक्त परिवार का चलन था जिस में बच्चे अपने घर के सभी बड़ों से कुछ न कुछ सीखते थे और बड़ों का भी बच्चों के लालनपालन में काफी सहयोग रहता था परंतु समय के साथ एकल परिवारों में जिंदगी सिमट कर रह गई है और आर्थिक तंगी के बो?ा ने इंसान के सब्र को खत्म कर दिया है. हमेशा से बड़ी मछली छोटी मछली को निगलती आई है. शायद इसीलिए पिता भी बच्चों को पीटते हैं. नतीजतन, बच्चे मानसिक रूप से काफी आहत हो जाते हैं और बड़े हो कर बगावत करने पर उतारू हो जाते हैं.

कानूनी सुरक्षा की छांव

अगर हम कानूनी प्रावधान देखें, ‘यूएन कन्वैंशन औन चाइल्ड राइट्स 1992’ के तहत बच्चों को तमाम अधिकार दिए गए हैं. इस पर भारत सरकार ने भी दस्तखत कर अपने यहां लागू किया है. 1992 में संसद द्वारा इसे संशोधित किया गया और कुछ कानूनी प्रावधान जोड़े गए. जेजे ऐक्ट-23 के तहत बच्चों को सुरक्षा दी गई है जिस का अर्थ है कि जिस की भी कस्टडी में बच्चा है अगर वह व्यक्ति चाहे मातापिता हो, टीचर हो, बच्चे को शारीरिक या मानसिक तौर पर प्रताडि़त करता है या धमकी देता है तो उस के खिलाफ केस दर्ज किए जाने का प्रावधान है. साथ ही साथ, दोषी पाए जाने पर 6 महीने कैद की सजा है.

दरअसल, भारत में बच्चों को प्रताडि़त करने के संबंध में कानूनी प्रावधान है लेकिन देखने में यह आता है कि कभी शिकायत होती है पर कार्यवाही नहीं होती या कभी कार्यवाही होती है पर शिकायत नहीं होती, इसलिए जरूरी हो जाता है कि सरकारी और गैरसरकारी संस्थाएं इस बारे में लोगों को जागरूक करें, ताकि हमारे बच्चों का समाज सुरक्षित रह सके और बच्चे नफरत या अपराध के माहौल से दूर अपनों के प्यार व अपनेपन की छांव तले सुखद जीवन जी सकें.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें