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दूध के अलावा ये 5 चीजें हैं कैल्शियम की प्रमुख स्रोत

शरीर के लिए कैंल्शियम एक महत्वपूर्ण तत्व होता है. डाक्टरों का कहना है कि 19 से 64 साल के साभी लोगों को रोजाना 700 एमजी कैल्शियम खाना चाहिए. दूध समेत कई डेयरी उत्पाद कैल्शियम के प्रमुख  स्रोत हैं.

इस खबर में हम आपको बताएंगे कि डेयरी उत्पादों के अलावा और कौन से खाद्य पदार्थ हो सकते हैं जिनसे हमें प्रचुर मात्रा में कैल्शियम मिल सके.

संतरा

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आम तौर पर लोगों को जानकारी नहीं होती कि संतरा भी कैल्शियम का प्रमुख  स्रोत है. एक संतरे से आपको 70 एमजी से ज्यादा कैल्शियम मिलता है, ये आपकी रोजाना की जरूरत का 6 फीसदी है.

हरी पत्तेदार सब्जियां

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पत्तेदार सब्जियां में कम कैलोरी, कम फैट और फाइबर व कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है। आप इस सब्जी को नियमित रूप से अपनी डायट में शामिल करने से आपको कैल्शियम की कमी नहीं होगी.

वाइट बिन्स

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वाइट बिन्स फाइबर के साथ साथ प्रोटीन का प्रमुख  स्रोत है. इसके नियामित उपयोग से शरीर में प्रोटीन की कमी कभी नहीं होगी. इसकी एक खुराक से आपको लगभग 175 मिलीग्राम कैल्शियम मिलता है.

ब्रोकोली

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ब्रोकोली काफी फायदेमंद और खूबियों से युक्त सब्जी है. इसमें विटामिन ए-के और मिनरल्स जैसे मैग्नीशियम, जिंक और फास्फोरसका प्रमुखता से पाए जाते हैं. इसके अलावा इसमें कैल्शियम भी भरपूर मात्रा में होती है.

बादाम

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बादाम में प्रचूर मात्रा में कैल्शियम होता है. इससे आपका इम्युन सिस्टम मजबूत बनता है और आपको ऊर्जा मिलती है। बादाम के अलावा कई अन्य नट्स में भी उच्च मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है.

कर्मचारियों का ज्यादा खयाल रख रही हैं कंपनियां

दुनियाभर में बिगड़ती जीवनशैली और तमाम दबावों के चलते बीमारियों की और बीमारों की तादाद में इजाफा हो रहा है. यही वजह है कि इन दिनों वर्कप्लेस पर वैलनेस का कान्सेप्ट काफी तेजी पकड़ रहा है.

ब्रिटेन और अमेरिका में कुछ कंपनियां अपने कर्मचारियों को एक ट्रैकिंग डिवाइस पहना रही हैं. इस से वे अपने कर्मचारियों की सेहत, फिटनेस और उन के तनाव पर हर लम्हा नजर रख सकेंगी. गले में लौकेट की तरह लटकाई जाने वाली इस डिवाइस को सोशियोमैट्रिक बैंडेज कहा जा रहा है. एक बैंक समेत 4 बड़ी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को यह ट्रैकिंग डिवाइस दी है. ब्रिटेन में यह सरकारी स्वास्थ सेवा एनएचएस  के साथ मिल कर किया जा रहा है.

एटीएम कार्ड जितनी बड़ी इस मशीन में एक माइक्रोफोन लगा है जो बातचीत के लहजे, रफ्तार और वौल्यूम को दर्ज करेगा. क्या कहा जा रहा है, यह रिकार्ड नहीं होगा. लेकिन बात करने के अंदाज से पता चलेगा कि ट्रैकिंग डिवाइस पहनने वाले शख्स का मूड कैसा है और वह क्या कर रहा है.

यह बताना जरूरी है कि यह कर्मचारियों की निजता का हनन नहीं है क्योंकि कंपनिया हर कर्मचारी का डाटा नहीं देख पाएंगी. कर्मचारियों की पहचान सुरक्षित रखी जाएगी और जानकारी को डाटा के रूप में पेश किया जाएगा.

अपने कर्मचारियों का खयाल रखने में भारतीय कम्पनियां भी अब पीछे नहीं हैं. वे भी अपने कर्मचारियों के स्वास्थ्य व उन के वेलनेस पर ध्यान दे रही हैं. इस में आर्थिक और भावनात्मक पहलू को भी शामिल किया गया है.

ग्लोबल एडवाइजरी, ब्रोकिंग एंड सोल्यूशन्स कम्पनी विलिस टावर्स की ओर से कराई गई ‘इंडिया हेल्थ एंड वेल बीईंग स्टडी 2018’ से पता चला है कि इस साल तकरीबन 80 फीसदी से ज्यादा कंपनियों ने अपने यहां कर्मचारियों की सेहत की देखभाल, वेट मैनेजमेंट (वजन पर कण्ट्रोल), जिस्म की गतिविधि, बेहतर खानपान के अलावा मानसिक स्वास्थ्य पर सहभागिता बढ़ाई है.

प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ के बीच बैलेंस बनाने के लिए भारतीयों को काफी मशक्कत करनी पड़ती है, जिस का असर कर्मचारी की परफार्मेंस और कंपनी के प्रोडक्शन पर भी पड़ता है. बड़ी कार्पोरेट कंपनियां अब इस बात को अच्छी तरह समझने लगी हैं. शायद यही कारण है कि वे अब एंप्लॉयी की हेल्थ और वैलनेस पर निवेश करने में हिचकिचा नहीं रही हैं.

स्टडी के मुताबिक, इस साल देश की 61 फीसदी कंपनियों ने कर्मचारियों की आर्थिक सेहत सुधारने के लिए काम किया है. स्टडी में इस बात पर चिंता भी जाहिर की गई है कि सर्वे में शामिल करीब आधी कंपनियों के पास कर्मचारियों की सेहत की बेहतरी के लिए अच्छी रणनीति नहीं है.

सर्वे से मालूम हुआ कि अपने यहां मानसिक स्वास्थ्य रणनीति बनाने के लिए 66 फीसदी कम्पनियां कोशिश शुरू कर चुकी हैं जबकि 59 फीसदी कम्पनियां सेहत से जुड़ी योजना पर अपने यहां काम करने की तैयारी कर रही हैं. सर्वे रिपोर्ट में बताया गया है कि 63 फीसदी कम्पनियां कर्मचारियों की सेहत में सुधार लाने के लिए काम कर रही हैं या ऐसा करने की कोशिश में जुटी हुई हैं.  वहीँ, 13 फीसदी कम्पनियां इस मोर्चे पर अगले 3 वर्षों तक काम करने पर विचार कर रही हैं.      
इतना ही नहीं, कंपनियां अपने कर्मचारियों को पर्सनल केयर भी मुहैया करवा रही हैं. इस के लिए कंपनियां न सिर्फ डाक्टर से इलाज करवाने की सुविधा दे रही हैं, बल्कि तकनीक के इस्तेमाल से उन्हें जब जरूरत हो, तब डाक्टर तक पहुंचा भी रही हैं.

कई कंपनियां अब यह भी नोटिस कर रही हैं कि उन के किन कर्मचारियों पर बच्चे या वृद्ध निर्भर हैं. ऐसे में कंपनियां यह खयाल रखती हैं कि आने वाले समय में उन के ऊपर बोझ पड़ सकता है. ऐसे में कंपनियां कर्मचारियों के डिपेंडेंट के लिए मेडिकल सुविधाओं में बढ़ोतरी कर रही हैं ताकि कर्मचारी अपने फाइनेंस और अपने ऊपर निर्भर परिवार की चिंता छोड़ कंपनी के काम पर ज्यादा ध्यान दे सकें.

कर्मचारियों के पूर्ण स्वास्‍थ्‍य लाभ के लिए कंपनियां आजकल वर्कप्लेस के माहौल को भी बेहतर बनाने पर जोर दे रही हैं, ताकि कोई कर्मचारी खुद को किसी डब्बे में पड़ी तीली की तरह न महसूस करे. यहां पूर्ण स्वास्थ्य लाभ से मतलब केवल शारीरिक तंदुरुस्ती से नहीं, बल्कि वैलनेस के पूरे स्पेक्ट्रम से है जिस में शारीरिक वैलनेस के साथसाथ मानसिक, भावनात्मक और फाइनेंशियल वैलनेस भी शामिल है.

अब कंपनियां शरीर, दिमाग और उद्देश्यों के लिए कई तरह के स्वास्थ्यवर्द्धक उपाय करने को प्रतिबद्ध हैं. वजन घटाने,तनाव और स्मोकिंग मुक्ति से ले कर डायग्नोस्टिक केयर तक का खयाल कंपनियों द्वारा रखा जा रहा है. इस में को शक नहीं कि कंपनियों का इस दिशा में काम करना अच्छी खबर है.

छिपकलियों से परेशान हैं तो आजमाइए ये घरेलू उपाय

छिपकली हर मौसम में पायी जाती है. शायद ही ऐसा घर कोई हो जो छिपकलियों से बचा हो. अगर आप भी अपने घरों से छिपकली भगाने के लिए काफी जतन कर चुकी हैं और आप छिपकली भगाने में असफल रहें तो आज हम आपको कुछ आसान घरेलू नुस्खे बताएंगे जो आपकी ये सारी टेंशन दूर कर देंगे.

आप छिपकलियों को दूर भगाने के लिए काली मिर्च का स्प्रे भी इस्तेमाल कर सकती हैं. इस स्प्रे को बनाने के लिए आपको काली मिर्च पाउडर को पानी के साथ मिलाकर एक बोतल में भरना है. इसके बाद इस काली मिर्च के पानी को घर के हर कोने में छिड़क दें.

इसके अलावा घर के जिस-जिस कोने में छिपकली सबसे ज्यादा आती है वहां लहसुन की कली भी रख सकते है. ऐसा करने से भी छिपकलियां घर से दूर रहती है.

लहसुन के इस नुस्खे के अलावा आप छिपकलियां दूर भगाने के लिए प्याज का भी इस्तेमाल कर सकती हैं. इसके लिए प्याज को लंबा-लंबा पतला काटकर उसे धागे से बांधकर घर के कोने में लटकाने से भी वहां छिपकली नहीं आती है.

बजट में घर सजाने के लिए मददगार हो सकते हैं ये 5 उपाय

अगर आप चाहती हैं, आपके घर का हर कोना  आकर्षक लगे. पर आप इसके लिए ज्यादा पैसे भी खर्च करना नहीं चाहती हैं तो आइए ऐसे पांच उपाय अपको बताते है, जिनसे आप बजट के भीतर अपने घर को आकर्षक और बेहतरिन लुक दे सकती हैं.

–  महंगी पेंटिंग्स या खर्चीले फर्नीचर के आलावा घर की सजावट में शीशे और फोटो फ्रेम्स का भी समझदारी से इस्तेमाल कर सकते हैं. लंबे साइज के शीशे से घर का भी लुक बड़ा लगता है.

–  घर में दरवाजें और खिड़कियां अगर मेनटेन हैं तो बिना अधिक तमाझाम के भी घर सुंदर दिख सकता है. ऐसे में समय-समय पर दरवाजों और खिड़कियों की पौलिश करें जिससे इनका लुक हमेशा नया लगे.

–  घर के किसी भी कोने में ढेर सारा फर्नीचर या सामान, उसको स्टोर रूम का लुक दे सकता है. ऐसे में जो चीजें कम काम में आएं उन्हें स्टोर करके भीतर रखें जिससे जगह खाली और आरामदायक लगे.

–  केवल दरवाजे और खिड़कियों की पौलिश भी पूरे कमरे को नया लुक दे सकती है. आप चाहें तो इनपर कलरफुल पेंटिंग्स बनाकर भी कुछ प्रयोग कर सकते हैं.

–  अपने स्टडी रूम या बेडरूम की सजावट से अपनी खूबसूरती यादों को भी संजो सकते हैं और अपने व्यक्तित्व को भी दर्शा सकते हैं. मसलन, आपके अलग-अलग यादगार मौकों का कोलाज बनाकर भी घर को स्पेशल लुक दे सकती हैं.

करतारपुर कौरिडोर से रिश्ते सुधरने की उम्मीद क्या आप को भी है..!

पंजाब के गुरदासपुर जिले में स्थित डेरा बाबा नानक से पाकिस्तान के करतारपुर में गुरुद्वारा दरबार साहिब को जोड़ने वाला कौरिडोर बनाए जाने पर खुशियां मनाई जा रही हैं. कौरिडोर के शुरू होने के फायदे गिनाए जा रहे हैं. कहा जा रहा है कि करतारपुर कौरिडोर बनने से दोनों देशों के बीच कला, संस्कृति की साझा विरासत को बढ़ावा मिल सकेगा. इस से परस्पर प्रेम, सद्भाव बढ़ेगा.

केंद्र सरकार द्वारा गुरदासपुर के डेरा बाबा नानक से पाकिस्तान की सीमा तक यह कौरिडोर बनाया जा रहा है. 150 करोड़ की लागत का यह कौरिडोर चार लेन का होगा. उधर पाकिस्तान सरकार करतारपुर के गुरुद्वारा दरबार साहिब से भारत की सीमा तक अपने क्षेत्र में कौरिडोर बना रही है. दोनों ओर से यह कौरिडोर डेरा बाबा नानक और दरबार साहिब को जोड़ेगा.

उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडु ने डेरा बाबा नानक में इस कौरिडोर का शिलान्यास किया है. 28 नवंबर को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान करतारपुर में दरबार साहिब से शिलान्यास करेंगे. पाकिस्तान में यह रावी के तट पर स्थित है. कौरिडोर के निर्माण में चार महीने का समय लगेगा और फिर दोनों देशों के श्रद्घालुओं के लिए इसे खोल दिया जाएगा.

दरअसल भारत पाकिस्तान के बीच दो धर्मस्थलों को जोड़ने वाले इस कौरिडोर से दोनों देशों के बीच सद्भावना की राह खुलने की उम्मीद करना बेकार है. ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान में सिखों के साथ नफरत नहीं है. फिर गुरुद्वारों में हर धर्म के लोग जाते हैं.

भारत पाकिस्तान के बीच आनेजाने के पहले से पहले से कई रास्ते हैं लेकिन उन रास्तों से जरिए परस्पर प्रेम, शांति की बातें सही साबित नहीं हो पाई हैं. पाकिस्तान के कट्टरपंथियों ने कई अवैध रास्ते भी निकाल रखे हैं. इन के जरिए वे घुसपैठ करते रहे हैं और भारत में आ कर खूनी खेल खेलते आए हैं.

जब भारत के बंटवारे की नींव ही धर्म पर टिकी हो तो ऐसे में धार्मिक गलियारे के जरिए दोनों देशों के रिश्तों में शांति, सद्भाव, प्रेम कायब करने की बात सोचना दिवास्वप्न ही है.

1947 में भारत और पाकिस्तान का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था. तब से ले कर दोनों देशों के बीच लाखों बेकसूरों को धर्म की नफरत ने लील लिया. आज तक पाकिस्तान के शासकों के मन में भारत के प्रति नफरत भरी हुई है. पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की हालत ठीक नहीं है. आए दिन उन के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ले कर पंजाब के मुख्यमंत्री अमरेंद्र सिंह तक आशंका जताते हुए कह रहे हैं कि पाकिस्तान द्वारा इस कौरिडोर को ले कर सदाशयता दिखाने के बावजूद उस से सावधान रहने की जरूरत है.

अब हो यह रहा है कि भारत पाकिस्तान की सीमाओं से मजहबी कट्टरपंथी आतंकी लोगों का आनाजाना अधिक है. इन लोगों की आतंकी गतिविधियों में ज्यादा इजाफा हो रहा है. करतारपुर कौरिडोर से भी प्रेम, सद्भाव चाहने वाले लोगों का कम, मजहब और आतंक का व्यापार करने वालों को ज्यादा फायदा मिल सकेगा.

दोनों देशों के बीच अगर प्रेम, शांति, तरक्की का रास्ता निकालना है तो धार्मिक कौरिडोर की  बजाय व्यापारिक कौरिडोर बनाए जाने चाहिए. एकदूसरे देशों के बीच ज्यादा से ज्यादा व्यापारिक गतिविधियां बढ़ेगीं तो धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले और कट्टरपंथियों दोनों की ताकत कमजोर होने लगेगी.

चीन, जापान जैसे देश आज तरक्की करते जा रहे हैं तो इन देशों ने धर्म को एक तरफ खूंटी पर टांग कर दूसरे देशों के साथ कारोबारी रिश्ते बढ़ाते जा रहे हैं. दुनिया के देशों ने शुरू में एकदूसरे से जुड़ने के लिए व्यापार करने के इरादे से आवागमन के रास्ते तलाश किए. हालांकि उसी के साथ ईसाइयत के प्रचारकों ने भी धर्म के प्रसार के इरादे से दुनिया के देशों में घुसपैठ शुरू कर दी थी. व्यापार और धर्म के विस्तार दोनों ही कामों से दुनिया परस्पर जुड़ी तो सही तरक्की व्यापार से ही हुई. धर्म ने तो नफरत, हिंसा और युद्घ फैलाने का काम किया.

धर्म के नाम पर खुले रास्ते कभी प्रेम, सद्भावना के पुल नहीं बन सकते. धर्म के रास्तों से तो जेहादी, नफरती और खूनी हवाएं ही आजा सकेंगी. प्रेम, शांति, सद्भाव की उम्मीदें कहीं कोने में दुबकी पड़ी रहेंगी.

मध्यप्रदेश में सवर्ण और दलित वोटों का समीकरण बिगाड़ेगा भाजपा का खेल

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में वोटों का ऊंट किस करवट बैठेगा इसका अंदाजा कोई नहीं लगा पा रहा, वजह साफ है कि यह चुनाव उन चुनावों में से एक है जिनमें कोई मुद्दा नहीं होता और होते हैं तो इतने सारे मुद्दे होते हैं कि खुद मतदाता गड़बड़ा उठता है कि किसे वोट दे और क्यों दे. असमंजस की इस स्थिति का नुकसान अक्सर सत्तारूढ़ दल को उठाना पड़ता है जिससे वोटर हिसाब मांगता नजर आता है कि बताइये सरकार ने क्या किया.

सरकार गिनाती है पर लोग उसका विश्वास नहीं करते, वे इस आम धारणा का शिकार रहते हैं कि सरकार का तो काम है झूठ बोलकर फिर कुर्सी हथियाना और फर्जी आंकड़े गिनाना, लिहाजा उसे क्यों वोट दिया जाये और मध्यप्रदेश में तो भाजपा 15 सालों से काबिज होने के बाद भी कह रही है कि चौथी बार भी हमें चुनो तो प्रदेश को समृद्ध बना देंगे. ऐसे में लोगों का दिल बड़े पैमाने पर बदलाव को मचलने लगा है तो बात कतई हैरानी की नहीं, उल्टे इस बदलाव की मानसिकता का खौफ भाजपाई दिग्गजों नरेंद्र मोदी, अमित शाह और शिवराज सिंह चौहान के चेहरों और भाषणों में स्पष्ट दिख रहा है.

लोग किस आधार पर वोट करेंगे इस गुत्थी को सुलझाने में अच्छे अच्छे जानकारों और विश्लेषकों को सर्दी में पसीना छूट रहा है और आखिरी निष्कर्ष यह निकल कर सामने आ रहा है कि चूंकि कोई लहर नहीं है इसलिए भाजपा को नुकसान झेलने तैयार रहना चाहिए. 230 विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में हर सीट पर वोटर का मूड और मिजाज अलग है, लेकिन ऐसी कई वजहें हैं जो सीधे सीधे भाजपा को एक समान नुकसान पहुंचा रहीं हैं. जाति इस चुनाव में भी बड़ा फेक्टर है. आइये देखें यह परंपरागत फेक्टर क्या गुल खिला सकता है.

एट्रोसिटी एक्ट को लेकर सवर्ण समुदाय का भाजपा के प्रति गुस्सा कम जरूर हुआ है लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है.  यह समुदाय भाजपा का घोषित वोट बैंक रहा है जो एट्रोसिटी एक्ट को लेकर तीन लगभग बराबरी के हिस्सों में बंट गया है. ऐसा पहली बार देखने में आ रहा है कि बड़े पैमाने पर सवर्ण भाजपा से कट रहा है. इस वर्ग के गुस्से को तीन हिस्सों में बांट कर देखें तो तस्वीर कुछ यूं बनती है –

1 – पहला वर्ग उन सवर्णों का है जो भाजपा से इस बात को लेकर भड़ास से भरे हुये हैं कि उसने संसद में दलितों के सामने घुटने टेकते सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदल दिया. इस गुस्से से भरे लोगों का मकसद एक बार भाजपा को सबक सिखाने का है यानि ये अब भाजपा को वोट न देने की नहीं बल्कि कांग्रेस को वोट देने की बात कर रहे हैं. इससे भाजपा का नुकसान होना तय दिख रहा है .

2 – इस वर्ग के लोग अपना गुस्सा दिखाने किसी को वोट नहीं देंगे. इनकी नजर में एट्रोसिटी एक्ट पर भाजपा का रुख उसकी सियासी मजबूरी था और कांग्रेस भी इस मुद्दे पर खामोश रही थी, लिहाजा विरोध की अपनी मंशा जताने वोट किसी तीसरे को दिया जाये या फिर न दिया जाना ही बेहतर समझ रहे हैं. इससे भी भाजपा को नुकसान है क्योंकि उसका गारंटेड वोट बूथ तक ही नहीं जाएगा, हालांकि इस वोट को घर से निकालने भाजपा कार्यकर्ता कोशिश करेगा और आरएसएस की भी कोशिश है कि इस वोट को यथासंभव डलवाया जाये, जिससे भाजपा का नुकसान कम हो.

3 – तीसरे वर्ग के सवर्ण आफ्टर आल भाजपा को ही वोट देंगे, यह भाजपा को सुकून देने वाली बात है, लेकिन इसके बाद भी इन यानि पहले दो वर्गों के वोटों की भरपाई वह कहीं और से नहीं कर पा रही .

दलित वोट

यह तो 2 अप्रैल की हिंसा के बाद ही उजागर हो गया था कि राज्य का अहम 27 फीसदी दलित वोट भाजपा से कट चुका है, जिसने 2013 के विधानसभा चुनाव और फिर 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा पर भरोसा जताया था लेकिन भाजपा खासतौर से मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने हिम्मत नहीं हारी और न ही उम्मीद छोड़ी. तमाम कल्याणकारी योजनाएं इसी वोट को ध्यान में रखते बनाई गईं. इससे भाजपा का नुकसान थोड़ा कम हुआ, लेकिन शिक्षित होते दलित समुदाय का भरोसा उसने खो दिया.

आरक्षण और एट्रोसिटी एक्ट को लेकर यह वोट डरा हुआ है, लिहाजा इस का भी तीन हिस्सों में बंटना तय दिख रहा है. यह नुकसान भी भाजपा के खाते में जाना तय है. भोपाल के एक सरकारी कालेज के प्रोफेसर की मानें तो, शिक्षित हो अशिक्षित दलित यह जानता समझता है कि जिसको भी सत्ता चाहिए उसे दलितों को साधकर रखना ही पड़ेगा, गरीबों के नाम पर बनी तमाम योजनाओं का फायदा बेशक दलित समुदाय को ज्यादा मिल रहा है लेकिन कांग्रेस होती तो वह भी यही करती.

इन प्रोफेसर साहब ने एक दिलचस्प बात यह बताई कि साल 2003 में दिग्विजय सिंह सरकार की करारी हार की वजह दिग्विजय सिंह का दलित प्रेम ही था जो सवर्णों को रास नहीं आया था. अपने आखिरी दिनों में तो दिग्विजय सिंह साफ साफ कहने लगे थे कि उन्हें सवर्ण वोट नहीं चाहिए, इसकी इतनी भारी कीमत उन्हें चुकाना पड़ी थी कि कांग्रेस आज भी सत्ता को तरस रही है. यह प्रोफेसर यह मानने को तैयार नहीं कि इस बार दिग्विजय सिंह को हाशिये पर उनकी बंटाधार वाली इमेज के चलते या फिर कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के दबाब में ढकेला गया है, बल्कि इसकी वजह उनका अतिरेक दलित प्रेम है जिस पर आज भी सवर्ण समुदाय खार खाये बैठा है.

तो फिर दलित वोट कहां जाएगा, इस सवाल का जवाब साफ है कि वह भी तीन बराबर हिस्सों में बंट रहा है. पहला भाजपा के खाते में जा रहा है क्योंकि उसने जोखिम उठाते एट्रोसिटी एक्ट पर उसका साथ दिया और फिर योजनाओं के जरिये उसे लाभ पहुंचाया. दूसरा वर्ग सीधे कांग्रेस की तरफ मुड़ रहा है और तीसरा बसपा को जा रहा है.

यह एक बेहद दिलचस्प समीकरण है कि कांग्रेस बसपा का गठबंधन न होने के बाद भी भाजपा को उम्मीद के मुताबिक फायदा होता नहीं दिख रहा. बगैर घोषित तौर पर कहे दलितों को जैसे  जादू के जोर से यह बात समझ आ गई है कि जहां जहां कांग्रेस मजबूत है वहां वहां उसे और जहां जहां बसपा मजबूत है वहां उसे वोट किया जाये जिससे भाजपा को फायदा न हो. यह कोई फ्रेंडली फाइट भी नहीं है, बल्कि दलित खुद इस तरह के फैसले अपने विवेक से ले रहा है.

इससे सबसे ज्यादा मुनाफे में कांग्रेस नजर आ रही है क्योंकि बसपा विंध्य और चंबल इलाकों की 20 सीटों पर ही मजबूत है, बाकी जगहों पर उसके अते पते नहीं हैं. कहने को तो उसने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं लेकिन वे कमजोर जगहों पर प्रचार ही नहीं कर रहे हैं. भोपाल, इंदौर, उज्जैन, जबलपुर और ग्वालियर जैसे शहरों में इस बार नीले झंडे कहीं कहीं देखने मिल रहे हैं, नहीं तो 2013 के विधानसभा चुनाव में ये सभी शहर नीले झंडों और हाथी निशान से भरे पड़े रहते थे.

ऐसे में भाजपा की चिंता स्वभाविक है उसे इकलौता सहारा पिछड़े वोटों का बचा है जिसमें उम्मीद के मुताबिक सेंधमारी कांग्रेस नहीं कर पाई है, लेकिन इस वर्ग का किसान कतई भाजपा से खुश नहीं है, खुश तो उससे व्यापारी और युवा भी नहीं हैं जो क्रमश जीएसटी और बेरोजगारी से त्रस्त हैं. यही वह स्थिति है जो एंटी इंकम्बेंसी कहलाती है, जिसका खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ेगा, पर यह कितना होगा यह तो 11 दिसंबर को पता चलेगा जब वोटों की गिनती होगी.

हाल फिलहाल तो लोगों का यह कहना भी उसे भारी पड़ रहा है कि शिवराजसिंह मेहनत तो बहुत कर रहे हैं लेकिन उन्हें देख देख कर और सुन सुन कर बोरियत होने लगी है. वे एक अच्छे मुख्यमंत्री हैं लेकिन भाजपा अगर किसी और पर दांव खेलती तो बात कुछ और होती.

आदित्यनाथ की दिवाली ने उजाड़े सैकड़ों लोगों के घर

दिवाली के एक रोज पहले अयोध्या में हुए मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के भव्य आयोजन के कारण 400 साधुओं सहित 1000 से अधिक लोग बेघर हो गए. 6 नवंबर को राज्य सरकार ने सरयू नदी के घाट पर रंगबिरंगी रोशनी के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों का एक बड़ा मेला लगाया. मेले में आने वाले हाई प्रोफाइल अतिथियों में राज्यपाल राम नाईक, आदित्यनाथ और दक्षिण कोरिया की प्रथम महिला किम जोंग-सुक जैसे नाम शामिल थे.

विशिष्ठ अतिथियों की सुरक्षा और शहर की सफाई के मद्देनजर आयोजन स्थल के रास्ते से अतिक्रमण हटाया गया. अतिक्रमण हटाओ अभियान में अयोध्या के मांझा इलाके के बहुत से दिहाड़ी मजदूरों या साधुओं को विस्थापित होना पड़ा. दशकों से सरयू के पास के क्षेत्र को स्थानीय लोग मांझा कहते हैं.

जिस बेरहमी से अतिक्रमण हटाया गया उसने सैकड़ों परिवार- बच्चे, बुजुर्ग और साधुओं के सिर से छत छीन ली. साधु शंकर दास ने बताया, “15 दिन पहले भारी पुलिस बल के साथ बुलडोजर इस इलाके में आया.” शंकर दास दिसंबर 1992 में, जिस साल बाबरी मस्जिद गिराई गई थी, कारसेवकों के साथ अयोध्या आए थे और तब से ही मांझा में रह रहे हैं. दास ने बताया कि अतिक्रमण हटाने का काम 5 नवंबर तक जारी रहा “और हम लोगों को अपना सामान तक बाहर करने नहीं दिया गया. जिन लोगों ने इसका विरोध किया उन्हें पीटा गया और गिरफ्तार कर लिया गया.”

आदित्यनाथ का शिकार हुए अन्य साधू शिवप्रयाग गिरी ने बताया कि मांझा इलाके में लगभग 400 साधू रहते हैं. “कुछ साधू 1992 से यह सोच कर यहां रह रहे थे कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के काम में शामिल होंगे और अन्य साधू यहां इस कारण बस गए क्योंकि उनके पास जाने की और कोई जगह नहीं थी.”

दिहाड़ी का काम करने वाली झुग्गी की एक महिला, रेखा देवी ने बताया कि प्रशासन ने उनसे कहा कि हम लोगों को यहां से जाना होगा क्योंकि “ हम लोग सुरक्षा के लिए खतरा हैं और इस इलाके को गंदा करते हैं.” देवी अपनी 80 वर्षीय सास, विकलांग पति और एक से पांच साल के तीन बच्चों के साथ मांझा में रहती हैं. वह बताती हैं, “हमने उनसे मिन्नतें की लेकिन वो लोग नहीं माने.” उन्होंने आगे कहा, “अब हमारे पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है. हम लोग गंदे हैं क्योंकि गरीब हैं. लेकिन मुझे समझ नहीं आता कि हम लोग सुरक्षा के लिए खतरा कैसे हैं.”

देवी के पति भगवत प्रसाद ने जब परिवार के लिए वैकल्पिक व्यवस्था न होने तक वहां बने रहने देने के लिए पुलिस से समय मांगा तो पुलिस ने उन्हें मारा पीटा. वो बताते हैं, “मैंने जैसे ही पुलिस वाले से वक्त मांगा तो उसने मुझे चांटा मार दिया.” “फिर वो मुझे घसीटता हुआ अपने अफसर के पास ले गया जिसने कहा कि यदि हम लोग अभी वहां से नहीं गए तो हमे जेल में डाल दिया जाएगा.”

दिवाली की पूर्व संध्या का यह कार्यक्रम दूसरी बार हो रहा है. पिछले साल आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के कुछ महिनों बाद यह कार्यक्रम हुआ था. इस साल यह कार्यक्रम भव्य रूप में आयोजित किया गया जिसमें कई विदेशी मेहमान शामिल हुए. अतिक्रमण हटाने के लिए स्थानीय प्रशासन के उत्साह के पीछे सरकार के दबाव को बताया जा रहा है. भारी संख्या में झुग्गियों को हटाया गया और जिन भवनों को हटाया नहीं जा सका उन्हें आदित्यनाथ और प्रथम महिला के बड़े बड़े होर्डिंग से ढक दिया गया.

नगर की मुख्य सड़क को बनाया-सुधारा गया, नदी के समीप बने पुराने मंदिर की रंगाई की गई और नदी के किनारें विश्व रिकार्ड बनाने के लिए लाखों मिट्टी के दिये जलाए गए. सरयू के किनारे राम की 30 फीट ऊंची मूर्ति बनाई गई. यह सब इसलिए किया गया ताकि दिवाली की पूर्व संध्या पर आयोजित होने वाले इस आयोजन में शामिल होने के लिए आने वाले मेहमानों को अयोध्या की “गंदगी” देखकर झटका न लगे.

मांझा इलाके का अतिक्रमण हटाने का काम ठीक उसी तरह है जैसा राष्ट्रमंडल खेल-2010 के वक्त दिल्ली में हुआ था. उस वक्त झुग्गियों में रहने वाले लोगों को इस “उच्च गरिमा” वाले खेलों के लिए विस्थापित किया गया था. जिस प्रकार दिल्ली में भारत की छवि को दागदार करने वाली प्रत्येक चीज को हटा दिया गया था उसी प्रकार यहां भव्य आयोजन स्थल के मार्ग और उसके आसपास गंदी माने जाने वाली सभी चीजों को हटा दिया गया.

पुलिस प्रशासन ने तोड़फोड़ पर बात करने से इनकार किया है और स्थानीय मीडिया आयोजन की चकाचौंध में इस कदर सम्मोहित है कि वह अतिक्रमण के पीड़ितों को देख नहीं पा रहा है. राज्य और स्थानीय प्रशासन का दावा है कि उजाड़े गए लोगों ने सरकारी जमीन पर अवैध रूप से कब्जा कर रखा था, जबकि आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए मकान दिए गए हैं. एक दशक पहले जब बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती मुख्यमंत्री थीं उस वक्त ये आवास बनाए गए थे.

हालांकि अतिक्रमण के पीड़ित इस बारे में दूसरी ही बाते करते हैं. अतिक्रमण के पीड़ित राम कुमार निषाद ने बताया, “यह सच है कि मायावती ने अयोध्या के गरीब लोगों को कांशीराम कौलोनी में आवास उपलब्ध कराए थे”, जो शहर के बाहरी हिस्से में बने हैं, ”लेकिन मांझा के अधिकांश पीड़ितों के पास ऐसा कोई आवास नहीं हैं.” उनका दावा है, “यह एक झूठ है जो प्रशासन अपने अपराध को छिपाने के लिए कह रहा है.”

इस बार रोशनी के उत्सव दिवाली में प्रकाश और अंधकार का भेद अयोध्या में कहीं ज्यादा ही दिखाई दिया.

किस बात के लिए दर्शकों से माफी मांग रहे हैं आमिर खान

बौलीवुड में परफैक्शनिस्ट कलाकार के रूप में मशहूर अभिनेता आमिर खान हर फिल्म को करने से पहले उसकी पटकथा पर गंभीरता  से विचार करते हैं. आमिर खान ने ‘‘यशराज फिल्मस’’ की फिल्म ‘‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’’ में अभिनय करना स्वीकार करने से पहले भी पटकथा पढ़ कर इस फिल्म के लिए काफी वक्त लिया था. उन्होंने स्वयं फिल्म में अपने लुक को लेकर तैयारी की थी. आमिर खान का दावा था कि यह फिल्म ‘‘दीवाली’’ की छुट्टी के चार दिनों के अंदर ही तीन सौ करोड़ रूपए कमा लेगी.

मगर अफसोस की बात यह है कि बीस दिन बाद भी यह फिल्म 150 करोड़ रूपए नहीं कमा सकी. जबकि निर्माता ने इस फिल्म के लिए सिनेमा घरों में टिकट के दाम भी काफी बढ़ाए. हालात ऐसे हो गए हैं कि अब फिल्म के प्रदर्शकों ने ‘‘यशराज फिल्मस’’ से अपने नुकसान की भरपाई करने की मांग भी कर दी है. यह हालात तब हुए हैं जबकि इस फिल्म में अमिताभ बच्चन, आमिर खान, कैटरीना कैफ जैसे दिग्गज कलाकार हैं. सोशल मीडिया पर अमिताभ बच्चन के करीबन एक करोड़, आमिर खान के करीबन साठ लाख और कैटरीना कैफ के 30 लाख फालोअर्स हैं. इसके मायने यह हुए कि इन कलाकारों के प्रशंसक व फालोअर्स ने भी इनकी इस फिल्म से दूरी बनाकर रखी.

इस बीच सबसे पहले अमिताभ बच्चन एक समारोह में अपनी गलती मानते हुए कहा था-‘‘मैं फिल्म आलोचकों द्वारा बताई गयी गलतियों पर गौर करता हूं. अखबार के उस हिस्से को, जिसमें मेरे अभियय की कमियां लिखी होती हैं, उसे एक दीवार पर चिपकाकर रखता हूं और हर दिन उसे देखकर उस कमी को दूर करने के बारे में सोचता रहता हूं.’’

इस फिल्म के प्रदर्शन के पहले ही दिन से सोशल मीडिया पर सबसे अधिक आमिर खान की आलोचना हो रही है. जिसे देखते हुए दो दिन बाद ही आमिर खान ने कुछ समय के लिए अभिनय से संन्यास लेने का निर्णय सुना दिया था. पर अब बीस दिन बाद उन्होंने अपने दर्शकों व प्रशंसकों से माफी मांगी है.

‘‘सिनेस्टान’’ की तरफ से आयोजित ‘‘सिनेस्टान इंडियाज स्टोरी टेलर अवार्ड’’ समारोह में बोलते हुए आमिर खान ने अपनी फिल्म ‘‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’’ के बौक्स औफिस पर बुरी तरह से असफल होने का जिक्र कर दर्शकों से माफी मांगते हुए कहा-‘‘हमने अपनी तरफ से इस फिल्म को बेहतरीन मनोरंजक फिल्म बनाने के लिए सारे प्रयास किए. हमने अपनी तरफ से कोई कसर बाकी नहीं रखी. लेकिन कहीं न कहीं हमसे गलती हुई. कुछ लोगों को यह फिल्म पसंद आयी, पर ऐसे लोगों की संख्या नगण्य है. फिल्म को पसंद न करने वालों की संख्या बहुत है. मैं इस फिल्म की असफलता की पूरी जिम्मेदारी लेता हूं.’’

आमिर खान ने आगे कहा- ‘‘अपने प्रशंसकों को अपने अभिनय से निराश करने का बोझ मेरे कंधों पर बहुत ज्यादा है. मैं उन सभी दर्शकों से माफी मांगता हूं, जो बहुत अपेक्षाओं के साथ मेरी इस फिल्म को देखने के लिए सिनेमाघरों में गए. मैं क्षमाप्राथी हूं कि हम उनका मनोरंजन न कर सके. मैं असफलता से उबरने का प्रयास कर रहा हूं. इसके बावजूद मैं अपनी फिल्म को लेकर आम लोगों के सामने बात नहीं करना चाहता. फिल्म असफल हुई है, पर वह मेरी ही फिल्म है.’’

आमिर खान ने उस वक्त माफी मांगी है, जब उन्हे शाहरुख खान की तरफ से समर्थन मिल चुका है. शाहरुख खान ने फिल्म ‘‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’’ की असफलता पर कहा है-‘‘इस फिल्म को जज करते हुए लोग ‘बहुत ज्यादा कठोर’ हो गए. फिर भी एक कलाकार के लिए दर्शकों का निर्णय ही अंतिम निर्णय होता है. हमें दर्शकों की राय का सम्मान करना चाहिए.’’

मजेदार बात यह है कि शाहरुख खान के इस बयान के आने के बाद बौलीवुड का एक तबका कहने लगा है कि शाहरुख खान अपनी फिल्म ‘‘जीरो’’ को लेकर अभी से आशंकित हो गए हैं.

उधर आमिर खान द्वारा सार्वजनिक तौर पर दर्शकों से माफी मांगने के बाद आमिर खान के करीबी अब ‘‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’’ की असफलता के लिए इसकी मार्केटिंग टीम और पी आर टीम को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं. इनका आरोप है कि फिल्म की पी आर टीम ने पत्रकारों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करने के साथ साथ कुछ वरिष्ठ पत्रकारों को अपमानित करने का काम किया था.

ज्ञातब्य है कि इस फिल्म का पीआर ‘यशराज फिल्मस’’ की अंदरूनी टीम के अलावा एक दूसरी एजेंसी भी कर रही थी. दोनों पत्रकारो को पैंडुलम की तरह एक दूसरे के पास ढकेलती रही. किसी ने भी फिल्म को सही ढंग से प्रमोट करने का काम नहीं किया. यहां तक कि पत्रकारों को फिल्म देखने के लिए टिकटों में भी काफी पक्षपात किया गया. उधर ‘यशराज फिल्मस’ के सूत्र दावा कर रहे हैं कि आदित्य चोपड़ा ने लंबी चौड़ी पीआर टीम के सदस्यों की भी समीक्षा करनी शुरू कर दी है.

माना कि फिल्म ‘‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’’ के प्रचार को लेकर पी आर टीम की तरफ से बहुत गलतियां की गयी. कई पत्रकारों की अवहेलना की गयी. मगर इस बात से भी इनकार नही किया जा स्कता कि इस फिल्म में कथानक, लेखन व निर्देशन सहित ढेर सारी कमियां रहीं. इसके अलावा अब वह वक्त आ गया है जब हर कलाकार को सोशल मीडिया के मोह से बचते हुए सोशल मीडिया पर निर्भरता खत्म करनी होगी. तमाम शोध यह साबित कर रहे हैं कि सोशल मीडिया के चलते कलाकार के स्टारडम को जबरदस्त नुकसान हो रहा है.

क्या मोबाइल से जुड़ी इन अफवाहों के बारे में जानते हैं आप

बदलते दौर के साथ मोबाइल ने भी कई परिवर्तन देखे हैं. शुरुआती दौर में वौइस कौलिंग तक सीमित रहे मोबाइल में अब हमारी जरूरतों के कई ऐप शामिल हो चुके हैं. इससे हमारी जिंदगी पहले की तुलना में बेहद आसान हो गई है. जब भी हम मोबाइल खरीदने की सोचते हैं तो उसके फीचर्स पर ज्यादा ध्यान देते हैं. ताकी हम मोबाइल के जरिए अपडेट रहें.

मोबाइल में बैटरी से जुड़ी हुई कुछ बातें या अफवाहों पर भी कुछ ज्यादा ही ध्यान जाता है, तो आज हम बात करेंगे मोबाइल बैटरी से जुड़े मिथकों के बारे में, जिनका हकीकत से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है.

पहला मिथ है कि मोबाइल की बैटरी को रातभर चार्ज नहीं करना चाहिए, इससे मोबाइल के खराब होने का अंदेशा जताया जाता है, लेकिन आजकल स्मार्टफोन में इनबिल्ट सर्किट होता है, जिससे किसी तरह के नुकसान का सवाल ही पैदा नहीं होता.

tehnology

दूसरा मिथ यह है कि चार्जिंग के दौरान मोबाइल के उपयोग करने से ब्लास्ट हो सकता है, लेकिन इस बात में भी सच्चाई नहीं है. वास्तविकता यह है कि चार्जिंग के दौरान मोबाइल के हार्डवेयर या सौफ्टवेयर में समस्या हो सकती है, लेकिन ब्लास्ट होने वाली बात पूरी तरह निराधार है.

यह भी कहा जाता है कि मोबाइल में ज्यादा ऐप्स डाइनलोड करने से बैटरी जल्दी खत्म होती है, लेकिन यह भी सिर्फ कही-सुनी बात है. ऐप के इंस्टौल करने का बैटरी के डिस्चार्ज से कोई संबंध नहीं है, बशर्ते आप अपने मोबाइल के ऐप्स को बार-बार नहीं खोलें.

4G नेटवर्क को भी ज्यादा बैटरी खपाने का जिम्मेदार माना जाता है और कहा जाता है कि फास्ट नेटवर्क की वजह से बैटरी की खपत ज्यादा होती है, जबकि हकीकत में नेटवर्क की क्वालिटी बेहतर न होने पर बैटरी डिस्चार्ज की समस्या होती है.

मोबाइल को  लैपटौप से चार्ज करने की मनाही की जाती है, लेकिन मोबाइल को लैपटौप से चार्ज करने पर मोबाइल और लैपटौप दोनो को कोई नुकसान नहीं होता है. हां, चार्जिंग की स्पीड जरूर कुछ कम होती है.

वीडियो : जब बीच मैच में अंपायर ने दिखाए डांस मूव्स

क्रिकेट के मैदान पर सबसे बोरिंग जौब शायद अंपायरों की होती है. उन्हें सारा वक्त मैदान पर बने रहना होता है और कुछ इशारे करने होते हैं. हालांकि, उनका जौब खिलाड़ियों से किसी भी मायने में कमतर नहीं होता है, क्योंकि उन्हें खेल की बारीकियों पर लगातार नजर बनाकर रखनी होती है और औन द स्पौट सही फैसले देने होते हैं. उनका एक गलत निर्णय मैच का पूरा रुख पलचर कर रख देता है. अंपायर को अपने एक गलत फैसले की वजह से ना जाने कितनी आलोचना सहनी पड़ती है. ऐसे में मैदान पर अंपायर का सीरियस रहना बहुत जरूरी है.

लेकिन एक अंपायर ऐसे भी रहे हैं, जिन्होंने इस बोरिंग जौब को काफी मजेदार बना दिया. इस अंपायर का नाम है बिली बाउडेन. जिसने कभी भी क्रिकेट मैच देखे हैं या क्रिकेट को फौलो किया है, वह अम्पायर बिली बाउडन के नाम से अवश्य वाकिफ होगा. बिली बाउडन अपने असामान्य अम्पायरिंग स्टाइल के लिए जाने जाते हैं.

वह अब तक, 20 साल के अपने अम्पायरिंग करियर में 200 वनडे और 84 टेस्ट मैचों में अम्पायरिंग कर चुके हैं. बिली को अपने असामान्य, मनोरंजक मैनरिज्म के लिए जाना जाता है. मिसाल के तौर पर खिलाड़ी को आउट करार देने के लिए वह अपनी उंगली को एक अलग तरह से उठाते हैं.

अब एक और अंपायर का वीडियो सामने आया है, जो क्रिकेट के मैदान पर बेहद मजेदार अंदाज में डांस करते नजर आ रहे हैं. यह वीडियो कहां का है और कौन से मैच का इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. यह अंपायर कौन है इसके बारे में भी कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन बौलीवुड गानों पर इस अंपायर का डांस काफी मजेदार नजर आ रहा है. यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है.

अंपायर के इस मजेदार डांस का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है और लोग भी इसे खासा पसंद कर रहे हैं.

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