अनुसूचित जाति तथा जनजाति अत्याचार निवारण कानून (अत्याचार कानून) के प्रावधानों को कमजोर बनाने वाले सर्वोच्च अदालत के फैसले के खिलाफ 2 अप्रैल को हजारों की संख्या में दलितों ने देश भर में प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों पर पुलिस और हिंदुत्ववादी गुंडो की हिंसा में, कम से कम 9 लोगों की मौत हो गई. “दो अप्रैल के प्रदर्शन के बाद दलितों की हालत इतनी खराब हो गई है कि जब हम पुलिस के पास अपनी शिकायत लेकर जाते हैं तो वो लोग हमारी पृष्ठभूमि की जांच करने लगते हैं”, ग्वालियर के 30 वर्षीय निवासी महेश कुमार मंडेलिया ने मुझे बताया.

मंडेलिया गल्ला कोठार के रहने वाले जाटव हैं. चौहान प्याऊ के इर्दगिर्द बसे दलित मोहल्लों में से एक है गल्ला कोठार. इन मोहल्लों में रहने वाले लोगों का कहना है कि चौहान प्याऊ के राजपूत (तोमर और चौहान) ग्वालियर के सबसे प्रभावशाली परिवारों में से एक हैं जिन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है. यहां रहने वाले लोगों ने बताया कि 2 अप्रैल की रैली में चौहान प्याऊ के राजपूतों ने पिस्तौल और रायफलों से गोलिया बरसाईं और नजदीकी दलित मोहल्लों- गल्ला कोठार और भीम नगर- में गुस आए. हिंसा में दोनों मोहल्लों के दो दलित आदमी मारे गए और दर्जन भर से अधिक गोलीबारी में घायल हो गए.

हिंसा के बाद राज्य पुलिस ने इलाके के दलित और राजपूत लागों की शिकायतों के आधार पर कई एफआईआर दर्ज की. चौहान प्याऊ में मैंने राजा चौहान और महेन्द्र चौहान से बात की. इन दो राजपूतों पर प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का आरोप है. राजा को गिरफ्तार होने से पहले अंतरिम जमानत मिल गई थी और उसका दावा है कि उसने “अपनी औरतों को बचाने के लिए” गोली चलाई थी. दलित निवासियों की हत्या के आरोपी महेन्द्र को तीन महीनों के भीतर जमानत पर रिहा कर दिया गया था. उसका दावा है कि उसने “आत्मरक्षा” में गोली चलाई थी. लेकिन राजपूतों की ओर से कोई क्षति नहीं हुई और ना ही दलितों के पास से कोई हथियार जब्त किया गया.

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