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परदे बढ़ाएंगे आपके घर की रौनक

परदे आपके घर की रौनक बढ़ाते है. पर इसे मेंटेन करना आसान काम नहीं है. परदों पर पूरी तरह से धूल-मिट्टी जमी रहती है. और अगर घर में बच्चें हैं तो वें परदे से कुछ न कुछ पोंछते रहते हैं या फिर उसे पकड कर झूलने ही लग जाते हैं जिससे परदों को नुकसान होता है. इसलिए इनकी देखभाल भी करना जरूरी है. तो आइए जानते हैं, परदों के साफ करने के आसान तरीके.

  • सूती और सिल्क के परदे अकसर धोने के बाद सिकुड जाते हैं. इन्हें सिलवाने से पहले धो लेना चाहिए. अगर पहले से धोना नहीं चाहते तो अंदर की तरफ दबाव देकर परदा लंबा सिलवाएं.
  • यदि परदों पर रंग गिर गया है तो इसे तेजाब से ब्लीच करना पडता है. बेहतर यही है कि इसे ड्राई क्लीनर के पास ले जाएं.
  • परदा लगाते समय ध्यान रखें कि चाहे वह किसी भी कपडे का बनवाएं लेकिन उस पर लाइनिंग अवश्य लगवाएं. लाइनिंग से परदे की उम्र बढ जाती है. आजकल लाइनिंग भी कई तरह की आ गयी हैं. अधिक मांग सूती और टेरीकौट की लाइनिंग की है. टेरीकौट की सफेद रंग की लाइनिंग ज्यादा टिकाऊ मानी जाती है.
  • यदि परदा कहीं से फट गया है  तो उस हिस्से को सिलाई या रफू कर लें. धोने में यह और फट सकता है. परदे धोने के लिए तैयार किए गए घोल में दो-तीन घंटे भिगो कर रखें. और फिर साफ कर लें.
  • परदा टांगने के लिए प्लास्टिक या स्टेनलेस स्टील के हुक लगाएं. लोहे के हुक लगाने से परदे पर जंग के दाग लग जाते हैं. पंद्रह-बीस दिन में एक बार परदे वैक्यूम क्लीनर से साफ कर दें. धोने से पहले परदे के हुक अवश्य निकाल दें.

करें घर का मेकओवर

अगर आप घर का मेकओवर करना चाहती हैं, तो इसके लिए आज हम आपको कुछ आसान टिप्स बताएंगे जिसे आप आजमा कर आसानी से अपने घर का मेकओवर कर सकती हैं. आइए बताते है ये आसान टिप्स.

–  कमरे में आरामदायक माहौल के लिए दीवारों व वालपेपर्स के लिए ग्रीन, ब्लू व पर्पल के लाइट शेड्स चुनें. स्ट्राइप्स वाले वाल पेपर को दीवार पर हौरिजौन्टल लगाने पर कमरा बडा नजर आता है. हल्के कलर व छोट पैटर्न के डिजाइन्स के यूज से छोटा कमरा भी स्पेसियस नजर आता है.

–  दीवारों का कलर बदलने के साथ ही कुछ अलग और डिफरैन्स भी करें मतलब कि वाल डेकोर के लिए वालपेपर्स का इस्तेमाल करें.

–  वालपेपर खरीदेते समय सही कलर व पैटर्न का चुनाव करके आप अपने आशियाने में आरामदायक और खुशनुमा माहौल बना सकती हैं.

रिलायंस की सहायक कंपनियों को आखिर कैसे मिले रक्षा लाइसेंस

10 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री के रूप में अपनी पहली फ्रांस यात्रा में नरेन्द्र मोदी ने दोनों सरकारों के बीच फ्लाई-अवे कंडीशन यानी तैयार हालत में फ्रांसीसी कंपनी डसॉल्ट एविएशन द्वार निर्मित 36 राफेल विमानों की खरीद समझौते की घोषणा की. प्रक्रिया के अनुसार भारत में रक्षा आपूर्ति करने वाली किसी भी विदेशी कंपनी को रक्षा समझौते का एक हिस्सा भारत में निवेश करना होता है. सितंबर 2016 में, तत्कालीन रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने अपने फ्रांसीसी समकक्ष के साथ राफेल करार किया. अनुमान के मुताबिक यह करार 59000 करोड़ रुपए का है और डसॉल्ट को इस राशी का आधा हिस्सा भारत में निवेश करना है.

द कारवां के सितंबर अंक की मेरी कवर स्टोरी पर मैंने बताया है कि कैसे राफेल करार के चलते रक्षा क्षेत्र का जरा सा भी अनुभव न रखने वाली उद्योगपति अनिल अंबानी के रिलायंस समूह को अचानक हजारों करोड़ रुपए के एयरोस्पेस व्यवसाय हाथ लग गए. इस करार के 13 दिन पहले रिलायंस समूह ने रिलायंस डिफेंस लिमिटेड के नाम से नई कंपनी रजिस्टर कराई और इस करार के 10 दिन बाद रिलायंस डिफेंस की सहायक कंपनी रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड और डसॉल्ट एविएशन ने रिलायंस की अधिकांश हिस्सेदारी में डसॉल्ट रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड की स्थापना की घोषणा की.

प्रधानमंत्री मोदी की राफेल खरीद घोषणा के बाद रक्षा क्षेत्र में रिलायंस समूह ने अवसरों को भुनाना एकाएक बढ़ा दिया. रिलायंस डिफेंस की 2016-17 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार इस कंपनी की 13 सहायक कंपनियां हैं. ये सभी कंपनियां रक्षा उत्पादों के निर्माण में लगी हैं. इनमें से 9 कंपनियों को तो मोदी की घोषणा के तीन हफ्तों के भीतर स्थापित किया गया है और इनकी स्थापना के एक साल के अंदर ही इनमें से 7 कंपनियों को रक्षा मंत्रालय से रक्षा निर्माण का लाइसेंस दे दिया. लेकिन इस वर्ष मार्च तक इनमें से किसी भी कंपनी ने किसी भी प्रकार रक्षा उत्पादन नहीं किया है.

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रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार इन 13 सहायक कंपनियों में से 12 कंपनियों ने मार्च 2018 तक कोई व्यवसाय नहीं किया है. इसके बावजूद, सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार, 22 जनवरी 2016 को वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अधीनस्थ औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग ने इनमें से 8 सहायक कंपनियों को रक्षा निर्माण का लाइसेंस दे दिया है. इनमें 7 मोदी की राफेल घोषणा के बाद अस्तित्व में आईं थीं.

इस वर्ष मार्च में मैंने एक आरटीआई आवेदन किया था जिसके जवाब में डीआईपीपी ने रिलायंस समूह की रक्षा कंपनियों को दिए गए 12 लाइसेंस की जानकारी दी. ये लाइसेंस वायु और नौसेना के लिए मिसाइल और सिम्युलेटर के डिजाइन, विकास और निर्माण और हेलिकॉप्टर, वायुयान और सभी प्रकार के सैन्य वाहनों और लड़ाकू विमानों के लिए हथियार प्रक्षेपक बनाने के लिए दिए गए हैं. हैरान करने वाली बात है कि निर्माण शुरू करने से पहले ही इन कंपनियों को ये लायसेंस दे दिए गए. यहां यह समझना प्रासंगिक होगा कि डसॉल्ट का भारत में निवेश 2013 की रक्षा खरीद नीति से निर्देशित है और लाइसेंस प्राप्ति भारतीय ऑफसेट साझेदार बनने की शर्तों में एक है.

26 नवंबर को मैंने डीआईपीपी की अवर सचिव आर मैथिली से बात की और रक्षा लाइसेंस प्राप्त करने की प्रक्रिया और कंपनी की पात्रता की शर्तों के बारे में जानना चाहा. मैथिली ने लायसेंस जारी करने से पहले की विस्तृत प्रक्रिया के बारे में बताया जिसमें रक्षा मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय और गृह मंत्रालय की टिप्पणियां भी शामिल की जाती हैं. इन टिप्पणियों को आंतरिक लाइसेंस समिति के सामने रखा जाता है. यह समिति वाणिज्य मंत्रालय के समक्ष अपनी सिफारिशें भेजती है जिसके बाद वाणिज्य मंत्रालय तय करता है कि लाइसेंस देना है अथवा नहीं. उन्होंने बताया कि लाइसेंस के लिए आवेदन करने वाली कंपनी को आयुध अधिनियम 1959 के तहत पंजीकृत होना चाहिए, न्यूनत्म संख्या में कर्मचारी होने चाहिए और उसके द्वारा निर्माण कार्य शुरू किया हुआ होना चाहिए. उन्होंने बताया, “औद्योगिक (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1951 के अंतर्गत एक निर्धारित संख्या में कंपनी में कर्मचारी कार्यरत होने चाहिए जिसका अर्थ है कि कंपनी संचालित होनी चाहिए.” हालांकि इन कंपनियों के कर्मचारियों की संख्या पता नहीं चली है लेकिन रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर की वार्षिक रिपोर्ट में साफ साफ लिखा है कि कंपनियों को कोई काम आंरभ नहीं किया है.

“औद्योगिक (विकास एवं विनियमन) अधिनियम (आईडीआर) और आयुध अधिनियम 1959 में लाइसेंस देने के लिए विस्तृत प्रक्रिया बताई गई है. इन कानूनों के अधिकार क्षेत्र में शस्त्र और गोलाबारूद निर्माण इकाई की स्थापना एवं निर्माण, बिक्री, आयात और रक्षा उत्पाद की ढुलाई के लिए लाइसेंस आते हैं. हालांकि इन कानूनों में लाइसेंस का निश्चित समय नहीं बताया गया है लेकिन जारी करने से पहले कंपनी की माली विश्वसनीयता, अनुभव और विशेषज्ञता तथा अंतरिक स्थिति की कड़ी जांच की बात कानून में उल्लेखित है.

आईडीआर कानून का अधिकार क्षेत्र उसके अनुच्छेदों के तहत आने वाली सभी इकइयों में लागू होता है जिसमें वायुयान और शस्त्र और गोलाबारूद भी शामिल है. जून 2014 में, डीआईपीपी ने कई रक्षा वस्तुओं की सूची वाला एक प्रेस नोट जारी किया जिसमें उन वस्तुओं का नाम था जिनके लिए आईडीआर अधिनियम के अनुपालन की आवश्यकता है- रिलायंस समूह की कंपनियों को जिन कलपुर्जों के लिए लाइसेंस प्राप्त हुआ है वे सभी इस सूची में हैं. यह अधिनियम केंद्र सरकार को अधिनियम के तहत लाइसेंस के लिए सभी आवेदकों की “पूरी और संपूर्ण जांच” करने के लिए एक अधिकारी नियुक्त करने का अधिकार देता है. इस जांच का दायरा व्यापक है जिसमें उस वस्तु के उत्पादन में गिरावट की जांच भी की जाती है जिसके लिए निर्माण लाइसेंस की अर्जी की गई है. साथ ही मूल्य में बढ़ोतरी और ऐसी वक्तु का राष्ट्रीय महत्व की जांच भी शामिल है. अधिनियम में आगे कहा गया है कि लाइसेंसिंग प्राधिकरण इस बात से “संतुष्ट होने के बाद कि आवेदनकर्ता के पास लाइसेंस लेने के वाजिव कारण है” लाइसेंस जारी कर सकता है.

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आयुध अधिनियम नियुक्त पुलिस अधिकारी को लाइसेंस के आवेदन की जांच करने और लाइसेंस दिया जाना चाहिए अथवा नहीं इसकी रिपोर्ट जमा करने को बाध्य बनाता है. इसके अलावा, 2016 के आयुध नियमों में व्यापक आवेदन प्रक्रिया निर्धारित की गई है जिसके तहत निर्माण लाइसेंस का आवेदन करने वाली कंपनी को अन्य चीजों के अतिरिक्त इस बात का भी प्रमाण देना होता है कि उसने निर्माण इकाई के लिए भूमि अधिग्रहण कर ली है. कंपनी को इस बात का भी सबूत देना होता है कि उसने बिजली और पानी का कनेक्शन ले लिया है. और तो और नियम के अनुसार “प्राथमिकता में हो कि उत्पाद के डिजाइन और विकास के मामले में कंपनी आत्मनिर्भर हो.”

अगस्त 2015 में, महाराष्ट्र सरकार ने रिलायंस एरोस्ट्रक्चर लिमिटेड को 289 एकड़ जमीन आवंटित की. दो साल बाद, डसॉल्ट एविएशन के सीईओ एरिक ट्रैपियर और अंबानी ने इकाई का शिलान्यास किया. हालांकि, यह पता नहीं चल पाया है कि रिलायंस डिफेंस लिमिटेड की सहायक कंपनियों ने उपरोक्त प्रक्रियागत आवश्यकताओं का पालन किया है या नहीं. मैंने औद्योगिक नीति एवं संवर्द्धन विभाग (डीआईपीपी) के सचिव रमेश अभिषेक, और रिलायंस समूह के कॉर्पोरेट संचार विभाग के अध्यक्ष दलजीत सिंह को इन लाइसेंसों को जारी करने के बारे में कुछ प्रश्न ईमेल किए थे. इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक ना अभिषेक और न ही सिंह ने जवाब दिया है.

24 जुलाई 2015 को, तत्कालीन रक्षा राज्यमंत्री इंद्रजीत सिंह ने लोकसभा को सूचित किया कि सरकार ने औद्योगिक लाइसेंस जारी करने के संबंध में कई मानदंडों को हल्का बनाया है. सिंह ने आगे कहा कि कई रक्षा वस्तुओं को “उद्योग- विशेष रूप से छोटे और मझोले उद्योगों- के लिए आवेदन वाधाओं को हल्का करने के लिए” लाइसेंसिंग की आवश्यकता से मुक्त किया गया है. छह दिन बाद, तत्कालीन रक्षा मंत्री पर्रिकर ने संसद के समक्ष कहा कि केंद्र सरकार ने 126 राफेल जेट खरीदने के लिए टेंडर वापस ले रही है.

इस साल फरवरी में, रक्षा राज्यमंत्री सुभाष भामरे ने लोकसभा को बताया कि नवंबर 2017 तक केंद्र सरकार ने पिछले तीन वर्षों में 74 निजी कंपनियों को कुल 100 रक्षा लाइसेंस जारी किए हैं. भामरे ने आगे बताया कि दिसंबर 2017 तक, 112 लाइसेंस वाली 69 कंपनियों ने उत्पादन कार्य शुरू कर दिया है. दूसरी ओर रिलायंस डिफेंस लिमिटेड की सहायक कंपनियों को किसी भी प्रकार का व्यवसाय शुरू किए बिना ही रक्षा निर्माण लाइसेंस प्राप्त हो गए.

इस वर्ष मार्च में मैंने एक आरटीआई आवेदन किया था जिसके जवाब में डीआईपीपी ने रिलायंस समूह की रक्षा कंपनियों को दिए गए 12 लाइसेंस की जानकारी दी. ये लाइसेंस वायु और नौसेना के लिए मिसाइल और सिम्युलेटर के डिजाइन, विकास और निर्माण और हेलिकॉप्टर, वायुयान और सभी प्रकार के सैन्य वाहनों और लड़ाकू विमानों के लिए हथियार प्रक्षेपक बनाने के लिए दिए गए हैं. हैरान करने वाली बात है कि निर्माण शुरू करने से पहले ही इन कंपनियों को ये लायसेंस दे दिए गए. यहां यह समझना प्रासंगिक होगा कि डसॉल्ट का भारत में निवेश 2013 की रक्षा खरीद नीति से निर्देशित है और लाइसेंस प्राप्ति भारतीय ऑफसेट साझेदार बनने की शर्तों में एक है.

26 नवंबर को मैंने डीआईपीपी की अवर सचिव आर मैथिली से बात की और रक्षा लाइसेंस प्राप्त करने की प्रक्रिया और कंपनी की पात्रता की शर्तों के बारे में जानना चाहा. मैथिली ने लायसेंस जारी करने से पहले की विस्तृत प्रक्रिया के बारे में बताया जिसमें रक्षा मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय और गृह मंत्रालय की टिप्पणियां भी शामिल की जाती हैं. इन टिप्पणियों को आंतरिक लाइसेंस समिति के सामने रखा जाता है. यह समिति वाणिज्य मंत्रालय के समक्ष अपनी सिफारिशें भेजती है जिसके बाद वाणिज्य मंत्रालय तय करता है कि लाइसेंस देना है अथवा नहीं. उन्होंने बताया कि लाइसेंस के लिए आवेदन करने वाली कंपनी को आयुध अधिनियम 1959 के तहत पंजीकृत होना चाहिए, न्यूनत्म संख्या में कर्मचारी होने चाहिए और उसके द्वारा निर्माण कार्य शुरू किया हुआ होना चाहिए. उन्होंने बताया, “औद्योगिक (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1951 के अंतर्गत एक निर्धारित संख्या में कंपनी में कर्मचारी कार्यरत होने चाहिए जिसका अर्थ है कि कंपनी संचालित होनी चाहिए.” हालांकि इन कंपनियों के कर्मचारियों की संख्या पता नहीं चली है लेकिन रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर की वार्षिक रिपोर्ट में साफ साफ लिखा है कि कंपनियों को कोई काम आंरभ नहीं किया है.

“औद्योगिक (विकास एवं विनियमन) अधिनियम (आईडीआर) और आयुध अधिनियम 1959 में लाइसेंस देने के लिए विस्तृत प्रक्रिया बताई गई है. इन कानूनों के अधिकार क्षेत्र में शस्त्र और गोलाबारूद निर्माण इकाई की स्थापना एवं निर्माण, बिक्री, आयात और रक्षा उत्पाद की ढुलाई के लिए लाइसेंस आते हैं. हालांकि इन कानूनों में लाइसेंस का निश्चित समय नहीं बताया गया है लेकिन जारी करने से पहले कंपनी की माली विश्वसनीयता, अनुभव और विशेषज्ञता तथा अंतरिक स्थिति की कड़ी जांच की बात कानून में उल्लेखित है.

आईडीआर कानून का अधिकार क्षेत्र उसके अनुच्छेदों के तहत आने वाली सभी इकइयों में लागू होता है जिसमें वायुयान और शस्त्र और गोलाबारूद भी शामिल है. जून 2014 में, डीआईपीपी ने कई रक्षा वस्तुओं की सूची वाला एक प्रेस नोट जारी किया जिसमें उन वस्तुओं का नाम था जिनके लिए आईडीआर अधिनियम के अनुपालन की आवश्यकता है- रिलायंस समूह की कंपनियों को जिन कलपुर्जों के लिए लाइसेंस प्राप्त हुआ है वे सभी इस सूची में हैं. यह अधिनियम केंद्र सरकार को अधिनियम के तहत लाइसेंस के लिए सभी आवेदकों की “पूरी और संपूर्ण जांच” करने के लिए एक अधिकारी नियुक्त करने का अधिकार देता है. इस जांच का दायरा व्यापक है जिसमें उस वस्तु के उत्पादन में गिरावट की जांच भी की जाती है जिसके लिए निर्माण लाइसेंस की अर्जी की गई है. साथ ही मूल्य में बढ़ोतरी और ऐसी वक्तु का राष्ट्रीय महत्व की जांच भी शामिल है. अधिनियम में आगे कहा गया है कि लाइसेंसिंग प्राधिकरण इस बात से “संतुष्ट होने के बाद कि आवेदनकर्ता के पास लाइसेंस लेने के वाजिव कारण है” लाइसेंस जारी कर सकता है.

आयुध अधिनियम नियुक्त पुलिस अधिकारी को लाइसेंस के आवेदन की जांच करने और लाइसेंस दिया जाना चाहिए अथवा नहीं इसकी रिपोर्ट जमा करने को बाध्य बनाता है. इसके अलावा, 2016 के आयुध नियमों में व्यापक आवेदन प्रक्रिया निर्धारित की गई है जिसके तहत निर्माण लाइसेंस का आवेदन करने वाली कंपनी को अन्य चीजों के अतिरिक्त इस बात का भी प्रमाण देना होता है कि उसने निर्माण इकाई के लिए भूमि अधिग्रहण कर ली है. कंपनी को इस बात का भी सबूत देना होता है कि उसने बिजली और पानी का कनेक्शन ले लिया है. और तो और नियम के अनुसार “प्राथमिकता में हो कि उत्पाद के डिजाइन और विकास के मामले में कंपनी आत्मनिर्भर हो.”

अगस्त 2015 में, महाराष्ट्र सरकार ने रिलायंस एरोस्ट्रक्चर लिमिटेड को 289 एकड़ जमीन आवंटित की. दो साल बाद, डसॉल्ट एविएशन के सीईओ एरिक ट्रैपियर और अंबानी ने इकाई का शिलान्यास किया. हालांकि, यह पता नहीं चल पाया है कि रिलायंस डिफेंस लिमिटेड की सहायक कंपनियों ने उपरोक्त प्रक्रियागत आवश्यकताओं का पालन किया है या नहीं. मैंने औद्योगिक नीति एवं संवर्द्धन विभाग (डीआईपीपी) के सचिव रमेश अभिषेक, और रिलायंस समूह के कॉर्पोरेट संचार विभाग के अध्यक्ष दलजीत सिंह को इन लाइसेंसों को जारी करने के बारे में कुछ प्रश्न ईमेल किए थे. इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक ना अभिषेक और न ही सिंह ने जवाब दिया है.

24 जुलाई 2015 को, तत्कालीन रक्षा राज्यमंत्री इंद्रजीत सिंह ने लोकसभा को सूचित किया कि सरकार ने औद्योगिक लाइसेंस जारी करने के संबंध में कई मानदंडों को हल्का बनाया है. सिंह ने आगे कहा कि कई रक्षा वस्तुओं को “उद्योग- विशेष रूप से छोटे और मझोले उद्योगों- के लिए आवेदन वाधाओं को हल्का करने के लिए” लाइसेंसिंग की आवश्यकता से मुक्त किया गया है. छह दिन बाद, तत्कालीन रक्षा मंत्री पर्रिकर ने संसद के समक्ष कहा कि केंद्र सरकार ने 126 राफेल जेट खरीदने के लिए टेंडर वापस ले रही है.

इस साल फरवरी में, रक्षा राज्यमंत्री सुभाष भामरे ने लोकसभा को बताया कि नवंबर 2017 तक केंद्र सरकार ने पिछले तीन वर्षों में 74 निजी कंपनियों को कुल 100 रक्षा लाइसेंस जारी किए हैं. भामरे ने आगे बताया कि दिसंबर 2017 तक, 112 लाइसेंस वाली 69 कंपनियों ने उत्पादन कार्य शुरू कर दिया है. दूसरी ओर रिलायंस डिफेंस लिमिटेड की सहायक कंपनियों को किसी भी प्रकार का व्यवसाय शुरू किए बिना ही रक्षा निर्माण लाइसेंस प्राप्त हो गए.

दलितों पर गोली चलाने वाले का दावा, केंद्रीय मंत्री तोमर ने गिरफ्तारी से बचाया

अपने नौकरों की तुलना में पांच फीट और चंद सेंटीमीटर के राजा सिंह चौहान छोटी कद काठी के हैं. वो हमेशा तीन चार लोगों से घिरे रहते हैं. चौहान ग्वालियर में सरकारी पैसों से एक कौशल विकास केन्द्र चलाते हैं. आज वो भगवा कुर्ते पैजामे में इस केन्द्र के बाहर घास पर रखी एक मेज पर बैठे हैं. मैंने उनसे कोई डेढ़ घंटा बातचीत की और इस दौरान लोग लगातार मिलने आते रहे. मिलने वाले सभी स्थानीय मर्द थे. कुछ लोग उनसे राम राम करने आए थे और कुछ लोग सलाह मशवरे के लिए. एक आदमी उन्हें अपने जन्मदिन की पार्टी में बुलाने आया था. हर मुलाकात से पहले चौहान का निजी सचिव आने वाले की जाति का उल्लेख कर पहचान करा रहा था. वो कहता था, “ये शर्मा जी हैं”, पंडित”, “ये अपने तोमर का लड़का है”. हर आगंतुक पहले झुक कर चौहान के पैर छूता और फिर बोलने या बैठने के लिए चौहान की आज्ञा की प्रतीक्षा करता.

राजा राजपूत जात के रसूखदार चौहान समुदाय के हैं. फिलहाल वो किसी हीरो से कम नहीं हैं. 2 अप्रैल के भारत बंद के समय राजा चौहान राष्ट्रीय समाचारपत्रों की सुर्खियों में थे. उस दिन देश भर में दलितों ने सर्वोच्च अदालत के मार्च महीने में दिए फैसले के खिलाफ आंदोलन किया था. सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार रोकथाम अधिनियम को कमजोर करने वाले अपने फैसला में इस कानून के तत्काल गिरफ्तारी वाले प्रावधान को हटा दिया था. इसके बाद बिना किसी राजनीतिक दल की अगुवाई में देश भर के दलितों ने व्यापक प्रदर्शन किया. बहुत सी जगहों पर प्रदर्शनकारी दलित पुलिस भिड़ गए और अन्य कई जगह सवर्णों के विरोध प्रदर्शनों से उनका आमना-सामना हुआ. सवर्णों की भीड़ ने आंदोलनकारियों पर पथराव किया, उन पर लाठियों से हमला किया और गोलियां चलाई. देश भर में पुलिस और सवर्णों की गोलीबारी में कम से कम 9 दलितों की मौत हो गई. उनमें से तीन मौतें अकेले ग्वालियर में हुईं और चार की मौत मध्य प्रदेश के ही भिंड में हुई.

ग्वालियर के गोली चलाने वाला वीडियो देश भर में हेडलाइन बना. वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि दो लोग प्रदर्शनकारियों पर सीधा निशाना लगा रहे हैं. एक वीडियो में राजा को भी देखा जा सकता है. बाद में पता चला कि यह वीडियो ग्वालियर के थाटीपुर इलाके का है जिसमें राजा प्रदर्शकारियों पर गोली चलाते दिखाई दे रहे हैं. उजली सफेद कमीज पहने राजा एक ऊंचे स्थान से प्रदशर्नकारियों पर गोली चलाते हैं और फिर पूरे विश्वास के साथ पिस्तौल को ठीक करते हुए प्रदर्शनकारियों की ओर बढ़ते हैं. उनके पीछे लोगों का झुंड “जय श्री राम” का नारा लगाता हुआ चल पड़ता है.

उस दिन की गोलीबारी में दीपक जाटव और राकेश टमोटिया नाम के दो दलित मारे गए. जाटव को उनके घर गल्ला कोठार में और टमोटिया को भीम नगर कॉलोनी के बाहर लेबर अड्डे में गोली मारी गई. ये दोनों जगहें थाटीपुर में हैं जहां ज्यादातर जाटवों सहित अन्य दलितों की बसावट है. दोनों मृतकों को छाती के पास गोली लगी थी. दोनों एक दूसरे से सिर्फ 500 मीटर की दूरी में मारे गए थे. दोनों ही मामलों में एफआईआर दर्ज है.

महेन्द्र सिंह चौहान को जाटव और टमोटिया की हत्या के लिए गिरफ्तार किया गया. वो तीन महीने तक जेल में रहा और दो महीने पहले जमानत में रिहा हुआ है. इन हत्यों के लिए राजपूत जाति के ऋषभ भदोरिया और ओबीसी जाति के ऋषि गुर्जर को भी महेन्द्र के साथ ही गिरफ्तार किया गया था. दोनों अभी जमानत में बाहर हैं.

राजा का वीडियो देश के तमाम टीवी चैनलों में देखा गया लेकिन पुलिस उनका संबंध हत्या से नहीं जोड़ पाई और उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 308 के तहत हत्या की कोशिश का आरोप लगाया गया है. उन पर एससी/एसटी अधिनियम के तहत भी मामला दर्ज है. बंद के पांच महीने तक राजा भगौड़ा थे. इस दौरान उन्होंने अंतरिम जमानत की अर्जी दायर की जिसे मध्य प्रदेश की सत्र न्यायालय और हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया. फिर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. 29 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने ना केवल एससी/एसटी की धाराओं को उन पर से हटा दिया बल्कि सत्र न्यायालय को भी आईपीसी की धारा 308 के तहत के मामले पर जमानत की मंजूरी पर विचार करने का भी निर्देश दिया. उन्होंने 5 सितंबर को सत्र न्यायालय के सामने आत्मसमर्पण किया और उसी दिन उन्हें जमानत दे दी गई.

अक्टूबर के मध्य में ग्वालियर की यात्रा के दौरान मैंने राजा से मुलाकात की. महेंद्र मुझसे व्यक्तिगत रूप से मिलने में संकोच रहे थे, लेकिन फोन पर मुझसे बात करने के लिए राजी हो गए. दोनों पुरुषों ने मुझसे यह बात मानी की उन्होंने असल में दलित प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई थी. राजा ने दावा किया कि उन्होंने चौहान और तोमर परिवारों की भाभियों और बहनों को बचाने के लिए प्रदर्शनकारियों पर “आत्मरक्षा” में गोलिया चलाई थी क्योंकि महिलाएं दलितों के “हिंसक” प्रदर्शन से डर गई थीं. महेंद्र ने भी कहा कि उन्होंने आत्मरक्षा में प्रदर्शनकारियों को गोली मारी थी.

राजा ने बताया कि बंद के एक दिन पहले थाटीपुर के दो शक्तिशाली जमींदार परिवार चैहानों और तोमरों ने दलितों के प्रदर्शन को असफल करने की योजना बनाई थी. सबसे अहम उनका यह दावा है कि केंद्रीय ग्रामीण विकास, पंचायती राज और खान मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने उन्हें गिरफ्तारी से बचाया और और पुलिस को उनका पीछा करने या घर पर रेड करने से रोका. मंत्री तोमर ग्वालियर से लोकसभा के सदस्य हैं और राजपूत भी हैं. राजा ने केंद्रीय मंत्री के साथ अपने परिवार के लंबे समय से चले आ रहे सहयोग की बात भी की. तोमर “अपने लोगों को बचाते हैं“, राजा ने मुझे बताया. “हां उन्होंने मदद की.”

मैंने राजा और उनके लोगों से बात की जिनमें से एक ने कहा कि वह राजा के कानूनी सलाहकार हैं. साथ ही, मैंने पुलिस अधिकारियों और ट्रायल कोर्ट के न्यायाधीश से भी बात की. इन बातचीत और जाटव और टमोटिया की हत्या की एफआईआर, पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट और अदालत के आदेशों और अन्य दस्तावेजों की जांच करने से पता चलाता है कि राजा की जाति ने उनके पक्ष में काम किया और अगड़ी जाति के पुरुषों की ताकत और प्रभाव ने दोनों को अपराध से बचने में मदद की.

थाटीपुर में राजा का घर और व्यवसाय चौहान प्याऊ नाम की जगह पर है. इस जमीन में कई किराए के मकान हैं और एक बड़ा सा शाॅपिंग परिसर. राजा के अनुसार 30000 वर्ग यार्ड भूमि उनके पिता भैय्या सिंह चौहान और उनके चाचाओं के नाम है. चौहान प्याऊ से 500 मीटर की दूरी पर भीम नगर स्थित है और गल्ला कोठार यहां से 500 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम पर है.

चौहान प्याऊ के साथ की जमीन पर तोमर (राजपूत) परिवार रहते हैं. राजा ने बताया कि ये दोनों समुदाय भूमि विवाद के चलते कई बार झगड़ा कर चुके हैं. लेकिन जब दोनों ने अप्रैल में दलितों के प्रदर्शन की बात सुनी तो एक हो कर “चमारों” को भगाने की ठानी. चमार शब्द को राजा ने एक गाली की तरह प्रयोग किया. राजा ने बताया कि हम लोगों ने पहले से ही तय कर लिया था कि इस प्रदर्शन को नहीं होने देना है.” प्रदर्शन से एक रात पहले मैंने अपने पार्षद को बुलाया और एक होकर प्रतिकार करने का निर्णय किया. उन्होंने बताया कि परिवार ने उसी रात लोगों और हथियारों को इकट्ठा किया.

दूसरे दिन प्रदर्शनकारी दलितों की भारी संख्या देख कर दंग रह गए दिया. राजा ने कहा कि उन्हें एहसास नहीं था कि इतनी बड़ी संख्या में दलित प्रदर्शन करेंगे. उनका कहना है कि वीडियो में उनके एक्शन को ही दिखाया गया है. वीडियो में दिखाई पड़ता है कि वो गोलिया चलाते हैं और फिर पिस्तौल हाथों में लिए आगे बढ़ते हैं. उन्होंने स्वीकार किया कि उसके बाद भी उन्होंने कई राउंड फायर किया था. “भगवान की कृपा से वीडियो बना नहीं और आगे, मैंने आगे बहुत फायर ली है.” फिर भी राजा ने दावा किया कि उनकी गोली से कोई प्रदर्शनकारी नहीं मरा क्योंकि वो हवा में गोली चला रहे थे. उन्होंने बताया कि वो अकेले गल्ला कोठार गए और प्रदर्शनकारियों को घरों में घुसेड़ दिया.

राजा की भांति ही महेन्द्र ने भी गोली चलाने की बात स्वीकारी. उनका भी दावा था कि उन्होंने आत्मरक्षा में गाली चलाई. उन्होंने कहा कि वह सिर्फ 308 के तहत दोषी हैं ना कि दोहरी हत्या के.”

बातचीत के दौरान मुझे एहसास हुआ कि राजा दलितों के प्रति घोर पूर्वाग्रहों से भरे हैं जिसकी वजह से उन्होंने वह कृत किया था. राजा ने दावा किया कि एससी/एसटी एक्ट की वजह से अगड़ी जातियों के साथ “ज्यादति” हुई है और यह कानून एससी/एसटी के “तुष्टीकरण” के लिए बनाया गया है. उन्होंने कहा कि जो भी उन्होंने किया उस पर उन्हें गर्व है. “मैंने सही किया और ये करना ही था.” वो कहते हैं, “अगर मैंने ऐसा नहीं किया होता तो उनकी ताकत बढ़ जाती. सरकार ने उन्हें वैसे भी बहुत ताकत दे दी है और उसने उनके सामने हार मान ली है. अगर उनको रोका नहीं जाता तो शायद वे लोग इतने ताकतवर हो जाते की हम लोगों पर हमला करने लगते.” राजा यह दावा उस स्थिति में कर रहे हैं जब दलित कॉलोनी में लोगों के मरने के बावजूद भी उनके परिवार के किसी सदस्य को चोट तक नहीं आई.

राजा ने मुझ से अपने जातीय गौरव और राजपूत पुरखों के बारे में लंबी लंबी बातें की. उन्होंने दावा किया कि उनके पुरखे अंग्रेज शासन से पहले सिंधिया राजाओं के सिपासलार थे. अंग्रेज के शासन के वक्त भी सिंधियाओं का इस क्षेत्र में जबर्दस्त प्रभाव था जो आज भी बना हुआ है. ग्वालियर के अंतिम महाराजा माधवराव सिंधिया कांग्रेस पार्टी के नेता और केन्द्रीय मंत्री रहे और उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया पिछली यूपीए सरकार में केन्द्रीय मंत्री थे. दोनों ही ग्वालियर से लोक सभा के लिए निर्वाचित हुए थे. माधवराव की बहन वसुंधरा राजे 2013 से राजस्थान की मुख्यमंत्री हैं. मध्य प्रदेश में शासन अभी भी सामंति ढांचे की जकड़ में है और समाज में इनके प्रभाव में कोई कमी नहीं आई है.

राजा ने दावा किया कि 1980 के दशक तक उनका परिवार सिंधियाओं का दाहिना हाथ था और वे लोग आज भी ग्वालियर में उतने ही रसूखदार लोग हैं. उनके लिए दलितों का विद्रोह उनके पारिवारिक जातीय शक्ति के लिए खतरा था. पुलिस ने राजा की पिस्तौल को कभी कब्जे में नहीं लिया. राजा ने मुझे गर्व के साथ बताया कि वह बंदूक अभी भी उनके पास ही है और वो “राजपूतों के सम्मान की खातिर उसे फिर चलाने को तैयार हैं.”

1997 में उत्तर प्रदेश में एक राजनीतिक विवाद के बाद बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन बसपा-बीजेपी सरकार के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन का आह्वान किया था. उत्तर प्रदेश के करीब होने की वजह से बंद की आंच ग्वालियर तक भी पहुंची. परिणाम स्वरूप बसपा के समर्थकों ने- जिनमें अधिकांश दलित थे- शहर में प्रदर्शन किया था. राजा ने दावा किया कि उनके पिता भैय्या सिंह चौहान ने 156 राउंड गोलियां आंदोलनकारियों पर चलाई थी. “मेरे पिताजी ने जो फायर किए थे उसके कारतूस आज भी रखे हैं हमारे घर में.” राजा ने कहा, “इतिहास दोहरा दिया इस वक्त हमने. पापा का काम किया.”

राजा ने बाताय कि गोली चलाने के बाद वो दो महीना अपने घर में ही छिपे रहे और अगले तीन महीने मुंबई में घूमते रहे. एक भी दारोगा उनके घर नहीं आया. “एसपी (पुलिस अधीक्षक) साहब मेरे पिता को फोन पर कहते थे कि ‘अपने बेटे को अब बुला लो, हम लोगों पर दवाब बढ़ रहा है.’ लेकिन मेरे पिता के सामने आईजी और डीआईजी- महानिरीक्षक और उप महानिरीक्षक- सब झुके हुए थे.”

क्षेत्र में परिवार के प्रभाव के अलावा राजा ने केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के साथ अपने परिवार के पुराने संबंधों को कानून से बचने की वजह बताया. उन्होंने दावा किया कि 1970 के दशक से भैय्या सिंह कैबिनेट मंत्री को जानते थे, जब कैबिनेट मंत्री जनसंघ से जुड़े थे और तोमर “थाठीपुर की सड़क में चलने वाला कोई आम आदमी” थे. राजा ने दावा किया कि एक जवान व्यक्ति के रूप में, तोमर भैय्या सिंह के आसपास रहने वाले लोगों में से एक थे. उन्होंने कहा कि ये जवान लड़के अपनी शामें पीने और चिकन खाने में बिताते थे. राजा ने कहा, “तब तोमर को देर रात अपने घर जाने की इजाजत नहीं थी, तो वह मेरे पिता के घर पर पैदल चले आते थे जहां उनको रहने की इजाजत मिल जाती थी.” राजा ने कहा कि तोमर तब कॉलेज छात्र थे और भैय्या सिंह उन्हें “मुन्ना” बुलाते थे और अक्सर उनसे कॉलेज की राजनीति की बात करते थे. राजा ने कहा कि उनको बनाने में मेरे पिता जी का हाथ रहा है. उन्होंने दावा किया कि भैय्या सिंह ने तोमर की राजनीति में पैसों से मदद की.

राजा ने कहा कि तोमर अभी भी चौहान परिवार के करीब हैं और जन्मदिन और पार्टियों में आते रहते हैं. उन्होंने कहा कि कैबिनेट मंत्री के करीब होने के बावजूद उन्होंने कभी सोशल मीडिया पर तोमर के साथ कोई तस्वीर पोस्ट नहीं की क्योंकि उनका मानना ​​था कि यह उनके लिए छोटी बात है. राजा ने कहा, “हमें पता है औकात क्या है तुम्हारी.”

विरोध प्रदर्शन का वीडियो सर्कुलेट होना शुरू होने के बाद थाटीपुर के निवासी देवाशीष जरारिया ने, जिन्होंने पहले उसी स्कूल में पढ़ाई थी जिसमें राजा ने की थी, पहले राजा की पहचान की. जरारिया के मुताबिक, चौहान का आत्मरक्षा का तर्क सही नहीं है, क्योंकि वीडियो में दोनों को प्रदर्शनकारियों पर सीधे फायरिंग करते देखा जा सकता है. जरारिया ने यह भी कहा कि पुरुष अपने घरों या महिलाओं परिवारों की रक्षा नहीं कर रहे थे, बल्कि दलितों की बस्तियों में उन्हें मारने के लिए बंदूक लेकर जा रहे थे. वीडियो में जगह का जिक्र करते हुए जरारिया ने कहा, “उनका घर कम से कम 100-200 मीटर दूर है जहां से उन्होंने पहली गोली चलाई. वो वहां क्या कर रहे थे? वो किसकी आत्मरक्षा की बात कर रहे हैं?”

क्षेत्र के दलित निवासियों का मानना ​​था कि बीजेपी सरकार ने राजा और उनके परिवार की मदद की थी, लेकिन यह सुनिश्चित नहीं था कि तोमर ने हस्तक्षेप किया था या नहीं.

चौहान और तोमर का जिक्र करते हुए, गल्ला कोठार में रहने वाले दलित राम अवतर सिंह ने कहा, “दोनों परिवारों में नगर निगम और राज्य विधानसभा में पार्षद और विधायक हैं. वो बहुत बड़ा परिवार हैं, कभी-कभी वो स्थानीय चुनावों में अपने परिवार से किसी को उतारते हैं या किसी भी ब्राह्मण या राजपूत नेता को अपना समर्थन दे देते हैं.” राजा ने मुझे बताया कि उनके परिवार ने हमेशा बीजेपी उम्मीदवार का समर्थन किया है और दावा किया है कि उनके क्षेत्र में चुनाव के लिए उतरा कोई भी विधायक या नगर परिषद उम्मीदवार उनके परिवार के समर्थन के बिना नहीं जीत सकता. राजा ने कहा, “अगर किसी को भी थाटीपुर में ब्राह्मण और ठाकुर का वोट चाहिए तो उसे गैराज में आना होता है.” गैराज का काम उनका पारिवारिक व्यापार है. उन्होंने मुझे ग्वालियर के मौजूदा विधायक माया सिंह का उदाहरण दिया, जो महिला और बाल कल्याण राज्य मंत्री हैं. फिर कहा, “हर कोई यहीं आता है.” जरारिया के मुताबिक राजा ने तोमर के साथ अपने प्रभाव और संबंध को बढ़ाचढ़ा कर बताया. जरारिया ने कहा, “तोमर इनको ठंडा कर देगा.” कांग्रेस का हिस्सा बनने के पहले इस साल के सितंबर तक जरारिया बीएसपी में थे. उन्होंने कहा, “राजा का भाई पार्षद का चुनाव लड़ रहा था और उसे हराने के लिए नरेंद्र सिंह तोमर ने ग्वालियर में दो रैलियां की और उनका भाई हार गया.” उसने मुझे बताया कि अगर तोमर ने राजा की मदद की है, तो ये “राजनीति” के कारण नहीं बल्कि “जाति” के कारण हुआ होगा. जरारिया ने कहा, “हिंसा जातीय आधिपत्य का विषय बन गई है. दलितों के दृढ़ निश्चय के साथ प्रदर्शन और उसके बाद पुलिस शिकायत से पूरे राजपूत समुदाय ने अपमानित महसूस किया.

मैंने तोमर के ऑफिस में कई बार फोन किया, लेकिन उनसे बात नहीं हो पाई. मेरे ईमेल का भी उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. थाटीपुर में हुई हत्या के आरोपी महेंद्र ने कहा तोमर से नजदीकी की वजह से राजा बचा हुआ है. महेंद्र का कहना है कि 2 अप्रैल को सिर्फ वही प्रदर्शनकारियों पर गोली नहीं चला रहा था बल्कि चौहान प्याऊ के पास के चौहान और तोमर घरों से गोलियां बरस रहीं थीं.

मैंने गल्ला कोठार और भीम नगर, जो मुख्य रूप से दलित कॉलोनियां हैं, के कई लोगों से बात की. उनकी बातें राजा और महेंद्र के दावों के विपरीत थी. मृतक राकेश के भाई मंगल टमोटिया ने कहा कि हथियार लिए हुए राजपूतों की भीड़ उनके घर और कॉलोनी तबाह करने आ रही थी. मंगल ने कहा कि वे पुलिस के साथ आए थे. उन्होंने हमारे मोहल्ले में कई चीजों को तहस-नहस कर दिया.

वहां के निवासियों ने मुझे बताया कि दूसरे कई लोग भी उस दिन घायल हुए थे. मंगल ने बताया कि आम दिनों की तरह राकेश लबर अड्डे पर बैठा किसी ठेकेदार का इंतजार कर रहा था, लेकिन जैसे ही दंगे शुरू हुए, पुलिस और राजपूतों की भीड़ ने कॉलोनी तक उनका पीछा किया. राकेश को एक गोली लगी थी और उसकी मौके पर ही मौत हो गई.

दीपक जाटव, लेबर अड्डे से लगभग 500 मीटर की दूरी पर गल्ला कोठार में अपने परिवार के साथ रहते थे. इसी जगह पर राजा को हथियार के साथ देखा गया था. दीपक के पिता मोहन जाटव ने बताया कि वे और दीपक 2 अप्रैल को अपने घर पर बैठे थे. तभी राजा और महेंद्र बंदूक लहराते और गोलियां चलाते हुए कॉलोनी में घुसे.  उन्होंने बताया कि उनके बेटे को छाती, बाजू और पेट की साइड में गोली लगी थी. उनके घर के बाहर बंधे एक बैल को भी गोली मारी गई, जिसकी मौत हो गई. परिवार के कई दूसरे लोगों को भी चोटें आई हैं. मोहन ने कहा, ‘किसी के पैर में गोली लगी है, किसी के जांघ में गोली लगी है.’ मेरे भतीजे को गोली लगी. मेरी एक पोती है, उसको भी गोली लगी है.

राकेश के भाई मंगल ने मुझे बताया कि पोस्ट-मॉर्टम के वक्त वे मौजूद थे. उनके भाई के शरीर पर कोई बाहरी चोट नहीं लगी थी. उन्होंने कहा, ‘ये 100 प्रतिशत मालूम है. मैंने अपने भाई को उठाके देखा है.’ उन्होंने बताया कि पुलिस और सरकारी एजेंसियां बोल रही है कि उनके शरीर से कोई गोली नहीं मिली थी. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में लिखा गया है कि गोली दायीं तरफ से उनकी कॉलरबोन में घुसी और छाती में से होते हुए दायीं बाजू में से बाहर निकल गई.

मृतकों के परिवार से मिलने के बाद मैं थाटीपुर पुलिस स्टेशन के दीवान रणवीर सिंह से मिला. पुलिस इंस्पेक्टर की अनुपस्थिति में रणवीर सिंह स्टेशन इंचार्ज हैं. सिंह ने मुझे बताया कि 2 अप्रैल के बाद तीन महीने में थाने का पूरा स्टाफ बदला गया है. इस मामले में नए जांच अधिकारी छगन सिंह बघेल को नियुक्त किया गया है. बघेल ने मुझे बताया कि जांच जारी है. उन्होंने बताया कि अगर कोर्ट के आदेश होंगे तो वे केवल राजा के हथियार जब्त करेंगे. बघेल ने कहा कि अभी हमारे पास कुछ गवाह हैं, बाकी हम ट्रायल के दौरान देखेंगे. जब मैंने पूछा कि क्या मौके से कोई गोली के कारतूस  बरामद हुए हैं और उन्हें फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है तो बघेल ने कोई जवाब नहीं दिया. जब मैनें उनसे राजनीतिक दबाव के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि ऐसा कोई दबाव नहीं है. उन्होंने कहा कि पुलिस ने हाई कोर्ट के सामने राजा की जमानत की अपील की है.

मई में ग्वालियर पुलिस अधीक्षक का पद संभालने वाले नवनीत भसीन ने भी कहा कि उन पर कोई राजनीतिक दबाव नहीं है. भसीन ने कहा कि अगर कोर्ट कहेगा तो बघेल राजा के हथियार जब्त करेंगे. साथ ही उन्होंने राजा के पिता और नरेंद्र सिंह तोमर की तरफ से किसी भी प्रकार के दबाव से इनकार किया. भसीन ने कहा, ‘नाम राजा रहने से कुछ नहीं होता. कुछ भी कह सकता है, उसकी मर्जी.’

जब उनसे पूछा गया कि राजा पांच महीने तक बाहर कैसे रहा. इस पर भसीन ने राजा का बचाव करते हुए कहा कि इस मामले में कई बेगुनाह लोगों का नाम आया है. क्या यह हमारा काम नहीं है कि हम इस बात की जांच करें कि कौन दोषी है और कौन नहीं. क्या हम सबको गिरफ्तार कर लें? क्या कानून ऐसे काम करता है?

ग्वालियर रेंज के आईजी अंशुमान यादव ने राजा के दावे को लेकर कहा कि वह कुछ भी कह रहा है. हम पर कोई दबाव नहीं है. ना ही उसका परिवार मेरे संपर्क में है. जब मैंने उनसे पूछा कि राजा अब तक गिरफ्तार क्यों नहीं हुआ तो उन्होंने कहा कि वह फरार था.

पुलिस के बारे में बात करते हुए राजा ने कहा कि ‘डिपार्टमेंट से बहुत मदद मिली.’ महेंद्र सिंह ने कहा, ‘अपने साथ कोई बदसलूकी नहीं हुई है, ना ही थाने में ना ही कोर्ट में और ना ही जेल में.’ दोनों ने कहा कि उन्हें पुलिस, कोर्ट और राज्य सरकार से मदद मिली है क्योंकि उनकी नजर में हमने कुछ गलत नहीं किया.

राजा ने बताया कि न्यायिक अधिकारियों ने भी उसकी मदद की थी. उसने कहा कि उसके वकील प्रशांत शर्मा ने उससे फीस नहीं ली. जिस दिन उसे जमानत मिली, स्थानीय बार एसोसिएशन ने मिठाई बांटी थी. उसने कहा, ‘ट्रायल कोर्ट के जज बीपी शर्मा भी बुहत खुश थे.’ राजा ने कहा कि उन्होंने पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा कि अगर वे मुझे हिरासत में रखना या रिमांड में लेना चाहते हैं तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट जाना होगा. मैंने शर्मा से फोन पर पूछा कि क्या राजपूत होने की वजह से कोर्ट ने राजा का पक्ष लिया तो शर्मा ने कहा कि मेरा तबादला हो गया है और इस बारे में मैं कुछ नहीं बोल सकता.

दलित कार्यकर्ता सुरेश माने, जो सुप्रीम कोर्ट से संभाजी भिंडे की गिरफ्तारी की मांग कर रहे हैं, ने कहा कि तीन जजों की बेंच के लिए एससी/एसटी एक्ट के आरोप को रद्द करना सामान्य नहीं है वह भी तब जब उन्हीं आरोपों पर ट्रायल और हाई कोर्ट जमानत याचिका को खारिज कर चुके हैं. यह बिल्कुल भी सामान्य नहीं है.

भिंड, जहां एक और दलित प्रदर्शनकारी की मौत हुई थी और ग्वालियर राज्य की चंबल और ग्वालियर एडमिनिस्ट्रेटिव डिवीजन का हिस्सा है. दोनों डिविजन में एससी लोगों की तादाद काफी ज्यादा है. दोनों डिवीजन के आठ जिलों में एससी लोगों की तादाद 20-25 प्रतिशत है. मध्यप्रदेश में बाकी जगहों पर बीजेपी और कांग्रेस के बीच चुनावी मुकाबला होता है लेकिन इन आठ जिलों में मुकाबला बसपा बनाम अन्य का होता है. इससे पहले बसपा इन जगहों पर ऊंची जाति के उम्मीदवार उतारकर राजपूत और ब्राह्मणों के वोट पाती थी, लेकिन 2 अप्रैल के विरोध प्रदर्शन के बाद दलित अनिश्चिंत हैं कि वे किसे वोट करें क्योंकि बसपा ने इन सीटों पर ब्राह्मण और राजपूत उम्मीदवार उतारे हैं. समुदाय के कई लोग बसपा से इसलिए भी नाराज हैं क्योंकि पार्टी ने भारत बंद को खास समर्थन नहीं दिया था. दूसरे सभी समुदाय बीजेपी को वापस सत्ता में लाने के लिए एकजुट दिख रहे हैं. जरारिया ने कहा कि बसपा द्वारा भारत बंद पर स्टैंड नहीं लेने के काऱण उन्होंने कांग्रेस ज्वाइन की है.

जब मैं जाने के लिए उठा तो राजा ने अपने आदमी से मुझे बाइक पर छोड़ कर आने को कहा. बाइक पर सफर के दौरान पता चला कि राजा का आदमी भी दलितों के खिलाफ पूर्वाग्रहों और नफरत से भरा है. उस आदमी ने मुझे अपना नाम विजय सिंह चौहान बताया और कहा कि उसे मोनू भी बुलाया जाता है. मेरे बिना पूछने के ही उसने बताया कि सरकारी नौकरियों में दलितों के लिए आरक्षण, एससी/एसटी एक्ट से भी ‘खतरनाक’ है. “आरक्षण ने ब्राह्मणों को बर्बाद कर दिया है. पहली गोली मादर$&$& उस भीमराव (भीमराव अंबेडकर) पर चलनी चाहिए.” मोनू ने कहा कि भारत को आजादी मिलते ही पहला काम उसकी (भीमराव अंबेडकर) छाती पर गोली मारने का करना चाहिए था. “यह क्या है कि कोई चमार हमारा संविधान लिख रहा है? क्या चमार भगवान है? बहन$&$& चमार लोग.” आगे उसने कहा कि कई ठाकुर और पंडित है. “पंडितों को सबसे ज्ञानी लोग कहा जाता है. वे ठाकुरों से भी ज्यादा पढ़े-लिखे होते हैं. इसलिए हमारा संविधान लिखने वाला एक ब्राह्मण होना चाहिए था. तब हमें भी कुछ फायदा मिलता.” मोनू कहता है, “मैं होता उस जमाने में तो मैं भीमराव  की छाती में गोली मारता .”

राजा का वीडियो देश के तमाम टीवी चैनलों में देखा गया लेकिन पुलिस उनका संबंध हत्या से नहीं जोड़ पाई और उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 308 के तहत हत्या की कोशिश का आरोप लगाया गया है. उन पर एससी/एसटी अधिनियम के तहत भी मामला दर्ज है. बंद के पांच महीने तक राजा भगौड़ा थे. इस दौरान उन्होंने अंतरिम जमानत की अर्जी दायर की जिसे मध्य प्रदेश की सत्र न्यायालय और हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया. फिर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. 29 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने ना केवल एससी/एसटी की धाराओं को उन पर से हटा दिया बल्कि सत्र न्यायालय को भी आईपीसी की धारा 308 के तहत के मामले पर जमानत की मंजूरी पर विचार करने का भी निर्देश दिया. उन्होंने 5 सितंबर को सत्र न्यायालय के सामने आत्मसमर्पण किया और उसी दिन उन्हें जमानत दे दी गई.

अक्टूबर के मध्य में ग्वालियर की यात्रा के दौरान मैंने राजा से मुलाकात की. महेंद्र मुझसे व्यक्तिगत रूप से मिलने में संकोच रहे थे, लेकिन फोन पर मुझसे बात करने के लिए राजी हो गए. दोनों पुरुषों ने मुझसे यह बात मानी की उन्होंने असल में दलित प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई थी. राजा ने दावा किया कि उन्होंने चौहान और तोमर परिवारों की भाभियों और बहनों को बचाने के लिए प्रदर्शनकारियों पर “आत्मरक्षा” में गोलिया चलाई थी क्योंकि महिलाएं दलितों के “हिंसक” प्रदर्शन से डर गई थीं. महेंद्र ने भी कहा कि उन्होंने आत्मरक्षा में प्रदर्शनकारियों को गोली मारी थी.

राजा ने बताया कि बंद के एक दिन पहले थाटीपुर के दो शक्तिशाली जमींदार परिवार चैहानों और तोमरों ने दलितों के प्रदर्शन को असफल करने की योजना बनाई थी. सबसे अहम उनका यह दावा है कि केंद्रीय ग्रामीण विकास, पंचायती राज और खान मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने उन्हें गिरफ्तारी से बचाया और और पुलिस को उनका पीछा करने या घर पर रेड करने से रोका. मंत्री तोमर ग्वालियर से लोकसभा के सदस्य हैं और राजपूत भी हैं. राजा ने केंद्रीय मंत्री के साथ अपने परिवार के लंबे समय से चले आ रहे सहयोग की बात भी की. तोमर “अपने लोगों को बचाते हैं“, राजा ने मुझे बताया. “हां उन्होंने मदद की.”

मैंने राजा और उनके लोगों से बात की जिनमें से एक ने कहा कि वह राजा के कानूनी सलाहकार हैं. साथ ही, मैंने पुलिस अधिकारियों और ट्रायल कोर्ट के न्यायाधीश से भी बात की. इन बातचीत और जाटव और टमोटिया की हत्या की एफआईआर, पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट और अदालत के आदेशों और अन्य दस्तावेजों की जांच करने से पता चलाता है कि राजा की जाति ने उनके पक्ष में काम किया और अगड़ी जाति के पुरुषों की ताकत और प्रभाव ने दोनों को अपराध से बचने में मदद की.

थाटीपुर में राजा का घर और व्यवसाय चौहान प्याऊ नाम की जगह पर है. इस जमीन में कई किराए के मकान हैं और एक बड़ा सा शाॅपिंग परिसर. राजा के अनुसार 30000 वर्ग यार्ड भूमि उनके पिता भैय्या सिंह चौहान और उनके चाचाओं के नाम है. चौहान प्याऊ से 500 मीटर की दूरी पर भीम नगर स्थित है और गल्ला कोठार यहां से 500 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम पर है.

चौहान प्याऊ के साथ की जमीन पर तोमर (राजपूत) परिवार रहते हैं. राजा ने बताया कि ये दोनों समुदाय भूमि विवाद के चलते कई बार झगड़ा कर चुके हैं. लेकिन जब दोनों ने अप्रैल में दलितों के प्रदर्शन की बात सुनी तो एक हो कर “चमारों” को भगाने की ठानी. चमार शब्द को राजा ने एक गाली की तरह प्रयोग किया. राजा ने बताया कि हम लोगों ने पहले से ही तय कर लिया था कि इस प्रदर्शन को नहीं होने देना है.” प्रदर्शन से एक रात पहले मैंने अपने पार्षद को बुलाया और एक होकर प्रतिकार करने का निर्णय किया. उन्होंने बताया कि परिवार ने उसी रात लोगों और हथियारों को इकट्ठा किया.

दूसरे दिन प्रदर्शनकारी दलितों की भारी संख्या देख कर दंग रह गए दिया. राजा ने कहा कि उन्हें एहसास नहीं था कि इतनी बड़ी संख्या में दलित प्रदर्शन करेंगे. उनका कहना है कि वीडियो में उनके एक्शन को ही दिखाया गया है. वीडियो में दिखाई पड़ता है कि वो गोलिया चलाते हैं और फिर पिस्तौल हाथों में लिए आगे बढ़ते हैं. उन्होंने स्वीकार किया कि उसके बाद भी उन्होंने कई राउंड फायर किया था. “भगवान की कृपा से वीडियो बना नहीं और आगे, मैंने आगे बहुत फायर ली है.” फिर भी राजा ने दावा किया कि उनकी गोली से कोई प्रदर्शनकारी नहीं मरा क्योंकि वो हवा में गोली चला रहे थे. उन्होंने बताया कि वो अकेले गल्ला कोठार गए और प्रदर्शनकारियों को घरों में घुसेड़ दिया.

राजा की भांति ही महेन्द्र ने भी गोली चलाने की बात स्वीकारी. उनका भी दावा था कि उन्होंने आत्मरक्षा में गाली चलाई. उन्होंने कहा कि वह सिर्फ 308 के तहत दोषी हैं ना कि दोहरी हत्या के.”

बातचीत के दौरान मुझे एहसास हुआ कि राजा दलितों के प्रति घोर पूर्वाग्रहों से भरे हैं जिसकी वजह से उन्होंने वह कृत किया था. राजा ने दावा किया कि एससी/एसटी एक्ट की वजह से अगड़ी जातियों के साथ “ज्यादति” हुई है और यह कानून एससी/एसटी के “तुष्टीकरण” के लिए बनाया गया है. उन्होंने कहा कि जो भी उन्होंने किया उस पर उन्हें गर्व है. “मैंने सही किया और ये करना ही था.” वो कहते हैं, “अगर मैंने ऐसा नहीं किया होता तो उनकी ताकत बढ़ जाती. सरकार ने उन्हें वैसे भी बहुत ताकत दे दी है और उसने उनके सामने हार मान ली है. अगर उनको रोका नहीं जाता तो शायद वे लोग इतने ताकतवर हो जाते की हम लोगों पर हमला करने लगते.” राजा यह दावा उस स्थिति में कर रहे हैं जब दलित कॉलोनी में लोगों के मरने के बावजूद भी उनके परिवार के किसी सदस्य को चोट तक नहीं आई.

राजा ने मुझ से अपने जातीय गौरव और राजपूत पुरखों के बारे में लंबी लंबी बातें की. उन्होंने दावा किया कि उनके पुरखे अंग्रेज शासन से पहले सिंधिया राजाओं के सिपासलार थे. अंग्रेज के शासन के वक्त भी सिंधियाओं का इस क्षेत्र में जबर्दस्त प्रभाव था जो आज भी बना हुआ है. ग्वालियर के अंतिम महाराजा माधवराव सिंधिया कांग्रेस पार्टी के नेता और केन्द्रीय मंत्री रहे और उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया पिछली यूपीए सरकार में केन्द्रीय मंत्री थे. दोनों ही ग्वालियर से लोक सभा के लिए निर्वाचित हुए थे. माधवराव की बहन वसुंधरा राजे 2013 से राजस्थान की मुख्यमंत्री हैं. मध्य प्रदेश में शासन अभी भी सामंति ढांचे की जकड़ में है और समाज में इनके प्रभाव में कोई कमी नहीं आई है.

राजा ने दावा किया कि 1980 के दशक तक उनका परिवार सिंधियाओं का दाहिना हाथ था और वे लोग आज भी ग्वालियर में उतने ही रसूखदार लोग हैं. उनके लिए दलितों का विद्रोह उनके पारिवारिक जातीय शक्ति के लिए खतरा था. पुलिस ने राजा की पिस्तौल को कभी कब्जे में नहीं लिया. राजा ने मुझे गर्व के साथ बताया कि वह बंदूक अभी भी उनके पास ही है और वो “राजपूतों के सम्मान की खातिर उसे फिर चलाने को तैयार हैं.”

1997 में उत्तर प्रदेश में एक राजनीतिक विवाद के बाद बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन बसपा-बीजेपी सरकार के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन का आह्वान किया था. उत्तर प्रदेश के करीब होने की वजह से बंद की आंच ग्वालियर तक भी पहुंची. परिणाम स्वरूप बसपा के समर्थकों ने- जिनमें अधिकांश दलित थे- शहर में प्रदर्शन किया था. राजा ने दावा किया कि उनके पिता भैय्या सिंह चौहान ने 156 राउंड गोलियां आंदोलनकारियों पर चलाई थी. “मेरे पिताजी ने जो फायर किए थे उसके कारतूस आज भी रखे हैं हमारे घर में.” राजा ने कहा, “इतिहास दोहरा दिया इस वक्त हमने. पापा का काम किया.”

राजा ने बाताय कि गोली चलाने के बाद वो दो महीना अपने घर में ही छिपे रहे और अगले तीन महीने मुंबई में घूमते रहे. एक भी दारोगा उनके घर नहीं आया. “एसपी (पुलिस अधीक्षक) साहब मेरे पिता को फोन पर कहते थे कि ‘अपने बेटे को अब बुला लो, हम लोगों पर दवाब बढ़ रहा है.’ लेकिन मेरे पिता के सामने आईजी और डीआईजी- महानिरीक्षक और उप महानिरीक्षक- सब झुके हुए थे.”

क्षेत्र में परिवार के प्रभाव के अलावा राजा ने केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के साथ अपने परिवार के पुराने संबंधों को कानून से बचने की वजह बताया. उन्होंने दावा किया कि 1970 के दशक से भैय्या सिंह कैबिनेट मंत्री को जानते थे, जब कैबिनेट मंत्री जनसंघ से जुड़े थे और तोमर “थाठीपुर की सड़क में चलने वाला कोई आम आदमी” थे. राजा ने दावा किया कि एक जवान व्यक्ति के रूप में, तोमर भैय्या सिंह के आसपास रहने वाले लोगों में से एक थे. उन्होंने कहा कि ये जवान लड़के अपनी शामें पीने और चिकन खाने में बिताते थे. राजा ने कहा, “तब तोमर को देर रात अपने घर जाने की इजाजत नहीं थी, तो वह मेरे पिता के घर पर पैदल चले आते थे जहां उनको रहने की इजाजत मिल जाती थी.” राजा ने कहा कि तोमर तब कॉलेज छात्र थे और भैय्या सिंह उन्हें “मुन्ना” बुलाते थे और अक्सर उनसे कॉलेज की राजनीति की बात करते थे. राजा ने कहा कि उनको बनाने में मेरे पिता जी का हाथ रहा है. उन्होंने दावा किया कि भैय्या सिंह ने तोमर की राजनीति में पैसों से मदद की.

राजा ने कहा कि तोमर अभी भी चौहान परिवार के करीब हैं और जन्मदिन और पार्टियों में आते रहते हैं. उन्होंने कहा कि कैबिनेट मंत्री के करीब होने के बावजूद उन्होंने कभी सोशल मीडिया पर तोमर के साथ कोई तस्वीर पोस्ट नहीं की क्योंकि उनका मानना ​​था कि यह उनके लिए छोटी बात है. राजा ने कहा, “हमें पता है औकात क्या है तुम्हारी.”

विरोध प्रदर्शन का वीडियो सर्कुलेट होना शुरू होने के बाद थाटीपुर के निवासी देवाशीष जरारिया ने, जिन्होंने पहले उसी स्कूल में पढ़ाई थी जिसमें राजा ने की थी, पहले राजा की पहचान की. जरारिया के मुताबिक, चौहान का आत्मरक्षा का तर्क सही नहीं है, क्योंकि वीडियो में दोनों को प्रदर्शनकारियों पर सीधे फायरिंग करते देखा जा सकता है. जरारिया ने यह भी कहा कि पुरुष अपने घरों या महिलाओं परिवारों की रक्षा नहीं कर रहे थे, बल्कि दलितों की बस्तियों में उन्हें मारने के लिए बंदूक लेकर जा रहे थे. वीडियो में जगह का जिक्र करते हुए जरारिया ने कहा, “उनका घर कम से कम 100-200 मीटर दूर है जहां से उन्होंने पहली गोली चलाई. वो वहां क्या कर रहे थे? वो किसकी आत्मरक्षा की बात कर रहे हैं?”

क्षेत्र के दलित निवासियों का मानना ​​था कि बीजेपी सरकार ने राजा और उनके परिवार की मदद की थी, लेकिन यह सुनिश्चित नहीं था कि तोमर ने हस्तक्षेप किया था या नहीं.

चौहान और तोमर का जिक्र करते हुए, गल्ला कोठार में रहने वाले दलित राम अवतर सिंह ने कहा, “दोनों परिवारों में नगर निगम और राज्य विधानसभा में पार्षद और विधायक हैं. वो बहुत बड़ा परिवार हैं, कभी-कभी वो स्थानीय चुनावों में अपने परिवार से किसी को उतारते हैं या किसी भी ब्राह्मण या राजपूत नेता को अपना समर्थन दे देते हैं.” राजा ने मुझे बताया कि उनके परिवार ने हमेशा बीजेपी उम्मीदवार का समर्थन किया है और दावा किया है कि उनके क्षेत्र में चुनाव के लिए उतरा कोई भी विधायक या नगर परिषद उम्मीदवार उनके परिवार के समर्थन के बिना नहीं जीत सकता. राजा ने कहा, “अगर किसी को भी थाटीपुर में ब्राह्मण और ठाकुर का वोट चाहिए तो उसे गैराज में आना होता है.” गैराज का काम उनका पारिवारिक व्यापार है. उन्होंने मुझे ग्वालियर के मौजूदा विधायक माया सिंह का उदाहरण दिया, जो महिला और बाल कल्याण राज्य मंत्री हैं. फिर कहा, “हर कोई यहीं आता है.” जरारिया के मुताबिक राजा ने तोमर के साथ अपने प्रभाव और संबंध को बढ़ाचढ़ा कर बताया. जरारिया ने कहा, “तोमर इनको ठंडा कर देगा.” कांग्रेस का हिस्सा बनने के पहले इस साल के सितंबर तक जरारिया बीएसपी में थे. उन्होंने कहा, “राजा का भाई पार्षद का चुनाव लड़ रहा था और उसे हराने के लिए नरेंद्र सिंह तोमर ने ग्वालियर में दो रैलियां की और उनका भाई हार गया.” उसने मुझे बताया कि अगर तोमर ने राजा की मदद की है, तो ये “राजनीति” के कारण नहीं बल्कि “जाति” के कारण हुआ होगा. जरारिया ने कहा, “हिंसा जातीय आधिपत्य का विषय बन गई है. दलितों के दृढ़ निश्चय के साथ प्रदर्शन और उसके बाद पुलिस शिकायत से पूरे राजपूत समुदाय ने अपमानित महसूस किया.

मैंने तोमर के ऑफिस में कई बार फोन किया, लेकिन उनसे बात नहीं हो पाई. मेरे ईमेल का भी उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. थाटीपुर में हुई हत्या के आरोपी महेंद्र ने कहा तोमर से नजदीकी की वजह से राजा बचा हुआ है. महेंद्र का कहना है कि 2 अप्रैल को सिर्फ वही प्रदर्शनकारियों पर गोली नहीं चला रहा था बल्कि चौहान प्याऊ के पास के चौहान और तोमर घरों से गोलियां बरस रहीं थीं.

मैंने गल्ला कोठार और भीम नगर, जो मुख्य रूप से दलित कॉलोनियां हैं, के कई लोगों से बात की. उनकी बातें राजा और महेंद्र के दावों के विपरीत थी. मृतक राकेश के भाई मंगल टमोटिया ने कहा कि हथियार लिए हुए राजपूतों की भीड़ उनके घर और कॉलोनी तबाह करने आ रही थी. मंगल ने कहा कि वे पुलिस के साथ आए थे. उन्होंने हमारे मोहल्ले में कई चीजों को तहस-नहस कर दिया.

वहां के निवासियों ने मुझे बताया कि दूसरे कई लोग भी उस दिन घायल हुए थे. मंगल ने बताया कि आम दिनों की तरह राकेश लबर अड्डे पर बैठा किसी ठेकेदार का इंतजार कर रहा था, लेकिन जैसे ही दंगे शुरू हुए, पुलिस और राजपूतों की भीड़ ने कॉलोनी तक उनका पीछा किया. राकेश को एक गोली लगी थी और उसकी मौके पर ही मौत हो गई.

दीपक जाटव, लेबर अड्डे से लगभग 500 मीटर की दूरी पर गल्ला कोठार में अपने परिवार के साथ रहते थे. इसी जगह पर राजा को हथियार के साथ देखा गया था. दीपक के पिता मोहन जाटव ने बताया कि वे और दीपक 2 अप्रैल को अपने घर पर बैठे थे. तभी राजा और महेंद्र बंदूक लहराते और गोलियां चलाते हुए कॉलोनी में घुसे.  उन्होंने बताया कि उनके बेटे को छाती, बाजू और पेट की साइड में गोली लगी थी. उनके घर के बाहर बंधे एक बैल को भी गोली मारी गई, जिसकी मौत हो गई. परिवार के कई दूसरे लोगों को भी चोटें आई हैं. मोहन ने कहा, ‘किसी के पैर में गोली लगी है, किसी के जांघ में गोली लगी है.’ मेरे भतीजे को गोली लगी. मेरी एक पोती है, उसको भी गोली लगी है.

राकेश के भाई मंगल ने मुझे बताया कि पोस्ट-मॉर्टम के वक्त वे मौजूद थे. उनके भाई के शरीर पर कोई बाहरी चोट नहीं लगी थी. उन्होंने कहा, ‘ये 100 प्रतिशत मालूम है. मैंने अपने भाई को उठाके देखा है.’ उन्होंने बताया कि पुलिस और सरकारी एजेंसियां बोल रही है कि उनके शरीर से कोई गोली नहीं मिली थी. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में लिखा गया है कि गोली दायीं तरफ से उनकी कॉलरबोन में घुसी और छाती में से होते हुए दायीं बाजू में से बाहर निकल गई.

मृतकों के परिवार से मिलने के बाद मैं थाटीपुर पुलिस स्टेशन के दीवान रणवीर सिंह से मिला. पुलिस इंस्पेक्टर की अनुपस्थिति में रणवीर सिंह स्टेशन इंचार्ज हैं. सिंह ने मुझे बताया कि 2 अप्रैल के बाद तीन महीने में थाने का पूरा स्टाफ बदला गया है. इस मामले में नए जांच अधिकारी छगन सिंह बघेल को नियुक्त किया गया है. बघेल ने मुझे बताया कि जांच जारी है. उन्होंने बताया कि अगर कोर्ट के आदेश होंगे तो वे केवल राजा के हथियार जब्त करेंगे. बघेल ने कहा कि अभी हमारे पास कुछ गवाह हैं, बाकी हम ट्रायल के दौरान देखेंगे. जब मैंने पूछा कि क्या मौके से कोई गोली के कारतूस  बरामद हुए हैं और उन्हें फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है तो बघेल ने कोई जवाब नहीं दिया. जब मैनें उनसे राजनीतिक दबाव के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि ऐसा कोई दबाव नहीं है. उन्होंने कहा कि पुलिस ने हाई कोर्ट के सामने राजा की जमानत की अपील की है.

मई में ग्वालियर पुलिस अधीक्षक का पद संभालने वाले नवनीत भसीन ने भी कहा कि उन पर कोई राजनीतिक दबाव नहीं है. भसीन ने कहा कि अगर कोर्ट कहेगा तो बघेल राजा के हथियार जब्त करेंगे. साथ ही उन्होंने राजा के पिता और नरेंद्र सिंह तोमर की तरफ से किसी भी प्रकार के दबाव से इनकार किया. भसीन ने कहा, ‘नाम राजा रहने से कुछ नहीं होता. कुछ भी कह सकता है, उसकी मर्जी.’

जब उनसे पूछा गया कि राजा पांच महीने तक बाहर कैसे रहा. इस पर भसीन ने राजा का बचाव करते हुए कहा कि इस मामले में कई बेगुनाह लोगों का नाम आया है. क्या यह हमारा काम नहीं है कि हम इस बात की जांच करें कि कौन दोषी है और कौन नहीं. क्या हम सबको गिरफ्तार कर लें? क्या कानून ऐसे काम करता है?

ग्वालियर रेंज के आईजी अंशुमान यादव ने राजा के दावे को लेकर कहा कि वह कुछ भी कह रहा है. हम पर कोई दबाव नहीं है. ना ही उसका परिवार मेरे संपर्क में है. जब मैंने उनसे पूछा कि राजा अब तक गिरफ्तार क्यों नहीं हुआ तो उन्होंने कहा कि वह फरार था.

पुलिस के बारे में बात करते हुए राजा ने कहा कि ‘डिपार्टमेंट से बहुत मदद मिली.’ महेंद्र सिंह ने कहा, ‘अपने साथ कोई बदसलूकी नहीं हुई है, ना ही थाने में ना ही कोर्ट में और ना ही जेल में.’ दोनों ने कहा कि उन्हें पुलिस, कोर्ट और राज्य सरकार से मदद मिली है क्योंकि उनकी नजर में हमने कुछ गलत नहीं किया.

राजा ने बताया कि न्यायिक अधिकारियों ने भी उसकी मदद की थी. उसने कहा कि उसके वकील प्रशांत शर्मा ने उससे फीस नहीं ली. जिस दिन उसे जमानत मिली, स्थानीय बार एसोसिएशन ने मिठाई बांटी थी. उसने कहा, ‘ट्रायल कोर्ट के जज बीपी शर्मा भी बुहत खुश थे.’ राजा ने कहा कि उन्होंने पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा कि अगर वे मुझे हिरासत में रखना या रिमांड में लेना चाहते हैं तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट जाना होगा. मैंने शर्मा से फोन पर पूछा कि क्या राजपूत होने की वजह से कोर्ट ने राजा का पक्ष लिया तो शर्मा ने कहा कि मेरा तबादला हो गया है और इस बारे में मैं कुछ नहीं बोल सकता.

दलित कार्यकर्ता सुरेश माने, जो सुप्रीम कोर्ट से संभाजी भिंडे की गिरफ्तारी की मांग कर रहे हैं, ने कहा कि तीन जजों की बेंच के लिए एससी/एसटी एक्ट के आरोप को रद्द करना सामान्य नहीं है वह भी तब जब उन्हीं आरोपों पर ट्रायल और हाई कोर्ट जमानत याचिका को खारिज कर चुके हैं. यह बिल्कुल भी सामान्य नहीं है.

भिंड, जहां एक और दलित प्रदर्शनकारी की मौत हुई थी और ग्वालियर राज्य की चंबल और ग्वालियर एडमिनिस्ट्रेटिव डिवीजन का हिस्सा है. दोनों डिविजन में एससी लोगों की तादाद काफी ज्यादा है. दोनों डिवीजन के आठ जिलों में एससी लोगों की तादाद 20-25 प्रतिशत है. मध्यप्रदेश में बाकी जगहों पर बीजेपी और कांग्रेस के बीच चुनावी मुकाबला होता है लेकिन इन आठ जिलों में मुकाबला बसपा बनाम अन्य का होता है. इससे पहले बसपा इन जगहों पर ऊंची जाति के उम्मीदवार उतारकर राजपूत और ब्राह्मणों के वोट पाती थी, लेकिन 2 अप्रैल के विरोध प्रदर्शन के बाद दलित अनिश्चिंत हैं कि वे किसे वोट करें क्योंकि बसपा ने इन सीटों पर ब्राह्मण और राजपूत उम्मीदवार उतारे हैं. समुदाय के कई लोग बसपा से इसलिए भी नाराज हैं क्योंकि पार्टी ने भारत बंद को खास समर्थन नहीं दिया था. दूसरे सभी समुदाय बीजेपी को वापस सत्ता में लाने के लिए एकजुट दिख रहे हैं. जरारिया ने कहा कि बसपा द्वारा भारत बंद पर स्टैंड नहीं लेने के काऱण उन्होंने कांग्रेस ज्वाइन की है.

जब मैं जाने के लिए उठा तो राजा ने अपने आदमी से मुझे बाइक पर छोड़ कर आने को कहा. बाइक पर सफर के दौरान पता चला कि राजा का आदमी भी दलितों के खिलाफ पूर्वाग्रहों और नफरत से भरा है. उस आदमी ने मुझे अपना नाम विजय सिंह चौहान बताया और कहा कि उसे मोनू भी बुलाया जाता है. मेरे बिना पूछने के ही उसने बताया कि सरकारी नौकरियों में दलितों के लिए आरक्षण, एससी/एसटी एक्ट से भी ‘खतरनाक’ है. “आरक्षण ने ब्राह्मणों को बर्बाद कर दिया है. पहली गोली मादर$&$& उस भीमराव (भीमराव अंबेडकर) पर चलनी चाहिए.” मोनू ने कहा कि भारत को आजादी मिलते ही पहला काम उसकी (भीमराव अंबेडकर) छाती पर गोली मारने का करना चाहिए था. “यह क्या है कि कोई चमार हमारा संविधान लिख रहा है? क्या चमार भगवान है? बहन$&$& चमार लोग.” आगे उसने कहा कि कई ठाकुर और पंडित है. “पंडितों को सबसे ज्ञानी लोग कहा जाता है. वे ठाकुरों से भी ज्यादा पढ़े-लिखे होते हैं. इसलिए हमारा संविधान लिखने वाला एक ब्राह्मण होना चाहिए था. तब हमें भी कुछ फायदा मिलता.” मोनू कहता है, “मैं होता उस जमाने में तो मैं भीमराव  की छाती में गोली मारता .”

भाजपा के सवर्ण वोट में सेंधमारी करेंगे राजा भैया

राजा भैया को कुछ साल पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति से ‘कुंडा का गुंडा’ का नाम मिला था. 1993 में 25 साल की अवस्था में निर्दलीय विधयक बने राजा भैया तब से लगातार चुनाव जीतते आ रहे हैं. अब वह अपनी पार्टी बनाकर दावा कर रहे हैं कि ‘कुंडा से प्रदेश की कुंडली’ बदलेगी. राजा भैया की पार्टी को लेकर ऊंची जातियों में एक उत्साह का माहौल है. इसे वोट में बदल कर राजा भैया भाजपा के सवर्ण वोट में सेंधमारी करेंगे.

25 सालों के राजनीतिक जीवन के बाद प्रतापगढ़ की कुंडा विधानसभा से विधायक बन रहे रघुराज प्रताप सिंह अब अपनी पार्टी ‘जनसत्ता’ का गठन कर चुके हैं. आने वाले चुनाव में वह पहली बार अपने दल से चुनाव लड़ेगे. रघुराज प्रताप सिंह को उत्तर प्रदेश की राजनीति में राजा भैया के नाम से जाना जाता है. वह भाजपा और सपा के सहयोग से उत्तर प्रदेश कैबिनेट में मंत्री भी रहे हैं.

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राजा भैया के खिलाफ मायावती ने पोटा एक्ट के तहत कार्यवाई की थी जिसके कारण उनको लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा था. दलित सवर्ण खेमेबंदी में राजा भैया को सवर्ण राजनीति का चेहरा माना जाता है. उत्तर प्रदेश की राजधनी लखनऊ में राजा भैया ने अपनी पहली रैली में बड़ी भीड जुटाकर अपनी ताकत का अहसास करा दिया है.

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राजा भैया ने अपनी पार्टी के रुख को साफ करते वही मुद्दे उठाये हैं जिनकी मांग सालों से सवर्ण करते आये हैं. क्रीमीलेयर का आरक्षण सुविध न देने का मुद्दा सबसे प्रमुख है. इसके साथ ही साथ यह मांग भी की गई कि हत्या और बलात्कार के मामले में सवर्णो को भी मुआवजा दिया जाये. दलित एक्ट में बिना जांच के किसी को जेल न भेजा जाये. शहीदों के परिवारों को एक करोड रुपया दिया जाये. सामान्य तौर पर देखें तो यह सभी मांग सत्ता में आने से पहले भाजपा भी करती रही है. सत्ता में आने के बाद भाजपा ने इन मुद्दों को दरकिनार कर दिया. दलित एक्ट को लेकर भाजपा ने जिस तरह का कदम उठाया उससे ऊंची जातियां भाजपा से नाराज हो गई हैं.

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राजा भैया अब इन ऊंची जातियों को एकजुट करके अपनी राजनीति करना चाहते हैं. ऐसे में भाजपा से नाराज लोगों खासकर क्षत्रिय बिरादरी को राजा भैया के रूप में एक विकल्प मिल गया है. राजा भैया कहते हैं ‘मुझे राजनीति जीवन में हर बिरादरी का सहयोग मिलता रहा है. अन्याय के खिलाफ मैं लड़ता रहा हूं. मेरी अपनी एक छवि है जिसका लाभ मुझे मिलेगा.’ राजा भैया ने इसके साथ ही साथ किसानों के मुद्दों को भी उठाया और कहा कि किसानों को उनकी उपज का सही लाभ दिये बिना देश का भला नहीं हो सकता’.

ट्रांस फैट बिगाड़ रहा सेहत

दीपा को बाहर बाजार से चटपटा खाना पसंद था. वीकैंड पर तो उस का डिनर सड़कछाप स्टौलों पर बर्गर, चाउमीन वगैरह खाने में बीतता था. इस वजह से वह बीमार रहने लगी. डाक्टर को दिखाया तो पता चला कि उस को ट्रांस फैट नुकसान पहुंचा रहा है.

फैट एक ऐसा तत्त्व है जो शरीर में जा कर पाचनतंत्र के नियंत्रण में नहीं आता यानी पाचनतंत्र उस खाने को पचा नहीं पाता. नतीजतन, हाजमा खराब हो जाता है और शरीर अस्वस्थ हो जाता है. यहां तक कि खून के थक्के जमना या गाढ़ापन आने का अंदेशा बना रहता है. इस वजह से दिल से संबंधित तमाम बीमारियां पनप जाती हैं.
एक तरफ जहां डाक्टर ट्रांस फैट को सब से बड़ा खतरा मानते हैं वहीं केंद्र सरकार भी इसे ले कर काफी गंभीर है. यही वजह है कि सरकार इसे ले कर देशभर में एक मुहिम चलाएगी. भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण भी इसे ले कर मुहिम शुरू करेगा.

ट्रांस फैट को ले कर डाक्टर भी मानते हैं कि इस की मात्रा ज्यादा होने से तमाम नौजवान दिल के मरीज बन रहे हैं वहीं बाजार में बिकने वाले चिप्स या बिसकुट से ले कर दूसरी तमाम खाने की चीजों में ट्रांस फैट होने से लोगों को खून कीधमनियों में ब्लौकेज हो जाती है और इस के मरीज को हार्ट सर्जरी कराने अस्पताल तक पहुंच जाते हैं.

दिल्ली व एनसीआर में बाजार की चाट, छोलेभठूरे, बै्रडबटर जैसी खाने की तैलीय चीजों का सेवन करने का शौक बढ़ा है जबकि ज्यादातर दुकानों में इन्हें ट्रांस फैट वाले तेल में पकाया जाता है. अकसर बर्गर और चाइनीज खाने से बटर में फ्राई के साथ परोसा जाता है, लेकिन दुकानों पर मौजूद बटर यानी मक्खन में काफी ज्यादा ट्रांस फैट होता है.

सरकार खाने की चीजों में ट्रांस फैट की मात्रा कम करने पर जोर दे रही है जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ पूरी दुनिया से साल 2025 तक ट्रांस फैट वाला भोजन न खाने की अपील कर चुका है. सरकार भी साल 2022 तक खाने की चीजों में ट्रांस फैट खत्म करने पर जोर दे रही है.

खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण के नए मानकों के अनुसार, यह मात्रा प्रति 100 ग्राम या मिलीलिटर पर 0.2 ग्राम या मिलीलिटर हो सकती है. अभी सभी उत्पादों में यह तकरीबन 5 फीसदी तय है वहीं दूसरी ओर तेलों व प्रसंस्कृत खाने की चीजों में ट्रांस फैट की मात्रा को ले कर सरकार कड़े नियम बनाने जा रही है.
हाई ब्लडप्रेशर और ट्रांस फैट नियंत्रण पर एक कार्यक्रम में खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण की तरफ से बताया गया कि ट्रांस फैट को ले कर देश में पहले नियम नहीं थे. साल 2013 में पहली बार नियम बनाए गए और मात्रा 10 फीसदी तय की गई वहीं साल 2015 में इसे घटा कर 5 फीसदी तय किया गया.

इस से पहले साल 2009 में सैंटर फौर साइंस ऐंड ऐनवायरमैंट ने विभिन्न वनस्पति तेलों की जांच कर दावा किया था कि हमारे यहां तेलों में ट्रांस फैट की मात्रा विदेशों में अपनाए जा रहे 2 फीसदी के मानकों से कई गुना तक ज्यादा है.
खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने साल 2022 तक देश में ट्रांस फैट को 2 फीसदी से भी नीचे लाने का लक्ष्य रखा है.

प्राधिकरण का यह भी कहना है कि ट्रांस फैट की कोई तय समयसीमा नहीं है. लेकिन खाने की चीजों के पैकेट पर ट्रांस फैट की लैबङ्क्षलग जरूरी करने पर जोर दिया. इस के तहत खाने के पैकेट पर फैट और ट्रांस फैट की मात्रा को अलगअलग लिखा जाना जरूरी बताया.

खाने से पहले आप भी सचेत हो जाइए कि बाहर का बिलकुल नहीं खाना अन्यथा बीमारी को दावत देना है.

सुशील कुमार नहीं बन पाए ए ग्रेड पहलवान

शुक्रवार, 30 नवंबर, 2018 का दिन कुश्ती जगत के लिए ऐतिहासिक माना जाएगा, क्योंकि इसी दिन भारतीय कुश्ती महासंघ ने अपने पहलवानों के लिए अनुबंध प्रणाली की शुरुआत की. इस के तहत खिलाड़ियों को उन के प्रदर्शन के अनुसार ग्रेड में बांधा गया है और जो खिलाड़ी जिस ग्रेड में रहेगा उसे उसी के अनुसार वित्तीय राशि दी जाएगी.
याद रहे कि भारतीय कुश्ती महासंघ भारतीय ओलिंपिक संघ द्वारा मान्यता प्राप्त एकमात्र ऐसा राष्ट्रीय खेल महासंघ है जिस ने अपने खिलाड़ियों के लिए इस तरह के अनुबंध की पेशकश की है और ऐसा करने वाली वह भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के बाद दूसरी खेल संस्था बन गई है.
इस ग्रेड प्रणाली में पहलवान बजरंग पूनिया, विनेश फोगाट और पूजा ढांडा को 30 लाख रुपए की राशि के ग्रेड ए अनुबंध में शामिल किया गया है. बजरंग पूनिया और विनेश फोगाट ने इस साल कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीते थे. यह ग्रेड मिलना उन की इसी जीत का सुखद परिणाम है, जबकि पूजा ढांडा ने हाल ही में वर्ल्ड चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता था और ऐसा करने वाली वे चौथी भारतीय महिला बन गई थीं.

चूक गए सुशील

2 बार के ओलिंपिक मेडलिस्ट सुशील कुमार और रियो ओलिंपिक की कांस्य पदक विजेता साक्षी मलिक ग्रेड ए में जगह नहीं बना सके. इस की खास वजह यह है कि ये दोनों पहलवान पिछले कुछ समय से अपनी फॉर्म से जूझ रहे हैं, लिहाजा इन दोनों को ग्रेड बी में रखा गया है जिस में इन्हें एक साल में 20 लाख रुपए की वित्तीय मदद दी जाएगी.
इस ग्रेड प्रणाली की एक खासीयत यह भी है कि एक साल के बाद खिलाड़ियों के अनुबंधों की समीक्षा की जाएगी.
इस बारे में भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह ने बताया, ‘समीक्षा के बाद पहलवान ग्रेड में ऊपरनीचे हो सकते हैं. सुशील कुमार ने अपने 2 ओलिंपिक पदकों से देश में कुश्ती खेल का चेहरा ही बदल दिया है. वे अभी टूर्नामेंटों में इतना ज्यादा हिस्सा नहीं ले रहे हैं, यह जानते हुए भी उन्हें सूची में शामिल किया गया है. साक्षी मलिक का प्रदर्शन भी उतारचढ़ाव भरा रहा है लेकिन पहलवान अपने अच्छे प्रदर्शन से अगले ग्रेड में ऊपर चढ़ सकते हैं.’

और किस को क्या मिलेगा

ग्रेड ए में 30 लाख, ग्रेड बी में 20 लाख तो ग्रेड सी में खिलाड़ियों को 10 लाख रुपए की मदद मिलेगी. ग्रेड सी में संदीप तोमर, साजन भानवाल, विनोद कुमार ओमप्रकाश, रितु फोगाट, सुमित मलिक, दीपक पूनिया और दिव्या काकरान शामिल हैं.
ग्रेड डी में 5 लाख रुपए की मदद मिलेगी. इस में राहुल अवारे, नवीन, उत्कर्ष काले, सचिन राठी, विजय, रवि कुमार, सिमरन, मानसी और अंशु मलिक शामिल हैं, जबकि ग्रेड ई में नवजोत कौर, किरन, हरप्रीत सिंह, जितेंद्र कुमार को शामिल किया गया है. इस ग्रेड में मदद राशि 3 लाख रुपए होगी.

जूनियर वर्ग के भी 30 पहलवान

भारतीय कुश्ती महासंघ जमीनी स्तर पर 120 लड़के और लड़कियों को भी आर्थिक मदद देगा. ग्रुप एफ में अंडर-23 राष्ट्रीय स्तर के स्वर्ण पदक विजेता खिलाड़ियों को शामिल किया है. उन्हें 1.2 लाख रुपए की आर्थिक मदद दी जाएगी. ग्रुप जी (जूनियर) में 90 हजार रुपए, ग्रुप एच (कैडेट) में 60 हजार रुपए और ग्रुप आई (अंडर-15) में 36 हजार रुपए दिए जाएंगे. अगर इन ग्रुप के खिलाड़ी एशिया या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतते हैं तो वे अगले ग्रेड में अपग्रेड हो जाएंगे.
भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह ने कहा, ‘देश के 144 पहलवानों को इस का लाभ मिलेगा. उन्हें अलगअलग चरण में फंड उपलब्ध कराए जाएंगे.’
भारतीय कुश्ती महासंघ के सचिव विनोद तोमर ने बताया, ‘पहलवानों को यह राशि 3-3 महीने में दी जाएगी. खिलाड़ियों को यह बताने की जरूरत नहीं है कि उन्होंने यह पैसा कहां खर्च किया.’

खिलाड़ी हुए खुश

भारत की स्टार पहलवान विनेश फोगाट ने भारतीय कुश्ती महासंघ के इस कदम की प्रशंसा करते हुए कहा, ‘जूनियर पहलवानों के लिए यह अच्छा है. इस से खिलाड़ी प्रेरित होंगे जिस से पदक, शोहरत आएगी और सहयोग मिलेगा. अब बजट भी बढ़ेगा और हम इसे ट्रेनिंग और टूर्नामेंट के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं. हम फंड के बारे में सोचे बिना अब बेहतर योजना बना सकते हैं.’
साक्षी मलिक ने कहा, ‘मैं शीर्ष ग्रेड ए में आने की उम्मीद कर रही थी लेकिन एक बार फिर मैं मजबूत प्रदर्शन करूंगी जिस से मेरे पास ग्रेड ए में जाने का अच्छा मौका होगा.’
कुश्ती को भारत में और ज्यादा बेहतर खेल बनाने के लिए भारतीय कुश्ती महासंघ का यह अच्छा कदम साबित हो सकता है बशर्ते खिलाड़ी मिलने वाली इस वित्तीय मदद का अपने खेल को और ज्यादा धारदार बनाने में इस्तेमाल करें.

क्या ऐप्स पैरेंटिंग को स्मार्ट और बच्चों को सेफ करते हैं?

आज जब न्यूक्लियर फैमिली का दौर है और उसमें भी पतिपत्नी कामकाजी रिवाज में घर छोड़ने पर मजबूर हैं, तब बच्चों को कौन संभाले यह सवाल दिनोंदिन बड़ा होता जा रहा है. इतना बड़ा कि पतिपत्नी के बीच टकराव और अलगाव के हालत भी पैदा कर रहा है. इसके अलावा बच्चों की सुरक्षा भी बड़ा मसला है. उन्हें सुरक्षित माहौल देते हुए खेलकूद के लिए बाहर ले जाना. ग्रुप में शामिल करना, डेकेयर या किसी करीबी की देखरेख में छोड़ना जैसे काम भी करने पड़ते हैं. लेकिन हर मांबाप चाहते हैं कि वे कहीं भी हो पर उन पर नजर रख सकें, उनकी लोकेशन ट्रैक कर सकें. यहां कुछ ऐप्स आती हैं जो स्मार्ट पैरेंटिंग का दावा करने के साथ अपनी ऐप्स की तकनीकी दक्षता के बल पर बच्चों की सुरक्षा का वादा करती हैं. यह सही है कि आप बच्चों की फोन गतिविधि की निगरानी कर उनके लोकेशन, ट्रैक भी कर सकते हैं.

लेकिन क्या ऐप्स इतने कारगर हैं, लेट्स फाइंड आउट..

स्टडी मोनिटर- इसे छात्र, माता-पिता और शिक्षकों द्वारा अपने अपने फोन्स में डाउनलोड किया जा सकता है. प्लस पौइंट यह है कि इसे छात्र की उपस्थिति को ट्रैक करने और उनकी निगरानी करने के लिए किया जाता है ताकि वे छात्रों को बेहतर शिक्षा प्रदान कर सकें. ऐसी सिंपल ऐक्टिविटीज़ होती हैं, जो रोजाना के अनुभवों में काम आनेवाले मैथ्स और शैक्षिक स्किल को बढ़ाती हैं. चूंकि ऐप विज़ुअलाइजेशन के माध्यम से सीखने के काम भी आती है लिहाजा यह पढने-लिखने के विकल्प भी देती है. बशर्ते सतर्कता से इस के फीचर्स इस्तेमाल किये जाएं.

केसपरस्‍काई सेफ किड्स- अगर आपको लगता है कि बच्चे स्मार्टफोन की वजह से भटक रहे हैं तो केसपरस्‍काई ऑल-इन-वन ट्रैकिंग और कंट्रोल डिवाइस प्रोवाइड करती है. आप बच्चों के फोन पर ऐप इंस्टॉल करें. इसके बाद जिन ऐप्स और वेबसाइट को उनके लिए एक्सेस बंद करना चाहते हैं, कर सकते हैं. वो भी टाइम ड्यूरेशन के साथ. इतना ही नहीं अगर आपका शरारती बच्चा प्रतिबंधित या क्रॉस डिवाइस उपयोग सीमा तक पहुंचने का प्रयास करता है, तो आपको  अलर्ट मिल जाएगा. लेकिन इसके लिए आपको $ 16.99 वार्षिक सदस्यता यानी 10 हजार के आसपास खर्चने होंगे. इसमें लोकेशन ट्रैकिंग, कॉल और एसएमएस लॉग, आपके ईमेल और फोन पर अलर्ट, और इंटरनेट उपयोग आदि शामिल है.

वीडिओ मोंस्टर- यह ऐप आपको उन वीडियो की एक सूची बनाने की अनुमति देता है जो आपके बच्चों के लिए सुरक्षित या शिक्षा से संबंधित हैं. इस तरह माता-पिता अपने बच्चों द्वारा अश्लील, हिंसक वीडियो देखने में समय बर्बाद करने से रोक सकते हैं. ऐप में वीडियो से जुड़ी ऐसी सेटिंग्स हैं जो हर आयु वर्ग के बच्चों के लिए ही फिल्टर मुहैया कराती है.

अलार्म डाट कौम- यह इप्स बच्चों को गहर में सेफ एनवायरमेंट देने का दावा करती है. हालांकि इस तरह का दावा करने वाली कई ईपीएस हैं पर इसकी खासियत यह है कि ऐप के माध्यम से, आप अपने सभी स्मार्ट डिवाइस से कनेक्ट कर कहीं पर बैठे हुए घर के विजुल्स देख सकते हैं. बिलकुल लाइव फीड के साथ.

आई रिवार्ड चार्ट- यह थोड़ी अलहदा एप है. इसे केवल माता-पिता के लिए बनाया गया है. इसमें पैरेंट्स बच्चों के लिए एक टेबल बना सकते हैं जिसमें वे बच्चों के होमवर्क करने के बाद सप्ताह के अंत में उनकी स्टडी परफोर्मेंस देखकर 2 घंटे के लिए टीवी देखने, 1 घंटे के लिए आउटडोर खेलने जैसे रिवार्ड दे सकते हैं. इस से उनको प्रोत्साहन मिलता है और आप को उनका प्यार.

ट्रू मोशन फैमिली सेफ ड्राविंग- इस एप की जरूरत उन्हें पड़ती हैं जिनके बच्चे ड्राइविंग को लेकर लापरवाह होते हैं. बच्चों की गैर जिम्मेदार ड्राइविंग को ट्रूमोशन की मदद से ट्रैक कर सकते हैं. इसे बच्चे के फोन पर इंस्टाल करें और यह औटोमेटिक आपके बच्चे की सभी ड्राइविंग आदतों को ट्रैक करेगा और उनके सभी को रेट भी करेगा. रियलटाइम लोकेशन के साथ आप आप सही और गलत ट्रैक का औप्शन भी देख सकते हैं. ओवर स्पीड, अचानक ब्रेक, ड्राविंग के बीच फोन का उपयोग जैसी एक्टिविटीज के सारे डाटा रिकौर्ड करती है यह ऐप्स. पैरेंट्स अपने बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट, लोकेशन, यहां तक कि ड्राइविंग के समय उनकी कितनी स्पीड थी, यह मौनिटर कर सकते हैं. हालांकि तकनीके तौर पर यह थोड़ी जटिल है लेकिन एक बार समझ गये तो इस्तमाल में आसान हो जाती है.

लाइफ 360 फैमिली लोकेटर- इसे जरिए भी बच्चे की लोकेशन ट्रैक करने के अलावा पूरे परिवार को एक प्लेटफोर्म पर जोड़ा जा सकता है. यह उनके रियम टाइम लोकेशन का रिकार्ड भी रखती है. इसमें चैट का औप्शन भी है. कुछ फीचर तो फ्री हैं लेकिन सारे औप्शन का लाभ लेने के लिए प्रीमियम वर्जन लेना पड़ता है और उसके लिए 50 डौलर खर्चने पड़ते हैं. इसमें इमरजेंसी में हेल्‍प मांगने का फीचर प्रभावी है.

फैमिली ट्रैकर- यह भी लाइफ 360 फैमिली लोकेटर  की तर्ज पर काम करती है और दोनों में बिल्ट-इन मैसेजिंग सिस्टम लगा हुआ है जो टेक्स्ट मैसेजिंग से अलग है, ये आपको अपनी फैमली से कनेक्‍ट रखता है.

कितने कारगर है ये ऐप्स ?

इन सभी ऐप्स के साथ अच्छी बात यह है कि ये जो दावे करती हैं वो पूरा करती हैं लेकिन अमेरिका के पैरेंट्स तो इन ऐप्स को इफरात में यूज करते हैं पर इंडियन पैरेट्स को इनका इस्तेमाल पेंचीदा लगेगा. ऐसा इसलिए क्योंकि इन्हें इंस्टाल करने से लेकर इन्हें प्रीमियम पैक के भुगतान तक कई तकनीकी स्टेप्स से गुजरना पड़ता और यह काफी उलझन भरा लग सकता है इंडियन पैरेंट्स को. और केसपरस्‍काई सेफ किड्स लाइफ 360 फैमिली लोकेटर को छोड़कर बाकी के लिए एब ढीली करनी पड़ती है. दूसरा अडंगा यह भी है कि इन सारी ऐप्स के लिए घर में पैरेंट्स के साथ साथ बच्चों के पास भी इस तरह के ऐप्स को सपोर्ट करने वाली स्मार्ट डिवाइस विद इंटरनेट कनेक्शन के होना चाहिए. और यह हर पैरेंट्स के साथ मुनासिब नहीं है. तीसरी रुकावट यह भी है बच्चे इन ऐप्स की सेक्योरिटी सेटिंग्स में जाकर छेड़छाड़ कर सकते हैं जिसका पता कई बार पैरेंट्स नहीं लगा पाते. ये ऐप्स समय समय पर अपडेट्स भी मागती हैं. इस लिहाज से यह कारगर तो हैं लेकिन उतनी नहीं जितनी प्रचारित की जाती हैं.

आजकल के बच्चे बहुत स्मार्ट हैं. उन्हें सिर्फ इन ऐप्स के जरिये नहीं संभाला जा सकता है. एक तरफ हम बच्चों को तकनीक की लत से दूर रखना चाहते हैं वहीँ दूसरी और तकनीकी ऐप्स की मदद से उन्हें ग्रो करना चाहते हैं. यह एक दुविधाजनक हालत है. ऐसे में आप इन ऐप्स के भरोसे न बैठे बल्कि उनकी स्मार्टनेस को शार्प करने के लिए खुद कुछ समय निकालें. अपना व्यवहार वैसा रखें जिसे सीखकर बच्चे भी सजग और सौम्य बनें. वे पैरेंट्स को जैसा करते देखते हैं, वे भी वैसा ही करते हैं. यदि पैरेंट्स टेक्नो एडिक्ट होंगे, तो बच्चे भी टेक्नो एडिक्ट ही बनेंगे उन्हें किताबो और पत्रिकाओं से जोडें. जहां वे अपने समय का सदुपयोग करना भी सीखें और तार्किक जानकारी भी हासिल कर अपना भविष्य सुरक्षित करें.

स्किन को हेल्दी बनाये फेस पैक

साफ सुथरी और चमकदार स्किन के लिये यह जरूरी है कि स्किन केयर की तरफ अच्छी तरह से ध्यान दिया जाय. इसके लिये लोग बहुत तरह के उपाय करते रहते हैं. इसमें ढेर सारा पैसा भी खर्च हो जाता है. इसके बाद भी मनचाही, स्वस्थ्य और सुदंर स्किन नहीं मिल पाती. अगर आप अपनी स्किन में ग्लो चाहते हैं तो स्किन की उचित तरीके से मसाज और सपफाई करनी चाहिये. फेस पैक इसमें बहुत ही अहम रोल अदा कर सकते हैं. फेसपैक के प्रयोग से स्किन में चमक और ताजगी पैदा हो जाती है. स्किन जवां और सुंदर नजर आने लगती है.

जावेद हबीब सिग्नेचर सैलून लखनउ की शमा सचदेवा कहती हैं सबसे ज्यादा परेशानी आयली स्किन को लेकर होती है. आयली स्किन के प्रभाव से वातावरण में फैले जीवाणु स्किन पर जम जाते हैं और उसको नुकसान पहुंचाते हैं. आयली स्किन की वजह से स्किन पर छोटे छोटे दाने और मुहांसें भी हो जाते हैं. इसलिये जिन लोगों की स्किन आयली होती है उनको बहुत ज्यादा केयर करनी होती है.

आयली स्किन की केयर के लिये उपाय

टोमैटो फेस पैक : टोमैटो से बना फेस पैक इसमें बहुत ही कारगर है. टोमैटो फेस पैक बनाने के लिये एक टमाटर का गूदा निकाल लें. इसमें नीबू का थोडा सा रस मिला लें. टमाटर और नीबू के रस से बने इस पेस्ट को पूरे फेस पर लगाये. इससे स्किन का एक्ट्रा आयल खत्म हो जाता है.

मुल्तानी मिटटी में गुलाब जल फेस पैक : आयली स्किन के लिये मुल्तानी मिटटी में गुलाब जल को मिलाकर फेस पैक तैयार किया जा सकता है. यह पैक भी त्वचा को राहत देता है.

स्टीम : अगर 15 दिन में एक बार स्टीम ली जाये तो भी आयली स्किन की परेशानी को कम किया जा सकता है.

नार्मल स्किन की केयर के लिये उपाय

स्किन केयर की जरूरत उन लोगो को भी होती है जिनकी स्किन नार्मल होती है. नार्मल स्किन की देखभाल करना कोई बहुत परेशानी का विषय नही होता है. नार्मल स्किन वालों को केवल धूल मिटटी से स्किन को बचाना होता है. यह कोशिश भी करनी होती है कि स्किन पर ब्लैकहेड्स न हो. इसके लिये त्वचा की क्लीजिंक करते रहने की जरूरत होती है.

हल्दी का पैक : नार्मल स्किन की केयर के लिये हल्दी का पैक बहुत ही लाभदायक होता है. एक चम्मच हल्दी पाउडर में एक चम्मच नीबू का रस मिलाकर पेस्ट तैयार कर लें. इसको स्किन पर लगाये और 10 मिनट के बाद इसको साफ कर दें. इससे स्किन में ग्लो दिखने लगेगा.

नार्मल स्किन की सफाई कच्चे दूध से : नार्मल स्किन की सफाई कच्चे दूध से की जाती है. इसके लिये साफ रूई को कच्चे दूध में डिप करें. स्किन पर लगायें. कुछ देर दूध को स्किन पर लगा रहने दें. बाद में साफ पानी से स्किन को साफ कर दे.

खीरा मास्क : खीरा मास्क भी स्किन को बहुत लाभ पहुंचाता है. आधे कप कसे हुये खीरे को एक अंडे की सपफेदी और 2 चम्मच मिल्क पाउडर में मिलाकर पेस्ट बना ले. 20 मिनट तक इसको चेहरे पर लगा रहने दे. पेस्ट को गुनगुने पानी से साफ करे. ठंडे पानी से भीगे हुये तौलिये से इसको पोछ दें. चेहरा खिलाखिला नजर आने लगेगा.

हनी मास्क : मुल्तानी मिटटी, शहद, गुलाब जल और संतरे के रस से बने पेस्ट को हनी मास्क कहते है. इसको चेहरे पर लगा रहने दें. 20 मिनट के बाद इसको धो दें. स्किन ग्लो करने लगेगी. इस तरह के उपाय करके स्किन को सुंदर बनाया जा सकता है.

अजवाइनी पनीर टिक्का

सामग्री

– 200 ग्राम पनीर

– 3 बड़े चम्मच हंग कर्ड

– 1 छोटा चम्मच अदरक और लहसुन का पेस्ट

– 1-1 चम्मच हलदी, लालमिर्च व धनिया पाउडर

– 1 बड़ा चम्मच गरममसाला

– 2 छोटे चम्मच अजवाइन

– 2 छोटे चम्मच कसूरी मेथी पाउडर

– 2 बड़ा चम्मच बेसन

– 1 बड़ा चम्मच नीबू का रस

– 1 बड़ा चम्मच सरसों का तेल मैरिनेट करने के लिए

– फ्राई करने के लिए औयल

– नमक स्वादानुसार.

विधि

एक पैन में बेसन डाल कर उसे तब तक भूनें जब तक खुशबू न आने लगे, फिर आंच बंद कर ठंडा होने दें.

इस बीच पनीर को छोटे टुकड़ों में काट लें. फिर एक बाउल में भुना बेसन, दही, नीबू का रस, सरसों का तेल और बाकी बची सारी सामग्री मिला कर पेस्ट तैयार कर उसे पनीर के टुकड़ों में लपेट कर 30 मिनट तक मैरिनेट होेने दें.

फिर एक नौनस्टिक पैन में तेल गरम कर उस में पनीर को सुनहरा होने तक फ्राई कर उस पर चाट मसाला और नीबू का रस डाल कर हरी सब्जियों से सजा कर पुदीने की चटनी के साथ सर्व करें.

  • व्यंजन सहयोग: टिप्सी एलिफैंट
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