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शेविंग के बाद निकलते हैं दाने ? अपनाएं यह उपाय

अगर आप पहली बार शेविंग करने जा रहे हैं या शेविंग के बाद आपके चेहरे पर दाने निकल आते हैं तो आपको कई प्रकार की सावधानी बरतने की आवश्यकता है. आज हम आपको स्‍टेप बाई स्‍टेप, दाढ़ी छीलने का तरीका बताएंगे, जिससे आपसे कोई गलती ना हो सके.

दाढ़ी लंबी है या छोटी : सबसे पहले शीशे के सामने खड़े हो जाए और देखें की दाढ़ी लंबी है या छोटी. लंबी दाढ़ी तुरंत नहीं बनाई जा सकती, इसके लिये सबसे पहले उसे ट्रिम करें और फिर उसके बाद रेजर से छीलें. अगर रेजर को ज्‍यादा दिनों तक चलाना है तो दाढ़ी को कैंची से ट्रिम कर लेना चाहिये और फिर ब्‍लेड चलानी चाहिये.

ट्रिम : दाढ़ी को ट्रिम करने से पहले यह देख लेना चाहिये कि दाढ़ी के बाल सूखे हुए हों. गीले बालों को ट्रिम करने से चेहरे पर घाव हो सकता है. अगर आप बालों को पकड़ कर ट्रिमिंग कर सकते हैं, तो वैसा ही कीजिये.

गरम पानी से धोएं : जब दाढ़ी ट्रिम कर लें, तब हल्‍के गरम पानी से अपना चेहरा धोएं. गरम पानी स्‍किन के पोर्स को खोलता है तथा डेड स्‍किन को साफ कर के उसे कोमल बनाता है. गरम पानी का बिल्‍कुल उपयोग ना करें.

शेविंग आयल : अपने गीले चेहरे पर शेविंग क्रीम लगाने से पहले हमेशा शेविंग आयल लगाइये. शेविंग आयल लगाने से शेव करने में आसानी होती है और रेजर से जलन भी नहीं होती.

शेविंग क्रीमल : जब आप दाढ़ी पर शेविंग आयल लगा लें, उसके बाद शेविंग क्रीम को ब्रश की मदद से लगाएं. शेविंग ब्रश को गीला करें और उस पर क्रीम लगाएं. ब्रश को अच्‍छी तरह से अपनी दाढ़ी पर चलाएं जिससे पूरे एरिया पर झाग फैल जाए. अब कुछ मिनट तक के लिये क्रीम को दाढ़ी पर ठीक से सेट हो जाने दीजिये. उसके बाद जब दाढ़ी के बाल मुलायम हो जाएं तब उन्‍हें शेव करें.

रेजर : रेजर को प्रयोग करने से पहले उसका ब्‍लेड चेक कर लें. आपकी त्‍वचा के लिये ब्‍लेड सही होना चाहिये. देख लीजिये कि कहीं आपकी स्‍किन ज्‍यादा संवेदनशील तो नहीं है या फिर दाढ़ी बहुत कठोर है, आदि. चेहरे पर छोटे भाग से बाल को शेव करते रहें और रेजर को भी साफ करते रहें.

सफाई : अपने चेहरे को हल्‍के गरम पानी से धोएं और उसके बाद अपनी ह‍थेलियों से चेहरे को रगड़े. देख लें कि आपने अपने चेहरे को अच्‍छी तरह से शेव किया है या नहीं. अगर कहीं पर कोई हिस्‍सा छूट गया हो, तो उसे तुरंत साफ करें. शेविंग करने के बाद अपने चेहरे को ठंडे पानी से धोएं और उसके बाद शेविंग बाल्‍म लगाएं या फिर आफटर शेविंग लोशन. एलो वेरा जैल एक प्राकृतिक आफटर शेविंग बाल्‍म है, जो त्‍वचा को रूखा होने से बचाता है तथा रेजर बर्न और खुजली को दूर करता है.

तमिलनाडु की कौटन वैली : पढ़ाई या मिलों में मजदूरी

तमिलनाडु की कपास घाटी कहे जाने वाले कई जिलों में गरीब, दलित और आदिवासी लड़कियों से पढ़ाई के नाम पर कपड़ा मिलों में मजदूरी कराई जा रही है. इन लड़कियों का 10वीं और 12वीं कक्षाओं में नामांकन करा कर इन्हें मिलों में स्थित होस्टलों में रखा जाता है और उन से मिल में काम लिया जा रहा है.

सितंबर में सलेम जिले के न्यू बसस्टैंड पर एक बस से करीब एक दर्जन लड़कियां उतरीं तो चाइल्डलाइन के एंटी टै्रफिकिंग दस्ते ने उन्हें रोका और बाल कल्याण समिति के सामने पेश कर जब उन से पूछताछ की गई तो इस बात का खुलासा हुआ कि इन लड़कियों को पढ़ाई के नाम पर कपड़ा मिलों में रख कर इन से मजदूरी कराई जा रही है. शुरुआती जांच में लड़कियों ने बताया कि वे कोयंबटूर की एक कपड़ा मिल में 10वीं और 12वीं कक्षा में पढ़ रही हैं.

कपड़ा मिल में पढ़ाई की बात सुन कर कल्याण समिति के अध्यक्ष ने जब पूछताछ की तो मालूम हुआ कि वे वास्तव में कपड़ा मिल में काम कर रही हैं और गैरकामकाजी समय में मिल के छात्रावास में पढ़ाई कर रही हैं. अब वार्षिक छुट्टियों में अपने घर जा रही हैं.

दरअसल, पश्चिमी तमिलनाडु के कोयंबटूर, सलेम, तिरुपुर, करूर, इरोड, नमक्कल, डिंडुगल जिलों को कौटन वैली यानी कपास घाटी कहा जाता है. इन जिलों की कपास कपड़ा मिलों में मुख्यरूप से गरीब, अशिक्षित, दलित, आदिवासी लड़कियों को एजेंटों के माध्यम से रोजगार के लिए लाया जाता है.

लेबर सप्लाई का खेल

यह स्थिति उसी तरह की है जैसे दिल्ली व अन्य शहरों के लिए झारखंड जैसे राज्यों से कामवाली के तौर पर लड़कियां दलालों द्वारा सप्लाई की जाती हैं.

तमिलनाडु के इन इलाकों की हजारों कपास कताई मिलों में एजेंटों व दलालों के माध्यम से लड़कियां लाई जाती हैं. बेहतर जीवन का वादा कर के एजेंट दक्षिण भारत के गरीब, ग्रामीण इलाकों की लड़कियों को इन मिलों में पहुंचाते हैं. लड़कियां यहां मिलों में स्थित होस्टलों में रह रही हैं और कपास कताई से पैसा कमा रही हैं.

यहां सुमंगली स्कीम, मंकल्या थित्तम, थिरूमगल थिरूमाना थित्तम या 3 वर्षीय योजना के नाम पर एजेंट 3 साल के लिए लड़कियों को मिलों में भेजते हैं. कई मिलें इन लड़कियों को 3 साल बाद पैसे का भुगतान करती हैं. लड़कियों के परिवार को लगता है कि यह पैसा इन के विवाह में दहेज व अन्य खर्चों में काम आएगा.

राज्य के कई गैरसरकारी संगठन कपड़ा मिलों पर लड़कियों के शोषण का आरोप लगा रहे हैं. लेकिन दक्षिण भारतीय मिल एसोसिएशन यानी सिमा का कहना है कि लड़कियों के शोषण को ले कर कानून का उल्लंघन हो सकता है पर कुछ बेईमान लोगों ने इन नियमों का उल्लंघन किया होगा, लेकिन अब हर किसी को गलत समझा जाने लगा है.

मिलों में काम करने वाली लड़कियां खुद को छात्राएं बता रही हैं. श्रमिकों के बजाय उन्हें मिलों द्वारा छात्राओं के रूप में ओपन स्कूली शिक्षा में नामांकित कराया जाता है ताकि जांच और बालश्रम कानूनों से बचा जा सके. मिलों द्वारा अविवाहित युवा श्रमिक युवतियों को अपने वास्तविक कार्य की स्थिति को छिपाने के लिए चेतावनी दी जाती है.

मिल प्रबंधन लड़कियों के ओपन स्कूलों में नामांकन करवा कर कामकाजी घंटों के बाद होस्टल डौरमैट्रियों में पढ़ने की अनुमति देता है. कुछ कपड़ा मिलें लड़कियों को 10वीं व 12वीं की पढ़ाई में मदद करने के लिए वेतन पर अध्यापक रखने का दावा कर रही हैं.सभी मिलों में शिक्षा की सुविधाएं नहीं हैं.

मजदूर यूनियनों का यह आरोप भी है कि लड़कियों को छात्रावासों में कैद कर के रखा जाता है. उन्हें बाहर आनेजाने की स्वतंत्रता नहीं है. इन के अलावा कपास की धूल और मिलों के प्रदूषित वातावरण से छोटी लड़कियों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है.

तमिलनाडु में कपड़ा मिलों का यह युवा लड़कियों और महिलाओं को निश्चित अवधि का रोजगार देने वाली कथित शोषणकारी प्रथा को कायम रखने का नया तरीका है. मिल मालिक इसे सुमंगली योजना, मंकल्या थित्तम या 3 वर्षीय योजना कह रहे हैं जबकि टे्रड यूनियनों और एनजीओ ने इसे कैंप कुली सिस्टम कहा है.

यह प्रथा राज्य की टैक्सटाइल मिलों ने 2 दशकों पहले तब शुरू की थी जब कोयंबटूर दक्षिण भारत के मानचैस्टर होने का रुतबा खोने लगा था. यह वह समय था जब विकेंद्रीकृत क्षेत्र में बढ़ोतरी हो रही थी. तमाम मिलें विघटित हो रही थीं. विकेंद्रीकृत कताई क्षेत्र इरोड, तिरुपुर, नमक्कल, सलेम, करूर और डिंडुगुल जैसे आसपास के जिलों में फैल गया. बड़ी मिलें बंद हो गई थीं. यह क्षेत्र पूरी तरह से निर्यात गुणवत्ता वाले धागों, वस्त्रों का हब था.

श्रम की कमी के चलते कई मिलें बंद होने के बाद कुछ मालिकों और कुछ नए खिलाडि़यों ने दूरदराज के गांवों में छोटी इकाइयां खोलनी शुरू कीं, जहां जमीन, पानी और श्रम सस्ते थे.

बाद में कपड़ा मिलें गरीब व अशिक्षित लड़कियों के रूप में सस्ता मैनपावर हासिल करने लगीं. इस काम के लिए मिलों को एजेंट मिलने लगे और वे इन लड़कियों को पढ़ाईलिखाई के नाम पर मिलों में मजदूरी के लिए लाने लगे.

तमिलनाडु का कपड़ा उद्योग 25 लाख से अधिक लोगों को रोजगार मुहैया कराता है जिन में महिलाओं की खासी संख्या है. अब विशेष रूप से यहां का कताई क्षेत्र अविवाहित लड़कियों के लिए नियत अवधि के मजबूत रोजगार संस्थान बन गए हैं. इन मिलों में काम करने वाले ज्यादातर श्रमिक निचली दलित, पिछड़ी जातियों के हैं.

तमिलनाडु का वस्त्र उद्योग देश का सब से बड़ा नियोक्ता और प्रमुख निर्यातक है. कपड़ा उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था में सब से बड़ा और महत्त्वपूर्ण है. यह लगभग 42 अरब डौलर का सालाना निर्यात करने वाला उद्योग है. कृषि के बाद यह उद्योग सब से बड़ा रोजगार देने वाला क्षेत्र है.

हालांकि, यह निश्चित अवधि का रोजगार दमनकारी माना जा रहा है. कई गरीब लड़कियों के मांबाप इस दौरान मर जाते हैं. लड़कियों का घरपरिवार छोड़ कर बाहर रहना दर्दनाक फैसला होता है पर मजबूरीवश, लड़कियां और उन के घर वाले ऐसा करते हैं. इस के कई फायदे भी हैं.

गरीब, दलित परिवारों की लड़कियां भी अब बड़ी तादाद में कामकाज के लिए घर से बाहर निकलने लगी हैं. लड़कियां जब दूसरे शहरों में रोजगार और शिक्षा के लिए आजा रही हैं और अकेले रह रही हैं तो वे अपने पैरों पर भी खड़ी हो रही हैं. शोषण कहां नहीं है. घर में लड़कियां अपनों द्वारा शिकार बनाई जा रही हैं. गांवों में उन की हालत और खराब रहती है.

दरअसल, गरीब जाति की औरतें इस देश में हमेशा से भेदभाव, शोषण और आर्थिक अभावों का दंश झेलती आई हैं. पिछले 2 दशकों से महिलाओं के घर से बाहर निकलने का माहौल बना है, वह चाहे शिक्षित महिला हो, अर्द्धशिक्षित, अनपढ़ या गरीब. जरूरतों की वजह से जैंडर और जाति की दीवारें टूट रही हैं.

महिलाएं हमेशा से पुरुषों पर निर्भर रही हैं. अब जब वे घर से बाहर निकल कर खुद कमाने लगी हैं तो  मांबाप को न उन की शादी की चिंता है, न उन के भविष्य की. लड़कियों के आत्मनिर्भर होने से मांबाप को भी बोझ लगने वाली बेटियां, बेटों के बराबर लाड़ली लगने लगी हैं.

इन परिवारों में गरीबी इसीलिए थी क्योंकि कमाने का जिम्मा केवल पुरुष के  हिस्से कर दिया गया था. दलित, गरीब परिवारों में पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी कमाएंगी तो इन परिवारों की माली दशा सुधरेगी, सो, और क्या चाहिए.

तकनीक का कमाल, डौक्टर अब आप के द्वार

तकनीकी तरक्की ने दुनिया को वरदान दिए हैं तो इस के कुछ अभिशाप भी हैं. अभिशापों में एक है सेहत पर बुरा असर होना. लेकिन इसी तकनीकी तरक्की ने सेहत पर पड़ने वाले बुरे असर से बचाने की तकनीक भी अब ईजाद कर ली है. हालांकि यह तकनीक नई नहीं है लेकिन हमारे देश में अभी यह आम नहीं हो सकी है.

यह खुला सच है कि भारत में डौक्टरों की कमी है.  देश में डौक्टर कम तो हैं ही, उन में से ज्यादातर बड़े शहरों में रहते हैं. छोटे शहरों में रहने वालों के लिए गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य देखभाल सेवा पाना अभी भी एक सपना है. ऐसे में तकनीक की मदद से शहर, मेट्रो व दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य से जुडी समस्यायों को दूर किया जा सकता है. इस संबंध में ईजाद तकनीक को टेलीमेडिसिन कहा जाता है.

पश्चिमी देशों में टेलीमेडिसिन काफी लोकप्रिय है. मौजूदा समय में भारत में डिजिटल इकौनमी की ग्रोथ अच्छी बनी हुई है, इसलिए यहां भी ओन-डिमांड हेल्थकेयर सर्विस घर तक पहुंचाई जा सकती है.

देश में डौक्टर इन्स्टा आप को घर बैठे मेडिकल सलाह देने के साथ आप के घर पर दवाएं भी पहुंचाने का काम कर रही है. डौक्टर इन्स्टा कंपनी का मकसद डौक्टर और मरीज के बीच की दूरी को दूर करना है. मरीजों को घर बैठे हेल्थ विशेषज्ञों से परामर्श की सुविधा देना है.

डौक्टर इन्स्टा ऐप के जरिए कोई मरीज हफ्ते के सातों दिन चौबीसों घंटे वौइस, वीडियो और चौट के जरिए हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स से राय ले सकता है. मरीज ही नहीं, बल्कि सेहतमंद लोग अपनी सेहत को बेहतर करने या अच्छी सेहत को बरकरार रखने के लिए भी इस ऐप के जरिए विशेषज्ञों से परामर्श ले सकते हैं.

डौक्टर इन्स्टा के फाउंडर व सीईओ अमित मुंजाल कहते हैं, “बड़ी बीमारियों के मामले में डौक्टर के साथ आमने सामने बैठ कर ही परामर्श देने की ज़रुरत होती है, लेकिन दवाओं, महिला रोग, खानपान, न्यूट्रीशन से जुड़ी समस्याओं और कई दूसरी बीमारियों पर डौक्टर इन्स्टा ऐप के जरिए परामर्श किया जा सकता है.”  बता दें कि डौक्टर इन्स्टा कंपनी दवाओं की होम डिलीवरी भी करती है, साथ ही, लैब और डायग्नोस्टिक रिपोर्ट ई-मेल से भेजती है.

अस्पतालों और क्लीनिकों में बाहरी मरीज विभाग (ओपीडी) में जाने पर कई समस्याएं और चुनौतियां होती हैं. लोग 3 से 4 घंटे बरबाद करते हैं. और डौक्टर के साथ 5 से 7 मिनट बिताते हैं. डौक्टर इन्स्टा के जरिए डॉक्टर से परामर्श लेने में आप के वे घंटे बरबाद होने से बच जाएंगे.

दुनिया के प्रमुख वैज्ञानिकों की रिपोर्ट के अनुसार, आंकड़े हमें दिखाते हैं कि नेट रेटेड औसत आधार पर 70 फीसदी समस्याओं को वर्चुअल हेल्थकेयर के माध्यम से हल किया जा सकता है.

देश में यदि आप किसी से पूछें कि क्या उन्होंने औनलाइन परामर्श किया है तो उन में से अधिकतर कहेंगे कि नहीं. लेकिन अगर आप ने उन से सवाल पूछा है कि आप ने कभी फोन उठाया है और अपने डौक्टर से बात की है और डौक्टर से अपनी समस्या के लिए उपाय बताने को कहा है या अपने डौक्टर को एक एसएमएस या व्हाट्सऐप भेजा है, तो लगभग सभी लोग हां कहेंगे कि यह किया है. तो भारत में एक असंगठित तरीके से सैकड़ों हजार परामर्श वैसे भी हो रहे हैं.

डौक्टर इन्स्टा के प्लेटफार्म पर अभी 100 से ज्यादा डौक्टर हैं. डौक्टर इन्स्टा ऐप के जरिए काफी देशवासी घर बैठे स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं से छुटकारा पा रहे हैं.

अकेलापन, तनाव और चिंता से कुछ इस तरह निबटें

अनुप्रिया के घर पर पार्टी चल रही थी. अनुप्रिया की घनिष्ठ सहेली रीना, अनुप्रिया की बेटी कनिका को ढूंढ़ती हुई उस के कमरे में गई. कनिका को गहरी सोच में डूबे देख रीना कुछ हैरान हुई. कनिका से उस के हालचाल पूछे तो उस ने बहुत ही निराश स्वर में कहा, ‘‘आंटी, आप कैसी हैं?’’

‘‘मैं ठीक हूं, तुम्हें क्या हुआ है?’’

ठंडी सांस ली कनिका ने, ‘‘कुछ नहीं, आंटी.’’

‘‘पार्टी छोड़ कर यहां क्या कर रही हो?’’

‘‘बाहर आने का मन नहीं है.’’

‘‘क्या हुआ, बेटा?’’ रीना के अनुप्रिया से पारिवारिक संबंध थे. इसलिए कनिका ने निसंकोच दिल का हाल कहा, ‘‘पता नहीं, आंटी, मुझे क्या हो गया है. रात को नींद भी नहीं आती. 90 फीसदी समय मैं डिप्रैस्ड ही रहती हूं. कई बार तो मन में सुसाइड करने का खयाल तक आता है.’’

रीना हैरान सी कनिका का मुंह देखती रह गई. कुछ देर बाद बोली, ‘‘तुम्हें किस बात का डिप्रैशन है, सबकुछ तो है तुम्हारे पास?’’

कनिका ने सपाट स्वर में कहा, ‘‘यदि मेरे पास सबकुछ है, फिर मैं खुश क्यों नहीं हूं?’’ कनिका की बात सुन कर रीना को कुछ नहीं सूझा. वह काफी देर तक कनिका से बहुत सी दूसरी बातें करती रही. उसे बहुतकुछ समझाती रही पर जानती थी कि उस के उपदेश का कनिका पर कोई असर नहीं हो रहा है. रीना बाहर आई, एक कोने में बैठ कर कनिका के बारे में सोच रही थी. अनुप्रिया बाकी मेहमानों में व्यस्त थी.

रीना को पिछले दिनों चर्चा में रहे पीटर मुखर्जी के बेटे राहुल का अचानक ध्यान आया कि राहुल जैसे युवा को डिप्रैशन हो तो बात समझ में आती है कि वह किस तरह मानसिक यंत्रणा से गुजर रहा होगा, जब उसे अपने पिता और अपनी बातचीत को टेप करना पड़ा होगा. ऐसा कौन करता है? केवल वही संतान जिस का अपने मातापिता पर से विश्वास उठ गया हो, एक ऐसी संतान जो सच जानने के लिए बेचैन हो और उसे आगे कई दुखद सत्यों के साथ जीवन जीना हो.

एक घटना और थी कि 2 युवा लड़कियों के आपस में प्रेमसंबंध थे. अलग होने के डर से वे अपना आपस का रिश्ता छिपा कर रखती थीं. कुछ रिश्तेदारों ने दोनों लड़कियों को मैरीन ड्राइव एरिया में आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया और उन के मातापिता को सचेत कर दिया. मातापिता ने दोनों का जीवन दूभर कर दिया जिस के चलते दोनों ने आत्महत्या करने का प्रयास किया. जिस में एक की मौत हो गई और दूसरी बच गई. पर अब आगे क्या होगा? दोनों के मातापिता अपने को धिक्कारते हुए कैसे जी पाएंगे?

एक मामले में एक बेहद सुंदर युवा लड़की ने अपना चेहरा ही जला लिया, क्योंकि उस का पति उस के सुंदर होने पर ताने मारता था जिसे वह सहन नहीं कर पाई. अब यह असुरक्षित व ईर्ष्यालु, भावनाहीन पति एक बुरी तरह जले हुए चेहरे वाली पत्नी के साथ कैसे रहेगा? क्या अब पत्नी को तलाक दे पाएगा और दूसरी कम सुंदर लड़की से विवाह कर लेगा?

रोंगटे खड़े कर देने वाली एक घटना में एक बिजनैसमैन की उस की प्रेमिका ने गला घोंट कर हत्या कर दी, क्योंकि वह अफेयर खत्म करना चाह रही थी और वह व्यक्ति इस के लिए तैयार नहीं था. 6 वर्षों से यह अफेयर था जिस की भनक भी किसी को नहीं लगी थी. पुरुष विवाहित था, उस के 2 बच्चे भी थे. प्रेमिका का हाल ही में विवाह हुआ था.

यह कितनी हैरान करने वाली बात है कि घर में रहने पर भी पुरुष के घर वालों को किसी भी तरह का संदेह नहीं हुआ. मतलब एकसाथ पास रहते हुए भी आजकल परिवार में एकदूसरे के रहनसहन, हावभाव, तौरतरीकों पर ध्यान देने की किसी को न रुचि है, न किसी के पास समय. जब यह पुरुष मृत अवस्था में पाया गया तब कहीं जा कर पूरा प्रकरण सामने आया.

इन घटनाओं से रिश्तों के भुरभुरेपन पर हैरानी और दुख होता है. या तो बहुत विश्वास है या धोखा, या फिर बहुत इमोशंस हैं या बिलकुल नहीं. पर दोस्तों और परिवार वालों से घिरे रहने के बावजूद इंसान इतना अकेलापन महसूस करने लगता है कि वह किसी से अपना दुख शेयर ही नहीं कर पाता.

इन तमाम उदाहरणों में शामिल लोग उन परिवारों से हैं जो बेहद धार्मिक हैं. ये लोग नियमित तौर पर मंदिरों, तीर्थस्थलों व तथाकथित गुरुओं के यहां चक्कर लगाते रहते हैं. वे पंडों, गुरुओं के बताए अनुसार समयसमय पर हवनयज्ञ, पूजापाठ व दानदक्षिणा देते रहते हैं लेकिन उन के जीवन में शांति नहीं है. धर्म, ईश्वर को सबकुछ मानने के बावजूद यह स्थिति है.

इन समस्याओं का उपाय धर्म और तथाकथित गुरुओं के पास नहीं है. अगर इन के पास उपाय होता तो परिवार में कोई भी सदस्य चिंता, तनाव, डिप्रैशन जैसी समस्याओं से पीडि़त न रहता. इस का इलाज मैडिकल साइंस और आप के व्यवहार में है. बात मैडिकल साइंस की करते हैं.

मानसिक दशा

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, लगभग 3 में से 1 व्यक्ति को चिंता और अवसाद जैसी आम मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं हैं. आंकड़े बताते हैं कि यदि हमें ऐसी कोई समस्या नहीं है तो हमारे किसी मित्र, सहकर्मी या परिवार के किसी सदस्य को जरूर होगी. अपने मानसिक स्वास्थ्य के बारे में हम जल्दी किसी से बात नहीं करते और हम चिंता के लक्षण भी पहचान नहीं पाते. यह बात महिला व पुरुष दोनों के लिए है.

माइंड और्गेनाइजेशन, यूके की रिसर्च के अनुसार, 35 प्रतिशत महिलाओं की तुलना में 23 प्रतिशत पुरुषों ने कहा कि 15 दिन भी अगर वे ठीक महसूस नहीं करते तो वे डाक्टर के पास जाएंगे. विकसित देशों में, डब्लूएचओ के अनुसार, 12 में से एक स्त्री के मुकाबले, 5 में से एक पुरुष शराब पर निर्भर हो जाता है. 50 वर्ष से कम आयु के पुरुषों में सुसाइड की गिनती हर साल बढ़ रही है. उन की भावनाओं पर समाज का यह प्रैशर कि, क्या करना चाहिए, क्या नहीं, बहुत रहता है.

दरअसल, सामान्य चिंताएं, सामाजिक चिंताएं, कई तरह के फोबिया, कंपलसिव बिहेवियर, पैनिक अटैक्स, खाने से संबंधित डिस्और्डर और पोस्ट ट्रौमेटिक स्ट्रैस डिस्और्डर आदि के चलते इंसान अवसाद का शिकार हो जाता है. हर व्यक्ति में इन के लक्षण अलगअलग जाहिर होते हैं, जैसे मांसपेशियों में तनाव, सिरदर्द, सीने में दर्द, हृदयगति बढ़ना, सांस लेने में कठिनाई, पसीना आना, उलटी या चक्कर आना, पेटदर्द, डायरिया, दम घुटना आदि.

मदद करें

भावनात्मक रूप से चिंता से प्रभावित व्यक्ति आराम करने में असमर्थ होता है. उसे बहुत गुस्सा आता है, निराशा या भय महसूस होता है.

चिंता और तनाव से प्रभावित व्यक्ति की मदद की जा सकती है. अगर कोई आप को बताता है कि उसे एंजाइटी डिस्और्डर है तो सब से पहले आप खुद इस के बारे में जान लें. औनलाइन जानकारी ले कर ही काफीकुछ समझ लें. उसे डाक्टर के पास जाने के लिए कहें. डाक्टर ऐसी समस्याएं हर समय देखते हैं. वे मरीज के साथ शांति से बात करते हैं. उन की बातें सुनते हैं और समझते हैं.

प्रभावित लोगों को सलाह दें कि हर समय चिंता में डूब कर जीवन बिताने के बजाय उस का इलाज करवाएं. यह न सोचें, न कहें कि तुम्हें ज्यादा नींद, कम काम करने, कम पीने, कम दवा लेने, ज्यादा व्यायाम की जरूरत है. उन की बात ध्यान से सुनें, उन की परेशानियां, लक्षण सुन कर हैरान न हों. उन से कहें, मुझे बताओ तुम्हें क्या परेशान कर रहा है.

यह कैसा खालीपन

किसी अपने की गुडमौर्निंग सुन कर या पुरानी अलार्म घड़ी की आवाज से आजकल हम कम ही उठते हैं. इन आवाजों की जगह अब हमारे मोबाइल फोन ने ले ली है. बैड से उठने से पहले ही लोग नया फेसबुक अपडेट चैक करते हैं, व्हाट्सऐप के मैसेज पढ़ते हैं. यह हायपर कनैक्टेड दुनिया है जहां अकेलापन हमारी सोच से भी ज्यादा आम हो गया है.

रिलेशनशिप विशेषज्ञों का मानना है कि जहां लोग पूरी दुनिया से सोशल नैटवर्किंग प्लेटफौर्म जैसे फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम से आसानी से जुड़ जाते हैं वहीं बराबर में बैठे व्यक्ति से नहीं जुड़ पाते.

वैलनैस ऐक्सपर्ट आनंद वाच्छानी कहते हैं, ‘‘रैस्तरां में जब हमें खाना सर्व किया जाता है, पहले हम इसे इंस्टाग्राम पर डालते हैं, क्योंकि गरम खाने का स्वाद लेने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हमें सोशल मीडिया पर अपनी प्रोफाइल अपडेट करना लगता है.’’

गृहिणी सीमा कश्यप कहती हैं, ‘‘मैं ने अपने 30वें बर्थडे पर रात 12 बजे अपना फोन अपनी दोस्तों के फोन के इंतजार में उत्साह से उठा लिया. मुझे विश्वास था कि मेरी खास दोस्त बर्थडे केक ले कर घर भी आएंगी. हमेशा यही होता आया था. हम एक ही कालोनी में रहती हैं. इस बहाने कुछ मनोरंजन हो ही जाता था पर मुझे बहुत निराशा हुई. बस, व्हाट्सऐप ग्रुप का नाम उस दिन बदल दिया गया और अगली सुबह फेसबुक पर कई बर्थडे मैसेज थे. किसी का कोई फोन नहीं, कोई बात नहीं.’’

अपनों से जुड़ें

क्लिनिकल साइकोलौजिस्ट और लेखिका सीमा हिंगोरानी कहती हैं कि अपने प्रियजनों से ज्यादा आजकल लोग अपने डाक्टर्स के साथ कंफर्टेबल हैं. लोग दूसरों को यह दिखाना ही नहीं चाहते कि वे कमजोर हैं, इसलिए लोगों से व्यक्तिगत रूप से मिलने के बजाय सोशल मीडिया के बाहरी दिखावे के पीछे रहना ज्यादा पसंद करते हैं.’’

लोगों से घिरे रहने के बावजूद व्यक्ति को अकेलापन महसूस हो सकता है. अकेलापन चिंता और अवसाद का ही लक्षण है, यह युवा और वरिष्ठ नागरिकों में ज्यादा दिख रहा है. सामाजिक अकेलापन कई कारणों से होता है, जैसे किसी प्रियजन की मृत्यु, कानूनी अलगाव, शारीरिक अस्वस्थता, रिटायरमैंट या नौकरी छूट जाना, पुनर्वास आदि.

भावनात्मक रूप से प्रभावित करने के साथसाथ अकेलापन इंसान के इम्यून सिस्टम यानी जिस्म की रोग प्रतिरोधक प्रणाली को भी प्रभावित करता है. शिकागो यूनिवर्सिटी की रिसर्च के अनुसार, अकेलेपन से हृदयरोग, अल्जाइमर और तेजी से बढ़ते कैंसर के पनपने की आशंका रहती है. लोगों के अलगथलग रहने से नोरीपाइनफेरिन हार्मोन का लैवल बढ़ जाता है जो वायरस से लड़ने की हमारी क्षमता को कमजोर करता है. इस से हार्टअटैक की आशंका भी बढ़ जाती है.

अवसाद, अनियमित नींद, स्ट्रैस हार्मोन कोर्टिसोल का स्तर बढ़ जाना, ब्लडप्रैशर बढ़ना आदि बीमारी अकेलेपन के चलते उत्पन्न होती हैं.

एकांत और अकेलेपन में फर्क यह है कि अकेलेपन में अकेले हो जाने की नकारात्मक भावना रहती है. जब तक हम महत्त्वपूर्ण महसूस करने के लिए सोशल मीडिया का प्रयोग नहीं करते तब तक ठीक है. आज चाहे रैस्तरां हो या पार्टी, हर व्यक्ति अपने सैलफोन से चिपका रहता है. यह आदत अकेलापन बढ़ा रही है. जो कोई सार्थक वार्त्तालाप करना चाहते हैं, उन पर इस का बहुत प्रभाव पड़ता है. असली रिश्तों को अकेला करते सोशल मीडिया पर वर्चुअल कनैक्शंस बढ़ रहे हैं.

इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और बाकी प्लेटफौर्म पर आप अपनेआप को एक अलग ही रूप में दिखाने की कोशिश करते रहते हैं. इस का मतलब यह नहीं है कि टैक्नोलौजी बुरी चीज है.

अपने आसपास के लोगों, परिवार, प्रियजनों को थोड़ा समय दें. उन का और अपना सुखदुख कहें, सुनें. एकदूसरे के जीवन में बढ़ते अकेलेपन को दूर करने की कोशिश करें, न कि सोशल मीडिया का सहारा ले कर एक स्वरचित झूठे संसार का हिस्सा बनें, जहां सिर्फ सब अच्छा ही अच्छा दिखता है. सोचें, क्या यह संभव है.

अपनों को अकेलेपन का शिकार न होने दें, एकदूसरे को समय दें, खुद स्वस्थ रहें और दूसरों को भी स्वस्थ रहने में सहयोग दें.

60 पार की उम्र, पर प्यार और जिंदादिली अभी भी कायम

आज की भागदौड़भरी जिंदगी और उस पर ढेरों जिम्मेदारियां इंसान को सुकून से जीने नहीं देतीं. रोटी, कपड़ा और मकान के साथ बच्चों के सुनहरे भविष्य की चिंता रिश्तों की मिठास को धीरेधीरे कड़वाहट में बदल देती है. ज्यादातर पतिपत्नी के रिश्तों में कुछ वर्षों बाद ही प्यारमनुहार की जगह तकरार ले लेती है, जिस से रिश्तों की ताजगी और मिठास कहीं गुम सी हो जाती है.

परंतु कुछ जोडि़यां इस का अपवाद हैं. इन जोडि़यों का प्यार उम्र के साथसाथ बढ़ता जा रहा है. आइए, कुछ ऐसे ही सदाबहार जोड़ों के जीवन के बारे में जानते हैं जिन की उम्र तो 60 पार हो चली है लेकिन जिंदगी में प्यार और जिंदादिली अभी भी कायम है…

मिथिलेश-ललित की जिंदादिली

इंदौर के शइनाई रैजीडैंसी में ललित कुमार और मिथिलेश लली त्रिवेदी अपने सब से छोटे बेटे के साथ रहते हैं. 60 की उम्र पार कर चुका यह जोड़ा बेहद जिंदादिल है और अपनी शादी की गोल्डन जुबली भी मना चुका है. इस उम्र में प्यार अधिक या तकरार, पूछने पर मिथिलेश मुसकरा कर बात शुरू करती हैं,  ‘‘निसंदेह प्यार. देखिए, हमारे दौर में प्यार को आंखों के जरिए दिल में महसूस किया जाता था. उस वक्त प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए उपहारों के लेनदेन का प्रचलन नहीं था, और न ही साथ बिताने के लिए अधिक समय. हां, कभीकभार मेरी पसंद की कोई चीज ये ले आते थे, तो यही प्यार दर्शाने का तरीका था. पर बदलते दौर के साथ हम ने अपनी सोच में काफी परिवर्तन किया.

Mithilesh-Lali-&-Lalit-kuma

‘‘लिहाजा, अब मुझे भी अपने जन्मदिन और अन्य मौकों पर पति से खूबसूरत उपहार मिल जाते हैं. सच पूछिए तो इन का दिया एक छोटा सा तोहफा भी मेरे चेहरे और जीवन में मुसकान लाने के लिए काफी है.’’

इस उम्र में एकदूसरे का खयाल कौन ज्यादा रखता है, इस पर ललित का कहना था, ‘‘मैं शुरू से ही बड़ा मस्तमौला इंसान रहा. शतरंज, लौन टैनिस, टेबल टैनिस व बैटमिंटन आदि खेलों का मैं बेहद शौकीन हूं. कमा कर श्रीमतीजी के हाथ में पैसा रखने के अलावा मेरा घरगृहस्थी में ज्यादा योगदान नहीं था. उस वक्त इन्होंने घर और बच्चों को भलीभांति संभाला. आज ये शरीर से कुछ कमजोर हो चली हैं तो मैं इन का ध्यान रखता हूं और इस काम में मुझे बहुत खुशी मिलती है.’’

सिक्स्टीज की लवलाइफ के बारे में बताते हुए ललित का कहना था, ‘‘हमारे लिए यह समय वाकई सपने जैसा है. इस वक्त हम अपनी सभी जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुके हैं. आज ज्यादा से ज्यादा वक्त हम एकदूसरे के साथ बिताते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो, हम आज सिर्फ अपने लिए जी रहे हैं. दोनों मिल कर मनमुताबिक खाना बनाते हैं और अपने सभी शौक पूरे करते हैं. हम साथ बैठ कर टीवी देखते हैं. श्रीमतीजी थोड़ा ऊंचा सुनने लगी हैं, फिर भी मेरे साथ बैठ कर न्यूज, फिल्म वगैरह बड़े शौक से देखती हैं. सीनियर सिटीजन के लिए आयोजित सोसाइटी के सभी प्रोग्रामों में हम दोनों की शिरकत होती है. दोनों ही गाने सुनने के शौकीन हैं, तो आज भी एकदूसरे के लिए पुराने रोमांटिक गाने गा कर अपने प्यार का इजहार करते हैं. हम एकदूसरे को भावनात्मक सपोर्ट देते हैं.’’

एकदूजे के मानसी-दिलीप

कोलकाता के गडि़या इलाके में रहने वाले मानसी और दिलीप राय के व्यक्तित्व भिन्न होते हुए भी दोनों एकदूसरे के पूरक हैं. पत्नी मानसी एकदम सीधी, सरल, घरेलू महिला हैं तो दिलीप बहुमुखी प्रतिभा के धनी. निडर, निसंकोच, साफगोई से अपनी बात रखने वाले दिलीप का पहला प्यार साहित्य है, जिस के चलते वे आज भी लेखन और थिएटर से जुड़े रहना पसंद करते हैं. सामाजिक मुद्दों पर बनी उन की 2 डौक्यूमैंट्री फिल्में पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा पुरस्कृत हो चुकी हैं.

Mansi-&-dileep

इस उम्र में एकदूसरे के लिए क्या महसूस करते हैं, इस पर दिलीप का कहना था, ‘‘यह सवाल बेमानी है हमारे लिए चूंकि हमारा स्वभाव और आदतें एकदूसरे से बिलकुल भिन्न हैं. पहले तो आपस में तालमेल बैठाना ही बड़ा मुश्किल लगा. लेकिन जल्द ही हम ने एकदूसरे के स्वभाव को पहचान आपसी समझ से एकदूसरे को स्पेस दिया. फलस्वरूप, हमारी बौडिंग दिनोंदिन मजबूत होती चली गई.’’

बात को आगे बढ़ाते हुए मानसी का कहना था, ‘‘इन का गुस्सा दूध में आए उबाल जैसा होता है. जितनी जल्दी आता है उतनी ही जल्दी शांत भी हो जाता है. इन्हें मनाने का तरीका भी बहुत सरल है. इन्हें थोड़ी सी गुदगुदी कर दो, बस, कुछ ही देर में इन का सारा गुस्सा छूमंतर हो जाता है. अभी भी हमारे बीच थोड़ीबहुत नोकझोंक चलती रहती है पर सही माने में यही हमारी सेहत की खुराक है क्योंकि बिना इस के जिंदगी नीरस है.’’

एकलौती बेटी रायपुर में रहती है, वह रोजरोज हमें संभालने तो नहीं आ सकती. सो, हम दोनों ही एकदूसरे की देखभाल करते हैं और इसी में खुश हैं. हम ने अपनेअपने काम तय कर रखे हैं और उन्हीं कामों के बीच हंसतेगाते समय कब व्यतीत होता है, पता ही नहीं चलता. हमारे लिए सिक्स्टीज की उम्र एक नईर् पारी की शुरुआत है और हम दोनों की कोशिश है कि इस उम्र को भरपूर जिएं.

सुधा-दिवाकर की रोमांटिक लाइफ

फ्रीडीच एटैक्सिया (एक न्यूरोडिजनरेटिव डिस्और्डर) नामक बीमारी से जूझ रही अपनी बेटी का हौसला बने डा. दिवाकर और सुधा जिंदगी की तमाम उलझनों के बीच भी हंसतेमुसकराते हुए उम्र के इस पड़ाव को जी रहे हैं. इस दंपती ने अपनी भरपूर कोशिशों से बेटी को जोश से भर कर उसे अपनी बीमारी पर रिसर्च करने को तैयार किया. फलस्वरूप, आज वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सफलताएं अर्जित कर रही है.

Sudha-&-divakar-

सर एसजीएसआईटीएस, इंदौर के हैड औफ द डिपार्टमैंट पद से रिटायर दिवाकर खुद अपनी मैथमैटिक्स की रिसर्च में लगे रहते हैं. पत्नी सुधा वैष्णव पौलीटैक्निक कालेज में लैक्चरर रह चुकी हैं. वे पति का साथ देते हुए लगातार यह तय करती हैं कि पारिवारिक व सामाजिक उलझनें डा. साहब को कतई परेशान न करने पाएं, क्योंकि रिसर्च में मानसिक शांति बहुत जरूरी होती है.

वे उन्हें वही माहौल देने की कोशिश करती हैं. इस उम्र की समस्याएं और उन के हल करने पर सुधा का कहना है, ‘‘जिंदगी को हमेशा आज में जीना चाहिए. पिछली जिंदगी और उस पर आरोपप्रत्यारोप दिलों में दूरियां पैदा करते हैं. सो, पतिपत्नी द्वारा जो हो चुका है उसे भुला कर, जो मिला है उसे सहेजने की कोशिश करनी चाहिए.’’

क्लासिकल म्यूजिक की शौकीन सुधा ने हाल ही में इस की क्लास जौइन कर अपने शौक को दोबारा जीना शुरू किया है. उन का कहना है कि कुछ वक्त सिर्फ अपने लिए जीना उन्हें सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है, जिस से आने वाली चुनौतियों के लिए फिर से वे अपनेआप को तैयार पाती हैं.

इस उम्र में एकदूसरे को भावनात्मक सपोर्ट करना बहुत अहम है. इसलिए एकदूसरे की नाराजगी या उदासी दूर करने और अपनी मस्ती व रोमांच को बनाए रखने के लिए दिवाकर व सुधा आउटिंग पर जाना पसंद करते हैं, फिर चाहे वह पिक्चर देखना हो या फ्रैंड्स के साथ कहीं घूमने जाना.

खुशमिजाज कांति-सत्यप्रकाश

‘जिंदगी जिंदादिली का नाम है,’ ‘मुर्दादिल क्या खाक जिया करते हैं’ उक्त कहावत पर अमल करती यह जोड़ी वाकई जिंदादिली की मिसाल है, क्योंकि वक्त की आंधियों के बीच आज भी इन के प्यार की सुरमई ज्योति ज्यों की त्यों जगमगा रही है. उम्र को दरकिनार कर अगर आज भी इन का रिश्ता एक ताजे फूल की तरह महक रहा है, तो उस के पीछे इन की एकदूजे के लिए बेपनाह मुहब्बत और परवा है. दिल्ली के बदरपुर इलाके में रहने वाले डा. सत्यप्रकाश पाठक व उन की पत्नी कांति पाठक से जो भी मिलता है, प्रभावित हुए बगैर नहीं रह पाता. दोनों ही बेहद खुशमिजाज और हरदिल अजीज इंसान हैं, जो प्यार और सिर्फ प्यार के सिद्धांत पर कार्य करते हैं.

Kanti-&-satyapraksh

नौकरी से रिटायर हो चुके डा. सत्यप्रकाश जानेमाने कवि भी हैं. समाज की ज्वलंत समस्याओं पर आधारित उन के काव्य संग्रह ‘मैं तो दहेज की मारी हूं’ का लोकार्पण वर्ष 1997 में देश के तत्कालीन राष्ट्रपति डा. शंकरदयाल शर्मा ने किया था. देशभक्ति पर आधारित उन की दूसरी किताब ‘मेरा देश बचा लो’ का विमोचन वर्ष 2003 में उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत द्वारा किया गया था. अभी फिलहाल वे अमर स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद के जीवन पर एक काव्य लिख रहे हैं.

कांति यों तो हाउसवाइफ हैं परंतु हर परिस्थिति में पति का साथ देने को तैयार रहती हैं. सिक्स्टीज की लवलाइफ के बारे में पूछने पर दोनों एकदूसरे की आंखों में देखते हुए कहते हैं कि हमारी नजरों में प्यार जिंदगी का दूसरा नाम है.

पत्नी के लिए लिखी कविताओं को सुनाते समय सत्यप्रकाश जहां आज भी रूमानी हो जाते हैं, वहीं कांति की आंखों में शर्म की लालिमा साफ नजर आती है. बच्चों व समाज के प्रति अपने सभी कर्तव्यों को वहन करते हुए सिक्स्टीज की लाइफ को ऐंजौय करता यह जोड़ा सच में बेमिसाल है.

केंद्र सरकार की डीएमएस अब गुजराती कंपनी के हाथ में

दूध की खपत को ध्यान में रख कर जहां एक ओर दूध कंपनियां हर घर में पहुंचाने के लिए कमर कस रही हैं वहीं डीएमएस भी घाटे से उबरने की तमाम कोशिशें नाकाम रही हैं. यही वजह है कि डीएमएस को अमूल ने सब से ऊंची बोली लगा कर अपने नाम कर लिया है.

गुजरात से संबंध रखते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हुकूमत में केंद्र सरकार की डीएमएस को अब गुजराती कंपनी अमूल को सौंपा जा रहा है. केंद्र सरकार के उच्च पदों पर जहां गुजराती कैडर के अधिकारी काबिज हैं वहीं अब गुजराती कंपनियों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है.

घाटे में चल रहे डीएमएस का संचालन कर अमूल न सिर्फ उसे किराया देगी बल्कि वह करोड़ों रुपए की आमदनी भी अपने नाम करेगी. दरअसल, मोदी सरकार देशभर में हर क्षेत्र में गुजरातियों को बढ़ावा देने में जुटी है. उस की इस मुहिम का ही नतीजा है कि अब डीएमएस भी अमूल के हाथों में रहेगी.

मतलब साफ है कि आने वाले समय में अमूल कंपनी डीएमएस को अपने हाथ में ले लेगी. अमूल ब्रांड के मालिक गुजरात कोआपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन यानी जीसीएमएमएफ ने मदर डेरी को पछाड़ कर मुश्किलों में घिरी डेरी यूनिट दिल्ली मिल्क स्कीम यानी डीएमएस को चलाने की खातिर सब से ऊंची बोली लगाई है.

डीएमएस की संपत्तियों को इस्तेमाल करने के बदले में जीसीएमएमएफ ने 42.30 करोड़ रुपए के सालाना रैंट की पेशकश की, जबकि इस की तुलना में मदर डेरी ने 42.20 करोड़ रुपए का औफर दिया. बता दें कि डीएमएस की बोलियों को 27 नवंबर को खोला गया था.

अमूल और मदर डेरी दोनों की वित्तीय बोलियों को स्वीकार कर लिया गया है. इन्हें अब बिड इवैल्यूएशन कमेटी को सौंपा गया है.

यह रैंट एग्रीमैंट शुरुआती 30 साल के लिए होगा. डीएमएस की संपत्तियों को लीज पर दिए जाने का फैसला यूपीए सरकार के समय से ही लंबित था.

डीएमएस को साल 1959 में तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने शुरू किया था. दिल्ली के पौश इलाके में इस के पास 5 लाख लीटर की कूवत वाला मिल्क प्रोसैसिंग प्लांट है जो 25 एकड़ में फैला हुआ है.

डीएमएस के पास 5 मिल्क कलैक्शन और चिलिंग सैंटर भी हैं. दिल्ली व एनसीआर में कंपनी के पास 556 मिल्क बूथ हैं. कंपनी में फिलहाल 700 से भी ज्यादा मुलाजिम काम कर रहे हैं.

तकरीबन 900 करोड़ रुपए के घाटे से गुजर रही डीएमएस इस डील से बकाया चुका सकेगी. अमूल ने सालाना 42.30 करोड़ रुपए का रैंट देने की बात कही है जिस में वह हर साल 7 फीसदी की बढ़ोतरी करेगी.

मतलब साफ है कि अगले 30 सालों में डीएमएस को तकरीबन 3,400 करोड़ रुपए रैंट के रूप में मिलेंगे. इस रकम से डीएमएस भारी कर्ज से छुटकारा पा सकती है.

कृषि मंत्रालय के एक आला अफसर का कहना है कि वे डीएमएस के मुलाजिमों को दूसरी डेरी कंपनियों या दूसरे सरकारी विभागों में तैनात किए जाने की उम्मीद कर रहे हैं. डीएमएस के कर्मचारी चिंतित हैं क्योंकि अमूल अपने गुजराती कर्मचारियों की भरती कर कंपनी चलाएगी. डीएमएस के कुछ ही कर्मचारी रखे जाएंगे, हालांकि उन्हें पहले जैसी सुविधाएं नहीं मिलेंगी.

ये हैं वो 4 शब्द जो ‘वर्ड औफ द ईयर’ नहीं ‘महामारी औफ द डिकेड’ हैं

मोबाइल हमारी जरूरत है या एक लत जो महामारी बनकर पिछले एक दशक से हमारे जीवन के हर पहलू में जानलेवा स्पेक्ट्रम की घुन लगा रहे हैं? यह सवाल ऐसा है जो पूरी दुनिया में पूछा जा रहा है. समस्या सब जानते हैं लेकिन समाधान किसी के पास नहीं है. हाल में फिल्म 2.0 में भी मोबाइल्स को मानवों के लिए महामारी सरीखा दिखाया गया.

बहरहाल, जिस तरह पानी और ऊंचाई आदि से डरने के फोबिया होते हैं वैसे ही मोबाइल से भी डरने का फोबिया शब्द है नोमोफोबिया. Nomophobia  यानी वह स्थिति जब आप मोबाइल के बगैर रहने उसे इस्तेमाल नहीं कर पाने का सोचकर खौफजदा हो जाएं. फर्क बस इतना है कि और फोबिया से बचने के लिए हम उनसे दूर रह सकते हैं लेकिन मोबाइल से दूर रहना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो गया है.

  1. Nomophobia – शायद इसीलिये कैंब्रिज डिक्शनरी ने भी नोमोफोबिया को इस साल अपने नए वोटिंग सर्वे में ‘वर्ड औफ द ईयर’ घोषित किया है. इस शब्द का चयन लोगों द्वारा दिए गए वोट के आधार पर किया गया है.

हर साल कैंब्रिज की औनलाइन डिक्शनरी में नए शब्द जोड़े जाते हैं. दरअसल मोबाइल हमारे देश में महामारी की शक्ल लेता जा रहा है. मोबाइल चलाते गर्दन झुकी रहती है और अंगूठा हमेशा स्क्रीन पर रहता है. जिस से रीढ़ की हड्डी से जुड़ी बहुत सी समस्याएं सामने आ रही हैं. आंखें भी खराब हो रही हैं. मोबाइल पर चलते फिरते बात करते लोग दुर्घटना का शिकार हो रहे हैं सो अलग.

2 से 17 साल के 1000 लड़कों पर हुए सर्वे में ज्यादातर की याददाश्त कमजोर मिली जबकि 100 में 25 बच्चों को मोबाइल की लत पाई गयी. आर्ट कंपनीकल ने एक रिसर्च के आधार पर रिपोर्ट पेश की और बताया कि भारतीय औसतन एक दिन में तीन घंटे ऐप्स पर खर्च करते हैं. इनके मोबाइल में 78 ऐप्स होती हैं, जिनमें से 48 का प्रयोग वह महीने में करते हैं. इसके अलावा 2015-17 के बीच भारतीयों ने तीन गुना ज्यादा ऐप्स डाउनलोड किए. वैसे Nomophobia को नो मोबाइल और phobia के अक्षरों से मिलाकर बनाया गया है.

Nomophobia की तरह और भी 3 शब्द ऐसे हैं जो कैंब्रिज डिक्शनरी ने नोमोफोबिया के साथ रेस में उतारे थे. ये शब्द थे ecocide, no-platforming और gender gap. खैर जीत भले ही नोमोफोबिया की हुई हो, लेकिन बाकी तीनों को किसी महामारी से कम नहीं आंक सकते.

  1. Ecocide- वर्ड औफ द ईयर की रेस में दूसरा शब्द ecocide भी था. यह भी किसी वैश्विक महामारी से कम नहीं है. इकोसाइड भी नोमोफोबिया की तर्ज पर दो शब्दों से मिलकर बना है. इकोसिस्टम और सूइसाइड. इसका अर्थ हुआ कि जब किसी भी क्षेत्र के प्राकृतिक वातावरण को बर्बाद करने या खत्म करने का प्रयास किया जाये, तो यह हालात ecocide कहलाते हैं. यह काम तो इफरात से पूरी दुनिया में हो रहा है. प्राकृतिक क्षेत्र नाम मात्र के रह गए हैं. हर जगह कंक्रीट के जंगल है जहां लोभी और स्वार्थी सरकार, इंडस्ट्री वाले व करप्ट नौकरशाही मिलकर दुनिया भर के पर्यावरण को ग्लोबल वार्मिंग की स्टेज तक पहुंचा चुकी हैं. हालंकि इसमें हमारी भागीदारी भी कम नहीं है.
  2. No-platforming- नो प्लैटफौर्मिंग यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की राह में रोड़े अटकाना. डिक्शनरी के मुताबिक इस शब्द को कुछ इस तरह परिभाषित किया गया है: किसी व्यक्ति को अपने विचार को सार्वजनिक करने के लिए मंच मुहैया न कराना ही नो प्लैटफौर्मिंग कहलाती है. देश भर में तार्किक, पूजापाठ के पाखंड और अंधविश्वास के खिलाफ बोलने वाले बुद्धिजीवियों की हत्या होना, उन्हें मीडिया या पब्लिक प्लेटफोर्म में बोलने से रोकना, मौब लिंचिंग आदि परिस्थितियों को नो प्लैटफौर्मिंग के दायरे में देखा जा सकता है. इस लिहाज से समाज के लिए किसी महामारी से कम नहीं है यह शब्द.
  3. Gender gap- हाल में उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति इंदू मल्होत्रा ने कहा है कि जो कानून केवल लिंग के आधार व्यक्तियों के बीच भेदभाव करता है और महिलाओं को मुकदमा दायर करने के अधिकार से वंचित करता है, वह लैंगिक रुप से तटस्थ नहीं है और खारिज कर दिये जाने लायक है. तो समझ लीजिये वर्ड औफ द ईयर की रेस में चौथा शब्द उसी लैंगिक भेदभाव की बात करता है जिसे डिक्शनरी में Gender gap के तौर पर मेंशन किया गया है. इस का मतलब होता हैं लिंग के आधार पर भेदभाव यानी स्त्री के साथ अलग व्यवहार और पुरुष के साथ अलग व्यवहार.

यह भेदभाव तो हमारे जीन में है, धर्म में है और नैतिक शिक्षा की किताबों में भी. आज भी देश दुनिया की बड़ी कंपनियों या कहें प्रभुत्व वाले स्थानों पर महिलाओं की गिनती न के बराबर है. ‘वूमैन औन टौप’ सिर्फ कहने भर का जुमला है लेकिन हकीकत तो यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो टौप की 500 कंपनियां हैं, उनमें सिर्फ 10 प्रतिशत महिलाएं ही वरिष्ठ प्रबंधक हैं. भारत में वरिष्ठ प्रबंधन में महिलाएं सिर्फ 3 प्रतिशत हैं.

शर्म मगर हमको आती नहीं

तो इस लिहाज से ये चारों शब्द भले ही विदेशों में ‘वर्ड औफ द ईयर’ की रेस में थे और जीत नोमोफोबिया की हुई, लेकिन अगर हमारे देश में इन चारों शब्दों के बीच कौम्पीटिशन हो जाए तो चारों शब्द ‘वर्ड औफ द ईयर’ नहीं बल्कि ‘महामारी औफ द डिकेड’ साबित होंगे. और जीतेंगे भी. यह हमारे समाज का कड़वा और नंगा सच है जिस पर हमने शर्मिंदा होना कब का छोड़ दिया है.

भाग्यश्री के ये 4 वायरल वीडियो देख कर हर कोई है हैरान

बौलीवुड एक्ट्रेस भाग्यश्री काफी लंबे समय से फिल्मी पर्दे से गायब हैं. उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत सुपरस्टार सलमान खान के साथ ‘मैंने प्यार किया’ से की थी. इसी फिल्म से उन्हें बौलीवुड में अच्छी पहचान मिली थी.

फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ आज से करीब 29 साल पहले आई थी और इन वर्षों में बहुत कुछ बदल गया. लेकिन भाग्यश्री की लेटेस्ट तस्वीरों को देखें तो उनकी खूबसूरती और उनका ग्लैमर आज भी कायम है.

 

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The bootyworkout ! Do i need to say more….we all need this. #back2basics #workoutmode #bootyworkout #functionaltraining #hamstrings #glutes

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हाल ही में भाग्यश्री मुंबई एयरपोर्ट पर नजर आई थीं. इन तस्वीरों में उनके चेहरे की चमक देखकर उनकी उम्र का अंदाजा भी नहीं लगा पाएंगे. 49 साल की उम्र में भी भाग्यश्री बौलीवुड की कई अभिनेत्रियों को अपनी खूबसूरती से टक्कर दे रही हैं. भाग्यश्री अपने बेटे अभिमन्यु दसानी और बेटी अवंतिका दसानी के साथ अक्सर इवेंट या पार्टी में दिखाई देती रही हैं.

बता दें कि ‘मैंने प्यार किया’ के लिए फिल्मफेयर से बेस्ट डेब्यू फीमेल का पुरस्कार जीतने वाली भाग्यश्री ने फिल्म रिलीज होने के अगले साल ही यानी 1990 में हिमालय दासानी से शादी कर ली थी. अब भाग्यश्री अपने परिवार को प्राथमिकता दे रही हैं. सरल स्वाभाव की नजर आने वाली भाग्यश्री के दो बच्चे हैं. 23 साल का बेटा अभिमन्यु और 21 साल की बेटी अवन्तिका है.

49 साल की हो चुकीं भाग्यश्री की गिनती इंडस्ट्री की फिट एक्ट्रेसेस में होती है. अक्सर एक्ट्रेस अपनी फिटनेस और जिमिंग से जुड़े वीडियो इंस्टाग्राम पर जारी करती हैं. फिटनेस, फैमिली, वेकेशन और फोटोशूट की कई तस्वीरें भाग्यश्री इंस्टाग्राम पर साझा करती रहती हैं. भाग्यश्री अपने लेटेस्ट वीडियो में वर्कआउट करती दिखाई दे रही हैं.

बता दें कि 2014 और 2015 में भाग्यश्री छोटे पर्दे के सीरियल ‘लौट आओ त्रिशा’ में भी दिखी थीं. यह सीरियल काफी लोकप्रिय रहा. इसके अलावा वह 2009 में ‘झलक दिखला जा’ में बतौर प्रतियोगी नजर आ चुकी हैं. सोशल मीडिया पर भाग्यश्री बेहद सक्रिय हैं और लगातार अपनी फोटोज वह अपने सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर शेयर करती रहती हैं.

अवौर्ड विनिंग फिल्‍म पेडलर्स बना चुके डायरेक्‍टर वसन बाला अपनी फिल्म ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ लेकर आए हैं. इसे 43वें टोरंटो अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में ‘ग्रोल्स व्यूअर्स च्वाइस अवौर्ड’ से नवाजा गया है. इसी फिल्म से भाग्यश्री के बेटे अभिमन्यु ने अपने बौलीवुड सफर की शुरुआत की. वहीं उनकी छोटी बेटी अवंतिका फिलहाल अपनी पढ़ाई पूरी कर रही हैं.

अपनी बेटी के इशारों पर नाचते हैं धोनी, यकीन नहीं आता तो देखिए ये वीडियो

इन दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो बहुत तेजी से वायरल हो रहा है जिसमे महेंद्र सिंह धोनी अपनी बेटी जीवा से डांस सीख रहे हैं.

इस वीडियो में जीवा अपने पापा धोनी को डांस स्टेप्स सिखाती दिख रही हैं. जिस तरह जीवा डांस कर रही हैं, धोनी उनकी नकल करते दिख रहे हैं.

 

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Even better when we are dancing @zivasinghdhoni006

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जीवा बीच-बीच में डांस भूल भी जाती है और फिर याद करके धोनी की सिखाने लगती है. बता दे धोनी वैसे सोशल मीडिया पर बहुत एक्टिव रहते हैं और आये दिन अपनी तस्वीरें और वीडियो शेयर करते रहते हैं.

ये वीडियो शेयर करते ही इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो रहा है अब तक इस वीडियो को 25 लाख से ज्यादा लोग देख चुके है.

गेमिंग का है शौक तो डाउनलोड करें ये ऐप्स

खाली वक्त में ज्यादातर लोगों को स्मार्टफोन पर गेम्स खेलना पसंद होता है. लेकिन कुछ गेमिंग ऐप ऐसे होते हैं जो स्मार्टफोन में ज्यादा स्पेस लेते हैं और फोन के स्टोरेज को कम कर देते हैं. ऐसे में उन स्मार्टफोन्स में गेम खेलना मुश्किल हो जाता है जिनकी परफॉर्मेंस अच्छी और फास्ट ना हो.

चाहते हुए भी आप अपने पसंदीदा गोम ऐप को डाउनलोड नहीं कर पाते हैं. तो आज हम आपके कुछ ऐसे गेमिंग ऐप्स के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे आप आसानी से कम स्टोरेज के साथ डाउनलोड कर सकते हैं.

पिक्सल डंग्योन (Pixel Dungeon)

यह पिक्सल-आर्ट ग्राफिक्स और साधारण इंटरफेस के साथ एक roguelike गेम है. इस गेम में, आप पिक्सल डंगऑन की गहराई का पता लगा सकते हैं, उपयोगी वस्तुओं को इकट्ठा कर सकते हैं, एजेंडर की ताबीज खोजने के लिए भयंकर राक्षसों से लड़ सकते हैं.

यह बहुत कम स्टोरेज में आती है. इसके लिए आपके फोन में सिर्फ 2.84MB स्टोरेज की आवश्यकता है और बिना किसी अतिरिक्त अनुमति के इसे डाउनलोड किया जा सकता है.

गायरो (Gyro)

यह एक पजल गेम है. यह खेलने में आसान है. इसके अलावा, गैरो आपके मोबाइल फोन में 3.36 MB के आसपास स्टोरेज लेती है.

हॉपलाइट (HopLite)

यह गेम मैप में इस्तेमाल होने वाले कम ग्राफिक्स के टैक्टिकल मूवमेंट पर फोकस करता है. आप इस गेम को कई उपकरणों में प्रीमियम फीचर्स के लिए भी खरीद सकते हैं. यह एक आसान गेम है, जो लगभग 5.5 MB साइज में आता है.

इंफेक्टोनेटर (Infectonator)

यह गेम 56.7 MB साइज की है. यह एक सरल बिंदु और टैप खेल है. आप इसे प्ले स्टोर पर फ्री डाउनलोड कर सकते हैं.

लाग ऑफ एविल फ्री (League of Evil Free)

यह गेम आपकी मेमोरी से 16.8MB स्टोरेज स्पेस लेता है. इसके सुपर एजेंट एक्शन के करीब 160 लेवल हैं. आप इसे प्ले स्टोर के माध्यम से अपने मोबाइल पर मुफ्त में डाउनलोड कर सकते हैं. यदि आप खेल पसंद करते हैं, तो आप प्रीमियम वर्जन भी खरीद सकते हैं.

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