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‘लिटिल मास्टर’ की बड़ी लताड़

बड़े से बड़े दिग्गज तेज गेंदबाज की स्विंग होती गेंदों का सामना अपने ही तरह के सब से अलग हेलमेट को पहन कर खेलने वाले ‘लिटिल मास्टर’ सुनील गावस्कर गुस्से से तमतमा रहे हैं. भारत की क्रिकेट टीम के कप्तान रह चुके सुनील गावस्कर ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड से कड़े सुर में सवाल किया है कि इंगलैंड में 6 महीने बाद होने वाले वर्ल्ड कप से पहले शिखर धवन और महेंद्र सिंह धौनी को घरेलू टूर्नामेंटों से बाहर रहने की इजाजत कैसे दी गई?

यह सवाल पूछने की बड़ी अहम वजह यह है कि फिलहाल शिखर धवन भारतीय टेस्ट टीम से बाहर बाहर हैं और ऑस्ट्रेलिया के मेलबोर्न में अपने परिवार के साथ समय बिता रहे हैं, जबकि महेंद्र सिंह चौनी ने 1 नवंबर, 2018 को वेस्टइंडीज के खिलाफ हुई सीरीज के बाद से क्रिकेट नहीं खेला है. उन्हें ऑस्ट्रेलिया में हुई टी20 टीम में नहीं चुना गया था, जबकि वे साल 2014 में ही टेस्ट क्रिकेट से संन्यास ले चुके हैं. वे सिर्फ वनडे टीम का हिस्सा हैं.

सुनील गावस्कर ने एक मीडिया हाउस से बात करते हुए कहा, ‘हमें धवन और धोनी से नहीं पूछना चाहिए कि वे घरेलू क्रिकेट क्यों नहीं खेल रहे हैं बल्कि हमें बीसीसीआई और चयनकर्ताओं से पूछना चाहिए कि उन्होंने खिलाड़ियों को घरेलू क्रिकेट नहीं खेलने की इजाजत कैसे दी जबकि वे देश के लिए नहीं खेल रहे हैं?’

उन्होंने आगे कहा, ‘अगर भारतीय टीम को अच्छा खेलना है तो खिलाड़ियों को सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना होगा… ‘धौनी ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टी20 सीरीज नहीं खेली. उस के पहले वेस्टइंडीज के खिलाफ टेस्ट सीरीज और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ आगामी टेस्ट सीरीज में भी वे टीम में नहीं हैं. उन्होंने आखिरी मैच 1 नवंबर को खेला था और अगला मैच जनवरी में खेलेंगे. वर्ल्ड कप टीम में उन की जगह को ले कर और सवाल उठेंगे.’

सुनील गावस्कर ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘उम्र के साथ खेल में बदलाव आता है. अगर आप घरेलू स्तर पर ही क्रिकेट खेलते रहें, तो कैरियर का विस्तार करने में मदद मिलती है और अभ्यास भी हो जाता है.’

सुनील गावस्कर की यह सलाह बेवजह की नहीं है क्योंकि अभी भारत में घरेलू स्तर पर रणजी मैच खेले जा रहे हैं जो इन दोनों बल्लेबाजों के लिए अपनी फॉर्म को बनाए रखने के लिए मददगार साबित हो सकते हैं. इन के टीम में आने से इन के साथी खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ेगा और यह जो प्रथा सी बनती जा रही है कि अगर आप स्टार खिलाड़ी हैं तो घरेलू मैच नहीं खेलेंगे या किसी तरह खेलने से बच जाएंगे, उस पर भी रोक लगेगी.

इस बारे में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को सख्त कदम उठाने चाहिए क्योंकि खिलाड़ियों से ज्यादा बड़ी गलती तो बोर्ड की है जो न जाने किस वजह से उन्हें इतनी छूट देता है.

‘भीड़तंत्र’ के आगे बौनी हुई सरकार

सुप्रीम कोर्ट से लेकर सरकार तक कह चुकी है कि भीड़तंत्र का आतंक खत्म होना चाहिये. बुलंदशहर की घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि ‘भीड़तंत्र’ कानून और प्रशासन दोनों पर हावी है. बुलंदशहर में वहां के कोतवाल को जिस तरह से मारा गया वह ‘भीड़तंत्र’ के दुस्साहस का प्रतीक है. बुलंदशहर की  घटना बड़ी जरूर है पर भीड़तंत्र के हावी होने की छोटी छोटी घटनायें कम नहीं हैं.

पुलिस और कानून के पंगु होने से भीड़ का साहस बढ़ता है. भीड़तंत्र का राज कानून और प्रशासन दोनोंके मुंह पर तमाचे जैसा है. उत्तर प्रदेश की योगी सरकार यह कह कर नहीं बच सकती कि इसके पहले की सरकारों में ज्यादा बड़ी घटनायें होतीं थीं.

बुलंदशहर के स्याना कोतवाल सुबोध कुमार सिंह की जीप को बीच खेत में घेरकर हमला किया गया. पुलिस चौकी पर आग लगाने और तोड़फोड़ करने के साथ ही साथ पुलिसकर्मियों को एक किलोमीटर तक दौडाया गया. गौ तस्करों पर काररवाई को लेकर हिन्दू संगठनो के कार्यकर्ताओं ने पुलिस पर तब पथराव किया जब पुलिस ने हवाई फायरिंग की.

इसमें सुमित नामक युवक घायल हो गया इसके बाद बलवाईयों ने पुलिस को घेर लिया. जिसमें कोतवाल सुबोध कुमार सिंह की जान गई. सुबोध की मौत पर सवाल इसलिये भी उठ रहे है क्योकि 28 सितंबर 2015 को बिसाहडा कांड के पहले जांच अधिकारी वही थे. इस घटना में भी गौ हत्या की सूचना के बाद इकलाख की हत्या हुई थी.

दूसरी तरफ इस घटना के राजनीतिक मतलब भी निकाले जा रहे है. कांग्रेस के प्रवक्ता सुरेन्द्र सिंह राजपूत ने कहा कि इस घटना के द्वारा गौरक्षा का मसला उठा कर राजस्थान विधानसभा चुनाव को प्रभावित करने का प्रयास भी किया जा रहा है.

राजनीतिक आरोपों के बीच सच्चाई यह है कि पुलिस का प्रभाव और दबाव खत्म सा हो रहा है. कानून व्यवस्था के मामले में सरकार फेल हो रही है. राजधनी लखनऊ में ही भाजपा के कार्यकर्ता प्रत्यूषमणि त्रिपाठी की हत्या में उन लोगों का नाम सामने आया जिन्होंने कुछ दिन पहले उनके घर पर हमला कर मारपीट की थी. प्रत्यूषमणि त्रिपाठी के परिवार वालों का आरोप है कि मारपीट की शिकायत पर पुलिस ने कड़े कदम उठाये होते तो विरोधी यह काम नहीं कर पाते और प्रत्यूषमणि त्रिपाठी जिंदा होते.

शिकायत पर पुलिस जब कार्रवाई नहीं करती तो दबंगों के हौसले बढते हैं. राजधनी लखनऊ के ही निगोंहा थाना क्षेत्र में नंदौली गांव के प्रधान अमृतलाल पर जानलेवा हमला हुआ. इसी तरह सीतापुर में एक महिला ने अपने साथ छेड़छाड़ की घटना की शिकायत पुलिस में की तो पुलिस ने उसकी शिकायत दर्ज नहीं की.

दंबगों ने पुलिस में शिकायत करने से नाराज होकर महिला को जलाने का प्रयास किया. पुलिस अगर पहली ही शिकायत पर बिना किसी भेदभाव के कड़े कदम उठा ले तो अपराध करने वालों और भीड़तंत्र के हौसले न बढ सकें. अगर अपराधियों के हौसले बढते हैं तो वह दूसरों के लिये ही नहीं पुलिस के लिये भी खतरा बनता है. बुलंदशहर की घटना इसका प्रमाण है.

सोशल मीडिया से दूरी अच्छी

एक नए अध्ययन के मुताबिक यदि आप अपनी मानसिक सेहत दुरुस्त रखना चाहते हैं तो सोशल मीडिया पर  निश्चित समय से ज्यादा सक्रिय न रहें. अधिक से अधिक प्रतिदिन 30 मिनट तक का समय आप फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट जैसे सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर गुजार सकते हैं. पर इस से अधिक इंवौल्वमेंट आप की मानसिक सेहत पर भारी पड़ सकती है.

सोशल एंड क्लीनिकल साइकोलौजी नामक जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक. दिन में केवल 30 मिनट का समय सोशल मीडिया को देने से हमारी मानसिक सेहत बेहतर रहती है.

यूनिवर्सिटी औफ पेन्सील्वेनिया के शोधकर्ताओं ने कुल 143 अंडरग्रैजुएट स्टूडेंट्स को ले कर एक अध्ययन किया. इन प्रतिभागियों पर 2 ट्रायल किए गए. पहला ट्रायल स्प्रिंग सीजन में और अगला कुछ महीने बाद किया गया. प्रतिभागियों को तीन प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफौर्मस, फेसबुक, इंस्टाग्राम और स्नैपचैट पर 1 सप्ताह तक एक्टिव रहने को कहा गया. इस के बाद प्रतिभागियों की मानसिक सेहत का आकलन 7 फैक्टर्स के आधार पर किया गया. ये फैक्टर्स थे, सामाजिक सहयोग, अकेलापन, खो जाने का डर, सेल्फ एक्सपेक्टेशन, सेल्फएस्टीम, एंजायटी और डिप्रेशन.

इस के बाद प्रतिभागियों को अलगअलग 2 समूहों में बांट कर इन पर 3 सप्ताह तक अध्ययन किया गया.  एक समूह को कहा गया कि वह सोशल मीडिया का प्रयोग पहले जैसा करता रहे तो दूसरे समूह के सदस्यों को 1 दिन में एक प्लेटफार्म पर केवल 10 मिनट तक सक्रिय रहने की अनुमति दी गई.

इस तरह जिन प्रतिभागियों ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल केवल 30 मिनट तक सीमित रखा उन्होंने स्वयं को काफी बेहतर महसूस किया जबकि दूसरे समूह के प्रतिभागी कई तरह की मानसिक परेशानियों के शिकार पाए गए. उन्होंने अवसाद और अकेलापन अधिक महसूस किया.

सोशल साइट्स का बढ़ता जुनून

आज लोग अपने जीवन से जुड़े हर छोटेबड़े खूबसूरत लम्हे को सोशल साइट्स पर शेयर करने लगे हैं. मस्ती भरे पल हो या ग्रुप/ फैमिली आउटिंग, जौब से जुड़े अचीवमेंट्स हो या कोई फैमिली फंक्शन, बच्चों की नटखट अदाएं हो या किसी से बढ़ती नजदीकियां, हर ख़ुशी को दूसरों से शेयर करे बगैर लोगों का दिल नहीं मानता.

इधर दूसरों की हंसती मुस्कूराती जिंदगी देखते देखते हमारे अंदर का खालीपन बढ़ता जाता है. हम अवसाद के शिकार होने लगते हैं. हमारी मानसिक सहनशक्ति घटने लगती है.

झूठी जिंदगी जीते हैं हम

ऐसा नहीं है कि गम या परेशानियां केवल आप की जिंदगी में ही हैं और दूसरे लोग सिर्फ शानदार जिंदगी के मजे ले रहे हैं. हकीकत यह है कि लोग अपने दुख तकलीफ तनाव या परेशानी भरे लम्हों को न के बराबर शेयर करते हैं. जैसे हर कोई फोटो खिंचवाते वक्त मुस्कुराना पसंद करता है ताकि वह खूबसूरत दिख सके, वैसे ही सोशल मीडिया पर लोग केवल अपनी जिंदगी के बेहतर पहलू को ही शेयर करना पसंद करते हैं. झूठी जिंदगी का प्रदर्शन बड़े चाव से करते हैं. कभी भी अपने रोते  झगड़ते या गुमसुम, उदास बैठे चेहरे शेयर करना पसंद नहीं करते.

जब कि हमारा नजरिया अलग होता है. इन तस्वीरों और वीडियोज को देखते हुए हमें महसूस होता है जैसे हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं और दूसरों से कितने पीछे रह गए हैं. यह खलिश हमें मानसिक रूप से कमजोर बनाने लगती है.

दूसरों से तुलना करने की मनोवृत्ति से बचें

व्हाट्सएप, फेसबुक या इंस्टाग्राम पर दूसरों के हंसते खिलखिलाते, एंजौय करते चेहरे कहीं न कहीं हमें अंदर से अकेलेपन का एहसास कराते हैं. न चाहते हुए भी हम दूसरों की खुशहाल जिंदगी से अपनी बदहाल जिंदगी की तुलना करने लगते हैं और अंदर ही अंदर तनाव, एकाकीपन और घुटन महसूस करने लगते हैं.

दूसरों की तस्वीरें और वीडियोज देखते वक्त हम यह नहीं सोचते कि दुख और परेशानी सब की जिंदगी में होते हैं. मगर जब बात दूसरों के साथ शेयर करने की हो तो लोग केवल अपनी जिंदगी के खुशनुमा पलों को ही शेयर करते हैं.

इसलिए बेहतर है कि या तो इस हकीकत को समझते हुए दूसरों की प्रोफाइल देखें या फिर बेवजह सोशल साइट्स पर समय और ऊर्जा बर्बाद करने से बचें. यदि उतना वक़्त आप अपनी जिंदगी और रिश्तो को बेहतर बनाने में लगाएं तो आप की अपनी जिंदगी ज्यादा खूबसूरत हो जाएगी.

ज्यादा जीना चाहते हैं तो संतुलित मात्रा में लें कार्बोहाइड्रेट

अगर आप ज्यादा और स्वस्थ जीना चाहते हैं तो ये खबर आपके लिए है. अच्छी जिंदगी के लिए जरूरी है कि आप कार्बोहाइड्रेट की बहुत ही संतुलित मात्रा लें. हाल ही में हुई एक स्टडी में ये बात सामने आई कि भोजन से जरूरत से कम या ज्यादा मात्रा में कार्बोहाइड्रेट का सेवन करने से समय से पहले मौत की संभावना तेज हो जाती है.

स्टडी की रिपोर्ट में बताया गया है कि कार्बोहाइड्रेट में 40 फीसदी से कम या 70 फीसदी से ज्यादा उर्जा के सेवन से मौत का खतरा बढ़ जाता है. लेकिन कार्बोहाइड्रेट के रूप में 50-55 फीसदी ऊर्जा ग्रहण करने वालों को मौत का खतरा कम रहता है.

इस स्टडी को बोस्टन के हार्वर्ड टी. एच. चैन स्कूल औफ पब्लिक हेल्थ में प्रोफेसर वाल्टर विलेट ने कहा, इन नतीजों में एक साथ कई पहलू हैं, जो विवादास्पद रहे हैं. बहुत ज्यादा और बहुत कम कार्बोहाइड्रेट नुकसानदेह हो सकता है, पर इसमें वसा, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट के प्रकार का महत्वपूर्ण रोल है.

इस स्टडी में 45 से 64 साल की आयु वर्ग के लगभग 15,500 लोगों को शामिल किया गया था. पुरुष प्रतिभागियों को 600-420 किलो कैलोरी ऊर्जा रोज ग्रहण करते थे, जबकि महिलाएं 500-3600 किलो कैलोरी.

शोधकर्ताओं ने पाया कि सीमित मात्रा में कार्बोहाइड्रेट खाने वालों की आयु आवश्यकता से कम कार्बोहाइड्रेट खाने वालों की तुलना में चार साल अधिक पाई गई, जबकि अधिक कार्बोहाइड्रेट खाने वालों की तुलना में एक साल अधिक थी.

धूमिल होता पाखंड

कर्नाटक में हुए उपचुनावों के परिणाम कांग्रेस के पक्ष में जाने से यह बात सिद्ध हो गई है कि भ्रष्टाचारमुक्त और अच्छे दिनों के सपनों के पीछे धार्मिक धंधे के प्रचारप्रसार के एजेंडे की राजनीति का एकाधिकार नहीं रह गया है. कांग्रेस को 5 सीटों में से 4 पर भारी जीत मिली है. भाजपा का गढ़ बेल्लारी भी उस के हाथ से निकल गया है. राजस्थान, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, मिजोरम के विधानसभा चुनावों में चाहे जो भी हो, पर 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद केंद्र में किसी की भी सरकार बने, अब बात एकतरफा नहीं होगी.

हिंदू धर्म के स्पष्ट और छिपे दोनों उद्देश्यों का लक्ष्य एक ही है, वर्णव्यवस्था को कायम रखना और सर्वोच्च वर्ण का एकाधिकार रखना. धर्म का काम भगवान की शरण में ले जाना नहीं, बल्कि मंदिर की शरण में ले जाना है जहां भक्त अपनी जेबें अघोषित टैक्स के रूप में खाली कर, राज जैसा है, अच्छा है, को मान लें.

धर्म ने हमेशा यही कहा है कि जो राजा दान करता है, यज्ञ कराता है, गोदान करता है, ऋषिमुनियों को औरतें उपलब्ध कराता है, वही श्रेष्ठ है. पुराणों, महाभारत, रामायण की कथाएं इन प्रसंगों से भरी पड़ी हैं. इन में पुरोहितों को पैसा देना और औरतों का दान किया जाना ही मुख्य है. आज भाजपा सरकारें यही करने में लगी हुई हैं.

सरदार पटेल की मूर्ति बनाना, राममंदिर का मुद्दा उठाना, इलाहाबाद, फैजाबाद का नाम बदलना, कुंभ की महान तैयारी करना, देशभर के तीर्थस्थलों को सुधारना भाजपाई सरकारों की प्राथमिकता बन गई है. पिछली सरकार द्वारा शुरू किए गए काम, जो अब पूरे हो रहे हैं, का श्रेय ले कर मौजूदा सरकार चाहे कह दे कि यह हो गया, वह हो गया पर 5 सालों में कुछ नया दिखा नहीं है.

यह न भूलें कि यह देश हमेशा से ही कुछ न कुछ करता रहा है. तभी विदेशी सदियों से यहां आते रहे. अच्छी भूमि, अच्छा मौसम होने के कारण यह भूभाग दुनिया में अद्भुत है. पर इस का सदुपयोग तकनीकी तरक्की के बावजूद नहीं हो रहा है. 250 वर्षों में अमेरिका ने बंजर, खाली जमीन पर शहर, फैक्टरियां उगा लीं.

50 वर्षों में चीन ने 89 डौलर प्रतिव्यक्ति आय बढ़ा कर 9,000 डौलर कर ली, अमेरिका ने 3,000 से बढ़ा कर 60,000 डौलर कर ली जबकि भारत ने 81 से बढ़ा कर सिर्फ 1,900 डौलर ही की. हमारी क्षमता आसानी से 20,000 डौलर करने की थी पर पहले कांग्रेस सरकारों के समाजवादी ढोंग और अब धार्मिक सरकारों के धर्म के ढोंग के चलते देश पिछड़ता जा रहा है.

दुनिया की दूसरी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था चाहे हम बन जाएं और चाहे सब से तेज गति से बढ़ने का दावा कर लें, लेकिन हाल उस गरीब का सा होगा ही जिस के हाथ में एक लोटे की जगह 3 लोटे हो गए. इस से ज्यादा कुछ नहीं. इन उपचुनावों के परिणामों से लगा है कि कम से कम एक और पाखंड का मोह कुछ फीका पड़ा है.

पाखंड से जुड़ी है नामकरण की राजनीति

धर्म में नामकरण एक तरह का संस्कार होता है, जिस में पूजापाठ के बाद नामकरण किया जाता है. धर्म की राजनीति करने वाली भाजपा शहर को पौराणिक कथा से जोड़ कर उस का नाम बदल रही है. इस में महाभारत और रामायण की कथाओं को प्रमुखता के साथ प्रयोग किया जा रहा है. राम और रामायण का राजनीतिकरण हो चुका है.

अब वोट पाने के लिए शहरों के नामों को बदला जा रहा है. दीवाली की पूजा के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने फैजाबाद का नाम बदल कर अयोध्या रख दिया. अयोध्या जिला मुख्यालय फैजाबाद से करीब 11 किलोमीटर दूर सरयू नदी के किनारे बसा है. पहले यह फैजाबाद जिले में आता था. अयोध्या को महत्त्व देने के मकसद से

योगी सरकार ने जिले का नाम बदल कर अयोध्या रख दिया. जिला होने के साथ ही फैजाबाद मंडल यानी कमिश्नरी भी था.

अयोध्या से पहले योगी सरकार ने इलाहाबाद का नाम बदल कर प्रयागराज रख दिया. प्रयाग नाम की जगह इलाहाबाद शहर के समीप ही है. अब प्रयागराज नाम रखने के बाद इलाहाबाद का अस्तित्व खत्म हो गया है. धार्मिक शहरों के नाम बदलने का विरोध विरोधी दल भी नहीं कर पाएंगे और सत्ता बदलने के बाद भी इन शहरों का नाम नहीं बदला जा सकेगा.

धर्म से जुड़ी नामकरण की राजनीति को बढ़ाते हुए उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का नाम बदल कर लखनपुर करने की मांग तेज हो गई है. पौराणिक कथा के अनुसार, लखनऊ को राम के भाई लक्ष्मण ने बसाया था. ऐसे में अब इस का नाम बदल कर लखनपुर करने की मांग तेज हो गई है. ऐसे ही आगरा और मुजफ्फरपुर का नाम बदल कर अग्रवन और लक्ष्मीनगर करने की मांग बढ़ रही है.

आगरा में ताजमहल को ले कर हिंदुत्व की राजनीति जोर पकड़ती जा रही है. ऐसे में वहां का नाम और पहचान बदलने की मांग तेज हो गई है. नामकरण की राजनीति में इस बात का खास खयाल रखा जा रहा है कि मुसलिम नाम बदल कर हिंदू नाम रख दिए जाएं. इस बात का विरोध भाजपा के सहयोगी नेता ही कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश सरकार में सहयोगी सुहेलदेव पार्टी के मुखिया ओम प्रकाश राजभर ने कहा, ‘‘भाजपा को शहरों के नाम बदलने के पहले अपने मुसलिम नेताओं के नाम बदलने चाहिए.’ नामकरण की राजनीति पर उठे सवालों का जवाब देते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, ‘मुझे जो नाम सही लगा वह किया. यह जनता की मांग भी थी.’’

नाम नहीं काम बदलिए

उत्तर प्रदेश में नाम बदलने की राजनीति पुरानी है. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की आलोचना करने वाली भारतीय जनता पार्टी भी उसी राह पर चल रही है. योगी सरकार ने मुगलसराय से ले कर फैजाबाद तक के तमाम नाम बदल दिए हैं. इस के बाद भी इस समस्या का कोई छोर दिखाई नहीं पड़ रहा है. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सहित कई जिलों के नाम बदलने की मांग भी चल रही है. संभव है कि योगी सरकार चुनाव सामने देख कुछ और शहरों के नाम भी बदल दे.

असल में शहरों के नाम बदलने के पीछे की मंशा केवल अपने वोटबैंक को खुश रखने की होती है. इस से उस शहर की दशा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. ऐसे बहुत से शहरों के उदाहरण सामने हैं.

राजनीतिक दल इस बहाने यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि अगर उन की सरकार रही तो राजतंत्र की तरह वह कोई भी फैसला ले सकते हैं. जिस तरह से मायावती और अखिलेश मूर्तियां, पार्क और जिलों के नाम बदलने में लगे थे, अब वही योगी सरकार भी कर रही है. योगी सरकार को देखना चाहिए कि पार्क और मूर्तियां बनवाने के बाद भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती हाशिए पर चली गईं.

भाजपा की राममंदिर राजनीति भी इस प्रदेश के लोगों ने पसंद नहीं की थी. 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा ढहने के बाद 2017 तक भाजपा बहुमत की सरकार बनाने से दूर रही थी. प्रदेश की जनता ने राममंदिर की राजनीति को नकार दिया था. ऐसे में फिर से राममंदिर की राजनीति भाजपा को राजनीति से कहीं बाहर न कर दे, यह उसे सोचना चाहिए.

फेल है नाम की राजनीति

उत्तर प्रदेश के इतिहास को देखें तो 1990 के बाद से यह चलन तेज हो गया है. 1990 के पहले कांग्रेस के कार्यकाल में भी ऐसे बदलाव कहींकहीं देखने को मिलते हैं. उस समय यह कभीकभी ही होता था.

जब मंडल और मंदिर की राजनीति शुरू हुई, इस चलन ने जोर पकड़ लिया. बसपा नेता मायावती ने कई शहरों के नाम बदले और कुछ नए जिले भी बना दिए. सपा की सरकार ने मायावती के कुछ फैसलों को बदला और पुराने शहरों के नाम बहाल भी हो गए. अपनीअपनी सरकार में ये बदलाव होने लगे. दलित विचारक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘राजशाही के जमाने में जब एक राजा दूसरे राजा के राज्य में कब्जा करता था तो वहां पर अपनी प्रभुसत्ता को दिखाने के लिए जीत का स्तंभ बनाता था. उसी तरह लोकतंत्र में राजनीतिक दल अपना वोटबैंक बनाने के लिए ऐसे फैसले लेने लगे हैं.’’

बसपा ने अपने वोटरों को खुश करने के लिए अंबेडकर पार्क, रमा बाई पार्क, कांशीराम पार्क अपने राज में बनवाए और प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने अपनी मूर्ति के साथ ही कई दलित महापुरुषों की मूर्तियां भी लगवाईं.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और दिल्ली के करीबी नोएडा में ऐसे पार्क आज भी मौजूद हैं. मायावती के समय में अंबेडकर नगर, संतकबीर नगर, सिद्धार्थ नगर, गौतमबुद्ध नगर जैसे कई नाम इस का उदाहरण हैं. नए जिले बनने के बाद भी यहां के हालात नहीं सुधरे. अखिलेश सरकार ने अपने समय में जनेश्वर पार्क बनाया और कई जिलों के नाम बदले. इस के बाद भी वे अपने को खुश नहीं रख पाए और उन की बहुमत की सरकार अगले चुनाव में धराशायी हो गई थी. भाजपा की ही तरह 2007 में मायावती और 2012 में अखिलेश बहुमत से मुख्यमंत्री बने और अगला ही चुनाव हार गए.

सबक नहीं सीखा

योगी सरकार ने पहले की सरकारों के कामों से कोई सबक नहीं सीखा और सत्ता में आने के बाद विकास की जगह पर नाम बदलने वाले काम करने लगी. सब से पहले योगी सरकार ने मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदल कर दीनदयाल उपाध्याय नगर कर दिया. इस के बाद इलाहाबाद का नाम बदल कर प्रयागराज कर दिया. अब फैजाबाद का नाम बदल कर अयोध्या कर दिया. लखनऊ के इकाना क्रिकेट स्टेडियम का नाम बदल कर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर रख दिया. यह सिलसिला अभी चल रहा है. सत्ता से जुड़े कुछ लोगों द्वारा आगरा, लखनऊ और कई दूसरे शहरों के नाम भी बदलने की मांग उठाई जा रही है.

जिस तरह से बसपा और सपा ने दलित और पिछडे़ वर्ग को खुश करने के लिए नाम बदलने की राजनीति की, उसी तरह योगी सरकार अपने हिंदुत्व के वोटबैंक को खुश करने के लिए काम कर रही है. ऐसे में यह देखना जरूरी है कि जिस तरह से सपाबसपा के कामों से दलितपिछड़ों को कुछ हासिल नहीं हुआ वैसे ही इस तरह की दिखावे की राजनीति से हिंदुओं को भी कुछ हासिल नहीं होगा.

राजनीतिक दल केवल सत्ता में बने रहने की राजनीति करते हैं. उन का मकसद किसी भी तरह से सत्ता में बने रहने और राज करने का होता है. लोकतंत्र में जनता का जागरूक होना जरूरी है. उसे सरकारों पर विकास की राह पर चलने के लिए दबाव डालना चाहिए. सरकार जनता को विकास, नौकरी, सड़क, पानी, शिक्षा, भ्रष्टाचार और सेहत के मुददों से दूर मूर्तियां, पार्क और नाम बदलने जैसे काम करने का दिखावा कर खुश करने का प्रयास करती है. कई बार सरकारों को लगता है कि वे जनता को बरगलाने में सफल हो गई हैं पर हकीकत में ऐसा नहीं होता. अगर मूर्तियां, पार्क और जिलों के नाम बदलने से सरकार बनती और लोग वोट देते तो बसपा नेता मायावती कभी चुनाव न हारतीं.

मायावती 1995 से 2007 तक 4 बार प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. इस के बाद 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद लगातार उन को हार का सामना करना पड़ा. 2012 के विधानसभा चुनाव में हार का सिलसिला 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में जारी रहा. बसपा के गठन के बाद से सब से खराब हालत में बसपा और मायावती पहुंच गई हैं.

भाजपा के 1991 में बहुमत की सरकार बनाने के बाद जब उस पर अयोध्याकांड का दाग लगा तो 15 साल वह बहुमत से दूर रही. 2014 में उसे बहुमत मिला. अब अगर भाजपा

वापस अपने दिखावे की राजनीति पर जाएगी तो उस के लिए आगे का सफर मुश्किल हो जाएगा. राजनीतिक दलों को अपने विरोधी दलों की हार से सबक लेना चाहिए.

भाजपा ने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बना कर प्रदेश के हिंदुत्व वोटबैंक को खुश रखने की कोशिश की. योगी आदित्यनाथ प्रदेश को विकास की राह पर ले जाने की जगह वोटबैंक को खुश करने की राजनीति कर रहे हैं. इस का यह परिणाम हुआ कि योगी के गढ़ गोरखपुर में भाजपा लोकसभा का उपचुनाव हार गई. यह सीट खुद योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से खाली हुई थी. इसी तरह उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की सीट फूलपुर भी भाजपा उपचुनाव में हारी. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कैराना विधानसभा सीट और नूरपुर की लोकसभा सीट भी भाजपा के हाथ से निकल गईं. ऐसे में योगी सरकार की छवि का अंदाजा लगाया जा सकता है.

2019 के लोकसभा चुनाव में योगी सरकार के कामकाज का प्रभाव चुनाव पर पड़ेगा. जिस तरह से योगी सरकार का प्रदर्शन है, उस से भाजपा के लिए 2014 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले आधी सीटें भी हासिल कर पाना मुश्किल नजर आ रहा है.

आरडी और एफडी सब से ज्यादा सुरक्षित

निवेश की जब भी बात आती है, सब से पहले प्राथमिकता सुरक्षित निवेश होता है. एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो सुरक्षित निवेश करना चाहता है. निवेश करने वाले को यह लगता है कि उस का पैसा सुरक्षित रहे. इस के बदले अगर थोड़ाबहुत ब्याज में नुकसान हो रहा हो तो उसे कोई खास फर्क नहीं पड़ता. ऐसे निवेशकों के लिए एफडी यानी फिक्स्ड डिपौजिट और आरडी यानी रिकरिंग डिपौजिट निवेश के सब से सुरक्षित तरीके हैं. इन की लोकप्रियता का अंदाजा इस से लगाया जा सकता है कि बैंकों के साथ ही पोस्टऔफिस और बचत के दूसरे माध्यमों में इस को प्रमुख निवेश के रूप में रखा जाता है.

आरडी और एफडी लोकप्रिय इसलिए हैं क्योंकि इन में एक तय समय के लिए पैसा जमा किया जाता है. पैसा जमा करते समय ही निवेशक को यह पता होता है कि उसे जमा पैसे पर तयशुदा निश्चित रकम मिलेगी.

एफडी यानी एकमुश्त सुरक्षित निवेश

तयशुदा रकम मिलने के भरोसे के कारण ही आरडी और एफडी को सुरक्षित निवेश माना जाता है. एफडी के लिए अलगअलग बैंकों में कम से कम और ज्यादा से ज्यादा की अलग अवधि निर्धारित है. यह समय 15 दिन से ले कर 3 साल के ऊपर तक होता है. जब से बैंकों की ब्याजदर तेजी से बदलने लगी है, 3 साल की समयसीमा को सब से अच्छा निवेश माना जाता है.

एक समय एफडी की ब्याजदर 10 फीसदी से ऊपर चली गई थी. अब भी यह 7 से 8 प्रतिशत के करीब है. एफडी में मिलने वाली ब्याज की रकम को निवेशक चाहे तो जमा की मियाद पूरी होने पर एकसाथ ले सकता है. बैंक यह सुविधा भी देता है कि ब्याज के रूप में मिलने वाली रकम ग्राहक यदि चाहे तो हर माह या हर तीसरे माह उस के बचत खाते में स्थानांतरित कर दी जाती है.

अपने पैसों को एफडी में निवेश करने का फैसला निवेशक को अपनी जरूरत के हिसाब से लेना चाहिए. अगर निवेशक को समयसमय पर पैसे की जरूरत पड़ती है तो उसे ब्याज की रकम को हर माह या हर तीसरे माह लेने का औप्शन चुनना चाहिए. इस से उस की मूल रकम एफडी के रूप में बैंक में जमा होगी और ब्याज के रूप में मिलने वाली रकम से वह अपने खर्च चला सकता है.  इस का एक लाभ यह है कि बचत खाते में आए पैसों पर बचत बैंक खाते पर मिलने वाला ब्याज भी मिलेगा. ऐसे में एक ही रकम से 2 तरह के ब्याज भी मिलते हैं.

एफडी की खासीयत यह है कि इस का पैसा घटता नहीं है. बैंक ने एफडी करते समय जो ब्याजदर देने का वादा किया था वही वह देता है. इस बीच, बैंक अगर अपनी ब्याजदर कम भी करता है तो एफडी की ब्याजदर में कोई बदलाव नहीं होगा.

निवेशक को अगर यह लगता है कि उसे सालदोसाल बाद एक तय समय में पैसों की जरूरत पड़ने वाली है तो उसे एकसाथ मिलने वाली रकम का औप्शन चुनना चाहिए. उदाहरण के लिए, अगर आप को 5 साल बाद पैसे की जरूरत है, तो उस समय ही पैसा लीजिए, जिस से जमा रकम और ब्याज मिला कर एकमुश्त बड़ी रकम मिल जाए.

आरडी यानी छोटीछोटी बचत मिले एकमुश्त

आरडी यानी रिकरिंग डिपौजिट, छोटीछोटी बचत के लिए जरूरी और सुरक्षित तरीका है. इस का खाता पोस्टऔफिस और बैंक दोनों जगहों पर खोला जा सकता है. 100 रुपए प्रति माह से ले कर ज्यादा से ज्यादा कितनी भी रकम जमा की जा सकती है. एक साल से ले कर 3 साल या ऊपर तक की आरडी निवेशक शुरू कर सकते हैं. औसतन निवेशक 3 साल की आरडी ज्यादा पसंद करते हैं. छोटीछोटी बचत बड़ी रकम के रूप में मिलती है, जिस को निवेशक लंबी बचत के लिए एफडी भी करा सकते हैं. आरडी बहुत लोकप्रिय निवेश है.

म्यूचुअल फंड बाजार ने भी आरडी जैसी ही एसआईपी स्कीन बना रखी है. एसआईपी और आरडी में केवल एक ही अंतर है कि एसआईपी में मुनाफा बाजार के उतारचढ़ाव से प्रभावित हो सकता है जबकि आरडी में तय ब्याजदर के हिसाब से ही मुनाफा मिलता है. निवेश की दोनों ही तरीकों में छोटीछोटी रकम बड़ी बन जाती है. सामान्य निवेशक के पास हमेशा ही छोटीछोटी बचत होती है, जिसे वह इन के जरिए एकसाथ बड़ी कर सकता है. बचत का कोई समय नहीं होता.

बचत के लिए रकम की कोई सीमा नहीं होती. निवेशक को अपनी क्षमता के अनुसार बचत योजनाओं में पैसा जमा करना चाहिए. आरडी से बचत की आदत भी पड़ती है. ऐसे में बच्चों में अगर बचपन से बचत की आदत डालें तो यह आगे चल कर उन के लिए बहुत ही फायदेमंद साबित होगी.

गुल्लक से करें शुरुआत

बचत योजनाओं में आरडी एक गुल्लक की तरह काम करती है. छोटी बचत वाले निवेशक घर में गुल्लक रख सकते हैं. रोज उस में तय रकम डालें और फिर माह के अंत में गुल्लक का पैसा निकाल कर तय जमा रकम बैंक के आरडी खाते में जमा कर दें. एकएक दिन की यह बचत आप को पता भी नहीं चलेगी और एक दिन यह बड़ी रकम के रूप में आप की मदद के लिए मौजूद होगी. निवेशक को सब्र के साथ इस बचत को शुरू करना चाहिए. बूंदबूंद पानी से घड़ा भरने में सब्र की जरूरत होती ही है. पर यह बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के हो जाता है.

नियमित बचत छोटे कामधंधा करने वालों के लिए बेहद जरूरी और उपयोगी होती है. ऐसे में इस की ओर सभी ध्यान दें. आरडी से मिले पैसे की एफडी कर दें. ऐसे में छोटी बचत से बड़ी बचत की ओर निवेश बढ़ता जाएगा. जरूरत केवल इस बात की होती है कि बचत की आदत पड़े और धैर्यपूर्वक नियमित बचत का सिलसिला जारी रहे. इस से बड़ी बचत का लाभ मिलेगा. जो लोग यह सोचते हैं कि एकमुश्त ही बड़ी बचत कर लें, वे असल में खुद को भुलावे में रखते हैं. बचत हमेशा छोटे निवेश से ही शुरू होती है.

तलाक की चक्की में पिसता बचपन

8 साल का रोहन अपनी मां के साथ नानी के घर में रहता है. नानानानी की तो मृत्यु हो चुकी है, लेकिन घर में उस के मामामामी और उन के 2 बच्चे हैं, जिन का व्यवहार न तो रोहन के साथ अच्छा है और न ही रोहन की मां माधुरी के साथ. मगर भैयाभाभी के साथ रहना माधुरी की मजबूरी है. उस के पति ने 3 वर्षों पहले उसे तलाक दे दिया था. मजबूर माधुरी को पति का घर छोड़ना पड़ा. वह 5 साल के नन्हे रोहन को ले कर अपने मायके आ गई. तब उस की मां जिंदा थीं. इसलिए भैयाभाभी ने उस के वहां रहने पर कोई ऐतराज नहीं किया.

मां के गुजरते ही माधुरी की हालत अपने ही मायके में नौकरानी जैसी हो गई. भाई के दोनों बच्चों का व्यवहार भी उस के और उस के बेटे रोहन के साथ अच्छा नहीं है. मगर वह क्या करे, इस घर को छोड़ कर कहां जाए? भाभी के तानों और भाई के लालच ने उस का जीना दूभर कर दिया है, फिर भी निभा रही है किसी तरह.

भैयाभाभी यह भी नहीं चाहते कि माधुरी बच्चे को ले कर कहीं जाए, क्योंकि तलाक के बाद उस के पति से मिलने वाले मेंटिनेंस के पैसों पर दोनों अपना हक समझते हैं. इधर मेंटिनैंस के 10 हजार रुपए माधुरी के अकाउंट में आए नहीं कि भाई ने एटीएम से तुरंत निकाल लिए. माधुरी ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं है. बैंक के सारे काम शुरू से ही भाई ने अपने हाथ में रखे हैं. उस की चैकबुक, पास बुक, एटीएम कार्ड सब भाई की कस्टडी में हैं. वह तो बस कागजों पर साइनभर करती है, जहां वह करने को कहता है.

रोहन धीरेधीरे समझदार हो रहा है. वह अपने ममेरे भाईबहन को देखता है कि उन के पास तो मां भी है और पिता भी. वह माधुरी से अपने पिता के बारे में सवाल करता है. उन से मिलने की जिद करता है. मगर माधुरी क्या करे. उसे कैसे समझाए कि उस के पिता ने दूसरी शादी कर ली है और उस के घर में रोहन के लिए कोई जगह नहीं है क्योंकि जिस तलाकशुदा महिला से उस ने शादी की है उस के पहले पति से 2 बच्चे हैं, जो अब रोहन के पिता के साथ ही रहते हैं.

मांबाप के तलाक की वजह से रोहन का बचपन छटपटा रहा है. वह अंदर ही अंदर घुट रहा था. एक ओर मामामामी और ममेरे भाईबहन का रूखा व्यवहार, वहीं दूसरी ओर अपनी मां को उनके हाथों जलील होता देख वह सिहर जाता है.

पिता की कमी का एहसास उस को बुरी तरह सालता है. रोहन जब दूसरे बच्चों को उन के पापा के साथ घूमतेखेलते देखता है तो अपने पापा को याद कर छिपछिप कर रोता है. मांबाप के तलाक का बुरा असर रोहन के व्यक्तित्व पर पड़ रहा है.  रोहन मानसिक रूप से तनावग्रस्त और शारीरिक रूप से कमजोर व्यक्ति के रूप में बड़ा हो रहा है. उस का विकास ठीक से नहीं हो पा रहा है.

मुख्यधारा से हटते बच्चें

एक दूसरे केस में मैं ने देखा था कि मांबाप के बीच हुए तलाक से संतान इस कदर प्रभावित होती है कि उस के दर्द और तनाव का परिणाम समाज में भयानक अपराध के रूप में सामने आता है. अजय राठी से मैं गुड़गांव के एक किशोराश्रम में मिली. उस की उम्र कोई 14 बरस की थी. वह बड़ा खूबसूरत था. झक गोरा रंग, बड़ीबड़ी आंखें और चमकदार घुंघराले बाल. बिलकुल अंगरेज बच्चे सा दिखता था. इस किशोराश्रम में वे बच्चे थे जो किसी न किसी अपराध के कारण यहां 3 साल के लिए रखे गए थे ताकि उन के जीवन में सुधार ला कर उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके. इन पर कड़ी निगरानी रखी जाती थी. अजय के बारे में जब मैं ने वहां के संचालक से पूछा तो उस की कहानी सुन कर मैं भीतर तक कांप गई.

अजय के मातापिता का तलाक हो चुका था. उस वक्त अजय की उम्र 10 साल थी. अदालत ने उस के पिता की बेहतर आर्थिक हालत को देखते हुए उस की पढ़ाई और अच्छे भविष्य के मद्देनजर उस की कस्टडी पिता को ही सौंपी थी, और उस की मां को यह अधिकार दिया था कि विशेष दिनों पर वह उस से मुलाकात कर सकती थी.

शुरू के दिनों में तो अजय को मांबाप के अलगाव का एहसास नहीं हुआ, लेकिन धीरेधीरे वह सारी बातें समझने लगा. उस का मन अपनी मां के लिए छटपटाने लगा. दरअसल, उस की मां से अलग हो कर पिता का रुझान एक अन्य महिला की ओर हो गया था और अजय की ओर ध्यान देना उन्होंने लगभग बंद कर दिया था. अजय घर में बस एक नौकर के साथ ही रहता था. उस के पिता देररात अपनी नई प्रेमिका के साथ घर आते और दोनों बैडरूम में रातभर सैक्स गतिविधियों में शामिल रहते थे, इस बात से बेखबर कि बगल के कमरे में अजय न सिर्फ जाग रहा है, बल्कि दरवाजे की झिर्री से उन की तमाम हरकतें देख भी रहा है. उस के नन्हे दिमाग पर इन बातों का बुरा असर पड़ रहा था.

पिता से उस का राब्ता बस इतना भर रह गया था कि उस की स्कूल और ट्यूशन फीस सही वक्त पर जमा हो जाती थी और उस की जरूरत का सारा सामान उसे घर में उपलब्ध था. मगर प्यार और सुरक्षा का जो एहसास उसे पिता की ओर से मिलना चाहिए था, उस से वह बिलकुल महरूम था. जब मां से मिलने का दिन होता तो वह बहुत खुश होता था क्योंकि वहां उसे प्यार और सुकून मिलता था. पर एक दिन मां ने भी दूसरी शादी कर ली और अजय से मिलने का उस का सिलसिला लगभग खत्म ही हो गया क्योंकि वह अपने नए पति के साथ दूसरे शहर में शिफ्ट हो गई थी, जहां से बारबार आना उस के लिए संभव नहीं था.

मांबाप के प्यार के अभाव ने ही अजय को गलत राह पर मोड़ दिया. उस के अंदर गुस्सा पनपने लगा. वह स्कूल में बच्चों से लड़ताझगड़ता, पड़ोसी बच्चों से मारपीट करता, घर में पिता की बातों का चीख कर जवाब देता और कभी गुस्से में घर का सामान उलटपलट देता. उस के व्यवहार में आक्रामकता बढ़ती जा रही थी और इसी तनाव व आक्रामकता ने एक दिन इतना उग्र रूप धारण कर लिया कि उस ने बैडरूम में सो रहे अपने पिता और उन की गर्लफ्रैंड को चाकू से गोद कर मार डाला. इस भयावह कांड को करने के बाद वह भागा नहीं, बल्कि सुबह होने का इंतजार करता लाशों के पास ही बैठा रहा.

सुबह उस ने सब से पहले अपनी मां को फोन कर के अपने कृत्य के बारे में बताया और उस के बाद 100 नंबर पर फोन कर के खुद ही पुलिस भी बुला ली. अजय को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया गया और वहां से किशोराश्रम. आखिर किस की गलती है कि अजय का जीवन एक सामान्य बच्चे की तरह न हो कर एक अपराधी का हो गया? कौन है इस का जिम्मेदार? अब क्या होगा अजय का भविष्य? क्या हत्यारे का कलंक उस के माथे से कभी मिट पाएगा? क्या उस के व्यवहार में सुधार आएगा और वह एक अच्छा नागरिक बन पाएगा? सवाल बहुतेरे हैं, और जवाब नदारद.

‘आप मां के साथ क्यों नहीं रहते?’ कलकत्ता हाईकोर्ट में 6 साल की मासूम बच्ची आंखों में आंसू लिए अपने पिता से यह सवाल कर रही थी. उसे रोता देख उस के छोटे भाई ने भी सिसकना शुरू कर दिया. गालों पर लुढ़क आए आंसुओं के साथ उस के मुंह से निकला, ‘अगर वह पापा के साथ रहेगी तो मैं भी रहूंगा.’ कोने में खड़ी मां चुपचाप रो रही थी. पिता की आंखें भी भीगी हुई थीं.

इस हृदय विदारक दृश्य ने जज साहब और वकीलों को भी भावुक कर दिया. तलाक के मामले में अकसर बच्चे ही पिसते हैं और उन्हें ही परिस्थितियों से जूझना पड़ता है. जस्टिस निशिता म्हात्रे और जस्टिस राकेश तिवारी की डिविजन बैंच द्वारा बच्चों की अंतरिम कस्टडी मां को दिए जाने के बाद दोनों बच्चे पिता से अलग होने के दुख में रो पड़े थे. उन के मातापिता दोनों ने ही कस्टडी के लिए हाईकोर्ट में अपील की थी.

आपसी मतभेदों की मार

सिलीगुड़ी के इस दंपती के घर 2010 में बेटी और 2012 में बेटा हुआ था. तभी पत्नी को पति पर शक होने लगा और बच्चों के साथ उस ने सिलीगुड़ी छोड़ने का फैसला कर लिया. पत्नी और बच्चों को वापस लाने में असफल होने के बाद पति ने फरवरी 2016 में सिलीगुड़ी की अदालत का दरवाजा खटखटाया. पत्नी ने भी बच्चों की कस्टडी के लिए याचिका दायर कर दी. अप्रैल में कोर्ट ने बेटी की कस्टडी पिता को और बेटे की कस्टडी मां को दे दी. हालांकि मां ने बेटी को वापस पाने की जिद की और उस ने कलकत्ता हाईकोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी. ऐसा ही उस के पति ने भी किया,

जो दोनों बच्चों की कस्टडी चाहता था. 17 मई, 2015 को जस्टिस म्हात्रे और जस्टिस तिवारी ने फैसला दिया कि दोनों बच्चे फिलहाल मां के साथ ही रहेंगे.

पतिपत्नी के बीच पैदा हुए आपसी मतभेद हद से गुजर जाएं या किसी शारीरिक, मानसिक या पारिवारिक समस्या के कारण स्थिति असहनीय हो उठे और साथ रहना दूभर हो जाए तो अलग हो जाना ही बेहतर माना जाता है. लेकिन तलाक के बाद बच्चों का हक, उन का पालनपोषण, उन की जिम्मेदारी एक गंभीर समस्या बन जाती है. कौन उन की देखभाल अच्छी तरह करेगा? यह विवाद का मुद्दा बन जाता है.

कानून की दृष्टि से बच्चे की भलाई व उस का हित सर्वोपरि होता है. कानून इस बात पर गौर करते हुए ही फैसला करता है कि बच्चा माता या पिता में से किस के पास ज्यादा सुरक्षित है. 95 प्रतिशत मामलों में बच्चे की अभिरक्षा का भार मां को ही सौंपा जाता है. यहां तक कि वेश्यावृत्ति से जुड़ी महिलाओं के लिए भी यह कानून समानरूप से लागू होता है, क्योंकि माना जाता है कि मां बच्चे की हर प्रकार से पिता के मुकाबले हजारगुना बेहतर देखभाल कर सकती है और बच्चा भी भावनात्मक रूप से मां के ज्यादा करीब होता है. 5 प्रतिशत मामलों में बच्चा पिता के अधिकार में सौंप दिया जाता है. ऐसे में बच्चे की रजामंदी सब से बड़ा कारण होती है.

हिंसक होते बच्चे

देश में अभी भी बच्चों की कस्टडी पिता को मिलना एक मुश्किल काम है. मगर अकेली मां के लिए नौकरी, घर और बच्चे की परवरिश एकसाथ करना मुश्किलभरा होता है. ऐसे में कहीं न कहीं पिता की कमी तो महसूस होती ही है. यही कमी धीरेधीरे कुंठा का रूप ले लेती है.

हिंदू अधिनियम के अनुसार, 8 वर्ष की उम्र के बाद लड़के को पिता के साथ रहने का विकल्प दिया जाता है. पिता या बेटा चाहे तो बच्चा पिता के पास जा सकता है. कोर्ट बच्चे की सुरक्षा व देखभाल को ध्यान में रखता है, इस के लिए कभीकभी जज भी बच्चे से बात करते हैं और उस की इच्छा जानने की कोशिश करते हैं. उस के बाद ही पिता के साथ बच्चे को रहने की इजाजत दी जाती है.

बेटी के मामले में यह आयुसीमा

18 वर्ष है. बेटी को 18 वर्ष तक मां के पास ही रहना होता है, उस के बाद वह अपनी इच्छा से पिता के पास जा सकती है. मां यदि दूसरी शादी कर लेती है या फिर स्थिति ऐसी है कि वह बच्ची को नहीं रखना चाहती है तो बेटी की कस्टडी पिता को मिल जाती है. मगर एक बच्चे के लिए मातापिता दोनों का प्यार जरूरी है. मां से जहां वह भावनात्मक रूप से मजबूत बनता है, वहीं पिता की वजह से उस के अंदर सुरक्षा का एहसास पनपता है. एक अच्छे व्यक्तित्व के निर्माण के लिए यह दोनों  चीजें बहुत महत्त्वपूर्ण हैं. मगर तलाक की स्थिति में बच्चे को किसी एक से अलग होना पड़ता है और इस का सीधा असर उस के मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ता है.

तलाकशुदा दंपती के बच्चों में बहुधा साधारण स्थितियां भी प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं. समाज की नजरों में वे खुद को अपराधी महसूस करने लगते हैं. उन्हें शर्म आती है कि उन के मातापिता ने ऐसा कदम उठाया. उन के अंदर प्रतिरोध की भावना प्रबल हो उठती है. उन का व्यवहार असामान्य होने लगता है. वे अपने साथी बच्चों के प्रति आक्रामक हो जाते हैं. यही नहीं, ठीक परवरिश न मिलने पर उन के कदम आपराधिक गतिविधियों की ओर बढ़ जाते हैं.

क्या कहता है कानून

फिजिकल और लीगल कस्टडी के लिए गार्जियन ऐंड वार्ड्स एक्ट 1890, द कस्टडी फौर द चाइल्ड फौर हिंदूज और हिंदू माइनौरिटी ऐंड गार्जियनशिप एक्ट 1956 के तहत कस्टडी दी जाती है. अदालत का साफ आदेश है कि ‘वैलफेयर औफ माइनर टू बी पैरामाउंट कंसीडरेशन.’ इस के लिए देश में जिला स्तर पर गार्जियन कोर्ट बनी हुई हैं.

बच्चों की कस्टडी के लिए अदालतों में आने वाले मामलों में 90 फीसदी पिता यह दावा करते हैं कि चूंकि उन की आय पत्नी से ज्यादा है, इसलिए वे बच्चों को बेहतर परवरिश और सुरक्षा दे सकते हैं, लिहाजा कस्टडी उन्हें दी जाए. यही नहीं, 85 प्रतिशत मामलों में देखा गया है कि बच्चे को पाने के लिए पति अपनी पत्नी के व्यवहार को खराब बताते हैं, उन्हें बेरोजगार, व्यभिचारी या मंदबुद्धि घोषित करने की कोशिश करते हैं. इस के बावजूद देखा गया है कि अदालतों में 95 फीसदी मामलों में बच्चों की कस्टडी मां को ही सौंपी जाती है. करीब 5 फीसदी मामलों में ही कस्टडी पिता को मिल पाती है. वहीं, 10 वर्ष से बड़े बच्चे की मरजी को भी कोर्ट प्रमुखता देता है.

पिता कोर्ट में बच्चे की कस्टडी हासिल करने के लिए हर संभव कोशिश करता है. वह अपनी कमाई और शिक्षा के आधार पर खुद को पत्नी से ज्यादा सक्षम भी बताता है. बावजूद इस के, कोर्ट मानता है कि मां ही बच्चे की नेचुरल गार्जियन है, इसलिए उस के पक्ष में फैसले ज्यादा होते हैं. हालांकि अब पिता का रोल बच्चों के लालनपालन में बढ़ा है. इसलिए अदालतें पिता के प्रति भी कुछ सौफ्ट हो रही हैं. शायद इसीलिए अब जौइंट लीगल कस्टडी का ट्रैंड भी बढ़ा है, जैसा कि बौलीवुड अदाकार रितिक रोशन और उन की पत्नी सुजैन के मामले में देखा गया है. तलाक के बावजूद दोनों ही अपने बच्चों के साथ पब्लिक इवैंट, स्कूली कार्यक्रम व निजी जलसों में इकट्ठा देखे जाते हैं. अदालतें भी बच्चों के फिजिकल और साइकोलौजिकल डैवलपमैंट को देखते हुए साझा परवरिश के कौन्सैप्ट को प्रमोट कर रही हैं.

साझी परवरिश की वकालत

पतिपत्नी में दांपत्य विवाद के बाद तलाक होने की स्थिति में उन के बच्चों पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को ले कर अदालतें ही नहीं, बल्कि विधि आयोग भी बेहद चिंतित है. उस की चिंता का मुख्य कारण तलाक के बाद दंपती के बीच बच्चों पर हक को ले कर छिड़ने वाली कानूनी लड़ाई और बच्चों के मनमस्तिष्क पर पड़ने वाले बुरे प्रभाव को ले कर है. विधि आयोग अदालतों में कानूनी दांवपेंच का मोहरा बनने से बच्चों को बचाने के लिए ‘साझा परवरिश’ की वकालत करता है. उस ने तलाकशुदा दंपती के बच्चों की एकल के मुकाबले साझा परवरिश का कानूनी प्रावधान किए जाने पर जोर दिया और वर्ष 2015 में केंद्र सरकार को सौंपी अपनी 157वीं रिपोर्ट में तलाकशुदा दंपतियों के बच्चों की परवरिश को ले कर कई सिफारिशें कीं ताकि मातापिता के बीच तलाक के बाद उन के बच्चों पर बुरा प्रभाव न पड़ सके.

आयोग ने बच्चों पर पतिपत्नी दोनों का प्राकृतिक अभिभावक होने की वकालत करते हुए कहा कि अब समय आ गया कि पारिवारिक न्यायालय के निरीक्षण में भारत में साझा परवरिश की कोशिश की जानी चाहिए. साझा परवरिश का सिद्धांत पहले से ही अमेरिका, आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और नीदरलैंड्स में मौजूद है. विधि मंत्री सदानंद गौड़ा को सौंपी रिपोर्ट में हिंदू माइनौरिटी ऐंड गार्जियनशिप एक्ट 156 तथा गार्जियंस एेंड वार्ड्स एक्ट 1890 में संशोधन करने की बात हो रही है.

कुछ ऐसे कानूनों, जिन में पिता को ही बच्चे का प्राकृतिक अभिभावक होने की बात कही गई है, को रेखांकित करते हुए आयोग ने अपनी सिफारिशों में यह भी कहा है कि एक अभिभावक होने की वरिष्ठता को हटाया जाना चाहिए और मातापिता दोनों को समान महत्त्व दिया जाना चाहिए.

उल्लेखनीय है कि विधि आयोग ने ‘भारत में साझा परवरिश प्रणाली क्रियान्वयन’ नाम से एक परामर्शपत्र जारी कर इस बारे में विशेषज्ञों से राय मांगी थी. इस संबंध में ज्यादातर ने आयोग की सिफारिशों पर अपनी सहमति की मुहर लगाई है.

तलाक के बाद

समय आ गया है कि मातापिता तलाक लेने से पहले अपने बच्चों के भविष्य और उन पर पड़ने वाले मानसिक प्रभाव के बारे में गंभीरता से सोचें. हालांकि दंपती के तलाक लेने के फैसले को अदालतें कभी प्रोत्साहित नहीं करतीं और आखिर तक कोशिश करती हैं कि दोनों में सुलह हो जाए, पर यदि तलाक के लिए दोनों पक्ष अड़ ही जाएं और तलाक ही अंतिम फैसला हो, तो ऐसे में उन्हें चाहिए कि अपने बच्चों को अपने अलग होने का कारण भलीभांति और सही रूप में समझाएं. दोनों पक्षों के वक्तव्यों में समानता होनी चाहिए.

ऐसा नहीं कि वे बच्चे को एकदूसरे के प्रति कड़वाहट से भर दें. उसे यह आश्वासन दें कि हम पतिपत्नी अलग हो रहे हैं, किंतु तुम्हारे साथ आजीवन जुड़े रहेंगे. तुम्हारी जरूरतें तलाक के बाद भी हमारे लिए उतनी ही महत्त्वपूर्ण होंगी जितनी अब हैं.

यह स्वाभाविक है कि बच्चा जिस पक्ष के पास रहता है उस के विपरीत उसे दूसरे पक्ष की चाहत ज्यादा होती है. इस को गलत नहीं समझना चाहिए और इस को ले कर बच्चे को कभी डांटना नहीं चाहिए. अपने बचपन को ध्यान में रख कर ही अपने बच्चे के विकास की ओर ध्यान देना चाहिए. बेहतर तो यही होगा कि बच्चे को बोर्डिंग स्कूल भेज दें और दोनों नियमितरूप से उस से मिलने जाते रहें.

किचन को दें ट्रेंडी लुक

किचन एक्सेसरीज की किचन में महत्वपूर्ण भूमिका होती है. आजकल ये  काफी महंगे मिलने लगे है. पर किचन को ट्रेंडी लुक देने के लिए इनका इस्तेमाल करना जरुरी है. तो आइए जानते हैं कैसी होनी चाहिए आपकी किचन एक्सेसरीज.

–  जूसर-मिक्सर-ग्राइन्डर जैसी चीजें और माइक्रोवेव जैसी एक्सेसरीज किचन की शोभा बढाते हैं. माइक्रोवेव खरीदते समय एक बात का ध्यान जरूर रखना चाहिए कि माइक्रोवेव किचन के हिसाब से लें. यदि किचन छोटा है तो उसी के हिसाब से माइक्रोवेव लें.

–  चिमनी खरीदते समय कुछ बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए. भारत में वसा युक्त खाना ज्यादा बनता है तो इन चीजों को ध्यान में रखते हुए चिमनी ऐसी लेनी चाहिए जो धुएं पर काबू करने में कारगर हो.

–  अगर किचन में रंगों की बात करें तो किचन की दीवारों में हमेशा हल्के रंगो का इस्तेमाल करना चाहिए क्योंकि किचन मे तेज रोशनी का होना बहुत जरूरी होता है और गहरे रंग अक्सर रोशनी को दबा देते हैं, इसलिए किचन में हमेशा लाइट यलों, व्हाइट, लाइट ब्लू और लाइट ग्रीन रंगों का इस्तेमाल करें.

–  किचन में सामान रखने के लिए रैक बहुत जरूरी है, पर किचन में स्पेस को ध्यान में रखते हुए रैक बनवाना चाहिए. आप वुडेन की जगह ग्लास का भी रैक बनवा सकती हैं. यह देखने में भी अच्छा लगेगा और सामान को ढूंढने में भी आपको असुविधा नहीं होगी, क्योंकि आपकों आसानी से पता चल जाएगा कि कौन-सा सामान कहां है.

घूस पाप या जुर्म नहीं मुक्ति का उपाय है

सरकारी दफ्तरों में काम कराने का सब से आसान तरीका घूस देने को भी केंद्र सरकार ने लोगों से छीन लिया है. हर किसी का सरकारी विभागों से वास्ता पड़ता है और सभी को मालूम है कि काम तभी होगा जब घूस दी जाएगी. लोग बेफिक्र हो कर सरकारी दफ्तर कूच कर जाते थे और काम के मुताबिक 1000-500 से ले कर लाखदोलाख रुपए देंगे तो उन का काम हो जाएगा. चिंता तो इस बात की रहती थी कि कहीं बाबू या साहब ने ईमानदारी दिखाते हुए घूस के पैसे को पाप समझ लिया तो जरूर दिक्कत खड़ी हो जाएगी.

इस डर की वजह वे कानून और नियम हैं जिन को हथियार बना कर बाबू या साहब काम करने में असमर्थता जाहिर कर देते हैं. ज्यादा चिल्लपों करने पर वह दोटूक कह देता है कि अब ये नियम हम ने थोड़े बनाए हैं. आप चाहो तो ऊपर शिकायत कर दो लेकिन मैं नियमकानून तोड़ कर अपनी नौकरी से नहीं खेलूंगा.

इस ब्रह्मास्त्र के चलते ही अच्छेअच्छे हरिश्चंद्रों के आदर्श, उसूल और ईमानदारी धूल चाटते नजर आने लगते थे और वे हथियार डाल कर पूछते थे, अच्छा, तो बताइए कितने रुपए देने हैं?

इस पर ईमानदारी से सरकारी मुलाजिम बता देता था कि इतनी दक्षिणा लगेगी, तब कहीं जा कर वह नियम, कानून और अपने ईमान से खिलवाड़ करने का जोखिम उठाएगा. सौदा पहले ही झटके में हो जाता था जिस से लेने वाला भी खुश और देने वाला भी यह सोच कर खुश हो जाता था कि चलो, काम हो गया. ऊपर वाले की कृपा है कि साहब घूस लेने को तैयार हो गए वरना एडि़यां घिस जातीं. ऊपर शिकायत करने पर घूस की रकम और बढ़ जाती तथा काम आसानी से नहीं होता, सो अलग.

हजार में से एकाध सनकी सुचारु रूप से चलती इस व्यवस्था पर प्रहार करते रिश्वत मांगे जाने की शिकायत लोकायुक्त को कर डालता था जिस पर बेईमान कर्मचारी रंगेहाथ घूस लेते दबोच लिया जाता था.

अगले दिन घूसखोरी की यह खबर अखबारों में मोटीमोटी हैडिंगों में कुछ इस तरह छपती थी मानो पृथ्वी से पाप खत्म करने के लिए विष्णु ने समय से पहले ही कल्कि अवतार ले लिया हो यानी अब घूसखोरी खत्म हो गई है.

हकीकत में ऐसी खबरें दूसरे लोगों के लिए विज्ञापन का काम ज्यादा करती हैं कि बेफिक्र रहो, सरकारी दफ्तरों में घूस का लेनदेन बदस्तूर जारी है. यह तो देने वाले की चालाकी या फिर लेने वाले की लापरवाही थी, जो वह पकड़ा गया. घूसखोर के पकड़े जाने की खबर कुछकुछ वैसी ही होती है जैसे कौलगर्ल्स का गिरोह पकड़े जाने की होती है जिस से यह प्रचार ज्यादा होता है कि शहर में देहव्यापार चल रहा है, लिहाजा, शौकीनों को निराश होने की जरूरत नहीं है.

कुछ कमियों और कई ज्यादतियों के बाद भी इस सिस्टम में कोई खास खोट नहीं थी, लेकिन जाने क्यों सरकार की आंख में घूसखोरी का कांटा इतना खटक रहा था कि उस ने अब देने वाले को भी सजा देने का का प्रावधान कर दिया.

तोहफे देना भी जुर्म

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा भ्रष्टाचार निरोधक (संशोधन) विधेयक 2018 को मंजूरी दिए जाने के साथ ही यह कानून वजूद में आ गया है. अब सरकारी कर्मचारियों को रिश्वत देने वाला भी बराबरी का दोषी माना जाएगा.

इसलिए उसे सजा भी दी जाएगी जिस में 10 वर्ष तक की कैद हो सकती है. इस कानून में सजा के साथसाथ जुर्माने का भी प्रावधान है और एक खास बात यह जोड़ी गई है कि सरकारीकर्मियों को रिश्वत के लिए उकसाना भी अपराध की श्रेणी में आएगा और उन्हें तोहफे देना भी जुर्म होगा.

वाकई इस कानून का वाजिब असर हुआ और घूसखोरी के कम मामले सामने आए. इस पर किसी एजेंसी की रिपोर्ट आते ही सरकार अपनी पीठ थपथपाने से चूकेगी नहीं कि देखो, कानन बनते ही घूसखोरी पर लगाम लग गई. लेकिन यह लगाम ठीक वैसी ही है जैसी नोटबंदी के बाद से सामने आ रही है कि हुआ कुछ नहीं है, बस, सरकार की जिद या मंशा, जो भी कह लें, पूरी हो गई है.

उधर, सरकार की मंशा बेहद साफ है कि जब घूसखोरी के मामले कम दर्ज होंगे तो आंकड़ों में भी भ्रष्टाचार कम दिखेगा. अब लोग यानी दोनों पक्ष घूस के लेनदेन में इतनी एहतियात बरतें कि वे पकड़े ही न जाएं, तो सरकार का इस में क्या दोष.

यह होगा असर

क्या आप घूस देने के जुर्म में 10 वर्षों के लिए जेल जाना चाहेंगे, इस सवाल के जवाब में कोई भी हां नहीं कहने वाला. ऐसे में जाहिर है लोग सुरक्षित तरीके से घूस देने के उपायों पर अमल करेंगे. गौरतलब है कि सरकार ने कानून बदला है, लेकिन सिस्टम और सरकारी कर्मचारियों के अधिकार ज्यों के त्यों हैं.

अंदेशा जताया जा रहा है कि अब दलालों के जरिए घूस लेनदेन का रिवाज बढ़ेगा. एक फिल्म में कादर खान का घूसखोर किरदार खुद घूस नहीं लेता बल्कि नगरनिगम आए बेचारे आम नागरिक को दफ्तर के बाहर चाय की दुकान वाले को भुगतान करना होता था. इस फिल्म में घूस की रकम चीनी के चम्मच के हिसाब से तय होती दिखाई गई है. मसलन, अगर घूस लेने वाला एक चम्मच चीनी डालने को बोलता है तो घूस की रकम 1 हजार रुपए होती है.

कहने का मतलब यह नहीं कि लोग यही तरीका अपनाएंगे, बल्कि होगा यह कि फाइल रुकी रहेगी और उसी दौरान घूस देने वाले को ज्ञान प्राप्त होगा कि उसे अपने काम के एवज में कितनी घूस किस तरीके से कहां चुकानी है. ऐसे कई तरीके अभी भी चलन में हैं, लेकिन अब आम हो जाएंगे. घूसखोर का साला या भतीजा रिश्वत लेगा या फिर किसी और को इस बाबत नियुक्त कर दिया जाएगा.?

इस कानून का दूसरा प्रभाव यह पड़ेगा कि लोग शिकायत करेंगे ही नहीं, क्योंकि इस से उन का काम होने की गारंटी सरकार नहीं ले रही. मसलन, अगर आप को नगरनिगम में अपने मकान का नामांतरण कराना है तो दफ्तर में बैठा बाबू आप से रिश्वत नहीं मांगेगा. वह कागजात में कमियां निकालता रहेगा. आप चाहें तो कमिश्नर से ले कर मिनिस्टर तक से शिकायत करने का अपना अधिकार या कर्तव्य इस्तेमाल कर सकते हैं. अव्वल तो जवाब मिलेगा नहीं, और मिला भी, तो यही होगा कि आप कागजात पूरे और दुरुस्त लाएं तो काम हो जाएगा.

लोग कानून को कोसते पुराना सुनहरा जमाना याद करते नजर आएंगे कि वो भी क्या दिन थे जब बगैर किसी झंझट के नामांतरण हो जाया करता था. अब यह नई बला कहां से आ गई कि पटवारी, बाबू, हवलदार से ले कर इंजीनियर, डाक्टर और कलैक्टर साहब तक घूस के नाम से नाकभौं सिकोड़ रहे हैं और कह रहे हैं कि हम क्या करें, खोट तो आप के काम में ही है, यानी आप एक गलत काम करवाने के लिए आए हैं.

अब यहां कोई ज्यादा हल्ला मचाएगा तो सरकारी कर्मचारी ही शिकायत करेगा कि उसे रिश्वत लेने के लिए उकसाया जा रहा है. इस पर देने वाला झट से नप जाएगा. फिर मोटेमोटे अक्षरों में खबर छपेगी कि घूस देने की कोशिश करने वाले को रंगेहाथ पकड़ा गया. इस कानून में पहले ही स्पष्ट कर दिया गया है कि सरकारी अधिकारी को घूस लेने के लिए उकसाना भी अपराध माना जाएगा. न उकसाने की स्थिति में भी वह झूठी शिकायत कर सकता है कि उस पर रिश्वत लेने के लिए दबाव बनाया जा रहा है. अब ऐेसे में सफाई देने की जिम्मेदारी यानी बर्डन औफ प्रूफ आम आदमी का होगा कि वह साबित करे कि उस ने घूस देने की कोशिश की ही नहीं थी या इस बाबत उकसाया नहीं था.

पाप और दक्षिणा

उकसाया नहीं था यानी एक ऐसा पाप जो आप ने किया ही नहीं, उस के लिए आप को थानों और अदालतों के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं और दक्षिणा भी चढ़ानी पड़ सकती है लेकिन इस पर वह सलीके की होगी और सलीके से ही होगी.

यहां बात या मंशा कतई अतिशयोक्ति वाली या इस कानून की आलोचना की नहीं, बल्कि ऐसे कानूनों के साइड इफैक्ट्स बता कर होशियार करने की है कि इस से भी कुछ होने वाला नहीं है.

दरअसल, केंद्र सरकार ने मान लिया है कि सब के सब पापी हैं, लेने वाला भी और देने वाला भी. ऐसे में सजा सिर्फ लेने वाले को क्यों? यही दहेज कानून में प्रावधान है कि दहेज देने वाला भी बराबरी का दोषी है लेकिन आज तक दहेज देने के लिए शायद ही किसी को सजा हुई हो.

सरकार चाहती है कि सभी धर्म के बताए रास्ते पर चलें, ईमानदारी से रहें और रहने दें. लेकिन इस के लिए दोषी सिस्टम यानी पूजापाठ, यज्ञ, हवन, आरती खत्म नहीं किए जाएंगे बल्कि दक्षिणा चढ़ाने का तरीका बदल दिया जाएगा. नए प्रावधान में होगा यह कि जो भी इन बाबुओं और साहबों यानी पंडों की शिकायत लोकायुक्त वगैरह से करेगा, वह खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारेगा.

सरकारी कर्मचारी को इतना भर कहना है कि उस ने किसी काम के लिए मना नहीं किया, लेकिन गलत काम करवाने के लिए उसे घूस की पेशकश की जा रही थी. तब लोग क्या करेंगे, इस तरफ सरकार का ध्यान नहीं गया या जानबूझ कर नहीं दिया गया, एक ही बात है. यह भी दिलचस्प बात है कि सरकार को पता कैसे चलेगा कि कौन, कहां घूस देने का पाप कर रहा है.

उदाहरण मकान निर्माण का ही लें. आप अपने घर के सपनों को आसानी से साकार नहीं कर सकते, क्योंकि आप का नक्शा गलत होगा. आप ने सरकारी गाइडलाइन के मुताबिक रास्ता नहीं छोड़ा होगा, ड्रेनेज के इंतजाम सरकारी पैमानों पर खरे नहीं उतर रहे होंगे या फिर पर्यावरण प्रभावित हो रहा होगा. मुमकिन है जो जमीन का टुकड़ा यानी प्लौट आप ने लिया हो वह ही किसी और वजह से नाजायज करार दे दिया जाए.

तब लोगों को समझ आएगा कि घूस देना वाकई अनिवार्य पाप होता है. अब पापमुक्ति के लिए काटते रहो छोटे से बडे़ मंदिरों यानी दफ्तरों तक चक्कर. सरकार तो नोटबंदी और जीएसटी की तरह आप को सुशासन और पारदर्शिता देना चाहती है, भ्रष्टाचार खत्म करना चाहती है लेकिन वे आप के संचित पाप हैं जो इस में आड़े आ रहे हैं तो सरकार इस में क्या कर लेगी. वह पापमुक्ति का ठेका नहीं लेती. यह लाइसैंस तो पंडेपुजारियों की तरह सरकारी मुलाजिमों ने ले रखा है. तो काटो उन्हीं के चक्कर, लेकिन, भूल कर भी घूस देते हुए पकड़े मत जाना वरना.

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