सामग्री
– 3 बड़े चम्मच खस सिरप
– 300 एमएल सोडा
– 2 बड़े चम्मच शुगर सिरप
– 5 बड़े चम्मच क्रश्ड आइस
– 1 चम्मच केवड़ा.
विधि
– सारी सामग्री को एकसाथ मिला कर ब्लैंडर में चर्न करें और ठंडाठंडा परोसें.
सामग्री
– 3 बड़े चम्मच खस सिरप
– 300 एमएल सोडा
– 2 बड़े चम्मच शुगर सिरप
– 5 बड़े चम्मच क्रश्ड आइस
– 1 चम्मच केवड़ा.
विधि
– सारी सामग्री को एकसाथ मिला कर ब्लैंडर में चर्न करें और ठंडाठंडा परोसें.
जिस तरह फिजिकल अब्यूज यानी यौन उत्पीड़न में महिला के शरीर पर चोट के निशान या दूसरे बाहरी संकेत नहीं दिखते, क्योंकि कई बार यह नजरों या बातों से किया गया उत्पीड़न होता है, ठीक वैसे ही इकोनौमिकल अब्यूज होता है, जो आज दुनियाभर की महिलाओं के साथ हो रहा है लेकिन इसे साबित करना काफी पेचीदा होता है. लिहाजा, पुरुष इस हथियार का इस्तेमाल महिलाओं को घर में कैद रखने, उन की आत्मनिर्भरता पर अंकुश लगाने या फिर व्यक्तिगत खुन्नस निकालने के लिए करते हैं.
यह एक तरह का आर्थिक शोषण है जहां आर्थिक संसाधनों का इस्तेमाल महिलाओं और बच्चों की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने के लिए किया जा रहा है. हाल में अभिनेत्री और पूर्व मिस इंडिया निहारिका सिंह ने देश में चल रहे मी टू अभियान से उत्साहित हो कर खुलासा किया है कि उन्हें भी मनोरंजन उद्योग में नवाजुद्दीन सिद्दीकी, भूषण कुमार और साजिद खान के हाथों फिजिकल और इकोनौमिकल अब्यूज का सामना करना पड़ा है.
क्या होता है इकोनौमिकल अब्यूज
भारत में महिलाएं ही घर का बजट, राशनपानी और दूसरे खर्च संभालती हैं. पति अपनी कमाई का एक हिस्सा दे कर महीनेभरे के घरेलू काम से आजादी पा लेता है और महिलाएं, चूंकि घर का खर्च पुरुषों से ज्यादा बेहतर ढंग से चला सकती हैं, इसलिए घर के खर्चपानी के प्रबंधन से ले कर फालतू खर्चे पर रोक लगाना, आर्थिक उधारी जैसे डैबिट कार्ड या बिल चुकाने आदि को ले कर सजग रहना, निवेश और बचत में सक्रिय रहना उन की लाइफस्टाइल का हिस्सा हो जाता है. लेकिन अचानक जब पत्नियों से घर के खर्चे के लिए दी गई रकम छीन ली जाती है और उन्हें हर जरूरत के लिए आर्थिक तौर पर लाचार बना दिया जाता है, तब यह इकोनौमिकल अब्यूज का मामला हो जाता है. पति अपने पैसों का इस्तेमाल महिला को कंट्रोल करने या सबक सिखाने के लिए करे तो वह इकोनौमिकल अब्यूज कहलाता है.
इकोनौमिकल अब्यूज के बढ़ते मामले
इकोनौमिकल अब्यूज यों तो दुनियाभर में हो रहा है, लेकिन अगर भारत की बात करें तो इस के मामले आएदिन अखबारों की सुर्खियों में मिल जाते हैं जहां इकोनौमिकल अब्यूज की शिकार महिलाएं कभी अपराध, कभी तलाक तो कभी कोर्ट के दरवाजे पर खड़ी मिलती हैं. कुछ सुर्खियों पर नजर डालते हैं-
12 अगस्त, 2018 : घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने और पति के नशे का आदी होने से 3 महिलाएं मैट्रो में चोरी करने लगीं. आरोपी महिलाएं मूलरूप से महाराष्ट्र के नागपुर शहर की रहने वाली हैं.
13 अगस्त, 2018 : हरियाणा के भिवानी इलाके में तीन तलाक का एक बेहद ही गंभीर मामला सामने आया है. जहां एक महिला ने अपने फौजी पति से घर को चलाने के लिए पैसे मांगे तो उस के जवाब में पति ने उसे चिट्ठी में तलाक लिख कर भेज दिया.
10 जुलाई, 2018 : 3 बच्चों की पढ़ाईलिखाई व घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए 27 वर्षीय रेनू ने ईरिकशा चलाना शुरू कर दिया.
4 मई, 2018 : पंजाब के बरनाला जिले के गांव सहजड़ा की लापता मांबेटी को पुलिस ने ढूंढ़ लिया और उन्हें अदालत में पेश किया. अदालत में उक्त महिला ने अपने पति पर खर्च न देने के आरोप लगाए और पति के साथ न जाने व प्रेमी के साथ जाने के बयान दर्ज करवाए हैं. जिस के बाद कोर्ट के आदेश पर पुलिस ने पर्चा रद्द कर दिया और महिला अपनी बेटी व प्रेमी के साथ चली गई.
सुर्खियां 4, लेकिन शोषण वही
उपरोक्त चारों मामले इकोनौमिकल अब्यूज के हैं. पहले मामले में घर का खर्च पति से नहीं मिला, सो, महिलाएं अपराध करने लगीं. अगर इन महिलाओं को अपने ही घर में इकोनौमिकल अब्यूज का शिकार नहीं होना पड़ता तो शायद ये अपराध के दलदल में न उतरतीं.
दूसरे मामले में इकोनौमिकल अब्यूज उसे तलाक के दरवाजे तक ले गया जब एक महिला को पति से घर चलाने के लिए पैसे मांगने पड़े. जाहिर है वह काफी समय से इकोनौमिकल अब्यूज का शिकार हो रही थी. और जब उस ने इस वित्तीय शोषण के खिलाफ आवाज उठाई तो उसे तलाक का तमाचा मिला.
तीसरे मामले की बात करें तो एक महिला जब लगातार इकोनौमिकल अब्यूज से जूझ रही है तो एक दिन आजिज आ कर खुद को इकोनौमिकल तौर पर मजबूत बनाने के लिए बाहर निकलती है और ईरिकशा चला कर आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ लेती है. शुरुआत में समाज ताने मारता है लेकिन आखिरकार महिला अपने दम पर खड़ी हो ही जाती है.
चौथा मामला काफी अलग है. इस में महिला पर जब पति ने आर्थिक अंकुश लगाया तो उस ने एक नया प्रेमी खोज लिया जो उसे इकोनौमिकल अब्यूज से नजात दिला रहा था. पति ने कोर्ट में भी गुहार लगाई लेकिन जज का फैसला सराहनीय रहा और इकोनौमिकल अब्यूज की सजा पति को देते हुए महिला को बेटी सहित प्रेमी के साथ जाने की इजाजत दे दी.
तीसरा तरीका है तर्कसंगत
15 से 49 साल के आयुवर्ग की महिलाओं में से करीब 27 फीसदी, 15 साल की उम्र से ही घरेलू हिंसा बरदाश्त करती आ रही हैं. विडंबना यह है कि इन में से ज्यादातर को इस में कोई खास शिकायत भी नहीं है.
जाहिर है इन में ज्यादातर महिलाएं इसलिए फिजिकली अब्यूज्ड होती हैं क्योंकि इन के पास आर्थिक स्वतंत्रता नहीं है. यह कहा जा सकता है कि हर अब्यूज की जड़ इकोनौमिकल अब्यूज ही है. यह एक तरह का आर्थिक शोषण है जहां आर्थिक संसाधनों का इस्तेमाल महिलाओं और बच्चों की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने के लिए किया जा रहा है.
वंचित महिलाओं और लड़़कियों के लिए काम कर रहे न्यूजीलैंड के एक संगठन गुड शेफर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, 50 से अधिक फ्रंटलाइन श्रमिकों और सामुदायिक समूहों, वित्तीय संस्थानों की ओर से महिलाओं के साथ आर्थिक दुर्व्यवहार के मामले दर्ज किए जाते हैं.
इस लिहाज से यह दुनियाभर की महिलाओं की समस्या है चाहे वह कीवी महिला हो या फिर अमेरिकी या इंडियन. चूंकि महिलाओं के बारे में हमेशा से माना जाता है कि वे बहुत खर्चीली होती हैं, सजनेसंवरने, कपड़ों व जूतों पर ज्यादा पैसा खर्च करती हैं, इसलिए उन के खर्चों पर कंट्रोल कर उन्हें एहसास दिलाया जाता है कि बिना पुरुषों के उन का अस्तित्व नहीं है. ऐसे में इस शोषण से निबटने का सब से तर्कसंगत तरीका तीसरा वाला है जहां 27 वर्षीय रेनू ईरिकशा चला कर अपनी आर्थिक स्वतंत्रता खरीद रही है. ऐसी हालत में अब उस के साथ कोई भी इकोनौमिकल अब्यूज नहीं कर सकता.
आर्थिक निर्भरता का मामला
दरअसल, इस समस्या के समाधान के लिए महिलाओं को शिक्षित, सशक्त और आत्मनिर्भर बनना होगा. अगर बिजनैस से ले कर नौकरी के क्षेत्र में इन की भागीदारी बढ़े तो पुरुषों की धारणा बदले. महिलाओं के प्रति भेदभाव और उपेक्षा को केवल साक्षरता और जागरूकता पैदा कर ही खत्म किया जा सकता है. अब महिलाएं सिर्फ घर संभालने वाली पत्नी ही नहीं, बल्कि घर और औफिस दोनों मैनेज करती हैं. हालांकि शहरों में हालात बदले हैं लेकिन आर्थिक निर्णय लेने के अधिकार अभी भी घर के पुरुषों के पास ही हैं.
पुरुषों को भी यह समझना होगा कि परदे में या दरवाजों के भीतर महिलाओं को आर्थिक तंगी में रखना ठीक नहीं है. जरूरत है उन बंद दरवाजों को खोलने की वरना ये महिलाएं अपनी आर्थिक आजादी के लिए घर और समाज की दहलीज लांघने में देर नहीं लगाएंगी. यह अलग बात है कि कई बार उन के कदम गलत दरवाजों पर जा कर रुकेंगे, लेकिन इस का कोई विकल्प भी नहीं है.
महिलाओं को अपनी प्राथमिकताएं देखते समय यह देखना चाहिए कि बचत उन के काम के अनुकूल हो. नौकरीशुदा महिलाओं को बचत के सामान्य तरीके प्रयोग में लाने चाहिए. वे रिकरिंग डिपौजिट, फिक्स्ड डिपौजिट, शेयर मार्केट और एसआईपी यानी सिस्टमैटिक इन्वैस्टमैंट प्लान
का सहारा ले सकती हैं. नौकरीपेशा महिलाओं को हर माह एक तय रकम मिलती है. ऐसे में उन को उसी तरह से अपनी बचत योजना भी बनानी चाहिए. बिजनैस करने वाली महिलाओं के पास दूसरी तरह के बचत करने के तरीके होते हैं. बचत के पैसों को वे अपने बिजनैस में लगाती हैं. प्रौपर्टी की खरीदारी भी वे बचत के हिसाब से करती हैं.
निवेश के जानकार बताते हैं कि बिजनैस करने वाली महिलाओं को भी बैंक में बचत के उपाय जरूर करने चाहिए. इस की वजह यह है कि प्रौपर्टी, बिजनैस, शेयर बाजार और सोने की खरीदारी में जो इन्वैस्टमैंट होता है वह हार्डकैश नहीं माना जाता.
कई बार जरूरत पड़ने पर इस पैसे के मिलने में देरी होती है. ऐसे में कई बार बिजनैस करने वाली महिलाओं को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए बाजार से महंगी दर पर पैसा लेना पड़ जाता है. वहीं, यदि आप के पास बैंक में पैसा है तो उसे अपनी जरूरत के मुताबिक ले सकती हैं. ऐसे में बिजनैस करने वाली महिलाओं के लिए जरूरी है कि वे अपनी बचत का एक हिस्सा कम से कम ऐसी बचत योजनाओं में जरूर लगाएं जहां उन को आसानी से पैसा वापस मिल सके.
कम उम्र में लंबे समय की बचत
आज कम उम्र में ही लड़कियां नौकरी करने लगती हैं. ऐसे में उन को अपनी बचत का एक हिस्सा ऐसी बचत योजनाओं में लगाना चाहिए जो लंबे समय के इन्वैस्टमैंट प्लान हों, जैसे पीपीएफ यानी पब्लिक प्रौविडैंट फंड. इस में हर साल आप कुछ न कुछ पैसा जमा करती रहें. इस में 15 साल बाद एक अच्छी रकम एकत्र हो जाती है, जो जरूरत के समय काम आती है. पीपीएफ में ब्याजदर अधिक होती है.
एसआईपी यानी सिस्टमैटिक इन्वैस्टमैंट प्लान भी लंबे समय के लिए मददगार होता है. एसआईपी पीपीएफ से एक माने में अलग है. इस में पैसा शेयर बाजार से प्रभावित होता है. पीपीएफ में एक फिक्स ब्याज की दर से पैसा मिलता है.
इसी तरह से आरडी यानी रिकरिंग डिपौजिट भी जरूरी होता है. इस में हर माह एक तय रकम जमा करने के बाद इसे पीपीएफ में जमा कर सकते हैं. ऐसे में एकसाथ पैसे जमा करने का दबाव खत्म हो जाता है.
महिलाओं में बचत योजनाओं के बढ़ते क्रेज को देखते हुए बैंकों ने कुछ खास योजनाओं को महिलाओं के लिए शुरू किया है.
सुरक्षा के लिए भी करें बचत
आज महिलाओं पर आर्थिकरूप से घर का बोझ भी बढ़ता जा रहा है. वे अपने घर की कमाऊ सदस्य भी होती हैं. ऐसे में अगर उन को किसी तरह की सुरक्षा या बीमारी संबंधी दिक्कत आती है तो पूरा घर प्रभावित होता है. अब महिलाओं के लिए भी जीवन बीमा, दुर्घटना बीमा और हैल्थ बीमा बहुत जरूरी है.
बीमा को बचत योजना से अलग रख कर प्लान करना चाहिए. बीमा और बचत में अंतर होता है. ऐसे में बचत योजनाओं के साथसाथ बीमा योजनाओं को भी लेना चाहिए. इस में किसी तरह की दुर्घटना होने पर या बीमारी में खर्च के लिए पैसे मिल जाते हैं. आमतौर पर लोग, खासकर युवावर्ग, बीमा योजनाओं को प्रमुखता नहीं देते हैं. असल में बीमा योजनाएं भी बचत योजनाओं की ही तरह जरूरी होती हैं.
कई तरह की बीमा योजनाएं बाजार में हैं. ठीक से समझ कर योजनाओं का चुनाव करना चाहिए. कई बार बीमा करने वाली कंपनियां लुभावने प्रचार से लोगों को सही बात नहीं बतातीं, ऐसे में बीमा करने से पहले योजना और उस से जुडे़ बिंदुओं को समझ लेना चाहिए, जिस से बाद में किसी तरह का कोई भ्रम न रहे.
युवाओं को लगता है कि उम्र के इस दौर में बीमा की क्या जरूरत है ? यह सही धारणा नहीं है. आज खानपान और जीवनशैली ठीक नहीं है. ऐसे में युवावस्था से ही सेहत की सुरक्षा का भी ध्यान रखना चाहिए. इस तरह की योजनाओं का लाभ युवाओं को उठाना चाहिए. युवावस्था की बचत जीवन में आगे काम आती है.
महिलाओं में हैल्थ की बहुत सारी परेशानियां पैदा होती हैं. ऐसे में स्वास्थ्य बीमा लेते समय खासतौर से जागरूक रहें. इस से बीमार होने पर खर्च का दबाव कम होगा जिस से परेशान नहीं होना पडे़गा. ऐसे में महिलाओं को अपने हिसाब से बचत करनी चाहिए. यह बचत केवल घरेलू बजट में कटौती तक ही सीमित नहीं रह गई है. अब बदलते दौर में यह बदल चुकी है.
बदलते दौर के हिसाब से बचत करने में भी महिलाओं को पुरुषों के बराबर ही कदम उठाने चाहिए. बचत का मूलमंत्र सही तरह से खर्च करना है. ऐसे में अपने खर्चे जरूरत के हिसाब से ही करें, तभी सही तरह से बचत हो पाएगी.
मोदी सरकार ने 2,989 करोड़ रुपए खर्च कर के सरदार वल्लभभाई पटेल की जो विशाल मूर्ति बनवाई है, उस का एक परोक्ष लाभ होगा. अब तक देशभर में जो विशाल मूर्तियां बनती रही हैं, वे पूजास्थल बन जाती हैं और उन के इर्दगिर्द पंडों की दुकानें खुल जाती हैं. जो विशाल अक्षरधाम मंदिर भारत में ही नहीं, विदेशों में भी बने हैं, वहां जम कर धर्म और पाखंड का व्यापार होता है. शिरडी के फकीर की स्वर्णमंडित मूर्तियों को पंडे जम कर बेच रहे हैं.
सरकारों, खासतौर पर भाजपा सरकारों को करोड़ों रुपए इन सब मंदिरों के रखरखाव, प्रबंध, वहां तक पहुंचने वाली सड़कों, बिजली, पानी, सीवर पर खर्च करने पड़ते हैं. ये सब मूर्तियां सरदार पटेल की मूर्ति से चाहे छोटी हों पर खर्च बहुत कराती हैं.
सरदार पटेल की मूर्ति से ये सब मूर्तियां बच जाएंगी. पटेल कांग्रेसी नेता थे, इसलिए मोदी के बाद भाजपाई उन से ऊब जाएंगे और सिवा गुजरात सरकार के, यदि भाजपा की रही तो, कोई परिंदा तक वहां न जाएगा. कुछ भूलेबिसरे यात्री वहां तक जाने की जहमत उठाएंगे वह भी इसलिए कि मूर्ति की लिफ्ट में चढ़ कर कुछ आनंद ले सकें. पर चाहे जितना गुणगान किया जाए, वहां का दृश्य कुछ अजूबा नहीं है. दिल्ली की कुतुबमीनार पर जब तक चढ़ने दिया जाता था, तब भी लोग कतारों में नहीं लगते थे.
इस मूर्ति का महत्त्व महज एक और कुतुबमीनार की तरह का रह जाएगा. आसपास केवल उस की देखभाल करने वाले होंगे. जैसे अहमदाबाद में साबरमती के किनारे महात्मा गांधी का आश्रम सुनसान पड़ा रहता है वैसा ही सरदार पटेल की मूर्ति के साथ होगा. मोदी के बाद न भाजपा, न कांग्रेस, न आम गुजराती, न औसत भारतीय इस मूर्ति में रुचि दिखाएंगे.
मूर्तियां बनाने का पागलपन अब कम होगा, क्योंकि इस से छोटी मूर्तियां बना कर अब कोई विशालता का सुबूत तो नहीं दे सकता. नरेंद्र मोदी ने यदि यह सोच कर पटेल की मूर्ति बनाई हो कि कभी इस से ऊंची उन की खुद की मूर्ति बनेगी, तो बात दूसरी है.
गनीमत है कांग्रेस ने गांधी, नेहरू, इंदिरा और राजीव की बड़ी मूर्तियां नहीं बनवाईं. हां, अंबेडकर एक ऐसे उम्मीदवार अभी अवश्य हैं. उन के समर्थकों को यदि सत्ता मिली तो वे अवश्य 300 मीटर ऊंची मूर्ति बनाएंगे चाहे लखनऊ में अंबेडकर व कांशीराम की मूर्तियों को देखने कोई जाता हो या न हो.
दक्षिण अफ्रीका की क्रिकेट टीम के कप्तान रह चुके ग्रीम स्मिथ जब जगमोहन डालमिया सालाना कौन्क्लेव में हिस्सा लेने भारत आए तो उन्होंने माना कि टैस्ट क्रिकेट में इस्तेमाल की जाने वाली गेंद की क्वालिटी का रोल बड़ा ही अहम होता है.
शुक्रवार, 2 नवंबर, 2018 को आयोजित हुई इस कौन्क्लेव में ग्रीम स्मिथ का मानना था कि लाल गेंद के इस खेल में कूकाबुरा गेंद टैस्ट क्रिकेट को खत्म कर रही है.
ग्रीम स्मिथ ने बताया, ‘‘कूकाबुरा गेंद खेल को मार रही है. मैं अपनी राय रखूं, तो टैस्ट क्रिकेट में गेंद बहुत बड़ा मुद्दा है.’’
ग्रीम स्मिथ ने हाल ही में भारत में मचे ड्यूक गेंद के हंगामे पर कहा, ‘‘मैं ने देखा है कि कुछ खिलाड़ी एसजी गेंद की शिकायत कर रहे हैं. ठीक उसी तरह कूकाबुरा गेंद भी लोगों को निराश कर रही है. कूकाबुरा गेंद अब ऐसी बनती है कि वह लंबे समय तक सख्त नहीं बनी रहती और इस के चलते वह ज्यादा समय तक स्विंग नहीं हो पाती.
‘‘टैस्ट क्रिकेट अब ड्रा से अपने वजूद को नहीं बचा सकता. टैस्ट क्रिकेट में नतीजे आएं, इस के लिए जरूरी है कि गेंद में स्विंग और स्पिन बनी रहे. गेंद में हमेशा ऐसा कुछ रहना चाहिए, जिस से वह हवा में भी हरकत करती रहे.
‘‘बल्ले और गेंद के बीच एक तरह की होड़ बनी रहने पर ही टैस्ट क्रिकेट का वजूद बना रह सकता है.
‘‘टैस्ट क्रिकेट कमजोर टीमों की पोल खोल कर रख देता है. 30 गेंदों में 70 रन बना कर आप क्रिकेट के छोटे फौर्मैट में तो जीत सकते हैं लेकिन टैस्ट क्रिकेट में नहीं. यहां एक अलग ढंग की चुनौती होती है.’’
टैस्ट क्रिकेट के रोमांच में आ रही कमी को ले कर उन्होंने आगे कहा, ‘‘इस की अहम वजह यह भी है कि हम ने कुछ शानदार टीमों को खो दिया है. मैं मानता हूं कि क्रिकेट के सभी फौर्मैट में बराबर की चुनौती रहनी चाहिए, तभी यह खेल अपना वजूद बनाए रह सकता है.’’
कितनी तरह की गेंदें होती हैं इस्तेमाल
दरअसल, टैस्ट क्रिकेट में 3 तरह की गेंदों का इस्तेमाल होता है, एसजी गेंद, कूकाबुरा गेंद और ड्यूक गेंद. एसजी गेंद का इस्तेमाल सिर्फ भारत में होता है. इसे हाथों से बनाया जाता है जो अपनी शानदार सीम के लिए जानी जाती है.
इस की एक क्वालिटी यह होती है कि यह स्पिन गेंदबाज को ड्रिफ्ट कराने में मदद करती है. इतना ही नहीं, यह तेज गेंदबाज को रिवर्स स्विंग भी कराती है.
कूकाबुरा गेंद को मशीन से बनाया जाता है पर इस की सीम जल्दी फेड पड़ जाती है और इस गेंद पर ग्रिप बनाए रखना बड़ा मुश्किल काम है. हां, यह गेंद लैग स्पिनर्स के लिए मददगार है.
कूकाबुरा गेंद का इस्तेमाल आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान, श्रीलंका और जिंबाब्वे में होता है.
तीसरी तरह की ड्यूक गेंद का इस्तेमाल इंगलैंड और वैस्टइंडीज में होता है. इस गेंद को भी हाथों से बनाया जाता है. इस की सीम लंबे समय तक ठीक रहती है और यह ज्यादा देर तक कठोर बनी रहती है. यह गेंद हर तरह के गेंदबाज के लिए मददगार है.
कोहली की पसंदीदा गेंद
भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली एसजी गेंद से ज्यादा ड्यूक गेंद को पसंद करते हैं. उन का मानना है कि एसजी गेंद अब पहले जैसी नहीं रही है. इस की क्वालिटी भी अब पहले जैसी नहीं रही है बल्कि खराब ही हुई है. वे इस गेंद के बजाय ड्यूक गेंद को टैस्ट मैचों के लिए बढि़या मानते हैं.
भारतीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबाज उमेश यादव ने भी यह बयान दिया था कि अब एसजी यानी सैंसपरील्स ग्रीनलैंड्स गेंद गेंदबाजी के लिए माकूल नहीं रह गई है.
भारतीय क्रिकेट में इस गेंद का इस्तेमाल तकरीबन 25 साल से हो रहा है. इसी गेंद से देशभर में घरेलू और इंटरनैशनल क्रिकेट खेला जा रहा है, लेकिन अब अचानक से कुछ खिलाड़ी जैसे उमेश यादव, कुलदीप यादव, रविचंद्रन अश्विन और विराट कोहली इस गेंद से नाराज दिख रहे हैं और वे मानते हैं कि इंगलैंड में बनी ड्यूक गेंद से ही टैस्ट क्रिकेट खेला जाना चाहिए.
अजहर हुए नाराज
भारतीय टीम के खिलाडि़यों की एसजी गेंद से हुई नाराजगी पर भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रह चुके मोहम्मद अजहरुद्दीन कहते हैं, ‘‘मेरी समझ में यह नहीं आ रहा कि अचानक एसजी गेंद को ले कर इतना होहल्ला क्यों हो रहा है. मुझे अब भी वे साल अच्छे से याद हैं जब साल 1984-85 में भारत में ड्यूक की गेंदें इस्तेमाल होती थीं और उन की सीम खराब हो जाया करती थी. यह साफ था कि भारतीय हालात में ड्यूक गेंद नहीं चल सकती. इस के बाद 1993 का वह साल था, जब भारत में एसजी गेंद से क्रिकेट खेलना शुरू हुआ और इस के बाद टीम इंडिया ने अपने घर पर खेले जाने वाले क्रिकेट पर अपना दबदबा बना लिया.
‘‘गेंद पर शोर मचाने से पहले दुनिया के सभी गेंदबाजों का अलगअलग गेंदों से अलगअलग हालात में गेंदबाजी का औसत देख लीजिए. इस से आप को सही जवाब मिल जाएगा. तो इसे ले कर इतना हंगामा करने की क्या जरूरत है.
‘‘जब हमारे देश के स्पिन गेंदबाज आस्ट्रेलिया जाते हैं तो उन्हें कूकाबुरा गेंद पर अपनी पकड़ बनाने में मुश्किलें आती हैं. आप को घरेलू टैस्ट सीरीज में वही गेंद इस्तेमाल करनी चाहिए, जो आप के हालात के माकूल हो. यही टैस्ट क्रिकेट की चुनौती है.’’
गेंद पर मचे इस घमासान पर क्या फैसला लिया जाता है, यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा, पर फिलहाल तो यह छोटी सी लाल गेंद भारतीय खिलाडि़यों को लालपीला कर रही है.
मूर्तिपूजक भाजपा नेता एक और मूर्ति के लगने से गर्वित दिखाई दे रहे हैं. गुजरात के केवडि़या में नर्मदा तट पर सरदार वल्लभभाई पटेल की 182 मीटर ऊंची लोहे की प्रतिमा से परदा उठाते समय धर्म की राजनीति करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टीम के चेहरों पर खुशी व घमंड के भाव दिखाई पड़ रहे थे, मानो देश ने बहुत बड़ी कामयाबी हासिल कर ली है.
विश्व की सब से ऊंची मूर्ति लगा कर नेतागण इस कदर गदगद दिखे मानो भारत ने सब से ऊंची मूर्ति लगाकर आसमान की ऊंचाई माप ली है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुबह जब सरदार पटेल की मूर्ति से परदा उठाया तो नहीं लगा कि वे पूरे देश की जनता की एकता के प्रतीक किसी नेता की मूर्ति को आमजन के लिए खोल रहे हैं. समारोह में सिर्फ गुजरात के ही नेता मौजूद थे. इन में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री और मध्य प्रदेश की मौजूदा राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी, उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल ही उपस्थित थे. आम आदमी नदारक थे. यह बात और है कि हर रोज चारधाम यात्रा में ज्यादा लोग जाते हैं, बजाय मूर्ति के अनावरण में पहुंचे लोगों के.
लोगों से ‘देश की एकता जिंदाबाद’ के नारे लगवाए गए. एकता की बेहतर मिसाल तब ज्यादा सराही जाती जब देश के तमाम दलों के नेता इस में शिरकत करते. फिर पटेल की मूर्ति केवल गुजरात या भाजपा की नहीं, समूचे देश की मानी जाती. ऐसा न कर के भाजपा का एकता का नहीं, संकीर्णता का संदेश गया है. भाजपा ने रन फौर यूनिटी का तमाशा दूसरे शहरों में किया था, पर हर शहर में मुसलमान अलग थे, दलित बाहर थे.
1,700 टन वजन की मूर्ति के निर्माण में 2,989 करोड़ रुपए का खर्च आया है. इसे बनाने में 33 महीने लगे. इस देश के 25 करोड़ भूखे लोगों के लिए मूर्ति कितनी जरूरी है? यह मिस्र के राजाओं की तरह के स्मारक हैं जिन्होंने मरने के बाद कब्र के रूप में विशाल पिरामिड बनवाए.
यह सही है कि सरदार पटेल ने देशी रियासतों के एकीकरण में अहम भूमिका निभाई थी. वे कांग्रेस के कद्दावर नेता थे. पर ऐसे कोई खास भी नहीं कि उन को महादेवता घोषित कर दिया जाए. हिटलर ने भी यूरोप को एक कर दिया था फौज और अत्याचार के बल पर. पटेल का कोई आर्थिक योगदान नहीं है, कोई सामाजिक परिवर्तन का योगदान नहीं. वे गुजराती गांधी के विश्वस्त थे, बस.
पिछली बार से भाजपा ने वोटों के लिए महात्मा गांधी पर अपना अधिकार जताना शुरू किया, फिर अंबेडकर और सरदार पटेल पर. इसे ले कर मुख्य विपक्ष कांग्रेस और भाजपा दोनों के बीच तकरार चलती रहती है.
देश में असंख्य मूर्तियां हैं. महानगर, शहर, कसबे और गांवों तक में गलीचौराहों पर मूर्तियां ही मूर्तियां हैं. अलगअलग धर्म, जाति, वर्ग, विचारधाराओं में बंटी मूर्तियों में कैसी सामाजिक एकता है?
पिछले दशकों में देश की निचली, पिछड़ी जातियों के लिए कई देवीदेवता गढ़े गए. महाराष्ट्र में सामाजिक सुधारक ज्योतिबा फुले, भीमराव अंबेडकर, शाहू महाराज, शिवाजी, कांशीराम जैसे नेताओं को दलित, पिछड़े अपना उद्धारक मान कर मूर्तियां खड़ी करने में जुट गए. हर जाति ने अपनेअपने नेता की मूर्तियां बना कर गलीचौराहों पर लगा दीं.
दरअसल, मूर्तियों को गढ़ने की सोच हजारों साल पुरानी है. जब मनुष्य को विज्ञान की जानकारी नहीं थी, वह ग्रहों और अन्य प्राकृतिक चीजों को पूजने लगा. उन लोगों ने सूर्य, चंद्रमा जैसे ग्रहों को अपना देवता मान लिया. मूर्तियां बना लीं और पूजन शुरू कर दिया.
वेदों में भी यज्ञों द्वारा देवताओं का आह्वान किया जाता था और दुश्मनों से रक्षा करने और उन्हें खत्म करने के लिए वरुण, वायु, इंद्र, अग्नि जैसे देवताओं से गुहार लगाई जाती थी.
दरअसल, मूर्तियां ब्राह्मणों द्वारा अपने पूजने के लिए बनवाई जाती थीं. अब उन्होंने दलित, पिछड़ों, आदिवासियों को उन्हीं की जाति के नेताओं को देवीदेवताओं के रूप में पेश कर मूर्तियां बनाने और पूजने के लिए आगे कर दिया. और अब अपनेअपने नेताओं की मूर्तियों की होड़ मची है.
बुद्ध की विशाल प्रतिमाएं पूरे एशिया में लगी हैं पर बौद्ध धर्म से क्या मिला. चीन, जापान धर्म के कारण नहीं, कर्मठता के कारण विकसित हो रहे हैं.
मूर्तियों का युग अंधकार का युग था. उस ने देश में ज्ञान का प्रकाश रोका. अब सरकार खुद ही देश को फिर से अंधकार युग में ले जाने की कवायद कर रही है.
मूर्तियों की वजह से सामाजिक एकता नहीं आ पाएगी. इस देश में जातियों की दीवारें कब ढहेंगी? इंसानों में यूनिटी कब होगी? सामाजिक यूनिटी कैसे होगी? क्या इस बारे में भी कोई योजना नहीं है? शायद ऐसी कोई योजना नहीं है. यह मूर्तियों में बंटे देश की यूनिटी नहीं, मूर्तियों के प्रति मानसिक गुलामी है.
11 सितंबर, 2018 की सुबह करीब 8 बजे कानपुर शहर के थाना कैंट के थानाप्रभारी ललितमणि त्रिपाठी थाने में पहुंचे ही थे कि उसी समय एक व्यक्ति बदहवास हालत में उन के पास पहुंचा. उस ने थानाप्रभारी को सैल्यूट किया फिर बताया, ‘‘सर, मेरा नाम दिलीप कुमार है. मैं सिपाही पद पर पुलिस लाइन में तैनात हूं और कैंट थाने के पुलिस आवास ब्लौक 3, कालोनी नंबर 29 में रहता हूं. बीती रात मेरी दूसरी पत्नी बबीता ने पंखे से फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली है. आप को सूचना देने थाने आया हूं.’’
चूंकि विभागीय मामला था. अत: थानाप्रभारी ललितमणि त्रिपाठी ने दिलीप की सूचना से अपने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को अवगत कराया फिर सहयोगियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस टीम जब दिलीप के आवास पर पहुंची तो बबीता का शव पलंग पर पड़ा था. उस की उम्र करीब 23 साल थी. उस के गले में खरोंच का निशान था. वहां एक दुपट्टा भी पड़ा था. शायद उस ने दुपट्टे से फांसी का फंदा बनाया था.
थानाप्रभारी अभी जांच कर ही रहे थे कि एसएसपी अनंत देव, एसपी राजेश कुमार यादव तथा सीओ (कैंट) अजीत प्रताप सिंह फोरैंसिक टीम के साथ वहां आ गए. पुलिस अधिकारियों ने बारीकी से घटनास्थल का निरीक्षण किया फिर सिपाही दिलीप कुमार व उस की पत्नी बबली से पूछताछ की.
दिलीप ने बताया कि उस की ब्याहता पत्नी बबली है. बाद में उस ने साली बबीता से दूसरा ब्याह रचा लिया था. दोनों पत्नियां साथ रहती थीं. बीती रात बबीता ने पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली जबकि बबली ने बताया कि बबीता को मिरगी का दौरा पड़ता था. वह बीमार रहती थी, जिस से परेशान हो कर उस ने आत्महत्या कर ली.
पुलिस अधिकारियों ने पूछताछ के बाद मृतका के परिवार वालों को भी सूचना भिजवा दी. फोरैंसिक टीम ने जांच की तो पंखे, छत के कुंडे व रौड पर धूल लगी थी. अगर पंखे से लटक कर बबीता ने जान दी होती तो धूल हटनी चाहिए थी. मौके से बरामद दुपट्टे पर भी किसी तरह की धूल नहीं लगी थी.
गले पर मिला निशान भी फांसी के फंदे जैसा नहीं था. टीम को यह मामला आत्महत्या जैसा नहीं लगा. फोरैंसिक टीम ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को अपने शक से अवगत कराया और शव का पोस्टमार्टम डाक्टरों के पैनल से कराने का अनुरोध किया. इस के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय चिकित्सालय भिजवा दी.
एसएसपी अनंत देव ने तब मृतका बबीता के शव का पोस्टमार्टम डाक्टरों के पैनल से कराने को कहा. डाक्टरों के पैनल ने बबीता का पोस्टमार्टम किया और अपनी रिपोर्ट पुलिस अधिकारियों को भेज दी.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट को पढ़ कर थानाप्रभारी चौंक पड़े, क्योंकि उस में साफ कहा गया था कि बबीता की मौत गला दबा कर हुई थी. यानी वह आत्महत्या नहीं बल्कि हत्या का मामला निकला.
श्री त्रिपाठी ने अपने अधिकारियों को भी बबीता की हत्या के बारे में अवगत करा दिया. फिर उन के आदेश पर सिपाही दिलीप कुमार को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया.
अब तक मृतका बबीता के मातापिता भी कानपुर आ गए थे. आते ही बबीता के पिता डा. बृजपाल सिंह ने थानाप्रभारी ललितमणि त्रिपाठी व सीओ अजीत प्रताप सिंह चौहान से मुलाकात की. उन्होंने आरोप लगाया कि सिपाही दिलीप व उस के परिवार वालों ने दहेज के लिए उन की बेटी बबीता को मार डाला. उन्होंने रिपोर्ट दर्ज कर आरोपियों को तुरंत गिरफ्तार करने की मांग की.
चूंकि बबीता की मौत गला घोंटने से हुई थी और सिपाही दिलीप कुमार शक के घेरे में था. अत: थानाप्रभारी ललितमणि त्रिपाठी ने मृतका के पिता डा. बृजपाल सिंह की तहरीर पर सिपाही दिलीप कुमार उस के पिता सोनेलाल व मां मालती के खिलाफ दहेज उत्पीड़न व गैर इरादतन हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर के जांच शुरू कर दी.
बबीता की मौत की बारीकी से जांच शुरू की तो उन्होंने सब से पहले हिरासत में लिए गए सिपाही दिलीप कुमार से पूछताछ की. दिलीप कुमार ने हत्या से साफ इनकार कर दिया. उस की ब्याहता बबली से पूछताछ की गई तो वह भी साफ मुकर गई. पासपड़ोस के लोगों से भी जानकारी जुटाई गई, पर हत्या का कोई क्लू नहीं मिला.
सिपाही दिलीप के पिता सोनेलाल भी यूपी पुलिस में एसआई हैं. वह पुलिस लाइन कानपुर में तैनात हैं. सोनेलाल भी इस केस में आरोपी थे. फिर भी उन्होंने पुलिस अधिकारियों से मुलाकात की और बताया कि बबीता की हत्या उन के बेटे दिलीप ने नहीं की है.
उन्होंने कहा कि बबीता के पिता बृजपाल ने झूठा आरोप लगा कर पूरे परिवार को फंसाया है. पुलिस जिस तरह चाहे जांच कर ले, वह जांच में पूरा सहयोग करने को तैयार हैं. उन्होंने यहां तक कहा कि यदि जांच में मेरा बेटा और मैं दोषी पाया जाऊं तो कतई न बख्शा जाए.
एसपी राजेश कुमार यादव व सीओ प्रताप सिंह भी चाहते थे कि हत्या जैसे गंभीर मामले में कोई निर्दोष व्यक्ति जेल न जाए, अत: उन्होंने एसआई सोनेलाल की बात को गंभीरता से लिया और थानाप्रभारी ललितमणि त्रिपाठी को आदेश दिया कि वह निष्पक्ष जांच कर जल्द से जल्द हत्या का खुलासा कर दोषी के खिलाफ काररवाई करें.
अधिकारियों के आदेश पर थानाप्रभारी ने केस की सिरे से जांच शुरू की. उन्होंने मामले का क्राइम सीन दोहराया. इस से एक बात तो स्पष्ट हो गई कि बबीता का हत्यारा कोई अपना ही है. क्योंकि घर में उस रात 4 सदस्य थे. सिपाही दिलीप कुमार, उस की ब्याहता बबली, 3 वर्षीय बेटा और दूसरी पत्नी बबीता. अब रात में बबीता की हत्या या तो दिलीप ने की या फिर बबली ने या फिर दोनों ने मिल कर की या किसी को सुपारी दे कर कराई.
दिलीप कुमार बबीता की हत्या से साफ मुकर रहा था. उस का दरोगा पिता सोनेलाल भी उस की बात का समर्थन कर रहा था. यदि दिलीप ने हत्या नहीं की तो बबली जरूर हत्या के राज से वाकिफ होगी. अब तक कई राउंड में पुलिस अधिकारी दिलीप तथा उस की ब्याहता बबली से पूछताछ कर चुके थे. पर किसी ने मुंह नहीं खोला था.
इस पूछताछ में बबली शक के घेरे में आ रही थी. पुष्टि करने के लिए पुलिस ने बबली के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. उस से पता चला कि उस ने घटना वाली शाम को अपने देवर शिवम से बात की थी. अत: 14 सितंबर को बबली को पूछताछ के लिए थाने बुलवा लिया.
महिला पुलिसकर्मियों ने जब उस से उस की छोटी बहन बबीता की हत्या के संबंध में पूछा तो वह साफ मुकर गई. लेकिन मनोवैज्ञानिक तरीके से की गई पूछताछ से बबली टूट गई. उस ने बबीता की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया.
बबली ने बताया कि उस की सगी छोटी बहन बबीता उस की सौतन बन गई थी. पति बबीता के चक्कर में उस की उपेक्षा करने लगा था. इतना ही नहीं, वह शारीरिक और मानसिक रूप से भी उसे प्रताडि़त करता था. पति की उपेक्षा से उस का झुकाव सगे देवर शिवम की तरफ हो गया. फिर शिवम की मदद से ही रात में बबीता की रस्सी से गला कस कर हत्या कर दी.
बबली के बयानों के आधार पर पुलिस ने शिवम को चकेरी से गिरफ्तार कर लिया. शिवम चकेरी में कमरा ले कर रह रहा था और पढ़ाई तथा प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा था. थाने में भाभी बबली को देख कर उस के चेहरे का रंग उड़ गया. फिर उस ने भी हत्या का जुर्म कबूल कर लिया.
शिवम ने बताया कि बबली भाभी व उस के बीच प्रेम संबंध थे. भाभी उस से मिलने चकेरी आती थी. किसी तरह बबीता को यह बात पता लग गई थी तो वह शिकायत दिलीप भैया से कर देती थी.
फिर दिलीप भैया हम दोनों को पीटते थे. इसी खुन्नस में हम दोनों ने गला घोट कर बबीता को मार डाला. शिवम ने हत्या में प्रयुक्त रस्सी भी पुलिस को बरामद करा दी जो उस ने झाडि़यों में फेंक दी थी.
चूंकि बबीता की हत्या की वजह साफ हो गई थी, इसलिए थानाप्रभारी ललितमणि त्रिपाठी ने दहेज हत्या की रिपोर्ट को खारिज कर बबली व शिवम के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली और दोनों को गिरफ्तार कर सिपाही दिलीप व उस के मातापिता को क्लीन चिट दे दी.
पुलिस द्वारा की गई जांच, आरोपियों के बयानों और अन्य सूत्रों से मिली जानकारी के आधार पर नाजायज रिश्तों एवं सौतिया डाह की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली-
उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले का एक छोटा सा गांव है रूपापुर. इसी गांव में डा. बृजपाल सिंह अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी ममता के अलावा 2 बेटियां बबली और बबीता थीं. बृजपाल सिंह गांव के सम्मानित व्यक्ति थे. वह डाक्टरी पेशे से जुड़े थे. उन के पास उपजाऊ जमीन भी थी. कुल मिला कर वह हर तरह से साधनसंपन्न और प्रतिष्ठित व्यक्ति थे.
उन्होंने बड़ी बेटी बबली की शादी फर्रुखाबाद जिले के गंज (फतेहगढ़) निवासी सोनेलाल के बेटे दिलीप कुमार के साथ तय कर दी. दिलीप कुमार उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही था. सोनेलाल भी उत्तर प्रदेश पुलिस में एसआई थे. उन का छोटा बेटा शिवम पढ़ रहा था. सोनेलाल का परिवार भी खुशहाल था.
दोनों ही परिवार पढ़ेलिखे थे, इसलिए सगाई से पहले ही परिजनों ने एकांत में बबली और दिलीप की मुलाकात करा दी थी. क्योंकि जिंदगी भर दोनों को साथ रहना है तो वे पहले ही एकदूसरे को देखसमझ लें. दोनों ने एकदूसरे को पसंद कर लिया तो 11 दिसंबर, 2012 को सामाजिक रीतिरिवाज से दोनों की शादी हो गई.
शादी के बाद बबली कुछ महीने ससुराल में रही फिर दिलीप को कानपुर के कैंट थाने में क्वार्टर मिल गया. क्वार्टर आवंटित होने के बाद दिलीप अपनी पत्नी को भी गांव से ले आया. वहां दोनों हंसीखुशी से जिंदगी व्यतीत करने लगे.
दिलीप जब ससुराल जाता तो उस की निगाहें अपनी खूबसूरत साली बबीता पर ही टिकी रहती थीं. वह महसूस करने लगा कि बबली से शादी कर के उस ने गलती की. उस की शादी तो बबीता से होनी चाहिए थी. ऐसा नहीं था कि बबली में किसी तरह की कमी थी. वह सुंदर, सुशील के साथ घर के सभी कामों में दक्ष थी.
लेकिन बबीता अपनी बड़ी बहन से ज्यादा सुंदर और चंचल थी, इसलिए दिलीप का मन साली पर इतना डोल गया कि उस ने फैसला कर लिया कि वह बबीता को अपने प्यार के जाल में फंसा कर उस से दूसरा विवाह करने की कोशिश करेगा.
रिश्ता जीजासाली का था सो दिलीप और बबीता के बीच हंसीमजाक होता रहता था. एक दिन दिलीप ससुराल में सोफे पर बैठा था तभी बबीता उसी के पास सोफे पर बैठ कर उस की शादी का एलबम देखने लगी. दोनों के बीच बातों के साथ हंसीमजाक हो रहा था. अचानक दिलीप ने एलबम में लगे एक फोटो की ओर संकेत किया, ‘‘देखो बबीता, मेरे बुरे वक्त में कितने लोग साथ खड़े हैं.’’
बबीता ने गौर से उस फोटो को देखा, जिस में दिलीप दूल्हा बना हुआ था और कई लोग उस के साथ खड़े थे. फिर वह खिलखिला कर हंसने लगी, ‘‘शादी और आप का बुरा वक्त. जीजाजी, बहुत अच्छा मजाक कर लेते हैं आप.’’
‘‘बबीता, मैं मजाक नहीं कर रहा हूं सच बोल रहा हूं.’’ चौंकन्नी निगाहों से इधरउधर देखने के बाद दिलीप फुसफुसा कर बोला, ‘‘बबली से शादी कर के मैं तो फंस गया यार.’’
‘‘पापा ने दहेज में न कोई कसर छोड़ी है और न दीदी में किसी तरह की कमी है.’’ हंसतेहंसते बबीता गंभीर हो गई, ‘‘फिर आप दिल दुखाने वाली ऐसी बात क्यों कर रहे हैं.’’
‘‘बबली को जीवनसाथी चुन कर मैं ने गलती की थी.’’ कह कर दिलीप बबीता की आंखों में देखने लगा फिर बोला, ‘‘सच कहूं, मेरी पत्नी के काबिल तो तुम थी.’’
गंभीरता का मुखौटा उतार कर बबीता फिर खिलखिलाने लगी, ‘‘जीजाजी, आप भी खूब हैं.’’
‘‘अच्छा, एक बात बताओ. अगर बबली से मेरा रिश्ता न हुआ होता और मैं तुम्हें प्रपोज करता तो क्या तुम मुझ से शादी करने को राजी हो जाती.’’ कह कर दिलीप ने उस के मन की टोह लेनी चाही.
बबीता से कोई जवाब देते न बना, वह गहरी सोच में डूब गई.
‘‘सच बोलूं?’’ बबीता ने कहा, ‘‘आप बुरा तो नहीं मानेंगे.’’
दिलीप का दिल डूबने सा लगा, ‘‘बिलकुल नहीं, लेकिन सच बोलना.’’
‘‘सच ही बोलूंगी जीजाजी,’’ शर्म से बबीता के गालों पर गुलाबी छा गई, ‘‘और सच यह है कि मैं आप से शादी करने को फौरन राजी हो जाती.’’
यह सुन कर दिलीप का दिल बल्लियों उछलने लगा किंतु मन में एक संशय भी था, सो उस ने तुरंत पूछ लिया, ‘‘कहीं मेरा मन रखने के लिए तो तुम यह जवाब नहीं दे रही.’’
‘‘हरगिज नहीं, बहुत सोचसमझ कर ही मैं ने आप को यह जवाब दिया है.’’ बबीता आहिस्ता से निगाहें उठा कर बोली, ‘‘आप हैं ही इतने हैंडसम और स्मार्ट कि किसी भी लड़की के आइडियल हो सकते हैं.’’
दिलीप ने अपनी आंखें उस की आंखों में डाल दीं, ‘‘तुम्हारा भी…’’
‘‘मैं कैसे शामिल हो सकती हूं.’’ बबीता बौखलाई सी थी, ‘‘आप तो मेरे जीजाजी हैं.’’
बबीता ने मुंह खोला ही था कि तभी उस की मां ममता वहां आ गईं. अत: दोनों की बातों पर वहीं विराम लग गया. दिलीप से हुई बातों को बबीता ने सामान्य रूप से लिया, मगर दिलीप का दिमाग दूसरी ही दिशा में सोच रहा था. उसे विश्वास हो गया कि बबीता भी उस पर फिदा है. लिहाजा वह बबीता पर डोरे डालने लगा.
शादी के ढाई साल बाद बबली गर्भवती हुई तो उस की खुशी का ठिकाना न रहा. दिलीप को भी बाप बनने की खुशी थी. एक रोज बबली ने पति से कहा कि उसे अब घरेलू काम व खाना बनाने में दिक्कत होने लगी है. अत: वह बबीता को घर की देखरेख के लिए लिवा लाए. कम से कम वह घर का काम तो कर लिया करेगी.
पत्नी की बात सुन कर दिलीप खुशी से झूम उठा. उस ने बबली से कहा कि वह अपने मातापिता से बबीता को भेजने की बात कर ले. कहीं ऐसा न हो कि वह उसे भेजने से इनकार कर दें.
बबली ने मां से बात की तो वह बबीता को दिलीप के साथ भेजने को राजी हो गईं. इस के बाद दिलीप ससुराल गया और बबीता को साथ ले आया. बबीता ने आते ही घर का कामकाज संभाल लिया.
साली घर आ गई तो दिलीप के जीवन में भी बहार आ गई. वह उसे रिझाने के लिए उस पर डोरे डालने लगा. पहले दोनों में मौखिक छेड़छाड़ शुरू हुई. फिर धीरेधीरे मगर चालाकी से दिलीप ने उस से शारीरिक छेड़छाड़ भी शुरू कर दी.
उन दिनों बबीता की उम्र 19-20 साल थी. उस के तनमन में यौवन का हाहाकारी सैलाब थमा हुआ था. दिलीप की कामुक हरकतों से उसे भी आनंद की अनुभूति होने लगी. दिलीप को छेड़ने पर वह उस का विरोध करने के बजाय मुसकरा देती. इस से दिलीप का हौसला बढ़ता गया. बबीता भी दिलीप में रुचि लेने लगी. फिर एक दिन मौका मिलने पर दोनों ने अपनी हसरतें भी पूरी कर लीं.
साली के शरीर को पा कर जहां दिलीप की प्रसन्नता का पारावार न था, वहीं बबीता को प्रसन्नता के साथ ग्लानि भी थी. उस ने कहा, ‘‘जीजाजी, यह अच्छा नहीं हुआ. तुम्हारे साथ मैं भी बहक गई.’’
‘‘तो इस में बुरा क्या है?’’
‘‘बुरा यह है कि मैं ने बड़ी बहन के हक पर अपना हक जमा लिया. यह पाप है.’’ वह बोली.
‘‘प्यार में पापपुण्य नहीं देखा जाता. भूल जाओ कि तुम ने कुछ गलत किया है. बबली का जो हक है, वह उसे मिलता रहेगा.’’ कहते हुए दिलीप ने बबीता को फिर से बांहों में समेटा तो वह भी अच्छाबुरा भूल कर उस से लिपट गई.
उसी दिन से दोनों के पतन की राह खुल गई. देर रात जब बबली सो जाती तो बबीता दिलीप के बिस्तर पर पहुंच जाती फिर दोनों हसरतें पूरी करते.
बबली ने बेटे को जन्म दिया तो घर में खुशी छा गई. पति के अलावा सासससुर सभी खुश थे. कुछ समय बाद बबली ने महसूस किया कि छोटी बहन बबीता उस के पति से कुछ ज्यादा ही नजदीकियां बढ़ा रही है. उस ने उस पर नजर रखनी शुरू की तो सच सामने आ गया.
उस ने नाजायज रिश्तों का विरोध किया तो दिलीप व बबीता दोनों ही उस पर हावी हो गए. तब बबली ने बबीता को घर वापस भेजने का प्रयास किया लेकिन दिलीप ने उसे नहीं जाने दिया.
एक रात जब बबली ने पति को छोटी बहन के साथ बिस्तर पर रंगेहाथ पकड़ा तो दिलीप बोला कि वे एकदूसरे को प्यार करते हैं और जल्द ही शादी भी कर लेंगे. यदि उस ने विरोध किया तो वह उसे घर से निकाल देगा.
इस धमकी से बबली डर गई. अब वह डरसहमी रहने लगी. बबली का विरोध कम हुआ तो दिलीप और बबीता खुल्लमखुल्ला रासलीला रचाने लगे. इसी बीच चोरीछिपे दिलीप ने बबीता के साथ आर्यसमाज मंदिर में शादी कर ली और उसे पत्नी का दरजा दे दिया.
डा. बृजलाल सिंह को जब दामाद की इस नापाक हरकत का पता चला तो वह किसी तरह बबीता को घर ले आए. घर पर मां ने उसे समझाया और बहन का घर न उजाड़ने की नसीहत दी.
लेकिन बबीता जीजा के प्यार में इस कदर डूब चुकी थी कि उसे मां की नसीहत अच्छी नहीं लगी. उस ने मां से साफ कह दिया कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह दिलीप का साथ नहीं छोड़ेगी.
डा. बृजपाल सिंह ने बड़ी बेटी बबली का घर टूटने से बचाने के लिए पुलिस में दिलीप की शिकायत की. जांच के दौरान पुलिस ने बबीता का बयान दर्ज किया.
बबीता ने तब हलफनामा दे कर कहा कि उस ने दिलीप से आर्यसमाज में शादी कर ली है. अब वह उस की पत्नी है और उसी के साथ रहना चाहती है. मांबाप उसे बंधक बनाए हैं. बबीता के इस बयान के बाद डा. बृजपाल मायूस हो गए. इस के बाद बबीता दिलीप के साथ चली गई.
दिलीप ने अब बबीता को पत्नी का दरजा दे दिया था और उसे सुखपूर्वक रखने लगा था. बबली और बबीता दोनों सगी बहनें अब एक ही छत के नीचे रहने लगी थीं.
बबीता ने बहन के सुहाग पर कब्जा भले ही कर लिया था लेकिन बबली ने मन से बबीता को स्वीकार नहीं किया था. बल्कि यह उस की मजबूरी थी. दोनों एकदूसरे से मन ही मन जलती थीं लेकिन दिखावे में साथ रहती थीं और हंसतीबतियाती थीं.
बबीता सौतन बन कर घर में रहने लगी तो दिलीप बबली की उपेक्षा करने लगा. वह बबीता की हर बात सुनता था, जबकि बबली को झिड़क देता था. ब्याहता की उपेक्षा कर वह बबीता के साथ घूमने और शौपिंग के लिए जाता. कभीकभी किसी बात को ले कर दोनों बहनों में झगड़ा हो जाता तो दिलीप बबीता का पक्ष ले कर बबली को ही बेइज्जत कर देता. बिस्तर पर भी बबीता ही दिलीप के साथ होती, जबकि बबली रात भर करवटें बदलती रहती थी.
बबली का एक देवर था शिवम. शिवम चकेरी में रहता था और पढ़ाई के साथ प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा था. शिवम बबली भाभी से मिलने आताजाता रहता था. शिवम को बबली से तो लगाव था लेकिन बबीता उसे फूटी आंख भी नहीं सुहाती थी.
उस का मानना था कि बबीता ने दिलीप से शादी कर के अपनी बड़ी बहन के हक को छीन लिया है. उसे बहन की सौतन बन कर नहीं आना चाहिए था.
बबली की उपेक्षा जब घर में होने लगी तो उस की नजर अपने देवर शिवम पर पड़ी. उस ने अपने हावभाव से शिवम से दोस्ती कर ली. दोस्ती प्यार में बदली और फिर उन के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. बबली अकसर देवर शिवम से मिलने जाने लगी. देवरभाभी के मिलन की शिकायत बबीता ने बढ़ाचढ़ा कर दिलीप से कर दी.
दिलीप ने निगरानी शुरू की तो बबली को छोटे भाई शिवम के साथ घूमते पकड़ लिया. इस के बाद उस ने बीच सड़क पर गिरा कर शिवम को पीटा तथा बबली की पिटाई घर पहुंच कर की. फिर तो यह सिलसिला ही चल पड़ा. बबीता की शिकायत पर बबली व शिवम की जबतब पिटाई होती रहती थी.
देवरभाभी के मिलन में बबीता बाधक बनने लगी तो बबली ने शिवम के साथ मिल कर उसे रास्ते से हटाने का फैसला ले लिया. बबली जानती थी कि जब तक बबीता जिंदा है, वह उस की छाती पर मूंग दलती रहेगी और तब तक उसे न तो घर में इज्जत मिलेगी और न ही पति का प्यार.
उसे यह भी शक था कि बबीता ने उस से उस का पति तो छीन ही लिया है, अब वह धन और गहने भी छीन लेगी इसलिए उस ने शिवम को अपनी चिकनीचुपड़ी बातों के जाल में उलझा कर ऐसा उकसाया कि वह बबीता की हत्या करने को राजी हो गया.
10 सितंबर, 2018 की शाम बबली व बबीता में किसी बात को ले कर झगड़ा हुआ. इस झगड़े ने बबली के मन में नफरत की आग भड़का दी. उस ने एकांत में जा कर शिवम से बात की और उसे घर बुला लिया. शिवम घर आया तो बबली ने उसे बाहर वाले कमरे में पलंग के नीचे छिपने को कहा. शिवम तब पलंग के नीचे छिप गया. बबीता को शिवम के आने की भनक नहीं लगी.
देर शाम दिलीप जब घर आया तो बबीता ने उस के साथ खाना खाया फिर दोनों कमरे में कूलर चला कर पलंग पर लेट गए. आधी रात के बाद बबीता लघुशंका के लिए कमरे से निकली तभी घात लगाए बैठे शिवम व बबली ने उसे दबोच लिया और घसीट कर वह उसे कमरे में ले आए.
इस के बाद शिवम ने बबीता का मुंह दबोच लिया ताकि वह चिल्ला न सके और बबली ने रस्सी से उस का गला घोट दिया. हत्या करने के बाद शिवम रस्सी का टुकड़ा ले कर भाग गया और बबली अपने मासूम बच्चे के साथ आ कर कमरे में लेट गई.
इधर सुबह को दिलीप की आंखें खुलीं तो बिस्तर पर बबीता को न पा कर कमरे से बाहर निकला. दूसरे कमरे में बबली बच्चे के साथ पलंग पर लेटी थी. बबीता को खोजते हुए दिलीप जब बाहर वाले कमरे में पहुंचा तो पलंग पर बबीता की लाश पड़ी थी.
लाश देख कर दिलीप चीखा तो बबली भी कमरे से बाहर आ गई. बबीता की लाश देख कर बबली रोने लगी. उस के रोने की आवाज सुन कर पासपड़ोस के लोग आ गए. फिर तो पुलिस कालोनी में हड़कंप मच गया.
इसी बीच दिलीप कुमार थाने पहुंचा और पुलिस को पत्नी बबीता द्वारा आत्महत्या करने की सूचना दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी ललितमणि त्रिपाठी पुलिस बल के साथ पहुंचे और फिर आगे की काररवाई हुई.
15 सितंबर, 2018 को पुलिस ने अभियुक्त शिवम और बबली को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट की अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक उन की जमानत नहीं हुई थी.
-कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
फ्रेंच मेनिक्योर नाखूनों को सजा कर एक दम क्लासी लुक प्रदान करता है. अगर आप किसी पार्टी या फौर्मल डिनर के लिए जा रही हैं, तो फ्रेंच मैनिक्योर इस मामले में बेस्ट है और इसे आसानी से आप घर पर कर सकती है. तो, आइये जानते हैं कि यह किया कैसे जाता है.
सफाई करें
मेनिक्योर की शुरुआत हाथों को सही तरीके से स्क्रब करने से होती है. ऐसा तब तक करें, जब तक हाथों व नाखूनों से धूल-मिट्टी पूरी तरह निकल नहीं जाती. नाखून के आस पास वाली रूखी त्वचा को क्यूटिकल क्लिपर्स से हटाएं. फिर नाखूनों को परफेक्ट शेप में फाइल करें.
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पेंटिंग द नेल्स
नाखूनों को फाइल करने के बाद बेस कोट कलर से पूरे नाखून को पेंट करें. इस बेस कोट को पतला रखें. अगर आपको सफाई से नेल पेंट लगाने में परेशानी होती है, तो उंगलियों के आस-पास की स्किन पर पेट्रोलियम जेली लगा लें. इससे हाथ फिसलने पर नेल पौलिश त्वचा पर नहीं चिपकेगी.
फाइन टिप्स
इस मेनिक्योर का थोड़ा मुश्किल हिस्सा उंगलियों के नाखूनों पर वाइट नेल पौलिश लगाना है. इस बात का पूरा ध्यान रखें कि नेल पेंट नाखून पर ही लगे और नाखून के निचले हिस्से पर न जाए.
क्लीयर फिनिश
अंत में पूरे नाखून पर ट्रांसपैरंट नेल पौलिश का कोट लगाएं. इससे आपका मेनिक्योर लंबे समय तक टिका रहेगा और यह आपके हाथों को स्मूद व ग्लासी लुक भी देगा.
अगर आप अपने जीवनसाथी के साथ पहले मिलन को यादगार बनाना चाहती हैं तो आप को न केवल कुछ तैयारी करनी होंगी, बल्कि साथ ही रखना होगा कुछ बातों का भी ध्यान. तभी आप का पहला मिलन आप के जीवन का यादगार लमहा बन पाएगा.
करें खास तैयारी : पहले मिलन पर एकदूसरे को पूरी तरह खुश करने की करें खास तैयारी ताकि एकदूसरे को इंप्रैस किया जा सके.

डैकोरेशन हो खास : वह जगह जहां आप पहली बार एकदूसरे से शारीरिक रूप से मिलने वाले हैं, वहां का माहौल ऐसा होना चाहिए कि आप अपने संबंध को पूरी तरह ऐंजौय कर सकें.
कमरे में विशेष प्रकार के रंग और खुशबू का प्रयोग कीजिए. आप चाहें तो कमरे में ऐरोमैटिक फ्लोरिंग कैंडल्स से रोमानी माहौल बना सकती हैं. इस के अलावा कमरे में दोनों की पसंद का संगीत और धीमी रोशनी भी माहौल को खुशगवार बनाने में मदद करेगी. कमरे को आप रैड हार्टशेप्ड बैलूंस और रैड हार्टशेप्ड कुशंस से सजाएं. चाहें तो कमरे में सैक्सी पैंटिंग भी लगा सकती हैं.

फूलों से भी कमरे को सजा सकती हैं. इस सारी तैयारी से सैक्स हारमोन के स्राव को बढ़ाने में मदद मिलेगी और आप का पहला मिलन हमेशा के लिए आप की यादों में बस जाएगा.
सैल्फ ग्रूमिंग : पहले मिलन का दिन निश्चित हो जाने के बाद आप खुद की ग्रूमिंग पर भी ध्यान दें. खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार करें. इस से न केवल आत्मविश्वास बढ़ेगा, बल्कि आप स्ट्रैस फ्री हो कर बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगी. पहले मिलन से पहले पर्सनल हाइजीन को भी महत्त्व दें ताकि आप को संबंध बनाते समय झिझक न हो और आप पहले मिलन को पूरी तरह ऐंजौय कर सकें.
प्यारभरा उपहार : पहले मिलन को यादगार बनाने के लिए आप एकदूसरे के लिए गिफ्ट भी खरीद सकते हैं. जो आप दोनों का पर्सनलाइज्ड फोटो फ्रेम, की रिंग या सैक्सी इनरवियर भी हो सकता है. ऐसा कर के आप माहौल को रोमांटिक और उत्तेजक बना सकती हैं.

खुल कर बात करें : पहले मिलन को रोमांचक और यादगार बनाने के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार करें. अपने पार्टनर से इस बारे में खुल कर बात करें. अपने मन में उठ रहे सवालों के हल पूछें. एकदूसरे की पसंदनापसंद पूछें. जितना हो सके पौजिटिव रहने की कोशिश करें.
सैक्स सुरक्षा : संबंध बनाने से पहले सैक्सुअल सुरक्षा की पूरी तैयारी कीजिए. सैक्सुअल प्लेजर को ऐंजौय करने से पहले सैक्स प्रीकौशंस पर ध्यान दें. आप का जीवनसाथी कंडोम का प्रयोग कर सकता है. इस से अनचाही प्रैगनैंसी का डर भी नहीं रहेगा और आप यौन रोगों से भी बच जाएंगी.
सैक्स के दौरान
– सैक्सी पलों की शुरुआत सैक्सी फूड जैसे स्ट्राबैरी, अंगूर या चौकलेट से करें.
– ज्यादा इंतजार न कराएं.
– मिलन के दौरान कोई भी ऐसी बात न करें जो एकदूसरे का मूड खराब करे या एकदूसरे को आहत करे. इस दौरान वर्जिनिटी या पुरानी गर्लफ्रैंड या बौयफ्रैंड के बारे में कोई बात न करें.
– संबंध के दौरान कल्पनाओं को एक तरफ रख दें. पोर्न मूवी की तुलना खुद से या पार्टनर से न करें और वास्तविकता के धरातल पर एकदूसरे को खुश करने की कोशिश करें.
– बैडरूम में बैड पर जाने से पहले अगर आप घर में या होटल के रूम में अकेली हों तो थोड़ी सी मस्ती, थोड़ी सी शरारत आप काउच पर भी कर सकती हैं. ऐसी शरारतों से पहले सैक्स का रोमांच और बढ़ जाएगा.
– सैक्स संबंध के दौरान उंगलियों से छेड़खानी करें. पार्टनर के शरीर के उत्तेजित करने वाले अंगों को सहलाएं और मिलन को चरमसीमा पर ले जा कर पहले मिलन को यादगार बनाएं.
– मिलन से पहले फोरप्ले करें. पार्टनर को किस करें. उस के खास अंगों पर आप की प्यार भरी छुअन सैक्स प्लेजर को बढ़ाने में मदद करेगी.
– सैक्स के दौरान सैक्सी टौक करें. चाहें तो सैक्सुअल फैंटेसीज का सहारा ले सकती हैं. ऐसा करने से आप दोनों सैक्स को ज्यादा ऐंजौय कर पाएंगे. लेकिन ध्यान रहे सैक्सुअल फैंटेसीज को पूरा के लिए पार्टनर पर दबाव न डालें.
– संयम रखें. यह पहले मिलन के दौरान सब से ज्यादा ध्यान रखने वाली बात है, क्योंकि पहले मिलन में किसी भी तरह की जल्दबाजी न केवल आप के लिए नुकसानदेह होगी, बल्कि आप की पहली सैक्स नाइट को भी खराब कर सकती है.
सैक्स के दौरान बातें करते हुए सहज रह कर संबंध बनाएं. तभी आप पहले मिलन को यादगार बना पाएंगे. संबंध के दौरान एकदूसरे के साथ आई कौंटैक्ट बनाएं. ऐसा करने से पार्टनर को लगेगा कि आप संबंध को ऐंजौय कर रहे हैं.
सैक्स की इच्छा युवक व युवती दोनों की होती है. पर देखा यह गया है कि युवक ही इस की शुरूआत करते हैं पर यदि युवती सैक्स की शुरुआत करे तो युवक को भरपूर आनंद मिलता है लेकिन समस्या यह है कि सैक्स की पहल करे कौन? इस बारे में किए गए एक शोध में पता चला है कि तकरीबन 80 प्रतिशत युवक सैक्स की शुरुआत और इच्छा जाहिर करते हैं. 10 प्रतिशत ऐसे युवक भी हैं जो सैक्स की इच्छा होने पर भी बिस्तर पर पहुंच कर युवती की इच्छाअनिच्छा जाने उस पर टूट पड़ते हैं. कई इस दुविधा में रहते हैं कि पहल करें या न करें.
सैक्स की इच्छा
सैक्स युवकयुवती का सब से निजी मामला है. दोनों आपसी सहमति से इस का मजा लेते हैं. इस मामले में देखा गया है कि सैक्स की पहल युवक ही करते हैं. इस का मतलब यह नहीं कि युवतियों में सैक्स की इच्छा नहीं होती या वे सैक्स संबंध के लिए उत्सुक नहीं रहतीं.
सच तो यह है कि हमारे देश (मुसलिम देशों में भी) में युवतियों के दिमाग में बचपन से ही यह बात भर दी जाती है कि सैक्स अच्छी बात नहीं होती. इस से बचना चाहिए. अपने प्रेमी के सामने भी कभी सैक्स की इच्छा जाहिर नहीं करनी चाहिए. न ही खुद इस की पहल करनी चाहिए. यह बात उन के दिमाग में इस कदर बैठ जाती है कि प्रेम के बाद वे अपने प्रेमी से इस बारे में बात नहीं कर पाती और न ही खुल कर इच्छा जाहिर कर पाती हैं.
एक महत्त्वपूर्ण बात और है, सबकुछ भूल कर साहस के साथ यदि कोई युवती अपने प्रेमी से सैक्स की पहल कर दे तो उस के लिए आफत आ सकती है, क्योंकि उस का प्रेमी उसे खाईखेली समझ सकता है. इसी भय से सैक्स की इच्छा होते हुए भी युवती इस की पहल नहीं करती. यह बात सच है कि युवकों में युवतियों के सैक्स की पहल को ले कर गलत धारणा है कि जो युवती सैक्स की पहल करती है वह खेलीखाई होती है. देश में आज भी सैक्स को बुराई ही समझा जाता है इसलिए भी युवतियां अपनी ओर से पहल करने से कतराती हैं जबकि विदेशों की युवतियां बराबर शरीक होती हैं.
कनाडा के एक मनोचिकित्सक डा. भोजान ने हाल ही में सैक्स की पहल को ले कर औनलाइन सर्वे करवाया, जिस में यह पता करना था कि सैक्स को ले कर युवक और युवतियों का नजरिया क्या है. अधिकतर युवतियां सैक्स को भरपूर ऐंजौय करना तो चाहती हैं, पर सैक्स की पहल उन के ऐंजौय में आड़े आती है. इच्छा होने पर भी वे पहल नहीं कर पातीं और अनिच्छा होने पर मना भी नहीं कर पाती हैं. डा. भोजान का कहना है, युवतियों को सैक्सुअली ऐक्टिव बनाने के लिए उन में इमोशंस की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है. सैक्स का आनंद वे तभी उठा पाती हैं.
मजेदार बात यह है कि सैक्स की पहल को ले कर युवकों का नजरिया काफी बदला है. अब युवक भी चाहता है कि उस की पार्टनर सैक्स के बारे में उस से खुल कर बात करे. उस से सैक्स की इच्छा जाहिर करे.
यह जान कर अधिकतर युवतियों को विश्वास नहीं होगा कि औनलाइन सर्वे में पता चला है कि युवक अपने मन में युवती की तरफ से पहल की चाह संजोए रहते हैं, लेकिन उन की चाह बहुत कम ही पूरी हो पाती है. युवतियों द्वारा पहल न करने की वजह से मजबूरन युवकों को अपनी तरफ से पहल करनी पड़ती है.
युवती करे पहल
जब सैक्स की चाह युवती और युवक दोनों में समान होती है तो ऐसे में सिर्फ युवक ही सैक्स की पहल क्यों करें? युवतियों को भी कभीकभी सैक्स की पहल करनी चाहिए ताकि वे सैक्स को अपनी तरह से ऐंजौय कर सकें.
सर्वे में यह भी पता चला है कि युवतियों को ले कर उन की सोच बदल रही है. युवक भी यह बात समझने लगे हैं कि सैक्स की इच्छा सिर्फ उन में ही नहीं युवतियों में भी होती है. ऐसे में युवती अपने पति से सैक्स की पहल करती है तो इस में बुराई क्या है? सर्वे में अनेक युवकों का कहना था कि अपनी पार्टनर की ओर से की गई पहल उन की रगरग में जबरदस्त जोश भर देती है.
डा. भोजान कहते हैं कि युवक के जोश का युवती के सैक्सुअल सैटिस्फैक्शन से सीधा संबंध होता है. मतलब अपनी ओर से की गई पहल का फायदा उन्हें सीधे तौर पर मिलता है.
युवतियों को अब जान लेना चाहिए कि जमाना बदल गया है. दुनिया भर के युवकों की सोच भी बदल रही है. अपनी झिझक और डर को दूर कर बेझिझक हो कर आप भी कभीकभी युवक बन जाएं और सैक्स ऐंजौय करें.
यहां कुछ तरीके बताए जा रहे हैं, जिन्हें अपना कर आप पार्टनर को सैक्स के लिए उत्साहित कर सकती हैं.
आत्मविश्वास लाएं : सब से पहले अपने अंदर आत्मविश्वास लाएं, ताकि बेझिझक सैक्स की पहल कर सकें.
मूड बनाएं : अपने पार्टनर के मूड को देखें और उस के साथ प्यार भरी बातें करें. आप की बातें ऐसी होनी चाहिए कि इस में तैरते हुए सैक्स में डूब जाएं. लव मेकिंग के दौरान खुल कर सैक्स की बातें करें. यदि आप शर्मीली हैं तो डबल मीनिंग वाले नौटी जोक्स उन पलों का मजा बढ़ा देंगे.
तारीफ करें : आज की रात आप खुद ही लगाम थामिए. सब से पहले उन की तारीफ की झड़ी लगा दें. फिर कान में फुसफुसा कर अचानक किस कर उन्हें हैरान करें. कान में की गई फुसफुसाहट उन की रगों में खून का लावा भर देगी. जब हर कहीं ऐक्सपैरिमैंट की बहार चल रही है तब सैक्स लाइफ में इसे क्यों न आजमाएं.
छेड़छाड़ करें : लव मेकिंग के लिए छेड़छाड़ को मामूली क्रिया न समझें. अपनी ओर से पहल करते हुए पार्टनर के साथ छेड़छाड़ करें. इस दौरान कमरे की लाइट धीमी कर दें. साथ में हलका रोमांटिक हौट म्यूजिक बजा दें. कमरे की धीमी लाइट में आंखों की पुतलियां फैल जाती हैं, जिस से रोमांस हार्मोंस शरीर में तेजी से बढ़ने लगता है. साथ में हौट म्यूजिक. इस पल के लिए पूरी रात भी आप के लिए कम पड़ेगी.
आकर्षक लगें : सैक्स की इच्छा अपने पार्टनर से जाहिर करनी है तो अट्रैक्टिव व सैक्सी मेकअप करें. फिर देखें बैडरूम में अपनी बोल्ड ब्यूटी को देख कर उन्हें आज की रात का प्लान समझते देर नहीं लगेगी.
माहौल बनाएं : अपने आसपास का माहौल खुशबूदार व रोमांटिक बनाएं. इस के लिए बेहद हौट म्यूजिक बजाएं. रोमांटिक सौंग गुनगुनाएं. तेज परफ्यूम का छिड़काव करें. ऐेसे माहौल में उन के अंदर आग भड़काने में देर नहीं लगेगी. आप के शरीर की भीनीभीनी खुशबू और गरम सांसें उन को बेचैन करने के लिए काफी हैं. क्यों न उन की पसंद की खुशबू का इस्तेमाल कर उन्हें कहर ढाने के लिए मजबूर कर दें.
खुलापन लाएं : अपने पार्टनर पर खुल कर प्यार लुटाएं. किस करें, गले लगें, बांहों में जकड़ लें. आहें या सिसकियां भरें, ब्लाउज या ब्रा के बटन लगाने या खोलने के बहाने उन्हें अपने पास बुलाएं, टौवेल में उन के सामने हाजिर हो जाएं. आप के खुलेपन को देख कर आप की भावनाओं को वे बड़ी आसानी से समझ जाएंगे. मूड न होने पर भी उन का मूड बन जाएगा.
सैक्सी लौंजरी : लौंजरी, नाइटी या अंडरगारमैंट की खूबी को ऐसे मौके पर इस्तेमाल करें. इन्हें खरीदते वक्त खासकर इस के फैब्रिक पर ध्यान दें. महीन, मुलायम और फिसलन वाले फैब्रिक हो, जिन पर हाथ फेरते ही उन के हाथ खुदबखुद फिसलने लगेंगे. इस के आकार और रंग का भी ध्यान रखें. यह आप की नहीं उन की पसंद की हो.
हौलेहौले : यदि आप रात को कुछ खास बनाना चाहती हैं तो देर न करें. उन के बैडरूम में आते ही उन के नजदीक जा कर प्यार जताएं. एकएक कर उन के कपड़े उतारना शुरू करें. आप का बदला रूप देख कर वे ऐक्साइट हो जाएंगे. उन्हें हौट होने में देर नहीं लगेगी. यह उन्हें शारीरिक रूप से ही नहीं मानसिक रूप से भी उत्तेजित करता है.
पोर्न ट्रंप : अगर आप सचमुच में सैक्स के क्लाइमैक्स को ऐंजौय करना चाहती हैं तो पोर्न को ट्रंप कार्ड की तरह इस्तेमाल करें. उन के सामने पोर्न फिल्म, साइट, मैगजीन या अन्य सामग्री ले कर बैठ जाएं. फिर देखें उन में कैसे जोश भरता है.