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सर्दियों में लगाएं इन पांच कलर्स के पर्दे

विंटर सीजन में सर्द हवाओं से बचने और घर को नेचुरल तरीके से गर्म रखने के लिए ब्राइट कलर के पर्दे इस्तेमाल करें. इस सीजन में ऐसे पर्दे खूबसूरत लगते हैं. आज हम ऐसे फैब्रिक और कलर के बारे में बात करेंगे जो आपके घर को इस सीजन में भी खूबसूरत दिखाएगा. आइए बताते हैं.

मेहरून रंग – मेहरून रंग के पर्दे वुडन फर्नीचर वाले कमरे में भी लगा सकते हैं. यह पर्दे सर्द हवा को रोक कर कमरे को गर्मी प्रदान करते है.

डीप ब्‍लू –  इस कलर के पर्दे को बच्चों के कमरे, लिविंग रूम, डाईनिंग या ड्राइंग रूम में लगा सकती हैं. इस रंग के पर्दे घर को स्टाइलिश लुक देते हैं.

पीला रंग – पीले रंग के परदे लगाने से कमरा सुंदर लगता है. पीले रंग के पर्दे लगाने से कमरे में रौशनी भी आती है और कमरे को एक न्य लुक भी मिलता है.

लाल रंग – ब्राइट कलर इस मौसम के लिए बेस्ट है. इस रंग के पर्दे लगाने से घर सुंदर और परफेक्ट लगता है. आप वेलवेट फैब्रिक में भी इस रंग के पर्दे का चुनाव कर सकती हैं,  इससे बाहर की सर्द हवा अंदर नही आएगी.

क्रीड मैक एन चीज

सामग्री

– 1 बड़ा चम्मच औलिव औयल

– 1 छोटा चम्मच जीरा

– 1 बड़ा चम्मच अदरकलहसुन व हरीमिर्च का पेस्ट

– 1 मध्यम आकार का प्याज कटा

– 1/2 कप गाजर कटी

– 1/2 कप फ्रैंचबींस कटी

– 1 बड़ा चम्मच जीरा

– 1 बड़ा चम्मच धनिया पाउडर

– 1 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर

– 1/4 छोटा चम्मच  हल्दी

– 1/2 कप टोमैटो प्यूरी

– 1/2 कप फ्रैश क्रीम

– 21/2 कप पानी

– 1 कप पास्ता

– 1 कप प्रोसैस्ड चीज कद्दूकस किया.

विधि

– पैन में तेल गरम कर जीरा चटकाएं.

– फिर इस में अदरकलहसुन व हरीमिर्च का पेस्ट व कटे हुए प्याज डाल कर सुनहरा होने तक भूनें.

– अब सब्जियां डाल कर पकाएं. इस के बाद मिर्च पाउडर, टोमैटो प्यूरी व क्रीम डालें.

– अब पास्ता व जरूरतानुसार पानी मिला कर कुछ देर पकाएं. चीज स्प्रैड कर गरमगरम सर्व करें.

 

  • व्यंजन सहयोग: रनवीर बरार

 

 

बेक्ड स्टफ्ड टोमैटो विद सोया ऐंड पनीर

सामग्री

– 4 छोटे टमाटर कटे

– 2 छोटे चम्मच औलिव औयल

– 1 कप सोया कीमा ब्लांच किया

– 1 कप पनीर टुकड़ों में कटा

– 1/2 कप हरे मटर पके

– थोड़ी सी हरीमिर्च कटी

– 1 बड़ा चम्मच अदरकलहसुन का पेस्ट

– 1 छोटा चम्मच पावभाजी मसाला

– थोड़ा सा धनियापत्ती बारीक कटी

– 1/4 कप प्रोसैस्ड व मोजरेला चीज कद्दूकस किया.

विधि

– पैन में घी गरम कर प्याज और अदरकलहसुन का पेस्ट सुनहरा होने तक भूनें.

– फिर इस में पनीर, मटर और सोया कीमा डाल कर कुछ मिनट तक और भूनें.

– अब पावभाजी मसाला, हरीमिर्च व धनियापत्ती मिला कर आंच से उतार लें.

– टमाटरों को बीच से खाली कर उन के ऊपर थोड़ा तेल लगाएं और फिर तैयार मिश्रण स्टफ कर, चीज स्प्रैड कर 180 डिग्री सैल्सियस पर 15 मिनट बेक करें.

– धनियापत्ती से सजा कर सर्व करें.

व्यंजन सहयोग: रनवीर बरार

केदारनाथः स्तरहीन फिल्म

2013 में उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर में हुई बारिश की तबाही की पृष्ठभूमि पर अभिषेक कपूर एक प्रेम प्रधान फिल्म ‘‘केदारनाथ’’ लेकर आए हैं. कमजोर कहानी,अति कमजोर पटकथा व घटिया निर्देशन के चलते यह एक अति सामान्य प्रेम कहानी वाली फिल्म बन कर रह गयी है. जिसमें न इश्क की गहराई है और न ही केदारनाथ की त्रासदी का दर्द ही है. अफसोस की बात है कि हम 2018 में यानी कि इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं, मगर लेखक व निर्देशक ने जिस तरह के घटनाक्रम रचे हैं, वह साठ व सत्तर का दशक याद दिलाते हैं.

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फिल्म की कहानी उत्तराखंड के केदारनाथ में रह रहे व केदारनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित जी (नितीश भारद्वाज) यानी कि हिंदू परिवार की लड़की मंदाकिनी (सारा अली खान ) उर्फ मुक्कू और पिठ्ठू के कार्य में रत मुस्लिम युवक मंसूर (सुशांत सिंह राजपूत) की प्रेम कहानी है. मंदाकिनी और मंसूर दोनों क्रिकेट के दीवाने हैं.

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मंसूर के पिता भी इसी क्षेत्र में पिठ्ठू के रूप में काम किया करते थे. उनके नेक कारनामों के ही चलते केदारनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी ने उन्हे मंदिर में पहुंचकर घंटी बजाने की इजाजत दे रखी थी. अब मंसूर भी हर दिन ऊपर चढ़कर एक बार मंदिर की घंटी बजा लेता है. मंसूर नेकदिल युवक है. यात्रियों को सकुशल मंदिर तक पहुंचाने के साथ साथ पैसे भी कम लेता है. इससे मंसूर की मां काफी परेशान रहती है.

उधर मंदाकिनी के पिता पंडित जी ने उसकी बड़ी बहन (पूजा गौर) की शादी मंदिर से ही जुड़े कल्लू (निशांत दहिया) नामक युवक से पांच साल पहले मंगनी कर तय कर दी थी. मगर पांच साल बाद कल्लू की जिद के चलते अब मक्कू उसकी मंगेतर है. पर खुद मंदाकिनी उर्फ मक्कू को कल्लू पसंद नही है. हर माह वह अपने पिता के पास अपना हाथ मांगने के लिए किसी न किसी युवक को भेजती रहती है.

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मंदाकिनी को जब भी केदारनाथ से रामगढ़ जाना होता, तो वह मंसूर को ही अपना पिठ्ठू चुनती. अल्हड़ स्वभाव की मंदाकिनी को मंसूर से प्यार हो जाता है. मंसूर अपनी तरफ से मंदाकिनी को समझाने का प्रयास करता है कि उन दोनों का मिलन संभव नहीं. मगर मंदाकिनी तो उसी के साथ पूरी जिंदगी बिताना चाहती है. यह प्रेम कहानी आगे बढ़ रही होती है, तभी मंदाकिनी की बड़ी बहन मंसूर से मिलकर कह देती है कि मंदाकिनी उसके साथ खेल खेल रही है. मंसूर, मंदाकिनी से दूरी बना लेता है. पर मंदाकिनी उसके पीछे पड़ी हुई है. एक दिन बारिश में मंसूर के घर के सामने भीगते भीगते मंदाकिनी बेहोश हो जाती है. रात हो चुकी है. मंसूर अपनी मां की आज्ञा का उल्लंघन कर उसे अपने घर ले आता है. इस बात की खबर कल्लू को लग जाती है.

कल्लू अपने हिंदूधर्म के साथियों व मंदाकिनी के पिता गुरू के साथ मंसूर के घर पहुंचता है. मंदाकिनी के पिता उसे अपने साथ ले जाकर गंगा नदी में खड़ा कर मंत्रों से उसका शुद्धिकरण करते हैं.

उधर मंसूर, मंदाकिनी के पिता से बात करने आता है, तो कल्लू व उसके साथी उसे अधमरा कर देते हैं. दूसरे दिन सुबह सुबह मंदाकिनी व कल्लू का विवाह करा दिया जाता है. पर विदाई से पहले मंदाकिनी ब्लेड से अपने हाथ की नस काट लेती है, विदाई टल जाती है. अचानक केदारनाथ में बारिश के रूप में तबाही आ जाती है. हर घर तबाह हो जाता है. लोग नदी में बहने लगते हैं. मंसूर अपनी जान पर खेलकर मंदाकिनी, मंदाकिनी के माता पिता सहित कई हिंदुओं की जान बचाता है. पर खुद मौत के मुंह में समा जाता है.

लेखक की कमजोरी के चलते कमजोर कहानी व घटिया स्तर की पटकथा ने फिल्म को तहस नहस कर दिया. प्रेम कहानी के साथ मैलोड्रामा काफी पैदा किया गया है. लेखक ने होटल, माल्स आदि के विस्तारीकरण के साथ पर्यावरण को क्षति पहुंचाने का मुद्दा इस तरह उठाया कि वह कहीं से भी उभर नहीं पाया.

बल्कि कहानी में भटकाव ही लाता है. इंटरवल से पहले यह फिल्म किसी भी सीरियल का एक अति सुस्त एपिसोड मात्र है, जिसमें कहानी कहीं आगे नहीं बढ़ती. इंटरवल के बाद फिल्म इतनी मैलोड्रामैटिक है कि उम्मीद नही जगाती. इतना ही नहीं लेखक व निर्देशक की अपनी बेवकूफियों के चलते 2013 में केदारनाथ व उत्तराखंड ने तबाही का जो मंजर देखा था, वह भी फिल्म में उभर नहीं पाता. सच यही है कि फिल्म में न इश्क की गहराई है और न ही केदारनाथ की त्रासदी का दर्द ही है. बेमन से बनाई गयी फिल्म है. जहां तक अभिनय का सवाल है तो सैफ अली खान व अमृता सिंह की बेटी सारा अली खान की तारीफ करनी ही पड़ेगी. सारा अली खान के करियर की यह पहली फिल्म है, पर वह पूरी फिल्म में खूबसूरत लगने के साथ ही अपने बेहतरीन अभिनय के चलते छा जाती हैं. सुशांत सिंह राजपूत ने काफी निराश किया है. लेखक व निर्देशक के बाद इस फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी सुशांत सिंह राजपूत हैं. अमृता सिंह की प्रतिभा को जाया किया गया है.

फिल्म का गीत संगीत भी असरहीन है. फिल्म का सकारात्मक पक्ष इसकी लोकेशन है, जिसके लिए फिल्म के कैमरामैन तुषार कांति रे की जितनी तारीफ की जाए, उतनी कम है. तुषार कांति रे ने अपने कैमरे के माध्यम से हिमालय की खूबसूरती को बहुत अच्छे ढंग से चित्रित किया है.

दो घंटे की अवधि वाली फिल्म ‘‘केदारनाथ’’ का निर्माण रौनी स्क्रूवाला, प्रज्ञा कपूर, अभिषेक कपूर और अभिषेक नायर ने किया है. फिल्म के निर्देशक अभिषेक कपूर, लेखक: अभिषेक कपूर व कनिका ढिल्लों, संगीतकार: अमित त्रिवेदी, कैमरामैन: तुषार कांति रे तथा कलाकार हैं – सुशांत सिंह राजपूत, सारा अली खान, नितीश भारद्वाज, सोनाली सचदेव, अलका अमीन, पूजा गौर, निशांत दहिया व अन्य.

प्रियंका चोपड़ा ‘स्कैम आर्टिस्ट’ और निक उनकी ‘Bitch’ क्यों हैं?

फ्रस्टेटेड तो मैं भी बहुत था. विरुष्का, दीपवीर और निक-प्रियंका का शादी तमाशा और वेडिंग एल्बम न चाहते हुए इतनी बार देखना पड़ा मानो माया कैलेंडर के मुताबिक ये ब्राह्मांड की आखिरी शादियां थीं. इस चक्कर में ‘शादी का पैपराजी तमाशा’ नाम से एकाध आलोचनात्मक रिपोर्टिंग कर भड़ास भी निकाल डाली लेकिन लेकिन शायद मुझसे ज्यादा फ्रस्टेशन का शिकार इंटरनैशनल मैग्जीन ‘द कट’ की रिपोर्टर मारिया स्मिथ रही होंगी. इसलिए उसने अमेरिकी सिंगर निक जोनस और बौलीवुड ऐक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा की शादी को फर्जी बताते हुए प्रियंका को ग्लोबल स्कैम आर्टिस्ट और निक को उनकी BITCH बता डाला. उनके मुताबिक निक जोनस अपनी इच्छा के विरुद्ध इस चालबाजी से भरे संबंध में हैं. वह तो सिर्फ कैजुअल अफेयर चाहते थे, लेकिन इसके बदले हौलीवुड में हाल में कदम रखने वाली एक नयी कलाकार ने उन्हें आजीवन कारावास दे दिया.

मारिया लिखती हैं कि प्रियंका ने निक को एक अवसर की तरह भुनाया. कुल मिलाकर पूरे लेख में निक को बेचारा और प्रियंका को शातिर औरत बताया गया है.

नस्लभेद और गोरों का हेट कल्चर

जाहिर है यह लेख नस्ली और महिला से घृणा करनेवाली सोच से भरा हुआ है. जबकि इसे लिखने वाली एक महिला है. सो एक औरत की सबसे बड़ी दुश्मन औरत वाली इक्वेशन यहां सोल्व होती दिखती है. दूसरी बात उस सोच की जो मारिया ने अपने लेख में जाहिर की है. दरअसल अमेरिकी आज भी भारतीय पुरुषों को हाथ में बीन लिए सपेरा या नंगा साधु समझते हैं जो अमेरिका में ग्रीन कार्ड पाने के लिए कोई भी ट्रिक अपनाता है. और महिलाओं को Witch यानी जादूटोना करने वाली चुड़ैल. जिसने अपने जादू से निक को भरमाया, भारत लाई और उसे जबरन घोड़ी पर बिठाकर अपना पति (मारिया के मुताबिक Her forever Bitch) बना लिया. इस पूरे तमाशे में प्रियंका ने निक के खानदान को भी सम्मोहित करके जोधपुर में नाच गाने के लिए मजबूर कर दिया.

थोडा-थोड़ा समझ आता है कि अंग्रेजों ने हमारा नाम इंडियन क्यों रखा होगा. उन्हें हम उनके अपने रेड इंडियन कबीलाई आदिवासी (नेटिव अमेरिकन ट्राइब्स) से ज्यादा कुछ नहीं लगे होंगे. फर्क इतना है कि नेटिव अमेरिकन फेदर लगाते थे जबकि इंडियन वुमेन माथे पर बिंदी.

अब मुल्क आजाद हो गया लेकिन इंडियन (इसका अंगरेजी मतलब गंवार/पिछड़ा/ जादूटोना/पूजापाठ करने वाले ही समझें) का लेबल आज भी हमारे माथे पर चस्पा है. मारिया ने भी अपने लेख में प्रियंका के मंगलसूत्र का जिक्र किया है.

अफ्रीकी नहीं तो इंडियन ही सही

प्रियंका काली हैं और निक गोरे. उम्र में भी दोनों के बीच बड़ा फासला है. मारिया को लगता है की गोरे होने के नाते निक को एक अश्वेत इंडियन महिला ने प्यार के जादू में फंसाया और उनके जरिये हौलीवुड में मौके तलाशेंगी. वैसे ऐसा ही व्यवहार पहले भी कई अफ्रीकी-अमेरिकी अभिनेत्रियों के साथ भी देखा जा चुका है लेकिन अब विल स्मिथ से लेकर बियोंस तक और सैमुअल जैक्शन, मार्गन फ्री मैन से लेकर एकोन तक सब इतने नामी और कमाऊ सितारे हो चुके हैं कि हौलीवुड का इन अश्वेत हस्तियों के खिलाफ कोई बस नहीं चलता. और अब जब इंडियन कलाकार धीरे-धीरे वहां की राजनीतिक, आर्थिक और ग्लैमर जगत में जगह बना रहे हैं तो कुछ लोगों को यह हजम नहीं हो रहा.

बड़का माल फंसाई है लौंडि..

याद होगा कुछ साल पहले रेड डौट (लाल बिंदी) रेसिस्ट ग्रुप ने भारतीय महिलाओं (हिन्दू) को निशाना बनाया था, इस प्रकरण में भी उसी नस्लभेदी दौर की बू आती है. अगर एक इंडियन लेडी हौलीवुड सीरीज (क्वांटिको) में लीड रोल और कुछ फिल्मों में साइड रोल कर थोड़ा बहुत प्रवासियों के बीच पौपुलर हो जाती है और किसी गोरे से शादी कर लेती है तो अपोर्चुनिस्ट यानी मौकापरस्त हो गयी. ऐसा भी तो कहा जा सकता था कि हौलीवुड गलियारे में उनका पति होने से निक को कोई फायदा हो जाए. लेकिन हम ऐसा कहां सोचते हैं. औरतों को लेकर रूढ़िवादी सोच आसाम से लेकर अमेरिका तक कोई जुदा नहीं है.

जैसे हमारे पड़ोस के लफंगे और आज के सोशल मीडिया के गंवार किसी भी लड़की को ठीकठाक पति मिल जाए तो कहते हैं, ‘साला बड़का मोटा माल फंसा ली है लौंडिया’, या फिर ‘बाप ने मोटा आसामी पकड़ा है गुरु छोकरी के लिए’. ये वाक्य उस लड़की की काबिलियत, शक्लसूरत को पल भर में दरकिनार कर उसे चालाक और मौकापरस्त साबित कर देते हैं. जैसे प्रियंका का फौर्मर मिस वर्ल्ड होना और इंडियन फिल्म ऐक्ट्रेस/प्रोड्यूसर होने को दरकिनार कर दिया गया है. फर्क बस जगह और प्लेटफोर्म का है. वरना एक अमेरिकी और हमारे नुक्कड़ पर बैठे लफंदारों की सोच में खासा फर्क नहीं है.

यह सवाल मारिया से पूछना चाहिए कि जब किम कारदाशियां एक अश्वेत एक्टर के साथ अपना सेक्स टेप बनाकर उसे मिलियन डॉलर्स में बेचकर अपना करियर बना लेती है तो कोई कुछ नहीं कहता लेकिन एक इंडियन एक्ट्रेस अपनी मेहनत से किसी मुकाम तक पहुँच जाती हैं तो यह उसकी चालाकी कैसे हो गयी?

अफेयर चलेगा शादी नहीं ..

खुद मारिया ने लिखा है कि निक का प्रियंका के लिए लस्ट सोशल प्लेटफोर्म में सबने देखा था. शायद इसी लस्ट को प्रियंका की मार्केटिंग टीम ने भांप लिया और लालच का जाल फेंककर निक को प्रियंका के फायदे के लिए यूज किया. वैसे यूज एंड थ्रो वाला लव सबको भाता है लेकिन शादी की जिम्मेदारी लेना रिश्ते की गंभीरता को दर्शाता है.

मारिया के मुताबिक़ निक प्रियंका के साथ कैजुअल रिलेशनशिप चाहते थे लेकिन उन्हें जबरन शादी के जंजाल में फंसा दिया गया. इस बात से उनका आशय यह था कई निक को उनसे शादी करने की क्या जरूरत थी जब अफेयर्स मात्र से काम चल सकता था. इस मामले में उनकी सोच हार्वे विन्स्टीन से कम नहीं है. ये महिलाओं को ऑब्जेक्ट से ज्यादा कुछ और नहीं समझने वाली बात है. अगर निक प्रियंका के साथ कुछ साल के लिए लिव-इन टाइप रिलेशनशिप में रहते तो शायद उन्हें कोई ऐतराज नहीं होता लेकिन शादी हो जाने से एक तरह से प्रियंका को बराबरी का कानूनी और सामाजिक और सम्मानजनक दर्जा मिल गया जो जाहिर है गर्लफ्रेंड रहते नहीं मिल पाता.

तो यह बराबरी वाली बात ही मारिया स्मिथ और उनके जैसी सोच रखने वाले ग्रुप को नहीं भाई. क्योंकि इस लेख को बाकायदा संपादक द्वारा स्वीकृति भी मिली होगी. इसलिए इसमें सिर्फ मारिया नहीं एक बड़े बुद्धिजीवी मीडिया हाउस की मानसिकता रिफ्लेक्ट होती है.

हॉलीवुड कोई मक्का नहीं

बात कद ही करें तो निक कोई इतने कामयाब सितारा भी नहीं हैं और न ही वहां के A ग्रेड सेलेब्रिटी लिस्ट में आते हैं. जबकि प्रिंयका बतौर अभिनेता, प्रोड्यूसर और एन्त्रप्रेन्योर खुद को साबित कर चुके हैं. मिस वर्ल्ड का खिताब उन्हें अंतर्राष्ट्रीय पहचान देता है तो फिर उनके निक की जरूरत क्यों?  सवाल जरूरत का नहीं सोच का जो मारिया के जरिये तमाम गोरों की अपनी नस्ल को बेहतर मानने के दकियानूसी मानसिकता को उजागर करता है. इस आशय से जुदा एक वाकया अभिनेता विक्टर बनर्जी ने भी बताया था. वे एक इंग्लिश फिल्म (शायद ब्रिटिश) की शूटिंग कर रहे थे और आदतन उन्होंने प्रोडक्शन की क्रू मेम्बर्स के साथ हो रही ज्यादती को लेकर आवाज उठायी तो उनके एक इंडियन एक्टर होने की हैसियत याद दिला दी गयी. जाहिर है वैसा ही प्रियंका के साथ हो रहा है.

वैसे इस मामले में सारा दोष उनका नहीं हमारा भी है. हम ही हॉलीवुड को फिल्मों का मक्का बनाने पर तुले रहते हैं. वहां किसी भारतीय को चाँद सेकेण्ड का रोल मिल जाए तो उसे सर पर बिठा लेते हैं. ऑस्कर जो कि फिल्फेयर या स्टारडस्ट अवार्डस से ज्यादा कुछ नहीं है, बावजूद उसके आमिर खान सरीखे सितारे भी उसके लालच में फिल्म लगान के नामांकन के दौरान महीनों अमरीकन लौबी को लुभाने के लिए डेरा जमा लेते हैं.

हम जिसे भगवान या स्वामी का दर्जा देते हैं, उसी पल उसे लात मारने या बेइज्जत करने का अधिकार भी दे देते हैं. तो फिर हॉलीवुड को उस दर्जे के तहत बेइज्जती का अधिकार मिलना स्वाभाविक है.

यों तो यह परंपरा हॉलीवुड की है कि कुछ एशियन अभिनेताओं (खासकर चीनी, जैपनीज और इंडियन) की चंद सीन का रोल देकर अपनी फिल्मों की पहुंच वहां की बड़ी आबादी के बीच पहुंचकर मोटा मुनाफा कमाया जाए. इस क्रम में वे सफल भी हुए लेकिन अब चंद सीन्स से शुरू हुआ एशियन कलाकारों के रोल फुल लेंथ होने से इन्हें हजम नहीं हो रहे हैं. चीनी, कोरियाई सिनेमा तो इन्हें अपनी जुबान में मुंह तोड़ जवाब दे रहा है लेकिन हम अब भी हॉलीवुड के पूजक हैं. याद करिए कुछ समय पहले जब अमेरिकन अभिनेता रॉबर्ट डी नीरो इंडिया आये थे तो यहाँ के बड़े से बड़े सितारे और निर्देशक एक तस्वीर के लिए उनके पैरों में लोटने को तैयार थे, लेकिन क्या इंडियन एक्टर्स को इतनी इज्जत आफजाई मिलती है वहां जाकर ? बिलकुल नहीं. कारण वही स्वामी नौकर का सम्बन्ध.

हम भी तो यही करते हैं

बहरहाल जिस तरह हम पाकिस्तानी अभिनताओं या अभिनेत्रियों के भारत में आकर काम करने और नाम कमाने को लेकर ऐतराज करते है और इस आशय का ऐतराज करने वाली क्षेत्रवाद की संकीर्णता से प्रेरित दलों का समर्थन करते हैं, ठीक वैसे ही अमेरिकन भी यह बात ख़ास पसंद नहीं करते कि कोई उनके मुल्क में आये और उनका रोजगार छीने. इस आशय से मिलता जुलता इशारा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी (एच 1 वीजा नीति) दे चुके हैं. उनके लिए जैसे मैक्सिको है वैसे ही हमारे लिए पाकिस्तान. बात बौर्डर के है और दुनिया गोल है. सो हम जो बो रहे होते हैं वैसा कुछ हमारे बाहर जाकर काटते हैं. इसलिए अपना गिरेबान झांकना भी जरूरी है.

आज भारत में इस लेख के हिस्से वायरल कर लोग सोशल मीडिया पर पब्लिकेशन की कड़ी आलोचना की. निक के भैया-भाभी के अलावा बॉलिवुड के कई सिलेब्रिटीज़ ने पब्लिकेशन को लताड़ रहे हैं लेकिन यह एक बड़ी महामारी है जो ग्लोबल हो चुकी है. हर जगह धर्म, नस्ल, रंग और क्षेत्र को लेकर मर्यादा लांघी जा रही हैं बिहारी और यूपी वीले मुंबई में पीटे जाते हैं तो गुजरात से भी खदेड़े जा रहे हैं. हम एक इंटरनेशनल मैगजीन ने प्रियंका को ‘ग्लोबल स्कैम आर्टिस्ट’  कहने से खफा हैं लेकिन उस ने तो माफी मांग कर लेख को वेबसाइट से हटा दिया. लेकिन हम कब महिला विरोधी, नस्ली, अंधविश्वासी और पाखंडी होने के लिए माफी मांगेंगे?

 

यासिर शाह ने रचा कीर्तिमान, तोड़ा 82 साल पुराना रिकार्ड

पहली ही नजर में अपनी शक्ल और सूरत से औस्ट्रेलिया के महान लैग स्पिन गेंदबाज शेन वार्न जैसे दिखने वाले छोटे कद के हैंडसम पाकिस्तानी लैग स्पिनर यासिर शाह गेंदबाजी भी उन्हीं के स्टाइल में करते हैं. और जब उन दोनों के बीच इतना कुछ मिलताजुलता है तो फिर यासिर शाह का रिकौर्ड बनाना तो बनता ही है.

यासिर शाह ने गुरुवार, 6 दिसंबर, 2018 को अबुधाबी में टेस्ट क्रिकेट का 82 साल पुराना रिकौर्ड तोड़ दिया. उन्होंने न्यूजीलैंड के खिलाफ तीसरे टेस्ट मैच के चौथे दिन बल्लेबाज विल समरविले को आउट कर के अपने 200 शिकार पूरे किए. इस तरह वे टेस्ट क्रिकेट में सब से तेजी से 200 विकेट चटकाने वाले गेंदबाज बन गए.

यासिर शाह ने औस्ट्रेलिया के लैग स्पिनर क्लेरी ग्रिमट के 36 टेस्ट मैचों में 200 विकेट लेने के रिकौर्ड को पीछे छोड़ दिया. क्लेरी ग्रिमट ने साल 1936 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ जोहानिसबर्ग में यह रिकौर्ड बनाया था.

टेस्ट क्रिकेट में सब से तेजी से 200 विकेट पूरे करने के मामले में भारत के रविचंद्रन अश्विन तीसरे नंबर पर हैं, जिन्होंने 37 मैचों में यह मुकाम हासिल किया था. इस तरह देखा जाए तो टेस्ट क्रिकेट में सब से तेज 200 विकेट लेने वाले पहले 3 गेंदबाज स्पिनर ही हैं.

2 मई 1986 को जनमे यासिर शाह को 200 विकेट के इस आंकड़े तक पहुंचने के लिए 5 विकेटों की जरूरत थी. इस मैच की पहली पारी में उन्होंने 3 विकेट लिए थे. इस से उन का इंतजार लंबा हो गया था. लेकिन गुरुवार को उन्होंने यह कमाल कर ही दिया.

किसी पाकिस्तानी गेंदबाज की बात करें, तो ऐसी ही उपलब्धि यासिर शाह से पहले वकार यूनिस के नाम थी. उन्होंने साल 1995 में अपने 38वें टेस्ट मैच में न्यूजीलैंड के खिलाफ ही 200 विकेट लेने का कारनामा किया था.

यासिर शाह पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा के स्वाबी जिले से हैं. उन्हें तकरीबन 12 साल तक घरेलू क्रिकेट खेलने के बाद इंटरनेशनल क्रिकेट खेलने का मौका मिला. उन्होंने अपने शुरुआती मैचों में ही अपना हुनर दिखा दिया था और सिर्फ 9 मैचों में 50 टेस्ट विकेट झटक लिए थे. वे इतने कम मैचों में 50 विकेट हासिल करने वाले पहले पाकिस्तानी गेंदबाज थे जबकि 100 टेस्ट विकेट तक तो वे सिर्फ 17 टेस्ट मैचों में ही पहुंच गए थे.

यासिर शाह के शहर में खेलने की ज्यादा सुविधाएं नहीं थीं. लिहाजा, वे क्रिकेट की ट्रेनिंग लेने के लिए पेशावर चले गए और घर और परिवार से 8 साल से भी ज्यादा समय तक दूर रहे.

यासिर शाह की गेंबाजी को ले कर एक बार शेन वार्न ने कहा था, ‘मैं ने कई लेग स्पिनर देखे, लेकिन यासिर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लेग स्पिनर हैं. मुझे उम्मीद है कि वे अपने कैरियर में 600 विकेट ले सकते हैं.’

आज जिस तरह यासिर शाह अपनी फिरकी से बल्लेबाजों को नचा रहे हैं, उस से तो लगता है कि शेन वार्न के कहे को वे सच साबित कर देंगे.

दुलार चो : आदिवासियों के चुंबन पर भगवा आतंक का साया

अगर सब कुछ ठीकठाक रहा तो आदिवासी बाहुल्य राज्य झारखंड के संताल परगना में इस साल भी एक रोमांटिक चुंबन प्रतियोगिता का आयोजन होगा. इस प्रतियोगिता में आदिवासी दंपत्ति भाग लेते हैं और विजेताओं को पुरुस्कृत किया जाता है. इस साल यह प्रतियोगिता 15 दिसंबर को प्रसिद्ध पाकुड़ मेले में आयोजित की जाएगी जिसके अघोषित आयोजक झारखंड मुक्ति मोर्चा यानि झामुमो के डांगपाड़ा से विधायक साइमन मराण्डी हैं .

क्या है यह दिलचस्प और रोमांटिक प्रतियोगिता जिसे लेकर झारखंड की सियासत गरमाई हुई है और पौराणिकवादियों के पेट में मरोड़ें उठ रहीं हैं इससे पहले पिछले साल हुई प्रतियोगिता पर एक नजर डालना जरूरी है जिससे समझ आ जायेगा की अब हिंदूवादियों से आदिवासियों का चुंबन भी बर्दाश्त नहीं हो रहा और वे धर्म और संस्कृति के नाम पर आदिवासियों की जिंदगी और मौजमस्ती में भी टांग फंसा रहे हैं.

पिछले साल 9 दिसंबर को लिट्टीपाड़ा प्रखण्ड के एक गांव तालपहाड़ी के डुमरिया मैदान में इस अनूठी प्रतियोगिता का आयोजन हुआ था. हर साल धान कटाई के बाद इस इलाके में सिदो-कान्हू मेले का आयोजन होता है जिसमें आदिवासी पूरी मस्ती और अपने रंग में होते हैं. इसी मेले में आदिवासियों की चुंबन प्रतियोगिता भी हुई थी. मैदान के गोल घेरे में कोई दस हजार दर्शक मौजूद थे जो प्रतियोगिता में हिस्सा ले रहे दर्जन भर आदिवासी दंपत्तियों का तालियां उत्साह बढ़ा रहे थे. इस प्रतियोगिता को दुलार चो नाम दिया गया था जिसका जिक्र बांटे गए आमंत्रण पत्रों और प्रचार सामग्री में भी था. दुलार चो एक सांथाली शब्द है जिसका हिन्दी में मतलब होता है प्यार भरा चुंबन या चुम्मा.

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प्रतियोगिता स्थल के गोल मैदान में आदिवासी पति पत्नी एक दूसरे को चूम रहे थे इस दौरान चुंबन लेते लेते वे पूरा गोल घेरा घूमे , शर्त यह थी कि जो पति पत्नी एक दूसरे को ज्यादा देर तक चूमेंगे वे विजेता घोषित किए जाएंगे. जिनका चुंबन टूटता गया वे हटते गए और जिनका नहीं टूटा वे मैदान में डटे रहे. आखिर में उन तीन दंपत्तियों को इनाम दिया गया जिन्होंने सबसे ज्यादा देर तक एक दूसरे का लगातार चुंबन लिया.
तालपहाड़ी साइमन मराण्डी का पैतृक गांव है लिहाजा वे भी इस जलसे में मौजूद थे उनके साथ एक और विधायक स्टीफन मराण्डी भी थे. इस मेले में और भी कई प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया था.kiss competition

विरोध के नाम पर बवाल – हिन्दूवादियों को उम्मीद के मुताबिक यह प्रतियोगिता रास नहीं आई क्योंकि इसमे कहीं भी शंकर – पार्वती, सीताराम या फिर राधाकृष्ण नहीं थे लिहाजा उनहोंने इसका हर मुमकिन विरोध किया मानो आदिवासी पति पत्नी को चुंबन के जरिये प्यार करने या जताने का हक ही नहीं .

यह हक भी शायद सभ्य कही जाने वाली ऊंची जाति को ही है गंवार कहे जाने वाले आदिवासियों को नहीं.
तब झारखंड भाजपा के उपाध्यक्ष हेमलाल मुर्मू ने साइमन और स्टीफन मराण्डी को इसका जिम्मेदार ठहराते कहा था कि झामुमो के विधायकों ने आदिवासी संस्कृति के खिलाफ काम किया है. वे सांथाल परगना को यरूशलम और रोम बनाने पर तुले हुये हैं, हम इस कोशिश को कामयाब नहीं होने देंगे. मुर्मू ने झामुमो के विधायकों पर ईसाई मिशनरियों के इशारे पर काम करने का आरोप भी लगाया था.  बक़ौल मुर्मू उनकी मंशा राजनीति करने की नहीं बल्कि संस्कृति बचाने की है.

jharkhand adivasi dular cho

भाजपा को उस वक्त केन्द्रीय सरना समिति का भी समर्थन मिला था जिसके कार्यकारी अध्यक्ष बबलू मुंडा ने भगवा खेमे की हां में हां मिलाते हुए कहा था कि यह आदिवासी संस्कृति के विनाश की कोशिश है इसलिए सरना समिति के लोग इसके विरोध में जुलूस निकालेगे और काले झंडे लगाएंगे.

एक आदिवासी धर्मगुरु बंधन तिग्गा ने भी दुलार चो का विरोध करते कहा था कि आदिवासी समाज में ऐसे जलसों की इजाजत नहीं है हमारे त्योहारों सरहुल और करमा वगैरह में लड़का लड़की एक साथ नाचते हैं लेकिन खुले में चुंबन लेने की इजाजत सरमा समाज नहीं देता .

भाजपा का तो मकसद ही हिंदूवाद फैलाना और आदिवासियों की खुशी और आजादी से चिढ़ना और उसे खत्म करना है. इस राह में बबलू मराण्डी और बंधन तिग्गा जैसे लोग भी साथ हो लिए तो इसके पीछे उनके अपने स्वार्थ और आदिवासियों को संस्कृति के डंडे से हांक कर अपनी बादशाहत कायम रखने की है .

अच्छी बात यह रही कि आदिवासियों के बुद्धिजीवी और शिक्षित वर्ग ने विरोध को नाजायज ठहराया . साइमन मराण्डी की दलील यह थी कि कुछ दिनों से आदिवासी समाज में तलाक के मामले बढ़े हैं उनकी नजर में दुलार चो से पति पत्नी के सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आएगी और इसमें कुछ भी गलत नहीं है. बात में दम इस लिहाज से है कि इस प्रतियोगिता में पति पत्नी ही हिस्सा लेकर एक दूसरे को चूमते हैं. प्यार की चुंबन के जरिये समारोहपूर्वक अभियक्ति कोई अश्लीलता तो कहीं से नहीं कही जा सकती.

अनुज लुगुन एक जाने माने आदिवासी कवि हैं उनके मुताबिक दुलार चो का विरोध करने वाले आदिवासी समाज को भी हिन्दू नजरिए से देखने की कोशिश कर रहे हैं. उन्हें यह समझना होगा कि आदिवासी समाज हिन्दू समाज नहीं है. न ही उसका व्यवहार और आचरण हिन्दू समाज की तरह हो सकता. यह समाज शुरू से ज्यादा स्व्छंद रहा है इसे किसी दायरे में बांधने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. अनुज के ही मुताबिक दुलार चो में कुछ भी अराजक नहीं था क्योंकि वे विवाहित जोड़े थे और अपनी मर्जी से इसमें भाग ले रहे थे. इसे मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए.

अव्वल तो विरोध की मंशा और हकीकत बताने के लिए अनुज का इतना कहना ही काफी है जिसका सार यह है कि भगवा खेमा जबरिया आदिवासियों को हिन्दू बताने और मानने को बैचेन रहता है जबकि आदिवासी खुद को हिन्दू कहलाने से किस कदर डरते हैं इसका एक उदाहरण पिछले साल फरवरी में मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिले बैतूल में देखने में आया था. आरएसएस के एक प्रोग्राम का आदिवासियों ने जमकर विरोध किया था. आदिवासियों की खुद के हिन्दू न होने की आवाज हर कहीं से आती रहती है.

बहरहाल अनुज लुगुन की दलील को विस्तार देने वाले आदिवासी विषयों पर लेखन करने वाले अश्विनी कुमार पंकज की मानें तो यह प्रेम प्रदर्शन का तरीका है आदिवासी समाज मानता है कि प्रेम कोई बुरी चीज नहीं है. सांथाली समाज संकीर्ण दायरों में नहीं रहना चाहता इसी वजह से वे फैशन शो जैसे आयोजनों में भी शामिल है लिहाजा इसे एक इवैंट की तरह देखा जाना चाहिए न कि संस्कृति पर हमले की नजर से.

बात बहुत साफ है जिसके निहितार्थ ये भी हैं कि हिन्दू समाज बेहद संकीर्ण है उसके कट्टरवादी संगठनों को फैशन शो भी नहीं भाते और प्यार का इजहार करने वाला वेलेंटाइन डे भी, लिहाजा वे डंडा लेकर घूमते हैं और प्रेमियों के सर फोड़कर अपनी संस्कृति का हिंसक प्रदर्शन करते रहते हैं. इन ठेकेदारों की नजर में हर वो काम गैर सांस्कृतिक है जिसमें चढ़ावा नहीं मिलता और लोग अपनी मर्जी से रहते हैं. हां अगर लोग इन कामों का टेक्स इन्हें देने लगें तो ये कोई एतराज नहीं जताते.

साइमन मराण्डी ने इस बार कमर कस ली है उन्होने धनबाद से चुंबन प्रतियोगिता का ऐलान कर दिया है और ज़ोर शोर से तैयारियां भी शुरू कर दी हैं. आदिवासियों में भी पिछले साल से ज्यादा उत्साह इस प्रतियोगिता को लेकर है. उधर साइमन की घोषणा को लेकर भाजपाइयों ने भी विरोध शुरू कर दिया है.

झारखंड के कृषि मंत्री रणधीर सिंह साइमन को चुनौती दे चुके हैं और झारखंड भाजपा के प्रवक्ता प्रतुल सहदेव भी पुराना आरोप दोहरा रहे हैं कि झामुमो झारखंड की सांस्कृतिक विरासत और संस्कृति को नष्ट करने पर तुला हुआ है.

जबकि सच यह है कि भाजपा और भगवा खेमा खुद धर्म और संस्कृति की आड़ में आदिवासियों की आजादी और मर्जी छीनने की साजिश रच रहा है पर उसकी दिक्कत यह है कि उसे आदिवासियों का समर्थन नहीं मिल रहा है जो ज़िंदादिली से दुलार चो मनाना चाहता है अब देखना दिलचस्प होगा कि जीत किसकी होती है प्यार करने वालों की या फिर प्यार के दुश्मनों की.

 

अरे, गौतम गंभीर ने तो भावुक कर दिया

पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया पर कुछ ज्यादा ही गंभीरता से एक्टिव रहने वाले क्रिकेटर गौतम गंभीर ने क्रिकेट से संन्यास ले लिया है. वे आखिरी बार 6 दिसंबर से शुरू हो रहे रणजी ट्रॉफी के मुकाबले में आंध्र प्रदेश के खिलाफ खेलने उतरेंगे. दिल्ली के उन के होम ग्राउंड फिरोजशाह कोटला मैदान पर एक तरह से यह उन का फेयरवेल मैच होगा.

गौतम गंभीर का क्रिकेट को अलविदा कहने का तरीका भी बड़ा शानदार रहा. उन्होंने इस संन्यास के बाद अपने एक भावुक वीडियो संदेश में कहा जिस के अंश कुछ इस तरह हैं, ‘दोस्तो, अपना कीमती समय देने के लिए आप का शुक्रिया. आज मैं आप लोगों के साथ कुछ शेयर करना चाहता हूं जिस के बारे में मैं बहुत दिनों से सोचविचार कर रहा था, पर कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था.

‘यह विचार मेरे दिमाग में दिनरात चल रहा था. यह विचार मुझे वैसे ही परेशान कर रहा था, जैसे हवाई सफर के दौरान कोई एक्स्ट्रा लगेज आप के लिए परेशानी का सबब बन जाता है. यह विचार अभ्यास के दौरान भी मेरे साथ रहता, मुझे किसी गेंदबाज की तरह धमकी देता रहता था. कभीकभी तो यह विचार मेरे रात के खाने को बेस्वाद बना देता था. ग्राउंड, ड्रेसिंगरूम से ले कर वॉशरूम तक यह विचार मुझे डराता था.

‘जब भी मैं बल्लेबाजी के लिए मैदान पर उतरता, चाहे वह भारत के लिए हो, कोलकाता नाइट राइडर्स के लिए या फिर दिल्ली डेयरडेविल्स के लिए, यह विचार परेशान करने वाले एक शोर के रूप में बदल जाता और वापस ड्रेसिंगरूम लौटने तक मेरे कानों में चिल्लाता, ‘इट इज ओवर गौती’ (अब अंत आ चुका है गौती). ( गौतम गंभीर को उन के चाहने वाले गौती कहते हैं).

‘जब 2014 के आईपीएल सीजन में मैं लगतार 3 मैचों में बिना खाता खोले आउट हो गया था, तब इस विचार ने मेरा मजाक उड़ाया और मेरे ऊपर जोरजोर से हंसा. उसी साल इंगलैंड के दौरे पर भी मैं बुरी तरह नाकाम रहा और एक बार फिर इस विचार ने मुझे डराया. साल 2016 में एक बार फिर मैं अपने घुटनों पर था. इंगलैंड के खिलाफ राजकोट टैस्ट मैच के बाद मुझे टीम से बाहर कर दिया गया था.

‘मैं अपना आत्मविश्वास वापस पाने की कोशिश कर रहा था लेकिन यह विचार एक शोर बन कर मेरे कानों में गूंज रहा था और मुझे परेशान कर रहा था. बारबार कह रहा था.

‘लेकिन मैं ने हार मानने से इनकार कर दिया. मैं इस विचार को, इस शोर को हराना चाहता था जिस के लिए मैं ने अपने शरीर को बहुत ज्यादा कष्ट दिया. मैं ने कठिन ट्रेनिंग शुरू की. मेरे ट्रेनर्स ने मुझ से कहा कि इस उम्र में मैं जोखिम ले रहा हूं. मैं इस तरह आहार लेता था, जैसे मैं कंगाल हो गया हूं और मेरे पास खाने तक के पैसे नहीं हैं…

‘साल 2017 के डोमेस्टिक सीजन में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद मैं इस साल के आईपीएल सीजन में पूरे आत्मविश्वास के साथ खेलने के लिए उतरा था. मेरे पैरों में नई जान आ गई थी, मेरा दिमाग पूरी तरह खुल गया था. मेरा बल्ला समंदर की लहरों की तरह गरज रहा था.

‘मैं ने सोचा कि उस डरावने विचार को मैं ने मार दिया था. लेकिन मैं गलत था. दिल्ली डेयरडेविल्स के लिए 2017 के आईपीएल में 6 मैच खेलने के बाद वह डरावना विचार फिर से मेरे कानों में शोर करने लगा. इस बार यह शोर पहले से भी ज्यादा डरावना था. शायद मेरा समय ख़त्म हो चुका था. हां, मेरा समय खत्म हो चुका था इसलिए आज मैं आप के सामने हूं. तकरीबन 15 साल तक अपने देश के लिए खेलने के बाद आज मैं क्रिकेट के इस खूबसूरत खेल को अलविदा कह रहा हूं…

‘2 विश्व कप और दोनों ही विश्व कप के फाइनल में अपनी टीम के लिए सब से ज्यादा रन बनाना किसी भी क्रिकेटर के लिए बहुत बड़े सम्मान की बात है. मैं ने सिर्फ एक ही सपना देखा था, वह सपना था आप लोगों के लिए विश्व कप जीतना. मुझे लगता है कि कोई था जो मेरे जीवन की पटकथा लिख रहा था, लेकिन शायद अब उस के पेन की स्याही खत्म हो गई है.

‘लेकिन उस ने जितना भी लिखा है, उन में कुछ अध्याय बेहद ही शानदार हैं जिस में से दुनिया की नंबर एक टैस्ट टीम का हिस्सा होना भी शामिल है. एक ऐसी ट्रॉफी जिसे पाने की मैं ने हमेशा तमन्ना की थी, वह थी ‘आईसीसी टैस्ट बैट्समैन आॅफ द ईयर’, जिस से मुझे 2009 में नवाजा गया. यह एक ऐसे बल्लेबाज का सम्मान था, जिसे हमेशा पता रहता था कि उस का आॅफ स्टंप कहां है.

‘न्यूजीलैंड में टैस्ट सीरीज और आॅस्ट्रेलिया में सीबी सीरीज जीतना मेरे कैरियर की कुछ बेहतरीन उपलब्धियों में शामिल है…

‘मैं यह नहीं कहूंगा कि मैं अपने कैरियर से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हूं. लेकिन मैं यह जरूर कहना चाहूंगा कि मैं इस से ज्यादा पाने के योग्य था. मैं ने अपने क्रिकेटिंग कैरियर में कई यादगार साझेदारियां निभाई हैं. लेकिन आप लोगों के साथ, भारतीय क्रिकेट फैंस के साथ जो साझेदारी बनी है उस से अहम कुछ भी नहीं है. एक क्रिकेटर के लिए आप लोग ही सब से अहम साझेदार हो… मुझे लगता है कि आप लोग ही तो हैं जो किसी भी क्रिकेटर को एक खास पहचान दिलाते हैं इसलिए मैं आप लोगों को अपने क्रिकेटिंग कैरियर में साझेदार मानता हूं…

‘मैं ने जिस भी टीम से खेला उस का सपोर्ट करने के लिए मैं आप लोगों का दिल से शुक्रिया अदा करता हूं. मैं कोलकाता के अपने फैंस को खासतौर पर धन्यवाद कहना चाहता हूं. कोलकाता के साथ मेरा प्यार हमेशा के लिए बना रहेगा. मैं उन सभी पिच क्यूरेटर्स, ग्राउंड स्टाफ, ड्रेसिंगरूम स्टाफ के सदस्यों का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं जो बहुत कम के बदले में एक क्रिकेटर को बहुतकुछ देते हैं.

‘मैं नेट प्रैक्टिस के दौरान मुझे गेंदबाजी करने वाले उन सभी गेंदबाजों का भी शुक्रिया अदा करता हूं जिन्होंने एक बेहतर बल्लेबाज बनने में मेरी मदद की. वे सब बहुत दूर से सिर्फ नेट में मुझे प्रैक्टिस कराने आते थे.

‘मेरे कोच संजय भारद्वाज हर हालत में चट्टान की तरह मेरे साथ खड़े रहे. मैं जब भी परेशानी में पड़ता था, उन्हें याद करता था. सर, मुझे नहीं पता कि मैं ने अपने खेल से आप को गौरवान्वित किया या नहीं लेकिन मैं इतना कहना चाहूंगा कि मेरे अंदर जितनी प्रतिभा थी उस का सौ फीसदी मैं ने क्रिकेट के मैदान पर दिया.

‘संजय सर ने ही मुझे दूसरे कोचों से भी मिलाया जिन में पार्थसारथी शर्मा सर भी शामिल हैं जो अपनेआप में बल्लेबाजी के एक पूरे संस्थान हैं. स्पिन गेंदबाजों को खेलने की मेरी काबिलियत का सारा श्रेय उन को जाता है…

‘आस्ट्रेलिया के पूर्व टैस्ट ओपनर जस्टिन लैंगर ने भी मेरे कैरियर में मेरी बहुत मदद की. मैं ने साल 2015 में उन से सलाह मांगी था और उन्होंने दिल खोल कर मेरी मदद की. उन की तरफ से बाद में मुझे ढेर सारी तारीफ भी मिली…

‘मैं भारतीय क्रिकेट टीम, कोलकाता नाइट राइडर्स, दिल्ली डेयरडेविल्स और दिल्ली स्टेट टीम के उन सभी कोचों का भी शुक्रगुजार हूं, जिन के संपर्क में मैं आया. उन सभी का मेरी बल्लेबाजी और मेरे व्यक्तित्व पर गहरा असर है.

‘मैं ने अपने साथी क्रिकेटर्स से बहुतकुछ सीखा है. मैं उन सभी को मिस करूंगा. धन्यवाद दोस्तो, आप सभी मेरे लिए हमेशा परिवार का हिस्सा रहेंगे.

‘आखिरी में मैं अपने परिवार के सभी सदस्यों का शुक्रिया अदा करना चाहूंगा, जिन्होंने मुझे इतना प्यार दिया. मेरा इतना सपोर्ट किया. मैं अपने मातापिता, दादादादी, दोनों मामा और मामी, मेरी पत्नी और मेरी दोनों प्यारी बेटियों का आभारी हूं, जिन्होंने मेरे सारे नखरे और मूड स्विंग्स को बिना कुछ कहे झेला.

‘मैं अंत में अपनी मां का धन्यवाद कहना चाहूंगा, जिन्होंने मेरी प्रतिभा को पहचाना और मुझे पहली बार 10 साल की उम्र में क्रिकेट एकेडेमी ले कर गईं. उस के बाद सब इतिहास में दर्ज हो चुका है. मेरे हर खराब दौर में मेरी मां मेरे साथ थीं. मैं अपना सारा गुस्सा भी उन्हीं पर निकालता था. इस के लिए मैं आप से माफी मांगता हूं मां.

‘मेरे क्रिकेट खेलने का दबाव मुझ से ज्यादा मेरे पिता पर रहता था. उन्होंने मुझ से कभी कहा तो नहीं लेकिन उन के साथी मुझ से बताया करते थे. मैं जब भी बल्लेबाजी करता था वे टीवी नहीं देखते थे. डैड, अब आप भी थोड़ा सहज महसूस करेंगे.

‘मेरे मामा जिन्होंने एक क्रिकेटर के रूप में मुझे गढ़ा, मेरे पीछे एक खंभे की तरह खड़े रहे. वे शब्दों में बहुत कम जाहिर करते थे लेकिन एक्शन से बहुतकुछ कह देते थे. उन्होंने मेरे लिए जो भी किया उस की कभी बराबरी नहीं की जा सकती, न ही उस का आकलन किया जा सकता है. मैं उम्मीद करता हूं कि मैं आप की उम्मीदों पर खरा उतरा होउंगा. मैं बिना आप की इजाजत के यह कहना चाहूंगा कि मैं आप की सब से बड़ी उपलब्धि हूं. धन्यवाद मामा.

‘मैं अपने दूसरे मामा और मामी का भी शुक्रगुजार हूं, जो बुरे समय में हमेशा मेरे साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़े रहे. मैं अपनी एकलौती बहन एकता से अधिकतर बार रक्षाबंधन पर उस के साथ नहीं रहने के लिए माफी मांगता हूं.

‘मैं अपने दोस्तों दिनेश और विवेक को भी धन्यवाद देता हूं जो हमेशा मेरे लिए दुआ करते थे. मैं तुम दोनों को दोस्त के रूप में पा कर खुद को भाग्यशाली मानता हूं. दिनेश को खासकर जिस ने मेरी हर बदतमीजी को बिना कुछ कहे बर्दाश्त किया है.

‘मैं अपनी पत्नी नताशा को खासतौर पर याद करता हूं. वही थी जो मेरे मूड स्विंग्स के सामने हमेशा खुद को खड़ा पाती थी. दुख की बात यह है कि वह अच्छे से ज्यादा बुरे समय में मेरी साझेदार रही. मेरे साथ मेरी शक्ति बनने के लिए तुम्हारा शुक्रिया नताशा…

‘आंध्र प्रदेश के साथ अगला रणजी मैच मेरे क्रिकेटिंग कैरियर का आखिरी मुकाबला होगा. वहीं पर अंत होगा जहां से सबकुछ शुरू हुआ था, फिरोजशाह कोटला क्रिकेट स्टेडियम… एक बल्लेबाज के रूप में मैं ने हमेशा समय की इज्जत की है. मुझे पता है कि यह सही समय है. गुड बाय एंड गुड लक.’

घर को दें फ्रेश और न्यू लुक

घर में थोड़ा सा बदलाव करके आप इसे स्टाइलिश, कूल, फ्रैश और न्यू लुक दे सकती हैं. आज हम आपको कुछ ऐसे उपाय बताएंगे,  जिससे आप घर को बिना किसी मेहनत के नया और फ्रैश बना सकती हैं. तो चलिए जानते हैं घर को फ्रैश और नया दिखाने के कुछ आसान उपाय.

हैण्ड-पेंटेड-चीजें – घर को नए तरीके से सजाने के लिए आप हैण्ड-पेंटेड चीजों का भी इस्तेमाल कर सकती हैं. आप चाहें तो अपने घर में ही हैण्ड-पेंटेड चीजें बनाकर घर को डेकोरेट कर सकती हैं. इससे आपके घर को सिपंल अट्रैक्टिव लुक मिलेगा

कुशन कवर– बदलते मौसम के साथ आप कुशन कवर को बदलकर लेटेस्ट कलर कौम्बिनेशन से भी घर को डेकोरेट कर सकती हैं. इससे आपके घर की शोभा भी बढ़गी और आपका घर नया लगेगा.

फ्रैश कलर्स– गर्मियों में घर को कूल और न्यू लुक देने के लिए घर में लाइट शेड्स जैसे पीच, येलो, ब्लू कलर के फ्लावरी प्रिंट वाले कर्टन्स लागएं. आप चाहे तो इन कलर का पेंट करवा कर भी घर को नया बना सकती हैं.

केवल फेफड़ों पर ही नहीं, आंखों पर भी होता है प्रदूषण का बुरा असर

देश भर में प्रदूषण एक गंभीर चुनौती बन चुकी है. कई शहर और कस्बे प्रदूषण की जद में आ चुके हैं. हालत इतनी खराब है कि कई जगहों पर बिना मास्क के निकलना भी मुश्किल है. प्रदूषण से होने वाले नुकसान से जुड़ा एक गंभीर तथ्य सामने आया है. वायु प्रदूषण से केवल फेफड़े या श्वसन तंत्र प्रभावित नहीं होते हैं. कई जानकारों का मानना है कि इसका असर आंखों पर भी होता है. खराब वायु गुणवत्ता से आंखों में कई समस्याएं हो रही हैं, जिसमें कौर्निया को होने वाली क्षति भी शामिल है.

नाक की तरह आंखों को ढंकना मुश्किल होता है. इससे फेफड़े के अलावा आंखों पर वायु प्रदूषण का बुरा असर हो रहा है. चूंकि आंखों की ओकुलर परत सीधे प्रदूषण के संपर्क में आती है, इस पर सबसे ज्यादा प्रदूषण का असर होता है.

इसके अलावा कई जानकारों का मानना है कि कई सालों तक प्रदूषण के संपर्क में रहने के कारण कोरोना को क्षति पहुंचती है, यह तुरंत नहीं होता है. अगर ड्राइ आई की समस्या लंबे समय तक रहती है, तो यह कोरोना को क्षतिग्रस्त कर सकती है, जिससे लंबे समय में दृष्टि प्रभावित होती है. खुजली होने पर आंखों को रगड़ने से भी कोरोना पर असर पड़ता है.

प्रदूषण से होने वाली परेशानियों में आंखों में खुजली, परेशानी और लाल होने की समस्याएं होती हैं. वहीं जो लोग कांटैक्ट लेंस का प्रयोग करते हैं, उन्हें जोखिम और बढ़ जाता है, क्योंकि उनकी आंखें पहले से ही ड्राई होती हैं.

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