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सर्दियों में बालों की खूबसूरती बनाएं रखने के लिए ट्राई करें ये हेयर मास्क

सर्दियों का मौसम हमारे लिए तो बहुत खूबसूरत होता है पर शायद हमारे बालों के लिए नहीं. क्योंकि इस मौसम में बालों की स्थिति थोड़ी खराब सी हो जाती है. इस मौसम में चलने वाली शुष्क हवा की वजह से ही बाल सबसे ज्यादा डैमेज होते हैं. टोपी पहनना और हीट प्रोडक्ट्स का ज्यादा इस्तेमाल भी आपके बालों को डैमेज कर देता है. अगर आप भी ठंड के मौसम में बालों को हेल्दी व खूबसूरत बनाएं रखना चाहती हैं तो इसके लिए आपको उनकी खास देखभाल करने की जरूरत है. आज हम आपको घर पर तैयार किये जा सकने वाले विंटर हेयर केयर मास्क के बारे में बताने जा रहे हैं.

एलोवेरा और नींबू का रस

स्कैल्प को राहत पहुंचाने और बालों की डीप कंडीशनिंग के लिए एलोवेरा बेस्ट है. एलोवेरा का एक ताजा पत्ता लें और उसमें से सफेद जेल निकाल लें. अगर आपके पास एलोवेरा का पत्ता नहीं है तो आप मार्किट में उपलब्ध रेडीमेड जेल भी ले सकती हैं. इसमें आप ताजे नींबू के रस को डालें और दोनों को अच्छे से मिक्स करें. इस मिश्रण को अपने बालों की जड़ से लेकर टिप तक लगाएं और इसे 15 मिनट के लिए रहने दें. 15 मिनट के बाद आप इसे सादे पानी और अपने पसंदीदा शैम्पू से धो लें.

केला और ओलिव औयल

कड़ाके की ठंड के बावजूद ये मास्क आपके बालों को स्मूद और सॉफ्ट रखेगा. एक पका हुआ केला लें और उसे छील लें. इसे अब एक स्मूद पेस्ट बनाने के लिए मैश कर लें. अब केले के इस इस पेस्ट में कुछ बूंदें ओलिव औयल की मिलाएं. दोनों सामग्री को अच्छे से मिक्स कर लें. इसे अपने बाल और स्कैल्प पर लगाएं. 30 मिनट तक इंतजार करें और फिर इसे आप शैम्पू से धो लें.

अंडे और शहद का मास्क

शहद बालों में नमी को लौक कर देता है जिससे आपके बाल और स्कैल्प हाईड्रेटेड रहते हैं. एक बाउल में अंडा और कच्चे शहद को मिक्स करें. इस मास्क को अपने स्कैल्प और बालों में लगाकर मसाज करें. इस बात का ध्यान रखें की ये मास्क आपके पूरे बालों में लगा हो. इसे 30 मिनट तक के लिए लगा रहने दें और फिर अपने नौर्मल शैम्पू से धो लें.

कानून के दुरुपयोग में मर्दों से आगे निकलती महिलाएं

हर शख्स दौड़ता है यहां भीड़ की तरफ,

फिर यह भी चाहता है कि उसे रास्ता मिले.

इस दौरे मुंसिफी में जरूरी तो नहीं वसीम,

जिस शख्स की खता हो उसी को सजा मिले.

वसीम बरेलवी की ये पंक्तियां बढ़ रही मुकदमेबाजी व बेगुनाहों को सजा पर बड़ी मौजूं लगती हैं. कायदेकानून समाज में बुराई व अत्याचार रोकने, लोगों की हिफाजत करने व उन के अधिकारों को बचाने के लिए बने हैं, लेकिन दूसरों को फंसा कर मोटी रकम ऐंठने की गरज से कानूनों का बेजा इस्तेमाल भी खूब होता है. इस में औरतें भी पीछे नहीं हैं.

अकसर घरेलू झगड़ों को बढ़ाचढ़ा कर आपराधिक बना दिया जाता है. धन व जमीनजायदाद हड़पने, दबाव बनाने, रंजिश निकालने व परेशान करने के लिए झूठे केस बनाए जाते हैं. सो, कोर्टकचहरियों में मुकदमों की भरमार है. हालांकि बेबुनियाद, मनगढ़ंत व झूठी शिकायतें करना जुर्म है लेकिन इस से कोई नहीं डरता. दरअसल, न कहीं लिखा है, न कोई बताता है कि झूठा केस करने पर कड़ी सजा मिलेगी. सो, झूठी शिकायतों पर धड़ल्ले से मुकदमे दर्ज होते रहते हैं.

नतीजतन, बेगुनाह लोग कोर्टकचहरी के चक्कर में फंस जाते हैं. वे राहत और इंसाफ के लिए वकीलों व पुलिस के पास जाते हैं व अपनी जेबें कटवाते हैं. अदालती दांवपेंचों में मात खा कर कई बेगुनाह कितनी ही बार बेवजह सजा भी भुगतते हैं.

यह सच है कि बहुत सी औरतें अपने हक में बने कानून का बेजा इस्तेमाल करती हैं. वे अपने घर वालों, सखीसहेली या वकीलों आदि के भड़काने से अकसर झूठे व संगीन इलजाम लगा कर किसी को भी फंसा देती हैं.

झूठे मुकदमे में फंसे इंसान का वक्त, पैसा और कोर्ट का कीमती समय बरबाद होता है. दूसरे, मामला मीडिया में उछलने से समाज में बेवजह बदनामी भी होती है. कई लोग तो इस ब्लैकमेलिंग से दुखी हो कर खुदकुशी तक कर लेते हैं. पत्नी से तंग आ कर जान गंवाने के मामले अकसर सुर्खियों में आते रहते हैं.

अदालतों को पता है इस झूठ का

महिलाओं को दहेज की मांग से बचाने के लिए भारतीय दंड संहिता में धारा 498ए के तहत अपनी शिकायत दर्ज कराने का हक है, लेकिन कई घटनाओं में झूठी शिकायतों पर पूरे परिवार को सलाखों के पीछे डाल दिया गया. सो, सुप्रीम कोर्ट कई बार इस कानून के बेजा इस्तेमाल की बात कह चुका है.

सुशील कुमार शर्मा बनाम भारत संघ एवं अन्य 2005 के केस में तो सुप्रीम कोर्ट ने इसे कानूनी आंतकवाद तक कह दिया था.

बहुत सी औरतें खुद मरने व झूठे केस में पति व उस के पूरे परिवार को फंसाने की धमकी देती रहती हैं. अदालतों में दहेज, मारपीट, छेड़खानी, बलात्कार व चेहरे पर तेजाब फेंकने जैसे बहुत से मामले झूठे साबित हो चुके हैं. कोई ऐसा कारगर नियमकानून आज तक नहीं बना जिस से झूठे केस करने वालों को सबक मिले.

एक व्यापारी पर उस की पत्नी ने दहेज का केस दर्ज किया था. मुंबई हाईकोर्ट में इस केस की सुनवाई हुई तो मामला झूठा पाया गया. सो, कोर्ट ने पत्नी पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया.

अपने मर्द से छुटकारा पाने व सबक सिखाने को भी कई औरतें दहेज के अलावा घरेलू हिंसा यानी मारपीट करने व जान से मारने तक के झूठे इलजाम लगा देती हैं.

मेरठ में एक औरत ने सरकारी अस्पताल में अपनी डाक्टरी जांच करा कर सर्टिफिकेट बनवाया व थाने जा कर शिकायत दर्ज करा दी. पुलिस ने उस के पति को उठा कर जेल में डाल दिया.

पति का एक पत्रकार मित्र जब जेल में उस से मिलने पहुंचा तो उस ने आपबीती सुनाई. कोई मारपीट हुई ही नहीं थी. दरअसल, पत्नी के गैरमर्द से नाजायज संबंध थे. सो, पति मना करता था. इस बात पर पत्नी ने यह ड्रामा रचा व फर्जी मैडिकल सर्टिफिकेट बनवा कर पति को अंदर करा दिया. उस पत्रकार ने खुद जांच कर के मामले की पोल खोली कि एक दलाल को 7 हजार रुपए दे कर वह फर्जी मैडिकल सर्टिफिकेट बनवाया गया था.

इस केस में आईपीसी की दफा 193 के तहत झूठा सुबूत बनाने वाले डाक्टर व उस औरत को 7 साल की कैद व जुर्माना हो सकता था, लेकिन पति ने मुकदमेबाजी करने के बजाय उस से तलाक ले लिया. यही आमतौर पर होता भी है. झूठे केस दर्ज कराने पर अदालतों को कड़ा रुख अपनाना चाहिए ताकि उन में कमी आए.

इसी तरह मुजफ्फरनगर के छपार गांव की लक्ष्मी ने हरिद्वार के रविंद्र पर उस का रेप करने का केस दर्ज करा दिया. पुलिस ने जांच में रेप के वक्त जब दोनों के मोबाइल की लोकेशन देखी तो उस वक्त लक्ष्मी पुरकाजी में व रविंद्र हरिद्वार में था. केस झूठा पाया गया. सो, पुलिस ने लक्ष्मी व उस के 2 साथियों को जेल भेज दिया. मामला अदालत में चल रहा है.

हुआ यों कि बिजनौर के एक तांत्रिक ने रविंद्र से 5 लाख रुपए ठगे थे. सो, हरिद्वार पुलिस रविंद्र की शिकायत पर तांत्रिक को पकड़ने बिजनौर गई. फरार तांत्रिक ने रविंद्र पर केस वापस लेने का दबाव बनाने के लिए यह नाटक रचा व रविंद्र पर रेप का झूठा आरोप लगवा दिया, लेकिन पुलिस के सामने लक्ष्मी ने सारा सच उगल दिया.

वर्ष 2014 में बिलासपुर की एक अदालत ने रेप का झूठा केस दर्ज कराने वाली एक औरत को 2 साल की ही सजा सुनाई थी. दरअसल, ज्यादातर कानून औरतों के हक में हैं जो सिर्फ उन्हीं की हिफाजत करते हैं. पुरुषों के हक व उन की मानमर्यादा बचाने का कोई कानून नहीं है. सो, ज्यादातर पुरुषों की बात अनसुनी व दरकिनार की जाती है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल 2013 से जुलाई 2014 के बीच अकेले दिल्ली में रेप के 2,753 मामले दर्ज हुए थे. इन में 1,464 मामले झूठे पाए गए थे. जाहिर है कि उन औरतों की कमी नहीं है जो अपने मकसद के लिए रेप का इलजाम लगाने से नहीं चूकतीं. हमारा समाज यह मानने के लिए सदा तैयार रहता है कि आरोप में कुछ न कुछ सचाई होगी.

यह माना जाता है कि पुरुष ताकतवर होते हैं. उन का शोषण नहीं हो सकता. औरत उन के साथ क्रूरता नहीं कर सकती. सो, उन्हें थाने या कचहरी से जल्दी कोई राहत नहीं मिलती. यह भी एक कारण है जिस से औरतों द्वारा झूठी शिकायतों से मर्दों को लूटने, ठगने व फंसाने के मामले तेजी से बढ़े हैं. नतीजतन, बहुत से पुरुष बेहद परेशान हैं.

आजकल अमीर लोगों पर नाबालिग लड़की से रेप का आरोप लगवा कर फंसाया जाता है. फिर उसे पोक्सो में फंसवाने की धमकी दी जाती है. बाद में समझौते के नाम पर मोटी रकम ऐंठी जाती है. ऐसी कई शिकायतें पिछले दिनों देश की महिला एवं बाल विकास मंत्री के पास पहुंचीं तो उन्होंने राष्ट्रीय महिला आयोग को पत्र लिख कर पीडि़त पुरुषों को जल्द ही एक प्लेटफौर्म मुहैया कराने को कहा ताकि पीडि़त पुरुष भी अपनी बात रख सकें. लेकिन नतीजा सिफर रहा. दरअसल, आयोग महिलाओं के लिए है, पुरुषों के लिए नहीं. उस का काम महिलाओं की हिफाजत करना है.

इसी तरह बीते दिनों गृह राज्यमंत्री ने जयपुर में कहा था कि झूठे मुकदमे करने वालों की अब खैर नहीं. उन के खिलाफ पुलिस द्वारा दफा 108 व 211 के तहत सख्त कार्यवाही की जाएगी. लेकिन सब जानते हैं कि  हमारे रहनुमाओं की ऐसी जुमलेबाजी असलियत से कोसों दूर रह कर सिर्फ भाषणों के दौरान तालियां बटोरने तक ही सिमटी रहती है.

लालच के लिए जालसाजी

मुफ्त की चीज पाने के लिए कुछ को छोड़ कर ज्यादातर लोगों की लार टपकती रहती है. यदि सरकारी खजाने से राहत का धन मिलता हो तो छीनाझपटी और भी बढ़ जाती है. इस मामले में औरतें भी अपवाद नहीं हैं. मसलन, उत्तर प्रदेश में लड़कियों पर तेजाब फेंकने की घटनाओं को देखते हुए सरकार ने कई कठोर कदम उठाए हैं.

इस के तहत तुरंत शिकायत दर्ज करने, जल्द जांच पूरी करने, सख्त कार्यवाही करने व साढ़े 5 लाख रुपए तक पीडि़ता को माली इमदाद देने का इंतजाम किया गया है. साथ ही, भारतीय रेल ने उन्हें ग्रुप 3 व 4 में नौकरी देने का भी वादा किया है. झूठ व फरेब के चलते इस में भी जम कर हेराफेरी की जा रही है.

पिछले दिनों अकेले मेरठ मंडल में तेजाब फेंकने के दर्ज कराए गए कुल 210 मामलों में से 80 मामले जांच के दौरान फर्जी पाए गए हैं. कमोबेश यही हाल बेसहारा व विधवा पैंशन जैसी दूसरी सरकारी स्कीमों का है.

दरअसल, झूठ, फरेब व जालसाजी से फायदा उठाने के लिए झूठी शिकायतें व मुकदमेबाजी पर जब तक कोई लगाम नहीं लगती, तब तक बेगुनाहों की जिंदगी तबाह होती रहेगी. अब वक्त आ गया है कि राजकाज चलाने वाले ओहदेदार इस अहम मुद्दे पर भी गौर फरमाएं व जल्द ही कुछ करें.

इन खास उपायों से चमकाएं अपना किचन

आप अपना अधिकतर समय अपने किचन को बेहतर बनाने और उसकी साज-सज्जा में बीता देती है. पर सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि किचन को सजाने में आप होम डेकोर की चीजें इस्तेमाल न करें. आइए आज आपको बताते हैं, आप अपने किचन को कैसे सजाएं.

  • डिज़ाइनर डिनर सेट्स किचन को सजाने में काफी मददगार हैं. ब्रांडेड कंपनियों के सेट इस्तेमाल करें. यदि आपकी किचन का कोई विशेष कलर थीम नहीं है तो दीवारों के कलर से विपरीत कलर के सेट्स लें. इन्हें बेहतरीन तरीके से सजाएं.
  •  आपके किचन में विजिटर्स का ध्यान सबसे ज्यादा किचन वेयर्स पर जाता है जैसे कि कप, प्याले, सौसर और प्लेट्स आदि. सामान्य डिज़ाइन के बजाय इनकी कुछ अनूठी डिज़ाइन लेकर आए और लोगों का ध्यान आकर्षित कर सकती हैं.
  • स्टोरेज कंटेनर्स ऐसे जार इस्तेमाल ना करें जो कि अन्य चीजों के साथ आते हैं. अलग-अलग आकार और डिज़ाइन के जार काम में लें. इससे किचन ज्यादा व्यवस्थित लगेगा. स्पाइस जार इसका शानदार उदाहरण हैं.
  • हर अच्छी लगने वाली चीज खरीदने के बजाय कोई थीम निर्धारित करें. उस थीम और कलर के अनुसार चीजें खरीदें. इससे कम समय में ही आपका किचन अच्छा लगने लगेगा. अपने किचन को चमकाने का ये एक रचनात्मक तरीका है.
  • दीवारों का कलर आपका किचन लाइट कलर से ज्यादा आकर्षक लगेगा. इससे जगह ज्यादा लगेगी. यदि आपको लगता है कि दीवारें जल्दी गंदी हो रही हैं तो वाशेबल पेंट का इस्तेमाल करें. यदि आपकी कोई कलर थीम है तो इसके अनुसार प्लान करें.
  • किचन का फर्नीचर और अलमारियां खरीदने से पहले थोड़ी रिसर्च करें. आपके किचन के अनुसार जो सूट करे वो खरीदें. अलमारी या सन्दूक जो आप खरीदें उसमें सामान रखने की पूरी जगह हो, ताकि किचन बिखरा सा ना लगे. ये किचन को चमकाने का एक क्रिएटिव आइडिया है.

VIDEO : इतना सोचने के बाद भी गलत साबित हुआ कोहली का निर्णय

भारत और औस्ट्रेलियाई टीम के बीच पर्थ में खेले जा रहे दूसरे टेस्ट मैच में मेजबान टीम की शुरुआत काफी अच्छी रही है. अब तक का खेल देखने के बाद ऐसा लग रहा है कि ‘कंगारू’ खिलाड़ी एडिलेड टेस्ट की हार को भुलाकर आगे बढ़ चुके हैं. सलामी बल्लेबाज एरोन फिंच और मार्कस हैरिस आत्मविश्वास से भरे नजर आए

पर्थ टेस्ट में जब औस्ट्रेलियाई कप्तान टिम पेन ने टौस जीतकर बल्लेबाजी का फैसला किया तो दबाव एरोन फिंच पर था. पर्थ टेस्ट की पहली पारी में एरोन फिंच अर्धशतक जड़कर आउट हो गए हैं. एरोन फिंच ने अपना दूसरा टेस्ट अर्धशतक पूरा किया, लेकिन जसप्रीत बुमराह ने उन्हें एलबीडब्ल्यू आउट कर दिया. इस तरह 112 रनों पर भारत को पहली सफलता मिली.

एरोन फिंच 105 गेंदों पर 50 रन बनाकर पवेलियन लौट गए. उन्होंने अपनी पारी में 6 चौके लगाए, लेकिन इससे पहले मोहम्मद शमी की दो लगातार गेंदों पर वह बमुश्किल बचे थे.

मोहम्मद शमी की एक गेंद उनके घुटने के ऊपर लगी और दूसरी गेंद को वह खेल नहीं पाए. शमी उत्साही लग रहे थे और टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली भी. कई खिलाड़ियों से सलाह मशविरा करने के बाद विराट ने डिसीजन रिव्यू सिस्टम (DRS) लिया. रिप्ले में साफ दिखा कि गेंद स्टंप्स के ऊपर से जा रही थी और फिंच बच गए.

बता दें कि औस्ट्रेलिया टीम ने पर्थ में कोई बदलाव नहीं किया है. जबकि भारतीय टीम को मजबूरन रविचंद्र आश्विन और रोहित शर्मा को चोटों की वजह से बाहर रखना पड़ा. एडिलेड में बाहर बैठने वाले स्पिन बौलिंग औल राउंडर हनुमा विहारी और उमेश यादव प्लेइंग 11 में शामिल हुए हैं.

Gmail से पुराना डाटा रिकवर करने के ये हैं 3 आसान तरीके

फोटो और वीडियो में कैद हसीन यादों को सहेजने के लिए अक्सर लोग कंप्यूटर, लैपटौप या पेन ड्राइव का सहारा लेते हैं. लेकिन सिस्टम की हार्डडिस्क क्रैश होने या फिर पेन ड्राइव खो जाने पर कई बार पुरानी यादें यूजर से जुदा भी हो सकती हैं.

हालांकि यूजर ने अगर दोस्तों, परिजनों या रिश्तेदारों से जीमेल के जरिए फोटो और वीडियो साझा किए हैं तो उन्हें दोबारा हासिल करना मुश्किल भी नहीं है. आइए जीमेल से पुराना डाटा रिकवर करने के प्रमुख तरीकों पर नजर डालें.

तस्वीरें खोजना आसान

जीमेल अकाउंट से यूजर न सिर्फ दोस्तों को भेजी गईं, बल्कि उनसे प्राप्त की गईं तस्वीरों को भी रिकवर कर सकते हैं. इसके लिए उन्हें जीमेल के सर्च बार में jpg, jpeg  या png टाइप करना होता है. अधिकतर तस्वीरें इन्हीं तीन फौर्मेट में अटैच करके भेजी जाती हैं.

इसके बाद स्क्रीन पर उन सभी ईमेल की लिस्ट नजर आएगी, जिनके जरिए कोई भी jpg, jpeg या png  फाइल साझा की गई है. यूजर मनचाहे ईमेल पर क्लिक करके उसमें मौजूद फोटो को कंप्यूटर में दोबारा सहेज सकते हैं.

हालांकि सर्च बार में jpg, jpeg  या png टाइप करने से पहले ‘औल ईमेल’ का विकल्प जरूर चुन लें, ताकि आपको पढ़े हुए यानी ‘रेड’ और बिना पढ़े हुए यानी ‘अनरेड’ मैसेज, दोनों में ही अटैच तस्वीरें देखने का मौका मिले

has: attachment का कमाल

अगर आपको ई-मेल में अटैच की गई किसी जरूरी फाइल का फॉर्मेट याद नहीं आ रहा है तो भी उसे बिना मशक्कत के मिनटों में खोज सकते हैं. इसके लिए आपको जीमेल के सर्च बार में बस has:attachment टाइप करने की जरूरत पड़ती है. फिर क्या है, नीचे की तरफ उन सभी ईमेल की सूची नजर आने लगेगी, जिनमें किसी भी फौर्मेट में अटैच की गई टेक्स्ट, औडियो, वीडियो या फोटो फाइल मौजूद है.

एरो (< >) का इस्तेमाल फायदेमंद

किसी खास फोटो, वीडियो, औडियो या टेक्स्ट फाइल को खोजने के लिए सभी ईमेल को एक-एक करके खोलकर देखना थोड़ा बोझिल लग सकता है. इससे बचने के लिए आप ‘एरो’ बटन का इस्तेमाल कर सकते हैं. यह बटन सर्च बार के ठीक नीचे वाली लाइन में दाईं ओर मौजूद होता है.

कोई भी एक ईमेल खोलने के बाद यूजर एरो बटन पर क्लिक करके उसके आगे और पीछे वाले ईमेल में अटैच की गईं तस्वीरें देख सकता है. आगे की फाइलें देखने के लिए उसे दाएं, जबकि पीछे की फाइलों पर लौटने के लिए बाएं एरो बटन पर क्लिक करना पड़ता है.

सेलिब्रिटीज वेडिंग सीजन में मिस इंडिया भी बनीं दुल्हन

विराट-अनुष्का, रणवीर-दीपिका, प्रियंका-निक के बाद अंबानी परिवार में शादी का सीजन कुछ इस तरह चला मानो आखिरी साल जाते जाते वेडिंग सीजन के नाम दर्ज हो गया है. लेकिन इस वेडिंग सीजन में कुछ और लोग हैं जिन्होंने शादी रचाई है. जैसे कपिल शर्मा ने गिन्नी के साथ ब्याह रचाया, वहीं कुलभूषण खरबंदा की बेटी की शादी भी तभी हुई जब प्रियंका चोपड़ा निक के साथ फेरे ले रही थी.

अब इसी कड़ी में एक और ब्यूटी क्वीन का नाम जुड़ गया है. इनका नाम है तन्वी व्यास. एक तरफ जहां दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह, प्रियंका चोपड़ा और निक जोनास की शादी के बाद जिस शादी ने सबका ध्यान खिंचा वो थी 12 दिसंबर को उद्योगपति मुकेश अंबानी की बेटी ईशा अंबानी की उद्यमी आनंद पीरामल के साथ वेडिंग. लेकिन इसी दिन ‘मिस इंडिया’ तन्वी व्यास ने अपने एक्टर ब्वौयफ्रेंड हर्ष नागर के साथ अपनी गृहस्थी बसा ली. तन्वी और हर्ष ने गुजरात के वडोदरा में भव्य समारोह में शादी की, जबकि आनेवाले समय में दिल्ली और मुंबई में रिसेप्शन का आयोजन करेंगे.

बता दें कि दिल्ली के लड़के और अभिनेता हर्ष नागर के साथ अपनी शादी को लेकर तन्वी बहुत उत्साहित थीं. दोनों की पहली मुलाकात मुंबई में एक शौर्ट टर्म एक्टिंग कोर्स करने के दौरान हुई थी. हर्ष ने वर्ष 2011 में शाहरुख खान के प्रोडक्शन हाउस रेड चिलीज एंटरटेनमेंट की फिल्म ‘औलवेज कभी कभी’ के जरिये एक्टिंग की दुनिया में कदम रखा था. वहीं टैलेंटेड तन्वी व्यास एक ग्राफिक डिजाइनर थीं, लेकिन बाद में उन्होंने अपने सपनों की दुनिया की ओर कदम बढ़ाया और आखिरकार मुंबई में ‘फेमिना मिस इंडिया अर्थ 2008’ का ताज उन्हें पहनाया गया. उन्होंने 2012 में मणसुक्कुल वांथाई के साथ फिल्म ‘कोलिवुडएपदी’ से अभिनय सफर की शुरुआत की.

तमिल फिल्मों के अलावा उन्होंने भारतीय फिल्म उद्योग में भी काम किया. उन्होंने फिल्म ‘ए स्कैंडल’ और दो बेहद चर्चित वेबसीरीज में भी काम किया. इनमें से एक बालाजी टेलीफिल्म्स प्रोडक्शन के बैनर ‘कर ले तू भी मोहब्बत’ में उनके अभिनय कौशल को जमकर सराहा गया, जबकि दूसरी वेबसीरीज ‘ट्विस्ट’ विक्रम भट्ट प्रोडक्शन की थी.

हर्ष ने संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यूयौर्क फिल्म अकादमी से अपना एक्टिंग कोर्स पूरा किया है, जबकि उन्हें ‘द रोटारैक्ट क्लब’ के ब्रांड एंबेसडर के रूप में चुना गया है और वे टीवी पर कई विज्ञापनों में भी नजर आते रहते हैं. इतना ही नहीं, हर्ष फैशन उद्योग के भी प्रसिद्ध मौडल हैं.

कुल मिलाकर बाकी सेलिब्रिटीज शादियों की तर्ज पर यह भी एक लव अफेयर के साथ ही शुरू हुई थी. यानी, एक लंबा सफर तय कर चुके हर्ष और तन्वी जीवन के सुनहरे सफर पर कदम बढ़ा चुके हैं. आशा है दोनों की शादी और करियर दोनों ही खुशनुमा रहेंगे.

जियो के बाद अब जूते बेचना शुरू करने वाले हैं मुकेश अंबानी

मोबाइल सेवा के जरिए घरघर पहुंच चुके दुनिया में मशहूर भारत के जानेमाने उद्योगपति मुकेश अंबानी अब कदमकदम पर आप के साथसाथ होंगे. जी हां, ऐसा होने जा रहा है. जियो आप के हाथ में होगा तो रिलायंस के जियो पाइंट स्टोर्स से हासिल किए गए जूते आप के पैरों में होंगे.

रिलायंस के रणनीतिकारों की सलाह को ग्रुप चेयरपर्सन मुकेश अंबानी ने स्वीकृति दे दी है. अब रिलायंस रिटेल कंपनी अपने जियो पांइंट स्टोर्स के जरिए चीनी, दाल, साबुन और बिस्कुट से ले कर अपैरल और जूतों की भी बिक्री करेगी.  इन सब सामानों की डिलीवरी मौजूदा जियो डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क के जरिए ग्राहकों के घर पर की जाएगी. ये ग्राहक वैसे भी अपने सिम कार्ड, मोबाइल हैंडसेट और एसेसरीज के लिए इन स्टोर्स पर आते हैं.

मालूम हो कि रिलायंस ग्रुप ने  5 हजार  से ज्यादा शहरों में तकरीबन  5,100 छोटे जियो पाइंट स्टोर्स को अपने महत्त्वाकांक्षी ई-कौमर्स वेंचर के लिए लास्ट माइल कनेक्शन प्वाइंट बनाने की योजना बनाई है.  वह इन के जरिए उन ग्राहकों तक पहुंचना चाहता है,  जिन के पास इंटरनेट कनेक्शन नहीं है या जिन्होंने कभी औनलाइन शौपिंग नहीं की है.

फिलहाल, जियो पाइंट स्टोर्स के लरिए रिलायंस रिटेल अभी टेलीविजन, रेफ्रिजरेटर और वौशिंग मशीन की बिक्री इसी तरह से कर रही है. कंपनी की कुल कंज्यूमर इलेक्ट्रौनिक सेल्स में इस की हिस्सेदारी अभी 10 पर्सेंट के करीब है. अब कंपनी ने इस मौडल को ग्रौसरी, पर्सनल केयर, अपैरल और जूतों के सेगमेंट तक बढ़ाने की योजना बनाई है.

माना जा रहा है कि जियो पाइंट का रिलायंस रिटेल के ई-कौमर्स वेंचर में बड़ा रोल होगा. कंपनी इन सामानों का बिजनेस अगले साल अप्रैल से शुरू करेगी.

दरअसल, रिलायंस रिटेल ने देश की  95 फीसदी आबादी तक सीधे पहुंचने का प्लान बनाया है.  और यह काम ई-कौमर्स और जियो पाइंट स्टोर्स के जरिए ही हो सकता है. कंपनी ई-कौमर्स के जरिए 10 हजार से ज्यादा आबादी वाले शहरों में रिटेल सेक्टर में मौजूदगी चाहती है. इस का मतलब यह है कि वह देश के 95-98  फीसदी ग्राहक बेस तक पहुंचेगी.

रिलायंस ने छोटेबड़े शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में  50 हजार जियो पाइंट स्टोर्स खोलने की तयारी की है, जो जियो के लिए कस्टमर सेल्स और सर्विस टच पाइंट का काम करेंगे. इस से कंपनी अपना एक बड़ा डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क तैयार करेगी. कंपनी हर 3 महीने में 500 नए जियो पाइंट स्टोर्स खोल रही है.

देश में एमेजौन और फ्लिपकार्ट ई-कौमर्स कंपनियां भी छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं. एमेजौन ने इस के लिए प्रोजेक्ट उड़ान शुरू किया है.  इस के जरिए कंपनी ने 12 हजार  किराना दुकानों और स्थानीय उद्यमियों तक पहुंच बनाई है. ग्राहक इन दुकानों में और्डर दे कर अपने प्रोडक्ट्स वहां से ले सकते हैं.

रिलायंस ग्रुप के एक अधिकारी का कहना है कि रिलायंस रिटेल अपने जियो पाइंट स्टोर्स में ई-कौमर्स कियोस्क लगाएगी, जहां से स्टोर एग्जीक्यूटिव्स लोगों को और्डर प्लेस करने में मदद करेंगे.

ईवाई इंडिया एजेंसी की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक,  भारत में ई-कौमर्स का रूरल मार्केट अगले 4 वर्षों में 10-12 अरब डौलर तक पहुंच सकता है. इस में  2018  से  2021 के बीच देश में ई-कौमर्स सेल्स में 32 फीसदी चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर यानी कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (सीएजीआर) से बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया है.

जियो मोबाइल के ग्राहकों को जियो पाइंट स्टोर्स से जूते वगैरह की खरीदारी करने पर क्या स्पेशल डिस्काउंट मिलेगा, इस सवाल पर रिलायंस ग्रुप के एक अधिकारी का कहना थे कि इन पर अभी गौर नहीं किया गया है.  बहराल, अप्रैल 2019 से आप के पैरों में जियो के जूते होंगे.

मासूम बच्चियों के यौन शोषण की इस कहानी के आगे शर्मसार है इंसानियत

बात वर्ष 2012 की है. इलाहाबाद राजकीय बाल संरक्षण गृह के बारे में कुछ उड़ती-उड़ती सी खबर मिली कि वहां कुछ गलत चल रहा है. मैं अपने कैमरामेन के साथ दिल्ली से सीधा इलाहाबाद जा पहुंची. राजकीय बाल संरक्षण गृह में सुबह आठ बजे हम गेट पर तैनात गार्ड को अपना प्रेस कार्ड दिखा कर इस बहाने से घुसे कि सुना है शहर के नये कप्तान ने अनाथ बच्चों के लिए नये कपड़े और खिलौने वगैरह भिजवाये हैं. दरअसल यह खबर मैंने उसी रोज सुबह अपने होटल के रिसेप्शन टेबल पर रखे एक अखबार में पहले पेज पर देखी थी. दांव काम कर गया. घनी मूंछों वाले गार्ड के चेहरे पर कप्तान साहब का नाम सुनते ही मुस्कुराहट फैल गयी. उसने आदर सहित हमें अन्दर जाने के लिए गेट पर जड़े बड़े-बड़े तीन ताले खोल दिये. तीन बड़े-बड़े तालों में बंधा गेट और चारों ओर ऊंची-ऊंची नुकीली सरियों से घिरा यह बालाश्रम बाहर से किसी जेल सरीखा ही नजर आता था.

बालाश्रम की संचालिका तब तक पहुंची नहीं थी. उनके और अन्य टीचर्स के आने का वक्त 10 बजे का था. उस वक्त अन्दर चार आया, एक रसोइया और एक गार्ड, इतने ही लोग मौजूद थे. हमने गार्ड के साथ हल्की बातचीत के साथ यह शो करने की कोशिश की कि संचालिका के आने तक हम यूंही थोड़ा टहल कर आश्रम को देख रहे हैं. मेरे कैमरामैन ने तेजी से अपना काम शुरू कर दिया था. नन्हें नन्हें बच्चे एक तंग गलियारे के सामने नंगी जमीन पर अपनी थालियां लिये ब्रेकफास्ट के इंतजार में बैठे थे. तभी एक आया रसोईघर से बाल्टी में खिचड़ी लेकर निकली, और हरेक की थाली में एक-एक कटोरी खिचड़ी की उलटती चली गयी.

इस गलियारे के अंत में शौचालय था, जिधर से बह कर आने वाला गंदा पानी पूरे गलियारे में फैला हुआ था. सूखी जमीनें ढूंढ-ढूंढ कर बैठे बच्चों के चेहरों पर एक अजीब सा डर तारी था. दो साल की एक बच्ची, जिसको अपने हाथों से खाना खाना नहीं आता था, अपना पूरा हाथ थाली में पड़ी खिचड़ी में डाल कर चाट रही थी. एक बच्चे ने थाली उलट दी थी और जमीन पर पड़ी खिचड़ी को किसी जानवर की तरह लेट कर चाट रहा था. एक बच्चा जो मानसिक रूप से कमजोर दिख रहा था, शौचालय की दीवार से चिपका बैठा ऊंघ रहा था. उसकी थाली में पड़ी खिचड़ी पर ढेरों मक्खियां बैठी हुई थीं. यह दृश्य देखकर मैं सिहर गयी.

वहां कोई इन बच्चों की दयनीय हालत को देखने वाला नहीं था. कोई उनको पुचकार कर खाना खिलाने वाला नहीं था. कोई यह देखने वाला नहीं था कि थाली में डाली जा रही खिचड़ी उनके पेट में जा रही है या जमीन पर लीपी जा रही है. शौचालय में पांच खाने बने थे, चार शौच के लिए और एक नहाने के लिए. किसी के आगे दरवाजा नहीं, अन्दर रोशनी का इंतजाम नहीं, सिर्फ एक टूटी बाल्टी और मग कोने में रखा था, मगर साबुन नदारद था. बच्चे शौच करने के बाद आंगन की मिट्टी से हाथ साफ करते थे.

रसोईघर में तीन आया और रसोइया मजे से बैठे गपशप कर रहे थे. गार्ड हमारे साथ-साथ घूम रहा था. उसने मेरे कैमरामैन को फोटो खींचने को मना किया तो मैंने उसको बातों में फंसा लिया ताकि कैमरामैन अपना काम आराम से कर सके. ऊपर बच्चों के शयनकक्षों की हालत और भी ज्यादा खराब थी. दीवारें जालों और पान की पीकों से भरी हुर्इं. गन्दी चादरें और बिछौने. वहीं एक आया एक नन्हीं बच्ची को जबरन खिचड़ी ठुंसाने की कोशिश कर रही थी. पता चला यह चार साल की बच्ची रीढ़ की हड्डी में चोट की वजह से अब उठ बैठ नहीं पाती और न ही बोल-सुन सकती है. उसकी आंखों के कोरों से आंसू बह रहे थे और मुंह में बार-बार खिचड़ी से भरा चम्मच ठूंसे जाने से वह बेकल हो रही थी, मगर आया को अपना काम चटपट निपटाने की जल्दी थी.

दस बजे तक तमाम तस्वीरें हमारे कैमरे में कैद हो चुकी थीं. मगर जिस खबर की तलाश में हम वहां आये थे, वह अभी तक हमें नहीं मिली थी. खबर थी यौन शोषण की. अचानक मेरा कैमरामैन छत पर बने एक लकड़ी के कमरे के अन्दर जा पहुंचा. वहां 12-14 साल की दो लड़कियां थीं. हमें हमारी खबर मिल चुकी थी. दस बजे जब संचालिका और अन्य टीचर्स इस बालाश्रम में पहुंचे, तब तक हम वहां का पूरा कच्चा-चिट्ठा निकाल चुके थे.

इसके बाद हम इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा गठित एक कमिटी के कुछ मेम्बर्स से मिले. इनमें हाईकोर्ट के सीनियर वकील थे. इस कमेटी को कुछ वक्त पहले ही सरकारी बालाश्रमों की जांच के लिए जस्टिस अमर सरन की अध्यक्षता में बनाया गया था. इस कमिटी को हमने सारी तस्वीरें और बातचीत की टेप सौंपे. तस्वीरें खुद सारी कहानी बयां कर रही थीं. उन्हें देखकर उनकी आंखें फटी रह गयीं. हमने उनसे गुजारिश की कि बच्चों के स्वास्थ्य की जांच करवाएं क्योंकि हमें शक है कि छत के कमरे में बंद दोनों लड़कियां प्रेग्नेंट हैं. दूसरे दिन हमने शहर के एसपी से भी मुलाकात की. इधर हमारी खबर छपनी शुरू हुई और उधर राजकीय बालाश्रम की जांच. खबर पक्की थी. वह दोनों बच्चियां प्रेग्नेंट थीं. पता चला कि उनके साथ लगातार बलात्कार होता रहा है और इस अपराध में रसोइया और गार्ड शामिल थे. इन दो बच्चियों का ही नहीं, बल्कि इस संरक्षण गृह की अन्य छोटी बच्चियों का भी देह शोषण वहां काम करने वाले मेल टीचर और अन्य कर्मचारी करते थे. हमारी खबर के बाद संचालिका और अन्य आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया.

मगर इतने भर से क्या उस बालाश्रम की हालत में कोई सुधार आया है? बिल्कुल नहीं. हालात अब भी वैसे ही बदतर हैं. बच्चे खौफ में जीते हैं, कोई नहीं उनके आंसू पोछने वाला, उनका दर्द समझने वाला. जिसे मौका मिलता है उन पर हाथ साफ करके निकल जाता है. यह हाल सिर्फ एकाध अनाथाश्रमों का नहीं, इस देश के ज्यादातर अनाथाश्रमों और संरक्षण गृहों का है. बीते अगस्त में बिहार और उत्तर प्रदेश में संरक्षण गृहों का जो सच सामने आया है, उससे शर्मनाक तो कुछ हो ही नहीं सकता. इससे लज्जाजनक और कुछ नहीं हो सकता कि बालिका अथवा नारी संरक्षण गृह में आश्रय लेने वाली लड़कियों और महिलाओं को देह व्यापार में धकेल दिया जाए.

उत्तर प्रदेश के देवरिया में संरक्षण गृह संचालिका द्वारा चलाये जा रहे सैक्स रैकेट के खुलासे के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी का सक्रिय होना और 12 घंटे में प्रदेश के सभी जनपदों से रिपोर्ट तलब करना इस बात की ओर संकेत करता है कि सरकारें आग लगने के बाद ही कुआं खोदने की तत्परता दिखाती हैं. मुख्यमंत्री के आदेश के बाद लखनऊ, हरदोई और सुल्तानपुर के संरक्षण गृह से लापता होने वाले बच्चों की संख्या इस बात का संकेत हैं कि संरक्षण सुधार गृहों और बाल सुधार गृहों की स्थिति इस देश में नरक के समान है.

देवरिया कांड के खुलासे के बाद हरदोई जनपद के बेनीगंज कस्बे में किराये के मकान पर आशया ग्रामोद्योग द्वारा संचालित स्वाधारा गृह में छापा मारी में 19 महिलाओं का गायब मिलना और गाजियाबाद के बलिका गृह से 31जुलाई से चार लड़कियों का गायब होना मामूली बात नहीं है. सुल्तानपुर से भी नौ महिलाओं के गायब होने की खबर आयी थी. दरअसल देश भर में मौजूद ये सुधार गृह या बाल संरक्षण गृह बच्चों या किशोरियों की मदद के नहीं, बल्कि यौन उत्पीड़न के केन्द्र बन चुके हैं. ये ऐसी जगहें हैं जहां नेता, मंत्री, अफसर, चपरासी, गार्ड, रसोइया, अध्यापक सब बिना किसी भय के अपनी यौन पिपासा पूरी कर रहे हैं. कोई नहीं जो इनकी जांच करे, इनको चिन्हित करे या इनको जेल का रास्ता दिखाये.

पैसे और हवस के आगे सब बेबस नजर आ रहे है. बाल संरक्षण गृहों से बच्चों का भागना, महिला संरक्षण गृहों में शोषण, बलात्कार, कुपोषण और मासूमों के साथ जानवरों जैसा व्यवहार करना जैसे यहां काम कर रहे कर्मचारियों का हक बन गया है.

योगी-मोदी की सरकारें राम राज्य का सपना दिखाती रहीं और पूरे देश में सीता हरण का खेल खुलेआम चलता रहा. बिहार के मुजफ्फरपुर में बेसहारा लड़कियों के लिए बने आश्रय गृह में 34 नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण का सनसनीखेज मामला सामने आया, तो वहीं इस जघन्य कांड में बच्चियों की मौत की बात भी सामने आयी. इस बालिका गृह का संचालन ब्रजेश ठाकुर नाम के राजनीतिक शख्स का एनजीओ सेवा संकल्प एवं विकास समिति करता है. ब्रजेश ठाकुर समेत कई अन्य आरोपियों को काफी दबाव के बाद गिरफ्तार किया गया. ब्रजेश ठाकुर नितीश सरकार की समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा का करीबी था. इस पूरे कांड में मंजू वर्मा और उनके पति चंद्रशेखर वर्मा की संलिप्तता उजागर हो चुकी है.

अब ये बात पूरी तरह से साफ हो गई है कि ब्रजेश ठाकुर के बालिका गृह की 44 बच्चियों में से 34 बच्चियों के साथ रेप हुआ है. इस बालिका गृह में एक बच्ची की हत्या कर शव दफनाने की भी बात सामने आयी. जिसके लिए बालिका गृह की खुदाई की गयी और वहां की मिट्टी को जांच के लिए भेजा गया. डीजीपी के एस. द्विवेदी के मुताबिक 2013 से 2015 के बीच इस बालिका गृह से चार बच्चियों के गायब होने की भी पुष्टि हो चुकी है. मामला अब सीबीआई के हाथ में है.

देवरिया में मां विंध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण एवं समाज सेवा संस्थान द्वारा संचालित बाल एवं महिला संरक्षण गृह से नाबालिग लड़कियों को रात में कार द्वारा बाहर ग्राहकों तक पहुंचाया जाता था और सुबह उन्हें वापस संरक्षण गृह में पहुंचा दिया जाता था. यौन व्यापार के इस अड्डे पर पुलिस ने छापा मार कर चौबीस बच्चों और युवतियों को मुक्त कराया. साथ ही संस्थान परिसर को सील कर वहां की अधीक्षिका कंचनलता, संचालिका गिरिजा त्रिपाठी तथा उसके पति मोहन त्रिपाठी को गिरफ्तार किया. संरक्षण गृह में 42 लड़कियों का पंजीयन कराया गया था, जिनमें से 18 अभी भी लापता हैं.

केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी कहती हैं, ‘ये जो मुजफ्फरपुर और देवरिया में हुआ है उससे हम लोग चकित भी है और दुखी भी और मुझे मालूम है कि ऐसी बहुत सारी जगह निकलेगी.’ यानि केन्द्र सरकार की मंत्री मानती हैं कि देश भर में अनाथाश्रमों और संरक्षण गृहों में बच्चों और युवतियों का शोषण हो रहा है, मगर इसको रोकने का क्या प्रयास हो रहा है, इसकी कोई स्पष्ट रूपरेखा अब तक तैयार नहीं हुई है. हकीकत यह है कि देश भर में बालिका अथवा नारी संरक्षण गृह चलाने का काम धूर्त और लम्पट किस्म के लोग कर रहे हैं.

इससे भी चिंताजनक बात यह है कि ऐसे समाज विरोधी तत्व ऊंची पहुंच वाले भी साबित हो रहे हैं. बेसहारा लड़कियों के यौन शोषण का सिलसिला गैर सरकारी संस्थाओं (एनजीओ) के संचालकों और रसूख वाले राजनीतिक लोगों के आपसी तालमेल से चल रहा है. हाल ही में टॉमस राइटर्स फाउंडेशन के सर्वे में महिलाओं के लिहाज से खतरनाक देशों में भारत को अफगानिस्तान, सीरिया और सऊदी अरब से भी आगे का स्थान दिया गया है. आजादी के 72वें वर्ष में भारत में ऐसा होना विचित्र और शर्मनाक है.

मुजफ्फरपुर और देवरिया के बाद चंडीगढ़ से भी ऐसी ही खबरें आ चुकी हैं. 19 वर्षीय एक लड़की जो दिमागी तौर पर अस्थिर थी, चंडीगढ़ के एक बालिका गृह में रखी गयी थी, जहां उसने एक बच्ची को जन्म दिया. पता चला कि उसके साथ वहां के गार्ड्स और चौकीदार लगातार बलात्कार करते रहे थे.

मीडिया जब भी ऐसी घटनाओं को उभारता है तब सरकारें और समाज थोड़ी सक्रियता दिखाना शुरू करते हैं. इस देश में अनाथ बच्चों, किशोरियों का देह शोषण कोई नया नहीं है, सदियों से होता आ रहा है, मगर उसको रोकने के कठोर प्रयास किसी सरकार के द्वारा नहीं हुए. बिहार की समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा के इस्तीफा दे देने से, गिरफ्तार हो जाने से यह कांड रुकने वाला नहीं है. अफसरों के तबादले या निलम्बन को भी यथोचित दंड नहीं कहा जा सकता. समाज और देश को शर्मिदा करने वाले ऐसे मामलों में सख्त सबक सिखाने वाली कार्रवाई होनी चाहिए, न केवल संरक्षण गृह चलाने वालों के खिलाफ, बल्कि सम्बन्धित अधिकारियों के खिलाफ भी.

यह शासन-प्रशासन की नाकामी ही है कि ऐसे तत्व आश्रय स्थल चलाते पाये जा रहे हैं, जो एक तरह से सभ्य समाज के लिए शत्रु हैं. आखिर इस देश के जिला प्रशासन इतने नाकारा कैसे हो सकते हैं कि वे संदिग्ध गतिविधियों वाले किसी संरक्षण गृह की हकीकत न जान सकें? भविष्य में ऐसी घटनाओं पर लगाम लग सके, इसके लिए सामाजिक आॅडिट जरूरी है. जिला स्तरों पर मीडिया, पुलिस, न्यायाधीषों, वकीलों, समाजिक संस्थाओं से जुड़े कुछ ऐसे स्वच्छ छवि वाले लोगों की कमिटियां बनायी जानी चाहिएं, जो इन संस्थाओं का औचक निरीक्षण करती रहें और अपनी रिपोर्ट सरकारों को सौंपती रहें. उन रिपोर्ट्स पर तत्काल कार्रवाइयां हों और दोषियों को जल्दी से जल्दी सजा हो. यह काम आसान नहीं है, पर सरकार की नीयत हो तो सुधार लाना कोई इतना मुश्किल भी नहीं है.

इसी के साथ समाज में जागरूकता फैलाये जाने की भी जरूरत है. ऐसा तो सम्भव ही नहीं है कि संरक्षण गृहों में घोर अनुचित काम होते रहें और आसपास के लोगों को उनके बारे में कुछ भनक न लगे. किन्हीं कारणों से संरक्षण या आश्रय गृहों मे गुजर-बसर करने वाले बच्चों, लड़कियों और महिलाओं को गरिमामय जीवन जीने का अवसर मिले, इसकी चिंता सरकारों के साथ साथ समाज को भी करनी होगी.

अगर शासन के साथ समाज अपने हिस्से की जिम्मेदारी सही तरह निभा रहा होता तो शायद चंडीगढ़, मुजफ्फरपुर और देवरिया में शर्मसार करने वाले मामले सामने नहीं आये होते. इसके लिए अब केन्द्र और राज्य सरकारों को इस तरह की घटनाओं के होने पर जिला प्रशासन से लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधि और पुलिस की जिम्मेदारी और दण्ड को सुनिश्चित करना बहुत जरूरी है.

देश भर के 539 बाल आश्रय गृहों पर पड़ा ताला   

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (डब्ल्यूसीडी) ने यौन उत्पीड़न और शोषण की सूचनाओं के बाद देश भर के 539 बाल सुधार एवं आश्रय गृहों पर तालाबंदी कर दी है. महिला आश्रय व बाल सुधार गृहों (सीसीआई) में यौन उत्पीड़न के मामले प्रकाश में आने के बाद हुई जांच में कई तरह की अनियमितताओं के चलते यह कदम उठाया गया है.

बिहार के मुजफ्फरपुर में अगस्त में आश्रय स्थल पर गंभीर अनियमितताओं और 34 नाबालिगों के साथ दुष्कर्म के मामले प्रकाश में आने के बाद यह किया गया. साथ ही जिलाधिकारियों को देश भर के सीसीआई केन्द्रों की जांच के बाद रिपोर्ट देने को कहा गया. उनकी रिपोर्ट के आधार पर सबसे ज्यादा महाराष्ट्र में 377, आंध्र प्रदेश में 78 और तेलंगाना में 32 आश्रय स्थल बंद कर दिये गये हैं.

निरीक्षण के बाद पाया गया कि यह आश्रय स्थल सीसीआई के नियमों और तय मानकों का पालन नहीं कर रहे थे. कई तो पंजीकृत ही नहीं थे. प्रबंधन को लेकर प्रशासन को कोई जानकारी नहीं थी. गृहों में सुधार कमेटी तक नहीं थीं. फिलहाल बंद किये गये गृहों के बच्चों को अन्य संस्थानों में स्थानांतरित कर दिया गया है.

जो भुला दिया, सो भुला दिया

तुझे दिल से अपने निकाल कर

मैंने ख्वाहिशों को सुला दिया

तू लौट कर भी ना आ सके

मैंने आशियाँ ही जला दिया

 

चुभने लगे थे आंख में

जो ख्वाब तूने दिखाये थे

ये तो शुक्र है के सहर ने फ़िर

मुझे असलियत से मिला दिया

 

तेरा प्यार था के फरेब था

मुझे आज तक ना पता चला

कभी रो दिये तो हंसा दिया

कभी हंसते हंसते रुला दिया

 

कभी बेपनाह मोहब्बतें

कभी बेबसी की कहानियां

कभी मौत के दर ले गया

कभी ज़िन्दगी से मिला दिया

 

ये ना सोचना के मैं रोऊंगी

पछताऊंगी तुम्हें छोड़ कर

मुझे गम नहीं किसी बात का

जो भुला दिया, सो भुला दिया

दलित नेता के खाते में ही गए दलित वोट

विधानसभा चुनावों से पहले बहुजन समाजव पार्टी सुप्रीमो मायावती ने जिस अहंकार के साथ कांग्रेस के साथ गठबंधन को ठुकरा दिया था, चुनाव नतीजों के बाद वह पस्त नजर आने लगी हैं. मायावती की शुरू में मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के साथ गठबंधन की बातचीत चल रही थी पर बाद में उन्होंने मध्यप्रदेश और राजस्थान में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया तथा छत्तीसगढ़ में अजित जोगी की जनता कांग्रेस जोगी के साथ गठबंधन कर लिया.

मायावती चुनाव से पहले कांग्रेस से नाराज थीं. उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस कर कांग्रेस पर हमला बोला औैर गठबंधन न होने का ठीकरा दिग्विजय सिंह पर फोड़ा. उन्होंने कहा था कि कांग्रेस भाजपा से ज्यादा गैरभाजपा दलों को कमजोर करने में लगी रहती है.

मायावती के इस कदम को भाजपा के खिलाफ महागठबंधन के प्रयासों में रोड़ा मान लिया गया, लेकिन इन चुनाव नतीतों ने मायावती के गरूर को तोड़ा है और फिर से विपक्षी दलों को भाजपा के खिलाफ महागठबंधन की नई राह खुल गई है.

चुनाव नतीजों के बाद मायावती बिना मांगे कांग्रेस को समर्थन देने का ऐलान करते हुए कहा कि उन की पार्टी ने भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए चुनाव लड़ा था इसलिए कांग्रेस की सरकार बनाने के लिए उसे मध्यप्रदेश और राजस्थान में समर्थन देने का फैसला किया है.

मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस सामान्य बहुमत से 2-2 सीटें दूर रह गई. मध्यप्रदेश में कांग्रेस को 114 सीटें मिली हैं. उसे बहुमत के लिए 116 सीटों की जरूरत हैं. उधर राजस्थान में भी कांग्रेस को 99 सीटें प्राप्त हुईं और बहुमत के लिए 101 सीटें चाहिए.

मायावती के अहंकार के टूटने के पीछे उन के पार्टी को मनमुताबिक कामयाबी नहीं मिलना है. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ में उन्हें महज 2-2 सीटें ही मिल पाईं. हालांकि राजस्थान में अंदरूनी कलह के बावजूद उस के खाते में पहले बार सब से अधिक 6 सीटें हासिल हुईं. यह बात अलग है कि यहां जो जीत मिली है वह भी बसपा के नाम पर कम, उम्मीदवारों की निजी जातिगत हैसियत की वजह से मिली है.

इन चुनाव नतीजों से साफ हुआ है कि दलित वोट भले ही कांग्रेस, भाजपा, बसपा, सपा और निर्दलियों में बंट गया हो पर वह दलित नेताओं के खाते में ही गया है. तीनों प्रदेशों के नतीजों के आकलन में यह बात साफ हो जाती है.

राजस्थान में किशनगढ बास दीपचंद खैरिया, उदयपुरवाटी से राजेंद्र सिंह गुढा, तिजारा से संदीप यादव, नदबई से जोगेंद्र अवाना, नगर से वाजिद अली और करोली से लाखनसिंह मीणा को जीत मिली. यहां बसपा के खाते में 3 प्रतिशत वोट गए. प्रदेश में बसपा ने सभी 200 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे.

मध्यप्रदेश में बसपा को 2 सीटें मिलीं. दोनों सीटों पर दलित उम्मीदवार थे. पिछली बार यहां बसपा की एक सीट थी. छत्तीसगढ़ में मायावती अजित जोगी की जनता कांग्रेस जोगी से गठबंधन कर के महज दो सीटें जीत पाईं. यहां मायावती ने तालमेल के तहत 35 उम्मीदवार उतारे थे जबकि जोगी ने 55. जोगी की पार्टी को 5 सीटों पर ही जीत मिल पाई.

राज्य में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 10 सीटों में से 8 सीटें बसपा को दी गईं जबकि 2 सीटें जोगी की पार्टी को मिलीं. इन के अलावा अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 29 सीटों में से 12 सीटों पर बसपा और 17 पर जोगी ने चुनाव लड़ा. बसपा ने 15 अन्य सामान्य सीटों पर भी अपने उम्मीदवार उतारे थे.

छत्तीसगढ़ में 11.6 प्रतिशत दलित वोटर हैं और 31.8 प्रतिशत आदिवासी हैं. बसपा के हिस्से कुल वोटों का दो प्रतिशत आया है. हालांकि तीनों राज्यों में आए नतीजे बसपा के लिए  2013 के चुनावों से बेहतर है.

इन नतीजों से अब बसपा नेता मायावती को समझ आ रहा है कि दलित वोट बैंक की एकमात्र नेता वही नहीं हैं. दलित वोट दलित नेता के पीछे ही है वह चाहे किसी भी पार्टी का हो.

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