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राजगीर हलवा

सामग्री

– 1 कप राजगिरा आटा

– 21/2 कप दूध

– 8 बड़े चम्मच घी

– 1/2 कप चीनी

– थोड़ा सा इलायची पाउडर

– थोड़े से काजू व बादाम कटे हुए.

विधि

– एक पैन में धीमी आंच पर दूध पकाएं.

– पकने पर उस में चीनी डाल कर अच्छी तरह चलाएं.

– अब एक अन्य पैन में घी गरम कर उस में राजगिरा आटा डाल कर तब तक चलाएं जब तक कि वह सुनहरा न हो जाए.

– फिर इस में धीरेधीरे दूध डालते हुए धीमी आंच पर थोड़ी देर चलाएं.

– जब दूध सूख जाए और शीरा घी छोड़ने लगे तब आंच बंद कर इस में इलायची व ड्राईफूट्स डाल कर गरमगरम सर्व करें.

आधारशिला- भाग 1: किस के साथ सफलता बांटनी चाहती थी श्वेता

चिकित्सा महाविद्यालय के दीक्षांत समारोह में एमबीबीएस की डिगरी और 2 विषयों में स्वर्णपदक लेती हुई श्वेता को देख कर खुशी से मेरी आंखें भर आईं. वह कितनी सुंदर लग रही थी. गोरा रंग, मोहक नैननक्श. उस पर आत्मविश्वास और बुद्धिमत्ता के तेज ने उस के चेहरे को हजारों में एक बना दिया था.

मैं उस की मां हूं, क्या इसीलिए अपनी बेटी में इतना सौंदर्य देख पाती हूं? मैं ने एक निगाह अपने इर्दगिर्द बैठी भीड़ पर डाली तो पाया कई जोड़ी आंखें श्वेता को एकटक निहार रही हैं.

श्वेता की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी. अपना लक्ष्य उस ने पा लिया था. मेरा मन गर्व से भर उठा. साथ ही एक चिंता ने हृदय के किसी कोने से हलके से सिर उठाया कि अब हमें उस के लिए वर की तलाश करनी होगी. सही समय पर सही काम होना ही चाहिए, यही सफल व्यक्ति की निशानी है.

बरसों पहले की बात याद आई. नन्ही श्वेता को पैरों पर झुलाते हुए मैं उसे रटाया करती, ‘वर्क व्हाइल यू वर्क, प्ले व्हाइल यू प्ले…’

श्वेता ने यह कविता अच्छी तरह रट ली थी. जब वह अपनी तोतली आवाज में इसे सुनाती तो मैं भावविभोर हो जाती. मगर क्या इस का सही अर्थ वह समझ पाई थी.

10वीं कक्षा में पहुंचते ही वह पढ़ाई और कैरियर की नींव बनाने की उम्र में राह भटक गई थी. अनजाने प्रदेश की ओर बढ़ते हुए उस के क्रमश: दूर जाते हुए कदमों की पद्चाप को मैं मां हो कर भी पहचान नहीं पाई थी. यदि वह नेक व्यक्ति मुझे उस बात की सूचना न देता तो न जाने श्वेता का क्या होता, क्या होता हम सब का, यदि उस की जगह कोई और होता तो…

मुझे वह दिन याद आया, जब दोपहर की डाक से वह पत्र मिला था :

मीनाजी,

जितनी जल्दी संभव हो, स्कूल आ कर मुझ से मिल लें. कृपया इस बात को गुप्त रखें. श्वेता को भी इस बारे में कुछ न बताएं.

-पुनीत.

वह नाम मेरे लिए कतई अपरिचित नहीं था. 3-4 महीनों से श्वेता के मुख से वह नाम सुनतेसुनते हमें ही नहीं, शायद पड़ोसियों को भी रट गया था. मगर मैं सोचने लगी कि यह पत्र… इस का मजमून ऐसी कौन सी बात की ओर इशारा कर रहा है, जोकि बेहद गोपनीय है, और शायद गंभीर भी. मेरा हृदय कांप उठा.

‘जैसेतैसे साड़ी लपेट कर मैं ने बालों को ढीलेढाले जूड़े की शक्ल में बांध लिया. श्वेता को उस दिन बुखार था, इसलिए वह स्कूल नहीं जा पाई थी. यह बात मेरे पक्ष में थी. उसे बता कर कि आवश्यक काम से बाहर जा रही हूं, मैं निकल पड़ी.

श्वेता के स्कूल की छुट्टी 4 बजे होती थी. मैं साढ़े 3 बजे ही स्कूल पहुंच चुकी थी. अभी मुझे आधा घंटा इंतजार करना था. मैं प्रवेशद्वार के समीप ही बैंच पर बैठ गई. इस तरह चोरीछिपे इंतजार करना मुझे बड़ा अजीब लग रहा था, मगर करती भी क्या? बात कुछ समझ में नहीं आ रही थी. यदि वह श्वेता की पढ़ाई के संबंध में थी तो उस में गोपनीयता की क्या बात थी?

मासिक टैस्ट में उसे कैमेस्ट्री में अच्छे अंक मिलने लगे थे. हालांकि अन्य विषयों में वह कमजोर ही थी. 1-2 बार मैं ने इस बात के लिए उसे टोका भी था, मगर जोर दे कर कुछ नहीं कहा था. क्योंकि कैमेस्ट्री में उसे इंट्रैस्ट नहीं था, लेकिन अचानक इस वर्ष उस का इंट्रैस्ट देख कर मुझे मन ही मन बड़ा भला लगा था.

मेरी नींद पिछले महीने के टैस्ट के परिणाम के बाद भी नहीं खुली थी, अब अंगरेजी और फिजिक्स में उसे बहुत कम अंक मिले थे. उस समय भी मैं ने श्वेता को संबंधित विषयों में ध्यान देने की बस मामूली सी हिदायत ही दी थी.

हालांकि कुशाग्रबुद्धि श्वेता का अन्य विषयों में इतने कम अंक प्राप्त करना चिंता का विषय होना चाहिए था, परंतु मैं ने सोचा कि साल की शुरुआत ही है, धीरेधीरे वह सभी विषयों को गंभीरता से पढ़ने लगेगी. मैं सोचने लगी, क्या इन विषयों में कम अंक आने के कारण ही पुनीत ने मुझे बुलाया है? लेकिन भला उन्हें अन्य विषयों से क्या लेना? उन के विषय कैमेस्ट्री में तो श्वेता के बराबर ही अच्छे अंक आ रहे हैं.

‘विचारों के भंवर में मैं इस कदर डूब गई थी कि छुट्टी होने की घंटी भी मुझे सुनाई नहीं दी. जब क्लास से लड़कियों के झुंड बाहर निकलने लगे, तब मैं चौंकी. उसी समय देखा, सामने से एक युवक मेरी ओर चला आ रहा है.

‘क्या आप मीनाजी हैं?’ उस ने नम्रता से पूछा.

मेरे हां कहने पर उस ने अपना परिचय दिया, ‘मैं, पुनीत हूं. आइए, हम पास वाले कौफीहाउस में कुछ देर बैठें. दरअसल, बात जरा नाजुक है, इस तरह सड़क पर बताना ठीक नहीं होगा.’

‘ठीक है,’ कहती हुई मैं उन के साथ चल दी. इस तरह अनजान व्यक्ति के साथ आना मुझे कुछ अजीब जरूर लग रहा था, पर गए बिना चारा भी नहीं था.

‘बगल में चलते हुए मैं ने पुनीत पर एक निगाह डाली. 6 फुट लंबा कद, गोरा रंग और आंखों पर चढ़ा चश्मा, जो उन के व्यक्तित्व को और भी अधिक प्रभावशाली बना रहा था. उन की आवाज धीर गंभीर थी.

शीघ्र ही हम कौफीहाउस पहुंच गए. कौफी का और्डर दे कर वे कुछ क्षणों के लिए चुप हो गए. चारों ओर नजर दौड़ा कर उन्होंने कमीज की जेब से एक कागज का टुकड़ा निकाल कर मेरी ओर बढ़ाया, ‘पत्र है, श्वेता का, मेरे नाम.’

मैं ने थरथराते हाथों से पत्र ले कर पढ़ा. क्या नहीं था उस में, जन्मजन्मांतर का अटूट संबंध, रातरात भर जागते रहने का इजहार, याद, इंतजार, आरजू और न जाने कैसेकैसे शब्दों से भरा हुआ था वह पत्र.

पत्र पढ़तेपढ़ते मेरे आंसू निकल आए. ऐसा लगा, श्वेता की उच्चशिक्षा संबंधी सारी महत्त्वाकांक्षाओं का अंत हो गया. मेरी स्थिति को पुनीत भांप गए थे. वे कहने लगे, ‘यदि आप होश खो बैठेंगी तो श्वेता का क्या होगा.’

आलसीपन की तोहमत, क्योंकि सब से ज्यादा आलसी माने जाते हैं भारतीय

क्या हम भारतीय कामचोर हैं? क्या यह एक आम भारतीय की आदत है कि वह अलसाया सा रहता है? सरकारी दफ्तरों में तो यह आम नजारा होता है कि कर्मचारी या तो देर से आते हैं, सीट से नदारद मिलते हैं या फिर ऊंघते हुए से दिखाई देते हैं.

हालांकि इधर कुछ वर्षों में देश की कार्यसंस्कृति को ले कर काफी कुछ कहासुना गया है. जैसे, दफ्तरों में बायोमीट्रिक हाजिरी के प्रबंध किए गए हैं, लेकिन जब कभी सरकार के मंत्रियों ने औचक निरीक्षण किया, बहुतेरे कर्मचारियों को अपनी सीट से या तो गायब पाया या फिर उन्हें लेटलतीफी की आदत का शिकार पाया.

बायोमीट्रिक प्रबंधों के बाद भी सरकारी बाबुओं के काम करने की गति में कोई तेजी आई है, यह पता लगाने का कोई सर्वेक्षण तो नहीं हुआ है पर सितंबर 2018 में जब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सैंपल के रूप में दुनिया के 19 लाख लोगों की रोजाना की शारीरिक सक्रियता का अध्ययन कर के रिपोर्ट पेश की, तो भारत के बारे में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए.

वैसे तो विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अंदाजा लगाया है कि इस वक्त दुनिया में करीब 140 करोड़ लोगों की शारीरिक सक्रियता काफी कम है, लेकिन यह रिपोर्ट बताती है कि भारत के 24.7 फीसदी पुरुषों और 43.3 फीसदी महिलाओं को अपने हाथपांव हिलाने में ज्यादा यकीन नहीं है. खेतीप्रधान और मेहनतकश लोगों के देश के रूप में पहचान बना चुके भारत में ऐसी स्थिति का दिखना चिंताजनक तो है ही, इस से हमारी लुंजपुंज होती कार्यसंस्कृति और कामचोरी की प्रवृत्ति भी झलकती है जो घरों से ले कर दफ्तरों तक बेहद आम हो चली है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन से पहले वर्ष 2017 में भारतीयों के आलस्य पर एक टिप्पणी दलाई लामा ने भी की थी. दलाई लामा ने नवंबर 2017 में इंडियन चैंबर औफ कौमर्स ऐंड इंडस्ट्री में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए कहा था कि भारत के लोग चीनियों की तुलना में आलसी हैं.

हालांकि इस के पीछे उन्होंने भौगोलिक या कहें कि जलवायु के कारणों को जिम्मेदार ठहराया था और भारत को सब से ज्यादा स्थिर देश बताते हुए धार्मिक सहनशीलता आदि पैमानों पर इस की तारीफ की थी, लेकिन जीवनशैली और कार्यसंस्कृति के जिस पहलू की तरफ उन्होंने भारतीयों को आलसी बताते हुए इशारा किया, वह गंभीर बात है.

यह समझना होगा कि आखिर इन टिप्पणियों के माने क्या हैं और क्यों भारत की छवि एक आलसी व लेटलतीफ देश के रूप में बनी हुई है. भारत और चीन के बीच कई मानों में तुलना होती ही रहती है, चीन व भारत की आर्थिक उन्नति, सैन्य क्षमताओं और राजनीतिक समझबूझ को अकसर तोला जाता है पर दलाई लामा की टिप्पणी ने भारतीयों को चीनियों के मुकाबले कमतर साबित किया.

उल्लेखनीय बात यह रही कि इस टिप्पणी के बावजूद देश, सरकार या जनता के स्तर पर कोई ज्यादा हलचल नहीं मची अन्यथा चीनभारत के बीच किसी भी तुलना पर देश में तूफान खड़ा कर दिया जाता है. इस से प्रतीत होता है कि सरकार और समाज दोनों को अपने आलसीपन और उस की खूबियों के बारे में अच्छी तरह से पता है.

कई सर्वेक्षण हैं आधार

पहले भी कुछ अध्ययनों में भारतीयों के आलस के ऐसे ही तथ्यों का खुलासा हो चुका है. जैसे, जुलाई 2017 में अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने दुनिया के 7 देशों के करीब 46 लाख लोगों की कदमताल पर नजर रख कर जो नतीजे निकाले थे, उन में 46 देशों की लिस्ट में भारत 39वें स्थान पर आया था. इस अध्ययन के मुताबिक एक औसत भारतीय प्रतिदिन सिर्फ 4,297 कदम चलता है, जबकि भारतीयों के मुकाबले चीन और हौंगकौंग के नागरिक ज्यादा सक्रिय पाए गए थे.

इन दोनों देशों के लोग हर दिन औसतन 6,880 कदम पैदल चलते हैं. काम करने के दिनों और छुट्टी लेने की अवधि के आधार पर भी दिल्ली व हौंगकौंग के नागरिकों में अंतर पाया गया. इस तुलना में देखा गया कि दिल्ली में एक औसत नागरिक साल में औसतन 2,214 घंटे काम करता है और साल में 26 दिनों की छुट्टी शनिवाररविवार व सार्वजनिक अवकाशों के अलावा लेता है.

इस के उलट, हौंगकौंग के लोग सब से कम छुट्टियां लेने और ज्यादा काम करने वालों के रूप में पहचाने जाते हैं. यहां के लोग औसतन हर हफ्ते 50 घंटे से ज्यादा काम करते हैं और साल में सिर्फ 17 दिनों की अतिरिक्त छुट्टी लेते हैं.

हम से भी ज्यादा आलसी

हालांकि दुनिया में कुछ हम से भी ज्यादा आलसी लोग हैं. पैदल चलने के मामले में इंडोनेशिया के लोग सबसे ज्यादा सुस्त पाए गए, जो प्रतिदिन औसतन सिर्फ 3,513 कदम पैदल चलते हैं. लेकिन इंडोनेशिया के लोगों का हम से भी ज्यादा सुस्त होना हमारे लिए किसी संतुष्टि की बात तो नहीं होनी चाहिए.

उल्लेखनीय है कि जब यह अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल ‘नेचर’ में प्रकाशित किया गया तो इसे ले कर भारत समेत कई देशों की कार्यसंस्कृति पर चर्चा छिड़ी थी. ध्यान रहे कि इस लिस्ट के मुताबिक, वैश्विक औसत 4,961 कदम चलने का है. इस में अमेरिकियों, यूक्रेन, जापान, हौंगकौंग के लोग पैदल चलने के मामले में भारत से बेहतर पाए गए थे, लेकिन सऊदी अरब और इंडोनेशिया के लोग सब से सुस्त कतार में थे. इन्हीं के बीच मौजूद मलयेशिया में पैदल चलने का औसत 6 हजार कदम पाया गया, जो एक मिसाल पेश करता है.

महिलाएं और भी सुस्त

वैसे तो महिलाओं के बारे में कोई भी टीकाटिप्पणी गलत मानी जाती है पर इस वैश्विक सर्वेक्षण से यह भी साफ हुआ था कि पुरुषों के मुकाबले भारतीय स्त्रियां और भी सुस्त होती जा रही हैं.

भारतीय महिलाएं अब पैदल चलने से परहेज करने लगी हैं जिस कारण उन में मोटापे की समस्या गंभीर होती जा रही है. वजह यह है कि भारतीय महिलाओं (शहरी और कसबाई) का ज्यादातर घरेलू कामकाज या तो मशीनों के हवाले हो गया है या फिर कामवाली बाई या महरी के हाथों में चला गया है.

हालांकि गांवकसबों की महिलाएं शहरी स्त्रियों के मुकाबले ज्यादा काम करती हैं, लेकिन टीवीवाशिंग मशीनों की लत उन्हें भी लग गई है, जिस कारण उन के जीवन में भी शारीरिक श्रम के मौके कम होते जा रहे हैं. इधर के वर्षों में उन के खानपान में भी कुछ ऐसे बदलाव हुए हैं, जिन्हें महिलाओं के आलस्य और मोटापे के लिए जिम्मेदार माना जा सकता है.

शहरों में पिज्जाबर्गर व चिप्स जैसे खानपान तेजी से प्रचलन में आए हैं और भारतीय शैली के वे खानपान हाशिए पर चले गए हैं जो आसानी से पच कर ऊर्जा में बदल जाते थे और शरीर पर अतिरिक्त चरबी नहीं बढ़ाते थे. इस का नतीजा यह है कि दुनिया में भूखे पेट सोने वालों के मुकाबले मोटे लोगों का प्रतिशत दोगुना होने का जो अनुमान खानपान और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर काम करने वाले एनजीओ औक्सफैम ने जनवरी 2014 में लगाया था, उस में एक बड़ा हिस्सा मोटी महिलाओं का हो सकता है.

खानपान में हुई तबदीली से महिलाओं में जो मोटापा बढ़ रहा है, उस की कुछ प्राकृतिक वजहें भी हैं जिन्हें अगर समझ लिया जाए तो स्त्रियों को हार्ट अटैक, डायबिटीज और कैंसर आदि जैसे रोगों को पैदा करने वाले मोटापे से निबटने में आसानी हो सकती है. असल में, महिला और पुरुष शरीर की बनावट में कुछ बुनियादी फर्क होते हैं और इस के लिए हार्मोंस जिम्मेदार होते हैं.

शारीरिक श्रम का सेहत से रिश्ता

वैसे तो स्वास्थ्य के नजरिए से पैदल चलने का महत्त्व है और इस पैमाने पर भारतीयों को आलसी ठहराने वाली रिपोर्ट हमारे लिए एक चेतावनी है, पर ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह सुस्ती हमारी पूरी जीवनशैली और कार्यसंस्कृति में समाई हुई है और इसलिए यह सिर्फ एक टिप्पणी नहीं, बल्कि चेतावनी भी है.

दलाई लामा ने जो बात हलकेफुलके अंदाज में कह दी है, अगर उस टिप्पणी के मर्म को समझेंगे, तो पता चलेगा कि इस की गंभीरता को समझते हुए हमें क्यों अपनी कार्यसंस्कृति में बदलाव को ले कर तुरंत सतर्क हो जाने की जरूरत है.

इस चेतावनी का सब से अहम पहलू शारीरिक परिश्रम से जुड़ा है जिस की भारतीय जीवन में जबरदस्त अनदेखी हो रही है. इस में महिलाओं और पुरुषों की ही नहीं, बल्कि बच्चों की बदलती जीवनशैली के लिए भी संकेत निहित हैं.

शेष विश्व के मुकाबले को छोड़ दें, तो भी चीन के नागरिकों से तुलना में ही भारतीयों को आलसी साबित करने वाले सर्वेक्षणों में सचाई इसलिए नजर आती है, क्योंकि हाल के दशकों में देश में हुए सामाजिकआर्थिक विकास के कारण बहुत से कामकाज मशीनों के हवाले कर दिए गए हैं.

हमारे देश और समाज की आर्थिक उन्नति तेज शहरीकरण के रूप में दिखती है, जहां आधुनिक सुखसुविधाओं में काफी ज्यादा बढ़ोतरी हुई है. एक आम सहूलियत लोगों को यह मिली है कि उन के पास जो पैसा आया, उस से ज्यादातर परिवारों ने अपने लिए कार खरीदी. कारों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और अब लोग सब्जीमंडी तक आनेजाने में भी कारों का बढ़चढ़ कर इस्तेमाल करने लगे हैं.

शहरों में बढ़ते ट्रैफिक जाम और प्रदूषण के पीछे हर साल कारों की संख्या में वृद्धि होना ही है. पहले लोग आसपास के बाजारों तक या तो पैदल जाते थे या खुद की साइकिल का सहारा लेते थे. पर अब तो बाजार खुद लोगों के घरों में आ पहुंचा है. जूते, कपड़े, इलैक्ट्रौनिक्स सामानों से ले कर फलसब्जी तक, ऐसा क्या है जिसे औनलाइन नहीं खरीदा जा सकता. ऐसे में अधिक से अधिक कसरत आंखों और हाथ की उंगलियों की ही होती है वरना लोग हाथपांव हिलाए बिना कुरसी पर टीवी के सामने जमे रहते हैं. कहीं कोई चलनेफिरने का दबाव नहीं, जरूरत नहीं.

यह सही है कि मैडिकल साइंस की बदौलत इंसान की औसत उम्र में इजाफा हो रहा है, लेकिन लोग ऐसी बीमारियों से ग्रस्त होने लगे हैं जिन्हें जीवनशैली की बीमारियां (लाइफस्टाइल डिजीजेज) कहा जाता है, जैसे मोटापा, रक्तचाप व दिल की बीमारियां.

वर्ष 2017 में एक मैडिकल जर्नल में प्रकाशित अध्ययन ‘ग्लोबल बर्डन औफ डिजीज’ में कहा गया कि अमेरिका जैसे अमीर देशों के लोग यह समझने लगे हैं कि सेहत कितनी जरूरी है, इसलिए वे शारीरिक श्रम को महत्त्व देने लगे हैं, लेकिन भारत जैसे देशों में यह बात समझी नहीं जा रही. लिहाजा, गरीब और विकासशील देशों में अमीर मुल्कों की तुलना में लोग ज्यादा दिन बीमार रहते हैं.

इसी तरह ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दुनिया की एक बड़ी आबादी मेहनत, कामकाज और व्यायाम से कोसों दूर चली गई है, जिस के कारण दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ता जा रहा है. खासतौर से शहरी जीवन एक मुसीबत ही पैदा कर रहा है. शहरों में रसोई का सारा कामकाज मशीनों और महरी आदि घरेलू सहायकों के जिम्मे छोड़ कर कार से दफ्तर जाने वाली महिलाएं दिनभर कंप्यूटर पर काम करने के बाद थक कर घर आती हैं, तो उन्हें लगता है कि उन्होंने एक व्यस्त जीवनशैली जी है. पर सचाई यह है कि इस तरह वे औसतन एक साल में 74 दिन कुरसी पर बैठे हुए बिता रही हैं.

भारत, जहां ज्यादातर महिलाओं के सामने अभी दफ्तर जाने की चुनौती ज्यादा नहीं है, में वे इस श्रम से भी बच जाती हैं. वहीं वाशिंग मशीनें और आरामतलबी के दूसरे साधन उन्होंने भी हासिल कर लिए हैं. ऐसे में उन की ज्यादातर व्यस्तता टीवी के सामने बैठ कर परिवार के साथ होती है, जिस में शारीरिक श्रम कहीं पीछे छूट जाता है.

सुस्ती से आती बीमारी

यूनिवर्सिटी औफ वाशिंगटन के इंस्टिट्यूट फौर हैल्थ मीट्रिक्स ऐंड इवैलुएशन’ के निदेशक क्रिस्टोफर मूर के अनुसार, व्यक्ति हों या देश, वे बीमारियों का इलाज यह सोच कर कराते हैं कि किसी तरह जान बची रहे. पर हम उन कारकों की ओर नहीं देखते जो बीमारी पैदा करते हैं या हमारे सहज और स्वस्थ जीवन में रुकावट पैदा करते हैं.

असल में आज मोटापा और मनोरोग जैसी समस्याएं हमारी बेहतर लाइफस्टाइल में बाधक हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, भारत में औसतन कुल आबादी का 34 फीसदी हिस्सा अपनी सेहत ठीक रखने के लिए बहुत ही कम कोशिश करता है. इतनी कम कि दिल की बीमारियां, हाइपरटैंशन, स्तन और आंतों का कैंसर, डिमैंशिया और टाइप-2 डायबिटीज जैसी बीमारियां या तो उन्हें अपनी चपेट में ले चुकी हैं या लेने को आतुर हैं.

शारीरिक निष्क्रियता के मामले में यह अध्ययन भारत को दुनिया में 52वें पायदान पर दिखा रहा है, जबकि पड़ोसी देश चीन, पाकिस्तान, नेपाल और म्यांमार के लोग अपने स्वास्थ्य का हम से अधिक ध्यान रख रहे हैं. इस से पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह अध्ययन वर्ष 2001 में किया था और तब भारत का निष्क्रियता औसत 32 फीसदी था यानी पिछली बार के मुकाबले इस बार सेहत के प्रति भारतीय चेतना 2 फीसदी और नीचे आ गई है.

समस्या युवाओं को ले कर ज्यादा है. हर वक्त मोबाइल में घुसे रहने वाले हमारे देश के युवा अपने स्वास्थ्य को ले कर बिलकुल सजग नहीं हैं. सरकार भी इस बारे में ध्यान नहीं दे रही है. स्वास्थ्य पर हमारी सरकार अपनी जीडीपी का महज 1.25 फीसदी ही खर्च करती है, जबकि पड़ोसी देश चीन इस मद में करीब 7-8 फीसदी खर्च कर देता है.

हालांकि इस मामले में सीधे सरकार को भी दोष नहीं दे सकते, क्योंकि अपनी सेहत का खयाल रखना, अपने शरीर को काम करने लायक बनाए रखना सब से पहले इंसान की निजी जिम्मेदारी है. बुजुर्ग यह जिम्मेदारी कैसे भी कर के निभा लेते हैं, लेकिन मोबाइल फोन और लैपटौप पर बिजी रहने वाले युवाओं में नियमित कसरत करने, घूमनेटहलने की प्रवृत्ति काफी कम देखी जा रही है.

मुख्य बात यही है कि ये बीमारियां हमारी सुस्ती या आलस की ही देन हैं. ऐसे में हमारा फोकस इस बात पर होना चाहिए कि हम इन से बचें और जितना संभव हो, सक्रिय, प्रसन्न और जीवंत बने रहें. वैज्ञानिकों और हाल में दलाई लामा की चेतावनी का साफ इशारा है कि हमें अपनी जीवनशैली बदलनी चाहिए.

कैसे संभालें जिद्दी बच्चे

8 साल का अंकुर हर चीज के लिए जिद कर बैठता और वही काम करता, जिस काम के लिए उसे मना किया जाता. स्कूल से भी आएदिन उस की शिकायतें आती रहतीं. कभी किसी बच्चे को मारता, तो कभी किसी बच्चे के लंचबौक्स से नाश्ता चुरा कर खा लेता.

सजा के  तौर पर जब उसे क्लास से बाहर निकाल दिया जाता, तो अपनी गलती मानने के बजाय वह खेलने लग जाता. जब स्कूल में बुला कर प्रिंसिपल उस की शिकायत करतीं तब इस बात के लिए उस के मांपापा को काफी शर्मिंदगी उठानी पड़ती थी.

डांट कर, मार कर कई तरीकों से उसे समझाया गया, वह तो दिनप्रतिदिन और भी जिद्दी होता जा रहा था. जब उस पर और सख्ती की जाती, तो वह चीखनेचिल्लाने लगता. घर का सामान उठाउठा कर फेंकने लगता था. अब तो एक और बात सीख ली थी उस ने. चाकू उठा कर अपने हाथ की नसें काटने लगता जब उसे किसी काम को करने से रोका जाता या उस की जिद पूरी नहीं की जातीं तब. डराता था अपने मातापिता को कि वह आत्महत्या कर लेगा.

वहीं 6 साल के दक्ष का भी यही हाल है. उस की मां कहती है कि वह इतना ढीठ बन चुका है कि अब उस पर न तो बातों का और न ही मार का कोई असर होता है. उस के पापा दूसरे शहर में रहते हैं, इसलिए वह बेटे पर ज्यादा सख्ती नहीं बरतती और शायद इसीलिए वह इतना ढीठ और बदतमीज हो गया है.

यह सिर्फ अंकुर और दक्ष के मातापिता की समस्या नहीं है, बल्कि हर मातापिता को कभी न कभी अपने बच्चों के जिद्दी स्वभाव का सामना करना ही पड़ता है. जिद्दी बच्चे को संभालना पेरैंट्स के लिए सब से बड़ी चुनौती बन जाती है. ऐसे में कई मातापिता झुंझलाहट से भर उठते हैं और गुस्से में वे अपने बच्चे पर हाथ उठाते हैं, लेकिन इस से स्थिति और बिगड़ जाती है.

पेरैंट्स की गलतियां दिनप्रतिदिन भारी पड़ती चली जाती हैं और बच्चा पूरी तरह से मातापिता के नियंत्रण से बाहर हो जाता है.

बच्चों को नहीं समझते पेरैंट्स

एक शोध के अनुसार, 91 प्रतिशत पेरैंट्स अपने बच्चों को समझ नहीं पाते, जिस से उन के और बच्चों के बीच एक गैप आ जाता है और बच्चों का रवैया जिद्दी व उद्दंड होता चला जाता है. वे बदतमीज, दुखदाई बनने लगते हैं. यहां दोष मातापिता का भी है, क्योंकि वे अपने बच्चों की छोटीमोटी बातों को सुनतेसमझते नहीं, बल्कि बच्चा समझ कर उस की बातों की अनसुना कर देते हैं जिस से बच्चे को लगने लगता है मातापिता उस से प्यार नहीं करते. जिस तरह मातापिता बच्चों के स्वास्थ्य की देखभाल करते हैं, उसी तरह उन्हें उन की बातों, भावनाओं को समझना है. बच्चों की शैक्षणिक शिक्षा, सेहत की देखभाल के साथसाथ उन्हें नैतिक शिक्षा, अनुशासन, सही व्यवहार, सहीगलत में अंतर जैसे पहलुओं से अवगत कराना भी है.

आइए, जानते हैं कि जिद्दी बच्चों की परवरिश कैसे करें कि वे समझदार बन सकें.

तर्क सिखाइए : सब से महत्त्वपूर्ण बात यह है कि बच्चों को तर्क का महत्त्व सिखाना. हम कहते हैं इसलिए ऐसा करो की जगह ऐसा करना ही ठीक है, समझाइए. हमारे समाज में लकीरों को पीटने की शिक्षा दी जाती है और कोई कार्य क्यों किया जाए या न किया जाए, यह न जानने की कोशिश करते हैं, न समझने की, न ही समझाने की. बच्चों को सही राह दिखाने के लिए उन की तर्कशक्ति बढ़ाएं. वे क्यों का उत्तर देना सीखें.

शिष्टाचार : मातापिता को शिष्टाचार विशेषरूप से पहले खुद सीखने की जरूरत है, क्योंकि बच्चे जैसा अपने पेरैंट्स को करते देखते हैं वैसा ही वे दोहराते हैं. इसलिए बच्चों के सामने कभी कोई ऐसी बात न कहें जो शिष्टता से परे हो और बच्चों के सामने कभी अपना गुस्सा प्रदर्शित न करें.

दूर रखना : जहां तक हो अपने बच्चे को ऐसे इंसानों से दूर रखें, जिन्हें अपने गुस्से पर कंट्रोल नहीं रहता और जिन्हें बात करने का सलीका न आता हो. थोड़ीबहुत शरारत करना बच्चों का स्वभाव होता है. इस के लिए उन्हें किसी भी प्रकार का शारीरिक दंड न दें, नहीं तो वे और उद्दंड हो जाएंगे. मातापिता का अटैंशन पाने के लिए कभीकभार बच्चा झूठा गुस्सा दिखाने लगता है, तो उस के बदले व्यवहार को समझें और प्यार से उसे समझाएं.

गुस्सा : कोईकोई बच्चा बहुत जिद्दी और आक्रामक होता है. गुस्सा हर वक्त उस की नाक पर सवार होता है, तो ऐसे बच्चे को कंट्रोल कर के रखें, नहीं तो कहीं ऐसा न हो कि वह किसी और को नुकसान पहुंचा दे. बच्चों के प्रति अपना प्यार दर्शाते रहें.

उन्हें सुनें, बहस न करें : अगर आप चाहते हैं कि आप का बच्चा आप को सुने, आप की बात माने, तो पहले खुद आप को उस की बात ध्यान से सुननी होगी. मजबूत इच्छाशक्ति वाले बच्चों की राय बहुत मजबूत होती है और कई बार वे अपने पेरैंट्स से बहस करने लगते हैं. अगर आप उन की बातें नहीं सुनेंगे तो वे और जिद्दी बन जाएंगे. अगर बच्चे को यह लगने लगता है कि उस की बातों को महत्त्व नहीं दिया जा रहा है, तो वह धीरेधीरे आप की हर बात को दरकिनार करना शुरू कर देगा.

जबरदस्ती न करें : जब आप बच्चों के साथ किसी भी चीज को ले कर जबरदस्ती करते हैं, तो वे स्वभाव से विद्रोही बनते जाते हैं. उस समय तो जबरदस्ती करने से आप को उस समस्या का अस्थायी समाधान मिल जाता है, लेकिन आगे के लिए खतरनाक होता चला जाता है. बच्चों के साथ जबदरस्ती करने से वे वही करते हैं जिस बात के लिए उन्हें रोका जाता है. जहां तक हो सके आप अपने बच्चों के साथ कनैक्ट होने की कोशिश करें. जब बच्चा टीवी देखने की जिद करे, तो उसे मना करने के बजाय इस चीज की दिलचस्पी दिखाएं और कहें कि चलो, साथ बैठ कर टीवी देखते हैं. जब आप बच्चों की चीजों में दिलचस्पी दिखाएंगे, तो वे आप के प्रति और ज्यादा जवाबदेह बनते जाएंगे.

बच्चे को विकल्प दीजिए : बच्चों का अपना दिमाग होता है और वे वही करते हैं जो उन का दिमाग उसे करने को कहता है. अगर आप बच्चे को कहेंगी कि वह 9 बजे तक बैड पर चला जाए, तो इस बात में कोई शक नहीं कि वह आप की बात को अनसुना कर खेलता या टीवी ही देखता रहे. इसलिए आदेश देने के बजाय, बच्चे को विकल्प दें. उन से पूछें कि आज वह कौन सी कहानी सुनना पसंद करेगा. अगर इस पर भी बच्चा रिऐक्ट न करे, तो धैर्य न खोएं, उसे प्यार से समझाएं, वह जरूर मान जाएगा.

शांत रहें : अगर आप हर बात पर अपने बच्चे पर चिलाएंगी, तो शायद डरने के बजाय वह पलटवार करे और वह भी आप से उसी अंदाज में बात करे. बच्चे को सुधारने से पहले अपने व्यवहार पर नियंत्रण रखना सीखें. आप बड़े हैं, इसलिए बच्चों की तरह बरताव न करें. याद रखें कि प्यार से आप को जिद्दी बच्चे को सही राह पर लाना है, न कि खुद भी भटक जाना है.

बच्चों का सम्मान करें : अगर आप चाहते हैं कि आप के बच्चे आप के फैसले का सम्मान करें, तो आप को भी उन का सम्मान करना होगा. उन से सहयोग मांगें, न कि आदेश दें. बच्चों की भावनाओं और विचारों को सुनें, तुरंत खारिज न कर दें.

उन के साथ काम करें : यह भी सच है कि जिद्दी बच्चे या अडि़यल रवैए वाले बच्चे बहुत संवेदनशील होते हैं और वे इस बात को बहुत गहराई से महसूस करते हैं कि आप उन के साथ कैसा बरताव करते हैं. इसलिए अपनी टोन, बौडी लैंग्वेज, अपने शब्दों को ले कर खास सावधानी बरतें. जब बच्चों को मातापिता का व्यवहार अच्छा नहीं लगता, तो वे खुद को बचाने के लिए वैसी ही भाषा का उपयोग करने लगते हैं. मतलब, बच्चे विद्रोही हो जाते हैं. बच्चों से काम डांटडपट कर नहीं, बल्कि प्यार से, मजेदार तरीके से करवाएं. ऐसे तरीके कारगर साबित होते हैं.

बाजी : कई बार अपने बच्चों के साथ समझौता करना भी जरूरी होता है. जब बच्चों को अपने पसंद की चीजें नहीं मिलतीं, तो वे जिद करने लगते हैं वही चीज पाने को. लेकिन इस का यह मतलब नहीं कि आप उन की हर मांग को मान लें. सूझबूझ और व्यावहारिक हल निकालें. उदाहरण के तौर पर, उस से कहें कि ठीक है तुम कुछ देर बाद सोना, थोड़ी देर और खेल सकते हो.

टीचर को दोष न दें : अकसर पेरैंट्स बच्चे के अडि़यल और ढीठ स्वभाव के लिए स्कूलटीचर को भी कठघरे में खड़ा कर देते हैं. इस बात को समझें कि बच्चे के ऐसे व्यवहार के लिए पूरी तरह से टीचर ही दोषी नहीं है, बल्कि आप भी जिम्मेदार हैं. अगर आप चाहें तो टीचर से मिल कर बच्चे को सुधारने के टिप्स ले सकते हैं. ऐसे बच्चे को फिजिकल ऐक्टिविटी व अन्य शार्पमाइंड गेम्स में डालें ताकि वह बिजी रहे और गलतसलत जिद न करे.

बच्चा जो कुछ सीखता है यहां ही, अपने परिवार, दोस्तों से सीखता है. इसलिए बच्चे की गलती पर, बिना कोई कठोर दंड दिए उसे प्यारे से सभ्य, शिष्ट, और अनुशासित बनाएं. यह मातापिता और शिक्षक पर निर्भर करता है कि वे बच्चे को कैसे शिष्ट बनाएं.

ऐसे में बाल मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि दृढ़ संकल्प और जिद्दीपन के बीच के अंतर को समझें. दृढ़ संकल्प का अर्थ उद्देश्य की दृढ़ता है. जिद्दीपन को कुछ करने या विशेष तरीके से कार्य करने के लिए एक दृढ़ संकल्प के रूप में परिभाषित किया जाता है. जिद्दीपन से किसी बाहरी दबाव के बावजूद किसी के विचार, व्यवहार या कार्यों को बदलने से इनकार कर दिया जाता है. बच्चों का जिद्दीपन आनुवंशिक भी हो सकता है.

डिजिटल मीडिया से टूटते परिवार

केस नंबर 1 : ‘मुझे ऐसा पति चाहिए जो फेसबुक, व्हाट्सऐप जैसे डिजिटल मीडिया का एडिक्ट न हो.’ मुंबई के एक नामी अस्पताल में काम करने वाली लड़की ने अखबार में अपने लिए दिए गए वैवाहिक विज्ञापन में यह लिखा.

लड़की के परिवार के लोगों ने जब इस बारे में उस से पूछा तो वह बोली, ‘‘मैं ने अपने साथ काम करने वाली कई सहेलियों के पतियों को देखा है कि वे औफिस से आते ही अपने मोबाइल में बिजी हो जाते हैं. इस से पतिपत्नी के बीच के स्वाभाविक रिश्ते प्रभावित होने लगे हैं. हर दिन लड़ाईझगड़ा होता है.

ऐसे में मोबाइल सौतन सा दिखता है. मैं ऐसा नहीं चाहती, इसलिए मोबाइल एडिक्ट पति नहीं चाहती हूं.’’ बडे़ शहरों के वैवाहिक विज्ञापनों में अब ऐसी शर्तें लिखी जाने लगी हैं.

केस नंबर 2 : लखनऊ के परिवार परामर्श केंद्र में रेखा नामक महिला ने शिकायत दर्ज कराई कि उस के पति दिनभर मोबाइल पर व्यस्त रहते हैं. इस बात को ले कर उन का कई बार झगड़ा भी हो चुका है. एक बार गुस्से में आ कर पति ने मोबाइल तोड़ दिया. इस वजह से दोनों में मारपीट भी हुई. मोबाइल के चक्कर में उन के बीच पतिपत्नी के संबंध प्रभावित हो रहे हैं.

पति का परिवारिक बातों से कोई मतलब नहीं रह गया. औफिस से आने के बाद वे मोबाइल ले कर घर के एक कोने में बैठ जाते हैं, न किसी नातेरिश्तेदार से मिलने जाते हैं, और न किसी पड़ोसी से, मोबाइल में बस चैटिंग करते रहते हैं. इस से मैं बहुत परेशान हूं. रेखा ने परिवार परामर्श केंद्र में यह गुहार लगाई कि उस के पति को समझाया जाए, ताकि वे मोबाइल का इतना इस्तेमाल न करें.

केस नंबर 3 : एक प्रतिष्ठित स्कूल में कक्षा 6 में पढ़ने वाला बच्चा रमन होमवर्क कर के नहीं लाता था. उस की टीचर बारबार स्कूल की डायरी में पेरैंट्स को इस बारे में लिखती थी. इस के बाद भी सुधार नहीं हो रहा था. रमन लगातार चिड़चिड़ा होता जा रहा था.

क्लासटीचर ने स्कूल में काउंसलर के पास रमन को भेजा. काउंसलर ने जब रमन से पूछा तो उस ने बताया कि स्कूल में कुछ विषय उस को समझ नहीं आते हैं. वह घर में यह बात बता चुका है. लेकिन घर वाले ट्यूशन नहीं लगवाना चाहते.

पिछले साल तक मम्मीपापा पढ़ाते थे. अब इस साल वे लोग एकदूसरे पर पढ़ाने की बात टालते रहते हैं. वे दोनों ही मुझे होमवर्क कराने की जगह अपने मोबाइल में बिजी रहते हैं. स्कूल कांउसलर ने जब रमन के पेरैंट्स को बुलाया और उन से यह बात कही तो वे लोग इस बात पर राजी हो गए कि वे रमन का ट्यूशन लगा देंगे. आगे से टीचर को शिकायत का कोई मौका नहीं मिलेगा.

केस नंबर 4 : पुरुष बांझपन का इलाज और कांउसलिंग करने वाले डाक्टर के पास अपने इलाज के लिए एक दंपती आया. शादी के 2 वर्षों बाद भी उन को बच्चा नहीं हो रहा था.

शुरुआती बातचीत में डाक्टर को पता चला कि पतिपत्नी के बीच शारीरिक संबंध बहुत जल्दी में बनते थे. ऐसे में शारीरिक संबंधों से मिलने वाला मानसिक सुख उन को कभी महसूस ही नहीं हुआ. सबकुछ केवल मशीनी अंदाज में होता था. डाक्टर ने जब उन की लाइफस्टाइल को समझा तो पाया कि देररात तक दोनों मोबाइल पर व्यस्त रहते हैं. जबतब सैक्स की इच्छा होते ही संबंध बन जाते हैं. डाक्टर ने पाया कि जिस प्यार और मनुहार के बीच पतिपत्नी में शारीरिक संबंध बनने चाहिए वैसे नहीं बन पा रहे हैं.

ऐसे में डाक्टर ने उन दोनों से कहा कि वे शाम को 8 बजे के बाद मोबाइल को खुद से दूर कर दें. लगातार 15 दिनों तक ऐसा करने के बाद जब वे फिर से काउंसलिंग के लिए आए तो उन को अपने में फर्क महसूस हुआ. दोनों ने ही कहा कि अब वे पहले के मुकाबले काफी खुश हैं और दांपत्य जीवन का सुख उठा रहे हैं. उन की सैक्सलाइफ पहले से बेहतर हो गई है.

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बढ़ रही घटनाएं

ऐसे तमाम केस हैं. कई लोग इन परेशानियों को ले कर अपने में ही घुटते रहते हैं. कई लोग इस से बचाव के रास्ते तलाश करते काउंसलर से मिलने लगे हैं.

एक स्कूल में काम करने वाली काउंसलर बताती है, ‘‘हमारे पास बच्चे ऐसी बहुत सारी शिकायतें ले कर आते हैं जिन में वे बताते हैं कि उन के पेरैंट्स उन को तो सोशल मीडिया से दूर रहने की बात कहते हैं पर खुद उन के सामने मोबाइल में ही लगे रहते है. ऐसे में उन का मन पढ़ने में नहीं लगता.’’

कक्षा 4 में पढ़ने वाले दिव्य ने अपनी टीचर को बताया कि उस की मम्मी खुद मोबाइल ले कर उस के पास बैठ जाती हैं और उस से कहती हैं कि तुम चुपचाप पढ़ाई करो. ऐसे में उस का मन पढ़ाई में नहीं लगता. वह बारबार मोबाइल और मम्मी के चेहरे के बदलते हावभाव देखता रहता है.

मनोविज्ञानी डा. मधु पाठक कहती हैं, ‘‘बच्चे के सामने जिस चीज का प्रयोग किया जा रहा हो उसी के लिए उस को मना करना ठीक नहीं होता. ऐसे में बच्चा यह सोचता है कि जो काम मम्मीपापा कर रहे हैं, उस के लिए वे हमें क्यों मना कर रहे हैं? यह सोच कर बच्चा चोरीछिपे उस काम को करने लगता है. जिन घरों में नशा किया जाता है वहां के बच्चे नशे से दूर नहीं रह पाते हैं.

‘‘देशविदेश में तमाम फोरमों से यह बात रिसर्च के बल पर कही जा चुकी है. यही बात मोबाइल के बारे में भी सही है. मोबाइल में फेसबुक और व्हाट्सऐप का बहुत ज्यादा प्रयोग भी एकतरह का एडिक्शन ही बन जाता है. ऐसे में जब मम्मीपापा सोशल साइट्स का प्रयोग करेंगे तो बच्चे कैसे दूर रह सकेंगे? यह बात पेरैंट्स को सोचनी चाहिए.’’

झगड़े की शुरुआती वजह

अधिवक्ता शिवा पांडेय कहती हैं, ‘‘पतिपत्नी के बीच लड़ाईझगडे़ की शुरुआत आजकल सोशल मीडिया के प्रयोग से हो रही है. धीरेधीरे मामला बढ़ने लगता है. तब मारपीट  की नौबत आ जाती है.

लखनऊ निवासी एक लड़की अपना बिजनैस करती थी. इस बीच एक लड़के से उस को प्यार हो गया. लड़की प्यार में पागल हो गई. 6 महीने में ही दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया. शादी से पहले प्रीवैडिंग शूट में दोनों ही किसी फिल्मी कलाकार की तरह नजर आए. दोनों के बीच प्यार सभी को दिख रहा था. शादी के बाद दोनों मुंबई घूमने गए. वहां से वापस आते ही दोनों में अनबन शुरू हो गई. लड़की ने अपने उत्पीड़न की बात कही और महिला थाने में मुकदमा दर्ज करवा दिया.

झगड़े की शुरुआत की बात करते हुए लड़की ने बताया कि जब वह सो जाती थी, तो पति जाग कर रातरातभर न जाने किसकिस से चैटिंग करता रहता था. जब इस के लिए उसे मना किया तो झगड़ा शुरू हो गया. कुछ ही माह पहले जिस लड़के के लिए लड़की के मन में प्यार दीवानगी की हद को पार कर चुका था वह अब मन से उतर चुका था. पुलिस ने दोनों के बीच शुरुआती दौर में समझौता करा दिया. पर दोनों के ही मन में एक गांठ पड़ चुकी है, जो कभी भी बिगड़ सकती है.’’

शिवा पांडेय आगे कहती हैं, ‘‘मोबाइल की नजदीकी करीबी रिश्तों में दूरी पैदा कर रही है. ऐसे में जरूरी है कि मोबाइल का सही और उचित उपयोग किया जाए. सोशल मीडिया की दीवानगी हद पार करेगी तो परेशानियां बढ़ेंगी और आपसी रिश्ते खराब होंगे.’’

बढ़ रही अनिद्रा की बीमारी

डा. गिरीश मक्कड़ कहते हैं, ‘‘इंसान के मन पर मोबाइल की स्क्रीन का ही नहीं बल्कि टीवी, लैपटौप और कंप्पूटर की स्क्रीन का भी गहरा प्रभाव पड़ता है.

यह इंसान की स्वाभाविक नींद को दूर कर देती है. ऐसे में वह अनिद्रा का रोगी हो जाता है. सो, जरूरी है कि वह सोने के कम से कम 2 घंटे पहले इन सभी स्क्रीनों से दूर हो जाए. टीवी, लैपटौप और कंप्यूटर से दूर होना सरल होता है, पर मोबाइल से दूर होना सरल नहीं होता. यह हमेशा औन रहता है. सोशल मीडिया पर आने वाले नोटिफिकेशन के समय यह आवाज भी करता है. ऐसे में नींद चली जाती है. कई बार हमारी आदत में यह शामिल हो जाता है कि जब भी हम रात में जगते हैं तो मोबाइल को देख लेते हैं. एक बार मोबाइल खोलते ही उस को पढ़ने का लोभ मन में आ जाता है, जिस से नींद में खलल पड़ता है. ऐसे में यह साफ है कि टीवी, लैपटौप और कंप्यूटर के मुकाबले मोबाइल ज्यादा खतरनाक है.

‘‘पहले अनिद्रा का रोग बड़ी उम्र के लोगों में ही देखा जाता था. अब कम उम्र के लोगों में भी यह रोग देखा जाने लगा है. 25 साल की उम्र की लड़केलड़कियां भी इस परेशानी में शामिल हैं. जब लोग मोबाइल से दूरी बना लेते हैं तो उन की अनिद्रा की बीमारी दूर हो जाती है.

‘‘पहले किताबें पढ़ने का दौर था. ऐसे में तमाम लोग मानसिक शांति के लिए अपनी रुचि के अनुसार किताबे पढ़ते थे. अब किताबें पढ़ने का चलन खत्म हो गया है.’’

कंसल्टैंट साइकोलौजिस्ट डा. नेहाश्री श्रीवास्तव कहती हैं, ‘‘मोबाइल की आदत मन को उलझा देती है. सोशल मीडिया पर तमाम ऐसे विचार आते हैं जहां पर मन प्रतिक्रिया देने को कहने लगता है.

ऐसे में मन चेतन अवस्था में आ जाता है. नींद गायब हो जाती है. इस के लिए जरूरी है कि सोने से पहले मोबाइल को खुद से दूर कर दिया जाए. तभी स्वाभाविक नींद आ सकती है.’’

बचाव के हो रहे प्रयोग

भारत के मुकाबले विदेशों में इस बात को ले कर ज्यादा प्रयोग होने लगे हैं. वहां यह परेशानी ज्यादा बढ़ चुकी है, क्योंकि विदेशों में मोबाइल का प्रयोग भारत के मुकाबले पहले से हो रहा है. ऐसे में वहां पर हैप्पी आवर्स और नो मोबाइल जैसे कौंसैप्ट पर काम हो रहा है, जिस में कुछ घंटे इंसान को मोबाइल से दूर रहने को कहा जाता है. इस के प्रयोग वहां पर सार्थक बदलाव भी ला रहे हैं. ऐसे में अब भारत में भी ऐसे प्रयोग होने लगे हैं.

कई महिलाओं ने अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर बताया कि जब वे पतिपत्नी दोनों ही बिना किसी रोकथाम के मोबाइल का प्रयोग करते थे तो उन को मानसिक सुकून नहीं था. फिर आपसी समझदारी से मोबाइल का प्रयोग बैडरूम के अंदर बंद कर दिया. तब से उन को सुकून है. उन को मानसिक रूप से लगता है कि अब उन दंपतियों के पास एकदूसरे के लिए ज्यादा समय होने लगा है.

कुछ लोगों ने बताया कि उन के बीच पहले से बेहतर तालमेल हो गया है. पहले बातबात पर एकदूसरे से झगड़ने की जो आदत बढ़ गई थी, वह खत्म हो गई है. ऐसे में शांति का अनुभव होने लगा है. इस के अलावा, हम सोशल मीडिया की साइट्स पर नहीं जाते हैं.

अपना बिजनैस संभाल रहीं एक महिला का कहना है, ‘‘मैं तो बीचबीच में अपने फेसबुक और व्हाट्सऐप अकाउंट डीएक्टिवेट कर देती हूं. ऐसे में मैं खुद को इन का आदी होने से बचा लेती हूं. इस के साथ ही साथ, खुद का कुछ समय किताबें पढ़ने में भी लगाती हूं. जिस से मन में शांति बनी रहे और अच्छे किस्म की सोच और विचार पनप सकें. सोशल मीडिया के प्रयोग से यह बदलाव नहीं हो पाता है. हमें अब खुद के लिए समय निकालने की जरूरत है ताकि हमारे अंदर अपनी मौलिक सोच पैदा हो सके.’’

रिश्ते ही रिश्ते

नफरत की आंधी में,

तारतार हुए रिश्ते.

नफरत की आग में,

झुलस गए रिश्ते.

टकराहट के घर्षण ने,

बरबाद किए रिश्ते.

दूरियां बढ़ गईं,

अजनबी हुए रिश्ते.

न हम झुके, न तुम झुके,

गुम हुए रिश्ते.

प्रेम की डोर मजबूत हो,

तभी निभेंगे रिश्ते.

सरसता और क्षमा से,

बने रहेंगे रिश्ते,

कुछ तुम सहो, कुछ हम सहें,

मधुर रहेंगे रिश्ते.

ताकत, सहारा और अभिमान,

हमारे रिश्ते.

शिकवा व शिकायत न हो,

ऐसे हों रिश्ते.

जिन का न कोई होता,

वे चाहते हैं रिश्ते.

कदर उस की समझते हैं,

निभाते हैं रिश्ते.

– हंसा मेहता

शराब का शबाब

ड्रग्स और सिगरेट की तरह शराब भी जानलेवा होती है पर शराब के व्यापारियों को इस साजिश में विशेषज्ञता हासिल है कि उन्होंने लगभग सारी दुनिया में इस जानलेवा नशे को रोजमर्रा के जीवन की जरूरत बनवा दिया है. हाल यह है कि भारत जैसे पुरातनपंथी देश में भी बच्चों के जन्मदिन के मौकों पर अब बड़ों को खुलेआम शराब परोसना फैशन या शान नहीं, बल्कि जरूरत समझी जाती है.

आयरलैंड ने शराब के कुप्रभावों के प्रति अपने देशवासियों में जागरूकता फैलाने की मुहिम शुरू की है. वहां शराब के विज्ञापनों पर पाबंदी लगा दी गई है. दुकानों में शराब का सैक्शन अलग बनाया जा रहा है और शराब की बोतल पर हैल्थ वार्निंग का स्टिकर चिपकाया जाना जरूरी कर दिया गया है. शराब न केवल कैंसर, किडनी के रोगों के लिए जिम्मेदार है, बल्कि शराब पी कर गाड़ी चलाने यानी ड्रंक ड्राइविंग करने के कारण दुर्घटना हाने की आशंका प्रबल हो जाती है.

सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में कहा था कि देश में हाईवे के दोनों तरफ 500 मीटर के भीतर शराब की दुकान न हो ताकि सड़क पर वाहन चलाते समय शराब के ठेके ड्राइवरों को ललचाएं नहीं. इस से कोई बड़ा फर्क पड़ा हो, इस का आंकड़ा तो नहीं है पर कम से कम शराब की लटकी बोतलें अब रास्ते में नहीं दिखतीं. कहने वाले कहते रहें कि शराब जोशीला ड्रिंक है पर असल में इस में कुछ भी जोश नहीं है. यह शरीर के लिए किसी तरह भी लाभदायक नहीं.

शराब कंपनियों ने जबरदस्त प्रचार के बल पर इसे घरघर पहुंचाया है. उन्होंने फिल्म कंपनियों को मुफ्त शराब दे कर, उन्हें हर मौके पर शराब की बोतलें खुलवाते दिखा कर, इसे मान्यता दिला दी है. पानी की जगह शराब को पीते दिखा कर शराब कंपनियां भरपूर कमाई कर रही हैं. सरकार चुप है क्योंकि उसे टैक्स मिलता है और सरकारी कर्मचारियों को रिश्वत.

शराब का शिकार इस का सेवन करने वाले ही नहीं, बल्कि उन के परिवार की औरतें और बच्चे भी होते हैं. परिवार की आमदनी शराब में बह जाती है और घर की शांति भी. शराब के चलते दुर्घटना होने या गंभीर बीमारी होने से मौत हो जाए, तो और ही मुसीबत होती है. आयरलैंड की सरकार ने एक एनजीओ के दबाव में अपने देश में अच्छा कदम उठाया है पर शराब कंपनियों से टकराना आसान नहीं है. शराब आज तकरीबन सारी दुनिया में शबाब पर है.

महिलाओं की बल्ले बल्ले : कंपनियां बढ़ाएंगी डिलीवरी गर्ल्स

हर साल 2 करोड़ युवाओं को रोजगार देने का वादा कर सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने वादा नहीं निभाया, उलटे उस की गलत नीतियों के चलते कितने ही कारोबारी बेकार हो गए. लेकिन, अब थोड़ी राहत की खबर यह है कि कंपनियां महिलाओं को रोजगार देने के लिए आगे आ रही हैं. वे किसी भी उम्र की हों, कंपनियां नौकरी देने में उन्हें प्राथमिकता दे रही हैं.

ई-कौमर्स, ई-व्यापार, ई-लेनदेन वगैरह के चलते डिलीवरी पर्सन्स की मांग खूब बढ़ी है. इस काम में लेडीज जेंट्स दोनों भागीदार हैं. इसे अब डिलीवरी इंडस्ट्री कहा जाने लगा है. पिछले एक साल के दौरान इन इंडस्ट्री में काम करने वाली महिलाओं की तादाद दोगुनी हो गई है. इस ट्रेंड के आगे और बढ़ने की उम्मीद भी है.

अमेरिकी मूल की अंतर्राष्ट्रीय ई-कौमर्स कंपनी अमेजन की बात करें तो वर्ष 2016 में उस के पास डिलीवरी और लोजिस्टिक सेगमेंट में सिर्फ 20 महिलाएं थीं.  अब उन की तादाद 800 पहुंच गई है. वहीं, फूड स्टार्टअप स्विगी मात्र  6 महीने में डिलीवरी के लिए 1,500 महिलाओं की भरती करने की तयारी कर रही है. अभी स्विगी कंपनी के पास इस काम के लिए 50 महिलाएं हैं. मुंबई की आल वीमेन डिलीवरी स्टार्टअप हेदीदी भी महिला कर्मचारियों की तादाद  300  से बढ़ा कर मार्च 2019 तक 1,500  करेगी.

कंपनियों द्वारा महिलाओं की भरती को प्राथमिकता देने के पीछे यह सोच है कि वे पुरुषों के अपेक्षा नौकरी कम बदलती हैं. आंकड़े बताते हैं कि जेंट्स के मुकाबले लेडीज में नौकरी छोड़ने की दर कम है. इस वजह से भी पुरुषों के दबदबे वाली डिलीवरी इंडस्ट्री में महिलाओं की भरती बढ़ रही है.

देश की बड़ी प्लेसमेंट एजेंसी रैंडस्टैड इंडिया के प्रवक्ता का कहना है कि लास्ट-माइल डिलीवरी के काम में नौकरी छोड़ने की दर 3 अंकों में है. इस से कंपनियों की भरोसेमंद सेवा देने की क्षमता घटती है.  फ्रंटलाइन की भूमिका में महिलाओं के नौकरी छोड़ने की दर काफी कम है.  ऐसे में डिलीवरी सेक्टर में महिलाओं की भूमिका बढ़ाना समझदारी भरा काम है.

मालूम हो कि अमेजन के पास देश में कोच्चि, पुणे, अहमदाबाद, नागपुर और मुंबई जैसे शहरों में 50 महिला डिलीवरी पार्टनर्स हैं.  अमेजन इंडिया के प्रवक्ता बताते हैं कि उन्हें अब तक ग्राहकों और डिलीवरी पार्टनर्स से काफी बेहतर रेस्पोंस मिला है.

एक दूसरी प्लेसमेंट एजेंसी टीमलीज सर्विसेज के प्रवक्ता का कहना है कि देश में फिलहाल 40,000 महिलायें डिलीवरी और लोजिस्टिक भूमिका में हैं. यह कुल डिलीवरी इंडस्ट्री का तकरीबन 6.77 फीसदी है. उम्मीद यह है कि डिलीवरी सेक्टर में महिलाओं की तादाद में आगे बढ़ोतरी ही होगी. यह भी अनुमान है कि वर्ष 2021 तक कुल डिलीवरी जॉब्स में महिलाओं की भागीदारी बढ़ कर 20-26 फीसदी तक हो जाएगी.

विदित हो कि अमेजन इंडिया ने तिरुअनंतपुरम में वीमेन ओनली डिलीवरी स्टेशन लांच करने की घोषणा की थी.  इस के बाद दूसरा सेंटर चेन्नई में खोला गया.  कंपनी के प्रवक्ता का कहना है कि कंपनी के वीमेन डिलीवरी स्टेशनों को महिलाएं ही संभालती और चलती हैं.  इन दोनों स्टेशनों पर महिलाएं टू व्हीलर्स पर सामान की डिलीवरी करती हैं.  आमतौर पर वे डिलीवरी स्टेशन से 2 से 3 किलोमीटर का दायरा कवर करती हैं.  फिलहाल अमेजन इंडिया के पास 3 ऐसे डिलीवरी स्टेशन चेन्नई, चंडीगढ़ और धुले (महाराष्ट्र) में हैं.  तिरुअनंतपुरम अब इस से बाहर हो गया है क्योंकि वहां अब पुरुष भी काम कर रहे हैं.

ई-कौमर्स फूड कंपनी स्विगी के प्रवक्ता का कहना है कि उन की कंपनी 6 महीने में कुल 90  हजार डिलीवरी पार्टनर्स में कम से कम 2 फीसदी महिलाओं को शामिल करना चाहती है.  कंपनी चाहती है कि जेंडर के आधार पर कोई भेदभाव न हो और सभी को काम करने का मौका मिले.

हेदीदी कंपनी का कहना है कि वह फ्रंट-एंड पर लोजिस्टिक और बैक-एंड पर स्किल कंपनी है. कंपनी ने अक्टूबर में 2 महिला सहायकों के साथ फोर-व्हीलर डिलीवरी लांच की थी, एक महिला ड्राइविंग सीट संभालती है और एक महिला डिलीवरी करती है.

इस प्रकार कंपनियों का कहना है कि डिलीवरी इंडस्ट्री में महिलाओं की सैलरी पुरुषों के बराबर ही है. यह अतितिक्त भुगतान के साथ 15 हज़ार से 30 हज़ार रुपए प्रति महिना होती है. कुल मिला कर ई-कौमर्स कारोबार के चलन से महिलाओं के अच्छे दिन आ गए हैं, उन्हें खूब रोजगार मिल रहे हैं.

मंजिल (भाग-5) : ससुराल में कैसे घुलमिल गई थी पुरवा

पूर्व कथा

पुरवा का पर्स चोर से वापस लाने में सुहास मदद करता है. इस तरह दोनों की जानपहचान होती है और मुलाकातें बढ़ कर प्यार में बदल जाती हैं. सुहास पुरवा को अपने घर ले जाता है. वह अपनी मां रजनीबाला और बहन श्वेता से उसे मिलवाता है. रजनीबाला को पुरवा अच्छी लगती है. उधर पुरवा सुहास को अपने पिता से मिलवाने अपने घर ले आती है तो उस के पिता सहाय साहब सुहास की काम के प्रति लगन देख कर खुश होते हैं.

सुहास की बहन श्वेता को देखने लड़के वाले आते हैं. इंजीनियर लड़के गौरव से श्वेता का विवाह तय हो जाता है. मिठाई  के डब्बे के साथ बहन की सगाई का निमंत्रण ले कर सुहास सहाय साहब के घर जाता है. घर पर बीमार सहाय साहब का हालचाल पूछने उन के मित्र आए होते हैं. सहाय साहब सुहास की तारीफ करते हुए सब को बताते हैं कि वह उस के लिए मोटरपार्ट्स की दुकान खुलवा रहे हैं. सुहास अपनी तारीफ सुन कर खुश होता है.

श्वेता की सगाई पर आए सहाय साहब के परिवार से मकरंद वर्मा परिवार के सभी सदस्य उत्साहपूर्वक मिलते हैं. दोनों परिवारवाले सुहास और पुरवा के रिश्ते से खुश थे.

समय तेजी से गुजरता रहा. सुहास व्यापार शुरू कर देता है, लेकिन कई बार काम के लिए बंध कर बैठना उस के लिए मुश्किल हो जाता क्योंकि किसी भी जगह जम कर रह पाना उस के स्वभाव में नहीं था.

अंतत: श्वेता के विवाह का दिन आ जाता है. उस दिन पुरवा का सजाधजा रूप देख कर सुहास दीवाना हो जाता है. पुरवा से शीघ्र विवाह करने के लिए सुहास दुकान पर मन लगा कर काम करने लगता है. यह सब देख सहाय साहब खुश थे. आखिरकार वह एक दिन वर्मा साहब के घर पुरवा का रिश्ता ले कर पहुंच जाते हैं. सभी की मौजूदगी और खुशी से पुरवासुहास का रिश्ता पक्का हो जाता है और शीघ्र ही धूमधाम से विवाह हो जाता है.

सुहागसेज पर दोनों हजारों सपने संजोते हैं और हनीमून पर ऊटी जाते हैं. वापस आने पर घर में सब उन का स्वागत करते हैं. इधर श्वेता से बात करने पर पुरवा को पता चलता है कि बड़े परिवार के कारण वह ससुराल में नाखुश है. उधर अपनी व्यवहारकुशलता से पुरवा ससुराल में जल्द ही सब से घुलमिल जाती है.

अब आगे…

सुहास जब से हनीमून से आया था एक बार भी अपनी दुकान पर नहीं गया. फोन पर अपने कर्मचारी से बातें कर लेता और  आवश्यक निर्देश भी देता रहता. पुरवा के प्यार में मदहोश बस वहीं उस के आसपास मंडराता रहता.

पुरवा टोकती, ‘‘तुम दुकान पर क्यों नहीं जाते हो, मुझे भी अंधमहाविद्यालय जाना है.’’

‘‘पुरवा, दुकान और विद्यालय तो अपनी जगह पर स्थिर हैं, कहीं भाग नहीं जाएंगे पर यह सुनहरे दिन फिर कभी लौट कर नहीं आएंगे,’’ सुहास उसे बांहों में भर कर उत्तर देता.

पुरवा को लगता कि सुहास ठीक ही कह रहा है, यह नयानया उत्साह फीका पड़ने से पहले ही इन पलों को जी भर कर जी लेना चाहिए. उसे सुहास के प्यार पर गर्व होने लगता.

एक शाम सागर और बेला आ धमके और आते ही बेला सुहास के कमरे में पहुंच गई. सुहास उस समय शीशे के सामने संवरती हुई पुरवा के बालों में बड़े प्यार से ब्रश फेर रहा था.

‘‘वाह देवरजी वाह, यहां अचानक न आती तो आप का यह अनोखा प्यार कैसे देख पाती,’’ बेला ने अंदर आते हुए कहा.

सुहास लजा कर हंस दिया और बोला, ‘‘आइए भाभी, आज हम आप के घर ही आने वाले थे.’’

‘‘आप ने याद किया और हम हाजिर हो गए,’’ बेला ने मुसकरा कर कहा. पुरवा ने भी हंसने का प्रयास किया पर उस के चेहरे पर हल्का सा तनाव साफ दिखाई दे रहा था. बेला का यों निसंकोच उस के निजी कमरे में घुस आना उसे अच्छा नहीं लगा था. बेला ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया और दोनों से ही हनीमून को ले कर चुहल करती रही.

सागर ड्राइंगरूम में ही बैठे थे अत: सब को वहीं जाना पड़ा. चाय के बीच अचानक सागर ने कहा, ‘‘सुहास, थोड़ा समय निकाल पाओगे क्या?’’

‘‘क्यों भाई साहब, कोई खास बात?’’ सुहास ने पूछा.

‘‘वह मेरे ताऊजी का छोटा बेटा है न तरुण, उसे कैंसर अस्पताल ले जाना है,’’ सागर ने उदासी से कहा.

‘‘अरे, उसे कैंसर है?’’ सुहास आश्चर्य से बोला.

‘‘है या नहीं, यही तो सही से मालूम नहीं पड़ रहा है. डाक्टर कहते हैं कि ठीक से पता चल जाए तो अभी इलाज संभव है. अभी तो उस की दशा देख कर डाक्टरों को कैंसर का शक है,’’ बेला ने भी बुझे स्वर में कहा.

‘‘मैं जरूर चलूंगा भाई साहब. आप जितना जल्दी हो सके उन्हें ले चलिए,’’ सुहास ने बहुत आतुरता से कहा.

पुरवा ने देखा कि सुहास कैसे दूसरों के दुख में व्याकुल हो उठता है. कुछ अच्छा लगा और कुछ उदास भी हो गई. इतनी देर से वह इस माहौल में अपनेआप को अपरिचित सा अनुभव कर रही थी. सागर व बेला के साथ सुहास घर से जो गया तो रात को ही वापस लौटा. पुरवा को उस समय उस का जाना बुरा नहीं लगा था, पर जब सारा दिन उस की प्रतीक्षा में बीत गया तो उस के मन में विचित्र सी खिन्नता भर गई. क्या सुहास समाजसेवा के आगे बाकी सारी जिम्मेदारियां भूल जाता है?

कहां तो उस के प्यार में डूब कर वह अपनी दुकान पर जाना भी भूल गया था, कहां सारा दिन उस की याद भी नहीं आई. सुहास ने अपनी थकान जाहिर करते हुए उसे देखा और बोला, ‘‘बहुत देर हो गई न. अंकल का दुख देखा नहीं जा रहा था. सागर भैया के साथ मैं बराबर बना रहा तो उन सब को भी बहुत तसल्ली थी.’’

पुरवा चुपचाप उस के उतारे कपड़े तह करती रही और सुहास अपने वहां होने के महत्त्व पर भाषण देता रहा.

रात में सोने से पहले पुरवा ने कहा, ‘‘सुहास, तुम्हें कुछ समय अपने व्यापार को भी देना चाहिए. कोई भी काम नौकरों के भरोसे ठीक से नहीं होता है.’’

‘‘मुझे पता है पुरु. कल मैं दुकान पर भी जाऊंगा. अभी तो बस, हमारे प्यार की घड़ी को याद करने दो,’’ और इसी के साथ सुहास ने पुरवा को अपनी बांहों में खींच लिया.

एक दोपहर श्वेता अचानक ही अपना सूटकेस उठाए घर आ गई. रजनीबाला उसे देख कर खिल उठीं.

‘‘अरे श्वेता, अचानक…’’

‘‘हां,’’ श्वेता के चेहरे पर खीज भरी हुई थी. वह कुछ कहना चाह रही पर बिना कुछ कहे ही वह अपने पहले के कमरे में घुस गई. पुरवा मेज पर खाना लगा रही थी. श्वेता को विचित्र स्थिति में कमरे की तरफ जाते देखा तो पीछेपीछे हो ली और हंसते हुए बोली, ‘‘यह क्या ननद रानी, सूटकेस तो कोई भी नौकर अंदर रख देता, तुम तो हमें देखे बिना ही अंदर भाग आईं.’’

श्वेता बनावटी हंसी के साथ बोली, ‘‘नहीं भाभी, किसी के ऊपर गुस्सा चढ़ा हुआ था, सो इधरउधर कहीं ध्यान ही नहीं दिया.’’

‘‘अच्छा,’’ पुरवा ने प्यार से उस की ठुड्डी उठाई, ‘‘कहीं यह गुस्सा हमारे ननदोईजी पर तो नहीं है?’’

श्वेता हंस दी, तभी मां रजनी वहां आ गईं. पुरवा ने हंस कर कहा, ‘‘कल से मम्मी तुम्हें बहुत याद कर रही थीं. चाहत तुम्हें खींच ही लाई.’’

पुरवा ने मां के सामने प्यार की  चादर डाल स्थिति को सहज बना दिया था.

उस दिन बहुत कहने पर सुहास अपनी दुकान पर गया था. पुरवा ने उसे फोन किया और कहा, ‘‘सुहास, डाइनिंग टेबल पर खाना लग गया है और इत्तेफाक से श्वेता भी आई है. तुम भी आ जाओ.’’

सुहास के आसपास उस समय कोई नहीं था इसलिए परिहास करता हुआ बोला, ‘‘आखिर तुम भी हर पल मुझे देखे बिना रह नहीं सकतीं न?’’

श्वेता खाना खाते समय भी बहुत अनमनी रही. पुरवा ने मलाई कोफ्ते का डोंगा उस की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘श्वेता, मुझे बहुत अच्छा खाना बनाना तो नहीं आता पर कोशिश की है, यह मलाई कोफ्ता बनाने की. जरा चख कर बताना कि अभी और क्या कमी है इस में.’’

श्वेता उस की इस बात पर शायद चिढ़ गई थी. एक कोफ्ता निकाल कर बोली, ‘‘बस यही तो कमी है मुझ में भाभी कि तुम्हारी तरह मैं लच्छेदार बातें नहीं कर पाती. तभी तो वहां मुझ में सभी मीनमेख निकालते रहते हैं.’’

सब ने एकसाथ श्वेता को देखा था. सुहास को शायद बुरा लगा था, झट से बोला, ‘‘श्वेता, वहां का गुस्सा तुम क्या पुरवा पर निकाल रही हो?’’

पुरवा ने हाथ से उसे रोका और बोली, ‘‘कहने दो सुहास, अपनों से ही मन का दुख कहा जाता है.’’

‘‘बस, यही तो…’’ श्वेता चिढ़ कर उठ गई, ‘‘हर समय बहुत अच्छे बने रहने का स्वांग, न मुझ से होता है न पसंद है.’’

श्वेता दनदनाती हुई कमरे में चली गई. रजनी ने क्रोध से पुकारा, ‘‘श्वेता यह क्या, खाने पर से ऐसे ही उठ कर जाते हैं?’’

बुरा तो पुरवा को भी लगा था पर उसे श्वेता के बचकाने स्वभाव के बारे में थोड़ाबहुत पहले से ही अंदाजा था.

‘‘असल में हम लोगों के लाड़प्यार ने ही इसे बिगाड़ दिया. इकलौती बेटी जो है, इसीलिए इस की हर बात हम दोनों तुरंत मान लेते थे,’’ मां रजनी ने पुरवा को जैसे सफाई दी. उन की आंखों में वेदना भी थी और ममता भी. बोलीं, ‘‘लगता है इस का जिद्दी स्वभाव ससुराल में भी इस के आड़े आ रहा है.’’

पुरवा और सुहास चुपचाप खाना खाते रहे. मां ने एक प्लेट में कुछ चीजें परोसीं और प्लेट ले कर श्वेता को मनाने चल दीं. सुहास धीरे से बोला, ‘‘अब भी तो बिगाड़ ही रही हो मां. ससुराल में कोई खाना ले कर यों पीछे थोड़े ही भागता होगा.’’

‘‘जानती हूं रे, पर मां का दिल मानता नहीं. जब तक वह नहीं खाएगी, मुझ से भी नहीं खाया जाएगा.’’

शाम को अचानक गौरव आ गया. मां खुश हो गईं और बोलीं, ‘‘हम लोग तुम्हें ही याद कर रहे थे बेटा. श्वेता तो बच्ची है, अभी तक नासमझ. आई है तब से तुम्हें फोन भी नहीं किया.’’

‘‘वह तो रूठती ही रहती है मम्मीजी, मैं मना लूंगा उसे,’’ उस ने हंस कर कहा.

पुरवा चाय की तैयारी करने लगी. गौरव श्वेता के कमरे में था. रजनी ने पुरवा से कहा, ‘‘कितना अच्छा लड़का ढूंढ़ा है पर जब देखो नादानियां दिखाती रहती है.’’

‘‘कुछ दिन में समझदार हो जाएगी, फिर नादानी नहीं करेगी,’’ पुरवा ने जैसे मां को सांत्वना देने के लिए हंस कर कहा.

‘‘तुम भी तो नई हो, पर कितनी समझदार हो,’’ मां ने कहा तो पुरवा गद्गद हो उठी. केतली में चाय का पानी डालते हुए वह बोली, ‘‘कभी ऐसी भूलचूक हो जाए मम्मीजी तो कान पकड़ लीजिएगा.’’

पुरवा फिर से यदाकदा अंध महाविद्यालय जाने लगी थी. मां ने भी आज्ञा दे दी थी कि यह तो समाज कल्याण का काम है, बंद मत करो. बहुत दिनों से पुरवा ने बस यात्रा नहीं की थी. उस दिन अपने पुराने रूट वाली बस में बैठी तो पुरानी यादों में खो गई. यादों की तंद्रा तो तब टूटी जब कानों में यह सुनाई पड़ा, ‘‘ए मिस्टर, आप ठीक से खड़े नहीं हो सकते?’’

आवाज सुन कर पुरवा चौंक उठी. दरवाजे के पास की भीड़ में चेहरे दिखाई नहीं दे रहे थे, पर आवाज तो पहचानी हुई थी. पुरवा सोच में पड़ गई कि वह सुहास बस में क्या कर रहा है. इस समय तो उसे अपनी दुकान में होना चाहिए था.

बड़ी कठिनाई से जगह बनाती हुई पुरवा आगे बढ़ी तो देखा कि सुहास बेला के साथ बस के दरवाजे पर खड़ा है और एक नवयुवक से उलझ रहा है. शायद उस ने बेला के साथ कुछ शरारत की होगी. एकदम निकट पहुंच कर पुरवा ने आवाज दी तो सुहास चौंक पड़ा, ‘‘अरे, तुम.’’

‘‘हां,’’ पुरवा ने अधिक बात नहीं की, बस रुकी तो तीनों ही उतर गए. सुहास की गोद में बेला का बच्चा था. सफाई देता सा वह झट से बोला, ‘‘मैं दुकान के लिए निकलने ही वाला था कि सागर भैया का फोन आ गया. उन्हें जरूरी मीटिंग में जाना था और इसे आज डाक्टर के पास चेकअप के लिए ले जाना था.’’

पुरवा सोचने लगी कि अभी थोड़ी देर पहले ही तो वह सुहास को घर पर छोड़ कर आई थी. तब वह दुकान के कुछ काम के सिलसिले में किसी से मिलने जाने वाला था. इतनी जल्दी वह बेला को ले कर डाक्टर के पास भी चल दिया, उस ने लगभग 45 मिनट ही तो बस की प्रतीक्षा की थी, बसें भरी हुई आ रही थीं इसीलिए उस ने दो बसें छोड़ दी थीं. शायद सुहास दो बसें बदलता हुआ आया है तभी यहां दोनों की टक्कर हो गई.

जाने क्यों पुरवा के मन में कुछ चुभ सा रहा था. लाख मन को समझाया कि सुहास की इस सहायता करने वाली भावना के कारण ही तो वह स्वयं सुहास के जीवन में आई है, पर मन इसे सोच कर भी संतुष्ट नहीं हो पा रहा था. एक पत्नी का अधिकार निरंतर पुरवा के मन को भरमा रहा था, पर ऊपर से वह संयत बनी हुई खुद भी साथ चलने का आग्रह करने लगी थी. इस पर सुहास ने कहा, ‘‘तुम बहुत दिनों बाद अंध विद्यालय जा रही हो, वहीं जाओ, मैं इस बच्चे को दिखा कर और भाभी को बस में बैठा कर सीधा अपने काम पर चला जाऊंगा.’’

सुहास जैसेजैसे अपने काम की देखभाल करने लगा था पुरवा उतनी ही खुश रहने लगी थी. मां व पापा भी खुश हो कर कहते, ‘‘बहू के आने से सुहास का काम में भी मन लगने लगा है.’’

पुरवा एक अच्छी पत्नी की तरह सुहास का पूरा ध्यान रखती और घर की पूरी व्यवस्था संभालने के साथ मां व पापा का भी ध्यान रखती. कभी अपने मम्मीपापा के पास जाती तो उत्साह से भरी रहती. सहाय साहब भी यह जान कर संतुष्ट होते कि सुहास अब व्यापार की तरफ ध्यान देने लगा है.

एक दोपहर हाथ में अटैची उठाए हुए श्वेता फिर आ धमकी. रजनीबाला ने चौंक कर देखा और बोलीं, ‘‘कैसी हो श्वेता, सब ठीक तो है न?’’

मां के मुख से यह शब्द निकलते ही श्वेता उन के गले लग कर रोने लगी और बोली, ‘‘मैं वापस नहीं जाऊंगी मम्मी, अब की मुझे वापस भेजने की जिद मत करना.’’

तब तक पुरवा भी वहां आ गई थी और श्वेता को मां के गले से अलग करती हुई बोली, ‘‘चलो, अपने कमरे में चलो श्वेता, सब ठीक हो जाएगा.’’

उस समय किसी ने श्वेता से कोई प्रश्न नहीं किया. पुरवा भी समझ चुकी थी कि जब श्वेता क्रोध में होती है तब उस से कुछ भी कहनासुनना व्यर्थ होता है.

पुरवा तुरंत उस के लिए ठंडा जूस बना कर ले आई और बहुत प्यार से उस के आंसू पोंछती रही. मां बहुत परेशान थीं पर इस समय कुछ भी पूछना उन्हें भी उचित नहीं लग रहा था, अत: उस दिन श्वेता से किसी ने कोई प्रश्न नहीं पूछा और न ही श्वेता के ससुराल से कोई फोन आया.

पुरवा ने एकांत में सुहास से कहा, ‘‘गौरव का कोई फोन नहीं आया, कहीं उन से तो लड़ कर नहीं आई है श्वेता?’’

सुहास उस दिन बहुत थका हुआ था. अपने व्यापार के सिलसिले में उस ने काफी भागदौड़ की थी. पुरवा की बात पर हंस कर बोला, ‘‘तुम चिंता मत करो, यह लड़की बचपन से ही थोड़ी नकचढ़ी है. कुछ दिनों में फिर शांत हो कर गौरव से दोस्ती कर लेगी.’’

2 दिन बीत गए थे. गौरव नहीं आया था और न ही उस का कोई फोन आया तो रजनीबाला को चिंता होने लगी. वह श्वेता से पूछतीं, ‘‘ऐसी क्या बात है जो न तू खुद फोन करती है और न गौरव का फोन आता है.’’

श्वेता नाश्ता करते हुए कहने लगी, ‘‘मम्मा, यह बताओ कि क्या अब मैं यहां रह नहीं सकती हूं?’’

‘‘यह तेरा घर है, तुझे रहने के लिए कौन मना कर रहा है,’’ रजनीबाला बोलीं, ‘‘लेकिन इस तरह से तेरा रूठ कर आना और उन लोगों की तरफ से भी सन्नाटा खिंचे रहना, यह परेशान तो करता ही है न.’’

‘‘तुम सब को परेशान होने की जरूरत नहीं है. हम पतिपत्नी आपस में ही निबट लेंगे,’’ श्वेता ने निश्चिंतता से कहा.

‘‘पर बिना आपस में मिले और बात किए कैसे निबट लोगी?’’ यह स्वर पापा का था जो बहुत देर से चुपचाप नाश्ता कर रहे थे. वह फिर बोले, ‘‘ठीक है, आज मैं गौरव को फोन कर के घर पर बुलाता हूं.’’

श्वेता शांत रही. सब को लगा कि शायद यही ठीक है.

शाम को 6 बजे गौरव आया तो श्वेता को छोड़ कर सभी अंदर ही अंदर यह सोच कर बहुत भयभीत थे कि पता नहीं श्वेता क्या गलती कर के आई है. गौरव के मन में क्या होगा, यह सब जानने की उत्सुकता भी थी और भय भी था पर ऊपर से सब शांत थे और गौरव का स्वागत करते हुए निरंतर हंसने का प्रयास कर रहे थे. पापा ने तुरंत कहा, ‘‘आओ बेटा गौरव, आओ. मैं ने सोचा कि आज सब एकसाथ ही रात्रिभोज पर गपशप करते हैं.’’

गौरव भी हंस दिया और बोला, ‘‘अच्छा है पापाजी, एकसाथ मिल कर बैठने से बड़ी से बड़ी परेशानियां और समस्याएं हल हो जाती हैं.’’

कुछ देर ड्राइंगरूम में इधरउधर की गपशप चलती रही. नौकर ट्राली में चाय ले कर आ गया था और पुरवा सब को चाय बना कर दे रही थी. पापा ने चाय पकड़ते हुए गौरव से कहा, ‘‘श्वेता हमारी इकलौती बेटी है, इसी से थोड़ी जिद्दी हो गई है. गौरव बेटा, उस की नादान बातों का बुरा मत माना करो.’’

यद्यपि श्वेता ने क्रोध से पापा की ओर देखा था. फिर भी वह बेटी की नादानियों की सफाई सी देते रहे. तब गौरव ने कहा, ‘‘पापाजी, मैं सब समझता हूं, मैं इसे बहुत प्यार भी करता हूं, पर इस के लिए मैं अपने बूढ़े मातापिता और भाईबंधु के परिवार को नहीं छोड़ सकता.’’

गौरव की बात सुन कर सभी अचानक चौंक पड़े थे. चाय बनाती पुरवा भी ठिठक गई थी, गौरव ने आगे कहा, ‘‘आप श्वेता से ही पूछिए कि इस ने मेरे साथ रहने की क्या शर्त रखी है.’’

गौरव के शब्दों में अथाह दुख था. वह बोला, ‘‘यह चाहती है कि मैं अपना अलग घर ले कर रहूं. एक ही शहर में पिता की उतनी बड़ी कोठी छोड़ कर मैं एक किराए का मकान लूं.’’

श्वेता सिर झुकाए बैठी थी. मां ने कहा, ‘‘यह गलत है श्वेता, तुम्हें ऐसी बातें शोभा नहीं देती हैं.’’

‘‘लेकिन मैं उस भीड़ के साथ नहीं रह सकती, सब अपनीअपनी चलाते हैं, वहां मेरा अपना कुछ भी नहीं है.’’

‘‘अपने ससुराल वालों को भीड़ कहते हुए तुम्हें शर्म आनी चाहिए श्वेता. वे सब तुम्हारे सुखदुख के साथी हैं. अकेले की जिंदगी भी कोई जिंदगी है,’’ पापा ने क्रोध से कहा.

मां की आंखों में भी अपार दुख छा गया था. बोलीं, ‘‘ऐसा सोचना ही गलत है बेटा. अगर इसी तरह पुरवा भी सोचने लगे तो तुम्हें या हम सब को कैसा लगेगा.’’

मां की बात पर श्वेता और भी भड़क उठी, ‘‘भाभी, कैसे यह सब सोच सकती हैं. सुहास भैया कमाते ही क्या हैं जो वह अलग रहने की बात करेंगी.’’

श्वेता की बात पर अचानक ही वहां खामोशी छा गई थी. गौरव भी हैरान था और सुहास लज्जित हो उठा था. मां व पापा अपना क्रोध दबाने का प्रयास कर रहे थे. पुरवा वहां रुकी नहीं और सिर झुका कर अपने कमरे में चली गई.

क्रमश:

अंधविश्वास : प्रचार की देन मंगलवार व्रतकथा

कम समय में, कम परिश्रम कर के अधिक लाभ पाने की इंसान की कमजोरी को ध्यान में रखते हुए हिंदू धर्माचार्यों ने बहुत सी ऐसी व्यवस्थाएं बना रखी हैं कि जिन से बिना कोई परिश्रम किए मुफ्त में भक्त को सबकुछ मिलने की आस रहे और पुजारियों को सबकुछ मिलता रहे. मंगलवार को हनुमान से जोड़ कर मंगलवार व्रतकथा कही गई है.

हनुमान के संबंध में विभिन्न धर्मग्रंथों से जो जानकारी मिलती है, उस से हनुमान का जीवन व व्यक्तित्व सुस्पष्ट होने की अपेक्षा और अधिक उलझ कर रह जाता है. धर्मग्रंथों में लिखा है कि केसरी की पत्नी से एक अन्य देवता पवनदेव ने पुत्र उत्पन्न किया. हनुमान के जन्म के संबंध में यह जानकारी परोक्ष व्यभिचार है. यह आज के सामाजिक व नैतिक मानकों के खिलाफ भी है.

‘हनुमान राम के समकालीन माने जाते हैं. रामायण में हनुमान को वानर के रूप में चित्रित किया गया है. उन की पूंछ है. उन के लिए शाखामृग, कपि, हरि, प्लंवगम आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है. इन शब्दों का अर्थ है वानर. पर ये मानव थे या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है क्योंकि इन्हीं वानर को भरत ने बहुत से पदार्थों, गायें, गांवों के साथसाथ 16 स्त्रियां भी उपहारस्वरूप भेंट की-

‘‘गवांशत सरस्रं च ग्रामाणां च शतं परम्, सकुंडला शुभाचारा भार्या: कन्यास्तुषोडश’’

(उत्तरकांड)

अर्थात भरत ने हनुमान को एक लाख गायें, 100 उत्तम गांव तथा 16 कन्याएं पत्नी के रूप में प्रदान  कीं.

यदि हनुमान वास्तव में वानर थे तो भरत द्वारा दिए गए उपहारों की उन के लिए क्या उपयोगिता रह जाती है. ऐसे में, वे रामलक्ष्मण आदि के साथ वार्त्ता किस भाषा में और कैसे करते होंगे, जबकि पूंछ उन्हें मनुष्य होने से रोकती है.

ऐसे देव से जोड़ कर यह कथा लिखी गई. यह एक गलती थी. सदियों तक इसे दोहराया गया. यह दूसरी गलती थी. तीसरी गलती है आज भी इस से चिपके रहना.

धन व यश की प्राप्ति : इस कथा को ज्यादा से ज्यादा लोग अपनाएं, इस के लिए प्रलोभन देते हुए इस कथा में कहा गया है कि जो भी कोई स्त्री/पुरुष मंगलवार को नियमपूर्वक सुबह उठ कर पूरे विधिविधान से 21 सप्ताह मंगलवार व्रत करता हुआ मंगलवार व्रतकथा कहता अथवा दानदक्षिणा अदा कर कथावाचकों से सुनता है, उसे धन के साथसाथ यश की भी प्राप्ति होती है.

धन व यश की प्राप्ति कठोर परिश्रम व लगन से संभव हो पाती है. समुद्र में छिपे रत्नों को पाने में वही व्यक्ति सफल हो पाता है जो गहरे पानी में कूद जाने की क्षमता रखता है.

मानसिक कष्टों से मुक्ति : व्यापार में नुकसान या कारोबार का ठीक न बैठना, कारोबार का न होना या असफल रहना व नौकरी के अभाव में और पारिवारिक तनाव के चलते व्यक्ति का मानसिक रूप से परेशान होना स्वाभाविक है. यदि ऐसी स्थिति लंबे समय तक चलती है तो व्यक्ति के अवसाद यानी डिप्रैशन में चले जाने से इनकार नहीं किया जा सकता व उस का मानसिक रूप से दुखी होना स्वाभाविक है. ऐसे व्यक्ति इस कथा की उपेक्षा कर सकते हैं. ऐसे लोग इस कथा की उपेक्षा न करें बल्कि सहर्ष श्रद्धा व विश्वास के साथ इस कथा को स्वीकार करें, इसलिए इस में कहा गया है कि जो भी कोई मौन रह कर इस व्रतकथा को कहता या कथावाचकों से सुनता है, उस के सभी मानसिक कष्ट दूर हो जाते हैं.

स्वर्ग की प्राप्ति : इस व्रत को करने और कथा को कहने या कथावाचकों से सुनने के परिणामस्वरूप हमें जो फल प्राप्त होते हैं, उन का हमारे जीवन से सीधा संबंध है. वैसे हम हिंदू मोहमाया के त्याग की बड़ीबड़ी बातें करने वाले हैं तो फिर मरने के बाद स्वर्ग की कामना क्यों करते हैं, स्वर्ग में एडवांस बुकिंग की गारंटी क्यों चाहते हैं?

स्वर्ग, भवसागर, मोक्ष आदि ये सब मात्र कल्पनाओं के अलावा कुछ भी नहीं. जब मानव शरीर का अंत हो जाता है तो उसे अग्नि में जला दिया जाता है. तब फिर स्वर्ग में कुछ नहीं जा सकता.

दूसरी तरफ धर्मग्रंथों व विभिन्न धार्मिक कथाओं में बारबार लिखा गया है कि स्वर्ग में रहने वाले हमारे देवता तो परस्पर वैमनस्य, ईर्ष्या, काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार आदि मानवीय विकारों से पृथ्वीवासियों की अपेक्षा कहीं अधिक ग्रसित हैं व नैतिक दृष्टि से पतित रहे हैं. अपना सिंहासन छिन जाने के भय से इंद्र विभिन्न अनैतिक गतिविधियों में संलिप्त रहे. यही नहीं, उन्होंने गौतम ऋ षि का रूप धारण कर अहल्या से छल किया.

मंगलवार व्रतकथा के अंतर्गत

2 कथाएं मिलती हैं. एक कथा के अनुसार, एक निसंतान वृद्ध वेद प्राग नामक ब्राह्मण ने किसी दूसरे ब्राह्मण से कन्या ले कर उस का पालनपोषण किया. पूर्व जन्म (?) में उस कन्या ने मंगलवार के नियमपूर्वक व्रत किए व विधिविधान से मंगलवार व्रतकथा सुनी थी. इसी कारण उस के अंगों से सोना निकलता था. उस कन्या का सोमेश्वर से विवाह हुआ. चोरों ने उस के पति को मार दिया. तब उस ने अपने पति के साथ सती होना चाहा तो मंगलदेव ने प्रकट हो कर उसे ऐसा करने से रोकते हुए उस के पति को अजरअमर होने का वरदान दे दिया.

दूसरी कथा, एक मंगलभक्त वृद्धा से संबंधित है, जो मंगल के दिन रसोई को गोबर आदि से नहीं लीपती. मंगलदेव उस की भक्ति की परीक्षा के लिए साधु के रूप में प्रकट हो कर उस बुढि़या से रसोई को गोबर आदि से लीपने के लिए कहते हैं. वह बुढि़या मंगलवार को चौका लीपने की अपेक्षा अपने पुत्र की पीठ पर खाना बनाने की इजाजत दे देती है. साधु प्रसन्न हो जाता है. बालक की पीठ पर आग जला कर खाना बनाने के बाद भी वह जीवित रहता है. इन कथाओं से साफ है कि मंगलवार की कथा कितनी अतार्किक है.

कथा में बताया गया है कि  मंगलिया को उस की मां घर में आए एक साधु को इसलिए सौंप देती है ताकि वह साधु उस की पीठ पर आग जला कर खाना बना सके.

यानी साधु रूप में कोई भी व्यक्ति घर में आ कर आप से कुछ भी मांगे तो आप उसे वह सब बिना कोई किंतुपरंतु किए सौंप दें? वाह? क्या चाल है. क्या पता, जो साधु सामने खड़ा है वह किसी देवता का रूप हो या धोखेबाज का.

इन कथाओं से ही स्त्रियां अपनी संतान, पति व घरपरिवार की उपेक्षा कर के साधुसंतों की सेवा करती हैं और तथाकथित पुण्य के लोभ में पड़ कर इज्जत व बेटेबेटियों तक की बलि चढ़ा देने में संकोच नहीं करतीं.

जब मंगलवार का व्रत कर के विधिपूर्वक मंगलवार व्रतकथा सुनने के परिणामस्वरूप अंगों से सोना निकल सकता है तो भला कोई कठोर परिश्रम करने की क्यों सोचेगा. स्वाभाविक है कि वह मंगलवार व्रत कर के विधिपूर्वक मंगलवार व्रतकथा सुनना ही अच्छा समझेगा.

ऐसी कथाओं के प्रभाव के कारण ही हमारा बौद्धिक व मानसिक विकास और मौलिक चिंतन सदियों से अवरुद्ध हो रहा है.

निश्चित कर्मफल की मान्यता : हिंदू पंडेपुरोहितों ने अपनी दैनिक दिनचर्या को सुचारु रूप से चलाने व जनसाधारण को लूटने के उद्देश्य से इन कथाओं में जिन बातों का समावेश किया है, वे उन के ही बनाए हुए सिद्धांतों का विरोध करती हैं.

यदि कर्मों का फल मिलना पहले से ही निश्चित है तो पूजापाठ, वंदना आदि में समय नष्ट करने का क्या औचित्य? मंगलवार व्रत कर के मंगलवार व्रतकथा कहनेसुनने से क्या लाभ? और यदि इस व्रत को कर के ‘मंगलवार व्रतकथा’ को कहने अथवा कथा सुनने से इस कथा में कहे अनुसार फल प्राप्त हो सकता है, तब फिर हिंदू धर्म की निश्चित कर्मफल की मान्यता निराधार हो जाती है, क्योंकि कथा से तो मनचाहा फल प्राप्त किया जा सकता है. तब फिर पहले से ही निश्चित कर्मफल कैसा…

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