बात वर्ष 2012 की है. इलाहाबाद राजकीय बाल संरक्षण गृह के बारे में कुछ उड़ती-उड़ती सी खबर मिली कि वहां कुछ गलत चल रहा है. मैं अपने कैमरामेन के साथ दिल्ली से सीधा इलाहाबाद जा पहुंची. राजकीय बाल संरक्षण गृह में सुबह आठ बजे हम गेट पर तैनात गार्ड को अपना प्रेस कार्ड दिखा कर इस बहाने से घुसे कि सुना है शहर के नये कप्तान ने अनाथ बच्चों के लिए नये कपड़े और खिलौने वगैरह भिजवाये हैं. दरअसल यह खबर मैंने उसी रोज सुबह अपने होटल के रिसेप्शन टेबल पर रखे एक अखबार में पहले पेज पर देखी थी. दांव काम कर गया. घनी मूंछों वाले गार्ड के चेहरे पर कप्तान साहब का नाम सुनते ही मुस्कुराहट फैल गयी. उसने आदर सहित हमें अन्दर जाने के लिए गेट पर जड़े बड़े-बड़े तीन ताले खोल दिये. तीन बड़े-बड़े तालों में बंधा गेट और चारों ओर ऊंची-ऊंची नुकीली सरियों से घिरा यह बालाश्रम बाहर से किसी जेल सरीखा ही नजर आता था.

बालाश्रम की संचालिका तब तक पहुंची नहीं थी. उनके और अन्य टीचर्स के आने का वक्त 10 बजे का था. उस वक्त अन्दर चार आया, एक रसोइया और एक गार्ड, इतने ही लोग मौजूद थे. हमने गार्ड के साथ हल्की बातचीत के साथ यह शो करने की कोशिश की कि संचालिका के आने तक हम यूंही थोड़ा टहल कर आश्रम को देख रहे हैं. मेरे कैमरामैन ने तेजी से अपना काम शुरू कर दिया था. नन्हें नन्हें बच्चे एक तंग गलियारे के सामने नंगी जमीन पर अपनी थालियां लिये ब्रेकफास्ट के इंतजार में बैठे थे. तभी एक आया रसोईघर से बाल्टी में खिचड़ी लेकर निकली, और हरेक की थाली में एक-एक कटोरी खिचड़ी की उलटती चली गयी.

इस गलियारे के अंत में शौचालय था, जिधर से बह कर आने वाला गंदा पानी पूरे गलियारे में फैला हुआ था. सूखी जमीनें ढूंढ-ढूंढ कर बैठे बच्चों के चेहरों पर एक अजीब सा डर तारी था. दो साल की एक बच्ची, जिसको अपने हाथों से खाना खाना नहीं आता था, अपना पूरा हाथ थाली में पड़ी खिचड़ी में डाल कर चाट रही थी. एक बच्चे ने थाली उलट दी थी और जमीन पर पड़ी खिचड़ी को किसी जानवर की तरह लेट कर चाट रहा था. एक बच्चा जो मानसिक रूप से कमजोर दिख रहा था, शौचालय की दीवार से चिपका बैठा ऊंघ रहा था. उसकी थाली में पड़ी खिचड़ी पर ढेरों मक्खियां बैठी हुई थीं. यह दृश्य देखकर मैं सिहर गयी.

वहां कोई इन बच्चों की दयनीय हालत को देखने वाला नहीं था. कोई उनको पुचकार कर खाना खिलाने वाला नहीं था. कोई यह देखने वाला नहीं था कि थाली में डाली जा रही खिचड़ी उनके पेट में जा रही है या जमीन पर लीपी जा रही है. शौचालय में पांच खाने बने थे, चार शौच के लिए और एक नहाने के लिए. किसी के आगे दरवाजा नहीं, अन्दर रोशनी का इंतजाम नहीं, सिर्फ एक टूटी बाल्टी और मग कोने में रखा था, मगर साबुन नदारद था. बच्चे शौच करने के बाद आंगन की मिट्टी से हाथ साफ करते थे.

रसोईघर में तीन आया और रसोइया मजे से बैठे गपशप कर रहे थे. गार्ड हमारे साथ-साथ घूम रहा था. उसने मेरे कैमरामैन को फोटो खींचने को मना किया तो मैंने उसको बातों में फंसा लिया ताकि कैमरामैन अपना काम आराम से कर सके. ऊपर बच्चों के शयनकक्षों की हालत और भी ज्यादा खराब थी. दीवारें जालों और पान की पीकों से भरी हुर्इं. गन्दी चादरें और बिछौने. वहीं एक आया एक नन्हीं बच्ची को जबरन खिचड़ी ठुंसाने की कोशिश कर रही थी. पता चला यह चार साल की बच्ची रीढ़ की हड्डी में चोट की वजह से अब उठ बैठ नहीं पाती और न ही बोल-सुन सकती है. उसकी आंखों के कोरों से आंसू बह रहे थे और मुंह में बार-बार खिचड़ी से भरा चम्मच ठूंसे जाने से वह बेकल हो रही थी, मगर आया को अपना काम चटपट निपटाने की जल्दी थी.

दस बजे तक तमाम तस्वीरें हमारे कैमरे में कैद हो चुकी थीं. मगर जिस खबर की तलाश में हम वहां आये थे, वह अभी तक हमें नहीं मिली थी. खबर थी यौन शोषण की. अचानक मेरा कैमरामैन छत पर बने एक लकड़ी के कमरे के अन्दर जा पहुंचा. वहां 12-14 साल की दो लड़कियां थीं. हमें हमारी खबर मिल चुकी थी. दस बजे जब संचालिका और अन्य टीचर्स इस बालाश्रम में पहुंचे, तब तक हम वहां का पूरा कच्चा-चिट्ठा निकाल चुके थे.

इसके बाद हम इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा गठित एक कमिटी के कुछ मेम्बर्स से मिले. इनमें हाईकोर्ट के सीनियर वकील थे. इस कमेटी को कुछ वक्त पहले ही सरकारी बालाश्रमों की जांच के लिए जस्टिस अमर सरन की अध्यक्षता में बनाया गया था. इस कमिटी को हमने सारी तस्वीरें और बातचीत की टेप सौंपे. तस्वीरें खुद सारी कहानी बयां कर रही थीं. उन्हें देखकर उनकी आंखें फटी रह गयीं. हमने उनसे गुजारिश की कि बच्चों के स्वास्थ्य की जांच करवाएं क्योंकि हमें शक है कि छत के कमरे में बंद दोनों लड़कियां प्रेग्नेंट हैं. दूसरे दिन हमने शहर के एसपी से भी मुलाकात की. इधर हमारी खबर छपनी शुरू हुई और उधर राजकीय बालाश्रम की जांच. खबर पक्की थी. वह दोनों बच्चियां प्रेग्नेंट थीं. पता चला कि उनके साथ लगातार बलात्कार होता रहा है और इस अपराध में रसोइया और गार्ड शामिल थे. इन दो बच्चियों का ही नहीं, बल्कि इस संरक्षण गृह की अन्य छोटी बच्चियों का भी देह शोषण वहां काम करने वाले मेल टीचर और अन्य कर्मचारी करते थे. हमारी खबर के बाद संचालिका और अन्य आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया.

मगर इतने भर से क्या उस बालाश्रम की हालत में कोई सुधार आया है? बिल्कुल नहीं. हालात अब भी वैसे ही बदतर हैं. बच्चे खौफ में जीते हैं, कोई नहीं उनके आंसू पोछने वाला, उनका दर्द समझने वाला. जिसे मौका मिलता है उन पर हाथ साफ करके निकल जाता है. यह हाल सिर्फ एकाध अनाथाश्रमों का नहीं, इस देश के ज्यादातर अनाथाश्रमों और संरक्षण गृहों का है. बीते अगस्त में बिहार और उत्तर प्रदेश में संरक्षण गृहों का जो सच सामने आया है, उससे शर्मनाक तो कुछ हो ही नहीं सकता. इससे लज्जाजनक और कुछ नहीं हो सकता कि बालिका अथवा नारी संरक्षण गृह में आश्रय लेने वाली लड़कियों और महिलाओं को देह व्यापार में धकेल दिया जाए.

उत्तर प्रदेश के देवरिया में संरक्षण गृह संचालिका द्वारा चलाये जा रहे सैक्स रैकेट के खुलासे के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी का सक्रिय होना और 12 घंटे में प्रदेश के सभी जनपदों से रिपोर्ट तलब करना इस बात की ओर संकेत करता है कि सरकारें आग लगने के बाद ही कुआं खोदने की तत्परता दिखाती हैं. मुख्यमंत्री के आदेश के बाद लखनऊ, हरदोई और सुल्तानपुर के संरक्षण गृह से लापता होने वाले बच्चों की संख्या इस बात का संकेत हैं कि संरक्षण सुधार गृहों और बाल सुधार गृहों की स्थिति इस देश में नरक के समान है.

देवरिया कांड के खुलासे के बाद हरदोई जनपद के बेनीगंज कस्बे में किराये के मकान पर आशया ग्रामोद्योग द्वारा संचालित स्वाधारा गृह में छापा मारी में 19 महिलाओं का गायब मिलना और गाजियाबाद के बलिका गृह से 31जुलाई से चार लड़कियों का गायब होना मामूली बात नहीं है. सुल्तानपुर से भी नौ महिलाओं के गायब होने की खबर आयी थी. दरअसल देश भर में मौजूद ये सुधार गृह या बाल संरक्षण गृह बच्चों या किशोरियों की मदद के नहीं, बल्कि यौन उत्पीड़न के केन्द्र बन चुके हैं. ये ऐसी जगहें हैं जहां नेता, मंत्री, अफसर, चपरासी, गार्ड, रसोइया, अध्यापक सब बिना किसी भय के अपनी यौन पिपासा पूरी कर रहे हैं. कोई नहीं जो इनकी जांच करे, इनको चिन्हित करे या इनको जेल का रास्ता दिखाये.

पैसे और हवस के आगे सब बेबस नजर आ रहे है. बाल संरक्षण गृहों से बच्चों का भागना, महिला संरक्षण गृहों में शोषण, बलात्कार, कुपोषण और मासूमों के साथ जानवरों जैसा व्यवहार करना जैसे यहां काम कर रहे कर्मचारियों का हक बन गया है.

योगी-मोदी की सरकारें राम राज्य का सपना दिखाती रहीं और पूरे देश में सीता हरण का खेल खुलेआम चलता रहा. बिहार के मुजफ्फरपुर में बेसहारा लड़कियों के लिए बने आश्रय गृह में 34 नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण का सनसनीखेज मामला सामने आया, तो वहीं इस जघन्य कांड में बच्चियों की मौत की बात भी सामने आयी. इस बालिका गृह का संचालन ब्रजेश ठाकुर नाम के राजनीतिक शख्स का एनजीओ सेवा संकल्प एवं विकास समिति करता है. ब्रजेश ठाकुर समेत कई अन्य आरोपियों को काफी दबाव के बाद गिरफ्तार किया गया. ब्रजेश ठाकुर नितीश सरकार की समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा का करीबी था. इस पूरे कांड में मंजू वर्मा और उनके पति चंद्रशेखर वर्मा की संलिप्तता उजागर हो चुकी है.

अब ये बात पूरी तरह से साफ हो गई है कि ब्रजेश ठाकुर के बालिका गृह की 44 बच्चियों में से 34 बच्चियों के साथ रेप हुआ है. इस बालिका गृह में एक बच्ची की हत्या कर शव दफनाने की भी बात सामने आयी. जिसके लिए बालिका गृह की खुदाई की गयी और वहां की मिट्टी को जांच के लिए भेजा गया. डीजीपी के एस. द्विवेदी के मुताबिक 2013 से 2015 के बीच इस बालिका गृह से चार बच्चियों के गायब होने की भी पुष्टि हो चुकी है. मामला अब सीबीआई के हाथ में है.

देवरिया में मां विंध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण एवं समाज सेवा संस्थान द्वारा संचालित बाल एवं महिला संरक्षण गृह से नाबालिग लड़कियों को रात में कार द्वारा बाहर ग्राहकों तक पहुंचाया जाता था और सुबह उन्हें वापस संरक्षण गृह में पहुंचा दिया जाता था. यौन व्यापार के इस अड्डे पर पुलिस ने छापा मार कर चौबीस बच्चों और युवतियों को मुक्त कराया. साथ ही संस्थान परिसर को सील कर वहां की अधीक्षिका कंचनलता, संचालिका गिरिजा त्रिपाठी तथा उसके पति मोहन त्रिपाठी को गिरफ्तार किया. संरक्षण गृह में 42 लड़कियों का पंजीयन कराया गया था, जिनमें से 18 अभी भी लापता हैं.

केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी कहती हैं, ‘ये जो मुजफ्फरपुर और देवरिया में हुआ है उससे हम लोग चकित भी है और दुखी भी और मुझे मालूम है कि ऐसी बहुत सारी जगह निकलेगी.’ यानि केन्द्र सरकार की मंत्री मानती हैं कि देश भर में अनाथाश्रमों और संरक्षण गृहों में बच्चों और युवतियों का शोषण हो रहा है, मगर इसको रोकने का क्या प्रयास हो रहा है, इसकी कोई स्पष्ट रूपरेखा अब तक तैयार नहीं हुई है. हकीकत यह है कि देश भर में बालिका अथवा नारी संरक्षण गृह चलाने का काम धूर्त और लम्पट किस्म के लोग कर रहे हैं.

इससे भी चिंताजनक बात यह है कि ऐसे समाज विरोधी तत्व ऊंची पहुंच वाले भी साबित हो रहे हैं. बेसहारा लड़कियों के यौन शोषण का सिलसिला गैर सरकारी संस्थाओं (एनजीओ) के संचालकों और रसूख वाले राजनीतिक लोगों के आपसी तालमेल से चल रहा है. हाल ही में टॉमस राइटर्स फाउंडेशन के सर्वे में महिलाओं के लिहाज से खतरनाक देशों में भारत को अफगानिस्तान, सीरिया और सऊदी अरब से भी आगे का स्थान दिया गया है. आजादी के 72वें वर्ष में भारत में ऐसा होना विचित्र और शर्मनाक है.

मुजफ्फरपुर और देवरिया के बाद चंडीगढ़ से भी ऐसी ही खबरें आ चुकी हैं. 19 वर्षीय एक लड़की जो दिमागी तौर पर अस्थिर थी, चंडीगढ़ के एक बालिका गृह में रखी गयी थी, जहां उसने एक बच्ची को जन्म दिया. पता चला कि उसके साथ वहां के गार्ड्स और चौकीदार लगातार बलात्कार करते रहे थे.

मीडिया जब भी ऐसी घटनाओं को उभारता है तब सरकारें और समाज थोड़ी सक्रियता दिखाना शुरू करते हैं. इस देश में अनाथ बच्चों, किशोरियों का देह शोषण कोई नया नहीं है, सदियों से होता आ रहा है, मगर उसको रोकने के कठोर प्रयास किसी सरकार के द्वारा नहीं हुए. बिहार की समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा के इस्तीफा दे देने से, गिरफ्तार हो जाने से यह कांड रुकने वाला नहीं है. अफसरों के तबादले या निलम्बन को भी यथोचित दंड नहीं कहा जा सकता. समाज और देश को शर्मिदा करने वाले ऐसे मामलों में सख्त सबक सिखाने वाली कार्रवाई होनी चाहिए, न केवल संरक्षण गृह चलाने वालों के खिलाफ, बल्कि सम्बन्धित अधिकारियों के खिलाफ भी.

यह शासन-प्रशासन की नाकामी ही है कि ऐसे तत्व आश्रय स्थल चलाते पाये जा रहे हैं, जो एक तरह से सभ्य समाज के लिए शत्रु हैं. आखिर इस देश के जिला प्रशासन इतने नाकारा कैसे हो सकते हैं कि वे संदिग्ध गतिविधियों वाले किसी संरक्षण गृह की हकीकत न जान सकें? भविष्य में ऐसी घटनाओं पर लगाम लग सके, इसके लिए सामाजिक आॅडिट जरूरी है. जिला स्तरों पर मीडिया, पुलिस, न्यायाधीषों, वकीलों, समाजिक संस्थाओं से जुड़े कुछ ऐसे स्वच्छ छवि वाले लोगों की कमिटियां बनायी जानी चाहिएं, जो इन संस्थाओं का औचक निरीक्षण करती रहें और अपनी रिपोर्ट सरकारों को सौंपती रहें. उन रिपोर्ट्स पर तत्काल कार्रवाइयां हों और दोषियों को जल्दी से जल्दी सजा हो. यह काम आसान नहीं है, पर सरकार की नीयत हो तो सुधार लाना कोई इतना मुश्किल भी नहीं है.

इसी के साथ समाज में जागरूकता फैलाये जाने की भी जरूरत है. ऐसा तो सम्भव ही नहीं है कि संरक्षण गृहों में घोर अनुचित काम होते रहें और आसपास के लोगों को उनके बारे में कुछ भनक न लगे. किन्हीं कारणों से संरक्षण या आश्रय गृहों मे गुजर-बसर करने वाले बच्चों, लड़कियों और महिलाओं को गरिमामय जीवन जीने का अवसर मिले, इसकी चिंता सरकारों के साथ साथ समाज को भी करनी होगी.

अगर शासन के साथ समाज अपने हिस्से की जिम्मेदारी सही तरह निभा रहा होता तो शायद चंडीगढ़, मुजफ्फरपुर और देवरिया में शर्मसार करने वाले मामले सामने नहीं आये होते. इसके लिए अब केन्द्र और राज्य सरकारों को इस तरह की घटनाओं के होने पर जिला प्रशासन से लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधि और पुलिस की जिम्मेदारी और दण्ड को सुनिश्चित करना बहुत जरूरी है.

देश भर के 539 बाल आश्रय गृहों पर पड़ा ताला   

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (डब्ल्यूसीडी) ने यौन उत्पीड़न और शोषण की सूचनाओं के बाद देश भर के 539 बाल सुधार एवं आश्रय गृहों पर तालाबंदी कर दी है. महिला आश्रय व बाल सुधार गृहों (सीसीआई) में यौन उत्पीड़न के मामले प्रकाश में आने के बाद हुई जांच में कई तरह की अनियमितताओं के चलते यह कदम उठाया गया है.

बिहार के मुजफ्फरपुर में अगस्त में आश्रय स्थल पर गंभीर अनियमितताओं और 34 नाबालिगों के साथ दुष्कर्म के मामले प्रकाश में आने के बाद यह किया गया. साथ ही जिलाधिकारियों को देश भर के सीसीआई केन्द्रों की जांच के बाद रिपोर्ट देने को कहा गया. उनकी रिपोर्ट के आधार पर सबसे ज्यादा महाराष्ट्र में 377, आंध्र प्रदेश में 78 और तेलंगाना में 32 आश्रय स्थल बंद कर दिये गये हैं.

निरीक्षण के बाद पाया गया कि यह आश्रय स्थल सीसीआई के नियमों और तय मानकों का पालन नहीं कर रहे थे. कई तो पंजीकृत ही नहीं थे. प्रबंधन को लेकर प्रशासन को कोई जानकारी नहीं थी. गृहों में सुधार कमेटी तक नहीं थीं. फिलहाल बंद किये गये गृहों के बच्चों को अन्य संस्थानों में स्थानांतरित कर दिया गया है.

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