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इंटरनेशनल ओलिंपिक कमेटी ने दिया झटका

पाकिस्तान ने दिल्ली में शनिवार से हुए निशानेबाजी के वर्ल्ड कप के लिए अपने 2 निशानेबाजों जीएम बशीर और खलील अहमद के वीजा के लिए आवेदन किया था. उन्हें रैपिड फायर वर्ग में हिस्सा लेना था.

लेकिन भारत ने पुलवामा आतंकी हमले में मारे गए सीआरपीएफ के 40 से ज्यादा जवानों की घटना के बाद पाकिस्तानी निशानेबाजों को वीजा देने से इनकार कर दिया था. याद रहे कि यह वर्ल्ड कप साल 2020 में होने वाले ओलिंपिक खेलों के लिए क्वॉलिफायर प्रतियोगिता भी है.

भारत के इस फैसले के बाद इंटरनेशनल ओलिंपिक कमेटी ने इस टूर्नामेंट में पुरुषों की 25 मीटर रैपिड फायर पिस्टल स्पर्धा से हासिल किए जाने वाले 2 ओलिंपिक कोटे हटाने का फैसला किया. साथ ही उस ने यह घोषणा भी की कि वह बड़े टूर्नामेंट की मेजबानी के लिए भारत को चर्चाओं में शामिल नहीं करेगी. इस से भारत की 2026 में होने वाले युवा ओलिंपिक, 2032 के ग्रीष्मकालीन ओलिंपिक और 2030 के एशियाई खेलों की मेजबानी करने की उम्मीद को झटका लगा है.

इंटरनेशनल ओलिंपिक कमेटी ने यह भी कहा कि भारत के खिलाफ यह फैसला तब तक बरकरार रहेगा जब तक उसे भारत सरकार से लिखित में गारंटी नहीं मिल जाती कि इस तरह की प्रतियोगिताओं में सभी प्रतिभागियों का प्रवेश ओलिंपिक चार्टर के नियमों का पूरी तरह पालन करते हुए किया जाएगा.

इस  विश्व संस्था ने दूसरे इंटरनेशनल संघों से भी अनुरोध किया कि जब तक गारंटी नहीं मिल जाती, वे भारत को कोई भी खेल प्रतियोगिता नहीं दें और न ही यहां इन का आयोजन कराएं.

इस मसले पर भारतीय ओलिंपिक संघ के महासचिव राजीव मेहता ने दिल्ली में कहा, ‘हम ने अपना सर्वश्रेष्ठ करने की कोशिश की लेकिन आखिर में सरकार को ही वीजा देने होते हैं. देश में सभी खेलों के लिए ये भयावह हालात हैं.

‘भारत में किसी टूर्नामेंट की मेजबानी नहीं कर पाने के अलावा हमारे खिलाड़ियों को इंटरनेशनल प्रतियोगिताओं में भाग लेने में भी समस्याएं आएंगीं. हम दोबारा सरकार से बात करेंगे, ताकि हालात इस स्तर तक नहीं पहुंच जाएं.

‘यह ओलिंपिक चार्टर का उल्लघंन है और इस से देश की छवि भी खराब होगी. अगर भारत सरकार 15 से 20 दिन के अंदर यह गारंटी नहीं देती है तो आईओसी से एक और चिट्ठी आ सकती है.’

भारतीय ओलिंपिक संघ पहले ही 2032 के ग्रीष्मकालीन ओलिंपिक खेलों के लिए आईओसी को मेजबानी की इच्छा भेज चुका है और 2026 के युवा ओलिंपिक की बोली लगाने की प्रक्रिया भी अगले साल शुरू होने की उम्मीद है. फिलहाल भारत के पास 2021 में होने वाली पुरुषों की वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप की मेजबानी के अधिकार हैं.

नहीं रहे निर्माता राजकुमार बड़जात्या 

फिल्म ‘हम आपके हैं कौन, ‘हम साथ-साथ हैं’,’विवाह’ और ‘प्रेम रतन धन पायो’ जैसी बेहतरीन फिल्में बनाने वाले हिंदी फिल्म जगत के मशहूर फिल्म निर्माता राजकुमार बड़जात्या का निधन गुरुवार की सुबह मुंबई के सर एचएन रिलायंस फाउंडेशन हौस्पिटल में हुआ. वे एक सहज और सुलझे हुए और हंसमुख इंसान थे और बहुत ही सहजता से सामाजिक विषयों पर साफ-सुथरी फिल्म बनाने में विश्वास रखते थे. उनका कहना था कि मैं ऐसी फिल्में बनाता हूं, जिसे पूरा परिवार साथ बैठकर देख सके. उनकी अनुपस्थिति से हिंदी सिनेमा जगत को काफी आघात लगा है. उनकी इस विरासत को उन्होंने अपने बेटे सूरज बड़जात्या को दिया है और हमेशा उनके साथ किसी भी फिल्म या टीवी सीरियल के प्रमोशन पर साथ खड़े दिखते थे और अपने आनंद को वे सभी पत्रकारों के साथ साझा किया करते थे.

राजश्री प्रोडक्शन बैनर तले फिल्में प्रोड्यूस करने वाले राजकुमार बड़जात्या ‘राजबाबू’ के नाम से भी जाने जाते थे. वे एक अच्छे पटकथा लेखक भी थे. वे हमेशा नए टैलेंट पर विश्वास रखते थे. सलमान खान को सुपरस्टार बनाने वाले राजकुमार बड़जात्या ही थे. उनके द्वारा दिया गया ‘प्रेम’ नाम से वे काफी मशहूर हुए और उन्हें स्टारडम मिला. यही वजह है कि आज भी सलमान राजश्री प्रोडक्शन के किसी भी औफर को ठुकराते नहीं हैं.

इतना ही नहीं, उनका ‘दिल्ली प्रेस’ से काफी गहरा नाता था, वे दिल्ली प्रेस के नियमित सबस्क्रिप्शन लिया करते थे और कई बार वे ‘दिल्ली प्रेस’ के सर्कुलेशन विभाग में खुद आकर चुपचाप कहानियां ढूंढते  थे. एक बार खड़े खड़े मैंने जब उनसे इस बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया था कि ‘दिल्ली प्रेस’ की सारी पत्रिकाओं की कहानियां बहुत ही अलग और समाज सुधारक होती हैं. इसमें रिश्तों और उनके संबंधों को बहुत ही बारीकी से समझाया जाता है. जिसे मैं फिल्मों में दिखाना पसंद करता हूं और ये जिम्मेदारी हम सबकी है, ताकि हमारी नयी जेनरेशन इसकी अहमियत को समझ सके. इन्ही कहानियों को पढ़कर मैंने कई कांसेप्ट तैयार किये हैं और फिल्में बनाई हैं. खासकर पत्रिका ‘सरिता’ को वे अधिक पढ़ते थे. उन्होंने यह भी कहा था कि इसके लिए मैं इस पब्लिकेशन हाउस की सारी टीम को धन्यवाद हमेशा देता हूं. उनका निधन हिंदी सिनेमा के लिए बहुत बड़ी क्षति है.

आलू के चिप्स

सामग्री:-

– बड़े आलू (4)

– तेल (1 लीटर)

– टमाटर पाउडर(1/2 चम्मच)

– जीरा पाउडर (1/2 चम्मच)

– कश्मीरी लाल मिर्च (1/2 चम्मच)

– नमक (स्वादानुसार)

चिप्स बनाने की विधि:-

– सबसे पहले आलू को धोकर छील लें.

– फिर उसे चिप्सर से पतला पतला काट लें.

– और उसे थोड़ा पानी डालकर 10 मिनट के लिए छोड़ दें.

– फिर कढ़ाई में 1 लीटर पानी डालकर गरम करें और फिर उसमे आलू के चिप्स को डाल दें और उसे 2-3   मिनट के लिए पकाये.

– फिर उसी किसी सूती कपड़े या टावल पे निकाल दे और उसका पानी अच्छे से सुखा लें

– अब गैस पे तेल को गरम होने के लिए रख दे और तेल पूरा गर्म हो जाने पे उसमे चिप्स को डाल दे और      उसे फ्राई करें.

जब वो पककर हल्का लाल होने लगे तो उसे निकाल लें.

कैंसर, हार्ट अटैक जैसी बीमारियों के इलाज हैं नट्स

नट्स हमारी सेहत के लिए बेहद जरूरी हैं. इसमें कई ऐसे न्यूट्रिएंट्स पाए जाते हैं जो हमारी सेहत के लिए काफी जरूरी होते हैं. इससे हमारे शरीर की इम्यूनिटी बेहतर रहती है जो हमें बहुत सी बीमारियों से दूर रखता है. हाल ही में एक स्टडी में ये बात सामने आई है कि काजू या पिस्ता खाने से दिल की बीमारी, डायबिटीज और स्ट्रोक का खतरा भी कम रहता है. शोध में ये बात भी सामने आई है कि जो लोग एक हफ्ते में पांच दिन नट्स का सेवन करते हैं उनमें डायबिटीज का खतरा 34 फीसदी कम रहता है और हार्ट अटैक का खतरा 17 फीसदी कम हो जाता है.

इसके अलावा ट्री नट्स जैसे पाइन नट्स,पेकंस, हैलेज जैसे नट्स भी काफी फायदेमंद होते हैं. शोध में ये बात भी सामने आई कि जो लोग रोजाना नट्स का सेवन करते हैं उनमें कोरोनरी हार्ट डिजीज जैसे आर्टरीज के सख्त पड़ जाने का खतरा 20 फीसदी कम हो जाता है. वहीं इन बीमारियों में से किसी भी बीमारी से मरने का खतरा भी 31 फीसदी कम हो जाता है.

शोध में ये बात सामने आई कि जिन लोगों को दिल की बीमारी है उनके लिए नट्स काफी फायदेमंद होते हैं. इससे इन बीमारी से होने वाली मौत का खतरा भी काफी कम हो जाता है.

जानकारों की माने तो नट्स के सेवन से केवल दिलकी बीमारी और डायबिटीज ही नहीं बल्कि कैंसर का खतरा काफी कम हो जाता है. इस शोध में करीब 16,200 लोगों को शामिल किया गया था. इसमें पुरुष और स्त्री दोनों शामिल थे. इन लोगों से बीमारी से पहले और बाद की डाइट के बारे में पूछा गया. बातचीत में ये जानने की कोशिश की गई कि लोगों ने कितनी मात्रा में नट्स का सेवन किया था. नतीजों में पाया गया कि सभी प्रकार के नट्स का सेवन करने वाले लोगों में काफी सुधार देखा गया.

नोटबंदी पर सरकार को मांगनी चाहिए जनता से माफी

नोटबंदी के बेवकूफी वाले फैसले को सही ठहराने के लिए सरकार अब यह दावा कर रही है कि इससे ज्यादा लोग रिटर्न भरने लगे हैं. चूंकि बैंकों में लोगों को वर्षों संभाले पुराने रुपए जमा कराने पड़े थे और उन्हें उस वर्ष की आय दिखाना जरूरी था, यह तो सही है कि आयकर रिटर्नों की गिनती बढ़ गई पर इस से होता क्या है?

क्या सरकार की आय लाखों करोड़ रुपए में बढ़ी? सरकार का घाटा हर साल बढ़ रहा है जिस का मतलब है कि सरकार की आमदनी बढ़ी नहीं है और खर्च बढ़ गए हैं. फिर नोटबंदी पर सरकार को जनता से माफी क्यों नहीं मांगनी चाहिए. उलटे सरकार तो अकड़ कर कह रही है कि यह तो सर्जिकल स्ट्राइक थी.

नोटबंदी के बाद न तो कोई धन्ना सेठ सड़क पर आए, न लोगों के घरबार बिके, न दुकानों के शटर धड़ाधड़ बंद हुए. नोटबंदी मूर्खतापूर्ण कदम थी पर यह मानना पड़ेगा कि इस देश की अंधभक्त जनता को जैसे अपने देवीदेवताओं का कहर भी वरदान लगता है वैसे ही हिंदू कहलाने वाली सरकार केवल सही और सही करती दिखती है.

सरकारों से गलतियां हर जगह होती हैं. जापान ने कभी पर्ल हार्बर पर आक्रमण कर के द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका को निमंत्रण दे दिया और खमियाजा पूरे जापान को भुगतना पड़ा था. हाल में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरान ने यूरोपीय यूनियन में बने रहें या नहीं का जनमत संग्रह करा डाला जिस पर बेखबर जनता ने हां की मोहर लगा डाली और अब 2 साल से यूरोपीय यूनियन से कैसे निकलें के चक्कर में फंसें हैं. जनता का चाहे समर्थन जापान में भी था और ब्रिटेन में भी पर सरकार का फैसला नरेंद्र मोदी के फैसले की तरह महज गलत था.

नोटबंदी को जिस तरह थोपा गया और जिस तरह थोड़े समय में नोट बदलवाने की बंदिश रखी गई वह एक अत्याचार था. इस तरह का आर्थिक आतंक कुख्यात मध्य भारत के ठगों का होता था या ईस्ट इंडिया कंपनी का अकाल के समय अधिक कर वसूलना था जो उन्होंने 1770-80 और फिर 1940-42 में किया.

पीयूष गोयल का नोटबंदी की तारीफ करना जले पर तेजाब डालना है पर मानना होगा कि इस देश की जनता की सहनशीलता की सीमा को. जनता ने कोई दंगा न तब किया और न विरोध अब किया. अरुण जेटली ने इस देश की जनता की गुलामी का राज जान लिया है और तभी बेकारी के आंकड़ों को नकारते हुए कहा कि अगर करोड़ों बेकार हैं तो वे दंगेफसाद क्यों नहीं करते. वे जानते हैं यहां की जनता रेंगना जानती है, नाक रगड़ना जानती है, जबान से जूते चाटना जानती है चाहे वह नेता की हो या पत्थर की किसी मूर्ति की.

टोटल धमालः महज सिर दर्द, इस फिल्म से दूरी ही भली

रेटिंग : डेढ़ स्टार

रोमांचक हास्य फिल्म ‘धमाल ‘ का तीसरा सिक्वल ‘टोटल धमाल‘ बेसिर पैर की कहानी के अलावा कुछ नहीं है. हास्य व रोमांच के नाम पर ‘टोटल धमाल‘ से ज्यादा खराब फिल्म शायद नहीं बनायी जा सकती थी.

फिल्म ‘टोटल धमाल‘ की कहानी होटल किंग्स से शुरू होती है, जहां पुलिस कमिश्नर (बोमन ईरानी) अपने एक सहयोगी के साथ एक काला बाजारी से सौदेबाजी कर रहे हैं. वह उस कालाबाजारी से सौ करोड़ पुराने नोट के बदले पचास करोड़ नए नोट देने का सौदा कर रहे हैं. वहां पर सख्त सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद कमीनेपन के लिए मशहूर गुड्डू (अजय देवगन) अपने साथी जौनी (संजय मिश्रा) के साथ बड़े अजीबोगरीब तरीके से पहुंच जाते हैं. और पचास करोड़ रूपए से भरे बैग होटल के कमरे से नीचे फेंकते हैं, जिन्हे कार में मौजूद उनका तीसरा साथी पिंटू (मनोज पाहवा) लेकर फरार हो जाता है. पिंटू इस रकम को ओंकार जू के अंदर छिपा देता है. पर एक मोड़ पर मरने से पहले पिंटू बता देता है कि उसने यह पचास करोड़ रुपये जनकपुर के ओंकार जू में ओके में छिपाया है. अब इस पचास करोड़़ के पीछे पुलिस कमिश्नर के अलावा गुड्ड भी पड़ जाते हैं. फिर नाटकीय घटनाक्रमों के साथ तलाक ले रहे दंपति अविनाश पटेल (अनिल कपूर) और बिंदू (माधुरी दीक्षित), नौकरी की तलाश में लगे कमीने आदित्य श्रीवास्तव उर्फ आदी (अरशद वारसी) व मानव श्रीवास्तव (जावेद जाफरी) के साथ साथ फायर ब्रिगेड में नौकरी कर रहे मगर घूसखोर लल्लन (रितेश देशमुख) अपने साथी झिंगुर (पितोबाश त्रिपाठी) के साथ लग जाता है. अब सवाल है कि पचास करोड़ का विभाजन इनके बीच कैसे हेगा? काफी बहस के बाद तय होता है कि जो जनकपुर पहुंचकर पहले रकम अपने कब्जे कर लेगा, पचास करोड़ उसके हो जाएंगे. कुछ बेसिर पैर के हास्य व रोमांचक दृश्यों के बाद सभी ओंकार जू पहुंच जाते हैं, जहां एक विलेन भी आ जाता है. पर अंत में यह सभी उस विलेन से जू के जानवरों व मालकिन को छुटकारा दिलाने के साथ साथ धन भी आपस में बराबर बांट लेते हैं.

अति घटिया व बेसिर पैर की कहानी, पटकथा व चरित्र चित्रण वाली फिल्म ‘टोटल धमाल‘ देखकर इस बात का एहसास होता है कि फिल्मकार ने अति जल्दबाजी में बिना किसी तरह की तैयारी किए किसी भी तरह इस फिल्म को फिल्माकर दर्शकों के सामने परोस दी. कहानी के अभाव में फिल्मकार ने सिक्वल के नाम पर कुछ भी परोस दो, कि सोच के साथ यह फिल्म बनायी है. फिल्म का लेखन अति भयानक है. चरित्र चित्रण उससे ज्यादा खराब है. संवाद भी घटिया ही है. बतौर निर्देशक भी इंद्र कुमार बुरी तरह से मात खा गए हैं. पूरी फिल्म देखकर यह समझ में नहीं आता कि क्या ‘टोटल धमाल’ का निर्देशन वास्तव में ‘दिल’,‘बेटा’ या ‘मस्ती’ जैसी फिल्मों के निर्देशक इंद्र कुमार ने ही किया है. फिल्म में दर्शकों को जबरन हंसाने का असफल प्रयास किया गया है. फिल्म में एक भी रोमांचक दृश्यों नहीं है, जिसे देखकर दर्शकों को रोमांच का अहसास हो सके. फिल्म में कई दृश्य तो दूसरी फिल्मों से सीधे उठाकर पेश कर दिए गए हैं.

फिल्म में कृछ दृश्य ऐसे हैं जिन्हे देखकर लेखक व निर्देशक  की सोच व उनकी कल्पना शक्ति पर तरस आता है. मसलन-फिल्म में एक दृश्य है, जहां आदित्य श्रीवास्तव उर्फ आदी (अरशद वारसी) रेत में नीचे धंसते जा रहे हैं, उन्हे बचाने के लिए उनका साथी मानव श्रीवास्तव (जावेद जाफरी) रस्सी की बजाय फुफकारने वाला सांप लेकर आते हैं, आदी सांप के मुंह को कसकर पकड़ लेते हैं और उस सांप को मानव अपनी तरफ खीचते हैं, जिससे आदी रेत के गड्ढे से बाहर आ जाते हैं. इसी तरह के एक नहीं कई बेवकूफी वाले दृश्य इस फिल्म का हिस्सा हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो अजय देवगन कहीं से भी प्रभावित नहीं करते. शुरूआत में अरशद वारसी कुछ समय के लिए जमते हैं, मगर फिर वह भी निराश करते हैं. बाकी के सभी कलाकारों ने अपने आपको दोहराया ही है. ‘मूंगड़ा’ गाने में सोनाक्षी अपने नृत्य से जरुर प्रभावित करती हैं.

वैसे फिल्म में एक भी गाना ऐसा नहीं है,जिसकी जरुरत महसूस हो. हर गाना जबरन ठूंसा हुआ लगता है.

दो घंटे सात मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘टोटल धमाल ‘का निर्माण फौक्स स्टार स्टूडियो, अजय देवगन फिल्म्स, अशोक ठाकरिया, इंद्र कुमार, श्रीअधिकारी ब्रदर्स व आनंद पंडित ने किया है. फिल्म के निर्देशक व कहानीकार इंद्र कुमार, फिल्म के पटकथा लेखक वेद प्रकाश, पारितोश पेंटर व बंटी राठौर, संगीतकार गौरव रूशिन, कैमरामैन कीको नकहारा व फिल्म के कलाकार हैं-अजय देवगन, रितेश देशमुख, अरशद वारसी, जावेद जाफरी, अनिल कपूर, माधुरी दीक्षित, ईशा गुप्ता, बोमन इरानी, संजय मिश्रा, अली असगर,महेश मांजरेकर, पीतोबाश त्रिपाठी, सुदेश लहरी, निहारिका रायजादा, स्वाती कपूर, विजय पाटकर, राजपाल यादव, जौनी लीवर, क्रिस्टल द मंकी, संजय दत्त, अशीष चौधरी व ‘मूंगड़ा’ गाने में सोनाक्षी सिन्हा.

मुलायम ने सौंपा भाजपा को ‘कोरा चेक’

जिस समय समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के दोनो नेता अखिलेश यादव और मायावती लोकसभा चुनाव को लेकर आपसी तालमेल से सीटों का बंटवारा कर रही थी उसी समय मुलायम सिंह यादव इस गठबंधन पर सवाल उठा रहे थे. सपा-बसपा गठबंधन पर सवाल उठाते हुये मुलायम ने यहां तक कह दिया कि भाजपा चुनाव में आगे निकल गई है. इसके पहले लोकसभा में भाषण देते हुये भी मुलायम सिंह यादव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ करते यहां तक कहा कि वह फिर से चुनाव जीत कर आएं. मुलायम के इस बयान से सहयोगी दलों बहुत असहज हो गये थे. विक्रमादित्य लखनऊ स्थित समाजवादी पार्टी के कार्यालय में जिस समय अखिलेश यादव और गुजरात के नेता हार्दिक पटेल बात कर रहे थे मुलायम वहां आये और कहा ‘मुझे पार्टी का संरक्षक बनाया जबकि कोई जिम्मेदारी नहीं दी.’

मुलायम के इस गुस्से के पीछे सपा-बसपा की दोस्ती को बड़ा कारण माना जा रहा है. 1993 में जब सपा-बसपा में तालमेल हुआ था उस समय मुलायम-कांशीराम के बीच समझौता हुआ था. उस समय मायावती मुलायम के खिलाफ थी. मायावती के विरोध के कारण ही सपा-बसपा की सरकार गिरी. उसके बाद लखनऊ गेस्ट हाउस कांड हुआ. जिसमें मायावती की जान को खतरा बन गया था. मायावती और मुलायम के बीच इसके बाद संबंध खराब हुये तो फिर कभी दोस्ती नहीं हुई. 2018 में अखिलेश और मायावती के बीच तालमेल बना. इस तालमेल के बाद लोकसभा की 37 सीटों पर सपा और 38 पर बसपा चुनाव लड़ेगी. सपा-बसपा की दोस्ती में मुलायम सिंह यादव कभी शामिल नहीं हुये.

मुलायम को मलाल है कि उनसे राय नहीं ली गई. अखिलेश भले ही फैसला करते पर इसकी घोषणा का काम मुलायम को ही करना चाहिये था. 37 सीटों पर चुनाव लड़कर आधी सीटें सपा पहले ही हार गई है. मुलायम यह भी कहते हैं कि 2004 में सपा 37 सीटे जीती थी उपचुनाव जीत कर यह सीटें 42 हो गई थी. मुलायम कहते हैं अखिलेश को भले ही टिकट देने का अधिकार हो पर उनको टिकट काटने का अधिकार है. सपा-बसपा पर इस ‘मुलायम वाणी’ को लेकर राजनीतिक जानकार मानते है कि इससे सपा के कार्यकर्ताओं में कन्फ्यूजन हो गया. जिसका नुकसान चुनाव में सपा को उठाना होगा.

समाजवादी पार्टी का हालत पहले से ही खराब चल रही है. पार्टी में ऐसा कुछ भी नया नहीं हो रहा जिससे लोग उसके साथ जुड़ें. पार्टी की बिगड़ती हालत से पिछड़े वर्ग का मतदाता भ्रम में है. उसे समझ में नहीं आ रहा कि वह कांग्रेस में जाये, भाजपा में जाये, सपा में रहे या चाचा शिवपाल की पार्टी में जाये. सपा की दूसरी बड़ी वोट बैंक कांग्रेस की तरफ बढ़ चुकी है. लोकसभा चुनाव में वह कांग्रेस के साथ खड़ी दिख रही है.

सपा नेता अखिलेश यादव की छवि भी ममता बनर्जी या नवीन पटनायक जैसे जुझारू नहीं है. इसके बाद घर का विवाद उनके रास्ता नहीं छोड़ रहा. ऐसे में बारबार नई बातें सामने आ रही हैं. मोदी और भाजपा की तारीफ करके मुलायम ने पिछड़े वर्ग के वोट बैंक से ‘कोरा चेक’ काट कर भाजपा को सौंप दिया है. देखा जाये तो पिछड़ा वोट बैंक पहले से खाली था. अब इस ‘कोरा चेक’ को लेकर भाजपा खुश हो रही है. भाजपा को इससे कुछ मिले ना मिले पर अखिलेश को मुश्किल हो सकती है.

सोशल मीडिया पर धार्मिक झूठ के संदेश

फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप ने झूठ का प्रचार करने में धर्मों को भी शांत कर दिया है. हर धर्म के अपने झूठ को ही अंतिम सत्य साबित करने में 100-200 या इस से भी ज्यादा साल लगे हैं पर इन हाईटैक कंपनियों झूठ को सच मानने की आदत सप्ताहों में उलझा दी.

धर्मों की खबर फैलाने में लंबा समय लगता था. जिस ने झूठ गढ़ा उसे अपने आसपास के 10-20 लोगों को झूठ दूत बना कर दूसरी जगह भेजना पड़ता था जिस में महीनों लगते थे. इन टैक प्लैटफार्मों पर झूठ तैयार करो और धर्मों में दुनिया के कोनेकोने में पहुंचा दो. अगर वहां झूठ को सच मानने वाले मिले तो वह वायरल हो कर कुछ ही दिनों में सदासदा के लिए सच बन जाता.

फर्क यह रहा है कि धार्मिक झूठ ने पक्की जमीन ली थी. उसे जिस ने माना अंतिम सत्य मान लिया और उसे झूठ कहने वाले का सिर काट दिया या अपना कटवा लिया पर झूठ को झूठ नहीं माना. हाईटैक झूठ की पोल भी उतनी ही तेजी से खुलने लगी और अब फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप के लिए खतरे की घंटी बज रही है कि उन पर भरोसा किया जाए या नहीं.

अमेरिकी चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया का जम कर फायदा उठाया क्योंकि वहां के गोरों को डर था कि काले, भूरे, सांवले, पीले लोग देश पर कब्जा न कर लें. भारत में 2014 में विकास और अच्छे दिनों के पीछे दलितों, पिछड़ों की बढ़ती तादाद और ताकत डरा रही थी. दोनों जगह चुनावों में स्पेशल मीडिया पर जम कर झूठ फेंका गया. अब टैक कंपनियां थोड़ी सावधान हुई है. फेसबुक ने अब संदेश पढ़ने शुरू कर दिए हैं और उस ने अकाउंट बंद करने शुरू कर दिए हैं जो भ्रामक झूठ या घृणा फैलाने में माहिर थे.

मतलब यह है कि अब फेसबुक की चिट्ठी डाकिया पढ़ने लगा है और यदि उसे लगे कि उस में गलत बातें हैं तो चिट्ठी भी दबा सकता है, भेजने वाले या पाने वाले को बैन कर सकता है. फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप और गूगल अब सरकारों से ज्यादा ताकतवर हो गए हैं. वे पार्टियों के ऊपर है. वे जनता के अकेले मार्गदर्शक हैं और उन्हें जनता के भले की नहीं अपने पैसों की चिंता है. वे पैसा मिले तो हर झूठ को फैला देंगे, न मिले तो सच को झूठों के अंबार के नीचे दबा देंगे.

लोग इस की भारी कीमत चुकाने लगे हैं. आज अज्ञान और गलत ज्ञान जम कर फैल रहा है और विज्ञान पिछड़ रहा है. नतीजा यह है कि लोग चुटकुलों से जीवन जीना सीख रहे हैं, पौर्न से साथी बच रहे हैं, मोबाइल के कैमरे से खींची अंतरंग तसवीरों को इन टैक प्लैटफार्मों से फैसलाने की धर्मांतरण दे कर अपनी बात मनवा रहे हैं. इन का असर गलत सरकार चुनने से ले कर घर, परिवार और संबंधों में गलतफहमी पैदा करने तक पर पड़ रहा है.

तो क्या आ गए परिणीति के बुरे दिन!

‘‘शुद्ध देशी रोमांस’’से लेकर अब तक लगातार कई असफल फिल्में दे चुकी परिणीति चोपडा की इस वर्ष यूं तो चार फिल्में प्रदर्शित होने वाली हैं, मगर उनके साथ कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा है. बौक्स आफिस पर उनकी लगातार असफल हो रही फिल्मों के ही चलते अब तो उनके हाथ से इंडोर्समेंट भी जाने लगे हैं. अब तक एक खाने के एक प्रोडक्ट की ब्रांड अम्बेसेडर रही परिणीति चोपड़ा के हाथ से अब यह प्रोडक्ट चला गया.

सूत्रों की माने तो इस प्रोडक्ट को बनाने वाली कंपनी ने इस बार अपने प्रोडक्ट का ब्रांड अम्बेसेडर परिणीति चोपड़ा की बजाय तापसी पन्नू को बनाते हुए तापसी पन्नू के साथ दो एड फिल्में भी फिल्मा ली है. अब इसे परिणीति चोपड़ा के बुरे दिन कहें या उनके अंदर अभिनय क्षमता का अभाव..?

पावभाजी रेसिपी

सामग्री-

– उबले हुए आलू (7 से 10)

– कांदे (5 से 8)

– टमाटर (4 से 6)

– फूल गोभी (1 उबली हुई)

– उबले हुए मटर (1 कप)

– मक्खन (250 ग्राम)

– स्वादानुसार नमक

–  ब्रेड के टुकड़े (10 – 12)

पावभाजी बनाने की विधि

–  आलू, फूल गोभी और मटर को एकसाथ उबाल लें.

– टमाटर और कांदे का अलग अलग पेस्ट बनाये और उन्हें अलग-अलग बर्तन में रख दें.

– एक कढ़ाई में तक़रीबन 200ग्राम मक्खन मिलाये और उसमे कांदे के पेस्ट को मिलाये.

– उसमे एक चुटकी नमक और 1 चम्मच पावभाजी मसाला मिलाये.

– और जब तक वह हल्का सा गुलाबी नही होता तब तक उसे पकने दें.

–  अब उसमे टमाटर का पेस्ट मिलाये और धीमी आंच पर पकने दें, जब तक की पूरा मिश्रण पक नही           जाता.

– अब उसमे मसले हुए आलू और मटर के पेस्ट को मिलाये, बाद में उबली हुई फूल मिलाये और गोभी के      पेस्ट को  और 2-3 मिनट तक पकने दें.

– अब उसमे स्वाद बढ़ाने के लिये एक चुटकी और पावभाजी मसाला डालें.

–  सजावट के लिये कांदे काटे और अंत में हरा धनिया भी काटें.

– पांव को तैयार करें, पाव को बिच से थोडा काटे और तवे पर मक्खन लगाये और पाव को तवे पर लगाये      मक्खन पर रखें.

–  गरमा-गर्म पांव को स्वादिष्ट भाजी के साथ परोसें.

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