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रोमांटिक ट्रिप: इन शहरों की हवाओं में जादू है, नशा है!

जीवन में चाहे जितनी कठिनाइयां क्यों न आएं लेकिन अगर आप अपनों को समय देते हुए साथ साथ काम करते चलते हैं तो कठिनाइयां चुटकियों में कम हो जाती हैं. अपने बिजी शेड्यूल से कुछ वक्त चुराइए और आ जाइए नार्थ की इन रोमांटिक डेस्टिनेशन पर जाए. जहां आप और आपके पार्टनर के बीच सारी गलतफहमियां खत्म हो जायेंगी.

शादी एक ऐसा पवित्र बंधन जो न सिर्फ दो लोगों या दो परिवारों को मिलाती है बल्कि दो आत्माओं को भी एक करती है. एक ऐसी गांठ जो लाइफ को प्यार, आनंद और रोमांस की ओर ले जाता है. तो क्यों न इसमें एक ट्विस्ट डाले जो जाए एक सुखद रोमांटिक ट्रीप पर. पर ज्यादातर लोग यह सोचकर परेशान हो जाते हैं कि आखिर जाए कहां. अपने रोमांटिक ट्रीप को यादगार कैसे बनाए.

तो आइए हम आपको कुछ खूबसूरत और आनंद से भरे रोमांटिक डेस्टिनेशन के बारे में बताते हैं.

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  1. चंबा

उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले में स्थित चंबा रोमांटिक युगल के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है. प्रदूषित रहित वातावरण, शांत व मनोरम दृश्य, ऊंचे ऊंचे घने वृक्ष, नदी का कल कल करता पानी और यहां की संस्कृति आपको बेहद भाएगी, कि आप यहीं रह जाने को सोचने लगेंगे. यह जगह सेब के बाग के लिए भी मशहूर है. यहां आप कई आकर्षक मंदिरों के भी दर्शन कर सकते हैं.

2. शिलांग

पूर्वोत्तर भारत का बेहद आकर्षक स्थल शिलांग पूर्वोत्तर भारत का स्कौटलैंड कहा जाता है. हरे भरे घने जंगल, फूलों की मनमोहक खुशबु, बादलों को ओढ़े पहाड़ और पानी का शोर यह सब देखके मन शिलांग की खूबसूरती में डूब जाता है. यहां के लोग और उनकी संस्कृति भी बेमिसाल है, मेहमानों की खातिरदारी का यह एक जीत जागता उदाहरण हैं.

3. नुब्रा घाटी

लद्दाख के बाग के नाम से जाना जाने वाली नुब्रा घाटी फूलों की घाटी कहलाती है. गर्मियों के मौसम में यहाँ पीले रंग के जंगली गुलाब खिल जाते हैं. जिनका दृश्य बेहद लुभावना लगता है. साल बाहर बर्फ से ढकी रहने वाली नुब्रा घाटी कारण विश्व प्रसिद्ध है, जिसे हर युगल जोड़ा पसंद करती है, इसकी ठंडी वादिया प्यार को गर्म करने की कोशिश करती है.

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4. सापूतारा

गुजरात का हरा भरा और गुजरात की नमी को समेटे हुए सापूतारा बेहद लोकप्रिय स्थल है. सापूतारा झील, सूर्यास्त प्वाइंट, सूर्योदय प्वाइंट, टाउन व्यू प्वाइंट और गांधी शिखर जैसे कई आकर्षणों के लिए जाना जाता है. यहां कई अभ्यारण,पार्क और बाग़ हैं- वंसदा नेशनल पार्क, पूर्णा अभयारण्य, गुलाब उद्यान, रोपवे सापूतारा आदि. यहां आकर आप प्राकृतिक नज़ारों का जी भर के लुफ्त उठा सकते हैं.

5. कलिम्‍पोंग

कलिम्‍पोंग भारत के पश्चिम बंगाल राज्‍य में स्थित यह आकर्षक स्थल हमेशा से ही पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहा है. आप अपने पार्टनर के साथ यहां आ सकते हैं क्यूंकि यहां की बर्फ से ढकी चोटियां एक बेहद रोमांटिक दृश्य प्रस्तुत करती हैं. यहां की ठंडी ठंडी हवा आपकी सारी थकान पल-भर में गायब कर देगी, जिससे आप एकदम रिलेक्स फील करेंगे.

सोशल मीडिया की लेखिकाएं हड़बड़ी में क्यों हैं : चित्रा मुद्गल

फेसबुक ने लेखन और अभिव्यक्ति को नए आयाम दिए हैं. एक जमाने में नए लेखकों को अपना लिखा हुआ छपा देखने, उसे पाठकों तक पहुंचाने आदि के लिए लिखने से भी कई गुना ज्यादा मेहनत करनी पड़ती थी, फिर भी यह गारंटी नहीं होती थी कि उन का लिखा हुआ छप कर उन की आंखों के सामने पाठकों तक पहुंच ही जाएगा. मुक्तिबोध जैसे मूर्धन्य कवि की कविताएं भी उन के जीतेजी नहीं छपी थीं. जबकि आज सोशल मीडिया ने न सिर्फ मंझे हुए लेखकों को, बल्कि आम नौसिखिया लेखकों को भी यह सुविधा दी है कि वे अपना लिखा हुआ जितना जल्दी चाहें, यहां तक कि लिखतेलिखते हुए भी चाहें तो, अपना लिखा हुआ पाठकों से साझा कर सकते हैं, उन की राय ले सकते  हैं.

फेसबुक या तमाम सोशल मीडिया मंचों ने लेखन का एक किस्म का जनतंत्र कायम कर दिया है. इस से जहां नए लेखक खुश हैं, वहीं पुराने लेखकों को लगता है कि सोशल मीडिया ने लेखन का यह जो शौर्टकट और पाठकों की एक वर्चुअल दुनिया पैदा की है, उस से लेखन का स्तर गिरा है. कई पुराने लेखक तो फेसबुक के लेखन को लेखन ही नहीं मानते जबकि नई पीढ़ी इसे पुरानी पीढ़ी की ईर्ष्या और अपनी खत्म हो रही मठाधीशी का खतरा मानती है.

फेसबुक के इस दौर के लेखन और इस दौर की लेखिकाओं के संबंध में मशहूर साहित्यकार चित्रा मुदगल क्या सोचती हैं, आइए जानते हैं उन से बातचीत के जरिए.

जब से आम आदमी को अपनी अभिव्यक्ति के लिए सोशल मीडिया का मंच मिला है, तब से महिला लेखिकाओं की बाढ़ सी आ गई है. आखिर इस का क्या कारण है? क्या महिलाओं को लेखिका बनाने में या महिला लेखिकाओं को सामने लाने में सोशल मीडिया की कोई भूमिका है?

बहुत बड़ी भूमिका है. पहली बात तो वे सोशल मीडिया में अवतरित हुईं, उस तकनीकी को सीखा. उस का इस्तेमाल दूसरे क्षेत्रों की जानकारी हासिल करने के अलावा अपनी सोच की अभिव्यक्ति के लिए भी किया और कर रही हैं. उन की रचनाएं चाहे परिपक्व हों या अपरिपक्व, महत्त्वपूर्ण हैं. वास्तव में हर वह व्यक्ति जिस के मन में भाव उठते हैं या किसी बात को ले कर उस में सहमतिअसमहति होती है या उसे लगता है कि मेरा समाज जिस तरह का है, उस में इनइन बेहतरी की जरूरत है तो उसे वह सोशल मीडिया पर प्रकाशित कर देता है.

इस संबंध में आधी आबादी यानी महिलाओं को ले कर खुलेदिल से सोचने की जरूरत है कि उन का अपना वजूद है. उन का भी अपना अस्तित्व है. उन की अपनी अभिव्यक्ति है. वह सब अब सोशल मीडिया के माध्यम से आसानी से अभिव्यक्त हो रहा है. सोशल मीडिया ऐसा मंच है, जहां कोई कहने वाला नहीं है, कोई रोकटोक नहीं है कि यह कमजोर रचना है, इसे क्यों प्रकाशित कर रही हैं.

उन की रचनाओं के लिए उन्हें पाठक भी मिल रहे हैं. तो एक बात तो लगती है कि रचनाएं चाहे जैसी हों, उन के लिए एक मंच मिला है. यह एक अच्छी बात है. हां, मैं यह जरूर कहूंगी कि इस मंच में आ रही लेखिकाओं को अपने लेखों के प्रति ईमानदार होना जरूरी है. केवल लाइक और डिस्लाइक पर ही न जाएं. अगर उन के लेखों की आलोचना हो रही है, तो उसे स्वीकार कर खुद की कलम को बेहतर बनाने की कोशिश करें. इस के लिए सिर्फ अपनी या अपने परिचितों की किताब ही न खरीदें, बल्कि बड़े लेखकों की किताबें भी पढ़ें. जब वे बड़े लेखकों को पढ़ेंगी तो उन्हें पता चलेगा कि वे किस प्रकार अपने भावों को अभिव्यक्त करते हैं.

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आमतौर पर सोशल मीडिया का दौर आने से पहले ही स्थापित हो चुके लेखक सोशल मीडिया के दौर के लेखकों को कमतर कर के आंकते हैं, वे सोशल मीडिया में पाठकों के बीच ऐसे लेखकों की लोकप्रियता को बहुत तवज्जुह नहीं देते. इस के पीछे पुराने लेखकों का क्या तर्क हो सकता है?

पहली बात तो यह है कि आप स्थापित लेखक या लेखिकाओं पर इस तरह का अधकचरा आरोप नहीं लगा सकतीं. अगर सोशल मीडिया से जुड़ी हुई लेखिकाएं यह सोचती हैं कि उन का लिखा हुआ शब्द आखिरी शब्द है, तो यह उन की सब से बड़ी भूल है. दूसरी चीज, अगर स्थापित लेखिकाएं उन से उम्मीद करती हैं कि परिपक्व रचना करें, सृजन करें, तो यह गलत नहीं है. तीसरी बात यह है कि लेखन को, कोई भी लिखने वाले, अभिव्यक्त करने वाले को यह मान कर चलना चाहिए कि अगर आप रचनात्मक लेखन में पैर रख रही हैं तो यह आप के जीवन की एक गंभीर बात है. जब तक नए दौर की लेखिकाएं सृजनात्मक लेखन, उस की अहमियत को, सामाजिक सरोकारों के महत्त्व को नहीं समझेंगी, तब तक उन्हें यही लगेगा कि उन्होंने जो कुछ लिखा है, वही बहुत ऊंची चीज है. यह बात उन के लेखन के लिए ठीक नहीं है.

एक और बात जो बहुत महत्त्वपूर्ण है, वह है कि सृजन बहुत बड़ी साधना है, तप है. तप कर के ही आप सृजन कर सकती हैं. जिस का लेखन तप कर के निकलता है, वह मील का पत्थर बन सकता है. उन्हें खुद अपना मूल्यांकन करने की जरूरत है. पढ़ने वाले अगर मूल्यांकन करते हैं, तो इस में गलत क्या है? स्थापित लेखिकाएं कभी भी सोशल मीडिया की लेखिकाओं पर नकारात्मक आरोप नहीं लगा सकतीं, क्योंकि वे जानती हैं वे भी शुरुआत में यों ही कच्चीपक्की रचनाएं लिख कर ही आगे आई हैं. लेकिन अब उन्हें लिखतेलिखते 40-50 वर्ष हो गए हैं. यह भी जरूरी नहीं है कि जिसे लिखतेलिखते 20 वर्ष हो गए हैं, वह अपने सृजनात्मक में इतने गहरे उतर चुका है कि वह समाज के तलछट को छू सकता है. यह अच्छा संकेत नहीं है.

सोशल मीडिया विशेषकर फेसबुक में लोकप्रिय लेखकों या लेखिकाओं को पुराने लेखक या लेखिकाएं यह कह कर के भी बहुत वजन नहीं देते कि ये लोग संपादकों की सचेत नजर से निखर कर सामने नहीं आए हैं, इसलिए इन में वह लेखकीय निष्ठा और परिपक्वता नहीं है जो पुराने जमाने के दौर में काफी संघर्ष के बाद स्थापित होने वाले नए लेखकों में होती थी, आखिर यह तर्क कितना सही है?

सब से पहले तो आप यह समझें कि स्थानीय लेखिकाएं किसी से ईर्ष्या करने के लिए स्थापित लेखिकाएं नहीं हुई है. उन्हें लिफाफे में अपनी रचनाओं के साथसाथ एक वापसी का लिफाफा भी भेजना पड़ता था. सोशल मीडिया में ऐसा नहीं है. लेकिन जो स्थापित लेखिकाएं तप कर लेखिका बनी हैं, उन के लिफाफे जब लौट आते थे, तो वे इसे चुनौती मानती थीं और बेहतर लिखने की कोशिश करती थीं.

अगर आज की सोशल मीडिया के दौर की लेखिकाएं किसी तरह की प्रतिकूल प्रतिक्रिया को सह नहीं सकती हैं तो मुझे दुख है इस बात का. मुझे यह जान कर दुख हो रहा है कि उन्हें इतनी हड़बड़ी क्यों है? सिर्फ इसलिए कि स्थापित लेखिकाएं उन्हें महान समझने लगें, तो यह सही नहीं है. स्थापित लेखिकाओं को उन्हें सोशल मीडिया में उन के लेखों को पढ़ कर उन की कमजोरियां निकालनी चाहिए और सोशल मीडिया की नई लेखिकाओं में अपनी आलोचना सुनने की कूवत भी होनी चाहिए.

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आप के मुताबिक, सोशल मीडिया के पाठकों व पुराने पाठकों में क्या खास फर्क होता है या होता था? और वे क्या तर्क हैं जिन के चलते सोशल मीडिया के पाठकों को गैरसोशल मीडिया वाले पाठकों से कमतर माना जाए?

इसलिए कमतर माना गया है कि मैं ने सुना है, सोशल मीडिया में एक खेमा बना लिया जाता है. जो लेखक है, उस को उस के जानने वाले ही पढ़ते हैं और वाहवाही करते हैं. जबकि पहले जब पत्रपत्रिकाओं में कहानियां छपती थीं, तो वे किसी समूह का अंग नहीं होती थीं. हां, वे किसी विचारधारा का अंग तो होती रही होंगी. जब पाठकों की अदालत में किसी लेखक की रचना जाती थी तो उस का पाठक कोई भी हो सकता था. वह किसी भी विचारधारा का हो सकता था और हर तरह की विचारधारा के कैद से मुक्त हो, ऐसा भी हो सकता था.

सोशल मीडिया का पाठक, मैं इस के बारे में ठीक से नहीं कह सकती हूं लेकिन एक अनुभवी होने के नाते, मैं इतना कह सकती हूं कि एक लेखक को आत्महंता होना चाहिए. सोशल मीडिया में प्रकाशित करने से पहले अपने लेखन को बारबार पढ़ना चाहिए. साथ ही, अपने बुजुर्गों के अनुभवियों को जरूर पढ़ाना चाहिए, चाहे बात आधी आबादी की ही क्यों न हो. उस समय के अनुभवी लेखिकाओं को पढ़ें, तो आप पाएंगी कि वे अपने मन की हर बात को कितने प्रभावशाली ढंग से रखती थीं.

अगर सोशल मीडिया की लेखिकाएं खुद को स्थापित लेखिकाओं की शत्रु की तरह पेश करेंगी, तो यह बचपना ही लगेगा. हम स्वागत करते हैं सोशल मीडिया का और नई पीढ़ी का भी क्योंकि सोशल मीडिया ने ऐसा मंच दिया है कि मन में कोई बात आई नहीं, कि उसे सैकंड्स में स्क्रीन पर उतारा जा सकता है. यह उस का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण बिंदु हैं.

अगर स्थापित लेखिकाएं नकारात्मक भाव रख कर उन की आलोचना करती हैं, तो गलत है. नकारात्मक भाव मन के भीतर न रख कर बड़े लेखकों के लेखों को पढ़ना चाहिए और जो उन की सलाह है, नई लेखिकाओं को उस पर जरूर ध्यान देना चाहिए. मैं यह कहना चाहती हूं कि सोशल मीडिया बहुत बड़ा माध्यम है, जबकि स्थापित लेखक या लेखिकाओं को यह सुविधा पहले उपलब्ध नहीं थी. आज के लेखकों के लिए यह माध्यम उपलब्ध है.

हम ने देश को, समाज को, लोगों के मन को साहित्य के जरिए ही जाना है. इस वजह से तब देर लगती थी लोगों को जाननेसमझने में. लेकिन अब ऐसा नहीं है.

कहने का अर्थ यह है कि सहीगलत की समझ का विवेक हम में होना चाहिए, साथ ही, एक आलोचक भी अपने मन में रखना चाहिए. इस से नए लेखकों की ही बेहतरी होगी.

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जानें, कैसे बनाएं अरबी काजू की टिक्की

अरबी और काजू से बनाई जाने वाली टिक्की काफी स्वादिष्ट होती है. इस टिक्की को धनिए की चटनी के साथ आप सर्व कर सकते हैं, तो आइए जानते है, इसकी रेसिपी.

सामग्री

अरबी (200 ग्राम)

काजू (50 ग्राम)

हरी मिर्च (2)

नमक (स्वादानुसार)

घी (तलने के लिए)

गार्निशिंग के लिए ताजा हरा धनिया

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बनाने की वि​धि

थोड़ा-सा नमक डालकर अरबी को उबाल लें.

और काजू का पेस्ट बना लें.

अरबी को मैश कर लें और इसमें काजू का पेस्ट, हरी मिर्च और घी डालकर मिलाएं.

अब इस मिश्रण से टिक्की बना लें और पैन में शैलो फ्राई कर लें.

गोल्डन ब्राउन होने के बाद इसे दही के साथ सर्व करें.

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अपना घर- भाग 1: आखिर विजय के घर में अंधेरा क्यों था?

विजय की गुस्से भरी आवाज सुनते ही सुरेखा चौंक उठी. उस का मूड खराब था. वह तो विजय के आने का इंतजार कर रही थी कि कब विजय आए और वह अपना गुस्सा उस पर बरसाए क्योंकि आज सुबह औफिस जाते समय विजय ने वादा किया था कि शाम को कहीं घूमने चलेंगे. उस के बाद खरीदारी करेंगे. खाना भी आज होटल में खाएंगे. शाम को 6 बजे से पहले घर पहुंचने का वादा किया था.

4 बजे के बाद सुरेखा ने कई बार विजय के मोबाइल फोन पर बात करनी चाही तो उस का फोन नहीं सुना था. हर बार उस का फोन काट दिया गया था. वह समझ नहीं पा रही थी कि आखिर क्या बात है? जल्दी नहीं आना था तो मना कर देते. बारबार फोन काटने का क्या मतलब?

सुरेखा तो शाम के 5 बजे से ही जाने के लिए तैयार हो गई थी. पता नहीं, औफिस में देर हो रही है या यारदोस्तों के साथ सैरसपाटा हो रहा है. बस, उस का मूड खराब होने लगा था. उसे कमरे की लाइट औन करना भी ध्यान नहीं रहा.

सुरेखा ने विजय की ओर देखा. विजय का चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था. 2 साल की शादीशुदा जिंदगी में आज वह पहली बार विजय को इतने गुस्से में देख रही थी.

सुरेखा अपना गुस्सा भूल कर हैरान सी बोल उठी, ‘‘यह क्या कह रहे हो? मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रही हूं. तुम्हारा फोन मिलाया तो हर बार तुम ने फोन काट दिया. आखिर बात क्या है?’’

‘‘बात तो बहुत बड़ी है. तुम ने मुझे धोखा दिया है. तुम्हारे मातापिता ने मुझे धोखा दिया है.’’

‘‘धोखा… कैसा धोखा?’’ सुरेखा के दिल की धड़कन बढ़ती चली गई.

‘‘तुम्हारे धोखे का मुझे आज पता चल गया है कि तुम शादी से पहले विकास की थी,’’ विजय ने कहा.

यह सुन कर सुरेखा चौंक गई. वह विजय से आंख न मिला पाई और इधरउधर देखने लगी.

‘‘अब तुम चुप क्यों हो गई? शादी को 2 साल होने वाले हैं. इतने दिनों से मैं धोखा खा रहा था. मुझे क्या पता था कि जिस शरीर पर मैं अपना हक समझता था, वह पहले ही कोई पा चुका था और मुझे दी गई उस की जूठन.’’

‘‘नहीं, आप यह गलत कह रहे हो.’’

‘‘क्या तुम विकास से प्यार नहीं करती थी? तुम उस के साथ पता नहीं कहांकहां आतीजाती थी. तुम दोनों को शादी की मंजूरी भी मिल गई थी कि अचानक वह कमबख्त विकास एक हादसे में मर गया. यह सब तो मुझे आज पता चल गया नहीं तो मैं हमेशा धोखे में रहता.’’

यह सुन कर सुरेखा की आंखें भर आईं. वह बोली, ‘‘तुम्हें किसी ने धोखा नहीं दिया है, मेरी किस्मत ने ही मुझे धोखा दिया है जो विकास के साथ ऐसा हो गया था.’’

‘‘तुम ने मुझे अब तक बताया क्यों नहीं?’’

सुरेखा चुप रही.

‘‘अब तुम यहां नहीं रहोगी. मैं तुम जैसी चरित्रहीन और धोखेबाज को अपने घर में नहीं रखूंगा.’’

‘‘विजय, मैं चरित्रहीन नहीं हूं. मेरा यकीन करो.’’

‘‘प्रेमी ही तो मरा है, तुम्हारे मांबाप तो अभी जिंदा हैं. जाओ, वहां दफा हो जाओ. मैं तुम्हारी सूरत भी नहीं देखना चाहता. अपने धोखेबाज मांबाप से कह देना कि अपना सामान ले जाएं.’’

सुरेखा सब सहन कर सकती थी, पर अपने मातापिता की बेइज्जती सहना उस के वश से बाहर था. वह एकदम बोल उठी, ‘‘तुम मेरे मम्मीपापा को क्यों गाली देते हो?’’

‘‘वे धोखेबाज नहीं हैं तो उन्होंने क्यों नहीं बताया?’’ कहते हुए विजय ने गालियां दे डालीं.

‘‘ठीक है, अब मैं यहां एक पल भी नहीं रहूंगी,’’ कहते हुए सुरेखा ने एक बैग में कुछ कपड़े भरे और चुपचाप कमरे से बाहर निकल गई.

सुरेखा रेलवे स्टेशन पर जा पहुंची. रात साढ़े 10 बजे ट्रेन आई.

3 साल पहले एक दिन सुरेखा बाजार में कुछ जरूरी सामान लेने जा रही थी. उस के हाथ में मोबाइल फोन था. तभी एक लड़का उस के हाथ से फोन छीन कर भागने लगा. वह एकदम चिल्लाई ‘पकड़ो… चोरचोर, मेरा मोबाइल…’

बराबर से जाते हुए एक नौजवान ने दौड़ लगाई. वह लड़का मोबाइल फेंक कर भाग गया था. जब उस नौजवान ने मोबाइल लौटाया, तो सुरेखा ने मुसकरा कर धन्यवाद कहा था.

वह युवक विकास ही था जिस के साथ पता नहीं कब सुरेखा प्यार के रास्ते पर चल दी थी.

एक दिन सुरेखा ने मम्मी से कह दिया था कि विकास उस से शादी करने को तैयार है. विकास के मम्मीपापा भी इस रिश्ते के लिए तैयार हो गए हैं.

पर उस दिन अचानक सुरेखा के सपनों का महल रेत के घरौंदे की तरह ढह गया जब उसे यह पता चला कि मोटरसाइकिल पर जाते समय एक ट्रक से कुचल जाने पर विकास की मौत हो गई है.

सुरेखा कई महीने तक दुख के सागर में डूबी रही. उस दिन पापा ने बताया था कि एक बहुत अच्छा लड़का विजय मिल गया है. वह प्राइवेट नौकरी करता है.

सुरेखा की विजय से शादी हो गई. एक रात विजय ने कहा था, ‘तुम बहुत खूबसूरत हो सुरेखा. मुझे तुम जैसी ही घरेलू व खूबसूरत पत्नी चाहिए थी. मेरे सपने सच हुए.’

बजट नहीं ‘बही खाता’ कहिए, महिलाओं के लिए कुछ नया नहीं

2019 के आम बजट में नई बात यह थी कि देश की पहली पूर्णकालिक पहली महिला वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जब बजट पेश किया तो उनके हाथ में लाल रंग के ब्रीफकेस की जगह लाल रंग का मखमली पैकेट था. निर्मला ने कहा कि अभी तक चली आ रही प्रथा को पूरी तरह बदल दिया. अब बजट को बजट नहीं बल्कि बहीखाता कहा जायेगा. देश की पहली महिला पूर्णकालिक वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जब देश का आम बजट पेश किया तो देश की जनता खासकर महिलाओं को उम्मीद थी कि उनके लिये कुछ खास होगा. महिलाओं के लिये बजट में कुछ नया नहीं है जिसको केवल महिलाओं के लिये फोकस करके किया गया हो.

बजट में ‘नारी तू नारायणी’ नाम से महिलाओं को एक अलग नारा दिया गया है. यह ठीक उसी तरह से है जिस तरह से देश भर में महिलाओं को लक्ष्मी माना जाता है इसके बाद भी महिलाओं के प्रति समाज में अपराधों में कमी नहीं आ रही है. बजट में महिलाओं को ‘नारी तू नारायणी’ कह कर झांसा देने की कोशिश की गई है. इस नारे के बाद भी वित्त मंत्री ने राहत की जो बातें कहीं हैं वह उन महिलाओं के लिये हैं, जो स्वयं सहायता समूह से जुड़ी और सरकार ने उन समूह को प्रमाणित कर रखा है.

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ऐसे में साफ है कि सामान्य महिलाओं के लिये इस बजट में कोई नया प्रावधान नहीं है. सरकार ने सोना मंहगा कर दिया है जिससे महिलाओं को अब गहने पहनने के लिये ज्यादा कीमत देनी होगी. आज के समय में बड़ी संख्या में कामकाजी महिलाएं हैं जो वाहन चालक है और अपने काम के लिये टू व्हीलर या कार चलाती हैं. डीजल और पेट्रोल मंहगा होने से महिलाओं पर प्रभाव पड़ेगा.

बजट में महिलाओं की उम्मीदों को देखते हुये वित्त मंत्री ने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने स्वामी रामकृष्ण को लिखे एक पत्र में कहा था,  ‘महिलाओं की स्थिति में सुधार के बिना दुनिया के कल्याण की कोई गुंजाइश नहीं है.’ देश की महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है. चुनावों में महिलाओं का पहले से ज्यादा बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद लोकसभा में सबसे ज्यादा 78 रिकार्ड महिलाएं चुनकर आई हैं. इस सरकार ने मुद्रा, स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया, स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) जैसी तमाम योजनाओं से विमन आंट्रप्रन्योरशिप को बढ़ावा दिया है. आगे भी महिला उद्यमियों को बढ़ावा देने के लिए विमन एसएचजी इंट्रेस्ट सबवेंशन प्रोग्राम को हर जिले में लागू करने का प्रस्ताव करती है. साथ ही, हर महिला वेरिफाइड एसएचजी (सेल्फ हेल्प ग्रुप) मेंबर जिसके पास जनधन अकाउंट है, उन्हें 5 हजार रुपये की ओवरड्राफ्ट फसिलिटी दी जाएगी. साथ ही, मुद्रा योजना के तहत स्वयं सहायता समूह की हर वेरीफाइड महिला सदस्य को 1 लाख रुपये तक लोन लेने की अनुमति दी जाएगी.

सरकार ने किफायती घरों के लिए लोन पर टैक्स छूट बढ़ाने की बात कही है. ब्याज भुगतान पर टैक्स में 2 लाख रुपये तक की छूट दी जाती थी. लेकिन अब अतिरिक्त 31 मार्च 2020 तक लिए गए लोन पर चुकाए जाने वाले ब्याज पर टैक्स में 1.5 लाख रुपये की अतिरिक्त छूट मिलेगी यानी, 45 लाख रुपये तक की कीमत वाले अफोर्डेबल हाउस खरीदने के लिए लोन लेने वालों को 3.5 लाख रुपये तक के ब्याज पर टैक्स छूट दी जाएगी. वित्त मंत्री के मुताबिक, 15 साल के लोन पीरियड में घर खरीदार को अब 7 लाख रुपये का लाभ होगा.

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अभिव्यक्ति पर चाबुक

उत्तर प्रदेश की नोएडा पुलिस ने नेशन लाइव के औनलाइन टीवी स्टेशन को बंद कर दिया है क्योंकि उस ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ एक रिपोर्ट प्रसारित की थी. सिटी मजिस्ट्रेट की राय में एक महिला रिपोर्टर द्वारा मुख्यमंत्री पर अभद्र टिप्पणी की गई थी, उस से पूरे उत्तर प्रदेश में कानून व व्यवस्था के लिए खतरा पैदा हो गया था. यह एक आपराधिक साजिश थी कि राज्य की सामाजिक शांति भंग हो.

जिलाधीश बी एन सिंह के अनुसार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपनेआप में सीमित है क्योंकि असीमित होने पर उस से विकट स्थिति पैदा हो सकती है और पूरे राज्य की शांति को खतरा हो सकता है.

जो शब्द सिटी मजिस्ट्रेट और जिलाधीश ने इस्तेमाल किए हैं वे असल में कानूनी बचाव के लिए हैं और पहली नजर में ब्रौडकास्टरों को बंद करने और नेशन लाइव को सील करने के लिए फिट हैं. पुलिस अधिकारी जानते भी हैं कि उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय इस गिरफ्तारी और सीलबंदी को अवैध ठहरा देंगे, लेकिन वे यह भी जानते हैं कि तब तक इस चैनल की आर्थिक कमर टूट जाएगी और संचालकों को सबक मिल ही जाएगा कि अब स्वतंत्रताएं एकतरफा हैं. बस, सत्ता की बोली बोलो.

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जिस तरह की भाषा पिछले 5-7 सालों में गैरभाजपाई दलों के नेताओं के बारे में फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप और यहां तक कि औनलाइन चैनलों द्वारा इस्तेमाल की गई है, और उस पर जो चुप्पी छाई हुई है, उस की बात ही न करें. भाजपाई सरकार के इस कदम ने साफ कर दिया है कि देश में अब एक ही भाषा का इस्तेमाल करने का रास्ता बनाया जा रहा है, सत्तारूढ़ लोगों की प्रशंसा वाली भाषा का. सरकार का विरोध और सरकारी नीतियों की पोल खोलने वालों को अदालतों और कैदखानों में घसीट कर उन्हें बरबाद करने का प्लान तैयार है.

आम व्यक्ति हो सकता है सोचे कि इस से उस का क्या जाता है, यह तो राजनीति का खेल है. पर असलियत यह है कि धीरेधीरे आम आदमी भी हर तरह की स्वतंत्रता खो रहा है. यह स्वतंत्रता काम करने की है, अपना पैसा रखने की है, अपने मनचाहे साथी के साथ प्रेम व विवाह करने की है, मनचाही जगह घूमने जाने या काम करने जाने की है. इन सब स्वतंत्रताओं पर बंदिशें लगाने की सरकारी प्रक्रिया जारी है.

सरकार केवल तीर्थस्थानों को पर्यटन की दृष्टि से विकसित कर रही है, जहां लोग चंदा चढ़ा कर आएं और पाखंड के गुलाम बनें. सरकार आप को क्रैडिटडैबिट कार्ड से भुगतान करने को कह रही है, जहां आप और दुकानदार दोनों का पैसा बैंक में फंसा रहे और दोनों को इस पर कमीशन देना पड़े. आप को मकान तक अब अपनों के महल्ले में ले कर रहना पड़ेगा. किराए पर रहना है तो वैरिफिकेशन के नाम पर क्षेत्र की पुलिस के सामने गिड़गिड़ाना पडे़गा, कुछ नकदी भेंट चढ़ानी पड़ेगी.

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फिल्म समीक्षाः वन डे जस्टिस डिलीवर्ड

रेटिंगः तीन

निर्माताः केतन पटेल व कमलेश सिंह कुशवाहा

निर्देशकः अशोक नंदा

संगीतकारः जोय अंजन, विक्रांत पारिजात, ऋषि सिंह

कलाकरः अनुपम खेर, ईशा गुप्ता, कुमुद मिश्रा, राजेश शर्मा, मुरली शर्मा, जरीना वहाब, अनुस्मृति सरकार, दीपशिखा नागपाल, अनंत महादेवन, जाकिर हुसैन, परीक्षत सहानी, अक्रम अली खान, मनोज मिश्रा, डा. मोनिका रावण,  हेमा शर्मा व अन्य.

अवधिः दो घंटे पांच मिनट

हर आम इंसान को उम्मीद रहती है कि उन्हे अदालत से सही न्याय मिलेगा? पर क्या ऐसा होता है? दूसरी बात हर इंसान न्याय चाहता है, न्याय पाने वाले के लिए यह मायने नहीं रखता कि न्याय दिलाने वाले ने किस रास्ते को अख्तियार किया है? इन्ही दो महत्वपूर्ण मुद्दों को फिल्मकार अशोक नंदा ने अपनी फिल्म ‘‘वन डे जस्टिस डिलिवर’’ में उठाते हुए देश के कानून व न्याय प्रणाली पर करारा तमाचा जड़ा है.

कहानीः

फिल्म की कहानी रांची शहर में हाई कोर्ट के जज जस्टिस ओमप्रकाश त्यागी (अनुपम खेर) के अवकाश ग्रहण करने वाले दिन से शुरू होती है. वह अपने भाषण में कहते हैं कि कानून के दायरे में बंधे होने के कारण वह काफी काम नही कर पाए. पर अब वह उन्हें पूरा करना चाहेंगे. कानून के दायरे में बंधे होने के कारण उनसे हुई गलतियों को सुधारने की बात करते हैं. वह कहते हैं कि वह अभी भी लोगों को न्याय दिलाने में सक्षम हैं. जस्टिस त्यागी के दिमाग में यह बात है कि जज की कुर्सी पर बैठे हुए उनके हाथ से चार लोग मुलजिम बरी हो गए. उन्हें कानून की किताबों के अनुसार बरी करना पड़ा था. अब वह उन चारों को सजा दिलाने के लिए अपने हिसाब से काम करते हैं. वास्तव में अदालत में सब कुछ गवाहों पर निर्भर करता है. गवाह कैसे मैन्यूप्युलेट होते हैं,यह सभी को पता है. जस्टिस त्यागी को याद आता है कि जब वह अब्दुल(मोहक कंसारा) की मौत का मुकदमा सुन रहे थे, तो डौक्टर दंपति डा. अजय चोपड़ा (मुरली शर्मा) और डा. रीमा चोपड़ा (दीपशिखा नागपाल), जिनकी हरकतों से वाकिफ होते हुए भी कानून के दायरे में उनके सामने जो सबूत आए, उस आधार पर उन्हें बरी किया था. इस बात से गुस्सा होकर अब्दुल की मां परवीन बीवी (जरीना वहाब) ने जज त्यागी को सरे आम थप्पड़ मारते हुए उन पर बिकने का आरोप लगाया था. तब जज त्यागी को अहसास हुआ था कि उन्होंने कहां गलती की है, पर उस वक्त वह कुछ कर नही सकते थे.

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खैर, कहानी आगे बढ़ती है. जस्टिस त्यागी की बेटी की शादी संपन्न होती है और इस शादी समारोह में शिरकत करने आए डा. अजय चोपड़ा व डा. रीना चोपड़ा गायब हो जाते हैं. दर्शक देखता है कि दूसरे दिन जस्टिस त्यागी डाक्टर दंपति को टार्चर करते हुए कैमरे पर उनसे सच कबूल करवा रहे हैं, पर शहर में डा. दंपति के गायब होने की खबरें हैं. पुलिस विभाग के पास कोई सुराग नही है. पुलिस अफसर शर्मा ( कुमुद मिश्रा) का दावा है कि वह जांच कर रहे हैं. दो चार दिन बाद एक अन्य केस को याद कर जस्टिस त्यागी शहर के एक होटल मालिक पंकज सिंह (राजेश शर्मा) को अगवा कराकर उन्हें टार्चर कर सच कबूल करवाते हैं. अब शहर में दो बड़ी हस्तियों के गायब होने के कारण हंगमा मच जाता है. शहर के सांसद रावत (जाकिर हुसैन) पुलिस कमिश्नर के दफ्तर में हंगामा मचाते हैं. तब पुलिस कमिश्नर (एहसान खान) हरियाणा की तेजतर्रार क्राइम ब्रांच की पुलिस अफसर लक्ष्मी राठी (ईशा गुप्ता) को इस कांड की जांच करने के लिए बुलाते हैं. लक्ष्मी राठी के आने के बाद एम पी रावत का खास आदमी और गुंडा दिलावर (मनोज मिश्रा) गायब हो जाता है. फिर पता चलता है कि शहर में बम विस्फोट करने वाला अफजल (आलोक पांडे) भी गायब हो गया. इन्हें भी जस्टिस त्यागी ने ही अगवा किया है. इस मसले की जांच कर रही पुलिस अफसर लक्ष्मी राठी समझ जाती है कि अब एम पी रावत के गायब होने का नंबर है. वह अपनी चाल चलती है और सच सामने आ जाता है.

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लेखन

लेखक ने न्याय व्यवस्था को लेकर एक बेहतरीन कथानक चुना, मगर पटकथा लेखक के तौर पर वह काफी चूक गए. उनकी लेखकीय कमजोरी के चलते यह एक बेहतरीन फिल्म बनने से वंचित रह गयी. मगर फिल्म की विषयवस्तु दर्शक को ही नहीं बल्कि भ्रष्टाचार खत्म कर सुशासन की बात करने वाले सरकार में बैठे लोगों भी सोचने पर मजबूर करेगी.

निर्देशनः

बौलीवुड मसाला फिल्म बनाने की सोच के चलते फिल्मकार ने इस फिल्म में बेवजह चार गाने ठूंसकर फिल्म को बर्बाद कर डाला. गानों की वजह से कहानी का प्रवाह बार बार रूकता है. फिल्म में सिर्फ शीर्ष गीत को छोटा करके रखा जाना चाहिए था. क्राइम ब्रांच की पुलिस अफसर लक्ष्मी राठी यानी कि ईशा गुप्ता को दर्शकों से परिचित कराने लिए जिस तरह से कलकत्ता के बार डांस में बार डांसर के रूप में नचवाया गया है, वह हास्यास्पद और गलत है.

इंटरवल से पहले फिल्म की गति काफी धीमी है. इंटरवल के बाद कहानी गति पकड़ती है. फिल्म का सर्वश्रेष्ठ हिस्सा इसका क्लाइमेक्स है.

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अभिनयः

जस्टिस की कुर्सी पर बैठकर न्याय करने वाल जस्टिस त्यागी के अवकाश ग्रहण करने के बाद जल्लाद बनकर न्याय करने वाले के किरदार को निभाकर अनुपम खेर ने एक बार फिर अपनी बेहतरीन परफार्मेंस दी है. अपराध शाखा पुलिस अफसर के किरदार में ईशा गुप्ता ने अभिनय कर बता दिया कि अब तक फिल्मकारों ने उनकी सही प्रतिभा का उपयोग नहीं किया. पुलिस अफसर शर्मा को कुमुद मिश्रा ने यथार्थ रूप में चित्रित कर साबित किया कि उनके तरकश में अभी काफी तीर है. उनमें अभिनेता के रूप में काफी संभावनाएं हैं.

क्या आप जानते हैं, टीवी सीरियल्स की शूटिंग सबसे ज्यादा कहां होती है?

करीब एक दशक पहले टीवी सीरियल्स में दिखाई गई लोकेशन्स ज्यादातर मुंबई की होती थी या फिर किसी स्पेशल सीन को दिखाने के लिए सेट लगा दिया जाता था. अब बदलते वक्त के साथ हर चीज को रियल लाइफ इफेक्ट के साथ दिखाने की कोशिश की जाती है. बीते सालों में कई लोकेशन्स ऐसी हैं, जिन्हें सबसे ज्यादा टेलीविजन शो में दिखाया जाता है. आइए, डालते हैं उनपर एक नजर.

अमृतसर (पंजाब)

अमृतसर जिसे आज भी कुछ लोग अम्बरसर कहते हैं. ज्यादातर पंजाब की कहानी पर आधारित ज्यादातर टेलीविजन शो अमृतसर में ही शूट किए जाते हैं. टशन-ए-इश्क, वारिस, गुरबानी, वीरा जैसे पौपुलर सीरियल्स की शूटिंग अमृतसर में की गई है.

बनारस (उत्तर प्रदेश)

गंगा की आरती और बनारस के घाट. बनारस का नाम लेते ही सबसे पहले ये दो खास बातें सबसे पहले याद आती हैं. शाम के समय अनगिनत दीयों से जगमगाता है बनारस. गंगा, सरस्वतीचंद्र, कर्म अपना-अपना, तेरे शहर में, बिलियन डौलर गर्ल की शूटिंग लोकेशन बनारस है.

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जैसलमेर, जयपुर (राजस्थान)

राजघराने, हवेली और राजशाही ठाट-बाट दिखाने के लिए राजस्थान की कई लोकेशन्स का इस्तेमाल टीवी शो में सबसे ज्यादा किया जाता है. जिनमें जैसलमेर और जयपुर सबसे पौपुलर लोकेशन्स हैं. रंगरसिया, बालिका बधु, पहरेदार पिया की, दीया और बाती, नागिन जैसे पौपुलर शो की शूटिंग जयपुर और जैसलमेर में की गई है.

ऋषिकेश (उत्तराखंड)

ऋषिकेश धार्मिक सीरियल्स की शूटिंग लोकेशन में सबसे पहले नम्बर पर आता है. कभी-कभी बनारस की भीड़ को देखते हुए कुछ टीवी सीरियल्स की लोकेशन ऋषिकेश भी कर दी जाती है. यहां नीली छतरीवाले, ये रिश्ता क्या कहलाता है, अगले जन्म मोहे बिटिया ना कीजो, महाभारत जैसे टीवी सीरियल्स की शूटिंग हो चुकी है.

दिल्ली

दिलवालों की दिल्ली में सबसे ज्यादा फिल्मों और टीवी शो शूट किए जाते हैं. पुरानी दिल्ली में कई टीवी शो के लव सीन शूट किए गए हैं.लव स्टोरी, तुम्हारी पाखी, तेरी-मेरी लव स्टोरी, कपिल शर्मा शो, लाइफ सही है जैसे शो दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में शूट किए गए हैं.

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मैं शटर गिरा रहा हूं, दुकान बंद !

कनछेदी लाल घर से निकले तो देखा राहुल भैया की दुकान के बाहर भीड़ लगी हुई है . उत्सुक भाव से कनछेदी लाल भीड़ में घुस गए .ऐसा मौका कनछेदीलाल कभी नहीं चूकते .जहां मजमा लगा हो, वह समझ जाते हैं कि कोई बे पैसे का तमाशा है, सो तमाशबीन बन पहली पंक्ति में आकर खड़ा हो जाना उनकी पैदाइशी फितरत है. सो कनछेदी लाल धक्का-मुक्की करते आगे पहुंच गए.

लोग उत्सुक भाव से खड़े हैं .राहुल चीख रहे हैं,- “मैं… मैं शटर गिरा रहा हूं . मैं शटर गिरा दुंगा… मै.. मै गिरा कर दिखाऊंगा .” राहुल चीख रहा है लोगों का हुजूम उसे घेरकर तमाशा बीन बना देख रहा है.

कनछेदी लाल आगे पहुंच राहुल भैया की बातें सुनता रहा.वह जानता है, यह दुकान राहुल भैया की पुश्तैनी दुकान है. आजकल की नहीं, दादा परदादा जमाने की .राहुल भैया को यह सजी सवांरी दुलहिन सी दुकान विरासत में मिली है . कनछेदी लाल को याद है जब वह बच्चा था तब राहुल की यह दुकान उसके पूर्वज चलाया करते थे क्या नाम था… हां जमाहिरलाल  फिर जब कनछेदी लाल कुछ होश संभालने लगा तो देखा राहुल की दादी इस दुकान को चलाया करती थी. समय बदला आज पिता की धरोहर राहुल भैया के हाथों में है . दुकान बड़ी विशाल है,सैकड़ों तो नौकर चाकर है. शहर में ऐसी चलती दुकान और है ही कितनी ! और राहुल भैया चिल्ला रहे हैं दुकान बंद करूगा… क्या बात है .

कनछेदी लाल ने पास खड़े शख्स से पूछा,- “भाई! क्या हो गया है, राहुल भैया इतने गुस्से में क्यों है . क्या बात है.”

पास खड़े शख्स ने कहा- “भैया ! मुझे भी नहीं मालूम, मैं तो खरीददारी के लिए आया था तो देखता हूं कि राहुल भैया आज उखड़े हुए हैं .”

कनछेदी लाल ने देखा पास ही राहुल भैया के दुकान का एक नौकर आवाक खड़ा है उसने उसे टोहका तो वह बोला – “कनछेदी भैया! अब तुमको क्या बताएं सब कुछ तो जानते हो, यह राहुल भैया चाहते हैं दुकान पहले जैसे जोर शोर से चले,लोगों की भीड़ डटी रहे, अब पहले वाला तो समय रहा नहीं. इन दिनों पास में और अच्छी-अच्छी दुकानें खुल गई हैं तो राहुल भैया की दुकान को ग्रहण लग गया है इधर पुराने दिनों को याद करके राहुल भैया जोश में आकर यह तमाशा कर रहे हैं .”

कनछेदी लाल ने हुंकार भरी, वे माजरा समझ गए, राहुल भैया को दुकान चलाने का हुनर आता नहीं, यह तो वही बात हो गई नाच न आये आंगन टेढ़ा. अब जब तुम्हारा व्यवहार ग्राहकों से आत्मीयता पूर्ण नहीं होगा तो दुकान तो ठप्प पढ़नी हीं है. इसमें इतना उतावलापन क्यों ?

इधर राहुल भैया चिल्ला रहे हैं कन छेदी लाल ने स्पष्ट सुना-” मैं शटर गिरा रहा हूं . मै…”

कनछेदी लाल राहुल भैया के पास पहुंचकर बोले- “भैया यह क्या कर रहे हो ”

राहुल भैया- “तुमने सुना नहीं क्या भैरे हो क्या… मैं शटर गिरा रहा हूं .

कनछेदी लाल- “लेकिन भैया, तुम शटर गिरा क्यों नहीं रहे हो. आधे घंटे से सुन रहा हूं… शटर गिरा रहा हूं शटर गिरा रहा हूं गिराओ न…”

राहुल भैया कनछेदी लाल की और घूर कर देखते हुए बोले-” मैं शटर गिरा दू” कनछेदी लाल- “हां, अगर तुम्हें लगता है, कोई जरूरी काम करना है, आयकर का छापा पड़ने वाला है, घर में कोई काम है कोई बीमार है, तो दुकान का शटर तो गिराना ही पड़ेगा ”

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राहुल भैया बोले- “कनछेदी लाल ऐसी कोई बात नहीं है,मगर मैं शटर गिरा रहा हूं .”

कनछेदी लाल-” फिर आखिर क्या  बात है,  क्यों शटर गिरा रहा हूं का राग घंटों से लगा रखा है . गिरा दो…”

राहुल भैया- “देख लो भैया फिर मत कहना…”

कनछेदी लाल- “देखो,अगर शटर गिराना जरूरी है और नहीं गिरा पा रहे हो, मदद चाहिए, तो वह भी कहो. हम मदद करेंगे और दुकान बंद हो जाएगी.”

राहुल भैया इस पर कनछेदी लाल और भीड़ की तरफ देखकर तड़प कर कहने लगे-” तुम सभी मे थोड़ी भी नैतिकता अपनापन नहीं है क्या,  इतने वर्षों से यह दुकान,  हमारा परिवार तुम्हारी सेवा करता आ रहा है. और आज मैं कह रहा हूं शटर गिरा रहा हूं तो मुझे मनाने की जगह, कहते हो हम शटर गिराने में मदद करें क्या.”

भीड़ राहुल भैया की बातें सुन रही है राहुल कह रहे है- “इस साल मेरी दुकान बुरी कंडीशन को प्राप्त हो गई, सामने दुकान क्या खुली सारा मोहल्ला, शहर नई दुकान की तरफ दौड़ा चला जा रहा है. वहां डुप्लीकेट सामान भी खुशी-खुशी खरीदा जा रहा है. मीठी मीठी बातों में आकर तुम लोगों ने मेरा भट्ठा बैठा दिया. मैं क्या करता मेरे पास शटर गिराने के अलावा चारा ही क्या बचा है.

राहुल भैया की बातें सुन भीड़ का ह्रदय द्रवित होने लगा  एक शख्स आगे आकर बोला,-” ऐसा है तो तुम जरा भी फिक्र न करो मैं तुम्हारी दुकान से ही सामान खरीदूगा.”

यह सुन सबने राहुल भैया को आश्वस्त किया कि शटर मत गिराओ हम तुम्हारी दुकान से ही सामान खरीदेंगे .

यह सुन राहुल भैया बोले-” तुम चंद लोगों की खरीददारी से मेरा भला नहीं होने वाला, जब तक सारा मोहल्ला, शहर सामान नहीं खरीदेगा,भला  मेरी दुकान मे कैसे रौनक आएगी.

राहुल की बात सुन एक बुजुर्ग ने कहा-” देखो बेटा ! हम सारे शहर का ठेका कैसे लें ?

इस पर राहुल भैया तूनक कर बोले, बाबा ! मैं शटर गिरा दूंगा. यह सुन सभी मुह बिचकाते राहुल भैया को बदहवास छोड़ वहां से निकल लिये.

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कैसे निबटें बातूनी बच्चों से?

कानपुर के मालरोड पर बने एक पब्लिक स्कूल की बात है. कक्षा 4 में पढ़ने वाला छात्र प्रदीप हमेशा किसी न किसी से बात करता रहता था. ऐसे में स्कूल के बच्चे परेशान रहते थे. कई बार तो वह टीचर से भी ऐसे सवाल करता था कि टीचर को समझ में नहीं आता था कि वह उसे कैसे समझाए.

एक दिन स्कूल में प्रार्थना के दौरान प्रदीप ने अध्यापकों से प्रार्थना को ले कर कई सवाल कर डाले. इस से उस के दोस्त और टीचर के साथ प्रिसिंपल भी परेशान हो गए. जब प्रदीप के सवाल खत्म नहीं हुए तो प्रिसिंपल ने टीचर से कहा कि प्रदीप के मुंह पर टेप चिपका दो. टीचर ने प्रदीप के मुंह पर भूरे रंग की टेप चिपका दी. इस के बाद वह क्लास में गया तो वहां सभी बच्चे उस का मजाक उड़ाने लगे. परेशान हो कर प्रदीप वहां से बाहर चला आया.

इसी स्कूल में उस की मां क्षमा टीचर थी. दूसरे पीरियड की घंटी बजी तो प्रदीप मां के पास गया. मां ने पहले उस के मुंह पर से टेप हटाई और उस से इस के बारे में पूछा तो उस ने घटना की जानकारी दी. क्षमा ने प्रिसिंपल से बात की. प्रिंसिपल ने कहा कि प्रदीप बहुत बातूनी बच्चा है,

ऐसे में उस की वजह से पूरी क्लास और स्कूल डिस्टर्ब होता है. काफी समझानेबुझाने पर मामला सुलझा. प्रिंसिपल उसे क्लास में लेने को तैयार नहीं थे तो क्षमा ने पिं्रसिपल और टीचर के खिलाफ बच्चे के साथ मारपीट का मुकदमा दायर करने की धमकी दे दी.

हंगामा भी करते हैं बातूनी बच्चे

प्रदीप जैसे बातूनी बच्चे होना कोई नई बात नहीं है. बहुत से बच्चे ऐसे सवाल करते हैं कि उन के जवाब देने मुश्किल हो जाते हैं. ऐसे बातूनी बच्चे केवल बातें ही नहीं बनाते बल्कि कई बार ये अजबगजब शरारतें भी करते हैं, जिस की वजह से बड़ी परेशानी खड़ी हो जाती है.

नेहा को शिकायत है कि वह अपने बच्चे को जब भी किसी होटल में ले जाती है, वह वहां खाने की चीजों को ले कर बहुत सवाल करता है. इस के बाद कई खाने वाली चीजें मंगा लेता है और थोड़ाथोड़ा खा कर छोड़ देता है.

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नेहा कहती है कि वह हद से ज्यादा बातें तो बनाता ही है, कई बार होटल में प्लेट और गिलास भी तोड़ देता है, जिस वजह से कई बार न चाहते हुए भी नेहा को बच्चे पर हाथ उठाना पड़ता है. बातूनी बच्चे केवल छोटी उम्र में ही परेशान नहीं करते, बड़े हो कर भी वे अपनी बातों से लोगों को परेशान करते हैं.

अनीता के जुड़वां बच्चे हैं. मजेदार बात यह है कि दोनों ही बहुत बातूनी हैं. स्कूल से ले कर घर तक दोनों की बातें चलती रहती हैं. बातों के चक्कर में वे स्कूल का होमवर्क भी नहीं करते. इस की वजह से स्कूल में रोज उन को सजा मिलती है. अनीता को समझ में नहीं आता कि वह कैसे अपने बच्चों को समझाए.

कई बार बच्चों का तनाव पति और घर के दूसरे सदस्यों पर निकल जाता है, उन से झगड़ा हो जाता है. बच्चों का तनाव घरपरिवार के संबंधों से ले कर दोस्तों तक पर भारी पड़ता है. अनीता कहती है कि उस ने अपने बच्चों की देखभाल के लिए नौकरानी रखी थी. बच्चों ने उसे इतना परेशान किया कि वह नौकरी छोड़ कर चली गई. वह बोली, ‘दीदी, आप के बच्चों को संभालना बहुत ही मुश्किल काम है.’

प्यार से संभालिए ऐसे बच्चे

बातूनी बच्चों को तनाव या गुस्से से मत संभालिए. उन्हें प्यार से संभालें. कई बार ऐसे बच्चों की हरकतों पर लोग गुस्सा हो जाते हैं और बच्चों के साथ मारपीट या सजा देने लगते हैं.

फिजियोथेरैपिस्ट और पेरैंट्स कोच नेहा आनंद कहती हैं, ‘‘बच्चों का ज्यादा बात करना, उन के द्वारा तरहतरह के सवाल किए जाना स्वाभाविक प्रक्रिया है. कई बार पेरैंट्स, बड़े भाईबहन, रिश्तेदार या टीचर इन सवालों को ठीक से जवाब नहीं देना चाहते. वे बच्चे को बिना ठीक से समझाए उस का मुंह बंद कराने के लिए चुप करा देते हैं. कई बार डांटडपट देते हैं. जब इस से भी बात नहीं बनती तो वे मारपीट या सजा देने तक पहुंच जाते हैं.’’

नेहा आनंद आगे बताती हैं, ‘‘जब बच्चा सवाल करे तो उसे धैर्यपूर्वक सुनें. सवाल गलत हो तो भी उस को प्यार से समझाएं. बच्चे की जिज्ञासा जब पूरी हो जाएगी तो वह संतुष्ट हो जाएगा. अगर सही से बच्चे को समझाया नहीं गया तो उस के मन में गलत बात घर कर जाएगी. ऐसे में कई बार बच्चों का मानसिक विकास रुक जाता है. यही वजह है कि आज बच्चों की शिक्षा में ऐसे तमाम सब्जैक्ट जोड़े गए हैं, जहां उन को सवाल करने की पूरी आजादी दी जाती है. सही जवाब न मिलने से बच्चा कुंठित हो जाता है, वह अपने सवालों के जवाब के लिए दूसरे लोगों के पास जा सकता है, जो हो सकता है कि सवाल के जवाब तो गलत दें ही, उस को गुमराह भी कर बैठें. पेरैंट्स को बच्चों के ये सवाल बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं लगते. सही मानो में देखें तो बच्चों के लिए ये सवाल बड़े उपयोगी होते हैं.’’

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सवाल दर सवाल

बातूनी बच्चे असल में एनर्जी से भरपूर और ऐक्टिव होते हैं. जब ऐसे बच्चों के साथ सही व्यवहार नहीं होता तो वे चिड़चिड़े और जिद्दी हो जाते हैं. अगर इन बच्चों को सही तरह से संभाल लिया जाए तो ये बहुत इंटैलिजैंट और जीनियस हो जाते हैं. सवाल करने के समय यदि इन बच्चों को रोका जाता है या इन्हें सही जवाब नहीं दिया जाता तो ये दब्बू बन जाते हैं. इन की सवाल करने की आदत खत्म हो जाती है. इस से उन का स्वाभाविक विकास प्रभावित होता है. इसलिए जरूरी है कि बच्चों की बातों को ठीक से सुना जाए और सही तरीके से उस का जवाब दिया जाए. यह बच्चों के स्वाभाविक विकास में सहायक होता है. बच्चे जिज्ञासू स्वभाव के होते हैं. वे अपने आसपास की चीजों को समझना चाहते हैं. जो बच्चे बातूनी होते हैं उन को एक्सट्रोवर्ट कहा जाता है. उन से किसी भी विषय पर बात करना अच्छा लगता है.

ऐसे बच्चों के सवालों के जवाब देने चाहिए. उन को हतोत्साहित नहीं करना चाहिए. ऐसे बच्चों को संभालना थोड़ा चुनौतीपूर्ण हो सकता है पर संयम से बात कर के संभाला जा सकता है.

ऐसे बच्चों से स्नेहपूर्वक बात करनी चाहिए. इस से ये अपनी बात को सरलता से कह लेते हैं. ऐसे बच्चों को जब संभाल लेंगे तो उन को सजा देने की जरूरत नहीं होगी. बच्चे भी अपने सवाल कर के आगे बढ़ सकेंगे. पेरैंट्स के साथसाथ ऐसे बच्चों को टीचर को भी सही तरीके से संभालना चाहिए, तभी इन का पूर्ण विकास हो सकेगा.

थोड़ा प्यार, थोड़ी समझ से संभालें अपने लाड़लों को

बातूनी यानी एक्सट्रोवर्ट बच्चों को संभालने के लिए सावधानीपूर्वक प्रयास करने चाहिए. कुछ टिप्स के सहारे यह काम सरल हो सकता है. इन टिप्स को धीरेधीरे बच्चों के साथ व्यवहार में ढाल लेंगे तो बातूनी बच्चों को सुधारा जा सकेगा :

–       बच्चों को बात करने पर कभी हतोत्साहित न करें. बच्चे बातों के जरिए ही अपनी फीलिंग्स और इमोशंस को जाहिर करते हैं.

–       कई बार वे आप का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए ऐसे समय सवाल करते हैं जब आप व्यस्त होते हैं. इस दौरान भी बच्चों को झिड़कने के बजाय सही तरह से जवाब दें.

–       ऐसे बच्चों को संभालने के लिए घर में 10 से 15 मिनट का खेल खेलें, उस में उन्हें शामिल करें और उन्हें भी अपने साथ उतनी देर चुप रहने को कहें.

–       बच्चों की बातों को ध्यानपूर्वक सुनना शुरू करेंगे तो वे भी आप की बातें सुनेंगे. बच्चों के साथ बात करने से आपस में सामंजस्य बैठाना सरल होगा.

–       बच्चे एनर्जी का पावरहाउस होते हैं. उन की एनर्जी को सही दिशा में लगाना जरूरी होता है. आर्ट, क्राफ्ट, पेंटिंग और डांस जैसी गतिविधियों में उन को लगा कर उन की एनर्जी को सही दिशा में ले जा सकते हैं.

–       बच्चों को किताबें पढ़ना अच्छा लगता है. आप उन को किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित करें. इस से वे अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकेंगे, हर वक्त आप से सवाल नहीं करेंगे.

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