धार्मिक हिंसा जोरू और जमीन के लिए की गई हिंसा से कई गुना अधिक होती है. हम जिस सर्वधर्म समभाव या धार्मिक सहिष्णुता की बात करते हैं, वह मिथ्या के अलावा कुछ नहीं. प्रस्तुत है, मोहन वर्मा की विवेचना.

प्रागैतिहासिक मनुष्य ने अस्तित्व के लिए संघर्ष का एक लंबे समय तक सामना बर्बरतापूर्वक लड़ कर अपना बचाव कर किया. उस के  लिए हर तरह के शत्रु को समाप्त करना जरूरी था, वरना शत्रु उसे समाप्त कर देता.

संगठन की ताकत का आभास होने के बाद लोग समूहों, गिरोहों, कबीलों में बंटने लगे. सामूहिक हिंसा शुरू हुई. यह भोजन एवं सुरक्षित घर पाने के लिए तिहरी लड़ाई का हिस्सा थी-प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध, वन्य जंतुओं के विरुद्ध और दूसरे व्यक्ति समूहों के विरुद्ध.

खेतीबाड़ी और पशुपालन की शुरुआत के बाद, संघर्षों के कारणों में जीने के लिए भोजन व रहने की जगह के अलावा नई चीजें भी जुड़ती गईं जिन में खेती के लायक जमीनों पर कब्जा, दूसरे समूहों के व्यक्तियों को गुलाम बनाने के लिए बंदी बनाना और शारीरिक शोषण के लिए औरतों को हथियाना, कुछ खास वजहें थीं. दूसरों की पैदा की या पाई चीजों पर कब्जा कर खुद उन का आनंद लेना भी उन्हीं में से था.

आंधीतूफान, बाढ़, सूखा और दावानल की भीषण मार झेलते मनुष्य को जल, वायु और अग्नि रक्षक की तरह दिखने लगे. विनाशकारी ताकत रखने वाले तत्त्वों के प्रति भय और बेबसी ने रक्षक तत्त्वों को वश में करने की कामना ने पूजापाठ के विधानों को बल दिया. चतुर लोगों ने इस भय का लाभ उठा कर बड़े अनिष्टों को टालने के लिए कर्मकांड शुरू किए. कर्मकांडों की सघनता बढ़ने के साथ ईश्वरीय अवधारणाएं भी नएनए रूपों में विस्तार पाती गईं.

फ्रांसीसी विचारक दुर्खीम ने आस्ट्रेलियाई जनजातियों के अध्ययनों में पाया कि हर कबीले, गोत्र का अपना ‘टोटम’ होता है, जो कोई भी पशु या पौधा हो सकता है, जिसे पवित्र संरक्षक माना जाता है. जिसे नष्ट करना अपराध है.

बर्बर घुमक्कड़ समूहों के बाद जैसे ही स्थायी निवास की आदत बननी शुरू हुई, वैसे ही कबीले को गोत्र या टोटम या देवता को धर्म की प्रारंभिक अवधारणाआें के आधार पर संगठित रखना आसान होता गया. दूसरी तरफ शत्रु का मनोबल गिराने के लिए उस के पवित्र प्रतीकों को नष्ट करना कारगर उपाय दिखने लगा. इसी कारण लड़ाइयां हुईं और ज्यादातर के पीछे वे चतुर लोग रहे जो धार्मिक हिंसा को प्रोत्साहन देते थे.

यह आज भी अनवरत चालू है. धार्मिक हिंसा जर और जमीन के लिए की गई हिंसा से मात्रा में कई गुनी अधिक रही है. हम जिस सर्वधर्म समभाव या धार्मिक सहिष्णुता की बात करते हैं, वह मिथ्या आधारों पर कल्पित दिवास्वप्न के सिवा और कुछ नहीं है. किन्हीं भी 2 धर्मों के प्रबल अलगाववादी तत्त्व लोगों को एकदूसरे के साथ रहने नहीं देना चाहते, सभी धर्मों के लिए सहअस्तित्व की बात बहुत दूर की चीज है. यह तो धर्म का विनाश कर देगी. सामाजिक संगठन में धर्म की जो भूमिका है, उस की बुनियाद में ही अन्य धर्मों के प्रति एक हिंसक अविश्वास होता है. दूसरे सांस्कृतिक व राजनीतिक कारणों से तो धार्मिक सहअस्तित्व की स्थितियां बनती हैं लेकिन फिर भी धर्म की अनूठी अलगाववादी मानसिक धारा अवचेतन में अपना काम करती रहे यह ध्यान रखा जाता है ताकि मौका मिलते ही नासूर की तरह फूट कर हिंसा के तेजाब से समाज को सराबोर कर सके.

गुजरात में जिस तरह संभ्रांत, सुशिक्षित वर्ग के लोगों ने लूटपाट और अन्य नृशंसतापूर्ण काररवाइयों को अंजाम दिया, वह किसी का व्यक्तिगत सनकीपन या मनोविकार नहीं था, बल्कि इस हिंसक मनोवृत्ति के लिए जरूरी पोषक तत्त्व तो धार्मिक संस्कार ही मुहैया कराते हैं, जिन से व्यक्ति को बांधने की तैयारी उस के जन्म लेने से पहले ही अलगअलग कर्मकांडों के जरिए शुरू कर दी जाती है.

मुंबई में राज ठाकरे के विरोध में छठ पूजा ज्यादा केंद्र में है, नौकरियां नहीं. एक ही धर्म के 2 हिस्सों में हिंसा का यह पहला और अकेला उदाहरण नहीं है. इतिहास अपनों से भी धार्मिक हिंसा के उदाहरणों से भरा है.

खून से सराबोर हैं सदियां

धर्म पे्ररित हिंसा के मामले में सब बराबर हैं. इस बारे में दुनिया भर के सभी मानव समूहों में एक आम सहमति बनी हुई है. हर जगह करिश्माई धार्मिक नेता धार्मिक विशेषता के प्रति गर्व और अन्य समुदायों के प्रति प्रतिक्रियावादी अविश्वास के बीज अपने लाखों अनुयायियों के मन में बो रहे हैं और दंगेफसाद, मारकाट, बर्बर आतंकवादी काररवाइयों, तोड़फोड़ और लूटपाट की फसलें काटी जा रही हैं.

जोनाथन फौक्स ने 1950 से 1996 तक के धार्मिक संघर्षों के अपने अध्ययन में कहा है कि इस लगभग आधी सदी में 33 से 47 प्रतिशत लड़ाइयां धर्म के नाम पर हुईं. शीत युद्ध की समाप्ति के बाद गैर धार्मिक हिंसा का ग्राफ गिरा है और धार्मिक हिंसा की घटनाआें में काफी तेजी आई है. जहां हिंसा के प्रमुख स्रोत के रूप में धर्म कार्यरत है, वहीं यह हिंसा के अन्य आर्थिक, आदर्शवादी, आतंकवादी और परंपरागत कारणों से इस तरह गुंथा हुआ है कि इसे अलग कर के देख पाना मुश्किल है.

पवित्र आतंक और ईश्वर के नाम पर हत्याएं, आज हिंसक झगड़ों के प्रमुख तत्त्व हैं. चेचेन्या से अफगानिस्तान तक पनपा हुआ इसलामी अतिवाद और सऊदी अरब तथा इंडोनेशिया के साथ पश्चिमी देशों, जिस में स्पेन व अमेरिका भी शामिल हैं, में आतंकी हमले इस के साक्ष्य हैं. हिंदुआें में जातिगत संघर्ष भी धार्मिक संघर्ष का ही एक रूप है.

ध्यान रहे, राजनीतिक और आर्थिक मामलों में भी धर्म को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है. ऐसा कोई धर्म या संप्रदाय नहीं है, जिस को सदा ही उग्र विचारधारा के हिंसक लोगों ने हाईजैक न कर रखा हो. धर्म की सफलता का कारण उस धार्मिक असहिष्णुता में छिपा हुआ है, जो सदियों से लड़ाई का सब से बड़ा कारण और औजार रहा है. बड़े आतंकी संगठनों से ले कर छोटे अलगाववादी संप्रदायों, मठोंमहंतों तक के अपने आर्थिक स्रोत और राजनीतिक दांवपेंच हैं. सरकारें और समाज सबकुछ जानते हैं लेकिन निहित स्वार्थों के कारण चुप्पी साध ली जाती है.

अमेरिकी रूढि़वादी आंदोलन पर लंबे समय से निगाह रखने वाले बिल बर्कोवित्स कहते हैं कि अमेरिका में धर्म को राजनीतिक रंग देने वाले रूढि़वादी समूहों ने बेतहाशा पैसा कूटा है. एलेन सियर्स के एलायंस डिफेंड फंड ने 2006 में 2.61 करोड़ डालर, डान वाइल्डमैन के अमेरिकन फैमिली एसोसिएशन ने 1.69 करोड़ डालर, जेम्स डाबसन के फोकस औन दि फैमिली ने 1.46 करोड़ डालर ऐंठे थे. ये महज चंद उदाहरण हैं, वास्तविकता यह है कि ऐसे संगठनों की भरमार सभी देशों में है.

इसलाम की रक्षा के लिए जिहाद के नाम पर दुनिया भर को अपने आतंक से थर्राने वाला अलकायदा संगठन पैसों के मामले में विश्वव्यापी नेटवर्क बनाए हुए है. भारत के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे हिंदूवादी संगठनों के पास भी पैसे की कभी कोई कमी नहीं रही, जैसा कि इन की प्रचारप्रसार और अन्य गतिविधियों में देखा जा सकता है. वैसे भी, अपने यहां लाखोंकरोड़ों भक्त चाहे 2 जून की सहीसलामत रोटी अपने परिवार के लिए न जुटा पाते हों, लेकिन मोटे पेट वाले महंतों को चांदी के सिंहासनों पर सवारी करते देख कर खुश हो कर जयजयकार जरूर कर लेते हैं.

मारकाट के पुण्य

सैमुएल पी. हटिंगटन ने ‘सभ्यताओं का टकराव’ के अपने विश्व प्रसिद्ध सिद्धांत में कहा है कि नए वैश्विक समाजों में धर्म आधारित सोच जिस तरह से आकार ले रही है, उस के चलते सभ्यताआें का टकराव टलने वाला नहीं है. ईरान के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी द्वारा सुझाए गए और संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा समर्थित एलायंस औफ सिविलाइ- जेशन अभियान की जड़ में इसी सिद्धांत का विरोध रहा.

स्पेन के राष्ट्रपति जपेटेरो और तुर्की के प्रधानमंत्री रेसेप तैयप एर्दोगान की पहल के साथ शुरू हुए इस अभियान को विश्वव्यापी धार्मिक सद्भाव बढ़ाने की दिशा में एक कदम तो माना जा सकता है, लेकिन यह अधिक प्रभावी नहीं हो सकता. सभ्यताओं की टकराव में मूलभूत कारण धार्मिक कट्टरता में ही निहित हैं. जैसा कि पुर्तगाल के पूर्व राष्ट्रपति मारियो सोरेस कहते हैं कि इतिहास को देखें, तो धर्म में हिंसा का ही बोलबाला रहा है. तीनों प्रमुख एकेश्वरवादी धर्मों, ईसाई, इसलाम और यहूदी, अपने पड़ोसियों से प्यारमुहब्बत की बात करते हैं, लेकिन वे आखिर किस पड़ोसी की बात करते हैं, सवाल इस बात का है. क्या वे विधर्मी और नास्तिकों से भी प्यार करते हैं?

न्यूयार्क के वर्ल्ड टे्रड सेंटर पर 9/11 की घटना अगर ईसाई पश्चिमी उन्नत समाज के प्रति हिंसक घृणा का एक पहलू है, तो अमेरिकी सेना के इराकी सैनिक कैसर-सादी-अल-जबूरी द्वारा अपने अमेरिकन सार्जेंट और कैप्टन द्वारा इराकी महिलाआें पर अत्याचार करते देख कर उन की गोली मार कर हत्या कर देने जैसी घटनाओं के निहितार्थ भी वही विधर्मीवाद है.

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जून, 2007 में जारी अपनी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि शहरीकरण के विस्तार के साथ लोगों में धर्मनिरपेक्षता और तर्क क्षमता के विकास की उम्मीद थी, लेकिन हुआ इस का ठीक उलटा है. दुनिया भर में भारत समेत बहुत सारे देशों में शहरीकरण के साथ धार्मिक कट्टरता का विकास ही हुआ है. यह रिपोर्ट अरब देशों में कट्टर इसलाम के उदय, लैटिन अमेरिकी राज्यों में कट्टर कैथोलिक ईसाइयत के विस्तार और भारत में शिवसेना के आदर्श शिवाजी और गुजरात में हिंदू फासीवाद आदि की चर्चा करते हुए धार्मिक पुनरुत्थान के नए खतरे का वर्णन करती है.

धार्मिक, चरमपंथी को यह विश्वास हो जाता है कि उस का कार्य तो पवित्र और ईश्वर की इच्छानुसार है और तब अकारण की जाने वाली हिंसा का विस्फोट होता है. इस हिंसा को नाटकीय और खासतौर से प्रतीकात्मक बताते हुए समाजशास्त्री मार्क जुएर्गेसमायर अपनी पुस्तक (टेरर इन द माइंड औफ गौड : द ग्लोबल राइज आफ रिलिजियस वायलैंस) में लिखते हैं कि अपने धार्मिक विश्वासों की रक्षा और विस्तार के लिए कास्मिक युद्ध में शरीक होते धर्मयोद्धाआें के लिए हिंसा जीवन से बड़ा कृत्य होता है. पुण्य और पाप के बीच का एक महायुद्ध, यह लगभग सभी धर्मों ने प्रचारित किया है.

वह ईसाई धर्म का उदाहरण देते हुए, ईसा और शैतान के विरोध को रेखांकित करते हैं. पर मानवता को बचाने के लिए शैतान के खिलाफ लड़ाई में सहयोग करने वाले मरनेमारने की परवा छोड़ कर खुद सब से बड़े शैतान बन बैठते हैं. ये कू्रर जड़बुद्धि, अपने विपरीत किसी भी तर्क को सुनना ही पसंद नहीं करते, विचार करना तो बहुत दूर की बात है.

मार्क जुएर्गेसमायर धर्म पे्ररित हिंसा की पड़ताल करते हुए लिखते हैं कि दुनिया के 3 प्रमुख एकेश्वरवादी धर्म, यहूदी, ईसाई और इसलाम हैं जिन में अच्छाई बनाम बुराई के महायुद्ध के विविध खूनी रंग उकेरे गए हैं. यहूदियों में यह अंतिम न्याय और जन्म लेने के उद्देश्य के रूप में आता है. ईसाइयों में कैथोलिकों और प्रोटेस्टेंट के आपसी मतभेद कहीं से भी ईसा मसीह के प्रेम संदेशों को व्यवहार में प्रतिबिंबित नहीं करते. इसलाम में यह पवित्र जिहाद के रूप में है, बुराई से बाहर आने और अच्छाई की ओर जाने का ऐसा प्रयास, जहां सबकुछ अल्लाह के नाम पर तय कर दिया गया है.

विधर्मियों और नास्तिकों से अपने धर्म को बचाना पहली प्राथमिकता होती है, इस गैर धर्मअनुयायियों के प्रति विरोध ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंसा के सहारे दुनिया के शक्ति संतुलनों को प्रबल चुनौती दी है. बहुदेववादी हिंदू धर्म में यह रामरावण की भयानक लड़ाई से कहीं आगे का संघर्ष है, जो राम जन्मभूमि से रामसेतु तक और गुजरात से गंगासागर तक अकसर प्रकट होता है.

एक ही रास्ते के मुसाफिर

चरमपंथियों का यह विश्वास सर्वाधिक खतरनाक है कि वे धार्मिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए लोगों की हत्याएं करने का हक रखते हैं. इस का फ्रेमवर्क मिस्र के सईद कुतुब ने 1950-1960 में तैयार किया था. फिलिस्तीनी चरमपंथी सुन्नी संगठन हरकत-अल-मुकवामा-अल-इसलामिया (हमास) इस का प्रमुख उदाहरण है, जो आस्टे्रलिया, कनाडा, इंगलैंड, यूरोपीय यूनियन और इसराईल तथा अन्य कई देशों के द्वारा आतंकी संगठनों की सूची में शामिल हैं.

हमास के स्त्री आत्मघाती हमलावरों में 6 बच्चों की मांएं तक शामिल होती हैं. हमास के शिक्षक भी कार्यकर्ताओं को आत्मघाती हमलों में मरने के बाद स्वर्ग में 70 कुमारियां और 70 बीवियां दिलाने का वादा करते हैं. फिलहाल उन के परिवारों को 12 से 15 हजार डालर की रकम दी जाती है.

‘तलवार उस स्वर्ग की चाबी है, जो केवल पवित्र योद्धाओं के लिए खुलता है,’ इसलाम कहता है, ‘यकीन न करने वालों को मार दो. तलवार के बिना लोगों को आज्ञाकारी नहीं बनाया जा सकता. अल्लाह के नाम पर उन सब को तलवार के नीचे रख कर उन के टुकड़े कर दो’.

आयातुल्लाह खुमैनी की इस घोषणा को आमिर ताहिरी अपनी किताब ‘द होली टेरर : इन साइड द वर्ल्ड औफ इसलामिक टेरेरिज्म’ में उद्धृत कर के धार्मिक हिंसा की पारलौकिक प्रेरणा को स्पष्ट करते हैं.

धार्मिक मान्यताओं की जटिलता और गूढ़ जड़ता ने धर्मों के बीच ही नहीं, धर्मों के अंदर अलगअलग पंथों के मध्य भी खूनी संघर्षों को बढ़ावा दिया है.

ईसाई पहचान आंदोलन के कुछ लोग बाहर से आने वाली 12 नस्लों को जानवरों से पैदा नीच नस्लें मानते हैं और यह मानते हैं कि बाईबिल के उपदेश और पुण्य केवल सफेद ईसाइयों के लिए ही हैं.

इराक व पाकिस्तान के शिया-सुन्नी संघर्षों ने जानमाल की व्यापक क्षतियां इन 2 देशों के अलावा अन्य देशों में भी की हैं जिन में भारत भी एक है.

हिंदू धर्म में जातिवाद और वर्णव्यवस्था ने लाखों लोगों को नारकीय जीवन और कीड़ेमकोड़ों सी मौत मुहैया कराई.

सिख समुदाय में डेरा सच्चा सौदा और रामरहीम प्रकरण नई चीजें हैं, इस से पहले खालिस्तान की सनक के नाम पर कुछ लोग अपने ही समुदाय का काफी नुकसान कर चुके हैं.

यहूदी, जो विश्व जनसंख्या का मात्र 0.2 प्रतिशत हैं, उन की धार्मिक कट्टरता का उद्घाटन कैरेन आर्मस्ट्रांग (द बैटिल फौर गौड) में करते हैं. रब्बी इसराईल हेस द्वारा 1980 में प्रकाशित जातीय नरसंहार संबंधी आलेख में ‘तोरा’ का हुक्म उद्धृत है कि फिलिस्तीनी यहूदियों के लिए उसी तरह हैं जैसे प्रकाश के लिए अंधकार होता है और वे अमेलकिट्स की तरह घृणित हैं. अमेलकिट्स के लिए 1 सैमुएल: 15 : 3 के अनुसार हिब्रुओं से कहा गया है कि ‘जाओ, और अमेलकिट्स को नष्ट कर दो, और उन के पास जो कुछ भी हो, वह सब नष्ट कर दो. उन के आदमियों, औरतों और बच्चों तथा दूध पीते शिशुओं, बैल, भेड़, ऊंटों, गधों सब को मार डालो.’

आजकल पश्चिमी समाजों में ईसाइयों द्वारा विधर्मियों पर घातक हमले नगण्य हैं. पर हिटलर का नाजी आंदोलन धर्मजनित रेसियल अहंकार पर आधारित था जिस में यहूदियों को उन के धर्म के कारण ही निशाना बना कर चुनचुन कर मारा गया. आज भी घृणा और असहिष्णुता के कारोबार में कमी नहीं है. प्रोटेस्टेंट ईसाइयों के सब से बड़े संगठन दक्षिणी बैपटिस्ट सभा के अध्यक्ष ने 1980 में कहा था कि ईश्वर यहूदी की प्रार्थना नहीं सुन सकता.

इसी संगठन की 2002 की सालाना बैठक में पैगंबर मुहम्मद को शैतानों के कब्जे में बताया गया था. ब्रिटिश और यूरोपीय पार्लियामेंटों के सदस्य डा. इयान रिचर्ड (एक चर्च संस्था के संस्थापक) ने कैथोलिकों को शैतानी कपट धारण करने वाला कहा. कट्टर ईसाइयों द्वारा यहूदी और अन्य पंथ के अनुयायियों के खिलाफ पथराव, गोलीबारी, बमविस्फोट और म्यूनिसिपल सप्लाई के पानी को जहरीला बनाने जैसी घटनाएं भी होती रही हैं. 1995 में ओक्लाहामा सिटी में टिमोथी मैकवेग ने 19 बच्चों सहित 168 लोगों को बम से मार दिया था.

शांति का आधार ले कर दुनिया में जगह बनाने वाले बौद्ध धर्म के ही एक अनुयायी ने श्रीलंका की प्रधानमंत्री भंडारनायके को मौत के घाट उतारा था. बौद्ध धर्म से प्रबल प्रभावित कोरिया और चीन में इनसानी अत्याचार, मानवाधिकारों के उल्लंघन और मारकाट आम बातें हैं. एअर इंडिया के बोइंग-747 विमान के बम धमाके में 329 लोगों के साथ अटलांटिक महासागर में जलसमाधि की रोंगटे खड़े कर देने वाली  घटना के आरोपी सिख और कश्मीरी दोनों चरमपंथी थे. प्रकट में राजनीतिक कारणों से होने वाले इन कांडों के पीछे धार्मिक अलगाव और विद्वेष के कीटाणु अपना काम करते हैं. जैसा कि बू्रस हाफमैन, (हौली टेरर : द इंप्लीकेशन औफ टेरेरिज्म मोटिवेटेड बाई ए रिलिजिएंस इंपेरेटिव) में लिखते हैं कि हिंसा न केवल स्वीकृत है, बल्कि दैवी पवित्रता के साथ महिमामंडित भी है.

कुछ चरवाहे, बाकी भेड़बकरियां

नए धार्मिक आंदोलनों ने अपनीअपनी क्षमतानुसार दुनिया के ओरछोर तक अपनी हिंसक गतिविधियों की बदौलत आम आदमी का जीना हराम किया हुआ है. रैंड की रिपोर्ट इन की 2 महत्त्वपूर्ण विशेषताओं का खुलासा करती है. पहली तो इन के समूह की तीखी तनावपूर्ण स्थिति उन समुदायों के प्रति, जो इन के आसपास होते हैं, और दूसरी इन के अगुवाकारों का सभी अनुयायियों पर कठोर नियंत्रण, जिस से पीछे चलने वाली भीड़ बिना सोचेसमझे आंख बंद कर इन का अनुकरण करती रहे.

प्रसिद्ध इटेलियन समाजशास्त्री ली-बौन ने भीड़ की जिस समूह मानसिकता की व्याख्या की है, उस की सब से अच्छी समझ इन संगठनों के ठेकेदारों में पाई जाती है. ऐसे संगठनों के खिलाफ सीधी सैनिक काररवाई प्राय: उलटा असर करती है, जैसा कि इराक में मुक्तदा-अल-सद्र और उन के आंदोलन को पश्चिमी ताकतों द्वारा जबरिया हथियारविहीन करने पर देखा गया.

इस और ऐसी काररवाइयों ने समूचे मुसलिम समाज को पश्चिम के खिलाफ एक पाले में खड़ा कर दिया. पाकिस्तान में लाल मसजिद पर सैन्य काररवाई हो, या स्वात घाटी के मुल्ला रेडियो के खिलाफ अभियान, इन की ताकत तब और बढ़ती है जब ये खुद को ‘शैतान के कब्जे वाली सरकार’ द्वारा पीडि़त बता कर, शहीदी मुद्रा में पेश करने का मौका पा जाते हैं और अपने समुदाय से हर प्रकार का समर्थन जुटाने में फिर इन को देर नहीं लगती.

क्या फिर भी यह कहा जा सकता है कि धर्म, मनुष्य को हिंसा और मारकाट नहीं, बल्कि सभ्यता और शांतिपूर्वक सहअस्तित्व के साथ जीना सिखाता है? क्या किसी के अपने आसपास के किसी संप्रदाय, धार्मिक अनुयायी को इसलिए आदर देना चाहिए, क्योंकि वह सही रास्ते पर जा रहा है? तो फिर विश्वव्यापी हिंसा की ओर जान

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