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8 साल का चेस चैंपियन 

8 साल का अफ्रीकी बच्चा टानी ओलुवा आदेवुमो की कहानी भी ऐसी ही है. टानी को शतरंज सीखे अभी एक साल भी नहीं हुआ और वह अपने आयुवर्ग में न्यूयार्क का स्टेट चैंपियन बन गया.

2 साल पहले नाइजीरिया में ईसाइयों पर हमलों के बाद टानी का परिवार भाग कर अमेरिका आ गया था. दूसरे लोगों की तरह इस परिवार को भी मैनहट्टन के शरणार्थी शिविर में रखा गया. 2 साल पहले एक पास्टर की मदद से टानी ने स्कूल जाना शुरू किया.

वहां पर उस के एक टीचर रसेल माकोस्की ने क्लास को शतरंज खेलना सिखाया. टानी ने बहुत तेजी से शतरंज सीखा. यह देख रसेल ने स्कूल में चेस क्लब बना लिया. टानी क्लब की फीस देने में असमर्थ था, इसलिए रसेल ने उस की फीस माफ कर दी.

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जब टानी ने पहली बार एक टूर्नामेंट में हिस्सा लिया तो उस के सब से कम अंक आए. लेकिन इस के करीब एक साल बाद हुए टूर्नामेंट में उस ने 73 खिलाडि़यों को हरा कर स्टेट चैंपियनशिप जीत ली. पहली बार ही इस टूर्नामेंट को जीतने वाला वह पहला खिलाड़ी बन गया. रसेल का कहना है कि एक साल में इस स्तर तक पहुंचना किसी पर्वत को फतह करने से कम नहीं है.

अब टानी हर रात शिविर के फर्श पर बैठ कर मई में होने वाली राष्ट्रीय चैंपियनशिप की तैयारी कर रहा है. उस का इरादा लंबे समय तक फर्श पर खेलने का नहीं है. वह दुनिया का सब से छोटा ग्रैंड मास्टर बनना चाहता है. उस के टीचर द्वारा उस की मदद के लिए बनाए गए पेज पर अब तक मदद के रूप में 2 लाख डौलर यानी करीब एक करोड़ 40 लाख रुपए की मदद मिल चुकी है.

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बजट का नियति ज्ञान

कनछेदी लाल को ‘बजट’ का बड़ा इंतजार था.दो-तीन दिनों  से कन छेदीलाल की कसमसाहट बढ़ गई थी. कभी इधर होता, कभी उधर होता, कभी आंखें बंद कर सोच में डूब जाता, कभी आंखें गोल गोल घुमाने लगता.उसकी दयनीय हालत देखकर श्रीमतीजी से रहा नहीं गया, वह बोल पड़ी -“स्वामी  ! क्या बात है किसका इंतजार है जो तुम्हारी स्थिति  बद से कुछ बदतर दिखाई दे रही है.”

कनछेदी लाल सयंत होकर बोले-” हमारी सरकार बजट ला रही है, बस… बजट की कल्पना करके मैं इस हालात को प्राप्त कर रहा हूं.”

श्रीमती जी ने कहा- “आप भी न ! दुनिया के अजीब प्राणी हो आपको बजट से क्या लेना और क्या देना. बजट तो हर साल आता है और कुछ न कुछ बोझ डाल कर चला जाता है. समझदार आदमी को इस बजट के सोच में नहीं पड़ना चाहिए.”

कनछेदी लाल ने पत्नी की ओर देखा फिर  मुस्कुराते हुए कहा-” मगर अब के हालात बिल्कुल नए हैं. हमारे प्रधानमंत्री अभी फुल पावर में है,देखना बजट ऐसा गुल खिलाएगा कि तुम खुशी से उछल चल पड़ोगी ….”

श्रीमती कनछेदीलाल की बातें सुनकर गंभीर मुद्रा में आ गई-“स्वामी! क्या आप सही कह रहे हैं.”

कनछेदी लाल- “मैं इसलिए तो सोच में डूबा हुआ हूं. मैं सोच रहा हूं एक तरफ तो हमारी सरकार तीन दशक होते-होते अब जाकर मजबूत सरकार बन कर आई है. तो हमें बजट में लाभ ही लाभ देगी, सच कहूं, फिर सोचता हूं कहीं ऐसा नहीं हुआ तो ! कहीं फिर  दुबले पर दो आषाण वाली कहावत तो सिद्ध नहीं हो जाएगी .”

श्रीमती जी ने गहरी सांस लेकर कहा- “तो ऐसा कहो न, यानी मैं सही थी, इसलिए आप के हालात ऐसे हो चले हैं.”

कनछेदी लाल- “हां, यह अजीब हालत हो गई है मेरी, अब तुम ही कुछ उपाय  बताओ ताकि मैं इससे उबर सकूं. मैं तो जितना सोचता हूं, मेरी स्थिति और भी खराब होती जाती है. फिर नहीं सोचता हूं  तो कसमसाहट होने लगती है .”

श्रीमती जी गंभीर हो गई बोली-” यह बजट का असर है,जब आपका ऐसा हाल है तो उन लोगों पर क्या बीतती होगी जो सीधे प्रभावित हैं, बड़े लोग हैं.”

कनछेदी लाल ने उसांस लेकर कहा- “पता नहीं, यह रोग कहां से आ लगा मुझे, अब तो मैं कहीं का नहीं रहा.”

श्रीमती जी ने कुछ विचार कर कहा- “जब तलक बजट नहीं आ जाता तुम्हारा उद्धार मुझे नहीं दिखता. इस हालात का भला क्या इलाज हो सकता है यह तो ऐसी  ‘बला’ है जिसे तुमने स्वयं बुलाया है. कितना मना करती हूं काम धंधे की सुध लो, कुछ मेरी और ध्यान दो, मगर नहीं दुनियाभर की चिंता लेकर बुद्धिजीवी बनेने चले हो अब खुद ही निपटो.”

कनछेदी लाल असहाय हो गए-” क्या इसका इलाज नहीं है ? कोई हकीम, वैध, डॉक्टर कोई दवा दे सकें तो मैं चैन की नींद सोऊ । न सो पाता हूं, न जाग पाता हूं. मेरी हालात तो इस बजट के चक्कर में बहुत बुरी हुई .”

श्रीमती जी-“अब सब्र करो. तुम भी झेलो, हम भी झेले और भला अब क्या चारा है. मेरी मानो तो किसी डॉक्टर, वैद्य, हकीम के चक्कर में मत पड़ो.”

” तो मैं क्या करूं ।” कसमसाहट घनी हुई तो रूंआसे कनछेदी लाल ने कहा

श्रीमती जी- “! तुम बुद्धिजीवी हो, मुझे शक है ! तुम कोई नकली बौद्धिक हो.”

कनछेदी लाल ने तड़प कर कहा-” कम से कम तुम तो ऐसा मत बोलो, दीवारों के भी कान होते हैं .”

श्रीमती जी-” फिर तुमने हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी से क्या सिखा है, बताओ तो.”

कनछेदी लाल बोले- “मैं भला उनसे क्या सिखूं, कहां प्रधानमंत्री और कहां मैं, शहर का कंत्री !”

श्रीमती जी बोली- “देखो ! हमारे प्रधानमंत्री जी कितने गुणी आदमी हैं जब भी कोई तीर, तलवार, भाला या कहो ब्रह्मास्त्र उनकी और चलाता है,तो वे उसे ही पैंतराबाजी कर, वापस उसी के पास भेज देते हैं बस… ”

कनछेदी लाल की यह सुनते ही कसमसाहट मानो और बढ़ गई बोले- “वाह!जैसे खून का सौदागर कहा, तो पलट कर श्रीमती सोनिया गांधी को ऐसा  प्रतिउत्तर दिया की श्रीमती गांधी हिल गई और गुजरात चुनाव फतह…”

श्रीमती जी- “बिल्कुल यह योग्यता अपने आप में पैदा करो…”

कनछेदी लाल बुदबुदाने लगा -“जैसे 2014 के चुनाव में चाय वाला कह कर अपमान करना चाहते थे तो उसे उन्होंने  अपनी योग्यता बना ली, जैसे चौकीदार चोर है कहा तो 2019 के समर में “हम सब चौकीदार”कहकर राहुल गांधी की बोलती बंद कर दी .

श्रीमती जी कनछेदी लाल की बातें ध्यान से सुन रही थी वह प्रसन्न हुई की श्रीमान को तीर चुभ गया… उसने एक कप प्याली चाय हाथों में रख, प्रेम -पगे स्वर में कहा- “अजी ! यही तुम्हारा इलाज है, समझ  गए  न !”

कनछेदी लाल ने चाय की चुस्की ली और कुछ सामान्य होते हुए कहा-” मैं भी प्रधानमंत्री जी का यह गुण आत्मसात करके भारतवर्ष का सुखी नागरिक बनूंगा.”

श्रीमतीजी बोली- “हां,फिजूल की चिंता, कसमसाहट स्वास्थ्य के लिए अहितकर है, मेरे स्वामी!”

कनछेदी लाल बोले- “मैं आज से बल्कि अभी से स्वयं को स्वयं की सोच को बदलने का प्रयास करता हूं .”

श्रीमती जी ने कहा- “सबसे पहले क्या करोगे, बताओ तो, मैं भी सुनू.” श्रीमतीजी के स्वर में मानो एक  चैलेंज था,  परीक्षा का भाव था.

कनछेदी लाल संभलकर बोले- “मैं… मैं… ‘बजट’ चाहे जितना कठोर हो उसमे अपना भला ढूंढ लूंगा.”

श्रीमती मुस्कुराई- “बहुत अच्छा मेरे स्वामी ! बहुत अच्छे… आगे…”

कनछेदी लाल- “और… और थोड़ा तुम बताओ.”

श्रीमती जी ने प्रेम सेउनके  माथे पर हाथ सहलाते हुए कहा-” बजट में जो भी महंगा हो, उसे खुशी-खुशी स्वीकार करना है बस .”

कनछेदी लाल की मानो आंखे खुल गई- “हां! पेट्रोल महंगा हो जाएगा  तो उसका स्वागत करूंगा मन मारकर ही सही, कहूंगा यह देश हित, राष्ट्रहित में जरूरी है.  सोना महंगा हुआ तो कहूंगा सरकार का यह अति आवश्यक कदम है, जनता को आवाम को इसको हमे हंसते-हंसते स्वीकार करना है .”

श्रीमती जी ने बीच मे टोहका-” भला क्यों ? क्योंकि जनता के पास इसके सिवाय चारा भी नहीं है ? पांच साल के लिए सरकार चुन ली गई है अब झेलो… ”

कनछेदी लाल अब धीरे-धीरे स्वस्थ हो रहे थे हंसकर बोले-” जैसे तुम मुझे झेल रही हो और झेलोगी .”

श्रीमती जी ने आंखें झुका ली-” ऐसा न कहो स्वामी.”

कनछेदी लाल अब स्वस्थ हैं. वे नियति का ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं.

बेवफाई रास न आई: भाग 1

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के अहिरौली थानाक्षेत्र का एक गांव है शंभूपुर दमदियावन. इसी गांव में हरिदास यादव अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के 2 बेटे थे संतोष यादव और विनोद यादव. संतोष बड़ा था. अपनी मेहनत और लगन की बदौलत वह सन 2015 में उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही के पद पर भरती हो गया था. उस की पहली पोस्टिंग चंदौली जिले के चकिया थाने में हुई थी. नौकरी लग जाने पर घर वाले भी बहुत खुश थे. जब लड़का कमाने लगा तो घर वालों ने उस का रिश्ता भी तय कर दिया.

30 दिसंबर, 2017 को उस का बरच्छा था, इसलिए वह एक सप्ताह की छुट्टी ले कर अपने गांव आया था. बरच्छा का कार्यक्रम सकुशल संपन्न हो गया था. अगली सुबह 8 बजे के करीब संतोष अपने 2 दोस्तों राहुल यादव और सुरेंद्र के साथ टहलते हुए गांव से बाहर की ओर निकला. शादी को ले कर राहुल और सुरेंद्र दोनों ही संतोष से हंसीमजाक कर रहे थे, तभी संतोष के मोबाइल पर किसी का फोन आ गया.

संतोष ने अपने मोबाइल स्क्रीन पर नजर डाली तो वह नंबर उस के किसी परिचित का निकला. काल रिसीव कर के उस ने उस से बात करनी शुरू की. अपने दोनों दोस्तों से वहीं रुकने और थोड़ी देर में लौट कर आने की बात कह कर वह वहां से चला गया. संतोष के इंतजार में राहुल और सुरेंद्र वहां काफी देर तक खड़े रहे. जब 2 घंटे बाद भी वह नहीं लौटा तो दोनों दोस्त यह सोच कर घर लौट गए कि हो सकता है संतोष अपने घर चला गया हो.

संतोष के यहां मांगलिक कार्यक्रम था. घर में मेहमान आए हुए थे. दोस्तों ने सोचा कि हो सकता है वह उन के सेवासत्कार में लग गया हो और उसे लौटने का समय न मिला हो. संतोष को घर से निकले 3 घंटे बीत चुके थे. घर वाले उसे ले कर काफी परेशान थे कि सुबह का निकला संतोष आखिर कहां घूम रहा है. सब से ज्यादा परेशान उस के पिता हरिदास थे.

उन्होंने छोटे बेटे विनोद को संतोष का पता लगाने के लिए भेज दिया. विनोद को पता चला कि 3 घंटे पहले संतोष को राहुल और सुरेंद्र के साथ गांव से बाहर जाते देखा गया था. यह जानकारी मिलते ही विनोद राहुल और सुरेंद्र के घर पहुंच गया. दोनों ही अपनेअपने घरों पर मिल गए. विनोद ने उन से संतोष के बारे में पूछा तो वह यह सुन कर चौंक गए कि संतोष अब तक घर पहुंचा ही नहीं था. आखिर वह कहां चला गया.

राहुल ने विनोद को बताया कि वे तीनों साथ में गांव से बाहर निकले थे तभी संतोष के मोबाइल पर किसी का फोन आया था. वह कुछ देर में वापस आने की बात कह कर चला गया था. जब 2 घंटे बीत जाने के बाद भी वह नहीं लौटा तो वे दोनों यह सोच कर लौट आए कि शायद वह घर चला गया होगा.

संतोष को ले कर जितना ताज्जुब दोस्तों को हो रहा था, विनोद भी उतनी ही हैरत में डूबा हुआ था कि बिना किसी को कुछ बताए भाई आखिर गया कहां. इस से भी बड़ी बात यह थी कि उस का मोबाइल फोन भी स्विच्ड औफ था. संतोष का नंबर मिलातेमिलाते विनोद भी परेशान हो चुका था.

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संतोष का जब कहीं पता नहीं चला तो विनोद घर लौट आया और पिता हरिदास को सब कुछ बता दिया. अचानक संतोष के लापता हो जाने की बात सुन कर हरिदास ही नहीं, बल्कि पूरा परिवार स्तब्ध रह गया.

संतोष की गांव भर में तलाश की गई, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. संतोष को तलाशते हुए पूरा घर और नातेरिश्तेदार परेशान हो गए. विनोद भी मोटरसाइकिल ले कर संतोष को खोजने गांव के बाहर निकल गया था. लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला.

दोपहर 2 बजे के करीब गांव के कुछ चरवाहे बच्चे गांव से करीब आधा किलोमीटर दूर अरहर के खेत के पास अपने पशु चरा रहे थे. भैंसें चरती हुई अरहर के खेत में घुस गईं तो चरवाहे खेत में गए. चरवाहे जैसे ही बीच खेत पहुंचे तो वहां दिल दहला देने वाला दृश्य देख कर उन के हाथपांव फूल गए.

अरहर के खेत के बीचोबीच संतोष यादव की खून से सनी लाश पड़ी थी. लाश देखते ही चरवाहे जानवरों को खेतों में छोड़ कर चीखते हुए उल्टे पांव गांव की ओर भागे. वे दौड़ते हुए सीधे हरिदास यादव के घर जा कर रुके और एक ही सांस में पूरी बात कह डाली.

बेटे की हत्या की बात पर एक बार तो हरिदास को भी विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने उन बच्चों से कहा, ‘‘बेटा, किसी और की लाश होगी. तुम ने ठीक से पहचाना नहीं होगा.’’

बच्चे पासपड़ोस के थे, इसलिए वे संतोष को अच्छी तरह जानतेपहचानते थे. बच्चों ने जब उन्हें फिर से बताया कि लाश किसी और की नहीं बल्कि संतोष चाचा की ही है तो हरिदास के घर में रोनापीटना शुरू हो गया.

हरिदास छोटे बेटे विनोद को ले कर अरहर के खेत में उस जगह पहुंच गए, जहां संतोष की लाश पड़ी होने की सूचना मिली थी. बेटे की रक्तरंजित लाश देख कर हरिदास गश खा कर वहीं गिर पड़े. कुछ ही देर में यह बात पूरे गांव में फैल गई तो वहां पूरा गांव उमड़ आया.

यह सूचना थाना अहरौला के थानाप्रभारी चंद्रभान यादव को दे दी गई थी. चूंकि हत्या एक पुलिसकर्मी की हुई थी, इसलिए आननफानन में थानाप्रभारी एसआई रमाशंकर यादव, कांस्टेबल महेंद्र कुमार, अखिलेश कुमार पांडेय, ओमप्रकाश यादव और महिला कांस्टेबल अनीता मिश्रा के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने इस की सूचना एसपी अजय कुमार साहनी और एसएसपी नरेंद्र प्रताप सिंह को भी दे दी.

सूचना मिलने के कुछ ही देर बाद दोनों पुलिस अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. जिस जगह लाश पड़ी थी, वहां आसपास अरहर की फसल टूटी हुई थी. इस से लग रहा था कि मृतक ने हत्यारों से संघर्ष किया होगा.

संतोष की हत्या कुल्हाड़ी जैसे तेज धारदार हथियार से की गई थी. हथियार के वार से उस का जबड़ा भी कट कर अलग हो गया था. गले पर कई वार किए गए थे. इस के अलावा उसे 2 गोली भी मारी गई थीं. इस से साफ पता चलता था कि हत्यारे नहीं चाहते थे कि संतोष जिंदा बचे. इसलिए मरते दम तक उस पर वार पर वार किए गए थे.

मौकेमुआयने के दौरान पुलिस को वहां कारतूस का एक खाली खोखा भी मिला. संतोष के पास मोबाइल फोन था, जो उस के पास नहीं मिला. इस का मतलब था कि हत्यारे उस का मोबाइल अपने साथ ले गए थे. बहरहाल, पुलिस ने कागजी काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दी.

पुलिस ने मृतक के पिता हरिदास यादव की तहरीर पर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. थानाप्रभारी चंद्रभान यादव ने सब से पहले संतोष के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स खंगाली तो पता चला कि संतोष के सेलफोन पर 30 दिसंबर, 2017 की सुबह आखिरी काल आजमगढ़ के छितौना गांव की रहने वाली ज्योति यादव की आई थी. पुलिस ने ज्योति को पूछताछ के लिए थाने बुला लिया. ज्योति से पूछताछ में पुलिस को पता चला कि वह मृतक संतोष यादव की प्रेमिका थी.

पुलिस ने जब ज्योति से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने संतोष की हत्या की पूरी कहानी बता दी. उस ने कहा कि संतोष को उस ने ही फोन कर के गांव से बाहर अरहर के खेत में मिलने के लिए बुलाया था. वहां पहले से छिपे बैठे उस के घर वालों ने उसे मौत के घाट उतार दिया. पुलिस ने वारदात में शामिल अन्य आरोपियों की तलाश में दबिश दी तो वे सभी अपने घरों से गायब मिले.

पुलिस ने सिपाही संतोष यादव हत्याकांड का खुलासा 60 घंटों में कर दिया था. ज्योति से विस्तार से पूछताछ की गई तो उस ने अपने प्रेमी की हत्या की जो कहानी बताई, वह रोमांचित कर देने वाली थी—

22 वर्षीया ज्योति उर्फ रजनी मूलरूप से आजमगढ़ के अहरौला थाने के छितौना गांव के रहने वाले रामकिशोर यादव की बेटी थी. 3-4 भाईबहनों में वह दूसरे नंबर की थी. रामकिशोर यादव की खेती की जमीन थी, उसी से वह अपने 6 सदस्यों के परिवार की आजीविका चलाते थे. सांवले रंग और सामान्य कदकाठी वाली ज्योति बिंदास स्वभाव की थी. वह एक बार किसी काम को करने की ठान लेती तो उसे पूरा कर के ही मानती थी.

ज्योति ने 12वीं तक पढ़ाई के बाद आगे की पढ़ाई नहीं की. आगे की पढ़ाई में उस का मन नहीं लग रहा था. हालांकि मांबाप ने उसे आगे पढ़ाने की कोशिश की, लेकिन उन की कोशिश बेकार गई थी.

ज्योति जिस स्कूल में पढ़ने जाया करती थी, उस स्कूल का रास्ता शंभूपुर दमदियावन गांव हो कर जाया करता था. ज्योति सहेलियों के साथ इसी रास्ते से हो कर आतीजाती थी. इसी गांव का रहने वाला संतोष कुमार यादव ज्योति के स्कूल आनेजाने वाले रास्ते में खड़ा हो जाता और उसे बड़े गौर से देखता था. ज्योति भले ही सांवली थी, लेकिन उस में गजब का आकर्षण था. यही आकर्षण संतोष को उस की ओर खींच रहा था.

संतोष ने ज्योति के बारे में जानकारी हासिल की तो पता चला कि वह पड़ोस के गांव छितौना के रहने वाले रामकिशोर यादव की बेटी है और उस का नाम ज्योति है. ज्योति के बारे में सब कुछ पता लगाने के बाद संतोष उस के पीछे पागल दीवानों की तरह घूमने लगा.

तमिलनाडु के फिल्मकारों ने जारी किया पत्रकारों के खिलाफ तुगलकी फरमान

सात जुलाई को कंगना रानौत और पत्रकारों के बीच शुरू हुए विवाद के एक दिन बाद यानी कि आठ जुलाई की देर रात दक्षिण भारत से भी एक खबर आ गयी है.तमिलनाड़ु के फिल्म निर्माताओं और फिल्म प्रचारकों ने फिल्म तथा कलाकारों के खिलाफ लिखने पर पत्रकार का बायकाौट करने के साथ साथ उसके खिलाफ कानूनी कारवाही का भी ऐलान कर दिया है.

फिल्मकार बेहतरीन फिल्में बनाने की बजाय लंबे समय से अपनी फिल्मों की आलोचन झेलने के बाद अब तमिलनाडू फिल्म प्रोड्यूसर्स काउंसिल और साउथ इंडियन पी आर ओ यूनियन ने प्रेस शो के दौरान निर्माताओं के असहनीय खर्चो फिल्म निर्माताओ की संस्था ने और फिल्म के प्रमोशन खर्च पर अंकुश लगाने के नाम पर सोमवार, आठ जुलाई की रात पत्रकारों पर नकेल कसने का प्रपत्र जारी किया है, जो कि आठ जुलाई से ही लागू हो गए.इसके अनुसार फिल्म की कठोर समीक्षा करने वालों को दरकिनार किया जाएगा.

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संगठन द्वारा जारी प्रपत्र पर कहा गया है कि सदस्यो की बैठक में निर्णय लिया गया है कि एक समीक्षा में एक फिल्म अभिनेता,अभिनेत्री, निर्देशक और निर्माता को नीचा दिखाने वाले आलोचकों को ‘कानूनी नोटिस’ दिया जाएगा और भविष्य में होने वाली किसी भी फिल्म इवेंट में उन्हे शिरकत करने की अनुमति नही दी जाएगी.

इस प्रपत्र के अनुसार एसोसिएशन ने तीन मुख्य मुद्दे उठाए हैं. निर्माताओं और संघ के सदस्यों ने आगे फैसला किया है कि जो भी फिल्म व अभिनेताओं की ‘‘बड़ी हद तक’’आलोचना करता है, उसे भविष्य में किसी भी ‘सिनेमा संबंधी’ इवेंट में शामिल होने की अनुमति नही दी जाएगी. इसमें प्रेस शो,फिल्म की सफलता पर दी जाने वाली पार्टी, औडियो लांच और ट्रेलर लांच भी  शामिल है.

इसके अलावा निर्माता और पीआरओ इसके बाद यह सुनिश्चित करेंगे कि फिल्म के मुहुर्त पूजा, सफलता मिलने, औडियो लांच और ट्रेलर के दौरान कोई भी उपहार या पारिश्रमिक वितरित नही किया जाएगा. केवल चाय और नाश्ता मीडिया कर्मियों को परोसा जाएगा.

प्रपत्र में अंकित तीन मुख्य मुद्देः

1.आज से मीडिया से जुड़े सभी कार्य जैसे फिल्म का मुहूर्त पूजा, प्रेस कांफ्रेंस, सफलता की प्रेस कांफ्रेंस, औडियो लांच, ट्रेलर लांच के अवसर पर कोई उपहार या पारिश्रमिक नहीं दिया जाएगा. यह निर्णय हमारे निर्माता संघ और उनके पक्ष पीआरओ दोनों द्वारा लिया गया.

2. मुहुर्त पूजा, प्रेस मीट, सक्सेस मीट, औडियो लांच, ट्रेलर लांच में हम च%B

स्वरा भास्कर के साथ ट्विटर पर हुई बदसलूकी

बौलीवुड एक्ट्रेस स्वरा भास्कर अपने बेबाक अंदाज को लेकर हमेशा खबरों में छाई रहती है. वे सोशल मीडिया पर एक्टिव भी रहती हैं. कई बार इनके पोस्ट की वजह से ट्रोल भी किया जाता है. हाल ही में एक ट्विटर यूजर ने सोशल मीडिया पर न सिर्फ स्वरा भास्कर के साथ बदसलूकी की, बल्कि उनके लिए अपशब्द भी कहा. एक्ट्रेस ने उसका बेबाकी से जवाब दिया और सोशल मीडिया पर इसके खिलाफ शिकायत भी की.

दरअसल, ट्विटर पर स्वरा भास्कर को एक ट्रोलर ने अपशब्द कहे. इसके खिलाफ शिकायत करते हुए स्वरा भास्कर ने एक ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने लिखा ‘पागल, गर्वित, भाग्यशाली राष्ट्रवादी और हिंदू’ अपने शब्दों से खुद के (और मेरे) धर्म और राष्ट्र को शर्मसार कर रहे हैं. इसके अलावा, मुझे लगता है कि यह उत्पीड़न छेड़छाड़ है.’ इस ट्वीट में स्वरा भास्कर ने मुंबई पुलिस को टैग करते हुए उनसे शिकायत भी की.

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स्वरा भास्कर के ट्वीट पर तत्काल एक्शन लेते हुए मुंबई पुलिस ने कार्रवाई करने का आश्वासन दिया. मुंबई पुलिस के इस काम से खुश होकर स्वरा भास्कर ने ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने लिखा ’24/7 सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने के लिए और जल्द से जल्द रिप्लाई देने के लिए मुंबई पुलिस का धन्यवाद.’

बता दें कि स्वरा भास्कर को उनके बेबाक अंदाज में बात करने के लिए पहचाना जाता है, इसके अलावा स्वरा भास्कर राजनैतिक मुद्दों और समसामयिक मुद्दों पर भी बेबाकी से अपनी राय रखती हैं. सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने के अलावा स्वरा भास्कर एक बेहतरीन एक्ट्रेस भी हैं. फिल्म रांझना में उनके किरदार को काफी पसंद किया गया था.

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ये हैं दुनिया की अजीबोगरीब इमारतें

दुनिया हर पल अपने रंग बदलती है. बदलते समय के साथ इंसानों ने अपने आराम और सुविधा के लिए कई चीजों का आविष्कार किया है. न तो आविष्कारों की कोई सीमा है और न ही क्रिएटीविटी की. क्रिएटीविटी का न तो कोई ओर है और न ही कोई छोर. बच्चों की चित्रकारी से लेकर आर्किटेक्ट द्वारा बनाई गई बड़ी बड़ी इमारतें, इन सबमें क्रिएटीविटी है, जरूरत है तो बस नजरिए की. इस दुनिया को कई आर्किटेक्ट ने अपने दिमाग की ऊल-जलूल कल्पनाओं से सजाया है. गौरतलब है कि यही ऊल-जलूल कल्पनाएं कि यह बहुत खूबसूरत संरचनाओं के रूप में मौजूद हैं. इनमें से कई रचनाएं ऐसी हैं जो कुछ लोगों के समझ के परे हैं.

आज हम आपको कुछ ऐसे ही क्रिएटीव बिल्डिंग के बारे में बताएंगे

1. नेशनल सेंटर फौर द पर्फोर्मिंग आर्ट्स (एनसीपीए), चीन

एनसीपीए बीजिंग का ओपरा हाउस है और इसे बनाने में पूरे 6 साल लगे. एक आर्टिफीशियल तलाब के ऊपर बनी यह बिल्डिंग एक बड़े से अंडे जैसी है. इस इमारत को टाइटेनियम और ग्लास से बनाया गया है.

2. क्यूबिक हाउस, रौट्टरडैम, नेडरलैंड

क्यूबिक हाउस, क्यूब शेप के घर हैं जिन्हें अलग अलग ऐंगल पर बैठाया गया है. इन क्यूब्स को किसी पेड़ की तरह बनाया गया है और सारे घर एक साथ किसी जंगल के जैसे दिखते हैं. क्यूबिक हाउस को पीट ब्लोम ने डिजाइन किया था.

3. द क्रूक्ड हाउस, पोलैंड

द क्रूक्ड हाउस एक अजब डिजाइन वाली बिल्डिंग है. पोलैंड के सोपोट में स्थित इस बिल्डिंग की बनावट आम बिल्डिंग से काफी अलग है. दूर से देखने में यह किसी कार्टून फिल्म से प्रेरित लगती है. इस टेढ़े-मेढ़े बिल्डिंग को देखकर दिमाग में यह सवाल जरूर आता है कि आखिर बनाने वाले ने इसे बनाया कैसे?

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4. डांसिंग हाउस, चेक रिपब्लिक

प्राग की इस बिल्डिंग को फ्रेड ऐंड जिंजर भी कहा जाता है. इस बिल्डिंग के रोमांटिक चार्म से कोई नहीं बच सकता. इस इमारत को देखकर ऐसा लगता है मानो दो इमारतें एक दूसरे को गले लगा रही हों. इस इमारत को व्लाडो मिलुनिक ने फ्रैंक गेहरी के साथ डिजाइन किया था. यह इमारत प्राग की पहचान है.

5. हैबिटाट 67, मोन्ट्रीयाल, कनाडा

यह मोन्ट्रीयाल का एक हाउसिंग कोम्प्लैक्स है. यह मोन्ट्रीयाल और कनाडा की पहचान है. इस कौम्प्लैक्स का आकार बच्चों के खेलने के क्यूब जैसा है. यह देखने में बिल्कुल असली नहीं लगती और यह यकीन करना मुश्किल है कि इस कोम्पलैक्स में लोग आराम से रहते हैं.

6. फौरेस्ट स्पाइरल, जर्मनी

यह जर्मनी का एक रेसिडेंशियल कौम्पलैक्स है. इस बिल्डिंग की छत हरियाली से ढकी है और यह स्पाइरल शेप की इमारत है. पूरी इमारत की शक्ल किसी जंगल जैसी है. कौन्क्रीट के जंगलों के बीच में एक जंगल जैसी इमारत तो होनी ही चाहिए.

7. द बास्केट बिल्डिंग, ओहायो

आपने मौल में शौपिंग करते हुए शौपिंग बास्केट तो देखे ही होंगे, पर क्या आपने शौपिंग बास्केट जैसी बिल्डिंग देखी है? अमेरिका के ओहायो स्टेट में दुनिया का सबसे बड़ा बास्केट मौजूद है. यह बास्केट जैसी बिल्डिंग असल में लौंगाबर्गर का हेडक्वार्टर है. डेव लौंगाबर्गर ने इस कंपनी की स्थापना की थी. यह कंपनी शॉपिंग और पिकनिक बास्केट बनाती है.

दुनिया में ऐसे कई अजूबे हैं, जिससे दुनिया तमाम परेशानियों के बावजूद बहुत खूबसूरत लगती है. इस जिन्दगी में एक दफा तो इनमें से किसी एक का दीदार करना जरूरी है.

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एक्सरसाइज करते समय भूलकर भी न करें ये गलतियां

अगर आप भी जिम में एक्सर्साइज करते हैं तो आपको कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना चाहिए वरना आप इंजरी का शिकार हो सकते हैं. और इससे आपका काफी नुकसान हो सकता है. तो आइए जानते हैं, जिम में एक्सरसाइज करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए.

​जिम में वार्मअप किए बिना एक्सरसाइज बिल्कुल भी न करें. अगर आप अच्छे से वार्मअप करेंगे तो क्रैंप और मसल टियर से बच सकते हैं.

जिम में जबरदस्ती वेट लिफ्टिंग न करें. अगर आप एक लिमिट के बाद वेट नहीं उठा सकते तो बिल्कुल न उठाएं. इससे इंजरी का खतरा होता है.

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एक्सरसाइज के दौरान ब्रीदिंग पर पूरा ध्यान न देने से बौडी में औक्सीजन की कमी हो सकती है. इस वजह से कई बार लोग बेहोश भी हो जाते हैं. इसलिए एक्सरसाइज के दौरान इस बात का ध्यान रखें कि आपकी सांस धीमी नहीं होनी चाहिए. ऐसे में मुंह और नाक दोनों से सांस लें.

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इसके अलावा वेट ट्रेनिंग करते समय अपनी फार्म पर जरूर फोकस करें. अच्छा रिजल्ट हासिल करने और इंजरी से बचने के लिए भी फार्म सबसे ज्यादा जरूरी है.

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जानें क्यों, हंसमुख लड़कों को डेट करती हैं लड़कियां

लड़कियों को हंसमुख और खुशमिजाज़ लड़के बहुत ज्यादा पसंद होते हैं, क्योंकि ऐसे लड़के हमेशा हंसाते हैं और टेंशन फ्री रखने में मदद करते हैं. इसलिए हर लड़की हंसमुख लड़कों को डेट करना पसंद करती हैं और ऐसे लड़कों से अट्रैक्ट भी होती हैं. ऐसे लड़के जिंदगी को खुलकर जीना जानते हैं और हर परिस्थिति में ना सिर्फ खुद को बल्कि अपने पार्टनर को भी खुश रखने का तरीका ढूढ़ लेते हैं.

आइए जानते हैं, हंसमुख लड़कों को डेट करने के क्या फायदे हैं.

हंसमुख लड़के चेहरे पर हंसी लाना जानते हैं – वैसे तो वो इंसान सभी को पसंद होते हैं जो दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाना जानते हो. लेकिन खासकर लड़कियों को ऐसे लड़के बहुत पसंद होते हैं जो उनके चेहरे पर मुस्कान लाना जानते हो क्योंकि ऐसे लड़कों को पता होता है कि अगर आप किसी कारण से तनाव में हैं तो आपको किस तरह खुश करें.

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हमेशा मनोरंजन करते हैं – जो लड़के हमेशा हंसते हैं और खुश रहते हैं वो दूसरों का मनोरंजन करते हैं और दूसरों को भी खुश रखते हैं. ऐसे लड़के बोरिंग नहीं होते हैं और ना ही दूसरों को बोर होने देते हैं. वो ऐसी बातें बोलते हैं जिससे हंसी आ जाती है. इससे चीजें रोमांचक हो जाती हैं. इसलिए हर लड़की ऐसे लड़के के साथ जिंदगी बिताना चाहती है.

दोस्त और परिवार वालों का दिल जीत लेते हैं – अपने खुशमिजाज होने के कारण वो हमेशा अपने आस-पास के लोगों का दिल जीत लेते हैं. लड़कियों को ऐसे लड़के इसलिए पसंद होते हैं क्योंकि उन्हें ऐसा लगता है कि वो अपने परिवार या दोस्तों से उस लड़के को मिलवाएगी तो वह आसानी से उनका दिल जीत लेगा.

दूसरों को भी खुश रखते हैं – ऐसे लड़के हमेशा दूसरों के तनाव और दुख को कम करने की कोशिश में रहते हैं. इस वजह से भी लड़कियां ना चाहते हुए भी उनकी ओर आकर्षित हो जाती हैं. अच्छी-अच्छी बातें बोलने की कोशिश करते हैं ताकि दूसरों के चेहरे की मुस्कान बनी रहे.

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सामाजिक स्थितियों को संभालना जानते हैं- ऐसे लड़कों के साथ सबसे अच्छी बात ये है कि वे सभी के साथ बड़ी जल्दी घुल मिल जाते हैं. वे अच्छे से जानते हैं कि समाजकि स्थितियों को किस तरह से मैनेज किया जाता है. अपने खुशमिजाज़ व्यवहार की वजह से लोगों के बीच जल्दी ही काफी प्रसिद्धि बटोर लेते हैं.

किसी तरह के ड्रामे में खुद को शामिल नहीं करते हैं – ऐसे लड़के कभी भी अपनी परेशानी के कारण भीड़ में किसी तरह का ड्रामा नहीं करते हैं. उन्हें अपनी भावनाओं पर नियंत्रण होता है इसलिए लड़कियां ऐसे लड़कों से अधिक आकर्षित होती हैं.

ये फेशियल मसाज आपको कर देगी तरोताजा

आप चेहरे को तरोताजा रखने के लिए तमाम कोशिशे करते हैं. पर इन कोशिशों के बावजूद भी आपका चेहरा वैसे नहीं हो पाता है, जैसा आप चाहते हैं. तो आइए बताते हैं कुछ टिप्स, जिसे आपनाकर आप चेहरे को तरोताजा रख सकते हैं.

चेहरे पर अच्छी तरह करें मसाज

चेहरे की अच्छी तरह से मालिश करें. मालिश करने के लिए जिस प्रोडक्ट का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह आपके त्वचा के अंदर तक जाता है और अपना असर दिखाता है. इसके अलावा त्वचा के अंदर यह प्रोडक्ट ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ाता है.

तेल से करें मालिश

आप चेहरे पर तेल से मालिश कर सकते हैं. इसके लिए अपने हाथों को सही से साफ करें और चेहरे पर तेल से मालिश करें. आप चेहरे की नार्मल सफाई के लिए रोज तेल की मालिश कर सकते हैं.

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जबड़े की करें मालिश

अधिक ताजगी और तनावमुक्त महसूस करना चाहते हैं तो जबड़े की मालिश करें. ऊर्जा बढ़ाने के लिए यह प्रक्रिया आप दिन में कभी भी कर सकते हैं. बता दें कि ऐसा करने से एक कप कौफी पीने से ज्यादा ऊर्जा मिलती है.

भौंहों के बीच में करें मालिश

लोग साइनस के चलते चेहरे के दर्द से बेहाल रहते हैं. कभी नाक से सांस लेने में दिक्कत होती है. आपका दर्द सही नहीं हो रहा है तो भौंहों के बीच में 30 सेकंड मालिश करके आप दर्द से छुटकारा पा सकते हो.

गर्दन पर तेल लगाकर करें मालिश

अक्सर देखा जाता है कि हमारी आंखों में सूजन आ जाती है. इसके लिए आप अपनी गर्दन पर तेल लगाकर नीचे की तरफ मालिश करें. इससे आंखों से पानी से तरह पदार्थ निकलने की समस्या से छुटकारा मिलता है.

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अंतिम स्तंभ

सुमेधा बहू के रूप में सास से दबती रही और जब खुद सास बनी तो बहू के तेवर सहती रही. एक तरह से पूरी जिंदगी उस का कंधा झुका ही रहा. परिवार का स्थायी स्तंभ बन कर भी क्या अधिकार नाम की चीज थी उस के पास?

‘‘तू यह बात किसी को मत बताना’’, वह मेरे हाथों को अपने हाथ में ले कर चिरौरी सी कर रही थी, ‘‘मेरी इतनी बात मान लेना.’’

मेरा मुंह उतर गया. ‘‘क्या रे, तू तो मेरा दिमाग ही खराब कर रही है. मैं तो तेरी दी यह साड़ी पहन कर दुनियाभर में मटकती फिरती हूं कि देखोदेखो सब लोग, मेरी प्यारी सहेली ने कितनी सुंदर साड़ी दी है. और तू कह रही है कि किसी को मत बताना.’’

‘‘तू मेरा नाम मत बताना, बस.’’

‘‘वाह, यह तो कोईर् भी पूछेगा कि इतनी सुंदर साड़ी किस सहेली ने दी, किस खुशी में दी.’’

‘‘तू तो जानती है रे, कितनी मुसीबत हो जाएगी मेरी.’’

‘‘जिंदगीभर मुसीबत ही रही तेरी तो…’’

मेरा मन सच में खराब हो गया. असल में मुझे याद आ गया. 35 बरस पहले भी सुमेधा ने मुझे साड़ी दी थी. ऐसे ही छिपा कर. ऐसे ही कहा था,  ‘किसी को मत बताना.’ अवसर था इस की पहली संतान, ‘पुत्र’ के जन्म का. सासससुर, जेठजेठानी, देवरदेवरानी, ढेर सारे रिश्तेदारों व अतिथियों से भरा घर. पूरे घर में आनंदोत्सव की धूम. वह मुझे अपने कमरे में ले गई थी. अपनी अलमारी खोल एक साड़ी निकाल कर मुझे पकड़ाते हुए बोली, ‘जल्दी से इसे अपने पर्स के भीतर डाल ले. अपने पैसे से खरीद कर लाई हूं. गुलाबी रंग तुझ पर बहुत खिलता है. जरूर पहनना इसे.’

‘तेरे पास पैसा ही कितना बचता है. सारी तनख्वाह तो तू अपनी सासुमां को देती है. अगर साड़ी देने का इतना ही मन था तो आज तो तोहफे में तुझे ढेरों साडि़यां मिली हैं. उन्हीं में से कोई मुझे दे देती.’

‘वे सब साडि़यां, तोहफे तो सासुमां को मिले हैं.’

‘बेटा तेरा हुआ है. लोगों ने तोहफे तुझे दिए हैं?’

और आज, आज गृहप्रवेश का शुभ अवसर है. उसी बेटे ने बनवाया है शानदार मकान. मकान क्या है, शानदार शाही बंगला है. जाने कहांकहां से ढूंढ़ढूंढ़ कर लाया है एक से एक बेशकीमती साजोसामान. भीतर से बाहर, हर ओर जगमगाते टाइल्स वाले फर्श. दमकती दीवारें. सामने अहाते में रंगबिरंगे फूलों से महकता बगीचा. पोर्टिको में खड़ी नईनवेली चमचमाती कार. बाजू में 2 दमदार दुपहिया वाहन दोनों पतिपत्नी के. रोबदार अलसेशियन कुत्ता. वैभव ही वैभव.

और मुझे याद आ रहा है उस का वह छोटा सा घर. ससुराल का संयुक्त परिवार वाला घर छूटने के बाद पति की नौकरी में जब वह घर बसाने आईर् थी, तो उसे यही घर मिला था. 2 छोटेछोटे कमरे, एक किचन. छोटा सा बरामदा. उसी से लगा निहायत छोटा सा बाथरूमटौयलेट. बरतन मांजने की जगह नहीं. न ही कपड़े सुखाने की.

हम सभी सहेलियों के वे दिन बड़ी भागदौड़ वाले थे. अपनी गृहस्थी से किसी तरह समय निकाल कर दोचार बार गई थी मैं उस के घर. एकदम अकबका जाती थी. इतने बड़े घर की लड़की, कैसे रहती है इस दड़बे जैसे छोटे से फ्लैट में. मगर वह खुश नजर आती.

तड़के सुबह से रात गए फुरसत ही नहीं उसे तो. मुंहअंधरे ही अपने नित्यकर्म से निबट, नाश्ता तैयार करना, चाय बनाना, बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना. पति की तैयारी में मदद करना, रूमाल, पेन, डायरी रखना, सब के बैग में टिफिन रखना. सब से अंत में अपने पर्स में टिफिन बौक्स डाल मामूली सी साड़ी लपेट चप्पल फटकारती स्कूल भागना. शाम ढेर सारी कौपियों व सब्जीभाजी के थैलों से लदीफंदी जल्दीजल्दी घर लौटना.

पति, बच्चे सब उस का ही इंतजार करते बारबार दरवाजे पर आ रहे हैं. बाहर निकल कर ताक रहे हैं. उस की छाती खुशी से भर जाती. बच्चों को छाती से लगा झट से काम में जुट जाती. चायनाश्ता खाना. बीचबीच में बरतन साफ करना, पोंछा लगाते जाना. जिस पर सब की अलगअलग फरमाइशें. किसी को पकौड़े चाहिए, किसी को गुलगुले. सब की फरमाइशें पूरी करती सुख सागर में मगन.

ऐसे में कभी कोई सहेली, कोई रिश्तेदार, अतिथि आ जाए तो क्या पूछना. पति उस के भारी मजाकिया. छका डालते अपने मजाकों से सब को. नहले पर दहले भी पड़ते उन पर. वह देखदेख कर विभोर होती.

गृहस्थी का आनंददायक सुख. सुखों से भरे दिन बीतते गए. बच्चे बड़े होते गए. स्कूल, कालेज, नौकरीचाकरी, कामधंधे, शादीब्याह निबटते गए. नातीपोते भी आते गए.

व्यस्तताओं के इस दौर में हमारा संपर्क लंबे अरसे तक नहीं हो पाया. बरसों बाद उसे अपने ही शहर में, अपने ही दरवाजे पर देख कर मेरी तो चीख निकल गई. भरपूर गले मिल कर हम रो लिए. आंसू पोंछ कर मैं पूछने लगी, ‘कैसे आ गई तू अचानक यहां?’

‘मैं तो पिछले कई महीनों से यहां हूं. तेरा घर नहीं ढूंढ़ पा रही थी.’

‘मेरा घर नहीं ढूंढ़ पा रही थी? तेरा तो बचपन ही इन्हीं गलियों में बीता है. इसी सामने वाले घर में तो रहते थे तुम लोग.’

‘वह घर तो मेरे नानाजी का था न. शुरू में हम लोग नानाजी के घर में ही रहते थे. बाद में पिताजी भी नौकरी के साथ जगह बदलते रहे. नानाजी की मृत्यु के बाद यह घर बेच दिया गया. हमारा यहां आना भी छूट गया. एकदो बार तुम्हारे ही घर के शादीब्याह के कार्यक्रम में आए थे, तो तुम्हारे ही घर ठहरे थे.

‘अब तो पूरी गली बदल गई है. बिल्ंिडग ही बिल्ंिडग नजर आती हैं. पूरा शहर ही बदल गया है. मुझे तो अपनी गली ही पकड़ में नहीं आ रही थी. एक बुजुर्ग सज्जन से तेरे पिताजी का नाम ले कर पूछा तो वे बेचारे तेरे दरवाजे तक पहुंचा गए. यह भी बता गए कि यह घर तो एक अरसे से सूना पड़ा था, अब उन की लड़की आ कर रहने लगी है. अच्छा किया जो पति का साथ छूटने के बाद यहां आ गई. पिता के उजाड़ सूने घर में दिया जला दिया तूने तो. मगर यहां पुरानी यादें तो सताती होंगी.’

‘खूब. मगर तू बता रही थी कि तू पिछले कई महीने से यहां है. कहां ठहरी है?’

‘खैरागढ़ रोड पर. एक फ्लैट किराए पर लिया है. मेरा लड़का अब उसी तरफ मकान भी बनवा रहा है.’

‘मकान बनवा रहा है? इस शहर में, क्यों?’

‘बहू यहीं शिक्षाकर्मी हो गई है.’

‘और बेटा?’

‘बेटे का काम तो भागमभाग का है. बहू यहीं रहेगी. वह आताजाता रहेगा, यह सोच कर यहीं मकान बनवा रहा है.’

‘करता क्या है लड़का?’

‘कंप्यूटर से संबंधित कुछ काम करता है. मैं आजकल के कामधंधे ठीक से समझती नहीं. महीने में 25 दिन तो दौरे पर रहता है. कभी कोलकाता, कभी लखनऊ, कभी धनबाद. जाने कहांकहां. घर आता है तो इतना थका रहता है कि मुझ से तो दो बोल भी नहीं बतिया पाता. अब मकान बनाने में भिड़ गया है तो और दम मारने की फुरसत नहीं.’

फिर वह मेरे घर अकसर ही आने लगी. हम बातें करते रहते. बचपन की, कालेज के दिनों की, अपनीअपनी गृहस्थी की. उस के पति अवकाशप्राप्ति के बाद ही सिधार गए थे. बताने लगी, ‘कह गए थे कि उन के भविष्य निधि वगैरह का पैसा दोनों बेटियों में बांट दिया जाए. मगर लड़के ने उन पैसों से मकान के लिए प्लौट खरीद लिया. कह दिया, बहनों को बाद में कमा कर दे देगा सारा पैसा. युद्ध स्तर पर चल रहा है मकान का काम. सारा पैसा उसी में झोंक रहा है. मुझ से स्पष्ट कह दिया, घर का खर्च तो अभी तुम्हें ही चलाना है, मां. वह नहीं कहता तो भी तो मैं करती ही थी अपनी खुशी से. महीनेभर का राशन, शाकसब्जियां, बच्चों की फरमाइशें, अभी तो पूरी पैंशन इसी सब में जा रही है.’

‘और बहू का पैसा?’

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‘बाप रे, मैं उन पैसों के बारे में मुंह से नहीं बोल सकती. जाने क्या सोच कर बेटे ने जमीन का प्लौट भी उसी के नाम लिया है. सोचा होगा कुछ.’

और मैं गृहप्रवेश पर उस के घर गई तो दंग रह गई. यह तो राजामहाराजाओं का शाही बंगला लगता है. आखिर इतना पैसा इस के पास आया कहां से.

मगर वह गदगद थी, बोली, ‘‘बच्चा मेरा जिंदगीभर छोटे से दड़बे में रहा है न. सो, अपने सपनों का महल बनाया है. मेरे लिए इस से बड़ी खुशी की बात और क्या हो सकती है. आज मेरा बहुत मन हो रहा है कि तुझे तेरी पसंद की साड़ी पहनाऊं.’’

मैं ने फिर वही बात कही कि तेरा इतना ही मन है तो जो इतनी साडि़यां तोहफे में आई हैं, मैं उन्हीं में से एक पसंद कर लेती हूं.

‘‘वे सब तो बहू को तोहफे  में मिली हैं. घर बहू का है. मैं तुझे अपनी तरफ से देना चाहती हूं. अपने पैसों से.’’

अगली शाम वह मुझे जिद कर दुकान ले गई. उस का मन रखने के लिए मैं ने एक साड़ी पसंद कर ली. अब वह कहने लगी कि, ‘‘किसी को बताना मत.’’

उस की इस बात से मेरा मन खराब हो गया. इधर जब से वह वहां आई थी, उस की स्थिति देख कर मेरा मन खराब ही हो जाता था. उस का घर मेरे घर से काफी दूर था. उस तरफ रिकशा या कोई सवारी मिलती ही न थी. घर में 2 दुपहिया वाहन और एक नईनवेली कार थी. मगर वह मेरे घर पैदल ही आती. पोते, पोती और बहू के स्कूल से लौटने के बाद. उस की ओपन हार्ट सर्जरी हो चुकी थी. बुढ़ापे पर पहुंचा जर्जर शरीर. मेरे घर पहुंचते ही पस्त पड़ जाती. मेरे घर में बैठेबैठे घंटों हो जाते, न कोई उसे लेने आता, न खोजखबर लेता. बेटा घर में हो, तब भी नहीं. उलटे, मां को व्यंग्य करता, ‘तुम ही दौड़दौड़ कर सहेली के घर जाती हो. तुम्हारी सहेली तो कभी दर्शन ही नहीं देती.’

मुझे सच में उन के घर जाना सुखद न लगता. मेरे जाते ही पोतेपोती अपना वीडियो गेम छोड़ कर आ कर जम जाते दादी के कमरे में. कान लगाए सुनते रहते हमारी बातें. बच्चों की आंखों में कहीं बालसुलभ मासूमभाव नहीं. अजीब उपेक्षा और हिकारतभरा भाव होता. दादी के कंधे पर चढ़ रहे हैं… ‘दादी, चलो, हम को होमवर्क कराओ.’ दादी की हिम्मत नहीं कि झिड़क सकें, ‘जाओ, बाहर खेलो,’ उन के शातिरपने का किस्सा भी सुन चुकी हूं मैं.

कुछ दिनों पहले सहेली की छोटी बेटी की लड़की हुई थी. मैं घर आई तो बोली, ‘‘बच्ची की छठी में जाना है. छोटी सी सोने की चेन देने का मन है. किसी अच्छे ज्वैलर की दुकान से दिलवा दे.’’ मैं उसे अपने परिचित ज्वैलर की दुकान में ले गई. उस ने एक चेन पसंद की. मगर जैसा लौकेट वह चाहती थी, वैसा दुकान में था नहीं. दुकानदार ने कहा, ‘‘4 दिनों में वह वैसा लौकेट बनवा देगा.’’

4 दिनों बाद वह दुकान में गई, अकेले ही. लौकेट लिया. घर लौटी. बेटाबहू, बच्चे सामने अहाते में ही कुरसियां डाले बैठे थे. बेटा बोला, ‘कहां गई थी मां?’

उस ने मेरा नाम बता दिया.

10 वर्षीय पोता आंखें तरेर कर बोला, ‘‘इतना झूठ क्यों बोलती हो, दादी. तुम तो ज्वैलर की दुकान से लौकेट ले कर आ रही हो.’’

सहेली का चेहरा फक पड़ गया, ‘‘कैसे कह रहा है तू यह?’’

‘‘मैं गया था न तुम्हारे पीछेपीछे. जब तुम लौकेट पसंद कर रही थीं, मैं तुम्हारे ही तो पीछे बैठा था सोफे पर.’’

सारा किस्सा सुन कर मैं अवाक रह गई, ‘‘उस लड़के को यह कैसे पता चला कि तू ज्वैलर की दुकान जा रही है?’’

‘‘मैं मोबाइल पर ज्वैलर से पूछ रही थी, क्या लौकेट बन कर आ गया? लड़के ने सुन लिया होगा. उस ने मां को बताया होगा. और मां ने बेटे को मेरे पीछे लगा दिया होगा.’’

यह मोबाइल का किस्सा भी अजीब है. वह अपने जमाने की अच्छी पढ़ीलिखी अध्यापिका, मगर अब जैसे एकदम पिछड़ी हुई, मूर्खगंवार. मोबाइल में फोन करना तक नहीं आता था उसे. जब मैं उस से कहूं, ‘तू इतनी दूर से मेरे घर आती है पैदल, तो मुझे फोन कर दिया कर, ताकि मैं घर पर ही रहूं.’ तो बोली, ‘मुझे तो फोन करना ही नहीं आता. बड़ी बेटी अपना पुराना मोबाइल छोड़ गईर् है. जिस से मैं किसी का फोन आए तो बात कर लेती हूं, बस.’

फोन करना उसे किसी ने नहीं सिखाया, न बेटे ने, न बेटी ने. न उन नातीपोतों ने जिन की मोबाइल पर महारत देखदेख कर वह चमत्कृत होती रहती है.

मैं ने उसे फोन करना, रिचार्ज करना सब सिखा दिया. वह गदगद होने लगी, ‘‘तू ने मुझ पर बड़ी कृपा की. अब मैं खुद भी अपनी बेटियों से बात कर सकती हूं.’’

अब वह जब भी फोन करे, पोतापोती कहीं भी हों, आ कर डट जाते.

उस के पोतापोती के सामने तो बात करना भी मुश्किल. सो, मैं ऐसे समय उस के घर जाती, जब बच्चेबहू सब स्कूल में हों. शहर से दूर उस एकांत शाही बंगले में वह अकेली और उन का भयानक कुत्ता. फाटक पर मुझे देखते ही उन का भयानक कुत्ता भूंकना शुरू कर देता. वह पगली सी फाटक पर आती और मुझे अंक में भर कर भीतर ले जाती.

मैं कहती, शांति से बैठ कर गपशप कर, मगर वह पगलाई सी जल्दीजल्दी नाश्ता बनाने लगती, हलवा, पकौड़े, चीले, जो सूझता वही. फिर बारबार कहने लगती…खा न रे, गरमगरम. देख, मैं नाश्ता भूली तो नहीं हूं.

चायनाश्ता खत्म होते ही फौरन सारे बरतन मांजधो कर चिकन में पूर्ववत सजा कर अपार संतुष्टि से बैठ जाती. मेरा मन और खराब होने लगता. याद आ जाता. ठीक ऐसा ही वह तब भी करती थी जब अपनी सासुमां के साथ रहती थी. हम उस से मिलने गए और अगर सासुमां घर में न हों तो उस की चपलता देखते ही बनती थी. फटाफट नाश्ता तैयार कर लेती. जल्दीजल्दी खाने के लिए चिरौरी करने लगती. खाना खत्म होते ही बरतन मांजधो कर सजा कर रख देती.

तब सासुमां का आतंक था. अब बहू का. तब ननददेवर की जासूसी अब पोतेपोती की. आतंक से भीतर ही भीतर आक्रांत. मगर उन्हीं लोगों की सेवा में तत्पर, मगन.

अजब समानता दिखती मुझे 35 साल पहले देखी उस सास में और अब शानदार पोशाक में सजी, काला चश्मा लगाए खुले केश उड़ाती धड़ल्ले से बाइक दौड़ाती इस आधुनिक बहू में. सास का चेहरा हमेशा चढ़ा ही दिखता, यह हमेशा मिमियाती ही दिखती. अब बहू का चेहरा हमेशा चढ़ा ही दिखता है. यह मिमियाती ही दिखती है.

सबकुछ जानतेसमझते हुए भी इधर शायद मुझ से ही कुछ बेवकूफी हो गई. हुआ यह कि मेरे घर अचानक हमारी कुछ पुरानी सहेलियां आ गईं. मैं ने उसे फोन किया कि तू मिलने आ सकती है क्या. वह एकदम तड़प गई, ‘घर में कोई है नहीं. बहू और बच्चे स्कूल में, बेटा दौरे पर. घर सूना छोड़ कर कैसे आऊं?’

मैं सहेलियों को ले कर उस के घर ही पहुंच गई. हमें देखते ही वह मारे खुशी के बेहाल. खूब गले मिलना, रोनाधोना हुआ. सब को अपने कमरे में बैठा वह दौड़ी किचन की ओर. सहेलियां चिल्लाईं, ‘बैठ न रे. बोलबतिया. नाश्ता बनाने में समय बरबाद मत कर. कितनी मुश्किल से तो हम लोग आ पाए हैं. वह बैठ गई. ढाई बजतेबजते बच्चे आ गए. वह बच्चों को खाना देने के लिए किचन को दौड़ी. हम आपस में बतियाने लगे.

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काफी देर हो गई. हार कर मैं किचन में गई. देखा, उस ने बच्चों के लिए ताजा भात बनाया था और अब रोटियां सेंक रही थी. नवाब बच्चे डब्बे में रखी सुबह की रोटी नहीं खा सकते थे. सहेलियों को देख कर और चिढ़ गए, ‘‘दादी, ये कैसी रोटियां दे रही हो. फूलीफूली दो.’’ मेरे मुंह से निकल गया, ‘‘ताजी रोटियां हैं, चुपचाप खाओ.’’ उस ने फौरन मेरे मुंह पर हाथ रख दिया ओर बच्चों को पुचकारने लगी, ‘‘लो, आज दादी को माफ कर दो. कर दोगे न?’’

बच्चों को खिला कर जैसे ही उस ने चाय का पानी चूल्हे पर चढ़ाया, मैं ने मना कर दिया, ‘‘सहेलियां जल्दी मचा रही हैं, अब चाय बनाने में समय बरबाद मत कर.’’ मन मार कर वह सहेलियों के बीच आ कर बैठ गई. बातचीत में अब वह रस नहीं आ रहा था. मन ही मन सब को कुछ कचोट रहा था. सहेलियों को उस की स्थिति और उसे सहेलियों का ठीक से स्वागत न कर पाने की विवशता. तिस पर दोनों शातिर जासूस हमारे ही बीच आ कर खड़े हो गए, ‘‘दादी, मेरा रैकेट कहां है? मेरा कलरबौक्स कहां है?’’

तभी बहू भी आ गई. तीखी नजरों से सास के कमरे को देखती बाथरूम की ओर चली गई. वहां से लौटी तो उस के ट्यूशन वाले लड़के आ गए. ट्यूशन पढ़ाना यानी पैसे बनाना. सो, लड़कों को देखते ही वह सामने बैठक में ही पढ़ाने बैठ गई.

सहेली की स्थिति अतिथियों के बीच अत्यंत दयनीय. आती हूं, कह कर गई और शायद बहू से चिरौरी की कि मेरी कुछ सहेलियां आ गई हैं, कुछ चायनाश्ता बना दो. बहू तमतमाई हुई किचन की ओर जाती दिखी. काफी देर हो गई. मगर न चाय आई, न नाश्ता. वह इतनी देर से सहेलियों को चायनाश्ते के लिए रोके हुए थी.

हार कर वह किचन की ओर गई. उस के पीछे मैं भी. बहू ने एक भारीभरकम भगोने में कनस्तर का सारा बेसन उड़ेल कर घोल बना लिया था और तेवर में तनी धड़ाधड़ पकौड़े छाने जा रही थी. बड़ी सी परात में पकौड़ों का पहाड़ लगा हुआ था.

दुख और क्षोभ में भरी सहेली कुछ पल खामोश खड़ी देखती रही. आंखों में पानी उतर आया. आंखें पोंछ कर प्लेटों में पकौड़े डाले. चटनी निकाली. ले जा कर सहेलियों को परोसा और हाथ जोड़ कर आग्रह किया, ‘‘यही स्वागत कर पा रही हूं तुम लोगों का.’’ फिर किचन में जा कर हाथ जोड़ कर प्रार्थना की, ‘‘कृपा कर के अब बनाना बंद करो. माफी चाहती हूं मैं ने तुम्हें डिस्टर्ब किया.’’

सहेलियां तो दुखी मन से उस की चर्चा करते शाम की ट्रेन से चली गईं अपनेअपने शहर, पर मैं परेशान ही रही. अगली शाम को वह खुद आ गई मेरे घर. वैसे ही जर्जर शरीर ढोते, हांफतेहांफते. बोली, ‘बच्चे स्कूल से आ गए, बहू भी. तब आ पाई हूं. चाय पिला.’

मैं ने जल्दी से चाय बनाई. नाश्ता बनाने के लिए चूल्हे पर कढ़ाई चढ़ाई कि वह बोली, ‘‘बनाना छोड़, घर में कुछ हो तो वही दे दे.’’

मुझे संकोच हो आया, ‘‘सवेरे मेथी के परांठे बनाए थे. जल्दी काम निबटाने के चक्कर में आखिरी लोइयों को मसल कर 2 मोटेमोटे परांठे बना लिए थे. वही हैं. तू दो मिनट रुक न. मैं बढि़या सा कुछ बनाती हूं.’’

एकदम अधीर सी वह कहने लगी, ‘‘मुझे मेथी के मोटे परांठे ही अच्छे लगते हैं. तू दे तो सही.’’

उस की बेताबी देख मैं ने वही मोटेमोटे परांठे परोस दिए. चटनी थी. वह धड़ल्ले से खाने लगी. खा कर चाय पीने लगी तो मैं ने पूछा, ‘‘तू भूखी थी क्या?’’

उस की आंख में पानी उतर आया, बोली, ‘‘हां.’’

‘‘हो क्या गया?’’

उस का गला भर आया. कुछ रुक कर बोली, ‘‘कांड ही हो गया था. मेरे हाथ जोड़ कर माफी मांगने के बाद बहू अपने कमरे में जा कर मुंह लपेट कर औधेमुंह पलंग पर पड़ गई. मैं ने जा कर चौका समेटा. बचे हुए ढेर सारे घोल में से कुछ फ्रिज में रखा. बाकी कामवाली को दे दिया. पकौड़ों में से भी कुछ रखा, बाकी कामवाली को दिया. रात का खाना बना कर बच्चों को खिलाया.

‘‘उसे खाने के लिए बुलाया तो भड़क गई, ‘मुझे चैन से जीने देना है कि नहीं. नम्रता का आवरण ओढ़े मुझे टौर्चर करती रहती है धूर्त बुढि़या.’ मैं भी पगला गई, ‘तुम चाहती हो कि मैं मर जाऊं. मौत आएगी तभी न मरूंगी.’

‘‘अपनी दयनीय विवशता पर मैं रोती जाऊं और लड़ती जाऊं. वह भी रोती जाए और लड़ती जाए. उस का मुख्य आरोप था कि मैं पाखंडी हूं. अपने को श्रेष्ठ समझती हूं और उसे हमेशा नीचा दिखाने के चक्कर में रहती हूं. दुख से मेरा कलेजा फटा जा रहा था. मैं भी अपने कमरे में जा कर बिस्तर में रोती पड़ी रही. रातभर नींद नहीं आई. मुझ से कहां गलती होती है, यही समझ में नहीं आया.

‘‘आधी रात के करीब बेटा आया. सीधे अपने कमरे में गया. मैं सहमीसटकी आहट लेती रही, क्या खाना परोसने जाऊं. मगर कुछ देर बाद बेटा खुद कमरे में आ गया, बोला, ‘मां, तुम लोग मुझे जीने दोगी कि नहीं. मैं तुम से कितनी बार कह चुका हूं कि उस में सहनशक्ति नहीं है. उसे डिस्टर्ब मत किया करो. वह भूखीप्यासी स्कूल से आई कि लड़के चले आए. किसी तरह लड़कों को पढ़ा रही थी कि तुम ने अपनी सहेलियों के लिए नाश्ता बनाने का फरमान सुना दिया. मां, आखिर तुम चाहती क्या हो? तुम हम को छोड़ कर तो रह नहीं सकतीं, तुम खुद जानती हो. तुम समय से पिछड़ चुकी हो. तुम्हें तो एटीएम से पैसा निकालना तक नहीं आता.’

‘‘तुझे एटीएम से पैसा निकालना नहीं आता सुमेधा?’’ मैं हैरान हो गई.

‘‘मैं कभी गई ही नहीं. तेरे जीजाजी के बाद से बैंक वगैरह के सारे कागजात बेटे के पास ही रहते हैं. मुझ से सिर्फ दस्तखत लेता रहा है. एटीएम से पैसा निकाल कर वही देता रहा है. वह न हो, तो बहू ला देती है.’’

‘‘तुझे पता है वे कितना निकालते हैं, तुझे कितनी पैंशन मिलती है?’’

‘‘वे मेरे हाथ में वही रकम थमा देते हैं, जो मुझे शुरू में मिलती थी.’’

मैं सिर पकड़ कर बैठ गई, बोली, ‘‘वह सब मैं तुझे सिखा दूं. मगर यह बता, क्या तू इन को छोड़ कर कहीं अलग सच में नहीं रह सकती?’’

‘‘फायदा क्या है. यहां मैं बेटे की सूरत तो देख सकती हूं. पोतेपोती से बोलबतिया तो लेती हूं. मैं जानती हूं, ये लोग मुझे मूर्ख, गंवार और अवांछित प्राणी समझ कर अपमानित करते रहते हैं. कुत्ता भी इन का अपना है, दुलारा है. मगर मैं नहीं. मैं क्या करूं. मुझ में इन के लिए ही प्रेम उमड़ता है. फिर बीचबीच में बेटियां आ जाती हैं. दामाद और बच्चे भी. मेरी छाती भर आती है. बेहद सुख लगता है. कभी देवरजेठभतीजेभतीजी वगैरह भी आ जाते हैं.

‘‘बहू अपने मायके वालों के अतिरिक्त किसी का आना पसंद नहीं करती. कई बार अपने कमरे से बाहर भी नहीं निकलती. मगर ये लोग बहुत समझदार हैं. उस के कमरे में जा कर खुद बोलबतिया लेते हैं. बेटियां तो अकसर भाभी के लिए तोहफे ले कर आती हैं. भरेपूरे मायके में आने से उन का भी तो ससुराल में मान बढ़ता है. इन्हीं सब से इस परिवार की प्रतिष्ठा बनी हुई है.

‘‘बहू को तो परिवार की प्रतिष्ठा की समझ नहीं है. शायद आजकल की अधिकतर युवतियों को ही नहीं है. अपना पति, अपने बच्चे, अपनी शानशौकत से भरी जिंदगी, अपना अधिकार, अपनी सत्ता. इन सब के लिए चाहिए पैसा. बटोर सको तो बटोरो. इसी में चौंधियाई हुई हैं. प्रतिष्ठा की फिक्र तो हम जैसों को होती है. सच तो यह है, मुझे जितना प्रेम अपने बेटेबेटी, नातीपोते से है, उतना ही परिवार की प्रतिष्ठा से है. बल्कि कुछ ज्यादा ही. अपने जीतेजी तो मैं इस प्रतिष्ठा को बचाए ही रखूंगी.’’

उस की आंखों में पानी छलछला आया था, ‘‘जाने मेरी मौत के बाद इस परिवार की प्रतिष्ठा का क्या होगा?’’

परिवार की प्रतिष्ठा. अच्छे से जानती हूं कि यह तो उस की घुट्टी में रही है. याद आया, कालेज के दूसरे साल में थी कि वह पड़ोस के एक लड़के से प्रेम कर बैठी थी. लड़का एमए का छात्र था. यह कुछकुछ पूछने उस के पास जाती थी. भीतर ही भीतर प्रेम का सागर हिलोरें ले रहा था. मगर बातें हो पातीं सिर्फ पढ़ाई की. मुझ से कहने लगी, ‘तू उस से पूछ न, क्या वह मुझे चाहता है.’

लड़का पहले ही मुझे अपने जज्बात बता चुका था, मैं बोली, ‘अगर वह ‘हां’ में जवाब दे तो क्या तू उस से शादी कर सकेगी?’ वह एकदम खामोश हो गई. फिर बोली, ‘मैं ऐसा नहीं कर सकती. वह दूसरी बिरादरी का है. बाबूजी को बहुत दुख होगा. समाज में हमारे परिवार की बदनामी होगी.’ उस की आंखें छलछलाने लगी थीं, आगे बोली, ‘मैं इस दारुण दुख को चुपचाप पी लूंगी, मगर परिवार की प्रतिष्ठा कलंकित नहीं कर सकती.’

और आज…?

आज भी उस की आंखों में पानी छलछला आया था, ‘‘जाने मेरी मौत के बाद इस परिवार की प्रतिष्ठा का क्या होगा?’’

भीगे नेत्रों से देखती रह गई मैं. परिवार की प्रतिष्ठा का भारी बोझ उठाए उस जर्जर अंतिम स्तंभ को. घर में दुपहिया वाहन और एक नईनवेली कार थी. मगर वह मेरे घर पैदल ही आती, पोते, पोती और बहू के स्कूल से लौटने के बाद. उस की ओपन हार्ट सर्जरी हो चुकी थी. बुढ़ापे पर पहुंचा जर्जर शरीर. मेरे घर पहुंचते ही पस्त पड़ जाती.

यह भी खूब रही. मेरे बेटे का मित्र आशीष, दिल्ली के इंदिरागांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर यूरोप के एक देश की एयरलाइंस कार्यालय में नौकरी करता है. यह एयरलाइंस अपने कर्मचारियों को अपने देश में घूमने के लिए डिस्काउंट टिकट और होटल में ठहरने की सुविधा भी देती है.

इसी सुविधा के अंतर्गत जब वह पहली बार यूरोप में उन के देश घूमने गया तो होटल के कमरे में अपना समान रख कर बालकनी की तरफ लगे शीशे के दरवाजे के हैंडल को नीचे की ओर शीघ्रता से घुमा कर खोलने लगा तो ऊपर की ओर से पूरा का पूरा दरवाजा दोनों ओर से खुल गया और उस के ऊपर गिरने लगा. उस ने दरवाजे को कई बार टिकाना चाहा लेकिन जैसे ही वह उसे छोड़ने का प्रयास करता वह तेजी से उस के ऊपर गिरने लगता.

अपने दोनों हाथों से उस ने दरवाजों को संभाल रखा था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे, तभी किसी ने मुख्य दरवाजे की घंटी बजाई. आशीष ने जोर से चिल्लाते हुए उसे अंदर आने को कहा. जैसे ही दरवाजा खुला तो होटल का वह कर्मचारी भीतर का दृश्य देख कर चौंक गया. वह कर्मचारी उस के पास आया और उस ने आशीष का हाथ पकड़ कर उसे वहां से हटाया और उसे दरवाजे की तकनीक समझाई.

नया व्यक्ति, जो इस तकनीक को नहीं जानता है, वह आम दरवाजे जैसे ही हैंडल नीचे की ओर कर, दरवाजे को खोलने की कोशिश करता है, तो उसे पूरा का पूरा दरवाजा खुल कर नीचे गिरने जैसा लगता है. आज भी यूरोप घूमने जाने पर ऐसे दरवाजेखिड़कियां खोलते ही यह वाकेआ ताजा हो जाता है और सब आशीष का नाम ले कर खूब ठहाके लगाते हैं.

मेरे एक बहुत ही घनिष्ठ मित्र हड्डी रोग विशेषज्ञ हैं. उन का क्लिनिक घर के पास ही है. उन की नईनई शादी हुई थी. कुछ दिनों बाद उन की पत्नी की मौसी उन के यहां आईं. जब भी वे मरीजों के प्लास्टर चढ़ाते तो घर पास में होने के कारण घर आ जाते और स्नान वगैरह करते. जब वे घर आते तो उन के कपड़े चूने से सने होते थे. उन्हें ऐसी हालत में मौसी रोज देखतीं.

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लौट कर मौसी अपनी बहन के घर जा कर बोलीं, ‘‘तुम तो कहती हो कि लड़का डाक्टर है, पर मुझे तो लगता है वह सफेदी करने वाला है. घर में जब भी आता है, सारे कपड़े चूने से सने रहते हैं.’’

आज भी डाक्टर साहब इस बात को याद कर के हंस पड़ते हैं.

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