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सेक्स संबंधी किसी भी बात पर लोग खुलकर बात नहीं करते: सोनाक्षी सिन्हा 

कौस्टयूम डिजाइनर से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली सोनाक्षी सिन्हा ने फिल्म ‘दबंग’ से अपने अभिनय की शुरुआत की, जिसमें उनके को स्टार सलमान खान थे. फिल्म सफल रही और सोनाक्षी सबकी नजरों में आ गयी. इसके बाद उन्होंने कई फिल्में की, जिसमें कुछ सफल तो कुछ असफल रही. फिल्मों में आने के लिए उन्होंने अपना वजन काफी घटाया, जिसके लिए सलमान ने ही उसे सलाह दी थी. सलमान खान को वे अपना मेंटर मानती हैं.

अभिनय के साथ-साथ सोनाक्षी फैशन और सिंगिंग को भी कायम रखी हैं. आगे वह इस बारे में और अधिक सोचेंगी. अलग कहानियां उन्हें हमेशा से प्रेरित करती है. यही वजह है कि उन्होंने सेक्स और गुप्त रोग पर आधारित फिल्म ‘खानदानी शफाखाना’ में बेबी बेदी की भूमिका निभाई है. पेश है उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश.

प्र. इस फिल्म को करने की खास वजह क्या है? कितना जरूरी है ऐसी फिल्मों का बनना ?

पहले मैं इसे करने को राजी नहीं हुई थी, क्योंकि इसे कैसे पर्दे पर दिखाया जायेगा, उस पर चिंतित थी, लेकिन इसकी कौंसेप्ट मुझे बहुत अच्छी लगी थी. ये एक बेहतर जरिया है जिससे हम एक टैबू को लोगों के सामने मजेदार रूप में दिखा सकते हैं. असल में हमारे समाज और परिवार में सेक्स संबंधी किसी भी बात पर लोग खुलकर बात नहीं करते. माता-पिता भी इस बारें में बात करने से झिझकते हैं. ये जीवन का फैक्ट है, जिसकी वजह से ये दुनिया बनी है. उसके बारें में हम खुलकर बात क्यों नहीं करते? हर बीमारी के बारें में लोग डौक्टर के पास जाते है, लेकिन सेक्स संबंधी बीमारी को लोग क्यों छुपाते हैं? बीमारी तो बीमारी है, इसी को ह्यूमर के साथ बताने की कोशिश की गई है. जिससे लोग देखें और इस बारे में सोचने पर विवश हो. बाकी विषयों की तरह इसे भी स्कूल लेवल से ही शुरू कर देना चाहिए, ताकि बच्चे को सही जानकारी इस विषय पर हो.

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प्र. आपको सेक्स एजुकेशन कब और कैसे मिला?

मुझे भी इस बारें में काफी देर में पता लगा. इस बारें में मेरे माता-पिता ने कभी बात नहीं की, क्योंकि मैं भी वैसे ही पली बढ़ी हुई हूं. मुझे दोस्तों से और बड़े होने पर पता चला.

प्र. इस फिल्म में निर्देशक के सोच को आप कैसे देखती हैं?

ये बहुत अच्छी बात है कि इस फिल्म को डायरेक्ट करने वाली एक महिला शिल्पी दासगुप्ता है, जिन्होंने बहुत ही मजेदार तरीके से इस बात को कहने की कोशिश की है. मुझे भी इसमें काम करने का मौका मिला. ऐसी फिल्म को निर्देश करना आसान नहीं था. इस बारें में उन्होंने सबको सेट पर काम करने की सहजता दी. कभी कोई गलत अनुभव नहीं हुआ.

प्र. आपने कई कौमेडी फिल्में की है, इसे करने में कितना मजा आता है?

कौमेडी करने और देखने में बहुत अच्छा लगता है. किसी को हंसाना आसान नहीं होता. इसमें टाइमिंग का खास ध्यान रखना पड़ता है. इस फिल्म में सारे साथी कलाकार ने बहुत सहयोग दिया है.

प्र. कौमेडी की रिपीट वैल्यू बहुत अधिक होती है, आप इस पर कितना विश्वास करती है?

ये सही बात है, क्योंकि आज के लोग काफी तनाव ग्रस्त होते हैं, ऐसे में कौमेडी उन्हें थोड़ी हंसी और राहत प्रदान करती है.

प्र. किसी फिल्म को चुनते समय किस बात का ध्यान रखती हैं?

मैं हमेशा ऐसी फिल्म करना चाहती हूं, जिसे मैं अपने परिवार के साथ देख पाऊं. इसके अलावा हर फिल्म की एक औडियेन्स होती है. थोड़ा-बहुत हर फिल्म चलती है. मेरे लिए किसी भी चरित्र को करने में मेरा पूरा सहयोग उसके साथ होगी या नहीं, इसे अवश्य परखती हूं.

प्र.फिल्म में आपने एक विरासत को आगे बढ़ाई है, कितना जरुरी होता है, विरासत को आगे ले जाना?

ये हर व्यक्ति की रुचि पर निर्भर करता है कि वे विरासत को आगे ले जाएं या नहीं. विरासत को आगे ले जाने से हमेशा अच्छा ही रहता है. रूचि न होने पर उसे न करें ,क्योंकि रुचि न होने पर आप उसे अच्छा नहीं कर सकते.

प्र. साइबर क्राइम आजकल बहुत होता है, ऐसे में सेक्स एजुकेशन इसे कितना कम कर सकती है?

जागरूकता बढ़ती है, तो जानकारी होती है और अपराध कम होते है, क्योंकि जिज्ञासा ही व्यक्ति को क्राइम की तरफ ले जाती है.

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प्र. फिल्म ‘दबंग’ से यहां तक आपने कितना ग्रो किया है?

मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं एक्टिंग करूंगी, जो भी सीखा है, मैंने सेट पर ही सीखा है. पहली फिल्म से अब तक सीख ही रही हूं. पहली फिल्म से अभी तक मैं अपने आप को पूरी तरह से बदली हुई पाती हूं. यह एक अच्छी जर्नी है और मुझे कोई रिग्रेट नहीं.

प्र. इंडस्ट्री में संघर्ष हमेशा रहता है, इस बात पर आप कितना यकीन रखती है?

ये बहुत सही है, कुछ लोग पहली फिल्म से सफल नहीं होते और अगर कोई होता भी है, तो उसे कामयाब रखने के लिए संघर्ष करना पड़ता है. ये हर क्षेत्र में होता है. हर किसी को अपनी जगह बनाये रखने के लिए कड़ी मेहनत,लगन और धीरज रखनी पड़ती है.

विश्वव्यापी समस्या: हेलमेट चोरी

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज में रहने वाली रीता के घर के सामने स्कूटी से एक युवक ने हेलमेट चोरी करते देखा गया. सोशल मीडिया पर इसका वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया. चोरी करने वाले ने खुद हेलमेट लगा रखा था. उसकी गाड़ी में भी तीन चार हेलमेट लगे थे. चोर को देख कर लगता है कि वह हेलमेट चोरी करता है. यह पहला मामला है जिसमें पुलिस ने हेलमेट चोरी में दर्ज किया है. मोटर साइकिल, स्कूटर, साइकिल चोरी के साथ ही साथ अब हेलमेट की चोरी भी बड़ी संख्या में होने लगी है. केवल नये ही नहीं पुराने हेलमेट भी चोरी हो सकते है. जो शायद बाजार में 50 रूपये का ही बिकता होगा.

लखनऊ पुलिस का कहना है कि हेलमेट चोरी की शिकायतें अक्सर आती रहती है. केवल रात में ही नहीं  बल्कि अगर हेलमेट लौक न हो तो पार्किग से भी हेलमेट चोरी हो जाता है. लखनऊ के ही रहने वाले रमेश बताते है कि वे अपनी मोटर साइकिल को चारबाग रेलवे स्टेशन की पार्किग में बाइक खड़ी कर दी. 4 घंटे के बाद जब वे वापस आएं तो गाड़ी से हेलमेट गायब था.

पार्किग के नियम कानून में यह लिखा होता है कि गाड़ी के साथ लगे हेलमेट की जिम्मेदारी पार्किंग की नहीं होगी. ऐसे में कई पार्किग में सुविधा भी होती है कि गाड़ी के लिये अलग और हेलमेट के लिये अलग चार्ज देना पड़ता है. किसी भी शहर को देख लीजिये वहां हर दोपहिया गाड़ी में हेलमेट का लौक लगा होता है.

केवल अपने देश में ही नहीं विदेशो में भी इस तरह वियाना जैसे देश में भी लोग अपनी साइकिल को 3-3 चेनों से खंभे में बांध देते है. साइकिल के साथ हेलमेट को भी चेन से बांधा जाता है. इससे साफ है कि छोटी छोटी चीजों की चोरी की परेशानी पूरी दुनिया में है. अपने देश में यह परेशानी कुछ ज्यादा ही है. इन चीजों को चोरी बचाने के लिये भी अलग अलग तरह की व्यवस्था होने लगी है. विदेशों में साइकिल चलाने वाले को भी हेलमेट लगाना होता है. ऐसे में हेलमेट को चोरी से बचाने के लिये उसे भी चेन से बांधना पडता है.

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स्कूटी जैसी गाडियों में तो कंपनी सीट के नीचे हेलमेट रखने की जगह कंपनी ही बनाकर देने लगी है. पहले स्कूटर में ऐसी व्यवस्था नहीं होती थी. उस समय हेलमेट स्कूटर में बांधना पड़ता था. मोटर बाइक में हेलमेट बांधने की व्यवस्था के लिये चेन और लौक दोनो तरीके होते है. नये हेलमेट की कीमत 5 सौ रूपये से लेकर 1200-1400 सौ रूपये तक होती है चेन और हेलमेट स्टैंड 100 रुपये से लेकर 200 रूपये तक मिलता है.

चोरी का हेलमेट बाजार में 200 से 400 रूपये में बिकता है. ऐसे में चोरी के हेलमेट से बहुत लाभ चोरी करने वाले को नहीं होता है. इसके बाद भी हेलमेट जैसी छोटीछोटी चीजों की चोरी होती रहती है. चोरी के डर से कुछ लोग हेलमेट नहीं लगाते. पार्किग में हेलमेट को सुरक्षित रखने की जगहें नहीं है. कई पार्किग में हेलमेट जमा करने के लिये अलग से पैसा देना पड़ता है. हेलमेट जमा ना करके पैसे बचाने में हेलमेट चोरी हो जाता है.

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लखनऊ से कानपुर रोज नौकरी करने जाने वाले सुरेश कुमार कहते है कि ‘मैं हेलमेट लगाकर इसलिये नहीं जाता क्योकि स्टेशन की पार्किंग में जहां हम बाइक खड़ी करते है वहां बाइक एक दूसरे से इतना सटाकर खड़ी की जाती है कि बाइक के बगल में हेलमेट बांधने से उसका शीशा टूट जाता है. अगर हेलमेट भी स्टैंड पर जमा करो तो उसके लिये अलग से पैसा देना पड़ता है. ऐसे में हेलमेट नहीं लगाता तो कई बार पुलिस का चालान भी हो जाता है.’

धार्मिक मान्यताएं भी छोटी छोटी चोरियों को रोकने में सफल नहीं हो पा रही है. धार्मिक स्थलों में भी इस तरह की चोरी होती है. इससे साफ है कि जो लोग धार्मिक स्थलों पर 501 रूपये का प्रसाद चढ़ाते हैं. 5 हजार तीर्थ यात्रा पर खर्च करते है वें भी 50 रूपये का पुराना हेलमेट चोरी कर सकते हैं.

एडवेंचर ट्रिप: कम खर्च में घूमे ऋषिकेश

अक्सर लोग  गरमी के मौसम  में  ऐसी जगह जाना चाहते हैं जहां का मौसम भी ठीक हो और ज्यादा खर्च भी न होने पाए. तो आइए, ले चलते हैं आपको कुछ ऐसी ही जगहों की सैर पर, जहां मजा तो बहुत है पर खर्च कम. यानी इन जगहों पर आप कम खर्च में भी रोमांचक पर्यटन का आनंद उठा सकते हैं.

अगर आप एडवेंचर के शौकीन हैं और एडवेंचर ट्रिप का प्लान बना रहे हैं तो आप उत्तराखंड के ऋषिकेश जरूर जाएं. गंगा के तट पर बसा यह छोटा सा शहर कुदरती नजारों के लिए मशहूर है. यहां कई तरह के एडवेंचर स्पोटर्स भी कराएं जाते हैं. ऋषिकेश में रिवर राफ्टिंग, क्लिफ जंपिंग, बौडी सर्फिंग जैसे स्पोटर्स शामिल हैं. ऋषिकेश के हरी वादियों में सब से मशहूर क्लिफ जंपिंग है. यहां देश का सबसे ऊंचा बंजी फ्लैटफौर्म तैयार किया गया है, जिसकी ऊंचाई लगभग 273 फुट है. इस ऊंचाई से कूदने के बाद आपको एक अलग ही तरीके का रोमांच का एहसास होगा.

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अगर आप यह सोच रहे हैं कि इतना सब कुछ है तो खर्चा भी ज्यादा होगा. तो नहीं, अगर आप आने-जाने का खर्चा हटा दें तो आप 1500 रुपये में ही एडवेंचर का मजा उठा सकते हैं. मई-जून के महीने में ज्यादातर लोग घूमने जाते हैं. ऐसे में कई ट्रैवल कंपनियां पैकेज औफर करती हैं.

यह पैकेज काफी सस्ते होते हैं जिससे आपकी जेब भी ढीली नहीं होगी. कई कंपनियां मात्र 400 से 500 रुपये में ही रिवर राफ्टिंग, क्लिफ जंपिंग और बौडी सर्फिंग करवाती हैं. जब भी आप ऋषिकेश या कोई भी एडवेंचर ट्रिप प्लान करें तो एक बार ट्रैवल कंपनियों का पैकेज जरूर देख लें. पर ध्यान दें कि ये सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त हों.

यदि आप आने-जाने की खर्च के वजह से प्लान कैंसिल कर रहे हैं तो ऐसा बिलकुल न करें.  जो 300 रुपये आप एक दिन में बाहर पिज्जा, बर्गर खाने में खर्च कर देते हैं उस से बेहतर है कि आप उस 300 रुपये में ऋषिकेश जाने का मजा ले सकते हैं.

आने-जाने का खर्चा

अगर आप बस से जाना चाहते हैं तो इसका शुरुआती किराया 300 रुपये से शुरू होता है. अगर आप औन लाइन बुकिंग करते है तो कई बार आपको स्पेशल औफर भी दिया जाता है. जिसमें आप कुपन कोड का इस्तेमाल करके सस्ते रेट में ऋषिकेश की वादियों में जा सकते हैं. अगर आपके पास ऋषिकेश जाने का कोई भी जुगाड़ नहीं है तो आप पैसेंजर ट्रेन से भी जा सकते हैं. पैसेंजर ट्रेन में किराया भी कम लगता है और आप की पौकेट भी मैनेज रहती है.

ठहरनें का प्रबंध

अधिकतर टुरिस्ट प्लेस पर सीजन के अनुसार ही होटल का दाम घटता बढ़ता है. गर्मी के मौसम की शुरुआत होते ही अधिकतर पहाड़ी इलाकों के होटल के दाम बढ़ा दिए जाते हैं. लेकिन कुछ ऐसे होटल भी होते हैं जो सस्ते तो होते हैं लेकिन उनकी सर्विस अच्छी नहीं होती. ऐसे में आप चाहें तो आश्रम या धर्मशाला में भी रुक सकते है. ऋषिकेश में कई आश्रम और धर्मशाला हैं जहां आप कम बजट में ठहर सकते हैं. इन के कमरें काफी बड़े और आरामदायक होते हैं. इन कमरों को आप 350 रुपए में बूक कर सकते हैं.

पहले बुकिंग है जरूरी 

आपको अगर होटल, आश्रम या धर्मशाला में रुकना है तो बुकिंग आपको ट्रिप से 10-15 दिन पहले करानी होगी. अगर आप वहां जा कर बुकिंग करेंगे तो आपको काफी महंगा रूम मिलेगा जो आपका सारा बजट बिगाड़ सकता है. इसलिए आप बुकिंग घर से ही कर के जाएं.

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बैग पैक में खाना खजाना

बैग पैक में तो हम तमाम जरूरी समान रखते हैं. लेकिन बात जब जेब तंगी और बाहर घूमने की हो तो पेट पूजा का ध्यान रखना भी जरूरी है. सफर करते वक्त भूख ज्यादा लगती है ऐसे में घर से ही बिसकुट, नमकपारे, नमकीन, नट्स, ड्राई फ्रूट, चिप्स, मिल्क पाउडर, टी बैग, शुगर पाउडर और गर्मपानी आप अपने बैग में रख सकते हैं. इससे भूक तो कम होगी ही साथ ही आपका खर्चा भी बचेगा.

ठगने से बचें

अक्सर जब हम नए शहर में जाते हैं तो वहां हर चीज का दाम डबल कर के बताया जाता है. ऐसे में आपका ठगना तो तय है. कोशिश करें मोल-भाव करने की खरीदारी करते वक्त कई बार हमें कोई अलग सी चीज दिखती है तो झट से खरीद लेते हैं जिससे आपकी जैब तो खाली होती ही है और वस्तु भी आपके कोई काम नहीं आता. इसलिए कोई भी फालतू समान बिलकुल न खरीदें यदि वो वस्तु आपके काम की है तो ही खरीदें.

अगर आपको एक जगह से दुसरें जगह जाना है तो पर्सनल गाड़ी न करें. वहां 5-10 रुपये में शेयरिंग टेम्पो आपको आसानी से मिल जाएगा.

साफ्ट हिंदुत्व को समर्पित कांग्रेसी बजट

शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में पुजारी अपना मानदेय बढ़वाने के लिए धरने प्रदर्शन करते रहते थे बल्कि उन्होंने शिवराज सिंह को सत्ता से बेदखल होने का श्राप भी दे डाला था. यह श्राप फलीभूत हुआ और पंडे पुजारियों के दम पर सत्ता के शिखर तक पहुंचने वाली भाजपा अब विपक्ष में बैठी है. कांग्रेस की सरकार में मुख्यमंत्री कमलनाथ बने तो उन्होंने शुरू में ही संकेत दे दिये थे कि मध्यप्रदेश सरकार साफ्ट हिन्दुत्व के एजेंडे पर चलेगी.

अपने पहले ही बजट में कमलनाथ सरकार ने न केवल पुजारियों का मानदेय तिगुना कर दिया है बल्कि 1000 गौशालाएं बनाने 132 करोड़ देने की भी घोषणा कर डाली है. इतना ही नहीं और दरियादिली दिखाते यह भी 732 करोड़ वाले भारी भरकम बजट में कहा गया है कि मंदिरों की जमीनों को सरकारी पैसे से विकसित किया जाएगा यानि एक तरह से सरकार अब मंदिर निर्माण कर भी पुण्य और ब्राह्मणों का आशीर्वाद बटोरेगी क्योंकि मंदिर की जमीनों पर खेती वही करेगा और दक्षिणा भी बटोरेगा. गौ शालाओं की गायों के भोजन के लिए अब सरकार 10 की जगह 20 रु प्रतिदिन देगी यानि 600 रु प्रति महीना प्रति गाय का खर्च आम लोगों को उठाना पड़ेगा. यहां कमलनाथ उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से पिछड़ गए हैं. जिन्होंने गौ माताओं को 900 रु प्रतिमाह देने का ऐलान किया है.

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पहले ही बजट में पुजारी कल्याण कोष की भी घोषणा की गई है और सरकार राम वन गमन पथ का भी विकास करेगी. 40 नदियों के पुनर्जीवन को भी साफ्ट हिन्दुत्व के एजेंडे का ही हिस्सा माना जा रहा है. बजट पूरी तरह हिन्दुत्व की छाप वाला न दिखे इसलिए हज कमेटी का भी अनुदान बढ़ाने की घोषणा की गई है. वित्त मंत्री तरुण भानोट हालांकि बजट को हिन्दुत्व का नहीं बल्कि यथार्थ का बता रहे हैं तो वे कुछ गलत नहीं कह रहे क्योंकि धर्म और उसकी दुकानदारी से बड़ा यथार्थ कुछ और हो भी नहीं सकता.

क्यों सरकार हिन्दुत्व के लिए करोड़ों रु फूंक रही है इस सवाल का जबाब बेहद साफ है कि कांग्रेस भी भाजपा की तरह हिन्दुत्व में वोट तलाश रही है जो बिना ब्राह्मणों के आशीर्वाद और सहयोग के नहीं मिलते. अगर यह प्रजाति नाराज हो जाये तो हश्र क्या होता है यह सबके सामने है कि शिवराज सिंह को दलित प्रेमी साबित कर उन्हें चलता कर दिया गया. गौरतलब है कि इन्हीं शिवराज सिंह ने दलित पुजारी बनाने की घोषणा की थी तो समूचा ब्राह्मण समुदाय दुर्वासा बनकर श्राप देने लगा था तब सड़कों पर आकर ब्राह्मणों ने कहा था कि कपाल क्रिया और अन्त्येष्टि भी हम ही कराते हैं.

लगता ऐसा है कि कमलनाथ ब्राह्मणों से जरूरत से ज्यादा डर गए हैं तभी एक अच्छे खासे बजट को उन्होंने गेरुआ बनाने में कसर नहीं छोड़ी है. जनता का पैसा पुजारियों को क्यों इस सवाल का जबाब भी शायद ही कमलनाथ दे पाएं कि राज्य में लाखों बच्चे कुपोषण का शिकार हैं उनके लिए बजट में कोई इंतजाम क्यों नहीं , क्या कुपोषण भी पूर्व जन्मों के पापों का फल है जिसमें कोई लोकतान्त्रिक सरकार कुछ नहीं कर सकती.

अगर यह और ऐसी कई विसंगतियां ईश्वरीय व्यवस्था हैं तो फिर मेहरबानी ब्राह्मणों पर ही क्यों, क्या सिर्फ इसलिए कि वे श्रेष्ठ जाति के धर्म के लिहाज से होते हैं और पूज्यनीय होते हैं गरीब दलितों और आदिवासियों के लिए बजट में कुछ उल्लेखनीय नहीं है क्योंकि सरकार की नजर में भी वे दोयम दर्जे के हैं. यह साफ्ट हिन्दुत्व कांग्रेस को कितना महंगा पड़ा था यह लोकसभा चुनाव नतीजों से समझ आ गया था कि कांग्रेस जितना दलितों आदिवासियों और मुसलमानों से दूर भागते ऊंची जाति वालों की खुशामद करेगी उतनी ही पिछड़ती जाएगी क्योंकि सवर्ण वोट आखिरकार जाता तो भाजपा की ही झोली में है.

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ऐसे में कमलनाथ ने राज्य की झोली एक विशेष जाति वालों के लिए खोलकर खुद के लिए ही मुसीबतें खड़ी कर लीं है जो जल्द ही भस्मासुर की तरह उनके सामने खड़ी होंगी. हाल फिलहाल तो वे त्रेता और द्वापर युग के राजाओं की तरह धर्म और ब्राह्मणों के पालन पोषण की जिम्मेदारी उठाते अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं.

अनोखा रिश्ता

‘‘बायमां, मैं निकल रही हूं… और हां भूलना मत,

दोपहर के खाने से पहले दवा जरूर खा लेना,’’ कह पल्लवी औफिस जाने लगी.

तभी ललिता ने उसे रोक कहा, ‘‘यह पकड़ो टिफिन. रोज भूल जाती हो और हां, पहुंचते ही फोन जरूर कर देना.’’

‘‘मैं भूल भी जाऊं तो क्या आप भूलने देती हो मां? पकड़ा ही देती हो खाने का टिफिन,’’ लाड़ दिखाते हुए पल्लवी ने कहा, तो ललिता भी प्यार के साथ नसीहतें देने लगीं कि वह कैंटीन में कुछ न खाए.

‘‘हांहां, नहीं खाऊंगी मेरी मां… वैसे याद है न शाम को 5 बजे… आप तैयार रहना मैं जल्दी आने की कोशिश करूंगी,’’ यह बात पल्लवी ने इशारों में कही, तो ललिता ने भी इशारों में ही जवाब दिया कि वे तैयार रहेंगी.

‘‘क्या इशारे हो रहे हैं दोनों के बीच?’’ ललिता और पल्लवी को इशारों में बात करते देख विपुल ने कहा, ‘‘देख लो पापा, जरूर यहां सासबहू और साजिश चल रही है.’’

विपुल की बातें सुन शंभुजी भी हंसे बिना नहीं रह पाए. मगर विपुल तो अपनी मां के पीछे ही पड़ गया, यह जानने के लिए कि इशारों में पल्लवी ने उन से क्या कहा.

‘‘यह हम सासबहू के बीच की बात है,’’ प्यार से बेटे का कान खींचते हुए ललिता बोलीं.

बेचारा विपुल बिना बात को जाने ही औफिस चला गया. दोनों को

औफिस भेज कर ललिता 2 कप चाय बना लाईं और फिर इतमीनान से शंभूजी की बगल में बैठ गईं.

चाय पीते हुए शंभूजी एकटक ललिता को देखदेख कर मुसकराए जा रहे थे.

‘‘इतना क्यों मुसकरा रहे हो? क्या गम है जिसे छिपा रहे हो…?’’ ललिता ने शायराना अंदाज में पूछा, तो उन की हंसी छूट गई.

कहने लगे, ‘‘मुसकरा इसलिए रहा हूं कि तुम भी न अजीब हो. अरे, बता देती बेचारे को कि तुम सासबहू का क्या प्रोग्राम है. लेकिन जो भी हो तुम सासबहू की बौडिंग देख कर मन को बड़ा सुकून मिलता है वरना तो मेरा सासबहू के झगड़े सुनसुन कर दिमाग घूम जाता है. हाल ही में मैं ने अखबार में एक खबर पढ़ी, जिस में लिखा था सास से तंग आ कर एक बहू 12वीं मंजिल से कूद गई और जानती हो पहले उस ने अपने ढाई साल के बेटे को फेंका और फिर खुद कूद गई, जिस से दोनों की मौत हो गई. सच कह रहा हूं ललिता यह पढ़ कर मेरा तो दिल बैठ गया था.’’

शंभूजी की बातें सुन कर ललिता का भी दिल दहल गया.

‘‘सोचा जरा उस इंसान पर क्या बीतती होगी जिसे न तो मां समझ पाती हैं और न पत्नी. पिसता रहता है बेचारा मां और पत्नी के बीच.’’

‘‘हूं, सही कह रहे हैं आप. हमारे समाज में जब एक लड़की शादी के बाद अपना मायका छोड़ कर जहां उस ने लगभग अपनी आधी जिंदगी पूरे हक के साथ गुजारी होती है, ससुराल में कदम रखते ही उस के दिल में घबराहट सी होने लगती है कि यहां सब उसे दिल से तो अपनाएंगे न? अपने परिवार का हिस्सा समझेंगे न? ज्यादातर घरों में यही होता है कि बहू को आए अभी कुछ दिन हुए नहीं कि जिम्मेदारी की टोकरी उसे पकड़ा दी जाती है. उसे यह तो समझा दिया जाता है कि सासससुर के साथसाथ ननददेवर और नातेरिश्तेदारों को भी सम्मान देना होगा, लेकिन यह नहीं समझाया जाता कि आज से यह घर उस का भी है और ससुराल में उस की राय भी उतनी ही मान्य होगी जितनी घर के बाकी सदस्यों की.

‘‘क्या एक बहू का यह अधिकार नहीं कि घर के हित के लिए जो भी फैसले लिए जाएं उन में उस की भी राय शामिल हो? क्यों सास को लगने लगता है कि बहू आते ही उस से उस के बेटे को छीन लेगी? अगर ऐसा ही है, तो फिर न करें वे अपने बेटे की शादी. रखें अपने आंचल में ही छिपा कर. अगर शादी के बाद बेटा अपने परिवार को कुछ बोल जाए, तो सब को यही लगने लगता है कि बीवी ने ही सिखाया होगा

उसे ऐसा बोलने के लिए और यही झगड़े की जड़ है. हर बात के लिए बहू को ही दोषी ठहराया जाने लगता है. और तो और उस के मायके को भी नहीं छोड़ते लोग,’’ कहते हुए ललिता की आंखें गीली हो गईं, जो शंभूजी से भी छिपी न रह पाईं.

वे समझ रहे थे कि आज ललिता के मन का गुब्बार निकल रहा है और वह वही सब बोल रही है जो उस के साथ हुआ है. उन्हें भी तो याद है… कभी उन की मां ने ललिता को चैन से जीने नहीं दिया. बातबात पर तानेउलाहने, गालीगलौच यहां तक कि थप्पड़ भी चला देती थीं वे ललिता पर और बेचारी रो कर रह जाती. लेकिन क्या कोई भी लड़की अपने मायके की बेइज्जती सहन कर सकती है भला? जब ललिता की सास उस के मायके के खिलाफ कुछ बोल देतीं, तो उस से सहन नहीं होता और वह पलट कर जवाब दे देती. यह बात उन की मां की बरदाश्त के बाहर चली जाती. गरजते हुए कहतीं कि अगर फिर कभी ललिता ने कैंची की तरह जबान चलाई तो वे उसे हमेशा के लिए उस के मायके भेज देगी, क्योंकि उन के बेटे के लिए लड़कियों की कमी नहीं है.

बेचारे शंभूजी भी क्या करते? खून का घूंट पी कर रह जाते पर अपनी मां से कुछ कह न पाते. अगर कुछ बोलते तो जोरू का गुलाम कहलाते और पहले के जमाने में कहां बेटे को इतना हक होता था कि वह पत्नी की तरफदारी में कुछ बोल सके.

‘‘मैं ने तो पहले ही सोच लिया था शंभूजी कि जब मेरी बहू का गृहप्रवेश होगा, तो उसे सिर्फ कर्तव्यों, दायित्वों, जिम्मेदारियों और फर्ज की टोकरी ही नहीं थमाऊंगी वरन उसे उस के हक और अधिकारों का गुलदस्ता भी दूंगी, क्योंकि आखिर वह भी तो अपनी ससुराल में कुछ उम्मीदें ले कर आएगी.’’

‘‘और अगर तुम्हारी बहू ही अच्छे विचारों वाली नहीं आती तब? तब कैसे निभाती उस से?’’ शंभूजी ने पूछा.

अपने पति की बातों पर वे हंसीं और फिर कहने लगीं, ‘‘मैं ने यह भी सोचा था

कि शायद मेरी बहू मेरे मनमुताबिक न आए, लेकिन फिर भी मैं उस से निभाऊंगी. उसे इतना प्यार दूंगी कि वह भी मेरे रंग में रंग जाएगी. जानते हैं शंभूजी, अगर एक औरत चाहे तो फिर चाहे वह सास हो या बहू, अपने रिश्ते को बिगाड़ भी सकती है और चाहे तो अपनी सूझबूझ से रिश्ते को कभी न टूटने वाले पक्के धागे में पिरो कर भी रख सकती है. हर लड़की चाहती है कि वह एक अच्छी बहू बने, पर इस के लिए सास को भी तो अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी न. अगर घर के किसी फैसले में बहू की सहमति न लें, उसे पराई समझें, तो वह हमें कितना अपना पाएगी, बोलिए? उफ, बातोंबातों में समय का पता  ही नहीं चला,’’ घड़ी की तरफ देखते हुए ललिता ने कहा, ‘‘आज आप को दुकान पर नहीं जाना क्या?’’

‘‘सोच रहा हूं आज न जाऊं. वैसे भी लेट हो गया और मंदी के कारण वैसे भी ग्राहक कम ही आते हैं,’’ शंभूजी ने कहा. उन का अपना कपड़े का व्यापार था.

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‘‘पर यह तो बताओ कि तुम सासबहू ने क्या प्रोग्राम बनाया है? मुझे तो बता दो,’’ वे बोले.

शंभूजी के पूछने पर पहले तो ललिता झूठेसच्चे बहाने बनाने लगीं, पर जब उन्होंने जोर दिया, तो बोलीं, ‘‘आज हम सासबहू फिल्म देखने जा रही हैं.’’

‘‘अच्छा, कौन सी?’’ पूछते हुए शंभूजी की आंखें चमक उठीं.

‘‘अरे, वह करीना कपूर और सोनम कपूर की कोई नई फिल्म आई है न… क्या नाम है उस का… हां, याद आया, ‘वीरे दी वैडिंग.’ वही देखने जा रही हैं. आज आप घर पर ही हैं, तो ध्यान रखना घर का.’’

‘‘अच्छा, तो अब तुम सासबहू फिल्म देखो और हम बापबेटा खाना पकाएं, यही कहना चाहती हो न?’’

‘‘हां, सही तो है,’’ हंसते हुए ललिता बोलीं और फिर किचन की तरफ बढ़ गईं.

‘‘अच्छा ठीक है, खाना हम बना लेंगे, पर

1 कप चाय और पिला दो,’’ शंभूजी ने कहा तो ललिता भुनभुनाईं यह कह कर कि घर में रहते हैं, तो बारबार चाय बनवा कर परेशान कर देते हैं.

जो भी हो पतिपत्नी अपने जीवन में बहुत खुश थे और हों भी क्यों न, जब पल्लवी जैसी बहू हो. शादी के 4 साल हो गए, पर कभी उस ने ललिता को यह एहसास नहीं दिलवाया कि वह उन की बहू है. पासपड़ोस, नातेरिश्तेदार इन दोनों के रिश्ते को देख कर आश्चर्य करते और कहते कि क्या सासबहू भी कभी ऐसे एकसाथ इतनी खुश रह सकती हैं? लगता ही नहीं है कि दोनों सासबहू हैं.

पल्लवी एक मल्टीनैशनल कंपनी में अच्छे पैकेज पर नौकरी कर रही थी और वहीं उस की मुलाकात विपुल से हुई, जो जानपहचान के बाद दोस्ती और फिर प्यार में बदल गई. 2 साल तक बेरोकटोक उन का प्यार चलता रहा और फिर दोनों परिवारों की सहमति से विवाह के बंधन में बंध गए. वैसे तो बचपन से ही पल्लवी को सास नाम के प्राणी से डर लगता था, क्योंकि उस के जेहन में एक हौआ सा बैठ गया था कि सास और बहू में कभी नहीं पटती, क्योंकि अपने घर में भी तो उस ने आएदिन अपनी मां और दादी को लड़तेझगड़ते ही देखा था.

ज्योंज्यों वह बड़ी होती गई दादी और मां में लड़ाइयां भी बढ़ती चली गईं. उसे याद है जब उस की मांदादी में झगड़ा होता और उस के पापा किसी एक की तरफदारी करते, तो दूसरी का मुंह फूल जाता. हालत यह हो गई कि फिर उन्होंने बोलना ही छोड़ दिया. जब भी दोनों में झगड़ा होता, पल्लवी के पापा घर से बाहर निकल जाते. नातेरिश्तेदारों और पासपड़ोस में भी तो आएदिन सासबहू के झगड़े सुनतेदेखते वह घबरा सी जाती.

उसे याद है जब पड़ोस की शकुंतला चाची की बहू ने अपने शरीर पर मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगा ली थी. तब यह सुन कर पल्लवी की रूह कांप उठी थी. वैसे हल्ला तो यही हुआ था कि उस की सास ने ही उसे जला कर मार डाला, मगर कोई सुबूत न मिलने के कारण वह कुछ सजा पा कर ही बच गई थी. मगर मारा तो उसे उस की सास ने ही था, क्योंकि उस की बहू तो गाय समान सीधी थी. ऐसा पल्लवी की दादी कहा करती थीं. पल्लवी की दादी भी किसी सांपनाथ से कम नहीं थीं और मां तो नागनाथ थीं ही, क्योंकि दादी एक सुनातीं, तो मां हजार सुना डालतीं.

खैर, एक दिन पल्लवी की दादी इस दुनिया को छोड़ कर चली गईं. लेकिन आश्चर्य तो उसे तब हुआ जब दादी की 13वीं पर महल्ले की औरतों के सामने घडि़याली आंसू बहाते हुए पल्लवी की मां शांति कहने लगीं कि उन की सास, सास नहीं मां थीं उन की. जाने अब वे उन के बगैर कैसे जी पाएंगी.

मन तो हुआ पल्लवी का कि कह दे कि क्यों झूठे आंसू बहा रही हो मां? कब तुम ने दादी को मां माना? मगर वह चुप रही. मन ही मन सोचने लगी कि बस नाम ही शांति है उस की मां का, काम तो सारे अशांति वाले ही करती हैं.

सासबहू के झगड़े सुनदेख कर पल्लवी का तो शादी पर से विश्वास ही उठ गया था. जब भी उस की शादी की बात चलती, वह सिहर जाती. सोचती, जाने कैसी ससुराल मिलेगी. कहीं उस की सास भी शकुंतला चाची जैसी निकली तो या कहीं उस में भी उस की मां का गुण आ गया तो? ऐसे कई सवाल उस के मन को डराते रहते.

अपने मन का डर उस ने विपुल को भी बताया, जिसे सुन उस की हंसी रुक नहीं रही थी. किसी तरह अपनी हंसी रोक वह कहने लगा, ‘‘हां, मेरी मां सच में ललिता पवार हैं. सोच लो अब भी समय है. कहीं ऐसा न हो तुम्हें बाद में पछताना पड़े? पागल, मेरी मां पुराने जमाने की सास नहीं हैं. तुम्हें उन से मिलने के बाद खुद ही पता चल जाएगा.’’

विपुल की बातों ने उस का डर जरा कम तो कर दिया, पर पूरी तरह से खत्म नहीं हो पाया. अब भी सास को ले कर दिल के किसी कोने में डर तो था ही.

बिदाई के वक्त बड़े प्यार से शांति ने भी अपनी बेटी के कान फूंकते हुए समझाया था, ‘‘देख बिटिया, सास को कभी मां समझने की भूल न करना, क्योंकि सास चुड़ैल का दूसरा रूप होती है. देखा नहीं अपनी दादी को? मांजीमांजी कह कर उसे सिर पर मत बैठा लेना. पैरों में तेल मालिशवालिश की आदत तो डालना ही मत नहीं तो मरते दम तक तुम से सेवा करवाती रहेगी… सब से बड़ी बात पति को अपनी मुट्ठी में रखना और उस के कमाए पैसों को भी. अपनी कमाई तो उसे छूने भी मत देना. एक बार मुंह को खून लग जाए, तो आदत पड़ जाती है. समझ रही हो न मेरे कहने का मतलब?’’

अपनी मां की कुछ बातों को उस ने आत्मसात कर लिया तो कुछ को नहीं.

ससुराल में जब पल्लवी ने पहला कदम रखा, तो सब से पहले उस का

सामना ललिता यानी अपनी सास से ही हुआ. उन का भरा हुआ रोबीला चेहरा, लंबा चरबी से लदा शरीर देख कर ही वह डर गई. लगा जैसा नाम वैसा ही रूप. और जिस तरह से वे आत्मविश्वास से भरी आवाज में बातें करतीं, पल्लवी कांप जाती. वह समझ गई कि उस का हाल वही होने वाला है जो और बेचारी बहुओं का होता आया है.

मगर हफ्ता 10 दिन में ही जान लिया पल्लवी ने कि यथा नाम तथा गुण वाली कहावत ललिता पर कहीं से भी लागू नहीं होती है. तेजतर्रार, कैंची की तरह जबान और सासों वाला रोब जरा भी नहीं था उन के पास.

एक रोज जब वह अपनी मां को याद कर रोने लगी, तो उस की सास ने उसे सीने से लगा लिया और कहा कि वह उसे सास नहीं मां समझे और जब मन हो जा कर अपनी मां से मिल आए. किसी बात की रोकटोक नहीं है यहां उस पर, क्योंकि यह उस का भी घर है. जैसे उन के लिए उन की बेटी है वैसे ही बहू भी… और सिर्फ कहा ही नहीं ललिता ने कर के भी दिखाया, क्योंकि पल्लवी को नए माहौल में ढलने और वहां के लोगों की पसंदनापसंद को समझने के लिए उसे पर्याप्त समय दिया.

अगर पल्लवी से कोई गलती हो जाती, तो एक मां की  तरह बड़े प्यार से उसे

सिखाने का प्रयास करतीं. पाककला में तो उस की सास ने ही उसे माहिर किया था वरना एक मैगी और अंडा उबालने के सिवा और कुछ कहां बनाना आता था उसे. लेकिन कभी ललिता ने उसे इस बात के लिए तानाउलाहना नहीं मारा, बल्कि बोलने वालों का भी यह कह कर मुंह चुप करा देतीं कि आज की लड़कियां चांद पर पहुंच चुकी हैं, पर अफसोस कि हमारी सोच आज भी वहीं की वहीं है. क्यों हमें बहू सर्वगुण संपन्न चाहिए? क्या हम सासें भी हैं सर्वगुण संपन्न और यही उम्मीद हम अपनी बेटियों से क्यों नहीं लगाते? फिर क्या मजाल जो कोई पल्लवी के बारे में कुछ बोल भी दे.

उस दिन ललिता की बातें सुन कर दिल से पल्लवी ने अपनी सास को मां समझा और सोच लिया कि वह कैसा रिश्ता निभाएगी अपनी सास से.

कभी ललिता ने यह नहीं जताया कि विपुल उन का बेटा है तो विपुल पर पहला अधिकार भी उन का ही है और न ही कभी पल्लवी ने ऐसा जताया कि अब उस के पति पर सिर्फ उस का अधिकार है. जब कभी बेटेबहू में किसी बात को ले कर बहस छिड़ जाती, तो ललिता बहू का ही साथ देतीं. इस से पल्लवी के मन में ललिता के प्रति और सम्मान बढ़ता गया. धीरेधीरे वह अपनी सास के और करीब आने लगी. पूरी तरह से खुलने लगी उन के साथ. कोई भी काम होता वह ललिता से पूछ कर ही करती. उस का जो भय था सास को ले कर वह दूर हो चुका था.

लोग कहते हैं अच्छी बहू बनना और सूर्य पर जाना एक ही बात है. लेकिन अगर मैं एक अच्छी बेटी हूं, तो अच्छी बहू क्यों नहीं बन सकती? मांदादी को मैं ने हमेशा लड़तेझगड़ते देखा है, लेकिन गलती सिर्फ दादी की ही नहीं होती थी. मां चाहतीं तो सासबहू के रिश्ते को संवार सकती थीं, पर उन्होंने और बिगाड़ा रिश्ते को. मुझे भी उन्होंने वही सब सिखाया सास के प्रति, पर मैं उन की एक भी बात में नहीं आई, क्योंकि मैं जानती थी कि सामने वाले मुझे वही देंगे, जो मैं उन्हें दूंगी और ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती. शादी के बाद एक लड़की का रिश्ता सिर्फ अपने पति से ही नहीं जुड़ता, बल्कि ससुराल के बाकी सदस्यों से भी खास रिश्ता बन जाता है, यह बात क्यों नहीं समझती लड़कियां? अगर अपने घर का माहौल हमेशा अच्छा और खुशी भरा रखना है, तो मुझे अपनी मां की बातें भूलनी होंगी और फिर सिर्फ पतिपत्नी में ही 7 वचन क्यों? सासबहू भी क्यों न कुछ वचनों में बंध जाएं ताकि जीवन सुखमय बीत सके, अपनेआप से ही कहती पल्लवी.

उसी दिन ठान लिया पल्लवी ने कि वे सासबहू भी कुछ वचनों में बंधेंगी और अपने रिश्ते को एक नया नाम देंगी-अनोखा रिश्ता. अब पल्लवी अपनी सास की हर पसंदनापसंद को जाननेसमझने लगी थी. चाहे शौपिंग पर जाना हो, फिल्म देखने जाना हो या घर में बैठ कर सासबहू सीरियल देखना हो, दोनों साथ देखतीं.

अब तो पल्लवी ने ललिता को व्हाट्सऐप, फेसबुक, लैपटौप यहां तक कि कार चलाना भी सिखा दिया था. सब के औफिस चले जाने के बाद ललिता घर में बोर न हों, इसलिए उस ने जबरदस्ती उन्हें किट्टी भी जौइन करवा दी.

शुरूशुरू में ललिता को अजीब लगा था, पर फिर मजा आने लगा. अब वे भी अपनी बहू के साथ जा कर और औरतों की तरह स्टाइलिश कपड़े खरीद लातीं. वजन भी बहुत कम कर लिया था. आखिर दोनों सासबहू रोज वाक पर जो जाती थीं. अपने हलके शरीर को देख बहुत खुश होतीं ललिता और उस का सारा श्रेय देतीं अपनी बहू को, जिस के कारण उन में इतना बदलाव आया था वरना तो 5 गज की साड़ी में ही लिपटी उन की जिंदगी गुजर रही थी.

एक दिन चुटकी लेते हुए शंभूजी ने कहा भी, ‘‘कहीं तुम ललिता पवार से 0 फिगर साइज वाली करीना न बन जाओ. फिर मेरा क्या होगा मेरी जान?’’

‘‘हां, बनूंगी ही, आप को क्यों जलन हो रही है?’’ ललिता बोलीं.

‘‘अरे, मैं क्यों जलने लगा भई. अच्छा है बन जाओ करीना की तरह. मेरे लिए तो और अच्छा ही है न वरना तो ट्रक के साथ आधी से ज्यादा उम्र बीत ही गई मेरी,’’ कह कर शंभूजी हंस पड़े पर ललिता बड़बड़ा उठीं.

दोनों की इस तरह की नोकझोंक देख पल्लवी और विपुल हंस पड़ते.

एक दिन जब पल्लवी ने अपने लिए जींस और टीशर्ट खरीदी, तो ललिता के लिए भी खरीद लाई. वैसे विपुल ने मना किया था कि मत खरीदो, मां नहीं पहनेगी, पर वह ले ही आई.

‘‘अरे, यह क्या ले आई बहू? नहींनहीं मैं ये सब नहीं पहनूंगी. लोग क्या कहेंगे और मेरी उम्र तो देखो,’’ जींस व टीशर्ट एक तरफ रखते हुए ललिता ने कहा.

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‘‘उम्र क्यों नहीं है? अभी आप की उम्र ही क्या हुई है मां? लगता है आप 50 की हैं? लोगों की परवाह छोडि़ए, बस वही पहनिए जो आप को अच्छा लगता है और मुझे पता है आप का जींस पहनने का मन है. आप यह जरूर पहनेंगी,’’ हुक्म सुना कर पल्लवी फ्रैश होने चली गई. ललिता उसे जाते देखते हुए सोचने लगीं कि यह कैसा अनोखा रिश्ता है उन का.

चीन होने की महत्ता

वर्ष 1980 तक भारत के बराबर गरीब और दानेदाने को मुहताज चीन आज दुनिया की सब से ज्यादा ताकतवर हस्ती अमेरिका को चुनौती दे रहा है और वह भी बराबरी की हैसियत से. चीन 1960-70 का वियतनाम या 1990-2010 का उत्तरी कोरिया नहीं है कि जो अपने लोगों के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने को तैयार हो कर अमेरिका से मुकाबला करने को तैयार हुए. चीन तो रूस की तरह, या यों कहिए कि उस से भी कई कदम आगे चल कर, अमेरिका से मुकाबला कर रहा है. इस के मुकाबले भारत, चाहे गिड़गिड़ा न रहा हो, को मालूम है कि उस का एक पांव चाहे चांद पर पहुंचने को उतावला हो, दूसरा तो गोबर के गड्ढे में धंस ही रहा है.

भारत और चीन की तुलना करना अब बंद कर दी गई है. विश्व के देश चीन की उन्नति से परेशान हैं. भारत के बारे में उन्हें मालूम है कि यह सिर्फ हल्ला मचा सकता है. भारत की विशेषता केवल यह है कि लाखों भारतीय दुनियाभर की कंपनियों में कंप्यूटरों के कर्ताधर्ता बने हैं. पर, चीनी तो मालिक हैं सैकड़ों कंपनियों के.

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चीन की अब यह हैसियत है कि वह अपने नागरिकों को अमेरिका का वीजा न लेने की सलाह दे रहा है. चीन अमेरिका व्यापार युद्ध के मौजूदा दौर में अमेरिका खीझ कर चीनियों पर बंदिश लगा सकता है जो मैक्सिकनों या अन्य दक्षिण अमेरिकी देशों के नागरिकों पर लगा रहा है. फर्क यह है कि उन देशों से केवल मजदूर अमेरिका आ रहे हैं. चीन से मजदूर तो वहां न के बराबर आ रहे हैं. वहां से तो समझदार, होशियार और बहुत पैसे वाले अमेरिका आ रहे हैं.

चीन का बंद माहौल वहां हर सफल व्यक्ति को डराता है. विदेशियों के लिए अमेरिका में स्वतंत्रता की एक अजीब खुशबू है. यह पहले भारत में गरीबी के बावजूद थी लेकिन अब खत्म हो रही है. अगर चीन में सत्ताधारी पार्टी का राज घरघर में है तो भारत में सत्ताधारी पार्टी अपने धार्मिक क्रियाकलापों के जरिए देशवासियों के मुंह पर ताला लगा रही है. अमेरिका आज जो बंदिशें लगा रहा है उन का वहीं अमेरिका में ही जम कर विरोध भी हो रहा है.

भारत और चीन की तुलना हमेशा होती रहेगी. हमारी सरकार पाकिस्तान को आगे कर इस तुलना को रोकने की कोशिश कर रही है. कोई आश्चर्य नहीं कि चीन से ज्यादा उपजाऊ जमीन पर बसे भारत देश की 130 करोड़ जनता चीन की 140 करोड़ जनता से सभी मोरचों पर पीछे रह जाए. इस का जवाब देश की सरकार को देना होगा, आम आदमी को नहीं, क्योंकि आज सरकार ही तय करती है कि हम भारतवासी क्या पढ़ें, क्या खेलें, कैसे काम करें, कहां रहें और यहां तक कि क्या खाएं.

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नाम तो सही लिखिए

‘‘इस नाम से कोई खाता नहीं है.’’ बैंक मैनेजर ने भी वही दोहराया जो क्लर्क ने कहा था. हम समझ नहीं पा रहे थे कि कुछ महीने पहले तक हम इस खाते में चैक जमा कर रहे थे और हमें वह रकम मिल भी रही थी. अब अचानक ऐसा क्या हो गया जो हमारा खाता ही गायब हो गया. हम ने बैंक मैनेजर से बारबार कहा कि हम इसी खाते में नकद और चैक जमा करते आ रहे हैं और पैसा निकालते आ रहे हैं पर वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था. ‘‘मुझे और भी काम हैं,’’ कह कर उस ने हमें सम्मानपूर्वक बाहर निकल जाने को कहा.

हर जगह जानपहचान होना कितना जरूरी है, यह हमें उस दिन पता चला. जब तक मैं अपने शहर में था और मेरा मित्र उस बैंक में था तब तक कोई दिक्कत नहीं आई थी. आज क्या हो गया. मैं ने बारबार चैक देखा. मेरा सरनेम गलत लिखा था. ‘गुप्ते’ की जगह ‘गुप्ता’ लिखा था. जब तक मेरा मित्र इस बैंक में था तब तक इस गलत सरनेम की समस्या नहीं आई थी. सोचा था कि इस नए शहर में भी कोई दिक्कत नहीं होगी.

आजकल तो किसी भी शहर में बैंक से पैसा निकाल सकते हैं और जमा कर सकते हैं. इसी भरोसे पर चैक जमा कर दिया. पेइनस्लिप पर जमा करने वाले का नाम और पता लिखा होता है, इसलिए वह चैक यहां के पते पर लौट आया. हम चैक ले कर बैंक पहुंचे. जांच करने पर हकीकत का पता चला. अब क्या हो? शहर अनजाना, ऐसे में पैसे की जरूरत आन पड़ी. रुपए निकालने गया तो पता चला कि अपना अस्तित्व ही खो गया. एक माह पहले लेखन पारिश्रमिक का चैक जमा करवाया था.

हम ने एक बार फिर मैनेजर को वस्तुस्थिति से परिचित करवाया. ‘‘हम कुछ नहीं कर सकते. यदि आज आप के खाते में चैक जमा कर देंगे तो कल को सचमुच का ही ‘गुप्ता’ सरनेम का ग्राहक आ गया तो हमारी नौकरी चली जाएगी. आप चैक वापस कर दीजिए,’’ उस ने कुछ नरम हो कर कहा.

देश के इस हिस्से में आ कर मैं ने पाया कि हम भारतवासी दूसरे प्रांत के लोगों से, उन की भाषा से, उन के नामों से कितने अपरिचित हैं. जो नाम अपनी जानकारी का होता है उसी को सही मानते हैं और उस से मिलताजुलता नाम हो सकता है, यह मानते ही नहीं. मेरे सरनेम को ही बारबार कहने के बावजूद लोग गलत लिखते हैं. जवाब मिलता है, ‘‘क्या फर्क पड़ता है? यह लिख दिया तो क्या गुनाह किया. आप तो वही हैं न?’’

मैं ने भी इस बात पर ज्यादा जोर नहीं दिया. वैसे भी जानपहचान का आदमी होने के कारण कभी आज जैसी समस्या नहीं आई थी. अब मैं इस शहर में आ गया. यहां के आदमी ने अपनी समझ से काम लिया और चैक खाते में जमा नहीं किया. गलती मेरी ही थी. मुझे पहले ही अपना सरनेम सही लिखने को कह देना चाहिए था. जब बिना कुछ किए काम हो रहा था तो बेकार में क्यों तकलीफ उठाई जाए, यही सोच कर चुप रहा.

आज पता चला कि घोड़े की नाल में सही समय पर कील न ठोंकने पर लड़ाई हार जाने की कहावत कितनी सही है. अगर मैं ने अब अपना सरनेम सही नहीं करवाया और लोगों को सही लिखनेबोलने पर जोर नहीं डाला तो कल गुप्ता सरनेम के किसी अपराधी की जगह पुलिस मुझे पकड़ कर ले जा सकती है. इस विचार से मैं गरमी के मौसम में पसीना पोंछतेपोंछते कांप भी गया.

सरनेम के गलत लिखे जाने का एकमात्र शिकार मैं ही नहीं हूं. मेरे एक परिचित कलैक्टर के दफ्तर के बाबू से हुई बिंदी की गलती के कारण मिलने वाली वैधानिक संपत्ति से हाथ धो बैठे. उन का सरनेम था ‘लोढ़ा’. पर बाबू ने ‘ढ’ के नीचे बिंदी न लगा कर उन्हें ‘लोढा’ लिखा. विपक्षी ने इसी का सहारा ले कर उन्हें झूठा साबित कर दिया. जरा सी बिंदी ने सही आदमी को गलत और गलत आदमी को सही साबित कर दिया.

यह आम धारणा है कि हिंदी अलग से सीखने की जरूरत नहीं है, वह तो राष्ट्रभाषा है. पर भाषा की शुद्धता भी तो आनी चाहिए. मराठी में भी एक कारकुन ने ‘कोरडे’ को ‘कोर्ड’ लिख कर उसे मराठी कायस्थ बना दिया. बेचारा सरनेम सही करवाने के लिए सरकारी दफ्तरों में रिश्वत खिलाता फिरा.

भाषा की लापरवाही से जाति का वैमनस्य बढ़ सकता है, क्योंकि महाराष्ट्र में जातिवाद सुशिक्षित लोगों में भी बहुत गहरा है. सिर्फ सवर्ण और पिछड़ी जातियां ही नहीं, ब्राह्मण और कायस्थ भी एकदूसरे को नापसंद करते हैं. सरनेम पता चलते ही शरीफ आदमी को भी किराए का मकान नहीं मिलता.

वह तो बाबू था. उस का लिखनेपढ़ने का एकमात्र उद्देश्य नौकरी पाना था. भाषाई शुद्धता से उसे कुछ नहीं करना था. लेकिन समाचारपत्र भी कम नहीं हैं, जहां पढ़ेलिखे और जागरूक लोग भरती किए जाते हैं. वे भी धड़ल्ले से नामों में गलती पर गलती किए जाते हैं. दुख की बात तो यह है कि उन्हें बारबार लिखने पर भी वे अपनी गलती नहीं स्वीकारते. इस के लिए दोष इंग्लिश के माथे मढ़ दिया जाता है. लेकिन उस से भी बड़ा दोष दूसरी भाषा की तरफ झांक कर न देखने वाले लोगों का है.

हिंदी और मराठी भाषाएं एक ही लिपि यानी देवनागरी लिपि में लिखी जाती हैं. मजाल है कि कोई हिंदी वाला मराठी अखबार उठा ले. अगर गलती से उठा भी लिया तो भाषा में फर्क नजर आते ही एकदम फेंक देगा मानो कोई गंदी चीज हाथ में आ गई हो. यही दुर्भावना मराठी लोगों में भी हिंदी के प्रति है. इसी कारण कई लोगों के नाम हास्यास्पद हो जाते हैं.

क्रिकेटर सचिन तेंडुलकर का नाम तो दुनियाभर में जानापहचाना है. लेकिन दिल्ली के अखबार और टीवी वाले बेचारे को ‘तेंदुलकर’ लिखते हैं. वह तो एहसान मानिए कि आयकर विभाग में इंग्लिश में कामकाज किया जाता है. वरना होता यह कि बेचारा सचिन अपना आयकर भरता ‘तेंडुलकर’ सरनेम से और वसूली या कुर्की का नोटिस आता ‘तेंदुलकर’ सरनेम से.

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अब क्रिकेट की बात आई ही है तो एक और उदाहरण दिया जा सकता है. गांगुली को हिंदी वाले और मराठी वाले ‘सौरव’ लिखते हैं क्योंकि इंग्लिश में वैसा ही लिखा आता है. जो लोग बांग्ला भाषा जानते हैं उन्हें मालूम है कि इस भाषा में ‘व’ शब्द नहीं है. इसीलिए तो ‘विमल’ को ‘बिमल’. ‘वरुण’ को ‘बरुण’ और ‘वर्तमान’ को ‘बर्तमान’ लिखापढ़ा जाता है. और तो और, जो लोग भाषा की जरा सी भी जानकारी रखते हैं वे इस नए शब्द ‘सौरव’ पर हैरान होंगे. शायद वे सोचते होंगे कि ‘कौरव’ की ही तरह ‘सौरव’ शब्द भी होगा. असल में सौरव नाम का कोई शब्द ही नहीं होता. सही शब्द है सौरभ. इसीलिए ‘सुमन सौरभ’ नाम की पत्रिका निकलती है, ‘सुमन सौरव’ नाम की नहीं.

बांग्ला में इंग्लिश के ‘वी’ का उच्चारण ‘भी’ होता है और उसे वैसा ही लिखा जाता है. इसीलिए बांग्लाभाषी ‘अमिताभ’ को इंग्लिश में ‘अमिताव’ और ‘शोभना नारायण’ को ‘शोवना नारायण’ लिखते हैं. अखबार वाले बिना मेहनत किए उसे इंग्लिश के हिसाब से ही लिखते हैं.

ऐसे में यदि वे इंग्लिश में लिखे ‘रामा’ को ‘रमा’ लिख कर बिना औपरेशन के लड़के को लड़की बना दें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. क्रिकेटर अजीत आगरकर को हमेशा ‘अगरकर’ लिखा जाता है. वह इसलिए कि उस का मध्य प्रदेश के आगर या ताज महल वाले आगरा से कोई संबंध नहीं है.

भारत जैसे विशाल देश में एक नाम के एक से अधिक नगर हैं. दंगों के लिए ख्यात औरंगाबाद बिहार में भी है तो सूखे के लिए प्रसिद्ध महाराष्ट्र में भी है. बेचारे अजीत को आगरा से या आगर से संबंधित न होने के कारण ‘अगरकर’ ही बना दिया गया.

हिंदी के अखबार तो इस बात पर भी एकमत नहीं हैं कि अभिनेत्री ऐश्वर्या राय का सही नाम ऐश्वर्य है या ऐश्वर्या. ‘ऐश्वर्य’ नाम तो लड़के का होता है. ठीक वैसे ही जैसे ‘दिव्य’ लड़के का होता है और ‘दिव्या’ लड़की का. ‘नक्षत्र’ लड़के का होता है और ‘नक्षत्रा’ लड़की का. ‘नयन’ लड़के का और ‘नयना’ लड़की का.

इसी तरह मद्रास के नए नाम पर भी विवाद है. यदि एक अखबार ‘चेन्नै’ लिखता है तो दूसरा ‘चेन्नई’. यही हाल मदुराई और ‘मदुरै’ का है. क्यों नहीं हम उन्हें तमिल उच्चारणों के हिसाब से लिखते?

अब पंजाब के एक रेलवे स्टेशन का नाम गुरुमुखी में लिखा है ‘बठिंडा’. लेकिन इस नाम से इसे देश में शायद ही कोई जानता हो. इसे ‘भटिंडा’ ही लिखा और बोला जाता है. ‘बठिंडा’ से ‘भटिंडा’ बनाने की तुक समझ में नहीं आती.

कुछ वर्षों पहले तक वडोदरा शहर के 4 नाम थे. हिंदी में बड़ौदा, इंग्लिश में बरोडा, मराठी में बडोदें और गुजराती में वडोदरा. अलगअलग भाषाओं में एक ही शहर के इतने नामों की तुक समझ नहीं आती. हिंदी अखबार ‘भांडारकर’ को हमेशा ‘भंडारकर’ लिख कर अपने ज्ञान के भंडार का प्रदर्शन करते हैं. ‘मालाड’ को ‘मलाड’ और ‘सातारा’ को ‘सतारा’ लिखने में इन्हें क्या मजा आता है, ये ही जानें.

दिल्ली के कई अखबार देव आनंद को ‘देवानंद’ लिख कर अपने संस्कृतबाज होने का सुबूत देते हैं जिस से स्वर संधि का उपयोग होता है. पता नहीं वे लक्ष्मी आनंद या सरस्वती आनंद को कैसे लिखते होंगे? शायद ‘लक्ष्म्यानंद’ या फिर ‘सरस्वत्यानंद’.

हिंदी के एक महान पत्रकार ने प्रभात फिल्म कंपनी की एक फिल्म ‘वहां’ का मजेदार अनुवाद किया. उस ने यह शब्द आंखें मूंद कर इंग्लिश से चुराया. इंग्लिश में लिखा था डब्ल्यूएएचएएन. उस ज्ञानी ने लगाया अपना दिमाग और उसे बना दिया ‘वहाण’ जिस का मराठी में अर्थ होता है ‘जूता’. अखबार के लेखक को भाषा के इस अति ज्ञान के बारे में बताया गया तो महाशय चुप्पी साध गए.

हिंदी में ‘गजानन’ को ‘गजानंद’ लिखने वाले भी कई मिल जाएंगे. खुद को ‘गजानंद’ लिखने वालों की भी कमी नहीं. वे इसे ‘विवेकानंद’ से जोड़ कर देखते हैं. किसी व्यक्ति के नाम को गलत लिखना लिखने वाले की नासमझी और उस व्यक्ति के प्रति असम्मान जताता है. अपनी भूल मंजूर करना और उसे फिर से न दोहराना न सिर्फ बड़े दिलदिमाग की निशानी है, बल्कि नई बात सीखने की चाह भी जाहिर करता है.

दुख की बात है कि ऐसा नहीं है.

‘‘हम जो लिखते हैं, वही सही है,’’ का दंभ रखने वालों के कारण बंगाली ‘दे’ सही सरनेम होने पर भी गलत लगने लगता है.

मराठी भी अजीब भाषा है. उस के अखबार इंग्लिश के बिना नहीं चलते. इसी कारण वे लोगों के नामों का कत्ल करते हैं. जिस तरह बच्चे नामों को बिगाड़ कर आनंद लेते हैं वही वृत्ति हिंदीमराठी में है. मराठी में मंसूर अली खां पटौदी को ‘पतौडी’ लिखते हैं. जानकार लोग जब ‘पतौडी’ पढ़तेसुनते हैं तो लगता है कि सिर पर हथौड़ी चल रही हो. उन के संवाददाता दिल्ली में बैठे हुए हैं पर उन्होंने कभी कुछ ही किलोमीटर दूर बसे गांव पटौदी की सुध नहीं ली जहां के मंसूर अली खां कभी नवाब थे.

इसी तरह भिंडरांवाले को सभी मराठी अखबार बेधड़क ‘भिन्द्रनवाले’ लिखते हैं. लाजपत राय को ‘लजपत’ लिखने में उन्हें आनंद आता है. चोपड़ा या कक्कड़ को वे कभी भी सही नहीं लिखते. वे बड़ी शान से लिखेंगे ‘चोप्रा’ या ‘कक्कर’. ‘गुड़गांव’ को वे आज तक ‘गुरगाव’ ही लिखते हैं. ऐसा नहीं कि मराठी में ‘ड़’ धवनि नहीं है. रवींद्रनाथ ठाकुर को वे बेधड़क ‘टागोर’ लिखतेबोलते हैं. जबकि मराठी में ‘ठाकूर’ सरनेम होता है.

एक अखबार ने तो पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री पर भरापूरा लेख लिखा पर हर जगह उन का नाम ‘बिधन चंद्र’ लिख कर उस लेख का महत्त्व मिट्टी में मिला दिया. इसी तरह विख्यात लेखक नीरद चौधुरी को ‘नीराद’ लिख कर उन की हंसी उड़वा दी.

पता नहीं किस झोंक में आ कर मराठी अखबारों ने सही नाम ‘ढाका’ लिखना शुरू कर दिया वरना कुछ वर्षो पहले तो वे इंग्लिश की लिपि को देवनागरी में बदल कर ‘डक्का’ लिखते थे. मराठी में आज भी ‘बरूआ’ को ‘बारूआ’ और ‘सान्याल’ को ‘सन्याल’ लिखा जाता है. कुछ समय पहले तो ‘गुवाहाटी’ को ‘गोहत्ती’ लिखा जाता था.

गुजराती लिपि में अहमदाबाद को ‘अमदाबाद’ लिखा जाता है. क्यों? इस का जवाब नहीं मालूम.

किसी जमाने में डिस्को किंग कहे जाने वाले संगीतकार बापी लाहिड़ी का नाम भी गलत लिखा जाता है. उन्हें ‘बप्पी’ या ‘बाप्पी’ लिखा करते हैं. ‘बापी’ बंगालियों में किसी का पुकारा जाने वाला नाम (डाक नाम) होता है. अंधविश्वास के कारण बापी ने अपनी स्पैलिंग में एक अतिरिक्त ‘पी’ जोड़ा है पर जनता ने इसे गलत तरीके से लिया है और वह ‘बप्पी’ या ‘बाप्पी’ लिखती है. ‘लाहिड़ी’ का ‘लहरी’ या ‘लाहिरी’ बन जाना तो इंग्लिश की मेहरबानी से हुआ है. इसे ठीक करना मुश्किल नहीं है, पर करे कौन?

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माना कि हर भाषा का अनुशासन अलग होता है, पर इस का मतलब यह तो नहीं कि नामों का मजाक उड़ाया जाए. इन विदू्रपीकरण से नफरत बढ़ती है. यह भी सही है कि यह जरूरी नहीं है कि हर आदमी सभी भाषाएं जाने. पर यह तो जरूरी है कि वह सही बोले या लिखे. यह जिम्मेदारी मीडिया पर है. और मीडिया इतना तो कर ही सकता है कि वह जनता को सही नाम बताए.

इंग्लिश का सहारा ले कर कब तक जीना चाहेंगे. इंग्लिश अखबारों तक ने ‘कानपुर’ की स्पैलिंग ‘सी’ के बजाय ‘के’ से लिखनी शुरू कर दी है. ‘गंगा’ को वे पहले की तरह ‘गैंजेस’ नहीं लिखते. ‘मथुरा’ को ‘मुथरा’ नहीं लिखा जाता. अगर इंग्लिश को ही दोष देना है तो उस में ‘मनोरंजन दास’ को ‘एंटरटेनमैंट स्लेव’ लिखना चाहिए. पर ‘रवि किरण’ को ‘सन रे’, ‘वीर सिंह’ को ‘ब्रेव लौयन’ नहीं लिखा जाता.

जब इंग्लिश मीडिया ने भारतीय नामों को स्वीकार कर लिया है तो हिंदीमराठी मीडिया को भी सही नाम लिखने में झिझक नहीं होनी चाहिए. इस के लिए मानक तय होने चाहिए ताकि उत्तर भारत के आदमी को दक्षिण भारत वाले जानवर न समझें और न ही दक्षिण भारत का कोई आदमी उत्तर भारत में अजूबे की तरह लिया जाए. लेकिन जो लोग ‘भारत’ को ‘इंडिया’ बना कर अपनी गरदन ऊंची कर सकते हैं उन से यह उम्मीद नहीं की जा सकती.

कैसे बचें फंगल इंफेक्शन से, जानें यहां

बारिश का मौसम आते ही सबके चेहरें पर रौनक आ जाती है. रिमझिम-रिंमझिम बारिश सुहावनें मौसम के साथ त्वचा संबंधी कई बीमारियां भी साथ लेकर आती है. मानसून में त्वचा से जुड़ी कई समस्या जैसे फंगल इंफेक्शन, खुजली, मुंहासे या त्वचा का अधिक तैलीय हो जाना, जैसी समस्या त्वचा को बहुत अधिक प्रभावित होती है. लेकिन इन सबसे ज्यादा बैक्टीरियल और फंगल संक्रमण त्वचा के लिए परेशानी का सबब बनता है, अगर इनपर समय रहते ध्यान ना दिया जाए तो ये गम्भीर समस्या का रूप ले सकती है.

बारिश के कारण वातावरण में नमी बढ़ने से होती है समस्या

बारिश के आने से वातावरण में नमी बढ़ जाती है. नमी के कारण हमारी त्वचा में चिपचिपाहट और पसीनें जैसी समस्या होती है. जिससे स्किन तैलीय हो जाती है. जिससे बालों और स्किन में त्वचा संबंधी रोग होते है. जून, जुलाई और अगस्त के समय में यह समस्या काफी बढ़ जाती है.

ये लक्षण दिखतें ही हो जाए अलर्ट

सिर के फंगल इंफेक्शन होते है अलग

सिर के स्कैल्प में होने वाले इंफेक्शन के लक्षण सामान्य त्वचा में होने वाले इंफेक्शन से अलग होते है. सामान्यतौर पर स्कैल्प पर छोटे-छोटे फोड़े हो जाना, दानों या चिपचिपी परत का होने जैसै लक्षण दिखाई देता है. अगर किसी व्यक्ति को इनमें से कोई लक्षण नजर आए तो उसे फौरन विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए. ऐसा ना करने पर बाल झड़ने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है.

त्वचा के फंगल इंफेक्शन होते है अलग

त्वचा पर होने वाले फंगल इंफेक्शन सिर में होने वाले इंफेकशन से अलग होता है. लाल चकत्ते होना, मुहांसे का निकल आना, उंगलियों के बीच स्कीन का नम होके स्किन की परत निकला जैसी परेशानियां बहुत अधिक तेजी से फैलती है.

कैसे बचें इस समस्या से

सबसे पहले तो इस समस्या से बचने के लिए खुद को ड्राई रखना जरूरी है. एंटी बैक्टीरियल साबुन का इस्तेमाल करना स्किन के लिए और बेहतर है. साथ ही साफ और धूले कपड़े पहनें. गीले कपड़ो का ना पहने. इससे फंगल इंफेक्शन से बचाव में मदद मिलेगी.

क्या करें उपाय

एलोवेरा जैल

एलोवेरा जैल यूं तो स्किन के लिए बहुत फायदेमंद होता ही है. लेकिन फंगल इंफेक्शन में एलोवेरा जैल का इस्तेमाल इंफेक्शन को दूर करने के साथ-साथ रैशेज, खुजली और जलन जैसी परेशानियों से भी बचाती है. इसके लिए एलोवेरा जैल को स्किन पर लगाकर 30 मिनट तक छोड़ दें, फिर गुनगुने पानी से धो लें.

नीम की पत्तीयां

एलोवेरा जैल की तरह ही नीम की पत्तीयां भी स्किन के लिए राम बाण की तरह है. नीम में निन्बिडोल और गेडूनिन को गुण होते है जो एंटी-फंगल होते है. इससे फंगल को खत्म में बहुत मदद मिलती है. नीम की पत्तीयों को पेस्ट बना लें और इसमें थोड़ा नींबू का रस और हल्दी मिला लें. इस पेस्ट को फंगल इंफेक्शन हुए जगह पर लगाए और बीस-तीस मिनट के बाद पानी से धो लें, ऐसा इंफेक्शन ठीक ना होने तक रोजाना करें.

यूं मुस्कुराएगी आपकी शादीशुदा जिंदगी

अगर आपकी शादीशुदा जिंदगी बोरिंग हो गयी है और कुछ नयापन नहीं है. आप हमेशा मायूश रहते हैं. ऐसे में आप सोचते हैं काश! आप अपनी जिंदगी को हसीन बना सकते तो देर किस बात की, आपको कुछ टिप्स बताते हैं, जिससे आप शादीशुदा जिंदगी को खूबसूरत बना सकते हैं.

 वक्त निकालें

व्यस्त दिनचर्या के चलते आपको एक दूसरे के लिए वक्त निकालना पड़ेगा. सुबह जल्दी उठकर या दफ्तर से जाने के बाद, भोजन करने के बाद शाम का समय साथ में टहलने के लिए निकालें. साथ समय बिताने का मौका भी मिल जाएगा और सैर भी हो जाएगी.

यादों की गठरी खोलें

शादी का एल्बम निकालकर साथ में देख सकते हैं. उन खूबसूरत लम्हों को एक बार फिर साथ जी लिया जाए. उन बातों को याद किया जिनकी वजह से मजबूत हुआ था आपका रिश्ता.

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काम में बंटाएं हाथ

रसोई सिर्फ आपकी पत्नी की ही जिम्मेएदारी नहीं है. क्यों नहीं आप दोनों वहां मिलकर काम करते. कभी-कभी तो उनके कामों में मदद कर ही सकते हैं. और अगर छुट्टी के दिन उन्हें सरप्राइज करने के लिए खुद ही खाना पकाएं तो बात ही क्या.

मजाक नहीं तो मिठास ही सही

अगर आप मजाकिया नहीं हैं, तो कोशिश करें कि अपने व्यवहार में मिठास लाएं और प्रैक्टिकल जोक का इस्तेमाल करें. मजाक ऐसा होना चाहिए जिससे आपका पार्टनर नाराज ना हो और ना उसे कोई बात बुरी लगें. मजाक ऐसा होना चाहिए जिसका अहसास सुखद हो.

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मुमकिन है ब्रेनवाश!

किसी व्यक्ति या विचारधारा का अनुयायी हो जाना कोई अपराध नहीं है, लेकिन जनून में आ कर उसे सच साबित करने की जिद जरूर नुकसानदेह है. ब्रेनवाश कर के कैसे राजनेता और धर्मगुरु अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं, यह सोचने वाली बात है.

यह वाकेआ 22 अप्रैल का है.भोपाल लोकसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार दिग्विजय सिंह ईंटखेड़ी में सभा कर रहे थे. अपने भाषण के दौरान दिग्विजय सिंह ने मौजूद जनता से पूछा कि यहां ऐसा कोई है जिस के खाते में 15 लाख रुपए आए हों. उम्मीद के मुताबिक मंच के नीचे जमा भीड़ से नहीं…नहीं की आवाजें आईं, लेकिन सभी को चौंकाते एक युवक खड़ा हो कर बोला कि हां, मेरे खाते में 15 लाख रुपए आए हैं.

दिग्विजय सिंह ने उस युवक को मंच पर बुला कर कहा कि जनता को बता भाई कि तेरा अकाउंट नंबर क्या है जिस में 15 लाख रुपए आ गए हैं. माइक हाथ में आते ही युवक ने जो जवाब दिया वह हैरान कर देने के साथ चौंका देने वाला था कि, मोदी ने एयर स्ट्राइक कर आतंकियों को मारा, अपने तो 15 लाख वसूल हो गए. इतना सुनना था कि कांग्रेसियों ने उसे मंच से उतार दिया.

इस युवक का नाम अमित माली था जो भोपाल के एक कालेज से बीकौम कर रहा है. हालांकि इस युवक ने कोई नई बात नहीं कही थी क्योंकि सोशल मीडिया पर लाखों मोदीभक्त वही कह रहे थे जो अमित ने कांग्रेसी मंच से कहा.

इस दिलचस्प घटना से एक बात जरूर साबित हुई थी कि ब्रेनवाश्ंिग मुमकिन है और नरेंद्र मोदी ने 5 वर्षों में कुछ किया हो या न किया हो लेकिन ऐसे लाखों लोगों की फौज जरूर तैयार कर ली है जो उन के हर सहीगलत फैसले पर बिना सोचेसमझे या तर्क किए उन की हां में हां मिलाती रही. मामला चाहे नोटबंदी का हो, जीएसटी लागू करने का रहा हो या फिर दलितमुसलिम पर अत्याचारों का, मोदी के भक्तों की फौज इन में भी उन की दूरदर्शिता और देश की भलाई देखती रही थी.

होती है ब्रेन वाशिंग

राजनीतिक ब्रेन वाशिंग का यह मामला बताता है कि ब्रेन वाशिंग मुमकिन है. इस के लिए जरूरी है कि आप बारबार एक बात को तरहतरह से दोहराते लोगों को बताते रहें कि जो भी हुआ वह सब के भले का था, इसलिए जरूरी भी था. अमित भी इस भ्रम या गलतफहमी का शिकार हो चला था कि अगर कथित एयर स्ट्राइक नहीं होती तो देश बरबाद हो गया होता और आतंकी विशालकाय और शक्तिशाली भारतीय सेना को धता बताते हुए देश में तबाही मचा चुके होते. उस की नजर में यह काम नरेंद्र मोदी के अलावा कोई और नहीं कर सकता था.

ऐसा लाखों मोदीभक्तों का मानना था कि 15 लाख रुपए देने का वादा भले ही नरेंद्र मोदी पूरा न कर पाए हों लेकिन कथित एयर स्ट्राइक होने से उन्हें वादे के मुताबिक पैसे न मिलने का कोई मलाल नहीं. ये वे लोग हैं जो नरेंद्र मोदी को भगवान और अवतार मानते हैं.

ब्रेनवाश्ंिग कोई नई चीज नहीं है. राजनीति से परे देखें तो दुनियाभर के आतंकी संगठन, नक्सली, धर्मगुरु और विभिन्न संप्रदायों व मठों के मठाधीश दरअसल आम लोगों की ब्रेनवाश्ंिग कर ही पैसा कमा कर अपनी दुकान चलाते रहे हैं. इस में कोई शक नहीं कि इस के लिए वे खासी मशक्कत करते हैं और झूठ को सच की पोशाक पहनाने का माद्दा भी रखते हैं. मनोविज्ञान की भाषा में ब्रेनवाश करने वाले को एजेंट और इस का शिकार होने वाले को टारगेट कहते हैं.

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ब्रेनवाश्ंिग को मनोवैज्ञानिक व सामाजिक दायरे के प्रभाव में रखा जाता है. लेकिन हकीकत में इस का संबंध धर्म संप्रदाय, आतंक और विशेष विचारधारा से ज्यादा है जिस के लिए देखा यह जाता है कि किसी भी व्यक्ति की मानसिकता कैसे बदली जा सकती है. इस के लिए उसे तरहतरह से बहलायाफुसलाया जाता है और अज्ञात खतरों से भी रूबरू कराया जाता है जिन का दरअसल कोई वजूद होता ही नहीं.

सोशल मीडिया के इस युग में ब्रेनवाश्ंिग करने का काम पहले के मुकाबले अब ज्यादा आसान हो गया है. कुख्यात आतंकी संगठन आईएसआईएस के बारे में तो कई बार उजागर हो चुका है कि उस की कुछ इकाइयां पहले सोशल साइट्स पर लोगों से दोस्ती गांठ कर यह आकलन या सर्वे करती हैं कि किन लोगों में दहशतगर्दी को ले कर उन से सहानुभूति या सहमति है, फिर ऐसे लोगों को छांट कर उन का ब्रेनवाश चरणबद्ध तरीके से किया जाता है. आतंकियों का मकसद क्या है, यह बात किसी से छिपी नहीं है कि वे अपनी दुकान अधिक से अधिक लोगों को ग्राहक बना कर ही चला सकते हैं.

नक्सली अभियान भी दरअसल ब्रेनवाश्ंिग की बुनियाद पर ही फलफूल रहा है. आदिवासियों की ब्रेनवाश्ंिग करने के लिए नक्सली तमाम तरह के हथकंडे अपनाते हैं ताकि उन की मुहिम परवान चढ़ती रहे. इस से किस का कितना नुकसान होता है और नतीजे उन के हक में निकलेंगे या नहीं, इस से कोई सरोकार वे नहीं रखते.

धर्मगुरु भी पीछे नहीं

हम में से हरेक के आसपास एक नहीं बल्कि कई लोग ऐसे मिल जाएंगे जो किसी धर्मगुरु या संप्रदाय के अनुयायी होते हैं. इन का भी मानना यही होता है कि धर्म और दुनिया खतरे में है जिस से उन का धर्मगुरु ही नजात दिला सकता है.

मौजूदा दौर में आसाराम, रामरहीम और निर्मल बाबा जैसे हजारों गुरुओं ने करोड़ोंअरबों की दौलत और जायदाद बनाई है. इस पर भी हैरत की बात यह है कि इन के व्यभिचारी, ठग और अपराधी साबित होने के बाद भी कई भक्तों का यह भ्रम नहीं टूट रहा कि उन के गुरु पर लगे आरोप मिथ्या हैं. उन का मानना है कि एक दिन दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा. अपनी विद्या और ईश्वरीय पहुंच के चलते ये लोग जीतेंगे और उन पर आरोप लगाने वालों को कोढ़ होगा क्योंकि उन्होेंने पाप किया है.

इन भक्तों की बातचीत से ऐसा लगता है कि इन के सोचनेसमझने की ताकत एक दायरे में समेट कर रख दी गई है. इन्हें गुरु के हर क्रियाकलाप यहां तक कि हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में भी उन की लीला नजर आती है.

ऐसे धर्मगुरुओं की भी भरमार है जिन्होंने संप्रदाय चला रखे हैं. लोगों का ब्रेनवाश करने के लिए वे तरहतरह के लुभावने प्रवचन देते हैं, किताबें छपवा कर बेचते हैं, सीडी बेचते हैं और भक्तों का भ्रम टूटे नहीं, इस के लिए सालभर में 3-4 बड़े भव्य हवन के आयोजन भी शिविर लगा कर करते हैं. इस के पीछे उन का मकसद भक्तों के ब्रेनवाश का नवीनीकरण ही होता है. संस्कार शिविर इस प्रक्रिया का पहला चरण होता है जिस में किशोरों का ब्रेनवाश किया जाता है जो अपेक्षाकृत आसान काम है, क्योंकि वे सौफ्ट टारगेट होते हैं.

कैसे होता है ब्रेनवाश

ब्रेनवाश करने के लिए एक चरणबद्ध प्रक्रिया अपनाई जाती है जिस में लोगों की कमजोरियों का इफरात से फायदा उठाया जाता है. लेकिन इस के पहले उन्हें डराया और बहलायाफुसलाया जाता है, मसलन इस काम में तुम्हारा फायदा है, इस की तुम्हें जरूरत है और हम ही तुम्हें आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक सुरक्षा दे सकते हैं.

सार रूप में देखें तो ब्रेनवाश की प्रक्रिया इस बात पर आधारित है कि कैसे लोगों के विचार, धारणाएं और मान्यताओं सहित उन का विश्वास बदल कर उन्हें अपने से सहमत किया जाए. यह ठीक किसी इश्तिहार के व्यापक प्रचारप्रसार जैसा है, मसलन आप फलां साबुन से नहाएंगे तो ही ज्यादा साफसुथरे, सुगंधित और स्वच्छ रह सकेंगे क्योंकि दूसरे साबुनों में ये गुण नहीं हैं.

जब लोग इन से सहमत हो जाते हैं तो उन के दिमाग में ये लोेग अपने विचार थोपते हैं और विचारों की जड़ें जमाने के लिए तरहतरह से खादपानी देते रहते हैं. देखते ही देखते यह पौधा बड़ा पेड़ बन जाता है और आदमी उन के सिवा कुछ और नहीं सोच पाता.

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बुद्धि पलटना, पट्टी पढ़ाना, मति भ्रष्ट कर देना जैसे शब्द और मुहावरे दरअसल ब्रेनवाश्ंिग के पर्याय ही हैं.

कौन होते हैं शिकार

यह जरूरी नहीं कि अनपढ़, अशिक्षित या गंवार ही ब्रेनवाश्ंिग के शिकार होते हों, बल्कि बुद्धिजीवी, शिक्षित, सभ्य और आधुनिक कहे जाने वाले लोग भी ब्रेनवाश्ंिग के शिकार होते हैं. ढेरों धार्मिक संप्रदायों के अनुयायी धर्मग्रंथों के मामले में लकीर के फकीर हैं. ये लोग मानते हैं कि उन का गुरु किसी स्वार्थ या लालच से नहीं, बल्कि कल्याण के लिए पैदा या अवतरित हुआ है और ऊपर वाले से उस का सीधा कनैक्शन है.

अधिकतर लोगों की इच्छा परेशानियों से छुटकारा पाने और मोक्ष की होती है और उन का गुरु यह भरोसा उन्हें दिला देता है कि वही उन्हें मोक्ष दिला सकता है, दुख दूर कर सकता है यानी उन का गुरुशिष्य का रिश्ता इस जन्म का नहीं बल्कि कई जन्मों से चला आ रहा है. लोग झांसे में आ कर उन के नाम की माला जपने लगते हैं, तावीज लटका लेते हैं और घर में सुबहशाम उन की तसवीर का पूजापाठ भी करते हैं.

यहां यह बात भी कम दिलचस्प नहीं है कि आमतौर पर जरूरी नहीं कि एक धार्मिक व्यक्ति ब्रेनवाश्ंिग की गिरफ्त में रहे. वह अंधविश्वासी और रूढि़वादी हो सकता है. लेकिन जो किसी का अनुयायी और अंधभक्त बन गया वह जरूर ब्रेनवाश्ंिग का शिकार हो गया माना जा सकता जाता है.

निश्चितरूप से मानसिक और वैचारिक रूप से कमजोर लोग ही ब्रेनवाश्ंिग का शिकार ज्यादा होते हैं. इन में से कितने शिक्षित और कितने अशिक्षित होते हैं, यह बात खास माने नहीं रखती.

भोपाल में दिग्विजय सिंह की सभा से अमित माली नाम के युवा ने जो कहा वह सम्मोहन नहीं था, बल्कि ब्रेनवाश्ंिग का एक सियासी सैंपल था जिस में वह नरेंद्र मोदी को गलत तरीके से सही साबित करने पर तुला हुआ था. 15 लाख रुपए की बात को भुला कर वह बात सर्जिकल स्ट्राइक पर ले गया जिस से नरेंद्र मोदी की बदनामी न हो, उन का झूठ उजागर न हो. चिंता की बात तो यह है कि जब ऐसे लोगों का भ्रम टूटता है तो वे कहीं के नहीं रह पाते. उन की हालत प्यार में धोखा खाए आशिक सरीखी हो जाती है, जो फिर किसी से प्यार नहीं कर पाता. द्य

खुद अपनी ही ब्रेनवाशिंग

फिल्म ‘ओमेर्टा’ में अभिनेता राजकुमार राव एक आतंकवादी सईद शेख की भूमिका में दिखाई दिए. राजकुमार राव ने अपने किरदार में जान डालने के लिए कई आतंकवादी संगठनों के बारे में साहित्य पढ़ा, गुस्से और नफरत से भरे आतंकवादियों के भाषण सुने. उन्होंने आतंकवाद से संबंधित कई वीडियो भी देखे, जो दिल दहला देने वाले थे.

बकौल राजकुमार राव, इन सब का असर उन्हें उन की असल जिंदगी में भी देखने को मिला. इत्तफाक से पैरिस हमले के दौरान ‘ओमेर्टा’ फिल्म की वहां शूटिंग चल रही थी. इस पर उन्होंने मन ही मन कहा, ‘बहुत अच्छा’. लेकिन अगले ही क्षण वे वास्तविकता में लौट आए. इस अनुभव के बाद उन्हें महसूस हुआ कि टारगेट का ब्रेनवाश बेहद सुनियोजित तरीके और मजबूती से किया जाता है या होता है.

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विवादों में इस्कौन

ब्रेनवाश के अधिकतर टारगेट युवा ही होते हैं. युवाओं के संन्यास का ब्रेनवाश से गहरा ताल्लुक आएदिन उजागर होता रहता है. ब्रेनवाश हालांकि कानूनन अपराध नहीं है लेकिन बहलाफुसला कर युवाओं को संन्यास की राह पर ले जाने के लिए उकसाना जरूर अपराध के दायरे में आ सकता है.

ऐसा ही एक दिलचस्प मामला अक्तूबर 2018 को देखने में आया था जब अहमदाबाद के भाडज स्थित इस्कौन के हरेराम, हरेकृष्ण मंदिर पर 27 वर्षीय प्रशांत सिंह के परिवारजनों ने आरोप लगाया था कि प्रशांत को आध्यात्म की आड़ में बहलाफुसला कर संन्यास के लिए प्रेरित किया जा रहा है. उन के मुताबिक, इस मंदिर से उसे बारबार बुलावा आता है. मूलरूप से झारखंड का रहने वाला प्रशांत पढ़ाई के लिए अहमदाबाद आया था लेकिन वहां वह इस्कौन के चक्कर में कुछ इस तरह पड़ा कि उस का मन पढ़ाई से उचटने लगा.

प्रशांत के परिवारजनों का आरोप है कि उस का ब्रेनवाश कर उसे घर, परिवार और दुनिया से दूर किया जा रहा है. उसे किसी त्योहार पर घर नहीं आने दिया जाता. इस से वह दुनिया से विरक्तहो कर इस तरफ मुड़ रहा है. इस मामले में दिलचस्प बात प्रशांत की बहन प्रीति का यह आरोप भी है कि इस्कौन के संतों के जरिए उस का भी ब्रेनवाश करने की कोशिश की गई थी, लेकिन वह झांसे में नहीं आई.

बकौल प्रीति, मंदिर मेें रह रहे प्रशांत को अकेले में घरवालों से नहीं मिलने दिया जाता. इस के पहले भी इस्कौन पर युवाओं का ब्रेनवाश कर उन्हें संन्यासी बनाने के आरोप लग चुके हैं.

प्रशांत के परिवारजनों की तरह अक्तूबर 2018 में ही दिशांत और धर्मेश नाम के युवकों के घरवालों ने भी इसी तरह के आरोप लगा कर अपने बच्चों को छुड़ाने की गुहार लगाई थी.

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