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कोठे से वापसी

लेखक- मुहम्मद तनवीर कादरी

उस कोठे पर जो भी आता, शमा उस से यही उम्मीद लगाए रखती कि वह उस की मदद करेगा और उसे वहां से निकाल कर ले जाएगा. मगर कोई उस की फिक्र नहीं करता था और अपना मतलब निकाल कर चला जाता था.

एक दिन शमा की कोठेदारनी चंद्रा को उस के भाग निकलने की योजना का पता चल गया.

‘‘अगर तू ने यहां से निकल भागने की कोशिश की, तो मैं तुझे काट डालूंगी. अरी, एक बार जो धंधे वाली बन जाती है, उसे तो उस के घर वाले भी वापस नहीं लेते हैं,’’ चंद्रा ने गुस्से में उबलते हुए कहा.

शमा के कमरे से थोड़ी दूरी पर एक पान की दुकान थी. वह उस दुकान पर अकसर जाती थी.

एक दिन शमा ने पान वाले से कहा, ‘‘भैया, आप ही मुझे यहां से निकलवा दीजिए. मैं तवायफ नहीं हूं, मजबूरी में फंस कर यह सब…’’

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पान वाले ने कहा, ‘‘मेरी इतनी ताकत नहीं है कि मैं तुम्हें यहां से निकलवा सकूं. हां, मेरे पास कमल और आरिफ आते हैं, वे तुम्हारी मदद जरूर कर सकते हैं.’’

शमा ने जब आरिफ और कमल का नाम सुना, तो उसे कुछ उम्मीद नजर आई. अब उस की आंखें हर पल आरिफ और कमल का इंतजार करने लगीं.

एक शाम को आरिफ और कमल पान की दुकान पर आए, तो शमा भी दुकान पर पहुंच गई.

शमा बगैर किसी हिचक के उन से फरियाद करने लगी, ‘‘भैया, मैं तवायफ नहीं हूं. मैं यहां से निकलना चाहती हूं. आप ही मुझ बेसहारा, मजबूर लड़की की मदद कर सकते हैं. मैं आप के पास बहुत उम्मीद ले कर आई हूं.’’

‘‘हम इस बारे में सोच कर बताएंगे,’’ कमल ने शमा को तसल्ली देते हुए कहा.

वहां से लौट कर उन दोनों ने आपस में बातचीत की और एक योजना बनाई. फिर कमल ने कोठे के एक दलाल से शमा को एक रात के लिए अपने पास रखने की बात की.

दलाल ने जितनी रकम बताई, कमल ने फौरन अदा कर दी और उसे जगह बता दी.

वह आदमी उस महल्ले का काफी पुराना और भरोसेमंद दलाल था. हर कोठेदारनी उस पर भरोसा कर के उस के साथ लड़कियों को महल्ले से बाहर भेज देती थी.

चंद्रा भी इनकार न कर सकी और रकम रखते हुए बोली, ‘‘तड़के ही शमा को वापस ले आना.’’

‘‘ठीक है,’’ दलाल ने अपनी मोटी गरदन हिलाते हुए कहा.

रात को वादे के मुताबिक वह दलाल शमा को ले कर कमल के बताए पते पर पहुंच गया.

शमा ने जब वहां आरिफ और कमल को देखा, तो वह अपने बुलाए जाने का मकसद समझ गई और मन ही मन खुश हो गई.

शमा को वहां छोड़ कर जब वह दलाल चला गया, तब आरिफ और कमल ने उस से अपने बारे में सबकुछ बताने को कहा.

शमा ने आराम से बैठते हुए बोलना शुरू किया, ‘‘साहब, मैं पश्चिम बंगाल की रहने वाली हूं. वहां मेरे पिता का अच्छा कारोबार है. मेरे 3 भाई और एक बहन है. भाइयों के भी अच्छे कारोबार हैं. बहन की शादी हो चुकी है.

‘‘कुछ महीने पहले हमारे घर में शीला नाम की एक औरत किराए पर रहने आई थी. कुछ ही दिनों में वह हमारे परिवार से घुलमिल गई थी. हम सब बच्चे उसे आंटी कह कर बुलाते थे.

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‘‘एक शाम को मैं स्कूल से आ रही थी. एक सुनसान जगह पर एक गाड़ी आ कर मेरे पास रुकी. कुछ गुंडों ने मुझे उस गाड़ी के अंदर खींच लिया. इस से पहले कि मैं कुछ बोल पाती, मेरे मुंह पर कपड़ा बांध दिया गया. इस के बाद मैं बेहोश हो गई.

‘‘जब मुझे होश आया, तो मैं ने वहां शीला आंटी को देखा. उसे देख कर मैं हैरान रह गई.

‘‘मुझे यह समझते देर न लगी कि इसी औरत ने मुझे अगवा कराया है. रात को शीला और उस के एक साथी ने मुझे जिस्मफरोशी के लिए मजबूर किया.

‘‘अगर मैं उन की किसी बात से इनकार करती थी, तो वे चाकू से मेरे जिस्म को हलका सा काट कर उस में मिर्च भर देते थे, ताकि मैं इस धंधे में उतर आऊं.

‘‘साहब, वहां मेरी चीखें सुनने वाला भी कोई नहीं था. वे मुझे बहुत मारते थे,’’ कहतेकहते शमा रो पड़ी.

शमा की दर्दभरी कहानी सुन कर कमल और आरिफ ने उस की हिम्मत की दाद दी.

‘‘शमा, हम तुम्हारी पूरी मदद करेंगे, लेकिन तुम इस राज को अपने तक ही रखना,’’ आरिफ ने कहा.

सुबह होते ही वह दलाल वहां आ गया और शमा को ले गया.

कमल और आरिफ कुछ लोगों की मदद से एक पुलिस अफसर से मिले और उन को शमा के बारे में पूरी जानकारी दी.

उन की बातें सुन कर पुलिस अफसर ने कहा, ‘‘ठीक है, हम छापा मार कर लड़की को वहां से निकालते हैं.’’

पुलिस कोठे पर छापा मार कर शमा के साथ चंद्रा और कई दलालों को पकड़ लाई.

थाने में आ कर पुलिस अफसर ने शमा से पूछताछ शुरू की.

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इस पर शमा ने पुलिस अफसर को जो बताया, उसे सुन कर आरिफ और कमल के होश उड़ गए. उस ने बयान दिया, ‘‘साहब, मैं एक तवायफ हूं और अपने मरजी से यह धंधा करती हूं.’’

शमा का बयान सुनने के बाद पुलिस अफसर ने कमल और आरिफ को डांटते हुए कहा कि दोबारा इस तरह पुलिस को परेशान करने की कोशिश की, तो बहुत बुरा होगा. उन्होंने शमा को चंद्रा के साथ भेज दिया.

कई दिन बाद कमल जब उसी गली से गुजर रहा था, तब शमा उसे रोक कर रोने लगी. वह बोली, ‘‘चंद्रा को हमारी योजना पता लग गई थी. उस ने अपने कुछ आदमियों से मुझे बहुत पिटवाया था, इसलिए मैं डर गई थी. लेकिन साहब, मैं अब भी यहां से किसी भी तरह निकलना चाहती हूं.’’

‘‘मैं तुम्हें एक मौका और दूंगा. अगर निकल सकती हो, तो निकल जाना, वरना जिंदगीभर यहीं जिस्मफरोशी करती रहना,’’ कमल ने गुस्से में कहा.

‘‘इस बार आप जैसा कहेंगे, मैं

वैसा ही करूंगी,’’ शमा ने हाथ जोड़ते हुए कहा.

जब कमल ने आरिफ से कहा, तो वह बोला, ‘‘कमल, हमें यह काम अब अकेले नहीं करना चाहिए. हमें अपने कुछ और दोस्तों की मदद लेनी चाहिए. मामला कुछ पेचीदा नजर आ रहा है.’’

कमल और आरिफ अपने एक दोस्त असद खां से मिले. असद खां का उस इलाके में काफी दबदबा था. वह जब उस गली से गुजरता था, तो सारी तवायफें उस के खौफ से अपने दरवाजे बंद कर लेती थीं.

कमल ने असद खां को शमा के बारे में बताया. उस की सारी बातें सुन कर वह भी संजीदा हो गया और बोला, ‘‘पहले मैं उस लड़की से बात करूंगा, उस के बाद कोई फैसला लूंगा.’’

अगले दिन असद खां अपने कुछ साथियों के साथ उस कोठे पर पहुंच गया.

असद खां को देखते ही महल्ले में भगदड़ सी मच गई. सारी तवायफें अपनेअपने कोठे के दरवाजे बंद करने लगीं.

असद खां ने शमा का कमरा खुलवाया. शमा ने उसे बैठने को कहा, लेकिन असद खां ने रोबीली आवाज में कहा, ‘‘मैं यहां बैठने नहीं आया हूं. मुझे कमल ने भेजा है.’’

असद खां के मुंह से कमल का नाम सुनते ही शमा सबकुछ समझ गई.

‘‘क्या तुम यहां से जाना चाहती हो?’’ असद खां ने उस से पूछा.

‘‘हां, मैं यहां से निकलना चाहती हूं, लेकिन आप लोगों ने देर कर दी, तो मुझे 1-2 दिन में कहीं दूर भेज दिया जाएगा,’’ शमा ने रोते हुए कहा.

‘‘मैं तुम्हें यहां से निकाल दूंगा, मगर याद रखना कि इस बार तुम पुलिस के सामने अपना बयान मत बदलना. अगर तुम ने ऐसा किया, तो मैं तुम्हें पुलिस थाने में ही गोली मार दूंगा,’’ असद खां ने कहा.

‘‘मैं थाने नहीं जाऊंगी. मुझे पुलिस से डर लगता है,’’ शमा ने सिसकते हुए कहा.

‘‘अच्छा, मैं तुम्हें थाने नहीं ले जाऊंगा. लेकिन तुम्हें अदालत में बयान देना होगा.’’

शमा ने ‘हां’ में अपना सिर हिला दिया.

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‘‘देखो लड़की, मैं तुम्हें इस कोठे से खुलेआम निकाल कर ले जाऊंगा. किसी माई के लाल में इतनी हिम्मत नहीं, जो मुझे रोक सके,’’ असद खां ने आंखें फाड़ते हुए कहा.

असद खां की बातों से शमा को यकीन हो गया कि वह उसे यहां से जरूर निकाल ले जाएगा.

असद खां जब शमा का हाथ पकड़ कर कमरे से बाहर ले आया, तो पूरे कोठे में सन्नाटा छा गया. किसी बदमाश या दलाल की उस से बात करने की हिम्मत न हो सकी.

असद खां शमा को एक वकील के साथ अदालत में ले गया.

शमा मजिस्ट्रेट के सामने फूटफूट कर रोने लगी. उस ने उन्हें अपनी सारी कहानी सुना दी और अपने जिस्म के जख्मों के निशान भी दिखाए.

शमा की दर्दभरी कहानी सुन कर मजिस्ट्रेट ने फौरन पुलिस को हुक्म दिया कि चंद्रा और उन लोगों को गिरफ्तार किया जाए, जिन्होंने इस लड़की पर जुल्म किया है.

मजिस्ट्रेट के हुक्म पर पुलिस ने फौरन गिरफ्तारी शुरू कर दी. बाद मैं मजिस्ट्रेट ने हुक्म दिया कि पुलिस की निगरानी में शमा को उस के घर भेज दिया जाए.

कुछ दिनों के बाद शमा को हिफाजत के साथ उस के घर भेज दिया गया.

शीला दीक्षित : कुछ कही कुछ अनकही बातें

लगातार 3 बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं और राजधानी को आधुनिक रूप देने वाली वरिष्ठ कांग्रेसी नेता शीला दीक्षित की पहचान निडर महिला व कुशल राजनीतिज्ञ के रूप में होता था. अंतिम समय तक राजनीति में सक्रिय रहीं शीला की मौत की खबर मीडिया में आया तो लोगों को सहसा यकीन ही नहीं हुआ कि वे अब नहीं रहीं.

उन के निधन के बाद जब उन का पार्थिव शरीर निजामुद्दीन स्थित उन के आवास से पार्टी मुख्यालय लाया गया तो उन की आखिरी झलक पाने के लिए लोग बेताब हो उठे.

कांच के ताबूत में उन का पार्थिव शरीर ले कर आ रहा ट्रक सड़क पर धीरेधीरे आगे बढ़ रहा था और ‘जब तक सूरज चांद रहेगा शीला जी का नाम रहेगा’ के नारों से आसमान गूंज उठा था.

क्या पक्ष और क्या विपक्ष, शीला की मौत पर हर राजनीतिक पार्टी के नेताओं की आंखें नम थीं.

कांग्रेस नेता सोनिया गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, अहमद पटेल और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तथा कमलनाथ समेत कई शीर्ष कांग्रेस नेता, भाजपा के वरिष्ठ नेता एलके आडवाणी और पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सहित कई लोगों ने शीला दीक्षित को श्रद्धांजलि दी तो यह महज एक औपचारिकता नहीं थी, दरअसल शीला आम से खास लोगों के दिलों में रहती थीं.

निधन की खबर सुन कर दुख हुआ- सुषमा स्वराज

भाजपा की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज ने कहा, “शीला दीक्षित जी के अचानक निधन की खबर सुन कर दुख हुआ. हम राजनीति में प्रतिद्वंद्वी थे लेकिन निजी जिंदगी में हम दोस्त थे. वह बेहतर इंसान थीं.”

भाजपा के 1998 में सत्ता से बाहर होने के बाद स्वराज की जगह दीक्षित ने ली थी.

काम करने और करवाने में माहिर थीं शीला

दिल्ली प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता पुष्पेंद्र श्रीवास्तव कहते हैं,”शीलाजी खानेपीने की शौकीन थीं, हालांकि हार्ट की बीमारी के बाद वे डाक्टर के निर्देशानुसार खातीपीती थीं. मगर जब भी मिलती थीं उन के चेहरे पर गजब का आत्मविश्वास दिखता था.”

एक वाकेआ का जिक्र करते हुए पुष्पेंद्र श्रीवास्तव ने बताया कि कैसे वे बङेबङे नेताओं से अपना काम निकलवा कर दिल्ली की भलाई में आगे रहती थीं.

एक संस्मरण बताते हुए वे कहते हैं,”बात तब की है जब एनडीए की सरकार थी और अटल बिहारी वाजपेयी तत्कालीन प्रधानमंत्री थे. एक बार दिल्ली की किसी बङे प्रोजेक्ट को ले कर काम की शुरूआत करानी थी. इस के लिए केंद्र की मंजूरी चाहिए थी. तब शीला दीक्षित ने तत्कालीन दिल्ली सरकार में मंत्री हारून युसुफ के साथ बाजपेयी से मिलने का प्रोग्राम बनाया. वे प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंचे तो वाजपेयी को प्रोजेक्ट के बारे में बताया.

बाजपेयी ने कहा कि प्रोजेक्ट तो अच्छा है लेकिन…

“उन के इतना कहते ही शीला ने छूटते ही कहा कि बाजपेयीजी, आप भी तो दिल्ली में रहते हैं. क्या आप नहीं चाहेंगे कि दिल्ली में यह काम हो?

“इस पर बाजपेयीजी जोर से हंसे और बोले कि शीला, आप कितनी सादगी से अपना काम निकलवाना जानती हो. हम जनता के कामों के लिए ही यहां हैं और कोई भी काम कभी रूकने नहीं पाएगा.”

कांग्रेस कार्यकर्ता मोहित सैनी ने बताया कि कैसे वे एक बार बुराङी आई थीं और उन्हें जब पता चला था कि यहां गरीब बच्चों को आगे की पढाई करने में दिक्कत होती है तो उन्होंने नई स्कूल खुलवाने की घोषणा की थी.

शीला चाहती थीं कि दिल्ली का हर बच्चा उच्च शिक्षा हासिल करे और यहां तक पढाई करने में कभी किसी तरह की दिक्कत न आए.

शीला मीठा खाने की भी शौकीन थीं और इसी वजह से उन्होंने नैनीताल से एक होटल के शेफ जोगाराम को स्वीट डिश बनाने दिल्ली और गुरूग्राम बुलाया था. शीला की मृत्यु की खबर सुन कर जोगाराम मीडिया के सामने आ कर रो पङे और कहा कि वे हम सब को बेहद प्यार करती थीं.

जब शीला को बस में प्रपोज किया था

शीला की शादी एक ही साथ पढने वाले विनोद दीक्षित से हुई थी. शीला ने अपनी जीवनी को याद करते हुए शादी की दिलचस्प बातें भी बताई थीं.

तब शीला पढने के लिए रोज बस से आतीजाती थीं. साथ पढने वाले विनोद शीला को देखते ही दिल दे बैठे और एक दिन तो रूट नंबर 10 की बस पर साथ बैठते हुए ही उन्होंने शीला को शादी के लिए प्रपोज कर डाला.

शीला ने बताया था कि किस तरह विनोद ने जब उन्हें कहा कि मुझे एक लङकी पसंद है और उसी से शादी करना चाहता हूं तो तब उन्होंने पूछा था कि कौन है वह लङकी? इस पर विनोद ने कहा कि मेरे साथ बैठी लङकी जिस के साथ मैं बस पर हूं तो शीला यह सुन कर दंग रह गई थीं.

शीला और विनोद तब साथ ही आतेजाते और जब भी मौका मिलता ढेर सारी बातें करते.

शीला उन्हें खत लिखा करती थीं क्योंकि तब के जमाने में न मोबाइल था और न ही कोई ऐसा फोन जिस से वे आपस में ढेर सारी बातें कर पाएं.

शादी नहीं थी आसान

विनोद से शीला की शादी तब आसान नहीं थी. विनोद तब के कद्दावर नेता उमा शंकर दीक्षित के बेटे थे जो इंदिरा गांधी सरकार में कैबिनेट में गृहमंत्री भी रहे.

शीला ब्राह्मण नहीं थीं और विनोद उच्च कुलीन ब्राह्मण परिवार से थे. पर विनोद की जिद के आगे परिवार वाले को झुकना पङा और फिर दोनों की शादी हुई. कहते हैं कि शीला ने राजनीति के गुर अपने ससुर उमा शंकर दीक्षित से ही सीखे थे.

उच्च शिक्षित थीं शीला

शीला दीक्षित का जन्म 31 मार्च 1938 को पंजाब के कपूरथला में हुआ था. उन्होंने दिल्ली के कौन्वेंट औफ जीसस ऐंड मैरी स्कूल से पढ़ाई की और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कालेज से उच्च शिक्षा हासिल की.

वह पहली बार साल 1984 में उत्तर प्रदेश के कन्नौज से सांसद चुनी गईं. बाद में वह दिल्ली की राजनीति में सक्रिय हुईं.

शीला के पुत्र संदीप दीक्षित भी राजनीति में हैं. वह पूर्वी दिल्ली लोकसभा सीट से 2004 से 2014 बीच 2 बार सांसद रहे हैं .

शीला दीक्षित ने हाल में उत्तर पूर्वी दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव लड़ा था लेकिन वह जीत नहीं पाई थीं.

निधन पर गहरा शोक

शीला के निधन पर तमाम लोगों ने संवेदना व्यक्त की है.

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने दीक्षित के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा है,”उन के कार्यकाल में राष्ट्रीय राजधानी में प्रभावी बदलाव हुआ .दिल्ली की मुख्यमंत्री के तौर पर उनके कार्यकाल के दौरान राजधानी में प्रभावी बदलाव हुआ जिस के लिए उन्हें सदैव याद किया जाएगा.”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दीक्षित के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने दिल्ली के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया है.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा, ‘‘मैं शीला दीक्षित जी के निधन के बारे में सुन कर बहुत दुखी हूं. वह कांग्रेस पार्टी की प्रिय बेटी थीं जिन के साथ मेरा नजदीकी रिश्ता रहा. दुख की इस घड़ी में उन के परिवार और दिल्ली के निवासियों के प्रति मेरी संवेदनाएं हैं.’’

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के निधन पर शोक जताया. केजरीवाल ने ट्वीट किया, ‘‘शीला दीक्षितजी का निधन अत्यंत दुखद है. यह दिल्ली के लिए भारी क्षति है.”

वाकई शीला दीक्षित राजनीति की एकमात्र ऐसी सितारा थीं जिन्हें पक्ष ही नहीं विपक्ष के नेता भी बेहद प्यार और सम्मान देते थे.

अपने मुख्यमंत्रीत्व काल में दिल्ली में कराए विकास के कार्यों के लिए उन्हें सदैव याद रखा जाएगा.

Edited By- Neelesh Singh Sisodia

फिर बिगड़े प्रज्ञा ठाकुर के बोल…

जनता ने उन्हें क्यों चुना है यह बात भोपाल के मतदाताओं ने चुनाव के वक्त बहुत साफ साफ कही थी कि वे प्रज्ञा भारती को नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी और भाजपा को वोट दे रहे हैं और भाजपा अगर बतौर उम्मीदवार किसी पुतले को भी मैदान में उतारती तो भी वे उसे ही वोट देते. प्रज्ञा भारती पुतला नहीं हैं बल्कि हिन्दुत्व के ठेकेदारों की कठपुतली हैं जो देश में वर्ण व्यवस्था बहाल कर सवर्णों का राज कायम करना चाहते हैं .

भोपाल के नजदीक सीहोर में प्रज्ञा भारती ने एक तरह से अपने मालिकों के मन की ही बात कही है कि अब देश में होगा वही जो मनु स्मृति और दूसरे धर्म ग्रन्थों में लिखा है कि शूद्र योनि में जन्म लेने बाले का यह कर्म ही नहीं बल्कि धर्म भी है कि वह ऊंची जाति बालों की सेवा कर अपना जीवन धन्य कर ले और पूर्व जन्मों के पापों से छुटकारा पाने के जतन में लगे रहें तभी तर पाएगा. देखा जाये तो उन्होने गलत कुछ नहीं कहा है क्योंकि लोकतन्त्र के आंशिक रूप से ही सही, होने के चलते दलित अपनी हैसियत भूल रहे हैं और यह प्रज्ञा भारती जैसे धर्माचार्यों की ड्यूटि है कि वे वक्त वक्त पर इस तबके के लोगों को यह एहसास कराते रहें के संविधान निर्माण नेहरू और अंबेडकर की बड़ी भूल थी जिसे अब सुधारा जा रहा है . इसी भूल को सुधारने जनता ने उन सहित भाजपा के 303 सांसदों को संसद में भेजा है . झाड़ू लगाना नालियाँ और शौचालय साफ करने चुनावी महाकुंभ पर अरबों रु नहीं फूंके जाते.

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हर कोई जानता है कि प्रज्ञा भारती एक बेसब्री , बड़बोली और उग्र महिला हैं वे इस बात से इत्तफाक नहीं रखतीं कि नरेंद्र मोदी की तरह स्वच्छ भारत अभियान चलाकर नीची जाति बालों को बहला फुसलाकर शूद्र कर्म के लिए उकसाया या सहमत किया जाये . इसमें क्या हर्ज है कि नीची जाति बालों को सीधे सीधे बता दिया जाये कि उनके धर्म शास्त्र वर्णित काम क्या क्या है . मालेगाँव बम ब्लास्ट की यह आरोपी चाहती है कि बिना किसी भूमिका के देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित करते मुसलमानों को भी खदेड़ दिया जाये . गांधी की आलोचक और उनके हत्यारे गोडसे की मुरीद प्रज्ञा भारती वही कह बैठीं जिसका नक्श नागपुर में बन चुका है इस वैदिक कालीन नक्शे को धीरे धीरे आरएसएस और भाजपा क्रियान्वित भी कर रहे हैं फिर इतनी बैचेनी क्यों जबकि धैर्य तो साधु संतों का गहना है.

असल में प्रज्ञा भारती को गहनों और झूठे दलित प्रेम से कोई सरोकार नहीं है क्योंकि वे पूर्णकालिक नेता नहीं है . वे बचपन से राम चरित मानस और भागवत बाँचती रहीं हैं जिनमें जाति के हिसाब से कर्मों का वर्गीकरन है . गांधी के दिखावटी मुस्लिम और दलित प्रेम का नतीजा ही यह था कि ये तबके खुद को सेवक और यवन नहीं बल्कि देश का बराबरी का नागरिक समझने लगे . अब इस बहस के कोई माने नहीं कि गांधी अलग तरीके से वर्ण व्यवस्था लागू करना चाहते थे और वही अब भाजपा और नरेंद्र मोदी कर रहे हैं कि ब्रह्मा के पैरों से उत्पन्न हुये दलितों को एकदम से गैर हिन्दू करार न दिया जाकर उनके हाथों में छोटे छोटे देवी देवता थमा दिये जाएँ जिससे वी भी खुद को हिन्दू राष्ट्र का हिस्सा समझें और मुसलमानों को खदेड़ने में सहयोग करें . 20 -22 फीसदी सवर्णों के दम पर यह काम नहीं हो सकता.

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ऐसे में प्रज्ञा भारती का झाड़ू , नाली और शौचालय बाला बयान थोड़ी दिक्कत पैदा कर सकता है . उत्तरप्रदेश के सोनभद्र में 9 गौंड आदिवासियों की जमीन विवाद को लेकर सरेआम हत्या के बाद देश भर के आदिवासी फिर लामबंद होने लगे हैं कि वे हिन्दू नहीं हैं . अब अगर यही राग दलितों ने अलापना शुरू कर दिया तो हिन्दुत्व की मुहिम को थोड़ा झटका तो लगेगा इत्तफाक से इन्हीं दिनों में देश भर में मोब लिंचिंग की घटनाएँ भी बढ़ रही हैं जिनमे हमेशा की तरह मारे दलित और मुस्लिम ही जा रहे हैं . मुमकिन यह भी है कि प्रज्ञा भारती के जरिये यह जताने की कोशिश की जा रही हो कि हिन्दुत्व आ रहा है चूंकि सत्ता और समाज की ताकत एक कट्टर हिंदूवादी दल की मुट्ठी में है इसलिए खैरियत इसी में है कि चुपचाप जुल्म बर्दाश्त करते जाओ क्योंकि तुम्हारी सुनने वाला अब कोई नहीं.

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सरकारी कर्मचारी

एक बार एक सरकारी कर्मचारी  सरकारी कार्य से कहीं जा कर आए थे. रास्ते में उन के पांव में कांटा लग गया. वे दफ्तर में आ कर कराहने लगे. सहकर्मी ने पूछा, ‘क्यों, क्या बात है?’ कर्मचारी बोला, ‘कांटा चुभ गया है पांव में.’ सहकर्मी बोला, ‘तो दुखी क्यों होते हो, कांटा निकाल फेंको.’ कर्मचारी बोला, ‘अभी क्यों निकालूं. अभी तो लंचटाइम है, यह मेरा निजी समय है. ड्यूटी के समय निकालूंगा.’

मेरे एक सरकारी सहकर्मी हैं. उन का हाल यह है कि पहली बात तो वे आते ही औफिस में घंटाडेढ़घंटा देर से हैं. आते हैं तो पहले अपनी सीट पर न बैठ कर अनुभाग कक्ष में बैठे दूसरे साथियों से उन की सीट पर जा कर वर्माजी नमस्ते, शर्माजी नमस्ते और नमस्ते भाई गुप्ताजी करते हैं. काम में लगे ये शर्मा और वर्मा काम करते हुए बेमन से उन से हाथ मिलाते हैं और वे हाथ तब तक नहीं छोड़ते, जब तक कि उन से उन की कुशलक्षेम नहीं पूछ लेते. सहकर्मियों को अपने कार्य की हड़बड़ी होती है और वे महाशय इधरउधर की गपबाजी शुरू कर देते हैं.

उधर उन की सीट पर होने वाले कार्य के लिए आने वाले बेताबी से इंतजार करते हैं कि वे सीट पर आ जाएं तो वे उन से अपना कार्य करवा लें. महाशय सीट पर आ जाएंगे तो विजिटर्स पर ही अपना तकियाकलाम दाग देते हैं- ‘और क्या हाल हो रहे हैं.’ बेचारा आने वाला अपने काम की जल्दी में होता है और वे उसे फालतू बातों में उलझाए रखते हैं.

ऐसे हालात में बताइए व्यंग्य का निशाना सरकारी कर्मचारी नहीं तो क्या सड़क बनाने वाला कामगार आदमी बनेगा? सरकारी दफ्तरों की कार्यशैली इसी तरह की हो जाने से सरकारी दफ्तर और उन के कर्मचारी उपहास के पात्र हैं. आज सरकारी कर्मचारी को मोटा वेतन मिलता है और दूसरी बीस तरह की सुविधाएं मिलती हैं. बावजूद इस के, वे कामचोरी और बहानेबाजी के नायाब करतबों से काम करने से बचते हैं.

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लंचटाइम आधे घंटे का होता है और कर्मचारी लंच के बहाने आधे घंटे पहले उठ जाता है और लंच समाप्ति के आधे घंटे बाद अपनी सीट पर प्रकट होता है.

मेरे एक जानकार हैं. वे अपनी लड़की की शादी के लिए सरकारी कर्मचारी लड़के की तलाश में 4 वर्षों से भटक रहे हैं. मैं ने उन्हें समझाया भी कि कौर्पोरेट क्षेत्र में अच्छे वर आप की लड़की को मिल जाएंगे, लेकिन उन का तर्क है कि सरकारी सेवा में आराम है और सेवानिवृत्ति पर पैंशन मिलती है, जिस से बुढ़ापा आसानी से निकल जाता है.

सरकारी कर्मचारी को आरामतलबी का पर्याय मान कर लोग रिश्तेनाते बनाते हैं. बताइए, देश इस तरह कैसे विकसित हो पाएगा. राजनीतिक दलों के हालात ऐसे हैं कि वे चुनाव जीतने के लिए विकास करने और गरीबों के उत्थान की बातें तो करते हैं लेकिन सत्तारूढ़ होने पर सत्तासुख भोगने व सरकारी रकम और कार्यक्रमों में घोटाले करने में लिप्त हो जाते हैं. इस का सीधा असर अधीनस्थ सेवा के कर्मियों पर पड़ता है और वे रिश्वतखोरी, गबनघोटालों में लिप्त होने की ओर अग्रसर हो जाते हैं. जनसेवा से जुड़े विभागों में यह दुर्गुण ज्यादा देखने में आता है. वहां रिश्वत का बोलबाला हो जाता है. जनता की धारणा बन जाती है कि वहां तो बिना रिश्वत खिलाए काम होगा ही नहीं. यह छवि न तो विभाग को उज्ज्वलता प्रदान करती है और न ही कर्मचारी को बेदाग छवि दे पाती है. इसलिए कर्मचारियों को इन उपहासों से बचने के लिए अपने दायित्वबोध के प्रति सजग और सचेष्ट होना चाहिए. आज लोगों ने अपना जीवनस्तर अपनी आमदनी से अधिक बढ़ा लिया है, इस वजह से गलत रास्तों से पैसा कमाने की होड़ सी मच गई है, जिस का खमियाजा जनता को झेलना पड़ता है. कर्मचारियों को दायित्वशीलता से विमुख नहीं होना चाहिए.

शायद आप गोपाल को नहीं जानते हैं. गोपाल को मैं जानता हूं. गोपाल एक सरकारी कार्यालय में बाबू है. अभी मैं उस की चारित्रिक विशेषताएं बताऊंगा तो आप भी उसे जान जाएंगे. कार्यालयी कामकाज में वह एक मक्कार किस्म का इंसान है. काम के नाम पर उस के देवता कूच कर जाते हैं. काम से बचने को उस के पास सौ बहाने हैं. आज उसे बच्चे को स्कूल छोड़ना है, कल उसे बच्चे को स्कूल से लाना है, कभी उस की पत्नी आएगी तो उस के साथ जाना पड़ेगा, कभी उस की तबीयत ठीक नहीं है तो कभी वह किसी की अंत्येष्टि या तीये की बैठक में जाएगा.

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वह सवेरे ही तय कर लेता है कि उसे कौन सा फार्मूला आजमाना है. मुझे खुद को उस के पूरे बहाने याद नहीं हैं. इन बिंदुओं को देखते हुए यह भी विचारणीय है कि उस का अफसर उसे कैसे लगातार बरदाश्त कर रहा है या वे क्यों नहीं उसे कामचोरी से रोक पाते हैं. दरअसल, गोपाल में चापलूसी का अद्भुत गुण मौजूद है. दूसरा, उस का सीनियर पूरी गंभीरता से कार्यालय में बैठ कर काम निबटा रहा है. चापलूसी में उस की अद्भुत क्षमता के आगे कोई भी लाजवाब हो सकता है.

यदि गोपाल दफ्तर में बैठा है और कोई डाक आ गई तो वह बहुत सावधानी से अवलोकन करने के बाद उसे अपने किसी साथी की ओर डायवर्ट कर के खुद निद्रालीन हो जाता है. किसी तरह की कार्यालयी चिंता न होने से वह दफ्तर के लौन में नींद भी ले लेता है. उस से पूछो कि वह कहां था, तो वह यही कहेगा, ‘मैं तो यहीं था.’ झूठ का कारोबार इतना प्रबल है कि आप स्वयं लज्जित हो जाएं, पर उस के जूं तक नहीं रेंगती. उस के गुणनफल अचंभित करने वाले होते हैं. कोई लैटर उसे टाइप करने को दे दिया जाए तो वह अपने किसी दूसरे साथी से याचना कर के अपना पिंड छुड़ा लेता है और उस के बाद घंटेदोघंटे के लिए वहां से लापता हो जाता है.

मैं उसे इसी आलम में 10 वर्षों से देख रहा हूं. वह हर बात भूल जाता है तथा उसे कुछ भी याद नहीं रहता. ये उस की जानबूझ कर की जाने वाली चालाकियां हैं. वह अभी तक अपनी किसी लापरवाही के लिए दंडित नहीं किया गया है, बल्कि वह चमचा सूत्रों से अच्छे कर्मचारी के रूप में सम्मानित भी हो चुका है. एक प्रमोशन भी वह इसी के बूते पर ले चुका है.

वह अभी और प्रमोशन लेना चाहता है तथा केवल साइन करने वाला पद प्राप्त करना चाहता है ताकि सारी झंझटों से मुक्ति पा सके. वेतन के प्रति वह पूरी तरह सजग है. वेतन स्लिपों को गौर से देखना व कटौतियों का हिसाबकिताब रखना उसे बखूबी आता है. उस का रोना यह भी है कि उसे वेतन उस के सीनियर्स से कम क्यों मिलता है.

कुछ चापलूस किस्म के कर्मचारी होते हैं, जो अपने काम से बचने के लिए अधिकारी के साथ अपने निजी काम के बहाने मौजमस्ती करते हैं. अफसर का एक काम लिया और दिनभर नदारद. इस से जहां वे स्वयं मक्कार बन जाते हैं, वहीं दूसरे कर्मी भी इस ओर प्रेरित होने लगते हैं.

अफसर भी चापलूसपसंद देखे गए हैं. जो कर्मचारी उन की चमचागीरी करता है उस से कुछ कहते नहीं तथा स्वाभिमानी और सेवाभावी कर्मियों पर काम का बोझ लाद कर दफ्तर का माहौल दूषित करते हैं. इसलिए जब तक एकदूसरे की लगाम कसने का काम नहीं होगा, तब तक सरकारी कर्मचारी की स्थिति विडंबनापूर्ण ही बनी रहने वाली है, जो कि देश, समाज व जनसामान्य के लिए विनाशकारी है.

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इस दृष्टि से सरकारी कर्मचारी व्यंग्य का पात्र बनेगा ही बनेगा. इस से बचने का सर्वकालिक उपाय तो सेवाभाव व दायित्वशीलता ही है जो कर्मचारी को व्यंग्य का पात्र बनने से बचा सकती है. नहीं तो, कर्मचारी कथा अनंत है और उस के अवगुण भी अनेक हैं.

हम संतान सुख से वंचित हैं, क्या हमें आईवीएफ तकनीक की मदद लेनी चाहिए ?

सवाल

मेरी उम्र 27 साल और पति की 30 साल है. हमारी शादी को 5 साल हो चुके हैं. हम लोगों की रिपोर्ट नौर्मल आई है. पति के शुक्राणुओं की संख्या भी लगभग 90 मिलियन आई है, बावजूद इस के हम संतान सुख से वंचित हैं. क्या हमें आईवीएफ तकनीक की मदद लेनी चाहिए?

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जवाब

आप को घबराने की जरूरत नहीं है. चूंकि आप के पति के शुक्राणुओं की संख्या ठीक है, इसलिए आप को आईयूआई तकनीक की दरकार नहीं है. लेकिन आप के लिए बढि़या विकल्प आईवीएफ है. इस तकनीक की मदद से संतान सुख की प्राप्ति कर सकते हैं. हां, इस बात का ध्यान रखें कि इस तकनीक के लिए किसी अच्छे चिकित्सक से ही संपर्क करें.

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अजब गजब: सबसे छोटा आइलैंड

विश्व का ये सबसे छोटा आइलैंड न्यूयार्क के एलेक्जेंड्रिया बाय के पास है. इस आइलैंड के आकार की वजह से ही  इसका नाम जस्ट रूम इनफ रख दिया गया है. जस्ट रूम इनफ आइलैंड इस घर के एक सिरे से शुरू होता है और उसके दूसरे सिरे पर खत्म हो जाता है.

वैसे पूरी दुनिया में करीब 2000 से ज्यादा आइलैंड हैं, जिसमें ये आइलैंड भी शामिल है. इसका क्षेत्रफल 3,300 स्क्वायर फीट बताया जा रहा है. इससे पहले सबसे छोटे आइलैंड का खिताब बिशप रौक माना जाता था.इसके आकार के कारण ही ये आइलैंड गिनीज बुक औफ रिकौर्ड में दर्ज हो गया है.

पहले इसका नाम हब आइलैंड था लेकिन जब 1950 में इस को एक परिवार ने खरीदकर यहां पर एक छोटा सा घर बनाकर एक पेड़ लगवा दिया तभी से इसे जस्ट रूम इनफ कहा जाने लगा. उस समय परिवार के लोगों ने इसे अपने वीकेंड होम के तौर पर तैयार करवाया था, लेकिन बाद में ये एक मशहूर टूरिस्ट प्लेस के रूप में जाने जाना लगा.

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5 टिप्स: कम बजट में घर को दें नया लुक

आप  घर में नया बदलाव लाना चाहती हैं, तो ये काम आप बिना पैसे खर्च किए भी कर सकती हैं. आज हम ऐसे ट्रिक्स आपको बताने जा रहे हैं, जिससे आप आजमा कर घर को एक नया लुक दे सकती हैं. आइए जानते हैं.

  1. घर को आकर्षक बनाने के लिए पुराने पीतल के बरतनों को पालिश करके आप सजाने के काम में ला सकती हैं. उसके ऊपर स्टोन लगाकर उसे और भी आकर्षक बना सकती हैं. इसके अलावा पुराने अच्छे कपडों का भी यूज कर सकती हैं. जैसे-आपकी कोई पुरानी अच्छी साड़ी हो,  जिसे आप नहीं पहनना चाहती तो आप उसे कुशन कवर या कर्टेन के रूप में यूज कर सकती हैं. इसके अलावा पुरानी साडियों का स्टाइलिश बेडशीट विद पिलो कवर भी बनने लगे हैं, यह बेडरूम की खूबसूरती बढ़ा देते हैं.

2. एक्सेसरीज फर्नीचर इसके स्थान में भी बदलाव ला सकती हैं. जैसे- बड़े रूम का सामान टेबल या साइड टेबल, चेयर, स्टूल और एक्सेसरीज में लैंप, पेंटिंग, वाल मिरर या डेकोरेशन के सामान आदि को लिविंग रूम में लगा सकती हैं और लिविंग रूम का कुछ सामान बेडरूम में सजा सकती हैं. ऐसा आप हर पांच से छह माह में एक बार कर सकती हैं. इससे लिविंग रूम और बेडरूम दोनों में बदलाव महसूस होगा.

3. दीवारों पर फोटो लगाना, यह बहुत पुराना चलन हो चुका है. आप अपनी क्रियेटिविटी से कुछ नया करके दिखाएं. जैसे-आप परिवार के लोगों की अलग-अलग फोटो लें और व्हाइट ग्लासी पेपर में चिपकाकर उसके नीचे उनका थोडा-सा इतिहास और उनकी खासियत लिखें और दीवार पर चिपका दें. इस तरह जितने लोगों की फोटो लगाना चाहती हैं, इसी तरह तैयार करके लगाएं तो काफी अच्छा लगेगा.

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4. इसके अलावा कई बार बच्चों के द्वारा बनाए गए क्रौफ्ट का भी यूज कर सकती हैं, उसे सजाने के काम ला सकती हैं. वो कलरफुल चीजें दीवारों पर अच्छी भी लगेंगी और बच्चें का प्रोत्साहन भी बढ़ेगा. इसके अलावा आप घर पर वाल हैंगिंग और सैफ्ट टौय बनाकर भी घर पर सजा सकती हैं. तो आप दीवारों पर कलाकृतियों बनाकर भी पेंट कर सकती हैं.

5. मार्केट में लैंप बनाने के लैंम्पशीट मिलती है, आप उसे घर लाकर लैंप भी बना सकती हैं और उसे लाइट के ऊपर लगा सकती हैं. यह देखने में आकर्षक लगता है. पुराने पत्थर और शंख जैसी चीजों को हम घर के बाहर करवा देते हैं या घर के किसी कोने में पड़े रहने देते हैं लेकिन आप इनका यूज अपने घर को सजाने के लिए कर सकती हैं.इमली के दानों को रंग कर उस पर ग्लिटर लगाकर बाउल में रखकर सजा सकती हैं.

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मौनसून रेसिपी: मैंगो पैन केक

आप आसानी से मेैंगो पेैन केक को बना सकते हैं. इसमें शहद, आइसक्रीम, आटा आदि की आवश्यकता होती है. तो चलिए आपको मैंगो पेन केक बनाने की विधि बताते हैं.

सामग्री :

– आम 02 (छिले और कटे हुए)

– वनीला आइसक्रीम ( 02 स्कूप)

– शहद (02 छोटे चम्मच)

– आटा (150 ग्राम)

– दूध (250 मिली)

– शक्कर (03 छोटे चम्मच)

– मक्खन (01 छोटा चम्मच)

– बेकिंग पाउडर (1/4 छोटा चम्मच)

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बनाने की विधि :

– सबसे पहले पैन केक के लिए बताई गयी सामग्री को आपस में अच्छी तरह से मिला कर पेस्ट बना लें.

– अब एक नौन स्टिक पैन में मक्खन डाल कर उसे गर्म करें.

– मक्खन के गर्म होने पर पैनकेक का मिश्रण उसमें डाल दें और इसे सुनहरा होने तक भूनें.

– मिश्रण के भुन जाने पर आंच बंद कर दें और मिश्रण को ठंडा होने दें.

– मिश्रण के ठंडा होने पर उसपर आधी आइसक्रीम, आम का गूदा और शहद मिला दें.

– अब आपका मैंगो पैन केक्स रोल तैयार है, इसे सर्विंग बाउल में निकालें और ऊपर से आइसक्रीम डाल     कर मैंगो पैन केक विद आइसक्रीम टेस्ट करें.

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नया सवेरा

हर साल की तरह आज भी सुबह के 5 बजे ही मोबाइल ने बता दिया कि आज अदिति और विनय की शादी की सालगिरह है. हड़बड़ा कर अदिति उठ बैठी. उसे लगा अभी विनय उसे खींच कर अपनी बांहों में भर लेगा हमेशा की तरह और कहेगा, ‘कहां जा रही हो अदिति? आज हमारी शादी की सालगिरह है. तो, आज तो तुम्हें मुझ से छुटकारा नहीं मिलने वाला.’ और अदिति जैसे ही कुछ बोलने को होती, विनय उस के होंठों पर अपनी उंगली रख देता और कहता, ‘नहीं, कोई काम का बहाना नहीं. आज हम घूमेंगेफिरेंगे, अच्छी सी फिल्म भी देखेंगे और खाना भी बाहर ही खाएंगे.’

पर, विनय तो अब रहा नहीं अदिति की जिंदगी में. वह तो उस से काफी दूर जा चुका था. आंखें छलछला गईं उस की अपने पति को याद कर के. विनय को उस की जिंदगी से गए 2 साल हो चुके थे. पर आज भी उसे लगता था कि विनय उस के पास ही है. ठंडी हवा के सर्द झोंके और उस का अदिति को छू कर गुजरना, विनय की याद को और भी ताजा कर रहा था. अदिति ने एक नजर पास ही पलंग पर सोए अपने बच्चों पर डाली. दोनों बड़े ही सुकून की नींद सो रहे थे. उस ने सोचा, थोड़ी देर और सोने देती हूं, तब तक नाश्ते की तैयारी कर लेती हूं.

नाश्ता बनाते वक्त भी आज उसे विनय की याद सता रही थी कि कैसे वह पीछे से आ कर अदिति को पकड़ लेता था और प्यार करते हुए जाने कितनी बार उसे किस करता था और तब अदिति, झल्ला कर कह उठती थी, ‘छोड़ो न विनय, आप को तो हरदम बस रोमांस ही सूझता रहता है, कभी मेरे काम में भी मदद कर दिया करो तो जानें.’ तो विनय हंस कर कहता, ‘काम जो बोलो मैं कर दूंगा पर फिर बाद में तुम भुनभुनाना मत कि मैं ने तुम्हारा किचन गंदा कर दिया.’

बच्चों ने जब आवाज लगाई कि जल्दी करो वरना वैन चली जाएगी तब जैसे वह विनय के खयालों से बाहर आई.  बच्चों को स्कूल भेज कर, चाय पीते हुए वह अखबार पलट ही रही थी कि उस का फोन बज उठा. भावना का फोन था जो अदिति के औफिस में ही सीनियर स्टाफ हैं. वह कह रही थीं, ‘आज ग्रोवरजी की फेयरवैल पार्टी है, अच्छे से तैयार हो कर आना.’ पर अदिति इस बात के लिए न कर रही थी.

दरअसल, जब से विनय उस की जिंदगी से गया, तब से सारे रंग भी उस के साथ चले गए थे. पर भावना की बात को वह टाल भी नहीं सकती थी. उस की अलमारी में पड़ी ज्यादातर साड़ी और सूट, विनय की ही पसंद के थे. कभी मन होता भी कि पहन ले पर उस का हाथ रुक जाता था क्योंकि विनय के जाने के बाद, जब भी उस ने ऐसे रंगीन कपड़े पहने, लोगों की टेढ़ी नजरों और तानों का सामना करना पड़ा था उसे.

भावना ही थी जो तब उस का संबल बनी थीं वरना विनय के गम ने तो उसे तोड़ ही दिया था. भावना, उसे अपनी बेटी की तरह प्यार देती थीं और अदिति भी उन्हें मां जैसा सम्मान देती थी. एक वही थी जिस से अदिति, अपना हर सुखदुख साझा करती थी. भावना अकसर अपने घर से कुछ न कुछ अदिति की पसंद का बना कर ले आतीं और बड़े हक के साथ उसे खिलातीं. अदिति को लगता जैसे भावना से उस का कोई पिछले जन्म का नाता हो.

न चाहते हुए भी अदिति ने आज विनय की पसंद की साड़ी पहन ली और हलका सा मेकअप भी किया. बहुत ही सुंदर लग रही थी वह. अदिति की इसी सुंदरता पर तो विनय मरमिटा था. अपनी मां को तैयार देख कर आज बच्चे भी बहुत खुश हुए. बच्चों को अच्छे से समझाबुझा कर कि कोई आए, दरवाजा मत खोलना और मैं जल्द ही आने की कोशिश करूंगी कह कर वह पार्टी के लिए घर से निकल गई.

अदिति ने अपनी नजरें दौड़ा कर देखा, शायद भावना अभी तक आई नहीं थीं. वह एक तरफ सोफे पर जा कर बैठ गई पर उसे बड़ा अजीब लग रहा था कि पार्टी में आए कुछ लोगों की नजरें सिर्फ उसे ही घूर रही थीं. वह अपने को बड़ा ही असहज महसूस कर रही थी और सोच रही थी कि इतनी जल्दी यहां नहीं आना चाहिए था.

तभी उस के समीप प्रमोद आ कर बैठ गया, जो अदिति का कलीग था, और कहने लगा, ‘‘अरे वाह अदितिजी, आज तो आप गजब ढा रही हैं इस नीले रंग की साड़ी में, और ऊपर से ये बिंदी, चूड़ी. नहीं, नहीं, कोई बात नहीं है, पहना करिए, अच्छी लग रही हैं और अब यह सब कौन मानता है.’’

तभी उधर से राठौरजी कहने लगे जो औफिस के ही सीनियर स्टाफ थे, ‘‘सच में अदितिजी, आप को देख कर कोई नहीं कह सकता कि अभी 2 साल पहले ही आप के पति का देहांत हो चुका है.’’ जब अदिति ने अपनी नजरें उन पर डालीं तो हकलाते हुए कहने लगे, ‘‘म…मेरा मतलब है अच्छी लग रही हैं.’’

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पार्टी में आए सब लोग अदिति को ऐसे देखने लगे जैसे अदिति ने कितना बड़ा अपराध कर डाला हो. सब की कटाक्षभरी नजरों और बातों को झेलना अब अदिति के लिए असहनीय हो गया था. फफक कर उस की आंखों से आंसू निकल पड़े. उसे लगा अब यहां रुकना सही नहीं है. वह पलट कर जाने लगी कि तभी पीछे से भावना के स्पर्श ने उसे चौंका दिया.

‘‘आंटी, आप आ गईं,’’ अदिति को जैसे बल मिल गया.

‘‘हां अदिति, मैं जाम में फंस गई थी. पर तुम कहां जा रही हो, घर?’’

‘‘जी, जी आंटी, वो बच्चे घर पर अकेले हैं तो…’’

‘‘पर बेटा, पार्टी तो अभी शुरू ही हुई है. एंजौय करो न, घर ही तो जाना है. कहीं तुम इन सब की बातों से डर कर तो घर नहीं जा रही हो? अगर ऐसी बात है, तो जाओ. लेकिन एक बात सुनती जाओ.  ऐसे टुच्चे और बेशर्म लोग तो तुम्हें हर जगह मिल जाएंगे. फिर कहांकहां और किसकिस से भागती फिरोगी? अरे, भागना तो इन्हें चाहिए यहां से, क्योंकि ये दिल और दिमाग दोनों से बीमार हैं.’’ भावना की बातों पर सब ने एकदम चुप्पी साध ली, क्योंकि सब जानते थे कि जब वे बोलती हैं तो किसी को नहीं छोड़तीं और न ही किसी से डरती हैं.

‘‘शर्म नहीं आती आप लोगों %E

एनजीओ : ठगी से खुद को बचाएं

गैर-सरकारी स्वयंसेवी संस्थाएं यानी एनजीओ देश में लाखों की संख्या में मौजूद हैं. आम आदमी की धारणा यह है कि एनजीओ बहुत रुपया कमा रहे हैं. इसी के चलते एनजीओ को बनाने व स्थापित करने के लिए अंधीदौड़ शुरू हो गई है. स्वयंसेवी संस्थाएं बहुत अच्छा काम कर रही हैं, लेकिन इन संस्थाओं को मूर्ख बनाने वाली कई छोटीबड़ी संस्थाएं भी इन दिनों बाजार में उतर चुकी हैं.

एनजीओ को सहयोग देने के नाम से ये अपने कार्यालय राज्य की राजधानी से ले कर राष्ट्र की राजधानी में खोल कर बैठे हैं. इन में सलाह देने का काम किया जाता है जिस की खासी फीस वसूली जाती है. जब सलाह के बाद एनजीओ प्रमुख उन से पट जाते हैं तो इन के कार्यालय संचालक प्रोजैक्ट, कौन्सैप्ट नोट (अवधारणा पत्र) आदि बनाने के नाम से भोलेभाले एनजीओ को लूटते हैं.

ये प्रश्न पूछते हैं कि प्रोजैक्ट कितने का बनाना है? उस पर ये अपना 3 फीसदी चार्ज वसूलते हैं. जाहिर है लालच में एनजीओ संचालक अधिक का प्रोजैक्ट बनवाता है. उस प्रोजैक्ट पर आप को काम मिलेगा या नहीं, इस की कोई गारंटी वे नहीं लेते हैं.

आप के हजारों रुपए 10 से 20 पृष्ठों के कागज पर प्रोजैक्ट बनाने के वसूल किए जाते हैं, जबकि अधिकतर वह चोरी से गूगल से डाउनलोड कर के बना कर रखे होते हैं. आप से आंकड़े पूछ कर भरने का वे काम करते हैं. आंकड़े, कार्य, क्षेत्र जहां कार्य किया जाना है जैसी महत्त्वपूर्ण जानिकारियां वे आप से ही पूछ कर भरते हैं.

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इस के अतिरिक्त कुछ ऐसे कार्यालय भी मिल जाएंगे जो गारंटी के साथ आप को काम देने की बात कहेंगे और सरकारी तंत्र में अपनी घुसपैठ के बड़े रोचक किस्से बताएंगे और अपनी बातों से प्रभावित करेंगे. आप के प्रभावित होने पर वे 5 फीसदी से 10 फीसदी टोकन मनी ले लेंगे और आप से प्रोजैक्ट की मांग करेंगे. ये लाखोंकरोड़ों के प्रोजैक्ट ऐसे दिलवाने का आश्वासन देंगे जैसे नेता वादे करते हैं.

एडवांस रकम दे देने के बाद महीनोंवर्षों तक आप चक्कर लगाते रहें. इन के उत्तर होते हैं, ‘अधिकारी बदल गया, दूसरा आएगा, तब देखेंगे,’ या फिर ‘यह परियोजना सरकार ने बंद कर दी है, आप कहें तो दूसरा प्रोजैक्ट दिलवा दूं.’ दूसरे प्रोजैक्ट दिलवाने के नाम पर फिर वर्षों लग जाते हैं जो नहीं मिलता है. इस बीच मोबाइल नंबर बदल जाता है, कार्यालय बंद हो जाता है, एनजीओ संचालक लुटपिट कर बैठ जाता है.

ये ऐसे एनजीओ को अपना शिकार बनाते हैं जो सुदूर ग्रामीण अंचल या तहसील में काम कर रहे हैं या नए एनजीओ से संपर्क साधते हैं ताकि उसे आसानी से ठगा जा सके. ऐसे एनजीओ बारबार अपना रुपया वसूलने राजधानी आ भी नहीं सकते हैं. यह पूरा कारोबार चिटफंट कंपनी की तरह ही होता है. रुपया एकत्र किया और नए नाम से अपनी एजेंसी खोल ली. इस के अलावा एक उपक्रम इन का कानूनी सलाह देने का भी होता है जो सलाह के साथ इनकम के तरीके भी बताता है. ये संस्था को 80 जी, 12 ए, 35 ए जैसे कई प्रमाणपत्र दिलवाने का लालच देते हैं और इस से होने वाले लाखों के लाभ का सब्जबाग दिखलाते हैं.

इस के अतिरिक्त, एफसीआरए यानी विदेशी फंड नियोजन हेतु भी एजेंसी खोल कर ठग बैठे हैं जो कि विदेशी रजिस्टे्रशन करवा कर विदेशों से करोड़ों डौलर लाने, दिलवाने का सपना दिखलाते हैं. एनजीओ ऐसे मक्कार, झूठे, दगाबाजों की बातों में उलझे तो फिर जो अपनी संपत्ति है उस से हाथ धो कर बैठ जाते हैं. यह 35 ए, सी जिस में सौ प्रतिशत टैक्स माफ होता है, दिलवाने के हजारों वसूलते हैं और उस के प्रोजैक्ट को बनाने के लाखों रुपए वसूलते हैं.

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पिछले दिनों दिल्ली के एक व्यक्ति पर एक संस्था दलित संघ ने धारा 420 के तहत रिपोर्ट दर्ज कराई थी जिस में 35 ए, सी दिलवाने के नाम पर 6 लाख रुपए ठग लिए थे. यह व्यक्ति राजनीतिक गलियारे में रहने के चलते अपना पता बदलता रहा और संस्था ठगी का शिकार हो गई. ऐसे ठगों का एक ऐक्सपर्ट गु्रप होता है जो काम दिलाने की 100 प्रतिशत गारंटी लेता है. साथ ही, आप के यहां फील्ड विजिट करने आता है. आप के कागज देखता है, उस में तमाम गलतियों को बता कर उसे दूर करने के रुपए वसूलता है.

वे प्रोफाइल, ब्रोशर, वैबसाइट आदि बनाने की आप से खासी रकम वसूलते हैं. यह सब हो जाने के बाद भी आप पाते है कि जहां से चले थे वहीं खड़े हुए हैं. आप की कम जानकारियों का वे भरपूर दोहन करते हैं. कानून, उस की सजा का ऐसा वर्णन करते हैं मानो आप ने वह गलती कर ही ली हो और वे बचाने को तत्पर हों. इस तरह स्वयंसेवी संस्थाओं को लूटने के इन्होंने नएनए तरीके ईजाद कर लिए हैं जिन से बचने की, सावधान रहने की आवश्यकता है.

इस के अतिरिक्त आप की संस्था का विजन डौक्युमैंट बनाने के लिए भी वे हजारों वसूलते हैं. ये सब वे सफेदपोश होते हैं जो फंडिंग एजेंसी या मल्टीनैशनल एजेंसी में डायरैक्टर या पी एम (प्रोग्राम मैनेजर) होते हैं जिन को सेवा निवृत्ति के बाद एनजीओ के खून चूसने की आदत पड़ी होती है. इस तरह एनजीओ को हर स्तर पर काम देने, फंड दिलाने, प्रमाणपत्र दिलाने के नाम पर ठगी का एक बड़ा नैटवर्क है. ऐसा नहीं कि सब झूठे हैं, लेकिन आप अपनी संस्था का काम करवाने के पहले उस की सत्यता की जांच अवश्य कर लें. ध्यान रखें कि अधिक लालच ही आप को ठगे जाने की ओर प्रेरित करता है.

एक बड़ी महाठगी इन दिनों इस क्षेत्र में और चल निकली है, वह है- कौर्पोरेट सोशल रिस्पौंसबिल फंड- जो हर कंपनी को 3 फीसदी अनिवार्य रूप से सामाजिक कार्यों में खर्च करना होगा. अधिकतर कंपनियों ने स्वयं के एनजीओ खोल कर यह काम स्वयं करने लगे हैं ताकि उन का रुपया घूम कर उन तक फिर आ आए.

कुछ कंपनियों के सीईओ या मैनेजर इसे मैनेज करने के लिए ऐसे छोटे एनजीओ को तलाश करते हैं जिन से फंड का 70 फीसदी वापस ले लें. एनजीओ उन्हें 70 फीसदी वापस करने के बाद 100 फीसदी का खर्चा बताएगा. जाहिर है कि जमीनी स्तर पर कोई काम न हो कर कागजी काम होता है. कभीकभी इस में एनजीओ से एडवांस ले लिया जाता है और फंड नहीं मिलता है.

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इस तरह स्वयंसेवी संस्थाओं को ऐसे झूठे मोहजाल से बचना चाहिए जो कि फंड देने के नाम पर आप के साथ फर्जीवाड़ा कर के आप को फर्जी काम करने हेतु प्रेरित करें. ऐसी किसी भी एजेंसी को स्वीकार कर के आप अपनी संस्था की छवि खराब करते हैं. इसलिए ऐसे ठगों से सावधान रहने की आवश्यकता है जो आप की मदद करने के नाम पर आप को लूट लेते हैं.

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