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असफलता की ताकत को समझना जरूरी है: अनुपम खेर

बौलीवुड में 35 वर्ष पहले फिल्म ‘सारांश’ से अभिनय कैरियर की शुरुआत करने वाले अभिनेता अनुपम खेर एकमात्र ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने अपनी असफलता की ताकत पर ऐसा मुकाम बनाया है जो कि हर किसी के वश की बात नहीं है. सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फिल्मफेयर अवार्ड, राष्ट्रीय पुरस्कार, पद्मश्री, पद्मभूषण के अलावा कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों  से सम्मानित अनुपम खेर पिछले 15 वर्षों से रंगमंच पर भी सक्रिय हैं.

उन्होंने 2 किताबें लिखी हैं. उन का अभिनय स्कूल चल रहा है. देश व विदेश के विश्वविद्यालयों में मोटिवेशन लैक्चर देते हैं. उन्होंने स्वयं अपनी आटोबायोग्राफी लिखी है, जो कि अगस्त में बाजार में आएगी. बौलीवुड में 515 फिल्मों के साथसाथ हौलीवुड में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का डंका बजाया है. हाल ही में उन्होंने अमेरिका के चर्चित सीरियल ‘न्यू अम्सटर्डम’ में भारतीय डाक्टर का किरदार निभाया है.

आप के 35 वर्षों के अभिनय कैरियर के पौइंट्स क्या रहे?  इस पर अनुपम कहते हैं, ‘‘पहली बात तो यह कि मेरा मध्यांतर है. मेरे कैरियर का पहला पड़ाव या टर्निंग पौइंट तो मेरे कैरियर की पहली फिल्म ‘सारांश’ ही थी. मैं ने 28 वर्ष की उम्र में 65 वर्ष के इंसान का किरदार निभाया था. पहली ही फिल्म के लिए फिल्मफेयर अवार्ड मिलना भी टर्निंग पौइंट था. यदि मेरे कैरियर की शुरुआत किसी फिल्म में हीरो से हुई होती, तो शायद आप आज मेरे इस औफिस में बैठ कर बातें न कर रहे होते. पता नहीं मैं क्या काम कर रहा होता या कहीं और आगे चला गया होता.

‘‘टर्निंग पौइंट यह भी रहा कि मैं ने खुद को किसी सीमा में नहीं बांधा. मैं ने किसी ढर्रे पर चलते हुए काम नहीं किया. आप तो अच्छी तरह जानते हैं कि उन दिनों तो ‘टाइप कास्ंिटग’ होती थी. कलाकार ने कैरियर की शुरुआत में पहला रोल जिस तरह का किया, उसी तरह के रोल उसे मिलते थे. पर मैं ने इस ढर्रे के खिलाफ जा कर ‘कर्मा’ भी की, ‘रामलखन’ भी की और ‘खोसला का घोंसला’ भी की. ‘ए वेडनेस्डे’ भी की. ‘ऐक्सिडैंटल प्राइम मिनिस्टर’ की.

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‘‘मेरा मानना है कि टर्निंग पौइंट्स सिर्फ सफलता के नहीं होते बल्कि असफलता के भी होते हैं. यदि आप ने असफलता के टर्निंग पौइंट को पकड़ लिया, तो आप को शानदार सफलता मिलती है. मैं ने अपनी प्रोडक्शन कंपनी खोल कर कुछ फिल्में व टीवी सीरियल बनाए, पर उस में मैं लगभग दिवालिया हो गया. यह भी मेरे कैरियर का बहुत बड़ा टर्निंग पौइंट था.

‘‘1994 में जब फिल्म ‘हम आप के हैं कौन’ की शूटिंग के दौरान (5 मिनट) मुझे फेशियल पैरालाइसि हुआ था, वह भी टर्निंग पौइंट था.

‘‘2002 में जब मैं ने अंतर्राष्ट्रीय फिल्म ‘बेंड इट लाइक बैकम’ में अभिनय कर अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा जगत में कदम रखा, वह भी टर्निंग पौइंट था.

‘‘मैं बौलीवुड का इकलौता ऐसा कलाकार हूं जिस ने अपनी जीवनी पर नाटक किया. जबकि किताब के रूप में अपनी जीवनी अब लिखी है जो कि अगस्त में बाजार में आएगी. 15 वर्षों से यह नाटक कर रहा हूं, जिस का नाम है, ‘कुछ भी हो सकता है.’ मैं अकेला ऐसा कलाकार हूं जिस ने अपनी जीवनी पर किताब लिखने से पहले नाटक किया. मैं पहला ऐसा कलाकार हूं जिस ने अपनी जीवनी से पहले लाइफ कोचिंग पर ‘द बेस्ट थिंग अबाउट यू इज यू’ नामक किताब लिखी, जो कि पिछले 7 वर्षों से विश्व की बैस्टसैलर बुक है. यह भी मेरे कैरियर व जीवन का टर्निंग पौइंट था.

‘‘5 फरवरी, 2005 को मेरा ऐक्ंिटग स्कूल ‘ऐक्टर्स प्रिपेअर्स’ खोलना भी टर्निंग पौइंट था. मैं ने वीरा देसाई रोड पर एक छोटे से कमरे में इस ऐक्टिंग स्कूल की शुरुआत की थी. आज आप जहां बैठे हैं, वहां पूरे 3 फ्लोर में मेरा ऐक्टिंग स्कूल है. मेरे इस ऐक्टिंग स्कूल से जितने भी लोग निकलते हैं, वे मेरे राजदूत हैं.’’

पिछले 35 वर्षों में सिनेमा में जो बदलाव आए हैं, उन्हें आप किस तरह से आंकते हैं?  इस सवाल के जवाब में वे कहते हैं, ‘‘जो समाज में  बदलाव आए हैं, जो जीवन में बदलाव आए हैं, वही बदलाव सिनेमा में आए हैं. अब फिल्म इंडस्ट्री में प्रोफैशनलिज्म आ गया है. प्रोफैशनलिज्म तो हो गया मगर भाईचारा निकल गया. सच कहा जाए तो भाईचारा में फिल्में अच्छी बनती थीं. पहले हम और आप यानी कि पत्रकार और कलाकार इस तरह से नहीं मिलते थे.

‘‘आप को याद होगा, पहले हम और आप कहीं भी किसी भी फिल्म की शूटिंग के सैट पर अचानक मिल जाते थे और बातें कर लेते थे.

‘‘पहले कलाकार के पास मोबाइल फोन और मोबाइल वैन नहीं हुआ करती थी. सभी कलाकार सैट पर एकसाथ बैठ कर गपशप किया करते थे. अब तो दोनों चीजें हैं. कलाकार कैमरे के सामने आ कर अपना सीन देता है और फिर सीधे अपनी मोबाइल वैन में जा कर दुबक जाता है.

‘‘इस के बावजूद भारतीय फिल्में तकनीकी दृष्टिकोण से काफी बेहतर हो गई हैं. अब काफी फिल्में बन रही हैं. कंटैंट वाला सिनेमा बनने लगा है. अब काफी लोगों को काम मिल रहा है. टीवी सीरियल के साथ ही वैब सीरीज बन रही हैं.’’

क्या प्रोफैशनलिज्म के चलते अब कलाकारों पर से निर्माता का विश्वास खत्म हो गया है? इस पर अनुपम कहते हैं, ‘‘मैं ने अब तक 515 फिल्मों में अभिनय किया है. इन में से कम से कम 400 फिल्में ऐसी हैं जिन के एग्रीमैंट मैं ने फिल्म की रिलीज के बाद साइन किए जब निर्माता ने कहा कि अब एग्रीमैंट पर साइन कर दीजिए, इन्कम टैक्स फाइल करना है. पर आज की तारीख में तो 50 पन्नें का एग्रीमैंट निर्माता पहले साइन कराता है, उस के बाद हमें शूटिंग के लिए सैट पर बुलाता है.  इन में कलाकार कितना छींकेगा, यह भी लिखा होता है. पहले कलाकार व निर्माता के बीच आपसी विश्वास होता था.’’

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आप ने हाल ही में अमेरिकन सीरीज ‘न्यू अम्सटर्डम’ की है, कैसा अनुभव रहा? इस पर वे बताते हैं, ‘‘जी हां, मैं दूसरों को यह निर्णय नहीं करने देता कि मुझे क्या करना चाहिए. जब मैं ने देखा कि यहां पर लोग मुझे लीजैंडरी ऐक्टर कह कर हाशिए पर डालना चाहते हैं, तो मैं विदेश चला गया. मैं ने अूमेरिका जा कर ‘नयू अम्सटर्डम’ नामक सीरीज की, बहुत लोकप्रियता मिली. इस में मैं ने एक भारतीय न्यूरोसर्जन डाक्टर का किरदार निभाया है. जुलाई में इस का दूसरा सीजन शूट करने के लिए अमेरिका जाने वाला हूं.

आप के जीवन की दूसरी व्यस्तताएं क्या हैं?  इस पर वे कहते हैं, ‘‘किताबें लिखता हूं. पूरे विश्व में मोटिवेशन लैक्चर देता हूं. मेरे मोटिवेशन लैक्चर का विषय होता है ‘पावर औफ फेलिअर’. मतलब, असफलता की क्या ताकत है. इस पर लैक्चर देता हूं. औक्सफोर्ड सहित विश्व की हर बड़ यूनिवर्सिटी में मोटिवेशन लैक्चर देने जाता हूं. मैं अपनी जिंदगी जीता हूं. मेरी जिंदगी बहुत बड़ा खजाना है. मैं कहां से कहां पहुंचा हूं. मैं ने कभी हार नहीं मानी.’’

आप ने काफी समय पहले कई हौलीवुड व अंतर्राष्ट्रीय फिल्में की थीं, तो कभी हौआ खड़ा करने का प्रयास नहीं किया? इस पर अनुपम कहते हैं, ‘‘हम ने जब विदेशों में काम किया, तब वह दौर अलग था. उस वक्त सोशल मीडिया का दौर नहीं था. मैं ने सोशल मीडिया को भी अपनाया. आज मेरे 1.33 करोड़ फौलोअर्स हैं. आप को वक्त के साथ चलना होगा. जमाने को बदलने से बेहतर है अपनेआप को बदलो.’’

आगे की योजना के बारे में बताते हुए अनुपम खेर कहते हैं, ‘‘मुझे 35 वर्षों ने बहुतकुछ सिखाया है. इन 35 वर्षों ने जो कुछ सिखाया है, उसे अब अगले 35 वर्षों तक अमल में लाना चाहता हूं.

‘‘मुझे ऐसा लगता है कि मुझे अभी बहुतकुछ करना है. कुछ ही दिन पहले की बात है, मैं अपने ऐक्ंिटग स्कूल में जब बच्चों को पढ़ा रहा था, तो मुझे एहसास हुआ कि अभी मुझे बहुतकुछ सीखना है. आजकल के बच्चों को देख कर आप काफीकुछ सीख सकते हैं. जब इंसान सोचने लगता है कि मैं जानता हूं कि मैं क्या कर रहा हूं, तो वहीं से आप की सीख खत्म हो जाती है.  मेरे लिए मुकाम से ज्यादा अहमियत यात्रा रखती है.’’

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3 टिप्स: पीरियड्स के दौरान ऐसे रखें अपनी त्वचा का ख्याल

महिलाओं के शरीर में पीरियड्स के दौरान कई तरह के हार्मोनल बदलाव होते हैं. इसका असर उनके त्वचा पर भी पड़ता है. महिलाओं में त्वचा से जुड़ी कई समस्याएं हो सकती है. ऐसे में आप इन दिनों में अपनी त्वचा का खासतौर पर ध्यान रखें. तो आइए जानते हैं, कुछ खास टिप्स जिसे आप अपनाकर पीरियड्स में अपनी त्वचा का ख्याल रख सकते हैं.

क्लीनअप

इस दौरान चेहरे को साफ रखना बेहद जरूरी है. क्लीनअप इसमें आपकी मदद करेंगे. इससे न सिर्फ त्वचा साफ होगी बल्कि इसे जरूरत के मुताबिक मसाज, मौइस्चर मिलने के साथ ही आपका स्ट्रेस लेवल भी कम होगा जो पिंपल को रोकने में मदद करेगा.

मेकअप से रहें दूर

मेकअप पोर्स को ब्लौक करता है, ताकि आपके फेस को स्मूद लुक मिले, लेकिन पीरियड्स के दिनों में यह अच्छा नहीं है. कोशिश करें कि मेकअप से दूरी बना सकें या ऐसे फाउंडेशन या बीबी, सीसी क्रीम का इस्तेमाल करें जो पोर्स ब्लौक नहीं करती.

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पिंपल 

पीरियड्स के दिनों में पोर्स बड़े हो जाते हैं जिससे स्किन ज्यादा औयल प्रड्यूस करती है. वहीं कुछ मामलों में स्किन रूखी हो जाती है. इससे निपटने के लिए दिन में कम से कम दो बार गुनगुने पानी से फेस धोएं. ऐसे फेसवाश का इस्तेमाल करें जो स्किन के लिए माइल्ड हो. इसके बाद चेहरे पर टोनर लगाएं और फिर मौइस्चराइज करें.

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अजब गजब: आलसी लोग होते हैं ज्यादा बुद्धिमान

अमेरिका में एक सर्वे के मुताबिक जो लोग आलसी होते है, वे ज्यादा बुद्धिमान होते हैं. इसका कारण जानकर आप हैरान हो जाएंगे. तो आइए बताते हैं, आलसी लोगों को क्यों बुद्धिमान माना गया है. अगर आलसी को आप कोई काम करने को कहोगे तो उसका वह सरलता से करने का कोई न कोई उपाय खोज लेता है.

क्या आप जानते हैं, इस कारण दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति बिल गेट्स ने भी कहा था कि मैं अपना मुश्किल कार्य किसी आलसी को करने को कहता हूं क्योकि वह उस काम को करने का कोई न कोई सरल तरीका निकाल सकता है.

एक शोध के मुताबिक जो लोग किसी दूसरे पर जल्दी ही भरोसा कर लेते है वे अधिक बुद्धिमान होते है. क्योंकि बुद्धिमान लोगों को किसी आदमी को परखने में ज्यादा समय नहीं लगाते हैं.

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वायरल हुआ दीपिका और रणवीर का रेट्रो लुक

बौलीवुड के सबसे स्वीट कपल में शुमार दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह इन दिनों फिल्म ’83’ की शूटिंग में बिजी चल रहे हैं. इसी बीच दीपिका पादुकोण ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर पति रणवीर के साथ एक थ्रोबैक फोटे शेयर की है जिसमें दोनों रेट्रो लुक में नजर आ रहे हैं.

आपको बता दें कि दोनों अकसर ही सोशल मीडिया पर फोटो शेयर करते रहते हैं. जहां एक तरफ रणवीर अपनी पत्नी की हर तस्वीर पर कमेंट करते रहते हैं, वहीं दीपिका भी दोनों के बारे काफी कुछ अपडेट करती रहती हैं.

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दीपिका ने सोशल मीडिया अकाउंट अपनी और रणवीर की एक पुरानी फोटो शेयर करते हुए लिखा कि हम. लगभग 17 लाख से ज्यादा फैंस इस फोटो को लाइक कर चुके हैं. इतना ही नहीं दोनों की फोटो पर फैंस के क्यूट कमेंट्स भी आ रहे हैं.

बता दें कि दीपिका ने ‘छपाक’ की शूटिंग पूरी कर ली हैं जिसमें वह एक एसिड-अटैक सरवाइवर की भूमिका निभा रही हैं. इस फिल्म में उनके साथ विक्रांत मेस्सी भी हैं. यह फिल्म 10 जनवरी, 2020 को रिलीज होने वाली है. इसके साथ ही दीपिका फिल्म ’83’ में रणवीर संग नजर आने वाली हैं.

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प्रियंका गांधी लाओ, कांग्रेस बचाओ !

कांग्रेस में इन दिनों ऐतिहासिक सन्नाटा है. 17 वीं लोकसभा समर में बुरी तरह पराजय के बाद मानो कांग्रेस मरणासन्न हो चुकी है. आलाकमान राहुल गांधी के हाथों से मानो तोते ही उड़ गए हैं. श्रीमती सोनिया गांधी जिनके पास राजनीति का दीर्घ अनुभव माना जाता है वे भी हतप्रभ हैं. खामोश है. कांग्रेस के तुरुप के पत्ते प्रियंका गांधी, ने भी मौन धारण कर रखा है. मानो यह गांधी परिवार के लिए पक्षाघात का समय है. दो माह गुजर चुके हैं 25 मई 2019 को राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की घोषणा की है मगर कांग्रेस को कुछ सूझ ही नहीं रहा है कि आखिर वह करें तो क्या करें और जाएं तो कहां जाएं. ऐसे में गांधी परिवार से एक नाम इन दिनों पुन: उभर कर आया है- वह है प्रियंका गांधी वाड्रा का. प्रियंका गांधी ने जैसे तेवर सोनभद्र मामले में दिखाएं कांग्रेसियों की बांछें खिल गई है. उन्होंने उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को घेर कर दिखा दिया की प्रियंका गांधी में वह जज्बा है वह आग है जो कांग्रेस के सर्वमान्य नेता में होनी चाहिए.

बड़े दिग्गज एकमत हैं

कांग्रेस के बड़े चेहरे,  बड़े नाम अनुभवी कांग्रेसी क्षत्रप एकमत है कि कांग्रेस को अगर कोई नेतृत्व दे सकता है जिंदा रख सकता है तो वह सिर्फ श्रीमती सोनिया गांधी का परिवार ही है. ऐसे में शशि थरूर, नटवर सिंह,  भक्त चरण दास लाल वोरा श्री प्रकाश जयसवाल अनिल शास्त्री जैसे दिग्गजों सहित अनेक नेताओं ने प्रियंका गांधी के नाम को आगे करना प्रारंभ कर दिया है सभी एक स्वर में कह रहे है कि प्रियंका गांधी को कांग्रेस की कमान संभालनी चाहिए.

इस तर्क दम नजर आता है क्योंकि राहुल गांधी अब लौट कर आने वाले नहीं है उनके नेतृत्व पर उनके द्वारा ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया गया है वे स्वयं पीछे हट चुके हैं. ऐसे में प्रियंका गांधी जो उनकी छोटी बहन है उनका सम्मान, उनसे स्नेह रखती है स्वयं आगे आकर “कमान” नहीं संभाल सकती मगर जब पार्टी में माहौल बनेगा जैसे की दिखाई पड़ रहा है तो वे कांग्रेस की कमान संभालेंगी यह प्रेक्षक कयास लगा रहे हैं.

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प्रियंका में वह ताब है !

नि:सन्देह राजनीति में सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने का जो सहज, सरल, आकर्षक चेहरा होना चाहिए वह प्रियंका गांधी के पास सहज ही है. वे जब बोलती हैं तो उनके कटाक्ष से विपक्ष अर्थात सत्तापक्ष हतप्रभ रह जाता है. ऐसे में प्रियंका गांधी में यह “ताब” गर्मी दिखाई पड़ती है जो कांग्रेस को शिखर तक पहुंचाने का माद्दा रखती है.

अभी कांग्रेस अंधेरे में है ऐसे में उन्होंने उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में आदिवासियों के ऊपर हुए अत्याचार के मामले मे जैसा कड़ा रूख अपनाया और अंततः पीड़ित परिवारों से मिली. उसका दोहरा संदेश गया. मरणासन्न कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेताओं को प्रतीत  हुआ यही वह ‘ज्योति’ है जो कांग्रेस के एक एक दिये को जलाने रोशनी देने का काम कर सकती है. सवाल यह भी है प्रियंका गांधी ने जैसा स्वविवेक सोनभद्र मामले में दिखाया उससे यह भी संदेश प्रसारित हो गया की वे निर्णय क्षमता रखती हैं और उनमें राजनीतिक परिपक्वता की कमी नहीं है.

राहुल सोनिया की खामोशी

प्रियंका का नाम जिस तरह नटवर सिंह, श्रीप्रकाश जयसवाल, मोतीलाल वोरा, प्रणव मुखर्जी के पुत्र अभिजीत मुखर्जी सहित शशी थरूर, अनिल शास्त्री ने लिया हैं उसके पीछे सोची-समझी रणनीति भी दिखाई देती है. कांग्रेस के यह धुरंधर गांधी परिवार की ‘कोटरी’ के चेहरे है. यह जो कहते हैं वह गांधी परिवार का स्वर होता है इशारा होता है.

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ऐसे में प्रियंका गांधी का नाम आना यह संकेत है की श्रीमती सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने एक मतेन यह निर्णय ले लिया है की कांग्रेस की कमान किसी गैर और ऐरे गैरे को नहीं दी जा सकती. चुनाव भी संभव नहीं है क्योंकि जो शख्स विजयी होकर आएंगे ये जरूरी नहीं की गांधी परिवार के यहां मत्था टेके.

ऐसे में यह निष्कर्ष सही बैठता है कि बहुत जल्द प्रियंका गांधी वाड्रा कांग्रेस की नई आलाकमान बनने जा रही है.

इस अंधविश्वास के चलते शादी नहीं की थी संजीव कुमार ने

फिल्म इंडस्ट्री में अपने अभिनय की विविधता के चलते एक बेहतर मुकाम हासिल करने वाले प्रतिभाशाली अभिनेता संजीव कुमार का नाम उन फिल्मी हस्तियों में भी शुमार किया जाता है जिन्होंने शादी नहीं की. इस मामले में तो उनका नाम लता मंगेशकर, परवीन बौबी, वहीदा रहमान और नन्दा जैसे कलाकारों से भी पहले लिया जाता है. गुजरात के सूरत में गरीब पारसी परिवार में जन्मे संजीव कुमार का असली नाम हरि भाई जरीवाला था.

दूसरे कई कलाकारों की तरह एक्टिंग का शौक उन्हें भी मुंबई खींच लाया लेकिन उनकी कोई जान पहचान फिल्म इंडस्ट्री में नहीं थी. शुरुआती दौर में बतौर स्ट्रगलर उन्हें छोटे मोटे रोल ही मिले लेकिन ये रोल भी उन्होंने इतनी शिद्दत से निभाए कि जल्द ही वे नामी गिरामी निर्माता निर्देशकों की निगाह में चढ़ गए. असाधारण प्रतिभा के धनी संजीव कुमार ने हर तरह की भूमिकाएं निभाई. हास्य, गंभीर, खलनायक, रोमांटिक और चरित्र अभिनेता के रूप में वे खूब सराहे गए फिर शोले फिल्म के ठाकुर के रोल ने तो नए रिकार्ड गढ़ दिये थे.

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हालांकि फिल्म समीक्षक कभी यह तय नहीं कर पाये कि उन्होंने किस फिल्म में अच्छी एक्टिंग की थी. खिलौना में, सीता और गीता में, कोशिश में, नया दिन नई रात में, त्रिशूल में अंगूर में या फिर आंधी और मौसम में. एक्टिंग के यही शेड्स संजीव कुमार को खास बनाते थे. इसके अलावा स्टार बनने के बाद भी उन्होंने कभी नखरे या गुरूर नहीं दिखाया उल्टे लोग उनकी नम्रता का मिसाल देते थे.

फिल्में चलीं तो उनके रोमांस के चर्चे भी होने लगे कभी उनका नाम जया भादुरी से जोड़ा गया तो कभी हेमा मालिनी और रेखा से भी, लेकिन नूतन से उनके दिली लगाव के किस्से बेहद आम रहने लगे थे. संजीव कुमार की इसे खूबी कह लें या कमजोरी कि वे कभी अपने रोमांस के चर्चों पर कुछ नहीं बोलते थे और न ही इस बारे में कि वे शादी क्यों नहीं कर रहे. नूतन ने रजनीश बहल से शादी के बाद एक बार उन्हें सरे आम थप्पड़ रसीद कर दिया था क्योंकि उनसे उनके रोमांस के चर्चे उनकी शादीशुदा ज़िंदगी में कलह पैदा करने लगे थे.

संजीव कुमार की व्यक्तिगत जिंदगी में दिलचस्पी और दखल रखने वाले आखिर यह रहस्य ढूंढ ही लाये कि वे शादी क्यों नहीं कर रहे. यह रहस्य एक अजीब किस्म का अंधविश्वास था. यह अंधविश्वास भी बड़ा विचित्र था कि उनके परिवार में शादीशुदा मर्द का बेटा जब दस साल का हो जाता है तो उसकी मृत्यु हो जाती है. उनके पिता, चाचा और दादा के साथ ऐसा हो चुका था इसलिए वे शादी के नाम से ही डरने लगे थे लिहाजा उन्होने कुंवारा रहने का ही फैसला ले लिया.

लेकिन इसके बाद भी उनकी मौत तभी हुई जब उनका बेटा दस साल का हो गया. दरअसल संजीव कुमार ने अपने मरहूम भाई नकुल के बेटे को गोद ले लिया था और जब वह दस साल का हुआ तो साल 1985 में 47 साल की उम्र में हार्ट अटैक से चल बसे. इस घटना की चर्चा आज भी फिल्म इंडस्ट्री में होती रहती है. कई लोग इसे वाकई अंधविश्वास मानते हैं तो कई महज इत्तफाक मानते हैं लेकिन यह बात सच के ज्यादा नजदीक लगती है कि यह कोरा अंधविश्वास ही था क्योंकि जिंदगी के आखिरी दिनों में वे शराब बहुत ज्यादा पीने लगे थे.

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हालांकि एक परिवार में लगातार ऐसा होना आनुवंशिकी विज्ञान के लिहाज से शोध का विषय है लेकिन संजीव कुमार के अविवाहित रहने का राज, राज नहीं रह गया था. जिसके चलते वे जिंदगी भर घर गृहस्थी के सुख को तरसते रहे.

टिकटौक स्टार व अभिनेत्री एकता जैन को मिला धर्मेंद्र का साथ

कई सीरियलों और फिल्मों अभिनय कर चुकी अभिनेत्री एकता जैन को ‘‘टिकटौक’’ का अति मशहूर क्रिएटर माना जा रहा है. ‘‘टिकटौक’’ पर एकता जैन के चार लाख से ज्यादा फौलोअर्स और लगभग तीन मिलियन हार्ट हैं. आश्चर्यक तथ्य यह है कि एकता जैन के कई वीडियो को ग्यारह लाख से अधिक व्यूज मिल चुके हैं.

सोशल मीडिया क्वीन के रूप में मशहूर एकता जैन इन दिनों अपने समय के ‘‘ही मैन’’ कहे जाने वाले अभिनेता धर्मेंद्र के साथ हास्य फिल्म ‘‘खली बली’’ में अभिनय कर कर रही हैं.

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‘‘वन इंटरटेनमेंट प्रोडक्शन’’और ‘‘प्राची मूवीज’’ के कमल किशोर द्वारा निर्मित लेखक व निर्देशक मनोज शर्मा की फिल्म ‘‘खली बली’’ के लिए एकता जैन ने कुछ दिन धर्मेंद्र के साथ मुंबई में शूटिंग कर चुकी हैं और अब वह 4 अगस्त को लखनउ में इसी फिल्म की शूटिंग के लिए जा रही हैं.

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धर्मेंद्र के साथ अभिनय करने की चर्चा चलने पर एकता जैन कहती हैं-‘‘धर्मेंद्र के साथ काम करना मेरे एक सपने के पूरे होने जैसा है. मुझे उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला. मैं फिल्म ‘खली बली’ में धर्मेंद्र जी के अलावा असरानी और ब्रजेंद्र काला के साथ भी काम कर रही हूं. यह सभी दिग्गज कलाकार अपने आप में अभिनय के संस्थान हैं. इनके साथ बातें करके और इनके साथ अभिनय करते हुए हमें बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है. इनके साथ काम करते हुए हर दिन अद्भुत अनुभव हो रहे हैं.’’

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नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर ‘नैनीताल’

गरमी से राहत पाने के लिए किसी न किसी हिल स्टेशन पर जाने को मन मचलने लगता है. ऐसे में नैसर्गिक सौंदर्य से लबरेज नैनीताल हमेशा से युवाओं का फेवरिट डैस्टिनेशन रहा है. प्रकृति पे्रेमियों के लिए तो यह शहर स्वप्ननगरी के समान है. तालों के लिए जाने जाने वाले इस शहर की एक बड़ी खासीयत यह भी है कि यहां के जर्रेजर्रे में प्रकृति का सौंदर्य बिखरा है.

समुद्रतल से करीब 2,000 मीटर की ऊंचाई पर बसा नैनीताल उत्तराखंड राज्य का प्रमुख पर्यटन स्थल है. नैनीताल शहर अपनी हरीभरी वादियों, खूबसूरत पहाडि़यों, प्राकृतिक झरनों और तालों के लिए दुनियाभर में जाना जाता है. यहां मौजूद सागौन और देवदार के ऊंचेऊंचे वृक्षों के झुरमुट और नैनी झील के अनुपम सौंदर्य में खो जाने को मगरूर प्रकृति प्रेमियों के साथसाथ देशविदेश के पर्यटकों व नवदंपतियों को यह स्थान हनीमून स्पौट के रूप में भी खूब रास आता है.

अतीत के झरोखे से

वर्ष 1841 में पहली बार पी बैरन नामक अंगरेज ने इस जगह की खोज की थी. इस की नैसर्गिक खूबसूरती से वह इतना प्रभावित हुआ कि उस ने यहां अपना घर ही बनवा लिया और उस का नाम रखा ‘पिलग्राम कौटेज.’ अंगरेजी शासनकाल में ही एक समय ऐसा भी आया, जब गरमियों में इसे उत्तर प्रदेश की राजधानी बनने का गौरव प्राप्त हुआ. ज्ञातव्य है कि कुछ वर्ष पहले उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश का ही भाग था.

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नैनीताल में अनेक दर्शनीय स्थल मौजूद हैं जिन में प्रमुख हैं :

केव गार्डन

केव गार्डन के नाम से प्रसिद्ध इस स्थान पर अनेक आकार की कई छोटीछोटी संकरी गुफाएं मौजूद हैं. यह गार्डन विशेषतया बच्चों को आकर्षित करता है. इस में प्रवेश के लिए बड़ों और बच्चों को अलगअलग शुल्क देना पड़ता है.

नैनी पीक

यहां की सब से ऊंची पहाड़ी नैनी पीक है, जो मुख्य शहर से 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. 2,610 मीटर ऊंची इस चोटी से हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियों और शहर का खूबसूरत नजारा देखा जा सकता है. बस और टैक्सी के अलावा यहां घोड़े की सवारी से भी पहुंचा जा सकता है.

स्नो व्यू

बर्फ से ढकी 2,270 मीटर ऊंचाई पर स्थित स्नो व्यू से उत्तरी हिमालय की चोटियों को देखने का भरपूर आनंद लिया जा सकता है. यहां से हरेभरे वनों से ढकी पहाडि़यों और घाटियों के दृश्य बेहद मनोहारी लगते हैं. यहां पहुंचने के लिए रोप वे से, घोड़े से या फिर पैदल भी जाया जा सकता है.

नैनी झील

प्रसिद्ध नैनी झील, इस शहर के बीचोंबीच स्थित है और यहां आने वाले सैलानियों के मुख्य आकर्षण का केंद्र भी है. इस झील के ऊपरी छोर को मल्लीताल के नाम से जाना जाता है. यहां विशेष रूप से नौका विहार का आनंद लिया जा सकता है. यहां टूसीटर, फोरसीटर बोट्स के अलावा कुछ निजी बोट्स भी चलती हैं. इन सभी का किराया अलगअलग होता है.

टिफिन टौप

टिफिन टौप पहाड़ी को ‘डोरोथी सीट’ के नाम से भी जाना जाता है. इसे ब्रिटिश आर्मी औफिसर ने अपनी पत्नी की याद में बनवाया था. यहां से आसपास की पर्वत शृंखलाओं और शहर की हरीभरी वादियों का आकर्षक व सुंदर नजारा दिखाई देता है, इस पहाड़ी की आकृति टिफिन की तरह है, इसलिए इसे टिफिन टौप भी कहा जाता है.

लैंड्स एंड

लैंड्स एंड मुख्य शहर से 5 किलोमीटर की दूरी पर समुद्रतल से 3,120 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. लैंड्स एंड के आखिरी छोर से खुरपा ताल का विहंगम दृश्य दिखाई देता है. दूर से उस ताल का आकार पशु के समान नजर आता है.

लवर्स पौइंट

टिफिन टौप से थोड़ा पहले एक स्थल, लवर्स पौइंट के नाम से जाना जाता है. यह स्थान युगलों और नवदंपतियों को विशेष रूप से आकृष्ट करता है. यहां चारों ओर धुएं की तरह उड़ते बादलों की खूबसूरती सैलानियों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करती है.

भीमताल

यहां आने वाले पर्यटकों के लिए भीमताल भी आकर्षण का केंद्र है, जो नैनीताल से 22 किलोमीटर दूर स्थित है. एक मिथक के अनुसार पांडवों के भाई भीम की याद में इस ताल का नाम भीमताल रखा गया. इस झील में बोटिंग का अपना ही मजा है.

नौकुचियाताल

9 कोनों वाली यह झील, एकदम शांत और प्रदूषणरहित है. यह भीमताल से करीब 5 किलोमीटर दूर स्थित है. नौकुचियाताल में बोटिंग का विशेष इंतजाम है. 192 फुट गहरी इस झील की परिक्रमा करने में करीब डेढ़ घंटे का समय लगता है. इस झील में बगैर अनुमति के मछली पकड़ना मना है. यहां पर रोइंग बोट्स और पैडल बोट्स भी हैं.

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कब जाएं

वैसे तो पर्यटक सालभर यहां आते रहते हैं लेकिन गरमियों में यहां का मौसम अधिक सुहावना होता है. यहां मौसम पलपल बदलता रहता है.

कैसे जाएं

रेलमार्ग : यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन काठगोदाम है जो नैनीताल से 35 किलोमीटर की दूरी पर है. पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से रोजाना रात 10.30 पर रानीखेत ऐक्सप्रैस जाती है.

सड़क मार्ग : नैनीताल के लिए दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश परिवहन की बसों की अच्छी सुविधा है. यहां के लिए पैकेजिंग टूर की भी व्यवस्था है.

कहां ठहरें : यहां हर तरह के होटल मौजूद हैं. इन के अलावा कई सरकारी गैस्ट हाउस भी हैं. आप अपनी जेब के अनुसार इन में रह सकते हैं.

अन्य आकर्षण

नैनीताल में एक छोटा सा चिडि़याघर भी मौजूद है, जहां कई तरह के पहाड़ी जंतु मौजूद हैं. इस के अलावा ट्रैकिंग का मजा लेने के लिए बेताल घाटी ट्रैक, विनायक ट्रैक, कैंची ट्रैक किलबरी ट्रैक, कुंजरवारक ट्रैक और स्नो व्यू ट्रैक स्थल प्रसिद्ध हैं. ट्रैकिंग के सामान व जानकारी के लिए नैनीताल माउंटेनियरिंग क्लब व कुमाऊं मंडल विकास निगम, नैनीताल से संपर्क कर सकते हैं.

मकान बनाने से पहले

रोटी, कपड़ा और मकान इनसान की बुनियादी जरूरतें हैं. मेरे पास कपड़े थे और रोटियां भी, लेकिन मकान किराए का था. मेरे पिताजी का कहना था कि इस बुनियादी जरूरत को जल्दी से जल्दी पूरा कर लेना चाहिए, क्योंकि दूसरे के मकान में थूकने का भी डर होता है और अपने मकान में मनमानी करने की पूरी छूट होती है, इसलिए इस मनमानी को पूरा करने के लिए मेरे मन में उतावलापन मचा हुआ था.

लेकिन मकान का इंतजाम करना बड़ी टेढ़ी खीर होती है. मैं ने नौकरी करते हुए रिश्वतखोरी को बढ़ावा दिया, ताकि जैसेतैसे मैं अपना एक गरीबखाना बना सकूं.

मेरे हर दोस्त ने अपना यह शौक पलक झपकते ही पूरा कर लिया था. कई तो ऐसे थे, जिन के पास हर आवास योजना में एक मकान था. वे हमेशा मकान जैसी अचल जायदाद बनाने में लगे रहे और मैं हमेशा चंचला लक्ष्मी के पीछे पड़ा रहा.

एक दिन मेरे साथ अनहोनी हो गई. मैं ने एक हाउसिंग सोसाइटी में मकान लेने का फार्म भरा हुआ था. इत्तिफाक कहिए कि मुझे प्लौट अलौट हो गया.

यह सुनते ही मेरा शरीर रोमांचित हो उठा. पत्नी समेत बच्चे बल्लियां उछल पड़े. मदहोशी का एक ऐसा आलम था कि उसे मैं यहां बयान नहीं कर सकता.

मुझे रातदिन मकान के रंगीन सपने आने लगे. खाली जमीन पर सपनों में कोठी बनने लगी. उस को बनाने को ले कर घरेलू बैठकों का सिलसिला शुरू हो गया. नक्शे बनने लगे. सुझाव आने लगे.

पत्नी का कहना था कि अमुक कमरे में पंखा लगेगा, तो मेरा सुझाव था कि कूलर लगवाया जाएगा. बच्चे पढ़ने के बजाय चुपकेचुपके कोर्स की कौपियों में मकान के नक्शे बनाने लगे. बाहर लौनपेड़पौधे और ऊपर खुली बालकनी पर जोर दिया जाने लगा.

मैं इस सारी मुहिम में शामिल तो होता था, लेकिन हमेशा एक हताशा मुझे घेरे रहती थी कि मकान की नींव कैसे खुद पाएगी.

मेरे एक दोस्त हैं महेशजी. 2-3 महीने बाद एक दिन जब वे अचानक मिले, तो उन का हुलिया व चेहरे का भूगोल देख कर मेरे होश फाख्ता हो गए.

मैं ने पूछा, ‘‘क्यों, क्या मकान बनवा रहे हो?’’

वे खुश हो कर बोले, ‘‘आप को कैसे पता चला?’’

मैं ने कहा, ‘‘वह तो आप की शक्ल देख कर ही पता चल गया है. यह आप की बढ़ी हुई दाढ़ी, पिचके हुए गाल, धंसी हुई आंखें, बिना इस्तिरी किए कपड़े… कौन कह सकता है कि आप मकान नहीं बनवा रहे हैं?’’

वे बोले, ‘‘बस, पूछिए मत. भूल कर भी इस करमजले मकान का नाम मत लेना भाई. मुझे पता होता कि यह ऐसे गुल खिलाएगा, तो मैं नींव में सब से पहले खुद कूद जाता.’’

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‘‘क्यों, ऐसा क्या हुआ?’’

‘‘हुआ यह कि जनाब, इस देश में जिन की पत्नियां कमाएं और जो बीड़ी पीता हो, उस का तो ऊपर वाला ही मालिक है. बस, मकान में जो कारीगर आते हैं, वे हर 15 मिनट के बाद बीड़ी पीते हैं. भला बताइए कि वे आप की जान नहीं लेंगे, तो और क्या करेंगे?’’

‘‘लेकिन, मैं क्या करूं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘करना क्या है, इमली के पत्ते पर दंड पेलिए. मकान तो साक्षात काल है, जो मुंह खोले खड़ा है. जो जाता है, वही उस में समा जाता है,’’ महेशजी बोले.

मैं ने कहा, ‘‘जरा, सोचसमझ कर बोलिए. मकान के मामले में कुछ तो अच्छा बोलिए.’’

उन्होंने कहा, ‘‘तुम मेरे हालात देखने के बाद अगर रिस्क लेना चाहते हो, तो शौक से ले लो. मकान वही बना सकता है, जिस का दो नंबर का धंधा हो.’’

‘‘जब एक नंबर ही नहीं है, तो दो नंबर का सवाल ही कहां से आता है?’’

‘‘फिर तो हरि कीर्तन करो. मकान एक ऐसा लड्डू है, जिसे खाने वाला और नहीं खाने वाला दोनों पछताते हैं. मैं ने बनाया है, जान गले में आ गई. लोन के तमाम फौर्म भर कर पैसा उगाह लिया, लेकिन मकान अभी तक अधूरा है. मैं समझता हूं कि अगर मैं ने मकान पूरा बनाया, तो या तो मकान रहेगा या फिर मैं,’’ वे बोले.

यह सुन कर मेरे भी रोंगटे खड़े हो गए. मैं बस इतना ही कह पाया, ‘‘अगर ऐसी बात है, तो मैं मकान न बनाने की शपथ खाता हूं. जिस मकान को बनाने से आदमी को जिंदा ही स्वर्ग नसीब होता है, तो फिर मैं किराए के मकान में ही रह लूंगा.’’

वे हंसते हुए चले गए. उस दिन के बाद से मैं रोज नक्शे बनाता हूं, मकान के स्टाइल पर विचार करता हूं, लेकिन जमीन की बाउंड्रीवाल ही नहीं बन पाती, तो मकान क्या बनेगा.

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मीडिया को मिटाने की चाह

सत्ता से गलबहियां करना मीडिया का काम नहीं है. मगर, आज मीडिया खुद सवालों में घिरा है. सत्ता ने डराओ, धमकाओ, मारो और राज करो की नीति के तहत मीडिया की कमर तोड़ दी है. उस ने उस की स्वतंत्रता छीन ली है. जो बिका उसे उस ने खरीद लिया, जो नहीं बिका उस का दम निकाल दिया.

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल के दिनों में ‘फेक न्यूज अवार्ड्स’ की घोषणा की. अपने खिलाफ अमेरिकी अखबारों में छपने वाली खबरों को झूठी और भ्रामक बताना शुरू कर दिया. अमेरिकी मीडिया की धज्जियां उड़ाने के लिए बाकायदा अवार्ड्स घोषित कर दिए. अपने गुनाह छिपाने के लिए ट्रंप ने ‘सब से भ्रष्ट और बेईमान’ कवरेज के लिए अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार न्यूयौर्क टाइम्स को विजेता घोषित किया. एबीसी न्यूज, सीएनएन, टाइम और वाश्ंिगटन पोस्ट को भी इन अनोखे अवार्ड्स में जगह दी और यह साबित करने की कोशिश की कि ये तमाम मीडिया हाउस वाले सरकार के बारे में सिर्फ गलत ही लिखतेछापते हैं. उन्होंने विजेताओं की सूची बाकायदा रिपब्लिकन नैशनल कमेटी की वैबसाइट पर भी जारी की. जनता की आवाज दबाने का कितना शर्मनाक तरीका है यह. मीडिया पर इस तरह का हमला आश्चर्यजनक है.

गौरतलब है कि ट्रंप हमेशा से अपने ट्वीट्स और बड़बोलेपन को ले कर चर्चित रहे हैं. वे हमेशा से मीडियाविरोधी हैं. अपने चुनाव अभियान के दौरान भी उन्होंने जम कर फेक न्यूज शब्द का इस्तेमाल किया था. राष्ट्रपति बनने के बाद से वे लगातार मीडिया हाउसों और उन के मालिकोंसंपादकों पर निशाना साधते रहे हैं. आजकल वे अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार न्यूयौर्क टाइम्स के संपादक ए जी सल्जबर्जर के पीछे पड़े हुए हैं. वे प्रिंट मीडिया और जर्नलिज्म पर ताबड़तोड़ हमले कर रहे हैं. वे मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं और उसे एक मरता हुआ उद्योग करार देते हैं.

ट्रंप की मंशा

वाश्ंिगटन पोस्ट और न्यूयौर्क टाइम्स पर आरोप लगाते ट्रंप कहते हैं कि उन की सरकार अच्छा काम कर रही है, लेकिन ये दोनों अखबार सरकार के अच्छे कामों को भी नकारात्मक तरीके से पेश करते हैं. वे इन अखबारों द्वारा किए गए खुलासों और आरोपों से खुद को बचाने की कोशिश में मीडिया को लोगों का दुश्मन करार देते हैं. वे उन सवालों के जवाब नहीं देना चाहते जो सवाल ये अखबार उठा रहे हैं.

दरअसल, ट्रंप हमेशा अपने पक्ष में सकारात्मक न्यूज कवरेज चाहते हैं और अपने विरोधियों के लिए आलोचनात्मक खबरें. फेक न्यूज, लोगों का दुश्मन जैसे शब्दों से मीडिया को लगातार कोसना उन का इस लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता है. जो अखबार उन के इस उद्देश्य में बाधा बनते हैं, वे उन के पीछे पड़ जाते हैं.

राजनीति की पिच पर ट्रंप, दरअसल, रेफरी को हर हाल में अपने पाले में करना चाहते हैं. वे रेफरी के फैसलों को अपने पक्ष में नहीं करना चाहते, बल्कि उन का उद्देश्य रेफरी की विश्वसनीयता को पूरी तरह खत्म कर देना है. उन की यह रणनीति काम भी कर रही है, कम से कम ट्रंप के सब से वफादार समर्थकों के बीच में तो जरूर.

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न्यूयौर्क टाइम्स के पीछे ट्रंप इसलिए पड़े हुए हैं क्योंकि इस अखबार ने उन की नाजायज संपत्ति और कर चोरी का खुलासा किया था. अखबार ने लिखा था कि ट्रंप ने अपनी मेहनत से कोई संपत्ति अर्जित नहीं की, जैसा प्रचार उन्होंने चुनाव के समय किया था. ट्रंप और उन के भाईबहनों को उन के बिल्डर पिता से अथाह संपत्ति हासिल हुई है. यह संपत्ति नाजायज तरीके से बनाई गई थी. अखबार कहता है कि ट्रंप और उन के भाईबहनों ने अपने पिता से तोहफे में मिली अरबों डौलर की संपत्ति छिपाने के लिए कई फर्जी कंपनियां बनाईं. यही नहीं, ट्रंप ने लाखों रुपए के कर को छिपाने में भी अपने पिता की मदद की थी.

जबकि, राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ट्रंप ने दावा किया था कि उन के पास जो संपत्ति है वह उन्होंने अपने दम पर बनाई है और उन के पिता फ्रेड ट्रंप से उन्हें कोई वित्तीय मदद नहीं मिली है. जो गोपनीय दस्तावेज, टैक्स रिटर्न के पेपर्स और अन्य वित्तीय रिकौर्ड्स न्यूयौर्क टाइम्स के पास हैं, उन के मुताबिक, ट्रंप को अपने पिता के रियल एस्टेट के साम्राज्य से आज के हिसाब से कम से कम 41.3 करोड़ डौलर मिले थे और इतनी बड़ी धनराशि उन्हें इसलिए मिली थी क्योंकि ट्रंप ने कर अदा करने से बचने में पिता की मदद की थी.

यही नहीं, टं्रप ने अपने मातापिता की रियल एस्टेट की संपत्तियों की कम कीमत आंकने की रणनीति बनाने में भी मदद की थी, जिस से जब ये संपत्तियां उन्हें व उन के भाईबहनों को हस्तांतरित की गईं तो काफी हद तक कर कम हो गया. ट्रंप ने पिता से तोहफे में मिली अरबों डौलर की संपत्ति छिपाने के लिए फर्जी कंपनियां बनाईं और इस तरह सारी ब्लैक मनी को व्हाइट कर लिया.

एक के बाद एक 3 शादियां करने वाले ट्रंप के महिलाओं के साथ भी नाजायज रिश्ते, अश्लील हरकतें और फब्तियां भी किसी से छिपी नहीं हैं. उन की अश्लील हरकतों की कई कहानियां समयसमय पर अखबारों में उजागर होती रही हैं. डोनाल्ड ट्रंप का एक औडियो भी सामने आ चुका है, जिस में वे महिलाओं के बारे में अभद्र बातें करते सुने गए हैं. यह औडियो एक टीवी शो की शूटिंग के दौरान का है.

वहीं, गैरधर्म के प्रति उन की नफरत भी जगजाहिर है. मुसलमानों के प्रति ट्रंप की नफरत उस वक्त जाहिर हुई थी जब 7 दिसंबर, 2015 को उन्होंने सब से विवादित बयान दिया. उन्होंने साउथ कैरोलिना में एक चुनावी रैली में कहा था कि मुसलमानों के लिए अमेरिका के दरवाजे पूरी तरह बंद कर दिए जाने चाहिए. साथ ही, उन्होंने कहा था कि अमेरिका में रहने वाले मुसलमानों के बारे में भी पूरी जांचपड़ताल होनी चाहिए. उन्होंने अपने इस सख्त प्रस्ताव से सिर्फ लंदन के मेयर सादिक खान को ही छूट दी थी. इस पर काफी हंगामा मचा था. आज भी बहुत से लोगों को लगता है कि ट्रंप की मुसलिम विरोधी छवि पूरी दुनिया के लिए खतरनाक है.

लोकतंत्र का चौथा खंभा

भारत में भी ऐसा ही माहौल है. अघोषित तानाशाही से डरे हुए देश में सच की आवाज कौन उठा सकता है? सत्ता से सवाल पूछने की हिम्मत कौन कर सकता है? सरकार के कामों का विश्लेषण करने की हिम्मत किस की है? आज का मीडिया जानता है कि सरकार की ओर उंगली उठाने की गुस्ताखी कौन कर सकता है? जिस ने की, उसे नेस्तनाबूद कर दिया गया, उखाड़ फेंका गया, सलाखों में जकड़ दिया गया, मौत के घाट उतार दिया गया. जी हां, हम उस लोकतांत्रिक देश की बात कर रहे हैं, जहां जनता द्वारा चुनी हुई सरकार से जनता को सवाल पूछने की मनाही है. मीडिया को प्रताडि़त किया जा रहा है, वह भयभीत है.

आप को जज बी एच लोया याद हैं? जज प्रकाश थोंबरे और वकील श्रीकांत खंडेलकर याद हैं? पत्रकार गौरी लंकेश याद हैं? नरेंद्र दाभोलकर याद हैं? गोविंद पानसरे और एम एम कलबुर्गी याद हैं? गुजरात दंगे की हकीकत खोलने वाले आईपीएस संजीव भट्ट का क्या हाल हुआ, देखा आप ने?

इन्होंने सच की राह पर चलने का जोखिम उठाया और सत्ता द्वारा खेत दिए गए. सत्ता के स्याह और डरावने सच की अनगिनत कहानियां हैं. मगर इन कहानियों को कौन कहे? जिन को कहना चाहिए वे बिक गए, मारे डर के सत्ता के भोंपू हो गए. जो नहीं बिके, उन का गला घोंट दिया गया. मीडिया यानी लोकतंत्र का चौथा खंभा अब पूरी तरह जर्जर हो चुका है. कब ढह जाए कहा नहीं जा सकता.

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जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने देश के स्थापित अखबारों पर प्रहार कर रहे हैं वैसे ही यहां भी मीडिया की स्वतंत्रता लगभग खत्म हो चुकी है. सत्ताधारियों के डर और दबाव में व हिंदू कट्टरवाद के समर्थक पत्रकारों के पास बस, एक काम बचा है-चाटुकारिता. आज ज्यादातर अखबारोंपत्रिकाओं में जो कुछ छप रहा है या टीवी चैनलों पर जो कुछ दिखाया जा रहा है, वह सरकार की गौरवगाथा के सिवा कुछ नहीं है.

अरबोंखरबों के विज्ञापनों की खैरात बांट कर सत्ता मीडिया से अपने तलुए चटवा रही है, अपनी वाहवाही करवा रही है और लालची, लोलुप मीडिया-मालिक इसे अपना ‘अहोभाग्य’ कह रहे हैं. भारतीय मीडिया का एक धड़ा, जिसे झोली भरभर कर बख्शिशों से नवाजा गया है, सरकारी भोंपू बना हुआ है. और सख्त कलमों की नोंकें तुड़वा दी गई हैं. जो तोड़ने पर राजी नहीं हुए उन्हें उन की कलम के साथ उठा कर संस्थानों से बाहर फिंकवा दिया गया है.

नार्सिसिस्ट हैं ट्रंप और मोदी

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में काफी कुछ समान है. ट्रंप मोदी के बड़े फैन हैं. वे कई मौकों पर प्रधानमंत्री मोदी और भारत की तारीफ भी कर चुके हैं. दोनों में पटती भी खूब है. ट्रंप मोदी को अपना दोस्त बताते नहीं थकते. अमेरिका आने पर उन का शानदार स्वागतसत्कार करते हैं. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लोकसभा चुनाव 2019 की प्रचंड जीत पर बाकायदा टैलीफोन कर के बधाई दी. तू मेरी खुजा, मैं तेरी खुजाता हूं, वाली दोस्ती है दोनों के बीच. वही अमेरिका, जिस ने कभी मोदी को वीजा देने से इंकार कर दिया था, आज मोदी की राह में पलकपांवड़े बिछाए हुए है. क्यों? क्योंकि सत्ताशीर्ष पर बैठे दोनों धुरंधरों के मिजाज मिलते हैं, व्यवहार मिलते हैं, कर्म मिलते हैं, सोच मिलती है, रवैया मिलता है. दोनों अपने आगे पूरी दुनिया को बौना समझते हैं. दोनों सवाल पूछने वालों से नफरत करते हैं. दोनों सच से परहेज करते हैं. दोनों मीडिया को अपने अंगूठे के नीचे रखना चाहते हैं.

दोनों गे्रट शोमैन हैं, अच्छे वक्ता हैं. उन्हें पता है भीड़ को कैसे खुश करना है और विरोधियों को कैसे नीचा दिखाना है. मोदी और ट्रंप दोनों ही नार्सिसिस्ट हैं. नार्सिसिस्ट यानी ऐसे शख्स जो खुद से बेहद प्यार करते हैं. जो अपनी वाकपटुता के चलते अपनी कमजोरियों को छिपा सकते हैं. अपनी अलग आदतों के चलते आकर्षक लगते हैं और जनता को आकर्षित कर लेते हैं. मगर उन का मोह मानसिक और शारीरिक रूप से हानि पहुंचाता है. ऐसे लोगों को लगता है कि वे बेहद प्रतिभाशाली हैं और जनता की दिक्कतें दूर करने के लिए ऊपर वाले ने उन्हें धरती पर भेजा है.

कुछ ऐसा ही हाल ट्रंप और मोदी का है. अपने चुनावप्रचार के दौरान ट्रंप ने भारतीय मूल के वोटरों का दिल जीतने के लिए नरेंद्र मोदी के मशहूर नारे ‘अब की बार, मोदी सरकार’ की नकल कर अपना नारा बनाया, ‘अब की बार, ट्रंप सरकार.’ मोदी ने आम चुनाव में जनता को ‘अच्छे दिनों’ का सपना दिखाया था. ट्रंप ने इसी तर्ज पर अमेरिका को फिर से महान बनाने की अपील जनता से की.

ट्रंप और मोदी दोनों पर ही अल्पसंख्यकों के प्रति दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगता रहा है. मोदी ने कोलकाता में अपने एक भाषण के दौरान बंगलादेशी प्रवासियों पर पाबंदी लगाए जाने की धमकी दी थी. हालांकि, उन्होंने एक बार यह भी कहा था कि बंगलादेशी हिंदू प्रवासियों का भारत में स्वागत है.

दूसरी तरफ ट्रंप के दिल में मुसलमानों और मैक्सिको के प्रवासियों के प्रति नफरत भरी हुई है. चुनावप्रचार के दौरान ट्रंप ने मुसलमानों को अमेरिका में घुसने से रोकने और मैक्सिको के प्रवासियों को अमेरिका में घुसने से रोकने के लिए बड़ी दीवार बनाए जाने की बात कही थी. इस तरह दोनों पर ही उग्र राष्ट्रवाद हावी है. और इस उग्र राष्ट्रवाद की राह में सब से बड़ा रोड़ा है मीडिया, जिस को खत्म करना दोनों की प्राथमिकता है.

जेनेट मैल्कम ने ‘द जर्नलिस्ट ऐंड द मर्डरर’ में लिखा है, ‘जो पत्रकार किसी के कहे को बिना किसी शंका की नजर से देखे हुए निगल कर हूबहू पेश करता है, उसे पत्रकार नहीं, बल्कि प्रचारक की संज्ञा दी जानी चाहिए.’ सच लिखा, क्योंकि सत्ता से गलबहियां करना तो मीडिया का काम नहीं है.

एक राजनीतिक पत्रकार की भूमिका, जनता की तरफ से सिर्फ जरूरी सवाल करना ही नहीं होता, बल्कि अगर राजनेता सवाल से बचने की कोशिश कर रहा है या तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश कर रहा है, तो उस को दृढ़तापूर्वक चुनौती देना भी होता है. मीडिया का काम है शक करना और सवाल पूछना. सरकार के काम का विश्लेषण करना और जनता को सच से रूबरू कराना. इसीलिए, इसे लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता है. मगर, आज मीडिया खुद सवालों में घिरा हुआ है. सत्ता ने डराओ, धमकाओ, मारो और राज करो, की नीति के तहत मीडिया की कमर तोड़ दी है, उस की स्वतंत्रता हर ली है. जो बिका सत्ता ने उसे खरीद लिया, जो नहीं बिका उस का दम निकाल दिया.

मोदी का भोंपू मीडिया

अमेरिकी मीडिया जहां हार मानने को तैयार नहीं है और जिस ने एकजुट हो कर ट्रंप की जवाबदेही तय करने का फैसला किया है, वहीं भारतीय मीडिया का एक धड़ा, जिसे खूब बख्शिश और मुआवजों से लाद दिया गया है, मोदी का भोंपू बन कर उभरा है. यह अब मोदी की सेना की तरह काम कर रहा है. खूब शोर मचा रहा है और जनता से जुड़े हर मुद्दे हर सवाल को पीछे ढकेल देता है. यह प्रधानमंत्री के लिए प्रधानमंत्री के कहे अनुसार मनमाफिक इंटरव्यू प्लैन करता है. उन के मनमाफिक सवालजवाब तैयार करता है और उस का खूब प्रचारप्रसार करता है. वह देशहित से जुड़ा, जनता की समस्याओं से जुड़ा प्रधानमंत्री को असहज करने वाला कोई सवाल नहीं पूछता.

कितनी हैरत की बात है कि 26 मई, 2014 को कुरसी पर बैठने के बाद पूरे 5 वर्षों तक मोदी ने एक भी प्रैस कौन्फ्रैंस नहीं की. जबकि किसी लोकतंत्र के प्रधानमंत्री द्वारा प्रैस कौन्फ्रैंस करना स्वतंत्र मीडिया (जिसे वर्तमान सरकार सैकुलर्स और प्रौस्टिट्यूट्स कह कर पुकारती है) पर किया जाने वाला एहसान नहीं है, बल्कि यह सरकार की सब से बड़ी जिम्मेदारी है. सत्ता से सवाल पूछना स्वतंत्र प्रैस का अधिकार है. मगर प्रधानमंत्री मोदी ने इस अधिकार से मीडिया को वंचित रखा.

सोशल मीडिया के जरिए मोदी का किसी सम्मानित बुजुर्ग जैसा एकतरफा संवाद और रेडियो पर प्रसारित होने वाला उन का निजी एकालाप, वास्तव में लोकतंत्र और एक स्वतंत्र प्रैस की भूमिका के प्रति निकृष्ट अवमानना के भाव को प्रकट करता है. इसे सवालों से बचने की रणनीति कहा जाता है. जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने, मुख्यधारा के मीडिया के प्रति जिन की नफरत के बारे में सब को पता है, व्हाइट हाउस (अमेरिकी राष्ट्रपति निवास) में नियमित प्रैस कौन्फ्रैंस की परंपरा को अभी समाप्त नहीं किया है.

सवाल पूछने के हक से वंचित

लोकतांत्रिक दुनिया में मोदी एकमात्र ऐसे नेता हैं जिन्होंने आधिकारिक तौर पर सवाल पूछे जाने की प्रथा को अंगूठा दिखा दिया है. उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रैस सलाहकार तक की नियुक्ति नहीं की है, जबकि इस का रिवाज सा रहा है. भाजपा के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी इस का पालन किया था. इस पद पर किसी को बैठाए जाने से प्रैस को प्रधानमंत्री के उन के अनेक वादों के बारे में सवाल पूछने में आसानी होती, मगर जब वादे पूरे ही नहीं करने हैं तो सवाल कैसे पूछने देते?

विदेशी दौरों के वक्त प्रधानमंत्री के हवाई जहाज में पत्रकारों को साथ ले जाने की परंपरा को भी मोदी ने खत्म कर दिया है. तब प्रधानमंत्री के सहयात्री होने से संवाददाताओं और संपादकों को प्रधानमंत्री से सवाल पूछने का मौका मिलता था.

गौरतलब है कि मोदी के पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह, जिन का ‘मौनमोहन सिंह’ कह कर मोदी मजाक उड़ाया करते थे, यात्रा के दौरान हवाई जहाज में पत्रकारों के साथ प्रैस कौन्फ्रैंस किया करते थे. इस में वे पत्रकारों के तमाम सवालों के जवाब दिया करते थे और ये सवाल पहले से तय या चुने हुए नहीं होते थे. मनमोहन सिंह ने कार्यालय में रहते हुए कम से कम 3 बड़ी प्रैस कौन्फ्रैंस कीं (2004, 2006, 2010), जिन में कोई भी शिरकत कर सकता था. पत्रकार राष्ट्रीय हित के मसलों पर प्रधानमंत्री से सीधे अहम सवाल पूछ सकते थे.

अमेरिकी राष्ट्रपति भी विदेश दौरों के दौरान अपने साथ मीडिया के दल को ले कर जाते हैं और जरूरी सवाल पूछने के इस मौके को पत्रकारों के लिहाज से काफी सामान्य सी चीज माना जाता है. मगर मोदी को आजाद प्रैस बिलकुल नहीं सुहाती है. उन का यह स्वभाव

आज का नहीं है. इस का इतिहास 2002 के गुजरात दंगों से ही शुरू होता है. अपनी बात कहने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर के उन्होंने संवाद के परंपरागत माध्यमों को दरगुजर करने की कोशिश की है.

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