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Bihar Elections : क्या भाजपा देगी नीतीश को झटका

Bihar Elections : नीतीश कुमार की साख भी अब पहले जैसे नहीं रही है. एक तो उन की राजनीतिक निष्ठा पासे की तरह पलटती रहती है और दूसरे उन के खराब स्वास्थ्य और सरकार की कार्यशैली के कारण उन के प्रति विश्वास में कमी आई है. नीतीश कुमार वैसे भी अब 74 साल के हो गए हैं. ऐसे में उन के नेतृत्व को ले कर अभी से सवाल उठ रहे हैं.

बिहार विधानसभा चुनाव की सरगर्मी बढ़ने लगी है और चुनावी समीकरण आकार ले रहे हैं. बिहार की वर्तमान नीतीश सरकार का कार्यकाल 23 नवंबर 2020 से शुरू हुआ था, जिस का कार्यकाल 22 नवंबर 2025 तक है. जाहिर है कि इस से पहले चुनाव होंगे. माना जा रहा है कि सितंबर से अक्तूबर के बीच बिहार में आचार संहिता लग जाएगी.

बिहार में एक बार फिर से चुनावी गठबंधन की बात जोरशोर से उठ रही है. बिहार का चुनाव इस बार कई मायनों में बहुत अलग होने जा रहा है. बिहार की राजनीति सीधे केंद्र की राजनीति पर असर डालती है. इसलिए केंद्र की मोदी सरकार के लिए बिहार का समीकरण भी काफी अहम है. इस बार बिहार का चुनाव एक बार फिर नीतीश कुमार के इर्दगिर्द बुना जा रहा है.

गौरतलब है कि बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव में 243 सीटों की विधानसभा में भाजपा 110 सीटों पर और जेडीयू 115 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. इस बार सीटों के बंटवारे को ले कर रस्साकशी और सौदेबाजी देखने को मिल सकती है क्योंकि पिछली बार जेडीयू मात्र 43 सीटें ही जीत पाई थी.

भाजपा ने वैसे तो नीतीश की जनता दल यूनाइटेड के नेतृत्व में चुनाव लड़ना स्वीकार किया है मगर इरादा उस का यही है कि किसी तरह नीतीश के पैरों के नीचे से सत्ता की कालीन खींच ली जाए. ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि अब की बिहार चुनाव नीतीश के राजनीतिक भविष्य की दिशा भी तय कर देगा. राजनीति में अनिश्चितता तो रहती है, लेकिन बिहार में भाजपा अभी तो यही कह रही है कि एनडीए विधानसभा का चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ेगा.

दूसरी तरफ तेजस्वी यादव विरोधी दल के नेता के रूप में काफी मुखर हैं. राहुल गांधी कांग्रेस के लिए जमीन तलाशने में पूरा जोर लगा रहे हैं तो उधर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी को भी उम्मीद है कि उन की पार्टी बिहार में अच्छा प्रदर्शन करेगी.

लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान बिहार के अगले ‘नीतीश’ बनने के फेर में हैं. चिराग पासवान की राजनीति इन दिनों बिहार के सीएम नीतीश कुमार के ही इर्दगिर्द घूम रही है. कभी पक्षधरता के साथ तो कभी विरोध के साथ. वह भी नीतीश कुमार के अंदाज में यानी जब मौका मिला तो यह दोहरा देना कि बिहार मुझे बुला रहा है. या केंद्र की राजनीति में नहीं रहूंगा और बिहार ही मेरी राजनीति का अब केंद्र होगा. इन बदले हुए अंदाज में चिराग पासवान चाहे जो चाहते हों, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे माना जा रहा है कि खुद को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट कर उस समय का इंतजार कर रहे हैं जहां मजबूरी के सीएम की जरूरत हो.

चुनाव के मद्देनजर अब बिहार में नेताओं के भाषणों में कसैलापन और कड़वाहट बढ़ गई है. बजट सत्र में ही इस की झलक दिख चुकी है. तेजस्वी यादव हों या फिर नीतीश कुमार दोनों ही व्यक्तिगत हमला कर रहे हैं. एनडीए हो या फिर इंडिया गठबंधन दोनों तरफ से व्यक्तिगत हमले हो रहे हैं. नीतीश कुमार सदन में तेजस्वी को बच्चा कह कर बात करते हैं. इस तरीके से वह उन के कद को कम करने का प्रयास करते हैं. नीतीश का कहना है कि उन्होंने तेजस्वी के पिता लालू यादव के साथ राजनीति की है. ऐसे में वह उन्हें क्या सिखाएंगे? राजद नेता तेजस्वी यादव इस समय नीतीश कुमार के साथ ही उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का भी राजनीतिक हमला झेल रहे हैं. इस के साथ ही अन्य नेता भी तेजस्वी पर हमलावर हैं.

बिहार की चुनावी राजनीति में जाति का वर्चस्व एक अहम फैक्टर है और यह बात भगवा पार्टी के नेताओं के दिमाग में पहले से ही है. इस बार के चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग की बड़ी भूमिका देखने को मिलेगी. जमीन पर उतरने वाले नेता लोगों को केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की नीतीश कुमार सरकार की जनकल्याण के लिए किए गए कार्यों का बढ़चढ़ कर बखान करेंगे.

उस के आगे क्या होगा? चुनाव के बाद क्या परिणाम आते हैं? कैसी परिस्थितियां होंगी? राजद का प्रदर्शन कैसा होगा? अगर राजद के पास सीटें अच्छी आती हैं तो नीतीश कुमार के पास राजद के साथ जाने का विकल्प होगा. पलटूराम कभी भी पलटी मार सकते हैं. पिछली बार जेडीयू का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा था. इस के बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री इसलिए बनाया गया क्योंकि उन के पास दूसरा विकल्प मौजूद था. इस समय जेडीयू और राजद के रिश्ते खराब हैं. ऐसे में भाजपा और जेडीयू का चुनाव में साथ आना मजबूरी है.

इधर मोदी सरकार ने अचानक ही देश में जाति जनगणना कराने का ऐलान कर दिया है. मोदी कैबिनेट के इस फैसले के बाद आगामी बिहार चुनाव में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव को बड़ा झटका लगा है. भाजपा को घेरने के लिए जाति जनगणना का मुद्दा विपक्ष का बहुत मजबूत हथियार था जिसे मोदी कैबिनेट के फैसले ने भोथरा कर दिया है.

हाल के वर्षों में कांग्रेस नेता राहुल गांधी जाति जनगणना कराने की मांग संसद के अंदर और बाहर करते रहे हैं. बिहार चुनाव से पहले मोदी कैबिनेट के इस फैसले ने राहुल गांधी के तरकश से एक धारदार तीर छीन लिया है. बिहार में जाति आधारित वोट-बैंक हमेशा से निर्णायक रहा है. भाजपा के इस कदम ने विपक्षी नेताओं, खासकर कांग्रेस के राहुल गांधी और राजद के तेजस्वी यादव को रणनीतिक रूप से बैकफुट पर ला दिया है, जो लंबे समय से जाति जनगणना की मांग को अपना प्रमुख मुद्दा बनाए हुए थे. विपक्ष हक्का बक्का तो है, मगर खिसियानी हंसी के साथ अब इस बात का श्रेय लेने की होड़ में लग गया है कि जाति जनगणना की मांग तो वे ही पहले कर रहे थे. हर पार्टी ये दावा कर रही है कि उन के दबाव में ही मोदी सरकार को ऐसा फैसला लेना पड़ा है.

आखिर जाति जनगणना का विरोध करने वाली भाजपा ने अचानक इसे कराने का ऐलान कैसे कर दिया? दरअसल 22 अप्रैल को कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के कारण मोदी सरकार देश की सुरक्षा को ले कर सवालों के कटघरे में है. अभी तक हुए आतंकी हमलों में आतंकी ज्यादातर सेना और पुलिस के जवानों पर ही हमले करते आए हैं, मगर पहली बार दहशतगर्दों ने देशभर से कश्मीर घूमने आए पर्यटकों को उन का धर्म पूछ कर अपनी गोलियों का शिकार बनाया. एक ऐसे पर्यटक स्थल बैसरन पर जहां हर दिन कोई दो हजार पर्यटक घूमने आते हों, वहां राज्य सरकार और केंद्र सरकार की ओर से सुरक्षा का कोई इंतजाम न होना, दूरदूर तक कोई सुरक्षाकर्मी न होना और खुफिया तंत्र को हथियारबंद आतंकियों का वहां तक आराम से पहुंचने और 25 मिनट तक गोलीबारी कर 26 पर्यटकों की जान ले कर आराम से निकल जाने की कोई खबर न होना, बहुत बड़ी सुरक्षा चूक है, जिस की जिम्मेदार केंद्र सरकार है.

फिर जिस दिन यह घटना हुई प्रधानमंत्री मोदी जद्दा के दो दिन के टूर पर थे. घटना की खबर सुन कर वे टूर रद्द कर देश वापस तो लौटे मगर बजाए घटनास्थल पर पहुंचने के, वे सीधे बिहार पहुंच गए, जहां चुनावी सरगर्मियां तेज हैं और वहां से उन्होंने रैली को सम्बोधित करते हुए पहलगाम की घटना पर शोक जताया. इस बात को ले कर भी सोशल मीडिया पर भाजपा की काफी किरकिरी हो रही है. ऐसे में कुछ तो ऐसा करना था जिस से यह कलंक कुछ मद्धम पड़े. तो यही दांव मोदी सरकार को जंचा कि जाति जनगणना का ऐलान कर के एक तीर से दो शिकार कर लिए जाए. विपक्ष को भी पटखनी मिल जाए और टीवी चैनलों, अखबारों और सोशल मीडिया पर जारी चर्चाओं में पहलगाम की घटना की जगह जातीय जनगणना ले ले.

मोदी कैबिनेट का यह फैसला बिहार में ओबीसी और ईबीसी वोटरों को साधने की रणनीति का हिस्सा भी है. पिछले दो दशकों में भाजपा ने सामाजिक इंजीनियरिंग के जरिए यादव मुसलिम समीकरण से इतर अति पिछड़ा वर्ग में अपनी पैठ बनाई है. जाति जनगणना का वादा इन वोटरों को यह संदेश देता है कि केंद्र सरकार उन की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है. लेकिन यह कब तक सुनिश्चित होगा इस की कोई निश्चित तारीख नहीं घोषित की गई है.

खैर, मोदी सरकार का यह दांव विपक्ष के लिए काफी उलझन पैदा कर रहा है. खासकर बिहार में, जहां विधानसभा चुनाव सिर पर हैं. राहुल गांधी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में ‘जितनी आबादी, उतनी भागीदारी’ का नारा दिया था. अब वे इस मुद्दे पर भाजपा को श्रेय लेने से रोकने के लिए नई रणनीति तलाश रहे हैं. तेजस्वी यादव, जिन्होंने 2023 के सर्वे का श्रेय लिया था, अब यह दावा नहीं कर पाएंगे कि केवल उन की पार्टी ही पिछड़ों की हितैषी है.

विश्लेषकों का मानना है कि अगर भाजपा इस जनगणना को प्रभावी ढंग से लागू करती है, तो महागठबंधन का ओबीसी-मुसलिम गठजोड़ कमजोर पड़ सकता है. कुल मिला कर बिहार के आगामी चुनाव में जाति जनगणना कराने का ऐलान भाजपा के लिए काफी मददगार साबित हो सकता है. मोदी के इस मास्टर स्ट्रोक ने बिहार के चुनावी समीकरण को और जटिल बना दिया है.

नीतीश कुमार की साख भी अब पहले जैसे नहीं रही है. एक तो उन की राजनीतिक निष्ठा पासे की तरह पलटती रहती है और दूसरे उन के खराब स्वास्थ्य और सरकार की कार्यशैली के कारण उन के प्रति विश्वास में कमी आई है. नीतीश कुमार वैसे भी अब 74 साल के हो गए हैं. ऐसे में उन के नेतृत्व को ले कर अभी से सवाल उठ रहे हैं. नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को ले कर पूरी की पूरी रणनीति तैयार की जा रही है.

साल 2005 में जब नीतीश ने सत्ता संभाली थी तो यह कहा जाता था कि बहुत अच्छे शब्द बोलने वाले व्यक्ति के पास सत्ता आई है. इस से इतर पिछले दिनों में उन का भाषण देखें, उन का स्टाइल देखें, वह कैसे गुस्सा हो जा रहे हैं. सभी महसूस कर रहे हैं कि उन का स्वास्थ्य अब अच्छा नहीं है. हालांकि अभी भी वे खुद को काफी सक्रिय दिखाते हैं और ऐसी स्थिति नहीं आई है कि भाजपा उन से पल्ला झाड़ कर अकेले दम पर चुनाव में उतर जाए. नीतीश कुमार के पास 14 प्रतिशत वोट है और भाजपा भी इस बात को मानती है. यह वजह है कि नीतीश कुमार जिस तरफ जाते हैं, जीत उसी की होती है.

भाजपा बिहार में इस बात को ले कर आश्वस्त ही नहीं है कि वह अकेले चुनाव लड़ कर चुनाव जीत सकती है. वैसे कुछ राजनितिक विश्लेषक यह मानते हैं कि यदि भाजपा अकेले चुनाव लड़ जाए तो शायद वहां सब से बड़ी पार्टी बन कर उभरे, लेकिन भाजपा फिलहाल नीतीश कुमार को चुनाव तक साथ रखना चाहती है. भाजपा अभी बहुत संभल कर राजनीति कर रही है, जिस से नीतीश कुमार दूर भी न जाएं और वह अपने पैरों पर खड़ी भी हो जाए. बिहार में नीतीश कुमार भाजपा की जरूरत है. उन के बिना भाजपा चुनाव नहीं जीत सकती है. दोनों ही इस रिश्ते से खुश नहीं हैं लेकिन इसे निभाया जा रहा है. नीतीश कुमार को ले कर भाजपा नेताओं में बेचैनी भी बहुत है. चुनाव के बाद यह बेचैनी और ज्यादा बढ़ेगी. चुनाव में सीट जीतने का अनुपात अगर पिछली बार की तरह ही रहा तो इस बार बिहार में महाराष्ट्र जैसी राजनीति देखने को मिलेगी.

उत्तर प्रदेश में जिस तरह मुलायम सिंह यादव ने अपने पूरे परिवार को राजनीति में दक्ष किया. बेटों और भाइयों को ही नहीं बल्कि घर की बहुओं को भी राजनीति के गुण सिखाए, वहीं नीतीश कुमार ने अपने बाद दूसरी पंक्ति का कोई नेता उभरने नहीं दिया. बीते 23 साल से पूरी जेडीयू उन के ही इर्दगिर्द घूम रही है. अब जब उन की उम्र ढल रही है तब उन्होंने अपने बेटे निशांत कुमार को कुछ आगे किया है. मगर 40 साल की उम्र पार कर रहा व्यक्ति क्या नीतीश की राजनीतिक विरासत को संभाल पाएगा?

बिहार के नेताओं का मानना है कि नीतीश कुमार के बाद जेडीयू का अस्तित्व मुश्किल में लगता है. उन्होंने अपने बेटे को राजनीति में उस तरह से नहीं बड़ा किया, जिस तरह से बाल ठाकरे ने किया था. वहां यह बात स्पष्ट थी कि उद्धव ठाकरे को बाल ठाकरे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर रहे हैं. मगर नीतीश की राजनीति उन्हीं पर केंद्रित रही है. उन के बेटे निशांत कुमार ने सक्रिय राजनीति में भाग नहीं लिया है. ऐसे में उन के पास ज्यादा अवसर नहीं है. जेडीयू कार्यकर्ताओं की पार्टी नहीं, जातिगत आधार पर खड़ी पार्टी है. नीतीश ने जातिगत आधार पर उपेंद्र कुशवाहा को आगे बढ़ाया था, लेकिन फिर आगे जाने नहीं दिया. प्रशांत किशोर भी एक समय नीतीश के बहुत करीबी थे लेकिन उन के करीब जो भी रहा है वह ज्यादा समय तक उन के साथ नहीं रहा. बिहार की राजनीति में यह भी चर्चा होती है कि जो नेता जेडीयू में नीतीश के बहुत करीब हैं. वह भाजपा के भी उतने की करीब हैं. ऐसे में नीतीश कुमार के बाद जेडीयू का क्या भविष्य होगा, कुछ भी कहा नहीं जा सकता है.

Family Story : राहुल बड़ा हो गया है – राहुल की तीमारदारी ने कैसे बदली मां की सोच

Family Story : अमित से मैं अकसर इस बात पर उलझ पड़ती हूं कि राहुल अभी छोटा है. वह कभी हंस देते हैं, कभी झुंझला उठते हैं कि इतना छोटा भी नहीं है जितना तुम समझती हो.

अमित कहते हैं, ‘‘14 साल पूरे करने वाला है और तुम उसे छोटा ही कहती हो. मैं तो समझता हूं कि कल को उस के बच्चे भी हो जाएंगे तब भी राहुल तुम्हें छोटा ही लगेगा.’’

मैं इस तरह की बातें अनसुनी करती रहती हूं. बेटी मिनी, जो 16 की हुई है, वह भी अपने पापा के सुर में सुर मिलाए रखती है. वह भी यही कहती है, ‘‘छोटा है, हुंह, स्कूल में इस की मस्ती देखो तो आप को पता चलेगा कि यह कितना छोटा है.’’

मैं कहती हूं, ‘‘तो क्या हुआ, छोटा है तो मस्ती तो करेगा ही,’’ मतलब मेरे पास इन दोनों की हर बात का यही जवाब होता है कि राहुल अभी छोटा है. यह तो शुक्र है कि राहुल ने बहुत तेज दिमाग पाया है. कक्षा में हमेशा प्रथम स्थान प्राप्त करता है. खेलकूद में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेता है. जिस में भाग लेता है उसी में प्रथम स्थान प्राप्त करता है. यहीं पर अमित उस से बहुत खुश हो जाते हैं नहीं तो उसे मेरा छोटा कहना दोनों बापबेटी के लिए अच्छाखासा मनोरंजन का विषय रहता है. अब मैं क्या करूं, अगर वह मुझे छोटा लगता है. वैसे भी सुना है कि मां के लिए बच्चे हमेशा छोटे ही रहते हैं.

ठीक है, उस का कद मुझे पार कर गया है. मैं जो अच्छीखासी लंबी हूं, राहुल के कंधे पर आने लगी हूं. उस की हर समय खेलकूद की बातें, उस के चेहरे पर रहने वाली भोली सी मुसकराहट, बस, मुझे कुछ दिखाई नहीं देता, न घर में सब को पार करता उस का कद, न उस के होंठों के ऊपर हलकी सी उभरती मूंछों की कालिमा.

अभी एक हफ्ते पहले मैं ने राहुल का एक दूसरा ही रूप देखा जिसे देख कर मैं ने भी महसूस किया कि राहुल बड़ा हो गया है.

मेरी तबीयत अकसर ठीक नहीं रहती है. कभी कुछ, कभी कुछ, लगा ही रहता है. पिछले हफ्ते की बात है. एक दिन घर का सामान लेने बाजार जाना था. मेरी तबीयत सुबह से ही कुछ सुस्त थी. अमित टूर पर थे, मिनी की परीक्षाएं चल रही थीं. सामान जरूरी था, अत: राहुल और मैं शाम को 4 बजे के आसपास बाजार चले गए. यहां मुंबई में किसी भी दिन किसी भी समय कहीं भी चले जाइए भीड़ ही भीड़, लोग ही लोग. कोई कोना खाली नहीं दिखता.

मुंबई आए 7 साल होने को हैं लेकिन आज भी बाहर निकलती हूं तो हर तरफ भीड़ देख कर जी घबरा जाता है. साधारण हाउसवाइफ हूं, बाहर अकेले कम ही निकलती हूं.

खैर, उस दिन बाजार में सामान लेतेलेते एक जगह सिर बहुत भारी लगने लगा. अचानक ही मुझे तेज चक्कर आया और मैं पसीनेपसीने हो उठी. साथ ही पेट के अंदर कमर के पास तेज दर्द शुरू हो गया. राहुल मेरी हालत देख कर घबरा उठा. मैं ने उसे अपना पर्स व सामान थमाया और इतना ही कहा, ‘‘राहुल, तुरंत डाक्टर के पास चलो.’’

राहुल ने तुरंत आटो बुलाया और मुझे उस में बैठा कर मेरे फैमिली डाक्टर के नर्सिंग होम पहुंचा. रास्ते में मैं ने उसे मिनी को फोन कर के बताने को कहा. डाक्टर ने पहुंचते ही मेरा चेकअप किया और बताया, ‘‘ब्लडप्रेशर बहुत हाई है. मुझे कुछ टेस्ट करने हैं. दर्द के लिए इंजेक्शन दे रहा हूं, आज आप को यहां भरती होना पड़ेगा.’’

मैं यह सोच कर परेशान हो गई कि अमित शहर में नहीं हैं और परीक्षा की तैयारी में व्यस्त मिनी घर पर अकेली है.

मैं अपनी परेशान हालत में कुछ और सोचती इस से पहले ही राहुल बोल उठा, ‘‘अंकल, मम्मी आज यहीं रुक जाएंगी. मैं सब देख लूंगा,’’ आगे मुझ से बोला, ‘‘आप बिलकुल किसी बात की चिंता मत करो, मम्मी. मैं यहीं हूं, मैं हर बात का ध्यान रखूंगा.’’

दर्द से तड़पती मैं उस हाल में भी गर्वित हो उठी यह सोच कर कि मेरा छोटा सा बेटा कैसे मेरी देखभाल के लिए तैयार है. दर्द से मेरी जान निकल रही थी. शायद इंजेक्शन से थोड़ी देर में मुझे नींद भी आ गई. इस बीच राहुल ने मिनी को फोन कर के कुछ पैसे और मेरे लिए खाने को कुछ लाने के लिए कहा.

रात 8 बजे मेरी आंख खुली, तो देखा, दोनों बच्चे मेरे सामने चुपचाप उदास बैठे थे. मन हुआ उठ कर दोनों को अपने सीने से लगा लूं. दर्द खत्म हो चुका था, कमजोरी बहुत महसूस हो रही थी.

मैं बच्चों से बोली, ‘‘अब मैं ठीक हूं. तुम लोग अब घर चले जाओ, रात हो गई है.’’

मैं ने अपनी 2-3 सहेलियों के नाम ले कर कहा, ‘‘उन लोगों को बता दो, उन में से कोई एक यहां रुक जाएगा रात को.’’

मैं आगे कुछ और कहती, इस से पहले ही राहुल बोल उठा, ‘‘नहीं, मम्मी, जब मैं यहां हूं और किसी को बुलाने की जरूरत नहीं है. आप देखना, मैं आप का अच्छी तरह ध्यान रखूंगा. मिनी दीदी, आप जाओ, आप के पेपर हैं. मम्मी और मैं सुबह आ जाएंगे.’’

राहुल आगे बोला, ‘‘हां, एक बात और मम्मी, हम पापा को नहीं बताएंगे. वह टूर पर हैं, परेशान हो जाएंगे. वैसे भी 2 दिन बाद तो वह आ ही जाएंगे.’’

मैं अपने छोटे से बेटे का यह रूप देख कर हैरान थी. मिनी को हम ने समझा कर घर भेज दिया. वैसे भी वह एक समझदार लड़की है. राहुल ने अपने हाथों से मुझे थोड़ा खाना खिलाया और कुछ खुद भी खाया. मेरे राहुल ने कितनी देर से कुछ भी नहीं खाया था, सोच कर मैं लेटेलेटे दुखी सी हो गई.

कुछ दवाइयों का असर था शायद मैं फिर सो गई लेकिन रात को मैं ने जितनी बार आंखें खोलीं, राहुल को बराबर के बेड पर जागते ही पाया. सुबह मुझे पता चला कि किडनी में पथरी का दर्द था. खैर, उस का इलाज तो बाद में होना था. ब्लडप्रेशर सामान्य था.

अब मैं डाक्टर की हिदायतों के बाद घर जाने को तैयार थी. डाक्टर से दवाई समझता, सब बिल चुकाता, एक हाथ से मेरा हाथ, दूसरे में मेरा पर्स और बैग थामता राहुल आज मुझे सच में बड़ा लग रहा था. अस्पताल से निकलते हुए मैं यही सोच रही थी कि अमित और मिनी ठीक कहते हैं राहुल बड़ा हो गया है.

Hindi Kahani : चाय की दुकान – हमारे खबरीलाल बादो चाचा

Hindi Kahani : चाय की दुकान, जहां दुनिया से जुड़ी हर खबर मिल जाएगी आप को. भले हम डिजिटल युग में जी रहे हैं जहां कोई भी खबर सिर्फ उंगलियों को घुमाने से मिल जाती है पर उस से भी तेज खबर मिलेगी आप को चाय की दुकान पर.

किस के बेटे ने मूंछें मुंड़वा लीं, किस की बीवी झगड़ कर मायके चली गई, किस के घर में क्या पका है, किस की बकरी दूसरे का खेत चर गई… हर तरह की खबरें बगैर किसी फीस के  न कोई इंटरनैट और न ही कोई टैलीविजन या रेडियो, पर खबरें बिलकुल टैलीविजन के जैसी मसालेदार.

सब से मजेदार बात तो यह है कि वहां पर पुरानी से पुरानी खबरें सुनाने वाले भी आप को हमेशा मिल जाएंगे, भले ही वे आप के जन्म से पहले की ही क्यों न हों, जैसे कि वे उन के मैमोरी कार्ड में सेव हों.

इन्हीं खबरीलाल में से एक हैं बादो चाचा. उन के पास तो समय ही समय है. कोई भी घटना वे ऐसे सुनाते हैं मानो आंखों देखी बता रहे हों.

गांव के हर गलीनुक्कड़, चौकचौराहे पर मिल जाएंगे. आप उन से इस नुक्कड़ पर मिल कर जाएं और अगले नुक्कड़ पर आप से पहले वे पहुंचे रहते हैं. वे किस रास्ते से जाते हैं आज तक कोई नहीं जान पाया.

इमरान ने जब से होश संभाला है तब से उन्हें वैसा का वैसा ही देख रहा है. बाल तो उन के 20 साल पहले ही पक चुके थे, पर उन की शारीरिक बनावट में आज भी कोई बदलाव या बुढ़ापेपन की झलक नहीं दिखती है, मानो उन के लिए समय रुक गया हो. कोई कह नहीं सकता कि वे नातीपोते वाले हैं.

सुबहसुबह रघु चाचा की चाय की दुकान पर चाय प्रेमियों का जमावड़ा लगना शुरू हो गया. यह ठीक उसी तरह होता है जिस तरह शहर के किसी रैस्टौरैंट में. वहां व्यंजन पसंद करने में कम से कम आधा घंटा लगता है, और्डर को सर्व होने में कम से कम आधा घंटा लगेगा, यह तो मेनू कार्ड में खुद लिखा होता है और फिर उस के बाद कोई समय सीमा नहीं. आप जब तक खाएं और जब तक बैठें आप की मरजी. खाएं या न खाएं, पर सैल्फी ले कर लोगों को बताएं जरूर कि सोनू विद मोनू ऐंड थर्टी फाइव अदर्स एट ओस्मानी रैस्टौरैंट.

यहां भी कुछ ऐसा ही नजारा रहता है. 5 रुपए की चाय पी कर लोग साढ़े 3 रुपए का अखबार पढ़ते हैं और फिर देशदुनिया के साथ पूरे गांव और आसपास के गांवों की कहानियां चलती हैं बगैर किसी समय सीमा के. सब को पता होता है कि घर के बुजुर्ग चाय की दुकान पर मिल जाएंगे, विद अदर्स.

हमेशा की तरह बादो चाचा की आकाशवाणी जारी थी, ‘‘यह हरी को भी क्या हो गया है, बड़ीबड़ी बच्चियों को पढ़ने के लिए ट्रेन से भेजता है. वे अभी साइकिल से स्टेशन जाएंगी और फिर वहां से लड़कों की तरह ट्रेन पकड़ कर बाजार…

‘‘पढ़लिख कर क्या करेंगी? कलक्टर बनेंगी क्या? कुछ तो गांव की मानमर्यादा का खयाल रखता. मैट्रिक कर ली, अब कोई आसान सा विषय दे कर घर से पढ़ा लेता.’’

इसी के साथ शुरू हो गई गरमागरम चाय के साथ ताजा विषय पर परिचर्चा. सब लोगों ने एकसाथ हरी चाचा पर ताने मारने में हिस्सा लिया.

कोई कहता कि खुद तो अंगूठाछाप है, अब चला है भैया बेटियों को पढ़ाने, तो कोई कहता कि पढ़ कर वही चूल्हाचौका ही संभालेंगी, इंदिरा गांधी थोड़े न बन जाएंगी.

अगले दिन बादो चाचा चाय की दुकान पर नहीं दिखे, पता चला कि पोती को जो स्कूल में सरकारी साइकिल के पैसे मिलने वाले हैं, उसी की रसीद लाने गए हैं.

इमरान को कल हरी चाचा पर मारे गए ताने याद आ गए. जब वह बचपन में साइकिल चलाना सीखता था तो उस समय उस की ही उम्र की कुछ लड़कियां भी साइकिल चलाना सीखती थीं और यही बादो चाचा और गांव के कुछ दूसरे बुजुर्ग उन पर ताने मारते नहीं थकते थे और आज वे अपनी ही पोती के लिए साइकिल के पैसे के लिए रसीद लाने गए हैं.

अगले दिन इमरान ने पूछा, ‘‘कल आप आए नहीं बादो चाचा?’’

वे कहने लगे, ‘‘क्या बताऊं बेटा, जगमला… मेरी पोती 9वीं जमात में चली गई है. उसी को साइकिल मिलने वाली है. उसी की रसीद लाने गया था. परेशान हो गया बेटा. कोई साइकिल का दुकानदार रसीद देने को तैयार ही नहीं था. सब को कमीशन चाहिए. पहले ही अगर चैक मिल जाए तो इतनी परेशानी न हो.

‘‘यह सरकार भी न, पहले रसीद स्कूल में जमा करो, फिर जा कर आप को चैक मिलेगा. जब साइकिल के पैसे देने ही हैं तो दे दो, रसीद क्यों मांगते हो? उन पैसों का कोई भोज थोड़े न कर लेगा, साइकिल ही लाएगा. आजकल के बच्चेबच्चियों को भी पता है कि सरकार उन्हें पैसे देती है वे खरीदवा कर ही दम लेते हैं, चैन से थोड़े न रहने देते हैं.’’

‘‘हां चाचा, पर जगमला तो लड़की है. वह साइकिल चलाए, यह शोभा थोड़े न देगा,’’ इमरान ने ताना मारा.

‘‘अरे नहीं बेटा, उस का स्कूल बहुत दूर है. नन्ही सी जान कितना पैदल चलेगी. स्कूलट्यूशन सब करना पड़ता है, साइकिल रहने से थोड़ी आसानी होगी. और देखो, आजकल जमाना कहां से कहां पहुंच गया है. पढ़ेगी नहीं तो अच्छे रिश्ते भी नहीं मिलेंगे.’’

‘‘पर, आप ही तो कल हरी चाचा की बेटी के बारे में कह रहे थे कि पढ़ कर कलक्टर बनेगी क्या?’’ इमराने ने फिर ताना मारा. इस बार बादो चाचा ने कोई जवाब नहीं दिया.

इमरान ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘चाचा, जैसा आप अपनी पोती के बारे में सोचते हो, वैसा ही दूसरों की बेटियों के बारे में भी सोचा करो. याद है, मेरे बचपन में आप ताने मारते थे जब मेरे साथ गांव की कुछ लड़कियां भी साइकिल चलाना सीखती थीं और आज खुद अपनी पोती की साइकिल खरीदने के लिए इतनी मेहनत कर रहे हो.

‘‘समय बदल रहा है चाचा, अपनी सोच भी बदलो. गांव में अगर साधन हों तो बच्चियां ट्रेन से पढ़ने क्यों जाएंगी? मजबूरी है तभी तो जा रही हैं. अभी ताने मारते हो और भविष्य में जब खुद पर आएगी तो उसी को फिर सराहोगे.

‘‘क्या पता हरी चाचा की बेटी सच में कलक्टर बन जाए. और नहीं तो कम से कम गांव में ही कोचिंग सैंटर खोल ले, तब शायद आप की जगमला को इस तरह बाजार न जाना पड़े…’’

तभी बीच में सत्तो चाचा कहने लगे, ‘‘लड़कियों की पढ़ाईलिखाई तो सिर्फ इसलिए है बेटा कि शादी के लिए कोई अच्छा सा रिश्ता मिल जाए, हमें कौन सा डाक्टरइंजीनियर बनाना है या नौकरी करवानी है.

‘‘आजकल जिस को देखो, अपनी बहूबेटियों को मास्टर बनाने में लगा हुआ है. उस के लिए आसानआसान तरीके ढूंढ़ रहा है. नौकरी करेंगी, मर्दों के साथ उठनाबैठना होगा, घर का सारा संस्कार स्वाहा हो जाएगा. यह सब लड़कियों को शोभा नहीं देता.’’

इमरान ने कहा, ‘‘चाचा, अगर सब आप की तरह सोचने लगे तो अपनी बहूबेटियों के लिए जो लेडीज डाक्टर ढूंढ़ते हो, वे कहां से लाओगे? घर की औरतें खेतों में जा कर मजदूरी करें, बकरियां चराएं, चारा लाएं, जलावनचुन कर लाएं, यह शोभा देता है आप को…

‘‘ऐसी औरतें आप लोगों की नजरों में एकदम मेहनती और आज्ञाकारी होती हैं पर पढ़ीलिखी, डाक्टरइंजीनियर या नौकरी करने वाली लड़कियां संस्कारहीन हैं.

‘‘क्या खेतखलिहानों में सिर्फ औरतें ही काम करती हैं? वहां भी तो मर्द रहते हैं. बचपन से देख रहा हूं कि चाची ही चाय की दुकान संभालती हैं. रघु चाचा की तो रात वाली उतरी भी नहीं होगी अभी तक. यहां भी तो सिर्फ मर्द ही रहते हैं और यहां पर कितनी संस्कार की बातें होती हैं, यह तो आप सब भी जानते हो.’’

यह सुन कर सब चुप. किसी ने कोई सवालजवाब नहीं किया. इमरान वहां से चला गया.

2 दिन बाद जब इमरान सुबहसुबह ट्रेन पकड़ने जा रहा था तो उस ने देखा कि स्टेशन जाने के रास्ते में जो मैदान पड़ता था वहां बादो चाचा अपनी पोती को साइकिल चलाना सिखा रहे थे.

चाचा की नजरें इमरान से मिलीं और वे मुसकरा दिए. चाय की दुकान पर कही गई इमरान की बातें उन पर असर कर गई थीं.

Hindi Story : कीर्ति चक्र – आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर स्त्री

Hindi Story : जरूरी है क्या स्त्री जीवनयापन के लिए पुरुष पर निर्भर रहे जबकि उस का आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता उसे जीवन के नए आयाम दे सकते हैं. सुषमा की इसी सोच ने उसे नए मुकाम पर पहुंचा दिया था.

मैं, लैफ्टिनैंट सुषमा कुमारी, आईएमए से डेढ़ साल की ट्रेनिंग के बाद पासिंगआउट हुई थी. मेरी पहली पोस्टिंग लद्दाख में सेना की आयुद्ध कोर की एक छोटी यूनिट में हुई थी. मुझे इंडिपैंडैंट कमांड मिली थी. थोड़ा आश्चर्य हुआ था कि पहली पोस्टिंग में इंडिपैंडैंट कमांड? शायद सैनिक परिवार से थी, इसीलिए ऐसा हुआ. मुझे 2 महीने की छुट्टी दी गई थी. मैं अमृतसर घर जाने के लिए प्लेन में बैठी तो मैं अपने अतीत में डूब गई.

मैं यहां तक कैसे पहुंची, यह एक लंबी दुखभरी दास्तान है. मैं कैप्टन राजेश की विधवा थी जो जम्मूकश्मीर में आंतकवादियों के एक अंबुश में शहीद हो गए थे. वे लड़ाकू फौज में नहीं थे लेकिन फिर भी सेना में सभी को लड़ने की ट्रेनिंग दी जाती है. वे उरी सैक्टर में कहीं जा रहे थे. उन पर अचानक आतंकवादियों ने हमला किया. इस अचानक हुए हमले से जब तक वे संभलते तब तक उन के 2 जवान शहीद हो गए थे. उन्होंने अपने बाकी के जवानों को बचाने के लिए तुरंत मोरचा संभाला और कारबाइन मशीन का मुंह खोल दिया. आतंकवादी संख्या में ज्यादा थे, उन्होंने अपने जवानों को तो बचा लिया लेकिन खुद शहीद हो गए. उन्हें उन की बहादुरी के लिए कीर्ति चक्र मिला. मैं और मेरी सास इसे राष्ट्रपति से प्राप्त करने के लिए गए.

मेरी आंखों के आंसू सूख नहीं रहे थे. मेरी उम्र मात्र 23 साल की थी. मैं राजेश को याद कर के रोती रहती थी. एक रोज मेरी सास मेरे पास आई और बड़े प्यार से बोली, मेरे ससुरजी भी पीछे आ कर खड़े हो गए थे, ‘सुषमा, कब तक रोती रहोगी? अगर तुम ने अपना पति खोया है तो हम ने अपना बेटा खोया है. हमें हौसला रखना होगा और आगे के जीवन के बारे सोचना होगा.’ वह थोड़ा हिचकी, फिर दृढ़ता से आगे कहा, ‘घर की बात घर में रह जाएगी. सबकुछ पहले की तरह चलेगा. तुम इस घर की बहू बनी रहोगी. तुम अपने देवर विभू से शादी कर लो. पैसाटका भी घर में रहेगा.’

मैं ने रोते हुए कहा था, ‘यह कैसे संभव है, मम्मीजी. मेरे पति और आप के बेटे की चिता की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई है कि आप ऐसा अभद्र प्रस्ताव ले कर आई हैं. मैं विभू को अपना भाई मानती आई हूं और भाई से शादी नहीं की जाती.’

जब इस के लिए अन्य रिश्तेदारों से भी दवाब बढ़ने लगा तो मैं ‘कीर्ति चक्र’ ले कर अपने मायके चली आई. मैं मायके वालों पर भी बोझ नहीं बनना चाहती थी. वहां भी मेरा विरोध करने वाले बहुत थे. विधवा लड़की को कोई रखना नहीं चाहता. समाज की यह भद्दी सोच थी कि जो अपने पति को खा गई वह हमें कहां छोड़ेगी. मैं ने उसी शहर में 2 कमरों का फ्लैट लिया और रहने लगी.

मैं ने मन बना लिया था कि मैं कैप्टन राजेश की तरह आर्मी में जाऊंगी. मैं अपने पांवों पर खड़ी होऊंगी. मैं पढ़ीलिखी हूं, शहीद की विधवा हूं तो क्या हुआ.

कैप्टन राजेश की पैंशन और जो सुविधाएं मुझे मिलनी थीं, वे बैंक में आ गई थीं. मेरा मैडिकल कार्ड भी बन कर आ गया था.

सोशल मीडिया पर मेरे सासससुर बहुत से भ्रम फैला रहे थे, जैसे मैं सबकुछ ले कर अपने मायके चली आई हूं. मीडिया वाले सूंघतेसूंघते मेरे पास भी आए थे. मैं ने कहा, ‘आप मुझ से पूछने के बजाय सेना मुख्यालय से क्यों नहीं पूछते?’
‘हम ने पूछा था, शहीद को एक करोड़ रुपया दिया जाता है जिस में से 60 फीसदी पत्नी का होता है और 40 फीसदी शहीद के मांबाप का. पैंशन, पीएफ, मैडिकल का अधिकार पत्नी का होता है.’
‘फिर आप मुझ से और क्या जानना चाहते हैं?’
‘यही कि आप भविष्य में क्या करेंगी, शादी करेंगी?’
‘नहीं, शादी मैं बिलकुल नहीं करूंगी. शादी करनी होती तो मैं वहीं पड़ी रहती. यूपीएससी ने सेना में स्थायी कमीशन की वैकेंसी निकाली थी, मैं उस की लिखित परीक्षा दे कर आई हूं. उम्मीद है कि पास हो जाऊंगी. एसएसबी और मैडिकल भी क्लीयर कर लूंगी. आप मुझे अपने पांवों पर खड़े होते देखेंगे. मैं अपनी ससुराल से केवल ‘कीर्ति चक्र’ ले कर आई हूं. अपने लिए मैं ने पलंग और टेबलकुरसी खरीदी है. मेरे सारे गहने, दहेज का सामान वहीं पड़ा है. मेरे मायके जा कर भी आप देख सकते हैं.’
‘हम ने देख लिया है पर एक सवाल मन में कुलबुला रहा है कि आप अपने मायके में क्यों नहीं रह रहीं?’ महिला पत्रकार ने बड़े मीठे स्वर में पूछा था.
मैं ने कहा, ‘यह किसी व्यक्ति विशेष पर प्रहार नहीं है, यह समाज की सोच है कि मांबाप को छोड़ कर और कोई किसी विधवा को अपने पास रखने के लिए तैयार नहीं होता. मैं ने यह बेहतर समझ कि अलग रहूं.’
दूसरे दिन अखबारों में मेरे बयानों की चर्चा थी. मेरे सासससुर और रिश्तेदारों को झुठा बताया गया था.

यूपीएससी की लिखित परीक्षा का रिजल्ट आ गया था. मैं सफल कैंडिडेट थी.
एसएसबी का सैंटर पुणे पड़ा था. इस के लिए 2 महीने का समय था. मैं ने
अमृतसर में एसएसबी की तैयारी के लिए कालेज जौइन किया.

पुणे में भी सारे फिजिकल टैस्टों के बाद फाइनल इंटरव्यू में सभी मेरे पति के शहीद होने के बारे में पूछते रहे. ‘कीर्ति चक्र’ प्राप्त करने के लिए बधाई भी दी और पति के शहीद होने का अफसोस भी जताया. आखिर में प्रीसाइडिंग अफसर ने कहा, ‘भारतीय सेना को ऐसी वीर नारियों की जरूरत है.’

पास बैठी बोर्ड की एक महिला अधिकारी ने पूछा, ‘इतनी लंबी जिंदगी अकेले कैसे काटोगी?’
मैं काफी देर चुप रही, फिर कहा, ‘आप की मुराद शायद शादी से है, यह मेरे अस्तित्व की लड़ाई है. मैं अकेले लड़ूंगी. फिलहाल मैं किसी मर्द को पालने में विश्वास नहीं रखती हूं.’
मेरे चेहरे पर दृढ़ता थी. प्रश्न जितना तीखा था, जवाब भी उतना ही तीखा था. फिर किसी ने कोई प्रश्न नहीं पूछा. मैं सब का अभिवादन कर के बाहर आ गई.

शाम को जब रिजल्ट सुनाया गया तो मैं सफल थी. दूसरे रोज मेरा मैडिकल हुआ और मैं अपने घर लौट आई. जनवरी के पहले सोमवार से मेरा कोर्स शुरू होना था. उस से पहले मेरे सर्टिफिकेट वैरिफाई किए गए. मिलिट्री अस्पताल से मैडिकल करवाया गया और भी बहुत सी फौरमैलिटीज पूरी होने के बाद वह लिस्ट भेजी गई जो मुझे आईएमए में ले कर जानी थी. मैं ने अमृतसर के सदर बाजार से वे आइटमें ले लीं. ट्रेनिंग चलती रही.

लैफ्टिनैंट बन कर मैं अपने किराए के मकान में आ गई. मैं ने यह मकान छोड़ा नहीं था, किराया देती रही थी. छोड़ने का इरादा भी नहीं था. एक दिन मुझे मेरी सास का पत्र प्राप्त हुआ. उस में लिखा था, ‘आप लैफ्टिनैंट बन गई हैं, इस के लिए बधाई. आप पर गलत प्रैशर डाला गया था, उस के लिए खेद है. आप इस घर की बहू हैं और रहेंगी, चाहे विधवा बन कर रहें. आप के दहेज का सामान और गहने सुरक्षित हैं, जब चाहें, ले जा सकती हैं.’

मैं ने उन के पत्र का कोई उत्तर नहीं दिया. मन में इतनी टीस थी कि उत्तर देने का मन ही नहीं किया. 2 साल से उन्होंने मेरी कोई सुध नहीं ली. आज मैं अफसर बन गई हूं तो याद आई हूं. मीडिया में कैसेकैसे भ्रम फैलाए थे, मुझे सब याद है. अपनी ससुराल को ले कर मेरा मन फिर कसैला हो गया था. आज शायद इसलिए भी याद आई हूं, लगातार आने वाला पैसा दिखाई दे रहा है. मैं ऐसी ससुराल से दूर भली.
मेरे मांबाप मुझे मिलने आते रहे लेकिन उन्होंने मुझे कभी अपने पास आ कर रहने को नहीं कहा. कम उम्र में ही मैं सब की मानसिकता को जान गई थी. वे मेरे अफसर बनने से खुश थे.
मां ने पूछा था, ‘क्या तुम सारी उम्र किराए के घर में रहोगी?’
‘नहीं, बहुत जल्दी आर्मी वैलफेयर एसोसिएशन द्वारा बनाए गए फ्लैट के लिए अप्लाई करूंगी. वे फ्लैट जब बन जाते हैं तब अप्लाई करने के लिए कहते हैं. जल्दी ही दिल्लीएनसीआर में मुझे फ्लैट अलौट हो जाएगा.’
‘फिर हम से नाते टूट जाएंगे?’
‘हां, यही समझ लें. रिश्तेनाते अब भी कहां हैं? मायके से डोली उठती है तो ससुराल से अर्थी, यही परंपरा है न? मेरी तो डोली और अर्थी साथ उठ गई हैं. जीतेजी इस त्रासदी को भुगत रही हूं, फिर कैसे रिश्ते और कैसे नाते?’ यह कह कर मैं थोड़ी देर रुकी, फिर आगे कहा, ‘मुझे खुशी है कि मैं सेना की अफसर बन गई हूं. मुझे किसी के आगे अपनी जरूरतों के लिए हाथ फैलाने की जरूरत नहीं है.’
वे मेरी बातों का कोई जवाब नहीं दे पाए थे. थोड़ी देर बैठे और चले गए.

2 महीने की छुट्टी खत्म हुई तो मैं ने चंडीगढ़ ट्रांजिट कैंप में रिपोर्ट की. ट्रांजिट कैंप आगे की फ्लाइट का प्रबंध करता है. मैं चंडीगढ़ के एमसीओ यानी मिलिट्री मूवमैंट कंट्रोल औफिस पहुंची. यूनिफौर्म में थी. सब ने उठ कर मुझे सम्मान दिया. मैं ने कहा, ‘मुझे ट्रांजिट कैंप के लिए कोई गाड़ी मिलेगी?’
‘जी हां मैडम सर, सामने गाड़ी खड़ी है, वह ट्रांजिट कैंप जाएगी.’
कुली ने मेरा सामान गाड़ी में रख दिया. कुली पैसे ले कर चला गया. ड्राइवर ने मुझे सैल्यूट किया और कहा, ‘थोड़ी देर रुक कर चलते हैं. शायद कोई जवान ट्रांजिट कैंप जाने वाला आ जाए.’

मैं कुछ नहीं बोली. 2 जवान आ कर गाड़ी में बैठ गए. ड्राइवर ने जवानों को बैरक में उतार कर मुझे अफसर मैस में उतार दिया. मैं सामान वहीं रख कर अफसर मैस के औफिस में गई. वहां बैठे हवलदार को मैं ने अपना मूवमैंट और्डर दिया. उस ने मुझे सैल्यूट किया और बैठने के लिए कहा. मैं कुरसी पर बैठ गई. हवलदार ने एक जवान को बुलाया और मेरा सामान कमरा नंबर 2 में रखने के लिए कहा. मुझे से कहा, ‘मैडम सर, आप कमरे में चलें, मैं आप के जाने का शैड्यूल ले कर हाजिर होता हूं.’

मैं कमरे में आ गई. कमरा आधुनिक था. 2 अफसरों के रहने के लिए बनाया गया था. वाशरूम भी आधुनिक था. 2 कुरसियां और 1 टेबल रखी थी. ड्रैसिंगटेबल थी. मैं ने बैल्ट उतार कर मच्छरदानी लगाने वाले पोल पर टांग दी. मैं बैठी ही थी कि एक जवान मेरे लिए चाय ले कर आया, साथ में पनीर के पकौड़े थे. सफर से आई थी, मुझे चाय की बहुत जरूरत थी. मैं चाय के साथ पकौड़े खाने लगी.

अभी मैं चाय पी कर हटी ही थी कि औफिस का हवलदार आया, बोला, ‘मैडम सर, शैड्यूल इस तरह है. 8 बजे बार खुलेगी, आप सौफ्टड्रिंक, रम, व्हिस्की, वाइन पेमैंट पर पी सकेंगी. स्नैक्स आप को ट्रांजिट कैंप की ओर से मिलेंगे. 9 बजे डिनर होगा,’ वह थोड़ी देर के लिए रुका, फिर बोला, ‘सुबह 6 बजे की फ्लाइट है. सुबह 2 बजे आप को बैड टी मिलेगी. 3 बजे आप को स्टेशनवैगन पिक करने आएगी. यह आप का बोर्डिंगपास है और वीआईपी लाउंज का 200 रुपए का कूपन है. आप वहां 200 रुपए का कुछ भी खा सकती हैं.
मैं ने पूछा, ‘कोई और भी अफसर ट्रांजिट कैंप से जा रहा है?’
‘अभी तो कोई नहीं है. आने की उम्मीद भी नहीं है. आना होता तो अब तक आ जाता. अब जो आएगा, परसों सुबह की फ्लाइट से जाएगा.’

वह चला गया तो मैं ने मोबाइल से अपनी यूनिट में बात की. वहां के सूबेदार इंचार्ज ने बताया, ‘जयहिंद मैडम सर, आप के शैड्यूल के मुताबक गाड़ी लेह पहुंच चुकी है. आप के लिए स्नो क्लोदिंग भेजा है. लेह में उतरते ही पहन लीजिएगा. सर्दी बहुत है, तापमान माइनस में चल रहा है. लेह ट्रांजिट कैंप के अफसर मैस को बोल दिया गया है कि आप के लिए चाय, नाश्ते और लंच का प्रबंध करें. इस के लिए मैं ने टिफिन और थर्मस भेजे हैं. ड्राइवर मैस से ले लेगा.’
मैं ने कहा, ‘थैंक्स.’
‘जयहिंद मैडम सर.’
‘जयहिंद.’
गेट पर खड़े जवान ने मुझे सैल्यूट किया और गेट खोल दिया. अंदर डिनर का अच्छा प्रबंध था. स्नैक्स में पकौड़े रखे हुए थे. मुझे भूख जोरों की लगी थी. कई ड्रिंक्स भी रखी थीं लेकिन मैं ने उस ओर ध्यान नहीं दिया. एक जवान मेरे पास ट्रे में ड्रिंक रख कर ले आया तो मैं ने उसे आराम से मना कर दिया कि मुझे नहीं चाहिए.

मैं ने डिनर किया और कमरे में आ गई. वरदी उतार कर हैंगर में डाल कर अलमारी में टांग दी. नाइटसूट पहना और मच्छरदानी लगा कर सो गई. सुबह 2 बजे चाय आई. फ्रैश हो कर वरदी पहनी. जवान मेरा बिस्तर और ट्रंक ले गया था, बोला, ‘स्टेशन वैगन आ गई है, आ जाइए.’

आधे घंटे में मैं एयरपोर्ट पर थी. इंडियन एयरलाइंस के लगेज पौइंट पर मैं ने सामान जमा किया. मेरे हाथ में मोबाइल और छोटा बैग था जिस में जरसी थी. ओवरकोट हाथ में पकड़ लिया था. चैकइन करने में आसानी हुई. वीआईपी लाउंज में पहुंची तो वहां दिन की तरह रौनक थी. टेबल सर्विस थी. मैं ने कूपन दे कर ब्रैडमक्खन लाने के लिए कहा. चाय मैं तेज गरम पीती थी. मैं ने उसे बाद में लाने के लिए कहा.
बोर्डिंग होने में काफी समय था, इसलिए आराम से नाश्ता करती रही. 05.30 बजे मैं बोर्डिंग होने के लिए काउंटर पर गई. बिजनैस क्लास पर अपनी सीट पर बैठी तो मुझे वहां कोई बैठा दिखाई नहीं दिया. सभी अकसर इकोनौमी क्लास में सफर करते हैं. सरकारी अफसर या कोई बिजनैमैन इस क्लास में सफर करता है. तभी मेरे मोबाइल की घंटी बजी. मेरे ‘हैलो’ कहने पर उधर से आवाज आई, ‘जयहिंद मैडम सर, मैं नायक ड्राइवर ईश्वर सिंह बोल रहा हूं. आप प्लेन में बैठ गईं?’
‘हां, बैठ गई.’
‘मैं आप को गाड़ी ले कर लगेज मिलने वाली जगह पर मिलूंगा, जी.’
‘ठीक है.’
‘जयहिंद मैडम सर.’
‘जयहिंद.’

मोबाइल बंद करने का अनाउंसमैंट हो गया था. मैं ने मोबाइल बंद कर दिया. प्लेन उड़ा और एक घंटे बाद लेह एयरपोर्ट पर लैंड कर गया. बताया गया, बाहर का तापमान माइनस 2 डिग्री है. जब तक स्टाफ उतरता, मैं ने जर्सी और ओवरकोट पहन लिए. सिर ढकने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था. जानती थी, इस से सर्दी नहीं रुकेगी लेकिन कोई चारा नहीं था.

मैं बाहर निकली, सर्दी का एक झौंका आया, मुझे भीतर तक कंपा गया. जल्दी से सामने लगी बस में बैठ गई. इकोनौमी क्लास से बहुत से जवान और एक जेसीओ आ कर बैठे थे. जेसीओ मेरे पास आया, सैल्यूट किया और बोला, ‘मैडम सर, आप शायद नई पोस्टिंग पर आई हैं, तभी आप के पास सिर ढकने के लिए कुछ नहीं है.’
मैं ने कहा, ‘मेरे जवान मुझे लेने के लिए आए हुए हैं, वे सबकुछ ले कर आए हैं, सिर्फ लगेज पौइंट तक मुझे ऐसे जाना है.’
‘ठीक है, मैडम सर, यहां की हवा बहुत खतरनाक है, लग गई तो आप तुरंत बीमार हो जाएंगी. मेरे पास बिलकुल नया कैपबलकलावा है. आप लगेज पौइंट तक पहन लें, सुरक्षित रहेंगी. मुझे भी वहीं जाना है. वहां जा कर मुझे वापस कर दें.’
मुझे जेसीओ साहब का सुझाव अच्छा लगा. मैं ने कैपबलकलावा ले कर पहन लिया. सिर को आराम मिला. मैं ने उन से पूछा, ‘आप कौन सी रैजिमैंट से हैं और कहां जाना है?’
‘मैडम सर, मैं डोगरा रैजिमैंट से हूं और मुझे दुरबुक जाना है.’
‘मुझे भी वहीं जाना है, आप हमारे साथ चलें.’
‘थैंक्स मैडम सर, ट्रांजिट कैंप ने अगर इजाजत दी तो मैं आप के साथ चलूंगा.’
‘मुझे भी वहां नाश्ता करना है, रास्ते के लिए चाय और लंच लेना है. मैं बोल दूंगी.’
‘थैंक्स मडैम सर, यहां रुक गए तो पता नहीं कब भेजें. रहने और खाने की व्यवस्था इतनी अच्छी नहीं होती है.’
‘कोई बात नहीं, मैं कह दूंगी तो जाने देंगे.’
साहब ने मुझे सैल्यूट किया और पीछे जा कर बैठ गए. मैं और साहब लगेज पौइंट पर पहुंचे तो ओवरकोट पर रैंक न लगा होने के कारण मेरे जवान मुझे पहचान नहीं पाए लेकिन मैं ने पहचान लिया था. मैं उन के पास गई तब उन्होंने मुझे पहचाना. नायक ईश्वर सिंह और साथ आए जवान ने मुझे सैल्यूट किया, पूछा, ‘मैडम सर, यही 2 नग हैं?’
‘हां, यह छोटा बैग भी है. ये सूबेदार साहब हमारे साथ दुरबुक जाएंगे. गाड़ी में जगह होगी?’
‘जी मैडम सर, टोयटा की 8 सीटर गाड़ी है, जगह बहुत है.’
‘ठीक है, ईश्वर, इन का सामान भी गाड़ी में रखवा लो.’
‘थैंक्स मैडम सर,’ सूबेदार साहब ने कहा.
ट्रांजिट कैंप में सारी व्यवस्था कर के मैं अफसर मैस में नाश्ते के लिए आई. नाश्ता करते मेरे जवान ने मेरे लिए चाय और लंच ले लिया. मैं ने पूछा, ‘आप लोगों ने नाश्ता कर लिया?’
‘जी मैडम सर, आप के आते ही हम दुरबक के लिए चल देंगे.’
मैं कुछ नहीं बोली, वह टिफिन और थरमस ले कर चला गया. सब ने अपना लंच भी ले लिया था. जब हम लेह से चले तो मौसम साफ था. सूरज चमक रहा था. उस की गरम किरणें शरीर को अच्छी लग रही थीं. जैसेजैसे हम चढ़ाई चढ़ते गए, मौसम खराब होता गया.
मैं ने कहा, ‘सूबेदार साहब, मौसम एकदम खराब हो गया?’
‘जी मैडम सर, यहां के मौसम के बारे में मशहूर है कि सरदारजी का दिमाग और यहां का मौसम कब बिगड़ जाए, पता नहीं.’ यह कह कर सूबेदार साहब थोड़ा हंसे. वे मेरे सामने खुल कर नहीं हंस सकते थे. यह सेना के अनुशासन में आता है. फिर आगे उन्होंने कहा, ‘हमारे ब्रिगेड कमांडर साहब भी सरदारजी हैं, सिख रैजिमैंट से, बहादुर और मार्शल कौम के. पता नहीं चलता किस समय क्या हुकम दे दें. वे हर चीज खुद चैक करते हैं.
‘पहले हमारी चौकियां नीचे थीं, चाइना हमें देखता था. अब चौकियां ऊपर हैं, हम चाइना को देखते हैं. एक रात जबरदस्त बर्फ पड़ रही थी. हमारी पैट्रोलिंग पार्टी जाने के लिए तैयार थी. वे आए और बोले, वे भी आप के साथ जाएंगे. वास्तव में वे यह जानना चाहते थे कि इतनी भयानक सर्दी और बर्फबारी में पैट्रोलिंग करने में क्याक्या दिक्कतें आती हैं. वे हमारी तरह फुल ड्रैस में थे. हर जवान कोई 20 किलो भार ले कर चलता है. पानी की बोतल भरी जाती है लेकिन पानी जम जाता है, पिया नहीं जा सकता. पानी की जगह जवान रम भर कर ले जाते हैं. पैट्रोल और रम नहीं जमती है. कमांडर साहब ने यह पूछा कि सब की वाटर बोटल में रम है? सब ने कहा ‘हां सर.’
वहां से चले तो उतराई थी. उन्होंने देखा कि गमबूट में भी जवान फिसल रहे हैं. वे खुद 2 बार फिसले. गमबूट नौनस्किड होते हैं. चढ़ाई में भी फिसलेंगे. यह तो हम रोप के सहारे चलते हैं. उन्होंने महसूस किया कि और तो सब ठीक है लेकिन गमबूट में कमी है. दूसरे, औक्सीजन की कमी से सब की सांस फूलती है. धीरेधीरे लगातार चलने से सांस कंट्रोल हो जाती है. उस का कोई इलाज नहीं है लेकिन गमबूट के लिए उन्होंने रिसर्च डिपार्टमैंट को लिखा. अब जो गमबूट आए हैं, वे फिसलते नहीं हैं.’
सूबेदार साहब चुप हो गए थे. मैं ने कहा, ‘ऐसे शानदार और बहादुर अफसर के अंडर में काम करने में बहुतकुछ सीखने को मिलेगा.’
‘जी मैडम सर.’
हमारे देशवासी सोचते होंगे कि बड़े अफसर यों ही दफ्तरों में बैठ कर एंजौय करते हैं. उन्हें पता ही नहीं होगा कि वे जवानों के साथ उन की समस्याओं को गहराई से समझते हैं और उन का समाधान करते हैं.
ड्राइवर ने कहा, ‘मैडम सर, हम इस समय दुनिया की सब से ऊंची सड़क चांगला टौप पर खड़े हैं.’
मैं ने कहा, ‘रुको, मैं कुछ तसवीरें लेना चाहूंगी.’

सूबेदार साहब ने कहा, ‘मैडम सर, बाहर मौसम बहुत खराब है. मोबाइल का कैमरा काम नहीं करेगा. तापमान माइनस 20 से 25 डिग्री के बीच होगा. कभी भी बारिश या बर्फ पड़नी शुरू हो सकती है. हमें यहां से जल्दी निकलना होगा. हम कार में बैठे हैं. हीटर चल रहा है, इसलिए सर्दी सहन हो रही है.’
‘जी मैडम सर, साहब ठीक कह रहे हैं. कार एयरटाइट है. बीडिंग लगा कर खिड़कीदरवाजों को सील किया गया है. तब भी सर्दी लगती है. थोड़ा आगे झरना है, वहां लंच कर के आगे चलेंगे,’ ड्राइवर ने कहा.
मैं कुछ नहीं बोली, ड्राइवर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी. खराब मौसम के कारण दिन में ही अंधेरा हो रहा था. मैं ने कहा, ‘जो जवान ट्रांजिट कैंप की गाडि़यों में आते होंगे उन के लिए तो बहुत मुश्किल होती होगी? वे इतनी भयंकर सर्दी को कैसे सहते होंगे?’
‘तिरपाल से चारों तरफ से गाडि़यों को ढक लिया जाता है. जवान 3-4 कंबल ओढ़ लेते हैं. फ्रंट सीट पर ड्राइवर के साथ केवल एक जवान के बैठने का आदेश होता है लेकिन ड्राइवर अपनी रिस्क पर 2 जवान और आगे बैठा लेता है. बाकी जवानों के पास सर्दी सहने के अलावा कोई चारा नहीं होता. हां, रम पी कर खुद को गरम रखते हैं. इस के लिए ट्रांजिट से रम मिलती है.’
मैं सोच रही थी, अनुशासन के लिए जवानों और अफसरों में यह फर्क रहेगा. आगे चल कर सब ने लंच किया और चल पड़े. हम शाम 5 बजे अपनी यूनिट में पहुंचे. ड्राइवर को सूबेदार साहब रैजिमैंट में छोड़ने का आदेश दे कर मैं अपने लिए तय कमरे में आ गई. कमरा सुंदर था. हीटर से गरम कर रखा था. अच्छा लगा. हैल्पर मेरे लिए पानी और चाय ले कर आया. पानी हलका गरम था, मैं पूरा पी गई, फिर चाय पी. चाय बहुत टेस्टी थी.
मैं ने पूछा, ‘चाय किस ने बनाई ’
‘मैं ने बनाई है, मैडम सर,’ साथ के कमरे से आवाज आई और वह मेरे सामने आ कर खड़ा हो गया, मुझ से जयहिंद कर कहा, मैडम सर, मैं आप का स्पैशल कुक हूं. आप के लिए स्नैक्स और खाना बनाऊंगा. मेरा नाम अजीत है और यह सुमन कुमार है, आप का हैल्पर.’

मैं नहाना चाहती थी, साथ में वाशरूम था. गीजर औन था. तेज गरम पानी से नहाई. बहुत अच्छा लगा. मैं पलंग पर आ कर बैठ गई. नाइटसूट में थी. मैं ने अपनी टांगों पर स्लीपिंग बैग ओढ़ लिया था. सिर कैपबलकलावा से ढक लिया था. सारे गरम कपड़े पहने और रूमहीटर चलने पर भी सर्दी लग रही थी. तभी किसी ने बाहर से अंदर आने की इजाजत मांगी. मेरे ‘यस’ कहने पर अंदर आए. एक नायब सूबेदार साहब थे, दूसरे सूबेदार साहब थे.
दोनों ने मुझ से ‘जयहिंद मैडम सर’ कहा.

मुझ उन के ‘जयहिंद मैडम सर’ कहने पर हैरानी नहीं हुई. एटीकेट ट्रेनिंग में बताया
गया था कि सेना में महिला अफसर से ऐसे ही बात करेंगे. मैं ने उन्हें बैठने के
लिए कहा लेकिन वे बैठे नहीं. मैं ने उन्हें ईजी हो कर खड़े होने के लिए कहा.
उन्होंने अपना परिचय दिया, ‘मैं सूबेदार हरिराम, यहां का सीनियर जेसीओ हूं.’
‘और मैं नायब सूबेदार गुरनाम सिंह, यहां का जेसीओ एडजूडैंट.’
‘मैडम सर, आप का सफर ठीक रहा? रास्ते में कोई तकलीफ तो नहीं हुई? लंचचाय ठीक मिली?’
‘हां, सब ठीक था. मुझ पूरी यूनिट का इंस्पैक्शन करना है और फिर सैनिक दरबार लेना है. कुछ अपने बारे में बताऊंगी, कुछ जवानों की सुनूंगी. कब करवाना चाहेंगे?’
‘मैडम सर, आज बुधवार है, सोमवार को इंस्पैक्शन और मंगलवार को दरबार ले लें,’ सीनियर जेसीओ साहब ने कहा.
‘नहीं, मैं दरबार लूंगी, फिर दरबार के तुरंत बाद यूनिट का इंस्पैक्शन करूंगी, हो जाएगा?’
‘जी, मैडम सर,’ दोनों सैल्यूट कर के चले गए.
बाहर मौसम बहुत ज्यादा खराब हो रहा था. बारिश शुरू हो गई थी. थोड़ी देर में बर्फ भी गिरनी शुरू हो गई. कमरे का मीटर माइनस 22 डिग्री तापमान बता रहा था.ऐसे ठंडे मौसम में खून जमने लगता है. मैं ने गरम चाय मंगवाई. धीरेधीरे चाय के घूंट भरती रही. ठंड से बचने का यही रास्ता सूझ रहा था मुझे.

आगे का अंश बौक्स के बाद 

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पर्यटकों की पहली पसंद

भारत खुद को कितना ही विश्वगुरु कह ले, पर्यटकों की नजर में वह अभी भी दुनियाभर के देशों में सब से पीछे है. 2024 के पर्यटकों के आंकड़े बताते हैं कि घुमंतुओं की पहली पसंद फ्रांस है. फ्रांस जाने वालों की संख्या 8.94 करोड़ थी. फ्रांस के बाद दूसरे नंबर पर स्पेन जाने वालों की संख्या 8.37 करोड़ रही. अमेरिका 7.93 करोड लोग घूमने गए. चीन जाने वालों की संख्या 6.57 रही और इटली घूमने वालों की संख्या 6.45 करोड़ रही है.

इस के विपरीत भारत आने वालों की संख्या मात्र 1.79 करोड़ रही. भारत जनसंख्या और क्षेत्रफल की नजर से बड़े देशों में शामिल किया जाता है. देश में घूमने और रहनसहन के तमाम स्थान हैं. इस के बाद भी पर्यटकों की नजर में भारत सब से नीचे आता है. इस की सब से बड़ी वजह यहां का धार्मिक कट्टरपन और रूढि़वादिता है.

घूमने में जो मजा पर्यटकों को फ्रांस, अमेरिका, चीन और इटली में आता है वह भारत में नहीं आता. यहां घूमने आने वालों को अभी भी परेशान किया जाता है. उन को अपराध का शिकार बनाया जाता है, खासकर, महिला पर्यटकों के खिलाफ माहौल ठीक नहीं होता है. पर्यटकों को जो आजादी विदेशों में होती है वह भारत में नहीं मिलती है, इसलिए भी भारत में पर्यटकों की संख्या कम ही रहती है.
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सोमवार को मैं इंस्पैक्शन के लिए हर जगह गई. यूनिट लाइन में गई तो जगहजगह खाली स्थान थे जैसे कोई चार्ट लगे हों. सीनियर जेसीओ और जेसीओ एडजूडैंट मेरे साथ थे. मैं ने उन से पूछा, ‘इस खाली जगह पर कोई चार्ट लगे थे?’
वे दोनों एकदूसरे का मुंह देखने लगे. वे बताने में झिझक रहे थे. मैं ने कहा, ‘बेझिझक बताएं. मैं सैनिक परिवार से हूं, ज्यादा तो नहीं लेकिन बहुतकुछ जानती हूं.’
सीनियर जेसीओ ने झिझक हुए कहा, ‘मैडम सर, यहां ब्यूटीपोस्टर थे. आप का इंस्पैक्शन था, इसलिए हटा दिए गए. इंस्पैक्शन के बाद लगा दिए जाएंगे.’
यह जान कर अच्छा लगा. सेना में मर्यादा रखी जाती है. महिला अफसर के सामने ऐसे पोस्टर नहीं लगाए जा सकते थे. जवानों को गरम रखने के लिए ऐसे पोस्टर जरूरी थे नहीं तो भयंकर सर्दी में इंपोटैंसी की बीमारी पनप जाती है और भी कई उपक्रम किए जाते हैं. ड्राईफ्रूट दिए जाते हैं, रोज रम और मीट या अंडे दिए जाते हैं. मक्खन खाने को मिलता है. रोमांटिक फिल्में दिखाई जाती हैं. ट्रेनिंग में सब बताया गया था. मैं मन से दृढ़ हो गई थी. जवानों के स्वास्थ्य का प्रश्न था. मैं ने कहा, ‘साहब, चाहे किसी का भी इंस्पैक्शन हो, पोस्टर हटाए नहीं जाएंगे.’
‘जी मैडम सर.’
उस के बाद मैं मैस में आ गई. वहां केवल 3 जवान थे. 2 कुक थे और एक मैस कमांडर. सब ने हाथों में ग्लव्ज पहने हुए थे. मैं ने उन के ग्लव्ज उतरवा कर नाखून चैक किए. मैस कमांडर से पूछा, ‘क्वार्टरमास्टर से राशन नफरी के मुताबिक मिलता है? किसी तरह की कमी तो नहीं रहती?’
‘नहीं, मैडम सर. राशन की कमी नहीं होती है. राशन पूरा मिलता है,’ मैस कमांडर ने कहा.
‘इस बार जब राशन आए तो मुझे दिखाना.’
‘जी, मैडम सर.’
मैं ने सीनियर जेसीओ से पूछा, ‘साहब, आप का खाना कौन बनाता है?’
‘यहीं मैस से आता है.’
‘गुड और मेरा खाना कौन बनाता है?’
‘आप का खाना स्पैशल कुक बनाता है.’
‘आज से मेरा नाश्ते से ले कर डिनर तक यहीं से आएगा. जो जवान खांएगे वही मैं खाऊंगी. यह मेरा चैक होगा.’
‘जी मैडम सर.’

दरबार का टाइम हो रहा था. मैं वाशिंग पौइंट पर न जा सकी. परंपरा के अनुसार जेसीओ साहब ने मुझे जवानों की संख्या बता कर दरबार हैंडओवर किया. मैं कुर्सी पर बैठी और कहा, ‘दरबार बहुत जल्दी में लिया गया है, इसलिए किसी का कोई पौइंट नहीं आया. किसी का कोई पौइंट हो तो बोले.’

बहुत देर चुप्पी छाई रही, फिर एक जवान उठा. अपना नामनंबर बता कर बोला, ‘मैडम सर, मैं सिपाही वाशरमैन हूं. मेरे साथ एक और वाशरमैन काम करता है. हमारे पास 2 सैमीऔटो मशीन हैं. उन में कपड़े तो धुल जाते हैं लेकिन स्पिन नहीं हो पाते. कपड़ों में पानी जम जाता है. हम बड़ी मुश्किल से जेसीओ सहाबन के कपड़े धो पाते हैं. मौसम खराब रहने के कारण कईकई दिन कपड़े सूखते नहीं हैं. कई बार प्रैस से कपड़े सुखाने पड़ते हैं. यदि फुल्लीऔटो वाशिंग मशीन मिल जाए तो हम जवानों के कपड़े भी धो पाएंगे.’

वह सैल्यूट कर के बैठ गया. मैं ने हैडक्लर्क से पूछा, ‘क्या हमारे पास रैजिमैंटल फंड की कमी है?’
‘नहीं, मैडम सर, सिर्फ आप के आदेश की जरूरत है.’
मैं ने स्पष्ट कहा, ‘बहुत जल्दी मशीनों का प्रबंध हो जाएगा.’
दरबार के बाद ब्रिगेड कमांडर साहब से मेरा इंटरव्यू था. ड्राइवर मुझे ब्रिगेड हैडक्वार्टर ले गया. ब्रिगेड मेजर ने रजिस्टर में पर्टिकुलर नोट किए और कमांडर साहब के सामने मार्च किया. मैं ने स्मार्ट सैल्यूट किया. मुझे देख कर बहुत खुश हुए. वे उठे और हाथ मिलाया, कहा, ‘अपनी ब्रिगेड में एक महिला अफसर का स्वागत करते हुए बहुत खुशी हो रही है. मैं समझता हूं, आप पुरुष अफसरों से भी अच्छी कमांड करेंगी. ‘कीर्ति चक्र’ के लिए बधाई और कैप्टन राजेश के शहीद होने का अफसोस है, कोई प्रौब्लम?’
वे 6 फुट लंबे थे. मैं उन के सामने पिद्दी लगती थी. लड़ाकू फौज के अफसर ऐसे ही होते हैं.
‘कुछ नहीं सर, वाशिंग के लिए मैं रैजिमैंटल फंड से फुल्ली औटो मशीनें खरीदने जा रही हूं.’
‘दैट इज योर मैनेजमैंट. वैसे, यहां ड्राईक्लीन प्लांट है. आप जवानों के गरम कपड़े यहां भेज सकती हैं. दिन आप को मेजर साहब बता देंगे.’
‘जी सर, आई विल डू दिस.’
‘मार्च करें.’
ब्रिगेड मेजर साहब ने मुझे चाय पिए बिना आने नहीं दिया. उन्होंने बताया कि ड्राईक्लीन के लिए हमारी यूनिट का शनिवार का दिन तय है.

मैं ने थैंक्स कहा और यूनिट लौट आई. सरकारी डाक देखी. हैडक्लर्क मेरे पास आए, बोले, ‘इस समय सब से अच्छी मशीन बौस की है. मेरी बात हो गई है, 32 हजार रुपए की एक मशीन है. लैटरहैड पर लिख कर फैक्स कर दें और वह चैक फैक्स कर दें जो उन्हें देना है. वे एक हफ्ते में मशीनें लगा जाएंगे.’
मैं ने हैडक्लर्क से पूछा, ‘हमारे पास रैजिमैंटल फंड कितना है?’
‘11 लाख रुपए से ज्यादा है.’
‘कमाल है, आज तक किसी ने इस्तेमाल नहीं किया?’
मैं ने खुद मशीन वालों से बात की. 2 साल की गारंटी के साथ वे कोई इंस्टौलेशन चार्ज नहीं लेंगे. मैं ने हैडक्लर्क साहब से 10 केजी की 2 औटो मशीन का और्डर तुरंत प्लेस करने को कहा.
रनर चाय और स्नैक्स ले कर आया तो मैं ने जेसीओ एडयूडैंट को भेजने के लिए कहा. मैं ने रनर से पूछा, ‘यह चाय और स्नैक्स जवानों को भी मिलते हैं.’
‘हां जी, मैडम सर. उन के लिए व्हिस्ल बजने वाली है.’
जेसीओ एडयूडैंट साहब चाय पीने के बाद आए. मैं ने ड्राईक्लीन प्लांट के बारे में बताया. उन्होंने कहा, ‘जी मैडम सर, पता है लेकिन वे कपड़े इतने अच्छे साफ नहीं कर पाता है. वाशरमैन का दिन भी खराब होता है और उसे फिर से ईजी में धोने पड़ते हैं.’
3 दिन में मशीनें इंस्टौल हो गईं. मैं संतुष्ट थी. जेसीओ और जवान भी संतुष्ट थे. मैं रात को ड्रिंक लेने के साथ सोच रही थी कि मैं पढ़ीलिखी होने के कारण स्थापित हो गई. जो योग्य हैं, उन्हें भारतीय सेना में जाना चाहिए. भारतीय सेना कम पढ़ीलिखियों को भी जगह देती है, क्लर्क, लेबर आदि. मैं उन वीर नारियों के बारे में सोच रही थी जो ससुराल, मायके और समाज के प्रभाव में आ कर अपना जीवन नारकीय बना लेती हैं. पैंशन और सेना से इतना रुपया मिलता है कि वे बड़े आराम से अपना जीवन बिता सकती हैं. किसी दूसरे पुरुष को पालना जरूरी है क्या?
बस, यही प्रश्न हैं जिन के उत्तर नहीं मिलते.

Love Story : खरा सौदा प्रेम का – प्यार को परवान चढ़ाते प्रेमी

Love Story : दिल तो सभी के एकसमान धड़कते हैं, चाहे वे अलगअलग धर्म के हों. सबा और सुकुमार ने एकदूसरे से सच्ची मोहब्बत की थी. धर्म और समाज के ठेकेदार उन का कुछ न बिगाड़ सके. प्रेम सब पर भारी पड़ गया था.

लखनऊ शहर के ऐतिहासिक ग्राउंड बेगम हजरत महल पार्क में चारों तरफ हरी घास फैली हुई थी. पर, एक कोने की घास काफी हद तक बच्चों ने क्रिकेट खेल कर खराब कर दी थी, लेकिन इन बच्चों को, जिन में से अधिकांश किशोर उम्र के थे, इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ने वाला था उन्हें तो खेलने के लिए एक अदद मैदान चाहिए था, जो इस बेगम हजरत महल पार्क के रूप में उन्हें मिल गया था.

न जाने कितनी राजनीतिक और ऐतिहासिक रैलियों का गवाह बना है ये पार्क. इस पार्क के ठीक सामने 2 मकबरे बने हुए हैं. इन मकबरों के गुंबद आसमान को छूते हैं. एक तो नवाब सआदत अली खान का मकबरा है और दूसरा मकबरा उन की बेगम का है.

प्रेमी जोड़ों की प्रेमभरी बातों और शिकवेशिकायतों का गवाह बनी हैं ये मकबरे की इमारत और आज इसी मकबरे की इमारत की छाया में सबा और सुकुमार कभी आने वाले जीवन के बारे में संजीदा हो रहे हैं, तो कभी मामले की गंभीरता को हलका करने के लिए हलकीफुलकी नोकझोंक भरी बातें भी कर लेते हैं.

‘‘ये मकबरे असली प्रेम की निशानी होते हैं, चाहे कितने ही साल बीत जाएं, पर मरने के बाद भी दो जिस्म एकदूसरे के पास रहते हैं,‘‘ सबा ने मकबरे की तरफ देखते हुए कहा.

थोड़ी देर के लिए सुकुमार गंभीरता ओढ़े बैठा रहा, फिर चुटकी लेते हुए बोला, “अरे, मरने के बाद अगर किसी मकबरे में आप के शरीर को दफन भी कर दिया जाए तो क्या बात है? अरे, मजा तो तब है, जब जीतेजी मुहब्बत को जिया जाए,” कहते हुए सुकुमार ने सबा का हाथ थाम लिया था. पता नहीं क्यों, पर उन्हें एकदूसरे से दूर कर दिए जाने का एक अनजाना सा भय भी लग रहा था.

सुकुमार ने सबा को छेड़ने की गरज से कहा, ‘‘वैसे, तुम्हारे शहर आगरा में तो ताजमहल नाम का एक ही मकबरा है, पर हमारे शहर लखनऊ में तो देखो मकबरों के साथ कितनी  ऐतिहासिक इमारतें भी हैं.‘‘

“हां, है तो एक ही, पर एक ताजमहल ही सब पर भारी है, पर क्या हमारी मुहब्बत भी कहीं नाकाम मुहब्बत न बन कर रह जाएगी? और क्या हमारे एकसाथ जिंदगी बिताने का सपना पूरा नहीं हो पाएगा? काश, हमारा भी छोटा सा घर होता और वहां सिर्फ मैं और तुम ही होते.”

सबा ने अपने घोंसले में वापस आती चिड़ियों को देख कर कहा.

सबा की बात पर सुकुमार खामोश बैठा रहा. दोनों एकदूसरे की खामोशी को सिर्फ सुन ही नहीं रहे थे, बल्कि कुछ अनपूछे सवालों के जवाब समझ भी रहे थे.

सुकुमार लखनऊ के एक प्राइवेट सैक्टर में काम करता था, जबकि आगरा की रहने वाली सबा लखनऊ के सेवा अस्पताल में नर्स का काम करती थी और चैक इलाके में पेइंग गेस्ट के तौर पर रहती थी. वह समय मिलने पर अपने अम्मीअब्बू से मिलने आगरा जाती थी या कभीकभी उन दोनों को ही अपने पास बुला लेती थी.

सुकुमार की मुलाकात सबा से अस्पताल में ही हुई. उसे अपनी दाढ़ का रूट कैनाल ट्रीटमेंट कराना था, इसलिए वह सेवा अस्पताल के दंत विभाग में जाता था. बस, इसी सेवा अस्पताल में एक बार सुकुमार की मुलाकात एक गेहुंए रंग की लड़की से हुई, जो सुकुमार के मन को भा गई थी और उस लड़की को भी सुकुमार की हाजिरजवाबी भा गई थी.

सुकुमार की दाढ़ का इलाज भले ही हो गया था, पर वह अस्पताल जाता रहा, क्योंकि उसे सबा से मुलाकात जो करनी होती थी और ये मुलाकात धीरेधीरे प्यार में बदल गई.

28 साल के सुकुमार और 24 साल की सबा का ये प्यार कोई टाइमपास करने वाला प्यार नहीं था, बल्कि दोनों इस मुहब्बत को शादी में बदलना चाहते थे, मगर दोनों इस बात की गंभीरता और खतरे भी जानते थे, क्योंकि सुकुमार हिंदू था और सबा एक मुसलिम परिवार से आती थी, इसलिए अलगअलग धर्म से होने के कारण राह में आने वाली परेशानियों का अंदाजा दोनों को था.

सबा और सुकुमार अच्छी तरह से जानते थे कि उन के घर वाले इस शादी के लिए कभी नही मानेंगे. इसलिए सबा तो सुकुमार से कोर्ट मैरिज कर के अलग रहने पर भी राजी थी. वह कहती थी कि अगर घर वाले अनुमति न दें, तो वह घर वालों से अलग रहने लगे. पर, फिर भी बात तो बात करने से ही बनती है न, इसलिए इस बात की पहल सबा ने अपने घर में की तो मानो घर में बम फट गया था. मुन्ना भाई पूरे घर में चिल्लाता फिरता था और अम्मी अलग कोने में बड़बड़ा रही थीं, इन सभी बातों के लिए सबा की पढ़ाई को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा था.

“मैं कहती थी न कि लड़की जात को इतना पढ़ाना ठीक नहीं. अरे, अगर पढ़लिख भी गई, तो नौकरी करने के लिए इतनी दूर भेजने की क्या जरूरत थी. अरे, आगरा में भी हजार नौकरियां थीं. अब भुगतो.”

सिर्फ अब्बू ही थे, जो दो जवां दिलों के जज्बात को समझ रहे थे. सबा ने किचन से देखा कि वे खिड़की पर खड़े हो कर नीचे सड़क पर झांक रहे थे. भले ही वे खामोश थे, अलबत्ता उन के दिमाग में भी अंधड़ तो चल ही रहा था.

‘‘मुन्ना की अम्मी, नौकरीपेशा लड़की है और उस पर से जवान भी है. इस उम्र में दिमाग आसानी से बगावत कर सकता है और कहीं कुछ ऊंचनीच कर बैठी तो हम अपनेआप को कभी माफ नहीं कर पाएंगे,‘‘ बड़े लाचार से दिख रहे अब्बू की आवाज में दोनों की शादी के लिए स्वीकार भाव था और यह स्वीकार भाव अम्मी को भी समझ आ गया था. शादी के लिए उन दोनों की स्वीकृति तुरंत तो नहीं मिली, पर सबा को काफीकुछ समझ आ गया था.

लड़की हो कर सबा ने अपने घर में अपनी ही शादी एक हिंदू लड़के से करने की बात कहने की हिम्मत दिखाई, पर सुकुमार यह हिम्मत नहीं कर पा रहा था. इस की वजह थी उस के पिता की बीमारी. सुकुमार के पिता किडनी इन्फेक्शन से पीड़ित थे और ऐसी हालत में वह अपने पिता को कोई टैंशन नहीं देना चाहता था, पर जब सबा ने सुकुमार से कहा कि अगर उस के अंदर हिम्मत नहीं है, तो वह खुद उस के पिता से मिल कर अपनी शादी की बात करेगी, पर उस की बात सुन कर सुकुमार ने कहा कि वह आज खुद ही बात कर लेगा.

“आकर्षण तो विरोध में ही होता है, पर शादियां अपने धर्म और बराबरी वालों में ही हों तो ठीक रहता है, क्योंकि मैं ने न जाने कितने प्रेमियों को देखा है, जो अलगअलग जाति के होने के कारण शादी नहीं कर सके,” एक लंबी सांस छोड़ते हुए सुकुमार के पिताजी ने कहा.

पिताजी की आंखों में अतीत लहरा रहा था. उन्हें वह महल्ला याद आ रहा था, जिस में वे रहा करते थे और वहां रहने वाली एक ईसाई लडकी से उन्हें प्रेम हुआ था और वे दोनों आपस में शादी करना चाहते थे, पर उन के घर में कोई राजी नहीं था. उन्हें ताने मिलने लगे और चरित्रहीन तक कहा गया. महल्ले वालों ने घर आ कर धमकी दी कि लड़के ने धर्म विरोधी काम किया, तो पूरे परिवार को महल्ला छोड़ कर जाना होगा. घर वाले मजबूर दिखे, इसलिए अपना मन मसोस कर अपने धर्म में ही शादी कर ली.

सुकुमार के पिताजी ने यह कहते हुए सुकुमार को सबा से शादी की अनुमति दे दी, ‘‘अगर वह ठीक समझता है, तो सबा से शादी कर सकता है.’’

सुकुमार ने सबा से यह बात बताई तो वह भी बहुत खुश हुई. दोनों परिवारों के मां और पिता में मुलाकात जरूरी थी, इसलिए एक दिन निश्चित किया गया और नियत दिन पर सबा के अम्मीअब्बू आगरा से लखनऊ आ गए. ये मुलाकात ‘‘मीना महल‘‘ नाम के एक होटल में रखी गई.

सबा और सुकुमार अपने परिवार के साथ थे, पर फिर भी दोनों की प्रेमभरी नजरें एकदूसरे से टकरा ही जाती थीं. शुरुआत में दोनों परिवार थोड़े असहज लगे, पर धीरेधीरे दोनों में बातचीत आगे बढ़ी तो वे घुलनेमिलने लगे और अब तक दोनों परिवारों ने सबा और सुकुमार के मन में चलने वाले प्रेम के बवंडर को भी जान और पहचान लिया था, इसलिए शादी की तारीख पर दोनों परिवारों ने मुहर लगा दी. सबा के बड़े भाई मुन्ना ने इस शादी में शामिल होने से इनकार कर दिया था.

अगले दिन सुकुमार ने अपने औफिस में शादी के लिए छुट्टी की अर्जी लगा दी और बातोंबातों में यह बात सब को पता चल गई कि सुकुमार एक मुसलिम लड़की से शादी कर रहा है. कुछ दोस्तों ने खुशी व्यक्त की, तो कुछ ने धर्म विरोधी कह कर सुकुमार का मजाक उड़ाया.

शाम का समय था. सुकुमार परिवार के साथ बैठा चाय पी रहा था, तभी “छनाक‘‘ की आवाज के साथ खिड़की के शीशे के टूटने की आवाज आई, तो सुकुमार ने बाहर की ओर देखा. ये 5-7 लोग थे, जो काफी गुस्से में दिख रहे थे और उसी गुस्से के अतिरेक के कारण उन्होंने शीशा तोड़ दिया था.

“क्या चाहते हैं आप लोग? और ये… ये क्या बदतमीजी है?” सुकुमार ने दरवाजा खोलते हुए कहा, तो उन मुस्टंडे लड़कों में से एक ने सुकुमार का गरीबान पकड़ लिया और उसे धमकाने लगा. ये सब हिंदू युवा ब्रिगेड के लड़के थे.
“सुना है कि तू किसी मुसलिम लड़की से शादी कर रहा है. अरे, अपने धर्म का कुछ तो खयाल कर. या तेरी बुद्धि ही फिर गई है. याद रख, अगर महल्ले में रहना है, तो अपने धर्म के हिसाब से रहना होगा. अगर किसी दूसरे धर्म की लड़की से शादी की, तो अंजाम ठीक नहीं होगा,” उन लोगों ने धमकी दी थी.

यह सुन कर सुकुमार डर तो गया ही था. वह अंदर आ कर सोफे में धम्म से बैठ गया. पिताजी भी घर में थे. उन्होंने भी सब देखा और सुना था.

“ये महल्ले के चंद लड़कों ने हमारे जीवन का ठेका ले रखा है क्या? हमें क्या खाना चाहिए, क्या पीना चाहिए, ये हमे बताएंगे क्या…?” सुकुमार के पिता का बरसों से दबा हुआ आवेग गुस्से की शक्ल में बाहर आ रहा था.

“आज ये कह रहे है कि इस से शादी मत करो, तो कल को कहेंगे कि इस दुनिया में सांस मत लो और ये धर्म के ठेकेदार आज की दुनिया में ही नही हैं. ये 50 साल पहले भी ऐसे ही थे. अगर इन को ठीक से सबक नहीं सिखाया गया, तो ये सारे समाज की ठेकेदारी अपने नाम लिखा लेंगे,” सुकुमार के पिताजी ने उस को हिम्मत देते हुए कहा कि उस की शादी सबा से ही होगी, चाहे इस के लिए उन्हें कुछ भी करना पड़े, क्योंकि अब वे ये नहीं चाहते थे कि इतिहास अपने को दोहराए और जो उन के साथ हुआ, वह उन के बेटे के साथ न हो.

सुकुमार के पिता यह बात समझ चुके थे कि समाज के ठेकेदार उन्हें यहां रहते हुए तो शादी नहीं करने देंगे, इसलिए उन्होंने सबा का नंबर ले कर उस से बात कर कुछ पूछताछ की और जब शाम को सुकुमार घर आया तो उन्होंने उस से कहा कि वह कैरियर और प्रेम में एक का चुन ले.

“क्या मतलब पापा…?”

सुकुमार के पिता ने उस से कहा कि वह इस महल्ले में रहते हुए सबा से शादी नहीं कर सकता, इसलिए उन्हें यह महल्ला… या बेहतर होगा कि ये शहर छोड़ कर कहीं और जाना होगा. उन्होंने सबा की स्वीकृति ले ली है. वह अपना ट्रांसफर सीतापुर की ब्रांच में करा लेगी, पर चूंकि सुकुमार की जौब प्राइवेट है, इसलिए उस का ट्रांसफर तो हो नहीं सकता. अतः जौब छोड़ना ही उस के लिए एकमात्र औप्शन होगा.

“ठीक है पापा, मैं सबा को पाने के लिए ये भी करने को तैयार हूं.”

सबा और सुकुमार ने यही किया. शादी के बाद दोनों सीतापुर शिफ्ट हो गए. दोनों ने एक छोटा सा घर किराए पर ले लिया था. वे दोनों खुशी से रह रहे थे, पर सबा से शादी करने के फेर में सुकुमार की नौकरी छूट गई थी और उसे अपने मातापिता को छोड़ कर सीतापुर आना पड़ गया था.

सबा के नौकरी पर जाने के बाद सुकुमार एकदम अकेला हो जाता. हालांकि उस का बायोडाटा नौकरी डौट कौम पर अपलोड था, पर नौकरी मिलने में समय लगता है और दूसरी तरफ अपने पापा की बिगड़ती तबीयत उस की चिंता का कारण बन रही थी.

उस की ये परेशानी सबा समझ गई थी और उस ने सुकुमार से कहा, ‘‘जिन मम्मीपापा ने समाज की परवाह न करते हुए हमारी शादी कराई है, उन्हें भला हम अकेले कैसे छोड़ देंगे. आप मम्मीपापा को यहां सीतापुर ही बुला लीजिए.‘‘

“पर, यह तो किराए का मकान है. वह भी सिर्फ 2 कमरों का,” सुकुमार झिझका.

“अगर एक कमरा भी होता तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता था. दिल में जगह हो तो घर अपनेआप बड़ा हो जाता है. यहां पर उन की किडनी इन्फेक्शन का इलाज भी अपनी नजरों के सामने ही कराऊंगी और जरूरत पड़ी तो उन्हें अपनी किडनी भी देने से पीछे नही हटूंगी,” सबा ने कहा, तो सुकुमार उस की समझदारी देख कर भावुक हो गया.

आननफानन में सुकुमार ने अपने पापा से बात कर मम्मी के साथ उन्हें भी सीतापुर बुला लिया. अब वे चारों लोग एकसाथ रहने लगे.

सबा ने अपने ससुर की किडनी की सारी जांचें कराईं और उन की रिपोर्ट आने के बाद डाक्टर ने ट्रीटमेंट शुरू कर दिया. लखनऊ में सुकुमार नौकरी करता था और उस के बाहर जाने के बाद पिताजी की दवाओं का ध्यान रखना और उन को नियमित रूप से जांच कराने के लिए अस्पताल ले जाना संभव नहीं हो पाता था. पर यहां तो बहू के रूप में उन के पास सबा थी, जो उन का पूरा ध्यान रखती और सारी जांचें समय से कराती. सही देखभाल और दवा के ठीक इस्तेमाल से तबीयत में सुधार होने लगा.

डाक्टरों ने यह बताया था कि अब उन्हें सबा से किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत नहीं पड़ेगी, सिर्फ दवाएं खा कर ही बीमारी कंट्रोल में रह सकती है.

पिताजी ने अपनी जीवनशैली को भी नियमित कर रखा था. सबा को सुबह 8 बजे अस्पताल के लिए निकलना होता. पिताजी सुबह 5 बजे उठते. हालांकि, वे खुद तो चाय नहीं पीते थे,  पर सबा के लिए एक कप चाय जरूर बना देते. अपने ससुर का प्यार देख कर सबा निहाल हुए जाती थी. सच ही तो है कि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती और ताली की आवाज से प्यार का संगीत तब ही सुनाई देता है, जब प्यार का परस्पर लेनादेना हो.

आएदिन इस महल्ले में दोनों धर्मों के ही कोई न कोई धर्मिक अनुष्ठान और कार्यक्रम होते थे. पर, ये परिवार किसी भी धार्मिक कार्यक्रम में भाग नहीं लेते थे. उन्हें इन सब चीजों की जरूरत ही नहीं महसूस हुई.

सबा के सासससुर को उन की बहू और बेटे का प्रेम मिल रहा था, क्योंकि उन्होंने भी तो सबा को अपना प्रेम और सम्मान दिया था.

इस परिवार में धर्म के नाम पर कोई बहसबाजी कभी नहीं हुई, क्योंकि धर्म हमें एकदूसरे से श्रेष्ठ होना बताता है और दूसरे को नीचा बताता है. पर, सच्चा प्रेम वही होता है, जो एकदूसरे को बराबरी का दर्जा दे.

प्रेम के सौदे में कभी घाटा नहीं होता, प्यार और मुहब्बत का सौदा ही तो होता है खरा सौदा प्रेम का.

Best Hindi Story : प्रदूषित ध्वनि – अपने में खोए जवां दिल

Best Hindi Story : वक्त की नजाकत शायद इसे ही कहते हैं. एक मधुर ध्वनि यानी आवाज खुशी में दिल बहका देती है लेकिन गम में वही ध्वनि कलेजा फाड़ देती है.

‘‘क्या सोच रही हो?’’
‘‘यही कि पपीहा जब अपनी पपीही को पुकारता है तो कहता क्या होगा?’’
‘‘यही कि तेरे बिन अकेला हूं, अब तो जिया न जाए.’’
‘‘तुम्हें हर वक्त मजाक सू झता है.’’
‘‘तुम ने बात ही ऐसी की है, पगली.’’
‘‘उन के पास शब्द नहीं होते, केवल ध्वनियां होती हैं, विभिन्न प्रकार की ध्वनियां, अभिन्न एहसासों के लिए.’’
‘‘तुम सच कहते हो, पंछियों की आवाजें, जिन्हें हम ध्वनि या साउंड कहते हैं, एकदम जुदाजुदा सी है हजारोंलाखों तरह की.’’
‘‘बिलकुल, कुदरत की भाषा भी ध्वनियां ही हैं. कायनात के पास शब्द नहीं हैं.’’
‘‘फिर हमारे पास शब्द कहां से आए?’’
‘‘सब प्रकृति का खेल है.’’ और दोनों हंसतेखिलखिलाते आगे बढ़ते रहे.

युवा जोड़ा अपने उल्लासों में गुम, जिंदगी के खूबसूरत लमहे गुजारने भरतपुर बर्ड सैंचुरी घूमता हुआ, अपने खूबसूरत पलों को सहेजता दुनिया की आपाधापी से दूर नितांत अकेले, स्वयं को स्वर्णिम एहसासों से सरोबार करते हुए आनंदित हो रहा था कि एक जीप, जिस में 2 पुलिसमैन, एक रेंजर व एक ड्राइवर बैठे हुए थे, उन के पास आ कर रुकी.
‘‘यहां कहां घूम रहे हो तुम लोग?’’ इंस्पैक्टर ने कड़कती आवाज में पूछा.
‘‘हम सैंचुरी घूमने आए हैं सर, विद परमिशन,’’ उन्होंने कार्ड दिखाया.
‘‘अच्छाअच्छा,’’ इंस्पैक्टर थोड़ी नरमाई दिखाता हुआ बोला, ‘‘जल्दी
से कौटेज पहुंच जाओ, बारिश आने
वाली है.’’
‘‘जी सर,’’ उन्होंने सहमति से सिर हिलाते हुए कहा.
‘‘और इस लैफ्ट वाली पगडंडी से जाओ, सीधे कौटेज पहुंचोगे.’’
‘‘जी, बेहतर है,’’ और वह हाथ हिलाते हुए आगे बढ़ने लगे.

मंदमंद, सरसराती समीर जिस्म को बहुत सुकून देती है. बादलों के साथ पागलों की तरह एकदूसरे से लिपट कर भागने में सुरमई सी फिजां कितना रोमांच भर देती है. देह में प्रेम पगने लगता है वह भी बगैर एक शब्द बोले. सिर्फ ध्वनियों में ही संपूर्ण प्रेम का प्रकटीकरण हो जाता है.

प्रेम निशब्द ही होता है. जब हम प्रेम में होते हैं तो केवल साउंड में ही क्रियाप्रतिक्रिया व्यक्त हो जाती है और हम तृप्त भी हो जाते हैं. अर्थात, ध्वनि मूल है, शब्द गौण.
अपनी ही बातों में मस्त जोड़ा अपनी ही मस्ती में अपनी कौटेज की ओर रवाना था.
पुलिस की जीप आगे जा कर रुक गई. जिस में एक वन विभाग का रेंजर था, एक पुलिस सब इंस्पैक्टर, एक सिपाही और एक ड्राइवर.
‘‘यार, लड़की तो बम्बाट दिखे है,’’ सब इंस्पैक्टर खीसें निपोरता बोला.
‘‘सही बोले, साबजी,’’ पुलिस वाले ने हां में हां मिलाई, दोनों मूर्खों की तरह हंसने लगे.
‘‘मतवाले मौसम ने उमंग जगा दी है और इस लड़की के रूप ने तो तनबदन में आग सी लगा दी है,’’ इंस्पैक्टर ने अंगड़ाई लेते हुए कहा.

प्रकृति का भी निराला खेल है, खूबसूरती इंसानों के दिलों में मोहब्बत जगाती है तो मौसम शैतानों के शरीरों में वासना फैलाता है. शैतानी मानसिकता से ग्रस्त शरीर कुछ गलतसही नहीं सोच पाता. जहां प्रकृति अपने मनमोहक सुरों में आलाप ले रही है वहीं ये दरिंदे वासना में बहक शंखनादी विलाप ले रहे हैं.
‘‘हां,’’ पुलिस वाले ने कहा.
‘‘तो उस्ताद, लड़की के पीछे गाड़ी लगा,’’ इंस्पैक्टर अपने ड्राइवर से बोला.
‘‘साब, लड़का उस के साथ है.’’
‘‘साले को काट के फेंक देंगे, जंगल है. जानवर तो मरते ही रहते हैं,’’ उस ने जोरदार ठहाका लगाया.
‘‘गाड़ी मत मोड़, सीधी रख, चैकपोस्ट पर पहुंचना है,’’ रेंजर ने ड्राइवर से कहा.
‘‘अरे रेंजर साहब, छोडि़ए भी चैकपोस्ट का रोना, आप भी मजे लेना.’’
‘‘मजे लेना मेरा काम नहीं है. इस इलाके का रेंजर हूं मैं. पशुपक्षियों की सुरक्षा के साथसाथ यहां आने वाले पर्यटकों की हिफाजत करना भी मेरा कर्तव्य है. गाड़ी सीधे चैकपोस्ट ही जाएगी,’’ उस ने दृढ़ता से कहा.
‘‘रेंजर साहब, आप तो घणे आदर्शवादी लाग्गे हो.’’
‘‘आप जो भी सम झें, आप की जैसी मरजी.’’
‘‘आप फुजूल बात बढ़ा रहे हैं, रेंजर बाबू. बात सिर्फ मजे लेण की है. तो यों करें कि लड़के को नहीं मारते. अब तो खुश?’’
‘‘बात खुशी की नहीं, उन की सुरक्षा की है.’’
‘‘अच्छा, कोंण देगा सुरक्सा उन्हें?’’ उस के चेहरे पे कुटिल सी मुसकान
खेल गई.
‘‘मैं दूंगा उन्हें सुरक्षा. यही मेरा काम है और आप का भी यही कर्तव्य है जनता की सुरक्षा.’’
‘‘लो, कर लो बात. इब यो सिखाएगा हमें हमारी ड्यूटी,’’ यह कह कर इंस्पैक्टर ने अपनी गन रेंजर पर तान दी.
‘‘साबजी, रहण दो, घणा खूनखराब्बा हो जावेगा. जाण दो साब. कोई दूसरा इंतजाम करेंगे आप की खातिर,’’ पुलिस वाला हाथ जोड़ते हुए बोला.
‘‘ना रे, उस्ताद. अब चखना तो उसी छोकरी ने है.’’
‘‘ऐसा तो होगा नहीं मेरे रहते,’’ रेंजर गुर्राया. रेंजर छह फुटा जवान, बलिष्ठ शरीर, सीना तना, गर्वीला, कम उम्र का नौजवान, डर उसे छू कर भी न निकला.

‘‘यह तमंचा अपनी जेब में रख लो, साहिबजी. खरहा मारने के काम आएगा.’’
‘‘रख लो, साबजी,’’ रेंजर ठीक
बोले से.
‘‘ओए, तू चुप कर. घणी बकवास न कर, अपनी औकात में रह,’’ इंस्पैक्टर धौंस दिखाते हुए बोला, ‘‘इस छोकरे की तो जानवर पार्टी करेंगे.’’
‘‘आप अपने होश में नहीं हैं, साबजी. थोड़ी ठंड रखो.’’
‘‘तू परे हट बे,’’ सब इंस्पैक्टर राक्षसपने पर उतर आया.
युवा जोड़ा दुनिया से बेखबर अपनी ही धुन में रमा बढ़ा चला जा रहा था कि लड़का अचानक रुक कर बोला, ‘‘यार, कहीं हम गलत रास्ते पर तो नहीं?
उन पुलिस वालों ने तो यही रास्ता बताया था.’’
‘‘तुम्हें बहुत भरोसा है पुलिस वालों पर,’’ लड़की ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘कितनी शराफत से तो बात की थी, रास्ता भी सही बताया होगा.’’
‘‘रुको, जब हम ने वापसी की थी तो हवा कानों से टकरा रही थी और अब सीधी नाक से टकरा रही है.’’
‘‘मतलब?’’
‘‘यही कि बातों के चक्कर में रास्ता भटक गए हैं.’’
‘‘तो अब?’’
‘‘तो अब रात बारिश में भीगते हुए बितानी होगी.’’
‘‘मजाक मत करो, अभी रात होने में काफी वक्त है.’’
‘‘मु झे लगा, तुम एक्साइटमैंट में मेरे गाल चूम लोगी.’’
‘‘चूम तो होंठ भी लूंगी लेकिन पहले कौटेज तो पहुंचें.’’
‘‘अरे, यह तो बुलेट फायर था, तुम ने सुना?’’
‘‘लगता है, शिकारी घुस आए हैं सैंचुरी में.’’
‘‘जल्दी डिसाइड करो, मु झे घबराहट हो रही है.’’
वह भी चिंतित हो गया था बुलेट की आवाज सुन कर.
‘‘वह जो पगडंडी घूम गई है, उस पर चलते हैं.’’
‘‘जैसा तुम्हें सही लगे, चलो.’’ और वह युवा जोड़ा उस पगडंडी की ओर मुड़ गया.
इंस्पैक्टर ने गोली चला दी.
गोली रेंजर के कंधे पर लगी लेकिन उस ने दूसरा मौका नहीं दिया. सब इंस्पैक्टर की बांह पकड़ कर मरोड़ी और फिर एक ही झटके में उसे जमीन पर पटक दिया.
रेंजर ने उस की छाती पर पैर रख कर मसल दिया. खोखला शरीर तड़प उठा.
‘‘हां, भई उस्ताद, तुम भी जोर आजमा लो?’’ रेंजर ने हंसते हुए पुलिस वाले से कहा.
‘‘ना सरजी, हमारी मति थोड़ी मारी गई है जो आप से पंगा लें.’’
‘‘सुन बे इंस्पैक्टर, तु झ से अच्छी गन मेरे पास है और मु झे बुलेट का हिसाब भी नहीं देना पड़ता है. यह देख, ठोक दूं तु झे अभी और तेरे इस चेले को भी,’’ रेंजर ने गन उन दोनों की तरफ मोड़ दी.

दोनों रेंजर के पैरों में लिपट गए, ‘‘नहीं सर, नहीं, गलती से गलती हो गई. हमें माफ कर दो, सर. आप तो रक्षक हैं,’’ वे दोनों गिड़गिड़ाए.
‘‘तो, चलो फिर, अपने साहब के हाथपैर बांधो, गाड़ी में लादो और चैकपोस्ट पहुंच कर सब सच बता दो.’’
उस के कंधे से खून बह रहा था. बुलेट अब भी कंधे के अंदर ही थी.
‘‘वह देखो वहां कौटेज, हम पहुंच गए. तुम ने सही रास्ता चुना,’’ यह कह कर युवती उस से लिपट गई. हलकीहलकी बारिश शुरू हो गई थी पर वे सुरक्षित थे.
‘‘यह बुलेट की आवाज भी तो ध्वनि ही होती है?’’
‘‘हां, पर प्रदूषित.’’ और फिर वे हाथों में हाथ डाले, मुसकराते हुए कौटेज में दाखिल हो गए.

लेखक : मुख्तार अहमद

Romantic Story : पुनर्मिलन – प्रेमियों के लिए वैलेंटाइन डे बना खास

Romantic Story : वर्षों की दूरियों के बावजूद समीर और अवनी के दिलों में प्यार अब भी जिंदा था. अचानक हुई मुलाकात से दोनों की आंखों में बीते समय की यादें उमड़ पड़ी थीं. क्या वैलेंटाइन डे उन के लिए एक नई शुरुआत का संदेश ले कर आया था?

वैलेंटाइन डे की शाम थी और समीर और अवनी 5 वर्षों बाद अचानक एक कैफे में आमनेसामने थे, दोनों की आंखों में बीते वक्त की यादें उमड़ पड़ीं. हैरान हो कर समीर बोला, ‘‘अवनी, तुम यहां?’’
मुसकराने की कोशिश करती हुई अवनी बोली, ‘‘हां, सोचा, जरा कौफी पी लूं. लेकिन तुम?’’
हलकी सांस लेते हुए समीर बोला, ‘‘मैं भी बस यों ही आ गया, अकेले.’’
यह सुन कर अवनी थोड़ा रुकी, फिर बोल पड़ी, ‘‘अच्छा, तुम अब भी अकेले हो?’’
समीर ने बेबाकी से कहा, ‘‘हां, शायद तुम्हारे बाद किसी से जुड़ने की हिम्मत नहीं हुई. तुम कैसी हो?’’
अवनी थोड़ा भावुक हो कर बोली, ‘‘अच्छी हूं लेकिन कुछ अधूरी सी.’’
समीर चौंकते हुए बोला, ‘‘अधूरी, क्यों?’’
अवनी ने जवाब दिया, ‘‘तुम से दूर हो कर ऐसा लगा जैसे जिंदगी का सब से खूबसूरत हिस्सा कहीं छूट गया, शादी हुई, निभाने की कोशिश की, लेकिन…रिश्ते कागज़ी थे, दिल से नहीं.’’

समीर गहरी सांस लेते हुए बोला, ‘‘मुझे हमेशा अफसोस रहा कि हम ने एकदूसरे को यों ही खो दिया. अगर हम थोड़ा और सम झदारी से सोचते तो शायद जुदाई कभी न होती.’’

अवनी नम आंखों से बोली, ‘‘हां, वक्त ने हमें अलग किया, लेकिन शायद यह भी जरूरी था. हम दोनों ने बहुतकुछ सीखा. लेकिन एक बात कभी नहीं बदली, समीर, वह है मेरा प्यार.’’

समीर ने अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘क्या इस वैलेंटाइन डे पर हम फिर से एक नई शुरुआत कर सकते हैं?’’

जवाब में अवनी उस का हाथ थामती हुई, हलकी मुसकान के साथ बोली, ‘‘शायद समय ने हमें आज फिर से मिलाने के लिए ही यहां बुलाया है. हां, समीर, मैं फिर से तुम्हारे साथ चलना चाहती हूं, इस बार हमेशा के लिए.’’

दोनों की आंखों में गजब की खुशी और उन के चेहरों पर राहत थी. सालों की दूरियां मिट गईं और वैलेंटाइन डे ने फिर से ‘दो दिलों’ को एक कर दिया.

लेखक : संजय सिंह चौहान

Allahabad High Court : जमानत पर हैं तो क्यों नहीं जा सकते विदेश?

Allahabad High Court : किसी आरोपी को जमानत पर रिहा किए जाने पर अदालत कुछ शर्तें लगा सकती है, जैसे विदेश यात्रा पर जाने के लिए अदालत से अनुमति लेना वगैरह लेकिन सवाल यह है कि अदालत जब यात्रा के अधिकार को व्यक्तिगत आजादी का हिस्सा मानती है तो जमानत मिलने के बाद विदेश जाने पर रोक क्यों?

आदित्य मूर्ति उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में श्रीराम मूर्ति स्मारक आयुर्विज्ञान संस्थान में एडवाइजर हैं. वे एक दशक से अधिक समय से सीबीआई मामले में मुकदमे का सामना कर रहे हैं. कोर्ट ने उन को जमानत दे रखी है. 22 मई, 2025 को आदित्य मूर्ति को अपने रिश्तेदार की शादी के लिए अमेरिका और उस के बाद शादी समारोह में हिस्सा लेने के लिए 3 मई से 22 मई, 2025 तक फ्रांस जाना चाहते थे. जमानत पर होने के कारण विदेश यात्रा करने के पहले उन को कोर्ट से आज्ञा लेनी है. आदित्य मूर्ति ने इस की एक अपील इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल की.

न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने श्रीराम मूर्ति स्मारक आयुर्विज्ञान संस्थान, बरेली के परामर्शदाता आदित्य मूर्ति की याचिका को खारिज करते फैसला सुनाया कि विदेश में रिश्तेदार की शादी और दूसरे देश की मौजमस्ती के लिए यात्रा करना विचाराधीन आरोपी के लिए अंतर्राष्ट्रीय यात्रा करने के लिए आवश्यक कारण नहीं माना जाता. जमानत पर रिहा किए गए आरोपी व्यक्ति को चिकित्सा उपचार, आवश्यक आधिकारिक कर्तव्यों में शामिल होने और इसी तरह की किसी जरूरी आवश्यकता के लिए विदेश यात्रा की अनुमति दी जा सकती है.

उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि रिश्तेदार के विवाह समारोह में शामिल होना जरूरी आवश्यकता नहीं है. इस के अलावा, न्यायालय ने याचिकाकर्ता के इस तर्क पर भी ध्यान दिया कि उसे पहले गैरआवश्यक उद्देश्यों के लिए विदेश यात्रा की अनुमति दी गई थी.

पीठ ने कहा, ‘केवल इसलिए कि अधीनस्थ अदालत ने आवेदक को कई मौकों पर गैरआवश्यक उद्देश्यों के लिए विदेश यात्रा की अनुमति दी थी, उसे इस बार भी गैरआवश्यक उद्देश्यों के लिए विदेश यात्रा करने का अधिकार नहीं है, जब मुकदमा बचाव पक्ष के साक्ष्य के चरण में पहुंच गया है.’

आदित्य मूर्ति ने 24 अप्रैल, 2025 को विशेष सीबीआई अदालत के आदेश को चुनौती दी थी, जिस ने विदेश यात्रा के लिए उन के आवेदन को खारिज कर दिया था. आदित्य मूर्ति एक दशक से अधिक समय से सीबीआई कोर्ट में एक मामले में मुकदमे का सामना कर रहे हैं.

कानून में बदलाव की जरूरत

भारतीय कानून में जमानत की शर्त लगाना एक विवादास्पद मुद्दा है, जिस के तहत किसी आरोपी को विदेश यात्रा से पहले अदालत से पूर्व अनुमति लेनी होती है. अदालतों ने यात्रा के अधिकार को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न अंग माना है, लेकिन वे कानूनी कार्यवाही के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए कुछ प्रतिबंधों की आवश्यकता को भी स्वीकार करते हैं. विदेश यात्रा का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक प्रमुख पहलू माना जाता है.

आज भारत के 5 करोड़ 50 लाख से अधिक लोग विदेश में रहते हैं. इन के भारत में रह रहे नातेरिश्तेदारों में से तमाम ऐसे होंगे जिन के मुकदमे चल रहे होंगे. देश में किसी पर भी मुकदमा हो सकता है चाहे व्यक्ति ने अपराध किया हो या न.

कई बार अनजाने में हुई गलतियों के लिए भी मुकदमा हो जाता है. ये मुकदमें सालोंसाल चलते हैं. आंकड़ें बताते हैं कि 5 करोड़ से अधिक के मुकदमें विभिन्न कोर्टों में लंबित हैं. इस के अलावा एसडीएम, डीएम और कमिश्नर की कोर्ट में भी मुकदमें लंबित है. एक मुकदमे में करीब 8 लोग प्रभावित होते हैं. ऐसे में 40 करोड़ लोग सीधे तौर पर इन मुकदमों से प्रभावित हैं.

देश में जमानत की प्रक्रिया सरल नहीं है. जमानत के लिए दो जमानतदार की जरूरत पड़ती है. शहरों में रहने वालों के लिए जमानतदार खोजना कठिन काम होता है. कोई किसी की जमानत लेने को तैयार नहीं होता.

1860 में जब कानून बने थे उस समय मुकदमे कम होते थे. विदेश जाने की जरूरत नहीं होती थी. तब जमानत पर रिहा हुए व्यक्ति के लिए विदेश जाने का मसला बड़ा नहीं था. अब यह दौर बदल गया है. ऐसे में उम्मीद की जा रही थी कि 2023 में जो नए कानून बनें उन में इस तरह के हालात को देखते हुए बदलाव किए जाएंगे.

देश के गृहमंत्री अमित शाह ने 2023 में जब नए कानून संसद में पेश किए तो उन की बड़ी तारीफ की थी. केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने देशभर में 3 नए आपराधिक कानूनों को जब लागू किया था तो बड़े जोरशोर से कहा था, ‘ये कानून दंड की जगह न्याय देने वाले और पीड़ित केंद्रित हैं.’

‘नए कानूनों में दंड की जगह न्याय को प्राथमिकता मिलेगी, देरी की जगह स्पीडी ट्रायल और स्पीडी जस्टिस मिलेगा और पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित होंगी. नए कानूनों को हर पहलू पर 4 वर्षों तक विस्तार से अलगअलग स्टेकहोल्डर्स के साथ चर्चा कर के लाया गया है और आजादी के बाद से अबतक किसी भी कानून पर इतनी लंबी चर्चा नहीं हुई है.’

गृह मंत्री ने कहा कि आजादी के 77 वर्षों बाद भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली पूर्णतया स्वदेशी हो गई है. इन कानूनों के आधार में दंड की जगह न्याय, देरी की जगह त्वरित ट्रायल और त्वरित न्याय को रखा गया है. इस के साथ ही पहले के कानूनों में सिर्फ पुलिस के अधिकारों की रक्षा की गई थी लेकिन इन नए कानूनों में पीड़ितों और शिकायतकर्ता के अधिकारों की भी रक्षा करने का प्रावधान है.

उन्होंने कहा था कि इन तीन नए कानूनों के लागू होने से देश की पूरी आपराधिक न्याय प्रणाली में भारतीय आत्मा दिखाई देगी. इन कानूनों में कई ऐसे प्रावधान किए गए हैं जिन से देश के नागरिकों को कई प्रकार के फायदे होंगे. इन कानूनों में अंगरेजों के समय विवाद में रहे कई प्रावधानों को हटा कर आज के समय के अनुकूल धाराएं जोड़ी गई हैं. इन कानूनों में भारतीय संविधान की स्पिरिट के अनुरूप धाराओं ओर अध्यायों की प्राथमिकता तय की गई है.

अब हकीकत आ रही सामने

जैसेजैसे नए कानून के प्रभाव देखने को मिल रहे हैं वैसेवैसे उन से साफ होता जा रहा है कि कानून में अभी भी समय के हिसाब से बदलाव नहीं हुए हैं. विदेश जाने का यह मसला इसी तरह के सुधार से जुड़ा है. आज हर शहर में इंटरनैशनल एयरपोर्ट है, जिस से पता चलता है कि कितने लोग विदेश जाते होंगे.

ऐसे में जमानत पर रिहा लोगों के लिए विदेश जाने के लिए कोर्ट से अनुमति लेने की जरूरत क्यों पड़ती है? जब जमानत मिलती है तो उस में यह जुड़ा होना चाहिए कि जमानत पर रिहा व्यक्ति विदेश जा सकता है.

बरुन चंद्र ठाकुर बनाम रयान औगस्टीन पिंटो केस में सुप्रीम कोर्ट ने एक शर्त को बहाल कर दिया, जिस के तहत अभियुक्त को विदेश यात्रा के लिए पूर्व अनुमति लेनी होगी, इस बात पर बल देते हुए कि यात्रा का अधिकार महत्त्वपूर्ण है.

अदालतें विशिष्ट परिस्थितियों में विदेश यात्रा की अनुमति देती हैं. इन में चिकित्सा आपातस्थिति या रोजगार की जरूरतें प्रमुख हैं. न्यायालयों ने मामलों की परिस्थितियों के आधार पर शर्तों को संशोधित करने की इच्छा दिखाई है.

यदि किसी अभियुक्त ने लगातार जमानत की शर्तों का पालन किया है तो न्यायालय विदेश यात्रा के लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता में ढील दे सकता है. यात्रा प्रतिबंधों सहित शर्तें लगाने के विवेक का प्रयोग विवेकपूर्ण तरीके से किया जाना चाहिए. जो शर्तें बोझिल या अनुचित समझी जाती हैं, उन्हें उच्च न्यायालयों द्वारा रद्द किया जा सकता है. कानूनों में अभी भी ऐसे तमाम प्रावधान हैं जो नागरिक अधिकारों की रक्षा नहीं करते. जमानत कानून इस का एक उदाहरण है.

इस का प्रभाव हमारे घर, परिवार और बच्चों पर पड़ता है. वह भले ही सीधे तौर पर अपराध में शामिल न हो, लेकिन घर के प्रमुख पर जब अपराध में शामिल होने का आरोप लगता है तो पूरे घर का ढांचा बिगड़ जाता है. स्कूल जा रहे बच्चे पर भी उंगली उठती है जिस के पिता को पुलिस ने पकड़ कर जेल भेज दिया है. घरपरिवार चलाने के साथ ही साथ जमानत का इंतजाम करना बेहद कठिन काम होता है.

Hindi Kahani : इश्क का भूत – अपने भटकते कदम रोकते हुए युवक की सीख देती कहानी

Hindi Kahani : जब इश्क का भूत सिर चढ़ कर बोलता है तब दुनिया में कुछ नजर ही नहीं आता. न मानप्रतिष्ठा की परवा न कैरियर की चिंता. शेफाली भी ऐसी ही सिरफिरी लड़की थी, उसे जब जीत नजर आया, तो वह उस पर जीजान से फिदा हो गई. बेशक जीत को भी उस का साथ अच्छा लगा, लेकिन जीत को पहले अपनी बहन सुमन के विवाह की चिंता थी. शेफाली रईस बाप की औलाद थी, जिस ने न गरीबी देखी थी और न ही भूख. वह अपने मन की करना जानती थी. वह गर्ल्स होस्टल में रहती व मौजमस्ती करती. उस के पिता की पेपरमिल थी. वे एक जानेमाने उद्योगपति थे, सो शेफाली के पास एक से बढ़ कर एक ड्रैसेस का अंबार लगा रहता. हमेशा सजीसंवरी, ज्वैलरी से लकदक, हाथ में पर्स लिए बाहर घूमने के अवसर तलाशती शेफाली की पढ़ने में कोई रुचि नहीं थी. कालेज में ऐडमिशन तो उस ने समय बिताने के लिए ले रखा था. उसे तलाश थी ऐसे युवक की जो दिखने में हैंडसम हो और उस के आगेपीछे घूमे.

जीत से उस की नजरें कालेज के फंक्शन में मिलीं और उसे उस में सारी बातें नजर आईं जिन की उसे तलाश थी. वह हौलेहौले बोलता और किसी फिल्मी नायक सा उस के ईदगिर्द डोलता. अंधा क्या चाहे, दो आंखें. शेफाली खर्च करने के लिए तैयार रहती, दोनों खूब घूमते. महानगरों में वैसे भी कौन किसे जानता है या कौन किस की परवा करता है. पौश इलाके के होस्टल में रह रही शेफाली के पास जीत बाइक ले कर आता. वह अदा से इतरातीलहराती उस के संग चली जाती.

जब लौटती तो सहेलियों को अपने रोमांस के किस्से बता कर इंप्रैस करती. चूंकि उस की सहेलियां स्टडी में व्यस्त थीं, उन्हें तो अपने रिजल्ट की अधिक फिक्र रहती. वे उस की कहानी सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं लेती थीं.

इधर जीत भी पढ़ाई में पिछड़ता चला गया. उस का सारा वक्त शेफाली के बारे में ही सोचसोच कर निकल जाता. शेफाली के दिए गिफ्ट उसे भारी तोहफे नजर आते. वह उसे कभी टीशर्ट देती, कभी ब्रेसलेट तो कभी गौगल्स. वह खुद को हीरो से कम नहीं समझता. वह यही समझता कि शेफाली उस से विवाह करेगी और वह एक उद्योगपति का दामाद बन कर मालामाल हो जाएगा.

इधर शेफाली जीत संग आउटिंग पर थी, उधर उस के पापा अशोक ने प्राइवेट डिटैक्टिव से सारी जानकारी इकट्ठी करवा ली थी कि वह कहां जाती है, क्या करती है.

शेफाली के पापा अशोकजी ने जमाना देखा था. वे पल भर में सारा माजरा समझ गए थे. उन्हें समझ आ गया कि उन की लाडली महज दिलबहलाव कर रही है. पढ़ाई में उस का मन नहीं लग रहा.

जीत जिस तरह से बेझिझक शेफाली से तोहफे ले रहा था, इस से अशोकजी को यह भी समझ में आ गया कि इस लड़के में कोई स्वाभिमान नहीं है वरना वह इस तरह शेफाली की दी वस्तुएं न स्वीकारता. जीत का फंडा समझने में अशोकजी को ज्यादा समय नहीं लगा, क्योंकि वे तो खुद व्यवसायी थे और जीत के प्रोफैशनल प्रेम को पहचान गए थे.

शेफाली के लिए उन्होंने विदेश से पढ़ाई कर के लौटा एमबीए लड़का विजय तलाश लिया था. शेफाली ने जब विजय को देखा तो देखती ही रह गई. वह स्टाइलिश और अमेरिकन अंगरेजी बोल रहा था. उसे जीत को भुला देने में एक मिनट भी नहीं लगा.

जीत देखता रह गया और शेफाली विजय के साथ शादी कर हनीमून मनाने स्विट्जरलैंड चली गई.

इश्क का भूत तो धन की चमक के आगे एक पल भी नहीं ठहर पाया. वे आज के युवा ही क्या जो इश्क के लिए जिंदगी बरबाद करें. अलबत्ता जीत को संभलने में एक साल लगा, पर जबकि वह दिल से नहीं मतलब की खातिर शेफाली से जुड़ा था. अब उस के सामने अपनी युवा बहन की जिम्मेदारी थी. वह नहीं चाहता था कि कोई उस के चालचलन का हवाला दे कर उस की बहन के रिश्ते को मना करे. जीत की मां को यही तसल्ली थी कि उस का बेटा एक बेवफा के प्यार में ज्यादा नहीं भटका.

Family Story : पहला पहला प्यार – मां को कैसे हुआ अपने बेटे की पसंद का आभास

Family Story : ‘‘दा,तुम मेरी बात मान लो और आज खाने की मेज पर मम्मीपापा को सारी बातें साफसाफ बता दो. आखिर कब तक यों परेशान बैठे रहोगे?’’

बच्चों की बातें कानों में पड़ीं तो मैं रुक गई. ऐसी कौन सी गलती विकी से हुई जो वह हम से छिपा रहा है और उस का छोटा भाई उसे सलाह दे रहा है. मैं ‘बात क्या है’ यह जानने की गरज से छिप कर उन की बातें सुनने लगी.

‘‘इतना आसान नहीं है सबकुछ साफसाफ बता देना जितना तू समझ रहा है,’’ विकी की आवाज सुनाई पड़ी.

‘‘दा, यह इतना मुश्किल भी तो नहीं है. आप की जगह मैं होता तो देखते कितनी स्टाइल से मम्मीपापा को सारी बातें बता भी देता और उन्हें मना भी लेता,’’ इस बार विनी की आवाज आई.

‘‘तेरी बात और है पर मुझ से किसी को ऐसी उम्मीद नहीं होगी,’’ यह आवाज मेरे बड़े बेटे विकी की थी.

‘‘दा, आप ने कोई अपराध तो किया नहीं जो इतना डर रहे हैं. सच कहूं तो मुझे ऐसा लगता है कि मम्मीपापा आप की बात सुन कर गले लगा लेंगे,’’ विनी की आवाज खुशी और उत्साह दोनों से भरी हुई थी.

‘बात क्या है’ मेरी समझ में कुछ नहीं आया. थोड़ी देर और खड़ी रह कर उन की आगे की बातें सुनती तो शायद कुछ समझ में आ भी जाता पर तभी प्रेस वाले ने डोर बेल बजा दी तो मैं दबे पांव वहां से खिसक ली.

बच्चों की आधीअधूरी बातें सुनने के बाद तो और किसी काम में मन ही नहीं लगा. बारबार मन में यही प्रश्न उठते कि मेरा वह पुत्र जो अपनी हर छोटीबड़ी बात मुझे बताए बिना मुंह में कौर तक नहीं डालता है, आज ऐसा क्या कर बैठा जो हम से कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है. सोचा, चल कर साफसाफ पूछ लूं पर फिर लगा कि बच्चे क्या सोचेंगे कि मम्मी छिपछिप कर उन की बातें सुनती हैं.

जैसेतैसे दोपहर का खाना तैयार कर के मेज पर लगा दिया और विकीविनी को खाने के लिए आवाज दी. खाना परोसते समय खयाल आया कि यह मैं ने क्या कर दिया, लौकी की सब्जी बना दी. अभी दोनों अपनीअपनी कटोरी मेरी ओर बढ़ा देंगे और कहेंगे कि रामदेव की प्रबल अनुयायी माताजी, यह लौकी की सब्जी आप को ही सादर समर्पित हो. कृपया आप ही इसे ग्रहण करें. पर मैं आश्चर्यचकित रह गई यह देख कर कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. उलटा दोनों इतने मन से सब्जी खाने में जुटे थे मानो उस से ज्यादा प्रिय उन्हें कोई दूसरी सब्जी है ही नहीं.

बात जरूर कुछ गंभीर है. मैं ने मन में सोचा क्योंकि मेरी बनाई नापसंद सब्जी या और भी किसी चीज को ये चुपचाप तभी खा लेते हैं जब या तो कुछ देर पहले उन्हें किसी बात पर जबरदस्त डांट पड़ी हो या फिर अपनी कोई इच्छा पूरी करवानी हो.

खाना खा कर विकी और विनी फिर अपने कमरे में चले गए. ऐसा लग रहा था कि किसी खास मसले पर मीटिंग अटेंड करने की बहुत जल्दी हो उन्हें.

विकी सी.ए. है. कानपुर में उस ने अपना शानदार आफिस बना लिया है. ज्यादातर शनिवार को ही आता है और सोमवार को चला जाता है. विनी एम.बी.ए. की तैयारी कर रहा है. बचपन से दोनों भाइयों के स्वभाव में जबरदस्त अंतर होते हुए भी दोनों पल भर को भी अलग नहीं होते हैं. विकी बेहद शांत स्वभाव का आज्ञाकारी लड़का रहा है तो विनी इस के ठीक उलट अत्यंत चंचल और अपनी बातों को मनवा कर ही दम लेने वाला रहा है. इस के बावजूद इन दोनों भाइयों का प्यार देख हम दोनों पतिपत्नी मन ही मन मुसकराते रहते हैं.

अपना काम निबटा कर मैं बच्चों के कमरे में चली गई. संडे की दोपहर हमारी बच्चों के कमरे में ही गुजरती है और बच्चे हम से सारी बातें भी कह डालते हैं, जबकि ऐसा करने में दूसरे बच्चे मांबाप से डरते हैं. आज मुझे राजीव का बाहर होना बहुत खलने लगा. वह रहते तो माहौल ही कुछ और होता और वह किसी न किसी तरह बच्चों के मन की थाह ले ही लेते.

मेरे कमरे में पहुंचते ही विनी अपनी कुरसी से उछलते हुए चिल्लाया, ‘‘मम्मा, एक बात आप को बताऊं, विकी दा ने…’’

उस की बात विकी की घूरती निगाहों की वजह से वहीं की वहीं रुक गई. मैं ने 1-2 बार कहा भी कि ऐसी कौन सी बात है जो आज तुम लोग मुझ से छिपा रहे हो, पर विकी ने यह कह कर टाल दिया कि कुछ खास नहीं मम्मा, थोड़ी आफिस से संबंधित समस्या है. मैं आप को बता कर परेशान नहीं करना चाहता पर विनी के पेट में कोई बात पचती ही नहीं है.

हालांकि मैं मन ही मन बहुत परेशान थी फिर भी न जाने कैसे झपकी लग गई और मैं वहीं लेट गई. अचानक ‘मम्मा’ शब्द कानों में पड़ने से एक झटके से मेरी नींद खुल गई पर मैं आंखें मूंदे पड़ी रही. मुझे सोता देख कर उन की बातें फिर से चालू हो गई थीं और इस बार उसी कमरे में होने की वजह से मुझे सबकुछ साफसाफ सुनाई दे रहा था.

विकी ने विनी को डांटा, ‘‘तुझे मना किया था फिर भी तू मम्मा को क्या बताने जा रहा था?’’

‘‘क्या करता, तुम्हारे पास हिम्मत जो नहीं है. दा, अब मुझ से नहीं रहा जाता, अब तो मुझे जल्दी से भाभी को घर लाना है. बस, चाहे कैसे भी.’’

विकी ने एक बार फिर विनी को चुप रहने का इशारा किया. उसे डर था कि कहीं मैं जाग न जाऊं या उन की बातें मेरे कानों में न पड़ जाएं.

अब तक तो नींद मुझ से कोसों दूर जा चुकी थी. ‘तो क्या विकी ने शादी कर ली है,’ यह सोच कर लगा मानो मेरे शरीर से सारा खून किसी ने निचोड़ लिया. कहां कमी रह गई थी हमारे प्यार में और कैसे हम अपने बच्चों में यह विश्वास उत्पन्न करने में असफल रह गए कि जीवन के हर निर्णय में हम उन के साथ हैं.

आज पलपल की बातें शेयर करने वाले मेरे बेटे ने मुझे इस योग्य भी न समझा कि अपने शादी जैसे महत्त्वपूर्ण फैसले में शामिल करे. शामिल करना तो दूर उस ने तो बताने तक की भी जरूरत नहीं समझी. मेरे व्यथित और तड़पते दिल से एक आवाज निकली, ‘विकी, सिर्फ एक बार कह कर तो देखा होता बेटे तुम ने, फिर देखते कैसे मैं तुम्हारी पसंद को अपने अरमानों का जोड़ा पहना कर इस घर में लाती. पर तुम ने तो मुझे जीतेजी मार डाला.’

पल भर के अंदर ही विकी के पिछले 25 बरस आंखों के सामने से गुजर गए और उन 25 सालों में कहीं भी विकी मेरा दिल दुखाता हुआ नहीं दिखा. टेबल पर रखे फल उठा कर खाने से पहले भी वह जहां होता वहीं से चिल्ला कर मुझे बताता था कि मम्मा, मैं यह सेब खाने जा रहा हूं. और आज…एक पल में ही पराया बना दिया बेटे ने.

कलेजे को चीरता हुआ आंसुओं का सैलाब बंद पलकों के छोर से बूंद बन कर टपकने ही वाला था कि अचानक विकी की फुसफुसाहट सुनाई पड़ी, ‘‘तुम ने देखा नहीं है मम्मीपापा के कितने अरमान हैं अपनी बहुओं को ले कर और बस, मैं इसी बात से डरता हूं कि कहीं बरखा मम्मीपापा की कल्पनाओं के अनुरूप नहीं उतरी तो क्या होगा? अगर मैं पहले ही इन्हें बता दूंगा कि मैं बरखा को पसंद करता हूं तो फिर कोई प्रश्न ही नहीं उठता कि मम्मीपापा उसे नापसंद करें, वे हर हाल में मेरी शादी उस से कर देंगे और मैं यही नहीं चाहता हूं. मम्मीपापा के शौक और अरमान पूरे होने चाहिए, उन की बहू उन्हें पसंद होनी चाहिए. बस, मैं इतना ही चाहता हूं.’’

‘‘और अगर वह उन्हें पसंद नहीं आई तो?’’

‘‘नहीं आई तो देखेंगे, पर मैं ने इतना तो तय कर लिया है कि मैं पहले से यह बिलकुल नहीं कह सकता कि मैं किसी को पसंद करता हूं.’’

तो विकी ने शादी नहीं की है, वह केवल किसी बरखा नाम की लड़की को पसंद करता है और उस की समस्या यह है कि बरखा के बारे में हमें बताए कैसे? इस बात का एहसास होते ही लगा जैसे मेरे बेजान शरीर में जान वापस आ गई. एक बार फिर से मेरे सामने वही विकी आ खड़ा हुआ जो अपनी कोई बात कहने से पहले मेरे चारों ओर चक्कर लगाता रहता, मेरा मूड देखता फिर शरमातेझिझकते हुए अपनी बात कहता. उस का कहना कुछ ऐसा होता कि मना करने का मैं साहस ही नहीं कर पाती. ‘बुद्धू, कहीं का,’ मन ही मन मैं बुदबुदाई. जानता है कि मम्मा किसी बात के लिए मना नहीं करतीं फिर भी इतनी जरूरी बात कहने से डर रहा है.

सो कर उठी तो सिर बहुत हलका लग रहा था. मन में चिंता का स्थान एक चुलबुले उत्साह ने ले लिया था. मेरे बेटे को प्यार हो गया है यह सोचसोच कर मुझे गुदगुदी सी होने लगी. अब मुझे समझ में आने लगा कि विनी को भाभी घर में लाने की इतनी जल्दी क्यों मच रही थी. ऐसा लगने लगा कि विनी का उतावलापन मेरे अंदर भी आ कर समा गया है. मन होने लगा कि अभी चलूं विकी के पास और बोलूं कि ले चल मुझे मेरी बहू के पास, मैं अभी उसे अपने घर में लाना चाहती हूं पर मां होने की मर्यादा और खुद विकी के मुंह से सुनने की एक चाह ने मुझे रोक दिया.

रात को खाने की मेज पर मेरा मूड तो खुश था ही, दिन भर के बाद बच्चों से मिलने के कारण राजीव भी बहुत खुश दिख रहे थे. मैं ने देखा कि विनी कई बार विकी को इशारा कर रहा था कि वह हम से बात करे पर विकी हर बार कुछ कहतेकहते रुक सा जाता था. अपने बेटे का यह हाल मुझ से और न देखा गया और मैं पूछ ही बैठी, ‘‘तुम कुछ कहना चाह रहे हो, विकी?’’

‘‘नहीं…हां, मैं यह कहना चाहता था मम्मा कि जब से कानपुर गया हूं दोस्तों से मुलाकात नहीं हो पाती है. अगर आप कहें तो अगले संडे को घर पर दोस्तों की एक पार्टी रख लूं. वैसे भी जब से काम शुरू किया है सारे दोस्त पार्टी मांग रहे हैं.’’

‘‘तो इस में पूछने की क्या बात है. कहा होता तो आज ही इंतजाम कर दिया होता,’’ मैं ने कहा, ‘‘वैसे कुल कितने दोस्तों को बुलाने की सोच रहे हो, सारे पुराने दोस्त ही हैं या कोई नया भी है?’’

‘‘हां, 2-4 नए भी हैं. अच्छा रहेगा, आप सब से भी मुलाकात हो जाएगी. क्यों विनी, अच्छा रहेगा न?’’ कह कर विकी ने विनी को संकेत कर के राहत की सांस ली.

मैं समझ गई थी कि पार्टी की योजना दोनों ने मिल कर बरखा को हम से मिलाने के लिए ही बनाई है और विकी के ‘नए दोस्तों’ में बरखा भी शामिल होगी.

अब बच्चों के साथसाथ मेरे लिए भी पार्टी की अहमियत बहुत बढ़ गई थी. अगले संडे की सुबह से ही विकी बहुत नर्वस दिख रहा था. कई बार मन में आया कि उसे पास बुला कर बता दूं कि वह सारी चिंता छोड़ दे क्योंकि हमें सबकुछ मालूम हो चुका है, और बरखा जैसी भी होगी मुझे पसंद होगी. पर एक बार फिर विकी के भविष्य को ले कर आशंकित मेरे मन ने मुझे चुप करा दिया कि कहीं बरखा विकी के योग्य न निकली तो? जब तक बात सामने नहीं आई है तब तक तो ठीक है, उस के बारे में कुछ भी राय दे सकती हूं, पर अगर एक बार सामने बात हो गई तो विकी का दिल टूट जाएगा.

4 बजतेबजते विकी के दोस्त एकएक कर के आने लगे. सच कहूं तो उस समय मैं खुद काफी नर्वस होने लगी थी कि आने वालों में बरखा नाम की लड़की न मालूम कैसी होगी. सचमुच वह मेरे विकी के लायक होगी या नहीं. मेरी भावनाओं को राजीव अच्छी तरह समझ रहे थे और आंखों के इशारे से मुझे धैर्य रखने को कह रहे थे. हमें देख कर आश्चर्य हो रहा था कि सदैव हंगामा करते रहने वाला विनी भी बिलकुल शांति  से मेरी मदद में लगा था और बीचबीच में जा कर विकी की बगल में कुछ इस अंदाज से खड़ा होता मानो उस से कह रहा हो, ‘दा, दुखी न हो, मैं तुम्हारे साथ हूं.’

ठीक साढ़े 4 बजे बरखा ने अपनी एक सहेली के साथ ड्राइंगरूम में प्रवेश किया. उस के घुसते ही विकी की नजरें विनी से और मेरी नजरें इन से जा टकराईं. विकी अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ और उन्हें हमारे पास ला कर उन से हमारा परिचय करवाया, ‘‘बरखा, यह मेरे मम्मीपापा हैं और मम्मीपापा, यह मेरी नई दोस्त बरखा और यह बरखा की दोस्त मालविका है. ये दोनों एम.सी.ए. कर रही हैं. पिछले 7 महीने से हमारी दोस्ती है पर आप लोगों से मुलाकात न करवा सका था.’’

हम ने महसूस किया कि बरखा से हमारे परिचय के दौरान पूरे कमरे का शोर थम गया था. इस का मतलब था कि विकी के सारे दोस्तों को पहले से बरखा के बारे में मालूम था. सच है, प्यार एक ऐसा मामला है जिस के बारे में बच्चों के मांबाप को ही सब से बाद में पता चलता है. बच्चे अपना यह राज दूसरों से तो खुल कर शेयर कर लेते हैं पर अपनों से बताने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं.

बरखा को देख लेने और उस से बातचीत कर लेने के बाद मेरे मन में उसे बहू बना लेने का फैसला पूर्णतया पक्का हो गया. विकी बरखा के ही साथ बातें कर रहा था पर उस से ज्यादा विनी उस का खयाल रख रहा था. पार्टी लगभग समाप्ति की ओर अग्रसर थी. यों तो हमारा फैसला पक्का हो चुका था पर फिर भी मैं ने एक बार बरखा को चेक करने की कोशिश की कि शादी के बाद घरगृहस्थी संभालने के उस में कुछ गुण हैं या नहीं.

मेरा मानना है कि लड़की कितने ही उच्च पद पर आसीन हो पर घरपरिवार को उस के मार्गदर्शन की आवश्यकता सदैव एक बच्चे की तरह होती है. वह चूल्हेचौके में अपना दिन भले ही न गुजारे पर चौके में क्या कैसे होता है, इस की जानकारी उसे अवश्य होनी चाहिए ताकि वह अच्छा बना कर खिलाने का वक्त न रखते हुए भी कम से कम अच्छा बनवाने का हुनर तो अवश्य रखती हो.

मैं शादी से पहले घरगृहस्थी में निपुण होना आवश्यक नहीं मानती पर उस का ‘क ख ग’ मालूम रहने पर ही उस जिम्मेदारी को निभा पाने की विश्वसनीयता होती है. बहुत से रिश्तों को इन्हीं बुनियादी जिम्मेदारियों के अभाव में बिखरते देखा था मैं ने, इसलिए विकी के जीवन के लिए मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी.

मैं ने बरखा को अपने पास बुला कर कहा, ‘‘बेटा, सुबह से पार्टी की तैयारी में लगे होने की वजह से इस वक्त सिर बहुत दुखने लगा है. मैं ने गैस पर तुम सब के लिए चाय का पानी चढ़ा दिया है, अगर तुम्हें चाय बनानी आती हो तो प्लीज, तुम बना लो.’’

‘‘जी, आंटी, अभी बना लाती हूं,’’ कह कर वह विकी की तरफ पलटी, ‘‘किचन कहां है?’’

‘‘उस तरफ,’’ हाथ से किचन की तरफ इशारा करते हुए विकी ने कहा, ‘‘चलो, मैं तुम्हें चीनी और चायपत्ती बता देता हूं,’’ कहते हुए वह बरखा के साथ ही चल पड़ा.

‘‘बरखाजी को अदरक कूट कर दे आता हूं,’’ कहता हुआ विनी भी उन के पीछे हो लिया.

चाय चाहे सब के सहयोग से बनी हो या अकेले पर बनी ठीक थी. किचन में जा कर मैं देख आई कि चीनी और चायपत्ती के डब्बे यथास्थान रखे थे, दूध ढक कर फ्रिज में रखा था और गैस के आसपास कहीं भी चाय गिरी, फैली नहीं थी. मैं निश्चिंत हो आ कर बैठ गई. मुझे मेरी बहू मिल गई थी.

एकएक कर के दोस्तों का जाना शुरू हो गया. सब से अंत में बरखा और मालविका हमारे पास आईं और नमस्ते कर के हम से जाने की अनुमति मांगने लगीं. अब हमारी बारी थी, विकी ने अपनी मर्यादा निभाई थी. पिछले न जाने कितने दिनों से असमंजस की स्थिति गुजरने के बाद उस ने हमारे सामने अपनी पसंद जाहिर नहीं की बल्कि उसे हमारे सामने ला कर हमारी राय जाननेसमझने का प्रयत्न करता रहा. और हम दोनों को अच्छी तरह पता है कि अभी भी अपनी बात कहने से पहले वह बरखा के बारे में हमारी राय जानने की कोशिश अवश्य करेगा, चाहे इस के लिए उसे कितना ही इंतजार क्यों न करना पड़े.

मैं अपने बेटे को और असमंजस में नहीं देख सकती थी, अगर वह अपने मुंह से नहीं कह पा रहा है तो उस की बात को मैं ही कह कर उसे कशमकश से उबार लूंगी.

बरखा के दोबारा अनुमति मांगने पर मैं ने कहा, ‘‘घर की बहू क्या घर से खाली हाथ और अकेली जाएगी?’’

मेरी बात का अर्थ जैसे पहली बार किसी की समझ में नहीं आया. मैं ने विकी का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘तेरी पसंद हमें पसंद है. चल, गाड़ी निकाल, हम सब बरखा को उस के घर पहुंचाने जाएंगे. वहीं इस के मम्मीडैडी से रिश्ते की बात भी करनी है. अब अपनी बहू को घर में लाने की हमें भी बहुत जल्दी है.’’

मेरी बात का अर्थ समझ में आते ही पूरा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. मम्मीपापा को यह सब कैसे पता चला, इस सवाल में उलझाअटका विकी पहले तो जहां का तहां खड़ा रह गया फिर अपने पापा की पहल पर बढ़ कर उन के सीने से लग गया.

इन सब बातों में समय गंवाए बिना विनी गैरेज से गाड़ी निकाल कर जोरजोर से हार्न बजाने लगा. उस की बेताबी देख कर मैं दौड़ते हुए अपनी खानदानी अंगूठी लेने के लिए अंदर चली गई, जिसे मैं बरखा के मातापिता की सहमति ले कर उसे वहीं पहनाने वाली थी.

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