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Valentine’s Special : बौलीवुड की मस्तानी अपने प्यार के साथ  वेलेंटाइन डे मनाने पहुंची विदेश

वेलेंटाइन डे से पहले वेलेंटाइन वीक की शुरुआत कल यानी 7 फरवरी Rose Day  से शुरू हो गई है और रोज डे के मौके पर बौलीवुड की मस्तानी Deepika Padukone अपने प्यार Ranveer Singh के साथ टाइम स्पेंड करने विदेश चली गई हैं दीपिका ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट से एक अनाउंसमेंट किया है. इस अनाउंसमेंट के साथ उन्होंने अपना और अपने पति  Ranveer Singh का पासपोर्ट शेयर किया है. पासपोर्ट शेयर करते हुए एक्ट्रेस ने लिखा है कि ‘हिज या हर #वैकेशन’.

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अपने पोस्ट में दीपिका ने ये नहीं बताया कि वो कहां जा रही हैं लेकिन उनके बोर्डिंग पास पर UL 142 नजर आ रहा है जिससे पता चल रहा है कि वो श्रीलंका की राजधानी कोलंबो गई हैं. पासपोर्ट से लग रहा है कि ये दोनों अपना वेलेंटाइन डे मनाने श्रीलंका की राजधानी कोलंबो गए हैं.

दीपिका के इस पोस्‍ट पर फैंस उन्हें यात्रा की शुभकामनाएं दे रहे हैं. दीपिका और रणवीर पिछले साल फिल्मों की वजह से काफी व्‍यस्‍त रहे. एक दूसरे को समय नही दे पाएं  इसलिए एक दूसरे के साथ क्‍वालिटी टाइम स्‍पेंड करने के लिए दोनों वेकेशन पर निकल गये हैं.

वर्कफ्रंट की बात करें तो  दीपिका पादुकोण की जनवरी में फिल्‍म ‘छपाक’ रिलीज हुई थी. मेघना गुलजार के निर्देशन में बनी इस फिल्म में दीपिका के साथ विक्रांत मेस्सी की मुख्य भूमिका थी. फिल्म बौक्स औफिस पर कुछ खास कमाल नहीं कर पाई लेकिन काफी चर्चा में रही.

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अब दीपिका कबीर खान के निर्देशन में बनी फिल्‍म ’83’ में रणवीर सिंह की वाइफ के किरदार में नजर आएंगी. यह फिल्‍म 1983 के क्रिकेट वर्ल्‍ड कप पर आधारित है, जब कपिल देव की कैप्‍टेंसी में भारत ने पहला वर्ल्‍ड कप जीता था. फिल्‍म में रणवीर सिंह, कपिल देव की भूमिका निभा रहे हैं. यह फिल्म 10 अप्रैल 2020 को  रिलीज होगी.

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रणवीर  की फिल्मों की बात करें तो उनको आखिरी बार फिल्म ‘गली ब्‍वाय’ में देखा गया था. दीपिका, रणवीर के साथ संजय लीला भंसाली की तीन फिल्‍मों ‘गोलियों की रासलीला रामलीला’, बाजीराव मस्‍तानी और पद्मावत में नजर आ चुकी है.

Valentine’s Special : इस मौके पर कुकिंग से जीतें उन का दिल

वैलेंटाइन डे पर इस बार क्यों न कुछ अलग प्लान करें. अपने पार्टनर के साथ इस खास दिन को सैलिब्रेट करते वक्त अपने दिन को खुशी और प्यार से भर दें, रोमांस को हवाओं में बहने दें.

इस के लिए इस वैलेंटाइन डे पर अपनी पत्नी या प्रेमिका के लिए नाश्ता बनाने की कोशिश कीजिए और फिर देखिए उस की आंखों की चमक जो इस से पहले आप ने कभी नहीं देखी होगी. उस के सपनों का शहजादा उस की पसंदीदा डिशेज की ट्रे ले कर सामने खड़ा हो, उस में एक गुलाब का फूल भी हो तो बस खुशियों की इस से बढि़या रैसिपी आप के पास कोई हो ही नहीं सकती.

कुछ आसान डिशेज के जरीए अपने पार्टनर का पूरा दिन स्वादिष्ठ सरप्राइजेस से भरने का प्लान बनाएं और प्यार का जादू बिखरने दें.

चीजी लव बाइट

प्यार भरा नाश्ता बना कर अपनी पत्नी या प्रेमिका की सुबह की शुरुआत को शानदार बनाएं. बस फ्रोजन चीज शौट्स को पैन में फ्राई कर मेयो मस्टर्ड डिप के साथ गरमगरम परोसें और उस की सुबह की स्वादिष्ठ शुरुआत करें.

अपने पसंदीदा शैफ के हाथों का बना लजीज नाश्ता करने के बाद अगर 1 कप कौफी भी प्रेमिका या पत्नी को मिल जाए तो इस से ज्यादा खुशी नहीं हो सकती.

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नाइट अंडर द स्टार्स

वैलेंटाइन डे पर सितारों की छांव में स्पैशल डिनर का इंतजाम करें, अपने घर की छत या लिविंगरूम में कैंडल जला कर.

पोटैटो वेजेस फ्राई कर के स्वादिष्ठ साइड डिश को तीखी थाई चिली सौस के साथ परोंसे. अपने स्वाद को थोड़ा स्पाइसी बना कर एक खास शाम अपने पार्टनर के साथ बिताएं.

औफिस लंच नोट्स

रिश्ते के शुरुआती दिनों में एकदूसरे को दिए गए सीक्रेट लव नोट्स का वह दौर याद कीजिएगा. फ्रोजन आलू टिक्की को प्यार के साथ फ्राई कर के रैप कर पैक करें, साथ ही पुदीना, नीबू व लहसुन चटनी पैक कर लंच को चटपटा बनाएं. हां, टूथपिक के साथ एक लव नोट लगाना न भूलें. आप की यह रोमांटिक कोशिश उन्हें शाम को जल्दी औफिस से घर खींच लाएगी.

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द बैस्ट फार द लास्ट

कोई भी मेन्यू स्वादिष्ठ डैजर्ट के बिना पूरा नहीं होता. डैजर्ट ज्यादा समय लेने वाला पेचीदा काम हो सकता है, लेकिन इस वैलेंटाइन डे पर अपने मेन्यू को मीठे और नमकीन स्वाद से सराबोर होने दें. ये दोनों स्वाद एकदूसरे से बेहद अलग हैं पर इन्हें प्यार के स्वाद से एक कर दीजिए. कुछ फ्रोजन पोटैटो फ्रैंच फ्राइज को फ्राई कर अपने पसंदीदा सिरप में टौस करें. फिर चाहे वह चौकलेट हो, स्ट्रोबैरी हो, माप्ले हो या फिर तीनों का मिक्सचर. इसे और जायकेदार बनाने के लिए ऊपर से थोड़ी व्हिप क्रीम डाल कर एक अनोखे स्वाद वाले सरप्राइज का मजा लें.

– शैफ तुषार

Bigg Boss13 : फिनाले के बाद सिद्धार्थ शुक्ला और रश्मि देसाई इस शो में एक साथ आएंगे नजर

छोटे पर्दे के पौपुलर सेलिब्रिटी Rashmi Desai और Siddharth Shukla कलर्स चैनल का शो Big Boss 13 में कंटेंस्टेंट के तौर पर नजर आ रहे हैं. इस शो में दर्शकों को Siddharth Shukla और Rashmi Desai के बीच केमिस्ट्री के साथ-साथ काफी नोक झोक देखने को मिली. जो उनके फैंस को काफी पसंद भी आई. तो इसी बीच ये खबर आ रही है कि मेकर्स एक बार फिर से इन दोनों को एक साथ लाने की योजना बना रहे हैं. जी हां, Big boss 13 फिनाले के बाद ये दोनों फिर से छोटे पर्दे पर साथ आ सकते हैं.

बता दें कि रश्मि और सिद्धार्थ खतरों के खिलाड़ी सीजन 6 का हिस्सा रह चुके हैं और इस सीजन के विनर भी रहे थे. एक रिपोर्ट के मुताबिक रश्मि देसाई और सिद्धार्थ शुक्ला के बार फिर खतरों के खिलाड़ी में एक जोड़ी के तौर पर नजर आ आएंगे.

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साथ ही, अन्य सेलिब्रिटीज को भी सीजन में भाग लेने के लिए कौल किया जा रहा है. यह देखना दिलचस्प होगा कि इस स्टंट- शो में एक-दूसरे के साथ कौन कौन से सदस्य काम्पिट करेंगे.

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बिग बौस का यह सीजन 15 फरवरी को आफ-एयर होने जा रहा है और ‘खतरों के खिलाड़ी 10’ इसकी जगह आन एयर होगा. इस शो में धर्मेश येलांडे, रानी चैटर्जी, करण पटेल, बलराज सयाल, अमृता खानविलकर, करिश्मा तन्ना, आरजे मलिश्का अदा खान, शिविन नारंग, तेजस्वी प्रकाश, जैसी कंटेंस्टेंट के तौर पर नजर आएंगे.

खुद से खुद की बात कर

तेरी मेरी, इधर उधर की ना दुनिया जहान की बात कर

जरा भीतर उतर खुद के, खुद से कोई खुद की बात कर…

क्या खोया – क्या पाया, क्या क्या फिसल गया हाथ से

भूल सारी बेजा यादें, जो बाकी है सामने उसकी बात कर…

ना देख रुख हवाओं का, ना सोच आसमां के मिजाज की

हौसला है तो तौल ताकत पंखों की और चांद की बात कर…

ना घबरा दुनिया के अंधेरों से, ना फिक्र कर आंधियों की

रोशनी की आरजू है तो फिर चिराग जलाने की बात कर…

माना कतरे-कतरे पर यहां दुनिया की नीयत बिगड़ती है

मेरी प्यास बुझानी है तो फिर तमाम समंदर की बात कर…

बहारें तो आनी जानी हैं.. सावन का भी कहां भरोसा है

ए मरुस्थल, तू अपनी सुहानी, चांदनी रात की बात कर.

जानिए, चुकंदर खाने के क्या है फायदे

इन दिनों चुकंदर खूब मिलता है, हम रोज एक चुकंदर खा सकते हैं. इसमें मौजूद विटामिन , खनिज, सोडियम, पोटैशियम, फौस्फोरस, कैल्शियम, सल्फर, क्लोरीन, आयोडीन, आयरन, विटामिन बी1, बी2 अन्य आदि तत्व पाए जाते है, जो शरीर को रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करते हैं. इसलिए चुकंदर को अपनी डाइट का हिस्सा जरूर बनाएं. रोज एक चुकंदर खाने से एनिमिया जैसी समस्या से छुटकारा पा सकते हैं.चुकंदर खाकर कोलेस्ट्रोल को भी नियंत्रित रखा जा सकता है. इतने सारे फायदे के बावजूद हमें इसे खाना अच्छा नहीं लगता..

ये है कुछ नए तरीके जिससे न केवल इसे खाना अच्छा लगेगा बल्कि आपके खाने का भी स्वाद बढ़ जाएगा.

1- चुकंदर को कद्दूकस करके उसमें पतली पतली हरी मिर्च और धनिया, कुछ बूंदे नीबू की और स्वादानुसार नमक मिलाकर खाए.. खाने का स्वाद बढ़ जाएगा.

2- चुकंदर, टमाटर, प्याज, मूली को बारीक बारीक काट कर उसमें  चाट मसाला मिलाकर खा सकते हैं.. चाहे तो नीबू भी मिला ले.

3- चुकंदर की एकदम पतली पतली slice काटकर प्लेट में सजा ले और ऊपर से नमक, काली मिर्च छिड़ककर खा सकते हैं.

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4- चुकंदर का हलवा भी बना सकते हैं गाजर की तरह. चुकंदर को छिल के धुल लें और फिर कद्दू कस करके उसे कढ़ाई में पकाये. पकाते समय ही उसमें दूध भी डाल दें तो बाद में खोए की जरूरत नहीं पड़ेगी. जब पक जाए तो ऊपर से ड्राई फ्रूट डाल ले. ये आपके लिए गाजर के हलवे से ज्यादा सेहतमंद और स्वादिष्ट लगेगा. खासकर बच्चों को के लिए.. एक दिन बनाकर कई टाइम खिला सकती है..

इन सभी तरह से खाकर खुद और पूरे परिवार को सेहतमंद कर सकती हैं.

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प्रतिदिन

प्रतिदिन : भाग 3

‘‘‘रात खानेपीने के बाद देवरानी व जेठानी एकसाथ बैठीं तो यहांवहां की बातें छिड़ गईं. सुमित्रा कहने लगी कि दीदी, यहां भी तो लोग अच्छा कमातेखाते हैं, नौकरचाकर रखते हैं और बडे़ मजे से जिंदगी जीते हैं. वहां तो सब काम हमें अपने हाथ से करना पड़ता है. दुख- तकलीफ में भी कोई मदद करने वाला नहीं मिलता. किसी के पास इतना समय ही नहीं होता कि किसी बीमार की जा कर खबर ले आए.’

‘‘भाभी का जला दिल और जल उठा. वह बोलीं कि सुमित्रा, हमें भरमाने की बातें तो मत करो. एक तुम्हीं तो विलायत हो कर नहीं आई हो…और भी बहुत लोग आते हैं. और वहां का जो यशोगान करते हैं उसे सुन कर दिल में टीस सी उठती है कि आप ने विलायत रह कर भी अपने भाई के लिए कुछ नहीं किया.

‘‘सुमित्रा ने बात बदलते हुए पूछा कि दीदी, उस सुनंदा का क्या हाल है जो यहां स्कूल में प्रिंसिपल थी. इस पर बड़ी भाभी बोलीं, ‘अरे, मजे में है. बच्चों की शादी बडे़ अमीर घरों में कर दी है. खुद रिटायर हो चुकी है. धन कमाने का उस का नशा अभी भी नहीं गया है. घर में बच्चों को पढ़ा कर दौलत कमा रही है. पूछती तो रहती है तेरे बारे में. कल मिल आना.’

‘‘अगले दिन सुमित्रा से सुनंदा बड़ी खुश हो कर मिली. उलाहना भी दिया कि इतने दिनों बाद गांव आई हो पर आज मिलने का मौका मिला है. आज भी मत आतीं.

‘‘सुनंदा के उलाहने के जवाब में सुमित्रा ने कहा, ‘लो चली जाती हूं. यह तो समझती नहीं कि बाहर वालों के पास समय की कितनी कमी होती है. रिश्तेदारों से मिलने जाना, उन के संदेश पहुंचाना. घर में कोई मिलने आ जाए तो उस के पास बैठना. वह उठ कर जाए तो व्यक्ति कोई दूसरा काम सोचे.’

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‘‘‘बसबस, रहने दे अपनी सफाई,’ सुनंदा बोली, ‘इतने दिनों बाद आई है, कुछ मेरी सुन कुछ अपनी कह.’

‘‘आवभगत के बाद सुनंदा ने सुमित्रा को बताया तुम्हारी जेठानी ने तुम्हारा घर अपना कह कर किराए पर चढ़ाया है. 1,200 रुपए महीना किराया लेती है और गांवमहल्ले में सब से कहती फिरती है कि सुमित्रा और देवरजी तो इधर आने से रहे. अब मुझे ही उन के घर की देखभाल करनी पड़ रही है. सुमित्रा पिछली बार खुद ही मुझे चाबी दे गई थी,’ फिर आगे बोली, ‘मुझे लगता है कि उस की निगाह तुम्हारे घर पर है.’

‘‘‘तभी भाभी मुझ से कह रही थीं कि जिस विलायत में जाने को हम यहां गलतसही तरीके अपनाते हैं, उसी को तुम ठुकरा कर आना चाहती हो. तेरे भले की कहती हूं ऐसी गलती मत करना, सुमित्रा.’

‘‘सुनंदा बोली, ‘मैं ने अपनी बहन समझ कर जो हकीकत है, बता दी. जो भी निर्णय लेना, ठंडे दिमाग से सोच कर लेना. मुझे तो खुशी होगी अगर तुम लोग यहां आ कर रहो. बीते दिनों को याद कर के खूब आनंद लेंगे.’

‘‘सुनंदा से मिल कर सुमित्रा आई तो घर में उस का दम घुटने लगा. वह 2 महीने की जगह 1 महीने में ही वापस लंदन चली आई.

‘‘‘विनोद भाई, तुम्हीं कोई रास्ता सुझाओ कि क्या करूं. इधर से सब बेच कर इंडिया रहने की सोचूं तो पहले तो घर से किराएदार नहीं उठेंगे. दूसरे, कोई जगह ले कर घर बनाना चाहूं तो वहां कितने दिन रह पाएंगे. बच्चों ने तो उधर जाना नहीं. यहां अपने घर में तो बैठे हैं. किसी से कुछ लेनादेना नहीं. वहां तो किसी काम से भी बाहर निकलो तो जासूस पीछे लग लेंगे. तुम जान ही नहीं पाओगे कि कब मौका मिलते ही तुम पर कोई अटैक कर दे. यहां का कानून तो सुनता है. कमी तो बस, इतनी ही है कि अपनों का प्यार, उन के दो मीठे बोल सुनने को नहीं मिलते.’’

‘‘‘बात तो तुम्हारी सही है. थोडे़ सुख के लिए ज्यादा दुख उठाना तो समझदारी नहीं. यहीं अपने को व्यस्त रखने की कोशिश करो,’’ विनोद ने उन्हें सुझाया था.

‘‘अब जब सारी उम्र खूनपसीना बहा कर यहीं गुजार दी, टैक्स दे कर रानी का घर भर दिया. अब पेंशन का सुख भी इधर ही रह कर भोगेंगे. जिस देश की मिट्टीपानी ने आधी सदी तक हमारे शरीर का पोषण किया उसी मिट्टी को हक है हमारे मरने के बाद इस शरीर की मिट्टी को अपने में समेटने का. और फिर अब तो यहां की सरकार ने भारतीयों के लिए अस्थिविसर्जन की सुविधा भी शुरू कर दी है.

‘‘विनोद, मैं तो सुमित्रा को समझासमझा कर हार गया पर उस के दिमाग में कुछ घुसता ही नहीं. एक बार बडे़ बेटे ने फोन क्या कर दिया कि मम्मी, आप दादी बन गई हैं और एक बार अपने पोते को देखने आओ न. बस, कनाडा जाने की रट लगा बैठी है. वह नहीं समझती कि बेटा ऐसा कर के अपने किए का प्रायश्चित करना चाहता है. मैं कहता हूं कि उसे पोते को तुम से मिलाने को इतना ही शौक है तो खुद क्यों नहीं यहां आ जाता.

‘‘तुम्हीं बताओ दोस्त, जिस ने हमारी इज्जत की तनिक परवा नहीं की, अच्छेभले रिश्ते को ठुकरा कर गोरी चमड़ी वाली से शादी कर ली, वह क्या जीवन के अनोखे सुख दे देगी इसे जो अपनी बिरादरी वाली लड़की न दे पाती. देखना, एक दिन ऐसा धत्ता बता कर जाएगी कि दिन में तारे नजर आएंगे.’’

‘‘यार मैं ने सुना है कि तुम भाभी को बुराभला भी कहते रहते हो. क्या इस उम्र में यह सब तुम्हें शोभा देता है?’’ एक दिन विनोद ने शर्माजी से पूछा था.

‘‘क्या करूं, जब वह सुनती ही नहीं, घर में सब सामान होते हुए भी फिर वही उठा लाती है. शाम होते ही खाना खा ऊपर जा कर जो एक बार बैठ गई तो फिर कुछ नहीं सुनेगी. कितना पुकारूं, सिर खपाऊं पर जवाब नहीं देती, जैसे बहरी हो गई हो. फिर एक पैग पीने के बाद मुझे भी होश नहीं रहता कि मैं क्या बोल रहा हूं.’’

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पूरी कहानी सुनातेसुनाते दीप्ति को लंच की छुट्टी का भी ध्यान न रहा. घड़ी देखी तो 5 मिनट ऊपर हो गए थे. दोनों ने भागते हुए जा कर बस पकड़ी.

घर पहुंचतेपहुंचते मेरे मन में पड़ोसिन आंटी के प्रति जो क्रोध और घृणा के भाव थे सब गायब हो चुके थे. धीरेधीरे हम भी उन के नित्य का ‘शबद कीर्तन’ सुनने के आदी होने लगे.

प्रतिदिन : भाग 2

‘‘इसी की तो सजा भुगत रहा है हमारा समाज,’’ दीप्ति बोली, ‘‘इन के 2 बेटे 1 बेटी है. तीनों ऊंचे ओहदों पर लगे हुए हैं. और अपनेअपने परिवार के साथ  आनंद से रह रहे हैं पर उन का इन से कोई संबंध नहीं है. हुआ यों कि इन्होंने अपने बड़े बेटे के लिए अपनी बिरादरी की एक सुशील लड़की देखी थी. बड़ी धूमधाम से रिंग सेरेमनी हुई. मूवी बनी. लड़की वालों ने 200 व्यक्तियों के खानेपीने पर दिल खोल कर खर्च किया. लड़के ने इस शादी के लिए बहुत मना किया था पर मां ने एक न सुनी और धमकी देने लगीं कि अगर मेरी बात न मानी तो मैं अपनी जान दे दूंगी. बेटे को मानना पड़ा.

‘‘बेटे ने कनाडा में नौकरी के लिए आवेदन किया था. नौकरी मिल गई तो वह चुपचाप घर से खिसक गया. वहां जा कर फोन कर दिया, ‘मम्मी, मैं ने कनाडा में ही रहने का निर्णय लिया है और यहीं अपनी पसंद की लड़की से शादी कर के घर बसाऊंगा. आप लड़की वालों को मना कर दें.’

‘‘मांबाप के दिल को तोड़ने वाली यह पहली चोट थी. लड़की वालों को पता चला तो आ कर उन्हें काफी कुछ सुना गए. बिरादरी में तो जैसे इन की नाक ही कट गई. अंकल ने तो बाहर निकलना ही छोड़ दिया लेकिन आंटी उसी ठाटबाट से निकलतीं. आखिर लड़के की मां होने का कुछ तो गरूर उन में होना ही था.

‘‘इधर छोटे बेटे ने भी किसी ईसाई लड़की से शादी कर ली. अब रह गई बेटी. अंकल ने उस से पूछा, ‘बेटी, तुम भी अपनी पसंद बता दो. हम तुम्हारे लिए लड़का देखें या तुम्हें भी अपनी इच्छा से शादी करनी है.’ इस पर वह बोली कि पापा, अभी तो मैं पढ़ रही हूं. पढ़ाई करने के बाद इस बारे में सोचूंगी.

‘‘‘फिर क्या सोचेगी.’ इस के पापा ने कहा, ‘फिर तो नौकरी खोजेगी और अपने पैरों पर खड़ी होने के बारे में सोचेगी. तब तक तुझे भी कोई मनपसंद साथी मिल जाएगा और कहेगी कि उसी से शादी करनी है. आजकल की पीढ़ी देशदेशांतर और जातिपाति को तो कुछ समझती नहीं बल्कि बिरादरी के बाहर शादी करने को एक उपलब्धि समझती है.’ ’’

इसी बीच दीप्ति की मम्मी कब हमारे लिए चाय रख गईं पता ही नहीं चला. मैं ने घड़ी देखी, 5 बज चुके थे.

‘‘अरे, मैं तो मम्मी को 4 बजे आने को कह कर आई हूं…अब खूब डांट पड़ेगी,’’ कहानी अधूरी छोड़ उस से विदा ले कर मैं घर चली आई. कहानी के बाकी हिस्से के लिए मन में उत्सुकता तो थी पर घड़ी की सूई की सी रफ्तार से चलने वाली यहां की जिंदगी का मैं भी एक हिस्सा थी. अगले दिन काम पर ही कहानी के बाकी हिस्से के लिए मैं ने दीप्ति को लंच टाइम में पकड़ा. उस ने वृद्ध दंपती की कहानी का अगला हिस्सा जो सुनाया वह इस प्रकार है:

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‘‘मिसेज शर्मा यानी मेरी पड़ोसिन वृद्धा कहीं भी विवाहशादी का धूमधड़ाका या रौनक सुनदेख लें तो बरदाश्त नहीं कर पातीं और पागलों की तरह व्यवहार करने लगती हैं. आसपड़ोस को बीच सड़क पर खड़ी हो कर गालियां देने लगती हैं. यह भी कारण है अंकल का हरदम घर में ही बैठे रहने का,’’ दीप्ति ने बताया, ‘‘एक बार पापा ने अंकल को सुझाया था कि आप रिटायर तो हो ही चुके हैं, क्यों नहीं कुछ दिनों के लिए इंडिया घूम आते या भाभी को ही कुछ दिनों के लिए भेज देते. कुछ हवापानी बदलेगा, अपनों से मिलेंगी तो इन का मन खुश होगा.

‘‘‘यह भी कर के देख लिया है,’ बडे़ मायूस हो कर शर्मा अंकल बोले थे, ‘चाहता तो था कि इंडिया जा कर बसेरा बनाऊं मगर वहां अब है क्या हमारा. भाईभतीजों ने पिता से यह कह कर सब हड़प लिया कि छोटे भैया को तो आप बाहर भेज कर पहले ही बहुत कुछ दे चुके हैं…वहां हमारा अब जो छोटा सा घर बचा है वह भी रहने लायक नहीं है.

‘‘‘4 साल पहले जब मेरी पत्नी सुमित्रा वहां गई थी तो घर की खस्ता हालत देख कर रो पड़ी थी. उसी घर में विवाह कर आई थी. भरापूरा घर, सासससुर, देवरजेठ, ननदों की गहमागहमी. अब क्या था, सिर्फ खंडहर, कबूतरों का बसेरा.

‘‘‘बड़ी भाभी ने सुमित्रा का खूब स्वागत किया. सुमित्रा को शक तो हुआ था कि यह अकारण ही मुझ पर इतनी मेहरबान क्यों हो रही हैं. पर सुमित्रा यह जांचने के लिए कि देखती हूं वह कौन सा नया नाटक करने जा रही है, खामोश बनी रही. फिर एक दिन कहा कि दीदी, किसी सफाई वाली को बुला दो. अब आई हूं तो घर की थोड़ी साफसफाई ही करवा जाऊं.’

‘‘‘सफाई भी हो जाएगी पर मैं तो सोचती हूं कि तुम किसी को घर की चाबी दे जाओ तो तुम्हारे पीछे घर को हवाधूप लगती रहेगी,’ भाभी ने अपना विचार रखा था.

‘‘‘सुमित्रा मेरी सलाह लिए बिना भाभी को चाबी दे आई. आ कर भाभी की बड़ी तारीफ करने लगी. चूंकि इस का अभी तक चालाक लोगों से वास्ता नहीं पड़ा था इसलिए भाभी इसे बहुत अच्छी लगी थीं. पर भाभी क्या बला है यह तो मैं ही जानता हूं. वैसे मैं ने इसे पिछली बार जब इंडिया भेजा था तो वहां जा कर इस का पागलपन का दौरा ठीक हो गया था. लेकिन इस बार रिश्तेदारों से मिल कर 1 महीने में ही वापस आ गई. पूछा तो बोली, ‘रहती कहां? बड़ी भाभी ने किसी को घर की चाबी दे रखी थी. कोई बैंक का कर्मचारी वहां रहने लगा था.’

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‘‘सुमित्रा आगे बताने लगी कि भाभी यह जान कर कि हम अब यहीं आ कर रहेंगे, खुश नहीं हुईं बल्कि कहने लगीं, ‘जानती हो कितनी महंगाई हो गई है. एक मेहमान के चायपानी पर ही 100 रुपए खर्च हो जाते हैं.’ फिर वह उठीं और अंदर से कुछ कागज ले आईं. सुमित्रा के हाथ में पकड़ाते हुए कहने लगीं कि यह तुम्हारे मकान की रिपेयरिंग का बिल है जो किराएदार दे गया है. मैं ने उस से कहा था कि जब मकानमालिक आएंगे तो सारा हिसाब करवा दूंगी. 14-15 हजार का खर्चा था जो मैं ने भर दिया.

प्रतिदिन : भाग 1

प्रीति अपने पड़ोस में रहने वाले वृद्ध दंपती मिस्टर एंड मिसेज शर्मा के आएदिन के आपसी झगड़ों से काफी हैरानपरेशान थी. लेकिन एक दिन सहेली दीप्ति के घर मिसेज शर्मा को देख कर चौंक गई. और वह दीप्ति से मिसेज शर्मा के बारे में जानने की जिज्ञासा को दबा न सकी.

कहते हैं परिवर्तन ही जिंदगी है.

सबकुछ वैसा ही नहीं रहता जैसा

आज है या कल था. मौसम के हिसाब से दिन भी कभी लंबे और कभी छोटे होते हैं पर उन के जीवन में यह परिवर्तन क्यों नहीं आता? क्या उन की जीवन रूपी घड़ी को कोई चाबी देना भूल गया या बैटरी डालना जो उन की जीवनरूपी घड़ी की सूई एक ही जगह अटक गई है. कुछ न कुछ तो ऐसा जरूर घटा होगा उन के जीवन में जो उन्हें असामान्य किए रहता है और उन के अंदर की पीड़ा की गालियों के रूप में बौछार करता रहता है.

मैं विचारों की इन्हीं भुलभुलैयों में खोई हुई थी कि फोन की घंटी बज उठी.

‘‘हैलो,’’ मैं ने रिसीवर उठाया.

‘‘हाय प्रीत,’’ उधर से चहक भरी आवाज आई, ‘‘क्या कर रही हो…वैसे मैं जानती हूं कि तू क्या कर रही होगी. तू जरूर अपनी स्टडी मेज पर बैठी किसी कथा का अंश या कोई शब्दचित्र बना रही होगी. क्यों, ठीक  कहा न?’’

‘‘जब तू इतना जानती है तो फिर मुझे खिझाने के लिए पूछा क्यों?’’ मैं ने गुस्से में उत्तर दिया.

‘‘तुझे चिढ़ाने के लिए,’’ यह कह कर हंसती हुई वह फिर बोली, ‘‘मेरे पास बहुत ही मजेदार किस्सा है, सुनेगी?’’

मेरी कमजोरी वह जान गई थी कि मुझे किस्सेकहानियां सुनने का बहुत शौक है.

‘‘फिर सुना न,’’ मैं सुनने को ललच गई.

‘‘नहीं, पहले एक शर्त है कि तू मेरे साथ पिक्चर चलेगी.’’

‘‘बिलकुल नहीं. मुझे तेरी शर्त मंजूर नहीं. रहने दे किस्साविस्सा. मुझे नहीं सुनना कुछ और न ही कोई बकवास फिल्म देखने जाना.’’

‘‘अच्छा सुन, अब अगर कुछ देखने को मन करे तो वही देखने जाना पड़ेगा न जो बन रहा है.’’

‘‘मेरा तो कुछ भी देखने का मन नहीं है.’’

‘‘पर मेरा मन तो है न. नई फिल्म आई है ‘बेंड इट लाइक बैखम.’ सुना है स्पोर्ट वाली फिल्म है. तू भी पसंद करेगी, थोड़ा खेल, थोड़ा फन, थोड़ी बेटियों को मां की डांट. मजा आएगा यार. मैं ने टिकटें भी ले ली हैं.’’

‘‘आ कर मम्मी से पूछ ले फिर,’’ मैं ने डोर ढीली छोड़ दी.

मैं ने मन में सोचा. सहेली भी तो ऐसीवैसी नहीं कि उसे टाल दूं. फोन करने के थोड़ी देर बाद वह दनदनाती हुई पहुंच जाएगी. आते ही सीधे मेरे पास नहीं आएगी बल्कि मम्मी के पास जाएगी. उन्हें बटर लगाएगी. रसोई से आ रही खुशबू से अंदाजा लगाएगी कि आंटी ने क्या पकाया होगा. फिर मांग कर खाने बैठ जाएगी. तब आएगी असली मुद्दे पर.

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‘आंटी, आज हम पिक्चर जाएंगे. मैं प्रीति को लेने आई हूं.’

‘सप्ताह में एक दिन तो घर बैठ कर आराम कर लिया करो. रोजरोज थकती नहीं बसट्रेनों के धक्के खाते,’ मम्मी टालने के लिए यही कहती हैं.

‘थकती क्यों नहीं पर एक दिन भी आउटिंग न करें तो हमारी जिंदगी बस, एक मशीन बन कर रह जाए. आज तो बस, पिक्चर जाना है और कहीं नहीं. शाम को सीधे घर. रविवार तो है ही हमारे लिए पूरा दिन रेस्ट करने का.’

‘अच्छा, बाबा जाओ. बिना गए थोड़े मानोगी,’ मम्मी भी हथियार डाल देती हैं.

फिर पिक्चर हाल में दीप्ति एकएक सीन को बड़ा आनंद लेले कर देखती और मैं बैठी बोर होती रहती. पिक्चर खत्म होने पर उसे उम्मीद होती कि मैं पिक्चर के बारे में अपनी कुछ राय दूं. पर अच्छी लगे तब तो कुछ कहूं. मुझे तो लगता कि मैं अपना टाइम वेस्ट कर रही हूं.

जब से हम इस कसबे में आए हैं पड़ोसियों के नाम पर अजीब से लोगों का साथ मिला है. हर रोज उन की आपसी लड़ाई को हमें बरदाश्त करना पड़ता है. कब्र में पैर लटकाए बैठे ये वृद्ध दंपती पता नहीं किस बात की खींचातानी में जुटे रहते हैं. बैक गार्डेन से देखें तो अकसर ये बड़े प्यार से बातें करते हुए एकदूसरे की मदद करते नजर आते हैं. यही नहीं ये एकदूसरे को बड़े प्यार से बुलाते भी हैं और पूछ कर नाश्ता तैयार करते हैं. तब इन के चेहरे पर रात की लड़ाई का कोई नामोनिशान देखने को नहीं मिलता है.

हर रोज दिन की शुरुआत के साथ वृद्धा बाहर जाने के लिए तैयार होने लगतीं. माथे पर बड़ी गोल सी बिंदी, बालों में लाल रिबन, चमचमाता सूट, जैकट और एक हाथ में कबूतरों को डालने के लिए दाने वाला बैग तथा दूसरे हाथ में छड़़ी. धीरेधीरे कदम रखते हुए बाहर निकलती हैं.

2-3 घंटे बाद जब वृद्धा की वापसी होती तो एक बैग की जगह उन के हाथों में 3-4 बैग होते. बस स्टाप से उन का घर ज्यादा दूर नहीं है. अत: वह किसी न किसी को सामान घर तक छोड़ने के लिए मना लेतीं. शायद उन का यही काम उन के पति के क्रोध में घी का काम करता और शाम ढलतेढलते उन पर शुरू होती पति की गालियों की बौछार. गालियां भी इतनी अश्लील कि आजकल अनपढ़ भी उस तरह की गाली देने से परहेज करते हैं. यह नित्य का नियम था उन का, हमारी आंखों देखा, कानों सुना.

हम जब भी शाम को खाना खाने बैठते तो उधर से भी शुरू हो जाता उन का कार्यक्रम. दीवार की दूसरी ओर से पुरुष वजनदार अश्लील गालियों का विशेषण जोड़ कर पत्नी को कुछ कहता, जिस का दूसरी ओर से कोई उत्तर न आता.

मम्मी बहुत दुखी स्वर में कहतीं, ‘‘छीछी, ये कितने असभ्य लोग हैं. इतना भी नहीं जानते कि दीवारों के भी कान होते हैं. दूसरी तरफ कोई सुनेगा तो क्या सोचेगा.’’

मम्मी चाहती थीं कि हम भाईबहनों के कानों में उन के अश्लील शब्द न पड़ें. इसलिए वह टेलीविजन की आवाज ऊंची कर देतीं.

खाने के बाद जब मम्मी रसोई साफ करतीं और मैं कपड़ा ले कर बरतन सुखा कर अलमारी में सजाने लगती तो मेरे लिए यही समय होता था उन से बात करने का. मैं पूछती, ‘‘मम्मी, आप तो दिन भर घर में ही रहती हैं. कभी पड़ोस वाली आंटी से मुलाकात नहीं हुई?’’

‘‘तुम्हें तो पता ही है, इस देश में हम भारतीय भी गोरों की तरह कितने रिजर्व हो गए हैं,’’ मम्मी उत्तर देतीं, ‘‘मुझे तो ऐसा लगता है कि दोनों डिप्रेशन के शिकार हैं. बोलते समय वे अपना होश गंवा बैठते हैं.’’

‘‘कहते हैं न मम्मी, कहनेसुनने से मन का बोझ हलका होता है,’’ मैं अपना ज्ञान बघारती.

कुछ दिन बाद दीप्ति के यहां प्रीति- भोज का आयोजन था और वह मुझे व मम्मी को बुलाने आई पर मम्मी को कहीं जाना था इसीलिए वह नहीं जा सकीं.

यह पहला मौका था कि मैं दीप्ति के घर गई थी. उस का बड़ा सा घर देख कर मन खुश हो गया. मेरे अढ़ाई कमरे के घर की तुलना में उस का 4 डबल बेडरूम का घर मुझे बहुत बड़ा लगा. मैं इस आश्चर्य से अभी उभर भी नहीं पाई थी कि एक और आश्चर्य मेरी प्रतीक्षा कर रहा था.

अचानक मेरी नजर ड्राइंगरूम में कोने में बैठी अपनी पड़ोसिन पर चली गई. मैं अपनी जिज्ञासा रोक न पाई और दीप्ति के पास जा कर पूछ बैठी, ‘‘वह वृद्ध महिला जो उधर कोने में बैठी हैं, तुम्हारी कोई रिश्तेदार हैं?’’

‘‘नहीं, पापा के किसी दोस्त की पत्नी हैं. इन की बेटी ने जिस लड़के से शादी की है वह हमारी जाति का है. इन का दिमाग कुछ ठीक नहीं रहता. इस कारण बेचारे अंकलजी बड़े परेशान रहते हैं. पर तू क्यों जानना चाहती है?’’

‘‘मेरी पड़ोसिन जो हैं,’’ इन का दिमाग ठीक क्यों नहीं रहता? इसी गुत्थी को तो मैं इतने दिनों से सुलझाने की कोशिश कर रही थी, अत: दोबारा पूछा, ‘‘बता न, क्या परेशानी है इन्हें?’’

अपनी बड़ीबड़ी आंखों को और बड़ा कर के दीप्ति बोली, ‘‘अभी…पागल है क्या? पहले मेहमानों को तो निबटा लें फिर आराम से बैठ कर बातें करेंगे.’’

2-3 घंटे बाद दीप्ति को फुरसत मिली. मौका देख कर मैं ने अधूरी बात का सूत्र पकड़ते हुए फिर पूछा, ‘‘तो क्या परेशानी है उन दंपती को?’’

‘‘अरे, वही जो घरघर की कहानी है,’’ दीप्ति ने बताना शुरू किया, ‘‘हमारे भारतीय समाज को पहले जो बातें मरने या मार डालने को मजबूर करती थीं और जिन बातों के चलते वे बिरादरी में मुंह दिखाने लायक नहीं रहते थे, उन्हीं बातों को ये अभी तक सीने से लगाए घूम रहे हैं.’’

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‘‘आजकल तो समय बहुत बदल गया है. लोग ऐसी बातों को नजरअंदाज करने लगे हैं,’’ मैं ने अपना ज्ञान बघारा.

‘‘तू ठीक कहती है. नईपुरानी पीढ़ी का आपस में तालमेल हमेशा से कोई उत्साहजनक नहीं रहा. फिर भी हमें जमाने के साथ कुछ तो चलना पड़ेगा वरना तो हम हीनभावना से पीडि़त हो जाएंगे,’’ कह कर दीप्ति सांस लेने के लिए रुकी.

मैं ने बात जारी रखते हुए कहा, ‘‘जब हम भारतीय विदेश में आए तो बस, धन कमाने के सपने देखने में लग गए. बच्चे पढ़लिख कर अच्छी डिगरियां लेंगे. अच्छी नौकरियां हासिल करेंगे. अच्छे घरों से उन के रिश्ते आएंगे. हम यह भूल ही गए कि यहां का माहौल हमारे बच्चों पर कितना असर डालेगा.’’

प्रतिभा के सदुपयोग से जीवन सार्थक

धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार के आरोप में आईएएस जैसे पदाधिकारी भी आएदिन अखबारों की सुर्खियां बनते हैं. पर हर आईएएस अफसर ऐसा नहीं होता है. कुछ ऐसे भी आईएएस अफसर होते हैं जो न सिर्फ पद की प्रतिष्ठा बनाए रखते हैं, बल्कि ईमानदारी का भी उदाहरण पेश करते हैं.

आज ऐसी स्थिति देखसुन कर कि अनेक आईएएस अधिकारी भ्रष्टाचार के आरोप में निलंबित हो रहे हैं, मैं ने दांतों तले उंगली दबा ली. मु झे आश्चर्य होता है कि ऐसी बुद्धि के मालिक कि उन का चयन आईएएस जैसे मुश्किल व सम्माननीय पद के लिए हो जाता है, तो फिर उन की प्रतिभा को काठ क्यों मार जाता है. वे न केवल गलत कदम उठाने की सोचते हैं, बल्कि बढ़ा भी डालते हैं. इस वजह से मात्र उन की प्रतिष्ठा ही मटियामेट नहीं होती, बल्कि नौकरी से हाथ धोने की नौबत तक आ जाती है.

आईएएस अधिकारियों की ऐसी गलत सोच देखसुन कर मु झे अचानक 1968 के बैच के आईएएस डा. गिरीश चंद्र श्रीवास्तव और उन के कुछ बाद ही आईएएस बनीं उन की धर्मपत्नी रोली श्रीवास्तव का सम्मान के साथ स्मरण हो आया.

रोली अपने पति से कुछ जूनियर रहीं. जब से गिरीश चंद्र और रोली ने अपनाअपना पदभार संभाला, बहुत ही ईमानदारी व कर्तव्यनिष्ठा से सरकार की सेवा करते रहे. इस से पहले कि उन के बारे में कुछ विशेष लिखूं, संक्षिप्त में उन का परिचय देना जरूरी है.

गिरीश का जन्म उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में 1942 में हुआ था. संयोग से उस समय बस्ती के जिलाधिकारी कोई गिरीश चंद्र थे. उन की मां ने उन्हीं के नाम पर अपने बेटे का नाम गिरीश चंद्र रख दिया, यह सोच कर कि मेरा बेटा भी एक दिन आईएएस बनेगा, जो भविष्य में सत्य हो कर सामने आया भी. गिरीश बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के रहे. हाईस्कूल से ही एमएससी टौपर और स्कौलरशिप होल्डर रहे. 18 वर्ष की आयु में उन्होंने एमएससी जियोफिजिक्स बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से किया था. आईएएस में बैठने की अभी आयु न होने के कारण वे जियोलौजिकल सर्वे औफ इंडिया में 4 वर्ष फर्स्टक्लास गजटेड औफिसर के पद पर कार्यरत रहे. 22 वर्ष की आयु होने पर वे यूपीएससी एग्जाम में अपने पहले ही प्रयास में सफल हो गए.

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कुछ समय बाद ही वे रोली श्रीवास्तव, आईएएस, के साथ परिणयसूत्र में बंधे. दोनों पतिपत्नी की नियुक्ति अधिकतर अलगअलग स्थानों पर ही होती रही. जैसे, जब गिरीश की नियुक्ति मिजोरम में हुई तब रोली शिलौंग में रहीं. गिरीश स्थानांतरित हो कर दिल्ली आए, तो रोली को नागपुर जाना पड़ा. लगभग पूरी सर्विस में अलगअलग स्थानों पर रहते हुए दोनों पतिपत्नी अपनेअपने विभागों का कार्य अत्यंत सत्यनिष्ठा से संभालते रहे.

हां, एक स्थान पर उन को साथ रहने का सुअवसर जरूर प्राप्त हुआ. वह था गोवा. गोवा में गिरीश चंद्र चीफ सैक्रेटरी औफ गोवा के सम्माननीय पद पर नियुक्त किए गए. रोली ने भी वहां पर चीफ कमिश्नर औफ इनकमटैक्स के पद का भार संभाला. वहां पर पतिपत्नी अपनेअपने विभाग का कार्य अत्यंत सत्यनिष्ठा और ईमानदारी का परिचय देते हुए करते रहे. हर व्यक्ति जो उन के संपर्क में आता, उन की प्रशंसा किए बिना नहीं रहता. उन को किसी प्रकार का प्रलोभन दे कर विचलित करने का साहस कोई नहीं कर सकता था. लगभग 3 वर्ष वे दोनों गोवा में रहे.

घटना उस समय की है जब गिरीश दिल्ली में थे. गिरीश की मां हमेशा उन्हीं के साथ रहती थीं. अचानक वे गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गईं. उन्हें अस्पताल में भरती कराना पड़ा. अकेले रहने के कारण गिरीश को मां को अस्पताल में देखने और औफिस का भी काम करने में कुछ दिक्कत आ रही थी. यहां यह बताना जरूरी है कि उन दिनों गिरीश को औफिस के अन्य कार्यों के साथ इंजीनियरों की भरती करने का भी काम देखना पड़ता था.

सो, उन के अंडर कार्य करते दोएक इंजीनियरों ने उन से अनुरोध किया कि ‘सर, आप निश्चिंत हो कर औफिस का कार्य करें, हम लोग अस्पताल में मांजी की देखभाल कर लेंगे.’

लेकिन गिरीश ने स्पष्ट मना करते हुए कहा, ‘नहीं, मां की देखभाल का इतना बड़ा एहसान मैं किसी का नहीं ले सकता. मैं ने अपने भाइयों को बुला लिया है. वे लोग यथासंभव शीघ्र आ जाएंगे, आप लोगों को परेशान होने की जरूरत नहीं है.’

गिरीश ने बाद में बताया, ‘‘मां की सेवा का इतना बड़ा ऋण मैं कैसे ले सकता था. आज वे हमें अपना ऋणी बना कर कल कहते कि फलां इंजीनियर की नियुक्ति कर दीजिए तो मेरा ऋणी मन क्या जवाब देता? मां की सेवा के प्रतिदान में मैं गलत काम करने के लिए विवश हो जाता, जो मु झे कतई स्वीकार नहीं होता.’’ इतनी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की भावना से परिपूर्ण रहे गिरीश.

एक अन्य छोटी सी घटना में भी उन का बड़प्पन  झांकता नजर आता है. एक औफिस में वे मुआयना करने के लिए गए थे. भीषण गरमी थी. उन्होंने पीने के लिए पानी मंगाया. तुरंत ही ट्रे में कोल्डड्रिंक और शिकंजी ले कर लोग सामने आ गए. गिरीश ने देखा तो नाराज होते हुए कहा, ‘यह क्या? मैं ने पानी मांगा था, जितना कहा जाए, बस, उतना ही किया करिए.’ अधिकारीगण  झेंप से गए, फिर केवल पानी ही ले कर सामने आने का साहस कर सके.

रोली भी अपने पति के नक्शेकदम पर चलती रहीं. किसी की मजाल भी नहीं थी कि किसी गलत काम के लिए कोई उन से कहने की हिम्मत कर सके. बहरहाल, इसी तरह समय सरकता रहा.

सरकते समय के साथ 2004 का आगमन हुआ और डा. गिरीश चंद्र श्रीवास्तव ने नौकरी से अवकाश ग्रहण कर लिया. अपने पति से कुछ जूनियर रहीं रोली की अभी 4 वर्ष नौकरी शेष थी. सो, उन्होंने कोशिश कर के शेष समय अपने होम डिस्ट्रिक्ट इलाहाबाद के लिए नियुक्ति ले ली. ऐडमिनिस्ट्रेशन सर्विस में यह छूट देने का नियम है कि अवकाश ग्रहण करने से 3-4 वर्ष शेष रहने पर यदि चाहें तो होम डिस्ट्रिक्ट मिल सकता है.

रोली की इलाहाबाद नियुक्ति मिलना गिरीश को भी अच्छा प्रतीत हुआ. वे अभी दिल्ली में ही थे. जौब जौइन करने के लिए रोली इलाहाबाद आ गईं, अपनी मां के पास.

गिरीश अपना वांछनीय सामान समेट कर प्रयागराज ट्रेन से इलाहाबाद के लिए निकल पड़े. उन्होंने अपने पहुंचने की सूचना भी भेज दी. यात्रा के दौरान रात्रि में फोन पर रोली की मां ने बात कर के बताया कि रोली को बुखार आ गया है, लेकिन चिंता की बात नहीं है, डाक्टर को बुला कर दिखा दिया है.

लेकिन अनहोनी उन के सुखद दिनों को लील लेने के लिए करीब ही खड़ी थी. सुबह 4 बजे रोली ने उठ कर पानी पिया और अपनी मां से मंद आवाज में बोलीं, ‘‘मां, सुबह जीसी आ रहे हैं, उन का ध्यान रखना.’’ वे गिरीश को जीसी ही कह कर संबोधित करती थीं.

बेटी की बात सुन कर मां ने कहा, ‘‘तुम को चिंता करने की जरूरत नहीं है, तुम आराम करो.’’

रोली को जैसे अपने अनंतपथ पर जाने का पूर्वाभास हो गया था, अत्यंत क्षीण आवाज में बोलीं, ‘‘मां, मु झे भय लग रहा है कि कहीं ट्रेन लेट न हो.’’

मां ने हलकी  िझड़की लगाई, ‘‘बिना मतलब मन में शंका करने की जरूरत नहीं है, आराम से सो जाओ.’’

मां की डांट से रोली दूसरी तरफ करवट बदल कर सो गईं, कभी न उठने के लिए.

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घर पहुंच कर गिरीश को गहरा आघात लगा, जैसे क्षणभर में सबकुछ खत्म हो गया हो, आंखों से खून टपक पड़ा. जीवनसाथी का साथ पलभर में छूट गया था, साथ रहने का सुनहरा महल ढह गया था. कुदरत की इस निष्ठुरता पर वे हाथ मल कर रह गए, किसी से कुछ कहतेसुनते नहीं बना.

आजकल गिरीश चंद्र श्रीवास्तव दिल्ली में ही अपनी बेटी पुण्य सलीला के साथ रहते हैं. वे भी आईएएस हैं और गृह मंत्रालय में कार्यरत हैं. कुछ समय तो गिरीश आईएएस और पीसीएस परीक्षाओं में उत्तीर्ण उम्मीदवारों का साक्षात्कार भी लेते रहे, लेकिन अब नहीं लेते.

देख कर व सम झ कर अफसोस होता है कि ऐसे ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी अब देखने व सुनने को कम मिलते हैं.

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