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Online Hindi Story : कभी अपने लिए

Online Hindi Story : विमान ने उड़ान भरी तो मैं ने खिड़की से बाहर देखा. मुंबई की इमारतें छोटी होती गईं, बाद में इतनी छोटी कि माचिस की डब्बियां सी लगने लगीं. प्लेन में बैठ कर बाहर देखना मुझे हमेशा बहुत अच्छा लगता है. बस, बादल ही बादल, उन्हें देख कर ऐसा लगता है कि रुई के गोले चारों तरफ बिखरे पड़े हों. कई बार मन होता है कि हाथ बढ़ा कर उन्हें छू लूं.

मुझे बचपन से ही आसमान का हलका नीला रंग और कहींकहीं बादलों के सफेद तैरते टुकड़े बहुत अच्छे लगते हैं. आज भी इस तरह के दृश्य देखती हूं तो सोचती हूं कि काश, इस नीले आसमान की तरह मिलावट और बनावट से दूर इनसानों के दिल भी होते तो आपस में दुश्मनी मिट जाती और सब खुश रहते.

दिल्ली पहुंचने में 2 घंटे का समय लगना था. बाहर देखतेदेखते मन विमान से भी तेज गति से दौड़ पड़ा, एअरपोर्ट से बाहर निकलूंगी तो अभिराम भैया लेने आए हुए होंगे, वहां से हम दोनों संपदा दीदी को पानीपत से लेंगे और फिर शाम तक हम तीनों भाईबहन मां के पास मुजफ्फरनगर पहुंच जाएंगे.

हम तीनों 10 साल के बाद एकसाथ मां के पास पहुंचेंगे. वैसे हम अलगअलग तो पता नहीं कितनी बार मां के पास चक्कर काट लेते हैं. अभिराम भैया दिल्ली में हृदयरोग विशेषज्ञ हैं. संपदा दीदी पानीपत में गर्ल्स कालेज की पिं्रसिपल हैं और मैं मुंबई में हाउसवाइफ हूं. 10 साल से मुंबई में रहने के बावजूद यहां के भागदौड़ भरे जीवन से अपने को दूर ही रखती हूं. बस, पढ़नालिखना मेरा शौक है और मैं अपना समय रोजमर्रा के कामों को करने के बाद अपने शौक को पूरा करने में बिताती हूं. शशांक मेरे पति हैं. मेरे दोनों बच्चे स्नेहा और यश मुंबई के जीवन में पूरी तरह रम गए हैं. मां के पास तीनों के पहुंचने का यह प्रोग्राम मैं ने ही बनाया है. कुछ दिनों से मन नहीं लग रहा था. लग रहा था कि रुटीन में कुछ बदलाव की जरूरत है.

स्नेहा और यश जल्दी कहीं जाना नहीं चाहते, वे कहीं भी चले जाते हैं तो दोनों के चेहरों से बोरियत टपकती रहती है, शशांक सेल्स मैनेजर हैं, अकसर टूर पर रहते हैं. एक दिन अचानक मन में आया कि मां के पास जाऊं और शांति से कम से कम एक सप्ताह रह कर आऊं. शशांक या बच्चों के साथ कभी जाती हूं तो जी भर कर मां के साथ समय नहीं बिता पाती, इन्हीं तीनों की जरूरतों का ध्यान रखती रह जाती हूं, इस बार सोचा अकेली जाती हूं. मां वहां अकेली रहती हैं, हमारे पापा का सालों पहले देहांत हो चुका है. मां टीचर रही हैं. अभी रिटायर हुई हैं.

हम तीनों भाईबहनों ने उन्हें साथ रहने के लिए कई बार कहा है लेकिन वे अपना घर छोड़ना नहीं चाहतीं, उन्हें वहीं अच्छा लगता है. सुबहशाम काम के लिए राधाबाई आती है. सालों से वैसे भी मां ने अपने अकेलेपन का रोना कभी नहीं रोया, वे हमेशा खुश रहती हैं, किसी न किसी काम में खुद को व्यस्त रखती हैं.

हां, तो मैं ने ही दीदी और भैया के साथ यह कार्यक्रम बनाया है कि हम तीनों अपनेअपने परिवार के बिना एक सप्ताह मां के साथ रहेंगे. अपनी हर व्यस्तता, हर जिम्मेदारी से स्वयं को दूर रख कर. कभी अपने लिए, अपने मन की खुशी के लिए भी तो कुछ सोच कर देखें, बस कुछ दिन.

अभिराम भैया को अपने मरीजों से समय नहीं मिलता, दीदी कालेज की गतिविधियों में व्यस्त रह कर कभी अपने स्वास्थ्य की भी चिंता नहीं करतीं, मेरा एक अलग निश्चित रुटीन है लेकिन मेरे प्रस्ताव पर दोनों सहर्ष तैयार हो गए, शायद हम तीनों ही कुछ बदलाव चाह रहे थे. शशांक तो मेरा कार्यक्रम सुनते ही हंस पड़े, बोले, ‘हम लोगों से इतनी परेशान हो क्या, सुखदा?’

मैं ने भी छेड़ा था, ‘हां, तुम लोगों को भी तो कुछ चेंज चाहिए, मैं जा रही हूं, मेरा भी चेंज हो जाएगा और तुम लोगों का भी, बोर हो गई हूं एक ही रुटीन से,’ शशांक ने हमेशा की तरह मेरी इच्छा का मान रखा और मैं आज जा रही हूं.

एअरहोस्टैस की आवाज से मेरी तंद्रा भंग हुई, मैं काफी देर से अपने विचारों में गुम थी. दिल्ली पहुंच कर जैसे ही एअरपोर्ट से बाहर आई, अभिराम भैया खड़े थे, उन्होंने हाथ हिलाया तो मैं तेजी से बढ़ कर उन के पास पहुंच गई, उन्होंने हमेशा की तरह मेरा सिर थपथपाया, बैग मेरे हाथ से लिया. बोले, ‘‘कैसी हो सुखदा, मान गए तुम्हें, यह योजना तुम ही बना सकती थीं, मैं तो अभी से एक हफ्ते की छुट्टी के लिए ऐक्साइटेड हो रहा हूं, पहले घर चलते हैं, तुम्हारी भाभी इंतजार कर रही हैं.’’

रास्ते भर हम आने वाले सप्ताह की प्लानिंग करते रहे. भैया के घर पहुंच कर स्वाति भाभी के हाथ का बना स्वादिष्ठ खाना खाया. अपने भतीजे राहुल के लिए लाए उपहार मैं ने उसे दिए तो वह चहक उठा. भैया बोले, ‘‘सुखदा, थोड़ा आराम कर लो.’’

मैं ने कहा, ‘‘बैठीबैठी ही आई हूं, एकदम फ्रैश हूं, कब निकलना है?’’

भाभी ने कहा, ‘‘1-2 दिन मेरे पास रुको.’’

‘‘नहीं भाभी, आज जाने दो, अगली बार रुकूंगी, पक्का’’

‘‘हां भई, मैं कुछ नहीं बोलूंगी बहनभाई के बीच में,’’ फिर हंस कर कहा, ‘‘वैसे कुछ अलग तरह का ही प्रोग्राम बना है इस बार, चलो, जाओ तुम लोग, मां को सरप्राइज दो.’’

मैं ने भाभी से विदा ले कर अपना बैग उठाया, भैया ने अपना सामान तैयार कर रखा था. हम भैया की गाड़ी से ही पानीपत बढ़ चले. वहां संपदा दीदी हमारा इंतजार कर रही थीं. ढाई घंटे में दीदी के पास पहुंच गए, वहां चायनाश्ता किया, जीजाजी हमारे प्रोग्राम पर हंसते रहे, अपनी टिप्पणियां दे कर हंसाते रहे, बोले, ‘‘हां, भई, ले जाओ अपनी दीदी को, इस बहाने थोड़ा आराम मिल जाएगा इसे,’’ फिर धीरे से बोले, ‘‘हमें भी.’’ सब ठहाका लगा कर हंस पड़े. दीदी की बेटियों के लिए लाए उपहार उन्हें दे कर हम मां के पास जाने के लिए निकल पड़े. पानीपत से मुजफ्फरनगर तक का समय कब कट गया, पता ही नहीं चला.

मुजफ्फरनगर में गांधी कालोनी में  जब कार मुड़ी तो हमें दूर से ही  अपना घर दिखाई दिया, तो भैया बच्चों की तरह बोले, ‘‘बहुत मजा आएगा, मां के लिए यह बहुत बड़ा सरप्राइज होगा.’’

हम ने धीरे से घर का दरवाजा खोला. बाहरी दरवाजा खोलते ही गेंदे के फूलों की खुशबू हमारे तनमन को महका गई. दरवाजे के एक तरफ अनगिनत गमले लाइन से रखे थे और मां अपने बगीचे की एक क्यारी में झुकी कुछ कर रही थीं. हमारी आहट से मुड़ कर खड़ी हुईं तो खड़ी की खड़ी रह गईं, इतना ही बोल पाईं, ‘‘तुम तीनों एकसाथ?’’

हम तीनों ही मां के गले लग गए और मां ने अपने मिट्टी वाले हाथ झाड़ कर हमें अपनी बांहों में भरा तो पल भर के लिए सब की आंखें भर आईं, फिर हम चारों अंदर गए, दीदी ने कहा, ‘‘यह कार्यक्रम सुखदा ने मुंबई में बनाया और हम आप के साथ पूरा एक हफ्ता रहेंगे.’’

मां की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था, हमारे सुंदर से खुलेखुले घर में मां अकेली ही तो रहती हैं. हां, एक हिस्सा उन के किराएदार के पास है. मां के मना करने पर भी हम दोनों मां के साथ किचन में लग गईं और भैया थोड़ी देर सो गए. इतनी देर गाड़ी चलाने से उन्हें कुछ थकान तो थी ही. फिर हम चारों ने डिनर किया, अपनेअपने घर सब के हालचाल लिए. सोने को हुए तो बिजली चली गई, मां को फिक्र हुई, बोलीं, ‘‘तुम तीनों को दिक्कत होगी अब, इनवर्टर भी खराब है, तुम लोगों को तो ए.सी.  की आदत है. मैं तो छत पर भी सो जाती हूं.’’

संपदा  दीदी ने कहा, ‘‘मां, मुझ से छत पर नहीं सोया जाएगा.’’

भैया बोले, ‘‘फिक्र क्यों करती हो दीदी, चल कर देखते हैं.’’ और हम चारों अपनीअपनी चटाई ले कर छत पर चले गए. हम छत पर क्या गए, तनमन खुशी से झूम उठा. क्या मनमोहक दृश्य था, फूलों की मादक खुशबू छाई हुई थी, संदली हवाओं के बीच धवल चांदनी छिटकी हुई थी. हम सब खुले आसमान के नीचे चटाई बिछा कर लेट गए, फ्लैटों में तो कभी छत के दर्शन ही नहीं हुए थे. खुले आकाश के आंचल में तारों का झिलमिल कर टिमटिमाना बड़ा ही सुखद एहसास था. बचपन में मां ने कई बार बताया था, ठीक 4 बजे भोर का तारा निकल आता है.

‘‘प्रकृति में कितना रहस्य व आनंद है लेकिन आज का मनुष्य तो बस, मशीन बन कर रह गया है. अच्छा किया तुम लोग आ गए, रोज की दौड़भाग से तुम लोगों को कुछ आराम मिल जाएगा,’’ मां ने कहा.

प्राकृतिक सुंदरता को देखतेदेखते हम कब सो गए, पता ही नहीं चला जबकि ए.सी. में भी इतना आनंद नहीं था. सब ने सुबह बहुत ही तरोताजा महसूस किया. जैसे हम में नई चेतना, नए प्राण आ गए थे. गमले के पौधों की खुशबू से पूरा वातावरण महक रहा था. रजनीगंधा व बेले की खुशबू ने तनमन दोनों को सम्मोहित कर लिया था. हम नीचे आए, मां नाश्ता तैयार कर चुकी थीं. भैया अपनी पसंद के आलू के परांठे देख कर खुश हो गए. उत्साह से कहा, ‘‘आज तो खा ही लेता हूं, बहुत हो गया दूध और कौर्नफ्लेक्स का नाश्ता.’’

मैं ने कहा, ‘‘मां, मुझे तो कुछ हलका ही दे दो, मुझे सुबह कुछ हलका ही लेने की आदत है.’’

दीदी भी बोलीं, ‘‘हां, मां, एक ब्रैडपीस ही दे दो.’’

अभिराम भैया ने टोका, ‘‘यह पहले ही तय हो गया था कि कोई खानेपीने के नखरे नहीं करेगा, जो बनेगा सब एकसाथ खाएंगे.’’

मां हंस पड़ीं, ‘‘क्या यह भी तय कर के आए हो?’’

दीदी बोलीं, ‘‘हां, मां, सुखदा ने ही कहा था, दीदी आप अपना माइग्रेन भूल जाना और मैं कमरदर्द तो मैं ने इस से कहा था, तू भी फिगर और ऐक्सरसाइज की चिंता मुंबई में ही छोड़ कर आना.’’

मैं ने कहा, ‘‘ठीक है, चलो, चारों नाश्ता करते हैं.’’

हम ने डट कर नाश्ता किया और फिर मां के साथ किचन समेट कर खूब बातें कीं.

राधाबाई आई तो हम तीनों बाजार घूमने चले गए. दिल्ली, मुंबई के मौल्स में घूमना अलग बात है और यहां दुकानदुकान जा कर खरीदारी करना अलग बात है. हम तीनों ने अपनेअपने परिवार के लिए कुछ न कुछ खरीदा, फोन पर सब के हालचाल लिए और फिर अपनी मनपसंद जगह ‘गोल मार्किट’ चाट खाने पहुंच गए. हमारा डाक्टर भाई जिस तरह से हमारे साथ चाट खा रहा था, कोई देखता तो उसे यकीन ही नहीं होता कि वह अपने शहर का प्रसिद्ध हृदयरोग विशेषज्ञ है. ढीली सी ट्राउजर पर एक टीशर्ट पहने दीदी को देख कर कौन कह सकता है कि वे एक सख्त पिं्रसिपल हैं, मैं ये पल अपने में संजो लेना चाहती थी, दीदी ने मुझे कहीं खोए हुए देख कर पूछा भी, ‘‘चाट खातेखाते हमारी लेखिका बहन कोई कहानी ढूंढ़ रही है क्या?’’ मैं हंस पड़ी.

हम तीनों ने मां के लिए साडि़यां खरीदीं और खाने का काफी सामान पैक करवा कर घर आए. बस, अब हम तीनों मां के साथ बातें करते, चारों कभी घूमतेफिरते ‘शुक्रताल’ पहुंच जाते कभी बाजार. भैया ने अपने मरीजों से, दीदी ने कालेज से और मैं ने अपने गृहकार्यों से जो समय निकाल लिया था, उसे हम जी भर कर जी रहे थे. शाम होते ही हम अपनी चटाइयां ले कर छत पर पहुंच जाते, इनवर्टर ठीक हो चुका था लेकिन छत पर सोने का सुख हम खोना नहीं चाहते थे. अपनी मां के साथ हम तीनों छत पर साथ बैठ कर समय बिताते तो हमें लगता हम किसी और ही दुनिया में पहुंच गए हैं.

मैं सोचती महानगर में सोचने का वक्त भी कहां मिलता है, अपनी भावनाओं को टटोलने की फुरसत भी कहां मिलती है. शाम की लालिमा को निहार कर कल्पनाओं में डूबने का समय कहां मिलता है, सुबह सूरज की रोशनी से आंखें चार करने का पल तो कैद हो जाता है कंकरीट की दीवारों में.

दीदी अपना माइग्रेन और मैं अपना कमरदर्द भूल चुकी थी. आंगन में लगे अमरूद के पेड़ से जब भैया अमरूद तोड़ कर खाते तो दृश्य बड़ा ही मजेदार होता.

छठी रात थी. कल जाना था, छत पर गए तो लेटेलेटे सब चुप से थे, मेरा दिल भी भर आया था, ये दिन बहुत अच्छे बीते थे, बहुत सुकून भरे और निश्चिंत से दिन थे, ऐसा लगता रहा था कि फिर से बचपन में लौट गए थे, वही बेफिक्री के दिन. सच ही है किसी का बचपन उम्र बढ़ने के साथ भले ही बीत जाए लेकिन वह उस के सीने में सदैव सांस लेता रहता है. यह संसार, प्रकृति तो नहीं बदलती, धूपछांव, चांदतारे, पेड़पौधे जैसे के तैसे अपनी जगह खड़े रहते हैं और अपनी गति से चलते रहते हैं. वह तो हमारी ही उम्र कुछ इस तरह बढ़ जाती है कि बचपन की उमंग फिर जीवन में दिखाई नहीं देती.

मां ने मुझे उदास और चुप देखा तो मेरे लेखन और मेरी प्रकाशित कहानियों की बातें छेड़ दीं क्योेंकि मां जानती हैं यही एक ऐसा विषय है जो मुझे हर स्थिति में उत्साहित कर देता है. मुझे मन ही मन हंसी आई, बच्चे कितने भी बड़े हो जाएं, मां हमेशा अपने बच्चों के दिल की बात समझ जाती है. मां ने मेरी रचनाओं की बात छेड़ी तो सब उठ कर बैठ गए. मां, दीदी, भैया वे सब पत्रिकाएं जिन में मेरी रचनाएं छपती रहती हैं जरूर पढ़ते हैं और पढ़ते ही सब मुझे फोन करते हैं और कभीकभी तो किसी कहानी के किसी पात्र को पढ़ते ही समझ जाते हैं कि वह मैं ने वास्तविक जीवन के किस व्यक्ति से लिया है. फिर सब मुझे खूब छेड़ते हैं. कुछ हंसीमजाक हुआ तो फिर सब का मन हलका हो गया.

जाने का समय आ गया, दिल्ली से ही फ्लाइट थी. मां ने पता नहीं क्याक्या, कितनी चीजें हम तीनों के साथ बांध दी थीं. हम तीनों की पसंद के कपड़े तो पहले ही दिलवा लाईं. अश्रुपूर्ण नेत्रों से मां से विदा ले कर हम तीनों पानीपत निकल गए, रास्ते में ही अगले साल इसी तरह मिलने का कार्यक्रम बनाया, यह भी तय किया परिवार के साथ आएंगे, यदि बच्चे आ पाए तो अच्छा होगा, हमें भी तो अपने बच्चों का प्रकृति से परिचय करवाना था, हमें लगा कहीं महानगरों में पलेबढ़े हमारे बच्चे प्रकृति के उस रहस्य व आनंद से वंचित न रह जाएं जो मां की बगिया में बिखरा पड़ा था और अगर बच्चे आना नहीं चाहेंगे तो हम तीनों तो जरूर आएंगे, पूरे साल से बस एक हफ्ता तो हम कभी अपने लिए निकाल ही सकते हैं, मां के साथ बचपन को जीते हुए, प्रकृति की छांव में.

Best Hindi Story : गूंगी गूंज – एक मांं की बेबसी की कहानी

Best Hindi Story : “रिमझिम के तराने ले के आई बरसात, याद आई किसी से वो पहली मुलाकात,” जब भी मैं यह गाना सुनती हूं, तो मन बहुत विचलित हो जाता है, क्योंकि याद आती है, पहली नहीं, पर आखिरी मुलाकात उस के साथ. आज फिर एक तूफानी शाम है. मुझे सख्त नफरत है वर्षा  से. वैसे तो यह भुलाए न भूलने वाली बात है, फिर भी जबजब वर्षा होती है तो मुझे तड़पा जाती है.

मुझे याद आती है मूक मीनो की, जो न तो मेरे जीवन में रही और न ही इस संसार में. उसे तकदीर ने सब नैमतों से महरूम रखा था. जिन चीजों को हम बिलकुल सामान्य मानते हैं, वह मीनो के लिए बहुत अहमियत रखती थीं. वह मुंह से तो कुछ नहीं बोल सकती थी, पर उस के नयन उस के विचार प्रकट कर देते थे.

कहते हैं, गूंगे की मां ही समझे गूंगे की बात. बहुतकुछ समझती थी, पर मैं अपनी कुछ मजबूरियों के कारण मीनो को न चाह कर भी नाराज कर देती थी.

बारिश की पहली बूंद पड़ती और वह भाग कर बाहर चली जाती और खामोशी से आकाश की ओर देखती, फिर नीचे पांव के पास बहते पानी को, जिस में बहती जाती थी सूखें पत्तों की नावें. ताली मार कर खिलखिला कर हंस पड़ती थी वह.

बादलों को देखते ही मेरे मन में एक अजीब सी उथलपुथल हो जाती है और एक तूफान सा उमड़ जाता है जो मुझे विचलित कर जाता है और मैं चिल्ला उठती हूं मीनो, मीनो…

मीनो जन्म से ही मानसिक रूप से अविकसित घोषित हुई थी. डाक्टरों की सलाह से बहुत जगह ले गई, पर कहीं उस के पूर्ण विकास की आशा नजर नहीं आई.

मीनो की अपनी ही दुनिया थी, सब से अलग, सब से पृथक. सब सांसारिक सुखों से क्या, वह तो शारीरिक व मानसिक सुख से भी वंचित थी. शायद इसीलिए वह कभीकभी आंतरिक भय से प्रचंड रूप से उत्तेजित हो जाती थी. सब को उस का भय था और उसे भय था अनजान दुनिया का, पर जब वह मेरे पास होती तो हमेशा सौम्य, बहुत शांत व मुसकराती रहती.

बहुत कोशिश की थी उस रोज कि मुझे गुस्सा न आए, पर 6 वर्षों की सहनशीलता ने मानसिक दबावों के आगे घुटने टेक दिए थे और क्रोध सब्र का बांध तोड़ता हुआ उमड़ पड़ा था. क्या करती मैं? सहनशीलता की भी अपनी सीमाएं होती हैं.

एक तरफ मीनो, जिस ने सारी उम्र मानसिक रूप से 3 साल का ही रहना था और दूसरी ओर गोद में सुम्मी. दोनों ही बच्चे, दोनों ही अपनी आवश्यकताओं के लिए मुझ पर निर्भर.

उस दिन एहसास हुआ था मुझे कि कितना सहारा मिलता है एक संयुक्त परिवार से. कितने ही हाथ होते हैं आप का हाथ बंटाने को और इकाई परिवार में स्वतंत्रता के नाम पर होती है आत्मनिर्भरता या निर्भर होना पड़ता है मनमानी करती नौकरानी पर. नौकर मैं रख नहीं सकती थी, क्योंकि मेरी 2 बेटियां थीं और कोई उन पर बुरी नजर नहीं डालेगा, इस की कोई गारंटी नहीं थी.

आएदिन अखबारों में ऐसी खबरें छपती रहती हैं. मीनो के साथसाथ मेरा भी परिवार सिकुड़ कर बहुत सीमित हो गया था. संजीव, मीनो, सुम्मी और मैं. कभीकभी तो संजीव भी अपने को उपक्षित महसूस करते थे. हमारी कलह को देख कर कई लोगों ने मुझे सलाह दी कि मीनो को मैं पागलखाने में दाखिल करा दूं और अपना ध्यान अपने पति और दूसरी बच्ची पर पूरी तरह दूं, पर कैसे करती मैं
मीनो को अपने से दूर. उस का संसार तो मैं ही थी और मैं नहीं चाहती थी कि उसे कोई तकलीफ हो, पर अनचाहे ही सब तकलीफों से छुटकारा दिला दिया मैं ने.

उस दिन मेरा और संजीव का बहुत झगड़ा हुआ था. फुटबाल का ‘विश्व कप’ का फाइनल मैच था. मैं ने संजीव से सुम्मी को संभालने को कहा, तो उस ने मना तो नहीं किया, पर बुरी तरह बोलना शुरू कर दिया.

यह देख मुझे बहुत गुस्सा आया और मैं ने भी उलटेसीधे जवाब दे दिए. फुटबाल मैच में तो शायद ब्राजील जीता था, परंतु उस मौखिक युद्ध में हम दोनों ही पराजित हुए थे. दोनों भूखे ही लेट गए और रातभर करवटें बदलते रहे.

सुबह भी संजीव नाराज थे. वे कुछ बोले या खाए बिना दफ्तर चले गए. जैसेतैसे बच्चों को कुछ खिलापिला कर मैं भी अपनी पीठ सीधी करने के लिए लेट गई. हलकीहलकी ठंडक थी. मैं कंबल ले कर लेटी ही थी कि मीनो, जो खिलौने से खेल रही थी, मेरे पास आ गई. मैं ने हाथ बाहर निकाल उसे अपने पास लिटाना चाहा, पर मीनो बाहर बारिश देखना चाहती थी.

मैं ने 2-3 बार मना किया, मुझे डर था कि कहीं मेरी ऊंची आवाज सुन कर सुम्मी न जाग जाए. उस समय मैं कुछ भी करने के मूड में नहीं थी. मैं ने एक बार फिर मीनो को गले लगाने के लिए बांह आगे की और उस ने मुझे कलाई पर काट लिया.

गुस्से में मैं ने जोर से उस के मुंह पर एक तमाचा मार दिया और चिल्लाई, ‘‘जानवर कहीं की. कुत्ते भी तुम से ज्यादा वफादार होते हैं. पता नहीं कितने साल तेरे लिए इस तरह काटने हैं मैं ने अपनी जिंदगी के.’’ कहते हैं, दिन में एक बार जबान पर सरस्वती जरूर बैठती है. उस दिन दुर्गा क्यों नहीं बैठी मेरी काली जबान पर. अपनी तलवार से तो काट लेती यह जबान.

थप्पड़ खाते ही मीनो स्तब्ध रह गई. न रोई, न चिल्लाई. चुपचाप मेरी ओर बिना देखे ही बाहर निकल गई मेरे कमरे से और मुंह फेर कर मैं भी फूटफूट कर रोई थी अपनी फूटी किस्मत पर कि कब मुक्ति मिलेगी आजीवन कारावास से, जिस में बंदी थी मेरी कुंठाएं. किस जुर्म की सजा काट रही हैं हम मांबेटी?

एहसास हुआ एक खामोशी का, जो सिर्फ आतंरिक नहीं थी, बाह्य भी थी. मीनो बहुत खामोश थी. अपनी आंखें पोंछती मैं ने मीनो को आवाज दी. वह नहीं आई, जैसे पहले दौड़ कर आती थी. रूठ कर जरूर खिलौने पर निकाल रही होगी अपना गुस्सा.

मैं उस के कमरे में गई. वहां का खालीपन मुझे दुत्कार रहा था. उदासीन बटन वाली आंखों वाला पिंचू बंदर जमीन पर मूक पड़ा मानो कुछ कहने को तत्पर था, पर वह भी तो मीनो की तरह मूक व मौन था.

घबराहट के कारण मेरे पांव मानो जकड़ गए थे. आवाज भी घुट गई थी. अचानक अपने पालतू कुत्ते भीरू की कूंकूं सुन मुझे होश सा आया. भीरू खुले दरवाजे की ओर जा कूंकूं करता, फिर मेरी ओर आता. उस के बाल कुछ भीगे से लगे.

यह देख मैं किसी अनजानी आशंका से भयभीत हो गई. कितने ही विचार गुजर गए पलछिन में. बच्चे उठाने वाला गिरोह, तेज रफ्तार से जाती मोटर कार का मीनो को मारना.

भीरू ने फिर कूंकूं की तो मैं उस के पीछे यंत्रवत चलने लगी. ठंडक के बावजूद सब पेड़पौधे पानी की फुहारों में झूम रहे थे. मेरा मजाक उड़ा रहे
थे. मानव जीवन पा कर भी मेरी स्थिति उन से ज्यादा दयनीय थी.

भीरू भागता हुआ सड़क पर निकल गया और कालोनी के पार्क में घुस गया. मैं उस के पीछेपीछे दौड़ी. भीरू बैंच के पास रुका. बैंच के नीचे मीनो सिकुड़ कर लेटी हुई थी. मैं ने उसे उठाना चाहा, पर वह और भी सिकुड़ गई. उस ने कस कर बैंच का सिरा पकड़ लिया. मैं बहुत झुक नहीं सकती. हैरानपरेशान मैं इधरउधर देख रही थी, तभी संजीव को अपनी ओर आते देखा.

संजीव ने घर फोन किया, लेकिन घंटी बजती रही, इसलिए परेशान हो कर दफ्तर से घर आया था. खुले दरवाजे व सुम्मी को अकेला देख बहुत परेशान था कि मिसेज मेहरा ने संजीव को मेरा पार्क की तरफ भागने का बताया. वे भी अपना दरवाजा बंद कर आ रही थीं.

संजीव ने झुक कर मीनो को बुलाया तो वह चुपचाप बाहर घिसट कर आ गई. मीनो को इस प्रव्यादेश का जिंदगी में सब से बड़ा व पहला धक्का लगा था. पर मैं खुश थी कि कोई और बड़ा हादसा नहीं हुआ और मीनो सुरक्षित मिल गई.

घर आ कर भी वह वैसे ही संजीव से चिपटी रही. संजीव ने ही उस के कपड़े बदले और कहा, ‘‘इस का शरीर तो तप रहा है. शायद, इसे बुखार है,” मैं ने जैसे ही हाथ लगाना चाहा, मीनो फिर संजीव से लिपट गई और सहमी हुई अपनी बड़ीबड़ी आंखों से मुझे देखने लगी.

मैं ने उसे प्यार से पुचकारा, “आ जा बेटी, मैं नही मारूंगी,” पर उस के दिमाग में डर घर कर गया था. वह मेरे पास नहीं आई.

”ठंड लग गई है. गरम दूध के साथ क्रोसीन दवा दे देती हूं,“ मैं ने मायूस आवाज में कहा.

“सिर्फ दूध दे दो. सुबह तक बुखार नहीं उतरा, तो डाक्टर से पूछ कर दवा दे देंगे,” संजीव का सुझाव था.

मैं मान गई और दूध ले आई. थोड़ा सा दूध पी मीनो संजीव की गोद में ही सो गई. अनमने मन से हम ने खाना खाया. सुबह का तूफान थम गया था. शांति थी हम दोनों के बीच.

संजीव ने प्यार भरे लहजे से पूछा, “उतरा सुबह का गुस्सा?” उस का यह पूछना था और मैं रो पड़ी.

“पगली सब ठीक हो जाएगा?” संजीव ने प्यार से सहलाया. मेरी रुलाई और फूटी. मन पर एक पत्थर का बोझ जो था मीनो को तमाचा मारने का.

मीनो सुबह उठी तो सहज थी. मेरे उठाने पर गले भी लगी. मैं खुश थी कि मुझे माफ कर वह सबकुछ भूल गई है. मुझे क्या पता था कि उस की माफी ही मेरी सजा थी.

मीनो को बुखार था, इसलिए हम उसे डाक्टर के पास ले गए. डाक्टर ने सांत्वना दी कि जल्दी ही वह ठीक हो जाएगी, पर मानो मीनो ने न ठीक होने की जिद पकड़ ली हो. 4 दिन बाद बुखार टूटा और मीनो शांति से सो गई- हमेशाहमेशा के लिए, चिरनिद्रा में. मुक्त कर गई मुझे जिंदगीभर के बंधनों से. और अब जब भी बारिश होती है, तो मुझे उलाहना सा दे जाती है और ले आती है मीनो का एक मूक संदेश, ”मां तुम आजाद हो मेरी सेवा से. मैं तुम्हारी कर्जदार नहीं बनना चाहती थी. सब ऋणों से मुक्त हूं मैं.

‘‘मीनो मुझे मुक्त कर इस सजा से. यादों के साथ घुटघुट कर जीनेमरने की सजा.”

Online Hindi Story : हयात – कथा अपने को बिखरने न देने वाली युवती की

Online Hindi Story : किस के जीवन में क्या घट रहा है, यह देख कर अंदाजा लगाना मुश्किल ही होता है. कुछ ऐसा ही हुआ था हयात के साथ.

‘‘कल जल्दी आ जाना.’’

‘‘क्यों?’’ हयात ने पूछा.

‘‘कल से रेहान सर आने वाले हैं और हमारे मिर्जा सर रिटायर हो रहे हैं.’’

‘‘कोशिश करूंगी,’’ हयात ने जवाब तो दिया लेकिन उसे खुद पता नहीं था कि वह वक्त पर आ पाएगी या नहीं.

दूसरे दिन रेहान सर ठीक 10 बजे औफिस में पहुंचे. हयात अपनी सीट पर नहीं थी. रेहान सर के आते ही सब लोगों ने खड़े हो कर गुडमौर्निंग कहा. रेहान सर की नजरों से एक खाली चेयर छूटी नहीं.

‘‘यहां कौन बैठता है?’’

‘‘मिस हयात, आप की असिस्टैंट, सर,’’ क्षितिज ने जवाब दिया.

‘‘ओके, वह जैसे ही आए उन्हें अंदर भेजो.’’

रेहान लैपटौप खोल कर बैठा था. कंपनी के रिकौर्ड्स चैक कर रहा था. ठीक 10 बज कर 30 मिनट पर हयात ने रेहान के केबिन का दरवाजा खटखटाया.

‘‘में आय कम इन, सर?’’

‘‘यस प्लीज, आप की तारीफ?’’

‘‘जी, मैं हयात हूं. आप की असिस्टैंट?’’

‘‘मुझे उम्मीद है कल सुबह मैं जब आऊंगा तो आप की चेयर खाली नहीं होगी. आप जा सकती हैं.’’

हयात नजरें झका कर केबिन से बाहर निकल आई. रेहान सर के सामने ज्यादा बात करना ठीक नहीं होगा, यह बात हयात को समझ में आ गई थी. थोड़ी ही देर में रेहान ने औफिस के स्टाफ की एक मीटिंग ली.

‘‘गुडआफ्टरनून टू औल औफ यू. मुझे आप सब से बस इतना कहना है कि कल से कंपनी के सभी कर्मचारी वक्त पर आएंगे और वक्त पर जाएंगे. औफिस में अपनी पर्सनल लाइफ को छोड़ कर कंपनी के काम को प्रायोरिटी देंगे. उम्मीद है कि आप में से कोई मुझे शिकायत का मौका नहीं देगा. बस, इतना ही, अब आप लोग जा सकते हैं.’’

‘कितना खड़ूस है. एकदो लाइंस ज्यादा बोलता तो क्या आसमान नीचे आ जाता या धरती फट जाती,’ हयात मन ही मन रेहान को कोस रही थी.

नए बौस का मूड देख कर हर कोई कंपनी में अपने काम के प्रति सजग हो गया. दूसरे दिन फिर से रेहान औफिस में ठीक 10 बजे दाखिल हुआ और आज फिर हयात की चेयर खाली थी. रेहान ने फिर से क्षितिज से मिस हयात को आते ही केबिन में भेजने को कहा. ठीक 10 बज कर 30 मिनट पर हयात ने रेहान के केबिन का दरवाजा खटखटाया.

‘‘मे आय कम इन, सर?’’

‘‘जी, जरूर, मुझे आप का ही इंतजार था. अभी हमें एक होटल में मीटिंग में जाना है. क्या आप तैयार हैं?’’

‘‘जी हां, कब निकलना है?’’

‘‘उस मीटिंग में आप को क्या करना है, यह पता है आप को?’’

‘‘जी, आप मुझे कल बता देते तो मैं तैयारी कर के आती.’’

‘‘मैं आप को अभी बताने वाला था. लेकिन शायद वक्त पर आना आप की आदत नहीं. आप की सैलरी कितनी है?’’

‘‘जी, 30 हजार.’’

‘‘अगर आप के पास कंपनी के लिए टाइम नहीं है तो आप घर जा सकती हैं और आप के लिए यह आखिरी चेतावनी है. ये फाइल्स उठाएं और अब हम निकल रहे हैं.’’

हयात रेहान के साथ होटल में पहुंच गई. आज एक हैदराबादी कंपनी के साथ मीटिंग थी. रेहान और हयात दोनों ही टाइम पर पहुंच गए. लेकिन सामने वाली पार्टी ने बुके और वो आज आएंगे नहीं, यह मैसेज अपने कर्मचारी के साथ भेज दिया. उस कर्मचारी के जाते ही रेहान ने वो फूल उठा कर होटल के गार्डन में गुस्से में फेंक दिए. ‘‘आज का तो दिन ही खराब है,’’ यह बात कहतेकहते वह अपनी गाड़ी में जा कर बैठ गया.

रेहान का गुस्सा देख कर हयात थोड़ी परेशान हो गई और सहमीसहमी सी गाड़ी में बैठ गई. औफिस में पहुंचते ही रेहान ने हैदराबादी कंपनी के साथ पहले किए हुए कौंट्रैक्ट के डिटेल्स मांगे. इस कंपनी के साथ 3 साल पहले एक कौंट्रैक्ट हुआ था लेकिन तब हयात यहां काम नहीं करती थी, इसलिए उसे वह फाइल मिल नहीं रही थी.

‘‘मिस हयात, क्या आप शाम को फाइल देंगी मुझे’’ रेहान केबिन से बाहर आ कर हयात पर चिल्ला रहा था.

‘‘जी…सर, वह फाइल मिल नहीं रही.’’

‘‘जब तक मुझे फाइल नहीं मिलेगी, आप घर नहीं जाएंगी.’’

यह बात सुन कर तो हयात का चेहरा ही उतर गया. वैसे भी औफिस में सब के सामने डांटने से हयात को बहुत ही इनसल्टिंग फील हो रहा था. शाम के 6 बज चुके थे. फाइल मिली नहीं थी.

‘‘सर, फाइल मिल नहीं रही है.’’

रेहान कुछ बोल नहीं रहा था. वह अपने कंप्यूटर पर काम कर रहा था. रेहान की खामोशी हयात को बेचैन कर रही थी. रेहान का रवैया देख कर वह केबिन से निकल आईर् और अपना पर्स उठा कर घर निकल गई. दूसरे दिन हयात रेहान से पहले औफिस में हाजिर थी. हयात को देखते ही रेहान ने कहा, ‘‘मिस हयात, आज आप गोडाउन में जाएं. हमें आज माल भेजना है. आई होप, आप यह काम तो ठीक से कर ही लेंगी.’’

हयात बिना कुछ बोले ही नजर झुका कर चली गई. 3 बजे तक कंटेनर आए ही नहीं. 3 बजने के बाद कंटेनर में कंपनी का माल भरना शुरू हुआ. रात के 8 बजे तक काम चलता रहा. हयात की बस छूट गई. रेहान और उस के पापा कंपनी से बाहर निकल ही रहे थे कि कंटेनर को देख कर वे गोडाउन की तरफ मुड़ गए. हयात एक टेबल पर बैठी थी और रजिस्टर में कुछ लिख रही थी.

तभी मिर्जा साहब के साथ रेहान गोडाउन में आया. हयात को वहां देख कर रेहान को, कुछ गलत हो गया, इस बात का एहसास हुआ.

‘‘हयात, तुम अभी तक घर नहीं गईं,’’ मिर्जा सर ने पूछा.

‘‘नहीं सर, बस अब जा ही रही थी.’’

‘‘चलो, जाने दो, कोई बात नहीं. आओ, हम तुम्हें छोड़ देते हैं.’’

अपने पापा का हयात के प्रति इतना प्यारभरा रवैया देख कर रेहान हैरान हो रहा था, लेकिन वह कुछ बोल भी नहीं रहा था. रेहान का मुंह देख कर हयात ने ‘नहीं सर, मैं चली जाऊंगी’ कह कर उन्हें टाल दिया. हयात बसस्टौप पर खड़ी थी. मिर्जा सर ने फिर से हयात को गाड़ी में बैठने की गुजारिश की. इस बार हयात न नहीं कह सकी.

‘‘हम तुम्हें कहां छोड़ें?’’

‘‘जी, मुझे सिटी हौस्पिटल जाना है.’’

‘‘सिटी हौस्पिटल क्यों? सबकुछ ठीक तो है?’’

‘‘मेरे पापा को कैंसर है, उन्हें वहां ऐडमिट किया है.’’

‘‘फिर तो तुम्हारे पापा से हम भी एक मुलाकात करना चाहेंगे.’’

कुछ ही देर में हयात अपने मिर्जा सर और रेहान के साथ अपने पापा के कमरे में आई.

‘‘आओआओ, मेरी नन्ही सी जान. कितना काम करती हो और आज इतनी देर क्यों कर दी आने में. तुम्हारे उस नए बौस ने आज फिर से तुम्हें परेशान किया क्या?’’

हयात के पापा की यह बात सुन कर तो हयात और रेहान दोनों के ही चेहरे के रंग उड़ गए.

‘‘बस अब्बू, कितना बोलते हैं आप. आज आप से मिलने मेरे कंपनी के बौस आए हैं. ये हैं मिर्जा सर और ये इन के बेटे रेहान सर.’’

‘‘आप से मिल कर बहुत खुशी हुई सुलतान मियां. अब कैसी तबीयत है आप की?’’ मिर्जा सर ने कहा.

‘‘हयात की वजह से मेरी सांस चल रही है. बस, अब जल्दी से किसी अच्छे खानदान में इस का रिश्ता हो जाए तो मैं गहरी नींद सो सकूं.’’

‘‘सुलतान मियां, परेशान न हों. हयात को अपनी बहू बनाना किसी भी खानदान के लिए गर्व की ही बात होगी. अच्छा, अब हम चलते हैं.’’

इस रात के बाद रेहान का हयात के प्रति रवैया थोड़ा सा दोस्ताना हो गया. हयात भी अब रेहान के बारे में सोचती रहती थी. रेहान को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए सजनेसंवरने लगी थी.

‘‘क्या बात है? आज बहुत खूबसूरत लग रही हो,’’ रेहान का छोटा भाई आमिर हयात के सामने आ कर बैठ गया. हयात ने एकबार उस की तरफ देखा और फिर से अपनी फाइल को पढ़ने लगी. आमिर उस की टेबल के सामने वाली चेयर पर बैठ कर उसे घूर रहा था. आखिरकार हयात ने परेशान हो कर फाइल बंद कर आमिर के उठने का इंतजार करने लगी. तभी रेहान आ गया. हयात को आमिर के सामने इस तरह से देख कर रेहान परेशान तो हुआ लेकिन उस ने देख कर भी अनदेखा कर दिया.

दूसरे दिन रेहान ने अपने केबिन में एक मीटिंग रखी थी. उस मीटिंग में आमिर को रेहान के साथ बैठना था. लेकिन वह जानबूझ कर हयात के बाजू में आ कर बैठ गया. हयात को परेशान करने का कोई मौका वह छोड़ नहीं रहा था. लेकिन हयात हर बार उसे देख कर अनदेखा कर देती थी. एक दिन तो हद ही हो गई. आमिर औफिस में ही हयात के रास्ते में खड़ा हो गया.

‘‘रेहान तुम्हें महीने के 30 हजार रुपए देता है. मैं एक रात के दूंगा. अब तो मान जाओ.’’

यह बात सुनते ही हयात ने आमिर के गाल पर एक जोरदार चांटा जड़ दिया. औफिस में सब के सामने हयात इस तरह रिऐक्ट करेगी, इस बात का आमिर को बिलकुल भी अंदाजा नहीं था. हयात ने तमाचा तो लगा दिया लेकिन अब उस की नौकरी चली जाएगी, यह उसे पता था. सबकुछ रेहान के सामने ही हुआ.

बस, आमिर ने ऐसा क्या कर दिया कि हयात ने उसे चाटा मार दिया, यह बात कोई समझ नहीं पाया. हयात और आमिर दोनों ही औफिस से निकल गए.

दूसरे दिन सुबह आमिर ने आते ही रेहान के केबिन में अपना रुख किया.

‘‘भाईजान, मैं इस लड़की को एक दिन भी यहां बरदाश्त नहीं करूंगा. आप अभी और इसी वक्त उसे यहां से निकाल दें.’’

‘‘मुझे क्या करना है, मुझे पता है. अगर गलती तुम्हारी हुई तो मैं तुम्हें भी इस कंपनी से बाहर कर दूंगा. यह बात याद रहे.’’

‘‘उस लड़की के लिए आप मुझे निकालेंगे?’’

‘‘जी, हां.’’

‘‘यह तो हद ही हो गई. ठीक है, फिर मैं ही चला जाता हूं.’’

रेहान कब उसे अंदर बुलाए हयात इस का इंतजार कर रही थी. आखिरकार, रेहान ने उसे बुला ही लिया. रेहान अपने कंप्यूटर पर कुछ देख रहा था. हयात को उस के सामने खड़े हुए 2 मिनट हुए. आखिरकार हयात ने ही बात करना शुरू कर दिया.

‘‘मैं जानती हूं आप ने मुझे यहां बाहर करने के लिए बुलाया है. वैसे भी आप तो मेरे काम से कभी खुश थे ही नहीं. आप का काम तो आसान हो गया. लेकिन मेरी कोई गलती नहीं है. फिर भी आप मुझे निकाल रहे हैं, यह बात याद रहे.’’

रेहान अचानक से खड़ा हो कर उस के करीब आ गया, ‘‘और कुछ?’’

‘‘जी नहीं.’’

‘‘वैसे, आमिर ने किया क्या था?’’

‘‘कह रहे थे एक रात के 30 हजार रुपए देंगे.’’

आमिर की यह सोच जान कर रेहान खुद सदमे में आ गया.

‘‘तो मैं जाऊं?’’

‘‘जी नहीं, आप ने जो किया, बिलकुल ठीक किया. जब भी कोई लड़का अपनी मर्यादा भूल जाए, लड़की की न को समझ न पाए, फिर चाहे वह बौस हो, पिता हो, बौयफ्रैंड हो उस के साथ ऐसा ही होना चाहिए. लड़कियों को छेड़खानी के खिलाफ जरूर आवाज उठानी चाहिए. मिस हयात, आप को नौकरी से नहीं निकाला जा रहा है.’’

‘‘शुक्रिया.’’

अब हयात की जान में जान आ गई. रेहान उस के करीब आ रहा था और हयात पीछेपीछे जा रही थी. हयात कुछ समझ नहीं पा रही थी.

रेहान ने हयात का हाथ अपने हाथ में ले लिया और आंखों में आंखें डालते हुए बोला, ‘‘मिस हयात, आप बहुत सुंदर हैं. जिम्मेदारियां भी अच्छी तरह से संभालती हैं और एक सशक्त महिला हैं. इसलिए मैं तुम्हें अपनी जीवनसाथी बनाना चाहता हूं.’’

हयात कुछ समझ नहीं पा रही थी. क्या बोले, क्या न बोले. बस, शरमा कर हामी भर दी.

Social Story : दूसरी औरत नहीं बनूंगी – क्या था लखिया का मुंह तोड़ जवाब?

Social Story : लखिया ठीक ढंग से खिली भी न थी कि मुरझा गई. उसे क्या पता था कि 2 साल पहले जिस ने अग्नि को साक्षी मान कर जिंदगीभर साथ निभाने का वादा किया था, वह इतनी जल्दी साथ छोड़ देगा. शादी के बाद लखिया कितनी खुश थी. उस का पति कलुआ उसे जीजान से प्यार करता था. वह उसे खुश रखने की पूरी कोशिश करता. वह खुद तो दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करता था, लेकिन लखिया पर खरोंच भी नहीं आने देता था. महल्ले वाले लखिया की एक झलक पाने को तरसते थे.

पर लखिया की यह खुशी ज्यादा टिक न सकी. कलुआ खेत में काम कर रहा था. वहीं उसे जहरीले सांप ने काट लिया, जिस से उस की मौत हो गई. बेचारी लखिया विधवा की जिंदगी जीने को मजबूर हो गई, क्योंकि कलुआ तोहफे के रूप में अपना एक वारिस छोड़ गया था. किसी तरह कर्ज ले कर लखिया ने पति का अंतिम संस्कार तो कर दिया, लेकिन कर्ज चुकाने की बात सोच कर वह सिहर उठती थी. उसे भूख की तड़प का भी एहसास होने लगा था.

जब भूख से बिलखते बच्चे के रोने की आवाज लखिया के कानों से टकराती, तो उस के सीने में हूक सी उठती. पर वह करती भी तो क्या करती? जिस लखिया की एक झलक देखने के लिए महल्ले वाले तरसते थे, वही लखिया अब मजदूरों के झुंड में काम करने लगी थी.

गांव के मनचले लड़के छींटाकशी भी करते थे, लेकिन उन की अनदेखी कर लखिया अपने को कोस कर चुप रह जाती थी. एक दिन गांव के सरपंच ने कहा, ‘‘बेटी लखिया, बीडीओ दफ्तर से कलुआ के मरने पर तुम्हें 10 हजार रुपए मिलेंगे. मैं ने सारा काम करा दिया है. तुम कल बीडीओ साहब से मिल लेना.’’

अगले दिन लखिया ने बीडीओ दफ्तर जा कर बीडीओ साहब को अपना सारा दुखड़ा सुना डाला. बीडीओ साहब ने पहले तो लखिया को ऊपर से नीचे तक घूरा, उस के बाद अपनापन दिखाते हुए उन्होंने खुद ही फार्म भरा. उस पर लखिया के अंगूठे का निशान लगवाया और एक हफ्ते बाद दोबारा मिलने को कहा.

लखिया बहुत खुश थी और मन ही मन सरपंच और बीडीओ साहब को धन्यवाद दे रही थी. एक हफ्ते बाद लखिया फिर बीडीओ दफ्तर पहुंच गई. बीडीओ साहब ने लखिया को अदब से कुरसी पर बैठने को कहा.

लखिया ने शरमाते हुए कहा, ‘‘नहीं साहब, मैं कुरसी पर नहीं बैठूंगी. ऐसे ही ठीक हूं.’’ बीडीओ साहब ने लखिया का हाथ पकड़ कर कुरसी पर बैठाते हुए कहा, ‘‘तुम्हें मालूम नहीं है कि अब सामाजिक न्याय की सरकार चल रही है. अब केवल गरीब ही ‘कुरसी’ पर बैठेंगे. मेरी तरफ देखो न, मैं भी तुम्हारी तरह गरीब ही हूं.’’

कुरसी पर बैठी लखिया के चेहरे पर चमक थी. वह यह सोच रही थी कि आज उसे रुपए मिल जाएंगे. उधर बीडीओ साहब काम में उलझे होने का नाटक करते हुए तिरछी नजरों से लखिया का गठा हुआ बदन देख कर मन ही मन खुश हो रहे थे.

तकरीबन एक घंटे बाद बीडीओ साहब बोले, ‘‘तुम्हारा सब काम हो गया है. बैंक से चैक भी आ गया है, लेकिन यहां का विधायक एक नंबर का घूसखोर है. वह कमीशन मांग रहा था. तुम चिंता मत करो. मैं कल तुम्हारे घर आऊंगा और वहीं पर अकेले में रुपए दे दूंगा.’’ लखिया थोड़ी नाउम्मीद तो जरूर हुई, फिर भी बोली, ‘‘ठीक है साहब, कल जरूर आइएगा.’’

इतना कह कर लखिया मुसकराते हुए बाहर निकल गई. आज लखिया ने अपने घर की अच्छी तरह से साफसफाई कर रखी थी. अपने टूटेफूटे कमरे को भी सलीके से सजा रखा था. वह सोच रही थी कि इतने बड़े हाकिम आज उस के घर आने वाले हैं, इसलिए चायनाश्ते का भी इंतजाम करना जरूरी है.

ठंड का मौसम था. लोग खेतों में काम कर रहे थे. चारों तरफ सन्नाटा था. बीडीओ साहब दोपहर ठीक 12 बजे लखिया के घर पहुंच गए. लखिया ने बड़े अदब से बीडीओ साहब को बैठाया. आज उस ने साफसुथरे कपड़े पहन रखे थे, जिस से वह काफी खूबसूरत लग रही थी.

‘‘आप बैठिए साहब, मैं अभी चाय बना कर लाती हूं,’’ लखिया ने मुसकराते हुए कहा. ‘‘अरे नहीं, चाय की कोई जरूरत नहीं है. मैं अभी खाना खा कर आ रहा हूं,’’ बीडीओ साहब ने कहा.

मना करने के बावजूद लखिया चाय बनाने अंदर चली गई. उधर लखिया को देखते ही बीडीओ साहब अपने होशोहवास खो बैठे थे. अब वे इसी ताक में थे कि कब लखिया को अपनी बांहों में समेट लें. तभी उन्होंने उठ कर कमरे का दरवाजा बंद कर दिया.

जल्दी ही लखिया चाय ले कर आ गई. लेकिन बीडीओ साहब ने चाय का प्याला ले कर मेज पर रख दिया और लखिया को अपनी बांहों में ऐसे जकड़ा कि लाख कोशिशों के बावजूद वह उन की पकड़ से छूट न सकी. बीडीओ साहब ने प्यार से उस के बाल सहलाते हुए कहा, ‘‘देख लखिया, अगर इनकार करेगी, तो बदनामी तेरी ही होगी. लोग यही कहेंगे कि लखिया ने विधवा होने का नाजायज फायदा उठाने के लिए बीडीओ साहब को फंसाया है. अगर चुप रही, तो तुझे रानी बना दूंगा.’’

लेकिन लखिया बिफर गई और बीडीओ साहब के चंगुल से छूटते हुए बोली, ‘‘तुम अपनेआप को समझते क्या हो? मैं 10 हजार रुपए में बिक जाऊंगी? इस से तो अच्छा है कि मैं भीख मांग कर कलुआ की विधवा कहलाना पसंद करूंगी, लेकिन रानी बन कर तुम्हारी रखैल नहीं बनूंगी.’’ लखिया के इस रूखे बरताव से बीडीओ साहब का सारा नशा काफूर हो गया. उन्होंने सोचा भी न था कि लखिया इतना हंगामा खड़ा करेगी. अब वे हाथ जोड़ कर लखिया से चुप होने की प्रार्थना करने लगे.

लखिया चिल्लाचिल्ला कर कहने लगी, ‘‘तुम जल्दी यहां से भाग जाओ, नहीं तो मैं शोर मचा कर पूरे गांव वालों को इकट्ठा कर लूंगी.’’ घबराए बीडीओ साहब ने वहां से भागने में ही अपनी भलाई समझी.

Hindi kahani : बेबसी एक मकान की

Hindi kahani : एक ट्रंक, एक अटैची और एक  बिस्तर, बस, यही संपत्ति समेट कर वे अंधेरी रात में घर छोड़ कर चले गए थे. 6 लोग. वह, उस की पत्नी, 2 अबोध बच्चे और 2 असहाय वृद्ध जिन का बोझ उसे जीवन में पहली बार महसूस हो रहा था.

‘‘अम्मी, हम इस अंधेरे में कहां जा रहे हैं?’’ जाते समय 7 साल की बच्ची ने मां से पूछा था.

‘‘नरक में…बिंदिया, तुम चुपचाप नहीं बैठ सकतीं,’’ मां ने खीझते हुए उत्तर दिया था.

बच्ची का मुंह बंद करने के लिए ये शब्द पर्याप्त थे. वे कहां जा रहे थे उन्हें स्वयं मालूम न था. कांपते हाथों से पत्नी ने मुख्यद्वार पर सांकल चढ़ा दी और फिर कुंडी में ताला लगा कर उस को 2-3 बार झटका दे कर अपनी ओर खींचा. जब ताला खुला नहीं तो उस ने संतुष्ट हो कर गहरी सांस ली कि चलो, अब मकान सुरक्षित है.

धीरेधीरे सारा परिवार न जाने रात के अंधेरे में कहां खो गया. ताला कोई भी तोड़ सकता था. अब वहां कौन किस को रोकने वाला था. ताला स्वयं में सुरक्षा की गारंटी नहीं होता. सुरक्षा करते हैं आसपास के लोग, जो स्वेच्छा से पड़ोसियों के जानमाल की रक्षा करना अपना कर्तव्य समझते हैं. लेकिन यहां पर परिस्थितियों ने ऐसी करवट बदली थी कि पड़ोसियों पर भरोसा करना भी निरर्थक था. उन्हें अपनी जान के लाले पड़े हुए थे, दूसरों की रखवाली क्या करते. अगर वे किसी को ताला तोड़ते देख भी लेते तो उन की भलाई इसी में थी कि वे अपनी खिड़कियां बंद कर के चुपचाप अंदर बैठे रहते जैसे कुछ देखा ही न हो. फिर ऐसा खतरा उठाने से लाभ भी क्या था. तालाब में रह कर मगरमच्छ से बैर.

कई महीने ताला अपने स्थान पर यों ही लटकता रहा. समय बीतने के साथसाथ उस निर्वासित परिवार के वापस आने की आशा धूमिल पड़ती गई. मकान के पास से गुजरने वाला हर व्यक्ति लालची नजरों से ताले को देखता रहता और फिर अपने मन में सोचता कि काश, यह ताला स्वयं ही टूट कर गिर जाता और दोनों कपाट स्वयं ही खुल जाते.

फिर एक दिन धायं की आवाज के साथ लोहा लोहे से टकराया, महीनों से लटके ताले की अंतडि़यां बाहर आ गईं. किसी अज्ञात व्यक्ति ने अमावस के अंधेरे की आड़ ले कर ताला तोड़ दिया. सभी ने राहत की सांस ली. वे आश्वस्त थे कि कम से कम उन में से कोई इस अपराध में शामिल नहीं है.

ताला जिस आदमी ने तोड़ा था वह एक खूंखार आतंकवादी था, जो सुरक्षाकर्मियों से छिपताछिपाता इस घर में घुस गया था. खाली मकान ने रात भर उस को अपने आंचल में पनाह दी थी. अंदर आते ही अपने कंधे से एके-47 राइफल उतार कर कुरसी पर ऐसे फेंक दी जैसे वर्षों की बोझिल और घृणित जिंदगी का बोझ हलका कर रहा हो. उस के बाद उस ने अपने भारीभरकम शरीर को भी उसी घृणा से नरम बिस्तर पर गिरा दिया और कुछ ही मिनटों में अपनी सुधबुध खो बैठा.

आधी रात को वह भूख और प्यास से तड़प कर उठ बैठा. सामने कुरसी पर रखी एके-47 न तो उस की भूख मिटा सकती थी और न ही प्यास. साहस बटोर कर उस ने सिगरेट सुलगाई और उसी धीमी रोशनी के सहारे किचन में जा कर पानी ढूंढ़ने लगा. जैसेतैसे उस ने मटके में से कई माह पहले भरा हुआ पानी निकाल कर गटागट पी लिया. फिर एक के बाद एक कई माचिस की तीलियां जला कर खाने का सामान ढूंढ़ने लगा. किचन पूरी तरह से खाली था. कहीं पर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था.

‘‘कुछ भी नहीं छोड़ा है घर में. सब ले कर भाग गए हैं,’’ उस के मुंह से सहसा निकल पड़ा.

तभी उस की नजर एक छोटी सी अलमारी पर पड़ी जिस में कई चेहरों की बहुत सारी तसवीरें सजी हुई थीं. उन पर चढ़ी हुई फूलमालाएं सूख चुकी थीं. तसवीरों  के सामने एक थाली थी जिस में 5 मोटे और मीठे रोट पड़े थे जो भूखे, खतरनाक आतंकवादी की भूख मिटाने के काम आए. पेट की भूख शांत कर वह निश्ंिचत हो कर सो गया.

सुबह होने से पहले उस ने मकान में रखे हुए ट्रंकों, संदूकों और अलमारियों की तलाशी ली. भारीभरकम सामान उठाना खतरे से खाली न था. वह तो केवल रुपए और गहनों की तलाश में था मगर उस के हाथ कुछ भी न लगा. निराश हो कर उस ने फिर घर वालों को एक मोटी सी गाली दी और अपने मिशन पर चल पड़ा.

दूसरे दिन सुरक्षाबलों को सूचना मिली कि एक खूंखार आतंकवादी ने इस मकान में पनाह ली है. उन का संदेह विश्वास में उस समय बदला जब उन्होंने कुंडे में टूटा हुआ ताला देखा. उन्होंने मकान को घेर लिया, गोलियां चलाईं, गोले बरसाए, आतंकवादियों को बारबार ललकारा और जब कोई जवाबी काररवाई नहीं हुई तो 4 सिपाही अपनी जान पर खेलते हुए अंदर घुस गए. बेबस मकान गोलीबारी से छलनी हो गया मगर बेजबानी के कारण कुछ भी बोल न पाया.

खैर, वहां तो कोई भी न था. सिपाहियों को आश्चर्य भी हुआ और बहुत क्रोध भी आया.

‘‘सर, यहां तो कोई भी नहीं,’’ एक जवान ने सूबेदार को रिपोर्ट दी.

‘‘कहीं छिप गया होगा. पूरा चेक करो. भागने न पाए,’’ सूबेदार कड़क कर बोला.

उन्होंने सारे मकान की तलाशी ली. सभी टं्रकों, संदूकों को उलटापलटा. उन में से साडि़यां ऐसे निकल रही थीं जैसे कटे हुए बकरे के पेट से अंतडि़यां निकल कर बाहर आ रही हों. कमरे में चारों ओर गरम कपड़े, स्वेटर, बच्चों की यूनिफार्म, बरतन और अन्य वस्तुएं जगहजगह बिखर गईं. जब कहीं कुछ न मिला तो क्रोध में आ कर उन्होंने फर्नीचर और टीन के टं्रकों पर ताबड़तोड़ डंडे बरसा कर अपने गुस्से को ठंडा किया और फिर निराश हो कर चले गए.

उस दिन के बाद मकान में घुसने के सारे रास्ते खुल गए. लोग एकदूसरे से नजरें बचा कर एक के बाद एक अंदर घुस जाते और माल लूट कर चले आते. पहली किस्त में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी, फिलिप्स का ट्रांजिस्टर, स्टील के बरतन और कपड़े निकाले गए. फिर फर्नीचर की बारी आई. सोफा, मेज, बेड, अलमारी और कुरसियां. यह लूट का क्रम तब तक चलता रहा जब तक कि सारा घर खाली न हो गया.

उस समय मकान की हालत ऐसी अबला नारी की सी लग रही थी जिस का कई गुंडों ने मिल कर बलात्कार किया हो और फिर खून से लथपथ उस की अधमरी देह को बीच सड़क पर छोड़ कर भाग गए हों.

मकान में अब कुछ भी न बचा था. फिर भी एक पड़ोसी की नजर देवदार की लकड़ी से बनी हुई खिड़कियों और दरवाजों पर पड़ी. रात को बापबेटे इन खिड़कियों और दरवाजों को उखाड़ने में ऐसे लग गए कि किसी को कानोंकान खबर न हुई. सूरज की किरणें निकलने से पहले ही उन्होंने मकान को आग के हवाले कर दिया ताकि लोगों को यह शक भी न हो कि मकान के दरवाजे और खिड़कियां पहले से ही निकाली जा चुकी हैं और शक की सुई सुरक्षाबलों की तरफ इशारा करे क्योंकि मकान की तलाशी उन्होंने ली थी.

आसपास रहने वालों को ज्यों ही पता चला कि मकान जल रहा है और आग की लपटें अनियंत्रित होती जा रही हैं, उन्हें अपनेअपने घरों की चिंता सताने लगी. वे जल्दीजल्दी पानी से भरी बाल्टियां लेले कर अपने घरों से बाहर निकल आए और आग पर पानी छिड़कने लगे. किसी ने फायर ब्रिगेड को भी सूचना दे दी. उन की घबराहट यह सोच कर बढ़ने लगी कि कहीं आग की ये लपटें उन के घरों को राख न कर दें.

मकान जो पहले से ही असहाय और बेबस था, मूक खड़ा घंटों आग के शोलों के साथ जूझता रहा. …शोले, धुआं, कोयला.

दिल फिर भी मानने को तैयार न था कि इस मलबे में अब कुछ भी शेष नहीं बचा है. ‘कुछ न कुछ, कहीं न कहीं जरूर होगा. आखिर इतने बड़े मकान में कहीं कोई चीज तो होगी जो किसी के काम आएगी,’ दिल गवाही देता.

एक अधेड़ उम्र की औरत ने मलबे में धंसी हुई टिन की जली हुई चादरों को देख लिया. उस ने अपने 2 जवान बेटों को आवाज दी. देखते ही देखते उन से सारी चादरें उठवा लीं और स्वयं सजदे में लीन हो गई. टीन की चादरें, गोशाला की मरम्मत के काम आ गईं. एक और पड़ोसी ने बचीखुची ईंटें और पत्थर उठवा कर अपने आंगन में छोटा सा शौचालय बनवा लिया. जो दीवारें आग और पानी के थपेड़ों के बावजूद अब तक खड़ी थीं, हथौड़ों की चोट न सह सकीं और आंख झपकते ही ढेर हो गईं.

कुछ दिन बाद एक गरीब विधवा वहां से गुजरी. उस की निगाहें मलबे के उस ढेर पर पड़ीं. यहांवहां अधजली लकडि़यां और कोयले दिखाई दे रहे थे. उसे बीते हुए वर्ष की सर्दी याद आ गई. सोचते ही सारे बदन में कंपकंपी सी महसूस हुई. उस ने आने वाले जाड़े के लिए अधजली लकडि़यां और कोयले बोरे में भर लिए और वापस अपने रास्ते पर चली गई.

मकान की जगह अब केवल राख का ढेर ही रह गया था. पासपड़ोस के बच्चों ने उसे खेल का मैदान बना लिया. हर रोज स्कूल से वापस आ कर बैट और विकेटें उठाए बच्चे चले आते और फिर क्रिकेट का मैच शुरू हो जाता.

हमेशा की तरह उस दिन भी 4 लड़के आए. एक लड़का विकेटें गाड़ने लगा. विकेट जमीन में घुस नहीं रहे थे. अंदर कोई चीज अटक रही थी. उस ने छेद को और चौड़ा किया. फिर अपना सिर झुका कर अंदर झांका. सूर्य की रोशनी में कोई चमकीली चीज नजर आ रही थी. वह बहुत खुश हुआ. इस बीच शेष तीनों लड़के भी उस के इर्दगिर्द एकत्रित हो गए. उन्होंने भी बारीबारी से छेद के अंदर देखने की कोशिश की और उस चमकती वस्तु को देखते ही उन की आंखों में चमक आ गई और मन में लालच ने पहली अंगड़ाई ली.

‘हो न हो सोने का कोई जेवर होगा.’ हरेक के मन में यही विचार आया लेकिन कोई भी इस बात को जबान पर लाना नहीं चाहता था.

पहले लड़के ने विकेट की नोक से वस्तु के इर्दगिर्द खोदना शुरू कर दिया. दूसरा लड़का दौड़ कर अपने घर से लोहे की कुदालनुमा एक वस्तु ले कर आ गया और उस को पहले लड़के को सौंप दिया.

पहला लड़का अब कुदाल से लगातार खोदने लगा जबकि बाकी तीनों लड़के उत्सुकता और बेचैनी से मन ही मन यह दुआ मांगते रहे कि काश, कोई जेवर निकल आए और उन को खूब सारा पैसा मिल जाए.

खुदाई पूरी हो गई. इस से पहले कि पहला लड़का अपना हाथ सुराख में डालता और गुप्त खजाने को बाहर निकालता, दूसरे लड़के ने कश्मीरी भाषा में आवाज दी :

‘‘अड़स…अड़स…’’ अर्थात मैं भी बराबर का हिस्सेदार हूं.

Hindi Story : सिसकता शैशव – मन के वो अनगिनत सवाल

Hindi Story : जिस उम्र में बच्चे मां की गोद में लोरियां सुनसुन कर मधुर नींद में सोते हैं, कहानीकिस्से सुनते हैं, सुबहशाम पिता के साथ आंखमिचौली खेलते हैं, दादादादी के स्नेह में बड़ी मस्ती से मचलते रहते हैं, उसी नन्हीं सी उम्र में अमान ने जब होश संभाला, तो हमेशा अपने मातापिता को लड़तेझगड़ते हुए ही देखा. वह सदा सहमासहमा रहता, इसलिए खाना खाना बंद कर देता. ऐसे में उसे मार पड़ती. मांबाप दोनों का गुस्सा उसी पर उतरता. जब दादी अमान को बचाने आतीं तो उन्हें भी झिड़क कर भगा दिया जाता. मां डपट कर कहतीं, ‘‘आप हमारे बीच में मत बोला कीजिए, इस से तो बच्चा और भी बिगड़ जाएगा. आप ही के लाड़ ने तो इस का यह हाल किया है.’’

फिर उसे आया के भरोसे छोड़ कर मातापिता अपनेअपने काम पर निकल जाते. अमान अपने को असुरक्षित महसूस करता. मन ही मन वह सुबकता रहता और जब वे सामने रहते तो डराडरा रहता. परंतु उन के जाते ही अमान को चैन की सांस आती, ‘चलो, दिनभर की तो छुट्टी मिली.’

आया घर के कामों में लगी रहती या फिर गपशप मारने बाहर गेट पर जा बैठती. अमान चुपचाप जा कर दादी की गोद में घुस कर बैठ जाता. तब कहीं जा कर उस का धड़कता दिल शांत होता. दादी के साथ उन की थाली में से खाना उसे बहुत भाता था. वह शेर, भालू और राजारानी के किस्से सुनाती रहतीं और वह ढेर सारा खाना खाता चला जाता.बीचबीच में अपनी जान बचाने को आया बुलाती, ‘‘बाबा, तुम्हारा खाना रखा है, खा लो और सो जाओ, नहीं तो मेमसाहब आ कर तुम्हें मारेंगी और मुझे डांटेंगी.’’

अमान को उस की उबली हुई सब्जियां तथा लुगदी जैसे चावल जहर समान लगते. वह आया की बात बिलकुल न सुनता और दादी से लिपट कर सो जाता. परंतु जैसेजैसे शाम निकट आने लगती, उस की घबराहट बढ़ने लगती. वह चुपचाप आया के साथ आ कर अपने कमरे में सहम कर बैठ जाता. घर में घुसते ही मां उसे देख कर जलभुन जातीं, ‘‘अरे, इतना गंदा बैठा है, इतना इस पर खर्च करते हैं, नित नए कपड़े लाला कर देते हैं, पर हमेशा गंदा रहना ही इसे अच्छा लगता है. ऐसे हाल में मेरी सहेलियां इसे देखेंगी तो मेरी तो नाक ही कट जाएग.’’ फिर आया को डांट पड़ती तो वह कहती, ‘‘मैं क्या करूं, अमान मानता ही नहीं.’’

फिर अमान को 2-4 थप्पड़ पड़ जाते. आया गुस्से में उसे घसीट कर स्नानघर ले जाती और गुस्से में नहलातीधुलाती. नन्हा सा अमान भी अब इन सब बातों का अभ्यस्त हो गया था. उस पर अब मारपीट का असर नहीं होता था. वह चुपचाप सब सहता रहता. बातबात में जिद करता, रोता, फिर चुपचाप अपने कमरे में जा कर बैठ जाता क्योंकि बैठक में जाने की उस को इजाजत नहीं थी. पहली बात तो यह थी कि वहां सजावट की इतनी वस्तुएं थीं कि उन के टूटनेफूटने का डर रहता और दूसरे, मेहमान भी आते ही रहते थे. उन के सामने जाने की उसे मनाही थी.

जब मां को पता चलता कि अमान दादी के पास चला गया है तो वे उन के पास लड़ने पहुंच जातीं, ‘‘मांजी, आप के लाड़प्यार ने ही इसे बिगाड़ रखा है, जिद्दी हो गया है, किसी की बात नहीं सुनता. इस का खाना पड़ा रहता है, खाता नहीं. आप इस से दूर ही रहें, तो अच्छा है.’’

सास समझाने की कोशिश करतीं, ‘‘बहू, बच्चे तो फूल होते हैं, इन्हें तो जितने प्यार से सींचोगी उतने ही पनपेंगे, मारनेपीटने से तो इन का विकास ही रुक जाएगा. तुम दिनभर कामकाज में बाहर रहती हो तो मैं ही संभाल लेती हूं. आखिर हमारा ही तो खून है, इकलौता पोता है, हमारा भी तो इस पर कुछ अधिकार है.’’ कभी तो मां चुप  हो जातीं और कभी दादी चुपचाप सब सुन लेतीं. पिताजी रात को देर से लड़खड़ाते हुए घर लौटते और फिर वही पतिपत्नी की झड़प हो जाती. अमान डर के मारे बिस्तर में आंख बंद किए पड़ा रहता कि कहीं मातापिता के गुस्से की चपेट में वह भी न आ जाए. उस का मन होता कि मातापिता से कहे कि वे दोनों प्यार से रहें और उसे भी खूब प्यार करें तो कितना मजा आए. वह हमेशा लाड़प्यार को तरसता रहता.

इसी प्रकार एक वर्र्ष बीत गया और अमान का स्कूल में ऐडमिशन करा दिया गया. पहले तो वह स्कूल के नाम से ही बहुत डरा, मानो किसी जेलखाने में पकड़ कर ले जाया जा रहा हो. परंतु 1-2 दिन जाने के बाद ही उसे वहां बहुत आनंद आने लगा. घर से तैयार कर, टिफिन ले कर, पिताजी उसे स्कूटर से स्कूल छोड़ने जाते. यह अमान के लिए नया अनुभव था. स्कूल में उसे हमउम्र बच्चों के साथ खेलने में आनंद आता. क्लास में तरहतरह के खिलौने खेलने को मिलते. टीचर भी कविता, गाना सिखातीं, उस में भी अमान को आनंद आने लगा. दोपहर को आया लेने आ जाती और उस के मचलने पर टौफी, बिस्कुट इत्यादि दिला देती. घर जा कर खूब भूख लगती तो दादी के हाथ से खाना खा कर सो जाता. दिन आराम से कटने लगे. परंतु मातापिता की लड़ाई, मारपीट बढ़ने लगी, एक दिन रात में उन की खूब जोर से लड़ाई होती रही. जब सुबह अमान उठा तो उसे आया से पता चला कि मां नहीं हैं, आधी रात में ही घर छोड़ कर कहीं चली गई हैं.

पहले तो अमान ने राहत सी महसूस की कि चलो, रोज की मारपीट  और उन के कड़े अनुशासन से तो छुट्टी मिली, परंतु फिर उसे मां की याद आने लगी और उस ने रोना शुरू कर दिया. तभी पिताजी उठे और प्यार से उसे गोदी में बैठा कर धीरेधीरे फुसलाने लगे, ‘‘हम अपने बेटे को चिडि़याघर घुमाने ले जाएंगे, खूब सारी टौफी, आइसक्रीम और खिलौने दिलाएंगे.’’  पिता की कमजोरी का लाभ उठा कर अमान ने और जोरों से ‘मां, मां,’ कह कर रोना शुरू कर दिया. उसे खातिर करवाने में बहुत मजा आ रहा था, सब उसे प्यार से समझाबुझा रहे थे. तब पिताजी उसे दादी के पास ले गए. बोले, ‘‘मांजी, अब इस बिन मां के बच्चे को आप ही संभालिए. सुबहशाम तो मैं घर में रहूंगा ही, दिन में आया आप की मदद करेगी.’’ अंधे को क्या चाहिए, दो आंखें, दादी, पोता दोनों प्रसन्न हो गए.

नए प्रबंध से अमान बहुत ही खुश था. वह खूब खेलता, खाता, मस्ती करता, कोई बोलने, टोकने वाला तो था नहीं, पिताजी रोज नएनए खिलौने ला कर देते, कभीकभी छुट्टी के दिन घुमानेफिराने भी ले जाते. अब कोई उसे डांटता भी नहीं था. स्कूल में एक दिन छुट्टी के समय उस की मां आ गईं. उन्होंने अमान को बहुत प्यार किया और बोलीं, ‘‘बेटा, आज तेरा जन्मदिन है.’’ फिर प्रिंसिपल से इजाजत ले कर उसे अपने साथ घुमाने ले गईं. उसे आइसक्रीम और केक खिलाया, टैडीबियर खिलौना भी दिया. फिर घर के बाहर छोड़ गईं. जब अमान दोनों हाथभरे हुए हंसताकूदता घर में घुसा तो वहां कुहराम मचा हुआ था. आया को खूब डांट पड़ रही थी. पिताजी भी औफिस से आ गए थे, पुलिस में जाने की बात हो रही थी. यह सब देख अमान एकदम डर गया कि क्या हो गया.

पिताजी ने गुस्से में आगे बढ़ कर उसे 2-4 थप्पड़ जड़ दिए और गरज कर बोले, ‘‘बोल बदमाश, कहां गया था? बिना हम से पूछे उस डायन के साथ क्यों गया? वह ले कर तुझे उड़ जाती तो क्या होता?’’ दादी ने उसे छुड़ाया और गोद में छिपा लिया. हाथ का सारा सामान गिर कर बिखर गया. जब खिलौना उठाने को वह बढ़ा तो पिता फिर गरजे, ‘‘फेंक दो कूड़े में सब सामान. खबरदार, जो इसे हाथ लगाया तो…’’  वह भौचक्का सा खड़ा था. उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर हुआ क्या? क्यों पिताजी इतने नाराज हैं?

2 दिनों बाद दादी ने रोतरोते उस का सामान और नए कपड़े अटैची में रखे. अमान ने सुना कि पिताजी के साथ वह दार्जिलिंग जा रहा है. वह रेल में बैठ कर घूमने जा रहा था, इसलिए खूब खुश था. उस ने दादी को समझाया, ‘‘क्यों रोती हो, घूमने ही तो जा रहा हूं. 3-4 दिनों में लौट आऊंगा.’’ दार्जिलिंग पहुंच कर अमान के पिता अपने मित्र रमेश के घर गए. दूसरे दिन उन्हीं के साथ वे एक स्कूल में गए. वहां अमान से कुछ सवाल पूछे गए और टैस्ट लिया गया. वह सब तो उसे आता ही था, झटझट सब बता दिया. तब वहां के एक रोबीले अंगरेज ने उस की पीठ थपथपाई और कहा, ‘‘बहुत अच्छे.’’ और टौफी खाने को दी. परंतु अमान को वहां कुछ अच्छा नहीं लग रहा था. वह घर चलने की जिद करने लगा. उसे महसूस हुआ कि यहां जरूर कुछ साजिश चल रही है. उस के पिताजी कितनी देर तक न जाने क्याक्या कागजों पर लिखते रहे, फिर उन्होंने ढेर सारे रुपए निकाल कर दिए. तब एक व्यक्ति ने उन्हें स्कूल और होस्टल घुमा कर दिखाया. पर अमान का दिल वहां घबरा रहा था. उस का मन आशंकित हो उठा कि जरूर कोई गड़बड़ है. उस ने अपने पिता का हाथ जोर से पकड़ लिया और घर चलने के लिए रोने लगा.

शाम को पिताजी उसे माल रोड पर घुमाने ले गए. छोटे घोड़े पर चढ़ा कर घुमाया और बहुत प्यार किया, फिर वहीं बैंच पर बैठ कर उसे खूब समझाते रहे, ‘‘बेटा, तुम्हारी मां वही कहानी वाली राक्षसी है जो बच्चों का खून पी जाती है, हाथपैर तोड़ कर मार डालती है, इसलिए तो हम लोगों ने उसे घर से निकाल दिया है. उस दिन वह स्कूल से जब तुम्हें उड़ा कर ले गई थी, तब हम सब परेशान हो गए थे. इसलिए वह यदि आए भी तो कभी भूल कर भी उस के साथ मत जाना. ऊपर से देखने में वह सुंदर लगती है, पर अकेले में राक्षसी बन जाती है.’’ अमान डर से कांपने लगा. बोला, ‘‘पिताजी, मैं अब कभी उन के साथ नहीं जाऊंगा.’’ दूसरे दिन सवेरे 8 बजे ही पिताजी उसे बड़े से गेट वाले जेलखाने जैसे होस्टल में छोड़ कर चले गए. वह रोता, चिल्लाता हुआ उन के पीछेपीछे भागा. परंतु एक मोटे दरबान ने उसे जोर से पकड़ लिया और अंदर खींच कर ले गया. वहां एक बूढ़ी औरत बैठी थी. उस ने उसे गोदी में बैठा कर प्यार से चुप कराया, बहुत सारे बच्चों को बुला कर मिलाया, ‘‘देखो, तुम्हारे इतने सारे साथी हैं. इन के साथ रहो, अब इसी को अपना घर समझो, मातापिता नहीं हैं तो क्या हुआ, हम यहां तुम्हारी देखभाल करने को हैं न.’’ अमान चुप हो गया. उस का दिल जोरजोर से धड़क रहा था. फिर उसे उस का बिस्तर दिखाया गया, सारा सामान अटैची से निकाल कर एक छोटी सी अलमारी में रख दिया गया. उसी कमरे में और बहुत सारे बैड पासपास लगे थे. बहुत सारे उसी की उम्र के बच्चे स्कूल जाने को तैयार हो रहे थे. उसे भी एक आया ने मदद कर तैयार कर दिया.

फिर घंटी बजी तो सभी बच्चे एक तरफ जाने लगे. एक बच्चे ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘चलो, नाश्ते की घंटी बजी है.’’ अमान यंत्रवत चला गया, पर उस से एक कौर भी न निगला गया. उसे दादी का प्यार से कहानी सुनाना, खाना खिलाना याद आ रहा था. उसे पिता से घृणा हो गई क्योंकि वे उसे जबरदस्ती, धोखे से यहां छोड़ कर चले गए. वह सोचने लगा कि कोई उसे प्यार नहीं करता. दादी ने भी न तो रोका और न ही पिताजी को समझाया. वह ऊपर से मशीन की तरह सब काम समय से कर रहा था पर उस के दिल पर तो मानो पहाड़ जैसा बोझ पड़ा हुआ था. लाचार था वह, कई दिनों तक गुमसुम रहा. चुपचाप रात में सुबकता रहा. फिर धीरेधीरे इस जीवन की आदत सी पड़ गई. कई बच्चों से जानपहचान और कइयों से दोस्ती भी हो गई. वह भी उन्हीं की तरह खाने और पढ़ने लग गया. धीरेधीरे उसे वहां अच्छा लगने लगा. वह कुछ अधिक समझदार भी होने लगा. इसी प्रकार 1 वर्ष बीत गया. वह अब घर को भूलने सा लगा था. पिता की याद भी धुंधली पड़ रही थी कि एक दिन अचानक ही पिं्रसिपल साहब ने उसे अपने औफिस में बुलाया. वहां 2 पुलिस वाले बैठे थे, एक महिला पुलिस वाली तथा दूसरा बड़ी मूंछों वाला मोटा सा पुलिस का आदमी. उन्हें देखते ही अमान भय से कांपने लगा कि उस ने तो कोई चोरी नहीं की, फिर क्यों पुलिस पकड़ने आ गई है.

वह वहां से भागने ही जा रहा था कि प्रिंसिपल साहब ने प्यार से उस की पीठ सहलाई और कहा, ‘‘बेटा, डरो नहीं, ये लोग तुम्हें तुम्हारे मातापिता के  पास ले जाएंगे. तुम्हें कुछ भी नुकसान नहीं पहुंचाएंगे. इन के पास कोर्ट का और्डर है. हम अब कुछ भी नहीं कर सकते, तुम्हें जाना ही पड़ेगा.’’ अमान ने रोतेरोते कहा, ‘‘मेरे पिताजी को बुलाइए, मैं इन के साथ नहीं जाऊंगा.’’ तब उस पुलिस वाली महिला ने उसे प्यार से गोदी में बैठा कर कहा, ‘‘बेटा, तुम्हारे पिताजी की तबीयत ठीक नहीं है, तभी तो उन्होंने हमें लेने भेजा है. तुम बिलकुल भी डरो मत, हम तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे. पर यदि नहीं जाओगे तो हम तुम्हें जबरदस्ती ले जाएंगे.’’ उस ने बचाव के लिए चारों तरफ देखा, पर कहीं से सहारा न पा, चुपचाप उन के साथ जाने को तैयार हो गया. होस्टल की आंटी उस का सामान ले आई थी.  कलकत्ता पहुंच कर पुलिस वाली आंटी अमान के बारबार कहने पर भी उसे पिता और दादी के पास नहीं ले गई. उस का मन भयभीत था कि क्या मामला है? रात को उन्होंने अपने घर पर ही उसे प्यार से रखा. दूसरे दिन पुलिस की जीप में बैठा कर एक बड़ी सी इमारत, जिस को लोग कोर्ट कह रहे थे, वहां ले गई. वहां उस के मातापिता दोनों दूरदूर बैठे थे और काले चोगे पहने बहुत से आदमी चारों तरफ घूम रहे थे. अमान सहमासहमा बैठा रहा. वह कुछ भी समझ नहीं पा रहा था कि यह सब क्या हो रहा है? फिर ऊंची कुरसी पर सफेद बालों वाले बड़ी उम्र के अंकल, जिन को लोग जज कह रहे थे, ने रोबदार आवाज में हुक्म दिया, ‘‘इस बच्चे यानी अमान को इस की मां को सौंप दिया जाए.’’

पुलिस वाली आंटी, जो उसे दार्जिलिंग से साथ लाई थी, उस का हाथ पकड़ कर ले गई और उसे मां को दे दिया. मां ने तुरंत उसे गोद में उठाया और प्यार करने लगीं. पहले तो उन का प्यारभरा स्पर्श अमान को बहुत ही भाया. परंतु तुरंत ही उसे पिता की राक्षसी वाली बात याद आ गई. तब उसे सचमुच ही लगने लगा कि मां जरूर ही एक राक्षसी है, अभी तो चख रही है, फिर अकेले में उसे खा जाएगी. वह घबरा कर चीखचीख कर रोने लगा, ‘‘मैं इस के साथ नहीं रहूंगा, यह मुझे मार डालेगी. मुझे पिताजी और दादी के साथ अपने घर जाना है. छोड़ दो मुझे, छोड़ो.’’ यह कहतेकहते डर से वह बेहोश हो गया. जब उस के पिता उसे लेने को आगे बढ़े तो उन्हें पुलिस ने रोक दिया, ‘‘कोर्ट के फैसले के विरुद्ध आप बच्चे को नहीं ले जा सकते, इसे हाथ भी न लगाएं.’’तब पिता ने गरज कर कहा, ‘‘यह अन्याय है, बच्चे पर अत्याचार है, आप लोग देख रहे हैं कि बच्चा अपनी मां के पास नहीं जाना चाहता. रोरो कर बेचारा अचेत हो गया है. आप लोग ऐसे नहीं मानेंगे तो मैं उच्च न्यायालय में याचिका दायर करूंगा. बच्चा मुझे ही मिलना चाहिए.’’ जज साहब ने नया फैसला सुनाया, ‘‘जब तक उच्च न्यायालय का फैसला नहीं होता है, तब तक बच्चा पुलिस की संरक्षण में ही रहेगा.’’

4 वर्ष का बेचारा अमान अकेला घर वालों से दूर अलग एक नए वातावरण में चारों तरफ पुलिस वालों के बीच भयभीत सहमासहमा रह रहा था. उसे वहां किसी प्रकार की तकलीफ नहीं थी. खाने को मिलता, पर कुछ खाया ही न जाता. टीवी, जिसे देखने को पहले वह सदा तरसता रहता था, वहां देखने को मिलता, पर कुछ भी देखने का जी ही न चाहता. उसे दुनिया में सब से घृणा हो गई. वह जीना नहीं चाहता था. उस ने कई बार वहां से भागने का प्रयत्न भी किया, पर बारबार पकड़ लिया गया. उस का चेहरा मुरझाता जा रहा था, हालत दयनीय हो गई थी. पर अब कुछकुछ बातें उस की समझ में आने लगी थीं. करीब महीनेभर बाद अमान को नहलाधुला कर अच्छे कपड़े पहना कर जीप में बैठा कर एक नए बड़े न्यायालय में ले जाया गया. वहां उस के मातापिता पहले की तरह ही दूरदूर बैठे हुए थे. चारों तरफ पुलिस वाले और काले कोट वाले वकील घूम रहे थे. पहले के समान ही ऊंची कुरसी पर जज साहब बैठे हुए थे.

पहले पिता के वकील ने खड़े हो कर लंबा किस्सा सुनाया. अमान के मातापिता, जो अलगअलग कठघरे में खड़े थे, से भी बहुत सारे सवाल पूछे. फिर दूसरे वकील ने भी, जो मां की तरफ से बहस कर रहा था, उस का नाम ‘अमान, अमान’ लेले कर उसे मां को देने की बात कही. अमान को समझ ही नहीं आ रहा था कि मातापिता के झगड़े में उस का क्या दोष है. आखिर में जज साहब ने अमान को कठघरे में बुलाया. वह भयभीत था कि न जाने अब उस के साथ क्या होने वाला है. उसे भी मातापिता की तरह गीता छू कर कसम खानी पड़ी कि वह सच बोलेगा, सच के सिवा कुछ भी नहीं बोलेगा. जज साहब ने उस से प्यार से पूछा, ‘‘बेटा, सोचसमझ कर सचसच बताना कि तुम किस के पास रहना चाहते हो… अपने पिता के या मां?’’ सब की नजरें उस के मुख पर ही लगी थीं. पर वह चुपचाप सोच रहा था. उस ने किसी की तरफ नहीं देखा, सिर झुकाए खड़ा रहा. तब यही प्रश्न 2-3 बार उस से पूछा गया तो उस ने रोष से चिल्ला कर उत्तर दिया, ‘‘मुझे किसी के भी साथ नहीं रहना, कोई मेरा अपना नहीं है, मुझे अकेला छोड़ दो, मुझे सब से नफरत है.’’

Love Story : स्टैच्यू – उन दो दीवाने को देखकर लोगों को क्या याद आया

Love Story : थौमस रावेली और टियारा, लंदन के बकिंघम पैलेस के एरिया में एकदूसरे को आलिंगन में भर कर ‘दो दीवाने शहर में…’ वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे थे. कभीकभी ‘किस’ का दौर भी होता. चलतेचलते रुक जाते और रोमांस की नई पराकाष्ठा पार कर जाते. इस जोड़े को मैं ने हैरी स्ट्रीट मैट्रो स्टेशन से नोटिस में लेना शुरू किया था. वे दोनों मैट्रो की परपल लाइन क्रौस कर बाहर निकले थे.

उस शहर में नई होने के कारण बकिंघम पैलेस घूमने जाने के लिए उसी मैट्रो की परपल लाइन क्रौस करने के दौरान उन से ही मैं ने रास्ता पूछा था. उन्होंने बताया था कि इस के लिए ग्रीन पार्क स्टेशन उतरना ठीक होगा. और कहा कि वे लोग भी उसी पैलेस को देखने जा रहे हैं.

सो, इधरउधर पूछने से छुटकारा मिल गया और एकटक उन के पीछेपीछे चलती चल रही थी. कहां टिकट लेना, किस गेट से ऐंट्री करना, किस लेन की ओर चलनामुड़ना सबकुछ सहज हो गया. एकदम फिट कपल, अंगरेजी मूवी ‘टाईटैनिक’ के हीरोहीरोइन के जोड़े जैसा लग रहा था.

18-20 साल का यह जोड़ा बीचबीच में कुछ टिकट आदि के दाम के बारे में भी पूछने पर बिलकुल भी खफा नहीं हो रहा था. बल्कि मेरे ‘बैग टू बी एक्सक्यूस्ड’ कहने पर उलटे कह देते ‘इट्स अवर प्लेजर’ और विस्तार से जानकारी देते. वहां की संस्कृति के अनुरूप, मेरे पूछने पर उन के रोमांस में कोई कमी नहीं आती. मानो प्यार किया तो डरना क्या.

उसी एरिया के बीचोंबीच एक शाही गार्डन था. गार्डन के बीचोंबीच मैटल की बड़ी सी सोल्जर यूनिफौर्म में एक आदमकद की मूर्ति थी. एक साइड म्यूज गैलरी थी जहां किस्मकिस्म के घोड़े थे. उन्हें विभिन्न राजा और रानियों के शौक के हिसाब से सजासंवार कर रखा गया था. एक तरफ बड़ा सा ग्रीन पार्क था. बकिंघम पैलेस का सोने का बड़ा सा शानदार शाही गेट था, जहां भीड़ देखने के लिए जमा थी. सुबहसुबह महारानी के शाही सैनिकों की घोड़ों की सवारी देखने के लिए भी रास्ते के दोनों तरफ पब्लिक का जमावड़ा बच्चेबड़ों सहित अपना स्थान निश्चित कर के कतारबद्ध था.

इन विभिन्न जमावड़ों पर भी कितनी बार मैं इस जोड़े से टकराई और हर बार दूर से हम एकदूसरे को देख कर स्माइल जरूर पास करते थे. लड़का तो कुछ ज्यादा ही सोशल लग रहा था. उस की दरियादिली तब पता चली जब उस ने मुझे अपने वैफर्स भी औफर किए थे. न जाने क्यों इतनी भीड़ में वह कपल मुझे आकर्षित करता रहा. उन के प्रति मेरी जिज्ञासा बढ़ने लगी. उन लोगों ने बीचबीच में 1-2 बार अपना कैमरा मुझे दिया ताकि उन की फोटो कैमरे में कैप्चर हो सके. मैं भी उसे अपना कैमरा देती रही ताकि मेरे भी स्नैप्स उन्हें में कैद हो सकें.

सुबह 9 बजे फ्रिट्सजय स्क्वायर से, बीबीसी टावर के ठीक सामने बने वाईडब्लूसीएम के होस्टल से निकली थी. मशहूर औक्सफोर्ड शौपिंग स्ट्रीट से घूमतीघूमती हैरी स्ट्रीट पहुंची थी, जहां से बकिंघम पैलेस के लिए मैट्रो ली थी. तब जा कर 10 बजे बकिंघम पैलेस पहुंची थी. मैट्रो टिकट लेने के दौरान ही दोनों का नाम पूछा था. इस बार इंगलैंड की रानी को अधिक वित्त जुटाने के मद्देनजर पैलेस को जनता के लिए भारी टिकट पर कुछ दिनों के लिए खोला गया था. इसलिए हजारों की भीड़ उस एरिया में एकत्रित थी. पैलेस के टिकट खरीदने की क्यू में भी वह कपल मेरे आगे खड़ा था. अथाह भीड़ के बीच भी रौयल सिस्टम सिस्टमैटिक था, जिस कारण उन से मित्रता बढ़ने लगी थी. वही समझा रहे थे कि पहले क्वीन गैलरी देखेंगे फिर म्यूज हाउस यानी अस्तबल जाएंगे.

टिकट खरीदने के बाद सीधे क्वीन गैलरी गए जहां उन्होंने कुछ वौलपेपर्स खरीदे. मैं ने एक एशियन सिविलाइजेशन टाइम का सिक्का, एक गोल्ड चेन खरीदी.
अब बकिंघम पैलेस के गेट पर पहुंचने पर उन की देखादेखी जब मैं ने अपना टिकट फोल्डर खोल कर देखा तो हमारे बकिंघम पैलेस में प्रवेश का टाइम रौयल पुलिस ने ढाई बजे तक अंकित कर रखा था. अभी दोपहर का 1 बजा था. बकिंघम पैलेस के पास कई गोल्ड स्टैच्यूस, पानी के फौआरे, पार्क आदि देखने लायक स्पौट्स थे. पास ही में गोल्डन लौयन (शेर) वाली सफेद दूधिया बिल्ंिडग के सफेद संगमरमरी फर्श पर कोई लेटा था तो कोई समूचे नजारे को निहार कर अपनी आंखें सेंक रहा था. कोई टूरिस्ट फोटो क्लिक कर रहा था तो कोई वीडियो शूट कर रहा था. उस समय वौकमैन ज्यादा प्रचलित था सो हर एक के पास वौकमैन ही था. टियारा की जीन्सपैंट की जेब में वौकमैन था और थौमस अपने दाहिने हाथ से उस का कंधा थामे धीरेधीरे चहलकदमी कर रहा था.

बकिंघम पैलेस स्क्वायर से 50 गज की दूरी पर तेज गति से पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बसें, टैक्सियां, रंगबिरंगी प्राइवेट कारें चल रही थीं. सड़क के दोनों ओर पगडंडियों पर जो हजारों की भीड़ चल रही थी वह आकाश से बरसती बूंदाबांदी से अपनी रफ्तार तेज कर उस दूधिया इमारत में कैसे भी घुस कर बारिश से बचना चाहती थी. सुबह से चलतेचलते पैरों ने पहले ही जवाब दे दिया था पर फिर भी चल रहे थे. चूंकि सब बकिंघम पैलेस देखने वाले थे इसलिए 2.30 बजे टाइम वाले सभी टूरिस्ट वहीं इमारत में पसरने लगे थे. कुछ दूरी पर टियारा और थौमस भी लेटेलेटे गप करते रहे.

पता नहीं क्यों जिज्ञासा हुई के ये दोनों मैरिड हैं या अनमैरिड. अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए जैसे ही हम लोग उठ कर चलने लगे, मैं ने कौंप्लीमैंट दिया, ‘‘क्यूट कपल.’’
दोनों एकसाथ बोले, ‘‘थैंक्स अ लोट.’’
मैं ने कहा, ‘‘ह्वेन आर यू गोइंग टू गैट मैरिड?’’
उन का उत्तर ही स्वयं सवाल था, ‘‘आर वी नौट लुकिंग मैरिड?’’

मैं सोच में पड़ गई कि हमारे यहां तो शादीशुदा कपल को पहचानना कठिन नहीं होता पर इंगलैंड में ऐसे कपल को पहचानना तो सच में मुश्किल है. यहां न विवाह की अनिवार्यताएं होती हैं और न ही लिवइन रिलेशनशिप को बुरा माना जाता है. टियारा ने बताया कि उस की मां इटैलियन हैं और पिता ब्रिटिश हैं. दोनों डाक्टर हैं और एक मैडिकल कौन्फ्रैंस में मिले. यह मुलाकात दोनों के लिए अच्छी रही. अब वे अच्छे दोस्त बन गए. फिर धीरेधीरे वे करीब आ गए. दोनों की कमाई भी अच्छी थी. इसलिए साथसाथ रहने लगे पर अब तक शादी नहीं की. लेकिन हम दोनों की तो उतनी कमाई नहीं है. टियारा ने वाक्य पूरा करने से पहले सिगरेट का कश लगाना शुरू किया. थौमस को सिगरेट की आदत नहीं थी.

मैं ने कहा, ‘‘इस का मतलब तुम लोग बिना शादी के साथ जीवन बिताओगे?’’
थौमस ने कहा, ‘‘नहीं, अभीअभी हमारा विवाह बड़ी मुश्किल से हुआ है,’’ आगे कहने लगा, ‘‘टियारा का बाप तो सख्त मिलिट्री रूल वाला मार्शल है. कहता था ‘तुम जब तक अच्छा कमा कर अच्छा घर, फर्नीचर का जुगाड़ नहीं कर लेते तब तक एकसाथ नहीं रह सकते.’ सो मैं ने इतना कमाने और टियारा का जीवनसाथी बनने का सपना देखना ही बंद कर दिया था. लेकिन बहुत उतारचढ़ाव के बाद मैं इस के लायक बना और हमारा विवाह हुआ.’’

एक बार बातों ही बातों में पता चला कि थौमस एक साधारण ट्रैवलिंग एजेंट है उस की उतनी कमाई नहीं थी कि घर खरीद कर ऐशोआराम से रह सके. ऊपर से उस की मानवीय संवेदनाएं भी आधी कमाई की हिस्सेदार थीं. जितना कमाता  उस से ज्यादा दूसरों की मदद में लगा देता. उस से किसी का दुख देखा नहीं जाता. उस की जेब में जब भी पैसा होता और सामने वाला भूखा होता तो पहले उस की मदद करता और खुद पैदल भी घर चल पड़ता. बीचबीच में टियारा कमैंट्स कर के ऐसी बातें कह रही थी.

मेरी जिज्ञासा बढ़ रही थी कि थौमस ने टियारा को जीवनसाथी बनाने का सपना देखना बंद कर दिया था फिर उस ने ऐसा क्या किया कि दोनों आज दो जिस्म एक जान बन गए. हालांकि शादी से पहले टियारा उसे प्यार से, डांट से, रूठ कर सचेत करती कि ये सब दरियादिली वाली बातें, पैसा हो तभी किया करो, पर थौमस इन बातों को कहां सुनने वाला था. उस का सिद्धांत था, सुनो सब की करो मन की. जब उस ने अपनी कथा बताई तो मैं अवाक् हो कर उसे एकटक निहारती रही.

उस ने बताया कि एक बार टियारा से इसी बात से डांट खा कर तनावग्रस्त वातावरण को हलका करने के लिए वह चित्रपेंटिंग बनाने वाले अपने एक दोस्त के पास गया जिसे वह पिकासो कहता था. वह अकसर किसी न किसी महंगी पेंटिंग पर काम करता रहता था. उस दिन भी वह एक पेंटिंग बनाने में मशगूल था. पिकासो को दोस्त की आने की आहट तो हुई पर उस के हावभाव देखने की फुरसत नहीं थी क्योंकि ऐसा करने पर उस की पेंटिंग बिगड़ सकती थी. उस समय वह सामने बैठे एक स्टैच्यू बने फकीर की पेंटिंग बना रहा था. फकीर वाकई फटेहाल था. उस के कपड़ों पर अनगिनत पैबंद लगे थे,  जूते फटे, बाल बिखरे हुए थे, चेहरे पर अनेक चोटों के निशान थे और उस के पैबंद वाले चोगे की एक बांह नदारद थी.

उस ने पिकासो से पूछा, ‘‘कितने बजे से पेंटिंग बना रहा है?’’
‘‘सुबह 7 बजे से,’’ पिकासो ने जवाब दिया.
‘‘मालूम है अभी कितना टाइम हुआ है?’’ थौमस का अगला तीर था.
‘‘शाम के 5 बजे होंगे.’’
‘‘कितना कमाएगा इस पेंटिंग के बन जाने पर?’’ उस ने पूछा.
‘‘कोई 1 हजार पौंड.’’
‘‘और इस फकीर को कितना देगा?’’
‘‘50 पौंड.’’
‘‘कब देगा?’’
‘‘पेंटिंग बिक्री हो जाने के बाद.’’

थौमस को बहुत बुरा लगा कि यह फकीर सुबह से बिना खाएपिए, बिना हिलेडुले स्टैच्यू बना बैठा है और इसे मिलेंगे सिर्फ 50 पौंड जबकि पिकासो को मिलेंगे 1 हजार पौंड. उसे टियारा के बाप की याद आई कि अमीर लोग कैसे अपनी शर्तों पर गरीबों को अपने इशारों पर नचाते हैं. उसे उस फकीर पर बड़ी दया आ रही थी पर वह अपने दोस्त की कमाई में कुछ भी नहीं कर सकता था. वह बीचबीच में अपने दोस्त को जरूर बोल रहा था, ‘‘इट इज नौट फेयर.’’

अभी पिकासो ब्रश और रंगों का कौंबिनेशन बना ही रहा था कि घर की कौल बैल बजी. ट्रिन…ट्रिन…ट्रिन…

पिकासो ‘‘जस्ट अ मिनट’’ कह कर लिविंगरूम को छोड़ कर ड्राइंगरूम में आया और दरवाजे की नौब घुमा कर दरवाजा खोला. पता लगा कि कोई क्लाइंट और्डर के लिए आया है. उन की बातें प्रोफैशनल होने के कारण 20-25 मिनट तक चलती रहीं.

मौडल बना फकीर थौमस की बातों से काफी प्रभावित सा लगा. उस ने थौमस का ठौरठिकाना पूछा कि कभी जरूरत होने पर क्या वह उस के पास आ सकता है? थौमस ने उसे अपना विजिटिंग कार्ड दिया और कहा, ‘‘आई शैल बी हैप्पी टू डू समथिंग फौर यू.’’

उस ने जेब में हाथ डाला तो 5 पौंड का नोट निकला. उस ने वह नोट उस फकीर को दे कर गुडबाय कर के उस से अलविदा ली.
टियारा ने घर देर से आने का कारण पूछा तो उस ने सारी बात बता कर कहा कि पैसे कम पड़ गए सो एक स्टेशन पैदल चल कर आने में देर तो लगेगी. इस पर वह नाराज हुई कि ऐसे तो उस के पापा उन की शादी ही नहीं होने देंगे. पर अगले ही पल थौमस की मासूम मुसकान के सामने टियारा के सब बाण बेकार जाते.

बैचलर थौमस के कोई अधिक ठिकाने तो थे नहीं, सो ऐसे ही एक दिन फिर पिकासो के पास गया. इधरउधर की बातों के बाद अचानक पिकासो को एक बात याद आई और कह बैठा, ‘‘अरे थौमस, उस दिन तुम ने उस फकीर पर बड़ा जादू कर दिया?’’
‘‘क्यों, क्या हुआ?’’ थौमस ने अर्थभरी भावमुद्रा में पूछा.
‘‘रात को जातेजाते वह केवल तुम्हारी ही बातें कर रहा था. तुम्हारी कहानी सुनने को बेकरार था. तुम्हारी कहानी सुन कर वह दुखी हो गया और कहने लगा, बहुत ही भला इंसान है थौमस. तुम ने उस को क्या दिया? जो उठतेबैठते तुम्हारा ही गुणगान कर रहा था.’’
‘‘धत, मेरे पास रहता ही क्या है? मात्र 5 पौंड थे, सो दे दिए ताकि जा कर कुछ खा ले.’’
‘‘सच?’’ पिकासो ने आश्चर्यचकित हो कर कहा.
थौमस ने विस्मय से पूछा, ‘‘बात क्या है, मेरे दोस्त?’’
पिकासो बोला, ‘‘तुम सच में बहुत बड़े बुद्धू हो. अरे तुम यूरोप के सब से बड़े नामी रईस गैलीलियो को नहीं जानते? क्या तुम ने उस का नाम भी नहीं सुना? अरे, वह चाहे तो पूरा यूरोप खरीद सकता है. और तुम ने उस को 5 पौंड दिए?’’

थौमस स्तब्ध रह गया कि उस ने नासमझी में यह क्या कर दिया. इस एक पल की बेवकूफी ने उसे घोर पश्चात्तापी बना दिया. सोचने लगा, टियारा ठीक कहती है. ऐसे थोड़े जिंदगी चलती है. आज से वह सोचसमझ कर ही काम करेगा. अपने दोस्त को भी भलाबुरा कहने लगा कि उस ने उस को पहले क्यों नहीं बताया? उस ने तो पूछा भी कि यह कौन है? पर उस ने तो बात मजाक में ही उड़ा दी. उसी समय कहता कि कोई अमीर, अपनी फटेहाली की शौकिया पेंटिंग बनवा रहा है? पर अब पछताए होत क्या जब चिडि़यां चुग गईं खेत? वह अपनी जिंदगी एकांत में गुजारने लगा. एक घटना ने उस का जीवन ही बदल डाला. उसे अपने मित्र पर गुस्सा भी बहुत आया पर तरकश से तीर निकल चुका था. बेबस हो कर अपने दोस्त को ‘आई बैग टू बी ऐक्सक्यूस्ड’ कह कर वहां से चल दिया.

अब वह पहले से अधिक अपने काम में मशगूल रहने लगा. डट कर जिंदगी का मुकाबला करने लगा. कई और एअरलाइंस की टिकट बुकिंग का जिम्मा ले लिया. डेल्टा एअरलाइंस, ब्रिटिश एअरवेज, लुफथांसा एअरलाइंस, केएलएम, एअर इंडिया, गल्फ एअरलाइंस, सिंगापुर एअरलाइंस और न जाने कितनी एअरलाइंस के टिकट बुक कर के पैसा कमाने लगा. अब तो उसे अपने मित्र के पास जाने का न तो समय था न ही कुछ सुधबुध. पर कभी अतीत की घटना याद आने पर वह परेशान जरूर हो जाता.

पर इतनी मेहनत करने पर भी घर खरीदना उस के लिए दूर गगन की छांव थी. कुछ एअरलाइंस ने अपने सौफ्टवेयर यूज करने के लिए कुछ कंप्यूटर अवश्य मुहैया कराए थे. एक दिन ऐसे ही अपनी उंगलियां कंप्यूटर पर चला रहा था कि एक मर्सिडीज आ कर उस के औफिस के बाहर रुकी. कार से बाहर निकला रईस अपने कपड़ों से पहचाना जा सकता था. थौमस को समझने में बिलकुल देर नहीं लगी कि यह तो वही रईसजादा है जो फकीर बना था. थौमस के मुंह से निकल पड़ा, ‘‘सर, आई बैग टू बी ऐक्सक्यूस्ड फार माई ब्लंडर.’’ पर उस धनवान के चेहरे पर शिकवा के कोई भाव नहीं थे. उस धनवान ने एक लिफाफा उसे थमाते हुए कहा, ‘‘कौंगरैट्स फौर वैंडिंग?’’

थौमस कुछ समझ पाता, उस से पहले उस ने लिफाफा खोलने का इशारा किया. लिफाफे में 1 मिलियन पौंड का एक चैक था. थौमस स्तब्ध रह गया. वह मेहनत की कमाई में विश्वास करता था. साथ ही खैरात में मिली दौलत से टियारा को अपनी जिंदगी में नहीं लाना चाहता था. सो, उस ने थैंक्स कह कर कहा, ‘‘बट आई डोंट बिलीव इन चैरिटीज.’’

धनवान ने कहा, ‘‘नो, इट्स नाट एट आल चैरिटी? इट्स योर हार्डअर्न्ड मनी.’’ थौमस को और अधिक कन्फ्यूजन में न डाल कर उस ने स्पष्ट किया कि उस दिन तुम ने जो 5 पौंड करेंसी दी थी, उस से मैं ने तुम्हारे लिए एक लौटरी का टिकट खरीद लिया. आज उस लौटरी का ड्रा हुआ और तुम्हारे टिकट पर 1 मिलियन पौंड की लौटरी खुली है. सो, तुम्हारा पैसा मैं कैसे रख सकता हूं. इस तरह थौमस ने अपनी पूरी कहानी बता कर मुझ से विदा ली.

Best Hindi Story : निराधार डर – माया क्यों शक करती थी

Best Hindi Story : ‘‘शादी हुई नहीं कि बेटा पराया हो जाता है,’’ माया किसी से फोन पर कह रही थीं, ‘‘दीप की शादी हुए अभी तो केवल 15 दिन ही हुए हैं और अभी से उस में इतना बदलाव आ गया है. पलक के सिवा उसे न कोई दिखाई देता है, न ही कुछ सूझता है. ठीक है कि पत्नी के साथ वह ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताना चाहता है, पर मां की उपेक्षा करना क्या ठीक है.’’ यह सुन कर दीप हैरान रह गया. उस ने अनुमान लगाया कि फोन के दूसरी तरफ सोमा बूआ ही होंगी. वही हैं जो इस तरह की बातों को शह देती हैं. वह भी तो हमेशा अपने बेटेबहू को ले कर नाराज रहती हैं. सब जानते हैं कि सोमा बूआ की किसी से नहीं बनती. वे तो सभी से परेशान रहती हैं और दूरपास का कोई ऐसा रिश्तेदार नहीं है जो उन के व्यंग्यबाणों का शिकार न हुआ हो. अपने बेटे को तो वे सब के सामने जोरू का गुलाम तक कहने से नहीं चूकती हैं. पर मां, उस के बारे में ऐसा सोचती हैं, यह बात उसे भीतर तक झकझोर गई. घर में और तो किसी ने ऐसा कुछ नहीं कहा, तो मां को ऐसा क्यों लग रहा है. पापा, उस की बहन दीपा, किसी ने भी तो ऐसा कुछ जाहिर नहीं किया है जिस से लगे कि वह शादी के बाद बदल गया है. फिर मां को ही क्यों लग रहा है कि वह बदल गया है.

पलक को इस समय नए घर में एडजस्ट होने में उस का सहयोग और साथ चाहिए और वही वह उसे दे रहा है तो इस से क्या वह मां के लिए पराया हो गया है. पलक के लिए यह घर नया है, यहां के तौरतरीके, रहनसहन सीखनेसमझने में उसे समय तो लगेगा ही और अगर वह यहां के अनुरूप नहीं ढलेगी तो क्या मां नाराज नहीं होंगी. आखिर मां क्यों नहीं समझ पा रही हैं कि पलक के लिए नए माहौल में ढल पाना सहज नहीं है. इस के लिए उसे पूरी तरह से अपने को बदलना होगा और वह चाहती है कि इस घर को जल्दी से जल्दी अपना बना लें ताकि सारी असहजता खत्म हो जाए. वह पूरी कोशिश कर रही है, पर मां का असहयोग उसे विचलित कर देता है. दीप खुद हैरान था मां के व्यवहार को देख कर. मां तो ऐसी नहीं हैं, फिर पलक के प्रति वे कटु कैसे हो गई हैं.

‘‘मां, ये कैसी बातें कर रही हैं आप? मैं पराया कहां हुआ हूं? बताइए न मुझ से कहां चूक हो गई या आप की कौन सी बात की अवहेलना की है मैं ने? हां, इतना अवश्य हुआ है कि मेरा समय अब बंट गया है. मुझे अब पलक को भी समय देना है ताकि वह अकेलापन महसूस न करे.

‘‘अभी मायके की यादें, मांबाप, भाईबहन से बिछुड़ने का दुख उस पर हावी है. हम सब को उसे सहयोग देना चाहिए ताकि वह खुल कर अपनी बात सब से कह सके. उसे थोड़ा वक्त तो हमें देना ही होगा, मां छुट्टियां खत्म हो जाने से पहले वह भी सब कुछ समझ लेना चाहती है, जिस से औफिस और घर के काम में उसे तालमेल बिठाने में दिक्कत न हो.’’

‘‘मुझे तुझ से बहस नहीं करनी है, चार दिन हुए हैं उसे आए और लगा है उस की तरफदारी करने.’’ पलक अपने कमरे में बैठी मांबेटे की बातें सुन रही थी. उसे हैरानी के साथसाथ दुख भी हो रहा था कि आखिर मां, इस तरह का व्यवहार क्यों कर रही हैं. वह तो उन के तौरतरीके अपनाने को पूरे मन से तैयार है, फिर मां की यह सोच कैसे बन गई कि उस ने दीप को अपनी मुट्ठी में कर लिया है. कमरे में दीप के आते ही उस ने पूछा, ‘‘मुझ से कहां चूक हो गई, दीप, जो मां इस तरह की बात कर रही हैं. मैं ने कब कहा कि तुम हमेशा मेरे पल्लू से बंधे रहो. इतना अवश्य है कि मां से मुझे किसी तरह भी सहयोग नहीं मिल रहा है, इसलिए मुझे तुम्हारे ऊपर ज्यादा निर्भर होना पड़ रहा है. फिर चाहे वह घरगृहस्थी से जुड़ी बात हो या रसोई के काम की या फिर मेरे दायित्वों की. इसी कारण तो हम हनीमून के लिए भी नहीं गए ताकि मुझे इस माहौल में एडजस्ट होने के लिए समय मिल जाए. जानते ही हो कि छुट्टी भी मुश्किल से एक महीने की ही मिली है.’’

‘‘मैं खुद हैरान हूं, पलक कि मां इस तरह का व्यवहार क्यों कर रही हैं. जबकि उन्हें ही मेरी शादी की जल्दी थी. हमारी लव मैरिज उन की स्वीकृति के बाद ही हुई है. शादी से पहले तो वे तुम्हारी तारीफ करते नहीं थकती थीं, फिर अब अचानक क्या हो गया. कितने चाव से उन्होंने शादी की एकएक रस्म निभाई थी. सोमा बूआ टोकती थीं तो मां उन की बातों को नजरअंदाज कर देती थीं. सब से यही कहतीं, मेरा तो एक ही बेटा है, उस की शादी में अपने सारे चाव पूरे करूंगी. आज वे सोमा बूआ की बातों को सुन रही हैं, उन से ही हमारी शिकायत कर रही हैं. ‘‘आज उन्हें अपने ही बेटे की खुशी खल रही है. उन्हें तो इस बात की तसल्ली होनी चाहिए कि हम दोनों खुश हैं और एकदूसरे से प्यार करते हैं. डरता हूं सोमा बूआ कहीं हमारे बीच भी तनाव न पैदा कर दें. मां ने उन की बातें सुनीं तो अवश्य ही उन के बेटेबहू की तरह हमारे बीच भी झगड़े होने लगेंगे.’’

‘‘मुझ पर विश्वास रखो दीप, ऐसा कुछ नहीं होगा,’’ पलक के स्वर में दृढ़ता थी. ‘‘हमें मां के भीतर चल रही उथलपुथल को समझ कर उन से व्यवहार करना होगा. उन के मनोविज्ञान को समझना होगा. दीप, मनोविज्ञान की छात्र रहने के कारण मैं उन की मानसिक स्थिति बखूबी समझ सकती हूं. जब बेटे की शादी होती है तो कई बार एक डर मां के मन में समा जाता है कि अब तो उस का बेटा हाथ से निकल गया. उस में सब से खराब स्थिति बेटे की ही होती है, क्योंकि वह ‘किस की सुने’ के चक्रव्यूह में फंस जाता है. त्रिशंकु जैसी स्थिति हो जाती है उस की. पत्नी जो दूसरे घर से आती है वह पूरी तरह से नए परिवेश में ढलने के लिए उस पर ही निर्भर होती है, और मां को लगता है कि बेटा जो आज तक हर काम उन से पूछ कर करता था, अब बीवी को हर बात बताने लगा है. बस, यही वजह है जब मां को लगता है कि उन की सत्ता में सेंध लगाने वाली आ गई है और वह बहू के खिलाफ मोरचा संभाल लेती है. लेकिन हमें मां को उस डर से बाहर निकालना ही होगा.’’

‘‘पर यह कैसे होगा?’’ दीप पलक की बात सुन थोड़ा असमंजस में था. वह किसी भी तरह से मां को दुखी नहीं देख सकता था और न ही चाहता था कि पलक और मां के संबंधों में कटुता आए.

‘‘यह तुम मुझ पर छोड़ दो, दीप. बस यह खयाल रखना कि मां चाहे मुझ से जो भी कहें, तुम हमारे बीच में नहीं बोलोगे. इस तरह बात और बिगड़ जाएगी और मां को लगेगा कि मेरी वजह से मांबेटे के रिश्ते में दरार आ रही है या बेटा मां से बहस कर रहा है. हालांकि उन की जगह कोई नहीं ले सकता पर फिर भी हमें उन्हें बारबार यह एहसास कराना होगा कि उन की सत्ता में सेंध लगाने का मेरा कोई इरादा नहीं है. ‘‘हर सदस्य की परिवार में अपनी तरह से अहमियत होती है. बस, यही उन्हें समझाना होगा. उस के बाद उन के मन से सारे भय निकल जाएंगे तब वे तुम्हें ले कर शंकित नहीं होंगी कि तुम उन के बुढ़ापे का सहारा नहीं बनोगे, न ही वे इस बात से चिंतित रहेंगी कि मैं उन के बेटे को उन से छीन लूंगी.’’

‘‘सही कह रही हो तुम, पलक. मैं ने भी कई घरों में यही बात देखी है. इसी की वजह से न चाहते हुए मेरे दोस्त वैभव को शादी के बाद अलग होने को मजबूर होना पड़ा था. सासबहू की लड़ाई में वह पिस रहा था. यह देख उस के पापा ने ही उस से अलग हो जाने को कहा था. बेटा हाथ से न निकल जाए का डर, यह अनिश्चतता कि बुढ़ापे में कहीं वे अकेले न रह जाएं, बहू घर पर अधिकार न कर ले, बहू की बातों में आ कर कहीं बेटा बुरा व्यवहार न करे या घर से न निकाल दे, ये बातें जब मन में पलने लगती हैं तो निराधार होने के बावजूद संबंधों में कड़वाहट ले आती हैं. मैं नहीं चाहता कि मेरे परिवार में ऐसा कुछ हो. मैं अपने मांबाप को किसी हाल में नहीं छोड़ सकता,’’ दीप भावुक हो गया था.

‘‘दीप, अब अंदर ही बैठा रहेगा या बाहर भी आएगा. देखो, तुम्हारे मामामामी आए हैं,’’ मां के स्वर में झल्लाहट साफ झलक रही थी. दीप को बुरा लगा पर पलक ने उसे शांत रहने का इशारा किया. बाहर आ कर दोनों ने मामामामी के पैर छुए. फिर पलक किचन में उन के लिए चायनाश्ता लेने चली गई. ‘‘दीदी, अब तो आप का मन खूब लग रहा होगा. पलक काफी मिलनसार और खुशमिजाज लड़की है. बड़ों का आदर भी करती है. जब कुछ दिन पहले दीप और पलक घर आए थे तभी पता लग गया था. बहुत प्यारी बच्ची है.’’ अपनी भाभी के मुंह से पलक की तारीफ सुन माया ने सिर्फ सिर हिलाया. यह सच था कि पलक उन्हें भी अच्छी लगती थी, पर उस की तारीफ करने से वे डरती थीं कि कहीं इस से उन का दिमाग खराब न हो जाए. पलक उस की हर बात को मानती थी, पर वे थीं कि एक दूरी बनाए हुए थीं, पता नहीं पढ़ीलिखी, नौकरी वाली बहू बाद में कैसे रंग दिखाए. वैसे ही बेटा उस के आगेपीछे घूमता रहता है, न जाने क्यों उन के अंदर एक खीझ भर गई थी जिस के कारण वे पलक से खिंचीखिंची रहती थी. और इस वजह से उन के पति और बेटी भी उन से नाराज थे.

‘‘मां, आप एक मिनट के लिए यहां आएंगी,’’ पलक ने 5 मिनट बाद आवाज लगाई, ‘‘मां, प्लीज मुझे बता दीजिए कि मामामामी को क्या पसंद है. आप तो सब जानती हैं.’’ माया को यह सुन अच्छा लगा. पलक जब नाश्ता ले कर आ रही थी तो उस ने मामी को कहते सुना, ‘‘मानना पड़ेगा दीदी, इतनी पढ़ीलिखी होने पर भी पलक में घमंड बिलकुल नहीं है, वरना कमाने वाली लड़कियां तो आजकल रसोई में जाने से ही परहेज करती हैं. ‘‘उस दिन जब हमारे घर आई थी तभी परख लिया था मैं ने कि इस में नखरे तो बिलकुल नहीं हैं. मेरी भाभी की बहू को ही देख लो. उस ने शादी के बाद ही साफ कह दिया था कि घर का कोई काम नहीं करेगी. नौकर रखो या और कोई व्यवस्था करो, उसे कोई मतलब नहीं है. भाभी की तो उस के सामने एक नहीं चलती. आप को तो खुश होना चाहिए बेटाबहू दोनों ही आप को इतना मान देते हैं.’’

‘‘अरे, अभी उसे आए दिन ही कितने हुए हैं. औफिस जाना एक बार शुरू करने दो, सारे रंग सामने आ जाएंगे,’’ पलक को आते देख माया एकदम चुप हो गईं. पलक को बुरा तो बहुत लगा पर वह हंसते हुए नाश्ता परोसने लगी. दीप अंदर ही अंदर कुढ़ कर रहा गया था. वह कुछ कहना ही चाहता था कि पलक ने उसे इशारे से मना कर दिया. मामी ने महसूस किया कि माया पलक के प्रति कुछ ज्यादा ही कटु हो रही हैं और दीप को अच्छा न लगना स्वाभाविक ही था. जातेजाते वे बोलीं, ‘‘दीदी, हो सकता है आप को मेरा कुछ कहना अच्छा न लगे, पर आप पलक के बारे में कुछ ज्यादा ही गलत सोच रही हैं. हो सकता है उस में कुछ कमियां हों, तो क्या हुआ. वे तो सभी में होती हैं. बच्ची को प्यार देंगी तो वह भी आप का सम्मान करेगी. मुझे तो लगता है कि वह आप के जितना निकट आना चाहती है, आप उस से उतनी ही दूरियां बनाती जा रही हैं. ‘‘दीप की खुशी के बारे में सोचें. पलक की वजह से ही वह चुप है, पर कब तक चुप रहेगा. बेटा चाहे वैसे दूर न हो, पर आप की सोच की वजह से दूर हो जाएगा. बहू बेटे को छीन लेगी, यह डर ही आप को रिश्ते में दरार डालने के लिए मजबूर कर रहा है. पलक को खुलेदिल से अपना लीजिए, वरना बेटा सचमुच छिन जाएगा.’’

‘‘सही तो कह रही थीं तुम्हारी भाभी,’’ रात को मौका पाते ही उन के पति ने उन्हें समझाना चाहा, ‘‘इतनी अच्छी बहू मिली है, पर तुम ने दूसरों के बेटेबहू के किस्से सुन एक धारणा बना ली है जो निराधार है. आज वह हर बात तुम से पूछ रही है, लेकिन अगर तुम्हारा यही रवैया रहा तो दीप ही सब से पहले तुम्हारा विरोध करेगा. ‘‘सोचो, अगर पलक उसे तुम्हारे खिलाफ भड़काने लगे तो क्या होगा. सोमा की बातों पर मत जाओ. बहू को दिनरात ताने दे कर उस ने संबंध खराब किए हैं. नए घर में जब एक लड़की आती है तो उस के कुछ सपने होते हैं, वह नए रिश्तों से जुड़ने की कोशिश करती है. पर तुम हो कि उस की गलतियां ही ढूंढ़ती रहती हो. इस तरह तुम दीप को दुखी कर रही हो. क्या तुम नहीं चाहतीं कि तुम्हारा बेटा खुश रहे.

‘‘कल हमारी दीपा के साथ भी उस की सास ऐसा ही व्यवहार करेगी तो क्या वह सुखी रह पाएगी या तुम बरदाश्त कर पाओगी? अपने डर से बाहर निकलो माया, और पलक व दीप पर विश्वास करो.’’ पूरी रात माया कशमकश से जूझती रहीं. सच में बेटे के छिन जाने का डर ही उन्हें पलक के साथ कठोर व्यवहार करने को मजबूर कर रहा है. आखिर जितना प्यार वे दीप और दीपा पर उड़ेलती हैं, पलक को दें तो क्या वह भी उन की बेटी नहीं बन जाएगी. जरूरी है कि उसे बहू के खांचे में जकड़ कर ही रखा जाए? वह भी तो माया में मां को ही तलाश रही होगी? माया जब सुबह उठीं तो उन के चेहरे पर कठोरता और खीझ के भाव की जगह एक कोमलता व नजरों में प्यार देख पलक बोली, ‘‘मां, आइए न, साथ बैठ कर चाय पीते हैं. आज संडे है तो दीप तो देर तक ही सोने वाले हैं.’’

‘‘तुम क्यों इतनी जल्दी उठ गईं? जाओ आराम करो. नाश्ता मैं बना लूंगी.’’ ‘‘नहीं मां, हम मिल कर नाश्ता बनाएंगे और इस बहाने मैं आप से नईनई चीजें भी सीख लूंगी.’’ डाइनिंग टेबल पर मां को पलक से बात करते और खिलखिलाते देख दीप हैरान था. पलक ने आंखों ही आंखों में जैसे उसे बताया कि उसे यहां भी मां मिल गई हैं.

Family Problem : पेरैंट्स की देखभाल हम बहनें करती हैं, शादी नहीं की

Family Problem : पापा 90 साल के हो चुके हैं. मम्मी 85 साल की हो गई हैं. हम 2 बहने हैं. मम्मीपापा का हम ही ध्यान रखते हैं. हम चौथी मंजिल पर रहते हैं. उसी सोसाइटी में मेरे मामाजी रहते थे जिन की डैथ हो गई है. वे अकेले थे, इसलिए मकान खाली है और वह मकान हमारा ही है. मैं चाहती हूं हम सब मामाजी के मकान में शिफ्ट हो जाएं क्योंकि वह ग्राउंडफ्लोर पर है. लेकिन पापा जिद पर अड़े हैं कि नहीं मैं अपना घर छोड़ कर नहीं जाना चाहता. हमें उन्हें ऊपर सीढ़ियों से उतारना मुश्किल होता है. बड़ी दिक्कत है, क्या करें?

जवाब : पापा से खुल कर बात करें, उन की भावनाओं को समझें उन से पूछें कि वे नीचे शिफ्ट होने से क्यों डर रहे हैं या क्यों मना कर रहे हैं. शायद कोई खास वजह हो, जैसे अकेलापन या बदलाव का डर. उन्हें समझाएं कि नीचे शिफ्ट होने से उन की देखभाल और डाक्टर के पास जाना आसान हो जाएगा, जो उन के स्वास्थ्य के लिए बेहतर है.

85 साल की उम्र में सीढि़यां चढ़नाउतरना न केवल मुश्किल है, बल्कि खतरनाक भी हो सकता है. आप कह सकते हैं कि आप उन की लंबी उम्र और उन के आराम के लिए यह बदलाव चाहते हैं. अगर संभव हो तो एक बार डाक्टर से बात कर के उन की राय लें और पिताजी को बताएं कि डाक्टर ने भी नीचे रहने की सलाह दी है. कई बार बुजुर्ग लोग बाहरी सलाह को ज्यादा गंभीरता से लेते हैं.

उन के पसंदीदा सामान, जैसे कुरसी, बिस्तर या तसवीरें वहां ले जाएं. इस से उन्हें लगेगा कि वे पूरी तरह अपना घर नहीं छोड़ रहे, बल्कि कुछ पुराना उन के साथ है. घर को साफसुथरा और बुजुर्गों के लिए सुरक्षित बनाएं, जैसे कि रैंप या हैंडल लगवाएं.

अगर पिताजी नहीं मान रहे तो क्या आप कुछ समय के लिए नीचे रहने की कोशिश कर सकते हैं, जैसे, कुछ हफ्तों के लिए वहां रहें और देखें कि क्या यह सब के लिए बेहतर है. इस से उन्हें भी बदलाव का अनुभव होगा. जबरदस्ती से बचें, लेकिन दृढ़ रहें. जबरदस्ती करने से पिताजी को भावनात्मक रूप से ठेस पहुंच सकती है और वे और जिद्दी हो सकते हैं.

आप कह सकते हैं कि आप उन के लिए सब से अच्छा चाहते हैं और नीचे रहना सभी के लिए आसान होगा. अगर वे फिर भी न मानें तो धीरेधीरे सामान शिफ्ट करने की शुरुआत करें और उन्हें इस की आदत डालें.

अगर शिफ्ट करना अभी संभव न हो तो क्या आप घर में कोई बदलाव कर सकते हैं, जैसे, किसी नर्स/हैल्पर की मदद लेना, जो आप के पिताजी और मां की देखभाल में सहायता करे.

मेरा सुझाव है कि सब से पहले पिताजी से बारबार और प्यार से बात करें. उन्हें यह भरोसा दिलाएं कि नीचे शिफ्ट होने से उन का सम्मान या घर से लगाव कम नहीं होगा. अगर कुछ हफ्तों तक बात करने से भी वे न मानें तो परिवार की भलाई के लिए धीरेधीरे शिफ्टिंग शुरू करें. यह कठिन निर्णय है, लेकिन आप की मां, आप, आप की बहन की सुविधा भी उतनी ही जरूरी है. याद रखें, आप की परिस्थिति को देखते हुए यह भी जरूरी है कि आप और आप की बहन खुद का खयाल रखें.

अपनी समस्‍याओं को इस नंबर पर 8588843415 लिख कर भेजें, हम उसे सुलझाने की कोशिश करेंगे.

Neurological Disorders : मेरी मां को 79 की उम्र में मैमोरी लौस की समस्या है

Neurological Disorders : एक साल से उन की यह प्रौब्लम ज्यादा बढ़ गई है. वे चिड़चिड़ी हो गई हैं, बारबार एक ही प्रश्न पूछती हैं. सुबह की चाय, नाश्ता किया है या नहीं, दोपहर तक भूल जाती हैं. उन को पैंशन मिलती है, जिस को ले कर भाई से प्रश्न करती रहती हैं कि उन की पैंशन तुम लोग खर्च कर देते हो. उन्हें नहीं देते. जबकि वे पैसे ले कर कहीं भी रख कर भूल जाती हैं. इस वजह से घर का माहौल खराब हो रहा है. इस स्थिति से कैसे निबटें?

जवाब : आप की मां की स्थिति को समझाते हुए ऐसा लगता है कि उन्हें मैमोरी लौस (याददाश्त की समस्या) और संभवतया डिमैंशिया या अल्जाइमर जैसी कोई न्यूरोलौजिकल स्थिति हो सकती है.

सब से पहले, किसी न्यूरोलौजिस्ट या जेरियाट्रिक विशेषज्ञ (बुजुर्गों के डाक्टर) से मिलें. मैमोरी लौस के लिए टैस्ट करवाएं. टैस्ट से पता चलेगा कि समस्या क्या है.

आप की मां का चिड़चिड़ापन और शक करना उन की बीमारी का हिस्सा हो सकता है. वे जानबूझ कर ऐसा नहीं कर रही हैं. उन के साथ नरमी से बात करें, बारबार सवाल पूछने पर गुस्सा न करें. उदाहरण के लिए, अगर वे खाने के बारे में दोबारा पूछती हैं तो शांति से जवाब दें, ‘हां मां, आप ने खाना खा लिया है.’

एक निश्चित दिनचर्या उन की भूलने की आदत को कम कर सकती है. खाने, दवाओं और सोने का समय निश्चित करें.

पैंशन और पैसों को ले कर भ्रम से बचने के लिए आप या आप का भाई उन की फाइनैंशियल जिम्मेदारी लें. एक छोटा रजिस्टर बनाएं जिस में लिखें कि कितने पैसे दिए गए और कब. उन्हें दिखाएं कि ‘मां, यह देखो, ये पैसे आप को दिए थे.’ इस से उन का शक कम हो सकता है. चूंकि वे पैसे कहीं रख कर भूल जाती हैं, उन के लिए एक सुरक्षित जगह (जैसे लौक वाला डब्बा) बनाएं.

उन्हें प्यार और ध्यान दें. पुरानी यादें (जैसे पुरानी तसवीरें दिखाना या पुराने गाने सुनाना) उन की खुशी बढ़ा सकते हैं.

आप के परिवार के लिए यह मुश्किल समय हो सकता है, लेकिन प्यार, धैर्य और सही मैडिकल मदद से आप उन की स्थिति को बेहतर तरीके से संभाल सकते हैं.

अपनी समस्‍याओं को इस नंबर पर 8588843415 लिख कर भेजें, हम उसे सुलझाने की कोशिश करेंगे.

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