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यूपी+योगी= बहुत है उपयोगी

लखनऊ . प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश वासियों को “यूपी+योगी= बहुत है उपयोगी” का मंत्र दिया है. शनिवार को शाहजहांपुर में 12 ज़िलों से होकर गुजरने वाले 594 किमी लंबे “गंगा एक्सप्रेस वे का शिलान्यास करते हुए प्रधानमंत्री ने प्रदेश की बेहतरी के लिए योगी सरकार की कोशिशों को खूब सराहा. उन्होंने कहा कि आज यूपी में माफिया पर बुलडोजर चल रहा है. यूं तो  बुलडोजर तो गैर-कानूनी इमारत पर चलता है, लेकिन दर्द उसे पालने-पोसने वाले को होता है. इसीलिए आज यूपी की जनता कह रही है- यूपी+योगी बहुत है उपयोगी. उन्होंने कहा कि मेरठ में एक बाजार है सोतीगंज देश मे कहीं गाड़ी चोरी हो तो वहीं कटती थी. चोरी की गाड़ियों के कटाई के आका पर पिछली सरकार कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं करती थी. अब योगी जी ने उस पर भी बुलडोजर चलवा दिया.

कुछ राजनीतिक दलों को विरासत और विकास से है दिक्कत: पीएम मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि हमारे यहां कुछ राजनीतिक दल ऐसे रहे हैं जिन्हें देश की विरासत से भी दिक्कत है और देश के विकास से भी. देश की विरासत से दिक्कत क्योंकि इन्हें अपने वोटबैंक की चिंता ज्यादा सताती है. देश के विकास से दिक्कत क्योंकि गरीब की, सामान्य मानवी की इन पर निर्भरता दिनों-दिन कम हो रही है. इन लोगों को गंगा जी के सफाई अभियान से दिक्कत है. यही लोग हैं जो आतंक के आकाओं के खिलाफ सेना की कार्रवाई पर सवाल उठाते हैं. यही लोग हैं जो भारतीय वैज्ञानिकों की बनाई मेड इन इंडिया कोरोना वैक्सीन को कठघरे में खड़ा कर देते हैं. इन लोगों को काशी में बाबा विश्वनाथ का भव्य धाम बनने से दिक्कत है तो अयोध्या में प्रभु श्रीराम का भव्य मंदिर बनने से दिक्कत है. पीएम ने कहा कि योगी जी के नेतृत्व में यहां सरकार बनने से पहले, पश्चिम यूपी में कानून-व्यवस्था की क्या स्थिति थी, इससे आप भलीभांति परिचित हैं. पहले यहां क्या कहते थे? दीया बरे तो घर लौट आओ! क्योंकि सूरज डूबता था, तो कट्टा लहराने वाले सड़कों पर आ धमकते थे.

तब बेटियों की सुरक्षा पर आए दिन सवाल उठते रहते थे, उनका स्कूल कॉलेज जाना तक मुश्किल था. कब कहां दंगा और आगजनी हो जाये कोई नहीं कह सकता था, लेकिन बीते साढ़े चार साल में योगी जी की सरकार ने स्थिति को सुधारने के लिए बहुत परिश्रम किया है. गंगा एक्सप्रेस वे के शिलान्यास के इस ऐतिहासिक मौके पर मौजूद लाखों जनसमुदाय को संबोधित करते हुए पीएम ने विश्वास दिलाया कि जनता के आशीर्वाद से यूपी के विकास का कर्मयोग इसी तरह जारी रहेगा. उन्होंने कहा कि जिनको माफिया का साथ पसंद है वो उनकी भाषा बोलेंगे लेकिन हम तो उनका यशगान करेंगे जिन्होंने देश के निर्माण में तप और त्याग किया है.

किसान-नौजवान सब पर फोकस, पहली बार किसी सरकार ने समझा गरीबों दर्द

प्रधानमंत्री ने कहा कि आजादी के बाद पहली बार गरीब का दर्द समझने वाली सरकार बनी है. पहली बार गैस, सड़क बिजली को प्राथमिकता दी जा रही है. इससे गरीब, दलित पिछड़ों को जीवन बदलता है. पहले यहां रात-बिरात इमरजेंसी में अगर किसी को अस्पताल की जरूरत पड़ती थी तो लोगों को लखनऊ, कानपुर और दिल्ली भागना पड़ता था. दूसरे शहर जाने के लिए सड़कें नहीं थीं. आज यहां सड़कें, एक्सप्रेस-वे बनते जा रहे हैं, मेडिकल कॉलेज भी खुले हैं. ऐसे ही होता है दमदार काम, ईमानदार काम. जो भी समाज में पिछड़ा हुआ है, उसे सशक्त करना, योजनाओं का लाभ पहुंचाना ही हमारी प्राथमिकता है. प्रधानमंत्री ने कहा कि पिछले सालों में बीज से बाजार तक की योजना हमने बनाई है इसका फायदा छोटे किसानों को मिला है. पीएम किसान सम्मान निधि के तहत किसानों के बैंक खाते में पैसा पहुंचा है. आज हम छोटे किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड से जोड़ रहे हैं. पहले छोटे किसानों के लिए बैंक के दरवाजे नहीं खुलते थे. पैसा डायरेक्ट किसान के खाते में जाने से छोटे किसान को बहुत राहत मिली है.

पिछली सरकारों की करगुजारियों की दिलाई याद, बोले अब नहीं होता भेदभाव

लाखों की भीड़ के उत्साह को नमन करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि हम आपके लिए काम करते हैं. जनता को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि पुराने दिनों को याद कीजिए, पुराने निर्णयों को याद कीजिए, पुराने काम-काज के तरीकों को याद करिए, आपको साफ-साफ नजर आएगा कि यूपी में भेदभाव नहीं, सबका विकास हो रहा है. जिन लोगों को पीएम आवास योजना के तहत घर नहीं मिले हैं, उन्हें जल्दी घर मिले इसके लिए मोदी और योगी दिन रात काम कर रहे हैं. गरीबों के पक्के घर बनाने के लिए हमने दो लाख करोड़ रुपए दिए. यह खजाना आपका है, आपको बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए है. हम केवल आपके लिए काम करते हैं.

गंग सकल मुद मंगल मूला, सब सुखकरनि हरनि सब सूला

शिलान्यास के बाद जनसभा को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि-रामचरित मानस में कहा गया है कि “गंग सकल मुद मंगल मूला, सब सुखकरनि हरनि सब सूला”. यानी मां गंगा सारे मंगलों, उन्नति प्रगति की स्रोत हैं. मां गंगा सारी पीड़ा हर लेती हैं. ऐसे ही गंगा एक्सप्रेस-वे विकास की नई इबारत लिखेगा. यह सारी परेशानियों को दूर करेगा. यह गंगा एक्सप्रेस-वे अनंत संभावनाओं का एक्सप्रेस-वे है. मेरठ, हापुड़, बुलंदशहर, अमरोहा, संभल, बदायूं, शाहजहांपुर, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली, प्रतापगढ़ और प्रयागराज जिलों के निवासियों को बधाई देते हुए पीएम ने बताया कि इस एक्सप्रेस-वे के निर्माण पर 36 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए जाएंगे. यह अपने साथ इस क्षेत्र में व्यापार और रोजगार साथ लाएगा. पीएम मोदी ने इसकी विशेषता बताते हुए कहा कि इस एक्सप्रेस-वे का एक छोर से दूसरा छोर करीब-करीब एक हजार किलोमीटर का है. इतने बड़े यूपी को चलाने के लिए जिस दम की जरूरत है वो आज डबल इंजन की सरकार करके दिखा रही है. उन्होंने कहा कि यूपी में आज जो एक्सप्रेस-वे का जाल बिछ रहा है, नए एयरपोर्ट बन रहे हैं, वो यूपी के लोगों के लिए अनेक वरदान एक साथ लेकर आ रहे हैं. पहला वरदान समय की बचत, दूसरा- सहूलियत और सुविधा में बढ़ोतरी, तीसरा- संसाधनों का सही प्रयोग, चौथा- सामर्थ्य में वृद्धि और पांचवा चौतरफा शांति. अब आपको एक जगह से दूसरे जगह जाने में ट्रैफिक जाम नहीं मिलेगा.

हाल ही में लोकार्पित हुए पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे, काशी विश्वनाथ धाम  कॉरिडोर तथा गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस-वे, बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे आदि का जिक्र करते हुए पीएम ने कहा कि यूपी में आज जो आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण हो रहा है वो ये दिखाता है कि संसाधनों का सही उपयोग कैसे किया जाता है. पहले जनता के पैसे का क्या-क्या इस्तेमाल हुआ है ये आप लोगों ने भली-भांति देखा है. लेकिन आज उत्तर प्रदेश के पैसे को उत्तर प्रदेश के विकास में लगाया जा रहा है. उन्होंने कहा कि जब पूरा यूपी एक साथ बढ़ता है तभी तो देश बढ़ता है. डबल इंजन की सरकार यूपी के साथ है. अब यूपी में भेदभाव नहीं सबका भला होता है. कुछ इलाकों को छोड़ दें तो बिजली ढूंढने पर भी नहीं मिलती थी. पहले कुछ ही लोगों के फायदे के लिए काम होता था. हर जिले को पहले से ज्यादा बिजली दी जा रही है. जब खुद का घर बनता है तब गर्व से सीना चौड़ा होता है.

शहीदों सपूतों को किया नमन, कहा कभी नहीं उतार सकते कर्ज

शाहजहांपुर की क्रांतिकारी धरती  पर आए प्रधानमंत्री ने अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह को नमन किया. उन्होंने कहा कि शाहजहांपुर के तीन सपूतों का कर्ज हम कभी नहीं चुका सकते. रैली को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने स्थानीय जनभाषा में काकोरी के क्रांतिकारियों को नमन किया.

उन्होंने कहा कि यह आप लोगों का आशीर्वाद है कि मुझे इस मिट्टी को माथे पर लगाने का सौभाग्य मिला. मैं इस धरती के सभी महापुरुषों के चरणों में प्रणाम करता हूं. अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देने वाले शाहजहांपुर के तीन सपूतों को 19 दिसंबर को फांसी दी गई थी. भारत की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले इन वीरों का हम सभी के ऊपर बहुत बड़ा कर्ज है. इसे हम कभी चुका नहीं सकते.

जब पद्मिनी कोल्हापुरे ने की भागकर शादी तो इस एक्ट्रेस ने दिए थे गहने और कपड़े

टीवी पर रियालिटी शो में पाॅयनियर माने जाने वाले टीवी चैनल जी टीवी पर इन दिनों हर शनिवार व रविवार रात नौ बजे एक संगीत प्रधान लोकप्रिय व पुराना रियालिटी शो प्रसारित हो रहा है.इस  शो के हर एपीसोड में एक या दो फिल्मी हस्तियां मेहमान बनकर आते हैं और अपने अनुभव सुनाते हैं.

इस सप्ताह ‘सारेगामा’ का दोस्ती स्पेशल एपीसोड प्रसारित हुए,जिसमें अस्सी के दशक की चर्चित दो अदाकारा और आपस में सहेलियो पूनम ढिल्लों और पद्मिनी कोल्हापुरे मेहमान के तौर पर मौजूद थीं. इन्होने न सिर्फ सभी प्रतियोगियों की परफॉर्मेंस को इंज्वाॅय किया, बल्कि एक दूसरे से जुड़े कुछ गहरे राज भी खोले.

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इस शो में पूनम ढिल्लों अपनी पुरानी यादों में खो गईं और उन्होंने एक खास किस्सा सुनाते हुए कहा कि किस तरह पद्मिनी कोल्हापुरे ने अपने माता पिता की इच्छा के विरुद्ध जाकर शादी की थी.और कैसे उन्होंने उस समय अपनी ज्वेलरी देकर पद्मिनी की मदद की थी. इस अवसर पर पद्मिनी नेकहा- ‘‘मुझे लगता है कि पूनम बहुत उदार हैं और उन्होंने हमारी दोस्ती के दौरान मेरे लिए बहुत कुछ किया, जब मेरी मां और मेरे पिता मेरी शादी के खिलाफ थे,उस समय पूनम ने मेरी बहुत मदद की थी.‘‘

वहीं पूनम ढिल्लों ने कहा- ‘‘आसान शब्दों में कहूं तो भागकर शादी की थी.

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पद्मिनी ने और उन्होंने जो भी ज्वेलरी पहनी थी, वह हमने उसे दी थी. हमलोग बहुत छोटे थे और हमें नहीं पता था कि वह अपनी शादी पर क्या पहनेंगी, इसलिए हमने उनके लिए कपड़ों की व्यवस्था की थी. हमने साथ में बहुत से उतार चढ़ाव खुशियों और उदासी वाले पल देखे हैं. मुझे लगता है कि भगवान आपका परिवार चुनता है,लेकिन केवल दोस्ती का एकमात्र रिश्ता है, जो हम अपनी मर्जी से चुनते हैं.मैं इस दोस्ती के लिए कुछ भी कर सकती हूं.‘‘

Bigg Boss 15 : घर से बेघर हुए 2 कंटेस्टेंट, राखी सावंत और शमिता शेट्टी हुईं इमोशनल

सलमान खान के सबसे विवादित शो बिग बॉस 15 में एक बार फिर से डबल एलिमिनेशन का गाज गिर गया है. सलमान खान ने वीकेंड के वार में पहले तो सभी कंटेस्टेंट की जमकर क्लास लगाई. इसके बाद से सलमान खान ने 2 कंटेस्टेंट को घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया.

मेकर्स के इस फैसले से सभी घरवालों को काफी ज्यादा तकलीफ हुआ है. अचानक घर से 2 लोग कैसे जा सकते हैं. इस हफ्ते राजीव आदातिया और राखी सावंत के पति रितेश घर से बेघर हुए हैं. इन दोनों ने बीती रात घर को अलविदा कह दिया.

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कम वोट्स के चलते राजीव आदातिया और राखी सावंत के पति का पत्ता घर से साफ हो चुका है. वहीं अभिजीत बिचकुले को भी कंटेस्टेंट कुछ खास पसंद नहीं कर रहे हैं. फैंस इन तीनों सदस्यों को वोट नहीं दे रहे हैं.

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खबर ये भी है कि बिग बॉस के घर से बाहर जानें के बाद भी रितेश की परेशानियां कम नहीं होने वाली है. कुछ समय पहले ही रितेश की पहली पत्नी ने उनपर निशाना साधा है. मीडिया से बात करते हुए रितेश की पत्नी ने दावा किया है कि उनका तालाक रितेश से नहीं हुआ है. ऐसे में रितेश राखी के पति कैसे हो सकते हैं. इसके अलावा रितेश की पत्नी ने कहा कि वह एनआरआई नहीं है. ना ही उसके पास कोई कंपनी है.

अब रितेश और राखी के रितेश का सच बिग बॉस के घर से बाहर होने के बाद ही पता चलेगा कि इन लोगों का क्या होने वाला है.

Top 10 Pregnancy Tips in Hindi : टॉप 10 प्रेग्नेंसी टिप्स हिंदी में

Pregnancy Tips in Hindi : मां बनना हर महिला के जीवन का सबसे सुखद पल होता है. आज कल के व्यस्त जीवन में प्रेंग्नेंट महिलाएं अपना ख्याल रखना भूल जाती हैं. अपने खाने भरपूर ख्याल नहीं रख पाती हैं. जिस वजह से उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ता है. अगर आप भी अपना और अपने होने वाले बच्चों का ख्याल रखना चाहती हैं तो पढ़ें सरिता के Top Ten Pregnancy Tips .जिसे ट्राई करके आप अपनी हेल्दी प्रेग्नेंसी को एंजॉय कर सकते हैं.

  1. कहीं ये तो नहीं प्रेग्नेंसी में देरी का कारण

आपकी प्रेग्नेंसी पर आपके खानपान का काफी असर पड़ता है. और ये बात केवल प्रेग्नेंसी के दौरान के खानपान की नहीं है, बल्कि लंबे समय से चली आ रही आपकी डाइट पर निर्भर करती है. एक शोध से स्पष्ट हुआ है कि जो महिलाएं जंक फूड का ज्यादा इस्तेमाल करती हैं, वो देर से प्रेग्नेंट होती हैं. इसमें ये भी स्पष्ट हुआ कि जो महिलाएं सप्ताह में तीन या चार बार या इससे भी अधिक फास्ट फूड खाती हैं, उनको कम फास्टफूड खाने वाली महिलाओं की अपेक्षा, प्रेग्नेंट होने में एक महीना अधिक वक्त लगता है.

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2. प्रेग्नेंसी में नींद नहीं आती? इन 6 तरीकों से दूर करें परेशानी

प्रेग्नेंसी किसी भी महिला के लिए एक खास समय होता है. इस दौरान महिलाओं को खास देखभाल की जरूरत होती है. बच्चे की अच्छी सेहत के लिए जरूरी है कि गर्भवती महिला को पूरी नींद, अच्छा खानपान और स्ट्रेस फ्री माहौल मिले. इस दौरान गर्भवती महिला के हार्मोंस में बहुत से बदलाव होते हैं जिससे उन्हें स्वास्थ संबंधी कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है. इन परेशानियों से उनकी नींद भी प्रभावित होती है. प्रेग्नेंसी के समय गर्भवती महिलाओं को कई बार घबराहट महसूस होती है.

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3. प्रेग्नेंसी में मिसकैरेज से बचने के लिए इन बातों का रखें ध्यान

प्रेग्नेंसी के वक्त आपको बेहद सावधानी बरतनी होती है. इसमें आपका खानपान, दिनचर्या और मानसिक अशांति शामिल है. हालिया अध्ययन में ये बात सामने आई कि प्रेग्नेंसी के दौरान ज्यादा तनाव में रहने वाली महिलाओं में मिसकैरेज (Miscarriage) का खतरा बढ़ जाता है.

शोधकर्ताओं का दावा है कि प्रेग्नेंसी के दौरान तनाव में रहने वाली महिलाओं में गर्भपात का खतरा 42 फीसदी अधिक हो जाता है. इससे पहले हुए अध्ययन की रिपोर्ट में यह पाया गया था कि 24 सप्ताह की प्रेग्नेंसी में होने वाले गर्भपात में 20 फीसदी मामले तनाव के कारण होते हैं. हालांकि बाद में हुए अध्ययन के बाद यह पाया गया कि आंकड़ें इससे कहीं ज्यादा हैं. क्योंकि गर्भपात के कई मामले दर्ज ही नहीं होते.

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4. समय पर होना है प्रेग्नेंट तो इस बात का रखें ध्यान

हाल ही में हुए एक स्टडी में ये बात सामने आई कि जंकफूड का अधिक प्रयोग करने वाली महिलाओं को प्रेगनेंसी के दौरान बहुत परेशानी होती है. शोध में पाया गया कि हफ्ते में तीन चार बार से अधिक जंकफूड का सेवन करने वाली महिलाओं को प्रेग्नेंट होने में ज्यादा वक्त लगता है. वहीं जो महिलाएं जंकफूड का सेवन कम करती है वो ज्यादा सहूलियत और आसानी से प्रेग्नेंट होती हैं.

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5. इस उम्र के बाद ही पिलाएं बच्चे को गाय का दूध

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बच्चे के जन्म के साथ ही मां का दूध बेहद जरूरी होता है. मां के दूध में बच्चे को सारे जरूरी पोषण मिल जाते हैं. यही कारण है कि जन्म के तुरंत बाद बच्चे को मां का दूध पिलाना अच्छा होता है. आमतौर पर मांएं बच्चों को बहुत ज्यादा दिनों तक ब्रेस्टफीडिंग नहीं कराती हैं. कुछ दिनों बाद ही वो नवजात को गाय का दूध पिलाना शुरू कर देती हैं. बच्चे की सेहत के लिए ये नुकसानदायक होता है. इस खबर में हम आपको बताएंगे कि नवजात को क्यों गाय का दूध नहीं पिलाना चाहिए और उन्हें गाय का दूध पिलाने का सही समय कौन सा होता है.

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6. 35 साल के बाद गर्भावस्था जोखिम भरी?

गर्भधारण के समय स्त्री का स्वस्थ होना सब से ज्यादा जरूरी होता है, पर देखा गया है कि 35 वर्ष की उम्र के बाद महिलाओं को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं घेरने लगती हैं, जिस के चलते गर्भावस्था में 20 प्रतिशत तक खतरा होने का अंदेशा बढ़ जाता है. जीवनशैली के साथसाथ समाज में हो रही सांस्कृतिक तबदीलियों की वजह से दंपतियों में 30 साल की उम्र के बाद परिवार बढ़ाने की तरफ ?ाकाव होना आम बात है. गर्भधारण में देरी की वजह से माताओं को कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है.

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7. जानिए गर्भावस्था को आसान बनाने के कुछ अहम सुझाव

अगर आप की गर्भावस्था सामान्य है, तो इस दौरान कामकाज जारी रखने में कोई नुकसान नहीं है. लेकिन आप को इस दौरान ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है. ऐसे कई तरीके हैं, जिन के जरीए आप काम करने के दौरान अपनी गर्भावस्था को आसान बना सकती हैं. गर्भावस्था के दौरान काम करते रहना हमेशा आसान नहीं होता है, लेकिन सही विकल्प चुन कर आप इस अवस्था के दौरान कामकाजी और निजी जीवन में बेहतर संतुलन बना सकती हैं.

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8. क्या आप जानते हैं प्रेग्नेंसी से जुड़े ये 7 मिथ और उनकी सच्चाई

यह सच है कि प्रेग्नेंसी के शुरू के दिनों में उलटियां होना बहुत सामान्य बात है, लेकिन इतनी सामान्य बात भी नहीं है जितना लोग समझ लेते हैं. सच्चाई  यह है कि ज्यादा उलटियां आने से न केवल गर्भवती वरन गर्भस्थ शिशु को भी नुकसान पहुंचता है. इसलिए बेहतर होगा कि आप डाक्टर से संपर्क करें.

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9. कैसी हो वर्किंग प्रैग्नैंट वूमन की डाइट, आप भी जानिए

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मां बनने वाली वर्किंग लेडी अकसर खुद को थकाथका सा महसूस करती है. 8-9 घंटे औफिस में रहने के कारण वह ज्यादा थक जाती है. उस के बाद वर्किंग महिला को घर का कामकाज भी करना पड़ता है. इसलिए पूरा दिन उस के लिए मुश्किल भरा होता है. आइए, जानें कि वर्किंग लेडी जो मां बनने वाली हो उस के लिए पूरे दिन का डाइट प्लान कैसा हो:

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10. जिंदगी की जंग विशेष: गर्भवती महिलाएं अपना और नवजात का जीवन बचाएं

कोविड संकट के दौर में गर्भवती महिलाओं को संक्रमण का अधिक जोखिम होता है. ऐसा इसलिए, क्योंकि इस समय ऐसी महिलाओं की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होती है, जिस से खतरा अधिक बना रहता है. ऐसे में गर्भवती महिलाएं कैसे खुद को सुरक्षित रख सकती हैं. आइए जानें?

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Winter 2021 : सर्दियों में बंद हो जाती है नाक, तो करें ये 6 उपाय

सर्दियों में बंद नाक होने से अक्सर लोग परेशान रहते हैं. इस हालत में सांस लेने में काफी परेशानी होती है, इसके साथ ही घुटन भी होती है. सर्दियों में ये समस्या आम है, इन परेशानियों में दवा लेने से पहले घरेलू उपायों को ट्राई करें.

  1. लें भाप

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नाक बंद होने की सूरत में भाप लेना काफी कारगर होता है. इसके लिए आप गर्म पानी में विक्स डाल दीजिए. विक्स जब पूरी तरह से पानी में घुल जाए तो इस गर्म पानी की ओर चेहरा कर के मोटे कपड़े से ढंक लें और तेजी से लंबी सांस लें. ऐसा करने से आपका नाक खुलेगा और सर्दी से भी काफी आराम मिलेगा.

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2. हर्बल टी का करें प्रयोग

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सर्दियों में हर्बल टी काफी फायदेमंद होती है. इसमें दालचीनी, काली मिर्च, तुलसी और रोजमेरी जैसे हर्ब प्रभावशाली होते हैं. समान्यत: आप जो चाय पीते हैं उसमें इन हर्ब्स को डाल लें,  आपकी बंद नाक खुल जाएगी.

3. प्‍याज

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प्‍याज कई ऐसे स्वास्थ्य गुणों से भरपूर होता है जो बंद नाक को खोलने में काफी कारगर होते हैं. नाक बंद हो जाए तो 5 मिनट तक प्‍याज के छिलके या प्‍याज को सूंघिए, इसका असर आपको तुरंत ही दिखेगा. आपका बंद नाक खुल जाएगा.

4. करें नींबू का प्रयोग

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एक कटोरे में दो चम्मच नींबू के रस में एक काली मिर्च कुट कर मिला लें. इस मिश्रण को नाक के पास लगा लें. थोड़ी देर तक इसे लगाने के बाद अपना मुंह धो लें. इसका असर जल्दी ही आपको दिखेगा.

5. नारियल तेल

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नारियल का पिघला तेल लें और उसे एक अंगुली पर ले कर नाक में लगा लें. फिर जोर से सांस लें ताकि ये तेल अंदर तक चला जाए. इसका असर आपको तुरंत देखने को मिलेगा, आपकी नाक तुरंत खुल जाएगी.

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6. कपूर

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कपूर की तेज महक बंद नाक को खोलने में काफी मददगार है. नारियल तेल में कपूर मिला कर सूंघना काफी लाभकारी होगा. इसके अलावा नाक को गर्माहट देकर भी बंद नाक को आसानी से खोल जा सकता है.

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अस्तित्व की तलाश

भारत भूमि युगे युगे: एक करोड़ के प्रशांत बोस

नक्सली कब कहां क्या कर गुजरें, इस की भनक सरकार और उस की एजेंसियों को नहीं रहती. लेकिन नक्सलियों को पुलिस और अर्धसैनिक बलों के खाने का भी मैन्यू तक मालूम रहता है. बीते दिनों ?ारखंड पुलिस ने 83 साल के नामी व एक करोड़ रुपए के इनामी नक्सली नेता प्रशांत बोस को पत्नी शीला मरांडी सहित जमशेदपुर से गिरफ्तार किया, जिन पर 5 राज्यों में 200 से भी ज्यादा मामले दर्ज हैं.

नक्सलियों के ईस्टर्न रीजनल ब्यूरो का यह मैंबर पुलिस को 4 दशकों से छका रहा था. बूढ़े हो चुके प्रशांत की प्रायोजित गिरफ्तारी से कुछ हासिल होगा, ऐसा लगता नहीं. इतना जरूर है कि जमींदारों और साहूकार टाइप के शोषकों ने चैन की सांस ली होगी क्योंकि प्रशात इन्हीं के खिलाफ शोषितों को इकट्ठा किया करते थे. आदिवासी इलाकों में उन्हें भगवान की तरह पूजा जाता था. अब कोई नया प्रशांत पैदा न हो, इस के लिए सामाजिक व सरकारी कोशिशें हों तो समस्या हल होती दिखे. समलैंगिक जज से परहेज क्यों सुप्रीम कोर्ट कौलेजियम ने तो पूरी निष्ठा व ईमानदारी से सीनियर एडवोकेट सौरभ कृपाल के नाम की सिफारिश हाईकोर्ट के जज के लिए कर दी है लेकिन सरकार उन के नाम पर कब और क्या फैसला लेती है,

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यह देखना दिलचस्प होगा क्योंकि सौरभ घोषित तौर पर समलैंगिक हैं. भगवा सरकार शूद्रों और औरतों की तरह समलैंगिकों को भी मानव मात्र ही नहीं मानती है, इसलिए काबिल होने के बाद भी उन्हें वह एक अहम न्यायिक पद देने में हिचकिचा रही है. रिटायर्ड जस्टिस बी एन कृपाल के बेटे सौरभ ने लंबी कानूनी लड़ाई आर्टिकल 377 के खिलाफ लड़ी और समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर निकलवाया. सरकार 4 वर्षों से एक खोखली दलील का सहारा ले रही है कि चूंकि कभी सौरभ का एक पार्टनर विदेशी हुआ करता था, इसलिए उन्हें जज नहीं बनाया जा सकता. यह, दरअसल, दलील नहीं बल्कि समलैंगिकों से नफरत की नुमाइश है जिस का विरोध अधिवक्ता समुदाय को करना चाहिए. बूआ-भतीजी बसपा सुप्रीमो मायावती की मां रामरती के निधन पर प्रियंका गांधी ने दूसरे नेताओं की तरह केवल मुंहजबानी संवेदना व्यक्त नहीं की बल्कि अपनी राजनीतिक बूआ से मिलने दिल्ली स्थित उन के निवास- 3, त्यागराज मार्ग भी पहुंचीं.

निकालने वालों ने इस के माने अपनेअपने हिसाब से निकाले और उत्तर प्रदेश के चुनाव से भी इस का संबंध जोड़ दिया. कोई प्रियंका की बौडी लैंग्वेज का विश्लेषण करता नजर आया तो किसी को मायावती का प्रियंका की पीठ पर हाथ रखना अर्थपूर्ण लगा. कुछ को माया व सोनिया का गले मिलने वाला सीन भी याद आ गया. अच्छा तो यह भर रहा कि किसी चैनल ने इस मुलाकात पर बहस का आयोजन नहीं कर डाला नहीं तो जाने. और कितनी नईनई बातें निकल कर आतीं. अघोषित तौर पर मायावती भगवा गैंग को मदद पहुंचा रही हैं लेकिन इस की कसक या गिल्ट भी कहीं न कहीं उन्हें है, पर वह इतनी नहीं है कि वे पौराणिकवादियों की वर्णव्यवस्था थोपने की मंशा पर पहले सा हमला कर पाएं. अब देखना दिलचस्प होगा कि यूपी में बसपा और कांग्रेस में से कौन तीसरे और चौथे नंबर पर रहता है.

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एक मूर्ति और सही सुषमा स्वराज एक खूबसूरत और मिलनसार नेत्री थीं. उन्हें अब मूर्ति के रूप में किसी चौराहे पर देखना एक तकलीफदेह अनुभव ही होगा. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने गृहनगर विदिशा के औडिटोरियम में उन की 3 करोड़ रुपए की मूर्ति लगवाने जा रहे हैं. यहां से सुषमा 2 बार सांसद रही थीं. देश पहले से ही मूर्तियों से अटा पड़ा है, ऐसे में एक और नई मूर्ति गैरजरूरी है लेकिन भगवा गैंग ने जब ठान ही लिया है कि देश में उस के महारथियों की मूर्तियां गांधी, नेहरू और इंदिरा की कुल मूर्तियों से ज्यादा होनी चाहिए फिर भले ही चाहे, एकाधदो और सार्वजनिक संपत्तियां बेचनी पड़ें तो कोई क्या कर लेगा.

अस्तित्व की तलाश : भाग 2

लेखिका- पूनम पाठक

उस की मां को उस से ज्यादा अपनी जाति या धर्म प्यारा था, जिस के लिए उन्होंने अपनी बेटी के प्यार व उस की ख़ुशी की कुर्बानी दे दी थी. ओह्ह… वंदना ने एक उसांस ली. सिर झटक कर उस ने कड़वी यादों की गिरफ़्त से छुटकारा पाना चाहा, मग़र निष्फल रही. हार कर वह सोफे पर निढाल पड़ गई, उस के मन में विचारों की अनवरत श्रृंखला जारी थी.

काफी रोने और सिसकने के बाद इस शादी को अपना प्रारब्ध मान उस ने समय से समझौता कर लिया. कुछ महीने सुकून में गुज़रे. मां की चाटुकारिता करने की कोशिश में प्रशांत उसे खुश रखता. लेकिन कहते हैं कि वक्त किसी का सगा नहीं होता. अपना बोया हमें यहीं इसी दुनिया में काटना पड़ता है.

विपक्षी पार्टी की साजिशों के तहत सत्तारुढ़ दल की कद्दावर नेता विधायक रामेश्वरी देवी को भ्रष्टाचार के आरोप में अपने पद से इस्तीफ़ा दे कर कुरसी से हाथ धोना पड़ा. सत्ता के जाते ही उन का पैसा, पावर, रुतबा सब जाता रहा. उन की बदनाम छवि से पार्टी को कहीं कोई नुकसान न पहुंचे, इस कारण पार्टी ने उन्हें दूध में पड़ी मक्खी की भांति निकाल फेंका. जिस पार्टी के लिए उन्होंने दिनरात एक कर दिया, उसी ने उन्हें आने वाले इलैक्शन में टिकट न दे कर अंगूठा दिखा दिया.

रामेश्वरी देवी बुरी तरह टूट चुकी थीं. जायदाद के नाम पर उन के पास अब वह घर ही बचा था जिस में वे रहती थीं. वक्त की इस करवट ने उन्हें चारों खाने चित्त कर दिया. इलाके की दबंग नेता को एक लाचार, अबला की खोल में परिवर्तित होते देर न लगी.

इधर वंदना ने सबकुछ भुला कर एक नई शुरुआत करने की कोशिश की, मग़र किसी समझौते की प्रक्रिया के तहत हुई इस शादी में समय के बदलते ही प्रशांत का व्यवहार भी बदलते मौसम सा साबित हुआ. अब तक उसे खुश रखने का प्रयास करने वाला प्रशांत अब बातबात में उस में कमियां निकालता, बातबेबात सब के सामने जलील करता. यहां तक की अब वह उस के चरित्र पर भी टीकाटिप्पणी करने से बाज न आता और कभीकभी वंदना पर अपना हाथ भी छोड़ देता.

मानस को पूरी तरह भुला कर इस रिश्ते को ईमानदारी से निभाने की कोशिश में लगी वंदना के लिए बिना वजह यह सब सहना मुश्किल होता जा रहा था. अपने ऊपर लगे चारित्रिक लांछन को वह बरदाश्त नहीं कर पा रही थी. क्योंकि उस का और मानस का प्रेम सच्चा था, जिस में दैहिक सुख की कहीं कोई चाह या गुंजाइश न थी.

आखिरकार, ये बातें रामेश्वरी देवी के कानों तक जा पहुचीं. समय के भारी फ़ेरबदल ने उन के विचारों की कट्टरता में भी आमूलचूल परिवर्तन ला दिया था. लिहाज़ा, अपनी इकलौती बेटी की जिंदगी का यह हश्र देख कर वे बहुत दुखी हुईं और अपनी करनी पर बहुत पछ्ताईं. वंदना को तलाक दिलवा कर उन्होंने अपनी गलती सुधारनी चाही, परंतु इस के लिए अब काफी देर हो चुकी थी. वंदना की कोख में एक नन्हा भ्रूण अंकुरित हो चुका था.

रामेश्वरी देवी ने उस के गर्भ में पल रहे भ्रूण को गिरवा कर उसे प्रशांत के साए से आज़ाद करना चाहा. लेकिन वंदना तैयार न हुई. हार कर उन्होंने बच्चे समेत सदा के लिए उस से मायके आ जाने का आग्रह किया जिसे भी वंदना ने सख्त लहजे में इनकार कर दिया. मां की तानाशाही प्रवृत्ति के चलते वह पिता के साए से हमेशा महरूम रही थी. यह गम उसे जिंदगीभर सालता रहा. इसलिए वह अपनी बेटी को उस के पिता के प्यार से वंचित नहीं रखना चाहती थी. सो, इन दुखों और परेशानियों को अपना नसीब मान कर वह सबकुछ सहने लगी.

खिलखिलाती हुई वंदना की जिंदगी अब घर की चारदीवारी के भीतर कैद हो चुकी थी. प्रशांत के लिए अस्तित्वहीन हो चुकी वंदना धीरेधीरे अपना स्वाभाविक स्वरूप खोने लगी. उस ने लाख कोशिशें कीं उस घर को अपनाने की, प्रशांत को अपना बनाने की. मगर प्रशांत पर इस सब का कोई फर्क न पड़ा. बेटी तृषा के होने के बाद भी उस का रवैया वंदना के प्रति तनिक न बदला.

हद तो तब हुई जब प्रशांत की जिंदगी में एक दूसरी औरत आ गई. वंदना इतनी मानसिक और शारीरिक यंत्रणाएं सह कर भी आज तक चुप रही थी पर सौतिया डाह का ये डंक उस की नसों में उबाल ले आया और वह अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो आख़िरकार विद्रोह कर बैठी.

इस पर प्रशांत ने एक और घटिया पैंतरा इस्तेमाल करते हुए उस पर बदचलनी का आरोप लगाया और उसे तलाक की धमकी दी. जाने कैसे उस ने वंदना और मानस की एक फोटो कहीं से जुगाड़ कर ली थी, जिस में हाथों में हाथ डाले वे प्रेमी परिंदे दुनिया से बेफ़िक्र हो कर कहीं घूम रहे थे. उस फोटो को उस के सामने उछालते हुए प्रशांत ने कहा कि वह उन मांबेटी की इज्जत पूरे समाज में ऐसे ही उछाल कर रख देगा जिस से वह और उस की मां कहीं किसी को मुंह दिखाने काबिल न बचेंगी. जिस का परिणाम यह होगा कि पहले ही अपना सबकुछ गंवा चुकी उस की लाचार मां समय से पहले ही मृत्यु का ग्रास बन जाएगी और वंदना पूरी दुनिया में अकेली रह जाएगी.

प्रशांत की ललकार ने वंदना का दिल कंपा दिया. सच में अगर मां को कुछ हो गया तो मायके के नाम पर उस का इकलौता सहारा भी छिन जाएगा और तलाक के बाद वह अपनी नन्हीं सी बच्ची को ले कर कहां जाएगी. अपनी दयनीय स्थिति पर वह खुल कर विलाप भी न कर पा रही थी. भीतर के इस डर ने उस की रहीसही हिम्मत को भी समाप्त कर दिया और वह पूरी तरह से प्रशांत के नियंत्रण में होती चली गई.

उस की जिंदगी में तृषा ही एकमात्र ख़ुशी थी जिस को पलतेपढ़ते देख वह सुकून से भर जाती. तृषा का खिलखिलाता चेहरा और मासूम शरारतें न चाहते हुए भी उसे मुसकराने पर मजबूर कर देतीं. इधर सालभर चले प्रेम प्रसंग के बाद प्रशांत ने उस दूसरी औरत से शादी रचा ली और उस के लिए एक फ़्लैट खरीद दिया जिस में अपनी सुविधानुसार वह जब तब आताजाता रहता था. लेकिन इस बीच भी वंदना पर उस का शिकंजा कसा ही रहा.

समय अपनी ही गति से आगे बढ़ा जा रहा था. नन्ही तृषा अब 21 साल की हो चली थी. दिखने में अपनी मां की तरह खूबसूरत तृषा उसी की तरह खुशमिजाज़ और जिंदादिल थी. वह घर के माहौल को अब काफीकुछ समझने लगी थी. लिहाज़ा, मां के प्रति पिता का गलत रवैया और उस पर मां की चुप्पी की मुहर कई बार उसे व्यथित कर देती. घर में पिता द्वारा बारबार होता मां का अपमान उस के लिए असहनीय होता जा रहा था. लेकिन वंदना अपनी फूल सी बच्ची को इन पचड़ों में नहीं पड़ने देना चाहती थी, इसलिए प्यारभरी नसीहत दे कर वह उसे हमेशा चुप करा देती. तृषा मां की बात का मान रखते हुए उस वक्त तो चुप्पी साध लेती मगर उस का मन भीतर ही भीतर विद्रोह कर उठता.

अस्तित्व की तलाश : भाग 1

लेखिका- पूनम पाठक

तमाम बंदिशों से दूर वंदना आज खुली हवा में सुकून की सांस ले रही थी. तोड़ आई थी अपने पीछे वह सात जन्मों के उस बंधन को जो बेड़ी बन कर कई सालों से उसे जकड़े हुए था. वह रिश्ता जिसे कभी उस ने जीजान से संवारने की कोशिश की थी, शिद्दत से निभाना चाहा था आखिरकार दरक चुका था. किसी रिश्ते को यों तोड़ देना सहज तो नहीं होता लेकिन यह एकतरफ़ा रिश्ता आख़िर वह निभाती भी कब तक? वैसे भी, आज तक इस रिश्ते में उस के हिस्से सिर्फ़ और सिर्फ़ कर्तव्यों की सूची आई थी, कहीं किसी अधिकार का नामोनिशान न था.

46 वर्षीया वंदना अब इस रिश्ते का बोझ ढोतेढोते थक चुकी थी. मन से तो बहुत पहले  ही वह इस रिश्ते को नकार चुकी थी, पर चूंकि पत्नी होने के साथ वह एक मां भी थी, सो बेटी के प्रति अपनी आख़िरी ज़िम्मेदारी निभा कर उस ने इस रिश्ते को तिलांजलि देने का मन बना लिया.

अभी पिछले हफ्ते ही उस की बेटी की शादी हुई थी. उस के बाद चारछह दिन मेहमानों की आवाजाही में बीत गए. कल सुबह ही उस ने पति प्रशांत का घर छोड़ दिया था. छोड़ आई थी उस के लिए वह एक चिट्ठी भी कि उसे तलाशने की कोशिश न की जाए. जिंदगी को अब वह अपने लिए, अपनी मरजी के मुताबिक जीना चाहती है.

अब तक उस ने एक आम घरेलू औरत की तरह अपने घर की साजसंभाल की थी. उस की दुनिया सिर्फ घर और घरवालों तक ही सीमित थी. पहली बार घर से अकेले बाहर निकलते वक्त उसे थोड़ा डर तो लगा लेकिन वह जानती थी कि अगर अभी नहीं तो कभी नहीं. बदलाव का यह अवसर उसे बारबार न मिलेगा.

वंदना ने सामने रखा कौफ़ी का मग उठाया और एक सिप लिया, फ़िर टहलती हुई बालकनी में आ खड़ी हुई, जहां से प्रकृति के खूबसूरत नज़ारे देख उस का मन प्रफुल्लित हो उठा. पंचगनी की हरीभरी वादियों के बीच, प्रकृति की गोद में बसे इस खूबसूरत क़सबे चंदाना में एक छोटे मगर सर्वसुविधायुक्त कौटेज में कौफ़ी की चुस्कियों के साथ प्रकृति का नैसर्गिक सौंदर्य देख वह मंत्रमुग्ध हो चली थी.

शहर की चकाचौंध और शोरगुल में मशीनी जिंदगी जीतेजीते वंदना बहुत थक चुकी थी. लिहाज़ा, यहां की शांति ने उस के दिलोदिमाग़ को तरोताज़ा कर दिया था, जितना सुंदर दृश्य उतना ही प्यारा मौसम. बारिश की हलकी फुहारों ने इसे और ख़ुशगवार बना दिया था. उस पर धीमी आवाज़ में चल रही जगजीत सिंह की गज़ल ‘प्यार हम से जो किया तुम ने तो क्या पाओगी…’ ने उसे बरसों पुराने समय में पहुंचा दिया. आज फिर से प्रकृति का सामीप्य पा कर उस का मन कहीं खो सा गया.

‘मानस, बात करो न अपने मम्मीपापा से. मेरे घर तकरीबन रोज ही कोई न कोई आ टपकता है शादी के लिए. अगर मम्मी को कोई पसंद आ गया तो बैठे रह जाना तुम अपनी कविताएं लिखते. मैं तो शादी कर के चल दूंगी उस के साथ,’ मानस को नोटबुक में कुछ लिखते देख वंदना ने चिढ़ाने की गरज़ से कहा. बारिश के सुहाने मौसम में वह मानस के साथ पाताल, पानी, झरने की ख़ूबसूरती देखने आई थी.

‘यार, मौसम की खुशमिजाजी देख मेरी लेखनी अपनेआप चल पड़ती है, इस में मेरा कोई दोष नही,’ मानस हंसा.  उस के हंसने से उस के गालों के गड्ढे और गहरे हो चले, जिन्हें देख वंदना को उस पर और भी प्यार आ जाता था. ‘और रही बात तुम्हारे ऊपर शादी के दबाव की, तो मैं नौकरी के जुगाड़ में ही लगा हुआ हूं. एक अच्छी सी नौकरी मिलते ही तुम्हारी हिटलर मां से तुम्हारा हाथ मांगने प्रस्तुत हो जाऊंगा,’ अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए मानस ने चुटकी ली.                                                                                                                                               ‘क्या कहा, मेरी मां हिटलर. जाओ, मैं तुम से बात नही करती.’

‘अच्छा माफ़ कर दो वंदू, आगे से ऐसी गलती नही होगी,’ मानस ने बड़ी स्टाइल से कानों को हाथ लगाते हुए कहा तो वंदना की हंसी छूट पड़ी.

उस वक्त यह बात भले ही मज़ाक में खत्म हो गई हो, पर यह एक बहुत बड़ा सच था कि अपने एरिये की विधायक वंदना की मां रामेश्वरी देवी एक बहुत तेजतर्रार व तानाशाह प्रवृत्ति की महिला थीं, जिन की दबंगई पूरे इलाके में  मशहूर थी. वंदना उन की इकलौती पुत्री थी जिसे उन्होंने अपने कीमती समय के अलावा बाकी सभीकुछ दिया था.

वे कट्टर हिंदुत्व की समर्थक थीं. यह भी एक बहुत बड़ा रोड़ा था वंदना और मानस के बीच. मानस एक छोटी जाति से था. सो, उस के मन में इस डर का होना स्वाभाविक था. उस ने कई बार मज़ाक ही मज़ाक में वंदना से इस बात का ज़िक्र भी किया था. लेकिन वंदना को अपने प्यार पर पूरा यकीन था, साथ ही, इस बात का भरोसा भी कि मां उस की बात कभी नहीं टालेंगी. कालेज के ज़माने से ही मानस की कविताएं और शायरी पसंद करने वाली वंदना उसे बेतहाशा प्यार करती थी. मानस भी उसे अपने दिल की गहराइयों से चाहता था. दोनों एकदूसरे के साथ ही अपना भविष्य देखते थे.

मानस कविहृदय होने के साथ एक मंजा हुआ युवा लेखक भी था. उस की लेखनी की धार बहुत पैनी थी. वह कालेज के ज़माने से ही भ्रष्ट और बेईमान लोगों के खिलाफ़ अपनी लेखनी से ज़हर उगलता था. उस की कविताएं और लेख ज्वलंत मुद्दों को लिए समाज की विसंगतियों पर बेहद तीखा प्रहार करते थे. वह जाति-धर्म से ऊपर एक ऐसे समाज की संरचना के लिए प्रतिबद्ध था जहां इंसान और इंसानियत ही सर्वोपरि हो तथा बाकी चीज़ें गौण. वह समाज के बीच की आर्थिक व जातीय खाई को पाटने के लिए प्रतिबद्ध था और बड़ी ही बेबाकी व मुखरता से अपने विचारों को शब्दों का जामा पहनाता था, इसीलिए धर्म के ठेकेदारों की आंख में भी सदा खटकता था.

बड़ी ही जद्दोजेहद से उसे एक अख़बार की रिपोर्टिंग का काम मिल गया. काम उस के मन मुताबिक था, सो उस ने पूरी लगन व ईमानदारी से इसे करना शुरू कर दिया. पर जैसा कि उसे भय था, वंदना के बहुत गिड़गिड़ाने पर भी उस की मां ने छोटी जाति और निम्न सामाजिक स्तर का होने के कारण मानस को अपना दामाद बनाना स्वीकार नहीं किया. उलटे, उन्होंने वंदना को यह धमकी दी कि अगर उस ने मानस से शादी करने का पागलपन नहीं छोड़ा तो वे मानस का कत्ल करवा देंगी. और तो और, गुस्से में वंदना पर सख्ती से दबाव बना कर आननफानन उस की शादी उन्होंने कपड़ों के एक साधारण कारोबारी प्रशांत से करवा दी, जो उन की पार्टी को फंड वगैरह दिया करता था.

हथेली पर आत्मसम्मान: सोम को क्या समझाना चाहता था श्याम

‘‘सोम, तुम्हारी यह मित्र इतना मीठा क्यों बोलती है?’’

श्याम के प्रश्न पर मेरे हाथ गाड़ी के स्टीयरिंग पर तनिक सख्त से हो गए. श्याम बहुत कम बात करता है लेकिन जब भी बात करता है उस का भाव और उस का अर्थ इतना गहरा होता है कि मैं नकार नहीं पाता और कभी नकारना चाहूं भी तो जानता हूं कि देरसवेर श्याम के शब्दों का गहरा अर्थ मेरी समझ में आ ही जाएगा.

‘‘जरूरत से ज्यादा मीठा बोलने वाला इनसान मुझे मीठी छुरी जैसा लगता है, जो अंदर से हमारी जड़ें काटता है और सामने चाशनी बरसाता है,’’ श्याम ने अपनी बात पूरी की.

‘‘ऐसा क्यों लगा तुम्हें? मीठा बोलना अच्छी आदत है. बचपन से हमें सिखाया जाता है सदा मीठा बोलो.’’

‘‘मीठा बोलना सिखाया जाता है न, झूठ बोलना तो नहीं सिखाया जाता. यह लड़की तो मुझे सिर से ले कर पैर तक झूठ बोलती लगी. हर भाव को प्रदर्शन करने में मनुष्य एक सीमा रेखा खींचता है. जरूरत जितनी मिठास ही मीठी लगती है. जरूरत से ज्यादा मीठा किस लिए? तुम से कोई मतलब नहीं है क्या उसे? कुछ न कुछ स्वार्थ जरूर होगा वरना आज के जमाने में कोई इतना मीठा बोलता ही नहीं. किसी के पास किसी के बारे में सोचने तक का समय नहीं और वह तुम्हें अपने घर बुला कर खाना खिलाना चाहती है. कौनकौन हैं उस के घर में?’’

‘‘उस के मांबाप हैं, 1 छोटी बहन है, बस. पिता रिटायर हो चुके हैं. पिछले साल ही कोलकाता से तबादला हुआ है. साथसाथ काम करते हैं हम. अच्छी लड़की है शोभना. मीठा बोलना उस का ऐब कैसे हो गया, श्याम?’’

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श्याम ने ‘छोड़ो भी’ कुछ इस तरह कहा जिस के बाद मैं कुछ कहूं भी तो उस का कोई अर्थ ही नहीं रहा. घर पहुंच कर भी वह अनमना सा चिढ़ा सा रहा, मानो कहीं का गुस्सा कहीं निकाल रहा हो.

‘‘लगता है, कहीं का गुस्सा तुम कहीं निकाल रहे हो? क्या हो गया है तुम्हें? इतनी जल्दी किसी के बारे में राय बना लेना क्या इतना जरूरी है…थोड़ा तो समय दो उसे.’’

‘‘वह क्या लगती है मेरी जो मैं उसे समय दूं और फिर मैं होता कौन हूं उस के बारे में राय बनाने वाला. अरे, भाई, कोई जो चाहे सो करे…तुम्हारी मित्र है इसलिए समझा दिया. जरा आंख और कान खोल कर रखना. कहीं बेवकूफ मत बनते रहना मेरी तरह. आजकल दोस्ती और किसी की निष्ठा को डिस्पोजेबल सामान की तरह इस्तेमाल कर के डस्टबिन में फेंक देने वालों का जमाना है.’’

‘‘सभी लोग एक जैसे नहीं होते हैं, श्याम.’’

‘‘तुम से ज्यादा तजरबा है मुझे दुनिया का. 10 साल हो गए हैं मुझे धक्के खाते हुए. तुम तो अभीअभी घर छोड़ कर आए हो न इसलिए नहीं जानते, घर की छत्रछाया सिर्फ घर में ही होती है. घर वाले ही हैं जो कुछ नहीं कहते फिर भी प्यार से बात भी करते हैं और पूछते हैं कुछ और भी चाहिए तो ले लो. बाहर का इनसान प्यार से बात कर जाए, हो ही नहीं सकता. अपना प्यार जताए तो समझ में आता है क्योंकि वह अपना है…बाहर वाला प्यार क्यों जताए? किस लिए वह आप का दुखदर्द बांटे? सोम, आखिर क्या लगते हो तुम उस के?’’

‘‘तुम्हें क्या लगता है क्या सिर्फ वही चोट देता है, जो हमारा कुछ नहीं लगता? अपना चोट नहीं देता है क्या? अच्छा, एक बात समझाओ मुझे, पराया इनसान चोट पहुंचा जाए तो पीड़ा का एहसास ही क्यों हो. वह तो कुछ लगता ही नहीं है न. उस के व्यवहार को हम इस तरह लें ही क्यों कि हमें चोट जैसी तकलीफ हो.

‘‘तुम कल इस शहर में आए. ट्रेन से उतरे तब अकेले तो नहीं थे न. सैकड़ों लोग स्टेशन पर उतरे होंगे. मुझ से मिलने तो कोई नहीं आया और न आए मेरी बला से पर हां, यदि तुम बिना मिले चले जाते तो दुख होता मुझे. सिर्फ इसलिए कि तुम अपने हो…इस का यही मतलब है न कि चोट पराए नहीं अपने देते हैं. इसीलिए पराए इनसान को हम इनसान ही समझें तो बेहतर है. कभी किसी के इतना भी पास न चले जाओ सोम कि धागों में उलझनें पड़ जाएं. कभीकभी उलझ जाने पर धागों का सिरा….’’

‘‘कैसा धागा और कैसा सिरा. इनसानों में धागे होते हैं क्या? तुम में और मुझ में कौन सा धागा है, जरा समझाना…’’

‘‘धागा था तभी तो अपनी बेंगलुरु की फ्लाइट छोड़ उसे 2 दिन के लिए आगे बढ़ा कर तुम यहां दिल्ली मेरे आफिस में चले आए. मुझे तो पता भी नहीं था तुम आने वाले हो. कौन लाया था तुम्हें मेरे पास? कोई तो खिंचाव था न, वरना इतनी तकलीफ उठा कर तुम मेरे पास कभी नहीं आते. तुम्हें क्या मतलब और क्या लेनादेना था मुझ से. सिर्फ धागे ही थे जो तुम्हें यहां मेरे पास खींच लाए हैं.’’

मेरी सारी बातों पर और मेरे सवाल पर श्याम मुझे टकटकी लगा कर देखता रहा जिस के साथ मैं ने अपने जीवन के 4 साल बिताए थे. इंजीनियरिंग में हम साथसाथ थे. वह होस्टल में था और मैं पढ़ने के लिए घर से जाता था. 2 साल एम.बी.ए. में लगे और अब 2 साल से हम दोनों एक अच्छी कंपनी में काम कर रहे हैं. वह भावुक और संवेदनशील है.

कहना शुरू किया श्याम ने, ‘‘मेरी एक सहयोगी है. पति के साथ उस का झगड़ा चल रहा है. तलाक तक बात पहुंच चुकी है. बहुत परेशान रहती है. पति अमेरिका में है, लंबी कानूनी प्रक्रिया और लाखों दांवपेंच. मांबाप के साथ रहती थी. कुछ दिन हुए कार दुर्घटना में मांबाप दोनों ही गुजर गए. उस की बहन और बहनोई दोनों ने मातापिता का घर और कारोबार संभाल कर उसे बेदखल ही कर दिया. आज की तारीख में वह नितांत अकेली है. मातापिता, बहन और पति, सभी से नाता टूट चुका है. मुझ से वह हर तरह की बात कर लेती है. एक तरह से आज की तारीख में मैं ही उस का सब कुछ हूं. कह सकते हो सुरक्षा कवच की तरह उसे संभाल रखा है मैं ने. हर रिश्ते को स्वयं में समेट कर उस का मरहम बनता रहता हूं…दिनरात जबजब जरूरत पड़ती है मैं चला जाता हूं…’’

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मैं अपलक उस का चेहरा पढ़ता रहा. जानता हूं श्याम पूरी ईमानदारी से उस की सहायता करता रहा होगा. तन, मन और धन तीनों से हाथ धो चुका होगा तभी इतनी पीड़ा में है.

‘‘मैं जुड़ गया हूं उस के साथ और उस का जवाब है मैं शादी के लायक ही नहीं हूं. शादी के लिए तो परिपक्वता की जरूरत होती है और मैं परिपक्व नहीं हूं.’’

‘‘यह परिपक्व होना किसे कहते हैं जरा बताना मुझे. एक तलाकशुदा औरत को मासूम समझना नासमझी है या उस के सुखदुख समझना. परिपक्व होता अगर उस की सुनाई बातों में उस का भी दोष निकालता. जिस तरह उस का पति उसे लांछित करता रहा उसी तरह मैं भी करता. क्या तभी उसे लगता मैं परिपक्व हूं? तुम्हीं समझाओ, मैं कहां चूक गया?

‘‘सामने वाले पर विश्वास कर लेना ही क्या मेरा दोष है? मेरे जैसे ही उस के और दोस्त हैं जो उस की उसी तरह से सहायता करते हैं जैसे मैं करता हूं. हम अच्छे दोस्त हैं बस…उस का कहना है हम सभी दोस्त हैं वो दूसरे भी और मैं भी.

‘‘दोस्ती के नाम पर ही क्या मैं ने हजारों खर्च कर दिए? मेरी भावनाओं को उस ने समझा नहीं होगा, इतनी नादान होगी वह ऐसा तो नहीं होगा न…वह समझदार है और मैं नासमझ.’’

श्याम की सारी गोलमोल बातें और उस की तकलीफ मेरे सामने अब आईने की तरह साफ हो चुकी थीं. मैं ने उसे समझाया, ‘‘उस से मिलनाजुलना बंद कर दो, श्याम. दूर हो जाओ तुम उस से, यही इलाज है. रिश्तों की कद्र नहीं है उस लड़की में वरना वह तुम्हारा मन नहीं दुखाती.’’

लपक कर भीतर गया श्याम और अटैची से महंगी कश्मीरी शाल निकाल लाया. उस ने यह शाल मंगाई है. 10 हजार रुपए कीमत है इस की. और यह पहली बार नहीं हुआ.

‘‘क्या वह भी तुम्हें इतने महंगे उपहार देती है?’’

‘‘पागल हो गए हो क्या? वह लड़की है सोम, मैं उस से उपहार लेता अच्छा लगूंगा क्या?’’

‘‘तो किस की कीमत वसूलती है वह तुम से. क्या तुम्हारा रिश्ता पाकसाफ है?’’

चौंक गया श्याम. मेरा सवाल था ही ऐसा कठोर. आंखें भर आईं उस की. अपलक मेरा चेहरा देखता रहा. मैं श्याम को जानता हूं. चरित्रवान है. इस ने कभी कोई लक्ष्मण रेखा नहीं लांघी होगी और अगर लांघी नहीं तो कुछ तो है जो जायज नहीं है. इतने महंगे उपहार लेने का उस लड़की को भी क्या अधिकार है. हर रिश्ते की एक गरिमा होती है. दोस्ती की अलग सीमा रेखा है और प्यार की अलग. अगर प्यार नहीं करती, किसी रिश्ते में बंधना नहीं चाहती तो इस्तेमाल भी क्यों?

श्याम का हाथ पकड़ कर भींच लिया मैं ने.

‘‘मैं जानता हूं तुम कभी गलत नहीं हो सकते. अपने प्यार का निरादर मत होने दो. वह लड़की तुम्हें डिजर्व नहीं करती. प्रकृति ने तुम्हें वैसा नहीं बनाया जैसा उसे बनाया है. तुम जितने ईमानदार हो वह उतनी ईमानदार नहीं है. उस का तलाक क्यों हुआ होगा? तलाक होने में भी कौन जाने किस का दोष है? जो सब तुम ने सुनाया है उस से तो यही समझ में आता है कि वह लड़की बंध कर रहना ही नहीं चाहती और प्यार तो बंधन चाहता है न. जो सब का हो वह किसी एक का होना नहीं चाहता और प्यार बांधना चाहता है, प्यार में जो एक का है वह सब का नहीं हो सकता है.’’

‘‘मैं क्या करूं, सोम? ऐसा लगता है लगातार ठगा जा रहा हूं. सब लुटा कर भी खाली हाथ हूं.’’

‘‘लुटना छोड़ दो श्याम, आंखें मूंद कर उस रास्ते पर मत चलो जो गहरी खाई में उतरता है. शोभना के विषय में बात कर रहे थे न तुम, उस का मीठा बोलना तुम्हें पसंद नहीं आया था. उस का अपने घर बुलाना भी तुम्हें अच्छा नहीं लगा. उस के पीछे कारण पूछ रहे थे न तुम…कारण है न. हम दोनों शादी करने वाले हैं. तुम मेरे मित्र हो और उसी नाते वह तुम्हारा मानसम्मान करना चाहती है, बस.’’ अवाक् तो होना ही था श्याम को.

‘‘पिछले डेढ़ साल से हम साथसाथ काम कर रहे हैं. मेरे हर सुखदुख मेें वह मेरा साथ देती है. जितना मैं उस के लिए करता हूं उस से कहीं ज्यादा वह मेरे लिए करती है. उपहार के नाम पर मैं ने उसे कभी कुछ भी नहीं दिया क्योंकि उसे बिना किसी रिश्ते के कुछ भी लेना पसंद नहीं. जबरदस्ती कुछ ला कर दे दूं तो वह भी कुछ वैसा ही कर के सब बराबर कर देती है क्योंकि दोस्ती में लेनादेना बराबर हो तभी सम्मानजनक लगता है…’’

‘‘हैरान हूं मैं. वह लड़की किस अधिकार से तुम्हें इतना लूट रही है और रिश्ता भी बांधना नहीं चाहती. मत करो उस से इतना प्यार और अपना प्यार इतना सस्ता मत बनाओ कि कोई उसे अपमानित कर पैरों के नीचे रौंदता चला जाए. एक रेखा खींचो, श्याम.’’

आंखें नम हो गईं श्याम की.

‘‘तुम्हारी होने वाली भाभी है शोभना और उस के कुछ गुण हैं जिन की वजह से मैं उस की इज्जत भी करता हूं. मेरी मान्यता है जब तक तुम किसी की इज्जत नहीं करते तब तक तुम उस से प्यार नहीं कर सकते. इकतरफा प्यार से आखिर कब तक निभा सकता है कोई?’’

कड़वी सी मुसकान चली आई थी श्याम के होंठों पर जिस में उस की पीड़ा मुझे साफसाफ नजर आ रही थी. लगता है कि अब वह उस लड़की का सम्मान नहीं कर पाएगा क्योंकि उस ने हाथ का कीमती शाल एक तरफ सरका दिया था… हिकारत से, मानो उसी पर अपना गुस्सा निकालना चाहता हो.

मेरा हाथ स्नेह से थाम रखा था श्याम ने. उस के हाथ की पकड़ कभी सख्त होती थी और कभी नरम. उस के भीतर का महाभारत उसे किस दिशा में धकेलेगा मैं नहीं जानता फिर भी एक उम्मीद जाग रही थी मन में. इस बार जब वह वापस जाएगा तब काफी बदल चुका होगा. अपने प्यार का, अपनी भावनाओं का सम्मान करना सीख चुका होगा.

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