लेखक- सुनील शर्मा 

अब ओलिंपिक खेलों का बुखार धीरेधीरे उतरने लगा है. सभी खिलाड़ी टोक्यो से वापस आ चुके हैं. जो जीते हैं वे जश्न के माहौल में हैं और जो जीततेजीतते रह गए या जीत नहीं पाए, उन में कसक है. इस बार भारत ने 7 मैडल जीते जो अपनेआप में रिकौर्ड है. जो अजूबा भाला फेंक में नीरज चोपड़ा ने किया है, वह नए इतिहास की सुनहरी इबारत से कम नहीं है. उन के गोल्ड मैडल की वजह से देश पदक तालिका में 48वें नंबर पर खड़ा था. इस के अलावा भारत ने मुक्केबाजी, बैडमिंटन और पुरुष हौकी में कांसे का पदक जीतने के साथसाथ कुश्ती और भारोत्तोलन में सिल्वर मैडल भी जीता.

पर यहां एक बात गौर करने लायक है कि ये जो भी पदकवीर हैं, वे ज्यादातर गांवदेहात के ठेठ बच्चे हैं और ज्यादा पढ़ेलिखे भी नहीं. इंगलिश तो क्या, बहुत से खिलाडि़यों को हिंदी भी अच्छे तरीके से बोलनी नहीं आती है. ऊपर से सभी गरीब घरों के या ज्यादा से ज्यादा मध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले. फिर भी ऐसे होनहारों ने खेल के महाकुंभ में अपना लोहा मनवाया है, जो तारीफ के काबिल है. साथ ही, उन के मातापिता भी उन की इस जीत में बराबर के हकदार हैं, जिन्होंने अभावों में अपने बच्चों की खेल प्रतिभा पर भरोसा किया और कर्ज ले कर उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी. अब भले ही सरकारें जीते हुए खिलाडि़यों पर पैसे, पद और पुरस्कारों की ?ाड़ी लगा रही हैं, पर हकीकत तो यही है कि आज भी देश में खेलों के प्रति जनून की कमी है. आर्थिक मदद की लीपापोती होती है और जब खिलाड़ी को अपनी प्रतिभा निखारने की सब से ज्यादा जरूरत होती है, तब उन्हें अंगूठा दिखा दिया जाता है. इस सब के बावजूद अगर खिलाड़ी देश का नाम पूरी दुनिया में रोशन करते हैं तो वे यकीनन शाबाशी के हकदार हैं.

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