आज पूरे विश्व में हिटलर और उस की दहशत के बारे में कौन नहीं जानता होगा. ऐसा क्रूर शासक, जिस के बारे में प्रचलित किस्से कहानियां आज भी रूह कंपा देती हैं, सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्या लोकतंत्र के दमन का ऐसा भी कोई शासन चलाया जा सकता था? इस प्रश्न का जवाब यदि हिटलर युग में ढूंढा जाता तो शायद नहीं मिलता, पर आज इस का जवाब जोसेफ गुएबल्स के रूप में मिलता है.

जोसेफ गोएबल्स नाजी जर्मनी का मिनिस्टर औफ प्रोपेगेंडा था. गोएबल्स का कहना था कि ‘एक झूठ को अगर बारबार दोहराया जाए तो वह सच बन जाता है और लोग उसी पर यकीन करने लगते हैं.’

बात बिलकुल सही थी, इसलिए पूरे विश्व में हिटलर के राज और जोसफ के काज को मानने वाले संकीर्ण लोगों ने इसे तहेदिल से स्वीकार किया. अब जोसफ तो नहीं रहा, पर उस की कही बातें कईयों के मनमस्तिष्क पर घर कर गई है और आधुनिक तकनीकी युग में यहां पुरे तंत्रयंत्र से हर साख पर जोसफ सरीखे खड़े हो गए है जिन का काम सिर्फ सरकार का प्रचारतंत्र बनना हो गया है.

इस का मौजूदा उदाहरण किसान आन्दोलन है. बीते लंबे समय से दिल्ली के बौर्डर पर चलने वाले किसान आंदोलन आज किसी से भी अछूता नहीं है. इस में कोई शक नहीं कि आंदोलन से ध्यान भटकाने के लिए तमाम मैनस्ट्रीम मीडिया चैनलों पर किसानों के मुद्दे पर अब बहस नहीं हुआ करती, वह लगातार किसान के मुद्दों से बच रही है. अगर वह किसानों के मुद्दों को थोड़ा बहुत कवर भी करती है तो वह महज खानापूर्ति और दिखावा मात्र ही है जिसे भी वह किसानों पर ही दोष मढ़ने के लिए दिखाया जाता है. आंदोलनरत किसान इस बात से अनजान नहीं है. वह जानते हैं कि उन के मुद्दों को आम लोगों से छिपाने के लिए टीवी चैनलों पर बेफिजूल के मुद्दों पर बहस चलती रहती है.

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