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राकेश टिकैत: अचानक उगा किसान नेता

Writer- रोहित और शाहनवाज

एक साल से ज्यादा चले किसान आंदोलन ने कई उतारचढ़ाव देखे, बहुतकुछ सहा पर आखिरकार जीत हासिल की. जीत का बड़ा श्रेय किसान नेताओं को जाता है जिन्होंने अपनी सू?ाबू?ा से फैसले लिए. इस में उत्तर प्रदेश के छोटे से गांव सिसौली से संबंध रखने वाले राकेश टिकैत किसानों के एक बड़े नेता के तौर पर उभरे और जमीनी फैसलों से सरकार के दांवपेंच फेल कर दिए. पेश है किसान आंदोलन पर यह ग्राउंड रिपोर्ट.

दिल्ली के बौर्डरों पर किसानों को बैठे पूरे 2 महीने बीत चुके थे, पर 28 जनवरी, 2021 वाली वह रात भयानक और कई आशंकाओं से घिरती चली जा रही थी. नहीं, उस दिन

3 डिग्री तापमान में कंकपाती सर्दी की फिक्र किसानों को नहीं थी, क्योंकि उन्हें तो सर्द ठिठुरते दिनों में पौ फटने से पहले ही फसल कटाई के लिए जाना पड़ता है. उन्हें फिक्र थी उस अंतहीन रात की जो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी और बाकी दिनों के मुकाबले ज्यादा अंधेरी व लंबी लग रही थी.

दरअसल, 26 जनवरी की घटना के बाद सरकार को यह पहला मौका हाथ लगा था जब वह किसानों पर धरना खत्म करने का दबाव बना सकती थी, उन्हें भीतर तक डरा सकती थी और उन से बौर्डर खाली कराने का माहौल तैयार कर सकती थी. किसान भी हताश थे और पहले के मुकाबले आत्मविश्वास की कमी ?ालकने लगी थी. इस मौके को लपकने के लिए तीनों मजबूत बौर्डरों में से सब से पहले सौफ्ट टारगेट के तौर पर ‘गाजीपुर बौर्डर’ को निशाना बनाया गया.

उत्तर प्रदेश प्रशासन ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि फौरन गाजीपुर का धरना खत्म करवाएं. सूचना मिलते ही गाजीपुर बौर्डर पर पुलिस बलों की तैनाती में इजाफा होने लगा. शाम तक गाजीपुर बौर्डर पर देखते ही देखते सैकड़ों की तादाद में पुलिस, रैपिड ऐक्शन और पैरामिलिट्री की फोर्स अपने साजोसामान के साथ प्रदर्शन स्थल खाली करवाने के लिए जमा होने लगी, मानो किसी बड़े जंग की तैयारी चल रही हो.

पुलिस फोर्स के साथसाथ गाजीपुर बौर्डर पर मीडियाकर्मियों की भीड़ ने किसानों का उपहास और उलाहना करने के लिए जमावड़ा लगा लिया था, मानो किसानों की इस स्थिति में चैनलों की जीत छिपी हो. साथ ही, गाजियाबाद का स्थानीय विधायक अपने समर्थकों व लाठीडंडों के साथ नारे लगाता रहा कि ‘दिल्ली पुलिस लट्ठ बजाओ, हम तुम्हारे साथ हैं.’ यह पूरा वाकेआ सुनियोजित था. बढ़ती रात के साथसाथ माहौल में बेचैनी होने लगी थी. क्या किसानों से धरना खत्म करवा दिया जाएगा? क्या किसान जमे रहेंगे? क्या यह गाजीपुर आंदोलन की अंतिम रात है? ये सवाल सभी के मन में खलबली मचाने लगे थे.

इतने में गाजीपुर बौर्डर के आंदोलन को संभाल रहे किसान नेता राकेश टिकैत भावुक हो पड़े. वे भावुक हो कर कहने लगे, ‘‘राकेश टिकैत न गांव जाएगा, न धरना खाली करेगा, न धरना स्थल खाली होगा. मैं देश के किसानों को बरबाद नहीं होने दूंगा. ये कानून भी वापस होंगे और अगर ये कानून वापस नहीं हुए तो राकेश टिकैत आत्महत्या करेगा.’’

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राकेश टिकैत के ये शब्द मानो पत्थर की लकीर बन गए. इन शब्दों ने आंदोलन में दोबारा जान फूंक दी. वीडियो घरघर पहुंचा तो किसान अपने नेता के लिए धरनास्थल पर बड़ी तादाद में वापस जुटने लगे. मानो वे अब मरमिटने को तैयार हों. उत्तर प्रदेश ही नहीं, हरियाणा और उत्तराखंड के किसान भी रातोंरात गाजीपुर बौर्डर के लिए निकल पड़े. देखते ही देखते धरनास्थल किसानों से भर गया. कुछ समय पहले तक जहां पुलिसकर्मी ज्यादा दिखाई दे रहे थे, अब वे किसानों के बीच से गायब होते दिखे. किसान अपने नेता को भावुक होते देख आक्रोश में थे. कल तक जिस आंदोलन की साख धूमिल होती दिखाई दे रही थी, जिस के पतन की इबारतें लिखी जा रहीं थीं, जिस का आत्मविश्वास डगमगा चुका था, उस में एकाएक जोश फूटने लगा.

यह कमाल था राकेश टिकैत का और उन के व्यावहारिक स्वभाव का, जिस से देश के किसानों ने खुद को जुड़ा हुआ महसूस किया. इस विकट स्थिति में भी आंदोलन को न छोड़ने व अपनी मांगों पर अड़े रहने की जिद से राकेश टिकैत को इस पूरे आंदोलन में एकछत्र राष्ट्रीय किसान नेता के तौर पर पहचान मिली. इस रात के बाद किसान आंदोलन को नया आयाम मिल चुका था. राकेश टिकैत की अपनी स्वतंत्र पहचान बन चुकी थी कि चाहे कुछ भी हो जाए, टिकैत ‘टिका’ रहेगा. किसानों ने इस रात के बाद फिर वापस मुड़ कर नहीं देखा और नई सुबह के साथ आंदोलन को नए सिरे से बुनना शुरू किया.

इस घटना के बाद आंदोलन की पूरी रूपरेखा में जबरदस्त बदलाव देखने को मिला. जो आंदोलन 2 फ्रंट (सिंघु और टीकरी) में अधिक मजबूत दिखाई दे रहा था, अब उन में गाजीपुर बौर्डर सब से मजबूत धड़े के तौर पर उभरने लगा. इसे राकेश टिकैत का कुशल व्यक्तित्व सम?ाना गलत नहीं होगा कि किसानों को उन्होंने अपनी तरफ पूरी तरह आकर्षित कर लिया था.

इसी के साथ दिल्ली के बौर्डरों की कमान के अलावा आंदोलन की रणनीति राज्यों के भीतर महापंचायतों को करने पर जोर पकड़ने लगी. इस पूरे आंदोलन में यह रणनीति किसानों के लिए कारगर साबित होने लगी, जिस में पहली विशाल महापंचायत टिकैत परिवार के नेतृत्व में ही उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हुई, जहां हजारों की संख्या में किसान एकत्रित हुए, जिस ने भाजपा सरकार के अतिआत्मविश्वास और घमंड को बड़ी फटकार लगाने का काम किया.

पर अहम सवाल यह कि आखिर राकेश टिकैत इस पूरे आंदोलन के एकछत्र नेता के तौर पर कैसे उभरे, आंदोलन के दौरान उन की रणनीति कारगर कैसे साबित हुई और आखिर उन के व्यक्तित्व में ऐसा क्या करिश्मा था कि उन्होंने ऐसे वक्त में पूरे आंदोलन की कमान तकरीबन अपने कंधे पर उठाई.

दरअसल, इस की असल वजह तलाशने के लिए राकेश टिकैत के उन पहलुओं को खंगालने की सख्त जरूरत है जो सीधा उन के जीवन से जुड़ा हुआ है. इसी कोशिश में सरिता पत्रिका की टीम राकेश टिकैत के जीवन को करीब से परखने के लिए उन के पैतृक गांव सिसौली में उन के घर पहुंची. विरासत की उपजउत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में ‘किसानों की राजधानी’ कहे जाने वाला यह गांव दिल्ली से तकरीबन 120 किलोमीटर की दूरी पर है. इसी गांव में 4 जून, 1969 को बाबा महेंद्र सिंह टिकैत के दूसरे बेटे के रूप में राकेश टिकैत का जन्म हुआ. यह क्षेत्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पड़ता है. गांव तक जाने के लिए शामली से होते जाना पड़ता है, जिस में बस से तकरीबन एक घंटे का समय लगता है. सिसौली गांव की आबादी लगभग 15 हजार है. अधिकतर लोग यहां अभी भी संयुक्त परिवार में रहते हैं. सिसौली में रहने वाले चांद वीर सिंह बताते हैं, ‘‘इस में सब से बड़ी भूमिका खेतों की है. परिवार का अकेला आदमी खेतों का काम नहीं संभाल सकता, उसे जौइंट में रहना पड़ेगा. वहीं, गांव में भारतीय किसान यूनियन के चलते एकल भावना अभी भी मजबूत है. यही कारण भी है कि टिकैत परिवार खुद भी बड़े जौइंट परिवार के रूप में यहां रहता है.’’

शामली शहर से 8 फुटा रोड होते हुए इस जाटबहुल गांव में मुसलिम आबादी भी ठीकठाक संख्या में रहती है. सिसौली गांव की बनावट भारत के किसी भी अन्य गांव की ही तरह है. गांव के गलीमहल्लों के किनारे नाली निकासी, बीचोंबीच फैला मवेशियों का गोबर और ?ांटा गाड़ी (भैंसा गाड़ी) पर सवार किसान यह एहसास कराने के लिए काफी थे कि यह एक आम साधारण गांव है.

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यहां हमारी पहली मुलाकात 98 वर्षीय बुजुर्ग दरियाऊ सिंह से हुई. दरियाऊ सिंह चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के साथ भारतीय किसान यूनियन के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे हैं और मौजूदा समय में वे इकलौते पुराने सदस्य हैं और इस समय भारतीय किसान यूनियन के कोषाध्यक्ष हैं. वे उस दौरान 62 वर्ष के थे जब बाबा टिकैत 52 वर्ष की उम्र

में भारतीय किसान यूनियन की स्थापना कर रहे थे. उन दोनों की दोस्ती बहुत करीबी थी. दरियाऊ सिंह ने वह समय भी देखा जब बाबा महेंद्र सिंह टिकैत भारतीय किसान यूनियन की स्थापना में जुटे हुए थे और वह समय भी देखा जब इस यूनियन ने राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति पाई.

दरियाऊ सिंह पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि बाबा महेंद्र सिंह टिकैत के साथ उन्होंने सब से पहले

27 जनवरी, 1987 को किसानों की बिजली की मांग उठाई थी. उस दौरान राज्य में कांग्रेस के वीर बहादुर सिंह की सरकार थी. सरकार ने बिजली के दाम 22 रुपए प्रति हौर्स पावर से 30 रुपए प्रति हौर्स पावर कर दिए थे. बाबा टिकैत पहले सीधा कर्मुखेड़ी बिजलीघर पर 26 लोगों के साथ पहुंचे, वहां 4 दिनों तक आंदोलन चला, फिर 1 मार्च को किसानों की यूनियन बनाने के बाद बाबा टिकैत हजारों लोगों को अपने साथ ले कर निकल पड़े, जहां आंदोलन का दमन करने के लिए पुलिस ने ओपन फायरिंग की जिस में जयपाल और अकबर नाम के 2 किसानों की मृत्यु हुई.

वे आगे बताते हैं, ‘‘यह चीज बहुत कम लोग जानते हैं कि बाबा टिकैत के फैसले आमतौर पर व्यावहारिक होते थे. वे कोई ज्यादा पढ़ेलिखे व्यक्ति नहीं थे पर चीजों की सम?ा पढ़ेलिखों से भी ज्यादा रखते थे. उन्हें जो चीज परिस्थिति के अनुसार ठीक लगती थी, वे वही करते थे. उन की जिद के आगे सरकार को ?ाकना पड़ता था क्योंकि वे किसानों के हितों के फैसले लिया करते थे. इसी के चलते उन्होंने अपने जीवन में कई बड़े ऐतिहासिक आंदोलन किए और उन में जीत हासिल की, फिर चाहे वह दिल्ली के बोट क्लब का आंदोलन हो या फिर नईमा कांड हो जिसे भोपा आंदोलन के नाम से जाना जाता है. बाबा टिकैत जो ठान लेते थे वह करते ही थे.’’

दरियाऊ सिंह राकेश टिकैत को बाबा टिकैत के नक्शेकदम पर चलने वाला मानते हैं. वे बताते हैं कि राकेश टिकैत ने बहुत सी चीजें अपने पिता के साथ आंदोलन में सीखीं. बाबा टिकैत उन्हें 13 देशों की विदेश यात्राओं पर भी ले कर गए थे, जहां उन्होंने विदेश के किसानों के आंदोलन को करीब से देखा. वे ज्यादातर समय किसानों के काम से यहांवहां (राज्यों) दौरे पर ही रहते थे. वे कहते हैं, ‘‘महेंद्र सिंह टिकैत की परछाईं राकेश टिकैत पर है. राकेश टिकैत ने अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाया है. उस में (राकेश टिकैत) भी एक जिद है. जो उसे परिस्थितिवश ठीक लगता है वह वही करता है.’’

सरल, साधारण टिकैत परिवार

20 दिसंबर दोपहर 3 बजे हम सिसौली में राकेश टिकैत के पैतृक घर पहुंचे. यह वह घर है जहां राकेश टिकैत का संयुक्त परिवार रहता है. राकेश टिकैत ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा इसी घर में बिताया. अपनी शुरुआती पढ़ाई से ले कर आंदोलन के गुण भी इसी घर में अपने पिता महेंद्र सिंह टिकैत से सीखे. घर में प्रवेश करते ही एक बड़ा खुला आंगन दिखा जिस में बाईं तरफ एक हरे रंग का पुराना ट्रैक्टर खड़ा था और ठीक बीचोंबीच सामने की ओर एक लाल रंग का पुराना ट्रैक्टर था. ट्रैक्टर के बारे में नरेश टिकैत के छोटे बेटे अमित टिकैत बताते हैं कि ये दोनों ट्रैक्टर किसान आंदोलन में इस्तेमाल किए गए थे.

घर की बाईं तरफ की दीवारों पर सफेद रंग का पेंट वक्त के साथ काला पड़ता जा रहा था, मानो कई सालों से दीवारों पर रंगाईपुताई न कराई गई हो. इसी के पास 3 टौयलेट बनाए गए थे. उसी दीवार की एक तरफ भैंसों और गायों को खूंटे से बांधा हुआ था. दूसरी तरफ भूसा काटने की मशीन लगाई गई थी. अंदर जाते समय राकेश टिकैत के छोटे भाई नरेंद्र टिकैत से फोन पर बात की तो पता चला, वे खेतों में गन्नाकटाई के लिए गए हुए हैं, जो कुछ देर बाद हम से मिले.

आंगन के दाईं ओर बड़ा सा हौल था जोकि बाहर से आने वाले विजिटरों के आराम करने के लिए बनाया गया था. यह एक मीटिंग हौल के तौर पर भी इस्तेमाल में किया जाता है. विजिटरों की सुविधा के लिए यह परंपरा बाबा टिकैत से चली आ रही थी ताकि घर आए अतिथियों को घर में रुकने की व्यवस्था हो सके. यही कारण था कि हौल के चारों तरफ खाट लगाई गई थीं. दिलचस्प यह कि इसी हौल में बीकेयू अध्यक्ष नरेश टिकैत अमूमन रात को सोते हैं जिस के चलते हमारी उन से देररात तक बातें होती रहीं. इस हौल की दीवारों पर बाबा टिकैत के आंदोलनों और उन से जुड़ी स्मृतियों के कलैक्शन की प्रदर्शनी की गई थी.

इस के बाद हौल के दाईं तरफ बाबा टिकैत का एक छोटा कमरा था, जिस में अमर ज्योत जलाई गई थी. घर के इस कमरे में घुमाते समय नरेंद्र टिकैत ने बताया कि इस ज्योत को जलाने के लिए कई गांवों से घी भिजवाया जाता है. यहीं मटके में रखे पानी को 13 देशों की यात्रा कर लाया गया था और इसी कमरे में वे बाबा टिकैत के लिए रोज परंपरागत तौर पर लौ जलाया करते हैं जिस का खास ध्यान राकेश टिकैत भी करते हैं जब वे घर में मौजूद होते हैं.

इस कमरे के बाहर कुछ कुरसियां लगी हुई थीं, जिन में दूसरे गांवों से कुछ विजिटर चौधरी नरेश टिकैत के आने का इंतजार कर रहे थे. इन में से ही एक 50 वर्षीय शाहिद बालियान से हमारी मुलाकात हुई. वे सिसौली गांव से 9 किलोमीटर दूर हरसौली गांव से हैं. शाहिद मुसलिम जाट हैं और उन लोगों में से हैं जो राकेश टिकैत के साथ एक साल 15 दिन लंबे चले आंदोलन में दिल्ली के बौर्डर पर जमे रहे. साथ ही, वे बीकेयू के विश्वासपात्र सदस्यों में से भी हैं. वे बताते हैं कि टिकैत परिवार को बालियान खाप में चौधरी की उपाधि दी गई है. यह खाप उत्तर प्रदेश की सब से बड़ी जाट खाप है और 84 गांवों में फैली हुई है. खाप का मुखिया परिवारदरपरिवार आने वाला चौधरी चुनता है, जिस के बाद चुना हुआ मुखिया खाप के चौधरी के रूप में पदभार संभालता है. महेंद्र सिंह टिकैत की मृत्यु के बाद, उन के सब से बड़े बेटे नरेश टिकैत बालियान खाप के चौधरी बने और बाबा कहलाए गए हैं.

शाहिद बालियान टिकैत परिवार में पूरा विश्वास रखते हैं. वे बताते हैं कि टिकैत परिवार में सब की भूमिकाएं बंटी हुई हैं. राकेश टिकैत संगठन में पूरी तरह से किसानों का बाहरी काम संभालते हैं, जैसे फ्रंट में रह कर वे मांगों को उठाते हैं, वहीं चौधरी नरेश टिकैत आंतरिक तौर पर अपनी चौधरी वाली भूमिका निभाते हैं. ऐसे ही राकेश टिकैत के छोटे भाई नरेंद्र टिकैत हैं जो अधिकतर खेतों से जुड़े कामों की देखरेख करते हैं और ग्रामीण स्तर पर कार्य करते हैं.

नरेंद्र टिकैत ने हमें सिसौली गांव घुमाते समय अपने उपनाम ‘टिकैत’ के बारे में एक किस्सा सा?ा किया. उन्होंने बताया, ‘‘हमारे पूर्वज, बालियान खाप के तत्कालीन चौधरी, ने 7वीं शताब्दी में राजा हर्षवर्धन को एक युद्ध में मदद की थी. बालियान खाप की वीरता से राजा इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने खून से चौधरी के माथे पर टीका लगाया. इसी टीके से टिकैत नाम पड़ा. तभी से हमारे परिवार को टिकैत के नाम से जाना जाता है.’’

शाम ढलने लगी तो नरेंद्र टिकैत हमें अपने घर से 50 मीटर दूरी पर किसान भवन की ओर ले कर गए. इसे बाबा महेंद्र सिंह टिकैत ने बनाया था. इस

2- मंजिला इमारत में उस समय रेनोवेशन का काम चल रहा था. इस के ग्राउंड के सामने बाबा टिकैत की समाधि बनाई गई है, जिस के बाईं ओर अपने समय के प्रभावशाली किसान नेताओं की 4 मूर्तियां हैं जिन में मुख्य आकर्षण कर्नाटक के किसान नेता महंता देवारु नंजुंडास्वामी की मूर्ति थी, जो बाबा  टिकैत के दोस्त थे.

इस भवन की दिल्ली में चले किसान आंदोलन में अहम भूमिका रही है. हर महीने की 17 तारीख को यहां मासिक किसानों की पंचायतें नियमित होती रहीं जो अभी भी चलती रहती हैं. यहीं से बड़ीबड़ी घोषणाएं की गईं जिन्होंने 28 दिसंबर के गाजीपुर बौर्डर और मुजफ्फरनगर की महापंचायत में अहम भूमिका निभाई. कपिल बालियान बताते हैं कि राकेश टिकैत जब भी अपने क्षेत्र में होते हैं तब इस मासिक मीटिंग को अटैंड करते हैं. वे अनुशासन के साथ मीटिंग में उपस्थित रहते हैं और लोगों की बातों पर ध्यान करते हैं.

जमीन से जुड़े राकेश टिकैत

सिसौली गांव से तकरीबन डेढ़ किलोमीटर दूर खेतों के बीच जनता इंटर कालेज पड़ता है. यह हिंदीभाषी सरकारी स्कूल है जिस की मरम्मत लगता है कई सालों से नहीं की गई. इसी स्कूल में राकेश टिकैत ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा हिंदी में हासिल की. राकेश टिकैत के बचपन के सहपाठी 52 वर्षीय रतन सिंह बताते हैं कि टिकैत बचपन में भी चीजों को ले कर गंभीर रहते थे

पर हंसीमजाक करना बखूबी जानते थे. वे कबड्डी और हौकी खेलने के शौकीन थे. रतन सिंह ने अपने जीवन के 30 सालों तक ट्रक चलाने का काम किया और अब खेती का काम कर रहे हैं. उन्होंने 10वीं कक्षा के बाद स्कूल छोड़ दिया था. इस समय उन का एक बेटा और एक बेटी उत्तर प्रदेश पुलिस में सेवारत हैं.

स्कूल से निकलने के बाद राकेश टिकैत ने आगे की पढ़ाई मेरठ स्थित चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से की. वहां से उन्होंने बीए व एमए की पढ़ाई की. शाम को गांव में आयोजित होने वाली सालाना ‘?ांटा दौड़’ (भैंसा दौड़) में ले जाते हुए उन के भाई नरेंद्र टिकैत हमें बताते हैं कि राकेश टिकैत कमांडो बनना चाहते थे. हालांकि, जब वे आर्मी में शामिल नहीं हो पाए तो दिल्ली पुलिस में शामिल हो गए.

राकेश टिकैत ने वर्ष 1992 में दिल्ली पुलिस की नौकरी जौइन की थी. उस दौरान उन की उम्र 23-24 साल की थी. लेकिन उस नौकरी में वे ज्यादा समय तक रह नहीं पाए, शायद उन के लिए इस से बड़ी जिम्मेदारी तय होनी बाकी थी. साल 1993 के किसान आंदोलन के दौरान जब भारत सरकार ने राकेश टिकैत पर उन के पिता बाबा टिकैत के धरने को खत्म कराने का दबाव बनाया तो उन्होंने किसानों के समर्थन में दिल्ली पुलिस की नौकरी छोड़ दी. उस के बाद वे पूर्णकालिक रूप से भारतीय किसान यूनियन से जुड़ गए. राकेश टिकैत शुरू से ही सीधी और खरी बात करने में माहिर थे. वर्ष 1997 में उन की काबीलियत और दक्षता देख कर राकेश टिकैत को भारतीय किसान यूनियन का राष्ट्रीय प्रवक्ता चुना गया.

राकेश टिकैत के व्यवहार के बारे में पूछने पर अधिकतर लोग उन्हें आदतों में सख्त और दैनिक जीवन में अनुशासित बताते हैं. नरेंद्र टिकैत ने हम से बात करते हुए बताया, ‘‘भाई राकेश टिकैत सचाई, ईमानदारी पर चलते हैं. यह सीख बाबा टिकैत ने हम सभी को दी है. राकेश की कुशलता का रहस्य यह है कि वे निर्णय लेने में तेज हैं और समय बरबाद नहीं करते.’’

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नरेद्र टिकैत से जब राकेश टिकैत की गंवई भाषा में बातव्यवहार करने की वजह के बारे में पूछा तो वे कहते हैं, ‘‘आदमी जिस माहौल में रहेगा उसी की भाषा कहेगा. हम अपनी बोली से जुड़े लोग हैं, जिसे हम छोड़ नहीं सकते.’’ यह सुनते ही वहां मौजूद लोग जोर से हंसते हैं और ‘बक्कल तार देंगे’ कहने लगते हैं. वहीं घेर (खाली पड़ी जगह) में बैठे एक अन्य व्यक्ति बताते हैं कि राकेश टिकैत जब भी गांव आते हैं उन का हर किसी के साथ बातव्यवहार सामान्य रहता है. बच्चों से उन की पढ़ाई के बारे में पूछते हैं, बूढ़ों का हालचाल पूछते हैं और युवाओं से उन के काम के बारे में पूछते हैं.

सिसौली से तकरीबन 44 किलोमीटर दूर मुजफ्फरनगर के महावीर चौक से सिविल लाइंस रोड पर लाल कोठी वाली गली में राकेश टिकैत का 300 गज में बना 2 मंजिला मकान है. यहां का मकान गांव के मकान के अनुरूप अधिक शहरीनुमा है, देशी खाट की जगह शहरी बैड हैं, हुक्का नजर में नहीं था, शायद इसलिए भी कि राकेश टिकैत हुक्का नहीं गुड़गुड़ाते. घर के सामने भी एक घेररूपी जगह बनाई गई है, जहां गाय बंधी थी पर वह घर से अलग हिस्से में थी. हालांकि घर के कमरों में बिखरे कपड़े और सामान बता रहे थे कि यह एक सामान्य घर की तरह है. राकेश टिकैत के कमरे में भी किसी प्रकार का विशेष ताम?ाम देखने को नहीं मिला, बल्कि दीवारों की उतरती पपडि़यां और टाइल पर पोती अनायरा की बनाई चित्रकारी बता रही थी कि घर में राकेश टिकैत का रहनसहन सामान्य है. राकेश टिकैत परिवार समेत 20 साल पहले शिफ्ट हो गए थे. राकेश टिकैत की पत्नी सुनीता देवी बताती हैं कि जब राकेश पुलिस में भरती हुए थे तब उन्होंने यह जगह ली थी.

वे कहती हैं, ‘‘राकेश टिकैत केवल घर का बना खाना खाते हैं, कभी होटल में भोजन नहीं करते. वे एक वक्त में एक या दो तरह की सब्जी लेते हैं. हां, मसूर की दाल वे पसंद नहीं करते. लेकिन कहीं बाहर होते हैं और यह दाल उन के लिए बन गई तो अचार से रोटी खा लेंगे पर सामने वाले को भनक नहीं लगने देंगे ताकि उस का अनादर न हो.’’

वे आगे कहती हैं, ‘‘राकेश टिकैत मसालेदार और तैलीय भोजन से दूर रहते हैं और कोल्ड ड्रिंक्स से परहेज करते हैं. उन्हें फिल्में देखने का शौक नहीं है पर टीवी पर न्यूज चैनल में खबरें देख लेते हैं. वे मु?ो टीवी सीरियल नहीं देखने देते, कहते हैं, ये सीरियल घर बिगाड़ते हैं.’’

कसेरवा गांव से नूरा बालियान मुसलिम जाट हैं. दिल्ली में चल रहे धरने पर निरंतर आतेजाते रहे. वे यूनियन के काम से सिसौली में भी आतेजाते रहते हैं. वे राकेश टिकैत को अपना नेता मानते

हैं और  कहते हैं, ‘‘टिकैत साहब का चीजों को सम?ाने का सैंस औफ हयूमर बहुत अच्छा है. उन्होंने लोगों को जोड़े रखने का काम किया है और समयसमय पर सही निर्णय लिए.’’

राकेश टिकैत की आंदोलन में भूमिका

मुजफ्फरनगर में राकेश टिकैत के घर पर हमारी मुलाकात उन के बेटे चरण सिंह टिकैत से हुई. चरण सिंह टिकैत अपने पिता राकेश टिकैत के साथ भारतीय किसान यूनियन में सक्रिय हैं. वे बताते हैं कि राकेश टिकैत किसानों के लिए आंदोलन करने के दौरान अपने पूरे जीवनकाल में करीब

42 बार जेल जा चुके हैं. वे बताते हैं, ‘‘मध्य प्रदेश में एक समय किसान के भूमि अधिग्रहण कानून के खिलाफ उन्हें 39 दिनों तक जेल में रहना पड़ा था. दिल्ली में संसद भवन के बाहर किसानों के गन्ना मूल्य बढ़ाने की वजह से सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया तो उन्हें तिहाड़ जेल भेज दिया गया था. राजस्थान में बाजरा की कीमत को बढ़ाने की मांग को ले कर किसानों की लड़ाई लड़ते हुए सरकार के खिलाफ धरना दिया था, जिस के बाद उन्हें जयपुर जेल में जाना पड़ा था.’’

किसान आंदोलन को देश और मुख्य तौर पर उत्तर प्रदेश में फैलाने के लिए राकेश टिकैट ने एड़ीचोटी का जोर लगा दिया और वे कई मंचों से सरकार को ललकारते नजर आए. इस तरह राकेश टिकैत किसानों के आंदोलन का सब से बड़ा चेहरा बन गए. दिल्ली में चले किसान आंदोलन में राकेश टिकैत की भूमिका उस समय से ही प्रमुख थी जब कृषि कानूनों को सरकार ने सिर्फ महज विधेयक के रूप में संसद में पेश किया था. राकेश टिकैत ने उसी समय से सरकार द्वारा पेश किए गए कृषि विधेयकों का विरोध किया. जब दिल्ली के बौर्डरों पर पंजाब व हरियाणा के किसान आंदोलन करने के लिए पहुंच गए थे उस समय राकेश टिकैत के नेतृत्व में भारतीय किसान यूनियन उत्तर प्रदेश में किसानों को लामबंद करने में जुटी थी.

राकेश टिकैत ने कृषि कानूनों को ले कर अपना रवैया आंदोलन के पहले दिन से ही साफ कर दिया था. दिल्ली के गाजीपुर बौर्डर पर तैनाती के साथ ही आंदोलन में उन की हिस्सेदारी संयुक्त किसान मोरचा में भी उतनी ही सक्रिय थी. कृषि कानूनों को ले कर सरकार से हुई कई राउंड की बातचीत में राकेश टिकैत कानूनों को वापस कराने की मांग पर कभी भी टस से मस नहीं हुए. कई बार सरकार ने गाजीपुर बौर्डर पर प्रदर्शनकारी किसानों को प्रताडि़त करने का काम किया, कभी बिजली काटी तो कभी पानी की सप्लाई रोक दी लेकिन राकेश टिकैत कानूनों की वापसी तक टिके रहे.

सालभर चले आंदोलन के बाद सरकार ने लागू किए कृषि कानूनों को वापस करने का फैसला लिया तो आंदोलनकारी किसानों में खुशी की लहर दौड़ पड़ी. सरकार के कानूनों को वापस लेने के पीछे कई कारण थे. उन में से एक मुख्य कारण उत्तर प्रदेश में विधानसभा का होने वाला चुनाव रहा. बहरहाल, किसान आंदोलन ने केंद्र की अडि़यल सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. इस पूरे प्रकरण में राकेश टिकैत की भूमिका बेहद अहम रही.

राजनीतिक दृष्टि से उत्तर प्रदेश की जमीन किसी भी सरकार के लिए बेहद कीमती होती है. राकेश टिकैत का उत्तर प्रदेश के किसानों को ले कर कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन करना सरकार की नींद उड़ा रहा था. यही नहीं, राकेश टिकैत का सरकार के खिलाफ देशभर में जगहजगह महापंचायतें करना और आंदोलन को जमीन पर पहुंचाना सरकार को डराने लगा.

लखीमपुर खीरी की घटना में राकेश टिकैत की सू?ाबू?ा का परिचय मिला. भाजपा किसानों को अनियंत्रित करने और देश का दूसरा चौराचौरी कांड बनाने का षड्यंत्र रच रही थी, वहां राकेश टिकैत ने पूरे मामले को सम?ादारी के साथ हैंडल करते हुए आंदोलन को उग्र होने से बचाया. ठीक इसी प्रकार पंजाब के किसानों पर लगने वाले उस टैग को सिरे से ध्वस्त कर दिया जो उन्हें खालिस्तानी और देशद्रोही बता रहा था. यहीं नहीं, भारतीय किसान यूनियन पर हमेशा से जाट संगठन होने का आरोप लगता रहा जिसे राकेश टिकैत ने एक हद तक खत्म करने का काम किया.

हालांकि, जानकार बताते हैं कि बाबा महेंद्र सिंह टिकैत के 2011 में गुजरने के बाद टिकैत परिवार ने अपनी ख्याति खो दी थी. बाबा टिकैत चाहते थे कि उन का संगठन अराजनीतिक रहे. लेकिन राकेश टिकैत का चुनावी राजनीति में आना और 2013 में मुजफ्फरनगर में दंगों के भड़कने से टिकैत परिवार के प्रति लोगों के मन में एक अविश्वास की स्थिति पैदा हुई, यही कारण भी है कि राकेश टिकैत अपने पिता की विरासत को फिर से रीगेन करने की कोशिश में रहे, जिस में वे एक हद तक कामयाब भी होते दिख रहे हैं.

राकेश टिकैत जिस जमीन से आते हैं, वहां की विरासत में आंदोलन का उभार हमेशा से रहा है. उन का अतीत जमीनी दिखाई देता है. एक साल चले आंदोलन में यह एक जरूरी हिस्सा भी था कि किसान नेताओं ने अपनी बोली और भाषा से जमीन के किसानों को जोड़ा. राकेश टिकैत समेत संयुक्त किसान मोरचा में अधिकतर नेता लोकल बोली में या हिंदी बोली में अपनी बात कहते दिखे. खासकर, राकेश टिकैत अपने बोलने के तरीके से चर्चित रहे. सिसौली जाते समय लोनी का बौर्डर पार करते ही हम ने पूरे रास्ते इस बोली को आम लोगों के मुंह से सुना, जाहिर है लोग आसानी से राकेश टिकैत से जुड़ पाए. राकेश टिकैत के स्कूल और गांव के माहौल व परवरिश का नतीजा था कि वे खुद अडि़यल सरकार के सामने अडि़यल बनने की सीख सम?ा पाए.

आज राकेश टिकैत उत्तर भारत में एक बड़े किसान नेता के तौर पर उभरे हैं. उन की बात को सुना जा रहा है ठीक उसी वजन से जैसे प्रधानमंत्री मोदी को हिंदी बैल्ट में सुना जाता है. वे अपने पिता की तरह ऐसे नेता के तौर पर उभरते दिखाई दे रहे हैं जो जननेता हैं, बगैर चुनाव में जीते या खड़े हुए.

सरकार लोकतंत्र और विरोध की ताकत को खत्म कर देना चाहती है : राकेश टिकैत    

23 दिसंबर, 2021 को किसान दिवस के अवसर पर राकेश टिकैत उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में थे. ओसीआर यानी पुराना विधायक निवास में रात के करीब 11 बजे उन के साथ हमारी बातचीत का वक्त तय हुआ. पूरा ओसीआर घने कोहरे में ढका था. उस समय भी उन के साथ किसान यूनियन के करीबी लोग अगले दिन की रणनीति बनाने में व्यस्त थे. टिकैत एक सामान्य नेता की तरह फोन और बातचीत में व्यस्त थे. बीचबीच में हमारे सवालों के जवाब देते जा रहे थे. लंदन स्थित स्क्वायर वाटरमेलन कंपनी ने राकेश टिकैत का नाम ‘21वीं सैंचुरी आइकन अवार्ड’ के लिए चुना. पेश है हमारे साथ हुई उन की बातचीत के प्रमुख अंश :

किसान आंदोलन की सफलता के बाद एक नेता के रूप में आने वाले समय में आप की क्या भूमिका होगी?

किसान आंदोलन स्थगित हुआ है. किसानों की समस्याओं का कोई सार्थक समाधान नहीं हुआ है. केंद्र सरकार ने एक भरोसा दिया है. सरकार वाले अपने भरोसे पर कितना खरा उतरेंगे, कहा नहीं जा सकता. कृषि कानूनों के अलावा भी किसानों के सामने तमाम परेशानियां हैं. एमएसपी की मांग भी है. सरकार ने कमेटी बना दी है जो इस के समाधान का रास्ता बनाएगी. किसानों की परेशानी जब तक खत्म नहीं होती, हमारा संघर्ष चलता रहेगा. हम किसानों को जागरूक करने के अपने काम में लगे हैं.

क्या आप चुनाव लड़ने की योजना बना रहे हैं. कहा जाता है कि राजनीति के जरिए बदलाव होता है?

नहीं, चुनावी राजनीति से मेरा कोई लेनादेना नहीं है. मैं आप के जरिए साफ कर देना चाहता हूं कि मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा. मेरा मानना है और यह साबित भी हो चुका है कि सरकार को भी ?ाकाया जा सकता है. किसान संसद में नहीं थे. किसान नेता संसद में नहीं थे. इस के बाद भी पूरे 13 माह किसानों का मुद्दा ही वहां प्रमुखता से छाया रहा. किसानों की बात करने और उन को हक दिलाने के लिए राजनीति में जाने की जरूरत नहीं है. किसानों को एकजुट रह कर अपनी ताकत का एहसास कराते रहने की जरूरत है.

विधानसभा चुनावों के बाद क्या केंद्र सरकार कृषि कानूनों पर पलटी मार सकती है?

कुछ कहा नहीं जा सकता. यह पलटी मार भी सकती है. यह सरकार लोकतंत्र और विरोध की राजनीति को पूरी तरह से खत्म कर देना चाहती है. इस के लिए यह सामदामदंडभेद कुछ भी अपनाने को तैयार रहती है. किसान आंदोलन को खत्म करने के लिए हर स्तर पर काम किया गया. किसान अनुशासित सिपाही की तरह सड़कों पर बैठे रहे. किसानों के खिलाफ एक भी ऐसा काम नहीं मिला जिस से सरकार उन को दबा सकती. किसानों को बदनाम किया गया. रुपएपैसों को ले कर आरोप लगाए गए. आखिर में जब सरकार का ?ाठ उजागर हो गया तब वह ?ाकने लगी.

किसान आंदोलन के दौरान आप की मुलाकात लोकल, नैशनल और इंटरनैशनल मीडिया से हुई. क्या फर्क देखने को मिला?

लोकल मीडिया के लोग हमारी बात को सम?ा रहे थे. हमारे साथ भी थे पर उन की सुनी कम जा रही थी. नैशनल मीडिया में बहुत कम लोग हमारे साथ थे. इस के ज्यादातर लोग सरकार के साथ थे. हमें दोषी सम?ा रहे थे. वे आंदोलन करने वाले किसानों के बजाय सरकार के पक्ष में थे. यही कारण है कि जनता अब मीडिया का भरोसा नहीं कर रही. मीडिया अब नएनए तरह के काम करने लगी है जिस से जनता उस से जुड़ सके. इंटरनैशनल मीडिया की बात करें तो वह ज्यादा आजादी और निष्पक्ष से काम कर रही थी.

कृषि कानूनों के पीछे क्या वजहें सरकार की रही होंगी?

अपने लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए ये कानून बने थे. इसी कारण एमएसपी को ले कर सरकार कानून नहीं बना रही है. सरकारी मंडियों को खत्म करने की साजिश की जा रही है. किसानों को उन की उपज का सही दाम मिल गया तो किसान मजबूत हो जाएगा. सरकार मजबूत नहीं, मजबूर किसान चाहती है जो उस के इशारे पर नाचता रहे. सरकार किसानों की जमीन बड़ी कंपनियों को देने की तैयारी में थी. कंपनी का राज आने से किसान ही नहीं, दूसरे लोग भी परेशान होते.

जनता की रोटी बड़े लोगों की तिजोरी में कैद हो जाती. शहरी लोग भी सम?ा गए. पूरे देश में किसान आंदोलन को समर्थन मिलने लगा. अब लोग सरकार की नीतियों को सम?ा गए हैं. सरकार लोगों को लड़ाने और तोड़ने का काम करती है. आंदोलन में शामिल हुए सिख समाज के लोगों को खालिस्तानी बता दिया गया और मुसलमानों को पाकिस्तानी. उत्तर प्रदेश के किसानों को केवल जाट बता दिया गया. इन्होंने उत्तर प्रदेश के भीतर हिंदूमुसलिम दंगे कराए. ये लोग हरियाणा के अंदर गए तो वहां जाट और गैरजाट की राजनीति की. गुजरात के भीतर पटेल और गैरपटेल की राजनीति की.

2022 के चुनाव में सत्ता बदलेगी?

सत्ता बदलेगी जरूर. लखीमपुर कांड का सच बाहर आ रहा है. दागी मंत्री को साथ रखने का प्रभाव पड़ेगा. किसान लखीमपुर कांड को भूल नहीं सकते. लोग यह भी सम?ा रहे हैं कि यह सरकार विरोध और लोकतंत्र का खत्म करने का काम कर रही है. संस्थाओं को निष्पक्ष तरह से काम नहीं करने दे रही. इस के लिए बदलाव तो होगा.

आप का व्यक्तिगत जीवन कैसा रहता है?

हम किसानों के बीच, मजदूरों के बीच उन की परेशानियों को सम?ाने और उन को जागरूक करने में समय बिताते हैं. हमें घर पर समय बिताने का वक्त नहीं मिलता. हमारा लगातार जनसंपर्क चलता रहता है. दूरदूर के किसान और उन के परिवार के लोग फोन करते हैं. अब तो सीधे वीडियो कौल करने लगे हैं. जल्दी सोने और सुबह जल्दी उठने की आदत है. आजकल जल्दी सो नहीं पा रहा हूं.

सड़क से धरना खत्म होने के बाद घर जाना कैसा लग रहा था?

हमें तो घर जाने को नहीं मिला. हम तो वापस किसानों को उन के हक के लिए जगाने की मुहिम में लग गए. धरने में शामिल दूसरे किसान बड़े बेमन से घर जा रहे थे. उन को लग रहा था कि वे अपने लोगों से बिछुड़ रहे हैं. घरों में हमारे परिवार के लोग घरेलू काम करते थे. धरने पर हम लोग ही आपस में काम बांट लेते थे. सब काम करते थे. अपने कपड़े हम ही धोते थे. किसानों के हौसले अब बढ़ चुके हैं. वे अब सरकार से डरने वाले नहीं हैं. सरकार कोई गलत कदम उठाएगी, हम वापस उस का गला पकड़ लेंगे. अब किसान तैयार है.

आप पर बहुत सारे कटाक्ष हुए. आरोप लगे. गुस्सा आता रहा होगा सुन कर. कैसे खुद को संभालते थे?

गलत बात सुन कर बुरा लगता है. पहले भी, अब भी. गुस्सा भी आता है. दुख भी होता है. इस के बाद खुद ही खुद को संभालता था. सब को नौर्मल करते हुए अपने फैसले साथियों की सलाह से करते थे. गुस्से या दुख को कभी खुद पर हावी नहीं होने दिया. 26 जनवरी की घटना और लखीमपुर कांड के बाद खुद को संभालने में थोड़ा वक्त लगा पर सब ठीक किया. आज लगता है कि हमारा फैसला किसानों के हित में था.

 -शैलेंद्र सिंह

सरकार हठी और जिद्दी है : चौधरी नरेश टिकैत

चौधरी नरेश टिकैत भारतीय किसान यूनियन के मौजूदा अध्यक्ष हैं. उन्हें 84 गांवों में चौधरी की उपाधि मिली है. गांव में लोग उन्हें ‘बाबा’ कह कर बुलाते हैं. वे बाबा महेंद्र सिंह टिकैत के सब से बड़े बेटे और राकेश टिकैत के बड़े भाई हैं. नरेश टिकैत से हमारी मुलाकात तब हुई जब वे भूसा काटने वाली मशीन चला रहे थे. गांव के लोगों का उन के बारे में कहना था कि उन का व्यवहार बेहद सरल है. वे आम लोगों की तरह रहते हैं, सादा खाना खाते हैं, खेत में काम करने से ले कर गोबर उठाने और ट्रैक्टर चलाने तक वह सामान्य किसान की तरह काम करते हैं. चौधरी नरेश टिकैत ने ‘सरिता’ पत्रिका को इंटरव्यू दिया. पेश हैं कुछ अंश :

मुजफ्फरनगर की महापंचायत में आप ने ऐसा क्या किया कि इतनी संख्या में किसान इकट्ठा हो गए?

ऐसा नहीं है कि आंदोलन में रह कर ही आंदोलन चलता है. बाहर से भी तो आंदोलन को सपोर्ट चाहिए होता है. क्षेत्र के लोगों की आवाज क्या है, वे आंदोलन

चाह रहे हैं या नहीं तो हम ने यहां से इस चीज को देखा है. आंदोलन सफल रहा,

लोगों ने सहयोग किया. किसानों की तौहीन की गई, वही आंदोलन के लंबे चलने का कारण रहा.

न्याय की लड़ाई लड़ने में अब लंबा समय लग रहा है, जिस से किसानों का पैसा और समय दोनों बरबाद हो रहा है, इसे आप कैसे देखते हैं?

किसी भी पार्टी की सरकार रही हो, पहले किसानों की इतनी अनदेखी नहीं होती थी. बातचीत 10-15 दिनों या महीनेभर में निबट जाती थी. आश्वासन दे दिए जाते थे या बात मान ली जाती थी. यह सरकार हठी और जिद्दी है. लेकिन ऐसा नहीं चलेगा, लोकतंत्र में इस की जगह नहीं है. इस ने कोई संगठन नहीं छोड़ा जब लोग मजबूरी में आंदोलन करने के लिए आगे न आए हों. इतने बड़े आंदोलन के आगे सरकार ?ाकने को तैयार नहीं थी तो यह देखा जा सकता है कि मौजूदा सरकार किस हद तक दमन का रास्ता अपना रही थी.

सरकार की नीतियों पर आप का क्या कहना है?

इन की अलग नीतियां हैं. हम तो यही चाहेंगे इन के पास कोई अच्छा सलाहकार हो. मौजूदा सरकार के लोग इस देश को गिरवी रख रहे हैं. सब चीजें बेच रहे हैं. आज हवाई अड्डे बेच दिए, रेल बेच दी, बिजली बेच दी, छोड़ा क्या? सबकुछ प्राइवेट में जा रहा है. कांग्रेस में इतना नहीं था. हम तो यही कहेंगे कि इस देश ने जिम्मेदारी सौंपी है तो वे लोग उसे ईमानदारी से निभाएं.

एमएसपी का गारंटी कानून का मुद्दा हल होता है तो किन किसानों को फायदा पहुंचेगा?

किसान तो सभी हैं. हमारे पास गेहूं कम है, हम छोटे किसान हैं. हम 50 क्ंिवटल गेहूं ही बेच सकें तो 50 क्विंटल गेहूं का हमें अगर एमएसपी गारंटी रेट मिले तो हमारा फायदा होगा.

कृषि कानून नहीं होते तो भारतीय किसान यूनियन किन मुद्दों पर अपने क्षेत्र में ऐक्टिव थी?

हमारे लोकल मुद्दे हैं. अभी तो किसानों के अस्तित्व की लड़ाई है, बाकी बिजली के मुददे, अच्छी सड़कों का मद्दा, बकाया गन्ने का दाम जो सरकार अटका कर रखती है, अभी हमारा 5 महीने का पेमैंट बकाया है. अब बताओ अच्छी सड़क का मुद्दा किसानों से अलग थोड़ी है. हमारे ट्रैक्टर ऊबड़खाबड़ सड़कों में चलेंगे तो जल्दी खराब हो जाएंगे, रिपेयरिंग मांगेंगे, किसानों का पैसा लगेगा.

हरहर महादेव और अल्ला हू अकबर के नारे की क्या अहमियत है?

मुसलमान हरहर महादेव कह रहे हैं हिंदू अल्ला हू अकबर कह रहे हैं तो यह धार्मिक मतभेदों को मिटाने का नारा है. यह नारा तो बीच की दूरियों को मिटाने का काम कर रहा है. हम तो लोगों को जोड़ रहे हैं, वे लोगों को तोड़ रहे हैं. जातिमजहब सिर्फ विवाहशादी तक सीमित रखो, उस से अलावा सब एक हैं.

Satyakatha: मां-बेटी का साझा प्रेमी

सौजन्य- सत्यकथा

जब कोई औरत अनैतिकता की राह पर दौड़ लगाने लगती है तब उस की आंखों में न तो परिवार और समाज की मानमर्यादा की शर्म रहती है और न ही जेहन में कायदेकानून का डर. पान मसाला सप्लाई का काम करने वाला नवीन शर्मा 23 जुलाई, 2021 की सुबह 7 बजे ही काम पर निकला था. लेकिन वह अगले रोज 10 बजे तक घर नहीं लौटा था. पिता प्रदीप शर्मा बीती रात से उसे फोन मिलामिला कर परेशान थे. वह बारबार उसे काल कर रहे थे, लेकिन उस का फोन बंद आ रहा था.

वह बेहद चिंतित हो गए थे कि उन का 30 वर्षीय बेटा नवीन आखिर अभी तक लौटा क्यों नहीं. उन्होंने पत्नी गीता शर्मा के साथ पूरी रात बेटे की एक सूचना के इंतजार में चहलकदमी करते हुए गुजारी. नवीन अकसर अपने कहे अनुसार समय से वापस घर लौट आ जाता था.

भारी मन से प्रदीप शर्मा अपने एक पड़ोसी की सलाह पर कानपुर के कोहना थाने पहुंचे. बेटे की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाई. थानाप्रभारी वी.के. सिंह को उन्होंने बताया कि वह कानपुर के भैरव घाट मोहल्ले के निवासी हैं. उन का जवान बेटा नवीन शर्मा कल दिन से ही नहीं आया है. उन्होंने किसी अनहोनी की आशंका भी जताई और उसे तलाश की मांग की.

थानाप्रभारी सिंह ने प्रदीप शर्मा की बात गौर से सुनी, फिर गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कर ली और उन्हें जल्द ढूंढ निकालने का आश्वासन दिया. इस के बाद प्रदीप शर्मा वापस घर लौट आए, लेकिन चुप नहीं बैठे. अपने बड़े बेटे अर्पित, अंकुर और कुछ पड़ोसियों को साथ ले कर नवीन की खोज में निकल पड़े.

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उन्होंने इलाके का चप्पाचप्पा छान मारा, लेकिन नवीन का कुछ पता नहीं चला. बेटे की चिंता में मां गीता का भी रोरो कर बुरा हाल हो गया था. उन्होंने खानापीना छोड़ दिया था.

इसी बीच 25 जुलाई, 2021 की सुबह 8 बजे थाना कोहना पुलिस को धोबी घाट के पास एक गड्ढे में किसी युवक की लाश होने की सूचना मिली. इस की जानकारी दूसरे अधिकारियों को दे कर थानाप्रभारी पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

युवक का शव 4 फीट गहरे में गड्ढे में पड़ा था. गड्ढे को सीमेंट की शीट से ढंक कर शव को छिपाने की कोशिश की गई थी. थानाप्रभारी ने शव को गड्ढे से बाहर निकलवा कर उस का बारीकी से निरीक्षण किया.

युवक की उम्र 30 वर्ष के आसपास थी. उस के माथे पर चोट के निशान थे. गले में रगड़ के भी निशान थे. देखने से लग रहा था कि किसी भारी हथियार से उस के माथे पर चोट की गई होगी.

फिर रस्सी या तार से उस का गला घोंट दिया होगा.

इस जांच के दौरान वी.के. सिंह को शक हुआ कि यह लाश प्रदीप शर्मा के बेटे नवीन शर्मा की हो सकती है, क्योंकि उन की शिकायत के अनुसार शव का हुलिया मेल खा रहा था. उन्होंने तुरंत प्रदीप को बुलवाया.

प्रदीप शर्मा भागेभागे घटनास्थल पर आए. साथ में पत्नी और बेटे भी थे. उन्होंने लाश देखते ही पहचान ली. वह नवीन शर्मा की ही निकली. नवीन की लाश देख कर घरवाले दहाड़ मार कर रोने लगे.

पुलिसकर्मियों ने किसी तरह परिवार को संभाला और लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. घटनास्थल पर एसपी (पश्चिम) संजीव त्यागी, एएसपी अभिषेक कुमार अग्रवाल और डीएसपी त्रिपुरारी पांडेय भी आ गए. उन्होंने प्रदीप शर्मा और उन के बेटों से विस्तृत पूछताछ की.

प्रदीप शर्मा ने पुलिस को बताया कि उन के बेटे नवीन का एक सप्ताह पहले टेफ्को टेनरी के किनारे रहने वाले भोला जैसवार की पत्नी गुडि़या और उस की बेटी कांती के साथ झगड़ा हुआ था. तब से वह नवीन से दुश्मनी कर बैठी थी. भोला और उस के बेटे भगत ने भी नवीन को सबक सिखाने की धमकी दी थी. प्रदीप शर्मा ने नवीन की हत्या का आरोप सीधेसीधे जैसवार परिवार पर लगा दिया.

‘‘नवीन का झगड़ा किस बात को ले कर हुआ था?’’ डीएसपी पांडेय ने पूछा.

‘‘साहब, भगत और नवीन गहरे दोस्त थे. कुछ दिन पहले नवीन ने भगत की बहन कांती को उस के प्रेमी रंजीत उर्फ पाले के साथ रंगेहाथों पकड़ लिया था. इस की शिकायत उस ने भगत से कर दी थी. इस पर भगत और  उस के पिता भोला ने गुडि़या और कांति की पिटाई कर दी थी. यह बात जब गुडि़या और उस की बेटी कांती को मालूम हुई कि शिकायत नवीन ने की है, तो उन्होंने नवीन से झगड़ा किया.’’

इस मामले में नवीन के भाई अर्पित ने पुलिस को बताया कि रंजीत के भगत की मां गुडि़या से भी नाजायज संबंध हैं. उस ने पहले गुडि़या को जाल में फंसाया फिर उस की बेटी से भी नाजायज रिश्ता बना लिया.

उस के भाई नवीन को मांबेटी की इस हरकत के बारे में जानकारी थी. इसी की शिकायत उस ने अपने दोस्त भगत से की थी.

नवीन के पिता और भाई के बयानों से पुलिस समझ चुकी थी कि उस की हत्या अवैध रिश्तों के चलते हुई है. एसपी संजीव त्यागी ने हत्या के खुलासे के लिए एएसपी अभिषेक कुमार अग्रवाल की निगरानी में एक टीम गठित कर दी.

टीम ने सब से पहले मृतक के घर वालों के बयान दर्ज किए, फिर गुडि़या के मोहल्ले वालों को विश्वास में ले कर उस के बारे में जानकारी जुटाई. पुलिस को उन से मिली जानकारी के आधार पर गुडि़या और रंजीत के अवैध संबंध के बारे में पता चला.

यह भी मालूम हो गया कि गुडि़या की बेटी कांती से भी रंजीत का गहरा नाता रहा है. यानी मांबेटी का आशिक रंजीत ही था. रंजीत दोनों में से एक की अनुपस्थिति में दूसरे से मिलता है.

लोगों ने दबी जुबान में यह भी बताया कि मांबेटी को इस बारे में पता था कि दोनों की आशिकी एक ही युवक से है.

गुडि़या जानती थी कि उस की बेटी कांती के रंजीत के साथ अवैध संबंध हैं. इसी तरह से कांती को रंजीत और उस की मां गुडि़या के नाजायज रिश्ते के बारे में पता था. दोनों ने एकदूसरे का विरोध करने के बजाय इसे ही ढाल बना लिया था.

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अब इस हत्याकांड में रंजीत भी संदेह के दायरे में आ गया था. हालांकि नवीन की हत्या में इन तीनों के अलावा पति भोला और बेटे भगत के भी शामिल होने का अनुमान लगाया गया. इस का पता लगाने के लिए जांच दल ने गुडि़या और कांति को हिरासत में ले लिया.

उन से सख्ती से पूछताछ की. दोनों ने यह तो स्वीकार कर लिया कि उन के नाजायज संबंध रंजीत से हैं, लेकिन हत्या में शामिल होने से इनकार कर दिया.

हत्या की तह तक जाने के लिए जांच टीम ने जाल फैलाया. मुखबिरों की मदद ली. जल्द ही इस में सफलता मिल गई. मुखबिर की सूचना पर 27 जुलाई, 2021 की रात 8 बजे पुलिस ने रंजीत को कंपनी बाग चौराहे से हिरासत में ले लिया. उसे पूछताछ के लिए थाना कोहना लाया गया. पहले तो रंजीत ने पुलिस को गुमराह किया, लेकिन सख्ती बरतने पर वह टूट गया.

उस ने नवीन की हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया. यही नहीं उस ने केबल का वह टुकड़ा भी बरामद करवा दिया, जिस से नवीन का गला कस कर हत्या की थी. नवीन का मोबाइल फोन भी उस से बरामद हो गया.

रंजीत ने बताया कि उस ने नवीन की हत्या गुडि़या और कांती के कहने पर की. दोनों ही हत्या के साजिश में शामिल थीं. कुछ दिन पहले नवीन ने उसे कांती के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया था. इस की शिकायत उस ने भोला और उस के बेटे से कर दी थी. उसी खुन्नस में तीनों ने नवीन की हत्या का प्लान बना लिया था.

नवीन की हत्या की योजना में गुडि़या और उस की बेटी कांती भी शामिल थी, अत: पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया. उन्होंने जब रंजीत को पुलिस हिरासत में देखा, तब दोनों समझ गईं कि उन का भेद खुल चुका है. फिर उन्होंने भी अपना जुर्म कबूल कर लिया.

जांच दल ने नवीन की हत्या का परदाफाश हो जाने और हत्यारोपियों को गिरफ्तार करने की जानकारी एसपी (पश्चिम) संजीव त्यागी को दे दी. साथ ही थानाप्रभारी ने मृतक के पिता को वादी बना कर भादंवि की धारा 302/201/120बी के तहत रंजीत उर्फ पाले, गुडि़या और  कांती के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस पूछताछ में हवस की ऐसी काली कहानी प्रकाश में आई, जो किसी समाज के लिए कालिख ही कही जाएगी.

उत्तर प्रदेश के शहर कानपुर  के मोहल्ला भैरवघाट में प्रदीप शर्मा सपरिवार रहते हैं. परिवार में पत्नी गीता के अलावा 3 बेटे अर्पित, अंकित और नवीन थे. प्रदीप शर्मा इलैक्ट्रीशियन हैं. 3 भाइयों में नवीन सब से छोटा था. वह ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था. वह शहर की फुटकर दुकानों में पान मसाला सप्लाई करने का काम करता था.

नवीन का एक दोस्त भगत था. भगत के पिता भोला जैसवार ईरिक्शा चलाते थे. वह परिवार सहित टेफ्को टेनरी के किनारे रहते थे.

नवीन और भगत में गहरी दोस्ती थी. दोनों जब फुरसत में होते तो आपस में खूब बातें करते थे. एकदूसरे की मदद भी करते थे. कभीकभी दोनों के बीच खानेपीने की पार्टी भी हो जाती थी.

भगत के घर के पास रंजीत रहता था. वह उस की ही जाति का था. वह भगत के  परिवार की आर्थिक मदद भी करता था, जिस से उस ने घर में पैठ बना ली थी. उस की भगत की मां गुडि़या से खूब पटती थी. भगत उसे शक की नजरों से देखता था, लेकिन मां के कारण वह उस को घर आने से मना नहीं कर पाता था.

40 वर्षीया गुडि़या के बच्चे जवान थे, इस के बावजूद वह यौवन से भरपूर दिखती थी. गुडि़या अपने पति से खुश नहीं थी. इस का फायदा रंजीत ने उठाया था. उस ने  गुडि़या को अपने जाल में फंसा लिया था. दोनों के बीच शारीरिक संबंध बनते देर नहीं लगी.

इस की जानकारी भगत और कांती को हो गई थी, लेकिन मां के खिलाफ बोलने की किसी में हिम्मत नहीं थी. भगत के पिता की घर में कोई कद्र नहीं थी.

कुछ समय बाद रंजीत ने जवान हो रही कांती पर भी डोरे डालने शुरू कर दिए. इस में वह जल्द ही सफल भी हो गया. गुडि़या को इस का पता चला, लेकिन वह विरोध नहीं कर पाई. क्योंकि उस के और रंजीत के रिश्ते के बारे में कांती भी जानती थी. इस तरह उन के बीच का यह खेल चलता रहा. यानी रंजीत मां और बेटी का साझा प्रेमी हो गया.

14 जुलाई, 2021 को नवीन ने कांती और रंजीत को घर में आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. वह दोस्त से मिलने उस के घर गया था. उस ने यह बात भगत को बताई, तो उस का गुस्सा सातवें आसमान जा पहुंचा. भगत ने मांबहन की करतूत बाप को बताई.

भोला भी आगबबूला हो उठा. उस के बाद देर रात भोला और भगत ने गुडि़या और कांती की जम कर पिटाई कर दी. 2 दिन बाद कांती और गुडि़या ने नवीन की शिकायत और फिर पिटाई की जानकारी प्रेमी रंजीत से कर दी. उस ने नवीन को सबक सिखाने की सौगंध खा ली.

योजना के तहत 23 जुलाई, 2021 की शाम 4 बजे रंजीत ने कांती के जरिए नवीन को घर बुलवाया. नवीन कांती के घर पहुंचा तो पता चला कि मांबेटी झोपड़ी पाटने के लिए लकड़ी लेने टेफ्को टेनरी की ओर गई हैं.

कुछ देर में नवीन भी वहां पहुंच गया. नवीन ने मांबेटी की मदद की और लकड़ी घर ले आया. नवीन की घर में मौजूदगी की खबर गुडि़या ने मोबाइल फोन से रंजीत को दे दी.

रंजीत पहले शराब के ठेके पर गया और शराब पी. फिर वह कांती के घर पहुंचा. घर पर नवीन मौजूद था. वह उसे फुसला कर दोबारा लकड़ी लाने के बहाने धोबीघाट ले गया. तब तक शाम का धुंधलका छाने लगा था. बातचीत करते हुए दोनों धोबीघाट से कुछ दूरी पर पहुंचे, तभी रंजीत की नजर एक पत्थर पर पड़ी. उस ने पत्थर उठाया और नवीन के माथे पर तेजी से मारा.

नवीन बेहोश हो कर जमीन पर गिर पड़ा. उस के बाद रंजीत ने केबल के टुकड़े से नवीन का गला घोंट दिया. हत्या के बाद रंजीत ने नवीन की जेब से मोबाइल फोन व रुपए निकाल लिए. फिर शव को घसीट कर गड्ढे में डाल दिया. गड्ढे को सीमेंट की चादर से ढंक दिया.

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नवीन के शव को छिपाने के बाद रंजीत गुडि़या के घर आया. उस ने मांबेटी को नवीन की हत्या की जानकारी दी. रंजीत ने कांती को नवीन का मोबाइल फोन और उस की जेब से निकाले रुपए दिए. कांती ने रुपए ले लिए, लेकिन मोबाइल फोन नहीं लिया. तब रंजीत ने मोबाइल फोन तोड़ कर धोबीघाट के पास झाडि़यों में फेंक दिया.

28 जुलाई, 2021 को पुलिस ने गुडि़या, कांती और रंजीत उर्फ पाले को गिरफ्तार कर कानपुर कोर्ट में पेश किया. जहां से उन को जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक उन की जमानत स्वीकृत नहीं हुई थी.

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

शापित- भाग 1: रोहित के गंदे खेल का अंजाम क्या हुआ

Writer-आशीष दलाल

‘मैं तो अभी छोटा ही हूं न अंकल,’ कहते हुए नमन मुसकरा दिया.

‘और भी छोटा.’

‘वो कैसे?’ रोहित की बात सुन कर नमन उलझ गया.

‘वो मैं सिखा दूंगा, पर पहले प्रामिस करो कि इस खेल के बारे में किसी से कुछ भी नहीं कहोगे,’ रोहित ने खड़े होते हुए फिर से नमन को गोद में ले लिया.

‘ओके. प्रामिस सीक्रेट,’ नमन ने अपने दाएं हाथ की उंगली रोहित के बाएं हाथ की उंगली से जोड़ते हुए जवाब दिया.

‘और अगर भूल से भी किसी को बताया, तो भगवान नाराज हो कर तुम्हें श्राप दे देंगे और तुम्हारे यह अंकल मर जाएंगे. फिर उस का पाप तुम्हें ही लगेगा,’ रोहित ने पास ही बेड की तरफ नमन को ले जाते हुए कहा.

‘नहीं कहूंगा अंकल. गौड प्रामिस. चलो न खेलते हैं,’ नमन नए खेल के बारे में जानने को उत्सुक था.

‘तो ठीक है. एक बार छोटे बच्चे की एक्टिंग कर के बताओ. इस बिस्तर पर लेट कर बताओ कि वह कैसे सोता है,’ रोहित ने अपनी गोद से उतार कर नमन को बिस्तर पर बैठा दिया.

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‘ये तो बड़ा ही आसान है,’ नमन चहकते हुए बिस्तर पर लेट गया. रोहित भी उस की बगल में लेट गया.

‘गुड बौय. अब छोटा सा बच्चा चड्डी में पेशाब कर देता है तो अंकल उस की चड्डी चेंज करेंगे,’ सहसा रोहित के हाथ नमन की चड्डी तक पहुंच गए और एक झटके में कमर से उतर कर उस की चड्डी घुटनों के नीचे तक पहुंच गई.

‘नहीं अंकल. मम्मी कहती हैं कि अब मैं बड़ा हो गया हूं. तो मुझे सब के सामने चड्डी नहीं उतारनी चाहिए,’ नमन ने प्रतिकार किया.

‘इतनी जल्दी भूल गया? इस खेल में तू छोटा बच्चा बना है और छोटे बच्चे के शूशू करने पर चड्डी उतारनी ही पड़ती है,’ रोहित ने नमन को अपनी बातों में लपेटते हुए उस पर अपनी पकड़ बनाते हुए कहा.

‘पर अंकल, मैं तो शूशू की ही नहीं…’

‘झूठमूठ में की है. ठीक है,’ रोहित ने नमन को समझाते हुए कहा.

‘पर, मुझे शर्म आ रही है,’ नमन ने रोहित की पकड़ से छूटने की कोशिश कर अपनी चड्डी ऊपर चढ़ाने की कोशिश की.

‘ये बात है तो चल मैं भी अपनी पेंट उतार देता हूं,’ कहते हुए रोहित ने अपनी पेंट ढीला कर घुटने तक उतार दिया. रोहित को इस अवस्था में देख नमन आश्चर्य से उसे घूरने लगा.

‘इस खेल का नियम है यह. अच्छा, अब तू चुपचाप रहेगा तो ही खेल का मजा आएगा,’ कहते हुए रोहित के हाथ नमन के कमर के नीचे भाग को सहलाने लगे. गुदगुदी होने का एहसास पा कर नमन चुपचाप रोहित की हरकतों का हिस्सा बनने लगा.

‘नहीं… अंकल. दुख रहा है,’ कुछ देर बाद नमन के मुंह से एक चीख निकल पड़ी.

पूरे वाकिए को याद करते हुए अपने हाथ में थाम रखे कांच के गिलास पर नमन की पकड़ मजबूत हो गई. चंद ही पलों में हथेली पर उभर आई पसीनें की बूंदों की वजह से गिलास नमन के हाथ से फिसल कर दूर जा गिरा और सारा दूध फर्श पर फैल गया.

‘आज फिर से गिलास तोड़ दिया? आखिर हो क्या गया है तुझे?’ गिलास के टूटने की आवाज सुन कर सुनंदा रसोई से नमन के कमरे में दौड़ी चली आई.

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नमन ने जैसे सुनंदा की मौजूदगी महसूस ही न की. उस की आंखें अब खिड़की से बाहर दूर कुछ खोज रही थीं.

‘नमन बेटा, क्या हो गया है रे तुझे?’ सुनंदा पिछले एक हफ्ते से नमन के बदले हुए व्यवहार को महसूस कर रही थी. उस ने नमन के कंधे पर हाथ रखते हुए स्नेह जताते हुए पूछा.

सुनंदा की बात सुन कर नमन सहम सा गया. वह सुनंदा के पास आ कर उस से लिपट गया.

‘क्या हुआ बेटा? किसी से झगड़ा हुआ है क्या?’ सुनंदा नमन के अचानक से बदले हुए व्यवहार को समझ नहीं पा रही थी. वह उस के बालों को सहलाने लगी.

‘मम्मी… रोहित अंकल…’ कहते हुए नमन चुप हो गया.

‘इत्ती सी बात. तेरे रोहित अंकल पूना चले गए, इसलिए दुखी है. बेटा, उन की पढ़ाई पूरी होने के बाद नौकरी लग गई है तो उन्हें जाना तो था ही न. वे जब छुट्टी मिलने पर घर वापस आएं तो तब तू फिर खूब खेलना उन के संग,’ सुनंदा ने नमन को समझाते हुए कहा, तो नमन सिर हिला कर रोते हुए कहने लगा, ‘मैं नहीं खेलूंगा अंकल के साथ. मुझे यहां बहुत दुखता है, जब वो मेरे साथ खेलते हैं तो…’

सुनंदा ने गौर किया, नमन रोते हुए बारबार अपनी कमर के नीचे पीछे जांंघ वाले भाग को बारबार सहला रहा था. उसे नमन की यह हरकत और उस का रोना कुछ आशंकित कर गई.

‘क्या हुआ नमन…? ठीक से बता कि कौन सा खेल खेलता था रोहित तेरे संग?’ सुनंदा अपने बेटे के संग कुछ गलत होने की आशंका से घबरा उठी.

‘नहीं, मम्मी. बता दिया तो अंकल मर जाएंगे तो मुझे पाप लगेगा और फिर सब मुझे डांटेंगे,’ सुनंदा ने महसूस किया कि नमन की आंखें में एक डर समाया हुआ था.

“मैं जिंदा लौट रहा हूं” प्रधानमंत्री मोदी की क्रोधाग्नि

आज के भारतीय जनता पार्टी और उसके नेतृत्व का यही कमाल बार बार देखने को मिल रहा है. जब “देश” से हटकर “मैं” पर बात आ जाती है. और “मैं” से हटाकर “देश” पर लाकर खड़ी कर दी जाती है.
अगर हम दो टूक शब्दों में कहें तो कहा जा सकता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कहना कि-” मैं जिंदा लौट रहा हुं” बहुअर्थी है. इन शब्दों में उनका गुस्सा और आज की भारतीय राजनीति की त्रासदी समाई हुई है.

आज राजनीति उस दौर में पहुंच गई है जब प्रधानमंत्री सिर्फ भारतीय जनता पार्टी का प्रधानमंत्री हो जाता है.और मुख्यमंत्री कांग्रेस पार्टी का. एक समय था जब कोई विभूति जब इन पदों पर पहुंच जाती थी तो वह पार्टी बंदी की राजनीति से ऊपर उठकर के देश प्रदेश की मानी जाती थी और वह वैसा ही काम भी करते थे, वैसा ही उनके आचरण में दिखाई भी देता था. मगर प्रधानमंत्री का पंजाब में रैली में नहीं पहुंच पाने के बाद जो कुछ कहा गया वह यह बताता है कि जहां पंजाब में किसानों ने रास्ता रोक करके प्रधानमंत्री मोदी के काफिले को रोक दिया तो कल्पना कीजिए कि अगर ऐसे में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू अथवा लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री होते तो क्या करते?

इस मसले को सकारात्मक भाव से लेने की अपेक्षा इसमें राजनीति को लाना और नकारात्मक भाव से लाना देश की भावी राजनीति के लिए अच्छा नहीं होगा यह तय है. ऐसे में इस गंभीर मसले पर पटाक्षेप बड़ी आसानी से हो सकता था जब प्रधानमंत्री 20 मिनट काफिले में रहने की अपेक्षा किसानों के बीच पहुंच जाते और उनसे संवाद करते , निसंदेह इससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पंजाब पहुंचना सार्थक हो जाता फिर चाहे रैली को आप संबोधित कर पाते अथवा नहीं, यह दिगर मसला है.

सुरक्षा में सेंध नहीं कही जा सकती

प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री का काफिला करीब बीस मिनट तक घेरे रखा. मीडियो में जो खबरें आ रही है उसके अनुसार- “सुरक्षा में सेंध और बारिश के चलते प्रधानमंत्री की फिरोजपुर रैली रद्द कर दी गई और वह वापस लौट गए.”

और फिर प्रधानमंत्री कार्यक्रम भी मीडिया के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से देश की जनता ने देखा सुना, बठिंडा हवाई अड्डे पर पंजाब के अधिकारियों से कहा, ‘आप अपने मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त करें क्योंकि मैं जिंदा वापस लौट रहा हूं।’

दरअसल, हुसैनीवाला में राष्ट्रीय शहीद स्मारक से कुछ दै किलोमीटर दूर जब प्रधानमंत्री काफिला फ्लाईओवर पर पहुंचा, तो वहां कुछ प्रदर्शनकारियों ने सड़क को अवरुद्ध कर दिया. प्रधानमंत्री काफिले समेत करीब 20 मिनट तक फ्लाईओवर पर फंसे रहे. अब इसे सुरक्षा में चुक कहा जा रहा है, इस मसले को अगर गंभीरता से देखा और विवेचना की जाए तो कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री जी की इतनी लंबी सड़क यात्रा और खराब मौसम को देखते हुए किसी भी हालत में सड़क के दोनों और फोर्स की व्यवस्था नहीं की जा सकती थी.

हमें यह भी याद रखना चाहिए कि प्रधानमंत्री को सीधा हवाई मार्ग से ही रैली स्थल पर पहुंचना था. मौसम भी साथ नहीं दे रहा था. ऐसी परिस्थितियों में सड़क मार्ग पर अगर किसानों ने रास्ता रोक रखा था तो क्या प्रधानमंत्री उनसे बातचीत करते तो कितना अच्छा होता. यह समझ से दूर है कि बात करने में क्या दिक्कत थी और सच तो यह है कि इससे एक यह संदेश चला जाता कि प्रधानमंत्री आम लोगों के साथ मिलते हैं उठते बैठते हैं. आखिर प्रधानमंत्री इस देश की आवाम की सदारत ही तो कर रहे हैं.

जब आप मन की बात करते हैं अक्सर टीवी पर आकर के लोगों से मिलते हैं, बात करते हैं अपना संदेश देते हैं तो सड़क पर आकर संवाद करने में गुरेज क्यों, क्या यह एक ऐसी बड़ी चुक नहीं है जिससे प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की छवि और भी निखर कर दुनिया के सामने आ जाती. और पंजाब सरकार द्वारा अगर कोई षड्यंत्र भी किया गया है तो वह छिन्न-भिन्न हो जाता.

Bigg Boss 15: चैनल के खिलाफ बोली Tejasswi Prakash तो सलमान खान ने लगाई क्लास

बिग बॉस (Bigg Boss 15)  के इस वीकेंड का वार का फैंस बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. शो से जुड़ा एक वीडियो सामने आया है. इसमें सलमान खान (Salman Khan) तेजस्वी प्रकाश (Tejasswi Prakash) की क्लास लगाते हुए दिखाई दे रहे हैं.

अपना आपा खोते हुए दिखाई देंगे. सलमान खान चैनल के खिलाफ किए गए कमेंट्स पर तेजस्वी प्रकाश की क्लास लेते नजर आएंगे. इतना ही नहीं सलमान खान ने उन्हें ‘बेईमान’ भी कहा.

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शो के लेटेस्ट प्रोमो के अनुसार, सलमान खान तेजस्वी प्रकाश से कहते हैं कि वह इस चैनल को कोस रही हैं, जिससे पता चलता है कि वह अनफैथफुल हैं.उन्होंने कहा, ‘जिस थाली में खाया जा रहा है, उसमें कोई छेद करता है?

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दरअसल तेजस्वी ने शमिता शेट्टी को लेकर चैनल पर पक्षपाती होने का आरोप लगाया था. उन्होंने सहानुभूति कार्ड खेलना बंद करने के लिए कहा था.  तेजस्वी ने कहा कि उन्हें किसी से सहानुभूति नहीं चाहिए. इसके बाद सलमान खान ने कहा, चुप रहो तेजस्वी. सलमान ने आगे ये भी कहा कि तेजस्वी अपने बॉयफ्रेंड करण कुंद्रा का भी सम्मान नहीं करती हैं.

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शो में आप ये भी देखेंगे कि घर के अंदर एक इमरजेंसी स्क्रीनिंग टेस्ट चलाया जाएगा. वीकेंड का वार में गौहर खान भी घर के अंदर स्पेशल गेस्ट के तौर पर नजर आएंगी. वह एक टास्क करेगी जिसमें तेजस्वी कहती हैं कि उनकी अपनी कोई पहचान नहीं है और उन्हें चुप रहना चाहिए.

Imlie: इमली ने किया आर्यन पर हमला, अनु की चाल का हुआ पर्दाफाश

टीवी सीरियल इमली (Imlie) में बड़ा-बड़ा ट्विस्ट देखने को मिलने वाला है. शो के बिते एपिसोड में आपने देखा कि पार्टी के दौरान अनु फर्श पर कपड़े की एक शीट पर आग लगा देती है जिसे देखकर अर्पिता कांपने लगती है. और वह आर्यन का नाम लेकर चिल्लाने लगती है. तभी इमली कुछ ऐसा करती है, जिसे अर्पिता का डर खत्म हो जाता है. आइए बताते हैं शो के लेटेस्ट एपिसोड के बारे में.

शो में दिखाया जा रहा है कि आग देखकर अर्पिता डर जाती है, उसकी हालत देखकर इमली सोचती है कि अर्पिता के दिमाग से डर को कैसे भगाया जाए. तो दूसरी तरफ आर्यन अर्पिता की मदद करने जाता है तो इमली उसे रोक देती है. वह खुद अर्पिता का डर भगाने के लिए आर्यन पर हमला करती है.

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दरअसल इमली भाले से आर्यन  के सीने पर वार करती है जिससे उसका खून निकलने लगता है. ये देखकर अर्पिता से रहा नहीं जाता और वह दौड़कर इमली को धक्का मार देती है और आर्यन (Aryan) को बचा लेती है. और उसके गले लगकर फूट-फूट कर रोने लगती है.

 

तभी इमली कहती है कि मैंने ये सब  आपके भाई के साथ किया ताकि आप अपने डर को हरा सके. वहां मौजूद सभी लोग इमली की तारीफ करने लगते हैं.

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तो दूसरी तरफ मालिनी को इमली से जलन होती है. वह  अनु से कहती है कि इमली बहुत लकी है और फिर वह सबकी हीरो बन गई है.तो वहीं अनु फिर एक नई चाल चलती है. वह मालिनी के नंबर कॉल करके अपने फोन को एक कमरे में छिपा देती है.

 

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तो वहीं इमली मां मीठी का कॉल आएगा. मीठी बताती है कि आदित्य सो रहा है और ठीक है. मीठी ये भी कहती है कि वह अभी भी तुम्हारा नाम ले रहा है उसके दिल में सिर्फ तुम हो. इस बीच इमली को वो मोबाइल मिल जाता है जिसे अनु ने उसकी बातें सुनने के लिए रखा था. शो में ये देखना होगा कि अब इमली अनु को कैसे सबक सीखाती है.

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Valentine’s Special: डिवोर्सी- भाग 2: मुक्ति ने शादी के महीने भर बाद ही तलाक क्यों ले लिया

‘‘आप से एक बात पूछूं मुक्ति?’’ एक दोपहर लंच के समय मैं ने कहा. ‘‘मेरे डिवोर्स के बारे में?’’ उन्होंने सहज भाव से कहा.

फिर हंसते हुए बोलीं, ‘‘एक पुरुष को स्त्री के बारे में जानने की उत्सुकता रहती ही है, पूछिए.’’ ‘‘आप इतनी सुंदर हैं. सिर से ले कर पैरों तक आप में कोई कमी नहीं. व्यावहारिक भी हैं. पढी़लिखी भी हैं. फिर आप के पति ने आप को तलाक कैसे दे दिया?’’

उन्होंने सहज भाव से कहा, ‘‘सुंदरता का डिवोर्स से कोई तालमेल नहीं होता. और दूसरी बात यह कि तलाक मेरे पति ने नहीं, मैं ने दिया है उन्हें.’’

अब मैं विस्मय में था, ‘‘आप ने? क्या आप के पति शराबी, जुआरी टाइप व्यक्ति हैं?’’ ‘‘हैं नहीं थे. अब वे मेरे पति नहीं हैं. नहीं, वे शराबी, कबाबी, जुआरी टाइप नहीं थे.’’

‘‘तो किसी दूसरी औरत से …’’ मेरी बात बीच ही में काटते हुए उन्होंने कहा, ‘‘नहीं.’’

‘‘तो दहेज की मांग?’’ ‘‘नहीं,’’ मुक्ति ने कहा.

‘‘तो आप की पसंद से शादी नहीं हुई थी?’’ ‘‘नहीं, हमारी लव मैरिज थी,’’ मुक्ति ने बिलकुल सहज भाव से कहा. कहते हुए उन के चेहरे पर हलका सा भी तनाव नहीं था. अब मेरे पास पूछने को कुछ नहीं था. सिवा इस के कि फिर डिवोर्स की वजह? लेकिन मैं ने दूसरी बात पूछी, ‘‘आप के मातापिता को चिंता रहती होगी.’’

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‘‘रहती तो होगी,’’ मुक्ति ने लापरवाही से कहा, ‘‘हर मांबाप को रहती है. लेकिन उतनी नहीं, बल्कि उन का यह कहना है कि अपनी पसंद की शादी की थी. अब भुगतो. फिर उन्हें शायद अच्छा लगा हो कि बेटी ने बगावत की. विद्रोह असफल हुआ. बेटी हार कर घर वापस आ गई. जैसा कि सहज मानवीय प्रकृति होती है. बेटी घर पर है तो घर भी देखती है और अपना कमा भी लेती है. एक भाई है जो अपने परिवार के साथ दिल्ली में रहता है.’’ अब मुझे पूछना था क्योंकि मुख्य प्रश्न यही था, ‘‘फिर डिवोर्स की वजह?’’ उस ने उलटा मुझ से प्रश्न किया, ‘‘पुरुष क्यों डिवोर्स देते हैं अपनी पत्नी को?’’

मैं कुछ देर चुप रहा. फिर कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘शायद उन्हें किसी दूसरी स्त्री से प्रेम हो जाता होगा इसलिए.’’ ‘‘बस यही एक वजह है.’’

‘‘दूसरी कोई वजह हो तो मुझे नहीं मालूम,’’ मैं ने कहा. फिर मेरे मन में अनायास ही खयाल आया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मुक्ति को किसी और से प्यार हो गया हो शादी के बाद. हो सकता है कि बड़े घर में शादी हुई हो. सोचा होगा तलाक में लंबी रकम हासिल कर के आराम से अपने प्रेमी से विवाह… लेकिन नहीं, इतने समय में तो कोई नहीं दिखा ऐसा और न ही कभी मुक्ति ने बताया… न कोई उस से मिलने आया.

मुक्ति ने मुझे विचारों में खोया देख कर कहा, ‘‘ऐसा कुछ नहीं है कार्तिक जैसा आप सोच रहे हैं.’’ ‘‘मैं क्या सोच रहा हूं?’’ मुझे लगा कि मेरे मन की बात पकड़ ली मुक्ति ने. मैं हड़बड़ा गया.

उन्होंने हंसते हुए कहा, ‘‘मुझे किसी दूसरे पुरुष से प्रेम नहीं हुआ. जैसा कि आजकल महिलाएं करती हैं. तलाक लो… तगड़ा मुआवजा मांगो. मेरा भूतपूर्व पति सरकारी अस्पताल में लोअर डिवीजन क्लर्क था. था से मतलब वह जिंदा है, लेकिन मेरा पति नहीं है.’’ मैं समझ नहीं पा रहा था कि फिर तलाक की क्या वजह हो सकती थी?

‘‘समाज डिवोर्सी स्त्री के बारे में क्या सोचता है?’’ मैं ने पूछा. ‘‘कौन सा समाज? मुझे क्या लेनादेना समाज से? समाज का काम है बातें बनाना. समाज अपना काम बखूबी कर रहा है और मैं अपना जीवन अपने तरीके से जी रही हूं,’’ उन्होंने समाज को ठेंगा दिखाने वाले अंदाज में कहा.

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‘‘लेकिन कोई तो वजह होगी तलाक की… इतना बड़ा फैसला… शादी 7 जन्मों का बंधन होता है,’’ मैं ने कहा. ‘‘शादी 7 जन्मों का बंधन… आप पुरुष लोग कब तक 7 जन्मों की आड़ ले कर हम औरतों को बांध कर रखेंगे? ये औरतों को बेवकूफ बनाने की बात है,’’ मुक्ति ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा.

‘‘आप तो नारीवादी विचारधारा की हैं.’’ ‘‘नहीं, मैं बिलकुल भी पुरुषविरोधी विचारधारा की नहीं हूं.’’

लंच समाप्त हो चुका था. मैं ने उठते हुए पूछा, ‘‘मुक्ति, शादीशुदा रही हैं आप… अपनी शारीरिक इच्छाएं कैसे…’’ मुझे लगा कि प्रश्न मर्यादा लांघ रहा है. अत: मैं बीच ही में चुप हो गया.

लेकिन उन्होंने मेरी बात का उत्तर अपने हाथ की मध्यमा और तर्जनी उंगली उठा कर दिया और फिर नारी सुलभ हया से अपना चेहरा झुका लिया.

Winter 2022: न मर्ज रहेगा न ही मरीज

Writer- डा. पंकज चतुर्वेदी

इंगलैंड में 30 साल के एक युवक की अचानक मौत हो गई. डाक्टरों ने पाया कि इस असामयिक मौत का कारण सीजेडी अर्थात क्रूजफेल्ड जैकब डिजीज था. गहन जांच से पता चला कि युवक जब 15 साल का था, तभी उसे लंबाई बढ़ाने के लिए मानव वृद्धि हार्मोंस दिए जा रहे थे. हार्मोंस एक मुर्दे से निकाले गए थे और दाता टिश्यू के साथसाथ संक्रमण एजेंट भी आ गए थे. अनुमान है कि आज ऐसे हजारों लोग असामयिक काल के गाल में समा रहे हैं.

‘बच्चों के लिए पौष्टिक आहार, लंबाई बढ़ाएं तंदुरुस्ती बनाएं’, ‘वजन घटाना अब बहुत आसान, बस एक गोली रोज’, ‘बगैर कमजोरी के मोटापा कम करें’, ‘खुराक का बेहतरीन विकल्प, केवल एक कैप्सूल प्रतिदिन’, ‘मुंह में पंप करें, महीने में 7 किलो वजन घटाएं’, ‘स्लिम बनें, रंगरूप निखारें’ जैसे विज्ञापनों की प्रचार माध्यमों में भरमार है. इन के साथ यह भी प्रचारित किया जाता है कि नुस्खे अमेरिका में सफलता से आजमाए जा रहे हैं.

दूसरी ओर अमेरिका की सरकार ने मोटापा घटाने वाली नई लोकप्रिय दवाओं पर पाबंदी लगा दी थी, जिस का सेवन दुनियाभर में 50 लाख से अधिक लोग अपनी काया सुडौल बनाने के लिए करते थे. इस दवा के कारगर होने की प्रक्रिया शरीर के ‘मूल आचार व्यवहार में परिवर्तन’ के माध्यम से संचालित होती है जिस तरह मस्तिष्क कोशिकाओं से ‘न्यूरोट्रांसमीटर सेरोटौनिक’ का स्राव होता है.

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असल में मोटापा घटाने वाली दवाओं के सेवन में मस्तिष्क कोशिकाओं का क्षय होने लगता है. हालांकि दवा निर्माता कंपनियों ने इस बात से असहमति जताई है लेकिन न्यूरोकैमिकल परीक्षणों से प्राप्त नतीजे इस बात को सिद्ध करते हैं कि मस्तिष्क की कुछ कोशिकाएं इस के कारण प्रभावित हो सकती हैं. खासतौर से पतली और लंबी शाखाओं वाली कोशिकाओं की न्यूरोट्रांसमीटर सेरोटौनिक के प्रति अनुकूल होने की क्षमता घट जाती है.

इस रिपोर्ट के कुछ दिनों पहले अमेरिका में एक अन्य मैडिकल खोज की चर्चा थी. उस में बताया गया था कि मोटापा घटाने की एक और प्रचलित दवा लेने से जानलेवा हृदय रोग हो सकते हैं. इन दवाओं के कुप्रभावों पर जब हल्ला मचा तो इन्हें बाजार से हटा लिया गया.

अमेरिका की एक रिपोर्ट में लिखा गया था कि इन दवाओं को एफडीए (फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन) की मंजूरी केवल ‘अतिस्थूल मरीजों’ के इलाज के लिए थी, जबकि डाक्टरों और सुडौल बनाने की दुकान चलाने वालों ने इस का इस्तेमाल थोड़ी सी चरबी बढ़ने पर करना शुरू कर दिया था.

यही नहीं, इस मैजिक मैडिसिन की अंधाधुंध खुराकें भी दी गईं जिस के चलते फायदे के बजाय नुकसान अधिक हुआ. सनद रहे, पांडीमीन के दुष्प्रभाव की जानकारी उस की खोज के 24 साल बाद हो पाई थी.

मोटापा घटाने की लोकप्रिय दवा जब मंजूरी के लिए एक भारतीय कंपनी अमेरिका में एफडीए के पास गई तो पता चला कि इस दवा ने परीक्षण के दौरान जानवरों के दिमाग पर उलटा असर डाला था पर पैसा कमाने की हवस में कंपनी ने इस तथ्य को छिपाए रखा.

अमेरिका में ऐसे सैकड़ों मामले प्रकाश में आए, जिन में इस दवा का सेवन करने वालों के हृदय वौल्व क्षतिग्रस्त हो गए. साथ ही, दवा खाने वाले 30 फीसदी लोगों में बगैर किसी पूर्व लक्षण के दिल का वौल्व खराब होने की संभावना देखी गई.

इस बीमारी का मुख्य कारण वैकल्पिक आहार के रूप में दवा का इस्तेमाल बताया गया. इस तथ्य की जानकारी एफडीए को एक ऐसी कंपनी के उत्पादों से लगी जिस ने अपने वैकल्पिक खाद्य बनाने वाले कारखाने में अत्याधुनिक आनुवंशिकी इंजीनियरिंग बैक्टीरिया का इस्तेमाल शुरू किया था. इस बीमारी के शिकार लगभग 50 लोगों की मौत हो गई, जबकि कोई डेढ़ हजार के आसपास लोग स्थाई रूप से विकलांग हो गए थे.

आनुवंशिकी इंजीनियरिंग के तहत डीएनए तकनीक से इंटरफेरोन इंसुलिन हार्मोंस आदि चिकित्सकीय प्रोटीनों का उत्पाद होता है. इंटरफेरोन का निर्माण मानव शरीर के ऊतकों और रक्त कोशिकाओं से किया जाता है. इस का प्रयोग शक्तिशाली प्रतिविषाणु कारक एजेंट के रूप में होता है. चूंकि इसे मानव शरीर से प्राप्त करने की प्रक्रिया खासी जटिल और महंगी है, इसलिए इस के उत्पादन के लिए बैक्टीरिया प्रणाली अपनाने के प्रयोग आज भी हो रहे हैं.

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यहां जानना जरूरी है कि जिस मानव शरीर से इंटरफेरोन का संश्लेषण किया जाता है, उस के आनुवंशिकी जटिल रोगों का उस से निर्मित दवा खाने वाले पर गंभीर असर होता है. इसी प्रकार इंसुलिन का निष्कर्षण गाय और सूअर के अग्नाशय से किया जाता है. कई मामलों में पशु इंसुलिन से एलर्जी हो जाने की शिकायतें भी सामने आई हैं.

भारत में बिक रहीं संदिग्ध दवाएं

अमेरिका और यूरोप के देशों में जब ऐसी घातक दवाओं के इस्तेमाल पर पाबंदी लगी तो पेटेंटधारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत जैसे विकासशील देशों को अपना बाजार बना लिया. आज भारत के बाजार में सैकड़ों ऐसी दवाएं धड़ल्ले से बिक रही हैं, जिन की रोग निरोधक क्षमता संदिग्ध है. कई दवाओं पर भारत सरकार ने पाबंदी लगा रखी है और कइयों के घातक असर को देखते हुए उन पर रोक लगाना जरूरी है. कुछ ऐसी दवाएं भी बाजार में बिक रही हैं, जिन के माकूल होने की जांच आज तक किसी अधिकृत संस्था से नहीं हुई है.

बाजार में इन दिनों भूख बढ़ाने वाली दवाओं का बोलबाला है. ऐसी कई दवाएं प्रचलित हैं, जो नवजात शिशुओं या समय से पहले पैदा हुए बच्चों के लिए जानलेवा हो सकती हैं. इन दवाओं के इस्तेमाल से मतिभ्रम, ऐंठन और मौत तक संभव है. इस से मानसिक सक्रियता में कमी आने के भी अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं.

जहां एक ओर भारत को अपने बेकार व नुकसानदायक उत्पादों की मंडी बनाने के लिए जन स्वास्थ्य से मखौल करते विकसित देश हैं, वहीं दूसरी ओर लापरवाह भारत सरकार है, जो आने वाली पीढि़यों को पंगु बनाने वाली तथाकथित दवाओं की बिक्री के प्रति आंखें मूंदे हुए है. साथ ही, वह नव धनाढ्य वर्ग भी है, जो अत्याधुनिक भौतिक लिप्सा की फिराक में अपने हाथपैर हिलाने से भी परहेज कर रहा है. फलस्वरूप, बेडौल हो रहे शरीर को स्लिमट्रिम रखने के लिए ऐसी दवाओं का सहारा ले रहा है, जो घोषित जहर हैं.

हो सकता है कि इस पीढ़ी की कोताही का खमियाजा आने वाली पीढ़ी को भोगना पड़े क्योंकि आज शारीरिक आनुवंशिकी में बदलाव करने वाली जो दवाएं दी जा रही हैं, उन का असर आने वाली नस्लों पर तो होना है.

कोविड-19 के बाद वैक्सीन का इन दवाओं पर क्या असर होगा, यह भी अभी पता नहीं है क्योंकि वैक्सीन निर्माताओं का सारा ध्यान स्वस्थ लोगों पर है, उन पर नहीं जो अनापशनाप दवाएं, काढ़े, दवाइयां खाते रहते हैं. हमारे यहां घरघर दवा बनाने के कारखाने खुले हैं और वे वैक्सीन व वजन घटानेबढ़ाने की दवाओं के साथ क्या खिलवाड़ कर सकते हैं, अभी मालूम नहीं है.

एक कमरे में बंद दो एटम बम: नीना और लीना की कहानी 

Writer- Dipanvita Roy Banerjee

वे चारों डाइनिंग टेबल पर जैसे तैसे आखरी कौर समेट कर उठने के फिराक में थे. दिल के दरवाजे और खिड़कियां अंदुरनी शोर शराबों से धूम धड़ाका कर रहीं थीं.

नीना और लीना दोनों टीन एज बच्चियां अब उठकर अपने कमरे में चली गईं है और कमरे का दरवाजा अंदर से बन्द कर लिया है.

समीर और श्रीजा का चेहरा मेंढ़क के फूले गाल की तरह सूजा है, और उन दोनों के मन में एक दूसरे पर लात घुंसो की बारिश कर देने की इच्छा बलवती हो रही है.

” मै कुछ भी वीडियो फारवर्ड करूं ,किसी से कुछ भी कहूं ,तुम्हे क्या – तुमने मेरे मामले में दुबारा टांग अड़ाने की कोशिश भी की तो अंजाम देखने के लिए तैयार रहना! तुम औरत हो,देश और दुनिया के बारे में ज्यादा नाक न गलाओ! समझी?”

“अरे! इतनी क्यों कट्टर सोच है  तुम्हारी ! तुम सारे ग्रुप्स में फेक वीडियो डाल रहे हो ,भड़काऊ संदेश भेज रहे हो, कोरोना वाले लौक डाउन में जहां लोगों को शांत रहकर एक जुट होने का संदेश देना चाहिए, ताकि बिना वैमनस्य के लोग एक दूसरे की मदद कर सकें, तुम असहिष्णुता को बढ़ावा दे रहे हो, और मुझसे सहा नहीं जा रहा तो मै इसलिए चुप रहूं क्योंकि मै औरत हूं!”

“हां ,इसलिए ही तुम  मुझसे मुंह मत लगो! तुम लेडिस लोग समझती कुछ नहीं बस मुंह फाड़कर चिल्लाने लगती हो!”

“लडकियां भी समझ रही हैं, कि औरतों के प्रति तुम्हारा नजरिया कितना पूराना और कमतर है!”

“जानना ही चाहिए! उन्हें अपनी तरह नाच मत नचाओ!

औरत का जन्म है तो जिंदगी भर औरत ही रहेगी,मर्द बनकर  तो नहीं रह सकती!”

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उफ़ इसका क्या इलाज! बात बढ़ने से बच्चियां परेशान होंगी, श्रीजा मन मसोस कर रह गई.

कोरोना की वजह से लौक डाउन था.औफिस बंद था,यानी अब अपनी मर्जी का था,दवाब नहीं था. सैर सपाटा,दोस्ती यारी ,शराब कबाब बन्द था , बिन बताए घर से घंटों गायब रहना बन्द था, इस बन्द में सब कुछ तो बन्द था – फिर श्रीजा का खुलकर सांस लेना तो बन्द होना ही था ! मन लगाने को भड़काऊ संदेश फारवर्ड और पत्नी और बेटियों पर कट्टर पंथी सोचों का वार! लौक डाउन ने वाकई श्रीजा की जिंदगी तोड़ मरोड़ कर रख दी थी.

वह बेटियों के पास जाकर बैठ गई.छोटी बेटी ने पूछा – मां क्या पापा के दूसरे धर्मों के दोस्त नहीं है? मेरे तो बहुत सारे दोस्त हैं पक्के पक्के, जिनकी धर्म जाति  मुझसे अलग है.उनके घर जाती हूं तो पता तो नहीं चलता कि वे अलग धर्म के है, हम तो उनके घर खूब मज़े करते हैं!”

“बेटा खुराफात लोगों का यह अच्छा टाइम पास है! यहां इस लौक डाउन में  कितने ही लोगों को कितनी मुश्किलें हो रहीं हैं ,हम चाहे तो उन्हें मदद करें, ये क्या कि आपस में रंजिश बढ़ाएं! हर जाति धर्म में बुरे लोग होते हैं, जो अपराध करते हैं, उनका धर्म अपराध होता है, और कुछ नहीं! लेकिन कट्टर सोच वालों को कैसे समझाया जाय!”

“क्या हमारे पापा भी कट्टर ही हैं?”

“ये तुम खुद ही समझना , मै नहीं बता सकती!”

डिनर जैसे तैसे खत्म कर अब सोने की तैयारी थी.

निबाहना भी भारी काम है .श्रीजा को निभाना पड़ता ही है, बात सिर्फ बच्चों के भविष्य की ही नहीं, इस मरदुए से वो भी तो जाने अनजाने लगाव की डोर से बंधी है! दिमाग में कितनी ही भिन्नता हो, दिल में कितनी ही खिन्नता हो, निभाना सिर्फ निभाना नहीं, दिल का कहा मानना भी है!

काश ! पति अगर शांति प्रिय होता, उदार और समझदार होता, तो घर में ताला बन्दी कितनी रूमानी होती! हसरतें अनुराग से भरी भरी -बल्लियों उछलती पतिदेव के गले में झुल सी जाती!

पर यहां तो कूप मंडूक को देखते ही तन बदन में आग लहक जाती है!

कमरा साफ सुंदर, नीली रोशनी जैसे मादक नील परी सी अपनी चुनरी फैलाए थी!

करीने से बिस्तर लगाकर श्रीजा एक किनारे सिमट गई .

“श्रीजा ! इधर आओ ”

“मन नहीं है!”

“तुम्हारे मन से क्या होता है?”

“लौक डाउन!”

“वो बाहर है!”

“दिल में भी!”

“अरे! छोड़ो मै दिल की बात नहीं कर रहा!”

” मेरे घर का दरवाजा दिल से होकर गुजरता है! मेरा दिल चकनाचूर है! तुम देश वासियों में नफरत क्यों बांट रहे हो? उदार बनो,कट्टर नहीं! ”

“भाड़ में जाओ! इतना लेक्चर चौराहे पर जाकर दो!”

यार एक तो घर में कैद होकर रह गया ,ऊपर से तुम एटम बम फोड़े जा रही हो! घर है कि ब्लास्ट फर्नेस!”

“तुम ही बताओ! तुम भी कोरोना बम से कम हो क्या!

इतनी नफरत और उंच नीच का भेद भाव!”

अचानक  एक तकिया श्रीजा की पीठ पर आकर लगा. वो समीर की तरफ पीठ दिखाकर लड़ती जा रही थी, कि अचानक यह झटका !

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धमाके सा समीर मेन गेट खोलकर बाहर निकल चुका था.

दिमाग भन्ना गया था समीर का. आखिर एक औरत को इतनी हिम्मत पड़ी कैसे कि वह अपने पति से जवाब तलब करे ! कहीं उसने श्रीजा को ज्यादा ढील तो न दे दी? समीर अपने विचारों में इतना ही खो चुका था कि कब वह अपनी कालोनी से निकलकर मेन रोड में चलता जा रहा था उसे पता ही न चला!

होश तो तब हुआ जब पुलिस पेट्रोलिंग गाड़ी ने उसे आकर रोका!

“अरे !सर जी कुछ नहीं, बीबी घर में बड़ा चिक चिक कर रही थी!

मजाक है ?बिना मास्क बाहर घूम रहे हैं, वो भी रात के बारह बजे इस 144 में!”

लाख मिन्नतें कर किसी  तरह समीर पुलिस से जान छुड़ाने में कामयाब हुआ लेकिन पुलिस की गाड़ी उसे घर तक छोड़ने आई.

क्या हुआ मैडम! हम तो इन्हे थाने ले जा रहे थे.बड़ा गिड़गिड़ाया इन्होंने. क्या अनबन हो गई?”

“अहंकार के फुले हुए कुप्पे का यूं पिचक जाना श्रीजा के लिए बड़ा संतोष कारी था.उसने समीर की ओर भेद भरी नजरों से देख इतना ही पूछा- “क्या हुआ था

बताऊं?”

“अरे सर जी! गलती मेरी भी थी! अब घर के अंदर ही रहूंगा और बीबी की बात मानुंगा.”

श्रीजा के अंदर हंसी का गुबार भर भर निकलने को हुआ,लेकिन वो समीर के घिघियाए चेहरे को हंसी में टालना नहीं चाहती थी.

फिर से दोनो बिस्तर पर थे.समीर इस बार अपना खार खाया हाइड्रोजन बम दिल में ही दबाकर चुप सो गया!

करम फूटे जो ऐसी एटम बम को छुए!

जरूरी हैं दूरियां पास आने के लिए- भाग 2: क्या हुआ था विहान और मिशी के जीवन में

लेखिका- डा. मंजरी अमित चतुर्वेदी

‘‘विहान… मेरा नाम इस से पहले इतना अच्छा कभी नहीं लगा,’’ विहान पीछे से खड़ेखड़े ही बोला.

मिशी ने हड़बड़ाहट में नाम पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘कहां है… कब आए तुम, कहां है वह?’’

मिशी की आंखें उस लड़की को  ढूंढ़ रही थीं जिस से मिलवाने विहान उसे  वहां ले कर आया था.

‘‘नाराज हो कर चली गई,’’ मिशी के पास बैठते हुए विहान ने कहा.

‘‘नाराज हो गई, पर क्यों?’’ मिशी ने पूछा.

‘‘अरे वाह, मैं जिसे प्रपोज करने वाला हूं, वह लड़की यदि देखे कि मेरे बचपन की दोस्त रेत पर इस कदर प्यार से उस के बौयफ्रैंड का नाम लिख रही है, तो गुस्सा नहीं आएगा उसे,’’ विहान ने नाटकीय अंदाज में कहा.

‘‘मैं ने कब लिखा तुम्हारा नाम,’’ मिशी सकपका कर बोली.

‘‘जो अभी अपनेआप रेत पर उभर आया था, उस नाम की बात कर रहा हूं.’’

उस ने नजरें झका लीं, उस की चोरी जो पकड़ी गई थी. फिर भी मिशी बोली, ‘‘मैं ने… मैं ने तो कोई नाम नहीं लिखा.’’

‘‘अच्छा बाबा, नहीं लिखा,’’ विहान ने  मुसकरा कर कहा.

मिशी समझ ही नहीं पा रही थी कि यह हो क्या रहा है.

‘‘और वह लड़की जिस से मिलवाने तुम मुझे यहां ले कर आए थे? सच बताओ न विहान.’’

‘‘कोई लड़कीवड़की नहीं है, मैं अभी जिस के करीब बैठा हूं, बस, वही है,’’ उस ने मिशी की आंखों में देखते हुए कहा.

नजरें  मिलते ही मिशी नजरें चुराने लगी.

‘‘मिशी, मत छिपाओ, आज कह दो जो भी दिल में हो,’’ विहान बोला.

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मिशी की जबान खामोश थी पर आंखों में विहान के लिए प्यार साफ नजर आ रहा था, जिसे विहान ने पहले ही महसूस कर लिया था. पर वह मिशी से जानना चाहता था.

मिशी कुछ देर चुप रही, दूर समंदर में उठती लहरों के ज्वार को देखती रही. ऐसा  ही भावनाओं का ज्वार अभी उस के दिल में मचल रहा था. फिर उस ने हिम्मत बटोर कर बोलने की कोशिश की, पर उस की आंखों में जज्बातों का समंदर तैर गया, कुछ रुक कर वह बोली, ‘‘कहां चले गए थे विहान, मैं… मैं… तुम को कितना मिस कर रही थी,’’ इतना कह कर वह फिर शून्य में देखने लगी.

‘‘मिशी, आज भी चुप रहोगी? बह जाने दो अपने जज्बातों को, जो भी दिल में है कहो. तुम नहीं जानतीं मैं ने इस दिन का कितना इंतजार किया है. मिशी बताओ, प्यार करती हो मुझ से?’’

मिशी विहान की तरफ मुड़ी. उस के मन की भावनाएं उस की आंखों में साफ नजर आ रही थीं. होंठ कंपकंपा रहे थे. ‘‘विहान, तुम जब नहीं थे, तब जाना कि मेरे जीवन में तुम क्या हो, तुम्हारे बिना जीना सिर्फ सांस लेना भर है. तुम्हें अंदाजा भी नहीं है कि मैं किस दौर से गुजरी हूं. मेरी उदासी का थोड़ा भी खयाल नहीं आया तुम को,’’ कहतेकहते मिशी रो पड़ी.

विहान ने उस के आंसू पोंछे और  मुसकराने का इशारा करते हुए कहा, ‘‘मिशी, तुम ने तो सिर्फ 10 महीने इंतजार किया, मैं ने वर्षों किया है. जिस तड़प से तुम कुछ दिन गुजरीं, वह मैं ने आज तक सही है. मिशी तुम मेरे लिए तब से खास हो जब मैं प्यार का मतलब भी नहीं समझता था. बचपन में खेलने के बाद जब तुम्हारे घर जाने का समय आता था तब अकसर तुम्हारी चप्पल कहीं खो जाती थी, तुम देर तक ढूंढ़ने के बाद मुझ से ही शिकायत करतीं और हम दोनों मिल कर अपने साथियों पर ही बरस पड़ते. पर मिशी वह मैं ही होता था, हर बार जो तुम्हें रोकने के लिए यह सब करता था. तुम कभी जान ही नहीं पाईं,’’ कहतेकहते विहान यादों में खो गया.

‘‘जानती हो, जब हम साथ पढ़ाई करते थे तब भी मैं टौपिक समझ न आने के बहाने से देर तक बैठा रहता. तुम मुझे बारबार समझतीं. पर, मैं नादान बना बैठा रहता सिर्फ तुम्हारा साथ पाने की चाह में. जब छुट्टियों में बच्चे बाहर अलगअलग ऐक्टिविटी करते तब भी मैं तुम्हारी पसंद के हिसाब से काम करता था ताकि तुम्हारा साथ रहे.’’

‘‘विहान…’’ मिशी ने अचरज से कहा.

‘‘अभी तुम बस सुनो मुझे और मेरे दिल की आवाज को. याद है मिशी, जब हम 12वीं में थे, तुम मुझ से कहतीं, ‘क्यों विहान, गर्लफ्रैंड नहीं बनाई, मेरी तो सब सहेलियों के बौयफ्रैंड हैं?’ मैं पूछता कि तुम्हारा भी है तो तुम हंस देतीं, ‘हट पागल, मुझे तो पढ़ाई करनी है एमबीए की, फिर मस्त जौब. पर विहान,  तुम्हारी गर्लफ्रैंड होनी चाहिए’ इतना  कह कर तुम मुझे अपनी कुछ सहेलियों की खूबियां गिनवाने लगतीं. मेरा मन करता कि तुम्हें  झकझर कर कहूं कि तुम हो तो, पर नहीं कह सका.

‘‘और तुम्हें जो अपने हर बर्थडे पर  जिस सरप्राइज का सब से ज्यादा इंतजार होता, वह देने वाला मैं ही था. बचपन में जब तुम को तुम्हारी फेवरेट टौफी तुम्हारे पैंसिल बौक्स में मिली, तुम बेहद खुश हुई थीं. अगली बार भी जब मैं ने तुम को सरप्राइज किया, तब तुम ने कहा था, ‘विहान, पता नहीं कौन है, मौम, डैड, दी या मेरी कोई फ्रैंड, पर मेरी इच्छा है कि मुझे हमेशा यह सरप्राइज गिफ्ट  मिले.’ तुम ने सब के नाम लिए, पर मेरा नहीं,’’ कहतेकहते विहान की आवाज लड़खड़ा सी गई, फिर भर आए गले को साफ कर वह आगे बोला, ‘‘तब से हर बार मैं यह करता गया. पहले पैंसिल बौक्स था, फिर बैग, फिर तुम्हारा पर्स और अब कूरियर.’’

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सच जान कर मिशी जैसे सुन्न हो गई. वह हर बात विहान से शेयर करती थी. पर कभी यह नहीं सोचा कि विहान भी तो वह शख्स हो सकता है. उसे खुद पर बहुत गुस्सा आ रहा था.

रात गहरा चुकी थी. चांद स्याह रात के माथे पर बिंदी बन कर चमक रहा था. तेज हवा और लहरों के शोर में मिशी के जोर से धड़कते दिल की आवाज भी मिल रही थी. विहान आज वर्षों से छिपे प्रेम की परतें खोल  रहा था.

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