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Winter 2022: बथुआ से बनाएं ये 2 टेस्टी रेसिपी

सर्दियों के मौसम में बथुआ आसानी से मिल जाती है, अगर आप केवल बथुआ का साग खाकर बोर हो गये हैं तो हम आपको बताएंगे बथुआ से बनने वाले कई तरह की रेसिपी के बारे में.

  1. बथुआ आलू परांठा 

सामग्री

– 2 कप आटा

– 2 बड़े चम्मच दही

-आटा गूंथने के लिए पानी

– नमक (स्वादानुसार)

भरावन की सामग्री

– धुला व बारीक कटा बथुआ (4 कप)

–  आलू (1मीडियम आकार का)

– अदरक व हरी मिर्च (1 बड़ा चम्मच)

– धनिया जीरा (बारीक कटी 1 बड़ा चम्मच)

– दरदरा कुटा (1/4 छोटा चम्मच)

– हींग पाउडर (1/2 छोटा चम्मच)

– गरममसाला  (1 छोटा चम्मच)

– चाटमसाला (1 छोटा चम्मच)

– नमक (स्वादानुसार)

– परांठा सेंकने के लिए (रिफाइंड औयल)

बनाने की विधि

– आटा गूंथ कर रख लें.

– एक नौनस्टिक कड़ाही में 1 बड़ा चम्मच तेल गरम करें.

– हींग का तड़का लगा कर बथुआ व आलू छोटेछोटे काट डाल दें.

– ढक कर मीडियम आंच पर पकाएं.

– जब आलू गल जाएं और बथुए का पानी सूखने लगे तब उस में नमक डाल दें.

– पानी सूख जाए तब मैशर से आलू मैश कर दें.

– सभी बचे सूखे मसाले डाल कर मिश्रण उलटे-पलटें.

– ठंडा कर मिश्रण की मीडियम आकार की लोई लें.

–  थोड़ा बेलें बीच में मिश्रण भर कर बंद करें और फिर बेलें.

– इसे गरम तवे पर तेल लगा कर सेंक लें.

– चटनी या दही के साथ सर्व करें.

2. बथुआ स्टिक्स रेसिपी

सामग्री:

–  1 कप मैदा

– 3 बड़े चम्मच बथुए का पेस्ट

– थोड़ा सा लहसुन और मिर्च का पेस्ट

– 1 बड़ा चम्मच मक्खन

–  नमक स्वादानुसार

– तलने के लिए तेल

बनाने की विधि

– मैदा, बथुए का पेस्ट, लहसुन-मिर्च का पेस्ट, नमक और मक्खन थोड़े से पानी में     एकसाथ मिलाएं.

– अब इसकी टाइट लोई (डो) बनाएं.

–  लोई की पतली-पतली स्ट्रिप्स काटें

–  फिर इसे गरम तेल में तलें और सर्व करें.

Imlie: आदित्य को बचाने के लिए जेल से भागी इमली, अब क्या करेगी मालिनी

स्टार प्लस का सीरियल ‘इमली’ (Imlie) की कहानी में दिलचस्प मोड़ दिखाया जा रहा है. जिससे फैंस को शो में फुल ड्रामा देखने को मिल रहा है. शो में आपने देखा कि आदित्य किडनैप हो जाता है. तो दूसरी तरफ जब इमली को पता चलता है तो उसके होश उड़ जाते हैं. आदित्य की किडनैपिंग की खबर सुनकर मालिनी भी घबरा जाती है.

दरअसल आर्यन के पास एक वीडियो आता है. इस वीडियो से पता चलता है कि आदित्य किडनैप हो गया है. आदित्य के साथ 2 और लोग भी आतंकवादियों के चंगुल में फंस चुके हैं. इसी बीच शो में बड़ा ट्विस्ट आएगा, जब  आतंकवादी आदित्य को बताएंगे कि उसके कान में एक बम लगा है.

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इस फुटेज को देखकर इमली अपना होश खो देगी. वह आर्यन पर बुरी तरह भड़क जाएगी. तो वहीं आर्यन, आदित्य को बचाने के लिए पुलिस की मदद लेगा.

 

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तो दूसरी तरफ मालिनी आदित्य को बचाने का फैसला करेगी. वह अपनी मां अनु को फोन करेगी और मदद मांगेगी. त्रिपाठी परिवार के लोग मालिनी का साथ नहीं देंगे. मालिनी परिवार के लोगों पर भड़क जाएगी. वह कहेगी कि आदित्य को बचाने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है.

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शो में ये भी दिखाया जाएगा कि इमली मौका पाते ही जेल से भाग जाएगी. आदित्य को बचाने के लिए वह पगडंडिया पहुंच जाएगी और ये बात जानकर मालिनी परेशान हो जाएगी. वह नहीं चाहती कि इमली किसी भी तरह आदित्य के सामने जाए. शो में अब ये देखना दिलचस्प होगा कि इमली कैसे आदित्य की जान बचाती है तो वहीं अब मालिनी क्या कदम उठाएगी.

 

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अनुपमा ने फोटोग्राफर्स से छुपाया चेहरा, देखें Video

अनुपमा फेम रूपाली गांगुली (Rupali Ganguly) अपनी किरदार और एक्टिंग से दर्शकों के दिल पर राज कर रही है. सोशल मीडिया पर एक्ट्रेस की फैन फॉलोविंग भी आए दिन बढ़ती जा रही है. दर्शकों को अनुपमा का फोटोज और वीडियो का बेसब्री से इंतजार रहता है. अब अनुपमा का एक ऐसा वीडियो सामने आया है जिसमें वह फोटोग्राफर से चेहरा छुपाती हुई नजर आ रही है. आइए बताते है क्या है पूरा मामला.

अनुपमा का एक वीडियो सामने आया है जिसमें वह मीडिया से अपना चेहरा छुपाती नजर आ रही हैं. फोटोग्राफर्स उन्हें फोटो क्लिक कराने के कह रहे हैं और वो कैमरे से दूर भागती दिखाई दे रही हैं. हाल ही में रूपाली गांगुली को मुंबई में एक सैलून के बाहर देखा गया था. फोटोग्राफर्स उनसे तस्वीरें क्लिक करवाने के लिए कहते हैं लेकिन वह मना कर देती हैं. वह कहती है, मेरे बालों में तेल लगा हुआ है.

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अनुपमा के इस वीडियो को फोटोग्राफर विरल भयानी ने इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेयर किया है जिसमें देखा जा सकता है कि रूपाली सैलून के बाहर फोटोग्राफर्स को देख चौंक जाती हैं और अपना चेहरा छिपाने लगती हैं. वह रिक्वेस्ट करती है कि उनकी फोटो क्लिक न करें.

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अनुपमा ने अपने बालों में तेल लगाया था इसलिए वह फोटो क्लिक करने से मना कर रही थी. एक्ट्रेस ने कहा कि आप मेरे फोटोज मत लो, मैंने तेल लगाया हुआ है. इस वीडियो पर यूजर्स लगातार कमेंट्स कर रहे हैं.

 

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कई यूजर्स ने कमेंट किया है कि ऑयल लगाना कोई गुनाह नहीं है ऐसा है तो तेल लगाते क्यों हैं तो वहीं दूसरे यूजर ने लिखा है कि इन लोगों को देख-देखकर हमारे युवा भी ऐसे भी रिएक्ट करते हैं. लेकिन अनुपमा के फैन्स ने सपोर्ट किया और लिखा कि रूपाली बहुत रियलिस्टिक हैं. तो वहीं दूसरे फैंस ने लिखा कि फिर भी वह बहुत खूबसूरत लग रही हैं.

कांशीराम की विरासत, बचा न पाईं मायावती!

बसपा के संस्थापक कांशीराम ने अपनी विरासत और दलित उद्धार की जो जिम्मेदारी मायावती को सौंपी थी, बहनजी न तो उस विरासत को बचा पाईं और न ही दलित समाज का कोई उद्धार कर पाईं. उत्तर प्रदेश में चुनाव सिर पर हैं मगर बहनजी और उन के हाथी का अतापता नहीं है.

उत्तर प्रदेश में फरवरी 2022 में विधानसभा चुनाव होने हैं. प्रदेश में तमाम राजनीतिक दलों ने जनता को अपने पाले में करने के लिए पूरी ताकत ?ांक दी है. भाजपा जहां प्रदेशभर में विजय संकल्प यात्रा और जन विकास यात्रा निकाल रही है, वहीं कांग्रेस का जन जागरण अभियान चल रहा है. समाजवादी पार्टी की भी विजय रथ यात्रा प्रदेश भर में जारी है.

यहां तक कि एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी तक हैदराबाद छोड़ उत्तर प्रदेश में डेरा जमाए हुए हैं और सौ सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की घोषणा कर चुके हैं. वहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी उत्तर प्रदेश में 30 सीटों पर आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों की घोषणा कर चुके हैं. मगर इन सब के बीच 4 बार प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकीं बसपा प्रमुख और दलित नेत्री मायावती की चुनावी तैयारी बहुत फीकीफीकी सी है.

चुनाव सिर पर हैं मगर बहनजी के पुराने तेवर कहीं दिख नहीं रहे हैं. न कोई दावा न वादा, न यात्रा, न संकल्प, न समारोह. नरेंद्र मोदी, योगी आदित्यनाथ, अखिलेश यादव, ओमप्रकाश राजभर, प्रियंका गांधी वाड्रा, राहुल गांधी, ओवैसी सब सड़कों पर हैं, बड़ीबड़ी रैलियां कर रहे हैं, भाषणबाजी में लगे हैं मगर बहनजी और उन के हाथी का कहीं अतापता नहीं है.

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हाथी की यह सुस्ती बेवजह नहीं है. दरअसल उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले सब से ज्यादा टूट का सामना बसपा कर रही है. रिकौर्ड उठा कर देखें तो पता चलता है कि पिछले 7 सालों में 150 से ज्यादा नेता बसपा का साथ या तो छोड़ चुके हैं, या निकाले जा चुके हैं. इन में कई वे चेहरे भी थे जो कभी पार्टी की पहचान हुआ करते थे. आज बसपा के पास विधानसभा में मात्र 5 विधायक बचे हैं, जिन में से एक मुख्तार अंसारी जेल में बंद हैं.

बसपा के संस्थापक कांशीराम ने अपनी विरासत और दलित समाज के उद्धार की जो जिम्मेदारी मायावती को सौंपी थी, बहनजी न तो उस विरासत को बचा पाईं और न दलित समाज का कोई उद्धार कर पाईं. वे, उन की पार्टी और उन की पार्टी के नेता बीते 3 दशकों में सिर्फ धनउगाही, भ्रष्टाचार और घोटालों में रमे रहे. बहनजी अपने कुछ खास करीबियों की मदद से अपना बटुआ भरती रहीं और अपनी शोहरत बुलंद रखने के लिए अपनी मूर्तियां गड़वाती रहीं. दलित समाज के लिए उन्होंने क्या किया, यह तो सूक्ष्मदर्शी यंत्र लगा कर ढूंढ़ने से भी मालूम नहीं चलेगा.

आज प्रदेश का दलित समाज नेतृत्वविहीन है. शहरी दलित भाजपा के भरमाने में फंस कर खुद को हिंदू और हिंदुत्व से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं तो वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में निचली जातियों में फिर वही डर पनपने लगा है कि भाजपा राज मजबूत हुआ तो वे सवर्णों के तलुवे चाटने वाले अछूत और तुच्छ तो कहलाएंगे ही, शोषण और प्रताड़ना का दंश भी ?ोलेंगे. यह डर उन पिछड़ों और दलितों को अब विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच बांट रहा है जो कभी मायावती की एक ललकार पर हाथी छाप ?ांडे के नीचे जमा हो जाते थे. आज उन्हें सम?ा में नहीं आ रहा है कि उन का नेता कौन है, उन्हें किस के पीछे चलना है, किस को वोट देना है, कौन उन का उद्धारक होगा.

बसपा संस्थापक कांशीराम ने जीवनपर्यंत दलितों को मजबूत बनाया, साथ ही साथ दूसरे राज्यों में भी वोट शेयर में इजाफा किया. दलित राजनीति के सक्रिय होने का श्रेय बिना किसी संदेह के उन्हीं को जाता है. कांशीराम का मानना था कि अपने हक के लिए दलितों को लड़ना होगा, उस के लिए गिड़गिड़ाने से बात नहीं बनेगी.

कांशीराम का दौर दलितों के राजनीतिक रूप से चेतनशील होने का दौर था. बहुत कम समय में उन की पार्टी बसपा ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी एक अलग पहचान स्थापित की. उत्तर भारत की राजनीति में गैरब्राह्मणवाद की शब्दावली बसपा ही प्रचलन में लाई थी.

1992 में राममंदिर आंदोलन के समय भाजपा जहां हिंदुत्व कार्ड खेल रही थी, कांशीराम की बहुजन समाज पार्टी बहुत खुरदुरे तरीके से दलितों को सम?ा रही थी कि उस की अपनी बिरादरी से भी कोई मुख्यमंत्री बन सकता है, ऐसा मुख्यमंत्री जो किसी बड़े पावर ग्रुप का नाममात्र चेहरा न हो बल्कि अपनी ताकत और तेवर दिखाने वाला दलित नेता हो.

वर्ष 1995 में कांशीराम इस में कामयाब हो गए जब उन की शिष्या मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी. मायावती को एक नेता के तौर पर कांशीराम ने ही ग्रूम किया था. वे मायावती के मार्गदर्शक थे. अपनी बीमारी व मौत से कई साल पहले ही उन्होंने मायावती को अपना राजनीतिक प्रतिनिधि चुन लिया था. मगर कांशीराम के तेवरों को सही से आगे न ले जाने के चलते मायावती जिस तेजी से उत्तर प्रदेश में उभरी थीं, उसी तेजी से वे उत्तर प्रदेश में सिर्फ एक जाति की नेता बन कर रह गईं.

कांशीराम का दलित आंदोलन देखते ही देखते मायावती की सोशल इंजीनियरिंग बन कर खत्म हो गया. कांशीराम जहां व्यक्तिगत रूप से बेहद सादा जीवन जीते थे, वहीं मायावती ने धनवैभव के प्रदर्शन को दलित शक्तिप्रदर्शन का प्रतीक बना दिया.

मंडल युग में कांशीराम के संघर्ष के चलते पिछड़ा और दलित वर्ग अपने अधिकारों को ले कर पहली बार सचेत हुआ था. संविधान रचयिता भीमराव अंबेडकर के बाद कांशीराम ही थे जिन्होंने भारतीय राजनीति और समाज में एक बड़ा परिवर्तन लाने वाले की भूमिका निभाई थी. बेशक अंबेडकर ने एक शानदार संविधान के जरिए इस परिवर्तन का ब्लूप्रिंट पेश किया, लेकिन वे कांशीराम ही थे जिन्होंने इसे राजनीति के धरातल पर उतारा. कांशीराम भले ही अंबेडकर की तरह महान चिंतक और बुद्धिजीवी न रहे हों, मगर उन्होंने जिस जमात की लड़ाई लड़ी वह संविधान में हक मिलने के बावजूद अशिक्षा, गरीबी, शोषण, प्रताड़ना, बेकारी और बंधुआ मजदूरी का शिकार थी. कांशीराम ने इस जमात के लिए सवर्णों द्वारा तय किए फर्मे तोड़े और उन में कुछ करने व कुछ पाने का आत्मविश्वास पैदा किया.

कांशीराम का जन्म पंजाब के एक दलित परिवार में हुआ था. उन्होंने बीएससी की पढ़ाई करने के बाद क्लास वन अधिकारी की सरकारी नौकरी की. आजादी के बाद से ही आरक्षण होने के कारण सरकारी सेवा में दलित कर्मचारियों की एक संस्था होती थी. कांशीराम ने पहली बार इस संस्था में दलितों से जुड़े सवाल और अंबेडकर जयंती के दिन अवकाश घोषित करने की मांग उठाई.

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बाद में उन्होंने सरकारी नौकरी त्याग कर देशभर में घूम कर दलितों को एकजुट किया. कांशीराम ने सब से पहले अपने घरवालों को 24 पन्ने का एक पत्र लिखा, जिस की मुख्य बातें थीं-

  1. अब कभी घर नहीं आऊंगा.
  2. कभी अपना घर नहीं खरीदूंगा.
  3. गरीबों दलितों का घर ही मेरा घर होगा.
  1. सभी रिश्तेदारों से मुक्त रहूंगा.
  2. किसी के शादी, जन्मदिन, अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होऊंगा.
  3. कोई नौकरी नहीं करूंगा.
  4. जब तक बाबासाहब अंबेडकर का सपना पूरा नहीं हो जाता, चैन से नहीं बैठूंगा.

कांशीराम ने ताउम्र अपनी इन प्रतिज्ञाओं का पालन किया. यहां तक कि वे अपने पिता के अंतिम संस्कार तक में शामिल नहीं हुए.

वर्ष 1981 में कांशीराम ने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति या डीएस 4 की स्थापना की. वर्ष 1982 में उन्होंने ‘द चमचा ऐज’ लिखा जिस में उन्होंने उन दलित नेताओं की आलोचना की जो कांग्रेस जैसी परंपरागत मुख्यधारा की पार्टी के लिए काम करते थे. वर्ष 1983 में डीएस 4 ने एक साइकिल रैली का आयोजन कर अपनी ताकत दिखाई. उक्त रैली में करीब 3 लाख लोगों ने हिस्सा लिया. उन्होंने मौजूदा पार्टियों में दलितों की जगह की पड़ताल की और अपनी अलग पार्टी बनाने की जरूरत महसूस की.

वर्ष 1984 में बसपा का गठन हुआ और तब तक कांशीराम पूरी तरह से एक पूर्णकालिक राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता बन चुके थे. उन्होंने तब कहा था कि अंबेडकर किताबें इकट्ठा करते थे लेकिन मैं लोगों को इकट्ठा करता हूं. कांशीराम एक चिंतक भी थे और जमीनी कार्यकर्ता भी. राजनीति में आने के बाद उन्होंने महसूस किया कि कलफ का कुरता पहन कर गांधीवादी बातें कर के अपनी बिरादरी का भला होने से रहा. लिहाजा वे सैकंडहैंड कपड़ों के बाजार से अपने लिए पैंटकमीज खरीदने लगे. कभी नेताओं वाली यूनिफौर्म नहीं पहनी. हां, बाद के दिनों में सफारी सूट पहनने लगे थे.

कांशीराम ने कहा- पहला चुनाव हारने के लिए, दूसरा चुनाव हरवाने के लिए और फिर तीसरे चुनाव से जीत मिलनी शुरू हो जाती है और यही हुआ. पहले चुनाव में इंदिरा लहर के दौरान बसपा का खाता नहीं खुला, मगर हिम्मत खुल गई. दलितों की अपनी पार्टी उत्तर भारत में जड़ें जमाती, मनुवाद और ब्राह्मणवाद को खुलेआम गरियाती, गांधी को और कांग्रेस को सिरे से खारिज करती एक बड़ी ताकत के रूप में उभरी.

कांशीराम ने ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई, ?ालकारी बाई और ऊदा देवी जैसे प्रतीकों को दलित चेतना का प्रतीक बनाया. उन्हें वह मान दिलाया कि किसी भी डिसकोर्स में प्रमुखता से याद किया जाए. हालांकि, इसे कांशीराम की गलती कहें या दुर्भाग्य कि उन की चुनी हुई वारिस मायावती ने इन प्रतीकों को मूर्ति बना कर अपनी सियासत चमकाने का फार्मूला मान लिया. कांशीराम ने अपने लोगों को जगाने के लिए सधे हुए शब्द नहीं तलाशे बल्कि खूंखार और खुरदुरे ढंग से अपनी बातें कहीं. उसी दौर में नारे आए थे- ‘ठाकुर ब्राह्मण बनिया चोर, बाकी सब हैं डीएस 4’ या फिर ‘तिलक तराजू और तलवार, इन को मारो जूते चार’. मायावती ने अब आधिकारिक तौर पर इन नारों को बसपा से अलग कर दिया है. सत्ता के लिए बसपा का मूवमैंट सत्ता में आने के 10 सालों के अंदर ही ‘ब्राह्मण शंख बजाएगा’ और ‘हाथी नहीं गणेश है’ जैसे नारों की भेंट चढ़ गया.

कांशीराम के समय में जो बसपा उत्तर प्रदेश पंजाब, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान जैसे समूची हिंदी पट्टी में तेजी से फैली, उस पार्टी की गति कांशीराम की मृत्यु के उपरांत 2 दशकों के अंदर ही सिमटती चली गई. कांशीराम की शिष्या ने कोर वोट के आगे बढ़ने के लिए बहुजन को सर्वजन में बदल दिया. उन की पार्टी में ब्राह्मण, ठाकुर, मुसलमान पहली पंक्ति में जमा हो गए.

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मायावती को जिस ठाटबाट से रहने की आदत लगी और जिस तेजी से वे भ्रष्टाचार में लिप्त हुईं, उस ने पूरी पार्टी और कांशीराम की सारी मेहनत मिट्टी कर दी. आज वे सारे नेता जो अग्रिम पंक्ति में खड़े हो कर मायावती की सोशल इंजीनियरिंग की कमान संभाल रहे थे उन की तिजोरी भरने के साथ अपने खजाने बढ़ा रहे थे, वे सब उन्हें अकेला छोड़ कर अन्य दलों में समाहित हो चुके हैं.

आज अगर मायावती के गुरु कांशीराम जीवित होते तो शायद उन को यही सम?ा रहे होते कि जन आंदोलन – सामाजिक आंदोलन त्याग और जिद से चलते हैं, इंजीनियरिंग के फार्मूलों से नहीं. जिस तरह देशभर के किसानों को एकजुट कर मोदी सरकार को ?ाका लेने की जिद और ढीठपना किसान नेता राकेश टिकैत ने दिखाया है, दलितों को भी अब ऐसे किसी ढीठ दलित नेता का इंतजार है.

हरित क्रान्ति बनाम गुलाबी क्रांति

Writer- अखिलेश आर्येंदु

यदि हम आजादी के बाद कृषि इतिहास की ओर नजर घुमाएं तो इस हकीकत को मानना पड़ेगा कि नेहरू युग के अंतिम साल में खाद्यान्न को ले कर देश में संकट इसलिए बढ़ा, क्योंकि केंद्र की पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि पर कोई खास ध्यान नहीं दिया गया था. इस वजह से राज्यों में दंगे शुरू हो गए थे. अमेरिकी नीति ‘फूड ऐंड पीस’ के हिस्से के तौर पर उस समय भारत में पीएल 480 अनाज का सहारा लिया गया था.

देश को खाद्यान्न संकट से उबारने के लिए जवाहरलाल नेहरू के बाद प्रधानमंत्री के तौर पर लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दे कर किसानों के साथ जवानों को भी हरित क्रांति के लिए तैयार किया.

60 के दशक का यह दौर उत्पादकता को बढ़ाने के मद्देनजर गेहूं  (बाद में धान पर भी) उत्पादन पर खास जोर दिया गया और 80 के दशक तक भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर ही नहीं हो गया, बल्कि निर्यात भी करने लगा.

इन में वैज्ञानिक डा. एमएस स्वामीनाथन के प्रयासों का भी हाथ था. इसे देश की पहली हरित क्रांति के रूप में जाना जाता है. यह (हरित क्रांति) 60 के दशक से ले कर 80 के दशक के मध्य तक पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ले कर भारत के दक्षिणी राज्यों तक फैल गई. लेकिन वक्त के साथ हरित क्रांति के व्यावसायीकरण करने की बात भी सामने आई. कृषि से जुड़े परंपरागत मूल्य एवं संस्कृति विलुप्त हुए. धरती से जल दोहन और रासायनिक जहरीले उर्वरकों के बेतहाशा इस्तेमाल की वजह से धरती और खाद्यान्न दोनों जहरीले हुए.

यदि उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण पर आधारित आर्थिक नीतियों के कारण भारत की पिछले 30 सालों में आर्थिक विकास की गति तेजी से बढ़ी है, तो साथ में इस हकीकत को भी स्वीकार किया जाना चाहिए कि तथाकथित आर्थिक विकास का फायदा भारत के उस अभिजात्य वर्ग को मिला, जो पहले से ही बेहतर जिंदगी जी रहा था.

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गौरतलब है जो आर्थिक विकास उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों को लागू करने के बाद हुआ, उस में ऐसी भी नीतियां हैं, जो कई तरह के सवाल खड़ा करती हैं. उन में कुछ ऐसे सवाल भी हैं, जो सीधे आम

आदमी, पर्यावरण, पशुधन के खात्मे से ताल्लुक रखते हैं.

कृषि से ताल्लुक रखने वाली श्वेत क्रांति और हरित क्रांति को ले कर भी सवाल खड़े किए जाते रहे हैं. इस के पीछे केंद्र और राज्य सरकारों की गलत नीतियां रही हैं.

भापजा की सरकार ने साल 2014 में सत्ता संभालते ही नई हरित क्रांति की बात कही, वहीं पर मांस निर्यात को बढ़ावा देने के लिए एक बड़ी रकम बूचड़खानों को भी दी. यह भाजपा की उस नीति से मेल नहीं खाती, जो भारतीय परंपरा और संस्कृति को बढ़ावा देने वाली है.

यदि आंकड़ों पर जाएं तो साल 2014 में जब राजग सरकार सत्ता में आई उस ने मांस निर्यात और बूचड़खानों के लिए अपने पहले ही बजट में 15 करोड़ की सब्सिडी दी और टैक्स में छूट का विधिवत प्रावधान किया. इस से सम?ा जा सकता है कि भाजपा की नीतियां मांस निर्यात के मामले में जैसी कांग्रेस की थीं, वैसी ही हैं.

आंकड़ों की तह में जाएं, तो पता चलता है कि साल 2003-04 में भारत से 3.4 लाख टन गायभैंस के मांस का निर्यात हुआ, जो साल 2012-13 में बढ़ कर 18.9 लाख टन हो गया. यह बढ़ोतरी साल 2014-15 में 24 लाख टन पहुंच गई यानी 14 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. वहीं साल 2019-20 में 1,030.41 मीट्रिक टन मांस का निर्यात किया गया, जिस की कीमत तकरीबन 16.32 करोड़ रुपए थी.

आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में जितना मांस का निर्यात होता है, उस में भारत अकेले ही तकरीबन 58.7 फीसदी निर्यात करता है. गौरतलब है की भारत 65 देशों को मांस का निर्यात करता है. इन में सऊदी अरब, कुवैत, मिस्र, मलयेशिया, फिलीपींस, म्यांमार, नेपाल, लाइबेरिया और वियतनाम प्रमुख हैं. विदेशों में बढ़ते मांस निर्यात की वजह से भारत में जो मांस कभी 30 रुपए प्रति किलोग्राम बिकता था, वह आज 300 रुपए प्रति किलोग्राम बिक रहा है.

मांस निर्यात से सब से ज्यादा असर दूध उत्पादन से ताल्लुक रखने वाली श्वेत क्रांति पर पड़ा है. जब 13 जनवरी, 1970 को श्वेत क्रांति की शुरुआत हुई, तब इसे आम आदमी के रोजगार, आर्थिक स्थिति में सुधार और बेहतर स्वास्थ्य से जोड़ कर देखा गया.

पिछले 40 सालों में जिस तरह से मांस निर्यात के जरीए विदेशी पैसा कमाने की होड़ लगी हुई है, उस ने श्वेत और हरित क्रांति को रोकने या खत्म करने का काम किया है.

गौरतलब है विदेशों में बढ़ते मांस के निर्यात का सीधा असर दूध उत्पादन और घटते पशुधन पर पड़ रहा है.

गौरतलब है कि पशुधन भारतीय कृषि का आधार रहा है. गैरकानूनी बूचड़खानों की वजह से पशुधन पर सीधे असर पड़ा है जिस से पशुपालन बहुत ही खर्चीला काम हो गया है.

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घटते दुधारू जानवरों की वजह से पिछले 20 सालों में दूध का दाम तेजी से बढ़ा है. आम आदमी जो कोई दुधारू जानवर नहीं पाल सकता, वह महंगे दूध खरीदने की हालत में नहीं होता है.

गौर करने वाली बात यह है कि बिना किसी सरकारी मदद के देश में दूध का 70 फीसदी कारोबार असंगठित ढांचा संभाल रहा है. देश में दूध उत्पादन में 96 हजार सहकारी संस्थाएं जुड़ी हुई हैं. 14 राज्यों में अपनी दुग्ध सहकारी संस्थाएं हैं. लेकिन मांस निर्यात की वजह से पशुधन के खात्मे का असर घटते दूध उत्पादन पर साफ दिखाई पड़ रहा है. इस असंगठित क्षेत्र (दूध उत्पादन) में 7 करोड़ से ज्यादा लोग जुड़े हुए हैं, जिस में अशिक्षित कारोबारी ज्यादा हैं.

यदि मांस निर्यात पर सरकारी रोक न लगी या गैरकानूनी बूचड़खानों के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो संभव है कि कुछ सालों में ही इस असंगठित क्षेत्र से जुड़े लोगों को किसी और क्षेत्र में कारोबार के लिए मजबूर हो कर आना पड़े.

मांस निर्यात के आईसीएआर के आंकड़े बताते हैं कि हर साल तकरीबन 9.12 लाख जो भैंसें बूचड़खानों में कत्ल कर दी जाती हैं, यदि वे भैंसें कत्लखाने में जाने से बच जाएं, तो 2,95,50,000 टन गोबर की खाद बनाई जा सकती है. इस से 39.40 हेक्टेयर कृषि भूमि को खाद मुहैया कराई जा सकती है. इस से जहां जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा, वहीं महंगी रासायनिक खादों से भी छुटकारा मिल जाएगा.

दूसरी तरफ  यदि देखा जाए तो इनसान और जानवर एकदूसरे के पूरक हैं. इनसान यदि एक जानवर को पालता है, तो वह जानवर उस के पूरे परिवार को पालता है. इतना ही नहीं, बंदर, रीछ, घोड़े, बैल, सांड़, भैंसा और गाय इनसान की जिंदगी के अहम हिस्से हैं.

आज भी लाखों लोगों की आजीविका इन जानवरों पर आधारित है. राजस्थान में एक कहावत है, कहने को तो भेड़ें पालते हैं, दरअसल भेड़ें ही इन को पालती हैं. इन के दूध, घी और ऊन आदि से हजारों परिवारों की जीविका चलती है. भेड़ों के दूध को वैज्ञानिकों ने फेफड़े के रोगियों के लिए बहुत ही फायदेमंद बताया है.

‘बांबे ह्यूमैनेटेरियन लीग’ के अनुसार, जानवरों से हर साल दूध, खाद, ऊर्जा और भार ढोने वाली सेवा द्वारा देश को अधिक आय होती है. इस के अलावा मरने के बाद इन की हड्डियों और चमड़े से जो आय होती है, वह भी करोड़ों रुपए में. यांत्रिक कत्लखानों को बंद कर दिया जाए, तो लाखों जानवरों का वध ही नहीं रुकेगा, बल्कि उस में इस्तेमाल होने वाला 70 करोड़ लिटर से अधिक पानी की बचत होगी, जो कत्लखानों की धुलाई में इस्तेमाल होता है.

ऐसे एकदो नहीं, बल्कि तमाम उदाहरण हैं, जिन से मांस निर्यात से होने वाले नुकसान का पता चलता है. आज जरूरत इस बात की है कि दुधारू जानवरों और भार ढोने वाले जानवरों को उन की उपयोगिता के मुताबिक उन का उपयोग किया जाए और उन्हें कत्लखाने भेजने की अपेक्षा उन को परंपरागत कामों में इस्तेमाल किया जाए. इस से जहां दुधारू जानवरों की संख्या बढ़ेगी, वहीं दूध और कंपोस्ट खाद की समस्या से भारत को नजात मिलेगी.

यदि महज भेड़ों को ही बूचड़खानों में भेजने की जगह उन का परंपरागत इस्तेमाल (जब तक वे जीवित रहें) किया जाए, तो 600 करोड़़ रुपए का दूध मिलेगा, 450 करोड़ रुपए की खाद, 50 करोड़ रुपए की ऊन प्राप्त होगी. इसी तरह गाय के वध को रोक देने से सालभर में जो लाभ होगा, वह हैरानी में डालने वाला है.

आंकड़ों के अनुसार, एक गाय के गोबर से सालभर में तकरीबन 17,000 रुपयों की खाद प्राप्त होगी. रोजाना यांत्रिक कत्लखानों में 60,000 गाय कटती हैं जिन के गोबर मात्र से प्रतिवर्ष लगभग एक अरब रुपए की आमदनी हो सकती है. दूध, घी, मक्खन और मूत्र से होने वाले फायदे को जोड़ दिया जाए, तो अरबों रुपए की आय केवल गाय के वध को रोक देने से देश को हो सकती है.

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ये आंकड़े और तथ्य यह बताते हैं कि देश की खुशहाली आम आदमी की बेहतरी के साथसाथ पर्यावरण की रक्षा के लिए गुलाबी क्रांति की नहीं, बल्कि निरापद श्वेत और हरित क्रांति की जरूरत है. इस से परंपरागत व्यवसायों को बढ़ावा मिलेगा और मांस निर्यात जैसे अहिंसा प्रधान देश में हिंसा वाले व्यवसाय से छुटकारा भी मिल सकेगा.

Yeh Rishta Kya Kehlata Hai: अभिमन्यु करेगा आरोही को एक्सपोज, आएगा ये ट्विस्ट 

स्टार प्लस का सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ (Yeh Rishta Kya Kehlata Hai) में इन दिनों लव ट्रैक दिखाया जा रहा है. शो के प्रोमो के अनुसार, आरोही और अभिमन्यु (Abhimanyu) भागकर शादी करने वाले है. तो वहीं शो के अपकमिंग एपिसोड में एक और बड़ा ट्विस्ट आने वाला है. आइए बताते हैं शो के नए एपिसोड के बारे में.

शो में दिखाया जा रहा है कि दोनों बहनें अक्षरा और अरोही एक ही लड़के अभिमन्यु से प्यार करती हैं. अभिमन्यु की शादी आरोही से होने वाली है. लेकिन अभिमन्यु, अक्षरा से प्यार करता है. शो के नए प्रोमो के अनुसार, अक्षरा और अभिमन्यु भागकर शादी करने वाले हैं.

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शो में आप ये भी देखेंगे कि शादी के दौरान आरोही को अभिमन्यु एक्सपोज करेगा. आरोही के आग वाले एक्सीडेंट का झूठ अभिमन्यु के सामने आएगा और वह शादी के दिन सबके सामने उसका सच बता देगा.

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दरअसल अभिमन्यु को आग वाले एक्सीडेंट की सच्चाई का पता चलेगा कि उसकी जान अक्षरा ने बचाई थी. उसे आरोही के झूठ से नफरत हो जाएगी. वह पूरे परिवार के सामने आरोही के झूठ का पर्दाफाश करेगा.

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Anupamaa में आएगा लीप, काव्या बनेगी मां तो समर करेगा दूसरी लड़की से शादी?

टीवी सीरियल अनुपमा की कहानी में लगातार ट्विस्ट एंड टर्न देखने को मिल रहा है. शो में अब तक आपने देखा कि काव्या कुछ दिन से शाह हाउस से गायब हो गई है लेकिन रिपोर्ट के अनुसार शो के आने वाले एपिसोड में काव्या धमाकेदार ट्विस्ट के साथ लौटेगी. जी हां, अब काव्या, वनराज को एक अच्छा सबक सिखाने वाली है. आइए बताते हैं शो के नए ट्रैक के बारे में.

शो में आप देखेंगे कि नंदिनी काव्या को लेकर वनराज से खूब बहस करेगी. वनराज भी नंदिनी पर चिल्लाएगा.  तो दूसरी तरफ वनराज की नजदीकियां मालविका से बढ़ रही हैं. वनराज, मालविका के साथ बिजनेस के लिए माइंड गेम खेल रहा है.

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तो दूसरी तरफ अनुपमा अपने बेटे समर की हालत देखकर टूट गई है. लेकिन वह समर को संभालती नजर आ रही है. अनुपमा नंदिनी के लिए भी चिंतित है. शो में आप देखेंगे कि समर अपने जीवन में आगे बढ़ने का फैसला करेगा. रिपोर्ट के अनुसार शो के अपकमिंग ट्रैक में समर को एक अमीर लड़की से शादी करेगा.

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बताया जा रहा है कि अनुपमा में जल्द ही लीप दिखाया जाएगा. शो के आने वाले एपिसोड में आप देखेंगे कि काव्या कहेगी कि वह वनराज के बच्चे की मां बनने वाली है तो वहीं पाखी अपने बॉयफ्रेंड संग भागने की तैयारी करेगी.

 

शो के पिछले एपिसोड़ में आपने देखा कि  पाखी अनुपमा से कहती है कि वह आगे की पढ़ाई के लिए यूएसए जाना चाहती है और वह चाहती है कि अनुपमा इस बारे में वनराज और बाबूजी से बात करे. लेकिन अनुपमा पाखी को समझाती है, वह कहती है कि वह विदेश जाने और पढ़ने के लिए बहुत छोटी है. वह कहती है कि जब वह आगे की पढ़ाई के लिए जाना चाहेगी, तो वे उसे यूएसए भेज देंगे.

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कांग्रेस का नारा: लडक़ी हूं, लड़ सकती हूं…

उत्तर प्रदेश के चुनाव अब सही पटरी पर आते देख रहे हैं जो पिछले और दलित नेता पिछले 7 सालों में पाखंड और छूआछूत की वैदिक ताकतों में भरोसा करने वाले सपा की राजनीतिक ब्रांच भारतीय जनता पार्टी में थोक में अपने सताए हुए गरीब, बेचारे, फटेहाल, आधे भूखों को पाखंड के खेल में झोंक रहे थे, वे अब समाजवादी पार्टी में लौट रहे हैं.

यह कहना गलत होगा कि यह पलायन आदित्यनाथ बिष्ठ उर्फ योगी की काम करने की पौलिसी के खिलाफ है. यह फेरबदल इस अहसास का नतीजा है कि भारतीय जनता पार्टी तो सिर्फ और सिर्फ मंदिर और पाखंडों के इर्दगिर्द घूमने वाली है जो दानदक्षिणा, पूजापाठ, स्नानों, तीर्थयात्राओं में भरोसा करती है, आप मजदूर, किसान, कारीगर छोटे दुकानदारों के लिए नहीं.

ऊपर से कांग्रेस को नारा कि लडक़ी हूं, लड़ सकती हूं, काफी जोर का है क्योंकि पाखंड के ठेकेदारों के हिसाब से लडक़ी सिर्फ भोग की चीज है जिसे पिता, पति या बेटे के ईशारों पर चलाना चाहिए और जिस का काम बच्चे पैदा करना, पालना, घर चलाना, पंडों की तनधन से सेवा करना और फिर भी यातना सहना है. लड़ सकती हूं का नारा कांग्रेस को सीटें चाहे न दिलाए वह भारतीय जनता पार्टी के अंधभक्तों की औरतों को सिर उठाने की ताकत दे सकता है. भारतीय जनता पार्टी अब बलात्कार का राजनीतिक फायदा नहीं उठा सकती.

राम मंदिर और का…… कौरीडोर पिछड़ों को सम्मान न दिए जाने और औरतों को पैर की जूती के समझने की आदत में बेमतलब के हो गए हैं. उत्तर प्रदेश जो देश की राजनीति जान है. अगर वहीं हाथ से फिसल गया तो 100 साल से पौराणिक राज के सपने देख रहे लोगों को बड़ा धक्का लगेगा.

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वैसे चंद नेताओं के इधर से उधर हो जाने पर कुछ ज्यादा नहीं होता. पश्चिमी बंगाल चुनावों में अमित शाह ने शोक में तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को भारतीय जनता पार्टी में शामिल करा लिया था और नरेंद्र मोदी खुले मंचों पर ‘दीदी ओ दीदी…’ ‘‘2 मई दीदी गई’’  का नारा लगाते रहे पर चुनाव परिणाम कुछ और थे. उत्तर प्रदेश में नेता अपने मतलबों से भाजपा से नहीं छिटक रहे हैं. उन्हें जमीनी हकीकत  का अहसास है. उत्तर प्रदेश हो या देश का कोर्ई भी हिस्सा देश का विकास सिर्फ मंदिरों तक है. और इन मंदिरों में भी जातिगत भेदभाव है. जहां पिछड़ों को उन के अपने छोटे देवता या गणेश और हनुमान…. गए हैं, दलितों को कौरव जैसे एक विष्णु, राम और महाभारत वाले कृष्ण ऊंची जातियों के लिए रिजर्व कर दिए गए हैं. ये मंदिर ही हैं जो आएगा की जमाअत को मजबूत करते हैं, उसे आरक्षण की जिसे खत्म करने के लिए सरकारें जीजान से लगी है. उन्होंने सरकार में सारा काम ठेके पर कराना शुरू दिया है और सरकारी कारखाने निजी कंपनियों को बेच डाले जहां आरक्षण का कानून नहीं चलता.

भारतीय जनता पार्टी छोडऩे वाले नेताओं ने अपनी जान और राजनीतिक दल पर बड़ा दांव खेला हे. वे जानते है कि उन के खिलाफ जांचें शुरू हो सकती हैं और उन्हें लालू यादव की तरह जेल में ठूंसा जा सकता है. पर जैसे लालू यादव ने अपनी जनता के हित के लिए समझौता नहीं किया, उम्मीद करें कि जो आज पाखंड की राजनीति छोड़ रहे हैं, जिस भी पार्टी में जाएं, कुछ बनाने की राजनीति करेंं. देश को तरक्की की सह पर तो जाने मैं बड़ी मेहनत करनी है. सबको बराबरी का स्तर देना आस्था नहीं है. एक पीढ़ी में तो कुछ न होगा क्योंकि 800 साल तक का बौद्ध धर्म का, जो पौराणिक धर्म से ज्यादा खुला था, आज नामोनिशान नहीं है.

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ऑनलाइन कारोबार खा गया लाखों को

औनलाइन रिटेल सैक्टर से देश में कुछ अमीर पूंजीपतियों की मोनोपोली हो रही है. इन्हें डिलीवरी करने वाले युवाओं की फौज की भारी जरूरत महसूस होगी, जिन का काम सिर्फ सामान पहुंचाने का होगा. छोटे धंधों को चलाने वालों की अगली पीढ़ी बस यही काम करेगी

विशाल गोयल दिल्ली के बलजीत नगर इलाके में बड़े रिटेलर के तौर पर जाने जाते हैं. उन के पिताजी पी सी गोयल ने साल 1984 में छोटी सी किराना दुकान ‘भारत स्टोर’ (विशाल गोयल के बड़े भाई के नाम पर) नाम से शुरू कर इस धंधे में कदम रखा था. काफी पुरानी दुकान होने और इलाके में अच्छी पैठ होने के बाद धीरेधीरे छोटे दुकानदार उन से माल खरीदने लगे, इसलिए इन्हें यहां छोटे थोक विक्रेता के रूप में भी जाना जाने लगा. इसी दुकान से पूरे गोयल परिवार ने सफलता की इबारत लिखी.

एक समय छोटे से मकान में रहने वाला गोयल परिवार आज इसी इलाके में 3 मकान और एक बड़े गोदाम जितनी अचल संपत्ति इकट्ठा कर चुका है. महीने में लाखों का ट्रांजैक्शन होता है. विशाल गोयल अपने भाई के साथ इस पेशे में पिछले 15 सालों से हैं पर आज इतने सालों में यह पहला ऐसा मौका आया है जब उन्हें अपने व्यापार में रुकावटों का सामना करना पड़ रहा है. इस का बड़ा कारण वे देश में बढ़ रहे औनलाइन कारोबार को मानते हैं.

दरअसल, बीते 2 सालों में लोगों ने बहुतकुछ देखा व सहा है. महामारी के दौर से जू?ाते हुए लाइफस्टाइल में काफी बदलाव हुए. समय की मांग और जरूरतों ने लोगों को नए जीवन में प्रवेश करने पर मजबूर किया. इसी बदलाव में औनलाइन कारोबार बड़े पैमाने में दबेपांव सरपट घरघर पहुंचा और अपनी स्वीकार्यता को दर्शाया भी. पहले इस ने गारमैंट्स, इलैक्ट्रोनिक्स सामानों की औनलाइन बिक्री से शुरुआत की, अब रिटेल और ग्रौसरी आइटम में सेंधमारी से पूरे मार्केट के हावभाव ही बिगाड़ कर रख दिए हैं, जिस के लपेटे में फिलहाल रिटेल सैक्टर है.

स्टेटिस्टा 2021 के आंकड़ों के अनुसार भारत में इस समय लगभग 1 करोड़ 28 लाख रिटेल की दुकानें हैं. आंकड़ों के अनुसार देश की जीडीपी का 10 प्रतिशत हिस्सा रिटेल सैक्टर से आता है वहीं भारत में यह सैक्टर 8 प्रतिशत लोगों को रोजगार प्रदान करता है. इन में से एक विशाल गोयल भी इस समय रिटेल सैक्टर में हो रही उथलपुथल से जू?ा रहे हैं. वे कहते हैं, ‘‘औनलाइन शौपिंग आज हर दुकान हर घर में पहुंच रही है. दुकानदार सस्ते सामान लेने के लिए औनलाइन शौपिंग एप्लीकेशन का इस्तेमाल कर रहे हैं. हम रिटेलरों को पता है कि यह हमारे लिए गहरी खाई है फिर भी हम तक इस में गोता लगा रहे हैं, क्योंकि जिन डिस्ट्रिब्यूटरों या बड़े होलसेलरों से हम सामान उठाते हैं कभीकभार उन से सस्ता हमें यहां एप्लीकेशन पड़ रहा है. ग्राहक अब घट गए हैं, आप मान के चलिए इस समय हमारी 30 परसैंट सेल कम हो गई है.’’

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गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट के मुताबिक, कोविड-19 महामारी ने कंज्यूमर पैकेज्ड गुड्स जैसी कैटेगरीज में ईकौमर्स की पैठ को ग्लोबली दोगुना कर दिया है. जो ग्रोथ सामान्य हालात में

3 साल में दर्ज होती, वह महज 3 महीने में दर्ज कर ली गई. रिपोर्ट में कहा गया कि भारत का ईकौमर्स बिजनैस 2024 तक 99 अरब डौलर का हो जाएगा. यह 27 फीसदी सीएजीआर से ग्रोथ दर्ज करेगा. इस में ग्रौसरी और फैशन इस ग्रोथ के प्रमुख कारक हो सकते हैं. अकेले रिटेल की औनलाइन पैठ 2024 तक 10.7 फीसदी हो जाने का अनुमान है, जो 2019 में 4.7 फीसदी थी.

दिल्ली के प्रेम नगर इलाके में किराना स्टोर चलाने वाले 35 वर्षीय प्रदीप कुमार के हाल भी कुछ ऐसे ही चल रहे हैं. प्रदीप ने 6 वर्ष पहले 5 लाख रुपए लगा कर अपनी किराना दुकान डाली थी कि इस काम से बरकत होगी. लेकिन अब फायदा नहीं मिल रहा है. शुरुआत में दुकान चलने भी लगी थी लेकिन अब समय काटनेभर का बहाना हो गया है. दुकान में लौकडाउन से पहले 3 हैल्पर रखे थे, अब एक ही बचा है. अधिकतर काम वे खुद संभालते हैं. वे बताते हैं कि उन का इस काम में आधा ही धंधा रह गया है. काम दिनोंदिन घट रहा है. वे खुद टेनसेंट कंपनी फंडेड ‘उड़ान’ एप्लीकेशन इस समय सामान खरीदने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.

दरअसल ग्रौसरी की औनलाइन बिक्री में अब बड़े जायंट बिसनैसमैनों ने कदम रखा है. गोल्डमैन सैक्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि बिगबास्केट और ग्रौफर्स की औनलाइन ग्रौसरी मार्केट में 2019 में हिस्सेदारी 80 फीसदी से अधिक थी. औनलाइन ग्रौसरी बाजार पिछले कुछ सालों से सालदरसाल 50 फीसदी की दर से बढ़ रहा है. लेकिन अनुमानतया आने वाले समय में आरआईएल की एंट्री से औनलाइन ग्रौसरी मार्केट की ग्रोथ बढ़ कर 81 फीसदी हो जाएगी. वहीं रिलायंस की फेसबुक के साथ पार्टनरशिप से रिलायंस 2024 तक 50 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी के साथ औनलाइन ग्रौसरी में मार्केट लीडर बन जाएगा.

इस बात को बताते हुए वे इस बात का अंदेशा भी जताते हैं कि आज जो लुभा रहा है कल वह उसे भी अपने जाल में फंसा देगा. वे कहते हैं, ‘‘आप एक बात सम?िए, आज औनलाइन में भले ही अच्छे डिस्काउंट पर सामान मिल रहा है पर हमारे पास हाल के उदाहरण सामने हैं. ये पहले आदत डलवाते हैं, पारंपरिक बाजार को बरबाद कर के तोड़फोड़ करते हैं, फिर अपने रंग में आते हैं. आप जोमैटो-स्विगी को ले लीजिए, आप ओला-उबर को ले लीजिए, आप जिओ सिम का उदाहरण ही ले लीजिए, इन के दाम शुरू में सस्ते थे, भारी डिस्काउंट देते थे, ओलाओबेर तो शुरुआती राइड फ्री तक दे रहे थे पर जैसे ही इन्होंने बाजार पर कब्जा जमा लिया, लोगों के स्वरोजगार को खत्म कर दिया. फिर रेट बढ़ाने शुरू कर दिए.

‘‘इन का तरीका है, अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए पहले पुराने व्यापार की रीढ़ तोड़ो, फिर लोगों से पैसा खींचना शुरू करो. औनलाइन शौपिंग में भी यही होगा. आज ये फ्री शिपिंग की बात कर रहे हैं, अच्छी सर्विस और सुविधा की बात कर रहे हैं लेकिन कल को सर्विस चार्ज के नाम पर पैसा वसूलने लगेंगे. आज ये सस्ते सामान की बात कर रहे हैं लेकिन कल को इन के कंपीटिशन में जब कोई नहीं होगा तो पैसा भी ऐंठने लगेंगे.’’

दरअसल औनलाइन कारोबार के बढ़ने का बड़ा कारण सुविधा, सर्विस और फिलहाल डिस्काउंट व आकर्षक औफर्स हैं. प्रदीप उदाहरण के तौर पर बताते हैं कि 70 ग्राम मैगी का एक पैकेट ग्राहकों को जो 12 रुपए का मिलता है, वह उन्हें पहले डिस्ट्रिब्यूटर से 11 रुपए में पड़ता था. इस में डिस्ट्रिब्यूटर का मार्जिन शामिल होता था. अब वह कभीकभी सीधे औनलाइन ऐप से 9 रुपए 95 पैसे में मिल जाता है.

औनलाइन कारोबार से पहला सीधा असर डिस्ट्रिब्यूटरों और सेल्समैन पर पड़ा है. डिस्ट्रिब्यूटर रिटेल चैन के मध्य आते हैं. यह प्रोडक्ट निर्माता कंपनी और होलसेलर या सीधे रिटेलर को आपस में जोड़ता है. इस समय इन्हीं डिस्ट्रिब्यूटरों पर फर्क पड़ रहा है. औनलाइन बाजार के बढ़ने के साथसाथ इन बीच वाली कड़ी की जरूरत गौण होती जा रही है. होलसेलर भी मौका देखते औनलाइन ऐप की मदद से बल्क में सामान खरीद रहा है. इस कारण डिस्ट्रिब्यूटरों, सेल्समैन या एजेंटों की जरूरत धूमिल होती जा रही है.

वर्करों पर असर आंकड़े के मुताबिक पूरे भारत में इस समय तकरीबन साढे़ 4 लाख डिस्ट्रिब्यूटर्स हैं जो सामान दुकानों, थोक विक्रेताओं या होलसेलर तक पहुंचाते है. इन के नीचे कामगारों की एक पूरी फौज तैयार है जो लोकल इलाकों में सामान पहुंचाती हैं. डिस्ट्रिब्यूटर प्रोडक्ट का लगभग 3-5 प्रतिशत मार्जिन अपने पास रखते हैं. औनलाइन कारोबार के बढ़ने से इन में काम करने वाले वर्कर्स पर भारी असर पड़ा है. जियो मार्ट, उड़ान, ग्रौफर्स, बिगबासकेट, स्विगी सुपर इत्यादि कई एप्लीकेशंस अब सीधा कंपनी टू कंपनी डील कर रही हैं.

ऐसे ही हाथ में डायमंड चिप्स की लंबीलंबी लडि़यां लिए पारंपरिक सेल्समैन धनंजय कुमार मिश्रा दुकान की देहरी पर खड़े हो दुकानदार से कुछ हिसाब कर रहे थे. 40 साल के धनंजय पिछले 9 सालों से लगातार दिल्ली के पटेल नगर, फरीदपुरी, पांडव नगर, रंजीत नगर, बलजीत नगर, प्रेम नगर, नेहरू नगर और नारायणा इलाके में येलो डायमंड कंपनी के पैक्ड प्रोडक्ट रिटेल और होलसेलर शौप्स को सप्लाई करते हैं. माल सप्लाई करने के लिए कंपनी ने उन्हें एक 3 टायरों वाला रिकशा दिया है जिस में उन के साथ एक युवा ड्राइवर भी है. रिटेल मार्केट लाइन में इस पेशे को डिस्ट्रिब्यूटर कहा जाता है. वह वहां 14 हजार 300 रुपए मासिक वेतन की नौकरी कर रहे हैं. अभी उन्हें पक्का नहीं किया गया है.

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येलो डायमंड कंपनी का अधिकतर माल इंदौर से बन कर आता है. इस जोन में नारायणा में राजीव गांधी कैंप के पास डिस्ट्रिब्यूटर सैंटर है, जहां से धनंजय माल उठाते है. धनंजय का 9 साल का बेटा है जो अपनी मां के साथ बिहार के समस्तीपुर जिले के नयानगर इलाके में रहता है. इतने साल इतनी कम तनख्वाह में धनंजय ने काम किया, पर आज धनंजय को अपने बेटे के भविष्य की चिंता सताने लगी है. उन की इस समस्या में इजाफा औनलाइन बाजार ने कर दिया है.

वे कहते हैं, ‘‘औनलाइन जब से आया है तब से पार्टी (रिटेलर और होलसेलर) हम से माल कम खरीद रहे हैं. मैं डिस्ट्रिब्यूटर के साथसाथ सेल्समैन का भी काम करता हूं, नईनई पार्टियां ढूंढ़नी पड़ती हैं. माल की डील करने जाओ तो वे हमारे माल से औनलाइन मिल रहे माल के रेट की तुलना करते हैं. कई बार

10-10 साल पुरानी बनीबनाई पार्टियां हम से माल लिखवा कर अंत समय में कैंसिल करवा देती हैं, क्योंकि उन्हें वही चीज औनलाइन कुछ सस्ती मिल रही होती है.’’

धनंजय बताते हैं कि इन 2 सालों में उन के यहां कई कर्मचारियों की छंटनी हुई है. औफिस की इंटरनल मीटिंगें होनी बंद हो गई हैं. इस का बड़ा जिम्मेदार वे कोरोना के चलते हुए लौकडाउन को तो मानते ही हैं पर साथ ही पिछले 3-4 सालों से रिटेल सैक्टर में औनलाइन व्यापार के बढ़ते कदमों को बड़ी वजह मानते हैं. उन का कहना है, ‘‘इन 2 सालों में जो भी परिस्थितियां बनीं उन में सब से ज्यादा औनलाइन बेचने वाले व्यापारियों ने चारों तरफ से बाजारों पर कब्जा किया. इसे समय की मांग भले कह लें, पर नुकसान आगे आने वाले कई कर्मचारियों पर पड़ने वाला है.’’

छोटे दुकानदारों पर आफत

औफलाइन बाजार की सुस्ती का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसी साल कोरोना की दूसरी लहर के बाद अगस्त महीने में अपनी ढाई लाख रुपए जमापूंजी इन्वैस्ट कर किराना की दुकान खोलने वाले रमीकांत को महज 4 महीने के भीतर ही अपनी दुकान बंद करनी पड़ गई है. एम्बिट कैपिटल के अनुमान के अनुसार भारत में अधिकांश किराना रिटेल का विस्तार छोटेछोटे और मध्य स्तरीय दुकानों में होता है. इस का बाजार में तकरीबन 70-75 फीसदी हिस्सा है.

ये दुकानें आमतौर पर निम्नवर्गीय क्राउडेड इलाकों में खुली होती हैं. इन दुकानों के अपने बंधेबंधाए कस्टमर है, जो अधिकतर इन के आसपड़ोस के

15-20 घर वाले होते हैं. ये शौप्स पान की दुकान बराबर होती हैं जहां दुकानदार गेट को एक लकड़ी की मेज से ब्लौक करता है और ग्राहक खचाखच भरी दुकान से बाहर से सामान मंगवाता है. इन दुकानों के भीतर कदम रखने भर की जगह होती है, सिर्फ दुकानदार ही हिलडुल कर सामान पैक कर पाता है. रमिकांत के अनुसार औनलाइन शौपिंग और बड़े मल्टी प्रोडक्ट्स स्टोर्स के खुलने से छोटे दुकानदारों के ग्राहक सीमित होते जा रहे हैं.

रमिकांत ने अपनी दुकान बलजीत नगर इलाके में ?ांडेवाला चौक के प्राइम एरिया में खोली थी, जिस के लिए उन्हें महीना 10 हजार रुपए किराया देना पड़ रहा था. उन्होंने जिस तरह की उम्मीद की थी वह दुकान से पूरी नहीं हो पाई, जिस कारण उन्हें इसे बंद करना पड़ा. अब वे वापस अपने पिताजी की पुरानी किराना दुकान में काम करने लगे हैं.

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वे बताते हैं, ‘‘अब वह समय चला गया जब छोटा आदमी दुकान खोल कर भी अपनी जिंदगी हंसीखुशी काट लेता था. आज के समय में अगर आप के पास इन्वैस्ट करने के लिए मोटा अमाउंट नहीं है तो आप व्यापार में जिंदा नहीं रह सकते.’’

‘सरिता’ पत्रिका ने इस मसले पर होलसेलरों से भी उन की राय जाननी चाही. प्रेम नगर इलाके में ‘जैन स्टोर’ के नाम से मशहूर 43 वर्षीय अजय जैन इलाके में बड़े होलसेलर हैं. इलाके में बहुत छोटेछोटे स्तर की दुकानें हैं तो वे उन दुकानों को सामान पहुंचा कर होलसेलर के नाम से जाने जाते हैं. वे

20 साल से किराना कारोबार में हैं.

उन के यहां इस समय तकरीबन 350 आउटलेट्स के लिए सामान जाता है, यानी 350 छोटीबड़ी किराना दुकानें उन के यहां से सामान ले कर जाती हैं और कई बड़े से ले कर छोटी कंपनियों के डिस्ट्रिब्यूटर उन से जुड़े हुए हैं. इलाके में उन के 2 बड़े गोदाम हैं और एक अच्छीखासी बड़ी किराना दुकान है, जहां से वे अपना व्यापार चलाते हैं.

औनलाइन शौपिंग से खुदरा व्यापार में आई दिक्कतों के बारे में जब उन से पूछा तो वे बताते हैं कि वे इस समय खुद भी औनलाइन सामान थोक में खरीदते हैं. उन के मोबाइल पर ग्रौफर्स, उड़ान, जियो मार्ट पार्टनर ऐप इन्सटौल थे. ज्यादातर वे ‘उड़ान’ एप्लीकेशन का इस्तेमाल करते हैं. वे सभी एप्लीकेशंस पर रेट की तुलना करते हैं, इस के साथ डिस्ट्रिब्यूटर के रेट की भी तुलना करते हैं. जहां से सामान सही पटता है वहां से खरीद लेते हैं.

औनलाइन कारोबार को ले कर अजय कहते हैं, ‘‘यह ऐसा ट्रैप है जिस में आप फंसेंगे ही. हमें पता है कि यही ईकौमर्स आगे जा कर उन्हें निगलने वाला है लेकिन फिर भी उस का इस्तेमाल वे कर रहे हैं. बड़े पूंजीपति किसान से ले कर दुकान हर जगह कब्जा करना चाहते हैं. वे छोटे व्यापारियों का भट्ठा बैठा रहे हैं. यह एक गहरी साजिश है.’’

औनलाइन शौपिंग को बड़े इन्वैस्टर भविष्य की दुकानदारी बता रहे हैं. आज बड़े से बड़ा पूंजीपति आलूटमाटर से ले कर दालचावल औनलाइन बेच रहा है. जाहिर है जब बड़े प्लेयर उतरेंगे तो छोटेछोटे व्यापारी और दुकानदारों का इस आंधी में टिकना मुश्किल है. इस में बशर्ते वे या तो खुद को इन में विलय करा दें, या पूरी तरह से इस धंधे को भी टाटाबायबाय कह दें.

2018 में देश के सब से अमीर शख्स मुकेश अंबानी ने खुदरा व्यापार में उतरने की घोषणा की थी. उन्होंने कहा था कि वे 3 करोड़ छोटे व्यापारियों के साथ औनलाइन कारोबार के माध्यम से खुदरा बाजार से जुड़ना चाहेंगे. पहले ही देश में वालमार्ट, एमेजौन, ग्रौफर्स इत्यादि ने अपने पैर इस सैक्टर में पसार लिए थे, ऐसे में रिलायंस की घोषणा के बाद यह तय माना गया कि खुदरा बाजार अब पूरी तरह से मोबाइल के बटनों तक कैद हो जाएगा. जाहिर है इस समय देश में ईग्रौसरी बाजार अभी 6201 करोड़ रुपए का है जो अनुमानतया 2023 में 1.03 लाख करोड़ रुपए होने जा रहा है.

बड़ी कंपनियों की बल्लेबल्ले

लोकल सर्किल के सर्वेक्षण के अनुसार, 52 प्रतिशत किराना दुकानदारों ने लौकडाउन के दौरान ईकौमर्स किराना ऐप को उपयोगी माना था. इसी सर्वे में कहा गया कि लगभग 32 फीसदी औनलाइन किराना दुकानदारों ने तालाबंदी के दौरान हफ्ते में एक से अधिक बार और्डर दिए. होमग्राउन कंसल्ंिटग फर्म ‘रेडशीर’ द्वारा प्रकाशित आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक साल के भीतर ईग्रौसरी व्यापार में 60 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

ऐसे में जियो मार्ट पार्टनर ऐप को सब से बड़े प्लेयर के तौर पर भविष्य में आंका जा रहा है. जियो मार्ट अपनी पहुंच बनाने के लिए जमीनी स्तर पर भी तेजी से काम कर रहा है. माना जा रहा है कि अगले

5 सालों तक जियो मार्ट खुदरा व्यापार के ईकौमर्स में 50 फीसदी से अधिक हिस्से के साथ इस क्षेत्र का नेतृत्व करेगा.

अमेरिकी कंपनी गोल्डमैन सैक्स ने एक रिपोर्ट जारी की है जिस में यह अनुमान जाहिर किया है कि मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज आने वाले कुछ समय में भारत के औनलाइन किराना कारोबार के आधे हिस्से पर कब्जा जमा लेगी. बता दें कि देश का ईकौमर्स कारोबार 27 फीसदी की दर से बढ़ रहा है. गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि फेसबुक से गठजोड़ करने के बाद रिलायंस इंडस्ट्रीज का औनलाइन रिटेल कारोबार में दबदबा निश्चित रूप से बढ़ेगा.

यह संभव भी है क्योंकि रिलायंस इस क्षेत्र पर भारी निवेश पर जोर दे रहा है. वह अपनी पैठ निचले स्तर की दुकानों तक बनाने के लिए तेजी से काम कर रहा है. लोकल इलाकों की दुकानों को जियो मार्ट से जोड़ने के लिए उस ने निम्न स्तर पर युवा लड़कों की फौज खड़ी कर दी है जो लगातार टार्गेट बेस पर काम करते हैं और दुकानदरदुकान घूम कर जियो मार्ट पार्टनर ऐप को दुकानदारों से इंस्टौल करवाते हैं.

इस संबंध में हमारी बात जियोमार्ट के लिए काम कर रहे 20 वर्षीय फील्डबौय (पहचान न बताने की शर्त पर) से हुई. वह बताता है कि इस समय जियोमार्ट पूरी तरह से रिटेल में घुस रही है. अकेले दिल्ली में सैकड़ों युवा लड़केलड़कियां हैं जिन का काम दुकानों पर सिर्फ जियोमार्ट पार्टनर की एप्लीकेशन इंस्टौल करवाने का है. उस के अनुसार, जियो शौपटूशौप डायरैक्ट इंटरैक्ट कर रहा है.

फील्डबौय को शुरुआती तनख्वाह के तौर पर जियोमार्ट 15 से 18 हजार रुपए दे रहा है. इस के साथ कस्टमर बनाने पर इन्सेंटिव भी दिया जा रहा है, लेकिन यह इन्सेन्टिव तभी मिलेगा जब एप्लीकेशन इंस्टौल करने वाला ग्राहक (दुकानदार) महीने में कम से कम 2 बार उस एप्लीकेशन का इस्तेमाल करे. उस का काम सिर्फ एप्लीकेशन इंस्टौल कराने भर का नहीं है, इस के साथ उसे दुकानदारों को गाइड भी करना होता है, तकनीकी जानकारी भी देनी होती है और फायदे भी बताने होते हैं.

फील्डबौय ने बताया, ‘‘दिल्ली को जियोमार्ट ने अलगअलग जोनों में बांटा हुआ है. हर जोन का एक टीम लीडर है. उस के नीचे मेरे जैसे कई सारे युवा लड़केलड़कियां, जिन की उम्र 18-35 साल तक होती है, काम करते हैं. हमारा जियोमार्ट कंपनी से सीधा संबंध नहीं है. जो भी सैलरी या इंसैंटिव मिलता है वह टीम लीडर के माध्यम से मिलता है.’’

युवाओं पर असर

इस समय औनलाइन कारोबार तेजी से अपने पांव पसार रहा है. दिल्ली समेत कई महानगरों में घर से ले कर स्टोर तक औनलाइन खरीदारी की जा रही है. अधिकतर दुकानदारों से बात करते हुए पाया कि इस की सब से बड़ी खासीयत यह है कि अभी यह दुकानदारों को सहूलियात का एहसास करा रहा है. आप यदि आज सामान और्डर करते हैं तो महज 24 घंटों के भीतर सामान आप के पास दरवाजे पर होता है. लेकिन एक तरह जहां सहूलियत की बात आ रही है वहीं इस से जुड़ी बहुत सी असुरक्षाएं हैं. रिटेल सैक्टर से जुड़े कई व्यापारियों, लाखों दुकानदारों और इस से कई गुना लोगों की रोजीरोटी पर खतरा मंडरा रहा है. वे आशंकित हैं कि कहीं यही ऐप उन्हें निगलने, उन का मालिकाना हक, उन की सामाजिकता को तोड़ने का जरिया न बन जाए.

गौरतलब है कि औनलाइन कारोबार के बढ़ने से पारंपरिक व्यापार पर बड़ी चोट पड़ेगी. ऐसे में इस से जुड़े लोगों के कामधंधों पर भारी असर पड़ेगा. दुकानों पर दुकान मालिक के साथ काम कर रहे कामगारों की लगातार घटती संख्या बता भी रही है कि इस का असर पड़ना शुरू हो गया है. कइयों की दुकानें महज खानापूर्ति तक सीमित रह गई है. कई महज समय काटने और बाजार में कोई दूसरा काम न होने के चलते छोटीमोटी किराना दुकानें या तो खींच रहे हैं या जैसेतैसे काम चला रहे हैं.

उल्लेखनीय है कि इस का असर भावी भविष्य की युवा पीढ़ी पर भी पड़ने वाला है. यह सिर्फ रिटेल सैक्टर के तहत आने वाले लोगों पर ही नहीं बल्कि देश में पढ़ेलिखे युवाओं पर भी सीधा असर डालेगा. जब देश में चंद अमीर पूंजीपतियों की मोनोपोली इस सैक्टर में हो जाएगी तो जाहिर है इन्हें डिलीवरी करने वाले युवाओं की फौज (जो तैयार हो चुकी है) की भारी जरूरत महसूस होगी.

ये वे युवा होंगे जिन्हें गूगल मैप चलाना आता होगा, जिन्हें टूव्हीलर और फोरव्हीलर चलाना आता होगा, जिन्हें हिसाब करना आता होगा, जिन्हें इंग्लिश की बेसिक सम?ा होगी और जो बात करने में माहिर होंगे. ये वे पढ़ेलिखे युवा होंगे जो इन के लिए दिनरात डिलीवरी कुली बन कर काम करेंगे. पढ़ेलिखे युवा पीठ पर बड़ेबड़े बैग तो आज भी उठाए गलियोंगलियों सामान ढो ही रहे हैं, आगे जा कर आटादाल पहुंचाने के भी काम करेंगे (जो संभवतया शुरू भी हो गया है).

खुदरा व्यापारियों का विरोध

इसे ले कर विरोध की सुगबुगाहट उठनी शुरू हो गई है. उत्तर प्रदेश से ले कर महाराष्ट्र तक खुदरा व्यपारियों के मंडल (संगठन) बैनरपोस्टर ले कर अपना विरोध जताना शुरू कर चुके हैं. औनलाइन कारोबारियों के पुतले फूंके गए हैं. कई जगह तो डिलीवरी करने वालों को रोका गया, बाजार में घुसने नहीं दिया गया. वहीं, न्याय की गुहार लगाते हुए व्यापारी मंडल कोर्ट का दरवाजा भी खटखटा चुके हैं. जाहिर है अभी यह विरोध सांकेतिक रूप से चल रहे हैं, लेकिन इन विरोधों की बारंबारता को देखते हुए लगता है कि आने वाले समय में यह विरोध बड़े स्तर पर होंगे. संभव है कि अगला बड़ा संघर्ष रिटेल सैक्टर को बचाने का हो.

हालिया उदाहरण आज देश के सामने है जब 19 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के नाम संबोधन में तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान किया, जिस के बाद किसानों की जीत पर आंशिक मोहर लग गई. संसद में जिस तरह बिना चर्चा, बातविचार के कानून लाए गए उसी रास्ते निबटा दिए गए. विचारा जा सकता है कि इन कानूनों के माध्यम से भाजपा सरकार कृषि सैक्टर को चंद अमीर पूंजीपतियों की बपौती बनाने का काम कर रही थी. इस के विरोध में देशभर के किसान सड़कों पर जम गए जिस के चलते सरकार को कानून वापस लेने पड़े.

यह आंदोलन 1 साल 15 दिन लंबा चला. इतिहास में ऐसा कोई आंदोलन नहीं जो इतने लंबे समय तक निरंतर चलता रहा हो. सरकार को किसानों के जज्बे के आगे आखिरकार ?ाकना पड़ा. इस आंदोलन की व्यापकता और कानूनों के लूप होल्स के बारे में ‘सरिता’ पत्रिका आंदोलन की शुरुआत से मुखर हो कर लिखती रही है. जाहिर है, देश के किसानों ने कृषि उत्पादों पर सेठ कंपनियों के एकाधिकार को टालने का बड़ा काम किया है. किसान आंदोलन से घरघर में अडानीअंबानी सरीखे पूंजीपतियों की बेरोकटोक घुसपैठ पर किसी हद तक लगाम लगी. निश्चित रूप से यह एकाधिकार देश के किसान समेत आम जनता को निचोड़ने का काम करने वाले थे. भूख पर सौदेबाजी करने वाले थे. ऐसे ही अगली लड़ाई किराना दुकानों को बचाने की होनी जरूरी है.

‘व्यापारी केवल कारोबार ही नहीं, समाज को जोड़ने का काम भी करता है’

-संदीप बंसल, अध्यक्ष, अखिल भारतीय उद्योग व्यापार मंडल

औनलाइन कारोबार खुदरा कारोबार को तोड़ने के साथ ही डिलीवरीमैन लड़कों को एक तरह से कुली बनाने का काम कर रहा है. औनलाइन कारोबार पूरी तरह से पैसों का कारोबार है. इस का सामाजिकता से कोई लेनादेना नहीं है. औनलाइन कारोबार किस तरह से कारोबार और समाज को नुकसान पहुंचा रहा है, इस बारे में अखिल भारतीय उद्योग व्यापार मंडल के अध्यक्ष संदीप बंसल के साथ बातचीत हुई. पेश हैं प्रमुख अंश :

औनलाइन बिजनैस खुदरा कारोबार को किस तरह से नुकसान पहुंचा रहा है?

खुदरा कारोबार पूरे देश में रोजगार देने का सब से बड़ा साधन है. बहुत बड़ेबड़े कारोबारियों को देखें तो यह पता चलता है कि बहुतों की शुरुआत छोटेछोटे कारोबार से होती थी. खुदरा कारोबार को शुरू करने में कम पूंजी लगती है. इस कारण बहुत सारे लोग इस को शुरू कर लेते हैं. इस के बाद वे धीरेधीरे कारोबार के मुनाफे को बचा कर अपने कारोबार को बड़ा करते थे. औनलाइन कारोबार से खुदरा कारोबार पूरी तरह से खत्म हो जाएगा. छोटाछोटा कारोबार भी बड़े बिजनैसमैनों के हाथ में चला जाएगा. देश के युवा कारोबार करने की जगह पर केवल डिलीवरी मैन बन कर रह जाएंगे.

औनलाइन कारोबार से जनता को क्या दिक्कतें होंगी?

दरअसल बड़े बिजनैसमैन शुरुआत में तमाम तरह के प्रलोभन देते हैं. छूट के चक्कर में लोग उन के ?ांसे में आ जाते हैं. जब वे अपना पूरा नैटवर्क फैला लेते हैं तो फिर मनमाने तरह से दाम बढ़ाने लगते हैं. अगर ओला और उबर को देखें तो सम?ा आएगा कि पहले यह सस्ता लगता था. जब इन लोगों ने पूरी ट्रैवल व्यवस्था को तोड़ दिया तो अब दाम बढ़ा दिए. आप टैक्सी ले कर चलते थे तो बीच रास्ते में रोक भी सकते थे. कोई अतिरिक्त पैसा नहीं देना होता था. ओलाउबर जैसी गाडि़यों को रोकेंगे तो उस का पैसा अलग से देना होगा. भीड़ और जाम लगा है तो उस का पैसा अलग से देंगे. अगर ओलाउबर की गाड़ी आ गई और आप ने इंतजार कराया तो अलग पैसा देना पड़ता है. जो लोग अपनी गाड़ी टैक्सी में चलाते थे वे पहले मालिक होते थे. अब वे ओला के ड्राइवर बन कर रह गए हैं. इसी तरह से औनलाइन खाने के कारोबार ने बड़ेबड़े रैस्तरां को बंदी की कगार पर पहुंचा दिया है.

औनलाइन कारोबार देशहित में क्यों नहीं है?

इस कारोबार से हमारा पैसा विदेशों में जा रहा है. सब से बड़ा नुकसान यह है. दूसरे, यह हमारे सामाजिक ढांचे को तोड़ने को काम कर रहा है. जब आप खुदरा कारोबारी के पास सामान लेने जाते हैं तो उस से आप का सामाजिक जुड़ाव होता है. आप उस से उधार ले सकते हो. आप दुखदर्द और हंसीखुशी आपस में सा?ा कर सकते हैं. वक्तबेवक्त एकदूसरे की मदद कर सकते हैं. अभी कोरोना के समय औनलाइन कारोबार कुछ दिनों के लिए बंद हो गया था. पासपड़ोस के दुकानदारों ने अपने पासपड़ोस के लोगों की मदद की. औनलाइन कारोबार से पैसे के साथ ही सामाजिकता भी खत्म हो रही है.

रोजगार तो औनलाइन कारोबार में भी मिलता है?

औनलाइन कारोबार में रोजगार मिल तो रहा है लेकिन वह कुछ समय के लिए होता है. जैसे ही आप की युवावस्था खत्म होती है वैसे ही आप डिलीवरीमैन के रूप में काम करने की हालत में नहीं रह जाएंगे. यह रोजगार डिलीवरीमैन का नहीं बल्कि युवाओं को डिलीवरी कुली बना रहा है जो उन की सेहत के लिए भी बेहद घातक है.

कारोबारी इस का विरोध क्यों नहीं करते?

हमारे संगठन ने लगातार इस का विरोध किया है. यही वजह थी कि कुछ वर्षों पहले रिलायंस फ्रैश नाम से खुली दुकानों को बंद कराया गया था. हम इस का विरोध सांकेतिक रूप से करते रहे हैं. अब हम कारोबारियों को एकजुट कर के इस का विरोध करेंगे. यह केवल कारोबारियों के लिए ही नहीं बल्कि जनता और समाज के लिए भी घातक है. यह हमारे आर्थिक ढांचे के साथ ही सामाजिक ढांचे को भी तोड़ने का काम कर रहा है.

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