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Valentine’s Special: जरूरी हैं दूरियां पास आने के लिए- क्या हुआ था विहान और मिशी के जीवन में

Valentine’s Special: गृहिणी- मीरा को देखकर समीर को क्यों गुस्सा आ रहा था

समीर को फिर गुस्सा आने लगा. घर के दरवाजे पर मुसकराती मीरा को देख कर उस का मन किया कि झापड़ लगा दे, पर खीजा सा, सिर झुकाए सीधा शयनकक्ष में घुस गया. मीरा का आगे बढ़ा हाथ धीरेधीरे झुकता चला गया. पति का इस तरह नजरअंदाज कर भीतर चले जाना उसे बहुत चुभा पर मन को तसल्ली दी कि शायद अस्पताल में काम बहुत होगा.

वह सोचने लगी कि नौकरी के अंदरूनी व बाहरी तनाव समीर को आजकल इतना थका देते हैं कि सारी मस्ती धीरेधीरे खत्म होती जा रही है. हर वक्त झल्लाया सा रहता है. वे दोनों जब से दिल्ली आए हैं, दिनोंदिन समीर बदलता जा रहा है. जाने कितना काम करवाते हैं ये अस्पताल वाले.

डाक्टर की पत्नी होने के एहसास से सराबोर पति की थकान को कम करने के विचार से मीरा माथे पर जरा सी भी शिकन लाए बिना रसोई में जा कर चाय बनाने लगी. छोटी इलायची वाली समीर की पसंद की चाय नए प्यालों में डाल, उस की प्रिय बीकानेरी भुजिया के साथ टे्र में लिए केवल 5 मिनट में शयनकक्ष में हाजिर थी.

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बिना कोई आवाज किए चाय ला कर उस ने मेज पर रख दी और इंतजार करने लगी कि समीर चाय देख कर अपनी सारी बोरियत और परेशानी भूल उसे प्यारभरी नजरों से देखेगा. फिर उस का हाथ थाम चाय के घूंट भरता हुआ दिनभर के तनाव से मुक्त हो जाएगा.

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समीर आंखें बंद किए चुपचाप लेटा था. उसे मालूम था कि मीरा चाय लिए उस का इंतजार कर रही है. पर वह फिर खीज उठा, ‘दो मिनट हुए नहीं, चाय बना लाई. जरा इंतजार नहीं कर सकती. बिना मांगे हर चीज पहले से हाजिर, फरमाइश करने का तो कभी मौका ही नहीं देती.

‘आखिर साधारण गृहिणी है न, और काम ही क्या है. चाय बनाना, खाना बनाना, घर में बैठेबैठे झाड़पोंछ करना. जब आओ मुसकराती हुई दरवाजे पर खड़ी मिलेगी. किसी दूसरे की बीवी तो यों खड़ी नहीं होती. सब दिनभर काम कर के थकीमांदी लौटती हैं, बुझीबुझी. एक यह है कि जब देखो, तरोताजा, ओस भीगी कली सी मुसकराती मिलेगी.

‘डा. मदन बस में मजाक कर रहे थे, भई, मजे तो सिर्फ समीर के हैं. घर पहुंचते ही गुलदस्ते सी सजीधजी बीवी मुसकराती हुई हाथ से बैग ले लेगी और फिर परोसेगी मीठे चुंबनों सी गरमागरम चाय. एक हम हैं कि घर पहुंचते ही बच्चों को गृहकार्य कराओ, फिर चाय के लिए बीवी का इंतजार करो कि क्लिनिक से आ कर अपनी थकान उतारे. हम भी थके हैं, यह तो घर जाते ही भूल जाना पड़ता है. यार, रोज अकेलेअकेले चाय पीता है, कभी तो दोस्तों को भी भाभी के हाथ की चाय पिलवा दिया कर.’

समीर आगे सोचने लगा, ‘सब के सब मतलबी हैं. वह डा. बसंत रात को 10 बजे लौटता है. कई बार तो क्लिनिक में ही रात गुजारता है. फिर भी पट्ठे को मस्ती चढ़ी रहती है. कल रात को जब हम घूम कर लौटे तो मिल गया. क्या बकवास कर रहा था. सभी के बीच कह रहा था, भई, मजे तो समीर के हैं, बाकी सब तो बेकार जिंदगी गुजार रहे हैं. अपन ने तो बीवी के आगे समर्पण कर रखा है.

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‘कल बोला, आज बच्चों में बहस चल रही थी कि हमारे कैंपस में कौनकौन से अंकल आंटियों से डरते हैं. शीना, मीना का विचार था कि यहां तो सभी अंकल आंटियों से डरते हैं. हां, चिरा के पापा के मजे हैं. रुचिरा की मम्मी उन्हें कभी डांटती नहीं. बस, समीर अंकल ही एक बहादुर और मर्द अंकल हैं.

‘उस के बाद डा. विमल की खिंचाई करने लगा, क्यों, तू अकेला खड़ा है इतनी रात में…क्या बीवी से डरना छोड़ दिया? जा, जल्दी जा, नहीं तो आज फिर घंटी बजाते रहना, दरवाजा नहीं खुलेगा सारी रात. मैडम को नींद आ रही होगी और तू डबलरोटी लाने के बहाने यारों से गपशप कर रहा है.

‘बसंत हमेशा थोड़ीबहुत तो पीए ही होता है. किसी को भी नहीं छोड़ता. सभी से छेड़खानी करता है. डा. अशोक से कह रहा था, डाक्टर साहब, आप के हिस्से में तो बम का गोला ही आया है. हमारी छत पर तो रोज ही बम विस्फोट होता है, भूकंप आता है, बिजली गिरती है और अंत में बारिश.

‘डा. देवेश और विनय को ही देखो, रोज ही रात का खाना खाने बाहर जाते हैं. दोनों की बीवियां प्राइवेट प्रैक्टिस में हैं. कमाती भी अंधाधुंध हैं और उसी हिसाब से खर्च भी हाथ खोल कर करती हैं. एक यह मीरा है, कभी कहो भी कहीं चलने के लिए तो कहेगी कि आज तो उस ने बहुत बढि़या खाना बना रखा है, फिर कभी चलेंगे. तंग आ गए रोजरोज घर का खाना खातेखाते.

‘उधर विमल को देखो, दोपहर को रोज मेरे कमरे में चला आता है और मेरे गोभी के परांठे खा जाता है. कहता है, यार समीर, कबाब तू खा, सैंडविच के साथ, परांठे इधर सरका दे. अपनी बीवी को परांठे बनाने की फुरसत भला कहां. मीरा भाभी के हाथ के परांठों में जादू है जादू.

‘हुंह, सब को दूसरे की बीवी में अप्सरा और हाथों में जादू नजर आता है.’

अंदर ही अंदर खदबदाता समीर मुंह ढक कर लेटा था. उसे उन दिनों मीरा की हर बात पर गुस्सा आता था. वे सब बातें या चीजें, जो उस की विशेषता थीं और पहले उसे अच्छी लगती थीं, अब आंखों में खटकने लगी थीं.

10 साल हो गए उन की शादी हुए. बेटी रुचिरा भी इस वर्ष 8 की हो गई थी. मीरा के साथ समीर ने एक भरपूर और सुखद वैवाहिक जीवन बिताया था. वह तो यही मानता रहा था कि वे दोनों जैसे बने ही एकदूसरे के लिए हैं.

मीरा सुंदर तो थी ही, उस का स्वभाव इतना मधुर और सरल था कि प्यार करने को दिल हो आता. परिवार के सभी सदस्यों की वह दुलारी थी. मातापिता, भैयाभाभी की तो वह आंखों की पुतली ही थी.

यों वास्तव में मीरा का कोई दोष नहीं था. बस, दोष था इस दिल्ली का, यहां की पहियों पर भागती तूफानी जिंदगी का.

2 साल से यानी जब से वह यहां के एक अस्पताल में काम करने दिल्ली आया था और मैडिकल कैंपस में रहने लगा था, सब कुछ गड़बड़ाने लगा था. वह पहले जैसा सहज नहीं रहा, सबकुछ जैसे टूटफूट गया था. चरमराने लगी थी जिंदगी और उस की सोच भी कितनी बदल गई थी.

यहां सभी महिलाएं नौकरी करती थीं. एक मीरा को छोड़ कर अन्य सभी की बीवियां डाक्टर थीं. सभी जबतब ‘फैलोशिप’ ले कर विदेश जाती रहती थीं. अस्पताल के काम के अलावा, कभी सेमिनार तो कभी कौन्फ्रैंस में व्यस्त रहतीं. कुछ प्राइवेट प्रैक्टिस करती थीं और अच्छा कमाती थीं.

सभी के घर में दोदो एअरकंडीशनर थे या हर कमरे में कूलर था. 2-3 साल में फर्नीचर या परदे बदल जाते. मियांबीवी दोनों डट कर काम करते थे, घर और बच्चे नौकरनौकरानियां संभालते.

समीर फिर सोच में डूब गया, ‘एक हम हैं, जब देखो, मीरा रुचिरा को पढ़ा रही है, सुला रही है, खिला रही है अथवा घर के काम में व्यस्त है. एक भी चीज खरीदनी हो तो चार बार सोचना पड़ता है. होटल में खाना तो हमारे लिए सपना ही है. रोजरोज दालरोटी खातेखाते तो अब ऊब होने लगती है.

‘यह ठीक है कि मीरा खाना बहुत अच्छा बनाती है, सभी तारीफ करते हैं. घर भी अच्छी तरह रखती है. लेकिन डा. मदन का घर देखो, विदेशी चीजों से भरा है. उस की बीवी साल में दोदो बार विदेश जाती रहती है. हेमंत का टैरेस गार्डन देखते ही बनता है. डा. सुनील के कैक्टस दूरदूर तक मशहूर हैं.

‘सब के बच्चे रातदिन केबल टीवी देखते हैं और एक हम हैं कि रुचिरा वीडियो देखने के लिए भी टीना के घर जाती है. चेतन के पास कितनी बढि़या नस्ल के 5 कुत्ते हैं, हमारे पास क्या है?

‘जो आता है, वही मीरा को अपने घर की चाबियां थमा जाता है. कभी अपने बच्चों को छोड़ जाता है. और कुछ नहीं हो तो कौफी या चाय पीने ही चला आता है वक्तबेवक्त. कैंपस का कोई काम हो, बस एक ही जवाब है कि मीराजी देख लेंगी. वही है न पूरे कैंपस में फालतू. अपनी बीवियों से तो कराओ नौकरी और फालतू कामों के लिए है मीरा. ये भी तो खूब है, कभी किसी काम के लिए मना नहीं करती.

‘अब तो रुचिरा भी पूछने लगी है, मम्मी, तुम अस्पताल क्यों नहीं जातीं? सब की मम्मी ड्यूटी पर जाती हैं, आप क्यों नहीं जातीं? कितनी बार कहा, कोई कोर्स ही कर लो, कुछ भी छोटामोटा, आखिर पढ़ीलिखी तो हो ही. पर शौक ही नहीं है. घर में घुसे रहना ही अच्छा लगता है.

‘सब की बीवियां कितने सलीके से रहती हैं. हमेशा टिपटौप. शक्लसूरत कुछ नहीं, पर सजीधजी रहती हैं हर समय. भई, नौकरी पर जाने वालों की बात ही कुछ और होती है, व्यक्तित्व अपनेआप ही निखर आता है.

‘मीरा आजकल मोटी भी होने लगी है. अपना ध्यान ही नहीं रखती. बाल कटाने को भी तैयार नहीं. बस, सीधी सी चोटी कर लेगी या कभी कस कर जूड़ा बांध लेगी. चेहरा कितना आकर्षक है, अगर ढंग से रहे तो सभी को मात दे सकती है.

‘समझ में नहीं आता कि मुझे क्या हो गया है? क्या चाहता हूं मैं, यह भी पता नहीं. मीरा की वे सब बातें या आदतें, जिन की दूसरे तारीफ करते हैं, मुझे जहर लगने लगी हैं. इलाहाबाद में सब कितना ठीकठाक चलता था पर दिल्ली आते ही सब जैसे गड़बड़ा गया है.

‘भई, आज की दुनिया में अन्नपूर्णा बनने की आखिर जरूरत ही क्या है? यह ठीक है कि तुम में सारे गुण हैं, पर क्या तुम बीसवीं सदी की रफ्तार के साथ नहीं चल सकतीं? आप भारतीय संस्कृति नहीं छोड़ेंगी. कितना समझाया कि मेरी चिंता करना छोड़ो, मैं अपनी देखभाल खुद कर लूंगा, लूलालंगड़ा या अपाहिज तो हूं नहीं. जरा तेजतर्रार और स्मार्ट बनो.

‘यह तो है नहीं कि मुझे दूसरों की परेशानियों का पता नहीं है. नौकरीपेशा महिलाओं की अपनी परेशानियां हैं, विवशताएं हैं. उन के घरों की हालत का भी मैं चश्मदीद गवाह हूं. किंतु जब सभी एक तरह से जी रहे हों तब कितना अजीब सा लगता है अलग ढंग से जीना.

‘डा. चेतन और उस की बीवी के शयनकक्ष अलगअलग हैं. अभी पिछले हफ्ते ही तो डा. अशोक का अपनी पत्नी से झगड़ा हुआ था. गुरदीप की बीवी रोज नाइट ड्यूटी करती है और जब वह अस्पताल जा रहा होता है तब वह घर में घुसती है.

‘डा. मनोज के बच्चे रातदिन नौकरों के बच्चों के बीच खेलते हैं. डा. विनय की आया ने चोरी करवा दी थी पिछले साल. मनोज के नौकर ने गाड़ी साफ करतेकरते जाने कब गाड़ी चला दी और डा. कुमार की गाड़ी में दे मारी. दोनों का कितना नुकसान हुआ था.

‘मीरा रुचिरा का कितना खयाल रखती है. कितनी शिष्ट और शालीन है रुचिरा, लेकिन कितनी सीधी है, कहीं मीरा जैसी ही न बन जाए.

‘इस में कोई संदेह नहीं कि पत्नी तो बस एक मीरा ही है, बाकी सब कामकाजी महिलाएं हैं, जो थोड़ाबहुत पत्नीधर्म शौकिया निबाह लेती हैं. पर मीरा अगर डाक्टर होती तो वह भी शान से कहता कि उस की पत्नी डाक्टर है.

‘शादी के समय मैं ने तो जिद की थी कि मुझे डाक्टर बीवी नहीं चाहिए. पत्नी घर में हो, जब मैं थकामांदा लौट कर आऊं. यही तो चाहता था मैं. मीरा मुझे पहली बार देखते ही पसंद आ गई थी. बिना नखरे दिखाए उस ने झट से हां कर दी थी. कैसी शांत, सुंदर, मधुर और सौम्य है मीरा. फिर मैं परेशान क्यों हूं, आखिर क्यों?’

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समीर को सोया देख मीरा चाय ले कर रसोई में रख आई. वह यह सोच कर दुखी थी कि आज जरूर ज्यादा आपरेशन करने के कारण समीर का सिरदर्द बढ़ गया होगा. थोड़ी देर चुपचाप सोने से शायद तबीयत सुधर जाएगी.

वह रुचिरा की फ्रौक में गोटा टांकने लगी. बहुत दिनों से वह समीर में एक परिवर्तन देख रही थी. वह बातबात में खीजता था. हर वक्त झल्लाया रहता था.

मीरा अच्छी तरह जानती थी कि आज की महंगाई में एक आदमी की तनख्वाह में गुजारा करना कितना कठिन है. आएदिन किसी न किसी चीज की किल्लत पड़ी रहती थी. वह कितनी समझदारी और किफायत से घर चलाती थी पर किफायत भी तो एक सीमा तक ही संभव थी.

कई बार उस का मन होता कि एमए की परीक्षा उत्तीर्ण कर ले या कोई कोर्स वगैरह कर के नौकरी कर ले, पर समीर और रुचिरा को असुविधा होगी, यह सोच कर वह घर में ही अपने लिए नएनए काम निकालती रहती. वह सभी की मदद करने की कोशिश करती.

सभी उसे प्यार करते थे. छोटे बच्चे तो उसे घेरे ही रहते. वह दिनभर कुछ न कुछ करती ही रहती. फिर भी जब समीर का मुरझाया चेहरा देखती तो भीतर ही भीतर उदास हो जाती. तरहतरह से पूछने की कोशिश वह कर चुकी थी, पर बहुत कुरेदने पर भी समीर खुलता ही नहीं था. न जाने कौन सा घुन उस की सुखी गृहस्थी में घुस आया था.

उस ने तो समीर की खुशी में ही अपनी खुशी, अपनी जिंदगी समाहित कर दी. अब क्या कारण है कि समीर दुखी है, परेशान है? अपने कैरियर के बारे में उस ने कभी सोचा ही नहीं. चारों ओर होने वाली भागदौड़ देख कर तो वह नौकरी के बारे में कभी सोचती भी नहीं थी.

मीरा सोचने लगी, ‘कितनी शांति है उस के छोटे से घर में. कोई तूफान नहीं, जैसा कि आसपास आएदिन उठता ही रहता है. दिनभर पहियों पर सवार ये सब भागते ही रहते हैं. पर समीर को पूरी स्वतंत्रता है, चाहे जितनी देर तक अस्पताल में काम करे. वह कितना खयाल रखती है उस की पसंदनापसंद का. सभी उस से रश्क करते हैं पर फिर उस का समीर उदास क्यों रहता है?

‘क्या कारण हो सकता है समीर की उदासी का? विभाग में शायद किसी से अनबन हो गई होगी.’

इसी तरह अनापशनाप सोचतेसोचते सूई उस की उंगली में चुभ गई. खून की बूंद छलछला आई. फ्रौक वहीं छोड़ उस ने हाथ धोया पर खून रुक ही नहीं रहा था.

उस ने कस कर उंगली दबाई और ‘डेटाल’ की शीशी उठाई. तभी रुचिरा आ कर अपने नन्हेनन्हे हाथों से उस की उंगली पर पट्टी बांधने लगी. रुचिरा को प्यार कर वह रसोई में आ गई क्योंकि समीर अभी तक सोया हुआ था.

मीरा ने खाना तैयार कर के मेज सजा दी. वह इस बात से बेखबर थी कि समीर के भीतर कौन सा तूफान चल रहा है. एक ही छत के नीचे, एकसाथ रहते हुए भी दोनों अपनेअपने हृदय में घुमड़ते तूफान से घिरे थे, दूसरे के भीतर चलने वाली हलचल से सर्वथा अनभिज्ञ. समीर की बेचैनी का कारण न जानते हुए भी मीरा को उस का आभास था और वह प्राणपण से उस की परेशानी दूर करने के लिए प्रयासरत थी. अब वह पति का पहले से भी ज्यादा ध्यान रखती. हर जरूरत की चीज उस के कहने से पहले ही जुटा देती. वह कहां जानती थी कि उस की यही तत्परता समीर की व्याकुलता का मूल कारण है.

Manohar Kahaniya: एक शादीशुदा, दूसरी तलाकशुदा

लेखक- जगदीश प्रसाद शर्मा ‘देशप्रेमी’

सौजन्य- मनोहर कहानियां

सितंबर की पहली तारीख थी. रितु ने अपने प्रेमी अजय को फोन कर अपनी मां की तरफ से माफी मांगते
हुए मिलने के लिए विनती की. जबकि अजय उस से मिलने में आनाकानी कर रहा था. उस ने अपने स्टूडियो में काम अधिक होने का बहाना बनाया. रितु के बारबार माफी मांगने पर अजय उस से मिलने को तैयार हो गया. लेकिन उस ने शर्त रखी कि उस के लिए बीयर का इंतजाम करना होगा.
‘‘अजय, मैं लड़की हूं. तुम्हारे लिए बीयर कहां से लाऊंगी. बताओ, मैं शराब की दुकान पर जाऊंगी तो अच्छा लगेगा?’’ रितु बोली.

इस पर अजय ने साफ लहजे में कह दिया कि वह चाहे जैसे भी लाए. उस का मूड बहुत ही खराब है. बगैर बीयर के ठीक होने वाला नहीं है. रितु ने इस बारे में और उस से ज्यादा जिरह नहीं की और फोन डिसकनेक्ट करने से पहले मिलने की जगह और समय बता दिया. रितु एलएलबी की छात्रा थी. उस का मोहल्ले में ही रहने वाले युवक अजय सैनी उर्फ बंटी के साथ काफी समय से प्रेम संबंध चल रहा था. यह बात रितु की मां सुशीला को पसंद नहीं थी. उन के प्रेम संबंध के खिलाफ जा कर सुशीला ने रितु की एक साल पहले ही शादी करवा दी थी. लेकिन शादी के 2 महीने बाद ही रितु पति से तलाक की बात कह कर मां सुशीला के पास ही आई थी, उन के तलाक का मामला कोर्ट में लंबित था. इस की वजह यह थी कि रितु पर अजय के प्यार का भूत सवार था. जबकि अजय के लिए रितु मौजमजे के अलावा कुछ और नहीं थी. अजय रितु से मिलने उस के घर पर भी जाता रहता था.

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प्रेमी की बात को रितु भला कैसे टाल सकती थी. लिहाजा वह हिम्मत कर शराब की दुकान से उस के लिए 2 बीयर की बोतलें खरीद लाई. इस के बाद शाम करीब साढ़े 5 बजे रितु हरिद्वार में चावमंडी स्थित गौशाला के सामने पहुंच कर अजय के आने का इंतजार करने लगी. उस दिन सितंबर की पहली तारीख थी. सड़क किनारे अपनी स्कूटी पर बैठी रितु मोबाइल सर्फिंग कर रही थी. तभी अचानक से अजय आ गया. इस का रितु को पता भी न चला. अजय ने शरारत करते हुए उस के कान के काफी नजदीक मुंह ला कर हैलो कहा. रितु अचानक तेज आवाज सुन कर हड़बड़ा गई और स्कूटी से गिरतेगिरते बची. नाराजगी भरे लहजे में बोली, ‘‘तुम्हारी यही हरकत मुझे पसंद नहीं, मैं गिर जाती तो!’’

‘‘कैसे गिर जाती, मैं यहां नहीं था क्या?’’ अजय बोला. ‘‘क्या करते तुम? आज ही तुम ने घर पर भी ऐसा ही किया था, तब मुझे गिरने से बचा पाए. वह तो गनीमत थी कि मैं सामने बैड पर गिरी थी.’’ ‘‘कुछ हुआ तो नहीं था न,’’ अजय ने सफाई दी. ‘‘कैसे कुछ नहीं हुआ था, तुम मुझ पर गिर पड़े थे, तभी वहां मां आ गई थीं. मां ने हमें गलत समझ लिया था. उस वक्त तुम्हें तो मां ने डांटडपट कर भगा दिया, लेकिन तुम्हारे जाने के बाद मेरी तो पूरी वाट लगा दी थी. और अब देखो, उसी वजह से तुम नाराज हो गए. उस के चलते मुझे तुम से माफी मांगनी पड़ी है. बदले में मैं ने जैसेतैसे कर तुम्हारे लिए 2 बोतल बीयर का इंतजाम किया है.’’ रितु नाराजगी के साथ एक सांस में सब कुछ बोल गई. ‘‘तुम्हारी मां तो मुझ से वैसे भी नाराज ही रहती हैं. उन को मेरा तुम्हारे घर आनाजाना पसंद नहीं है.’’ अजय बोला.

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‘‘आज मैं तुम से एक फैसला करने आई हूं.’’ रितु बोली. ‘‘फैसला…कैसा फैसला?’’ अजय चौंकते हुए बोला.
‘‘रोजरोज की टेंशन मुझ से अब सहन नहीं होती, आज तुम क्लीयर करो कि शादी कब करोगे?’’ रितु एक झटके में तेवर दिखाती हुई बोली. ‘‘रितु, अचानक तुम्हें क्या हो गया है, तुम ने सुबह फोन पर भी सुनाया, फिर माफी मांगी. और अब यह फिर से पुराना राग अलापना शुरू कर दिया,’’ अजय बोला.
‘‘पुराना राग?’’ रितु चौंकती हुई बोली. ‘‘पुराना नहीं तो और क्या, मैं ने तुम से पहले भी कई बार कहा है कि मैं शादीशुदा हूं. मेरे 3 बच्चे हैं.’’ अजय ने उसे समझाने की कोशिश की. ‘‘अजय, लोग चाहे जो कुछ बोलें, मैं परवाह नहीं करती, लेकिन मुझे तुम से शादी करनी है. मैं ने तुम से शादी करने के लिए पति को छोड़ा है. तलाक लिया है. तुम मुझे पसंद हो. मैं ने तुम से प्यार किया है.’’

दोनों पहुंचे लवर्स पौइंट पर रितु जब लगातार बोलने लगी तब अजय उस के मुंह पर हाथ रखते हुए बोला, ‘‘यहां बीच सड़क पर क्यों हंगामा खड़ा कर रही हो. चलो कहीं बैठ कर बातें करते हैं.’’ उस के बाद रितु और अजय स्कूटी से अपनी जानीपहचानी जगह की ओर चले गए, जो उन के लिए पसंदीदा गंगनहर के किनारे लवर्स मीट पौइंट था. वहीं बैठ कर दोनों ने बीयर पी. उधर रितु घर नहीं पहुंची तो उस की मां सुशीला को उस की बहुत चिंता हुई. उस का फोन भी नहीं मिल रहा था. रात को उस का इंतजार करतेकरते पता नहीं कब उन्हें झपकी आ गई.

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2 सितंबर को सुशीला की सुबह 7 बजे आंखें खुलीं. वह बेहद तनाव में थीं. पूरी रात रितु के इंतजार में जागी हुई थीं. सुबह के समय आंख लग गई थी. उन की बेटी रितु शाम से ही नहीं लौटी थी. वह मां की डांट खा कर दुखी थी. रात में तो उन्होंने सोचा कि शायद वह किसी रिश्तेदार के यहां चली गई होगी, हालांकि रितु के बारे में जानने के लिए रिश्तेदारों को फोन नहीं किया था. सुशीला खुद को कोस रही थीं कि उन्होंने कल अजय को बेटी के सामने कुछ ज्यादा ही भलाबुरा कह दिया था. डांटने तक तो ठीक था, उसे घर से जबरन निकाल कर खदेड़ना नहीं चाहिए था. उस ने खामख्वाह रितु को काफी जलीकटी सुना दी थी. वह सोच में पड़ गईं कि अब वह क्या करे.

थानाप्रभारी को बताई हकीकत स्कूटी ले कर निकली रितु के घर वापस नहीं आने के कारण मां सुशीला का मन अनजाने भय से कांपने लगा था. अंतत: उन्होंने इस की जानकारी पुलिस को देना ही सही समझी. उस के बाद वह कोतवाली जाने के लिए घर से निकल पड़ीं. आधे घंटे बाद वह हरिद्वार की गंगनहर कोतवाली पहुंच गईं. थानाप्रभारी प्रवीण सिंह कोश्यारी उस समय थाने में थे. पहले सुशीला ने उन्हें अपना परिचय दिया. बताया कि वह स्व. कंवर पाल की पत्नी है. इसी कोतवाली क्षेत्र के मोहल्ला गांधीनगर की 3 नंबर की गली में रहती है. उन की बेटी रितु पाल एलएलबी की पढ़ाई कर रही है. वह काफी समय से आजाद नगर मोहल्ले में फोटोग्राफी की दुकान चलाने वाले अजय सैनी के प्रेम जाल में फंस गई थी.

इसी सिलसिले में उन्होंने यह भी बताया कि वह उन के प्रेम का वह विरोध करती है. वह कई बार रितु और अजय से के संबंधों का विरोध भी जता चुकी है. मगर रितु व अजय उस की बात अनसुनी कर जाते हैं.
सुशीला ने बताया कि कल अजय उस के घर आया था. उस की हरकत को ले कर उन्होंने अजय को रितु से मिलने पर फटकारा था. इस पर वह उल्टे उसे देख लेने की धमकी देने लगा था. सुशीला की बात ध्यान से सुनते हुए थानाप्रभारी बीच में बोले, ‘‘लेकिन आप आज किसलिए आई हैं. क्या उन के साथ कोई अप्रिय घटना हो गई है?’’ ‘‘जी हुजूर, कल शाम से मेरी बेटी घर वापस नहीं लौटी है. मुझे पूरा संदेह है कि अजय ही मेरी बेटी को कहीं भगा कर ले गया है.’’

‘‘तो आप का कहना है कि आप की बेटी का अपहरण हो गया है?’’ कोश्यारी बोले.
‘‘जी साहब!’’ सुशीला बोली. ‘‘ठीक है, यह लीजिए प्लेन पेपर इस पर अभी जो आप ने बताया, वह सब लिख कर ले आइए.’’ कहते हुए कोश्यारी ने कंप्यूटर प्रिंटर से एक पेपर निकाल कर सुशीला को दे दिया.
सुशीला ने पेपर ले कर कोश्यारी से एक कलम मांगा और अलग जा कर बेंच पर बैठ गईं और तहरीर लिख कर थानाप्रभारी को दे दी, जिस में उन्होंने रितु के अपहरण का दोषी सीधेसीधे अजय को ही ठहराया.
सुशीला की तहरीर पर अपहरण की रिपोर्ट दर्ज हो गई. थानाप्रभारी ने यह जानकारी सीओ विवेक कुमार और एसपी (देहात) प्रमेंद्र डोभाल को भी दे दी. प्राथमिकी दर्ज होने के बाद गंगनहर पुलिस सक्रिय हो गई. रितु की सकुशल बरामदगी के लिए सीओ ने एक टीम गठित कर दी, जिस में थानाप्रभारी प्रवीण सिंह कोश्यारी के नेतृत्व में एसएसआई देवराज शर्मा, एसआई सुनील रमोला, सुखपाल मान आदि को शामिल किया गया.

पुलिस टीमें जुटीं जांच में पुलिस ने रितु के अकसर आनेजाने वाले जगहों के निरीक्षण के साथसाथ उस से मिलनेजुलने वालों से पूछताछ की. इसी सिलसिले में मुख्य आरोपी अजय को भी थाने बुला कर पूछताछ शुरू हुई. सीसीटीवी कैमरे की फुटेज की जांच शुरू की. इस के अलावा दूसरी टीम में एसआई अजय शाह व सिपाहियों हरी सिंह राठौर, शिवचरण, अनूप, अनिल, रविंद्र, चेतन, संदीप व यशपाल भंडारी को रितु व अजय सैनी के चालचलन के बारे में जानकारी जुटाने के लिए लगा दिया. उन्हें दोनों के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकालने का कार्य सौंपा गया. उन के कुछ कार्य हो जाने के बाद पुलिस की दोनों टीमों की जानकारियों के विश्लेषण का काम शुरू किया गया.

अगले दिन शाम को पुलिस ने कोतवाली सिविललाइंस क्षेत्र की पीरबाबा कालोनी से रितु की स्कूटी, उस का मोबाइल तथा आधार कार्ड लावारिस हालत में बरामद कर लिया था. स्कूटी लावारिस हालत में मिलने पर पुलिस व रितु की मां ने दूसरा संदेह जताया कि कहीं रितु ने गंगनहर में कूद कर आत्महत्या तो नहीं कर ली. इस एंगल से भी पुलिस जांच करने लगी. किंतु रितु व अजय के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स से उन की एक अहम बातचीत हाथ लग गई. उस आधार पर 4 सितंबर, 2021 को पुलिस ने पूछताछ के लिए अजय सैनी को कोतवाली बुलाया. उस से रितु के लापता होने के बारे में गहन पूछताछ की गई.

अजय ने पुलिस को बताया कि वह बीते 3 सालों से रितु को जानता है. उस से उस की जानपहचान उस समय हुई थी, जब वह उस के स्टूडियो पर फोटो खिंचवाने आई थी. तब उस ने उस की तसवीर को हीरोइन की तरह ग्लैमर से भरा बना दिया था. उस के बाद वह अकसर उस के स्टूडियो पर आनेजाने लगी थी. इस कारण उस की रितु से दोस्ती हो गई थी. बाद में यह दोस्ती कब प्यार में बदल गई, पता ही नहीं चला. अजय शादीशुदा था, यह जानते हुए भी रितु उस से प्यार करने लगी. अजय ने बताया कि वह उस के घर पर गया था. तब रितु के घर पर उस की मां सुशीला से उस की नोकझोंक भी हुई थी. उस के बाद वह अपने स्टूडियो पर वापस आ गया था. रितु अपने घर से कहां गई थी, इस की उसे कोई जानकारी नहीं है.

रितु की मिली लाश पुलिस को इतनी जानकारी दे कर अजय कोतवाली से चला गया. उस के बाद पुलिस ने गोताखोरों की मदद से गंगनहर में रितु को काफी तलाशा, मगर उस का कुछ पता नहीं चल सका.
रितु की मां और उस के रिश्तेदार हर रोज गंगनहर की आसफनगर झाल पर जाते थे. वह 7 सितंबर 2021 का दिन था. सुबह के 10 बज रहे थे. आसफनगर झाल पर तैनात सिंचाई विभाग के एक कर्मचारी ने गंगनहर पुलिस को सूचना दी कि झाल पर एक युवती का शव बह कर आया है. सूचना पाते ही थानेदार अजय शाह ने इस की जानकारी रितु की मां को दी. लगभग आधे घंटे बाद पुलिस टीम व सुशीला अपने रिश्तेदारों के साथ झाल पर पहुंच गए. सुशीला ने जैसे ही झाल में अटकी लाश देखी, दहाड़ मार कर रोने लगीं. दरअसल, वह लाश रितु की ही थी.

उस के बाद पुलिस ने लाश को झाल से बाहर निकाला और उस का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए जे.एन. सिन्हा राजकीय अस्पताल रुड़की भेज दिया.रितु की लाश बरामद होने के बाद उस के परिजन हंगामा करते हुए अजय के खिलाफ तुरंत काररवाई की मांग करने लगे. तभी वहां पहुंचे सीओ विवेक कुमार ने कोतवाली पहुंच कर अजय से पूछताछ की तो वह रितु के बारे में अनभिज्ञता जताने लगा.
तभी सीओ ने कहा, ‘‘फिर सफेद झूठ बोल रहा है. अभीअभी तूने बताया कि अपने पसंदीदा लवर्स पौइंट की ओर गए. बीयर की बोतल का क्या हुआ, जो तूने मंगवाई थी. रितु तभी से लापता है. उस की मां सुशीला ने तेरे खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई है.’’

पुलिस से पूछताछ के दौरान अजय ने सिरे से कुछ और बताने से इनकार कर दिया. इस पर वहीं खड़े थानाप्रभारी कोश्यारी को काफी गुस्सा आ गया, उन्होंने एक जोरदार थप्पड़ लगाते हुए कहा, ‘‘उस की आज ही नहर में तैरती हुई लाश बरामद हुई है. पता है तुझे?’’ रितु की लाश की बात सुन कर अजय के चेहरे का रंग फीका पड़ गया. पुलिस को समझते देर नहीं लगी कि रितु की मौत का जिम्मेदार अजय ही है. फिर उस से सख्ती से पूछताछ की जाने लगी. थानाप्रभारी कोश्यारी ने फिर वही सवाल किया, स्कूटी पर बैठ कर तुम दोनों कहां गए? अजय ने एक लाइन में बताया कि दोनों पीरबाबा कालोनी के पास गंगनहर के किनारे आ गए थे. उस समय वहां अंधेरा छा गया था. वहीं हम ने साथसाथ बीयर पी थी. फिर मैं वापस अपने घर आ गया था और रितु भी लौट आई थी.

इस के बाद पुलिस ने उसे रितु की लाश दिखाई. रितु की लाश देख कर वह टूट गया और समझ गया कि अब उस का बचना मुश्किल है. इस के बाद उस ने बताया कि उस ने किस तरह से रितु को बीयर पिला कर गंगनहर में धक्का दिया था. पुलिस ने अजय सैनी निवासी ग्राम किशनपुर थाना भगवानपुर जिला हरिद्वार के बयान नोट कर लिए. उस के बाद पुलिस ने अजय की निशानदेही पर रितु के गले की सोने की चेन और पेंडेंट भी बरामद कर लिया, जो अजय ने धक्का देने से पहले रितु के गले से निकाल लिया था.
एसपी (देहात) प्रमेंद्र डोभाल ने अजय को प्रैसवार्ता के दौरान मीडिया के सामने पेश कर के इस घटना की विस्तृत जानकारी दी.

अगले दिन पुलिस ने अजय सैनी को कोर्ट में पेश कर दिया. वहीं से उसे जेल भेज दिया गया. अजय सैनी के पिता शिक्षक हैं. कथा लिखे जाने तक आरोपी अजय सैनी रुड़की जेल में बंद था. पुलिस को रितु की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी मिल गई थी, जिस में उस की मौत का कारण पानी में डूब कर दम घुटना बताया गया था. इस प्रकरण की विवेचना अजय शाह द्वारा की जा रही थी. कथा लिखे जाने तक इस प्रकरण में अजय के विरुद्ध साक्ष्य जुटा कर उस के विरुद्ध चार्जशीट अदालत में भेजने की तैयारी की जा चुकी थी.

चुनाव और प्रलोभन: रोग बना महारोग

चुनाव का सीधा मतलब अब कोई न कोई लोभ या प्रलोभन हो गया है. लगभग सभी राजनीतिक पार्टीयां मतदाताओं को लुभाने का प्रयास कर रही है और यह सीधा सीधा लाभ नकद रुपए  और अन्य संसाधन का है जिसे सारा देश देख रहा है और संवैधानिक संस्थाएं तक असहाय स्थिति में दिखाई दे रही है, कुछ नहीं कर पा रही है.

क्या हमारे संविधान में कोई ऐसा प्रावधान है कि राजनीतिक दल देश के मतदाताओं को किसी भी हद तक लुभाने के लिए स्वतंत्र हैं? और मतदाता अपना विवेक गिरवी रख कर के अपने मत को ऐसे राजनेताओं को बेच देंगे जो सत्तासीन होकर 5 साल उन्हें भूला बैठते हैं क्या यह उचित है कि चुनाव जीतने के लिए लैपटॉप, स्कूटी, मोबाइल, रुपए पैसे दिए जाना आवश्यक हो, क्या अब विकास का मुद्दा पीछे रह गया है. क्या देश की अन्य महत्वपूर्ण मसले पीछे रह गए हैं कि हमारे नेताओं को रुपए पैसे का लाली पॉप मतदाताओं को देना अनिवार्य हो गया है या फिर यह सब गैरकानूनी है.

अब देश के उच्चतम न्यायालय ने इस मसले पर एक्शन ले लिया है और अब देखना यह है कि आगे आगे होता है क्या, क्या रुपए पैसे का लोभ लालच पर अंकुश लग जाएगा या फिर  और बढ़ता चला जाएगा यह प्रश्न आज हमारे सामने मुंह बाए खड़ा है.

विगत 25 जनवरी को उच्चतम न्यायालय  ने कहा है-” चुनाव में राजनीतिक दलों के मुफ्त सुविधाएं देने के वादे करना एक गंभीर मुद्दा है.”

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प्रधान न्यायाधीश एनवी रमण, न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने इस मामले को लेकर देश में चुनाव संपन्न कराने वाली संवैधानिक संस्था “चुनाव आयोग” और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर दिया है.

चुनाव में “माले मुफ्त दिल ए बेरहम”जैसी हरकतें कर रहे राजनीतिक दलों  की मान्यता रद्द करने की मांग करने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पीठ ने यह कदम उठाया. इसके बाद अब यह बहुत कुछ संभव है कि आने वाले समय में कोई निर्णायक परिणाम सामने आ जाए.

आपको यह बताते चलें कि सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति रमण ने कहा- ‘अदालत जानना चाहती है कि इसे कानूनी रूप से कैसे नियंत्रित किया जाए. क्या ऐसा इन चुनावों के दौरान किया जा सकता है? या इसे अगले चुनाव के लिए किया जाए.निश्चित ही यह एक गंभीर मुद्दा है, क्योंकि मुफ्त बजट तो नियमित बजट से भी तेज है.”

दरअसल,देश की चुनाव व्यवस्था और राजनीतिक दलों की मुफ्त घोषणाओं पर यह सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण और गंभीर तंज है.

रहस्यमय निंद्रा में चुनाव आयोग

लंबे समय से देश में चुनाव आयोग मतदाताओं को लुभाने के लिए राजनीतिक दलों द्वारा की जा रही घोषणाओं पर एक तरह से चुप्पी साथ कर बैठा हुआ है. लोकसभा हो या विधानसभा चुनाव उसे निष्पक्ष संपन्न करवाने की जिम्मेदारी देश के संविधान ने चुनाव आयोग को सौंपी है और यह चुनाव आयोग  केंद्र सरकार की मुट्ठी में रहा है. ऐसे में राजनीतिक दलों के द्वारा किए जा रहे असंसदीय व्यवहार और कानून की दृष्टि से गलत सलत व्यवहार को देखते हुए भी  अनदेखा करता रहा है. अन्यथा लगभग 40 वर्ष पूर्व शुरू हुए मतदाताओं को लुभाने के प्रयासों पर प्रारंभ में ही अंकुश लगाया जा सकता था.

दक्षिण के बड़े नेता अन्नादुरई ने बहुत सस्ते में मतदाताओं को चावल देने की घोषणा के साथ यह चुनावी प्रलोभन की यात्रा शुरू हुई है, जिसके बाद एन टी रामाराव ने आंध्र प्रदेश में इसे आगे बढ़ाया.

वर्तमान में उत्तर प्रदेश चुनाव में जो अपने सबाब पर है अखिलेश यादव ने मतदाताओं को लुभाने के लिए घोषणाओं की झड़ी लगा दी है अगर हमारी सरकार आई तो हम यह देंगे वह देंगे इसी तरह कांग्रेस की चुनाव कमान संभालने वाली प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी उत्तर प्रदेश चुनाव में मतदाताओं को कांग्रेस की सरकार बनने पर बहुत कुछ फ्री में देने का ऐलान कर दिया है.

पंजाब में कांग्रेस के नवजोत सिंह सिद्धू ने भी पीछे मुड़कर नहीं देखा और फ्री में बहुत कुछ देने की योजनाएं जारी कर दी हैं. अब यह रोग देश भर में महारोग बन चुका है. यही कारण है कि उच्चतम न्यायालय ने इसे गंभीरता से लिया है.

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आपको यह बताते चलें कि चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों के साथ एक बैठक कर उनसे उनके विचार जानना चाहा था और फिर यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया था. उच्चतम न्यायालय में मतदाताओं को प्रलोभन वाली यह याचिका भाजपा नेता और वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने दायर की है. याचिका में कहा गया है कि राजनीतिक दलों के चुनाव के समय मुफ्त चीजें देने की घोषणाएं मतदाताओं को अनुचित रूप से प्रभावित करती हैं. इससे चुनाव प्रक्रिया भी प्रभावित होती है और यह निष्पक्ष चुनाव के लिए ठीक नहीं है.

पीठ ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के सुब्रह्मण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु सरकार मामले के एक पुराने फैसले का भी उल्लेख किया. उसमें अदालत ने कहा था कि चुनावी घोषणा पत्र में किए गए वादों को जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 123 के तहत भ्रष्ट आचरण के रूप में नहीं माना जा सकता है. इस बारे में अदालत ने चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों के परामर्श से आदर्श आचार संहिता में शामिल करने की सलाह दी थी. याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ वकील  ने दलील दी कि इस मामले में केंद्र सरकार से हलफनामा तलब करना चाहिए. राजनीतिक दल किसके पैसे के बल पर रेवड़ियां बांटने के वादे कर रहे हैं.  राजनीतिक दल मुफ्त उपहार की पेशकश कर रहे हैं.हर पार्टी एक ही काम कर रही है. इस पर न्यायमूर्ति रमण ने उन्हें टोका और पूछा कि अगर हर पार्टी एक ही काम कर रही है तो आपने अपने हलफनामे में केवल दो पार्टियों का ही नाम क्यों लिया है. जवाब में वकील साहब ने कहा कि वे पार्टी का नाम नहीं लेना चाहते. पीठ में शामिल न्यायमूर्ति हिमा कोहली ने उनसे पूछा कि आपके बयानों में काफी कुछ स्पष्ट है. याचिकाकर्ता के वकील का सुझाव था कि इस तरह की गतिविधि में लिप्त पार्टी को मान्यता नहीं देनी चाहिए.

अब देखिए आगे क्या होता है क्या उच्चतम न्यायालय यह इस कदम से देश में आने वाले चुनाव में लोभ प्रलोभन का खेल बंद होगा या फिर यह बढ़ता ही चला जाएगा.

घर पर यूं बनाएं पालक जूस और ओट्स रवा पालक ढोकला

Writer- डाक्टर साधना वैश, वैज्ञानिक, गृह विज्ञान और डा. जितेंद्र सिंह, वैज्ञानिक, फसल उत्पादन

सर्दी के मौसम में लोग ज्यादातर पालक खाना पसंद करते हैं. ऐसे में लोग पालक के कई तरह के फूड बनाकर खाना पसंद करते हैं. आज आपको पालक ढोकला और पालक जूस की रेसिपी के बारे में बताएंगे.

  1. पालक ढोकला

रवा पालक ढोकला बनाने की सामग्री :

50 ग्राम ओट्स पाउडर

100 ग्राम रवा

100 ग्राम दही

हरी मिर्च

नमक स्वाद के अनुसार

रवा पालक ढोकला बनाने की विधि : आधा कप पानी डाल कर अच्छी तरह मिक्स कर लीजिए. उस के बाद

15 मिनट के लिए रख दीजिए. उस में पालक और 2 चम्मच पानी डाल कर अच्छी तरह से मिला लीजिए और इतना पानी मिलाइए कि मिश्रण गाढ़ा हो. स्टीम करने से तुरंत पहले बाउल में थोड़ा सा लगभग एक चुटकी ईनो पाउडर डाल दीजिए. जब यह फुल जाए, तो एक कड़ाही में या भगोने में थोड़ा पानी डालिए. उस के ऊपर कोई कटोरी रख कर एक छोटे से कटोरे में या किसी छोटे भगोने में तेल लगा कर इस मिश्रण को डाल दीजिए.

15 मिनट के बाद देखेंगे कि मिश्रण फूल कर डबल हो जाएगा और हमारा ढोकला तैयार हो जाएगा. ढोकले की पहचान करने के लिए उस में चाकू की सहायता से छेद कर के देखेंगे. अगर चाकू चिपकता नहीं है, तो समझें कि ढोकला तैयार हो गया है.

ढोकले को हरी मिर्च की चटनी के साथ सुबह के नाश्ते में सर्व करें. यह तेलरहित पोषक नाश्ता बहुत ही लाभकारी है.

2. पालक का जूस

पालक का जूस बनाने के लिए जरूरी सामग्री

पालक 100 ग्राम

खीरा एक

पुदीना 8-10 पत्तियां

काली मिर्च पाउडर एक चुटकी

नमक स्वाद के अनुसार

नीबू आधा

पालक का जूस बनाने की विधि

पालक को महीनमहीन काट लें और खीरे को भी महीनमहीन काट कर मिक्सी में पीसने के लिए डाल दें. इस में पुदीना भी मिला दें. जब यह फेस तैयार हो जाए, तो इस को जार से निकाल कर छान लें. इस पदार्थ में 2 गिलास पानी मिलाएं. नमक और काली मिर्च को

सर्व करने के पहले मिला दें और ऊपर से नीबू स्वाद के अनुसार मिला लें. यह जूस रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए बहुत ही कारगर है.

रबी फसलों को पाले से बचाएं

Writer- डा. शैलेंद्र सिंह

आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या द्वारा  संचालित कृषि विज्ञान केंद्र, बेलीपार, गोरखपुर के पादप सुरक्षा वैज्ञानिक डा. शैलेंद्र सिंह ने किसानों को सलाह देते हुए बताया कि दिसंबर से जनवरी माह में पाला पड़ने की संभावना अधिक होती है, जिस से फसलों को काफी नुकसान होता है.

उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि जिस दिन ठंड अधिक हो, शाम को हवा का चलना रुक जाए, रात में आकाश साफ हो व आर्द्रता प्रतिशत अधिक हो, तो उस रात पाला पड़ने की संभावना सब से अधिक होती है. दिन के समय सूरज की गरमी से धरती गरम हो जाती है, जमीन से यह गरमी विकिरण के द्वारा वातावरण में स्थानांतरित हो जाती है, जिस के कारण जमीन को गरमी नहीं मिल पाती है और रात में आसपास के वातावरण का तापमान कई बार जीरो डिगरी सैंटीग्रेड या इस से नीचे चला जाता है.

ऐसी दशा में ओस की बूंदें/जल वाष्प बिना द्रव रूप में बदले सीधे ही सूक्ष्म हिमकणों में बदल जाती हैं. इसे ही ‘पाला’ कहते हैं.

पाला पड़ने से पौधों की कोशिकाओं के रिक्त स्थानों में उपलब्ध जलीय घोल ठोस बर्फ में बदल जाता है, जिस का घनत्व अधिक होने के कारण पौधों की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और रंध्रावकाश नष्ट हो जाते हैं. इस के कारण कार्बन डाईऔक्साइड, औक्सीजन, वाष्प उत्सर्जन व अन्य दैहिक क्रियाओं की विनिमय प्रक्रिया में बाधा पड़ती है, जिस से पौधा नष्ट हो जाता है.

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उन्होंने यह भी कहा कि पाला पड़ने से पत्तियां व फूल मुर झा जाते हैं और  झुलस कर बदरंग हो जाते हैं. दाने छोटे बनते हैं. फूल  झड़ जाते हैं. उत्पादन अधिक प्रभावित होता है.

पाला पड़ने से आलू, टमाटर, मटर, मसूर, सरसों, बैगन, अलसी, जीरा, अरहर, धनिया, पपीता, आम व अन्य नवरोपित फसलें अधिक प्रभावित होती हैं. पाले की तीव्रता अधिक होने पर गेहूं, जौ, गन्ना आदि फसलें भी इस की चपेट में आ जाती हैं.

पाले से बचाव के तरीके

* खेतों की मेंड़ों पर घासफूस जला कर धुआं करें. ऐसा करने से फसलों के आसपास का वातावरण गरम हो जाता है. पाले के प्रभाव से फसलें बच जाती हैं.

* पाले से बचाव के लिए किसान फसलों में सिंचाई करें. सिंचाई करने से फसलों पर पाले का प्रभाव नहीं पड़ता है.

* पाले के समय 2 लोग सुबह के समय एक रस्सी के दोनों सिरों को पकड़ कर खेत के एक कोने से दूसरे कोने तक फसल को हिलाते रहें, जिस से फसल पर पड़ी हुई ओस गिर जाती है और फसल पाले से बच जाती है.

* यदि किसान नर्सरी तैयार कर रहे हैं, तो उस को घासफूस की टाटिया बना कर अथवा प्लास्टिक से ढकें. ध्यान रहे कि दक्षिणपूर्व भाग खुला रखें, ताकि सुबह और दोपहर में धूप मिलती रहे.

* पाले से दीर्घकालिक बचाव के लिए उत्तरपश्चिम मेंड़ पर और बीचबीच में उचित स्थान पर वायुरोधक पेड़ जैसे शीशम, बबूल, खेजड़ी, शहतूत, आम व जामुन आदि को लगाएं, तो सर्दियों में पाले से फसलों को बचाया जा सकता है.

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* यदि किसान फसलों पर कुनकुने पानी का छिड़काव करते हैं, तो फसलें पाले से बच जाती हैं.

* पाले से बचाव के लिए किसानों को पाला पड़ने के दिनों में यूरिया की 20 ग्राम प्रति लिटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए अथवा थायोयूरिया की 500 ग्राम मात्रा को 1,000 लिटर पानी में घोल कर

15-15 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें अथवा 8 से 10 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से भुरकाव करें अथवा घुलनशील सल्फर

80 फीसदी डब्लूडीजी की 40 ग्राम मात्रा को प्रति 15 लिटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव किया जा सकता है.

* ऐसा करने से पौधों की कोशिकाओं में उपस्थित जीवद्रव्य का तापमान बढ़ जाता है और वह जमने नहीं पाता है. इस तरह फसलें पाले से बच जाती हैं.

* फसलों को पाले से बचाव के लिए म्यूरेट औफ पोटाश की 15 ग्राम मात्रा प्रति

15 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव कर

सकते हैं.

* फसलों को पाले से बचाने के लिए ग्लूकोज 25 ग्राम प्रति 15 लिटर पानी की दर से घोल बना कर किसान अपने खेतों में छिड़काव करें.

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* फसलों को पाले से बचाव के लिए एनपीके 100 ग्राम व 25 ग्राम एग्रोमीन प्रति

15 लिटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव किया जा सकता है.

अधिक जानकारी के लिए कृषि विज्ञान केंद्र, बेलीपार, गोरखपुर के वैज्ञानिकों से संपर्क करें या पादप सुरक्षा वैज्ञानिक डा. शैलेंद्र सिंह के मोबाइल नंबर 9795160389 पर संपर्क करें.

कही अनकही: भाग 2- तन्वी की हरकतों से मां क्यों परेशान थी

Writer- Reeta Kumari

तन्वी की रूखी और कठोर वाणी से मैं तिलमिला उठी, थोड़ी देर को रुकी, फिर अपने कमरे में वापस लौट गई. फ्रिज से सूप निकाल कर गरम कर बे्रड के साथ खाने बैठी तो मुझे तन्वी का मुरझाया चेहरा याद आ गया. सोचा, पता नहीं उस ने कुछ खाया भी है या नहीं. सूप लिए हुए एक बार फिर मैं उस के पास जा पहुंची.

‘‘तुम्हें शायद मेरा यहां आना पसंद न हो, फिर भी मैं थोड़ा सा गरम सूप लाई हूं, पी लो.’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं…’’ तन्वी धीरे से बोली और सूप पीने लगी. सूप समाप्त करने के बाद, उस के चेहरे पर बच्चों जैसी एक तृप्ति भरी मासूम मुसकान दौड़ गई.

‘‘थैंक्स… मिसेज मीनू, सूप बहुत ही अच्छा बना था.’’

अब मुझ से रहा नहीं गया सो बोली, ‘‘कम से कम मेरी उम्र का लिहाज कर. तुम मुझे आंटी तो कह ही सकती हो.’’

उस की शांत और मासूम आंखों में फिर से वही विद्रोही झलक कौंध उठी.

‘‘मैं किसी रिश्ते में विश्वास नहीं करती इसलिए किसी को भी अपने साथ रिश्तों में जोड़ने की कोशिश नहीं करती.’’

उस की कुटिल हंसी ने उस की सारी मासूमियत को पल में धोपोंछ कर बहा दिया.

मैं भी उस का सामना करने के लिए पहले से ही तैयार थी.

‘‘हर बात को भौतिकता से जोड़ने वाले नई पीढ़ी के तुम लोग क्या जानो कि आदमी के लिए जिंदगी में रिश्तों की क्या अहमियत होती है. अरे, रिश्ता तो कच्चे धागे से बंधा प्यार का वह बंधन है जिस के लिए लोग कभीकभी अपने सारे सुख ही नहीं, अपनी जिंदगी तक कुरबान कर देते हैं.’’

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तभी नेहाजी आ गईं और मैं उन्हें संक्षेप में तन्वी के बीमार होने की बात बता कर लौट आई. इस घटना के करीब 2 दिन बाद मैं बैठी सूखे कपड़ों की तह लगा रही थी कि अचानक तन्वी मेरे सामने आ खड़ी हुई. वह सारे संकोच त्याग सहज ही मुसकराते हुए मेरे बगल में आ बैठी. उस लड़की की सारी उद्दंडता जाने कहां गुम हो गई थी. उस का सहज व्यवहार मुझे भी सहज बना गया.

‘‘कहो तन्वी, आज तुम्हें मेरी याद कैसे आ गई?’’

वह थोड़ी देर चुपचाप बैठी रही जैसे अपने अंदर बोलने का साहस जुटा रही हो, फिर बोली, ‘‘आंटी, मैं अपनी उस दिन की उद्दंडता के लिए आप से माफी मांगने आई हूं. आप ने ठीक ही कहा था कि मुझे किसी भी रिश्ते की अहमियत नहीं मालूम. जिंदगी में किसी ने पहली बार निस्वार्थ भाव से मेरी देखभाल की, मेरा खयाल रखा पर मैं ने उस प्यार और ममता के बंधन को भी स्वयं ही नकार दिया. सचमुच, आंटी मैं बहुत बुरी हूं.’’

‘‘तन्वी बेटा, तुम ने तो मेरी बातों को दिल से ही लगा लिया. तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हारे जैसे मासूम बच्चों की बातों का बुरा नहीं मानती.’’

‘‘सच, आंटी, मैं आप को खोना नहीं चाहती,’’ और खुशी से किलकते हुए उस ने अपनी दोनों बांहें मेरे गले में डाल दीं. आज पहली बार तन्वी मुझे बेहद निरीह लगी.

‘‘एक बात बता, तू ने अपने पास इतने सारे विषबाण कहां से जमा कर रखे हैं. जब चाहा, जिस पर जी चाहा, तड़ से चला दिया.’’

वह खिलखिला कर हंस पड़ी. फिर कुछ गंभीर होती हुई बोली, ‘‘हां, आंटी, आज मैं भी आप से वे सारी कहीअनकही बातें कहना चाहती हूं जिन्हें आज तक मैं किसी के सामने नहीं कह पाई.

‘‘शायद आप को पता नहीं, मेरे मम्मीपापा ने अपने सारे रिश्तेनाते तोड़ प्रेमविवाह किया था. पहले दोनों एक ही आफिस में काम करते थे. पापा की अपेक्षा मम्मी शुरू से ही ज्यादा जहीन, मेहनती और योग्य थीं. इसलिए उन की शीघ्रता से पदोन्नति होती गई. वहीं पापा की पदोन्नति काफी धीमी गति से होती रही थी. पदों के बीच बढ़ती दूरियों ने दोनों को पतिपत्नी से प्रतिस्पर्द्धी बना दिया. धीरेधीरे मम्मीपापा के बीच तनाव बढ़ता गया. उसी तनाव भरे माहौल में मेरा जन्म हुआ.

‘‘मेरा जन्म भी दोनों की महत्त्वा- कांक्षाओं पर अंकुश नहीं लगा सका. वे पहले की तरह अपनीअपनी नौकरियों में व्यस्त रहते. मेरा पालनपोषण आयाओं के सहारे हो रहा था. जब मैं बीमार पड़ती तो मम्मी व पापा में इस बात पर जंग छिड़ जाती कि छुट्टियां कौन लेगा. दोनों में से किसी के पास मेरे लिए टाइम नहीं था. बीमार अवस्था में भी मुझे आया या फिर डाक्टरों के क्लीनिक में नर्सों के सहारे रहना पड़ता.

‘‘मम्मी के अतिव्यस्त रहने के कारण उन के द्वारा रखी गई आया मुझे तरहतरह से प्रताडि़त करती. ख्याति, यश और वैभव की कामना ने मम्मी को अंधा और बहरा बना रखा था. अपनी बेटी की अंतर्वेदना उन्हें सुनाई नहीं देती थी. मैं आयाओं के व्यवहार से क्रोध, विवशता और झुंझलाहट से पागल सी हो जाती. धीरेधीरे जीवन को अपनाने और संसार में घुलमिल जाने की चेष्टा घटती चली गई और मैं अपनेआप में सिमट कर रह गई, जिस ने मुझे असामाजिक बना दिया.

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‘‘मेरी स्थिति से बेखबर मेरे मातापिता लड़तेझगड़ते एक दिन अलग हो गए. बिना किसी दर्द के पापा मुझे छोड़ कर चले गए. मम्मी की मजबूरी थी, उन्हें मुझे झेलना ही था. मैं एक आश्रिता थी, आश्रयदाता पापा हैं कि मम्मी, मुझे कोई अंतर नहीं पड़ता था. निरर्थक, उद्देश्यहीन मेहनत ने मुझे पढ़ाई में भी सफल नहीं होने दिया. यही मेरे भटकाव की पहली सीढ़ी थी.’’

तन्वी थोड़ी देर को रुकी. वह उठी और बड़े अधिकार से फ्रिज को खोला. उस में से बोतल निकाल कर पानी पिया, फिर बोतल को एक तरफ रखते हुए मेरे पास आ कर बैठ गई और बोलने लगी :

चूक गया अर्जुन का निशाना: भाग 5

अर्जुन ने स्पष्ट कहा कि अगर वह उस की बन कर रहेगी तो वह उसे रानी बना कर रखेगा. उस की सारी दौलत उसी की होगी.

दोनों को ही एकदूसरे की जरूरत थी. अर्जुन के पास देह के साथ दौलत भी थी, इसलिए सविता ने हामी भर दी थी. फिर क्या था, दोनों पतिपत्नी की तरह रहने लगे. इस का परिणाम यह निकला कि सविता गर्भवती हो गई. यह एक तरह का पाप ही था, जो सविता की कोख में आ गया था.

अगर यह पाप उजागर होता तो अर्जुन गांव में ही नहीं, पूरी बिरादरी में मुंह दिखाने लायक न रहता. दोनों का जीना हराम हो जाता. इसलिए उन्होंने गांव छोड़ कर कहीं ऐसी जगह जा

कर रहने का निर्णय लिया, जहां उन्हें कोई न जानता हो.

इस के लिए उन्होंने ऐसी योजना बनाई, जिस में गांव का कोई आदमी उन पर शक न कर सके. कभी कोई उन की तलाश भी न करे.

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इस के लिए सविता ने दशहरा के दिन जब गांव के लोग रामलीला मैदान में रामलीला देखने में मग्न थे, तभी सविता ने गांव में कई दिनों से घूम रही एक पागल औरत की रात में सोते समय लोहे के भारी सरिए से सिर पर कई वार कर के हत्या कर दी. चूंकि उन की योजना में दिनेश को फंसाना भी शामिल था. इसलिए लाश का चेहरा एक पत्थर से कुचल कर उसे दिनेश के खेत की ओर जाने वाले रास्ते पर फेंक दिया.

बगल के खेत में दोनों छिप कर दिनेश के आने का इंतजार करने लगे. उन्हें दिनेश की हर गतिविधि का पता था ही, इसलिए वे उसी हिसाब से अपना सारा काम कर रहे थे. आधी रात के बाद जब दिनेश आया तो लाश देख कर वह दोस्तों को बुलाने उल्टे पैर भागा.

उसी बीच सविता और अर्जुन ने लाश उठाई और बगल के गांव मालपुर ले जा कर गांव के बाहर स्थित कुएं में डाल दी. सविता वहां से सीधे बड़ौदा जा कर वहां एक धर्मशाला में ठहर गई. वह तब तक उस धर्मशाला में छिपी रही, जब तक अर्जुन ने उस के रहने की ठीक से व्यवस्था नहीं कर दी.

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खंभाडि़या के उस गांव में अर्जुन ने जमीन खरीद कर मकान बनवाया और गुजरबसर के लिए किराने की दुकान खोल ली. समय पर सविता ने एक बेटी को जन्म दिया. पर वह बच नहीं सकी. अर्जुन के पास पैसा था ही, उस ने खेती की कुछ जमीन भी खरीद ली थी. दोनों आराम से रह रहे थे, पर उन का अपराध छिप नहीं सका और वे पकड़े गए. इस के बाद जो हुआ, आप ऊपर पढ़ ही चुके हैं.

अपना कारनामा बताते हुए जहां सविता जोरजोर से रोने लगी थी, वहीं अर्जुन का सिर शरम और ग्लानि से झुक गया था. अर्जुन ने अपने अपराध को छिपाने का निशाना तो बहुत सही लगाया था, पर उस का निशाना चूक गया और वह जेल पहुंच गया.

पूछताछ के बाद थाना भादरवा पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश कर उन के बयान कराए, जिस से आजीवन कारावास की सजा काट रहे निर्दोष दिनेश को जेल से रिहा कराया जा सके. थानाप्रभारी फौजदार सिंह ने दिनेश के निर्दोष

होने के सारे सबूत पेश कर उसे जेल से रिहा कराया.

दिनेश की रिहाई के कागज ले कर आए  कान्हा और करसन के साथ थानाप्रभारी फौजदार सिंह भी अहमदाबाद की साबरमती जेल के गेट पर खड़े थे. दिनेश जैसे ही जेल से बाहर आया, दौड़ कर दोस्तों के गले लग गया. फौजदार सिंह को वे तीनों उस समय त्रिदेव लग रहे थे.

(कहानी सत्य घटना पर आधारित है. कथा में पात्रों के नाम बदले हुए हैं)

तेजस्‍वी प्रकाश-करण कुंद्रा की रोमांटिक डेट, पपाराजी ने कहा- भैया-भाभी! देखें Video

‘बिग बॉस 15’ की विनर तेजस्‍वी प्रकाश (Tejasswi Prakash)  बिग बॉस हाउस में अपने लवलाइफ को लेकर भी सुर्खियों में छायी रही. शो खत्म होने के बाद भी तेजो और करण का प्यार चर्चे में है. फैंस भी इस कपल को काफी पसंद करते हैं.

करण कुंद्रा (Karan Kundrra) अपनी गर्लफ्रेंड की जीत से काफी खुश है. करण ने बिग बॉस विनर बेहद ही शानदार तरीके से वेलकम किया. बिति रात करण और तेजस्वी डिनर डेट पर भी गए थे. इससे जुड़ा एक वीडियो सामने आया है.

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फिनाले के बाद जहां दोनों ने पार्टी की. करण अपनी गर्लफ्रेंड तेजस्‍वी के घर पहुंच गए. फिर शाम को दोनों डिनर डेट पर निकल गए. सबसे दिलचस्प बात ये हुई कि वहां मौजूद पपाराजी ने फोटो क्लिक करते हुए, उन्‍हें ‘भैया-भाभी’ कह दिया. जिसके बाद दोनों की हंसी छूटने लगी.

 

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तेजस्‍वी और करण का रोमांटिक अंदाज भी देखने को मिला. दोनों हाथों में हाथ डाले नजर आए.  तेजस्‍वी ने पिंक कलर की ड्रेस पहन रखी थी, करण व्‍हाइट हुडी में थे.  इसी दौरान पपाराजी ने दोनों को साथ देखकर कहा- क्‍या बात है भैया भाभी के साथ.

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तेजस्वी प्रकाश और करण कुंद्रा की डिनर डेट की तस्वीरें और वीडियोज सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही हैं. डिनर के बाद भी जब पपाराजी ने दोनों को देखा तो करण से पूछा कि भाभी की फोटो लेनी है. तेजस्‍वी यह सुनकर मुस्‍कुराने लगीं.

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पति को छोड़ इस एक्टर को Kiss करती दिखीं Mouny Roy, देखें Video

बॉलीवुड एक्ट्रेस मौनी रॉय (Mouni Roy) अपनी शादी को लेकर सुर्खियों में छाई हुई हैं. कुछ दिन पहले ही मौनी ने अपने बॉयफ्रेंड सूरज नांबियार (Suraj Nambiar) के साथ सात फेरे लिए. इनकी शादी की फोटोज और वीडियोज सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है. अब मौनी रॉय का एक वीडियो सामने आया है जिसमें वह पति को छोड़ किसी और को किस करती हुई नजर आ रही हैं. आइए बताते हैं क्या है पूरा मामला.

शादी के बाद मौनी रॉय (Mouni Roy) का ये वीडियो गृह प्रवेश का है. इस वीडियो में वह अर्जुन बिजलानी के साथ नजर आ रही है. बता दें कि अर्जुन बिजलानी और मौनी बहुत अच्छे दोस्त हैं. वीडियो में मौनी रॉय, अर्जुन बिजलानी को हग करती नजर आ रही हैं.

 

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इसके बाद वह उनके गाल पर किस भी करती हैं. अर्जुन बोलते हैं, ये सिर्फ वीडियो है बुरा मत मानना है. आज गृह प्रवेश हो गया. मौनी कहती हैं कि अर्जुन मेरे सबसे बेस्ट फ्रेंड है. इसके बाद अर्जुन भी मौनी रॉय के गाल पर किस करते हैं. इंटरनेट पर ये वीडियो खूब वायरल हो रहा है.

 

अर्जुन, मौनी और सूरज की शादी में भी शामिल हुए थे. उन्होंने वेडिंग सेरेमनी में जमकर डांस किया था. आपको बता दें कि मौनी राय के पति सूरज एक इनवेस्टमेंट बैंकर हैं. सूरज एक बिजनेसमैन होने के साथ दुबई बेस्ड इंवेस्टमेंट बैंकर भी हैं.

 

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