प्राची ने मां से सवाल किया कि स्त्रियां स्वयं को हीन क्यों बना लेती हैं? फिर आगे कहा कि जीवन में आई हर विपदा को अपने क्रूर ग्रहों का कारण मान कर सदा कलपते रहना उचित तो नहीं है. बेटी के तर्कों पर मां ने भी तर्क पेश किए…
प्राची ने मां से सवाल किया कि स्त्रियां स्वयं को हीन क्यों बना लेती हैं? फिर आगे कहा कि जीवन में आई हर विपदा को अपने क्रूर ग्रहों का कारण मान कर सदा कलपते रहना उचित तो नहीं है. बेटी के तर्कों पर मां ने भी तर्क पेश किए…
दिल्ली सरकार ने 104 करोड़ रुपए खर्च कर के 75 तिरंगे झंडे 115 फुट ऊंचे खंबों पर लगवाए हैं और 500 इस तरह के झंडे लगवाने की योजना है. उद्देश्य है कि हर नागरिक को हर समय 2-3 झंडे दिखते रहे. वैसे तो देश भक्ति नागरिकों के मन में होने चाहिए पर जब किसी भी भक्ति को पागलपन की हद तक तो जाना हो तो उस का प्रदर्शन जरूर हो जाता है. अरङ्क्षवद केजरीवाल इन ऊंचे झंडों के माध्यम से देश प्रेम और देश व समाज के प्रति कर्तव्य नागरिकों के मन में जगा पाएं या नहीं पर अपना प्रचार जरूर कर लेंगे क्योंकि हर झंडे का उद्घाटन विधायक करता है और दिल्ली सरकार में आम आदमी पार्टी के विधायक तीन चौथाई से ज्यादा है.
झंडों से अगर देश भक्ति आती और देश व उस की जनता का कल्याण होता तो यह स्टंट स्वीकार्य होता पर दिक्कत है कि चाहे आप के सिर पर 36 फुट लंबा और 24 फुट चौड़ा झंडा लहरा रहा हो, आपके पैर के नीचे की सडक़ न उस से पक्की गड्डे मुक्त होगी, न साफ होगी, न नाली ढग की बनेगी, न देखने वालों के सही साफ हवा मिलेगी, न ट्रैफिक अनुशासन आएगा. तो फिर यह प्रतीकात्यक देश भक्ति किस काम की?
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हां, इतना लाभ जरूर है कि अब झंडों से ऊपर पौराणिक देवी देवताओं की मूॢतयां या उन के मंदिर कम दिखेंगे. यह लाभ होगा कि आप जहां हो वहां से आप को दानदक्षिणा लेने वाला मंदिर दिखे जरूरी नहीं रहेगा. राष्ट्रीय झंडा कम से कम जाति, धर्म के भेद तो बढ़ाएगा. भारतीय जनता पार्टी जो अपने देश का सारा पैसा विभाजन करने वाले और अपना भविष्य पूजापाठ पर सेंकने वाले मंदिरों, घाटों, तीर्थों पर लगा रही है. झंडों का जवाब देने में कुछ कठिनाई आएगी. यह नरेंद्र मोदी वाला मास्टर स्ट्रोक तो नहीं कर बहकाने की प्रतियोगिता में लगे नेताओं के प्रयासों में कम खर्चीला अवश्य है.
एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में इन दिनों शादी का सीजन चल रहा है. हाल ही में मौनी रॉय शादी के बंधन मे बंधी. अब एक्ट्रेस करिश्मा तन्ना (Karishma Tanna) अपने बॉयफ्रेंड वरुण बंगेरा के साथ शादी के बंधन में बंधने जा रही हैं. जी हां एक्ट्रेस की शादी की रस्में शुरू हो गई है. करिश्मा तन्ना की हल्दी सेरेमनी की फोटोज सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है. फैंस एक्ट्रेस को लगातार शुभकामनाएं दे रहे हैं.
करिश्मा तन्ना ने अपनी हल्दी सेरेमनी की तस्वीरें इंस्टाग्राम स्टोरी पर शेयर किया है. इन तस्वीरों में करिश्मा बेहद प्यारी लग रही है. हल्दी फंक्शन में एक्ट्रेस ने अपना लुक काफी सिंपल रखा है. उन्होंने व्हाइट कलर की फ्लावर ज्वैलरी पहनी है. उनके मंगेतर वरुण बंगेरा भी व्हाइट कलर के कुर्ते में नजर आ रहे हैं.
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हल्दी सेरेमनी से जुड़ा एक वीडियो सामने आया है. वह अपने होने वाले दूल्हे का बाल संवारती दिख रही हैं. करिश्मा एक्ट्रेस पांच फरवरी को शादी के बंधन में बंधेंगी.
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आपको बता दें कि वरुण बंगेरा पेशे से एक बिजनेसमैन हैं. दोनों की मुलाकात एक कॉमन फ्रेंड के जरिए हुई थी. तभी से दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ने लगी. और अब वो दोनों शादी के बंधन में बंधने जा रहे हैं. करिश्मा तन्ना नच बलिए, बिग बॉस 8, झलक दिखला जा जैसे बड़े रियलिटी शो का हिस्सा रही हैं. वह खतरों के खिलाड़ी 10 की विनर भी हैं.
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रूपाली गांगुली और सुधांशु पांडे स्टारर सीरियल ‘अनुपमा’ टीआरपी चार्ट में राज कर रहा है. शो के लेटेस्ट ट्रैक में हाईवोल्टेज ड्रामा चल रहा है. अनुज नहीं चाहता है मालविका वनराज के गंदे चालों में फंसे. मालविका ने वनराज से पार्टनरशिप तोड़ दी है. ऐसे में वनराज भी मालविका और अनुज के रिश्ते में जहर घोलेगा. आइए बताते हैं शो के नए एपिसोड के बारे में.
वनराज मालविका को भड़काएगा. वह उससे कहेगा कि उसने अपने भाई के कहने पर उससे पार्टनरशिप तोड़ दी. वनराज ये भी कहेगा कि अनुज मालविका का सगा भाई नहीं है. इसके बावजूद वह उसके लिए कुछ भी करने को तैयार है. वह याद दिलाएगा कि अनुज के कारण ही मालविका ने अपने माता-पिता को खो दिया.
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वनराज की बातें सुनकर मालविका चुप रह जाएगी तो दूसरी तरफ अनुज उससे थैंक्स कहेगा कि वह वनराज की बातों में नहीं आई. लेकिन इसके बाद मालविका अनुज से कहेगी कि तुमने हमेशा मेरी खुशियां छीनी हैं. चाहे वह अक्षय हो या फिर वनराज. शादी कराकर भी तुमने मेरे साथ गलत किया, लेकिन अब नहीं. ये सब बातें सुनकर अनुज दंग रह जाएगा.
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तो दूसरी तरफ वनराज खुश होगा. वनराज के पास मालविका का वाइस मैसेज आएगा. वह वनराज से सॉरी बोलेगी. वनराज मौके का फायदा उठाते हुए उससे कहेगा कि मेरे कारण तुम अपने भाई से मत लड़ना क्योंकि गलती उसकी नहीं बल्कि अनुपमा की है. वह हमारे खिलाफ उसे भड़काती है.
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ये बातें काव्या सुन लेगी. वह कहेगी कि वनराज हर एज ग्रुप की लड़कियों को ठग चुका है. उसे अपना काम निकालने के लिए 40 की अनुपमा, 33 काव्या और 30 की मुक्कू हर किसी को यूज करना आता है. इस बात पर वनराज कहेगा कि अपनी मंजिल पर जाने के लिए वह शाम, दाम, दंड, भेद सबका इस्तेमाल करेगा.
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शो में आप ये भी देखेंगे कि अनुपमा अपना बैग और पार्टनरशिप की फाइल लेकर अनुज के पास आएगी. वह कहेगी कि जिंदगी से दूर नहीं जा रही है लेकिन इस वक्त घर और पार्टनरशिप से दूर जाना बहुत जरूरी है. अनुपमा कहेगी कि वह भाई-बहन के बीच की कड़ी बनना चाहती थी ददार नहीं.
जिन चुनावों का परिणाम 10 मार्च को आना है उन के बारे में भविष्यवाणी करना ठीक नहीं है पर यह जरूर दिख रहा है कि पंजाब हो या उत्तर प्रदेश या उत्तराखंड या गोवा, भारतीय जनता पार्टी के पांव लडख़ड़ा रहे हैं. उत्तर प्रदेश चुनावों से ठीक पहले अमित शाह धूमधड़ाके से उत्तर प्रदेश पहुंचे और योगी आदित्यनाथ विष्ठ के दरकिनार करते हुए खुद ही प्रचार में और दूसरी पाॢटयों में तोडफ़ोड़ में लग गए पर वहां तो लोग भाजपा उम्मीदवारों को गांवों में घुसने तक नहीं दे रहे.
गांव में पश्चिमी बंगाल की तृणमूत्र कांग्रेस और दिल्ली की आम आदमी पार्टी ने अपनी ब्रांचें खोल कर भाजपा, कांग्रेस और स्थानीय पाॢटयों में खलबली मचाई पर कोई करिश्मा कर पाएंगी ऐसा नहीं लगता. पंजाब में कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री अमरींद्र ङ्क्षसह भारतीय जनता पार्टी की गोद में जा बैठे पर जो जना अपने को आज भी सम्राट समझ रहा हो, उस के बस के घरघर जा कर वोट मांगना महज चुनावी नाटक ही लगेगा. उत्तराखंड भी छुलमुल हो रहा है और जिसे कोई पार्टी टिकट नहीं देती वह तुरंत दूसरी पार्टी में पाया जाता है.
कुल मिला कर किसी पार्टी को अब भरोसा नहीं रह गया है कि 10 मार्च का परिणाम क्या होगा पर यह पक्का है कि भारतीय जनता पार्टी को कई धक्के लगेंगे. भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से अपना पौराणिकवाद चलाया है वह किसानों और छात्रों से मिले झटकों के बाद भी धीमा नहीं पड़ा है. भारतीय जनता पार्टी की बागडोर उन लोगों के हाथों में है जो सोचते ही नहीं जिन्हें विश्वास है कि उन्हें जन्म से दूसरों के सहारे राज करने का वरदान किया है. सदियों तक विदेशियों के गुलाम रहने पर भी गांवों शहरों में उन का सामाजिक राज बना रहा है और वे उसी को स्वर्ग मानते रहे हैं. 2014 में जीत को तो उन्होंने पौराणिक देवताओं के राज की वापसी मान ली थी और जनता को कहा कि पूजा करो, पाठ करो, तीर्थ जाओ, देश का विकास अपने आप हो जाएगा.
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पौराणिक कथाओं का युग कभी था या नहीं, उस का कोई साक्ष्य आज नहीं है सिवाए उन किताबों के जो पहले बोल कर रची गई और फिर पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई गई. बाद में जब उन्हें लिखा जाने लगा तो तरहतरह की कथाएं उन में घुस गई. आम जनता को कहा गया कि नहीं उन के पुरखे कह गए है या कर गए हैं. भाजपा इन कपोल कल्पित कहानियों के बल पर आज राज करना चाह रही है. ये कहानियां कुछ समय अच्छी लगती है पर जब पेट की आग लगती है, जब ठंड पड़ती है. जब बिमारी होती है, जब प्राकृतिक भर मानवीय आक्रमण होते हैं तो कहानियां निरर्थक हो जाती हैं. भाजपा 2014, 2019 और अब उन कहानियों और दूसरों के कामों के बल पर अगर जीतने का सपना देख रहे है तो कठिन लग रहा है. भारतीय जनता पार्टी की दशा तो उन पौराणिक ऋषिमुनियों की तरह है जो दस्युओं के जोर पकडऩे पर विष्णु इंद्र या आसपास के राज्य के पास त्राहिमाम, त्राहिमाम की गुदार लगाते रहे हैं.
मुकम्मल जहां तो आज तक किसी को भी नहीं मिला, कहीं कुछ कमी रह गई तो कहीं कुछ. तुम चाहो तो सारी उम्र गुजार लो, जितनी चाहो कोशिश कर लो…कभी यह दावा नहीं कर सकते कि सब पा लिया है तुम ने.
शुभा का नाम आते ही कितनी यादें मन में घुमड़ने लगीं. मुझे याद है कालेज के दिनों में मन में कितना जोश हुआ करता था. हर चीज के लिए मेरा लपक कर आगे बढ़ना शुभा को अच्छा नहीं लगता था. ठहराव था शुभा में. वह कहती भी थी :
‘जो हमारा है वह हमें मिलेगा जरूर. उसे कोई भी नहीं छीन सकता…और जो हमारा है ही नहीं…अगर नहीं मिल पाया तो कैसा गिलाशिकवा और क्यों रोनाधोना? जो मिला है उस का संतोष मनाना सीखो सीमा. जो खो गया उसे भूल जाओ. वे भी लोग हैं जो जूतों के लिए रोते हैं…उन का क्या जिन के पैर ही नहीं होते.’
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बड़ी हैरानी होती थी मुझे कि इतनी बड़ीबड़ी बातें वह कहां से सीखती थी. सीखती थी और उन पर अमल भी करती थी. सीखने को तो मैं भी सीखती थी परंतु अमल करना कभी नहीं सीखा.
‘अपनी खुशी को ऐसी गाड़ी मत बनाओ जो किसी दूसरी गाड़ी के पीछे लगी हो. जबजब सामने वाली गाड़ी अपनी रफ्तार बढ़ाए आप को भी बढ़ानी पड़े. जबजब वह ब्रेक लगाए आप को भी लगाना पड़े, नहीं तो टकरा जाने का खतरा. अपना ही रास्ता स्वयं क्यों नहीं बना लेते कि अपनी मरजी चलाई जा सके. आप की खुशियां किसी दूसरे के हावभाव और किसी अन्य की हरकतों पर निर्भर क्यों हों? आप के किसी रिश्तेदार या मित्र ने आप से प्यार से बात नहीं की तो आप दुखी हो गए. उस का ध्यान कहीं और होगा, हो सकता है उस ने आप को देखा ही न हो. आप ऐसा सोचो ही क्यों, कि उस ने आप को अनदेखा कर दिया है. क्या अपने आप को इतना बड़ा इंसान समझते हो कि हर आनेजाने वाला सलाम ठोकता ही जाए. अपने को इतना ज्यादा महत्त्व देते ही क्यों हो?’
‘आत्मसम्मान नाम की कोई चीज होती है न…क्या नहीं होती?’ मैं पूछती.
‘आत्मसम्मान तब तक आत्मसम्मान है जब तक वह अपनी सीमारेखा के अंदर है, जब वह सामने वाले को दबाने लगे, उस के आत्मसम्मान पर प्रहार करने लगे, तब वह अहम बन जाता है… व्यर्थ की अकड़ बन जाती है और जब दोनों पक्ष दुखी हो जाएं तब समझो आप ने अपनी सीमा पार कर ली. अपने मानसम्मान को अपने तक रखो, किसी दूसरे के गले का फंदा मत बनाओ, समझी न.’
‘कैसे भला?’
‘वह इस तरह कि मैं यह उम्मीद ही क्यों करूं कि तुम मेरी सारी बातें मान ही लो. जरूरी तो नहीं है न कि तुम वही करो जो मैं कहूं. मेरी अपनी सोच है, मेरी अपनी इच्छा है. ऐसा तो नहीं है न, कि मेरा ही कहा माना जाए. तुम मेरा कहा न मानो तो मेरा आत्मसम्मान ही ठेस खा जाए. तुम्हारा भी तो आत्मसम्मान है. तुम्हें सुनना पसंद है, मुझे नहीं. जरूरी तो नहीं कि तुम मेरी खुशी के लिए गजल सुनने लगो ‘हर इंसान का अपना शौक है. अपना स्वाद है. कुदरत ने सब को अलगअलग सांचे में ढाल कर उन का निर्माण किया है. कोई गोरा है, कोई काला है. कोई मोटा है कोई पतला. किसी पर सफेद रंग जंचता है किसी पर काला रंग. अपनीअपनी जगह सब उचित हैं, सब सुंदर हैं. सब का मानसम्मान आदरणीय है, सभी इंसान उचित व्यवहार के हकदार हैं.
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‘हम कौन हैं जो किसी को नकार दें या उसे अपने से कम या ज्यादा समझें? अपना सम्मान करो लेकिन दूसरे का सम्मान भी कम मत होने दो. अपनी मरजी चलाओ, लेकिन यह भी ध्यान रखो कि किसी और की मरजी में तो आप का दखल नहीं हो रहा है. सोचो जरा.’
‘आप की दोस्त थी न शुभा,’ मेरे देवर मुझ से पूछ रहे थे.
‘हमारे नए मैनेजर की पत्नी हैं. कल ही हम उन से मिले थे. बातों में बात निकली तो मेरे मुंह से निकल गया कि मेरी भाभी भी जम्मू की हैं. आप का नाम लिया तो इतनी खुश हो गईं कि मेरी बांह ही पकड़ ली. वे तो यह भी भूल गईं कि उन के पति मेरे अफसर हैं. आप को बहुत याद कर रही थीं. बड़ी सीधी सी महिला हैं…बड़ी ही सरल…मेरा पता ले लिया है. कह रही थीं कि जरा घर संभल जाए तो वे आप से मिलने आ जाएंगी.’
सोम शुभा के बारे में बता कर चले गए और मैं सोचने लगी कि क्या सचमुच शुभा मुझ से मिलने आएगी? जब मेरी शादी हुई तब उस के पिताजी का तबादला हो चुका था. मेरी शादी में वह आ नहीं पाई थी और जब उस की शादी हुई थी तो मैं अपने ससुराल में व्यस्त थी. कभीकभार उस की कोई खबर मिल जाती थी. मेरे पति सफल बिजनैसमैन हैं. नौकरी करना उन्हें पसंद नहीं. यह अलग बात है कि मेज के उस पार बैठने वाले की जरूरत उन्हें कदमकदम पर पड़ती है. मेरे देवर का बैंक में नौकरी करना उन्हें पसंद नहीं आया था. चाहते थे वे भी उन के साथ ही हाथ बंटाएं लेकिन देवर की स्पष्टवादिता भी कहीं न कहीं सही थी.
‘नहीं भाई साहब, वेतनभोगी इंसान को अपनी चादर का पता होता है. मैं अपनी चादर का छोटाबड़ा होना पसंद नहीं कर पाऊंगा.’
चादर से याद आया कि शुभा भी कुछ ऐसा ही कहा करती थी. चादर से बाहर पैर पसारना उसे भी पसंद नहीं आता था. मेरे देवर से उस की सोच मिलतीजुलती है. शायद इसीलिए उन्हें भी शुभा अच्छी लगी थी. मेरे पिताजी को भी शुभा बहुत पसंद थी. एक बार तो उन की इच्छा इतनी प्रबल हो गई थी कि उन्होंने शुभा को अपनी बहू बनाने का भी विचार किया था. मेरे भैया अमेरिका से आए थे शादी करने. हमारा घर शुभा के घर से बीस ही था. उन्नीस होते हुए भी शुभा ने मना कर दिया था.
‘अपने देश की मिट्टी छोड़ कर मैं अमेरिका क्यों जाऊं. क्या यहां रोटी नहीं है खाने को?’
‘जिंदगी एक बार मिलती है शुभा, उसे ऐशोआराम से काटना नहीं चाहोगी?’
‘यहां मुझे कोई कमी है क्या? मैं तो बहुत सुखी हूं. प्रकृति ने मेरे हिस्से में जो था, मुझे दे रखा है और वक्त आने पर कल भी मुझे वह सब मिलेगा जिस की मैं हकदार हूं. मैं कुदरत के विरुद्ध नहीं जाना चाहती. उस ने इस मिट्टी में भेजा है तो क्यों कहीं और जाऊं?’ शुभा का साफसाफ इनकार कर देना मुझे चुभ गया था. मेरा आत्म सम्मान, हमारे परिवार का आत्मसम्मान ही मानो छिन्नभिन्न हो गया था. भला, लड़की की क्या औकात जो मना कर दे. मुझे लगा था कि उस ने मेरा अपमान किया है, मेरे भाई का तिरस्कार किया है.
‘रिश्ता विचार मिला कर करना चाहिए, सीमा. समान विचारों वाले इंसान ही साथ रहें तो अच्छा है. सुखी तभी होंगे जब सोच एक जैसी होगी. विपरीत स्वभाव मात्र तनाव और अलगाव पैदा करता है. क्या तुम चाहोगी कि तुम्हारा भाई दुखी रहे? मैं वैसी नहीं हूं जैसा तुम्हारा भाई है. न मैं चैन से रह पाऊंगी न वही अपना जीवन चैन से बिता पाएगा.’
‘तुम हमारा अपमान कर रही हो, शुभा.’
‘इसे मान व अपमान का प्रश्न न बनाओ सीमा. तुम्हारा मान बचाने के लिए अपने जीवन की गाड़ी मैं तुम्हारी इच्छा के पीछे तो नहीं लगा सकती न. तुम्हारी खुशी के लिए क्या मैं अपने विचार बदल लूं.’
शुभा का समझाना सब व्यर्थ गया था. 15 साल हो गए उस बात को. उस प्रसंग के बाद जल्दी ही उस के पिता का तबादला हो गया था. अपनी शादी में मैं ने अनमने भाव से ही निमंत्रण भेज दिया था मगर वह आ नहीं पाई थी. उस के भी किसी नजदीकी रिश्तेदार की शादी थी. वह किस्सा जो तब समाप्त सा हो गया था, आज पुन: शुरू हो पाएगा या नहीं, मुझे नहीं पता…और अगर शुरू हो भी जाता है तो किस दिशा में जाएगा, कहा नहीं जा सकता.
वैचारिक मतभेद जो इतने साल पहले था वह और भी चौड़ा हो कर खाई का रूप ले चुका होगा या वक्त की मार से शून्य में विलीन हो चुका होगा, पहले से ही अंदाजा लगाना आसान नहीं था.
शुभा के बारे में हर पल मैं सोचती थी. अपनी हार को मैं भूल नहीं पाई थी जबकि शुभा भी गलत कहां थी. उस का अपना दृष्टिकोण था जिसे मैं ने ही मान- अपमान का प्रश्न बना लिया था. अपना पूरा जीवन, अपनी पसंद, मात्र मेरी खुशी के लिए वह दांव पर क्यों लगा देती. मैं तो किसी की पसंद का लाया रूमाल तक पसंद नहीं करती. अपने पति से बहुत प्यार है मुझे, लेकिन उन की लाई एक साड़ी मैं आज तक पहन नहीं पाई क्योंकि वह मुझे पसंद नहीं है.
सच कहती थी शुभा. एक सीमा के बाद हर इंसान की सिर्फ अपनी सीमा शुरू हो जाती है जिस का सम्मान सब को करना चाहिए, किसी को बदलने का हमें क्या अधिकार जब हम किसी के लिए जरा सा भी बदल नहीं सकते. हमारा स्वाभिमान अगर हमें बड़ा प्यारा है तो क्या किसी दूसरे का स्वाभिमान उसे प्यारा नहीं होगा. किसी ने अपनी इच्छा जाहिर कर दी तो हमें ऐसा क्यों लगा कि उस ने हमारे स्वाभिमान को ठोकर लगा दी.
‘‘भाभी, शुभाजी आप से मिलना चाहती हैं. फोन पर हैं. आप से बात करना चाहती हैं,’’ कुछ दिन बाद एक शाम मेरे देवर ने आवाज दी मुझे. महीना भर हो चुका था शुभा को मेरे शहर में आए. मेरे मन में उस से मिलने की इच्छा तो थी पर एक अकड़ ने रोक रखा था. चाहती थी वही पहल करे. नाराजगी तो मुझे थी न, मैं क्यों पहल करूं.
एक दंभ भी था कि मैं उस से कहीं ज्यादा अमीर हूं. मेरे पति उस से कहीं ज्यादा कमाते हैं. रुपयापैसा और अन्य नेमतों से मेरा घर भरा पड़ा है. पहले वही आए मेरे घर पर और मेरा वैभव देखे. वह मेरे भाई के बारे में जाने. उसे भी तो पता चले कि उस ने क्याक्या खो दिया है. बारबार पुकारा मेरे देवर ने. मैं ने हाथ के इशारे से संकेत कर दिया.
‘‘अभी व्यस्त हूं, बाद में बात करने को कह दो.’’
अवाक् था मेरा देवर. उस के अफसर की पत्नी का फोन था. क्या कहता वह. इस से पहले कि वह कोई उत्तर देता, शुभा ने ही फोन काट दिया. बुरा लगा होगा न शुभा को. उसे पीड़ा का आभास दिला कर अच्छा लगा था मुझे.
कुछ दिन और बीत गए. संयोग से एक शादी समारोह में जाना हुआ. गहनों से लदी मैं पति के साथ पहुंची. काफी लोग थे वहां. हम जैसों की अच्छीखासी भीड़ थी जिस में ‘उस की साड़ी मेरी साड़ी से सुंदर क्यों’ की तर्ज पर खासी जलन और नुमाइश थी. कहीं किसी की साड़ी ऐसी तो नहीं जो दूसरी बार पहनी गई हो. पोशाक को दोहरा कर पहनना गरीबी का संकेत होता है न हमारी सोसायटी में.
‘‘कैसी हो, सीमा? पहचाना मुझे?’’
किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा. चौंक कर मैं ने देखा तो सामने शुभा खड़ी थी. गुलाबी रेशमी साड़ी जिस की किनारी सुनहरी थी. गले में हलकी सी मटरमाला और हाथों में सोने की 4 चूडि़यां.
‘‘कैसी हो, सीमा? पहचाना नहीं क्या?’’
28 हजार की मेरी साड़ी थी और लाखों के थे मेरे शरीर पर जगमगाते हीरे. इन की चमक में मुझे अपनी गरीब सी दिखने वाली सहेली भला कहां नजर आती. थोड़ी सी मोटी भी हो गई थी शुभा. दर्प से अकड़ गई थी मेरी गर्दन.
‘‘आइए मैडम, मेरे साथ…’’
तभी श्रीमान ग्रोवर हमारे पास चले आए. शहर के करोड़पति आसामी हैं. उन का झुक कर शुभा का अभिवादन करना बड़ा अजीब सा लगा मुझे.
‘‘आइए, नवविवाहित जोड़े से मिलाऊं. आप शहर में नएनए आए हैं. जरा सी जानपहचान हो जाए.’’
‘‘पहले पुरानी पहचान से तो पहचान हो जाए. मेरी कालेज के जमाने की मित्र है. पहचान ही नहीं पा रही मुझे.’’
वही अंदाज था शुभा का. मैं जैसे उसे न पहचानने ही का उपक्रम कर रही थी.
‘‘जल्दी चलो शुभा, देर हो रही है. जल्दी से दूल्हादुलहन को शगुन दो. रात के 12 बज रहे हैं. घर पर बच्चे अकेले हैं.’’
एक बहुत ही सौम्य व्यक्ति ने पुकारा शुभा को. आत्मविश्वास से भरा था दोनों का ही स्वरूप. दोनों ठिठक कर मुझे निहारने लगे. अच्छा लग रहा था मुझे. मेरा उसे न पहचानना कितनी तकलीफ दे रहा होगा न शुभा को. इतने लोगों की भीड़ में कितना बुरा लग रहा होगा शुभा को. बड़ी गहरी नजरें थीं शुभा की. सब समझ गई होगी शायद. शायद मेरा हाथ पकड़ कर मुझे याद दिलाएगी और कहेगी :
‘सीमा, याद करो न, मैं शुभा हूं. जम्मू में हम साथसाथ थे न. मैं ने तुम्हारा मन दुखाया था…तुम्हारा कहा नहीं माना था. कैसे हैं तुम्हारे भैया. अभी भी अमेरिका में ही हैं या कहीं और चले गए?’
‘‘बरसों पहले खो दिया था मैं ने अपनी प्यारी सखी को…आज भी बहुत याद आती है. पता चला था इसी शहर में है. आप को देख कर उस का धोखा हो गया, सो बुला लिया. आप वह नहीं हैं… क्षमा कीजिएगा.’’
मुसकरा दी शुभा. एक रहस्यमयी मुसकान. हाथ जोड़ कर उस ने माफी मांगी और दोनों पतिपत्नी चले गए. स्तब्ध रह गई मैं. शुभा ने नजर भर कर न मुझे देखा, न मेरे गहनों को. सादी सी शुभा की नजरों में गहनोंकपड़ों की कीमत कल भी शून्य थी और आज भी. कल भी वह संतोष से भरी थी और आज भी उस का चेहरा संतोष से दमक रहा था. सोचा था, मैं उसे पीड़ा पहुंचा रही हूं, नहीं जानती थी कि वही मुझे नकार कर इस तरह चली जाएगी कि मैं ही पीडि़ता हो कर रह जाऊंगी.
सौजन्य: सत्यकथा
मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल में पन्ना जिला मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर
बड़खेरा गांव के पुरुषोत्तम की शादी की उम्र निकल चुकी थी. वह 33 साल का हो गया था. उस के पिता पंडित सुक्कन पटेरिया उस की शादी को ले कर बहुत चिंतित थे. वह खेतीबाड़ी का काम करते थे. चिंता का एक कारण और था कि बड़े बेटे पुरुषोत्तम की शादी नहीं हो पाने के कारण उस से छोटे 2 भाइयों की उम्र भी निकलती जा रही थी.
पुरुषोत्तम के लिए उस की मां और पिता दोनों ही बहुत परेशान रहते थे. वे रिश्तेदारों की मदद से पुरुषोत्तम के लिए लड़की तलाश कर थक चुके थे. इस वजह से पुरुषोत्तम भी मानसिक तनाव में रहने लगा था. उस की शादी नहीं हो पाने का एक कारण उस की पढ़ाई भी थी. वह कुल 10वीं जमात तक ही पढ़ा था. इसलिए उसे कोई लड़की ब्याहने को तैयार नहीं था. लौकडाउन से पहले मार्च 2020 की बात है. पुरुषोत्तम टीकमगढ़ जिले के टीला गांव में एक रिश्तेदार के यहां गया था. वहीं उस की मुलाकात गांव के मुन्ना तिवारी से हुई.
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उस ने बातचीत के दौरान मुन्ना तिवारी से कहा, ‘‘तिवारीजी, मेरे पिताजी मेरी शादी को ले कर परेशान रहते हैं. आप की नजर में कोई लड़की इधर हो तो बताइए.’’मुन्ना तिवारी ने छूटते ही कहा, ‘‘क्यों नहीं भाई, लगता है तुम्हारी मुराद पूरी हो गई है. देखो, मेरी एक रिश्तेदारी में भी 30 साल की युवती पूजा कुंवारी बैठी है. तुम कहो तो मैं बात उस से करूं?’’‘‘अरे तिवारीजी, इस में पूछने की क्या बाता है? आज ही बात करो न उस के पिता से.’’ पुरुषोत्तम चहकते हुए बोला.
‘‘उस के पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं. इसी वजह से तो उस की शादी नहीं हो पा रही है. मैं देखता हूं, अगर तुम्हारी बात बन जाए तो अच्छा रहेगा.’’ मुन्ना तिवारी ने कहा. ‘‘उस की मां से बात कर लो न!’’ पुरुषोत्तम ने सुझाव दिया. ‘‘नहींनहीं, उन से डायरेक्ट बात करना सही नहीं होगा. पहले किसी नजदीकी रिश्तेदार से उन तक बात पहुंचानी होगी. तुम्हारे बारे में चर्चा करवानी होगी. अब देखना है कि कौन रिश्तेदार उन के सामने तुम्हारे और परिवार के बारे में तारीफ के पुल बांध सके.’’ तिवारी ने समझाया.
‘‘जैसा तुम उचित समझो, लेकिन जो भी करो जल्दी करो,’’ पुरुषोत्तम उम्मीद के साथ बोला.
‘‘ठीक है, होली के बाद देखता हूं.’’ वह बोला.
जैसा मुन्ना तिवारी ने कहा था, वैसा ही किया. होली के दूसरे दिन ही वह पूजा और उस की बहन भागवती मिश्रा को ले कर सुक्कन पटेरिया के घर पहुंच गया. पुरुषोत्तम को आश्चर्य हुआ कि जिस युवती से उस की शादी की बात चलने वाली है, वह भी साथ आई थी. उस ने तिवारी की ओर आश्चर्य से देखा. तिवारी ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘शुभ काम में देरी नहीं करनी चाहिए.’’
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चायनाश्ते के बाद युवतयुवती को एक साथ बैठा दिया गया. उन्होंने एकदूसरे को सरसरी निगाह से देखापरखा. पुरुषोत्तम को गोरी, तीखे नाकनक्श वाली पूजा पहली ही नजर में भा गई.
पूजा की बहन भागवती ने भी पुरुषोत्तम को पसंद कर लिया. पूजा ने भी अपनी पसंद बहन को बता कर अपनी रजामंदी दे दी. दूसरी तरफ अपने बेटे की शादी का सपना संजोए सुक्कन की पत्नी ने घर आए मेहमानों का खूब स्वागतसत्कार किया. उस ने मेहमानों के लिए तरहतरह के पकवान बना कर परोसे.
सुक्कन की पत्नी खुशी के मारे फूली नहीं समा रही थी. उस ने पति से होने वाली बहू को शगुन दे कर जल्दी से रिश्ता तय कर लेने को कहा. फिर पतिपत्नी ने शगुन के तौर पर पूजा की गोद में नारियल, कपड़े, फल और मिठाई भेंट कर दिए. पुरुषोत्तम ने उसे अंगूठी पहना कर सगाई की रस्म अदा कर दी. साथ में कुछ पैसे भी रख दिए. सगाई की रस्म पूरा होने से पहले ही मुन्ना तिवारी ने पंडित सुक्कन पटेरिया को साफतौर पर बता दिया था कि पूजा के पिता जीवित नहीं हैं. उस के घर की माली हालत भी ठीक नहीं है, इसलिए शादी का खर्चा उन्हें ही उठाना पड़ेगा. सुक्कन लड़की वालों की हर शर्त मानने तैयार हो गया.
सगाई होते ही पुरुषोत्तम शादी के हसीन सपने संजोने लगा. जब से उस ने पूजा को देखा था, तभी से उस के मन में खुशियों के लड्डू फूटने लगे थे और वह उस के साथ जीवन की शुरुआत करने की योजनाएं बनाने लगा था.
रात को सोते समय पुरुषोत्तम अपनी होने वाली सुहागरात की कल्पना कर के खुश हो रहा था. फिल्मों की तरह उसे भी सपने में सुहागरात में गुलाब की पंखुडि़यों से सजी सेज पर बैठी लजातीशरमाती पूजा नजर आने लगी थी. इंतजार की घड़ी और निकट आ गई, लेकिन यह क्या अचानक कोरोना वायरस के कहर ने सभी को घरों में बंद कर दिया. सरकार ने लौकडाउन लगा दिया. पुरुषोत्तम एक बार फिर निराश हो गया. वह अपनी किस्मत को दोष देने लगा. खैर, उसे अनलौक की प्रक्रिया शुरू होने तक इंतजार करना पड़ा, जिस की शुरुआत मई 2020 में हुई. प्रशासन की तरफ से शादीविवाह के सार्वजनिक
व सामूहिक कार्यक्रमों में सीमित संख्या में लोगों के शामिल होने की अनुमति थी.
दोनों पक्षों की आपसी सहमति के बाद 29 मई, 2020 को शादी की तारीख तय हो गई. इसी में यह भी तय हुआ कि कम से कम मेहमानों को बुलाया जाएगा. पूजा और उस की बहन भागवती 28 मई को आशा दीक्षित के घर बड़खेरा गांव आ गए. आशा पुरुषोत्तम की बुआ थी. वहीं 29 मई को 10-12 लोगों की मौजूदगी में सामाजिक रीतिरिवाज के अनुसार पुरुषोत्तम और पूजा का विवाह संपन्न हो गया. सुक्कन पटेरिया ने अपनी बहू के लिए सोनेचांदी के जेवर दिए. विवाह के दूसरे दिन पूजा के साथ आई उस की बहन भागवती ने अपनी गरीबी का हवाला दे कर पुरुषोत्तम के पिता सुक्कन से 60 हजार रुपए मांगे. सुक्कन पटेरिया ने यह सोच कर सहज भाव से रुपए दे दिए कि होने वाली बहू के परिवार की मदद करने में क्या बुराई है.
पुरुषोत्तम की मां ने नईनवेली दुलहन का स्वागत पारिवारिक और सामाजिक रीतिरिवाज के साथ किया. घर में शादी के बाद की सारी रस्में चलती रहीं. पुरुषोत्तम को अपनी सुहागरात का बेसब्री से इंतजार था.
रात होते ही मेहमानों के सो जाने के बाद उस ने फिल्मी अंदाज में अपने फूलों से सजे कमरे में प्रवेश किया. सुहागसेज पर बैठी दुलहन का घूंघट हटा कर उस के हुस्न के तारीफों के पुल बांध दिए. किंतु अपने प्रेम प्रदर्शन के दौरान पुरुषोत्तम ने महसूस किया कि पूजा उस के प्रति रोमांचित नहीं थी. वह उस की तरह उमंग में नहीं थी.
हालांकि पुरुषोत्तम ने यह सोच कर पूजा के इस व्यवहार पर कोई ध्यान नहीं दिया कि शायद ऐसा शादी में थकान की वजह से हो. इसी तरह से लगातार 5 दिन निकल गए, लेकिन पूजा के रुख में बदलाव नहीं दिखा. उस के सुस्त और नीरस व्यवहार ने पुरुषोत्तम को आहत कर दिया था. शादी के बाद छठवीं रात पुरुषोत्तम पूजा की बेरुखी से परेशान हो कर चुपचाप सो गया. सुबह 5 बजे जैसे ही उस की नींद खुली, तो पाया कि पूजा बिस्तर पर नहीं है. कुछ देर तक उस का इंतजार किया. नहीं आने पर घर के दूसरे कमरे, बरामदे आदि के बाद बाथरूम में तलाश किया, लेकिन पूजा कहीं नहीं मिली.
उस के बाद बदहवास कमरे में आ कर बिछावन पर बैठ गया. जल्दी ही बैचनी की स्थिति में कमरे से निकल कर बाहर आया. इस बीच उस की मां जाग चुकी थी. उस ने मां से पूछा, ‘‘मां पूजा कहां है?’’
मां ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘क्यों कमरे में नहीं है क्या? बाथरूम में होगी.’’ जब पुरुषोत्तम ने अपनी मां को बताया कि पूजा घर में कहीं नहीं है, तब मांबेटे ने कमरे में जा कर देखा तो पाया कि पूजा का बैग और सूटकेस भी कमरे में नहीं था. उन्हें समझते देर नहीं लगी कि पूजा उस के जेवरात और नकदी ले कर फरार हो चुकी है.
अचानक उन के दिमाग में लुटेरी दुलहन की कहानी कौंध गई. दुलहन के गायब होने की खबर जंगल की आग की तरह फैल गई. गांव में इस तरह की यह पहली घटना थी. पुरुषोत्तम और उस के घर वालों की बदनामी होने लगी. पुरुषोत्तम को समझ आ गया था कि उस के साथ शादी के नाम पर ठगी हुई है.
सुक्कन के परिवार ने मान लिया था कि वे लुटेरी दुलहन गैंग के शिकार हो चुके हैं. परंतु लोकलाज के चलते चुप रहे. उन्होंने सोचा कि गांव में जब यह बात फैलेगी तो कोई इस परिवार को लड़की नहीं ब्याहेगा.
वे पुलिस और अदालती चक्कर में नहीं पड़ना चाहते थे. इसलिए चुपचाप नुकसान और अपमान का घूंट पी कर रह गए. पुलिस में शिकायत नहीं करने की यही गलती आगे चल कर पूरे परिवार की परेशानी का सबब बन गई. आए दिन लुटेरी गैंग की तरफ से पुरुषोत्तम और उस के घर वालों से रुपयों की मांग होने लगी. तभी उन्हें मालूम हुआ कि भागवती ही गैंग की सरगना है.
वह पुरुषोत्तम को फोन कर धमकाते हुए बारबार रुपए की मांग करने लगी. वह हमेशा परिवार को दहेज मांगने के जुर्म में केस करने की धमकी देने लगी. रोजरोज की इन धमकियों से तंग अकर पुरुषोत्तम 20 जून को गांव के सरपंच धीरेंद्र बाजपेई को साथ लेकर पन्ना के कोतवाली थाने गया. टीआई अरुण कुमार सोनी को पूरी बात बताई और इस साजिश की रिपोर्ट लिखाई. थानाप्रभारी अरुण कुमार सोनी ने शादी के नाम पर ठगी करने वाली घटना की सूचना अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दी. पन्ना जिले के एसपी धर्मराज मीणा ने इस घटना को गंभीरता से लिया और तत्काल आरोपियों की गिरफ्तारी के निर्देश दिए. कारण पिछले एक साल के दौरान पन्ना में झूठी शादी रचाने के नाम पर ठगी की कई घटनाएं हो चुकी थीं. इस का परदाफाश करना किसी चुनौती से कम नहीं था.
धर्मराज मीणा ने टीआई अरुण कुमार सोनी और एसआई सोनम शर्मा के साथ एक विशेष टीम का गठन कर लुटेरी दुलहन गैंग का परदाफाश करने की जिम्मेदारी सौंप दी. पुलिस टीम ने अपने मुखबिरों को भी सक्रिय कर दिया. 23 जून, 2021 को पुलिस को एक मुखबिर के जरिए सूचना मिली कि धाम मोहल्ला के एक मकान में कुछ लोग रुके हुए हैं. उन के बीच चोरी के माल के बंटवारे को ले कर विवाद चल रहा है. तत्काल पुलिस टीम ने धाम मोहल्ला में मुखबिर के बताए मकान में दबिश दी. वहां से 6 पुरुष और 2 महिलाओं को संदेह के आधार पर दबोच लिया गया.
थाने ला कर जब उन से पूछताछ की तो पता चला कि वे मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के लोग हैं और वह लुटेरी दुलहन के गैंग के हैं. उन्होंने यह भी बताया कि वे भोलेभाले लोगों के घर में शादी रचा कर पहले उन का विश्वास जीतते हैं, फिर पैसे, गहनों का पता चलने पर मौका पा कर भाग जाते हैं. पकड़ी गई महिलाओं से पूछताछ में यह भी पता चला कि वह लुटेरी दुलहन बन कर कई घटनाओं को सफलतापूर्वक अंजाम दे चुकी हैं. पुलिस पूछताछ में जो कहानी सामने आई, उसे सुन कर भ्रष्टाचार के वैसे कारनामे का भी खुलासा हुआ, जिसे सरकार काफी सुरक्षित मानती आई है. जैसे आधार कार्ड का बनाया जाना. यह जान कर पुलिस टीम भी हैरान रह गई.
गिरोह की मुख्य सरगना छतरपुर के बिल्हा गांव की भागवती ठाकुर उर्फ भग्गो थी, जो बारबार अपना सरनेम बदल लेती थी. लौकडाउन के पहले सभी रीवा में किराए के मकान में रहते थे. वहीं से भागवती के गिरोह के लोग मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के आसपास के जिलों में चोरियां करते थे. चोरी की घटनाओं को अंजाम देने के बाद उस के मन में शादी कर के भाग जाने का आइडिया आया. भागवती ने जिस पूजा नाम की युवती का रिश्ता पुरुषोत्तम से करवाया था, उस का वास्तविक नाम इंद्रा यादव निकला. पुरुषोत्तम को अपने जाल में फांसने के लिए उस ने इंद्रा को पूजा तिवारी के रूप में पेश किया था.
भागवती के बनाए प्लान के मुताबिक वह शादी के 5 दिन बाद जेवरात और नकदी ले कर घर से भाग गई थी. 30 साल की पूजा उर्फ इंद्रा यादव उत्तर प्रदेश के झांसी के रहने वाले स्वामी यादव की बेटी है. वह ऐसी 4 शादियां कर चुकी थी, जो समाजपरिवार की निगाह में मान्य थीं, लेकिन वह उस के लिए महज एक ढोंग ही था.गिरोह का एक सदस्य इसरार खान निवासी इटावा (उत्तर प्रदेश) लैपटाप और प्रिंटर की मदद से गिरोह में शामिल लोगों के नकली आधार कार्ड बनाने का काम करता था.
ये लोग शादी के लिए रिश्ता तय करते समय रिश्ते के हिसाब से अपनी जाति और नाम बदल लेते थे. आधार कार्ड में फोटो व नामपता देख कर किसी को इन पर शक भी नहीं होता था. उन्होंने 2015 में आई एक फिल्म ‘डौली की डोली’ से प्रेरणा ली थी. फिल्म असली अंदाज में डौली झूठी शादियां रचाती है. शादी की रात ही लड़के और उस के परिवार की कीमती चीजों को चुरा कर भाग जाती है.पन्ना पुलिस ने जिन लुटेरी दुलहनों को पकड़ा था, वे भी झूठी शादी रचा कर कुछ दिनों तक घर में रहती थीं और फिर मौका पा कर कीमती सामान ले कर रफूचक्कर हो जाती थीं.
पुलिस ने दोनों के साथ जिन 6 अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया, उस में आसिफ, कमलेश केवट, रम्मू, मुन्ना तिवारी, रामजी भी थे. सभी सदस्य अलगअलग भूमिकाएं निभाते थे. पुलिस ने उन के कब्जे से एक तमंचा, एक जीवित कारतूस, 5 किलोग्राम चांदी और करीब 160 ग्राम सोने के जेवरात, फरजी आधार कार्ड, एक लैपटाप, एक प्रिंटर सहित करीब 14 लाख 25 हजार रुपए का माल बरामद किया.यह गैंग पकड़े जाने से पहले तक बुंदेलखंड, सतना, दमोह, छतरपुर, रीवा, कटनी, उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में चोरी, ठगी की करीब 21 वारदातों को अंजाम दे चुका था.
पुलिस हिरासत में लिए गए लोगों से जब अन्य घटनाओं के संबंध में पूछताछ की गई तब उन्होंने पन्ना के 5, पवई के 7, सिमरिया के 6, अमानगंज के 2 और धरमपुर के एक मामले में शामिल होना कुबूल कर लिया. पुलिस ने सभी आरोपियों से पूछताछ करने के बाद कोर्ट के आदेश पर उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया.
लेखक- प्रेमलता यदु
अनु अपने ही घर में घुटन की शिकार थी और घर से भाग जाना चाहती थी. एक दिन जब उस ने रश्मि को इस की वजह बताई तो वह हैरान रह गई… ब्लैकबोर्डकी ओर टकटकी लगाए अनु अपनी ही दुनिया में खोई थी. तभी जूही उस की पीठ पर चपत लगाती हुई बोली, ‘‘क्यों घर नहीं चलना क्या और यह तू ब्लैकबोर्ड में आंखें गड़ाए क्या देख रही है? रश्मि मैम ने जो समझाया क्या वह हमारी क्लास की टौपर को समझ नहीं आया?’’ रश्मि मैम अपने छात्रों की चहेती और अपने स्कूल के सभी विद्यार्थियों के बीच सब से लोकप्रिय शिक्षिका थीं.
स्कूल की हर छात्रा उन की सुंदरता की कायल थी. रश्मि की सादगी और सौम्यता सभी को आकर्षित करती थी. रश्मि भी अपने विद्यार्थियों का खूब खयाल रखतीं खासकर अनु का, क्योंकि अनु की मां कनक उस की सहपाठी व अभिन्न सहेली थी. अनु के संग रश्मि का दोस्ताना व्यवहार था. जब भी अनु को कोई दुविधा होती और जो बात वह अपनी मां या अपनी सहेली जूही से नहीं कह पाती रश्मि से साझा करती. अनु जब अपनी मां कनक से नाराज होती तो सीधे रश्मि के घर आ जाती और जब गुस्सा शांत होता तभी घर वापस जाती. रश्झ्मि भी बड़े लाड़प्यार से उसे रखतीं. रश्मि के पति का देहांत हो चुका था और वे अकेली रहती थीं. इसलिए अनु के इस प्रकार आ कर रहने पर उन्हें कोई ऐतराज भी नहीं होता था. रश्मि बायोलौजी सब्जैक्ट और 10वीं क्लास की टीचर थीं. अनु और जूही दोनों रिश्म की ही क्लास की छात्राएं थीं. अनु थोड़ा हड़बड़ाती हुई बोली, ‘‘हां.’’ ‘‘अरे… क्या हां, तुझे घर नहीं चलना?’’ ‘‘हां चलना है, चल,’’ कहती हुई अनु ने अपना स्कूल बैग कंधे पर लटका लिया. अनु और जूही दोनों सहेलियां थीं.
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दोनों बचपन से साथ पढ़ रही थीं और आसपास ही रहती थीं. जूही को अनु की मां बहुत पसंद थीं और अनु को जूही की मां. जूही अकसर अनु से कहती, ‘‘हाय… अनु तेरी मम्मी कितनी खूबसूरत हैं. आंटी का वे औफ टौकिंग, आउट लुक कितना इंप्रैसिव है और आंटी वैस्टर्न ड्रैस में किसी मौडल से कम नहीं लगतीं और सब से बड़ी बात आंटी सैल्फ डिपैंड हैं.’’ यह सुनते ही अनु चिढ़ जाती, लेकिन कुछ नहीं कहती. घर पहुंच अनु अपना बैग एक ओर फेंकती हुई सोफे पर धड़ाम से बैठ गई. कनक अनु को स्कूल से आया देख बोली, ‘‘अरे आ गया मेरा बच्चा. कैसा रहा आज का दिन.’’ अनु कोई जवाब दिए बगैर यों ही पड़ी रही. कनक कई दिनों से महसूस कर रही थी, अनु काफी परेशान दिख रही है. उस का मन न पढ़ने में लग रहा है और न खानेपीने में, उसे खेलनेकूदने में भी रुचि नहीं रही. गुमसुम और उस से खिंची सी रहती है. कनक जब भी अनु के इस उदासी का कारण जानना चाहती,
वह बुरी तरह से बिगड़ जाती. इसलिए कनक इस वक्त अनु से कुछ पूछना मुनासिब न समझते हुए बोली, ‘‘अनु आज मेरा औफ था इसलिए मैं ने तुम्हारी पसंद की सब्जी कड़ाही पनीर बनाई है. चलो आ कर खा लो. शाम को संजय अंकल आने वाले हैं. तुम तैयार हो जाना हम घूमने चलेंगे और खाना भी बाहर खाएंगे ओके.’’ कनक का इतना कहना था कि अनु तमतमाती हुई पैर पटकती अपने कमरे में जा दरवाजा जोर से बंद कर लिया. कनन अपनी आंखों में पानी लिए कमरे के बाहर खड़ी रही. अनु के व्यवहार में आया परिवर्तन कनक के लिए पहेली बनता जा रहा था. वह कुछ समझ नहीं पा रही थी कि आखिर अनु ऐसा क्यों कर रही है. कनक को लगता अनु उम्र के उस पड़ाव से गुजर रही है, जहां शरीर में हो रहे हारमोन चेंज और शारीरिक संरचना में बदलाव होने लगता है. शायद यह उसी का परिणाम है, लेकिन ऐसा नहीं था. इस के अलावा कुछ और बात भी थी, जिस से कनक अनजान थी. अचानक अनु कमरे का दरवाजा खोल अपनी साइकिल की चाबी उठा यह कहती हुई बाहर निकल गई कि मैं रश्मि मैम के घर जा रही हूं. तेज पैडल मारती हुई वह रश्मि के घर जा पहुंची. धड़ाम से रश्मि के घर का दरवाजा खोल, सीधे अंदर आ गई.
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हौल का जो नजारा था उसे देख अनु सन्न रह गई. उस ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि वह रश्मि को कभी इस रूप में भी देखेगी. रश्मि मैम तो उस की रोल मौडल थीं. अनु को एकाएक इस प्रकार अंदर आया देख रश्मि असहज हो गई. फिर अपने बाल और साड़ी का पल्लू ठीक करती हुई बोलीं, ‘‘अरे अनु तुम इस वक्त, क्या हुआ? आओ.’’ ‘‘नहीं मैम मैं बाद में आती हूं शायद मैं गलत समय पर आ गई.’’ ‘‘नहींनहीं ऐसा कुछ नहीं है आओ बैठो. इन से मिलो ये हैं मेरे दोस्त जय गवर्नमैंट कालेज में कैमिस्ट्री के प्रोफैसर हैं. हमारी अगले महीने शादी.’’ अनु थोड़ी सकुचाती अभिवादन में सिर झुकाती हुई बैठ गई. ‘‘बोलो क्या बात है?’’ अनु चुप बैठी रही. यह देख जय उठ खड़ा हुआ और रश्मि को आलिंगन करते हुए बोला, ‘‘रश्मि, मैं चलता हूं फिर आऊंगा. रश्मि दरवाजे तक जय को छोड़ने गई. अनु को जय का इस प्रकार उस की रश्मि मैम को गले लगाना अच्छा नहीं लगा पर वह कर भी क्या सकती थी. जय के जाने के पश्चात रश्मि अनु के करीब जा बैठी और उस के सिर पर हाथ फेरती हुई बोलीं,
‘‘क्या हुआ अनु कहो क्या बात है?’’ रश्मि के इतना कहते ही अनु उन से लिपट कर रोती हुई कहने लगी, ‘‘मैम मैं घर से कहीं दूर भाग जाना चाहती हूं. मैं उस घर में नहीं रहना चाहती. मेरा उस घर में दम घुटता है,’’ अनु एक ही सांस में सब बोल गई. अनु से ये सब सुन रश्मि अवाक रह गईं. शांत करते हुए बोलीं, ‘‘अच्छा ठीक है पहले तुम ये पानी पीयो फिर बताओ क्या हुआ? तुम्हारी मम्मी ने तुम से कुछ कहा?’’ यह सुनते ही अनु उठ खड़ी हुई और चीखती हुई बोली, ‘‘नहीं… वे क्या कहेंगी. उन्हें तो बस अपने काम और खुद को सजानेसंवारने से फुरसत नहीं. उन की वजह से मुझे अपने पापा का प्यार नहीं मिला. मुझे उन से दूर रहना पड़ता है. मैं कोई बच्ची नहीं हूं कि मुझे कुछ समझ न आए. मैं सब समझती हूं वे… संजय अंकल और मम्मी के बीच में…’’ कहती हुई रुक गई. ‘‘यह क्या कह रही हो? तुम अपनी मां के लिए ऐसा कैसे कह सकती हो?’’ अनु झुंझलाती हुई बोली, ‘‘तो क्या कहूं?’’ अनु अब इतनी छोटी नहीं थी कि कुछ समझ न सके. लेकिन इतनी बड़ी भी नहीं कि सबकुछ समझ सके. उस के किशोर मन में कई सवाल उमड़घुमड़ रहे थे जिसे शांत करना अब जरूरी हो गया था.
इसलिए रश्मि प्यार से अनु को अपने समीप बैठाती हुई बोलीं, ‘‘पहले तुम अपने मन से यह गुस्सा, जहर और नफरत निकाल फेंको जो तुम ने अपने अंदर भर रखा है. ‘‘मैं जानती हूं अब तुम कोई बच्ची नहीं रही, बड़ी हो गई हो, इसलिए मैं जो कहने जा रही हूं उसे धैर्य से सुनना उस के बाद हम सोचेंगे कि तुम्हें घर से दूर भाग जाना चाहिए या नहीं. ‘‘तुम बताओ क्या तुम ने कभी अपने पापा की तसवीर के अलावा भी उन्हें देखा है? नहीं देखा है न. क्यों… नहीं देखा? क्या तुम्हारे पापा इस दुनिया में नहीं हैं? क्या तुम्हारी मम्मी ने तुम्हें कभी अपने पापा से मिलने या उन के पास जाने से रोका है? नहीं रोका न. क्या तुम्हारे पापा कभी खुद तुम से मिलने आए? नहीं आए न… क्यों नहीं आए? वे तो इसी शहर में रहते हैं.’’ अनु निरुत्तर चुपचाप सुनती रही. ‘‘अब जो मैं कहने जा रही हूं तुम बड़े ध्यान से सुनना. तुम्हारी मम्मी अपने स्कूल, कालेज के समय से ही सुंदर और स्वतंत्र विचारधारा की रही है. वह शादी से पहले भी जौब करती थी. तुम्हारे पापा ने तुम्हारी मम्मी से शादी उस की खूबसूरती और मौडर्ननैस पर फिदा हो कर की थी. ‘‘उस के बाद तुम्हारे पापा को तुम्हारी मां की वही खूबसूरती, मौडर्ननैस और उस का जौब पर जाना खलने लगा. वे चाहते थे कनक सबकुछ छोड़ घर बैठ जाए.
तुम्हारे पापा कनक को अपनी निजी संपत्ति समझने लगे थे. उस के साथ दुर्व्यवहार करने लगे और जब तुम्हारी मम्मी विरोध करने लगी तो इस बात को ले कर दोनों के बीच तनाव बढ़ता गया. ‘‘एक दिन जब तुम्हारी मम्मी औफिस में किसी काम की वजह से देर रात घर लौटी तो तुम्हारे पापा ने बगैर कारण जाने ही तुम्हारी मम्मी को घर से निकाल दिया और तुम्हें भी अपने साथ ले जाने को कह दिया, उस वक्त तुम केवल 1 महीने की थी. उस रात संजय ने ही तुम्हारी मम्मी और तुम्हें अपने घर में पनाह दी. ‘‘तुम्हारी मम्मी और संजय अच्छे दोस्त हैं. तुम्हारे पापा ने तो तुम लोगों को छोड़ कर दूसरी शादी कर ली और फिर कभी उन्होंने तुम लोगों की ओर मुड़ कर नहीं देखा. उस वक्त एक संजय ही था जो तुम्हारी मम्मी के साथ खड़ा था दुनिया की परवाह किए बगैर. अब तुम बताओ क्या गलत था?’’
‘‘इतना सब सुनने के बाद अनु ने अपने कान बंद कर लिए जिस पिता के लिए अब तक वह अपनी मां से नफरत करती आई थी आज सचाई जान कर उसे स्वयं के व्यवहार पर अफसोस होने लगा. फिर वह रश्मि से कहने लगी, ‘‘बस मैम मुझे और कुछ नहीं सुनना.’’ ‘‘नहीं अनु अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई है. मुझे तुम से अभी बहुत कुछ कहना है. तुम्हारी मम्मी क्यों सजसंवर नहीं सकती, क्योंकि तुम्हें अच्छा नहीं लगता या फिर इसलिए कि वह अपने पति के साथ नहीं रहती या फिर इसलिए कि तुम चाहती हो कि तुम्हारी मम्मी जूही की मम्मी की तरह लगे. क्या तुम्हारी मम्मी की अपनी कोई इच्छा या चाहत नहीं हो सकती? तुम्हारी मम्मी की तरह, मेरी तरह की इस दुनियां में न जाने कितनी ही औरतें होंगी, तो क्या उन सब को बाकी औरतों की तरह खुश रहने का अधिकार नहीं? ‘‘तुम्हारी मम्मी जब भी चाहती संजय से शादी कर सकती थी, लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया, क्योंकि उसे अपने सुख से ज्यादा तुम्हारी फिक्र थी. वह तुम्हें अपनेआप से ज्यादा प्यार करती है. ‘‘अनु अब तुम छोटी नहीं हो इसलिए अब जो मैं तुम से कहने जा रही हूं उसे तुम एक बेटी बन कर नहीं एक आम लड़की बन कर समझने की कोशिश करना जैसे खानापीना हमारे शरीर की जरूरत है वैसे ही एक और जरूरत हमारे शरीर की होती है जिसे काम कहते हैं और इस कामरूपी भूख को शांत करना भी उतना ही आवश्यक है जितना बाकियों को.
‘‘हर इंसान इस भूख की पूर्ति अपनी सुविधानुसार करता है और इस में न तो कुछ गलत है और न ही यह अपराध है. यह केवल हमारी सोच और देखने के नजरिए पर निर्भर करता है, क्योंकि यह हमारे शरीर की मांग है और यदि तुम्हारी मम्मी की यह मांग संजय पूरी करता है तो क्या गलत है? अब तक तो तुम यह भी समझ ही गई होगी कि मेरे और जय के बीच का संबंध क्या है.’’ यह सुनने के बाद अनु ने रश्मि से कहा, ‘‘मैम, क्या मुझे आप का मोबाइल मिलेगा.’’ रश्मि ने अपना मोबाइल अनु की ओर बढ़ा दिया. अनु ने नंबर डायल किया. उधर से फोन उठाते ही अनु बोली, ‘‘आई एम सौरी मम्मी. मैं घर आ रही हूं, आप तैयार रहना. हम शाम को घूमने चलेंगे और खाना भी बाहर ही खाएंगे.’’
‘‘भाईसाहब, आप फिर कभी आइएगा,’’ जया ने अशोक से कहा और उसे जाने का इस तरह इशारा किया, जिसे मेजर नहीं देख पाए.
अशोक चौंका भी और कुछ विचलित भी हुआ. जया फिर बोली, ‘‘आप कभी शाम को आइए.’’
‘‘आज की मुलाकात मजेदार नहीं रही,’’ मेजर ने कहा, ‘‘आप फिर
कभी आइए.’’
‘‘ऐसा ही करना परंतु जब भी आना फोन कर के आना,’’ जया ने जाने का इशारा करते हुए कहा. मेजर की नजरें बचा कर एक बार फिर जाने का इशारा किया.
अशोक उठ कर खड़ा हो गया.
‘‘ठीक है, मेरी इच्छा है कि तुम विद्या से जरूर मिलो. लेकिन वह बहुत व्यस्त रहती है. आजकल उस ने नर्सरी में सूरजमुखी के बीज बो रखे हैं.
‘‘यदि तुम फोन कर के आओगे तो अच्छा रहेगा.’’
‘‘फिर आना भाई,’’ जया ने लगभग अशोक को विदा करते हुए कहा.
मेजर विवेक से अशोक की यह पहली मुलाकात थी.
अगले दिन लावण्य अशोक से मिलने आई तो थोड़ा तल्खी से बोली, ‘‘यदि तुम्हें मेरे यहां आना था तो मु झे बता दिया होता.’’
‘‘सच बताऊं लावण्य, मु झे लगा कि तुम्हारे डैडी का जन्मदिन है, इसलिए उन से मिलने का यही सब से बढि़या मौका है. मैं ऐसे ही मौके की तलाश में था परंतु तुम कहां चली गई थीं? अपने डैडी के जन्मदिन पर तुम, तुम्हारी मम्मी और पापा घर में ही होंगे, यही सोच कर मैं गया था,’’ अशोक ने सफाई दी.
‘‘मेरे डैडी जन्मदिन नहीं मनाते,’’ लावण्य बोली, ‘‘सालों पहले मेरे डैडी के जन्मदिन पर एक बहुत ही दुखद घटना घट गई थी. यह तब की बात है, जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हो रहा था. जन्मदिन पर युद्ध क्षेत्र में बने कैंप में मेरे डैडी के नीचे के अफसर उन्हें जन्मदिन की बधाई देने आए थे. ब्रैड पर चीनी रख कर डैडी ने सब का मुंह मीठा कराया. सभी चाय पी रहे थे कि कैंप पर एक बम आ गिरा. उस में 4 अफसर और 20 सिपाही मारे गए थे. डैडी का भी एक पैर उसी बम विस्फोट में उड़ गया था. स्वयं के घायल होने से ज्यादा आघात उन्हें अपने साथियों की मौत का लगा था,’’ लावण्य ने यह बात बड़ी सरलता से कही थी परंतु उस का रंज, उस की संवेदना मेजर विवेक, उन की पत्नी और लावण्य के लिए कितना गहरा होगा, इस की कल्पना अशोक आसानी से कर सकता था.
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‘‘मु झे यह नहीं मालूम था लावण्य, नहीं तो मैं तुम्हारे घर कतई न जाता,’’ अशोक ने दुख व्यक्त किया. उस ने देखा कि लावण्य के चेहरे पर दुख की छाया स्पष्ट झलक रही थी. इसलिए उस ने उस छाया को हटाने के लिए कहा, ‘‘जीवन में जिस किसी के भी साथ इस तरह की दुखद घटना घटेगी, वह भला अपना जन्मदिन कैसे मना पाएगा. आई फील सौरी डियर… मैं ऐसा सोच भी नहीं सकता था,’’ कहते हुए अशोक लावण्य का हाथ थाम कर आगे बढ़ा.
लावण्य स्कौर्पियो जीप चलाती थी. अशोक लावण्य का हाथ थामे स्कौर्पियो के पास तक पहुंचा. फिर उसी में बैठ कर दोनों महरौली के एक रैस्टारैंट में गए, जहां एक कोने की मेज पर दोनों जा बैठे.
‘‘तुम्हारे डैडी तो मेरा नाम भी जानते हैं. वे जैसे ही कमरे में आए थे, मेरे दिल की धड़कन बढ़ गई थी. लेकिन उन्होंने तो मु झ से बड़े प्रेम से बात की. लगता है, तुम ने मेरी उन से खूब तारीफ की है.’’
‘‘हूं.’’ लावण्य बोली.
‘‘आई थिंक, मेरी उन पर अच्छी छाप पड़ी है. तुम ने क्या कहा था मेरे बारे में उन से?’’ अशोक ने पूछा.
‘‘वे तुम्हारी खूब तारीफ कर रहे थे.’’
‘‘रियली,’’ अशोक थोड़ा उत्साह से बोला, ‘‘बस एक बार तुम्हारी मम्मी से मिल लूं, फिर…’’
‘‘फिर क्या?’’ लावण्य चौंक कर बोली.
‘‘फिर क्या… बस…’’ अशोक हिचका. फिर वह एकाएक लावण्य का हाथ थाम कर बोला, ‘‘लावण्य, मैं तुम से शादी करना चाहता हूं. मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं. इसलिए मैं सोचता था कि तुम्हारे डैडी फौजी आदमी हैं, फिर पैसे वाले भी हैं. मैं उन्हें पसंद आऊंगा कि नहीं? इस के अलावा एक डर यह भी है कि तुम्हारे परिवार वाले मु झे स्वीकार करेंगे या नहीं?’’
‘‘तुम ने इस बारे में मेरी राय नहीं
ली अशोक?’’
‘‘तुम इनकार नहीं करोगी.’’
‘‘क्यों?’’
‘‘क्योंकि, मैं तुम्हारे अंदर तक देख सकता हूं. तुम्हारे मम्मीडैडी हां कर दें, यही मेरे लिए महत्त्वपूर्ण है परंतु तुम्हारी मम्मी से तो अभी मैं मिला ही नहीं. तुम्हारे घर में यह जया कौन है?’’ अशोक ने पूछा.
‘‘जया…’’ लावण्य जैसे नींद से जागी हो, इस तरह बोली, ‘‘ओह जया, वे तो हमारे यहां सालों से काम कर रही हैं. सच बात तो यह है कि उन्होंने ही मु झे पालपोस कर बड़ा किया है.’’
‘‘इसीलिए आप के घर में उन का खासा वर्चस्व है. तुम्हारे डैडी मु झे बैठाना चाहते थे. तुम्हारी मम्मी नहाने गई थीं. मेजर साहब ने कहा भी कि जब तक वे न आ जाएं, रुको परंतु जया आंटी ने मु झे जाने का इशारा किया,’’ अशोक ने कहा, ‘‘उस वक्त मेरी सम झ में नहीं आ रहा था कि मैं मेजर साहब का कहना मानूं या जया आंटी का. फिर मैं वहां नहीं रुका. लेकिन आज मैं तुम्हारे साथ चल कर तुम्हारी मां से जरूर मिलूंगा.’’
‘‘अशोक,’’ लावण्य बोली. फिर मेज पर रखी नमक की शीशी को घुमाते हुए जैसे कहीं खो गई. उस के बाद एक लंबी सांस ले कर बोली, ‘‘अशोक, मेरी मम्मी तो 2 साल पहले ही गुजर गई हैं.’’
‘‘तो फिर,’’ अशोक ने हिचकते हुए पूछा, ‘‘ये विद्या कौन हैं?’’
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‘‘मेरी मम्मी.’’
‘‘तुम्हारी मम्मी? आई मीन सौतेली मम्मी,’’ अशोक ने कहा.
‘‘नहीं, मेरी सगी मां,’’ लावण्य ने झटके से सिर घुमाते हुए कहा. फिर उस ने दोनों होंठ भींच लिए. शायद उसे रुलाई आ गई थी, जिसे दबाने का वह प्रयास कर रही थी.
‘‘सौरी, मैं सम झ नहीं पाया लावण्य,’’ अशोक ने दुखी हो कर कहा.
‘‘वे मर गई हैं.’’
‘‘तो फिर मेजर साहब ने… आई मीन, उन्होंने बारबार आवाज क्यों लगाई थी? जया आंटी ने भी आ कर कहा था कि वे नहा रही हैं. वे स्नान कर के निकलें, तब तक मेजर साहब मु झ से रुकने के लिए कह रहे थे. फिर शतरंज खेलने के लिए भी कहा था.’’
लावण्य की आंखों से निकली आंसू की बूंदें गालों पर आ गई थीं.
‘‘ए फेक बिलीव.’’
‘‘मतलब?’’
‘‘भ्रम की दुनिया. मेरे डैडी भ्रम की दुनिया में जी रहे हैं. उन्हें कैसे सम झाऊं कि मम्मी को गुजरे 2 साल हो गए हैं. लेकिन कभीकभी डैडी ऐसा बरताव करते हैं, जैसे मम्मी अभी जिंदा हैं,’’ लावण्य बोली.
सच बात तो यह थी कि लावण्य की ये बातें अशोक की सम झ में नहीं आई थीं. वह आश्चर्य से बोला, ‘‘लावण्य, तुम कहना क्या चाहती हो?’’
‘‘डैडी मानसिक रूप से बीमार हैं. मम्मी मर चुकी हैं, यह बात वे मानने को तैयार नहीं हैं.’’
‘‘वे मानसिक रूप से बीमार हैं, परंतु वे तो मु झ से कितनी अच्छी तरह बातें कर रहे थे?’’
‘‘वह सब तो ठीक है, परंतु अचानक वे न जाने कहां खो जाते हैं. अचानक वे ऐसा व्यवहार करने लगते हैं, जैसे मम्मी जिंदा हों,’’
लावण्य लंबीलंबी सांसें ले कर ये बातें कह रही थी. अशोक विस्मय से उस का मुंह ताक रहा था. शायद उसे लावण्य की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था, क्योंकि मेजर विवेक ने उस से एक स्वस्थ व्यक्ति की तरह बातें की थीं. लावण्य आगे बोली, ‘‘डैडी जब भी इस तरह का व्यवहार करते हैं, हम किसी न किसी बहाने से उन्हें मना लेते हैं. जया आंटी इस मामले में मु झ से अधिक होशियार हैं.’’
‘‘शायद, इसीलिए उन्होंने मु झे वहां से जाने का इशारा किया था?’’
‘‘एक बार डैडी को मम्मी की याद आ जाए तो उन्हें सम झाना बहुत मुश्किल हो जाता है. लेकिन जब वे किसी काम में लगे रहते हैं तो कोई परेशानी नहीं होती.’’
‘‘मम्मी की मृत्यु का शायद उन्हें गहरा आघात लगा है, लावण्य.’’
‘‘आघात तो मु झे भी उतना ही लगा था. 2 दिनों की ही बीमारी में मम्मी की मृत्यु हो गई थीं. उन्हें अचानक हार्टअटैक हुआ था. हम कितने सुखी थे. डैडी का पैर कटने के बाद वे रिटायर हो गए थे. फिर हम यहां रहने आ गए थे. सालों तक हम इधरउधर घूमते रहे थे. मैं पहले तो इधरउधर उन्हीं के साथ भटकती रही, फिर दिल्ली में पढ़ाई पूरी की. मैं, मम्मी ज्यादातर डैडी के साथ कैंटोनमैंट में ही रहीं. डैडी को कहीं भी ड्यूटी पर जाना होता था, तभी दोनों अलग होते थे. फिर जब मिलते थे तो नवविवाहिता दंपती की तरह व्यवहार करते थे. मेरी मम्मी बहुत ही खुशमिजाज थीं. बाहरी जिंदगी उन्हें अधिक पसंद थी. मेरी मां वैष्णव बनिए की बेटी थीं. डैडी और मम्मी बचपन के दोस्त थे. डैडी जैसा आज दिखाई देते हैं, पहले वैसे नहीं थे. सौफ्ट, जैंटल और नाजुक. मेरी मां को मर्दानगी पसंद थी. वार फिल्म्स और वैंचर्स देखना उन्हें अधिक पसंद था.