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मुद्दा: ध्वस्त होती इमेज

देश की इमेज खराब होती है तब बड़ी परेशानी आम लोगों को भी होती है क्योंकि हकीकत होती कुछ और है और दिखाई कुछ और जाती है. इस से आम लोगों का आत्मविश्वास कम होता है जिस से उन की कार्यक्षमता पर बुरा असर पड़ता है. हर कोई चाहता है कि उस के देश का सिर दुनिया में ऊंचा हो, लेकिन ?ाठ, नफरत और हिंसा के चलते देश की छवि की भद पिट रही है.

अपने यूरोप टूर के दौरान 6 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में वहां रह रहे भारतीयों से रूबरू होते अपील की कि वे अपने कम से कम 5 गैरभारतीय दोस्तों को भारत आने को प्रेरित करें.

इस के एवज में वे राष्ट्रदूत कहलाएंगे. लगे हाथ उन्होंने इस मुहिम का नामकरण भी ‘चलो इंडिया’ कर दिया.

इस के क्या माने हुए और वे नव राष्ट्रदूतों के जरिए भारत लाने वाले विदेशियों को कौन सा इंडिया दिखलाना चाहते हैं, इस से पहले यह दिलचस्प बात जान लेना जरूरी है कि अब उन के विदेशी दौरों में आम लोगों की दिलचस्पी बेहद कम हो रही है वरना एक वक्त था जब नरेंद्र मोदी विदेश यात्रा पर होते थे तब लोग न्यूज चैनल्स के सामने अगरबत्ती जला कर बैठे मुग्धभाव से उन्हें निहारा करते थे.

हालांकि इतना सन्नाटा नहीं पसरता था कि रामायण या महाभारत सीरियलों का दौर याद आ जाए लेकिन ‘मोदीमोदी…’ के नारे ड्राइंगरूम से ले कर सोशल मीडिया पर गूंजते जरूर थे. फिर भले ही वे प्रायोजित हों या भक्तिभाव से निकले हों. कई दिनों तक गागा कर बताया जाता था कि देखो, मोदीजी ने अमेरिका और इंगलैंड तक में ?ांडे गाड़ दिए और भारत अब विश्वगुरु बनने ही वाला है.

तय है महंगाई की मार, विकराल होते भ्रष्टाचार और देश के लगातार खराब होते माहौल से आजिज आ गए लोगों का भ्रम टूटा है और उन्हें सम?ा आ रहा है कि भक्ति और नारों से उन की समस्याएं हल नहीं होने वालीं, उलटे बढ़ने लगी हैं और न ही मोदीजी कोई चमत्कारी नेता या दैवीय अवतार हैं जैसी कि उन्हें घुट्टी पिला दी गई थी और उन्होंने गणेशजी दूध पी रहे हैं की तर्ज पर भरोसा भी कर लिया था.

चलो इंडिया मुहिम में भी किसी ने दिलचस्पी नहीं दिखाई. हर कोई बिना किसी के बताए सम?ा गया कि यह एक बेकार की अपील थी जो ‘कुछ नया कहना है’ की गरज से की गई थी. इस से  किसी को कुछ हासिल नहीं होने वाला. हां, इस पर वे कुछ कमीशन की पेशकश करते तो पैसों के लालच में थोड़ाबहुत रिस्पौंस मिल भी जाता. इस पर भी अनियुक्त राष्ट्रदूतों को अपने मित्रों को यह बताने में पसीने छूट जाने थे कि उन्हें भारत में क्या दिखाने लाए हैं. इन अतिथियों को भारत लाने व ले जाने के भारीभरकम खर्च पर चुप्पी ने भी इस योजना की भ्रूणहत्या कर दी.

फर्क डेनमार्क और भारत में

देश बहुसंख्यकवाद की गिरफ्त में है. ऐसे में यह हकीकत बताना कि डेनमार्क दुनिया के खुशहाल देशों की लिस्ट में टौप पर है और वहां भ्रष्टाचार न के बराबर है. राष्ट्रवादियों की हर मुमकिन कोशिश यह रहती है कि अपनी जिन खामियों और कमजोरियों को दूर न किया जा सके उन्हें उजागर मत होने दो, बल्कि धर्म और संस्कृति की चादर से ढक दो.

अगर इस से भी बात बनती न दिखे तो उस खामी को ही खूबी कहते प्रचारित कर दो. ट्रांसपेरैंसी इंटरनैशनल के भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक 2021 के मुताबिक 180 देशों की सूची में डेनमार्क 88 अंक ले कर शीर्ष पर है जबकि भारत 40 अंकों के साथ 85वें स्थान पर है. हैरत की बात डेनमार्क का इस जगह पर 1995 से लगातार बने रहना है. रिपोर्ट बताती है कि डेनमार्क में सार्वजनिक लाभों और सेवाओं तक पहुंचने के लिए दी जानी वाली रिश्वत न के बराबर है, जबकि भारत में तसवीर उलट है कि न दी जाने वाली रिश्वत न के बराबर है.

भारत में वे लोग बड़े भाग्यवान होते हैं जिन के मकान या जमीन के नामांतरण जैसे मामूली काम बिना घूस दिए हो जाते हैं, फिर बड़े कामों की तो बात करना ही बेकार की बात है. हम में से हर किसी को जिंदगी में कम से कम 3 दर्जन बार रिश्वत देनी पड़ती है और जिस बार न देनी पड़े, उस दिन या तो बाबू, क्लर्क, सिपाही, पटवारी, चपरासी या उन से बड़े साहब का उपवास होता है या फिर बेटे का जन्मदिन होता है जिसे वे ईमानदारी से एक दिन अन्न की तरह घूस का सेवन न कर मनाते हैं.

डेनमार्क के लोगों या समाज, जिन्हें डेनिश कहा जाता है, को अगर घूस के लेनदेन का चलन और तौरतरीके सीखना हो तो जरूर ‘चलो इंडिया’ मुहिम उन के लिए बेहद उपयोगी साबित होगी. मशहूर व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के चर्चित व्यंग्य ‘इंस्पैक्टर मातादीन चांद पर’ में यही सब बताया गया है कि कैसे एक भारतीय पुलिस इंस्पैक्टर चांद पर पहुंच कर वहां भी घूस का रोग फैला देता है.

इस आर्ट को सीखने डेनिशों को जरूर इंडिया आना चाहिए. पहले सबक से ही वे इंडियंस के कायल हो जाएंगे जब उन से कहा जाएगा कि ‘अगर सीखना है तो पहले लाख दो लाख ढीले करो वरना कुतुबमीनार देख कर और सीताराम दीवान चंद के छोलेभठूरे खा कर चलते बनो.’

जिस देश में भ्रष्टाचार नहीं होगा, जाहिर है, वहां खुशहाली भी ज्यादा होगी. संयुक्त राष्ट्र की ओर से जारी विश्व प्रसन्नता सूची 2022 में डेनमार्क को दुनियाभर के 146 देशों में दूसरा स्थान मिला है जबकि भारत इस में 136वें नंबर पर है. यानी भारत नीचे से लगभग टौप पर है. इस रिपोर्ट में जीडीपी, सामाजिक समर्थन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और भ्रष्टाचार जैसे कारक शामिल किए जाते हैं. जीवन की गुणवत्ता भी एक अहम पैमाना होता है.

डेनिशों को दुख के कारणों को सम?ाने के लिए भी भारत आना चाहिए. यकीन मानें, वे घबरा कर एक दिन में ही दुख के माने और कारण सम?ा कर अपने वतन वापस भाग जाएंगे. इसी एक दिन में उन्हें यह भी ज्ञान प्राप्त हो जाएगा कि बेवजह ही उन के देश के लोकतंत्र को सब से मजबूत और सशक्त नहीं कहा जाता.

स्वीडन के गोथेनबर्ग यूनिवर्सिटी स्थित वी डेम संस्था की हालिया एक रिपोर्ट में डेनमार्क को दुनिया का सब से बढि़या लोकतंत्र बताया गया है. इस रिपोर्ट में भारतीय लोकतंत्र को 97वें स्थान पर रखते कहा गया है कि भारत 2010 के चुनावी लोकतंत्र से अब चुनावी निरंकुशता में बदल गया है.

इसी तरह अमेरिका की मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वाच की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक  सत्तारूढ़ हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाली सरकार की नीतियों ने हाशिए के समुदायों, सरकार की आलोचना करने वालों और धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासतौर से मुसलमानों पर ज्यादा से ज्यादा दबाव डाला है.

इस हकीकत को और उजागर करते हुए एक और अमेरिकी एजेंसी फ्रीडम हाउस ने अपनी सालाना रिपोर्ट में कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के तहत भारतीय लोकतंत्र अब पूर्णरूप से आजाद के बजाय आंशिक रूप से आजाद रह गया है. वह अधिनायकवाद की ओर बढ़ रहा है.

ऐसे कई पैमाने हैं जिन पर भारत डेनमार्क के सामने बहुत बौना साबित होता है. मसलन, वहां प्रतिव्यक्ति सालाना आमदनी 48 लाख रुपए है जो भारत में मात्र 2.5 लाख रुपए है. डेनमार्क में कोई भी नागरिक बेघर नहीं है जबकि भारत में, एक रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 6.8 करोड़ लोगों के पास अपना घर नहीं है.

2020 लोकतंत्र सूचकांक में भारत

2 पायदान नीचे फिसल कर 53वें नंबर पर आ गया है. यह गिरावट नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में दर्ज की गई, नहीं तो साल 2014 में भारत 27वें नंबर पर था. डैमोक्रेसी इन सिकनैस एंड इन हैल्थ शीर्षक वाले ईआईयू (द इकोनौमिस्ट इंटैलिजैंस यूनिट) की हालिया सर्वे रिपोर्ट में कहा गया है कि प्राधिकारियों के लोकतांत्रिक मूल्यों से पीछे हटने और नागरिकों के अधिकारों पर कार्रवाई करने से भारत में यह गिरावट और आई. बकौल ईआईयू, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने भारतीय नागरिकता की अवधारणा में धार्मिक तत्त्व को शामिल किया है और इसे कई आलोचक भारत के धर्मनिरपेक्ष आधार को कमजोर करने वाले कदम के तौर पर देखते हैं.

कोई वजह नहीं कि अंधभक्त, कट्टरपंथी और भगवा गैंग के सदस्यों से इन रिपोर्टों के बाबत किसी सीख या सबक की उम्मीद रखी जाए क्योंकि उन की नजर में यह साजिश है. उलटे, वे लोग तो लोकतंत्र को ले कर यह दम भरते हैं कि उन्हें कोई लोकतंत्र के माने न सिखाए. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री जयशंकर तो बात पूरी सुनने से पहले ही तिलमिला उठते हैं, लेकिन सपना विश्वगुरु बनने का देखते हैं.

रही बात डेनमार्क की तो उस से तुलना बेकार या हर्ज की बात नहीं है बल्कि इस से पता चलता है कि भारत को तो डेनमार्क सरीखे छोटे देश से सीखना चाहिए कि जीवन की गुणवत्ता, रहनेबोलने की आजादी और सभी को खाना किसी भी देश की खुशहाली की वजह होते हैं. इस से उस की इमेज बनती और बिगड़ती है और एक हमारे प्रधानमंत्री हैं जो सुख और संपन्नता धर्म व संस्कृति में बताते फिरते हैं जो एक ?ाठा दंभ और हीनभावना ही कही जाएगी.

जमीनी हकीकत बताते हैं आरहूस विश्वविद्यालय के भारतीय मूल के एसोसिएट प्रोफैसर ताबिश, जो 25 वर्षों से डेनमार्क में रह रहे हैं और हर साल भारत आते हैं. बिहार के गया शहर के ताबिश ने एक दर्जन किताबें भी लिखी हैं और कई पुरुस्कार भी उन्हें मिले हैं. कुछ दिनों पहले ही एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि डेनमार्क जैसी जगहें भारत जैसी जगहों से कहीं बेहतर हैं. इस की 4 बड़ी वजहें हैं जवाबदेही, पारदर्शिता, राजनीतिक शक्तियों का विकेंद्रीकरण और एक सिविल सोसाइटी. ये चारों भारत में कमजोर हैं और हाल के सालों में हालात और भी खराब हुए हैं.

ताबिश कहते हैं, ‘‘हम 1975 में इंदिरा गांधी के दौर में पीछे गए और हम 2014 से पीछे जा रहे हैं. इस की कई समान वजहें हैं जिन में से प्रमुख है शीर्ष पर बैठे शख्स का कल्ट में बदलना, शासन व्यवस्था की बढ़ती फुजूलखर्ची, नौकरशाहों व व्यापारियों की सांठगांठ और संविधान की अनदेखी करना.

उपनिषद का सफेद ?ाठ

नरेंद्र मोदी के भाषणों में धर्म का जिक्र होना एक अनिवार्यता है. भारत में वे अकसर संस्कृत के श्लोकों को अपने भाषणों में शामिल करते हैं जो किसी धर्मग्रंथ से ही लिए गए होते हैं. इस से पब्लिक उन्हें विद्वान मान लेती है. डेनमार्क में उन्हें एहसास था कि शून्य फीसदी बेरोजगारी और सौ फीसदी साक्षरता वाले इस देश में धाक जमाने के लिए कोई ऐसी गूढ़ सी बात कहनी जरूरी है जिस से लोग उन की विद्वत्ता के कायल हो जाएं. वक्त का तकाजा यह भी था कि इस बात में भारत और डेनमार्क दोनों शामिल हों.

इस के मद्देनजर उन्होंने कहा, हम वे लोग हैं जो नदी को मां मानते हैं और पौधों में भी परमात्मा देखते हैं. इस गैरजरूरी और अप्रासंगिक वक्तव्य का वाजिब असर न पड़ते देख वे आध्यात्म के छज्जे से कूदते धर्म की जमीन पर आते बोले, कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी में नील्स बोर का नाम है, वे खुद की जरूरत के समय भारत के उपनिषद के पास आते थे.

विदेशों में भी बड़ी सफाई से नरेंद्र मोदी ?ाठ बोल जाते हैं जो किसी की सम?ा में नहीं आता. नील्स बोर भौतिकी के नामी वैज्ञानिक थे. उन के योगदान के चलते उन्हें 1922 में नोबेल पुरस्कार भी दिया गया था. वे भारत उपनिषद के पास आते थे (इस की जांचपड़ताल शायद ही कोई करे). डेनिशों से उन्होंने आग्रह किया कि आप भी अपनी समस्याओं के लिए भारत आइए. नील्स बोर अब दुनिया में नहीं हैं जिन के नजदीकी लोग मानते थे कि वे नास्तिक थे और चर्चों से भी उन्होंने नाता तोड़ लिया था.

यह सच है कि 1960 में नील्स बोर भारत आए थे लेकिन उन के किसी मठमंदिर में जा कर उपनिषद पढ़ने की बात सिरे से ?ाठी है. अब यह डेनिशों की जिम्मेदारी है कि वे खामोशी से यह मान लें कि नील्स बोर ने परमाणु संरचना और क्वांटम सिद्धांत पढ़ कर, रिसर्च कर और प्रयोगशालाओं में हाड़तोड़ मेहनत कर नहीं बल्कि उपनिषदों में कहीं पढ़ कर दिए थे.

जब भारतीयों के पास गिनाने को कुछ नहीं होता तो वे अपने धर्मग्रंथों का हवाला देने लगते हैं कि देखो, हम नदियों और पहाड़ों को भी पूजते हैं, हमारे यहां हजारों साल पहले कृत्रिम गर्भाधान की तकनीक थी. और तो और हम इतने उन्नत थे कि एक वक्त में बच्चा पैदा करने में हमें कोख की भी जरूरत नहीं पड़ती थी. हमारे यहां जमीन से बच्चे पैदा होते थे, शरीर के मैल से भी हो जाते थे, नाक से भी बच्चे होते थे और मेढक से भी पैदा होते थे.

डेनिशों को ये बेहूदगियां पूरे आत्मविश्वास और विस्तार से जानने को इंडिया जरूर आना चाहिए और अपनी संपन्नता व खुशहाली पर लानतें भेजनी चाहिए कि देखो, वे तो इन के मुकाबले अभी तक पिछड़े ही हैं. एक ये महान लोग हैं कि अपने मृत पूर्वजों को

ऊपर खाना, बिस्तर, रुपयापैसा  और जूतेचप्पल तक पंडों के  मार्फत भिजवा देते हैं. ऐसे कई प्रसंग डेनिशों का सिर शर्म और हीनता से ?ाका देंगे.

और हमारा सिर…

मान भी लिया जाए कि 6 मई के बाद मोदीजी की अपील पर कुछ डेनिश भारत आ जाते तो उन के साथ आया राष्ट्रदूत उन्हें क्या दिखाता और जो बिना दिखाए दिख जाता, उस से देश की इमेज कौड़ी भर की भी न रह जाती. इस वक्त आगरा में ताजमहल को ले कर विवाद और तनाव था. सनातनी कोर्ट के भीतर और बाहर हल्ला मचा रहे थे कि ताजमहल के 22 कमरों में हिंदू देवीदेवताओं की मूर्तियां हैं, इसलिए यह भी हमें सौंप दिया जाए. इस के कुछ दिनों पहले ही भगवा कपड़े पहने कई हिंदू संतमहंत कानून को ठेंगा दिखाते ताजमहल पर कब्जा करने की नीयत से पहुंच गए थे.

दिखाने को तो धार्मिक नगरी काशी भी थी जहां की ज्ञानवापी मसजिद को ले कर खासा बवंडर मचा हुआ था. वाराणसी पुलिस छावनी में तबदील थी. कोर्ट के आदेश पर यहां सर्वे चल रहा था. हिंदू संगठन मांग कर रहे थे कि ज्ञानवापी के भीतर मौजूद शृंगार गौरी की रोज पूजाअर्चना की इजाजत दी जाए. मुसलिम पक्ष इस बात पर अड़ा हुआ था कि उसे सर्वे पर एतराज नहीं है बल्कि इस बात पर आपत्ति है कि कोर्ट ने मसजिद के अंदर जा कर सर्वे करने को नहीं कहा है, लिहाजा, सर्वे टीम को अंदर दाखिल नहीं होने दिया जाएगा.

डेनिशों के सामने हमारा सिर हिमाचल प्रदेश के विधानसभा विवाद को ले कर भी ?ाकता जहां हाई अलर्ट था क्योंकि वहां खालिस्तान के ?ांडे लगा दिए गए थे. इस मसले को सुल?ाने के लिए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने एक एसआईटी गठित कर दी थी. आलम यह था कि हिमाचल के बसअड्डों, रेलवे स्टेशनों और सरकारी इमारतों पर पुलिस ही पुलिस थी जिस से पर्यटकों और स्थानीय लोगों में दहशत थी.

इन्हीं दिनों में राष्ट्रदूत अपने डेनिश मित्रों को यह भी बताता कि एक राज्य ?ारखंड की आईएएस अधिकारी पूजा सिंघल के यहां से करोड़ों की नकदी बरामद हुई है जो घूसखोरी से ही इकट्ठा हो सकती है और एक तुम्हारा देश है जहां न सांप्रदायिक दंगे होते और न ही तुम लोग घूस का लेनदेन करते. ऐसी दर्जनों दिलचस्प घटनाओं से डेनिश रूबरू होते तो उन के दिमाग में भारत की क्या इमेज बनती, सहज सम?ा जा सकता है. नरेंद्र मोदी का न्यू इंडिया देख कर वे चमत्कृत रह जाते.

इमेज की चिंता किसे

जब देश की इमेज खराब होती है तब बड़ी परेशानी आम लोगों को भी होती है क्योंकि हकीकत होती कुछ और है और दिखाई कुछ और जाती है. इस से बड़ा नुकसान आम लोगों का आत्मविश्वास कम होना है जिस से उन की कार्यक्षमता पर बुरा असर पड़ता है. हर कोई चाहता है कि उस के देश का सिर दुनिया में ऊंचा हो, लोग जरूरत से ज्यादा अभावों में न रहें और सब से बड़ी बात, देश में अमनचैन रहे.

यह सब दूरदूर तक नजर नहीं आ रहा है. उलटे, माहौल और बिगड़ता जा रहा है. इस के चलते लोग तरहतरह की आशंकाओं से घिरे रहते हैं. इसी वजह से हम खुशहाली के मामले में पिछड़ते रहे हैं. हीनता को श्रेष्ठता बताने से देश की इमेज बनती नहीं, बिगड़ती ही है और लोग बारबार बोले गए ?ाठ या अस्तित्वहीन बातों को ही सच मान तर्क तो दूर, आम बुद्धि का भी इस्तेमाल नहीं कर पाते.

इस ध्वस्त होती इमेज को ले कर कई लोग चिंतित हैं जिन में एक बड़ा नाम भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का है. उन्होंने एक कार्यक्रम में बड़ी पीड़ा के साथ कहा, ‘‘भारत की अल्पसंख्यक विरोधी इमेज से दुनियाभर में भारतीय बाजार का नुकसान हो रहा है.’’ बकौल रघुराम राजन, देश की छवि का असर उपभोक्ताओं के साथसाथ दूसरे देशों की सरकारों पर भी पड़ता है. उन्होंने इस का सटीक उदाहरण देते हुए बताया

कि यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लोदोमीर जेलेंस्की को अपने देश की रक्षा के लिए खड़े व्यक्ति के रूप में देखा जाता है. यही वजह है कि दुनियाभर के देश यूक्रेन का साथ देने से पीछे नहीं हट रहे जबकि कुछ देश रूस के साथ व्यापार करने में लगे हैं.

ऐसे हुई छवि धूमिल

यह कोई इत्तफाक की बात नहीं थी कि फ्रांस से डेनमार्क पहुंचने के ठीक पहले 3 मई को प्रैस स्वतंत्रता दिवस वाले दिन आरएसएफ (रिपोर्ट्स सैंस फ्रंटियर्स) द्वारा जारी प्रैस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत की रैंकिंग 180 देशों में 150वें नंबर पर थी जबकि डेनमार्क की ऊपर से चौथे नंबर पर थी. पिछले साल भारत 142वें नंबर पर था, यानी एक साल में वह 8 पायदान नीचे खिसका. देश की दरकती इमेज की और वजहें भी हैं. इन पर दुनियाभर की नजर थी. आइए कुछ ताजा घटनाओं और हादसों पर सरसरी नजर डालें जिन्होंने छवि धूमिल की-

ईद और रामनवमी के त्योहारों पर हुई व्यापक हिंसा खासतौर से मध्य प्रदेश के पिछड़े जिले खरगौन की हिंसा, जिस में कई कथित आरोपी मुसलमानों के घर बुलडोजर से ढहा दिए गए. सांप्रदायिक हिंसा राजस्थान के जोधपुर में भी एक खंडहरनुमा मंदिर को ढहाने के बाद हुई.

गुजरात के निर्दलीय दलित विधायक जिग्नेश मेवानी की गिरफ्तारी और कोर्ट द्वारा उन्हें जमानत देने के बाद फिर से गिरफ्तारी.

सीबीआई द्वारा मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाली नोबेल पुरस्कार प्राप्त संस्था एमनेस्टी इंटरनैशनल के भारतीय अध्यक्ष आकार पटेल के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी कर उन्हें विदेश यात्रा से रोका जाना. यहां गौरतलब है कि एमनेस्टी की संपत्ति को सितंबर 2020 में मोदी सरकार द्वारा जब्त कर उसे भारत से खदेड़ दिया गया था.

एमनेस्टी ने कहा था कि विरोधी आवाजों के लिए जगह संकुचित कर भारतीय अधिकारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मजाक बना रहे हैं. अधिकारियों के आलोचकों के खिलाफ उन का लगातार विच हंट भारत के अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्वों और संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार परिषद के सदस्य के रूप में उस की भूमिका को पूरी तरह खंडित करता है.

मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में 3 आदिवासियों को इस शक की बिना पर बजरंग दल के लोगों द्वारा पीटपीट कर मार डाला गया कि वे कथित रूप से गौमांस ले जा रहे थे.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट में यह बताया गया है कि पिछले 2 सालों में भारत में कोरोना से 47 लाख मौतें हुई हैं जबकि सरकारी आंकड़ा मात्र 4 लाख 80 हजार के लगभग है यानी सरकार हकीकत छिपा रही है जिस से उस की बदनामी न हो.

पंजाब के पटियाला में खालिस्तानविरोधी मार्च को ले कर 2 समूहों के बीच हिंसा के बाद इंटरनैट सेवाएं बंद, हिंसा भड़काने के आरोप में 2 सप्ताह बाद एक भाजपा नेता तेजिंदर पाल बग्गा गिरफ्तार और फिर रिहा भी.

इन और ऐसी तमाम घटनाओं में सरकार की भूमिका संदिग्ध है. अब छिटपुट ही सही, देश के बाहर से भी भारत को ले कर चिंता जताई जाने लगी है कि आखिर यहां हो क्या रहा है और क्यों राष्ट्रवादियों को शह दी जा रही है. यह कोई राज की बात नहीं है कि भगवा गैंग हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए अपने पर उतारू है और इस के लिए वह लोकतंत्र व संविधान की बलि देने को तैयार है. अखंड भारत का नारा कहीं देश के और खंड न कर दे, इस की चिंता होना स्वाभाविक बात है लेकिन चिंता व्यक्त करने वालों को ही राष्ट्रद्रोही करार दे दिया जाए तो जाहिर है यह तानाशाही का अभिजात्य रूप है.

इकलौती लड़की बूढ़े मां-बाप

जिस तरह बच्चों की देखभाल के लिए पेरैंट्स की भूमिका अहम होती है उसी तरह बुढ़ापे में संतानों की भूमिका अहम हो जाती है, पर क्या हो अगर संतान इकलौती लड़की हो और उस की शादी हो गई हो?

क्या अकेली संतान के लिए पेरैंट्स बो?ा बनते हैं? क्या संतान अपनी जिंदगी को अच्छी तरह से जी नहीं सकती? क्या लड़की के लिए यह कुछ अधिक समस्या ले कर आती है? ऐसे न जाने कितने ही प्रश्नों के उत्तर शायद किसी के पास नहीं हैं, क्योंकि लड़कियां बड़ी होने पर अगर विवाह करती हैं तो उन्हें कई भूमिकाएं परिवार में निभानी पड़ती हैं, मसलन बेटी, पत्नी, व्यवस्थापक, मां, अनुशासक, हैल्थ औफिसर, रिक्रिएटर आदि न जाने कितनी ही अवस्थाओं से उन्हें गुजरना पड़ता है.

इस के अलावा एक महिला पर समाज के विकास का दायित्व भी होता है. इस में अकेला बेटा कुछ गलती करे तो उसे समाज और परिवार उस की परवरिश और रहनसहन को गलत बता कर पल्ला ?ाड़ लेते हैं लेकिन बेटी के लिए यह सोच अलग है. उस से किसी प्रकार की कमी हो तो समाज और परिवार सहन नहीं करते, उसे स्वार्थी कह दिया जाता है.

लेकिन इस से अलग जिंदगी गुजार रही है 45 वर्षीया शोमा बनर्जी, जो अपने मातापिता की अकेली संतान है और एक प्लेबैक सिंगर भी है. उस के पति विकास कुमार मित्रा फिल्म राइटर एंड डायरैक्टर हैं. पति का पूरा परिवार पहले छत्तीसगढ़ में रहता था, अभी सभी मुंबई में साथ रहते हैं.

सोचा नहीं शादी के बारे में

शोमा साल 1995 में अपने पेरैंट्स के साथ मुंबई संगीत में कुछ नाम कमाने आ गई. अकेली संतान होने की वजह से उस ने अपने बचपन को काफी मजे से गुजारा, कभी किसी बात की कमी उस ने अपने जीवन में नहीं देखी. बिना बताए ही सबकुछ उसे मिल जाता था.

जिम्मेदारी का एहसास तब हुआ जब उस के मातापिता की उम्र बढ़ी और शोमा की उम्र भी 30 साल हो चुकी थी. उसे लगने लगा कि उस का कोई रिलीवर नहीं है क्योंकि वह मातापिता की अकेली संतान है. उस की जिम्मेदारी बढ़ रही है क्योंकि कभी मां तो कभी पिता की देखभाल करनी पड़ती थी. ऐसे में जब शोमा ने देखा कि उस के आसपास की सहेलियों की शादियां हो रही थीं तो उस ने अपने मन को सम?ाया कि वह शादी के इस ?ां?ाट में नहीं पड़ सकती.

शोमा कहती है, ‘‘शुरू में मु?ो शादी करने की कोई इच्छा नहीं हुई क्योंकि मेरे पिता कहते थे कि अगर तुम संगीत में अच्छा कैरियर बनाना चाहती हो तो उस के लिए कोशिश करो और ऐसी इच्छा न होने पर शादी कर लो. इस के अलावा शुरू से मेरे घर के लोग जैंडर बायस्ड नहीं थे. किसी ने मेरी शादी को ले कर पेरैंट्स पर कभी दबाव नहीं डाला. मैं भी हमेशा पेरैंट्स से कहती थी कि जब तक आप हैं तब तक आप के साथ रहूंगी, बाद में मैं किसी संस्था में रह कर जरूरतमंदों की सेवा करूंगी.’’

शादी करने का बनाया मन 

40 वर्ष की होने पर शोमा को लगने लगा कि उस ने अपने साथ कुछ गलती की है क्योंकि पेरैंट्स को इस उम्र में लोगों की बातें सुनने को मिल रही थीं. कोई कहता कि वे अपनी सुविधा के लिए बेटी की शादी नहीं करवा रहे हैं, उन के बाद बेटी का क्या होगा आदिआदि?

शोमा कहती है, ‘‘जब काफी लोग मेरे पेरैंट्स और मु?ो मेरी शादी को ले कर कहने लगे तो मैं ने इस विषय पर सोचने का मन बनाया और जो भी मु?ो शादी को ले कर कुछ कहता तो उसे मैं लड़का ढूंढ़ कर लाने को कहती रही, क्योंकि 40 के बाद किसी भी लड़की को विवाह करना मुश्किल होता है क्योंकि इस उम्र में पार्टनर मिलना कठिन था. मैं ने सारे मैट्रिमोनियल साइट्स पर अपनी फोटो डाल दी थी. उसी दौरान मेरी एक फ्रैंड के कहने पर मैं अपने पति से मिली. वह भी अजीब तरीके से मिलना हुआ, दरअसल, मैं बहुत अधिक काम में व्यस्त थी, इसलिए बहुत कम बातचीत हुई और 2 महीने बाद ही शादी कर ली.’’

साथ रहना हुआ मुश्किल

शोमा का कहना है, ‘‘शादी के बाद दोनों का साथ रहना मुश्किल हो चुका था क्योंकि अपने पेरैंट्स को मैं नहीं छोड़ सकती थी और मेरे पति अपनी मां को अकेले नहीं छोड़ सकते थे. ऐसे में हम दोनों ने 4 कमरों वाला एक बड़ा फ्लैट मलाड एरिया में लिया जिस का किराया मेरे पिता के अंधेरी वैस्ट इलाके के 2 कमरों वाले फ्लैट के किराए से पूरा किया. हम दोनों ने मिल कर 3 बुजुर्गों की देखभाल का जिम्मा लिया लेकिन यह बहुत बड़ी चुनौती हम दोनों के साथ है क्योंकि मेरे पेरैंट्स बंगाल के हैं जबकि मेरे पति मिक्स कल्चर बंगाल और नेपाल के हैं. उन के पिता बंगाली और मां नेपाली हैं.

‘‘मेरे परिवार में सुबह उठ कर खाना बना कर औफिस जाना होता है. इस तरह से छोटीछोटी बातों को सुल?ाते हुए हम दोनों का बहुत सारा वक्त गुजर जाता था. इस तरह से आपसी तालमेल के साथ हम दोनों दायित्व निभा रहे हैं. मेरी कोई संतान न होने की वजह भी मेरी 40 की उम्र के बाद शादी करना और मेरे पिता का अचानक कैंसर डिटैक्ट होना रहा क्योंकि मैं ऐसी परिस्थिति में एक बच्चे को जन्म दूं और उस की देखभाल न कर सकूं, इसलिए मैं ने अपने 2 मातापिता और सास की देखभाल सही से करना ही उचित सम?ा. मेरे पति राजी न होतेहोते भी राजी हो गए. साथ ही, मेरा संगीत भी साथसाथ चल रहा था.’’

शादी से पहले करें बातचीत

यह सही है कि अकेली संतान को हमेशा ही मातापिता के भविष्य का सहारा सम?ा जाता है. फिर उस में अगर लड़का हो तो पेरैंट्स भले ही उसे अपना सहारा सम?ों लेकिन उन की उम्मीद पर अधिकतर पानी फिर जाता है, पर इस में वे अपनी गलत परवरिश को मान कर चुप रह जाते हैं. जबकि लड़की को कैसे भी दायित्व निभाना पड़ता है. इसलिए अकेली लड़की के होने वाले पति को शादी से पहले सबकुछ बता देना सही सम?ा जाता है.

शोमा कहती है, ‘‘सबकुछ क्लीयर होने पर भी इकलौती लड़की को ससुराल पक्ष से कुछ न कुछ सुनना पड़ता है पर मैं उस में अधिक ध्यान नहीं देती. कई बार हम दोनों अपनी सास और मातापिता को साथ घुमाने ले जाते हैं ताकि दोनों परिवारों के बीच संबंध अच्छे बने रहें. एकसाथ बैठ कर खाना भी खाते हैं. इस से फायदा हुआ. इस के अलावा छोटीछोटी बातों को आपस में बैठ कर सुल?ा लेना या फिर ध्यान न देना ही मेरे लिए सही हुआ.’’

अलग होती है मानसिकता

शोमा कहती है, ‘‘मैं ने देखा है कि लड़कों की मानसिकता सबकुछ जानने के बाद भी स्वार्थी दिखाई देती है. दरअसल, लड़कों को बचपन से ही अपनी दुनिया अधिक प्यारी लगती है. बहुत कम ऐसे लड़के हैं जो किसी की जिम्मेदारी को सम?ाते हैं. मु?ो इस बात का एहसास कभी नहीं हुआ क्योंकि मैं कभी लड़कों के साथ घूमी नहीं. मेरा तो शादी करने का इरादा ही नहीं था, इसलिए किसी प्रेमप्रसंग में नहीं पड़ी. अभी सब ठीक चल रहा है पर माइंड गेम का ?ामेला चलता रहता है जिसे बीचबीच में सुल?ाना पड़ता है क्योंकि मेरे पति इन्ट्रोवर्ट हैं जबकि मु?ो सब से बात करना अच्छा लगता है.’’

कानूनन प्रौपर्टी की बात   

प्रौपर्टी की बात अगर करें तो शोमा ने शादी से पहले ही सब क्लीयर कर दिया था कि दोनों एकदूसरे की प्रौपर्टी पर किसी प्रकार का दावा नहीं रखेंगे और यह जारी रहेगा. यह सही है कि पेरैंट्स का दायित्व लेना किसी लड़के के लिए काफी कठिन होता है. वहीं, शादी के बाद पत्नी अपने पेरैंट्स की देखभाल करे तो वह बहुत अधिक मुश्किल होता है. दरअसल समाज और परिवार लड़की की शादी के बाद उसे ससुराल की संपत्ति सम?ाते हैं.

शोमा का इस बारे में कहना है, ‘‘शादी के बाद एक अकेली लड़की दोनों परिवारों के बुजुर्गों की देखभाल आसानी से कर सकती है, अगर पति का सहयोग हो. मेरा सु?ाव सभी अकेली लड़कियों से यह है कि जब भी शादी करें, अपने पार्टनर के साथ अधिक समय बिताएं. शादी के लिए जल्दबाजी न करें.’’

कुछ उदाहरण ऐसे भी हैं जहां अकेली लड़की शादी के बाद अपने पेरैंट्स की देखभाल नहीं करती. भिलाई की एक अकेली लड़की ने शादी की, मां की मत्यु के बाद अपने 70 वर्षीय पिता की देखभाल का जिम्मा लिया और पूरी प्रौपर्टी अपने नाम करवा ली और फिर वहां अपने पति के साथ रहने लगी. कुछ दिनों बाद उस बुजुर्ग का शव भिलाई स्टेशन की रेल की पटरी पर मिला, जिसे बेटी ने आत्महत्या बताया जबकि वह व्यक्ति बहुत खुश रहता था और किसी से उस की नाराजगी नहीं थी. पुलिस भी पता करने में असमर्थ रही कि यह हत्या है या आत्महत्या?

जिंदगी कभी अधूरी नहीं होती- भाग 1: शादी के बाद खुशमन क्यों बदल गया?

‘‘खुशी…’’चिल्लाते हुए खुशमन बोला, ‘‘मेरे सामने बोलने की हिम्मत भी न करना. मैं कभी सहन नहीं कर पाऊंगा कि कोई मेरे सामने मुंह भी खोले और तुम जैसी का तो कभी भी नहीं.’’

पता नहीं और क्याक्या बोला खुशमन ने. ‘तुम जैसी को तो कभी भी सहन नहीं कर सकता,’ यह वाक्य तो खुशमन ने पता नहीं इन 5 वर्षों में कितनी बार दोहराया होगा. पर मैं पता नहीं क्यों फिर भी वहीं की वहीं थी. वैसे की वैसी… जिस पर जितना मरजी पानी फेंको, ठोकरें मारो कोई फर्क नहीं पड़ता था या फिर मेरा वजूद भी खत्म हो गया था.

शादी को 5 साल हो गए थे. पता नहीं क्याक्या बदल गया था? जब याद करती हूं कि यह वही खुशमन है जिसे मैं आज से 5 साल पहले मिली थी तो खुद को कितनी खुशहाल समझी थी. वह लड़की जिस से दोस्ती के लिए भी हाथ बढ़ाने को सब तरसते थे और वह खुशमन के पीछे चलती हुई न जाने कब उस की जीवनसंगिनी बन गई थी.

मांबाप की इकलौती संतान थी खुशी. बड़े नाजों से, लाड़प्यार से पाला था उस के मांबाप ने. पापा शहर के जानेमाने बिल्डर थे. इमारतें बना कर बेचना बड़ा काम था उन का. खुशी के जन्म के बाद तो उन का व्यवसाय इतना बढ़ा कि उन्होंने इस का श्रेय उसे दे दिया. खुशी के मुंह से निकली कोई इच्छा खाली नहीं जाती थी. शहर के अच्छे स्कूल में पढ़ने के बाद खुशी ने अपने ही शहर के सब से अच्छे कालेज में बीएससी साइंस में दाखिला ले लिया. पढ़ाई में तो होशियार थी ही, साथ ही साथ खूबसूरत भी थी.

कालेज में पहले ही दिन उस के कई दोस्त बन गए. खुशी कालेज के प्रत्येक समारोह में भाग लेती. पढ़ाई में भी प्रथम स्थान पर रहती. इसी कारण वह अध्यापकों की भी चहेती बन गई थी. हर कोई उस की प्रशंसा करता न थकता. इतने गुण होने के बावजूद भी खुशी में घमंड बिलकुल नहीं था. घर में भी सब से मिल कर रहना और मातापिता का पूरा ध्यान उस के द्वारा रखा जाता था.

एक बार पापा को दिल का दौरा पड़ा तो खुशी ने ऐसे संभाला कि एक बेटा भी ऐसा न कर पाता. एक दिन पापा जैसे ही शाम को घर पहुंचे तो खुशी रोज की तरह पापा को पानी देने आई तो पापा को सोफे पर गिरा पड़ा पाया. खुशी ने हिलाया, पर पापा के शरीर में कोई हलचल न थी. नौकरों और मां की सहायता से कार से तुरंत अस्पताल ले गई और पापा को बचा लिया. तब से मातापिता का उस पर मान और भी बढ़ गया था. तब पापा ने कहा भी था कि लड़की भी लड़का बन सकती है. जरूरी नहीं कि लड़का ही जिंदगी को खुशहाल बनाता है. तब खुशी को महसूस हुआ कि उन के परिवार में कुछ भी अधूरा नहीं है.

बीएससी करने के बाद खुशी ने एमएससी में दाखिला लेना चाहा पर मां की इच्छा थी कि अब उस की शादी हो जाए, क्योंकि पापा को अपने व्यवसाय को संभालने के लिए सहारा चाहिए था. लड़का तो कोई था नहीं. इसलिए उन का विचार था कि खुशी का पति उन के साथ व्यवसाय संभाल लेगा. मगर खुशी चाहती थी कि वह आगे पढ़े. अत: मातापिता ने उस की जिद मान ली.

एमएससी खुशी के शहर के कालेज में नहीं थी. इस के लिए उसे दूसरे शहर के कालेज में दाखिला लेना पड़ता था. इस के लिए भी पापा ने अपनी हरी झंडी दिखा दी. खुशी ने दाखिला ले लिया. रोजाना बस से ही कालेज जातीआती थी. पापा ने यह देख कर उसे कार ले दी. अब वह कार से कालेज जाने लगी. उस की सहेलियां भी उस के साथ ही जाने लगीं. समय पर कालेज पहुंचती, पूरे पीरियड अटैंड करती, यहां पर भी खुशी की कई सहेलियां बन गईं. होनकार विद्यार्थी होने के कारण अध्यापकों की भी चहेली बन गई.

कालेज जौइन कर समय का पता ही नहीं चला कि कब 4 महीने बीत गए. खुशी को कई बार महसूस होता कि कोई उसे चुपके से देखता है, उस का पीछा करता है, परंतु कई बार इसे वहम समझ लेती. मगर यह सच था और वह शख्स धीरेधीरे उस के सामने आ रहा था.

रोजाना की तरह उस दिन भी खुशी कक्षा खत्म होने के बाद लाइब्रेरी चली गई. वह वहां किताबें देख ही रही थी कि कोई पास आ कर उसी अलमारी में से पुस्तकें देखने लगा. खुशी घबरा कर पीछे हो गई. जब पलट कर देखा तो यह वही था जो उस के आसपास ही रहता था. उस ने खुशी की तरफ मुसकरा कर देखा, पर खुशी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और चली गई. अब तो वह खुशी को रोजाना नजर आने लगा. वह कहीं न कहीं खुशी को मिल ही जाता.

एक दिन खुशी लाइब्रेरी में बैठ कर एक पुस्तक पढ़ रही थी. उस की एक ही कापी लाइब्रेरी में थी जिस कारण उसे इश्यू नहीं किया गया था. तभी अचानक वह वहीं खुशी के पास आ कर बैठ गया और फिर कहने लगा, ‘‘इस पुस्तक को तो मैं कब से ढूंढ़ रहा था और यह आप के पास है.’’

खुशी घबरा गई. ‘‘अरे, घबराएं नहीं. मैं भी आप की ही तरह इसी विद्यालय का छात्र हूं. खुशमन नाम है मेरा और आप का?

‘‘खुशी, मेरा नाम खुशी है,’’ कह कर खुशी बाहर आ गई.

खुशमन भी साथ ही आ गया और फिर चला गया. अब रोज मिलते. हायहैलो हो जाती. धीरेधीरे कालेज की कैंटीन में समय बिताना शुरू कर दिया. खुशमन ने अपने परिवार के बारे में काफी बातें बतानी शुरू कर दीं. काफी होशियार था वह पढ़ने में. कालेज का जानामाना छात्र था. उस के मातापिता नहीं थे. एक भाई था, जो पिता का व्यवसाय संभालता था. पैसे की कमी न थी. खुशमन शुरू से ही होस्टल में पढ़ा था, इसलिए घर से लगाव भी कम ही था. शहर में कालेज होने पर भी होस्टल में ही रहता था. भाई ने शादी कर ली थी, परंतु खुशमन अभी पढ़ना चाहता था. इंजीनियरिंग का बड़ा ही होशियार छात्र था. उसे कई कंपनियों से नौकरी के औफर थे. बड़ीबड़ी कंपनियां उसे लेने के लिए खड़ी थीं. खुशी का अब काफी समय उस के साथ बीतने लगा. पता ही नहीं चला कि कब 1 साल बीत गया और कब उन की दोस्ती प्यार में बदल गई.

खुशी के पापा का व्यवसाय काफी अच्छा चल रहा था, परंतु अब वे ज्यादा बोझ नहीं उठा पाते थे, क्योंकि अब उन की उम्र और दूसरा शायद बेटा न होने की चिंता. मगर उन्होंने यह खुशी को पता नहीं चलने दिया.

मेरी बेटी किसी को ‘तू’ कहती है, मैं क्या करूं?

सवाल

हम ने नई सोसाइटी में आ कर 12 साल की बेटी का कोचिंग क्लासेस में ऐडमिशन कराया था. हमें लगा था कि नए कोचिंग सैंटर में उसे अच्छे बच्चे मिलेंगे जिन के साथ उस का शैक्षिक स्तर भी बढ़ेगा. परंतु हुआ बिलकुल उलटा. जब से वह इस नए कोचिंग सैंटर में जाने लगी है उस की भाषा में काफी बदलाव आ गया है. वह किसी को ‘तू’ कहती है तो कभी ‘ऐ ऐ’ कर के बुलाती है.

यह सोसाइटी के लफंगे बच्चों का ही असर होगा. मैं ने इस के चलते उसे कोचिंग सैंटर से निकलवाना चाहा लेकिन हम पहले ही 2 महीने की फीस एडवांस में दे चुके हैं. ऐसे में उसे कोचिंग से निकलवा भी नहीं सकते और उस के आचारविचार खराब होते भी नहीं देख सकते. समझ नहीं आता कि क्या करें?

जवाब

आप की समस्या का हल यह है कि आप अपनी बेटी से बात करें. वह अभी छोटी है, नासमझ है. जब तक आप उसे शांति से बैठ कर कुछ नहीं समझाएंगी, वह नहीं समझेगी. उसे बताएं कि हमारी भाषा किस तरह हमारे व्यक्तित्व को बनाती व बिगाड़ती है. उस की यह भाषा उस के कोचिंग सैंटर के बच्चों को शायद अच्छी लगती हो, लेकिन उस के स्कूल के दोस्तों और भविष्य में मिलने वाले लोगों को अच्छी नहीं लगेगी. वे उसे गंवार समझेंगे और उस से दोस्ती करना नहीं चाहेंगे. यह सब उस से कहने से  हो सकता है कि वह ऐसी भाषा और ऐसी भाषा बोलने वाले बच्चों से दूर रहने लगे. यदि किसी में आत्मविश्वास हो तो वह अपने चालचलन और अपनी भाषा पर नियंत्रण गंदे माहौल में भी रख सकता है. यह आत्मविश्वास पैदा करना आप का काम है.

आप जा कर उस कोचिंग सैंटर के टीचर्स से भी बात करें. उन्हें बताएं कि इस तरह की भाषा न बोलने के लिए उन्हें बच्चों को समझाना चाहिए, उन्हें अच्छी सीख देनी चाहिए. और हो सके तो उन से यह भी कहें कि वे आप की बेटी को ऐसे बच्चों से दूर रखें जो इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हों.

जब तक आप की बेटी इस कोचिंग सैंटर में है तब तक उस की बोलचाल पर बारीकी से नजर रखें. उसे कुछ भी उलटासीधा कहने पर टोकें. आप एक कोचिंग सैंटर बदल देंगी तब भी इस की कोई गारंटी नहीं कि नए कोचिंग सैंटर में उसे इस तरह तूतू वाली भाषा बोलने वाले बच्चे नहीं मिलेंगे. अच्छे संस्कार आप को खुद ही अपनी बच्ची में डालने होंगे.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

गंगासागर: सपना और विकास में किस बात को लेकर बहस चल रही थी?

‘सब तीर्थ बारबार, गंगासागर एकबार,’ इस वाक्य को रटते हुए गांव से हर साल कुछ परिचित टपक ही पड़ते. जैसेजैसे गंगासागर स्नान की तारीख नजदीक आती जाती, वैसेवैसे सपना को बुखार चढ़ने लगता.

विकास का छोटा सा घर गंगासागर स्नान के दिनों में गुलजार हो जाता. बबुआ, भैया व बचवा  कह कर बाबूजी या दादाजी का कोई न कोई परिचित कलकत्ता धमक ही पड़ता. गंगासागर का मेला तो 14 जनवरी को लगता, पर लोग 10-11 तारीख को ही आ जाते. हफ्तेभर पहले से घर की काया बदल देनी पड़ती, ताकि जितने लोग हों, उसी हिसाब से बिस्तरों का इंतजाम किया जा सके.

इस दौरान बच्चों की पढ़ाई का नुकसान होता. वैसे उन की तो मौज हो जाती, इतने लोगों के बीच जोर से डांटना भी संभव न होता.

फिर सब के जाने के बाद एक दिन की खटनी होती, नए सिरे से घर को व्यवस्थित करना पड़ता था. यह सारा तामझाम सपना को ही निबटाना पड़ता, सो उस की भृकुटि तनी रहती. पर इस से बचने का कोई उपाय भी न था. पिछले लगातार 5 वर्षों से जब से उन का तबादला पटना से कलकत्ता हुआ, गंगासागर के तीर्थयात्री उन के घर जुटते रहते.

विकास के लिए आनाकानी करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था. साल में जब भी वे एक बार छुट्टियों में गांव जाते, सभी लोग आत्मीयता से मिलते थे. जितने दिन भी वे गांव में रहते, कहीं से दूध आ जाता तो कहीं से दही, कोई मुरगा भिजवाता तो कोई तालाब से ताजा मछली लिए पहुंच जाता.

‘अब जहां से इतना मानसम्मान, स्नेह मिलता है, वहां से कोई गंगासागर के नाम पर उस के घर पहुंचता हो तो कैसे इनकार किया जा सकता है?’ विकास सपना को समझाने की बहुत कोशिश करते थे.

पर सपना को हर साल नए सिरे से समझाना पड़ता. वह भुनभुनाती रहती, ‘थोड़ा सा दूधदही खिला दिया और बापदादा का नाम ले कर कलकत्ता आ गए. आखिर जब हम कलकत्ता में नहीं थे, तब कैसे गंगासागर का पुण्य कमाया जाता था? इतनी दूर से लोग गठरियां उठाए हमारे भरोसे आ पहुंचते हैं. हमारी परेशानियों का तो किसी को ध्यान ही नहीं. क्या कलकत्ता में होटल और धर्मशाला नहीं, वे वहां नहीं ठहर सकते? न जाने तुम्हें क्या सुख मिलता है उन बूढ़ेबूढि़यों से बातचीत कर के. अगले साल से देखना, मैं इन्हीं दिनों मायके चली जाऊंगी, अकेले संभालना पड़ेगा, तब नानी याद आएगी.’

एक दिन पत्नी की भाषणबाजी पर विराम लगाते हुए विकास कह उठे, ‘‘क्या बच्चों जैसी बातें करती हो. हमें अपना समझते हैं तभी तो अधिकार सहित पहुंचते हैं. उन के पास पैसों की कमी नहीं है, चाहें तो होटल या धर्मशाला में ठहर सकते हैं. पर जब हम यहां मौजूद हैं तो उन्हें ऐसा करने की क्या जरूरत है. फिर वे कभी खाली हाथ नहीं आते, गांव का शुद्ध घी, सत्तू, बेसन, दाल, मसाले वगैरा ले कर आते हैं. अब तुम्हीं बताओ, ऐसी शुद्ध चीजें यहां कलकत्ता में मिल सकती हैं?

‘‘तुम तो सब भूल जाती हो. लौटते वक्त वे बच्चों को रुपए भी पकड़ा जाते हैं. आखिर वे हमारे बुजुर्ग हैं, 2-4 दिनों की सेवा से हम छोटे तो नहीं हो जाएंगे. गांव लौट कर वे हमारी कितनी तारीफ करते हैं तब माई व बाबूजी को कितनी खुशी होती होगी.’’

सपना मुंह बिचकाती हुई कह उठी, ‘‘ठीक है भई, हर साल यह झमेला मुझे ही सहना है तो सहूंगी. तुम से कहने का कोई फायदा नहीं. अब गंगासागर स्नान का समय फिर नजदीक आ गया है. देखें, इस बार कितने लोग आते हैं.’’

विकास ने जेब में हाथ डाला और एक पत्र निकालते हुए कह उठे, ‘‘अरे हां, मैं भूल गया था. आज ही सरस्वती बूआ की चिट्ठी आई है. वे भी गंगासागर के लिए आ रही हैं. तुम जरा उन का विशेष खयाल रखना. बेचारी ने सारा जीवन दुख ही सहा है. वे मुझे बहुत चाहती हैं. शायद मेरे ही कारण उन की गंगासागर स्नान की इच्छा पूर्ण होने जा रही है.’’

सपना, जो थोड़ी देर पहले समझौते वाले मूड में आ गई थी, फिर बिफर पड़ी, ‘‘वे तो न जाने कहां से तुम्हारी बूआ बन बैठीं. हर कोई चाची, बूआ बन कर पहुंचता रहता है और तुम उन्हें अपना करीबी कहते रहते हो. इन बूढ़ी विधवाओं के खानेपीने में और झंझट है. जरा कहीं भी लहसुन व प्याज की गंध मिली नहीं कि खाना नहीं खाएंगी. मैं ने तो तुम्हारी इस बूआ को कभी देखा नहीं. बिना पूछे कैसे लोग मुंह उठाए चले आते हैं, जैसे हम ने पुण्य कमाने का ठेका ले रखा हो.’’

विकास शांत स्वर में बोले, ‘‘उस बेचारी के लिए कुछ न कहो. उस दुखियारी ने घरगृहस्थी का सुख देखा ही नहीं. बचपन में शादी हो गई थी. गौना हुआ भी नहीं था कि पति की मृत्यु हो गई. शादी का अर्थ भी नहीं समझा और विधवा का खिताब मिल गया. अपने ही गांव की बेटी थी. ससुराल में स्थान नहीं मिला. सब उन्हें अभागी और मनहूस समझने लगे. मायके में भी इज्जत कम हो गई.

‘‘जब भाइयों ने दुत्कारना शुरू कर दिया तो एक दिन रोतीकलपती हमारे दरवाजे आ पहुंचीं. बाबूजी से उन का दुख न देखा गया. उसी क्षण उन्होंने फैसला किया कि सरस्वती मुंहबोली बहन बन कर इस घर में अपना जीवन गुजार सकती है. उन के इस फैसले से थोड़ी देर के लिए घर में हंगामा मच गया कि एक जवान लड़की को सारा जीवन ढोना पड़ेगा, पर बाबूजी के दृढ़ व्यक्तित्व के सामने फिर किसी की जबान न हिली.

‘‘दादादादी ने भी सहर्ष सरस्वती को अपनी बेटी मान लिया और इस तरह एक दुखी, लाचार लड़की अपना परिवार रहते दूसरे के घर में रहने को बाध्य हुई. हमारी शादी में उन्होंने बहुत काम किया था. तुम ने देखा होगा, पर शायद अभी याद नहीं आ रहा. करीब 10 साल वे हमारे घर में रहीं. फिर एक दिन उन के भाईभतीजों ने आ कर क्षमा मांगी. पंचायत बैठी और सब के सामने आदरसहित सरस्वती बूआ को वे लोग अपने घर ले गए.

‘‘सरस्वती बूआ इज्जत के साथ अपने मायके में रहने लगीं. पर खास मौकों पर वे जरूर हमारे घर आतीं. इस तरह भाईबहन का अटूट बंधन अभी तक निभता चला आ रहा है. सो, सरस्वती बूआ को यहां किसी बात की तकलीफ नहीं होनी चाहिए.’’

सपना का गुस्सा फिर भी कम न हुआ था. वह भुनभुनाती हुई रसोई की तरफ चली गई.

12 जनवरी को सुबह वाली गाड़ी से सरस्वती बूआ के साथ 2 अन्य बुजुर्ग भी आ पहुंचे. नहानाधोना, खानापीना हुआ और विकास बैठ गए गांव का हालचाल पूछने. सरस्वती बूआ सपना के साथ रसोई में चली गईं तथा खाना बनाने में कुछ मदद करने का इरादा जाहिर किया.

सपना रूखे स्वर में कह उठी, ‘‘आप आराम कीजिए, थकीहारी आई हैं. मेरे साथ महरी है. हम दोनों मिल कर सब काम कर लेंगी. आप से काम करवाऊंगी तो ये नाराज हो जाएंगे. वैसे भी यह तो हर साल का नियम है. आखिर सब अकेले ही करती हूं. आप आज मदद कर देंगी, अगले साल कौन करेगा?’’

सरस्वती बूआ को सपना का लहजा कड़वा लगा. वे बड़े शौक से आई थीं, पर मुंह लटका कर वापस बैठक में चली गईं. एक कोने में उन की खाट लगी थी. खाट की बगल में छोटा स्टूल रखा था, जिस पर उन की गठरी रखी थी. वे चुपचाप गईं और अपने बिस्तर पर लेट गईं. विकास की घरगृहस्थी देखने की उन की बड़ी साध थी. बचपन में विकास ज्यादातर उन के पास ही सोता था. बूआ की भतीजे से खूब पटती थी.

बूआ की इच्छा थी, गंगासागर घूमने के बाद कुछ दिन यहां और रहेंगी. जीवन में गांव से कभी बाहर कदम नहीं रखा था. कलकत्ता का नाम बचपन से सुनती आई थीं, पूरा शहर घूमने का मन था. परंतु बहू की बातों से उन का मन बुझ गया था.

पर विकास ताड़ गए कि सपना ने जरूर कुछ गलत कहा होगा. बात को तूल न देते हुए वे खुद बूआ की खातिरदारी में लगे रहे. शाम को उन्होंने टैक्सी ली तथा बूआ को घुमाने ले गए. दूसरे दोनों बुजुर्गों को भी कहा, पर उन्होंने अनिच्छा दिखाई.

विकास बूआ को घुमाफिरा कर रात 10 बजे तक लौटे. बूआ का मन अत्यधिक प्रसन्न था. बिना कहे विकास ने उन के मन की साध पूरी कर दी थी. महानगर कलकत्ता की भव्यता देख कर वे चकित थीं.

इधर सपना कुढ़ रही थी. बूआ को इतनी तरजीह देना और घुमानाफिराना उसे रत्तीभर नहीं सुहा रहा था. वह क्रोधित थी, पर चुप्पी लगाए थी. मौका मिलते ही पति को आड़ेहाथों लिया, ‘‘अब तुम ने सब के सैरसपाटे का ठेका भी ले लिया? टैक्सी के पैसे किस ने दिए थे? जरूर तुम ने ही खर्च किए होंगे.’’

विकास खामोश ही रहे. इतनी रात को बहस करने का उन का मूड नहीं था. वे समझ रहे थे कि बूआ को घुमाफिरा कर उन्होंने कोई गलती नहीं की है, आखिर पत्नी उस त्यागमयी औरत को कितना जानती है. मैं जितना बूआ के करीब हूं, पत्नी उतनी ही दूर है. बस, 2-4 दिनों की बात है, बूआ वापस चली जाएंगी. न जाने फिर कभी उन का दोबारा कलकत्ता आना हो या नहीं.

खैर, 3-4 दिन गुजर गए. गांव से आए सभी लोगों का गंगासागर तीर्थ पूरा हुआ. शाम की गाड़ी से सब को लौटना था. रास्ते के लिए पूड़ी, सब्जी के पैकेट बनाए गए.

बूआ का मन बड़ा उदास हो रहा था. बारबार उन की आंखों से आंसू छलक पड़ते. विकास और उस के बच्चों से उन का मन खूब हिलमिल गया था. बहू अंदर ही अंदर नाखुश है, इस का एहसास उन्हें पलपल हो रहा था, पर उसे भी वह यह सोच कर आसानी से पचा गई कि नई उम्र है, घरगृहस्थी के बोझ के अलावा मेहमानों का अलग से इंतजाम करना,  इसी सब से चिड़चिड़ी हो गई है. वैसे, सपना दिल की बुरी नहीं है.

बूआ के कारण सपना को भी स्टेशन जाना पड़ा. निश्चित समय पर प्लेटफौर्म पर गाड़ी आ कर लग गई. चूंकि गाड़ी को हावड़ा से ही बन कर चलना था, इसलिए हड़बड़ी नहीं थी. विकास ने आराम से आरक्षण वाले डब्बे में सब को पहुंचा दिया. सामान वगैरा भी सब खुद ही संभाल कर रखवा दिया ताकि उन बुजुर्गों को सफर में कोईर् तकलीफ न हो.

गाड़ी चलने में थोड़ा वक्त रह गया था. विकास और उन की पत्नी डब्बे से नीचे उतरने लगे. बूआ को अंतिम बार प्रणाम करने के लिए सपना आगे बढ़ी और उन के पैरों पर झुक गई. जब उठी तो बूआ ने एक रूमाल उस के हाथों में थमा दिया. कहा, ‘‘बहू, इसे तू घर जा कर खोलना, गरीब बूआ की तरफ से एक छोटी सी भेंट है.’’

सिगनल हो गया था. दोनों पतिपत्नी नीचे उतर पड़े. गाड़ी चल पड़ी और धीरेधीरे उस ने गति पकड़ ली.

सपना को बेचैनी हो रही थी कि आखिर बूआ ने अंतिम समय में क्या पकड़ाया है? वे टैक्सी से घर लौट रहे थे. रास्ते में सपना ने रूमाल खोला तो उस की आंखें फटी की फटी रह गईं. अंदर सोने का सीताहार अपनी पूरी आभा के साथ चमचमा रहा था.

सपना उस हार को देख कर सुखद आश्चर्य से भर उठी, ‘बूआ ने यह क्या किया? इतना कीमती हार इतनी आसानी से पकड़ा कर चली गईं. क्या अपनी सगी बूआ भी ऐसा उपहार दे सकती हैं? धिक्कार है मुझ पर, सिर्फ एक बार ही सही, बूआ को कहा होता… ‘कुछ दिन यहां और ठहर जाइए,’ यह सोचते हुए सपना की आंखों से आंसू बहने लगे.

डायबिटीज से बचने के लिए क्या करना चाहिए?

सवाल

मैं 40 साल की हो गई हूं. मेरे परिवार में डायबिटीज की हिस्ट्री है. मतलब कि मेरे मायके और ससुराल दोनों तरफ. मेरे पति को 36 साल में डायबिटीज हो गई थी. मुझे डर लगा रहता है कि कहीं मुझे भी यह प्रौब्लम न हो जाए. खानेपीने के प्रति सतर्क रहती हूं लेकिन फिर भी डर लगा रहता है. कैसे मैं यह डर अपने मन से निकालूं?

जवाब

आप ज्यादा स्ट्रैस मत लीजिए. बस, समयसमय पर प्रीडायबिटीज चैकअप करवाती रहिए. प्रीडायबिटीज वह स्टेज होती है जहां खून में शुगर लैवल खतरे के निशान से ठीक करीब होता है. इस का मतलब कि अगर आप को प्रीडायबिटीज स्टेज के बारे में पता चल गया है तो यह डायबिटीज से बचने का आखिरी मौका होता है.

प्रीडायबिटीज को बौर्डरलाइन डायबिटीज भी कहा जाता है. प्रीडायबिटीज के स्पष्ट लक्षण नहीं होते हैं. यह कारण है कि अधिकांश लोगों को इस का पता भी नहीं चलता है. इस का पता लगाने के लिए डाक्टर ब्लड शुगर और ब्लडप्रैशर की जांच करता है. वैसे इस के सामान्य लक्षणों में शामिल है-बारबार पेशाब आना और प्यास बढ़ना.

अगर आप इस स्टेज पर डाक्टर की सलाह, डाइट और ऐक्सरसाइज का प्लान रखती हैं तो डायबिटीज की समस्या से बच सकती हैं.

अगर आप मोटापे की ओर अग्रसर हैं, वजन ज्यादा है या बीएमआई स्तर 25 से ज्यादा है तो आप को प्रीडायबिटीज टैस्ट जरूर करवा लेना चाहिए.

यदि आप प्रीडायबिटीज स्टेज में आ जाती हैं तो घबराने के बजाय सतर्क हो जाइए और जहां तक हो सके,

लो-ग्लैसीमिक फूड्स का सेवन करना शुरू कर दें. डाइट का खास खयाल रखते हुए लो शुगर डाइट लें. पर्याप्त मात्रा में रोजाना पानी का सेवन करें और फल व सब्जियों से अपनी प्लेट का 60 प्रतिशत हिस्सा कवर करें. रोजाना ऐक्सरसाइज को अपने रूटीन का हिस्सा बनाएं. समयसमय पर जांच करवाती रहिए.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem 

वर्ण व्यवस्था को पुख्ता करने की साजिश है ‘अग्निपथ’

सेना में किस जाति और धर्म के लोग किस अनुपात में जाते हैं इसका सटीक आंकड़ा किसी के पास उपलब्ध नहीं है लेकिन अंदाजा सभी का समान है कि सेना में पिछड़े वर्ग के युवा ज्यादा जाते हैं . कुछ साल पहले एक अंग्रेजी पत्रिका ने सर्वे कर खुलासा किया था कि भारतीय सेना मुसलमानों की तादाद महज 3 फ़ीसदी है लेकिन हिन्दू जातियों के कितने लोग जाते हैं इसका जबाब किसी के पास नहीं क्योंकि सेना में जातिगत आरक्षण नहीं है और न ही कभी जाति के आधार पर सैनिकों की गिनती हुई .

इससे यह अंदाजा लगाना आसान हो जाता है कि चूँकि सेना में दलित और सवर्ण न के बराबर जाते हैं इसलिए सबसे बड़ी तादाद पिछड़ों की है क्योंकि वे पढ़ लिख गए हैं , जागरूक भी हुए हैं और उनमें जज्बे और जूनून के साथ साथ दमखम भी है . अग्निपथ के विरोध में भी पिछड़े युवकों की तादाद ज्यादा नजर आ रही है क्योंकि वे कई सालों से भर्ती की तयारी कर रहे थे . ये पिछड़े गौरतलब है कि राजनीति में बहुत ऊँचे तक पहुँच चुके है , प्रशासन में भी इनकी भागीदारी बढ़ी है और जो इनमें भी नहीं हैं वे जाति के मुताबिक अपना छोटा बड़ा कारोबार चला रहे हैं . सवर्णों के बाद सबसे ज्यादा खेती की जमीनें भी इन्हीं के पास हैं .

यह ठीक है कि न्यायिक सेवा की तरह सेना के ऊँचे ओहदे अभी भी इनसे दूर हैं लेकिन जिस तेजी से पिछड़े युवा पढ़ाई लिखाई कर प्रशासन में ऊँचे पदों पर पहुँच रहे हैं उसे देख भगवा गेंग चिंता में थी कि कैसे इन्हें उपरी माले पर आने से रोका जाये क्योंकि आख़िरकार वर्ण व्यवस्था के लिहाज से ये हैं तो शूद्र  ही इसलिए इन्हें सेना में जाने से रोका जाना जरुरी है .

निश्चित रूप से सेना में जाने का सपना वही युवा देखते हैं जिनमें जूनून होता है और जिन्हें जल्द नौकरी चाहिए होती है तय यह भी है कि ये युवा अधिकतर गरीब से ही होते हैं जिन्हें सेना की इज्जतदार नौकरी तगड़ी पगार और दीगर सहूलियतें जो रिटायर्मेंट के बाद भी मिलती हैं और सेना में भर्ती के लिए उकसाती भी रही हैं .पिछड़ों का यह वह तबका है जो खुद को सवर्ण तो समझता है लेकिन जानता है कि वह ऊँची जाति बालों की निगाह में तिरस्कृत है यानी शुद्र के समकक्ष है . हिन्दू धर्म ग्रंथों में इन्हें सछूत कहा गया है यानी इन्हें छू जाने से पाप नहीं लगता . लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि इनसे ऊँची जाति बालों ने रोटी बेटी के सम्बन्ध स्थापित कर लिए थे या अब करने लगे हैं .

साल 1925 में ब्रिटिश सैन्य अधिकारीयों ने भारत की समस्त जातियों को 2 वर्गों योद्धा और गैर योद्धा में बांटा था . दूसरे वर्ग में उन जातियों को रखा गया था जो आराम पसंद होकर सुविधाजनक जीवन जीती है . इस वर्ग में मुख्यत ब्राह्मण और वैश्य आदि रखे गए थे . राजपूत या क्षत्रिय चूँकि लड़ाकू होते थे देश की रक्षा की जिम्मेदारी संभालते थे और उनमें नेतृत्व क्षमता भी होती थी इसलिए उन्हें ऊँचे पद दिए गए इससे उनकी जातिगत ठसक बरकरार रही .इसके बाद अंग्रेजों ने अपनी भर्ती नीति में उन लोगों को जगह दी जिनकी शिक्षा तक पहुँच नहीं थी और जो नेतृत्व भी नहीं कर सकते थे . इसलिए इन्हें नियंत्रित करना आसान काम था .

इस वक्त एक सैन्य इतिहासकार जेफरी ग्रीनहंट ने कहा था , जो भारतीय बुद्धिमान और शिक्षित थे उन्हें कायर करार दिया गया जबकि अशिक्षितों और पिछड़ों को बहादुर कहा गया . सेना भर्ती के लिए अंग्रेजों ने भारतीय जातियों के इतिहास को खंगाला और पाया कि ऊँची जाति बाले उनके काम के नहीं , काम के उन जातियों के लोग हैं जो वफ़ादारी के नाम पर अपनी जान तक दे सकते हैं . इन जातियों में अहीर , कोली , मीणा , अवान , भूमिहार , त्यागी ,बलोच , गुर्जर , कुर्मी , जाट , सिक्ख , खोखर , मुस्लिम पठान , मनिहार , राजपूत , सैनी , नाइ , नन्दवंशी , गोरखा , रेड्डी , तमोली आदि प्रमुख थीं

सौ सालों में थोड़े बहुत ही बदलाब हुए हैं सेना में आज भी ये बहादुर ही ज्यादा जाते हैं जो अब पिछड़े कहलाने लगे हैं . पीढ़ी दर पीढ़ी मिलिट्री में जाने बालों के अनेकों उदाहरण मिल जाते हैं . यह अघोषित आरक्षण व्यवस्था थोड़े बद्लाबों और फेरबदल के साथ अभी तक जारी है .अग्निपथ स्कीम को लेकर यही पिछड़े युवा सबसे ज्यादा तिलमिलाए हुए हैं जिनके जेहन में पूरी पगार , आजीवन पेंशन , रिटायर्मेंट के बाद भी रोजगार और बहुत सी सहूलियतें जो एक बेफिक्र जिन्दगी की गारंटी होती हैं उमड़ घुमड़ रहीं थीं लेकिन नए फरमान ने उनके सपने तोड़ दिए हैं तो वे सड़कों पर आकर विरोध और तोड़ फोड़ कर रहे हैं .

इसमें कोई शक नहीं रह जाता कि मोदी सरकार की मंशा इन पिछड़े युवाओं की जिन्दगी ख़राब करने और तरक्की न करने देने की है सरकार की चाल यही है कि चार साल बाद ये कहीं के न रह जाएँ वर्ना तो नियमित भर्ती के बाद जब ये रिटायर होते हैं तो इनके खीसे में खासा पैसा होता है जिससे वे अपने बच्चों को पढ़ा लिखाकर बड़ा आदमी और साहब बनाने का सपना पूरा करने लगते हैं . इनके बच्चे अब प्रतियोगी परीक्षाओं में अगड़ों को पटखनी देने लगे हैं . हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी में मेरिट में आने लगे हैं जो सवर्णों को अखरता है .

सार्वजानिक उपक्रम बेचकर आरक्षण खत्म किया जा रहा है , संविदा पर वे नौकरियां दी जा रही हैं जिनमे आरक्षण लागू नहीं होता , सरकार वेकेंसी ही नहीं निकाल रही इससे खुश सवर्ण वर्ग है क्योंकि उनके बच्चों को स्पेस मिलने लगा है . अब नया शिगूफा अग्निसाक्षी का छेड़ा गया है जिससे दलित पिछड़े आदिवासी और पहाड़ी युवक 12 बी के बाद सीधे अग्निवीर बन कर अपने लिए आगे के रास्ते  बंद कर लें .चार साल की अमावसी चांदनी के बाद अग्निवीर आगे पढ़ पाएंगे इसमें शक है क्योंकि इस मियाद में वे शिक्षा से पूरी तरह कट जायेंगे .यानी थोक में एकलव्य पैदा होने की साजिश रची जा रही है यह और बात है कि कलयुग का एकलव्य अपना अंगूठा कटवाने राजी नहीं हो रहा

विरोध कब कहाँ जाकर रुकेगा कहा नहीं जा सकता लेकिन यह जरुरु साफ़ दिख रहा है कि अग्निपथ गरीब छोटी जाति बालों के लिए ही रचा गया चक्रव्यह है जो हर लिहाज से ऊँची जाति बाले युवाओं के लिए वरदान साबित होगा . जैसे ही अग्निवीरों की वेकेंसी निकलेंगी छोटी जाति बाले गरीब युवा अपना नुकसान भूलभाल कर इस नौकरी की तरफ दौड़ेंगे क्योंकि उन्हें हर महीने मिलने बाली 21 से 25 हजार की पगार दिखेगी . हालातों से अपने नुकसान की शर्त पर समझौते की बेबसी इस वर्ग की हमेशा से ही नियति रही है और इस बात को यह चक्रव्यूह रचने बाले आचार्य द्रोणाचार्य बेहतर जानते समझते हैं .

50 हजार युवा सीधे सीधे प्रतियोगी परीक्षाओं की रेस से बाहर हो जायेंगे और रिटायर्मेंट के बाद न तो ग्रेजुएट हो पाएंगे और न ही एम्बीए सहित कम्प्यूटर के टेक्निकल कोर्स कर पाएंगे . प्रतिस्पर्धी कम होने का फायदा फिसड्डी  सवर्ण युवाओं को मिलेगा और उनके अभिभावकों को कम दाम के मजदूर मिलते रहेंगे यानी वर्ण शोषण की भगवा साजिश हर सूरत में कामयाब होती दिख रही है .  . .

Anupamaa: GK काका सुनेंगे बरखा का प्लान तो अनुपमा लगाएगी लताड़

टीवी सीरियल अनुपमा (Anupamaa) में इन दिनों बड़ा टविस्ट देखने को मिल रहा है. जिससे फैंस को हाईलवोल्टेज ड्रामा देखने को मिल रहा है. शो के बिते एपिसोड में आपने देखा कि पाखी अनुपमा के घर जाने की जिद करती है, वनराज उसे मना करता है फिर पाखी बदतमीजी करती है. समर और तोषु भी समझाते हैं लेकिन पाखी नहीं मानती है. शो के अपकमिंग एपिसोड में खूब धमाल होने वाला है. आइए बताते हैं शो के नए एपिसोड में.

शो में आप देखेंगे कि बरखा अनुपमा से कहती है कि उसे अनुज की पत्नी होकर डांस अकेडमी चलाना शोभा नहीं देता. अनुपमा उसे  करारा जवाब देती है और कहती है कि यहां तक आने के लिए उसने काफी लड़ाई लड़ी है. उसने मेहनत से अपनी पहचान बनाई है.

 

शो में ये भी दिखाया जाएगा कि बरखा की बेटी सारा अनुपमा का डांस अकेडमी ज्वाइन करती है. अनुपमा उसे इसकी फीस के बारे में बताते हुए कहती है कि इसके लिए उसे हर दिन एक कप चाय बनानी होगी तो बरखा कहती है कि सारा को चाय बनाने नहीं आती.

 

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तो दूसरी तरफ वनराज समर से कहता है कि अनुपमा अनुज की पत्नी बन गई है और उसे लगता है कि वो डांस अकेडमी अब नहीं आएगी. वो दोनों अनुपमा को वहां देखकर चौंक जाते हैं.

 

शो में ये भी दिखाया जाएगा कि बरखा, आदिक से कहती है कि अगर बिजनेस करने में अंकुश फेल होता है तो उसे बिजनेस संभालना चाहिए. जीके काका उन दोनों की बातें सुन लेते है और शॉक्ड हो जाते हैं. शो के नये एपिसोड में आप देखेंगे कि पाखी, किंजल, समर, अनुपमा से मिलने कपाड़िया हाउस आते है.

समर ने अपनी भाभी संग करवाया फोटोशूट, देखें Viral Photos

अनुपमा  फेम किंजल यानि निधि शाह (Nidhi Shah) सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती है. वह अक्सर फैंस के साथ हॉट फोटोज और वीडियोज शेयर करती रहती हैं. अब उन्होंने अपने ऑनस्क्रीन देवर यानी पारस कलनावत (Paras Kalnawat)  संग फोटोशूटस करवाया है. दोनों का फोटोज सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है.

हाल ही में खबर आई थी कि निधि शाह जल्द ही अनुपमा को अलविदा कहने वाली हैं दरअसल वह किसी और प्रोजक्ट पर काम करने वाली है.  इस बीच निधि शाह ने सोशल मीडिया पर अपने नए फोटोशूट से सनसनी मचा दी है.

 

इन तस्वीरों में आप देख सकते हैं निधि शाह अपने ऑनस्क्रीन देवर समर यानी कि पारस कलनावत संग नजर आ रही हैं. तस्वीरों में दोनों का नया अंदाज देखने को मिल रहा है.

 

समर और किंजल की फोटोज पर फैंस लगातार कमेंट कर रहे हैं. फैंस जमकर दोनों की तारीफ कर रहे हैं. निधि शाह के किरदार को अनुपमा में खत्म करने के लिए मेकर्स कहानी में नया मोड़ लेकर आने वाले हैं. खबरों के मुताबिक अनुपमा में जल्द ही किंजल का एक्सीडेंट होगा और उसकी मौत हो जाएगी. इसके बाद अनुपमा ही किंजल के बच्चे को संभालेगी. शो में अनुपमा और अनुज कपाड़िया के रिश्ते में दरार भी देखने को मिलेगा.

 

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